शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

ईश्वर-विमर्श

ईश्वर-विमर्श

आज ईश्वर-विमर्श पुनः प्रासंगिक हो गया है । साम्यवादी विचारधारा और आन्दोलन के कमजोर पड़ने के बाद धर्म आधारित गैर राजनीतिक राष्ट्रीयताओं का विश्व-स्तर पर ध्रुवीकरण विश्व-मानवता के लिए एक समस्या और चुनौती के रूप में उभरा है । यह सब भूमंडलीकरण की स्वाभाविक प्रक्रिया के अन्तर्गत होता दिख रहा है । क्षेत्रीयता की भौगोलिक बाधाएं समाप्त होते ही बिखरी हुई अस्मिताएं दैत्याकार ढंग से सहसा वैश्विक हो उठी हैं ।
एक अन्य समस्या प्राचीन सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों के नवीनीकरण यानि आधुनिकता-बोध का है ।कम संसाधनों एवं अधिक जनसंख्या वाले एशियाई मूल के धर्म आधारित समाज लम्बे समय से कठोर धार्मिक नियमों एवं संयम द्वारा ही स्वयं को बचाए हुए थे । यद्यपि उनका भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक अवचेतन चरित्र और आचरण का भिन्न-भिन्न प्रादर्श उपलब्ध कराता है । ये जातीय साम्प्रदायिक गैर राजनीतिक राष्ट्रीयताएं आधुनिक राज्यों की राजनीतिक राष्ट्रीयताओ को अपने ढंग से बाधाएं एवं चुनौतियां देती रहती हैं ।
बौद्ध धर्म को छोड़ दिया जाय तो ईश्वर की आदिम अवधारणा विश्व के सभी धर्मों का आधार है । ईश्वर की मिथकीय परिकल्पना और चरित्रीकरण मे ही एक संस्कृति को मानने वाली बड़ी जनसंख्या की सभ्यता के अवचेतन सूत्र छिपे हैं ।
धर्मों को उनके अनुयायियों पर पडने वाले प्रभाव या यह कहें कि संस्कार-स्वभाव की दृष्टि से तीन प्रकार का देखा जा सकता है-निर्विचारवादी विचारवादी और भाववादी, । बौद्धों की विपश्यना तथा गीता का स्थिति प्रज्ञ ,जैन धर्म की का मोक्ष और कैवल्य तथा बौद्ध धर्म का परम सत्य निर्वाण आदि निर्विचारता को ही दुख-मुक्ति का उपाय या समाधान मानने वाले धर्म हैं ।ईसाई और इस्लाम जैसे सेमेटिक धर्मों को विचार जीवी धर्म कहने का तात्पर्य यह है कि इन धर्मों मे ईश्वर के साथ-साथ शैतान की भी समानान्तर अवधारणा के कारण इनका द्वंद्वात्मक सांस्कृतिक अवचेतन सफल जीवन के लिए सतत विचारक सजगता एवं सन्देहशील जीवन-पद्धति को प्रस्तावित करता है । सेमेटिक धर्मों की विचारजीविता का आधार उनका यह सांस्कृतिक विश्वास भी है कि इस सृष्टि को उसके निर्माता ईश्वर ने किसी बढ़ई या कलाकार की तरह बाहर से बनाया है । कहने का तात्पर्य यह है कि सेमेटिक विश्वास के अनुसार सृष्टि और उसके निर्माता ईश्वर अलग-अलग भिन्न अस्तित्व के रूप मे है । यद्यपि स्टीफ़न हाकिंग ने इस अवधारणा को खारिज कर दिया है लेकिन खारिज होने के बाद भी यह सांस्कृतिक अवधारणा पश्चिम के सम्पूर्ण विकास एवं आधुनिक वैज्ञानिक सभ्यता कि आधार है । प्रकृति की हर संरचना के पीछे ईश्वर का मस्तिष्क होने की परिकल्पना ने उनके पूर्वजों को प्रेरित किया कि सेमेटिक धर्म का सबसे प्रमुख उदाहरण सनातन कहा जाने वाला हिन्दू धर्म है ।
भारतीय वर्ण व्यवस्था और जाति-प्रथा ने जिस स्थाई लौह सामाजिक संरचना का निर्माण किया उससे प्रतिक्रियात्मक संतुलन के लिए मुक्ति और मोक्ष की अवधारणा का भी मिथकीय महिमामंडन किया । उसने यथास्थिति की एक दार्शनिकी रची जिसमे इस जन्म, जीवन और जगत मे कुछ भी नहीं बदलना था । बदलाव के लिए असंतुष्ट होने पर अगले जीवन के जन्म की प्रतीक्षा करनी थी । सनातन धर्म को जो आदिम कबीलाई संस्कार प्राप्त हुआ था उसमें आनुवांशिक उत्तराधिकार के कारण क़बीले के मुखिया की तरह राजा के भी नेतृत्व को प्रश्नाकित नहीं किया जा सकता था । सबसे विचित्र सांस्कृतिक निर्माण स्वयं ब्राह्मण वर्ण का ही देखने में आता है । इस जातीय समूह को श्रेष्ठ और सम्मानित कहकर मूर्ख बनाया गया । इसे भिखारी के रूप मे जीवनयापन के लिए अभिप्रेरित किया गया । इसे स्वयं महत्वाकांक्षा से रहित रहते हुए दूसरों के लिए महत्वाकांक्षा से रहित जीवन जीने के लिए आदर्श उपस्थित करना था । स्पष्ट है कि वह स्वयं नेतृत्व को चुनौती न देने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक संविधान का एक हिस्सा था । वह पीढ़ी दर पीढ़ी महामंत्री तक ही हो सकता था । उसका कार्य स्वयं निरीह संतोषपूर्ण जीवन जीते हुए दूसरों को भी निरीह-दयनीय महान बनाना था ।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के कारण सबके पास भूसम्पत्ति न होने के कारण सामाजिक-सांस्कृतिक कर के रूप मे दान देने को महिमामंडित किया गया । यक एक तरह से राजस्व का विकेन्द्रीकरण था । इससे राजा बदलने या अराजक समय मे भी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं का आर्थिक पोषण बाधित नहीं हुआ । लेकिन इसी दान-व्यवस्था के सांस्कृतिक अवचेतन ने आधुनिक काल मे घूस लेने और पहचाने कि नैतिक आधार तैयार किया । क्योंकि साक्षरता का पारिवारिक संस्कार होने के कारण आधुनिक काल मे ब्राह्मण-पुत्रों के लिए शिक्षित होकर नौकरियों मे आना आसान था ,इनकी अधिक संख्या ने दान लेने के स्थानापन्न के रूप मे घूस लेने को नैतिकता से मुक्त कर दिया और इसे असंवैधानिक प्रचलन मे लालबहादुर दिया । यह सब अवांतर प्रसंग धर्म और ईश्वर से सम्बन्धित लगते तो हैं लेकिन वास्तव मे हैं नहीं ।
मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से ईश्वर हमारी अभिभावक और जन्मदाता प्रकृति ,पारिवारिक धरातल पर पिता,राज्य के धरातल पर राजा ,राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आदि का मनोवैज्ञानिक प्रत्ययीकरण है । एक रहस्य यह भी है कि मकान बना लेने के पहले तक हमारे जंगली पूर्वज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने समूह पर ही निर्भर रहे । भेड़ियों, हाथियों और चींटियों की तरह मनुष्य भी एक सामाजिक प्राणी है । जैसा कि इन सभी सामाजिक प्राणियों मे अकेले रहने की एक नैसर्गिक अनिच्छा देखने को मिलती है । हम सभी को अपना एकाकी जीवन व्यर्थ लगने लगता है । अकेलापन एक अपूर्ण का अहसास कराता है । माता-पिता और समाज की अनुपस्थिति मे ईश्वर का सर्वव्यापी प्रत्यय इसी रिक्त स्थान की पूर्ति मे अवस्थित रहा है । इन विचारों से अलग ईश्वर और धर्म के नामपर हमारे पूर्वजों द्वारा अन्वेषित समझदारी और जीवनानुभव भी एक जीवन-पद्धति और मूल्य-व्यवस्था के रूप मे हमे विरासत में प्राप्त हुए है । इनकी जांच-पड़ताल तथा ग्रहण-त्याग के विवेक ने ही मुझे अपनी आस्था और विवेक के ईश्वर को बदलने का साहस दिया है । इस कृति के नामकरण के औचित्य का एक आधार यह भी है कि लोगों के विवेक की जड़ता प्रायः उनके समुदाय और समाज के विवेक के सापेक्ष होती है । मैने अपने ज्ञान और विचार के प्रकाश मे अपनी आस्था और ईश्वर की अवधारणा को बदला है । हाॅ, इतना मै अवश्य चाहता था कि यह कृति दूसरों को अपनी आस्था को बदलने की चुनौती तो दे लेकिन संवेदनशील होने के कारण अपने समूह के विवेकसम्मत बने रहने की आजादी हिंसक ढंग से न छीने । क्योकि भावी आस्था की खोज पूरी मानवजाति को करनी है और यह प्रक्रिया मानवजाति के अस्तित्व-पर्यन्त पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहेगी ।
रामप्रकाश कुशवाहा

