रविवार, 22 दिसंबर 2013

बुद्धिधर्मी-संशयवान लभते ज्ञानं !

मेरे प्रिय विचारक पी.एन.सिंह ने एक जीवन-मूल्य के रूप में बुद्धिधर्मी की अवधारणा दी है .वे आस्तिक होने के स्थान पर बुद्धिधार्मी होनाऔर कहलाना  अधिक क्रन्तिकारी महत्त्व का और साहसपूर्ण  समझते हैं .आस्तिकों के लिए नास्तिक होना एक अपराध है .धर्मभीरु प्रायः नास्तिक होने से डरते हैं.इस डर का कारण जीवन की असुरक्षा ग्रंथि तो है  ही,वह अपूर्णता भी है जो एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हमें अकेले में अपनी पूर्णता का अहसास नहीं जीने देती .एक तरह से यह ठीक ही है कि अकेले में हम अपनी पूर्णता की घोषणा करने से डरते हैं .कई अन्य प्राणियों की तरह सामाजिक होना हमारा जीनेटिक गुण भी हो सकता है ..ऐसे में अकेले अपनी अपूर्णता का अहसास जीना स्वाभाविक ही है .
                आस्तिकता और नास्तिकता का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि बुरे और कटु अनुभव हमें प्रायः नास्तिक बनाते हैं और प्रेममय अनुभव हमें आस्तिक ..एक बहुत सुखी समाज में ही अतिरिक्त कृतज्ञताएँ संभव  हैं .जहाँ तक मेरा प्रश्न है बचपन से ही ईश्वर के होने के  पारंपरिक विश्वास और समाज तथा व्यवस्था के गलत होने के मेरे निजी असंतोष नें मुझको मुझको विषम स्थिति में डाल रखा था आस्तिक मनुष्य के साथ समस्या कुछ इस तरह होती है कि जब वह एक बार यह मान लेता है कि अदृश्य हवाओं के पार कोई ऐसी छिपी शक्ति है जो उसके साथ घट रही अच्छी -बुरी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है तो एक अजीब किस्म के मानसिक युद्ध में फंस जाता है .उसकी हालत उस बन्दर की तरह हो जाती है जो अपना ही प्रतिबिम्ब दर्पण में देखकर उसपर खीसें निपोरता है .-प्रतिद्वंदी  समझकर उसपर झुझलाता है .जबकि सच्चाई यह है कि किसी अमूर्त को स्वीकारना या बिलकुल नकारना दोनों ही एक मानसिक द्वंद्व में फंस जाना है .बुद्ध  नें इसीलिए जो रास्ता निकालाथा वह शून्यवाद का था .उनका ईश्वर के होने के प्रश्न पर चुप लगा जाना मेरी समझ में अपनी अबोधता को ईमानदारी से स्वीकार करना था .हममें से अधिकांश में बुद्धजैसी निर्मम और निस्संग ईमानदारी नहीं है .हमारी आस्था दरअसल परंपरा से अर्जित आस्था होती है .दूसरे ऐसा मानते हैं इस लिए हमने भी उसे मान लिया . ऐसा हो सकता है कि दुसरे जो मन रहे हों वह सच ही हो लेकिन वह हमारे अपुष्ट और अप्रत्यक्ष ज्ञान का हिस्सा है ,प्रत्यक्ष एवं पुष्ट ज्ञान का नहीं .ऐसे ज्ञान को जिसके सच होने को हम कभी चुनौती नहीं देते ,वह गलत भी तो हो सकता है .
                    इसतरह हम देखें तो एक सच्चा बुद्धि धर्मी होना पूर्वाग्रही ,अप्रत्यक्ष एवं अप्रमाणिक अवधारणाओं से मुक्त होना भी है .अपने मस्तिष्क की उस प्रारम्भिक अबोधता को प्राप्त कर लेना है ,जो हमें प्रकृति नें हमारे जन्म लेने के समय सौपी थी .इस दृष्टि से हम देखें तो एक ईमानदार नास्तिक होना भी सच्चा बुद्धिधर्मी होना हो सकता है .बुद्धिधार्मी होना आधुनिक वज्ञानिक युग को बचाए रखने के लिए भी जरुरी है .क्योंकि प्रकृति ने जितना मानव जाति को अपनी नैसर्गिक सृजनशीलता से देना था उतना तो वह दे ही चुकी है .अब वह विकास की प्रौढ़ता को प्राप्त कर बूढ़ी हो चली है .मानवजाति के लिए आगे के अस्तित्व का रास्ता एक कठिन रास्ता ही होगा .उसे अपने रास्ते अपनी सृजनशीलता और बुद्धि से ही तलाशने होंगे .संभव है आगे की मानवजाति को सूर्य के चुकाने का भी विकल्प ढूढ़ना पड़े और आकाश गंगाओं के टकराने पर अपने बाख निकालने का भी .
                      एक बुद्धिधर्मी होने के लिए दरअसल प्रश्नधर्मी होना जरुरी है ."श्रद्धावान लभते ज्ञानं " और संशयात्मा विनश्यति जैसे सूक्ति- वाक्य प्राचीन काल में मुर्ख और अबोध अनुयायी बनाने के लिए भले ही आवश्यक रहे हों लेकिन वैज्ञानिक युग की सच्चाई तो यही है कि "शंकावान लभते ज्ञानं .

रविवार, 8 दिसंबर 2013

जीना,जानना और जाना

तेजी से बदलते समय नें बहुत से पर्यावरण लुप्त कर दिए हैं .तेजी से बदता हुआ शहरीकरण सिर्फ किसान पेशे पर ही चोट नहीं कर रहा है बल्कि  किसान संवेदना और मूल्यों को भी तेजी से उजाड़ रहा है .प्रकृति से मानव-जीवन के रिश्ते आज लगभग काल्पनिक होने के कगार पर पहुँच गए हैं .उत्पादन के स्थायी संसाधनों नें कभी मानवीय रिश्तों को जो स्थायित्व दिया था ,वह प्रतिपल परिवर्तित आर्थिक समय में असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है ,सच तो यह है कि लोग धीरे-धीरे जीना भूला रहे हैं ..लोगों के पास एक-दुसरे को जीने के लिए समय नहीं है .
               आज हर किसी को कहीं न कहीं जाना है ,यह जाना इतना भयंकर है कि हममें से अधिकांश व्यक्ति अपने भविष्य-निर्माण एव,भावी की  यात्रा में है . हममे  से अधिकांश व्यक्ति विस्थापन के लिए अभिशप्त है .वह निरंतर उजाड़ रहा है .निरंतर उजड़ते हुए विस्थापन की  गतिकी उसके सरे रिश्तों को औपचारिक बना रही है .आज हर व्यक्ति तेजी से भाग रहा है और हर व्यक्ति को कहीं न कहीं जाना है .इस तरह उसका जाना ही उसका जीना बन गया हैं .वह एक गतिशील अनुभव में है और स्थायी रिश्तों के निर्वाह के लिए उसके पास मानसिक समय नहीं है .स्थायी रिश्ते उसकी गति में अवरोध उत्पन्न करते हैं .असुविधाएं उत्पन्न करते हैं .उसका यह जाना प्रकृति से कृत्रिमता की और जाना है .वह स्वाभाविक से अस्वाभाविक हो रहा है .नैसर्गिक से कृत्रिम हो रहा है .वह एक छाया सृष्टि में जी रहा है .वह एक आभासी बनावटी दुनिया का नागरिक है .वह एक मानसिक व्यवस्था की उपज शहर में रहता है .
          शहरी जीवन की कृत्रिमता और यांत्रिकता उसे अर्थतंत्र के एक अमानवीय लोक में ले जाती है .यह दुनिया बौद्धिक क्रूरताओं और वर्जनाओं कि दुनिया है .यह दुनिया उसे असहज और विक्षिप्त कराती है ..जिस दुनिया को वह सिर्फ जानता है और जिसे सिर्फ जानना है .क्योंकि जानना ही उसका लक्ष्य है और वह सिर्फ जानंने की और ही जाता है -सिर्फ जानना ही उसका जाना और उसका जीना बन गया है .

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

बकरी का रूपक

सब तो ठीक है
बकरियों का क्या होगा
जहाँ तक जाती है दृष्टि
बकरियां ही बकरियां हैं

बकरिया संतुष्ट हैं
बकरियां आश्वसत  हैं
बकारियों  को देख-देख
बकरियां खिलमस्त हैं
बकरियों की गिनती कर गड़ेरिये  भी मस्त है
गिन -गिन कर पस्त है
थोडा-थोडा त्रस्त है

बकरियों में सींग की उलझन है
ताने हैं तिरकट है
जीने का संकट है
अलग-अलग बाड़े हैं
गड़ेरियों के पालतू कुत्ते भी ठाडे हैं
मेमने से मौत तक वक्त के सिंघाड़े हैं
हाडे हैं जाड़े हैं
जीने का मकसद भी भोडे और भांडे है

वैसे तो लगता है
बकरी है बकरी के लिए
दुनिया के वृत्त में
बकरियों का हिस्सा है
बकरियों का किस्सा है
बकरियों की  रीति है
लेकिन जन्म भी बकरियों का
दावत गड़ेरिये की
बकरे कि प्रीति भी
गड़ेरिये की जीत है

दृष्टिपथ जहाँ तक है
सींगें ही सींगें हैं
डरी-डरी सींगें है
सींगों में डर है गड़ेरिये कि लाठी का
भयानक असर है ...

