सोमवार, 28 जनवरी 2013

दो कविताएं

एक ही पूंजी समय 

एक

सब एक ही तरह से सोच रहे हैं
सभी सहमत हैं एक ही पसंद के  साथ
एक ही रूचि और मानसिकता के साथ
समय की एक ही बस में बैठे -घूरते
एक ही समूह के बलात्कारियों की तरह .....

सब एक ही तरह से सोच रहे हैं
नापसंद कर रहे हैं-
निरस्त और व्यर्थ घोषित कर रहे हैं
वे  पूरे आवेश के साथ मंच को ही
पूरी दुनिया घोषित कर रहे हैं

वे आश्वस्त हैं कि
एक बर्बर महत्वकांक्षी यात्रा के
शानदार अन्त के साथ
उन्होंने हथिया लिया है समय ....

वे एक पूर्वनिर्मित
और निर्धारित समूह के आतंक के साथ
गुजरते समय का सच घोषित करना चाहते हैं
विवेक की परीक्षा से बचने की
अपनी साजिशी कोशिश  में
रचना चाहते हैं
एक बन्धक विवेक का इतिहास

वे नहीं चाहते कि
कोई अकेला विवेक
कभी स्वतः स्फूर्त और अहिंसक विवेक में बदले


एक ही पूंजी
एक ही पूंजी-समूह
रच रहा है एक ही रचना-समय .....


वे समय के अपने बिवेक से
डरते हुए रचना चाहते हैं
एक सुरक्षित और सामूहिक
प्रायोजित रचना समय

दो

सृजन -नीति 


इसी प्रतिरोध में मैं हूँ
हूँ मैं अपने अस्वीकार में और घृणा में
और अनुपस्थितियों में
मैं रच रहा हूँ
अपना विस्थपित समय
तथाकथित स्थापितों के
नापसन्द वर्चस्व के विरुद्ध ...

वे जो  बाजार में है
और बाजार है

मैं जानता हूँ कि
मैं उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता
और यह कि उनके सामने
आत्म-समर्पण न करना
आत्महत्या करना है
या फिर मार दिए जाने की सुनिश्चितता
फिर भी पुरे होशोहवास के साथ
मैं उनको चिढाना चाहता हूँ एक सृजनात्मक मजाक की
उपस्थिति के साथ

सिर्फ इतना चाहता हूँ मैं कि
वे  मुझे देखकर चौंक जाएँ
भक सफ़ेद हो जाएँ उनका चेहरा
अपने होने के अनैतिकताबोध से
हे मुर्ख ,डकैत और कायर
सामूहिक जीवन-समय

मैं सिर्फ इतना भी कर सकूँ तो
गर्व से चला जाऊंगा
यह दुनिया छोड़कर....

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

स्वयं के पक्ष में ...

जब सब निष्ठाएं संदिग्ध हो गई हैं 
मैं किसी को भी अपना विश्वास कैसे सौंप सकता हूँ !

मुझे मेरे पास रहने दो 
मैं अभी किसी पर भी 
विश्वास नहीं कर पाता-
न ही ईश्वर 
न समय 
न समाज 

मैं स्वयं को 
अपने मूल स्वभाव में 
बचा लेना चाहता हूँ

आप यदि कहना चाहेंतो कह सकते हैं कि
यही मेरी आध्यात्मिकता है 

मैं डरता हूँ कि
हर विश्वास 
मुझे बेवकूफ बना सकता है 
और हर अविश्वास असामाजिक ...

दुनिया-घर


मैं पूरी दुनिया को अपने घर में बदल देना चाहता हूँ
आत्मीयता के एक सुखद पर्यावरण के रूप में
दुनिया में अपनी साझी उपस्थिति के साझे संविधान के साथ
प्रक्रिया और परिणति की असहमति के बावजूद
अतीत के संवेदना-पुरुषों की तरह
एक वृहत्तर स्व की खोज में

अपनी अस्मिता  की खोज की यात्रा के साथ
अपने आखिरी गंतव्य के पल में
समां जाना चाहता हूँ मैं
अफ्रीका के उस आदि-मानव के कुल में
चूमते हुए दुनिया की सारी बन्दर-प्रजाति को
आगे और आगे सभी स्तन-पाइयों और
बहु-कोशकीय दुनिया को पर करता हुआ
समां जन चाहता हूँ उस आदिम अकेली बीज कोशिका में
जिसके हम सब ही वंश-विस्तार हैं

मैं जानता हूँ कि परमाणुओं के गुण-धर्म ,पसन्द-नापसन्द
रूचि-अरुचि और स्वभाव से ही हुई है
अचेतन भौतिक पदार्थों से सचेतन जीवन-जगत की रचना और यह कि
सक्रिय व्यवहार ही
इस सृष्टि का रचनात्मक मूल है

मैं मानव-जाति के सबसे प्यारे बच्चों के
उन सुन्दर सपनों को फिर से साकार देखना चाहता हूँ
जैसा कि भारत में दो माओं के पुत्र पौराणिक कृष्ण नें
वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में तो
अरब में अनाथ बच्चे मुहम्मद नें
सारी  दुनिया को एक ही कबीले के रूप में बदल देने के लिए देखा था
जैसा देखा था ईसा मसीह नें
सारी दुनिया के पवित्रतम शिशु के रूप में
मैं सारी  मानव-जाति को अपने ही अस्तित्व के विस्तार के रूप में
अपने ही अभिन्न परिवार के रूप में पुनः पाना और जीना चाहता हूँ

मुझे संकीर्णताएँ अश्लील लगती है
और खण्डित अस्मिताएँ पागलपन
मेरी दृष्टि में दुनिया के सारे क्षुद्रताजीवी मुर्ख हैं
मैं जानता हूँ
पाना और जीना भी चाहता हूँ-दुनिया मेरा घर !

दुनिया-घर


मैं पूरी दुनिया को अपने घर में बदल देना चाहता हूँ
आत्मीयता के एक सुखद पर्यावरण के रूप में
दुनिया में अपनी साझी उपस्थिति के साझे संविधान के साथ
प्रक्रिया और परिणति की असहमति के बावजूद
अतीत के संवेदना-पुरुषों की तरह
एक वृहत्तर स्व की खोज में

अपनी अस्मिता  की खोज की यात्रा के साथ
अपने आखिरी गंतव्य के पल में
समां जाना चाहता हूँ मैं
अफ्रीका के उस आदि-मानव के कुल में
चूमते हुए दुनिया की सारी बन्दर-प्रजाति को
आगे और आगे सभी स्तन-पाइयों और
बहु-कोशकीय दुनिया को पर करता हुआ
समां जन चाहता हूँ उस आदिम अकेली बीज कोशिका में
जिसके हम सब ही वंश-विस्तार हैं

मैं जानता हूँ कि परमाणुओं के गुण-धर्म ,पसन्द-नापसन्द
रूचि-अरुचि और स्वभाव से ही हुई है
अचेतन भौतिक पदार्थों से सचेतन जीवन-जगत की रचना और यह कि
सक्रिय व्यवहार ही
इस सृष्टि का रचनात्मक मूल है

मैं मानव-जाति के सबसे प्यारे बच्चों के
उन सुन्दर सपनों को फिर से साकार देखना चाहता हूँ
जैसा कि भारत में दो माओं के पुत्र पौराणिक कृष्ण नें
वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में तो
अरब में अनाथ बच्चे मुहम्मद नें
सारी  दुनिया को एक ही कबीले के रूप में बदल देने के लिए देखा था
जैसा देखा था ईसा मसीह नें
सारी दुनिया के पवित्रतम शिशु के रूप में
मैं सारी  मानव-जाति को अपने ही अस्तित्व के विस्तार के रूप में
अपने ही अभिन्न परिवार के रूप में पुनः पाना और जीना चाहता हूँ

मुझे संकीर्णताएँ अश्लील लगती है
और खण्डित अस्मिताएँ पागलपन
मेरी दृष्टि में दुनिया के सारे क्षुद्रताजीवी मुर्ख हैं
मैं जानता हूँ
पाना और जीना भी चाहता हूँ-दुनिया मेरा घर !

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

सामयिक वार्ता ,जनवरी २०१३ के अंक में प्रकाशित दो कविताएं -

थोड़ी-सी जगह


थोड़ी सी जगह जरुरी है
किसी और के लिए
चाहे वह ईश्वर हो या फिर कोंई और
थोडा सा भोजन उसके लिए
जो अभी नहीं आया है
लेकिन जो आ सकता है कभी भी

थोडा सा धैर्य -जो दुःख में हैं
उनकी नाराजगी और क्रोध के लिए
थोडा सा बोझ दूसरो की विपत्ति को 
बाँट लेने और बचा लेने के लिए

थोड़ी सी सम्भावनाये बची रहनी चाहिए
नए आविष्कारो के लिए भी
और थोड़ी सी ऊब नए प्रश्नो के लिए
थोडा सा मन नैराश्य के अंतिम क्षणों के विरुद्ध
थोड़ी सी चुप्पी और थोडा सा संवाद
एक संवेदनशील मन और सुरक्षित जीवन के लिए---


सुख का आधार

सारा सुख आदमी के ऊपर ही टिका हुआ है
हर सुखी आदमी किसी दुखते कंधे वाले
आदमी के सर पर चढ़ा हुआ है
कोई जानबूझकर तो कोई अनजाने ही
किसी  के पैरो तले पड़ा हुआ है

जेब काटने से लेकर जीने तक आदमी के लिए
आदमी ही है कच्चा माल
मानसिक विकलांगो और पराश्रितों की एक बड़ी भीड़
जो कुछ भी नया रचना और स्वयं कमाना नहीं जानती
उनकी दुनिया का एकमात्र सच यही है कि
आदमी से छीन कर ही आदमी का भाग्योदय और भला हुआ है !