मूर्ति-पूजा और भारतीय धर्म

मूर्ति-पूजा और भारतीय धर्म

संस्कृत जैसी व्यवस्थित भाषा का विकास करने मे सक्षम भारतीय धर्म तथा संस्कृति(मूर्ति, मन्दिर एवं पूजा पद्धति आदि ) अपनी प्रकृति मे प्रतीकात्मक तथा चारित्रिक आख्यान के रूप मे होने से प्रायः साहित्यिक प्रकृति के हैं । इसीलिए मै इन्हे कबीलाई धर्मों की तरह विशुद्ध अन्धविश्वास की तरह ही नहीं देख पाता । भाषावैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधारो पर मै मिथकीय प्रतीकों के कूट अर्थ को तोडने का प्रयास करता रहता हूँ । ऐसा करने की प्रेरणा मुझे उन कबाडियो से मिलती है जो निष्प्रयोज्य के विसर्जन से पहले उनमें से धातुओं को निकाल लेते हैं । मैं यह नहीं भूलता कि बुद्ध काल तक हमारा अतीत विचारपूर्ण बहसों का था। साधना का लक्ष्य जीवन का परिष्कार था और कपिल , चार्वाक और वृहस्पति जैसे अनीश्वरवादी चिन्तक भी हुए हैं ।
गीता हो या पतंजलि के योग-सूत्र, महावीर हो या बुद्ध सभी की चिन्ता सभी की चिन्ता मानव-मन के नियमन की ही रही है । वै अपराध कितना कम कर पाए यह एक अलग प्रश्न है लेकिन उन्होने एक शिष्ट जीवन-पद्धति देकर जीवन एवं समाज का सामूहिक प्रबन्धन करने का प्रयत्न अवश्य किया । वे मस्तिष्क को इस सीमा तक प्रशिक्षित करने में तो सफल हुए ही कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियाॅ के क्रिया-कलाप भी मानव-मस्तिष्क के विवेक की सीमा मे आ जाएँ । अकरणीय या वर्जनाओ से सम्बन्धित कुछ सांस्कृतिक युक्तियाँ भी आधुनिक मनोविज्ञान सम्मत हैं । जातीय एवं स्थानीय होते हुए भी उनकी काव्यात्मक भावोदात्तता एवं सामाजिक सार्थकता पर रीझने को मन करता है । जैसे ब्रह्मचर्य आश्रम के नाम पर पचीस वर्ष तक यौन हारमोनो का सिर्फ सामना करने के लिए देना आज की वयस्कता आयु-सीमा से भी अधिक है । भाई और बहन के बीच रक्षाबंधन जैसे त्यौहार, छोटे भाई की पत्नी का बडे भाई से विवाह की अनुमति न देना आदि ऐसी ही रेखांकित करने योग्य वर्जनाएं हैं । हर आता हुआ नया पुरुष अपनी ही देह के भीतर एक युद्ध लड़ता और जीतता हुआ आता है । अपने ही जीवन के वेगों को जीतने के लिए किया जाने वाला युद्ध ।
                आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य का समर्थन करता है कि इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किसी संवेदना का प्रत्यक्षीकरण मस्तिष्क की धारणाओं, विश्वासों तथा व्याख्याओं के अनुरूप होता है । आध्यात्म के नाम पर अनेक सोद्देश्य किन्तु काल्पनिक और हास्यास्पद अवधारणाओं के बावजूद सांस्कृतिक नियामक झूठ बोलकर भी अनेक पशुओं, पक्षियों तथा वनस्पतियों सहित पर्यावरण को अधिकतम सीमा तक बचाने मे सफल रहे हैं । इस विधि से संरक्षित पर्यावरण में पितर घोषित कौओं से लेकर बन्दर, चूहे, सर्प,नीलकण्ठ,उल्लू,हाथी ,सिंह, और गाय-बैल ,नदियाँ सभी शामिल हैं ।
               व्यवस्थित ढंग से संघ यानि संगठन बनाकर ,आज के शब्दों मे कहें तो संस्थागत रूप से लोगों तक अपने आदर्श के अनुरूप विचार पहुँचाने का कार्य गौतम बुद्ध ने किया था । उनके पहले लोक को उनकी भाषा मे ही संबोधित करने की चिन्ता और किसी मे नही दिखती ।उनके पूर्व के जननायकों के यश का आधार अभिजन या विशिष्ट वर्गीय स्वीकृति रही है । बुद्ध को लम्बा जीवन मिला था । लोक के लिए बोधगम्य दृष्टान्त कथाएं जिन्हे जातक कथाएं कहा गया खूब रची गयीं । भव्य व्यक्तित्व के कारण बुद्ध को ही प्रतिमान के रूप मे विज्ञापित किया गया । संगठन और संसथाओ की अपनी सामूहिकता होती है । पूरा जीवन समर्पित कर चुके बुद्ध के अनुयायियों के पास इतना जीवन-समय था कि वे 'अप्प दीपो भव 'की चिन्ता छोड़ कर बुद्ध की मूर्तियों की रचना मे लग गए । ऐसा लगता है कि विदेशों मे बहुत से ऐसे भी धर्म प्रचारक पहुँचे जो बुद्ध का दर्शन फैलाने के स्थान पर आजीविका के लिए मूर्ति स्थापित कर पूजा करवाने मे लग गए । अरब वगैरह तक पहुँचते-पहुँचते यही बुद्ध मात्र मूर्ति स्वरूप बुत हो गये । ऐसा लगता है कि मुहम्मद साहब ने इस्लाम प्रवर्तन के समय जिन बुतो को तुड़वाया होगा -व्हाॅ बौद्ध धर्म के दार्शनिक पक्ष से पूरी तरह अनभिज्ञ बुद्ध की मूर्तियों की सिर्फ पूजा करने वाले पुरोहित रहे होंगे । यह भी कि असली दार्शनिक बौद्ध धर्म विश्व के बहुत से हिस्सों में नहीं पहुँचा । या फिर पूर्व प्रचलित शिवलिंगो की पूजा की तर्ज पर बुद्ध यानि बुत पूजा भी सुदूरवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित रही ।
               साफ है कि भारत मे भी बौद्ध धर्म को पहले मूर्तिपूजा मे बदला गया और फिर उनको देखते हुए बुद्ध की तर्ज पर दूसरे पौराणिक नायकों की भी मूर्तियाँ बनने लगीं । मूर्तिपूजा से दिमाग को आराम मिला और चढावे की संस्कृति विकसित हुई । जैसा कि प्रायः देखने मे आता है कि पेशे विचार और दर्शन को भी बाजार की एक उपस्थिति मे बदल देते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्ध काल से पहले का प्राचीन भारत मूर्तियों और मन्दिरों का देश नहीं रहा है । उनके पास ग्रामीण एवं नागरिक समाज थे जिनमें वैचारिक बहसे चलती रहती थीं । ऐसा नहीं है कि उनके पास आस्धा की पथराई हुई शिलाएँ बिल्कुल नहीं थी । भोले माने जाने वाले सबसे सरल अनगढ़ पाषाण- देवता आदि शिव तब भी थे । स्त्री-पुरुष के सृजनांगो तथा ब्रह्माण्ड के अनगढ़ प्रतीक के रूप में । बुद्ध के पहले की आस्था का स्वरूप साहित्यिक आख्यानों और विमर्शो के रूप में रहा है । इसीलिए ऐतिहासिक यथार्थ को देखते हुए मुझे मूर्तियों और मन्दिरों वाला भारतीय धर्म कम बुद्धि के लोगों एवं बच्चों के लिए लगता है । इन मूर्तियों का वास्तविक रहस्य इनके साहित्यिक पाठ मे है । पौराणिक नायकों के प्रतीकार्थ और चारित्रिक आख्यानों मे है । सिर्फ उन अंशो को छोड़कर जिसे अपनी आजीविका और पेशेवर स्वार्थ के कारण पुरोहित वर्ग ने लोगों का भयादोहन कर अर्थार्जन के लिए रची हैं ।
           इस दृष्टि से राम भी हमारी सभ्यता के बीज-पुरुष ही लगते है । वे एकल दाम्पत्य के आदि प्रतिमान हैं और किसान-सभ्यता की कौटुम्बिक संरचना का भी । इस दृष्टि से हर वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन पर्यन्त किसी एक ही महिला से विवाह का संकल्प ले रखा हो -मुझे राम का प्रतिरूप ही लगता है । संभवतः तुलसीदास जी ने भी इसी दृष्टिकोण से ही 'सिया राम मय सब जग जानी ' कहा था । यह अकारण नही है कि आराम मे भी राम है और हराम मे 'हे राम' यानि शिकायत के रूप में है
इससे पता चलता है कि अरबी और फारसियो के पुरखे भी राम से प्रभावित देश रहे ही होंगे । एक विवाह करने वाले ईसाइयों और मुसलमानों को भी राम का अनुगामी तो माना ही जा सकता है । यद्यपि जो लोग होमर की कृतियों और ट्राय युद्ध से परिचित होंगे या सिकन्दर की लड़ाइयों से भी परिचित होगे , उन्हे रामकथा के अनेक अंश समानधर्मा लग सकते हैं । लेकिन इतने लम्बे काल तक चले कुलीनतंत्र मे सन्तानहीन होने के कारण किसी राजवंश का खतरे मे पडना और नियोगप्रथा द्वारा वंश चलाने का प्रयास असंभव नही लगता । मैने कुछ भिन्न आधारों पर भारतीय अतीत की पडताल की है । जिससे सम्बन्धित आलेख मेरी प्रकाशनाधीन पुस्तक-"सभ्यता का पुनःपाठ " मे है ।
रामप्रकाश कुशवाहा
93/01/2020