बकरी तो बकरी है
बार-बार रीझ रहीं
मिमियाती भीग रहीं
गड़ेरिये का लाठी धुन जैसे संगीत है
बकरी का जीवन ही
जन -मन का गीत है


शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

सामूहिकता की जड़ता और नियतिवाद

मनुष्य एक सामुदायिक प्राणी है .वह अपनें अधिकांश में इस बात के लिए सजग रहता है कि वह विचारधारा के स्तर  पर भी दूसरों से बहुत दूर न जाए .अनुरूपता और अनुकूलता कि यह कोशिश ही बड़े समुदायों की उस सामुदायिक तानाशाही को जन्म देती है जो छोटे और स्वायत्त समुदायों के लिए हिंसक और आपराधिक भी हो सकती है .ऐसी दैत्याकार समुहिकताए अकेली और असहमत बुद्धिजीवियों को निरीह बनती हैं .जनसामान्य दैत्याकार  समूहों से उपजी तानाशाही को अपनी असमर्थता  के कारण ईश्वर की इच्छा का परिणाम समझाने लगता है .अधिकांश राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक संस्थाए निर्णय एवं प्रभाव कि क्रूरताएँ रचती हैं .ऐसे बघ्याकारी प्रभावों का भी अध्ययन होना चाहिए .
         जो नहीं है उसका होना संभव करने के लिए सृजनशील प्रतिरोध मनुष्य करता रहता है .अभावों को संभव करने का सृजनात्मक तनाव  एक जरूरी एवं उपयोगी मानसिक तनाव है .इसे दुख के रूप  में नहीं देखा जाना चाहिए .इसकी सार्थकता इसे गोरव्शाली बनाती हैं..इसलिए अपना नजरिया बदलने कि जरुरत है क्योंकि हर परेशांन आदमी दुखी नहीं होता .हमें सृजनशील दुखी और कुंठित दुखी में अंतर करना आना चाहिए .सृजनशील दुखी प्रतिरोधी होता है जबकि कुंठित दुखी असफल .


