गुरुवार, 19 जुलाई 2012

नए रचाव का समर्थ कवि

चिन्तन-दिशा
सम्पादक-âदयेश मयंक
अंक-6-7,जनवरी-जून 2012 में प्रकाशित
(सम्पादेीय कार्यालय-
ए-701,आशीर्वाद-1,पूनम सागर काम्लेक्स,
मीरा रोड (पूर्व),मुम्बर्इ-401107
मोबाइल-09869118707)



                     

         रामाज्ञा शशिधर के काव्य संग्रह ''बुरे समय में नींद की कविताओं को पढ़ना एक विरल एवं विशिष्ट काव्य अनुभव से गुजरना है । गहन संवेदनात्मक जीवनानुभवों और स्मृतियों के सघन बिम्बधर्मी मौलिक रचाव की उनकी कविताएं समकालीन कविता और कवियों के प्रति सजग रचनात्मक असन्तोष की उपज हैं। इस असन्तोष और नकार में ही रामाज्ञा की कविताओं की अलग भाव-भूमि और अलग शिल्प के प्रस्थान-बिन्दु का रहस्य भी छिपा है । तर्ज की मर्ज की शिकार, कविताएं पढ़कर कविताएं लिखने वालों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए मेरी भी निजी धारणा समकालीन कविताओं के अधिकांश के प्रति बहुत अच्छी नहीं रही है । मुद्रण की सर्वसुलभ प्रौधोगिकी नें अच्छे-बुरे सभी को छपने की सुविधा प्रदान की है । अब छपना एक सामान्य घटना है और सत्ता के संसााधनों पर अपनी पकड़ और नजदीकियों  के कारण अथवा किसी बड़ी पूंजी के सहारे बाजार पर नियन्त्रण से अर्जित यश के अर्थशास्त्र और समीकरणों को बढ़ती जागरूकता के कारण आम पाठक भी बहुत कुछ समझने लगा है । आम जनता से कटा यह साहित्य लेखन सरकारी खरीद के माध्यम से पुस्तकालयों में अपनी जगह पा तो लेता है,लेकिन हिन्दी के आम पाठकों में साहित्य के प्रति अरुचि और अनास्था उत्पन्न कर पठनीयता को हतोत्साहित भी करता है ।
         रामाज्ञा शशिधर की कर्इ कविताएं समकालीन बुद्धिजीवियों तथा हिन्दी कविता की अविश्वसनीयता और पतनशीलता की पड़ताल करती हैं ।  इस दृषिट से ''वे बुद्धिजीवी हैं,'दिल्ली,'कला समय,'एक दिन चुक जाओगे'मुंडेर पर कौआ,'मुठभेड़,'कसौटी आदि कविताएं महत्वपूर्ण हैं । यह समय जो सत्ता,बाजार और संचार के सहारे महानता को प्रायोजित करती है ,सम्बन्धों के सहारे सफलता का इतिहास रचती है ,सिर्फ उपसिथति और प्रसिद्धि केे तथ्य और तर्क के आधार पर मूल्यांकन और महत्व का निर्धारण एक झूठे और संदिग्ध रचना-समय को विज्ञापित करती है । रामाज्ञा की इन कविताओं में प्रतिभा और योग्यता के बावजूद उपेक्षित युवा पीढ़ी की पीड़ा और आक्रोश की प्रभावी अभिव्यकित हुर्इ है ।'वे बुद्धिजीवी हैंइसलिए हर चीज का विकल्प है उनके पास......वे अपने समय सेइतनी ज्यादा नफरत करते हैंकि बीबी और बच्चे भीअपनी रचना का कच्चा माल दिखते हैं (वे बुद्धिजीवी हैं ),'हम दिल्ली के सबल सिपाहीगीत गजल पर शासन अपना....