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

जाति-प्रथा

जाति-प्रथा


जब तक किसी समूह के सदस्य एक-दूसरे के अधिकतम समरूप बने रहने के प्रयास में दूसरे समूह से भिन्न बने रहेंगे भारत में जाति -प्रथा नाम-रूप बदलकर किसी न किसी रूप में बनी रहेगी | जातिविहीनता का आदर्शवाद तभी संभव है जब सभी असामाजिक हो जाएँ और समूह के आदर्शों को जीना बंद कर दें | जाति भी मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने के कारण ही अस्तित्व में बने हुए हैं | भारत में जातिवाद किसी ब्राह्मण या ब्राह्मण समुदाय द्वारा बनाया गया नहीं है ,बल्कि उसकी ऐतिहासिक पारिस्थितकी की उपज है |उपजाऊ देश होने के कारण प्राचीन काल से ही अलग-अलग समूह भारत में बसने के लिए आते गए और जातियाँ बढ़ती गयीं | यदि दूसरे की सामूहिक भिन्नता को स्वीकार करना ही जातिवाद है तो ऐसे जातिवाद को भारतीय इतिहास के लिए प्रगतिशील भी माना जा सकता है | हम सभी जानते हैं कि मध्यकाल में जब पुलिस व्यवस्था हमेशा ही ठीक नहीं रही होगी तो जातियों नें ही अपने सदस्यों का चारित्रिक नियमन किया होगा | जाति प्रथा भी मनोवैज्ञानिक दंड और पुरष्कार-प्रथा के आधार पर ही हजारों वर्षों तक ऐसा करती रहीं | जाति प्रथा की यह प्रगतिशील भूमिका थी | सबको समान रूप में जीने के लिए दबाव बनाना भी हिंसा है | जाति -प्रथा नें अलग-अलग समूहों को अलग -अलग रीति-रिवाजों को जीने की स्वायत्तता दी | भारत में जातिप्रथा इसलिए बुरी है कि धार्मिक आधार पर श्रेणीकरण करने के कारण कुछ लोगों को निचले दर्जे पर कर दिया गया | इससे चर्म-उद्योग से जुडी जातियां अधिक घाटे में रहीं और अछूत तक करार दी गयीं । ब्राह्मणों ने इनके (बौद्ध एवं जैन धर्म की) अहिंसावाद की प्रतिस्पर्धी मे अधिकांशतः मांसाहार छोड़ कर शाकाहार अपनाया । तभी इन दोनो धर्मों का प्रभाव कम कर अपने वर्चस्व की पुनर्स्थापना कर पाए । भारतीय इतिहास मे वर्णवादी और जातिवादी नर्क की सृष्टि करने वाले शासकों मे पुष्यमित्र शुंग और पेशवाओ का नाम सबसे पहले लिया जाता है । मनुस्मृति का प्रवर्तन काल भी यही है । क्योंकि इसने बौद्धों का विस्तृत मौर्य साम्राज्य सेनापति के रूप मे अपने शासक की हत्या कर प्राप्त किया था- इस लिए बहुत कम समय मे बौद्धधर्म मतावलम्बियों का भारत भूमि से उच्छेदन किया । जैसा कि सभी जानते हैं कि सत्ता कूटरचना और अहंकार की सृष्टि करती है । ब्राह्मणों के पास दो बार सत्ता आयी । दोनो बार ही इसने अपनी श्रेष्ठता, दिव्यता और पवित्रता के पाखण्डपूर्ण विज्ञापन कै लिए समानतावाली मानवता के विरुद्ध विषमता का इतिहास रचा । शूद्रों को अस्पृश्य घोषित कर जिस विभाजनकारी जातीय हिन्दू धर्म की नीव रखी उसने एक बडी जनसंख्या को समायोजन की दृष्टि से अक्षम तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बीमार बनाया । कहते हैं हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप द्वारा मानसिंह के साथ भोजन न करने के कारण हुआ था । उस अन्धविश्वासों वाले युग मे बहुत बड़ी जनसंख्या उनके कुओं मे गाय की हड्डी डालकर सिर्फ़ ढिंढोरा पीटकर अवगत करा देने मात्र से धर्म परिवर्तन के लिए विवश हुई । मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भारत मे आया इस्लाम उच्चवर्ण की शूद्र ग्रन्थि और अवधारणा का शिकार हुआ । इस मनोग्रन्थि ने भी हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या को और बढाया है ।
आज वैश्विक अनुरूपता की धारा बह रही है | नस्लीय या अनुवांशिक भिन्नता को छोड़ दे तो समान शिक्षा-दीक्षा और रहन-सहन के कारण आज समूह की भिन्नता भी कम हो रही है | आज जाति-प्रथा किसी बौद्धिक या वैचारिक आधार पर नहीं बल्कि वैवाहिक सुविधा , आलस्य और सामाजिक तंत्र के आधार पर बची हुई है | इसकी शक्ति भी सामाजिकता की ही शक्ति है | क्योकि कुछ जातियों का राजनीतिकरण हो चुका है इसलिए उनका संगठनात्मक हित जाति प्रथा को बनाए रखने में हो गया है | इस कारण ही जाति से बाहर निकलने के वैयक्तिक प्रयास भी प्रभावी नहीं हो रहे हैं | आजादी के पूर्व साम्प्रदायिकता की समस्या के उभार के कारण मुख्यधारा की राजनीति ने भारतीय मूल की जनसंख्या के घृणित जातीय विभाजन के मुद्दे को बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के हस्तक्षेपपूर्ण प्र्रयास के बावजूद दबायें रखा । आजादी के बाद ही जातिवाद का सबसे निकृष्टतम रूप देखने को मिला । चाहे नेहरू रहे हो या इंदिरा गांधी - कान्ग्रेस कुलीनतंत्र की पोषक होती गयी और उसके सिपहसालार तथा उसके शासनकाल की नौकरशाही उच्च वर्गीय जातिवादी । इस भ्रष्टाचार से जिन लोगों ने भी नौकरियां पायीं-चाहे वे नौकरशाह रहे हो या प्रोफेसर-जातीय सम्बन्ध के आधार पर नियुक्तियां पाने से बनेे तंत्र के अधिकारियों कर्मचारियों और शिक्षकों की दूसरी पीढ़ी ने बडी निर्लज्जता से जातिवाद फैलाया । राजनीति से लेकर नौकरशाही तक फैले इस भ्रष्टाचार को सबसे पहले जाट नेता चौधरी चरण सिंह ने सार्वजनिक मुद्दा बनाया । मंडल कमीशन, विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं कांशीराम की राजनीति उसके बाद की है । वर्तमान सरकार के भीतर घुसा उच्च वर्गीय नेतृत्व वर्ग भी राष्ट्रवादी आदर्श के भीतर अपने वर्ग की जातिवादी दमित आकांक्षाओं की पूर्ति करने मे लगा है । इतिहास-चक्र का मध्यवर्गीय यथार्थ इंदिरागांधी के जमाने वाली धोखाधड़ी और जातीय कुचक्रों का भीतर-भीतर फिर लौट रहा है । अपराधियों के प्रति जातिवादी पक्षपात की खबरें अब भी आती हैं । अभी कुछ दिनो पहले " आर्टिकल 14"नाम की एक विचारोत्तेजक फिल्म भी उच्च वर्णीय जातिवादी भ्रष्टाचार पर आयी थी ।नियामकों ने ध्यान नहीं दिया तो समय के न्याय-चक्र का पहिया घूमने से कोई रोक नहीं सकता । इस देश को सही अर्थों मे लोकतांत्रिक और मानवतावादी होने मे देखें अभी कितना वक्त लगता है ?


रामप्रकाश कुशवाहा
02/01/2020

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

भारतीय धर्म का तंत्र और चरित्र

भारतीय धर्म  का तंत्र और चरित्र 


भारत मे धर्म का तंत्र प्राचीन काल से ही  दो समानान्तर संगठनों पर अवलम्बित रहा है-जाति और मठ ।  इसमे जाति तो स्वयं को सनातनी कहने वाली ब्राह्मण जाति द्वारा संचालित है जबकि मठ व्यवस्था बौद्धों के संघ से होती हुई आश्रम व्यवस्था तक जाती है । लेकिन  आश्रम व्यवस्था के भी सर्वाधिक प्रत्यक्ष  उत्तराधिकारी  ब्राह्मण  जाति ही है । अधिक संभावना यह है कि आश्रमों के संचालन के लिए राजस्व या शुल्क आधारित न होकर भिक्षा और दान की अर्थव्यवस्था  का लाभ  उठाते हुए  बुद्ध ने  संघ स्थापित किए ।