रविवार, 27 अक्तूबर 2013

सही इतिहास-बोध के पुनर्रचनाकार

                                " संवाद ",
                                  संपादक,अमितकुमार पाण्डेय,,
                                  संयुक्तांक ६-७ ,नवम्बर २०१२ से अक्टूबर २०१३
                                  (ISSN: :2231-4156) में प्रकाशित  
भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और पुनर्निमाण के लिए बौद्धिक स्तर पर उन वर्ग-स्वार्थों की पडताल अत्यन्त जरूरी है जो उसके नियति के प्रवाह को सही-सही न समझने की नीयत को जन्म देती रही हैं । भारत में परम्परागत नेतत्व ब्राहमण बुद्धिजीवियों का रहा है । ब्रहमण जाति की ऐतिहासिक भूमिका सत्ताधारियों के पक्ष में सामाजिक-सांस्कृतिक जनमत तैयार करनें की रही है । यधपि यह प्रत्यक्ष रूप से सत्ता के केन्द्र में कम ही  रही है लेकिन कम समय में ही उसनें भारतीय समाज पर निर्णयक प्रभाव छोड़ा है । मौर्य काल के बाद पुष्यमित्र शुंग के रूप में तो मुगल काल के बाद पेशवार्इ के रूप मेे भारतीय समाज को छुआछूत और अस्पृश्यता की सौगात दी । भारत में ब्राहमण-श्रेष्ठता का आधार धार्मिक ही रहा हे । यही धामि्रक श्रेेष्ठता ही उसकी सांमंजिक-सांसकृतिक श्रेष्ठता का आधार रही है ।आजादी की लड़ार्इ में नवजागरण तो बि्रटिश शिक्षा और सत्ता के प्रभाव में ही होना था जबकि पुनर्जागरण का सामुदायिक आधार हिन्दू और मुसिलम जातीयता थी । इसमें भी हिन्दू जातीयता का आधार ब्राहमण और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियां ही थीं । इसीलिए जब भारत-भारतीकार मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में भी हिन्दू जातीयता के दर्शन होने लगते हैं तो आश्चर्य नहीं होता । यह जातीयता संस्कृत-निष्ठ तत्सम हिन्दी के विकास तक जाती है और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास के मूल्य-निर्णय तक भी । इसी चेतना के कारण ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य का इतिहास पुनर्जागरण के इतिहासबोध का ही पाठ प्रस्तुत करता है । बंगाल के प्रवास और नवजागरण के वास्तविक प्रवाह से परिचित होने के कारण हिन्दी में यह श्रेय प्रेमचन्द को छोड़कर सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी जैसे बंगाल-प्रवासी कुछेक साहित्यकारों को ही हे जो पुनर्जागरण की जातीय मनोग्रस्तता से बाहर निकलकर नवजागरण के आधुनिक स्वरूप का साक्षात्कार कर पाए । सम्यक इतिहासबोध के कारण सिर्फ आचार्य द्विवेद्वी ही ब्राहमण जातीयता की मध्ययुगीन सीमाओं को सही-सही जान और पहचान पाए । उन्हें आसन्न युगान्त और आधुनिक भावी की सही-सही पहचान थी । यह सजगता उन्हें राहुल सांकृत्यायन की परम्परा से जोड़ती है । इन इतिहासजनित पूर्वाग्रहों का अतिक्रमण न कर पाने के कारण ही आचार्य शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास ब्राहमण जातीयता पर आधारित आधुनिकता.बोध का ही पाठ प्रस्तुत करता है । विचारशील प्रतिभा की भव्य प्रस्तुति और ऐतिहासिक समझदारी के बावजूद वे दलित-विमर्श युग के मानवतावाद के प्रतिपक्ष में जा पड़ते हैं । आचार्य श्ुक्ल के ये विचलन उनकी ऐतिहासिक अवसिथति की उपज हैं । वे बि्रटिश भेदनीति द्वारा प्रोत्साहित हिन्दू जातीयता के उभार से बच नहीं सके हैं । यह वह समय था जब कबीर पिछड़ रहे थे और हिन्दू जातीयता ब्राहमण-श्रेष्ठता के पम्परागत बोध के साथ एक दूरगामी ऐतिहासिक विभाजन की ओर बढ़ गयी थी । हिन्दी के साहित्य-शिक्षकों की कर्इ पीढि़यां अपने पितामह साहितियक इतिहासकार की ऐतिहासिक सीमाओं का वाचन-पाठन करती रहीं । यह श्रेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी को ही है कि उन्होंनें व्यापक असहमतियों के साथ हिन्दी साहित्य के इतिहास का पुन:पाठ प्रस्तुत किया । उनमें इतिहास की विकासवादी र्इमानदार समझ मिलती है । वर्चस्व की संस्कृति के साथ ही प्रतिरोध की संस्कृति की वह शिनाख्त भी जिसे चौथीराम यादव नें 'लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा कहा है । वर्चस्व की संस्कृति को भारत के जातीय सामन्तवाद नें अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पैदा किया था । वर्ण भ्ेद ,आनुवांिशक प्रारब्धवाद ,क्र्रानितकारी असन्तोषविरोधी नियतिवाद ,मनोवैज्ञानिक दृषिट से अनुयायी बनाने वाला आध्यातिमक दर्शन जिसे पुरोहित वर्ग की जातीय श्रेष्ठता की सामजिक स्वीकृति के माध्यम से भकित साहित्य और संस्कृति के रूप में प्रचारित किया गया था-इस वर्चस्व की संस्कृति की सामान्य विशेषताएं थी । जाहिर है कि यह सामन्तवाद और पुरोहितवाद के गठजोड़ से पैदा हुर्इ सांस्कृतिक-सामाजिक अभियानित्रकी आधुनिक मानवतावादी प्रगतिशील नजरिए से और लोकतानित्रक नजरिए से भी आधुनिक मानवतावाद के प्रतिकूल पड़ती है ।
       दरअसल मांक्र्सवाद की सैद्धानितकी हर युग के अपनें सत्ता-संरक्षक साहित्य के असितत्व को स्वीकार करती है । भारतीय सामन्तवाद नें आनुवांशिक तथा जातीय उत्तराधिकार वाली संस्कृति आधारित व्यवस्था का विकास किया था ।इसकी सत्ता और उसके सहायकों का अलग चरित्र था । यह चरित्र जनसामान्य के विशिष्टता-बोध को नकारता है । इसके प्रतिरोध में लोक नें अपनी अलग दार्शनिकी विकसित की है । लोकधर्म की यह परम्परा प्रभु-वर्ग के अलग विशिष्टता और श्रेष्ठता-बोध को अस्वीकार करती है । आधुनिक लोकतानित्रक युग में जन-सामान्य की इस प्रतिरोधी धारा का महत्व बढ़ा है । चौथ्ीराम यादव के आलोचक की भूमिका इसी प्रतिरोधी धारा के स्पष्ट एवं युगधर्मी पहचान की है ।
       चौथीराम यादव के आलोचक के निर्माण में हजारीप्रसाद द्विवेद्वी इतिहासबोध और पर्यवेक्षणों की महत्वपूर्ण भूमिका है । लोकभारती से प्रकाशित उनकी पहली पुस्तक हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन  को लिखते समय वे इतिहास के संघर्ष के उन जरूरी प्रश्नों का भी साक्षत्कार करते और कराते हैं,जिसका स्वतंत्र और बहुआयामी प्रस्फुटन उनकी अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित उनकी दूसरी पुस्तक लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा  में हुआ है । चौथीराम का यह लेखन युग की अपनी अपरिहार्यताओं से पैदा हुआ अनौपचारिक लेखन है । यह प्राध्यापकीय प्रोन्नति के दबावों से पूरी तरह मुक्त ज्ञान के विकास के लिए आवश्यक एक जरूरी लेखन के रूप में है । हिन्दी की आलोचकीय विसंगतियों पर ऐसा साक्ष्यधर्मी चिन्तन है,जिसकी अवहेलना कर सही इतिहासबोध नहीं निर्मित किया जा सकता । अपनी इसी भूमिका में चौथीराम यादव एक बड़े बदलाव-बिन्दु की प्रस्तावना करने वाली महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक के रूप में सामनें आते हैं । एक विनम्र,उदार और साहसिक पक्षधरता उनके आलोचकीय विमर्श को महत्वपूर्ण बनाती है । बिना किसी पूर्वघोेषणा और संगठित प्रचार के अपनें अनौपचारिक चिन्तन, समाजशास्त्रीय दृषिट और स्पष्टवादी तेवर के साथ उनकी आलोचना एक निर्णायक विमर्श उपसिथत करती है । वर्चस्व की संस्कृृति के समानान्तर लोकधर्मी प्रतिरोध की संस्कृति और साहित्यधारा की पहचान चौथीराम यादव की आलोचना की केन्द्रीय चिन्ता है । यह संस्कृति वर्ण-धर्म की विरोधी और मानवतावादी है ।
       अपनी इस पुस्तक में चौथीराम यादव नें जनपदीयता और लोकधर्मिता  को अभिजात्य एवं शोषक सृजनशीलता के प्रगतिशील विकल्प के रूप में देखा है । इसी आधार पर प्रगतिशीलता की परम्परा को वे मध्य युग में कबीर से लेकर आधुनिक युग में प्रेमचन्द,निराला ,नागाजर्ुन,फणीश्वरनाथ रेणु , शिवपूजन सहाय,हरिशंकर परसार्इ,काशीनाथ सिंह,मैत्रेयी पुश्पा और अनामिका आदि तक में देखा है। उनके अनुसार कबीर का सांस्कृतिक जनपद प्रगतिशील हिन्दी कविता की कीमती रिसत है ।(भूमिका,लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा ) अपनें आलोचकीय विश्लेषण में चौथीराम यादव की यह स्थापना महत्वपूर्ण है कि  कबीर नें भाषा-विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया को ठीक पहचाना था ,क्योंकि भाषा-विकास की स्वाभाविक प्रकि्रया तदभवीकरण की थी,न कि तत्समीकरण की । इसी सन्दर्भ में वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इसलिए आलोचना करते हैं कि उन्होंने संस्कृत काव्यशासित्रयों का अनुसरण करते हुए  रचनाकारों पर संस्कृत बुद्धि,संस्कृत âदय,संस्कृत वाणी  का अपना आलोचकीय निर्णय लाद दिया । इसे वे हिन्दी-आलोचना के अलोकतानित्रक होने का उदाहरण समझते हैं । वर्ण भेद के समर्थन और विरोध के आधार पर कबीर की निन्दा और तुलसी की प्रशंसा वर्णवाद ग्रस्त मानसिकता का एक प्रतिगामी उदाहरण मात्र है ।  इस पुस्तक में संकलित आचार्य द्विवेद्वाी का कबीर-प्रेम 'भकित-आन्दोलन की पृष्ठभूमि और सन्त-साहित्य शीर्षक आलेख भकित-आन्दोलन की ऐतिहासिक सामाजिक भूमिका की पड़ताल वर्ण-विरोधी और समर्थक दोनों ही दृषिटयों से करता है ।