रागात्मक विद्रोह


जनसत्ता 20 जनवरी, 2013: युवा कवि-कथाकार गौरव सोलंकी के कविता संग्रह सौ साल फिदा की कविताओं की दुनिया भविष्यकामी युवा जीवन का अपने सपनों के पीछे खुद को निश्शेष कर देने की आकांक्षाओं और भावनाओं की दुनिया है। 
उनकी कविताएं दरअसल, गुजरते जीवन और समय के गोपन रहस्यों को सहसा अनावृत्त कर देने की युवा कवि की विद्रोही मानसिकता से उपजी हैं।
गौरव की कविताएं विवरण की अस्पष्टता का इस्तेमाल कविता की तकनीक की तरह बहुअर्थी संभावनाओं के लिए करती हैं। दरअसल, वे जीवन की सृजनात्मक संभावनाओं के कवि हैं। उनकी दुनिया में कुछ भी निश्चित नहीं है। चीजें जीवन की तरह ही कभी भी कोई दिशा और रूप ले सकती हैं और उनकी कविताओं में व्यक्त अनुभव भी। उनकी ‘कि घर है’ कविता की ये पंक्तियां: ‘या कि तुम्हारे लगातार बेघर होने की प्रक्रिया में/ मैं घर हूं।’
गौरव की रचना-प्रक्रिया वास्तविक जीवनानुभवों के जाल को बोतलबंद पानी की तरह एक जटिल सृजनात्मक प्रक्रिया में ले जाने की है; जहां जल भी केवल जल न रह कर बिसलेरी बन जाता है। उनकी कविताओं में दृष्टांतों की एक पर्यटक मस्ती है, जो कभी भी चौंका सकती है- यह न सही तो यह सही की शैली में अर्थों और संकेतों का एक झूमता हुआ गतिशील और बेफिक्र कविता-संसार है। जहां सब कुछ कविता के एकांत में घटित होता है, सामाजिक वर्जनाओं की चिंता छू तक नहीं पाती। गौरव की कविताएं संप्रेषण की क्रीड़ा और कौतुक के शिल्प में रमती हैं। उनकी कविता में अर्थों और संकेतों की आंख-मिचौली है।
गौरव सोलंकी अप्रत्याशित सृजनशीलता के कवि हैं। अभिव्यक्ति के उपकरणों से छेड़छाड़ उनकी विशेषता है। ‘मैं ईश्वर’ कविता में ईश्वर होने की घोषणा एक ऐसी ही शरारती घोषणा है। पूरी कविता हालांकि दुख को सृजनात्मक स्वतंत्रता के साथ जीने की एक निषेधात्मक प्रस्तुति है: ‘मैं अपनी सघन कुंठाओं से/ तुम्हें बनाना और तोड़ देना चाहता हूं/ रात के तीसरे पहर में/ मैं ईश्वर हूं।’
‘डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है/ कृपया कुछ देर बाद डायल करें/ यह मेरे संसार का ब्रह्मवाक्य है, सुनो।’ यह कविता प्रेमजनित ईर्ष्या की दुनिया में ले जाती है। प्रकारांतर से यह भी युवा-जीवन की आशंकाओं और दुस्वप्नों की दुनिया है। गौरव अद्यतन जीवन-समय के व्याख्याता कवि हैं। जिसके कारण सामान्य दैनिक अनुभव से भी कविता फूट पड़ी है: ‘मैं नहीं हूं/ तो कोई और है वहां/ कुछ और कहता हुआ/ जिसके शब्दों के अर्थ भी आधी रात की तुम्हारी हंसी में/ खुशी से उलझ कर खुदकुशी करते हैं।’
‘हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था’ शीर्षक कविता मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले में मारे गए आम लोगों की स्मृति, घटित मानवीय त्रासदियों और एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी की शहादत के साथ-साथ बढ़ती संवेदनहीनता और मीडिया की कमजोर स्मृति का भी रेखांकन करती है। यह कविता आतंकवादियों की बर्बर स्मृति और आम आदमी की दिनचर्या के जीवंत बिंबों से गुजरती हुई इस महत्त्वपूर्ण टिप्पणी के साथ समाप्त होती है कि ‘कमजोर याददाश्त और महेंद्र सिंह धोनी के इस समय में/ यह हर सुबह गला फाड़ कर उठती हुई हूक/ और बहुत साधारण लोगों को बचा कर रख लेने की/ एक नितांत स्वार्थी कोशिश है/ इसे कविता न कहा जाए।’
‘रात में फ्रिज’ कविता यांत्रिक सुविधाओं की निर्भरता को समकालीन जीवन के रागात्मक विस्तार 
के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पालतू पशुओं के प्रति रागात्मक संबंध वाली पीढ़ी से आगे की दुनिया है, जो इन यंत्रों की भी उपस्थिति और विस्तार को एक मानवीय अर्थवत्ता देती है: ‘फिर भी रात में फ्रिज खोलो तो/ सूरज दिखता है/ मरते-मरते भी लगेगा/ कि जन्मा हूं अभी/ और मां है सुबह-सुबह।’ गौरव खिलंदड़े और शरारती अहसासों के कवि हैं। वे जीवन के लिए अपरिहार्य यांत्रिक वातावरण से भी पुराने मानवीय रिश्ते ढूंढ़ निकालते हैं। फ्रिज के भीतर लाल सूरज का दिखना और सुबह-सुबह ताजा रोटियों के लिए मां की याद और अहसास उनकी ऐसी ही पंक्तियां हैं।
गौरव सोलंकी नें कामुकता के खुले बाजार के विरुद्ध एक मानसिक प्रतिरोध रचने की कोशिश की है। उनकी ‘छलती हुई स्त्रियों के खिलाफ’ ऐसी ही कविता है। उनकी दृष्टि में प्रेम में या फिर प्रेम के लिए पुरुष का बचना भी एक प्रकृति-प्रदत्त मानवीय पर्यावरण का बचना है। उनकी कविताएं कला पर थोपी गई नैतिकता के विरुद्ध हैं। गौरव साहस के साथ अपने काव्य-संसार में समाज की दृष्टि से वर्जित और घृणास्पद समझे जाने वाले विषयों का भी निर्बाध प्रवेश कराते हैं।
उनके यहां युवा जीवन की मन:स्थिति और यौन-यातना के अनेक प्रसंग हैं: ‘उसकी लड़कियां/ कि उनसे नफरत करना चाहूं/ तो मर जाने का मन करता है/ प्यार करता रहूं तो पागल हो जाऊं।’ गौरव प्राय: चौंकाने वाले विषयांतर की तरह ही कविता के प्रमुख कथ्य की ओर लौटते हैं। इस कविता में एक सहेली की बेटी की विदाई के अवसर पर मां की मानसिक पीड़ा, रुलाई और पिता के माध्यम से एक सम्मानजनक पेशे में आजीविका के लिए कार्यरत स्वाभिमानी बुद्धिजीवी के अपमानजनक जीवनानुभवों का वर्णन है। व्यवस्था के घृणास्पद और अपमानजनक होने की स्थायी स्थिति इस कविता को महत्त्वपूर्ण बनाती है। कविता अपमानों के संस्मरणों को इन शब्दों में व्यक्त करती है: ‘पिताओं को नहीं रहना चाहिए इतना अमर/ बेइज्जती को इतना ताजा।’
ये कविताएं जीवन, दुख, अंधेरे और दुस्वप्नों के बीच अपनी बेबाक टिप्पणियों और अलग अंदाज के साथ बिल्कुल नया पाठकीय अनुभव प्रदान करती हैं। इनके निर्माण में   देखे, भोगे और जिए गए यथार्थ और कवि के निजी संस्मरणों और एकांत टिप्पणियों की बड़ी सृजनात्मक भूमिका है। इनका वैशिष्ट्य उनके वैश्विक बाजार युग की युवा मानसिकता और दृष्टि से लोक और समय का साक्षात्कार करने वाली कविताएं होने में है। ‘जब तुम पिक्चर देख रही थी’, ‘और उन लड़कियों से किया इश्क हमने’, ‘चार लड़कियां भी हैं अकेली लड़कियां’, ‘रेडियो, आइसक्रीम और लाल गुब्बारे’, ‘छूटी हुई लिपस्टिक’, ‘और चंद्रकला, ब्रेक के बीच तुम्हारा कत्ल’, ‘आसमान फाड़ डालेंगे किसी दिन’, ‘सौ साल फिदा’ और ‘कहीं और करेंगे हम अपने बच्चे पैदा’ आदि कविताएं न सिर्फ शीर्षक, विषय और संरचना में गौरव की अलग पहचान बनाती हैं, बल्कि जीवन के साक्षात्कार और परिकल्पना में भी। ‘तुम्हारी आंखों में तमंचे हैं’, ‘इतना निहत्था कि डर नहीं’ और ‘वैसे भी कब तक मारेंगे मेरी जान/ एक बार से ज्यादा नहीं मारा जा सकता एक आदमी को।’ जैसी अनेक अभिव्यक्तियां गौरव को अभूतपूर्व, साहसिक, समर्थ और अविस्मरणीय कवि बनाती हैं। शर्त बस यही होगी कि इन कविताओं को कवि से सहमत होते हुए नैतिकता संबंधी बिना किसी पूर्वग्रह के, जीवन के सच के रूप में पढ़ा जाए।
रामप्रकाश कुशवाहा
सौ साल फिदा: गौरव सोलंकी; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 140 रुपए।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