रामराज्य तक आवाजाही! (दिल्ली)'यह सिद्धों का नहींसिद्धहस्तों की कला का समय है (कला समय)'उग रही हैं पत्थरों परदूबों की नर्इ प्रजातियांप्रतीक्षा कर रहे हैं सबतुम्हारी रचना के रí हो जाने की (एक दिन चुक जाओगे),लूटते हैंरोशनी की हाट जोरच रहेवे ही समय की सुर्खियां (मुंडेर पर कौआ),तुमनें एडि़यों से रगड़ दी पगडण्डी  चुपचाप गायब हो गयीं दिशाएंउड़ेल दी स्याही पृष्ठों परमर गए सारे के सारे अक्षर (मुठभेड़ ) तथा 'महान कवि होता जा रहा हूं इन दिनोंमूल्य में भर रहा हूं आस्वाद की नकलनकल के आस्वाद को ही मूल्य बता रहा हूं (कसौटी)।

        समकालीन हिन्दी कविताओं के परिदृश्य में रखकर देखें तो उनकी कविताएं सबसे पहले एक अलग और बिल्कुल निजी काव्यभाषा के रचाव,लोक-सम्पृक्त कविता-मानस ,जन-सरोकारों एवं संधषोर्ं के लिए चिनितत ,प्रतिबद्ध और सक्रिय कवि व्यकितत्व के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं। समकालीन समाज में कवि-कर्म की गिरती हुर्इ साख के दौर के प्रति एक सफल प्रतिरोध रचती उनकी कविताएं जुझारू आस्था एवं सृजनात्मक आत्मविश्वास के साथ कवि-कर्म को सार्थक प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। कवि का यह रचनात्मक आत्मविश्वास 'पपड़ी के नीचे शीर्षक कविता में इसप्रकार व्यक्त हुआ है-' मैं समय की क्यारी में दबा हुआ अंखुआसुख का स्वप्न का भविष्य कामैं सभ्यता की पपड़ी में ढकी हुर्इ भाषा प्यार की उमंग की उम्मीद की........मैं ही रचूंगा हवा में खुशबूमैं ही भरूंगा भविष्य में जीवनमैं ही गाऊंगा हरेपन का गीतशब्द हूं मैंबीज के कोश से फूटता हुआ स्वप्न। यह आत्मविश्वास इस संग्रह की 'भाषा'तुम्हारे खिलाफ,'बदलो जी,'हमारी कतारों में शामिल'इनिद्रय बोध आदि कर्इ कविताओं देख जा सकता है । ये कविताएं रामाज्ञा के कविकर्म के संकल्प ,स्वभाव और सन्देश की शिनाख्त की दृषिट से महत्वपूर्ण हैं । चाहे वह भाषा कविता की'भाषा में प्रतिरोध ऐसे फैलाओजैसे वे फैलाते हैंव्यापारके रूप में हो या तम्हारे खिलाफ कविता की 'तुम्हारे खिलाफ सपने देखनें और गीत गानें की चुनौती ,'बदलो जी कविता में घिसे-पिटे राग बदलने का संकल्प तो 'हमारी कतारों में शामिल कविता में कविता को प्रतिरोध और संघर्ष के सशक्त सामूहिक हथियार के रूप में रचनें और देखने का स्वप्न ।
          रामाज्ञा जीवन के सूक्ष्म निरीक्षण के कवि हैं । लेकिन उनका यह सूक्ष्म निरीक्षण भी उनकी गहरी संवेदनशील प्रकृति से परिचालित है । इस दृषिट से उनकी एक ही कविता कुम्हार का उद्धरण ही काफी है । जिसमें उन्होंने कुम्हार जीवन के सारे अनुभवों और पेशे की घ्वनियों को बिम्बों में बदल दिया है । समय और बाजार के खिलाफ अपनें पेशे में बनें हुए कुम्हार की चिन्ता ,आर्थिक परिसिथतियां और नियति को कवि पृथ्वी और चाक दोनों के उसके न चाहते हुए भी घूमनें के सहज रूपकात्मक बिम्ब से व्यक्त कर देता है-
               उसके न चाहते हुए भी
               उसकी उंगलियों में घूम रही है
               पृथ्वी...