           भकित आन्दोलन की पृष्ठभूमि और सन्त साहित्य शीर्षक आलेख भकित-आन्दोलन की ऐतिहासिक-सामाजिक भूमिका की पड़ताल वर्ण-विरोधी और समर्थक दोनों ही दृषिटयों से करती है । ऐसा करते हुए वे ब्राहमणवाद की हजारों वर्ष पुरानी मानवतावाद विरोधी भूमिका की शिनाख्त भी प्रस्तुत करते हैं ।यह एक ऐसा कैंसर है ,जिसे छिपाना आधुनिक प्रगतिशील दौर में असंभव ही है । ऐसा करना इतिहास-बोध की निर्णायक पुनर्रचना के लिए जरूरी है । यह लेख शंकराचार्य और तुलसीदास से लेकर आचार्य शुक्ल तक की ब्राहमणी पाठ का रेखांकन और प्रश्नांकन प्रस्तुत करता है । पूरे लेख में में चौथीराम यादव की स्थापना इस केन्द्रीय दृषिट के चतुर्दिक निर्मित हुइ्र है कि  यदि निर्गण भकित आन्दोलन को भारतीय चिन्तन परम्परा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो बुद्ध बनाम शंकराचार्य तथा कबीर,रैदास बनाम तुलसीदास के बीच एक वैचारिक संघर्ष की सिथति बहुत साफ दिखार्इ देती है । वर्ण-व्यवस्था के समर्थन और विरोध के इस संघर्ष में तुलसीदास,शंकराचार्य के साथ खडे़ दिखार्इ देते हैं तो कबीर और रैदास बुद्ध के साथ । (पृ0 25 ) चौथीराम यादव निगर्ुण भकित आन्दोलन को लोकभाषा के आन्दोलन के रूप में देखें जानें की प्रस्तावना करते हुए कबीर की प्रशंसा और आचार्य शुक्ल की भत्र्सना उनकी भाषानीति के लिए भी करते हैं । उनके अनुसार सामन्ती-पुराहिती रूढि़यों को अभिव्यक्त करनें वाली भाषाओं के स्थान पर क्षेत्रीय भाषाओं का विकास,उस युग की ऐतिहासिक आवश्यकता भी ,जिसके चलते निगर्ुण आन्दोलन के प्रवर्तक कबीर नें अपनी भाषानीति को स्पष्ट करते हुए संस्कृत को कूप-जल और भाषा को बहता नीर  घोषित किया । भाषा-विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया को पहचानने में कबीर नें कोर्इ गलती नहीं की और तत्समीकरण के स्थान पर तदभवीकरण की स्वाभाविकता को रेखांकित किया ।  यहां संस्कृत बुद्धि, ,संस्कृत âदय और संस्कृत वाणी के समर्थक आचार्य शुक्ल की भाषा-दृषिट से कबीर की भाषादृषिट का सर्जनात्मक अन्तर भी स्पष्ट हो जाता है ।(वही 24 ) यह लेख सामाजिक परिवर्तन के लिए  प्रगतिशील इतिहास-बोध की समझदारी निर्मित करनें के साथ-साथ अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए हिन्दी आलोचना में याद किया जाएगा । यह हिन्दी आलोचना का सामाजिक क्रानितधर्मी पाठ है ,जो  न सिर्फ कबीर की ऐतिहासिक स्मृति को समर्पित है ,बलिक उनकी खरा सच बोलने वाली उस विचारक परम्परा को भी जो निन्दा को आपरेशन के औजार की तरह इश्तेमाल करती है । यह आलोचना का समाजशास्त्रीय पाठ है-लेकिन उत्पादन श्रम को हेय बताकर उपभोक्ता संस्कृति की अकर्मण्यता विकसित करने वाले धर्मशास्त्रों के समर्थक इन बुद्धिजीवियों नें ऐसी कोर्इ आचार-संहिता नहीं बनार्इ कि उच्च वर्ण के लोग शूद्रों द्वारा उत्पादित खाधाान्नों का सेवन न करें । चौथीराम यादव कबीर आदि संत कवियों द्वारा वर्णश्रम के प्रति अश्रद्धा पैदा करना लोक विरोधी आचरण नहीं बलिक मध्यकालीन लोकजागरण का प्रगतिशील कदम मानते हैं ।(पृ0 44) उनकी दृषिट में कबीर मध्ययुगीन देशज आधुनिकता को आधुनिक कवियों और लेखकों के आधुनिकता-बोध से जोड़ने वाला सम्बन्ध-सेतु है । (पृ0 45 )
       'अवतारवाद का समाजशास्त्र और लोकधर्म चौथीराम यादव ज ी का महत्वपूर्ण आलेख है । यह एक ऐतिहासकि सच्चार्इ है कि समाजशास्त्रीय आलोचना का प्रगतिशील विवेक वर्णश्रम वादी और माक्र्सवादी आलोचना की शुद्धतावादी पूर्वाग्रही जड़ता की तुलना में अधिक सार्थक है । चौथीराम जी का यह आलेख अनेक दृषिटयों से महत्वपूर्ण है। रामकथा को पुरुष-सत्तात्मक यूटोपिया और कृष्णकथा को मातृसत्तात्मक यूटोपिया के रूप् में विश्लेषित कर भारतीय समाज के लिए कर्इ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले गए हैं । चौथीराम यादव के अनुसार तुलसीदास का रामचरित मानस पुरुषसत्तात्मक समाज के लिए अवतारवाद का वर्णाश्रमी पाठ है ; जबकि सूरदास के सूरसागर की कृष्णकथा मातृसत्तात्मक समाज का लोकधर्मी रूपान्तरण है तथा यह पौराणिक अवतारवाद के पाठ से बिल्कुल अलग है । इसका कारण यह है कि सूरदास नें कृष्ण का चित्रण मानवीय अन्तरंगता के साथ किया है और वे भूल गए हैं कि उनके कृष्ण र्इश्वर भी हैं । जबकि तुलसीदास राम का र्इश्वरताबोध बनाए रखनें के प्रयास में राम के सहज मानवीय रूप् को उभरने ही नहीं देते । रामकथा में तुलसी की अभिव्यकित राम की सामन्ती गरिमा  और शिष्टाचार को बनाए रखती है ।इसीलिए चौथीराम यादव मातृसत्तात्मक समाज की पौराणिक स्मृति,साहितियक रूपक और यूूटोपिया की प्रस्तुति की दृषिट से कृष्ण-काव्य को महत्वपूर्ण मानते हैं । इस लेख में ऐसे बहुत से स्थल हैं जो भारतीय संस्कृति की ब्राहमणवादी संरचना का समाजशास्त्रीय पुन्:पाठ प्रस्तुत करते हैं । निर्णयक और निर्मम न्यायिक टिप्पणियां चौथीराम यादव की आलोचना की विशेषता है । इस लेख में ब्राहमणवादी और ब्राहमण-विरोधी दोनों ही धाराओं की सम्यक पड़ताल की गर्इ है । यह एक तथ्य है कि राम-काव्य की तुलना में कृष्ण-काव्य और संरचना का समाजशास्त्रीय पुन्:पाठ प्रस्तुत करते हैं । निर्णयक और निर्मम न्यायिक टिप्पणियां चौथीराम यादव की आलोचना की विशेषता है । इस लेख में ब्राहमणवादी और ब्राहमण-विरोधी दोनों ही धाराओं की सम्यक पड़ताल की गर्इ है । यह एक तथ्य है कि राम-काव्य की तुलना में कृष्ण-काव्य औराल की गर्इ है । यह एक तथ्य है कि राम-काव्य की तुलना में कृष्ण-काव्य और चरित्र के प्रगतिशील पक्ष पर हिन्दी में मौलिक कम ही लिखा गया है । चौथीराम यादव ज ी की यह पुस्तक पहली बार आधुनिक समाजशास्त्रीय दृषिट से कृष्ण7चरित्र की सम्यक समीक्षा करती है ।
     रामकथा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हुए चौथीराम यादव की यह स्थापना महत्वपूर्ण है कि वर्चस्ववादी संस्कृति की रक्षा और प्रतिरोध की संस्कृति का नकार ही रामकथा का पौराणिक लक्ष्य है ।(पृ0 74) उनके अनुसार राम-रावण के प्रतीकात्मक संघर्ष का निहितार्थ वर्चस्व की संस्कृति बनाम प्रतिरोध की संस्कृति का संघर्ष है ; जिसमें तमाम जातीय-विजातीय परम्पराओं की जय-पराजय और स्मृतियां समाहित हैं ।( वही,पृ0 74 )चौथीराम जी नें रामकथा के अधिक ब्राहमणवाद-सम्मत होनें का जो संकेत किया है एवं तुलना में कृष्ण-चरित्र को जो अधिक चुनौतीपूर्ण और उन्मुक्त पाया है ,उसमें पर्याप्त बल है । दलार्इलामा संस्था की तरह राम का तो जन्म ही ब्राहमण ऋषियों द्वारा बहुप्रचारित सांस्कृतिक परियोजना के अन्तर्गत होता है । राम का सारा संघर्ष ब्राहमण ऋषियों के उस संघर्ष पर खरा उतरनें का ही है । बात सिर्फ इतनी सी ही लगती है कि ब्राहमणें से असहमत होने के कारण रावण राम के विष्णुत्व पर विश्वास नहीं कर पाता । राम और पाण्डव भी यदि प्राचीन नियोग प्रथा की उपज रहे हों तब भी उनकी आनुवांशिक श्रेष्ठता के वैज्ञानिक आधार से इन्कार नहीं किया जा सकता । निश्चय ही राजा दशरथ नें नियोगी जनक के रूप् में सर्वश्रेष्ठ पिता का ही चयन किया होगा । चारों बालकों में सिर्फ राम और लक्ष्मण को ही अपना शिष्य बनानें के लिए मांगनें के कारण अधिक संभावना यह भी है कि विश्वामित्र ही उनके नियोगी पिता रहे होंगे । श्रृंगी ऋषि तो उस यज्ञ के पुरोहित मात्र थे ।राम के ब्रहमत्व को ब्राहमणें नें अगि्रम मान्यता दे दी थी । मनोवैज्ञानिक दृषिट से भी देखें तो राम पर उस जाति की अपेक्षाओं पर खरा उतरनें का भारी दबाव रहा होगा । रावण नें उन्हें चुनौती देकर ब्राहमणी विभ्रम से बाहर निकालकर मनुष्य की तरह निरीह बनानें और बतानें की असफल कोशिश की और दशरथ द्वारा चयनित जीन से घटिया साबित हुआ और मारा भी गया । यह भी एक सच्चार्इ ही है कि इतिहास के नेतृत्वकर्ता प्रतिपक्षियों से अधिक विकसित रहे हैं । प्रचीन आयोर्ं की जातीय एकता और आनुवांशिक योग्यता के आधार पर वर्ण विभाजन के विकसित जातीय चरित्र को शायद आज की समझ से समझाा नहीं जा सकता । यदि ध्यान से देखा जाय तो रामकथा राजतन्त्र में विकसित नागरिक समाज के मूल्यों की महागाथा प्रस्तुत करती है । इसके समाज के सभी वगोर्ं में एक आवयविक निर्भरता है ,जो सहयोग की संस्कृति का प्रचार करती है,जबकि कृष्ण-काव्य के नायक कृष्ण का नायकत्व गणतन्त्र के नायक का नायकत्व है । इस भेद के कारण दोनों के मूल्य-निर्धरण में अन्तर है । चौथीराम यादव के अनुसार सूरदास के सूरसागर में चित्रित समाज ,रामचरित मानस के पौराणिक समाज से बिल्कुल भिन्न समाज है । सूरसागर में चित्रित समाज चाहे वैदिक समाज की स्मृति (नास्ट्रेलिजयाद्ध हो अथवा भावी समाज का स्वप्न (यूटोपिया) दोानों ही सिथतियों में वह मानस के बन्द समाज से कहीं ज्यादा खुला हुआ आधुनिक समाज है और कभी-कभी तो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की सामाजिक उन्मुक्तता के कारण उत्त्रआधुनिक जैसा भी प्रतीत होता है । (पृ067)