अतीतजीविता से मुक्ति

मानव-सभ्यता की अस्तित्व -यात्रा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनरूत्पादन एवं पुनर्प्रशिक्षण  की प्रक्रिया से होकर गुजरती है । सिर्फ अस्तित्व  की दृष्टि से ही नहीं बलिक मन,बुद्धि और विचार के धरातल पर भी आज का मनुष्य बीते हुए कल के मनुष्य  का प्रतिफल है । इसीलिए आज के मनुष्य की अनेक समस्याओं का उदगम भी प्राचीन मनुष्य द्वारा जिए गए जीवन की घटनाओं ,आदतों और स्मृतियों में है । ये स्मृतियां ही उस साभ्यतिक अचेतन का निर्माण करती हैं ,जो आज के मनुष्य को सोचने,जीने और करने की एक सांस्कृतिक पद्धति देती है। विकास की इस श्रृंखलित निरन्तरता के कारण आज के मनुष्य को बदलने की प्रथम-द्रष्टया प्रविधि उसकी स्मृति को ही बदल देने या फिर नयी पीढ़ी के मनुष्य को उसकी स्मृति-श्रृंखला से ही बाहर निकाल देने के रूप में संभव हो सकती है । सैद्धांतिक और नैतिक दृष्टि से भी क्योंकि  गुजरे हुए समय को बदलना संभव नहीं है , न ही अतीत से जुड़ी हुर्इ स्मृतियों को ही बदलना संभव है-सुनियोजित और सुनिश्चित बदलाव के लिए की गयी इतिहास की हर कृत्रिम पुनर्व्याख्या उसें संदिग्ध और अविश्वसनीय ही अधिक करेगी -इतिहास और स्मृति से बाहर निकलकर मूल्यपरक जीवनयापन के लिए एक परिष्कृत विवेक अर्जित करना ही वर्तमान और भावी मानव-जाति के लिए मुक्ति  का एकमात्र रास्ता है ।
         अतीतबद्ध,स्मृति-जीवी इतिहासित मनुष्य पुराने सामाजिक आदतों का पुनर्वाहक बनकर पुनरावर्ती घटना-चक्र को जन्म देता है । अपनी अतीतजीवी दृष्टि के अनुरूप ही समकालीन परिवेश  का भी अतीतीकरण करता जाता है । दृष्टि के अतीतीकरण के साथ ही प्रतिकूल मान्यताओं से जुड़ा समकालीन मनुष्य भी उसके लिए समस्यात्म्क परिसिथति का अवयवी हिस्सा बन जाता है । यह इतिहासित मनुष्य ही अपने प्रतिक्रियात्मक विवेक और व्यवहार के कारण अनेक सामाजिक अपराधों और दुर्घटनाओं की श्रृंखला को जन्म देने और जीने के लिएअभिशप्त है । आज का प्रबुद्ध मनुष्य भी इसी अर्थ में पराधीन या गुलाम है कि वह एक पूर्वनिर्धारित मस्तिष्क बनकर रह गया है । प्रतिक्रियात्मक जीवन और प्रतिबनिधत विवेक के कारण वह अतीतजीवी सभ्यता के यानित्रक उत्पाद की तरह सामने आता है । एक ही जीवन के अलग-अलग साभ्यतिक संज्ञान एवं व्याख्याओं नें उसे अनेक मानवीय विश्वों में बांट दिया है । वह अनेक परस्पर विरोधी अस्मिताओं में बंट गया है । तमाम बौद्धिक विकास के बावजूद वह अपने ही भीतर के शैतानी हत्यारे जीन की तलाश  नहीं कर पाया है । इस इतिहासित मनुष्य को उसके प्रतिक्रियात्मक विवेक से निकालकर विशुद्ध ,उचित ,मौलिक ,अधतन और मूल्यपरक विवेक की ओर ले जाना  सामूहिक रचनाशीलता की प्रमुख चिन्ता होनी चाहिए ।
          इस समय भारतीय बुद्धिजीवियों में परिकल्पनात्मक अतीतीकरण की शिकार तीन प्रजातियाँ दिख रहीं हैं -भारतीय मूल के सांस्कृतिक पुरातनताजीवी ,जिसके केंद्र में ब्राह्मण जाती की पेशेवर सामाजिकता भी है .दूसरी प्रजाति इस्लामी जिहाद की परिकल्पनाएं जीती हैं ,तीसरी प्रजाति बिना किसी आवश्यक समझदारी के बिना सोचे-समझे (सिर्फ पढ़े-जिए के आधार पर  )अपने  क्रन्तिकारी होने के मुगालाताजीवी महत्वाकांक्षी बुद्धिजीवियों की है (जिसमें से एक मैं स्वयं भी हूँ).
ये तीनों अपने पिछड़ेपन की नकारात्मकता के साथ प्रगति और विकास की प्रक्रिया को अपने-अपने ढंग से अवरुद्ध कर रहे हैं .ये तीनो ही धड़े अत्यन्त ही मूर्खतापूर्ण ढंग से विद्वता के घमंड को जी रहे हैं .स्वीकृति की सामाजिकता और सामूहिकता के कारण इनका सामुदायिक विवेक सापेक्षिक प्रभाव के कारण अपनी वैचारिक अयोग्यताओं को समझने के अयोग्य है .

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

साहित्य की संस्कृति,सत्ता और समाज


मनुष्य के जीने को समाजशास्त्रीय नजरिए से देखना बिल्कुल नया नजरिया है । यह दृषिट संस्कृति को भी नए दृषिटकोण से देखे जाने की वकालत करती है । संस्कृति साहित्य को भी कर्इ रूपों में प्रभावित और नियनित्रत करती है । इसके विपरीत यह भी सच है कि साहित्य भी संस्कृति को प्राय: सिथर और स्थार्इ प्रभावशीलता देती है । कर्इ बार साहितियक स्मृति सांस्कृतिक स्मृति के रूप में समाज को प्रभावित करती है तो कर्इ बार सांस्कृतिक स्मृति ही साहितियक स्मृति के रूप में पुनरूत्पादित होती रहती है । इसीतरह साहितियक स्मृति की सार्थकता, ऐतिहासिक स्मृति को संशाधित या विस्थापित करनें की सामथ्र्य में है । ऐतिहासिक स्मृति दुर्घटनात्मक  या आपराधिक स्मृति भी हो सकती है । ऐसी स्मृति को सतत समीक्षा और प्रतिरोध की स्मृति और संस्कृति का निर्माण साहितियक सृजनशीलता का उपलबिध कहा जा सकता है ।

       ऐतिहासिक स्मृति प्राय: अपने युग के असंगठित आम जन के सामूहिक भटकाव या आलस्य का परिणाम हुआ करती है । कर्इ बार वह मनुष्य के तात्कालिक सामूहिक विवेक एवं निर्णयों की अभिव्यकित हुआ करती है । ऐसे में साहितियक सृजनशीलता के माध्यम से व्यक्त मानवीय विवेक का महत्व बढ़ जाता है । क्योंकि साहित्य अधिक सजग ,गम्भीर और अपेक्षित विचारशीलता की अभिव्यकित हुआ करता है ।  साहित्यकारों को साहितियक सृजनशीलता के इस सांस्कृतिक महत्व और समाजोपयोगी भूमिका को समझना चाहिए ।  नासमझ एवं मनोरंजनजीवी साहितियक सृजन प्राय: आस्वादपरक या फिर उत्सवधर्मी होता है । सामाजिक स्वास्थ्य की दृषिट से एक साहित्यकार की भी अपनी सांस्कृतिक भूमिका होती है ।

      वस्तुत: साहित्य की संस्कृति विवेक की संस्कृति है । किसी ऐतिहासिक घटना का विश्लेषण करता हुआ इतिहासकार  किसी घटना से सम्बनिधत मानव-व्यवहार के उचित-अनुचित होनें का विश्लेषण तो करता है, लेकिन वह गलत और अनुचित होते हुए भी तथ्यों से कोर्इ छेड़छाड़ नहीं कर सकता । वह किसी सामुदायिक दु:ख य क्षोभ का निवारण भी नहीं कर सकता । संवेदनशील मसलों पर उसकी बौद्धिक समझदारी प्राय: नि ष्प्रभावी ही रही है । इसीलिए ऐतिहासिक स्मृति के स्थान पर साहितियक स्मृति अधिक मूल्यवान और प्रभावी हो सकती है । वह न सिर्फ संशोधन उपसिथत करती है ,बलिक नर्इ समानान्तर एवं सार्थक स्मृति की प्रस्तावना भी कर सकती है ।   उदाहरणस्वरूप देखा जाय तो मध्ययुग में औरंगजेब सत्ता के लिए अपनें सगे भाइयों की हत्या कर ऐतिहासिक स्मृति का निर्माण क्रता है । मध्य-युग में हर सृजित तुलसी के राम की साहितियक स्मृति और उपसिथति उसे इसतरह अपवाद के हाशिए पर धकेलकर उसका अवमूल्यन कर देती है कि भारत में सिर्फ हिन्दू ही नहीं बलिक मुसलमान भी प्राय: उस ऐतिहासिक स्मृति की चर्चा नहीं करता । इस प्रकार तुलसी के राम-काव्य की एक सृजनात्मक सार्थकता यह भी है कि वह औरंगजेब और उसके कुकृत्यों को भारतीय जनता की सामाजिक -सांस्कृतिक स्मृति से विस्थापित और खारिज करती है ।

