शनिवार, 22 जून 2013

मुझे बचपन कि... - Ramprakash Kushwaha

 मुझे बचपन कि... - Ramprakash Kushwaha



मुझे बचपन कि एक घटना याद् आती हैं..पिताजी जहाँ पढ़ते थे ,वहीँ हम बच्चों नें सीमेंट और बालू आदि निर्माण सामग्री लेकर एक शिव लिंग बनाया .वह इतना अच्छा बना था कि लडके-लड़कियाँ प्रणाम करके जाने लगे .एक दिन मैं अकेला ही बैठा था कि एक कुत्ते नें सूंघ कर एक पैर उठाया.पहले तो मैंने चेतावनी जारी की कि बचिएगा शंकर भगवान ! कि तभी जड़ पदार्थों से निर्मित भगवान की निरीहता मेरी समझ में आ गयी .मेरे मन में तभी यह भी कौंधा कि उन्हें बचाने कि शक्ति तो मैं भी अपन ही भीतर छिपाए यहाँ बैठा हूँ .बिना पल गवाए मुझे चारपाई से कुत्ते कि और कूदना पड़ा और शंकर भगवन भी भींगने से बाच गए .उस अनुभव नें इतना तो सिखा ही दिया कि किसी को भी पुकारने के पहले अपने भीतर कि शक्ति का भी आवाहन करा लेना चाहिए .क्या पता समस्या का इलाज अपनें पास ही हो