      वस्तुत: राम का चरित्र प्राचीन आयोर्ं के जातीय आदर्शवाद को पूर्ण चरमोत्कर्ष में सामनें लाता है ,जबकि कृष्ण का चरित्र उस जातीय आदर्शवाद से पूरी तरह बाहर और स्वच्छन्द है । कृष्ण को बहुत प्रतिरोध और संघर्ष के बाद ब्राहमणें द्वारा मान्यता मिली । कृष्ण के पालक नागरिक जीवन को नापसन्द करने वाले प्रकृतिजीवी प्रजाति और संस्कृति के लोग थे । राम की तरह प्रारम्भ से ही आरोपित गरिमा-बोध से मुक्त रहने के कारण कृष्ण का चरित्र अधिक सामाजिक तथा जन-सामान्य के लिए तादात्म्यपूर्ण है । वह ब्रहमणी अपेक्षाओं के अनुशासन में निबद्ध नहीं है । अपनें प्रारमिभक संघर्ष में वह इन्द्र-पूजा का विरोध करनें के कारण ब्रीहमणवादी वर्चस्व की अवहेलना की सूचना भी देता है । इस अर्थ में चौथीराम जी नें उसे ठीक ही रामकथा से अधिक प्रगतिशील पाया है ।'उनके अनुसार वैदिक काल से लेकर मध्यकालीन सूरदास के गोचारी काव्य तक कृष्ण की ऐतिहासक यात्रा वस्तुत: जननायक से लोकनायक बनने की ही अन्तर्यात्रा है ,भले ही समय-समय पर उसे र्इश्वर का मुकुट भी पहनाया जाता रहा हो । लेकिन सूरदास के लिए यह मुकुट किसान-संस्कृति के किसी प्रभावशाली मुखिया की पगड़ी से ज्यादा अहमियत नहीं रखता। वैदिक काल का सीमान्त और उत्तर वैदिक काल का आरम्भ भारतीय इतिहास का वह समय है जब आयोर्ं का प्शुचारी जीवन कृषि-जीवन में रूपान्तरित हो रहा था । कृषि-केनिद्रत इस नर्इ जीवन-पद्धति मेें इन्द्र के वर्चस्व वाली यज्ञ प्रणली और निरन्तर होने वाले युद्ध बहुत मंहगे और घातक सिद्ध हो रहे थे,उस सिथति में तो और भी जब यज्ञों के लिए मवेशी और अन्य प्शु बिना मूल्य चुकार ही हथिया लिए जाते थे  । जाहिर है कि ऐसे यज्ञ प्शुपालक किसानों के आर्थिक शोषण  के जटिल कर्मकाण्ड बन गए थे । सामाजिक जीवन के इस परिवर्तित मोड़ पर  किसानों के हित में यज्ञ और इन्द्र का विरोध एक एंतिहासकि अनिवार्यता बन गया था । ऐसे ही समय यज्ञ और इन्द्र का विरोध करने के कारण गोरक्षक कृष्ण नें किसानों का प्रवक्ता बन ,जननायक का गौरव अर्जित कर लिया और लगातार बढ़ती लोकप्रियता नें उसे पूज्य बना दिया ।  कृष्ण का यह चाित्र प्राय: धर्मभाीरु रहनें वाली सामान्य जनता को कर्म एवं वास्तविकताजीवी बनने का सन्देश देता है ।यह स्पष्ट रूप से पौराणिक स्मृति में मिलने वाला पुरोहितवाद का प्रत्यक्ष क्रानितकारी विरोध है । चौथीराम जी नें उचित ही यह रेखांकित किया है कि 'सूरदास के सूरसागर में चित्रित समाज,रामचरित मानस के पौराणिक समाज से बिल्कुल भिन्न समाज है । उनका यह आरोप कि जननायक कृष्ण को अपनें ही लोक के विरूद्ध पुराण्कारों नें खड़ाकर दिया महत्वपूर्ण है । विरोधी नायकों को अपना बनाने की कोशिश ब्राहमण जाति नें अपनें तरीके से की थी और अब भी कर ही रही है । दक्ष का यज्ञ विध्वंस करनें वाले शिव को महादेव घोषित कर देना और कालपनिक देवताओं की पूजा का बहिष्कार कराने वाले कृष्ण को ही विष्णु का अवतार घोषित कर देना एक ही जैसी ब्रहमणी नीति का हिस्सा है । यह एक-दूसरे को मान्यता देनें और असितत्व-समर्थन जैसी बात लगती है । यह सच है कि कृष्ण-चरित्र अधिक नैसर्गिक और मानवीय है ।उसे ब्राहमणवाद नें नहीं गढ़ा बलिक उसनें ही ब्राहमणवाद को अपनें तरीके से गढ़ लिया है । कृष्ण-चरित्र की लोकधर्मिता और लौकिकता अपनें आध्यातिमक संस्करण के बावजूद साफ-साफ दिखती है ।
सूूर की भाषा और भाषा की आधुनिकता शीर्षक लेख भाषा की मनोवैज्ञानिक प्रकृति का सम्बन्ध उसके प्रयोक्ता साहित्यकार के वर्गीय चरित्र से जोड़ते हुए मध्ययुगीन साहित्यकारों के समाजशास्त्रीय अर्थवत्ता पर प्रकाश डालती है । इसमें सन्देह नंहीं कि भाषा की वर्गीय और जातीय भूमिका की पड़ताल आधुनिक समाजशासत्रीय अवधारणा है । जातीय दंभ और बड़प्पन की भाषा-संरचना  वर्ग-विशेष में श्रेष्ठता के दंभ के साथ प्रति-वर्ग में हीनता की ग्रनिथ का भी प्रचार करती है । चौथीराम यादवइ स मनोवैज्ञानिक भाषा-संरचाना के कारण ही केशव और तुलसी  की काव्यभाषा को सूर की सहज भाषा क सापेक्ष खारिज करते हैं । चौथीराम यादव के अनुसार सूरदास कस शैली-सौन्दर्य बहुत कुछ उनकी भाषा पर आधारित है ।उन्होंनें भाषा को अपनें आन्तरिक अनुभव में इस प्रकार ढाल लिया था कि भाव-सम्प्रेषण के संकट से वे प्राय: मुक्त रहे हैं ।(पृ081)भषा यदि कविता और गध को निकट ला सके तो यह उसकी बहुत बड़ी उपलबिध होगी । सूर की भाषा के गधात्मक स्वरूप में सांगीतिक लय कहीं विशेष बाधक नहीं है ।(वही पृ0 84)सूर की भाषा के गधाात्मक स्वरूप् का एक मूल कारण यह है कि वह मूलत: आाम जिन्दगी की भाषा है  सामान्य जन-जीवन के मुहावरे,लहजे,सांस्कृतिक आचार-विचार,सामाजिक रीति-रिवाज,तीज-त्यौहार एवं उत्सव आदि की जीवन्तता को रूपायित करनें वाली समाज-प्रचलित भाषा ही सूर की भाषा हैजो जिन्दगी के मुहावरों और अनुभवों से टकराकर कहीं-कहीं आक्रामक और धारदार हो उठी है । स्वभावत: सूर की भाषा में मुहावरों-लोकोकितयों और कहावतों की प्रधानता है ।(पृ085) सूर कीउकितयां भाषा की रूढ़ता का माध्यम न होकर सशक्त अभिव्यंजना की आवश्यक उपादान हैं । इन्हें सूर के व्यापक सामाजिक अनुभव का प्रामाणिक दस्तावेज भी कहा जा सकता है ।सूर की भाषिक संरचना में तत्सम की अपेक्षा तदभव शब्दों को ज्यादा तरजीह देना,भाषा की जीवन्तता का परिचायक है ।तत्सम शब्दों का रूप-परिवर्तन करके भी भाषापन की रक्षा की गयी है ।इसतरह  खड़ीबोली को काव्यभाषा बनाने में जो योगदान सुमित्राननदन पंत का है ,ब्रजभाषा के बनानें और सजानें में सूर का योगदान उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है ।(पृ0 87)
     हिन्दी नवजागरण और उत्तरशती के विमर्श शीर्षक आलेख दलित नवजागरण से सम्बनिधत समकालीन बहसों पर केनिद्रत है । इस आलेख में प्रेमचन्द और दलित-विवाद ,धर्मवीर की विवादास्पद स्त्री-विरोधी और पुरूषवादी दलित-दृषिट ,डा0अम्बेडकर का ऐतिहासिक सामाजिक-राजनीतिक चिन्तन, समकालीन दलित हिन्दी कविता तथा दलित आन्दोलन को नर्इ दिशा देने के लिए दलित चिन्तकों की भूमिका आदि कर्इ विमशोर्ं पर दृषिटपात किया गया है । नवां आलेख स्त्री-विमर्श की चुनौतियां और छायावाद का मुकित स्वर
        रोती संवेदनाओं की आत्मकथा हैमुर्दहियाशीर्षक आलेख तुलसीराम की बहुचर्चित आत्मकथा की समाजशास्त्रीय साहितियक समालोचना है । चौथीराम यादव के अनुसार मुर्दहिया व्यकितकेनिद्रत आत्मकथा होनें के साथ ही धरमपुर की दलित बस्ती का लोकाख्यान भी है ।(पृ0174) वे घटना-प्रसंगों के चित्रण में लेखक की सूक्ष्म निरीक्षण-दृषिट और अदभुत वर्णनात्मक क्षमता की प्रशंसा करते हैं । उसमें वे शिष्ट साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र से भिन्न दलित-साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र पाते हैं जो सवणेर्ं और दलितों के कन्ट्रास्ट में रचा गया है ।(पृ0180) मुर्दहिया में मृतप्राय और उपेक्षित शब्दों को पुनर्जीवन देने की सामथ्र्य है ,जो ग्रामीण जीवन के एक समानान्तर शब्दकोश बनानें की प्रस्तावना करती है ।(वही,पृ0 180)
         नागाजर्ुन की कविता में प्रतिरोध का स्वर  शीर्षक आलेख वर्गान्तरण की विद्रोही परम्परा में रखकर नागाजर्ुन का मूल्यांकन करने की कोशिश है । चौथीराम यादव के अनुसार भारातीय चिन्तन में प्रतिरोध की परम्परा उतनी ही पुरानी है जितनी अलगाववाद पर आधारित वर्चस्ववादी विचार-परम्परा । प्रतिरोध का स्वर मूलत: भौतिकवादी,लोकवादी और मानवतावादी स्वर है  जो शुद्धतावादी विचार-सत्ता और भाषा के आभिजात्य के विरुद्ध तनकर खड़ा है । प्रतिरोध हिन्दी का मूल चरित्र है । व्यंग्यगर्भित आक्रोश-भरा प्रतिरोध का स्वर और खतरे से खेलने का अदम्य साहस या तो कबीर में दिखार्इ देता है या नागार्जुन में ।(पृ0 185) इस आलेख में नागाजर्ुन की प्रगतिशील जन-संवेदना की पड़ताल की गयी है । इसमें उनकी हरिजन गाथा जैसी दलित प्रसंग वाली कविताओं का भी विश्लेषण है । जिसे वे आन्दोलन धर्मी कविताओं की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी जनवादी परम्परा की क्रानितकारी कविता मानते हैं ।
         इक्कीसवी सदी का गल्प और काशी का अस्सी शीर्षक आलेख की विशेषता उसके समाजशास्त्रीय विमर्श के रूप में लिखे जानें में है । विमर्श के रूप् में लिखे जाने के कारण ही यह आलेख उन मुददों और बहसों को आगे बढ़ाता है जिसे काशीनाथ सिंह की कृति काशी का अस्सी अपनी सृजनशीलता में उठाती है । चौथीराम यादव के अनुसार भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के इस अन्धे दौर में काशी का अस्सी  विषय-वस्तु ही नहीं,भाषा और शिल्पगत प्रयोगों की दृषिट से भी उत्तर-आधुनिक काल की नर्इ रचनाशीलता का सवोर्ंत्तम उदाहरण है । उन्होने काशीनाथ सिंह को उनकी भदेसपन की हद तक फैली फक्कड़मिजाजी की अद्वितीय औघड़ भाषा के लिए सराहा है । उनके अनुसार गध विधाओं के पक्के ढांचे का टूटना,उनकी शुद्धता और स्वायत्तता का विखंणिडत होना ,उत्तर-आधुनिक रचनाओं की खास पहचान है ।इसलिए काशी का अस्सी गधा-विधाओं का अन्तर्पाठ प्रस्तुत करता है और इसीलिए उसका रूपबन्ध उत्तर-आधुनिक है ।(पृ0 200) काशी का अस्सी  अपनी नर्इ अन्तर्वस्तु और शिल्पगत प्रयोगों के साथ भूमण्डलीकरण,बहुराष्ट्रीयकरण,निजीकरण और बाजारवाद के सांस्कृतिक हमले के विरुद्ध प्रतिरोध का महाआख्यान है । ( पृ0 214)'प्रतिसंस्कृति  के हिन्दी-साहित्य पर एक नजर शीर्षक आलेख काशीनाथ सिंह के कथा-रिपोर्ताज 'संतो घर में झगरा भारी  के बहानें समाज और साहित्य में न्रतिसंस्कृति का विमर्श प्रस्तुत करती है । छायावादी कवयों की सामाजिक पीड़ा और चेतना को कम ही देखा गया है  अपने स्त्री विमर्ष की चुनौतियां और छायावाद का मुीक्त-स्वर  शीर्षक आलेख में  चौथीराम जी नें उसे पहलीबार गम्भीरता से उनके साहित्य में उपसिथत जीवन-वस्तुओं की समाजशास्त्रीय पड़ताल की है ।