         इसमें सन्देह नहीं कि साहित्य का संस्कृति,समाज और सत्ता से रिश्ता बहुआयामी और जटिल है । साहित्य समाज से प्रभावित होता है और उसे प्रभावित करता भी है । एक अच्छा और आदर्शवादी साहित्य समाज को भी एक आदर्श साहित्य बनानें की प्रेरणा देता है । यथार्थवादी साहित्य समाज की कटु वास्तविकताओं को सामनें लाकर उससे बचनें एवं उससे सजग रहनें के सन्देश देता है । प्राचीन काल से ही साहित्य सामाजिक परिवर्तन का माध्यम रहा है । आधुनिक काल में भी विभिन्न विचारधाराओं के लोग अपने मत के अनुसार साहित्य रचकर साहित्य को परिवर्तित करनें का प्रयास करते रहते हैं ।

        भारतीय साहित्य और सत्ता का एक हजार वषोर्ं का साहितियक इतिहास सम्पूर्ण समर्पण का तथा राजनीतिक इतिहास सम्पूर्ण पराधीनता का रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो इस दौर का साहित्य परार्इ सता के मानसिक समर्थन के लिए एक अचेतन सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रच रहा था । यधपि यह भी सच है कि उस दौर के भकित-साहित्य के प्रति यह दृषिटकोण या नजरिया  उस दौर के साहित्य को पढ़ते हुए हम नहीं हासिल करते । यह दृषिट उस दौर की इतिहासजीविता को अतिक्रमित करके ही पार्इ जा सकती है ।

         वस्तुत: हर युग की सत्ता का हर युग के साहित्य पर पर्याप्त प्रभाव रहा है । कभी तो यह कहना मुशिकल हो जाता है कि सत्ता,समाज और साहित्य को प्रभावित कर रही है या साहित्य ही समाज और उसकी सत्ता के चरित्र को । इस बिन्दु पर विचार करते हुए मेरा घ्यान बार-बार रामकथा के नायक राम के चरित्र और युग के बादशाह बाबर तथा उसके पुत्र हुमायूं के आपसी रिश्ते और चारित्रिक साम्य की ओर जाता है । कहते हैं बाबर नें अपनें बीमार बेटे हुमांयूं की यह कहते हुए परिक्रमा की थी कि उसका मरणासन्न बेटा बच जाए,भले ही उसके स्थान पर स्वयं उसकी ही मृत्यु क्यों न हो जाए । कहते हैं ऐसा ही हुआ था और उस दिन के बाद बाबर बीमार होनें लगा था और हुमायूं स्वस्थ । इतना ही नहीं बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं नें अपना राज्य अपनें भाइयों में बांट दिया था । बाबर के चरित्र की तुलना रामकथा के पात्रों से करें तो उसमें भी दशरथ की तरह का मरणान्तक पुत्र-प्रेम देखा जा सकता है । बाबर निशिचत रूप से हुमायूं से बहुत प्रेम करता होगा । अपनी भावना में वह भी दशरथ से कम नहीं रहा होगा । इसी तरह हुमायूं का अपने भाइयों के प्रति प्रेम और व्यवहार में भी राम के व्यवहार की झलक देखी जा सकती है । क्या यह एक संयोग मात्र ही है या फिर हुमायूं के चरित्र पर भारतीय जनमानस में व्याप्त राम के आदर्श चरित्र का परिचय और प्रभाव ! यह प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों में देखा जा सकता है । 

      हाल के दलित-चिन्तन द्वारा प्रहार के मुख्य केन्द्र के रूप में पुरोहित-वर्ग के वर्चस्व की चर्चा और उसपर प्रहार कोर्इ छिपी बात नहीं रह गर्इ है । भारत में एक जाति की आजीविका का साध नही पूजा-अर्चना व्यवसाय का रहा है । इस जाति नें उपनिषद काल की दार्शनिकता और बुद्ध-काल की विचारशीलता को खो देनें के बाद बौद्धों की मूर्ति और भितित-चित्रकला को पौराणिक भारतीय मिथकों के नायकोंं की पुनर्पस्तुति की ओर मोड़ दिया । ऐसे में इतिहास की जिस एक घटना नें संत मत एवं भकित आन्दोलन के भकित-स्वरूप् को दिशा दी होगी वह निश्चय ही महमूद गजनवी के हाथों सोमनाथ मनिदर का टूटना और लूटा जाना है । इस घटना नें मूर्ति एवं तीर्थ आदि से भारतीय जनजीवन का ध्यान हटाकर दिव्यता के खोज की दिशा को जीवन की ओर मोड़ दिया ।गोरखनाथ की ''जोर्इ पिण्डे सोर्इ ब्रहमाण्डे की अवधारणा में अन्तमर्ुख दार्शनिकता का यह मोड़ देखा जा सकता है । इसके पश्चात मानव-जीवन को केन्द्र में रखकर आध्यात्मवादी चिन्तन की जो धारा बहती है ,वह गोरखनाथ के हठयोग को कबीर के सहजयोग तक ले जाती है ।  कबीर के यहां र्इश्वर जीवन की दिव्य असिमता का चरम मानक है । वह एक ऐसा पारस है , जो जीवन के हर पत्थर को  सोना बनाता जात है । कबीर अवतारी राम को तो नहीं मानते लेकिन बहुत चुपके से हर मनुष्य को र्इश्वर के अवतार में बदल देते हैं । यहां देखने की बात यह है कि पुरोहितवाद सदैव ही वर्तमान जीवन की अवहेलना और अतीत की स्मृतिजीविता एवं उसके महिमामण्डन में लगा रहता है । ऐसा वह प्राय: पेशेवर कारणों से ही करता है । कबीर निश्चय ही इस रहस्य को जान गए थे-उनके ''राम-नाम का मरम है आना,दशरथ-सुत तिंहुं लोक बखाना का मर्म यही है । कबीर के यहां दशरथ-सुत स्मृतिपोषित राम हैं; जिसे एक जाति नें  आजीविका के लिए अपनें शास्त्रों में बन्धक बना लिया है । कबीर इसी बन्धुआ राम से जीवन को मुक्त करना चाहते हैं और प्रकारान्तर से हर मनुष्य में रमें हुए राम का सन्देश भी देते हैं।

            आदिकाल में भारतीय संस्कृति के प्रमुख केन्द्रों (तीथोर्ं) पर आक्रमण हो रहे थे । नाथ और सिद्ध साहित्य नें आस्था के बाहरी केन्द्रोें की नि:सारता को समझनें और समझानें का ही प्रयास किया है । पुरोहिती र्इश्वर एवं आस्था के केन्द्रों के ध्वस्त होते ही सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना बहिमर्ुख से अन्तमर्ुख होती है । जो भी ब्रहमाण्ड  यानि भौतिक पदाथोर्ं एवं संसार में है ,,वही पिण्ड यानि देह में भी दिखार्इ देने लगता है । इन सब में यही बात मुझे महत्वपूर्ण लगती है कि मनुष्य की स्वतंत्रता और उसके असितत्व की अर्थवत्ता बची रहनी चाहिए । वह ब्रहमाण्डीय जड़ता में जीवन का सर्वोत्तम प्रतिनिधि वर्तमान है । यदि चेतन इयत्ता की सत्ता बाहरी दुनिया में नहीं बचती तो सूक्ष्म मनोजगत में ही बचे,लेकिन उसका बचना जरूरी है । कबीर की मानवीय स्वतंत्रता उनके आत्माराम में बचती है तो तुलसी की राम के चारित्रिक सौन्दर्य के प्रति प्रेम,समर्पण और सम्मान में । सामाजिक विरेचन की दृषिट से मुझे राम ,कृष्ण और कबीर ही सवाधिक उपयोगी जान पड़ते है। ये तीनों ही चरित्र अपमानित जीवन की समस्त संभावनाओं को उसके चरमोत्कर्ष या अतिमानवीय परिणति तक पहुंचा देत हैं । ये तीनों ही चरित्र अपनें समय की समस्त मानवीय-सामाजिक सुरक्षाओं से वंचित हैं । ये अपनी अर्थवत्ता को शून्य से अर्जित करते है। अपनें समय से छीनते हुए जीते हैं। मैंने पढ़ा था कि बि्रटिश जेलों में भूमि पर बनें चबूतरों पर सोने वाले स्वतंत्रता सेनानी अपनें कैदी जीवन के अनुभवों को राम से बेहतर मानकर स्वस्थ-चित्त बनें रहते थे ।

