कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

एक पौराणिक जिज्ञासा

 ( कवि दिनेश कुशवाह उवाच)


बालि का क्या हुआ?
क्या हुआ बालि का !
उसका सब कुछ लूटने के बाद
उसके हाथ- पैर बांधकर
किसी कुएं मे फेंक आए उसे ?
उसकी उस भोली प्रजा का क्या हुआ
कहा गया जिससे
तुम्हारा राजा
धरती के स्थान पर
पाताल का राजा बना दिया गया है
(कुँए में फेककर )
उसकी हत्या करने के बाद ?

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

कहना तो पड़ेगा ...

जब सभी लोग एक ही दिशा में चलने लगते हैं
तो मैं अनहोनी की आशंका से घिर उठता हूँ
मुझे लगता है भगदड़ में मरेंगे सब
शास्त्रों में तो एक पिता को अपनी संतान के साथ भी
नाव पर बैठने का निषेध किया गया है
यहाँ तो चल रहा है पूरा का पूरा कुनबा ही
एक ही दिशा में और एक ही नाव पर सवार
और नदी की लहरें हैं कि किसी मगरमच्छ की तरह
घात लगाकर घूमती जा रही है .....

(भीड़ भीरु हूँ मैं
अभी मिलूंगा मैं सिर्फ अपने पास
स्वयं को दुहराने और बाहर निकालने का मेरा  कोई इरादा नहीं है)

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

समय-पाठ

०००००००० 
वे हैं 
उनके होने में संदेह नहीं 
उनका सिर्फ इतना ही दोष है 
कि वे हिंसक और अशिष्ट ढंग से हैं
उनका होना एक-दुसरे को व्यर्थ और निरस्त करता है

समय के संधान में यह निर्णय नहीं किया जा सकता
कि वे बाली हैं या सुग्रीव
मालाएँ दोनों ओर सामान हैं और मल्यार्पक भी
समय किसी निर्मम रस्सा कशी की भूमिका में है
सिर्फ दर्शक की भूमिका में
अनिर्णय की स्थिति का शिकार

वे सभी अपने जीवनाधिकार और हस्ताक्षर के लिए लड़ रहे हैं
एक दूसरे की हत्या और मृत्यु से ही होना है निर्णय
समय के सच्चे इतिहास-पुरुष का

जनता अपने आदिम अनुभव के साथ चुपचाप खड़ी है
हर लडाई के परिणाम में बचे हुओं के इंतजार में
जनता अपने भीतर की नापसंदगी के साथ
समेत रही है अपने हिस्से की निष्ठाएं
जनता अब बेवफाई के निर्णायक मूड में है
प्राचीन काल की उन बेवफा किन्तु समझदार स्त्र्यों की तरह
जिन्होंने सारी निगरानी और भय के बावजूद
समय पर भारी बनैले पशुओं के स्थान पर
भयभीत समझदारों के जीन
अत्यंत गोपनीय मिशन के साथ
अगली पीढ़ी तक पहुंचाए

कि डरा और सताया हुआ समय
बिना किसी शोर के
चुपके-चुपके पढ़ता है भीगी आँखों के पीछे से'''
और डराया हुआ समय
अपने विज्ञापित दु:स्वप्नों के बावजूद
हटाई हुई नज़रों और बंद नथुनों के साथ
किसी कूड़ा-स्थल की तरह
होता रहता है अपमानित अनंत-काल तक

सिर्फ बाजार में होना और जीना ही काफी नहीं है
उस प्रेयसी पहचान के लिए
जिसके लिए धरती से लेकर आसमान तक
मचा हुआ है घमासान
और जिंदगी के नाम पर बताई गयी सारी राहें
सिर्फ पहुंचना जानती हैं श्मशान (मसान !)

० रामप्रकाश कुशवाहा
०५..०७.२०१६

सोमवार, 10 मार्च 2014

विवेक की साधना

 हाँ मुझे करनी है विवेक की साधना
मुझे जीना सीखना होगा ईश्वर एवं पिता के बिना 
जैसा कि मुझे बताया गया था 
कि परमपिता ईश्वर सबकी इच्छाओं और सबके स्वार्थों का प्रतिनिधि है 
इस पतनशील सामूहिकता के समय में 
उसकी जिम्मेदार सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में 
मुझे उससे असहमति के लिए भी तैयार रहना होगा 
और एक लम्बे निर्वासन और उपेक्षा के लिए भी 

सम्भव है मनुष्य को अपना बंधुआ बनाये रखने वाली 
मनुष्यविरोधी सत्ताधारी शक्तियां मुझे पसंद न करें 
शक्त्तियां जो सामूहिक मूर्खता को 
सामूहिक समझदारी के रूप में विज्ञापित करती रहती हैं 
जिन्होंने एक बड़ी भीड़ को 
अपने बुने भ्रमजालों में फंसा लिया है 
और किसी अनुचित जातीय एकता की तरह अश्लील 
आश्वस्त और निर्लज्ज हो गयी हैं 

फिलहाल तो अब तक का भय,दुःख और मृत्यु कारक ईश्वर 
एक भगदड़ की तरह है 
जो रौंदते समय में नहीं सोच पाता कि 
कौन कुचला जा रहा है और क्यों ?

फिलहाल तो ईश्वर एक निर्णायक त्रासदी है 
जिसपर किसी भी टिप्पणी का कोई अर्थ नहीं है। 

विवेक की साधना

 हाँ मुझे करनी है विवेक की साधना
मुझे जीना सीखना होगा ईश्वर एवं पिता के बिना 
जैसा कि मुझे बताया गया था 
कि परमपिता ईश्वर सबकी इच्छाओं और सबके स्वार्थों का प्रतिनिधि है 
इस पतनशील सामूहिकता के समय में 
उसकी जिम्मेदार सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में 
मुझे उससे असहमति के लिए भी तैयार रहना होगा 
और एक लम्बे निर्वासन और उपेक्षा के लिए भी 

सम्भव है मनुष्य को अपना बंधुआ बनाये रखने वाली 
मनुष्यविरोधी सत्ताधारी शक्तियां मुझे पसंद न करें 
शक्त्तियां जो सामूहिक मूर्खता को 
सामूहिक समझदारी के रूप में विज्ञापित करती रहती हैं 
जिन्होंने एक बड़ी भीड़ को 
अपने बुने भ्रमजालों में फंसा लिया है 
और किसी अनुचित जातीय एकता की तरह अश्लील 
आश्वस्त और निर्लज्ज हो गयी हैं 

फिलहाल तो अब तक का भय,दुःख और मृत्यु कारक ईश्वर 
एक भगदड़ की तरह है 
जो रौंदते समय में नहीं सोच पाता कि 
कौन कुचला जा रहा है और क्यों ?

फिलहाल तो ईश्वर एक निर्णायक त्रासदी है 
जिसपर किसी भी टिप्पणी का कोई अर्थ नहीं है।