                      समीक्षित पुस्तक-    लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा,लेखक-चौथीराम यादव ,,
                      प्रकाशक -अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स(प्रा,)लिमिटेड.                  
                       ४६९७/३,अन्सरिरोअद,दरियागंज,,नयी दिल्ली  ११०००२

शनिवार, 22 जून 2013

मुझे बचपन कि... - Ramprakash Kushwaha

 मुझे बचपन कि... - Ramprakash Kushwaha



मुझे बचपन कि एक घटना याद् आती हैं..पिताजी जहाँ पढ़ते थे ,वहीँ हम बच्चों नें सीमेंट और बालू आदि निर्माण सामग्री लेकर एक शिव लिंग बनाया .वह इतना अच्छा बना था कि लडके-लड़कियाँ प्रणाम करके जाने लगे .एक दिन मैं अकेला ही बैठा था कि एक कुत्ते नें सूंघ कर एक पैर उठाया.पहले तो मैंने चेतावनी जारी की कि बचिएगा शंकर भगवान ! कि तभी जड़ पदार्थों से निर्मित भगवान की निरीहता मेरी समझ में आ गयी .मेरे मन में तभी यह भी कौंधा कि उन्हें बचाने कि शक्ति तो मैं भी अपन ही भीतर छिपाए यहाँ बैठा हूँ .बिना पल गवाए मुझे चारपाई से कुत्ते कि और कूदना पड़ा और शंकर भगवन भी भींगने से बाच गए .उस अनुभव नें इतना तो सिखा ही दिया कि किसी को भी पुकारने के पहले अपने भीतर कि शक्ति का भी आवाहन करा लेना चाहिए .क्या पता समस्या का इलाज अपनें पास ही हो

मंगलवार, 11 जून 2013

अलक्षित प्रतिरोध की पुनर्रचना

        
  समयांतर ,संपादक-पंकज बिष्ट ,जून-२०१३ के अंक में प्रकाशित 
     
              अलक्षित प्रतिरोध की पुनर्रचना
                                      राम्प्राकाश कुशवाहा

              किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन :रामाज्ञा  शशिधर ;
                   अंतिका प्रकाशन ,पृo 207,  मूल्य : 225.00
                        ISBN 978-93-81923-27-6
युवा कवि एवं  आलोचक रामाज्ञा शशिधर की किताब 'किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन ' साहित्यिक निबंधों की भाषा-संरचना और शिल्प में सृजित किसान आन्दोलनों और उनके लिए लिखे गए साहित्य पर केन्द्रित औपन्यसिक पठनीयता लिए एक साथ रोचक,मौलिक और महत्वपूर्ण शोधकार्य है .किसान-पक्ष एवं संवेदना की आत्मीय सृजनशीलता इसे हिन्दी के दूसरे शोध-प्रबंधों से अलग कराती है और इसे अपने ढंग की अकेली पठनीय किताब भी बनती है .यह इस किताब की विशिष्टताओं का साहित्यिक-सृजनात्मक पक्ष है ,जो इसके महत्वपूर्ण विषय किसान आन्दोलन और उससे जुडी  साहित्यिक सामग्री के शोध-महत्त्व के अतिरिक्त है .
            हमारे साहित्य,संस्कृति और सभ्यता के केन्द्र में किसान जीवन के मूल्य ही प्रतिष्ठित हैं .मुद्रा-विनिमय आधारित अर्थ-तंत्र और बाजार सभ्यता का विकास बहुत बाद में हुआ .इससे कृषि-उत्पादन के क्षेत्रों से दूर अलग हटाकर भी मानव-बस्तियां सम्भव हुईं.मंडियां,बाजार,कस्बे और नगर विकसित  हुए और आज हमारी सभ्यता महानगरों के विकास तक पहुँच गई है .लेकिन इस बाजार सभ्यता नें न सिर्फ आर्थिक व्यव्हार की अलग भाषा विकसित की है ,बल्कि मुद्रा आधारित मानव-व्यव्हार और रिश्तों का ऐसा यांत्रिक पर्यावरण भी दिया है ,जो एक संवेदन-शून्य असभ्य मनुष्य की रचना करता है .लेन-देन के बाहर  के हर रिश्ते को नकार देता है .शेक्सपियर के प्रसिद्ध  उपन्यास 'मर्चेण्ट आफ वेनिस 'का कंजूस पात्र शाईलाक  ऐसा ही अर्थ और बाजार के मूल्यों से  निर्मित अर्थ-पिशाच मनुष्य है .कार्ल मार्क्स इसी पूंजी-ग्रस्त मानस से मानव -सभ्यता को बाहर निकालने के लिए साम्यवाद की परिकल्पना कर रहे थे .
             दरआसल बाजार-व्यवस्था के अपने नियम हैं और नैतिक क्रूरताएँ हैं .यह एक प्रतीकात्मक और आभासी दुनिया की सृष्टि करती है .किसान जीवन जहाँ वस्तु-विनिमय और प्रत्यक्ष श्रम-सहयोग पर आधारित रहा है ,वहीँ बाजार-मूल्य पर आधारित नागरिक जीवन मुद्रा आधारित अप्रत्यक्ष और जटिल मानव-संबंधों पर .क्योकि हमारा सांस्कृतिक ढांचा अधिक पुराना है तथा वह किसान-मन और आत्मीयता का ही बौद्धिक विकास है ,इसलिए अब भी और कभी भी वह वह नागरिक जीवन की आलोचना का संवेदनात्मक पाठ और संविधान रचता है .युवा आलोचक रामाज्ञा शशिधर ने नें अपनी विरल शोध-कृति 'किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन 'में ब्रिटिश औपनिवेशिक वर्चस्व और चेतना के प्रतिरोध की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सक्रियता के रूप में देखा है और साथ ही विनाश को विकास तथा बाजारीकरण आधारित पश्चिमीकरण को आधुनिकता मानने की प्रवृत्ति का निषेध और समाधान किसान-जीवन-मूल्यों और प्रतिरोध की स्मृति में ढूंढा है-उसे अत्यंत ही सार्थक और महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जाना चाहिए .
                 भारत के ब्रिटिश औपनिवेशीकरण नें अपने आरभ और अंत में दो महाविनाशकारी हस्तक्षेप किए हैं .इस देश को मुक्त करते समय विभाजन के रूप में और अपनी सत्ता की स्थापना के आरंभिक काल  में हजारों वर्षों से श्रम द्वारा निर्मित कृषि-भूमि को वास्तविक किसान-पुरखों से छीनकर किसी को भी उसका स्वामित्व दे देना .इससे कृषि-भूमि का न सिर्फ अनैतिक विभाजन हुआ बल्कि भारत की वस्तु-विनिमय आधारित तथा संस्कृति आधारित अर्थ-तन्त्र वाली सभ्यता अवसाद में चली गई .ब्रिटिश भारत में बहुत -सी ऐसी जातियां थीं ,जिनका फसल में निश्चित हिस्सा लगता था और वे स्वयं कृषि-भूमि न रखते हुए भी अप्रत्यक्ष रूपमें कृषि-उपज के सांस्कृतिक हिस्सेदार थे-नयी व्यवस्था में भूमिहीन ही रह गए .इसमें संदेह नहीं कि संस्कृति आधारित अर्थ-तन्त्र के कारण ही भारत में जाति-आधारित सर्वहाराओं की सृष्टि हुई है .इस सच्चाई पर मार्क्सवादियों नें भी बहुत ध्यान नहीं दिया है .भारत में बहुत सी परंपरागत रूप में पेशेवर व्यापारी जातियां भी हैं .ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आजीविका के लिए  सिर्फ व्यवसाय का प्रशिक्षण और उत्तराधिकार ही देती हैं .ऐसी जनसंख्या को भूमि-विभाजन के प्रश्नों  से कुछ लेना ही नहीं है इस तरह भारत आर्थिक दृष्टि से भी बहुल श्रेणीबद्ध आर्थिक वर्ग-संरचनाओं वाला समाज है ..भूमि के कुछ जातियों में ही बंटने के कारण भारत की किसान समस्या बहुत ही जटिल हो गई है और उसमें मार्क्सवादियों का हस्तक्षेप जातीय युद्ध की ओर ही ले  गया है .जातीयता की दृष्टि से भूमि के असमान वितरण के कारण तथा कृषि-कार्य के प्रति जातीय-सांस्कृतिक रूचि के आभाव के कारण भी भारत की अधिकांश  भूमिहीन जातियों में जन्मी जनसँख्या किसान-समस्या के प्रति प्रायः उदासीन है .इन तथ्यों के बावजूद हमारा सांस्कृतिक अचेतन क्योंकि किसान जीवन-मूल्यों पर आधारित है और सिर्फ किसान सभ्यता ही उदार और नि:स्वार्थ  रागात्मक सम्बन्धों ,आत्मीयता और संवेदनशीलता का पर्यावरण बचा सकती है -हिन्दी-भारतीय यथार्थ के सन्दर्भ में रामाज्ञा शशिधर की यह किताब किसान-साहित्य और संवेदना के इतिहास और  स्मृति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय प्रयास है .जहाँ तक इस कृति के शैक्षणिक और साहित्यिक शोधा-महत्त्व का सवाल है ;यह एक सच्चाई है कि  हिन्दी में सिर्फ किसान आन्दोलन के बारे में ही नहीं ,बल्कि किसी भी प्रकार के इतिहास-लेखन या उसके पुनर्चिन्तन की गंभीर सृजनात्मक  चिंता समकालीन युवा-पीढ़ी में नहीं दिखती -यद्यपि उसे व्यस्ततम वर्तमानजीविता का नया  इतिहास रचते हुए अवश्य ही देखा जा सकता है ...पुराना सब कुछ उसके लिए इतना बेमतलब हो गया है कि उत्तर-आधुनिक बनने के बाद तथा इतिहास के अंत की घोषणा के साथ उसके लिए अतीतगामी होने का न तो कोई अवशेष प्रयोजन है और न कोई अवकाश .स्पष्ट है कि यह स्मृतिहीनता के लिए अभिशप्त पीढ़ी की स्मृति और तात्कालिक  विवेक है .वह अपने जटिल होते वर्त्तमान में पूरी तरह फैला ,फंसा और निःशेष होता हुआ है .उसके पास शोषण और दुर्घटनाओं की पूर्व -स्मृति और परंपरा का कोई लेखा-जोखा नहीं है .जबकि अनुभव और स्मृति के बिना कोई भी प्रतिरोध संभव नहीं है .
        रामाज्ञा शशिधर की 'किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन 'पुस्तक इस अर्थ में भी प्रतिरोध की पुनार्रचना है .आन्दोलन की मानसिकता और तेवर को आवाहन के माध्यम से पुनर्जीवित करती हुई .आलोचनात्मक नजरिया और संवेदनात्मक प्रस्तुति रामाज्ञ शशिधर की इस पुस्तक को एक विरल साहित्यिक कृति बनती है .इसे किसान आन्दोलन पर लिखे गए शोध-लेखों का संकलन मानना उचित नहीं होगा ये शोधपूर्ण अथवा शोध-समृद्ध निबन्ध हैं .विचारपूर्ण तथ्य-प्रस्तुति के साथ-साथ एक संवेदनात्मक पक्ष की प्रतिबद्धता इस पुस्तक को मिशनरी बनाती है .यह पुस्तक किसान संघर्ष को एक असमाप्त प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है .इसामें उद्धृत कविताएँ इतिहास में जिए गए शब्द हैं .इस तरह यह पुस्तक लोक-संवेदना का दस्तावेजीकरण भी है . इसमें विकास को विनाश के रूप में देखने और दिखने वाली आँख है जिसमें प्रश्नांकित करने वाला .ऐतिहासिक विवेक है .इसमें किसान-यथार्थ के ईस्ट इण्डिया कंपनी से मोर्सेटो-वालमार्ट तक की अनवरत औपनिवेशिक यात्रा की वैचारिक-सांस्कृतिक परिणति की सजग शिनाख्त भी है .
          इस पुस्तक के लेखन में हुआ दस वर्षों का लेखकीय निवेश साफ-साफ देखा जा सकता है .'खासकर १९१७ के अवध,बिजोलिया एवं चम्पारणसे १९४७ तक के लिए इतिहास की धुल से चुनकर अभूतपूर्व 'देशज साहित्यिक सामग्री 'एकत्रित की गई है .इस कार्य को धूल से चुने गए फूलों से निर्मित माला से उपमित किया जाय तो उसे अतिशयोक्ति  मानना उचित नहीं होगा .तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं और  अन्य दस्तावेजों से खोजकर किसान-यथार्थ से सम्बंधित कविताओं के लगभग तीन सौ उद्धरणों का सन्दर्भ देकर लिखी गई यह पुस्तक किसान आन्दोलन से सम्बंधित महत्वपूर्ण साहित्यिक सामग्री का प्रशासनीय दस्तावेजीकरण करती है .जब राष्ट्रीय आन्दोलन की आंधी चल रही थी -यह कार्य आंधी में हिलाते बड़े वृक्षों की सरासराहट के बीच दूबका हिलना खोजने की तरह है .रामाजज्ञा शशिधर नें अत्यन्त धैर्य के साथ यह सामग्री संकलित की है .यह पुस्तक किसान आन्दोलन से सम्बंधित साहित्यिक सामग्री के लिए लेखक के लम्बे एवं परिश्रमी शोध-पूर्ण भटकाव  से संभव हुई होगी -यह इसके पृष्ठों पर उपस्थित सामग्री देखा कर ही पता चल जाता है .प्राप्त संकलित सामग्री के लम्बे विचारशील साहचर्य से इस कृति में वे वैचारिक कौंधे और विश्लेषण-दृष्टि में सूक्ष्मता शामिल हो पाई है ,जो इस पुस्तक की अप्रत्याशित उपलब्धि है .यही कारण है की यह पुस्तक एक बहुआयामी और विरल पाठकीय अनुभव पाती है .किसान-आन्दोलन से सम्बंधित कविताओं का इतिहास-लेखन इसका एक पहलू है,जिसकी खोज और पड़ताल देश-कल में लोक और साहित्य दोनों की परस्पर आवा -जाही से की गई है .इससे यह किताब साहित्य का भी इतिहास बन पाई है और समाज का भी .आन्दोलनों से सम्बंधित तथ्य और लोक की सृजनशीलता के जीवित -स्पंदित टुकड़े परस्पर गुंथे हुए हैं .
           प्रत्येक अध्याय के अंत में दी गई विस्तृत सन्दर्भ -सूची;जिसकी संख्या दूसरे अध्याय में सर्वाधिक १७४ है,लेखकीय श्रम का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं . इसके अतिरिक्त  पुस्तक में किसान-आन्दोलन से सम्बंधित प्राप्त सूचना और साहित्य-सामग्री का विश्लेषण और वर्गीकरण -जो निश्चय ही समग्र्यों की खोज-यात्रा पूरी हो जाने के बाद ही किया गया होगा  भी. भूमिका के पश्चात् अध्याय होने की प्रतीति करने वाले शीर्षक मूलतः खंडों के शीर्षक ही हैं .इस दृष्टि से देखा जाए तो यह पुस्तक पांच खण्डों में विभाजित है -हिन्दी क्षेत्र में किसान आन्दोलन ,किसान-कविता का स्वरूप,मुक्ति का आर्थिक -राजनीतिक परिप्रेक्ष्य ,मुक्ति का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य और कला की राजनीति .