          मध्यकाल के साहित्य में सत्ता और समाज का सबसे रोचक प्रभाव मुझे सूर के यहां दिखता है । मुझे सूर के कृष्ण एक ऐसे बड़े रंगीन परदे की तरह दिखते हैं-जिसकी ओट में मध्ययुगीन शासकों की सारी रंगीनियां और सारी अश्लीलता ढक देनें या फिर छोटा करनें की कोशिश की गर्इ है । सूर के कृष्ण जमानें द्वारा खींची जा रही सभी रेखाओं को छोटा करनें के लिए खींची गर्इ  बड़ी रेखा की तरह हैं ; जो युग के चार रानियों वाले शासकों का मजाक अपनें सोलह हजार रानियों वाले कृष्ण से उड़वाती है । ऊपर से सीधे-सीधे न दिखनें के बावजूद सूर की सांस्कृतिक चेतना वस्तुत: प्रतिरोध की चेतना है । विश्वास न हो तो उनके भ्रमरगीत की गोपियों को देखिए । उनका भ्रमरगीत समकालीन सत्ता का सुविचारित एवं सशक्त प्रत्याख्यान है । मध्ययुग में समाज,संस्कृति और साहित्य के पारस्परिक सम्बन्ध का उदाहरण कृष्ण के चरित्र की अपार लोकप्रियता और उसकी उपयोगिता में देखा जा सकता है । सामन्ती युग में बहु-पत्नी प्रथा थी और अनेक विवाह करना मर्दानगी और शान की बात समझाी जाती थी । सामन्त और नवाब सभी इस मानसिकता से ग्रस्त थे । समकालीन जनता में उनकी कामुकता को लेकर अनेक झूठे-सच्चे प्रसंग तैरते रहते थे । व्यापक जनसंख्या में स्त्री-पुरुष अनुपात को देखते हुए सामान्य मनुष्य एकल वैवाहिक जीवन जीता था । ऐसे में कृष्ण का बहुनायकत्व अपने शासकों के प्रति र्इष्र्या और घृणा को निष्चय ही प्रति-सन्तुलन देता होगा। सूर की गोपिकाओं में अपनें आराध्य कृष्ण के प्रति भकित-भावना के साथ-साथ र्इष्र्या,घृणा,व्यंग्य और उलाहना की प्रवृतित को सूर के समकालीन यथार्थ-बोध से जोड़कर देखे बिना संभव नहीं है । गोपियों के परम आत्मीय कृष्ण जब तक ब्रज में रहते हैं ,परम हितैषी सखा के रूप में चित्रित हुए हैं;लेकिन जैसे ही वे मथुरा जाते हैं,मध्य युग के शासकों के प्रति तत्कालीन जनमानस में संचित सम्पूर्ण घृणा, किसी ज्वालामुखी विस्फोट की तरह फूट पड़ती है । कृष्ण जब तक ब्रज में रहते हैं,तब तक गोपियों के प्रति उनका प्रेम वैध एवं किसी भी आपतित से परे है ; लेकिन जैसे ही वे शासकों की पंकित में शामिल होते है-उनका होना-जीना सब अक्षम्य हो जाता है । यदि मैं कहूं कि सूर का भ्रमरगीत ,मध्ययुगीन शासकों के चरित्र के प्रति तत्कालीन जनभावना को प्रतिनिधित्व करनें वाला रूपक है  तो अत्युकित न होगी । कृष्ण सहसा ही सत्ता की कालिमा एवं कलंक के प्रतीक में बदल जाते हैं । बल्लभाचार्य के दर्शन के आधार पर पूरे दार्शनिक विवेचन के बावजूद मैं सूर के कृष्ण को इसी रूप् में देख और समझ पाता हूं कि वह लोकनायक कृष्ण और सत्ता-नायक कृष्ण के द्वैत में रची गर्इ है लेकिन अपने रचनात्मक द्वन्द्व एवं संघर्ष में वह चयन करती है लोकनायक कृष्ण का ही ।

          मध्य-युग के कवियों में तुलसी का यूटोपियन प्रतिरोध सबसे आकर्षक एवं लोकप्रिय है । राम कृषि-सभ्यता को केन्द्र में रखकर रची गर्इ जीवन और समाज की आचार-संहिता एवं नैतिक मूल्यों के महानायक हैं । मुझे रामकथा पूंजीवादी सत्ता के निषेध का आख्यान लगती है । राम की कथा न सिर्फ एकल दाम्पत्य की आदिम प्रचारक है ,बलिक वह कर्इ सन्तानों की दशा में सामूहिक दायित्व और अधिकार के रूप में भूमि एवं सम्पतित का बंटवारा भी रोकती है ।  यधपि उसकी मूल्य -दृषिट औधोगिक सभ्यता के जटिल श्रम-मूल्यों का न्यायपूर्ण विभाजन नहीं कर पाती । इसीलिए रामकथा समान श्रम-मूल्यों वाले क्षेत्रों से अलग के क्षेत्रों में अपने पारिवारिक एकता के सन्देश को सुरक्षित नहीं रख पाती ; न ही वह औधोगिक सभ्यता के भिन्न क्षेत्रों वाले श्रम-मूल्यों का न्यायपूर्ण वितरण ही सुझा पाती है । औधोगिक सभ्यता की नर्इ पीढ़ी उसके आदशोर्ं से आंखें चुराने लगी है ;इसीलिए अलग-अलग आय वाले एक ही संयुक्त परिवार के सदस्य एक साथ रहनें के स्थन पर चुपचाप अलग रहनें को ही प्राथमिकता देनें लगे हैं । इन तथ्यों के बावजूद रामराज्य का यूटोपियन प्रतिरोध किसी भी काल की व्यकितकेनिद्रत  सत्ता का निषेध एवं अस्वीकार है ।

        हिन्दी का रीतिकालीन साहित्य भूषण और गुरुगोविन्द सिंह जैसे एक-दो कवियों की रचनाओं को छोड़कर सत्ता-सन्दभोर्ं से निर्धारित साहित्य है । अपनें अधिकांश में यह साहित्य पारिवारिक चिन्ताओं का भी साहित्य नहीं है । रीतिकालीन कवि विशुद्ध रूप् से व्यकितवादी सरोकारों के रचनाकार हैं । घनानन्द,बोधा आलम आदि को अपवादस्वरूप छोड़ दे ंतो निर्विकल्प प्रेम-संवेदना का उसमें अभाव नहीं है । प्रेम यहां केन्द्र से बाहर एक उपभोक्तावादी बाहरी निर्विकल्प दृषिट के साथ उपसिथत है । वह संवेदना के स्तर पर नहीं बलिक ज्ञान और सामान्य-बोध के स्तर पर है । अधिकाशंत: मजाक और मनोरंजन के विषय के रूप में ।

        भारतेन्दु-युग से ही आधुनिक हिन्दी-साहित्य की यात्रा याचना से स्वावलम्बन के भव-बोध की यात्रा है । हीनता की मनोग्रनिथ के प्रति प्रतिरोध और निजता की खोज भारतेन्दुयुगीन हिन्दी-साहित्य की विशेषता है । निज सत्ता के अभाव का बोध,सामाजिक एवं सांस्कृतिक कुण्ठा इस दौर के साहित्य को आत्म-मुल्यांकन का साहित्य बना देती है । यह युग प्रतिस्पद्र्धा एवं आत्मपरिष्कार का भी है । द्विवेद्वी युग में ये प्रवृतितयां ही अधिक निर्णायक रूप् ले लेती हैं । परम्परा एवं अतीतजीवी प्रवृतित के कारण भारत में नवजागरण एवं पुनर्जागरण की दोनों ही धाराएं साथ-साथ प्रवाहित हुर्इ हैं । आमतौर पर पुनर्जागरण और नवजागरण को एक ही समझ लिया जाता है ; जबकि पुनर्जागरण से अभिप्राय स्वर्णिम अतीत की असिमता को पुन: प्राप्त करने की दिशा में हुआ जागरण है,जबकि नवजागरण का सम्बन्ध आधुनिकता से है ।

          अन्य एशियार्इ समाजोंं की तरह एक परम्पराजीवी समाज होनें के कारण भारत में नवजागरण की चेतना सम्पूर्णता में देखनें को नहीं मिलती । इसका एक कारण यह रहा है कि कठोर जातीय बन्धन के कारण उसकी आधुनिकता भी स्वत:स्फूर्त न होकर आयातित ही रही है । इसीलिए हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के साहितियक बोध में परम्परा एवं आधुनिकता का द्वन्द्व बना रहा है । उसकी आधुनिकता में भी परम्पराजीविता के लिए गुंजाइश एवं छदम पलायन मिलता है । ऐसा चेतन एवं अचेतन सजगता एवं चालाकी के रूप में रहा है । जातीय यथार्थ से पलायन की प्रवृतित के कारण ही हिन्दी का अधिकांश लेखन प्रामाणिक और विश्वसनीय लगता ही नहीं । काफी दूर तक वह एक भगोड़ा साहितियक लेखन है । वह रचते हुए भी बचता है और बचते हुए रचता है । उसनें साहित्य के ध्रातल पर एक काल्पनिक यथार्थलोक विकसित किया है । इसीलिए उसका अधिकांश आदर्शवादी ढंग की कृत्रिम प्रगतिशीलता की शिकार है । वह बिना किसी सटीक माप के रचे गए फैन्सी वस्त्र की तरह है । इसे आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता के दाेंहरे प्रयोग से प्रामाणिक,संस्थानिक एवं व्यापारिक इतिहास के रूप में प्रायोजित एवं विज्ञापित किया गया है। यह एक तथ्य है कि हिन्दी के दलित साहितियक लेखन नें इस साहितियक वर्जना,संकोच एवं साजिश को तोड़ा है । इस समकालीन परिदृश्य में कि  आज भी अशिक्षा,पूर्वाग्रह और रीतिरिवाजों से अनुशासित सामाजिक जीवन जीनें की बाध्यता के कारण भारतीय जनमानस अपनी पिछड़ी चेतना का अतिक्रमण नहीं कर पा रहा है । यही सिथति अधिकांश एशियार्इ देशों और उनके यहां उपसिथत विविध समुदायों के सांस्कृतिक जीवन की है । सशक्त सांस्कृतिक पृष्ठभूमि,प्रबल सामुदायिक भावना तथा जन्म आधारित जातीय नस्लीय संरचनाओं की उपसिथति के कारण उसकी अधिकांश जनसंख्या भौतिक समृद्धि के बावजूद आधुनिकता की दार्शनिकी को भी स्वायत्त करनें में असमर्थ है ।

