बुधवार, 29 जनवरी 2014

आप की भूमिका और भविष्य

कल" समकालीन सोच" से जुड़े मेरे एक मार्क्सवादी कवि मित्र जे ०के ० सिंह (पूरा नाम जितेन्द्र  कुमार सिंह जो समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं  ) अरविन्द केजरीवाल के वर्ग को लेकर परेशान थे। वे इसे एक सुधारवादी आंदोलन मानकर असली क्रांति को भटकाने  वाला यानि दूर करने वाला आंदोलन मान रहे थे। उनकी दृष्टि में यह इतिहास की एक साजिश है। वे इस बात के लिए भी दुखी थे कि इस साजिश के कारण अब क्रांति उनके जीवन-काल  में नहीं हो पाएगी। इस आंदोलन नें एक बार फिर वास्तविक क्रांति की आतंरिक ऊर्जा को जनमन से दूर कर दिया है। उन्होंने अपने सोचने पर मेरी व्यक्तिगत राय चाही।  मैंने उन्हें बताया कि यह आपके समझने यानि अण्डर-स्टैंडिंग की व्यक्तिगत समस्या है। मैं यह भी उन्हें कहने के लिए सोचता रहा कि आपमें एक विचारधारात्मक अक्षमता विकसित हो गयी है ,जिसके कारण मार्क्सवाद के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं पाते। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि आप इस समस्या को कुछ इस तरह से सोचें -कि आपने (विचारधारा  के रूप में ) मार्क्सवाद की एक नहर बनायीं थी और सोचा था कि इतिहास का पानी सिर्फ इसी नहर से निकले लेकिन इतिहास के जीवंत प्रवाह नें पहले ही बंधे को तोड़ दिया और नाले के रूप में बह निकला। अब यह नाला ही सही पानी तो इसी नाले से हीबह रहा है। इस बहाने को मानसिक रूप से स्वीकार करने में आपको वक्त लगेगा।
             फिलहाल उनकी चिंता यह थी कि वे केजरीवाल की विचारधारा को किस परंपरा से जोड़ें !स्वाभाविक है कि टोपी के आधार पर वे इसे गांधी की परंपरा और कांग्रेस से जोड़ते तो कुमार विश्वास के मोदी प्रेम के आधार पर भाजपा से।  उन्होंने अंतिम निष्कर्ष यह निकाला कि वास्तव में यह अभी तक तो गांधी की परम्परा वाली कांग्रेस से ही जुड़ती है ,आगे भविष्य ही जाने। इसमें बहुत से मोटा वेतन पाने वाले लोग भी शामिल हैं ,इस आधार पर इसे पूंजीवाद का हरावल दस्ता भी माना जा सकता है-एक अन्य मित्र नें सुझाया । मैंने चुटकी ली कि जनमहकवि घाघ नें जो सूत्र दिया है वह तो "निषिद्ध चाकरी भीख निदान" वाला है- इस आधार पर तो सारे नौकरशाह भिखारी ही माने जाने चाहिए और इसी आधार पर सर्वहारा भी । वैसे भी उनका जीवन स्तर इतना खर्चीला तो होता ही है कि नौकरी छूटते ही भीख मांगने लगें। दूसरे कितना भी अधिक वेतन पाने वाला हो ,नौकरशाह होता है हिस्सा मध्यवर्ग का ही।
              बहस में यह भी बात सामने आई कि इस आंदोलन में बहुत से घटिया लोग भी महिमामंडित हो गए हैं। अगर केजरीवाल जन भावना के निमित्त के रूप में अपनी ऐतिहासिक  भूमिका को  नहीं पहचान पाए तो अन्य पार्टियों के नेताओं की तरह कुछ निकटवर्ती अवसरवादियों से घिर जाएंगे और उनका भी वाही हश्र होगा जो आज कांग्रेस और भाजपा का है। आप एक  इतिहास की एक स्वाभाविक उपस्थिति तभी बन पाएगा जब केजरीवाल भी आप को बहते पानी की तरह योग्य बुद्धिजीवियों के लिए एक ईमानदार  तटस्थ मंच के रूप में विकसित कर पाएंगे। कांग्रेस की स्थापना ह्यूम नें कि थी लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका ह्यूम की प्रत्याशा से काफी दूर निकला गयी। नदियों कि तरह आंदोलन भी इतिहास की अपनी जरुरत के अनुसार आतंरिक वेग से संचालित होते हैं। बहुत से लोग (अण्णा हजारे की तरह ) अपनी भूमिका निभाकर अप्रासंगिक होकर पीछे छूट सकते हैं ,लेकिन आप को एक वैकल्पिक मंच के रूप में योग्य राजनीतिज्ञों की तलाश जारी रखनी चाहिए। हो सकता है कि आप की कोई पिछली शानदार परंपरा नहीं हो। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जीवित इतिहास में उपस्थित वर्तमान का एक हिस्सा है  वह अतीत के अनुभवों से कम संचालित होकर भी यदि वर्त्तमान के अनुभवों और आवश्यकताओं से संचालित होता है तो -यह भी एक ऐतिहासिक भूमिका बनती है।


शनिवार, 25 जनवरी 2014

श्रद्धा का समाजशास्त्र !