रविवार, 17 नवंबर 2019

उद्भ्रांत की आत्मकथा

एक विधा के 

केदारनाथ सिंह कि कविता

 रामप्रकाश कुशवाहा 
केदारनाथ सिंह तीसरा सप्तक के कवि हैं । अज्ञेय द्वारा 1966 मे प्रकाशित तीसरा सप्तक के कवियों मे सम्मिलित किए जाने से पहले केदारनाथ सिंह का पहला काव्य-संग्रह ' अभी, बिल्कुल अभी' (1960) प्रकाशित हो चुका था । इसलिए उनके कवि की निर्मित  को समझने के लिए यह संकलन महत्वपूर्ण है ।
तीसरा सप्तक की अनागत, नए पर्व के प्रति, कमरे का दानव,दीपदान,दिग्विजय का अश्व, बादल ओ ! तथा 'निराकार की पुकार ' आदि कविताएं उनके पहले काव्य-संग्रह 'अभी बिल्कुल अभी ' में भी है । इन कविताओं के अध्ययन से पता चलता है कि आम धारणा से अलग केदारनाथ सिंह मात्र बिम्बों के कवि नहीं हैं । यदि यह कहा जाय कि अपनी प्रारम्भिक यात्रा मे उनका महत्वाकांक्षी और युवा कवि अपनी कविताओं के शिल्प और स्वरूप को लेकर उनका किया गया आत्मसंघर्ष अपने समय तक हिन्दी-कविता के समस्त प्रयोगों और ध्रुवान्तों को लेकर किया गया है । उनका काव्य सौष्ठव और कविताओं में मिलने वाली मितभाषिता अज्ञेय को आदर्श बनाने की सूचना देती है तो उनकी कविताओं की आत्मा मे लोक के प्रति प्रेम, सम्मान तथा उसके जिए गए क्षणों की स्मृतियाँ और आख्यान छिपे हैं ।
       केदारनाथ नाथ सिंह की कई कविताएं अज्ञेय की काव्य-भाषा की याद दिलाती हैं ।फ़र्क बस इतना ही है कि अज्ञेय की कविताओं का पारगमन ।'आंगन के पार द्वारा और ' देहरी को बाहर से घर के भीतर देखने की है तो केदारनाथ सिंह आंगन के भीतर से आंगन के पार द्वारे स्थित लोक के द्रष्टा हैं  ।
       कहने का तात्पर्य यह है कि कवि केदारनाथ सिंह की लोकोन्मुखता ही उन्हें दूसरा अज्ञेय बन जाने से रोकती है । संवेदना और कथ्य के धरातल पर केदारनाथ सिंह लोक के यायावर कवि हैं । वे लोकजीवी आस्वाद धर्मिता के कवि हैं । अज्ञेय के सागर-मुद्रा शब्द से उधार लेते हुए कहें तो कवि केदारनाथ सिंह लोकमुद्रा के कवि हैं  लेकिन अज्ञेय से अचेतन प्रतिस्पर्धा और होड़ उन्हे आभिजात्यवर्गीय काव्यभाषा से जोड़े भी रहता है ।
        'जो रोज दिखते हैं सड़क पर ' कविता जीवन के सामान्य अनुभव और दिनचर्या को भी एक  महत्वपूर्ण घटना के रूप मे देखे जाने का विनम्र आग्रह करती है-
' कौन हैं ये लोग/जिनसे दूर-दूर तक/मेरा कोई रिश्ता नहीं/पर जिनके बिना/पृथ्वी पर हो जाऊंगाॅधी सबसे दरिद्र (उत्तर कबीर पृष्ठ 95)
आन्तरिक विस्थापन की स्मृतियाँ, संवेदनात्मक रिश्तों की पडताल एवं उनका विमर्शात्मक प्रत्यक्षीकरण केदारनाथ सिंह की अधिकांश रचनाओं का केन्द्रीय रचना-सूत्र है ।
    उनकी लोरी कविता के पाठ मे उनके कवि की रचना-प्रक्रिया खा रहस्य खुलता है ।वे एक मूड,एक प्रसंग, एक संवेदनात्मक काव्य-वस्तु उठाते हैं और यथार्थ के ऊपर प्रत्याशित संभावनाओ के कल्पना-सृजित चौहान से या धुन्ध मे छिपा देते हैं । प्रायः वे अनुभवों और विचार की श्रंखला प्रस्तुत करते हुए अपने पाठकों को काव्यात्मक साक्षात्कार के एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं जिसे पर्यटन या भ्रमण न कहकर टहलना  कहना अधिक उचित होगा ।
" कि गूँजहीन शब्दों के इस घने अन्धकार में /मैं-/ अर्थ-परिवर्तन की /एक अबूझ प्रक्रिया हूँ "........जड़ें रोशनी में हैं /रोशनी गंध में ,/गंध विचारों में /विचार स्मृतियों में /स्मृतियाँ रंगों में "- अभी,बिलकुल अभी "संकलन की पहली ही कविता के पीछे एक सुचिंतित और गंभीर भाषा-विमर्श और ज्ञान उपस्थित है . दरअसल वास्तविकता यह है कि केदारनाथ सिंह की कविताएँ अनेक विषयों और अनुभूतियों पर संवेदनात्मक विमर्श से बनी हैं . वे घटित-संवेदित होने के क्षण-विशेष के गतिशील चित्र हैं .मनोविज्ञान की शब्दावली में इन्हें प्रत्यक्षीकरण का प्रयास और काव्यालोचना में काव्य-बिम्ब की सर्जना का प्रयास कहा जा सकता है .बाल-सुलभ एवं रहस्यात्मक उत्प्रेक्षण कवि केदारनाथ सिंह की सर्वाधिक प्रिय रचना-पद्धति है . वे घटनाविहीन समय में घटनाओं की आशंका और संभावना के चितेरे कवि हैं .

           केदारनाथ सिंह की कविताएँ समकालीन राजनीतिक यथार्थ का अधिकतम सीमा तक बहिष्कार करती हैं .उनकी अनुपस्थिति सुनिश्चित कराती हुई  विकल्प की खोज में भटकती हैं .एक सजग और सायास अन्देखापन है उनमें जिसे मुंह चुराना नहीं ,बल्कि मुंह फेरना कहना ही उचित होगा . यह उस विस्थापन और अनुपस्थिति का बदला है जिसे उनके समय कि गैजिम्मेदार राजनीति नें घटित किया है .
             "अकाल में सारस "संग्रह की 'जिद ' कविता कवि के जीवन-a

शनिवार, 16 नवंबर 2019

ति कुण्ठित लोगों को चिढा कर दुखी भी करती है।
उनका दुख भी दूना करतीं हैं।
इसलिए इससे यथासम्भव बचे रहना ठीक है।
इसके बावजूद यह लोगों को सामूहिक रूप से पसन्द करने,अपने आदर्श को चुनने और उसका अनुसरण कर एकरूप आचरण करने वाले समाज के निर्माण और विकास का आधार भी है । यह सामाजिक शक्ति के निर्माण का भी आधार है । इसी अर्थ में यह प्रसिद्धि यानी श्रेष्ठ सिद्धि है ।

रहना नहीं

बकौल कबीर
रहना नहीं देश बेगाना है
फिर काहे को इतराना है
जो है ,जहाँ है,जैसा है
सब छोड-छाडि चलि जाना है
सब समझि-बूझि कर गाना है
ज्यों सब संग मिलि परदेश रवाना है ।
(टीका और व्याख्या सहित
ऐसे ही मन मे कौंध गया
अपराधियों के सुधार के लिए जरूरी
और औषधि तुल्य हो सकतीं हैं ये पंक्तियाँ ।)

धरती पर

जब-जब धरती पर
घाटी-सी कटान होगी
गहराइयाॅ बनेगी
तो पर्वत के कूबड़ तो अपने आप ही बन जाएंगे
जब-जब विषमता के खड्ढे बढ़ेंगे
तो बढेंगे धरती के भाग्यवान धनवान
बढेगी धरती पर भिखारियो की फ़ौज
तो यों ही कुछ न कुछ देते हुए इतराएंगे अन्नदाता
तालियों के बीच उपहार बटवाएंगे
सेल्फियाॅ खिचवाएंगे
अखबारों मे छपवाएंगे
जब-जब महंगी और ध्वस्त शिक्षा के कारण
सामूहिक मूर्खो और अशिक्षितो की आबादी बढ़ेगी
और बढेंगे ज्ञानचक्षुओ को
बन्द और अपहृत करने वाले बबान
जब-जब बढेगी धरती पर विषमता
और बढेंगे लाचार
बढेंगे धरती पर धरती के प्रभु- भगवान
होगी ही तब-तब धरती पर
लोकतंत्र और समानता के धर्म की हानि !
और तब तक
धरती पर सतयुग भी नहीं आएगा ।
रामप्रकाश कुशवाहा
07/11/2019