        हिन्दी में साहित्य-सृजन का कार्य जितना आज चुनौतीपूर्ण ,संशय और संकटग्रस्त है ;उतना इतिहास में पहले कभी नहीं था । इसका सबसे प्रमुख कारण तो यह है कि हम एक सांस्कृतिक शून्य-काल से होकर गुजर रहे हैं । पिछले युग के मनुष्य की अधिकांश धारणाएं वर्तमान युग में निमर्ूल सिद्ध हुर्इ हैं । इस तरह सभ्यता और संस्कृति का  पिछला पाठ बड़े पैमानें पर अप्रासंगिक हुआ है । आजादी के बाद सार्वभौमिक मानवतावाद को गांधीवादियों और राजनीतिक स्तर पर  कांग्रेस पार्टी द्वारा इतिहास की मुख्य धारा को अधिग्रहण कर लेने के बाद, उसकी नियति और प्रासंगिकता भारतीय सन्दर्भ में कांग्रेस के पार्टी-चरित्र और विश्वसनीयता से जुड़ गयी है । आज के भारत में गांधी का ब्रान्डनेम नेहरू परिवार और प्रकारान्तर से कांग्रेस  (इनिदरा) की गिरफत में है । गांधी की राजनीतिक विरासत स्वयं कांग्रेस की गिरफत में है लेकिन विडम्बना यह है कि गांधीवाद का स्थायी चरित्र सत्ता के विपक्ष और विरोध की संस्कृति रचने की है । इसलिए वह अन्ना हजारे के आन्दोलन में  स्वयं को पाने का प्रयास कर रही  है  ।

       विडम्बना यह है कि गांधीवाद भी हिन्दी जाति और उसके समाज में व्याप्त असिमता के संकट का स्थार्इ समाधान प्रस्तुत नहीं करता । उसमें एक अम्बेडकर की असहमति या दलितबोध की लाइलाज पीड़ा की हमेशा गुंजाइश है ।  अपनी जातीय मनोग्रस्तताओं एवं स्थानीय बीमारियों के कारण ही हिन्दी का यथार्थबोध कभी भी सार्वभौमिक नहीं बन सकता - वह अभी अपनी वैयकितक नकारात्मकताओं से मुकित एवं क्रानित की प्रतीक्षा में ही है । अपनी नग्न वास्तविकताओं के साथ वह देशज सामूहिक मनोविकृतियों का साहित्य है । वह अपने राजनीतिक और साहितियक परिदृश्य की तरह साहित्य में भी सिर्फ जातीय सेनाओं की सृषिट कर सकता है । यह आश्चर्य नहीं कि किसी मथे गए गन्दे तालाब की तरह उसका पानी किसी जातिवादी लोकतंत्र के कीचड़ पर सिथर हो ।

         परम्परागत भारतीय समाज यथासिथति को नियति और नियति को र्इश्वर के साथ जोड़कर एक व्यापक और संशयमुक्त शासित समाज और संस्कृति की रचना करता था । इसमें सन्देह नहीं कि ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक भारत देशी और विदेशी शासकों के लिए स्वर्ग था । राजनीतिक संघर्ष से बचने और बचानें के लिए नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को या तो जाति-विशेष तक सीमित कर दिया गया था या फिर विदेशियों तक । आखिर उसकी भकित-चेतना का राज उसके सम्पूर्ण एवं नि:शेष समर्पण में ही निहित था । इस तरह अधिकांश एशियार्इ समाजों की तरह  भारतीय समाज भी तथा उसकी संस्कृति और साहित्य अपनें मूल रूप् में सम्पूर्ण जनसंख्या की स्वतंत्रता का विरोधी था । उसका निस्पृहतावादी दर्शन प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि तथा कृषि आधारित न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा से पैदा हुआ था । वह एक ऐसे समाज की व्युत्पतित था जिसका जैविक असितत्व अपनी अमूर्त कल्पनाजीविता के बाद भी सुरक्षित रह सकता था ।

         एक लम्बे समय तक भारत के कम्युनिस्ट समूह नें भारतीय समाज के दलित अन्त्यज को सर्वहारा की वर्गीय अवधारणा से विस्थापित करने की असफल कोशिश की है । लेकिन गांधीवाद की तरह वह भी आदिम मूलतागामी दर्शन होने के कारण विकास और आधुनिकता में असिमता के इस संकट का समाधान नहीं देख पाया ।  यह मान लेने कें पर्याप्त कारण हैं कि दलित और सर्वहारा दोनों की निर्माण प्रविधियां एवं शोषक परिणतियां एक नहीं हैं । सर्वहारा की अवधारणा आर्थिक मुकित के सपने से जुड़ी हुर्इ है ,जबकि दलित की सामाजिक और सांस्कृतिक मुकित से । प्राचीनकाल से भारतीय परम्परागत सामाजिक व्यवस्था जन्मना दलित को बलात सर्वहारावर्गीय बनाती रही है  । समकालीन दलितवाद सामूहिक असिमता के इसी मुकित-संघर्ष की लड़ार्इ लड़ रहा है । उन्हें लम्बे समय से अलग रखा गया है ,इसलिए आत्मनिर्णय के मानवाधिकार के अन्तर्गत उनके मुकित-संघर्ष के नैतिक औचित्य का समर्थन किया जाना ,माक्र्सवाद की तर्ज पर दलित राजनीतिक वर्चस्व की सहायक और अनुगामी साहित्य की केन्द्रीय उपसिथति भारतीय इतिहास की विकास-यात्रा के लिए जरूरी लगती है । लेकिनप्रतिकि्रयावादी निषेध या अस्वीकारवादी चरित्र के कारण यह आधुनिकता की विकास-यात्रा में सहयोगी और संवादी होनें के स्थान पर पूर्वाग्रहग्रस्त एवं असंवादी लगने लगता है । समानान्तर वृत्तान्त की रचना करने के प्रयास में आधुनिकताविरोधी वृत्तान्त रचनें की दिशा में भटकाव से इस आन्दोलन को बचाना चाहिए ।  हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दलितवाद जातिवाद के सैद्धानितक औचित्य की आधारभूमि पर ही प्रासंगिक बना हुआ है । यह जातिवाद की स्वीकृति के भीतर ही सामाजिक बराबरी की मांग करने वाला आन्दोलन है । एक प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन के मुददे के रूप् में यह प्रकारान्तर से नारी-मुकित और जातिवाद से मुकित का विरोधी और अपने प्रतिकि्रयात्मक यथासिथतिवादी जातीय पूर्वाग्रह के चलते बहुत हद तक प्रतिगामी और पोषक भूमिका में है ।

        यह एक तथ्य है कि आजादी के बाद की भारतीय राजनीति नें अलग-अलग राजनीतिक दलों के चरित्र एवं उनके नेतृत्व की मानसिकता के माध्यम से मध्ययुगीन सामाजिक -सांस्कृतिक अधिरचनाओं की सुनियोजित वापसी की है । यह वापसी वंशवाद ,परिवारवाद,जातिवाद,सम्प्रदायवाद सभी स्तरों पर की गर्इ है । इसनें भारतीय लोकतंत्र को समुदायवादी लोकतंत्र में परिणित कर दिया है ।






बुधवार, 16 जनवरी 2013

क्रान्ति-विमर्श -१

यदि मुझसे पूछा जाये कि मानव-जाति के सतत विकास-क्रम में साहित्य और दर्शन की सही भूमिका क्या हो सकती है या क्या होनी चाहिए ? तो प्राचीन भारतीय मनीषियों की तरह मैं भी यही कहना चाहूंगा कि मुकित ! लेकिन मैं मुकित की अवधारणा को नए सिरे से परिभाषित करना चाहूंगा । मुकित का यह संघर्ष मेरे लिए साभ्यतिक अभियानित्रकीकरण से मानव-चेतना को मुक्त करनें के लिए होगा । इसीतरह साहितियक सृजनशीलता को मैं मानव-मन की संवेदनात्मक आदिमता या मूल-स्वभाव के पुनप्र्रापित की तरह देखता हूं । इस तरह देखें तो ये दोनों ही भिन्न किन्तु जरूरी मनन-प्रक्रियाएं हैं-एक-दूसरे से विपरीत किन्तु सहवर्ती एवं पूरक भी ।

        आम धारणा के विपरीत दार्शनिकीकरण अवधारणाओं के जटिल मनो-संसार को अर्थ के सामन्जस्य एवं सरल सूत्रीकरण की ओर ले जाता है । यदि कोर्इ दर्शन इसके विपरीत आचरण में है तो संभव है कि वह विद्वता-प्रदर्शन एवं ज्ञान-विलास के रूप् में हो । प्राचीनकाल से ही हम देख सकते हैं कि संकल्पनात्मक धारणाओं के केन्द्रक किस प्रकार एक बड़े ज्ञानात्मक समाज की रचना करते रहते हैं। कम्प्यूटर की भाषा में कहें तो इनकी भूमिका एक परिष्कृत साफटवेयर की तरह ही होती है ।

       सच तो यह है कि सभ्यता के जटिल विकास के साथ मनुष्य का ज्ञान ही उसे अभिशप्त करता जाता है । ऐचिछक-अनैचिछक,उचित-अनुचित संज्ञापन उसके संज्ञान को विभाजित करते जाते हैं । संज्ञान और संज्ञापन का का तिलिस्म जिस जटिल मनोसृषिट का निर्माण करते हैं ,उसके अतिक्रमण का विज्ञान ही दर्शन होना चाहिए ।

