गुरुवार, 5 मई 2016

उड़ान

मैं उड़ना चाहता था
चाहता था कुछ वैसी हवा लगे
जैसी वर्षों से नहीं चली
चाहता था अभी बरस पड़े पानी झमाझम
नदियाँ मुझसे बात करने मेरे घर तक आ जाएँ
भले ही डूब जाए मेरा घर
वह घर जिसकी सरहदे
काट देती हैं सारी दुनिया से
बाँट देती हैं आकाश.....
मैंने जब सोचा था सड़क चौड़ी हो जाये
मैंने नहीं सोचा था कितना हिस्सा ढह जाएगा मेरा अपना घर
मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि एक सीमा के बाद
दुनिया को जीतने के लिए सारे सपने
एक दिन थके-हारे लौट आते हैंअपने घर
सिर्फ वे ही नहीं लौटते
जोअपने परिवार के संग जाते हैं
और दुनिया के किसी भी छोर पर बसा लेते हैं अपना घर
मैं नींद में था शायद
अपने सपनों को बसाने के लिए
उजाड़ते हुए सारी धरती ....