प्रशूद्र

सभी इतिहास-प्र-शूद्रों से
------------------------------------
सब चारण थे
सब गुलाम थे
पराधीन और अपमानित
सभी शूद्र थे
स्वाधीन होने से पूर्व
ऐतिहासिक दुर्दशा को प्राप्त
तलवे चाट गुलामों के थे वंशज सब
सिर्फ एक ही वर्ण के लोग बचे थे जम्बू द्वीप में
पराधीन, पद-कुचलित-मर्दित !
कैसे तब आग लगी थी पूरे जंगल में
और अपमान की अहर्निश आग में जलने से
बचने के लिए भाग रहे थे मारे-मारे
क्षत्रप हत और क्षत्र भूलुण्ठित पडे थे
क्षत्रिय सभी मुँह छिपाए खडे थे
अपने पूर्वजों के तीर्थ को छोडकर
इधर-उधर भाग रहे थे पण्डे
पर्वतों और जंगलों की ओर
तब कोई भी नहीं बचा था श्रेष्ठ
सब क्षुद्र थे !
सब प्रशूद्र थे
सिर्फ श्रेष्ठ शूद्र ही नहीं
अति-शूद्र अति-शूद्रतम !
हे काल-पराजित अतिक्षुद्रो!
हे इतिहास-प्रमाणित अतिशूद्रो!
समय,समाज, संस्कृति और सभ्यता ने
ख़ारिज किया है तुम्हे!
तुममें किसी मक्खी की तरह
फिर उसी घाव पर
फिर उठकर जा बैठने की
इतनी बेचैनी क्यों है ?
संकट की उस निर्णायक घड़ी में
तब तुम स्वयं को
सिर्फ और सिर्फ इन्सान ही घोषित करते हुए
नहीं अघाते थे
स्वयं को कहते रहने के लिए बाध्य थे
वही कहो !
अब भी उसी एकता को जियो
जो अनेकता की भयानक अराजकता और
मूर्खतापूर्ण दुर्घटनाओं की समझदारी के रूप मै
प्राप्त हुई है !
उसी विरासत को अब भी
जानने और जीने की ज़रूरत है
(दिनांक 03/03/2016 के
डाायरी के पन्नो पर प्राप्त)
रामप्रकाश कुशवाहा

सुदामा पाण्डेय धूमिल

09 नवम्बर 1936 को वाराणसी के खेवली गाॅधी मे आज ही जनकवि सुदामा पाण्डेय धूमिल जी का जन्म हुआ था । खेवली मुझे केवटावली यानि मल्लाहो की बस्ती का तद्भव लगता है । अब जा ही रहा हूँ तो पता करॅगा कि मल्लाहो की आदिम बस्ती वहां है भी या नहीं । खेवली वरुणा का निकटवर्ती गाॅव है और समकालीन हिन्दी कविता के खेवनहार धूमिल का भी ।
मुक्तिबोध जहाँ साम्यवादी व्यवस्था के स्वप्नदर्शी कवि हैं तो धूमिल लोकतांत्रिक भारत के विचारक एवं जमीनी पडताल के कवि । धूमिल ने स्वतंत्रता के बाद की वर्तमान व्यवस्था की जिस नकारात्मक भूमिका का साक्षात्कार किया है ,वह आरोप अब भी विचारणीय और गम्भीर है । एक आम नागरिक की नियति को वे कैदी की नियति और व्यवस्था को कारागार की भूमिका मे पाते हैं । उनकी लम्बी कविता पटकथा की अन्तिम निष्कर्षात्मक अभिव्यक्ति यही है-
हर तरफ
शब्दबेधी सन्नाटा है ।
दरिद्र की व्यथा की तरह
उचाट और कूॅथता हुआ । घृणा में
डूबा हुआ सारा का सारा देश
पहले की तरह आज भी
मेरा कारागार है ।
धूमिल की कविताएं भारतीय लोकतंत्र के लिए प्रतिरोध के भाषिक हथियार बनाती हैं ।
हत्यारों संभावनाओ के नीचे
सहनशीलता का नाम
आज भी हथियारों की सूची मे नहीं है ।
सभ्य नागरिक होना सम्मान से जीने की प्रक्रिया और पर्यावरण नहीं बल्कि सतत निरस्तिकरण की कार्यवाही है -
हर आदमी
भीतर की बत्तियां बुझाकर
पडे-पड़े सोता है
क्योंकि वह समझता है
कि दिन की शुरुआत का ढंग
सिर्फ हारने के लिए होता है
(हत्यारी संभावनाओ के नीचे )
थूमिल के पास अविश्वास और व्यंग्य की व्यंजना के लिए अब तक की सर्वोत्तम और प्रभावी काव्या भाषा है । धूमिल जैसा मिजाज और भंगिमा भी किसी के पास नहीं है। शुक्ल जी होते तो वाग्वैदग्ध्य और व्यंग्य के लिए सूर और कबीर के बाद सबसे बडा कवि धूमिल को ही घोषित करते । धूमिल की दृष्टि मे देश मे -
ऐसा जनतंत्र है जिसमें
जिन्दा रहने के लिए
घोड़े और घास को
एक जैसी छूट है
राजनयिक की चिन्ता देश के जीवित मनुष्य के लिए नहीं बल्कि अतीत के प्रतीकों के लिए है-
देश डूबता है तो डूबे
लोग ऊबते हैं तो ऊबे
जनता लट्टू हो
चाहे तटस्थ रहे
बहरहाल, वह सिर्फ यह चाहता है
कि उसका 'स्वस्तिक'-
स्वस्थ रहे
(भाषा की रात कविता )
धूमिल की कविताएं व्यवस्था से असंतोष के बावजूद सभ्य नागरिक बने रहने की नियति और यातना के विरुद्ध एकालापी बयान हैं -
जब हमारे भीतर तरबूज कट रहे है
मगर हमारे सिर तकियो पर
पत्थर हो गए हैं
धूमिल बोनसाई और दमित नागरिकता को बार-बार प्रश्नाकित करते हैं और उनके कारणों की पडताल भी प्रस्तुत करते हैं-
दलदल की बगल मे जंगल होना
आदमी की आदत नही अद्धा लाचारी है
और मेरे भीतर एक कायर दिमाग है
जो मेरी रक्षा करता है और वही
मेरी बटनों का उत्तराधिकारी है ।
'जनतंत्र के सूर्योदय मे कविता मै वे लिखते है कि
जहाँ रात मे
संविधान की धाराएं
नाराज आदमी की परछाई को
देश के नक्शे मे
बदल देती हैं
पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
और हत्या अब लोगों की रुचि नही -
आदत बन चुकी है
---------------
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव मे
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है ।
(कविता)
धूमिल की कविताएं जीवन की जड़ता के विरुद्ध जीवित रहने का जुझारू स्पन्दन हैं । वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को पाखण्डमुक्त और पारदर्शी देखने की अदम्य रचनात्मक आकांक्षा और संकल्प का परिणाम हैं ।
जानवर बनने के लिए
कितने सब्र की जरूरत होती है
( बीस साल बाद)
और अब, मै एक शरीफ आदमी हूँ
पूरी नागरिक सौम्यता के साथ ।
धूमिल हिन्दी के पहले समाज-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण दृष्टि से सम्पन्न कवि हैं । यद्यपि उनकी समझदारी की कौंधो को उनके द्वारा प्रयुक्त बिम्बों और प्रतीकों में पढना पडता है । जैसे कि कुत्ते कविता समकालीन भारतीय मनुष्य का चारित्रिक रेखांकन प्रस्तुत करती है-
और वहाँ, हददर्जे की लचक है
लोच है
नर्मी है
मगर मत भूलो कि इन सबसे बड़ी चीज
वह बेशर्मी है
जो अनत मे
तुम्हे भी उसी रास्ते पर लाती है
जहाँ भूख-
उस वहशी को
पालतू बनाती है । (कुत्ता' कविता )
ऐसे चिरप्रासंगिक चिर युवा कवि को उनके जन्मदिन पर सादर नमन ।


रामप्रकाश कुशवाहा
09/11/2019

मानव-जाति

क्योंकि सभी धर्मों और विचारधाराओं के
मुखौटों के पीछे छिपी है मानव-जाति
हर आतताई समूह अपनी हिंसा से
दूसरे समूह को संक्रमित करता है
और विजय के उन्माद मे
अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए
घृणा और प्रतिशोध का
संतप्त उपहार छोड़ जाता है ।
जैसा कि विज्ञान का नियम है कि
हर संक्रमण प्रतिरोध को जन्म देता है
हर महायुद्ध के बाद
धरती पर बच जाने हैं
सिर्फ दुष्ट,जिद्दी और खूंखार बेहये !
सबसे अंन्त मे पुनश्चः
थकी-हारी-पछताती मानवजाति
अपने-अपने धर्म और विचारधारा के लिए
करती सभी को शर्मसार!

शब्द

शब्द तो हर किसी के पास होते हैं
लेकिन उन शब्दों की हैसियत
सभी के यहाँ
एक समान नहीं होती !
यानि कि शब्दों की अर्थवत्ता
किसी राष्ट्राध्यक्ष के भी
बचकाने हो सकते हैं शब्द
जबकि उसी देश के किसी गुमनाम -अनाम से
बच्चे के शब्द सयाने।
कभी शब्द आगे और ऊपर निकल जाते है व्यक्ति से
कभी भूलुण्ठित गिरे-पडे सिर धुनते है शब्द
शब्द ऐसे ही नहीं ब्रह्म है
ब्रह्म हैं कभी भी अपने प्रयोक्ता सवार को
सहसा गिरा देने की स्वतंत्रता के कारण
नौ दो ग्यारह हो जाने की शक्ति के कारण
हो जाते हैं गालियाँ बकने वाले के ही विरुद्ध
कि देखो लोगों
सबसे अश्लीलतम मनुष्य
यहाँ खड़ा बोल रहा है
इसके गन्दे दिमाग के प्रति सभी
सूचित संज्ञानित और अवगत हो !
शब्दों को उनके अर्थ और प्रभाव के लिए
तौला नहीं जा सकता किसी बटखरे से
उनका वजन सिर्फ उनके प्रयोक्ता के वजन
वजूद,आचरण और व्यवहार से ही जाना जा सकता है।
शब्द सदैव किसी ईमानदार सटीक जासूसी कुत्ते की तरह
सारी दुनिया छोड़कर
अपने मालिक का सही पता बता जाते हैं ।