          दार्शनिकों के इतिहास में मार्क्स का अवदान कर्इ दृषिटयों से अनूठा है । मार्क्स नें दर्शन की सृजनात्मक चुनौती को सिर्फ अवधारणाओं की दुनिया को ही नहीं,बलिक वास्तविक दुनिया को बदलने की चुनौती के रूप् में भी देखा । इसतरह मार्क्स सिर्फ मानव-सभ्यता की दार्शनिक अवधारणा का ही नहीं,बलिक सभ्यता की वास्तविकताओं का भी अतिक्रमण करनें का प्रयास करते हैं ।मार्क्स नें वैयकितक संज्ञापन की पूंजीवादी,भाग्यवादी या दैवी-परम्परा को को संज्ञापन की आर्थिक वर्गीय अवधारणा से विस्थपित किया ।

यदि मार्क्सवाद के बाद का दर्शन साभ्यतिक निष्क्रमण और अतिक्रमण नहीं घटित कर पा रहा है तो यही कह सकते हैं कि अनेक विचारकों द्वारा दुनिया को समझने ंके लगातार चल रहे प्रयासों के बावजूद हम अवधारणात्मक शोर एवं दिशाहीनता के शिकार हो गए हैं ।

 वर्तमान मानव-जाति की मुख्य त्रासदी यह है कि वह वैशिवक धरातल पर जिन दो-तीन सांस्कृतिक प्रोग्रामों-साफटवेयरों से संचालित है ,वे कर्इ धरातलों पर इतनें अलग और असंवादी हैं कि वे मानव-मात्र की जातीय एकता से अधिक जातीय भिन्नता का विज्ञापन और प्रचार करती है । सावधानी से निरीक्षण करनें पर हम पाते हैं कि सांस्कृतिक अचेतन और आदतें इतनी निर्णायक है। कि उनकी परिधि में दर्शन,धर्म,राजनीतिक व्यवस्थाएं एवं सामाजिक व्यवहार सभी कुछ आ जाते हैं । यह सच है कि इन सांस्कृतिक आदतों,विश्वासों और विचारों का विकास हजारों वर्ष में हुआ है ,लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विकास के साथ न सिर्फ हम उन्हें विश्लेषित करनें की सिथति में हैं; बलिक उनको समझ सकते हैं ; व्याख्या कर सकते हैं ;बलिक उनके अनुसार संचालित होनें से अस्वीकार कर सकते हैं। उनका अतिक्रमण कर सकते हैं और उन्हें बदल भी सकते हैं । इन आदतों में एक सामाजिक आदत क्रानित ,बदलाव और उसके लिए नायक की खोज की भी  है । यधपि क्रानित रोज नहीं होती लेकिन हमारी सभ्यता और ऐतिहासिक स्मृति का एक बड़ा भाग क्रानित-चर्चा को ही समर्पित रहनें से हमें उकसाती रहती है कि हम क्रानितकारी बनें । वैसे विश्व स्तर पर क्रानित का सबसे बड़ा प्रायोजक देश अब भी अमरीका ही बना हुआ है । हिन्दी साहित्य में भी मेरे कर्इ मित्र रचनाकार क्रानित की अदभुत पैरोडी करते हुए प्रचुर क्रानितकारी साहित्य लिख चुके हैं । व्यकितगत रूप से मैं उन्हें हमेशा ही अविश्वसनीय,अवसरवादी, अभिनयकर्ता तथा नक्काल ही मानता रहा हूं,क्योंकि वे मुझे भविष्य की संभावनाओं के अन्वेषी नायक कम,अतीत की स्मृति के वाहक नायक अधिक लगते रहे हैं । इस टिपपणी के बावजूद कुछ मित्रों में क्रानित की र्इमानदार चिन्ता एं भी मैंने देखी है ।

   क्रानित मानव-सभ्यता में बदलाव और परिवद्र्धन के लिए आवश्यक होते है। वैसे तो सृजनात्मक और विकासवादी बदलाव सतत होते रहना चाहिए । इस प्रकि्रया का अवरुद्ध होना ही क्रानित को ऐतिहासिक औचित्य और पृष्ठभूमि देता है । यह मानने के पर्याप्त आधार है कि मानव-जीवन की हत्या पर आधारित कोर्इ भी क्रानित मानव जाति की आदिम हत्यारी बर्बरता लिए एक संवेदनशून्य अमानवीय समाज की रचना करेगा- इस दृषिट से व्यकितगत रूप् से मैं उसकी सैद्धानितक संस्तुति करनें से बचता रहा हूं । इसके बावजूद ऐसी किसी भी सत्ता को; जो अपना नैतिक आधार  तथा संभावनापूर्ण भविष्य की दृषिट और स्वप्न खो चुकी हो तथा सिर्फ अपनी हत्या करने की शकित के आतंक के आधार पर ही वर्तमान में बनी हुर्इ हो,फांसी की अपरिहार्य सजा की तरह  ,उसका बलपूर्वक उच्छेद भी कर्इ बार अपरिहार्य लगनें लगता है । यह एक तथ्य है कि सारे मूल्य सापेक्ष होते हैं और यदि कोर्इ समुदाय सांस्कृतिक र्इकार्इ के रूप में हो तथा दूसरे समुदाय की स्वतंत्रता और अधिसकसा का सम्मान नहीं कर रहा हो तो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने का औचित्य बनता है ।

         फिलहाल क्रानित असंतुष्टों और भविष्यजीवियों का स्वर्ग है ।  कर्इ बार वह पेशेवर रूप में भी गैरजरूरी एवं व्यकितगत क्रानितकारी बनने की महत्वाकांक्षा की सृषिट करते भी दीखती है । इसके बावजूद सतत सृजनात्मक क्रानित एवं बदलाव मानव-जाति के असितत्व के लिए आवश्यक है। बदलाव की आवश्यकता और दिशा क्या हो सकती है;जबकि मानव-जाति एक प्रवहमान जैविक असितत्व है ,अब तक के अधिकांश दार्शनिक विजन एक सिथर समस्यात्मक समाज की परिकल्पना पर आधारित है । उन्होंने उस जनसंख्यात्मक विस्फोट की परिकल्पना नहीं की थी ,जो एक बन्द सिलेण्डर में हाइडोजन के परमाणुओं की तरह घनत्व बढ़ते जानें पर तेजी से टकराते हुए सिलेण्डर को ही गर्म करते जाते हैं और एक दिन विस्फोट पर पहुंचा देते हैं ।

         मार्क्सवाद क्रान्ति रूपी इस उन्मादी यिस्फोट का आवश्यकताओं से जोड़कर देखता है ,जबकि पूंजीवादी विद्रोह महत्वाकांक्षी प्रतिस्पद्र्धा से भी संचालित होते हैं । इतिहास की अनेक क्रान्तियाँ विशेषकर सत्ता-परिवर्तन समस्याओं के वास्तविक आधारों पर कम बलिक सामूहिक असुरक्षा और  विश्वासहीनता को व्यकितगत योग्यता के झूठे आश्वासनों के साथ तनावग्रस्त समुदायों को गुमराह करते हुए या फिर आपराधिक शैली में संगठित समूहों द्वारा घटित की गर्इ है। कर्इ बार सार्वजनिक व्यवस्था के ढांचे का पिछड़ापन भी आक्रोश की वजह बना है तो कर्इ बार उनके नियम,कानून और मूल्य ।मार्क्सवाद संसाधनों के समान वितरण और विभाजन के सपने पर आधारित है तो तानाशाही एवं लोकतानित्रक व्यवस्था में नेतत्व के नाम पर व्यकित-परिवर्तन ही बड़ी हिंसक क्रानितयों की अनितम परिणति होते हैं ।

    यह एक तथ्य है कि मार्क्सवाद पूंजीवादी व्यवस्था की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ था । लेकिन देखनें की बात यह है कि कृषि-युगीन सभ्यता से यन्त्र-आधारित औधोगिक सभ्यता तक मानव-जाति की विकास- यात्रा में तकनीक और श्रम का स्वरूप बदलनें के बावजूद सम्पतित की अवधारणा में कोर्इ रूपान्तरण नहीं हुआ था ।  कृषि-सभ्यता के जमींदार और सामन्त (बूजर्ुआ) की जगह उधोग या मिल-मालिक पू।जीपति नें ले ली । कृषि में मानवीय श्रम की आवश्यकता अल्पकालिक होती है । इस वस्तु-सिथति नें अल्पकालिक कृषि-मजदूर को पूर्णकालिक औधोगिक-मजदूर में बदल दिया था । इसनें मनुष्य को आर्थिक सत्ता का गुलाम बनाना शुरू कर दिया था। एक ऐसी आर्थिक गुलामी का सृजन किया जो मानव-इतिहास में अभूतपूर्व था । उधोग में तकनीकी आविष्कारों की गोपनीयता स्वामित्व और शोषण की नर्इ परिसिथतियां सामनें लाती है । कम्पनी अपनें तकनीकी उत्पाद की गोपनीयता बनें रहनें तक अपना प्रभुत्व बनाए रख सकती थी - मांग और आपूर्ति की लोकप्रियता के अतिरिक्त । भारत में अनेक पेशेवर जातियों के निर्माण में वंशानुगत उत्तराधिकार मेंं मिली पेशेवर योग्यता और उसकी गोपनीयता का भी योगदान रहा है ।