कविता का एक दूसरा बिम्ब दिए बनाते समय टूटते रहनें की ध्वनि को गहरे आदिम सम्बन्धो के टूटते रहनें की ध्वनि को गहरे आदिम सम्बन्धों के टूटनें से जोड़ देता है-
             ' खुच से टूटे हैं अभी-अभी
              गहरे आदिम संबध
आर्थिक मजबूरियों से हुए विस्थापन किस प्रकार प्राकृतिक रिश्तों को भी बंजर धरती में बदल देते हैं,यह संकलन की'पिता आये थे सपने में शीर्षक कविता में देखा जा सकता है । पिता का सपने में आना वास्तविक जीवन में पिता के न आ पाने की अभावात्मक व्यंजना करता है । यह व्यंजना जीवन की त्रासदी को और गम्भीर बना देती है । पिता के साथ साहचर्य ,राग और संवेदना के साथ जीवन जीने का एक अविस्मरणीय लोक ,प्राकृतिक जीवन पद्धति तथा लुप्त हुआ महत्वपूर्ण पर्यावरण है ,जिसे यह कविता सपने के रूप में ही सही बचाने का प्रयास करती है ।
       रामाज्ञा लोक के उत्सवधर्मी मन ,आस्था ,राग और संवेदना के सभी तारों काी सघन बुनावट के कवि हैं । इस दृषिट से उनकी छठ का पुआ कविता देखी जा सकती है । छठ यधपि सूर्य की आराधना से सम्बनित है लेकिन उध्सकी तिथि का निर्धारण षष्ठी के चन्द्र से ही होता है । प्रवासी कवि को मां की याद छठ के पर्व पर आती है । छठ के पर्व पर मां के गतिविधियों की परिकल्पना कवि की कल्पना को उत्तेजित कर उसे पुए छानती मां से चांद तक पहुंचा देती है। फिर कवि की कल्पना काव्य-न्याय के सहारे अनेक रागात्मक संभावनाओं से खेलने लगती है । कभी चांद के धब्बे उसे जली हुर्इ रोटी की याद दिलाते हैं तो कभी कटे हुए अधूरे चांद का दृश्य उसे चूहों द्वारा कुतरी गर्इ रोटी तक पहुचा देता है । रागात्मक अनुभवों का एक अलग संसार पूरी जीवन्तता के साथ पाठक के लिए भी खुल पड़ता है । यह संसार कविता का संसार होते हुए भी वास्तविक संसार की अनुभूतियों एवं यादों से रचा गया है । यह संसार लोक की संवेदना ,समर्पण और राग का है ,जहां का सूरज कृतज्ञता और आभार का है और हर श्रमजीवी का जीवन आधार है ,जहां उसका पूजना भी परिहास का नहीं बलिक एक श्रद्धास्पद आस्था के साथ गौरवशाली मानव-मूल्य बन जाता है -'पसीनें में आस्था है पसीने से प्यार हैपसीना सूरज से जन्मा है मैं सूरज का बेटा हूंसूरज को पूजता हूं। सूरज यहां जीवन के एक खोए हुए रिश्ते और अर्थ के रूप में सामनें आता है । इस तरह यह कविता लोकपर्व छठ के उत्सवधर्मी लोकमन का साक्षात्कार कराती है ।
        रामाज्ञा की कर्इ कविताएं सूक्ष्म निरीक्षण ,सृजनात्मक कल्पना और जीवन राग का अदभुत संयोजन प्रस्तुत करती हैं । ऐसी कविताएं सामान्य में भी असामान्य ढूंढ़ लेने वाली कवि की तीसरी आंख और लम्बे रचनात्मक श्रम और चिन्तन का परिणाम हैं । उदाहरण के लिए लड़कियों का साइकिल स्टैण्ड  शीर्षक कविता के रचनात्मक कौशल को देखा जा सकता है । साइकिलों का मानवीकरण और फिर लड़कियों के व्यकितत्व का आरोपण ,उनका लड़कियों के कभी प्रतीक तो कभी प्रतिनिधि के रूप में चित्रण और अन्त में निद्र्वन्द्व लड़कियों के किशोर मनोविज्ञन के अनुरूप उनके जीवन का अल्हड़ खिलन्दड़ापन इस कविता को इस संकलन की ही नहीं बलिक हिन्दी की भी अविस्मरणीय कविता बना देती हैं -'एक की गलबहियां किए दूसरी खड़ी हैदूसरों की टांग पर पहली नें रक्खी एड़ीतीसरी खींच रही दूसरी का रिबन........कतारबद्ध खड़ी हैं लड़कियों की आत्माएंआरजू आशिकी दीवानगी तमन्नाएंं।