रामप्रकाश कुशवाहा
14/011/2019

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

बुद्ध एक पुनर्विचार

बुद्ध   एक पुनर्विचार
आस्था और विश्वास के साथ सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि कभी भी धोखा हो सकता  है ।बुद्ध इस धोखाधडी से बचना चाहते थे । इसीलिए उन्होंने अपने सच से ईश्वर को भी बाहर रखा । एक प्रजाति के रूप मे मानवजाति को सुखी और सुरक्षित करने के लिए सिर्फ करुणा ही पर्याप्त है। यहां तक तक कि उसकी करुणा मे मार्क्सवाद को भी समाहित देखा जा सकता है ।
         बौद्ध धर्म ने मानव-चित्त और व्यक्तित्व को लेकर बिल्कुल स्वावलंबी और विशिष्ट सांस्कृतिक सौन्दर्यबोध उत्पन्न किया। मनुष्य मे अन्तर्निहित महानता की सम्भावना प्रदर्शित करने के लिए ही उनके अनुयायियों ने बुद्घ की विशाल बनवायी ।
           बौद्ध देशों में मिलने वाली विशेष ढंग की बौद्धिक सभ्यता अन्य धर्म के अनुयायियों की तुलना मे उन्हें श्रेष्ठतर प्रमाणित करती है ।  यह अजीब पर्यवेक्षण है कि ईश्वर को केन्द्र में रखकर विकसित धर्म एक विकलांग और परजीवी मनुष्यता को जन्म देते है  । ऐसे धर्म  ईश्वर की कृपा प्राप्त रूप मे व्यक्ति - पूजा को बढ़ावा देते है । इसी संस्कार के कारण भारतीय लोकतंत्र भी व्यक्ति, वंश और परिवार केन्द्रित हो गया है  ।
            प्राचीन गणतंत्र से सम्बंधित होने के कारण बुद्ध का दर्शन स्वाभाविक रूप से आधुनिक लोकतंत्र के लिए प्रासंगिक और अनुरूप है जबकि सनातन धर्म राजतंत्र की स्वाभाविक व्युत्पत्ति होने के कारण रीढ़ विहीन चाटुकारिता की  पोषक , सामन्ती विशिष्टता और भेदभाव  को मान्यता देने वाली और लोकतांत्रिक समानता की विरोधी है  ।
(बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर गौतम बुद्ध को याद करते हुए )
रामप्रकाश कुशवाहा
30/04/2018

सोमवार, 2 सितंबर 2019

ईश्वर के न होने की दशा मे एक प्राक्कलन

ईश्वर के न होने की दशा मे  एक प्राक्कलन 


सृष्टि निर्माण मे ईश्वर का पद रिक्त हो गया हैं ।(संदर्भ  स्टीफ़न हाकिंग) गुणधर्म से संचालित इस सृष्टि मे अब तक के विकास क्रम मे तो ईश्वर का भी सृजन और विकास  हो जाना चाहिए था । ईश्वर के न रहने पर किसी प्रलय या विनाश के बाद फिर नई जीवन-सृष्टि के लिए प्रकृति को ंसंयोगो  और भटकावो पर ही निर्भर रहना पडेगा । ईश्वर होता तो उसकी पूर्वस्मृति  से काम चल जाता और जीवन की नई व्युत्पत्ति का क्रम भी सुनिश्चित रहता  । सवाल केवल आस्था-अनास्था का नही है । सृष्टि की बेहतर संभाव्यता को सुनिश्चित करने के लिए किसी कर्ता का होना सिद्धान्ततः अधिक  गुणवत्तापूर्ण होंगा । इस खूबसूरत दुनिया को बनाए और बचाए रखने के लिए वास्तव मे किसी ईश्वर (चेतन स्मृति और नवसृजन के लिए विचार की सामर्थ्य का प्राकृतिक केन्द्र) को सिद्धान्ततः  होना चाहिए था । सृष्टि ने मनुष्य की सर्जना कर अपनी सर्जन कला और क्षमता का सर्वोत्तम प्रदर्शित भी किया है । लेकिन सच तो यह है कि उसके साथ सबसे बुरा व्यवहार उस स्वतंत्रता के दुरुपयोग से ही हो रहा है जो उसने मनुष्य जाति को उदारतापूर्वक दी है ।
     बहुत पहले मैने लिखा था कि जब तक मरेगी नही मृत्यु तब तक मरेगा नहीं ईश्वर ।  प्रकृति ने अपनी सृजन शक्ति तो प्रमाणित कर दी है लेकिन यह संयोग आधारित है  तो इस बात की कोई गारंटी नहीं होगी कि विनाश के बाद जब फिर ब्रहमांड की वापसी हो तो  जीवन का होना भी  लौट आए । लेकिन यदि वह सायास और सुचिंतित है तो एक बार फिर जीवन की व्युत्पत्ति सुनिश्चित हो सकती है ।  जैसा कि पश्चिमी धार्मिक विश्वास है- किसी बाह्य चेतन शक्ति के हस्तक्षेप के बिना वाली सृष्टि अनन्त काल तक  सजीव  सृष्टि की प्रतीक्षा कर सकती है ।
               निश्चिंत ही इस तरह के चिन्तन एकान्त में चलते हैं  जो देश-काल के अनुसार प्रचलन मे नहीं होते । एक बार बन चुकाने के बाद h2o  यानि जल यौगिक रूप मे  वाष्प, तरल और ठोस तीनो अवस्थाओं मे अस्तित्वमान रहता है । तापमान बढने पर अदृश्य भी हो जाता है  ।  यदि जीवों को नश्वर मान लिया जाय तब भी उनके भौतिक जैविक संयोजन की संरचनात्मक या गणितीय अमरता (जीन कोड) के रूप मे बनी रहेगी । यदि जल बनने के बाद वैज्ञानिक ढंग से हाइड्रोजन और आक्सीजन के अणुओं मे विभाजित किए जाने तक जल की अमरता बनी रह सकती है तो सृष्टि की मृत्यु(प्रलय ) के बाद भी किसी न किसी बीज-रूप में  जीवन का कोई सूक्ष्मतम प्रारूप बचा रहना चाहिए । चाहे वह विद्युतीय आवेश के रूप मे ही क्यों न हों । वैज्ञानिक नीहारिकाओं के लडने-भिडने ,सूर्य के चुक जाने बुझने एवं धरती के अन्त की भविष्यवाणी करते रहते है । मन मे आता है कि वाष्प की तरह जीवन के भी अदृश्य रूप मे बचे रहने की व्यवस्था यानि वैज्ञानिक संभावना है कि नहीं  । पदार्थों और ऊर्जा के गुणधर्म की संभाव्यता के आधार पर तो समान परिस्थितियों में जीवन फिर बन जाएगा लेकिन डायनासोरो से लेकर मनुष्य जाति को रचने वाली इस प्रकृति मे निर्माण की क़ोई स्मृति-व्यवस्था भी है या नहीं  यह प्रश्न-विचार मेरे मन मे उठता है। सामान्य भाषा मे जिसे प्रेत या पितर योनि कहते हैं । प्रलय काल मे ऐसा अस्तित्व ही जीवन की बारम्बारता सुनिश्चित कर सकता है । अभी तो उनका होना हत्यारों को डराने के भी काम नहीं आ रहा । लेकिन इन नेपथ्य की संभावनाओ के आधार पर ही मुझे तो प्रकृति की पूर्णता यानि सामर्थ्य की पूर्णता पर पूरा विश्वास है। चीजें एवं संभावनाएं मनुष्य के जानने न जानने से स्वतंत्र हैं । आदिवासी जैसा मानते है जैविक विद्युत के गुणधर्म और अस्तित्व की संभावनाओ मे यह सामर्थ्य मुझे दिखती है कि  वह प्रलय काल मे भी जैविक सृष्टि की स्मृति को बीज-रूप मे बचाए रखे । लेकिन डरता हूँ कि यह लोक विश्वास कहीं अवधारणा मात्र न हो । मुझे तो अवधारणा से बाहर सच्चाई के धरातल पर जैविक सृष्टि की सुरक्षा के लिए जीवन मे प्रेत के रूप मे बचे रहने की वैज्ञानिक संभाव्यता भी चाहिए ।मुझे इसलिए यह संभावनापूर्ण लगता है कि आकाशीय विद्युत या तड़ित धनात्मक आवेश वाले बादलों से ऋणात्मक आवेश वाले बादलों तक आकर ही समाप्त नहीं  हो जाती बल्कि धरती के गर्भ मे समाने तक आवेश रूप मे बनी रहती है । कई बार तो कई लोगों को मारते हुए जाती है । यदि भौतिक विद्युत  तड़ित मे ऐसा गुणधर्म है तो  जैविक विद्युत मे भी आवेश रूप मे देर तक बने रहने का गुण हो सकता है । संभव है यह आवेश बीज की तरह ही परमाणुओ को नई सृष्टि के समय पुनरसंयोजन के लिए प्रेरित कर सके ।  फिलहाल  मै सहमत हूँ कि यह प्रकृति पूर्ण है और स्वयं ही ईश्वर के आस-पास है । अलग से ईश्वर के होने या न होने की अवधारणा से कोई फर्क नहीं पड़ता  ।