 दरअसल माक्र्सवाद के सन्दर्भ में हुआ यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी की अवधारणाएं लेकर बीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध और इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध के पूंजीवाद पर विचार करनें वाले बुद्धिजीवी पूंजीवाद के संरचना और व्यवहार को प्राय: समझ ही नहीं पाये हैं । हुआ यह है कि स्वयं मार्क्स बि्रटिश राजनीतिक सत्ता के स्वर्णिम काल साम्राज्यवाद के युग में पैदा हुए थे । इसीलिए अपनी प्रतिक्रिया में वे सर्वहारा के अधिनायकत्व से अधिक नहीं सोच सके । अपनी साम्यवादी सैद्धानितकी के बावजूद मार्क्स पूंजीवादी राजनीतिक सत्ता के साम्यवादी सत्ता में रूपान्तरण के सपनें देखने वाले विचारक थे  ।  सत्ता की यह नयी अवधारणा एक नर्इ राजीतिक व्यवस्था और व्यवहार की मांग कर रहा था । लेकिन घ्यान से देखनें पर स्पष्ट हो जाता है कि बीसवीं शताब्दी के बाद का युग राजनीतिक सत्ता के ह्रास का युग है । यधपि राजनीतिक सत्ता एक पारम्परिक संरचना के रूप में अब भी बची हुर्इ है ,लेकिन शकित का केन्द्र औधोगिक सत्ता में स्थानान्तरित हो गया है । यह आर्थिक सेनाओं और आर्थिक सामा्रज्यवाद का युग है । देशों की जगह बहुराष्टीय औ?ोगिक कम्पनियों के सामा्रज्य नें ले ली है । इस तरह मार्क्स का सर्वहारा भी स्थानीय न रहकर वैशिवक सर्वहारा बन चुका है ।  औधोगिक सत्ता के वेतनभोगी की तरह वह एक औधोगिक सैनिक की तरह व्यवहार कर रहा है ; न कि सर्वहारा की तरह। अपनी विशेषज्ञ दक्षता एवं बुद्धिवाद से औधोगिक पूंजीवदी सभ्यता नें बहुत ही चालाकी से कृषि-मजदूर को अपना गुलाम बना लिया है ।

           आज के शोषण की मानवीय त्रासदी शोषक एवं शोषितों के परम्परागत रूप् एवं अधिरचनाओं में नहीं,बलिक दक्ष-अदक्ष,योग्य-अयोग्य के बड़े सामुदायिक विभाजन के रूप् में घट रही है ।  यह 'सरवाइवल आफ द फिटेस्ट यानि योग्यतम की विजय का सबसे क्रूरतम दौर है । जो अज्ञानी है वह मारा जाएगा ।

स्पष्ट है कि मार्क्स के समय का स्थानीय पूंजीवाद वैशिवक पूंजीवाद में बदल गया है । व्यवस्था का पूंजीवादी सर्प वहां नहीं है,जहां उसके होने की कल्पना मार्क्स नें अपने साम्यवाद में की थी । दरअसल मार्क्स जिस समय अपनी सैद्धानितकी दे रहे थे-उस युग की भौतिक परिसिथतियों में सर्वहारा किसे कहा जाय यह भी एक विचारणीय प्रश्न है । सामन्ती एवं कृषि-व्यवस्था में कृषि-कार्य में लगे या न लगे सभी भूमिहीनों को सर्वहारा कहा जा सकता है ; लेकिन शहरी औधोगिक व्यवस्था में  प्राय: उनका ध्यान क्रानित- कारी आवेश से औधोगिक मजदूरों को संबोधित करनें का था , न कि बेरोजगारों और भिखारियों को ।

भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में स्वाभाविक है कि औधोगिक मजदूरों को पूंजीवाद का हिस्सा मान लिया जाएगा ,क्योंकि यहां क्रानित के लिए बेरोजगार सुगमता से उपलब्ध हैं । बेरोजगारों में भी दक्ष,प्रशिक्षित या योग्य तथा अदक्ष,अप्रशिक्षित या अयोग्य दो भेद किए जा सकते हैं ।

         ऐसे में मजदूर आन्दोलन भारत में इसलिए सफल नहीं हो सके कि भारतीय पूंजीपति उनके क्रन्तिकारी असहयोग की सिथति में उनके विकल्प दक्ष बेरोजगारों को पानें में समर्थ थे । दूसरा यह की यहाँ उतना व्यापक पूंजीवाद भी नहीं था .स्वयं मार्क्स जिस ब्रिटेन में बैठे थे ,वहां इस लिए भी मार्क्सवादी क्रांति होना संभव नहीं था कि एक साम्राज्यवादी देश होने के कारण पूरा देश ही पूंजीपति की भूमिका में था .उसका मजदूर या सर्वहारा भी उच्चा जीवन -स्तर वाला एक पूंजीपति सर्वहारा था .शोषित सर्वहारा औपनिवेशिक देशों में स्थानांतरित हो गए थे . हुआ यह था कि माक्र्सकालीन योरोपीय देश औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी विस्तार के दौर से गुजर रहे थे । उनके पास अपने उपनिवेशों में प्रवास करनें के विकल्प थे । इसलिए वे असमानताबोध के लिए मजदूरों को सर्वहारा मानने एवं संबोधित करनें में समर्थ थे । साम्राज्यवादी योरोप की उन्न्त व्यवस्था में मजदूर ही व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर था ।

 एक और विडम्बना यह थी कि पूंजीपति दक्ष बेरोजगार युवा को जब अप्रशिक्षित या प्रशिक्षित अवस्था में औधाेंगिक मजदूर के रूप में चुनता है तो वह सापेक्षता में वास्तविक सर्वहारा जो कि दक्ष बेरोजगार है ,उससे विशिष्ट और सुरक्षित जीवन जीने ंके कारण एक तरह से पूंजीवादी व्यवस्था का ही अभिन्न अवयव बन जाता है ।  ऐसे में  अपने से भी हीन बेरोजगारों की बड़ाी फौज को देखते हुए, भारत में मजदूर वर्ग का अधिकांश कभी यह मानने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप् से तैयार ही नहीं हो सका कि वही वास्तविक सर्वहारा है । इस वास्तविकता की अनदेखी करने के कारण भारत में मजदूर आन्दोलन प्राय: सांगठनिक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए । इतिहास में तीसरी चीज यह देखी गर्इ कि तकनीकी गोपनीयता या एकाधिकार की सिथति में ही किसी मिल एवं उसके मालिक को ब्लैकमेल किया जा सकता है । अन्यथा बाजार में प्रतिस्पद्र्धी कम्पनी  का असितत्व उसको दिवालिया बना सकता है ।  ऐसे में मजदूरों द्वारा बनाया गया अधिकांश दबाव प्राय: आत्मघाती ही हुआ है और साम्यवादी आन्दोलनात्मक दबाव प्राय: कम्पनियों को दिवालिया या फिर बन्द करानें में ही सफल हुए ।

       भारत में माक्र्सवादी आन्दोलन के लिए अनितम प्रतिकूलता यहां ब्राहमण जैसी लचीली जाति का पाया जाना और उसकी प्रभावकारी सांस्कृतिक उपसिथति भी रही है ।  इसकी श्रमविहीन आजीविका की सांस्कृतिक व्यवस्था विशेषकर दक्षिणा और श्राद्ध आदि नें बड़े पैमाने पर घूस जैसे आर्थिक अपराध को सुविधा -शुल्क के रूप में  अपराध-बोध विहीन सामाजिक व्यवहार एवं चलन में ला दिया । यह चौंकाने वाला लग सकता है लेकिन है सच कि भ्रष्ट नौकरशाही नें भारत में आर्थिक असन्तोष को कम किया है । अर्थ का अघोषित प्रवाह भारतीय समाज के प्रकट-अप्रकट ऐसे कोनों को सींचता रहा है ,जिसकी कल्पना भी संभव नहीं है । यह एक सच्चार्इ है कि भारतीय लोकतंत्र एक कल्याणकारी राज्य की अपनी भूमिका में बहुत सीमित व्यवहार ही कर सका है ।  सामाजिक रूप से संयुक्त परिवार की प्रथा का लोप न होनें से  अयोग्यों,बेरोजगारों,पागलों का निर्वाह संयुक्त परिवार ही करता रहा है । इस दायित्वबोध या फिर असुरक्षाग्रनिथ नें भी भारत में घूसखोरी और भ्रष्टाचार फैला दिया है । कम वेतन की नौकरी पा गये हैं,घूस लीजिए ;दहेज देना है,घूस लीजिए ,काम करवाना है ,घूस दीजिए; नौकरी पाना है ,घूस दीजिए ; किसी को पढ़ाना है या बेरोजगार को पालना है ,घूस लीजिए ।  भारत में उदारीकरण और निजीकरण के पीछे मण्डल या आरक्षणविरोधी आर्थिक-प्रशासनिक इंजीनियरिंग भी थी जिसकी चर्चा प्राय: नहीं की जाती है । आरक्षण का उपाय स्ववित्तपोषित शिक्षा-व्यवस्था तथा भुगतान पर मिलने वाली सीटों से निकाला गया ।  इससे आरक्षण का प्रभाव और दुष्प्रभाव दोनो ही केवल सरकारी क्षेत्रों वाले अवसरों तक ही दिखार्इ देता है । उधर मंहगार्इ नें अपरोक्ष प्रभाव में लोगों की आमदनी बढ़ार्इ है और दूसरे शब्दों में लोगों को धनी बनाया है-इस तरह लोग त्रस्त हैं लेकिन मस्त हैं ;दु:खी है ,फिर भी सुखी हैं! दूरदर्शन से लेकर मोबाइल तक मनोरंजन का एक बड़ा बाजार लोगों को प्रसन्न करनें के व्यवसाय में लगा हुआ है। मनोरंजन आज उधोग है,व्यापार है और बाजार भी । वैशिवक धरातल पर तो नाटो से लेकर अमरीका तक फैला हुआ क्रानित भी तो एक उधोग ही हो गया है । आज युद्ध भी अर्थनीति का ही एक हिस्सा है और सांगठनिक तथा व्यकितगत महत्वाकांक्षा के रूप में साहित्य के बाजार का भी !