        साझेदार  कविता जीवन में सहयोग और साहचर्य का दर्शन प्रस्तुत करती है -'तुम्हारे सुख में शामिल है मेरा सुखतुम्हारे दु:ख में शामिल मेरा दु:ख.......कोर्इ फलजैसे थोड़ी सी मिटटी का बना होता है थोड़े से पानी काथोड़ सी हवा काथेड़ी सी धूप का.......साझा कोख में पलता है भविष्य।इसी तरह चौकीदार कविता पूंजीवादी सभ्यता में किसी मनुष्य के श्रम का मूल्यांकन करने की प्रवृतित को मानवीय संवेदना के धरातल पर प्रश्नांकित करती है -जबकि बीत चुका है रात का तीसरा पहरदोनों को जरूरत है गाढ़ी नींद की ऐसी नींद जो ओस की तरह कोमल होकपास के फूल की तरह आरामदेहदेर सुबह मांगोगे उससेझपकियां लेनेनींद,स्वप्न औरऐसी ही कर्इदूसरी चीज में खो जानें का हिसाबइसके एवज मेंकहां से दोगे उसेउसके हिस्से का सूरज....।बजट कविता सम्बन्धों पर पड़ने वाले बाजारवादी प्रभाव का रेखांकन करती है -'संबन्धों का ऐसा हमने बजट बनायाहर सपना चीख पड़ा है।
      पुस्तक के अनितम कवर पृष्ठ पर प्रकाशित मदन कश्यप की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि 'रामाज्ञा शशिधर की कविताएंं संवेदना की नर्इ बनावट के साथ-साथ यथार्थ को देखने-परखने के अपने नजरिए के कारण भी प्रभावित करती है । यह नर्इ रचना-दृषिट आम आदमी के संघषोर्ं में उनकी सक्रिय भागीदारी की देन है। आज की कविता और कवियों को देखते हुए इसे दुर्लभ ही माना जाएगा । इसीलिए रामाज्ञा अपने समकालीनों में सबसे अलग हैं । वे किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं और इस रूप में नागाजर्ुन की परम्परा का विकास उनमें देखा जा सकता है । कपास की खेती करनें वाले किसानों के शोषण और आत्महत्याओं की त्रासदी तथा उनके यथार्थ की भयावहता को रामाज्ञा नें अपनी विदर्भ कविता में जिसप्रकार रूपाान्तरित किया है वह उनकी रचना-सामथ्र्य का तो मानक है ही ,एक नए समर्थ कवि की प्रापित के रूप में हिन्दी कविता के लिए भी महत्वपूर्ण है -
     संसार का सबसे बड़ा श्मशानधूसर सलेटी कालासंसार का सबसे बड़ा कफनमुलायम
     सफेद आरामदेहमणिकर्णिकेतुमनें विदर्भ नहीं देखा है
कविता विदर्भ के सफेद कपास की खेती को कफन की संज्ञा देकर और मणिकर्णिका से सन्दर्भित कर शोषण के कारण हो रही मौतों के बारे में सीधे-सीधे न कहते हुए भी बहुत कुछ कह देती है ।
    रामाज्ञा की कर्इ कविताएं कुतिसत राजनीति और उसकी साजिशों के प्रति आम जनता को सजग करती हैं-'मेमनें को सब बता दूंगा तुम्हारे द्वारा बांटी गर्इ हरी पतितयों के बारे में । संकलन की खेत कविता राजनीतिक शोषण और उपेक्षा के शिकार कृषिकर्म तथा उसके त्रासद यथार्थ को, जो किसानाें को आत्महत्या के लिए विवश करती हैं को एक नर्इ सांकेतिक व्यंग्यार्थी अभिव्यंजना देती है -'खेत से आते हैं फांसी के धागेखेत से आती है सल्फास की टिकियाखेत से आते हैं श्रद्धान्जलि के फूलखेत से आता है सफेद कफनखेत से सिर्फ रोटी नहीं आती ।      
       संकतन की शीर्षक कविता 'बुरे समय में नींद विकास के नाम पर बहुआयामी विनाश के वर्तमान दौर का एक प्रभावी स्वप्न-रूपक प्रस्तुत करती है । अन्य कविताओं की तरह इस कविता में भी वांछित अभिव्यकित के लिए बिल्कुल नए काव्य-शिल्प की तलाश देखी जा सकती है । यह कविता बहुत आसानी से फैण्टेसी शिल्प में लिखी जा सकती थी । लेकिन इस कविता की विश्वसनीय प्रभावशीलता इसके स्वाभाविक रूप में वास्तविक दु:स्वप्न के रूप में प्रस्तुत किए जानें में ही है -