पुनर्जन्म की अवधारणा

पुनर्जन्म की अवधारणा पर एक और  तरह से मै  सोचता हूँ । वर्णमाला के कुछ ही वर्णों के मेल से मानव-जाति ने लाखों शब्द बना डाले हैं । आर एन ए ,डी एन ए भी   कुछ वर्णों के मेल से बने शब्दों की तरह कोई विशिष्ट संरचना बनाते है । यह संरचना शब्दों और संख्याओं की तरह बढ़ती जाती है । क्योंकि यह आवृत्ति चक्र संयोग आधारित है  इसलिए हजारों पीढियों बाद या अरबों-खरबों की जनसंख्या मे समरूप  विशेषताओ वाली जैविक सृष्टि कर सकती है । यह वही व्यक्ति तो नहीं होगा लेकिन वैसा ही हो सकता है । यह आध्यात्मिक पुनर्जन्म से अलग जैविक पुनर्जन्म की व्यवस्था है । एक और बात मै सोचता हूँ । सारी मानव जाति म्यूटेशन की शिकार किसी कपि पूर्वज की सन्तानें हैं । एक ही चेतन सृजन का जैविक बहुगुणन । प्रजाति के रूप मे हमारा  वैयक्तिक पुनर्जन्म न सही लेकिन उस आदिम पुरखे का तो हो ही रहा है ।

ईश्वर की अवधारणा

ईश्वर की अवधारणा 




आदमी का दिमाग सभ्यता के प्रारम्भिक काल मे किसी शिशु की तरह  सोचता था । ईश्वर की अवधारणा भी सम्पूर्ण प्रकृति को मनुष्य के समान ही सजीव मानने की अवधारणा की उपज है । यह प्रकृति का आत्मवत प्रत्यक्षीकरण है । भारतीय आध्यात्मिक विश्वास और दर्शन मे  इसी चेतना  और बोध का विस्तार है ।  दूसरी दृष्टि पश्चिम की है जो प्रकृति को आत्मवत मनाने के स्थान पर सृष्टि  के निर्माण में अन्तर्निहित जटिलता पर रीझी और ऊसकी आश्चर्यजनक सृजनशीलता के लिए सर्जक अंर कर्ता के पद पर ईश्वर को प्रतिष्ठित किया । ईश्वर के साथ पश्चिम के पूर्वजों ने सृष्टि के प्रतिकूल और नकारात्मक अनुभवों के लिए भी प्रकृति का मानवीकरण किया और उसे शैतान के रूप में देखा । सृष्टि के प्रत्यक्षीकरण की इस भिन्नता ने दो प्रकार की संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया । अपने एकल ईश्वर के अनुरूप भारतीयों का ईश्वर भी जहाँ उदार, कृपालु और सज्जन रहा वहीं ईश्वर और शैतान के सांझे  अस्तित्व के दोहरे मानवीकरण के कारण पश्चिम ने चतुराई की द्वन्द्वात्मक श्रेष्ठता और संघर्ष की परिकल्पना वाली राजनीतिक व्यवस्था को अपने विकास का आधार बनाया  ।       
          आधुनिक  मशीनी सभ्यता ने 18वी से 20वी  शताब्दी के बीच  जेम्सवाट के इंजन  आविष्कार के बाद जीवन को देखने की यान्त्रिक भौतिकवादी दृष्टि सौप दी ।  जीवन को भी एक यन्त्रवत सृष्टि मान ली गयी । वैसे इसके यन्त्र होने की जानकारी अनादिकाल से शेर-बाघ जैसे पशुओं को भी थी । वे इसे बन्द करना जानते थे -शिकार मे की जाने वाली हत्याओ  के रूप मे ।शिकार और मांसाहार हमारे पुरखों ने ऐसे ही शिकारी पशुओं से सीखा होगा ।
            वैज्ञानिकों द्वारा  आर एन ए,डी एन ए की खोज के बाद जड जगत से जीवन जगत् के बीच का  रिश्ता काफी कुछ समझ लिया गया हैं  । जीवविजान का तो विकास हुआ लेकिन भौतिकवाद के पूर्वाग्रह सत्रहवीं शताब्दी वाले ही बने हुए हैं । जड़ समझीं जाने वाली प्रकृति भी परमाणुओ के भीतर इलेक्ट्रॉन के रूप में गतिशील है लेकिन जड़ प्रकृति को लेकर धारणा पहले वाली ही है । दूसरी ओर ऐन्द्रिक संयम वालीं  नैतिकता के स्थान पर ऐन्द्रिक उन्मुक्तता को भौतिकवाद का पर्याय मान लिया गया है ।
              कहने का तात्पर्य यह  कि आधुनिक भौतिकवादी दृष्टि भी भटकाव का दूसरा छोर है जैसे पहले के लोग जड़ जगत् को भी सजीव मानते थे । पुरानी  आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि को प्रकृति के मानवीकरण के रूप मे भी देखा जा सकता है । दिक्कत तब होती है जब कुछ लोग आर्थिक- भौतिक प्रतीक मुद्रा की काल्पनिकता और उसके मनोवैज्ञानिक अस्तित्व को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाते लेकिन सृष्टि की सजीविता पर आधारित प्रतीक ईश्वर को लेकर परेशान रहते   हैं  । जीवन और जगत को देखने का पुराना ढंग ही सही । मेरा मानना है कि आध्यात्मिक दृष्टि पूॅजी निर्माण युग के पूर्व की आदिम  मानव जाति की विरासत है ।इसका बीच के शोषण में सहायक अनैतिक धार्मिक मूल्यों और वर्जनाओ के  सामन्त युगीन विकास  से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है । आप उसे जरूरी पर्यावरण  की तरह ही बचाकर रख सकते है । पशुपालकों को ही लीजिए ।वे अपने-अपने पशु से रिश्ता और भाषा दोनों ही विकसित कर लेते है । हम आत्मवाद को लेकर ही द्विधाग्रस्त रहते है जबकि वे वास्तविकता के स्तर पर जीते हैं । एक वृहत्तर प्रतीक के  रूप मे  ईश्वर पद की अर्थ एवं प्रयोग की संभावनाओ की भी पड़ताल की जानी चाहिए । चाहे वह अर्थ परिवर्तन के माध्यम से ही क्यों  न हो !
       मनुष्य और ईश्वर दोनों की मुक्ति का रास्ता भी विमर्श से होकर ही  गुजरता है । किसी का भी सोचना उसमे सहायक हो सकता है । मेरा चिन्तन तो विकल्प की चिन्ता से प्रेरित है । किसी को जूता दिए बिना  चप्पल फेंक देने का उपदेश देना उचित नहीं  । एक और बात है जो शिक्षक पेशे से सम्बन्धित है । पाठ्यक्रम में होंने के कारण जिससे असहमत रहा हूँ, उसे भी पढाता रहा हूँ । मेरे फेसबुक मित्रों मे बहुत से हिन्दी शिक्षक है । उनके लिए इस तरह का विमर्श भी उपयोगी हो सकता है ।