            पहला अध्याय अथवा खण्ड किसन आन्दोलन की राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है .संरचना की दृष्टि से पहला  खण्ड' हिन्दी क्षेत्र में किसान आन्दोलन 'स्वयं ही  पांच लघु अध्यायों का समुच्चय है -दमन और प्रतिरोध की यात्रा,सामन्तवाद विरोधी  चेतना ,उपनिवेशवाद विरोधी चेतना ,कांग्रेस यानि कालोनाइज्ड सिण्ड्रोम और वर्ग-संघर्ष की चेतना .इस उपखण्ड को आन्दोलन और उनकी पृष्ठभूमि का राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक इतिहास-लेखन कहा जा सकता है .अपनी प्रगतिशील समाजशास्त्रीय दृष्टि,रिपोर्ताज शिल्प और किसान जीवन तथा यथार्थ के प्रति अतिरिक्त संवेदन्शीलता के कारण रामाज्ञा शशिधर नें  १९१७ से १९१९ के बीच चलने वाले चम्पारण,बिजोलिया और अवध के किसान-आन्दोलनों की इतनी त्रिआयामिक प्रस्तुति की है कि सम्पूर्ण परिदृश्य प्रत्यक्ष हो उठता है .यह एक तरह से किसान आन्दोलनों और उनके नेतृत्वकर्ताओं का परिचयात्मक खंड भी है .तत्कालीन किसानों की आर्थिक असमर्थता और अशिक्षा का लाभ उठाकर इस देश का प्रभु-वर्ग औपनिवेशिक सत्ता के सहयोगी के रूप में कैसा निन्दनीय व्यव्हार करता रहा है ,इसका विस्तृत और प्रभावी विवरण यह पुस्तक देती है .विचारपरक होने के बावजूद पुस्तक का पहला खण्ड अनेक मार्मिक और त्रासद सूचनाओं से भरा है .किसानों से लिए जाने वाले सिर्फ बेगार करों की विस्तृत सूची को  ही देखें तो घुडअहीं ,मोटरर्हीं,हथियहीं,बंगलही ,फगुअहीं ,मुँहदेखाई ,चूल्हिआवन ,धवअहीं,नवअहीं, बपअही,पुतअहीं ,तावान,शराहबेशी ,हुंडा बंदोबस्त; मडवच ,सगौडा,सिंगरहाट,बाट,छप्पा , कोल्हुआवन, चंचरी, भाता , दंड,बराड,डोलचिये ,गठाई ,नकाई जैसे अनेक वसूलियों का पता चलता है .
            किसानों के प्रतिरोध के संगठनकर्ता नेतृत्व का परिचय देते हैं .इनमें चंपारण में अफ्रीका से लौटे महात्मा गाँधी की भूमिका ,बिजोलिया में  शचीन्द्र सान्याल और रासा बिहारी बोस के क्रन्तिकारी मित्र विजय सिंह पथिक की भूमिका तथा अवध में मराठी बाबा रामचंद्र दासकी भूमिका  तथा उनके द्वारा चलाए गए आन्दोलन कार्यक्रम पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है .उन प्रभावी नारों एवं गीतों पर भी जिनकी ऐसे आन्दोलनों में ऐतिहासिक भूमिका रही है .जैसे-राज समाज विराजत रूरे /रामचंद्र सहदेव झींगुरे (रूरे किसान सभा का नारा ).यहाँ झींगुरीसिंह एवं सहदेव सिंह बाबा रामचंद्र दास के सहयोगी थे .यद्यपि बिजोलिया किसान सत्याग्रह १९१६ से ही आरम्भ हो चुका था ,लेकिन अधिक प्रभावी चम्पारण सत्याग्रह १९१७ में महात्मा गाँधी के नेतृत्त्व  में आरम्भ हुआ था .अवध में बाबा रामचंद्र दास की रूरे सभा और शहरी वकीलों की यूपी किसान सभा द्वारा सामंती ढांचे के खिलाफ १९२० से २२ के बीच तेज संघर्ष हुआ .रामाज्ञा नें शोध में प्राप्त उन अमानवीय प्रसंगों का भी विस्तृत विवरण दिया है ,जो आज भी नई पीढ़ी को आवेशित एवं आक्रोशित कर सकते हैं .इनमें लगन के लिए ५ एवं १२ वर्ष की बेटी बेचने वाले निरीह किसानों से लेकर जमीदार के कारिंदों द्वारा पशु दुग्ध प्राप्त न होने की दश में किसानों से मानव -दुग्ध की मांग करना :किसानों के  घर आने वाली दुल्हन को पति के यहाँ पहुँचने से पहले जमींदार के यहाँ रात बिताना :ऐसे ही डोला प्रथा के विरुद्ध क्रन्तिकारी किसान नेता नक्षत्र मालाकर द्वारा अपने साथियों सहित पालकी में बैठ कर जमींदार और उसके लठैतों की जमकर पिटाई करना जैसे प्रसंग भी हैं .
           दूसरा अध्याय 'किसान कविता का स्वरूप 'वस्तुतः हिन्दी में लिखी गई किसान सम्बन्धी कविताओं का व्यापक सर्वेक्षण है .यह सर्वेक्षण लोक और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में किया गया है .इस अध्याय के उपशीर्षकों को देखें तो 'किसान-कविता की अवधारणा ',प्राकऔपनिवेशिक किसान कविता ','घाघ,डाक और भड्डरी ',किसान कविता में १८५७ ','पड़ा हिन्द में महाअकाल','प्रताप''अभ्युदय''नवशक्ति''जनता','हुँकार' ,'हल ',लोकप्रिय दस्तावेज ','जब्तशुदा साहित्य ','बिहार के किसान-गीत ','राजस्थान के किसान -गीत ',रामचरितमानस का क्रन्तिकारी प्रयोग ','युक्त-प्रान्त के किसान-गीत ','मुख्यधारा की कविता ','राष्ट्रीय काव्यधारा में किसान 'हैं.लेखक नें लोक और साहित्य दोनों क्षेत्रों के शोध - महत्त्व को आधुनिक समाजशास्त्रीय नजरिए से देखा है .इससे किसान मानविकी 'समस्या और प्रतिरोध को सम्पूर्णता में देखने में मदद मिली है .१८५७ से लेकर १९४७ के बीच हिन्दी में चले किसान आन्दोलन को हिन्दी की अलग-अलग पत्रिका और पत्रों में धैर्यपूर्वक तलाशने का कार्य   रामाज्ञा शशिधर नें किया है .
               तीसरा अध्याय 'मुक्ति का आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य ' अपने काव्यात्मक शीर्षकों और संवेदनात्मक चित्रण के साथ इस शोध को एक साहित्यिक निबन्ध-संरचना में प्रस्तुत करता है .उसके शीर्षक 'छोडो बेदखली की तलवार चलाना ','तोर जमीदरिया में ','फिरंगिया के राज में ','हल पंडित ध्वज निशान है ','गाँधी जी की छाप लगाकर ',आदि तथा इस अध्याय में सन्दर्भ रूप में दिए गए कविताओं के ७३ उद्धरण किसान आन्दोलन को उसके मूल सम्वेगधर्मिता और संवेदना  के साथ प्रस्तुत करते हैं .१९१८ में लिखी गई ऐसी पंक्तियाँ  जो अवध के किसानों की बेदखली से सम्बंधित हैं -आल्हा शैली में लिखी होने के कारण वीर रस शैली में निरीहता की व्यग्यात्मक प्रस्तुति करती हैं-'हंत!इजाफा अरु बेदाखलिन /की सहि जात न मार कुमार /कष्ट असह्य कहाँ लौं भोगाहिं/मिळत न विपति-सिन्धु को पार'(अभ्युदय साप्ताहिक ,२३ मार्च १९१८ ).ऐसे उद्धरण इस पुस्तक को अतिरिक्त महत्ता प्रदान करते हैं .लेखक के अनुसार हिन्दी की किसान कविता वर्ग संघर्ष की क्रन्तिकारी भूमिका तैयार करने में सक्षम थी,जन संस्कृति सांस्कृतिक क्रांति की आकांक्षा रखती थी और इसके लिए उसका रचनात्मक संघर्ष तीव्र था लेकिन किसान आन्दोलन को वर्ग संघर्ष के मूलगामी रूपन्तरण में ऐतिहासिक कारणों से चूक हुई .निस्संदेह यह चूक वही है ,जिसकी ओर मैंने  लेख के आरम्भ में ही संकेत किया है .   इसके बावजूद 'सामन्ती संरचना का विरोध किसान कविता का केंद्रीय कथ्य है .किसान-कविता में खेतिहर आबादी की बेदखली ,नाजायज लगान,लग-बैग ,नजराना,कर्ज जैसी जोंकों से निर्मित त्रासदी की अनगिनत छवियाँ हैं' .(पृष्ठ १४५ )    
                     चौथे अध्याय 'मुक्ति का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य 'भी काव्य-उद्धरणों और संवेदनाधर्मी  भाषा-संरचना में लिखा जाने के कारण पठनीय और प्रभावी है .उसके भी उपशीर्षक लोक-गीतों की पंक्तियों से लिए गए हैं .'साँझ जमीदारण के सेज ',पकड़ि-पकड़ि बेगार करावत',,'गाजी मियाँमुर्गा मांगे ','गावें-गावें संगठनमा' जैसे शीर्षक इस अध्याय में प्रस्तुत शोध-सामग्री को भी भाव-संवेद्य बनाते हैं .बिजोलिया किसान आन्दोलन के नायक विजय सिंह पथिक के बारे में यह कृतज्ञ भावोद्गार उस समय की लोक कविताओं की सच्ची छवि प्रस्तुत करता है -'म्हाने विजेसिंह आय जगायें माय /थारा गुण म्हें नहीं भूलां/म्हाने जूत्याँ सू पिटता बचाया ए माय /थारा गुण म्हें नहीं भूलां'.
                    पांचवां अध्याय 'कला की राजनीति ' इस शोध अनुभव को 'कला और लोकप्रियता का द्वंद्व ','रूप की धरती ',भाषा का यथार्थ ','अन्य का रूपक ','मिथक की विचारधारा 'आदि उपशीर्षकों के माध्यम से साहित्य-चिन्तन सम्बन्धी महत्वपूर्ण सूत्र विकसित करने का प्रयास करती है .रामाज्ञा के अनुसार 'किसान कविता कला की जन राजनीति से सीधी जुडी होने के कारण कलात्मकता और लोकप्रियता के संतुलन की कविता है .'किसान कविता की लोकप्रियता और कलात्मकता की एकता के निर्माण की प्रक्रिया को सामझाने के लिए किसान कविता की प्रसारशीलता ,विचारधारा,वर्गीय दृष्टिकोण ,पाठकों और श्रोताओं से उसके सम्बन्ध ,उद्देश्य और परिणाम ,प्रचार-प्रसार के माध्यम आदि मुद्दों को गहराई और व्यापकता के साथ समझाना होगा .(पृष्ठ १७५ )'किसान कविता की कलात्मकता वर्ग -संघर्ष की नईअंतर्वस्तु,नए रूप और नई भाषिक संरचना से प्राप्त हुई .उसकी लोकप्रियता के निर्माण में लोकभाषा ,लोक छंद ,लोक धुन ,लोक ले ,लोक मुहावरे आदि का योगदान है .उसकी कलात्मकता और लोकप्रियताकी रचनात्मक एकता के विकास में उद्बोधन ,संबोधन और संवाद की शैली का भी योगदान है .'(पृष्ठ १८० )रूप के स्तर पर किसान कविताएँ लिखित और मौखिक दोनों तरह की हैं .तुलना में 'किसान कविता का मौखिक लोक और जनगीत वाला हिस्सा ज्यादा रचनात्मक और लोकप्रिय है .'(वही,१८३ )भाषा भी लिखित और मौखिक दोनों रूपों में दिखाई देती है  .इसी अध्याय में 'अन्य का रूपक' शीर्षक के अन्तर्गत किसान-कविता में आए बिम्बों और प्रतीकों का विश्लेषण किया गया है लेखक नें किसान कविता के जन धर्मी बिम्बों को आन्दोलनधर्मी और मुक्तिधर्मी डॉ रूपों में चिन्हित किया है .आंदोलनधर्मी कविता में शोषण मूलक त्रासद  अनुभव वाले बिम्बों की भरमार है ,क्योकि प्रतिरोधी बिम्बों का व्यापक पैमाने पर निर्माण -कार्य किसान-कविता के लिए जरुरी रचना-प्रक्रिया था .सामन्तवाद-साम्राज्यवाद विरोधी बिम्ब ,वर्ग-संघर्ष की चेतना के निर्माण,किसान-जागरण ,राष्ट्रवादी तथा स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी बिम्ब आते हैं.  हिन्दी आलोचना की समृद्धि के लिए रामाज्ञा शशिधर की यह प्रस्तावना भी महत्वपूर्ण है कि' किसान-कविता अंग्रेजी की 'औपनिवेशिक भाषाई मानसिकता 'के विरुद्ध हिन्दी कविता की 'खड़ी बोली,को जनपदीय बोलियों की कविता से समृद्ध करती है तथा लिखित और वाचिक के तनाव से कलात्मकता एवं लोकप्रियता के बुनियादी कला-नियम का हल प्रस्तुत करती है .'