               ' इस बुरे समय में देर-सबेर आती है नींदनींद के साथ ही शुरू होता है सपना
                सपने में पृथ्वी आती है नाचती नहींकोयल आती है कूकती नहीं
                गौरैया आती है चुग्गा नहीं चुगतीबादल आते हैं बरसते नहीं'
रामाज्ञा के कविताओं की रचना प्रकि्रया एक साथ इतनी बहुस्तरीय,सहज और विशिष्ट है कि उनमें प्रकृत संसार के साथ-साथ कविता का बौद्धिक मानसिक सूक्ष्म संवेदी प्रति-संसार भी अर्थ-सम्प्रेषण की अधिकतम संभावनाओं के साथ सक्रिय रहता है । सूरन कविता के रचाव को देखें तो वह चुपचाप दलित उपेक्षित सर्वहारा वर्ग के प्रतीक में कब बदल जाता है ,इसका पता ही नहीं चलता -मैं रह गया ओल का ओलन मिली नागरिकता न भूगोल। कविता सूरन के स्वाभाविक वर्णन से शुरू होती है और शीघ्र ही असितत्व के जुझारूपन,जददोजहद और जिजीविषा के प्रतीक में सूरन को बदलती हुर्इ पाठक को जीवन के दार्शनिक साक्षात्कार तक ले जाती है -
      ''फालतू बोझिल समय नेंफेंक दिया गाठों के गुच्छ कोबंसवाड़े,गंडोरे या भटठे के पांव तले
     फैलना पड़ा धीरे-धीरेधरती के गर्भाशय को जबरिया फैलाता हुआ
     कोख का जीवन से ऐसा ही रिश्ता है
        रामाज्ञा शशिधर उन कवियों में से हैं,जो कविता को सिर्फ रचतें ही नहीं ,बलिक उसे जीते भी हैं । जब मैं उनसे पहली बार काशी हिन्दू विश्वविधालय के हिन्दी विभाग में व्यकितगत रूप से मिला था ,तो उनके कवि रूप और उनकी कविताओं से बिल्कुल ही परिचित नहीं था । मैंने पंकज विष्ट के समयान्तर में प्रकाशित उनके कुछ रिपोर्ताज पढे थे और,जोकहरा में आयोजित एक सेमिनार में दिया हुआ उनका व्याख्यान भी सुन चुका था । दोनों ही जगह उनकी संवेदनाधर्मी बिम्बात्मक भाषा पढ़-सुनकर मुझे यह अनुमान हो गया था कि इस व्यकित में कविता है । उनसे मैंने यह कहा कि आपमें मुझे कविता दिखती है । यदि अब तक नहीं लिखा हो तो लिखिए और यदि लिख चुके हों तो पढ़ाइये । जब भी लिखेंगे अपने ढंग की होगी । मेरी बात सुनकर रामाज्ञा सिर्फ मुस्कराए थे । 'बुरे समय में नींद  की कविताएं पढ़कर मेरे उस पूर्वाभास और पूर्वकथन की पुषिट हुर्इ है । रामाज्ञा की कविताएं दुर्लभ संवेदी प्रजाति की कविताएं हैं । वे लोकधर्मी संवेदना,प्रतिरोध ,संकल्प और जिजीविषा की अभिव्यकित करने वाली कविताएं हैं । उनकी कविताओं में त्रासद यथार्थ -विनाश और प्रलय में भी जीवन की चीखों की मार्मिक शिनाख्त मिलती है ।
   रामाज्ञा की कविताएं सामूहिकता और रिश्तों का मानवीय पर्यावरण ,राग और संवेदना ,कविकर्म की सामाजिक परिवर्तन में निर्णायक भूमिका के साथ कविता के प्रति एक नयी आस्था की प्रतिष्ठा करती हैं-'कि तुम भाषा मेंआग इस तरह लाओजैसे वे लाते हैंस्ांधि-पत्रभाषा में प्रतिरोध ऐसे फैलाओजैसे वे फैलाते हैं व्यापार....... हमारा समय नायकविहीन हो गया है....रामाज्ञा की कविताएं एक नायक विहीन युग में सही नायक के तलाश की प्रस्तावना करती है ।

            समीक्षित पुस्तक-
                        'बुरे समय में नींद
                        कवि- रामाज्ञा शशिधर
                        प्रकाशक-अनितका प्रकाशन, सी-56यूजीएफ-4
                        शालीमार गार्डन,एक्सटेशन-।। गजियाबाद-201005 (उ0प्र0)