शनिवार, 24 अगस्त 2019

ईश्वर प्रसंग


ईश्वर प्रसंग 


आदमी का दिमाग सभ्यता के प्रारम्भिक काल मे किसी शिशु की तरह  सोचता था । ईश्वर की अवधारणा भी सम्पूर्ण प्रकृति को मनुष्य के समान ही सजीव मानने की अवधारणा की उपज है । यह प्रकृति का आत्मवत प्रत्यक्षीकरण है । भारतीय आध्यात्मिक विश्वास और दर्शन मे  इसी चेतना  और बोध का विस्तार है ।  दूसरी दृष्टि पश्चिम की है जो प्रकृति को आत्मवत मनाने के स्थान पर सृष्टि  के निर्माण में अन्तर्निहित जटिलता पर रीझी और ऊसकी आश्चर्यजनक सृजनशीलता के लिए सर्जक अंर कर्ता के पद पर ईश्वर को प्रतिष्ठित किया । ईश्वर के साथ पश्चिम के पूर्वजों ने सृष्टि के प्रतिकूल और नकारात्मक अनुभवों के लिए भी प्रकृति का मानवीकरण किया और उसे शैतान के रूप में देखा । सृष्टि के प्रत्यक्षीकरण की इस भिन्नता ने दो प्रकार की संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया । अपने एकल ईश्वर के अनुरूप भारतीयों का ईश्वर भी जहाँ उदार, कृपालु और सज्जन रहा वहीं ईश्वर और शैतान के सांझे  अस्तित्व के दोहरे मानवीकरण के कारण पश्चिम ने चतुराई की द्वन्द्वात्मक श्रेष्ठता और संघर्ष की परिकल्पना वाली राजनीतिक व्यवस्था को अपने विकास का आधार बनाया  ।       
          आधुनिक  मशीनी सभ्यता ने 18वी से 20वी  शताब्दी के बीच  जेम्सवाट के इंजन  आविष्कार के बाद जीवन को देखने की यान्त्रिक भौतिकवादी दृष्टि सौप दी ।  जीवन को भी एक यन्त्रवत सृष्टि मान ली गयी । वैसे इसके यन्त्र होने की जानकारी अनादिकाल से शेर-बाघ जैसे पशुओं को भी थी । वे इसे बन्द करना जानते थे -शिकार मे की जाने वाली हत्याओ  के रूप मे ।शिकार और मांसाहार हमारे पुरखों ने ऐसे ही शिकारी पशुओं से सीखा होगा ।
            वैज्ञानिकों द्वारा  आर एन ए,डी एन ए की खोज के बाद जड जगत से जीवन जगत् के बीच का  रिश्ता काफी कुछ समझ लिया गया हैं  । जीवविजान का तो विकास हुआ लेकिन भौतिकवाद के पूर्वाग्रह सत्रहवीं शताब्दी वाले ही बने हुए हैं । जड़ समझीं जाने वाली प्रकृति भी परमाणुओ के भीतर इलेक्ट्रॉन के रूप में गतिशील है लेकिन जड़ प्रकृति को लेकर धारणा पहले वाली ही है । दूसरी ओर ऐन्द्रिक संयम वालीं  नैतिकता के स्थान पर ऐन्द्रिक उन्मुक्तता को भौतिकवाद का पर्याय मान लिया गया है ।
              कहने का तात्पर्य यह  कि आधुनिक भौतिकवादी दृष्टि भी भटकाव का दूसरा छोर है जैसे पहले के लोग जड़ जगत् को भी सजीव मानते थे । पुरानी  आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि को प्रकृति के मानवीकरण के रूप मे भी देखा जा सकता है । दिक्कत तब होती है जब कुछ लोग आर्थिक- भौतिक प्रतीक मुद्रा की काल्पनिकता और उसके मनोवैज्ञानिक अस्तित्व को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाते लेकिन सृष्टि की सजीविता पर आधारित प्रतीक ईश्वर को लेकर परेशान रहते   हैं  । जीवन और जगत को देखने का पुराना ढंग ही सही । मेरा मानना है कि आध्यात्मिक दृष्टि पूॅजी निर्माण युग के पूर्व की आदिम  मानव जाति की विरासत है ।इसका बीच के शोषण में सहायक अनैतिक धार्मिक मूल्यों और वर्जनाओ के  सामन्त युगीन विकास  से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है । आप उसे जरूरी पर्यावरण  की तरह ही बचाकर रख सकते है । पशुपालकों को ही लीजिए ।वे अपने-अपने पशु से रिश्ता और भाषा दोनों ही विकसित कर लेते है । हम आत्मवाद को लेकर ही द्विधाग्रस्त रहते है जबकि वे वास्तविकता के स्तर पर जीते हैं । एक वृहत्तर प्रतीक के  रूप मे  ईश्वर पद की अर्थ एवं प्रयोग की संभावनाओ की भी पड़ताल की जानी चाहिए । चाहे वह अर्थ परिवर्तन के माध्यम से ही क्यों  न हो !
       मनुष्य और ईश्वर दोनों की मुक्ति का रास्ता भी विमर्श से होकर ही  गुजरता है । किसी का भी सोचना उसमे सहायक हो सकता है । मेरा चिन्तन तो विकल्प की चिन्ता से प्रेरित है । किसी को जूता दिए बिना  चप्पल फेंक देने का उपदेश देना उचित नहीं  । एक और बात है जो शिक्षक पेशे से सम्बन्धित है । पाठ्यक्रम में होंने के कारण जिससे असहमत रहा हूँ, उसे भी पढाता रहा हूँ । मेरे फेसबुक मित्रों मे बहुत से हिन्दी शिक्षक है । उनके लिए इस तरह का विमर्श भी उपयोगी हो सकता है ।
            प्राचीन धार्मिक चिन्तन मे जीवन जीने का कई पीढ़ियो का अनुभव भी समाहित है। समय-विशेष के  समाज मे प्रचलित मूर्खताओ और चेतावनियो को भी धार्मिक आख्यान का विषय बनाया गया है । रामायण मे साधुवेशधारी रावण द्वारा सीता-हरण का प्रसंग तथा उसके पहले सोने के हिरण का पीछा करते राम द्वारा अपने दाम्पत्य जीवन को गंवाने का प्रसंग ऐसा ही   चेतावनीपरक है । 
              इसी दृष्टिकोण से गीता का दूसरा अध्याय  सभी को पढना  चाहिए । इसमें  महामानव  बनने -बनाने की मनोवैज्ञानिक युक्तियाँ  हैं । मन और मनोविज्ञान के अतिक्रमण का शास्त्र छिपा है । श्रीकृष्ण के लिए योग कर्म यानि सक्रिय जीवन जीने का विज्ञान था । दूसरे शब्दों में  योग उनके लिए कुशलतापूर्वक कर्म करते हुए जीवनयापन करने के लिए अनुकूल और सहायक चित्त  को पाना था । इसे मै विवेक प्रबन्धन की विद्या कहना  चाहूँगा ।
      यह मत पूछिएगा कि गीता यदि मैने पढ़ी है तो महामानव क्यो नहीं  बना ? दरअसल महामानव समय और  इतिहास की मांग और पूर्ति के नियम  के अनुसार प्रसिद्धि पाते यानि समाज द्वारा बनाये जाते हैं  । स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने निन्दको के  मारे जाने तक शिशुपाल और दुर्योधन से गालियाँ खाते रहे ।  ख्यात-कुख्यात न सही गोपनीय या पारिवारिक स्तर के  महामानव तो आप और हम (बिना नाम के भी) बन ही सकते है । बस अर्जुन की तरह बन्धु-बान्धवो की हत्या करने की मशीन मत बन जाएगा ।  हाॅ गीता के  साथ वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैत को भी समझना होगा तभी आप इस रहस्य का भेदन कर पाएंगे कि  सब कुछ या केवल श्रीकृष्ण ही नही आप भी कुछ कम नहीं ।
     शुद्धाद्वैत के अनुसार यह सारा जगत ब्रह्म ही है । सृष्टि का उद्देश्य आनन्द की सृष्टि है न कि दुख । ब्रह्म ही एक से अनेक हो गया है । वल्लभाचार्य उपनिषदों की इस सूक्ति को अपने शुद्धाद्वैत का आधार बनाते हैं । एकाकी न रमते ,सो कामयत्,एको-अहं बहुस्याम,' अर्थात् ब्रह्म का अजर-अमर अकेला अस्तित्व ऊब या बोर हो रहा था । उसने कामना की कि मै एक हूँ, अनेक हो जाऊँ । सर्व समर्थ होने से यह इच्छा ही सृष्टि की रचना का कारण बनी । इसलिए निरन्तर आनन्दित रहना हम सभी का कर्तव्य है । श्रीकृष्ण ने मुझ अन्तर्यामी को कृश न करने की चेतावनी दी है । यानि स्वयं को कष्ट देना भी आध्यात्मिक दृष्टि से अपराध है । दूसरों के ईश्वर-रूप को न पहचान कर दुख देने वाले तो आध्यात्मिक दृष्टि से अपराधी हैं ही ।   इस तरह इस दुनिया का हर जीव विकेन्द्रित ईश्वर ही है ।  वल्लभाचार्य के दर्शन के अनुसार यह सारा जगत ही ब्रह्म की मूर्ति है । केवल मन्दिर के भीतर ही ईश्वर होने का विश्वास रखने वाले आध्यात्मिक दृष्टि से अज्ञानी और मूर्ख है । वल्लभाचार्य ने जड़ जगत को अक्षर ब्रह्म  कहा है ।इस ब्रह्म मे सतोगुण तो है लेकिन चित् और आनन्द नहीं है ।
  जीवन जगत को आधिभौतिक यानि भौतिक से ऊपर कहा है । जिसमें सत् और चित् तो है लेकिन आनन्द का अभाव है ।  उदाहरण के लिए यह जागता है तो सोने के लिए परेशान हो जाता है । खड़े रहने पर बैठने के लिए । सच्चा आनन्द आधिदैविक श्रीकृष्ण (सदृश होने और जीने मे) मे ही है ।
      मध्ययुगीन दार्शनिक शब्दावली मे जीवन से विमुख या विरक्त होने का सन्देश न देने वाला दर्शन और उसपर आधारित सूर का काव्य मुझे अपने ढंग का सॅर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है । मित्र को, माता-पिता को और शिशु को भी दिव्य अस्तित्व यानि ईश्वर के रूप में दर्शन करने का सन्देश देने के कारण।

बुधवार, 21 अगस्त 2019

याचक

दरअसल वे डकैत थै ।
अलग ढंग के डकैत ।
सभी को सन्तोष,त्याग और दान का पाठ पढा रहे थे ।
क्या गजब का लूट रहे थे
कि सब लुटते हुए भी
मुस्करा रहे थे ।

इस तरह वे सभी का ध्यान
असली जरूरत मंदों से
फर्जी याचकों की ओर
भटका रहे थे
जो स्वाभिमानी भूखे थे
दम तोड़ रहे थे बन्द कमरों मे
और पेशेवर मंगते
सारे शहर मे
गुलछर्रे उड़ा रहे थे ।

देवता

उनका दोष यही था
कि वे देवता हो चुके थे
धरती से ऊपर उठ चुके थे
धरती से सम्बन्ध-विच्छेद हो चुका था उनका
अब वे स्वर्ग से बर्खास्त होने पर ही
धरती पर अपने अवतरण के लिए
सोच सकते थे !
धरती को
और धरती वालों को बचाने के लिए
उनका स्वर्ग से बर्खास्त होना बहुत जरूरी था ।

रामप्रकाश कुशवाहा
21-08-2019