तुमको जीना यथास्थिति को जीना  है
तुम्हारी भक्ति स्वीकृति है
दूसरों  की सत्ता की  अधीनता की
तुमको जीना
सहमति है पूर्ण यथास्थिति से
और पूरी तरह कर देना है स्थगित स्वयं को
दूसरों की इच्छा के सम्मान के पक्ष में
समर्पित होकरव्यक्तित्वहीन हो जाना है पूरी तरह.…

हे प्रभु (वर्ग)!
मैं असहमत हूँ
असंतुष्ट हूँ तुम्हारी बनायीं दुनिया से
इसलिए तुम मेरी अश्रद्धा के लिए
मुझे नरक (जेल ) देने की  मत सोचो।

आखिर मुझे भी तो अपनी दुनिया
रचने का अधिकार मिलना ही चाहिए
विकल्प रचने का अधिकार
अपने हिस्से की सृजनशीलता से



रविवार, 19 जनवरी 2014

मध्यवर्ग की भूमिका

सर्वहारा आधारित क्रान्ति की अवधारणा के कारण वामपन्थी क्रान्ति की दृष्टि से मध्यवर्ग की उपयोगिता एवं भूमिका नगण्य ही है .ज्ञानार्जन और बुद्धि -व्यवसाय में सबसे अधिक समय और जीवन का निवेश मध्य-वर्ग ही करता है .बौद्धिक विकास में लगे रहने के कारण वह बहुत ही कम अन्तराल के बाध्यकारी नेतृत्व का शिकार होता है .दूसरे शब्दों में कहें तो वह बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण नहीं बल्कि आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक कारणों से इतिहास में बाध्यकारी नेतृत्व को     स्वीकार करता है .सर्वाधिक प्रतिरोध और सजगता के कारण उसकी भूमिका को लेकर सबसे अधिक भर्तस्ना-पत्र लिखे गए हैं .उसके आत्म-विश्वास को तोड़ने एवं उसे विचलित करनें की कोशिशें हुई हैं .इसमें संदेह नहीं कि औसत,सन्दिग्ध एवं अस्पष्ट समझ की वह अनदेखी करता है .

                वस्तुतः मध्यवर्ग की अवधारणा का विकास पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों के विचारकों द्वारा प्रतिक्रांति एवं क्रांतिविरोध और अवरोध को समझने के लिए किया गया था। मध्यवर्ग के वर्ग-चरित्र और  रुझानों'प्रवृत्तियों और उसके मनोविज्ञान को  समझने की दिशा में मार्क्सवादी खेमा भी रूढ़ मुहावरों 'सरलीकरण और और विचारधारात्मक संभाव्यतावाद से आगे नहीं जा पाया है। स्वयं मार्क्सवादी विचारधारा सर्वहारा और पूंजीपति वर्ग ,उच्च और निम्न वर्ग के बारे में ही विस्तार से सोचती है। उसके थीसिस और एजेंडे में मध्यवर्ग की अधिक भूमिका नहीं थी। क्योंकि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रया में आनी थी  ंअध्यवर्ग मार्क्स के लिए भी क्रांतिकारी असंतोष की दृष्टि से शून्य और अनुपयोगी था।  वह बहुत कुछ दर्शक और तटस्थ जनसँख्या का हिस्सा था ,जो संगठित क्रांतिकारी शक्तियों का न  समर्थन करा सकता था और न विरोध !
             मध्यवर्ग को प्रायः उपभोक्ता वर्ग या समुदाय में देखने का नजरिया नजरिया भी ठीक नहीं है। क्योंकि वह बौद्धिक विकास और सृजनशीलता के प्रति समर्पित केंद्रीय जनसमूह है। चेतन एवं प्रशिक्षित होने के कारण उसमें सजग प्रतिरोध की क्षमता है। नेतृत्वकारी शक्तियों द्वारा उनका सहज अनुकूलन या अनुयायीकरण सम्भव नहीं है। इसी प्रतिरोध के कारन ही  नेतृत्व के अभिलाषी महत्वाकांक्षी  बुद्धिजीवियों के सहज अनुगामी नहीं बना सकते। 
            मध्यवर्ग की अब तक की भूमिका को देखते हुए जनवादी क्रांति के बाद भी नयी क्रांतिकारी व्यवस्था के संरक्षण में मध्यवर्ग की भूमिका के महत्वपूर्ण होने की सम्भावना देखी जा सकती है। उसका सृजनात्मक
एवं अग्रगामी असंतोष व्यवस्था के परिष्करण -परिवर्धन और गतिशीलता को बनाए रखा सकता है। 
              मार्क्सवादी विचारधारा की दृष्टि से समझने का प्रयास करें तो सामंतवाद कृषि-सभ्यता का पूंजीवादी व्यवस्था-प्रारूप है तो सामंतवाद कृषक-व्यवस्था का राजनीतिकृत तंत्र-प्रारूप है। कृषक व्यवस्था का पूंजीवाद  अनुवांशिकता के आधार पर भूमि-स्वामित्व की।  असमानता के आधार पर भूमिहीन के रूप में एक भिन्न प्रारूप वाले शोषित -सर्वहारा जन को जन्मा देता है। लेकिन दूसरी और  नैतिक मूल्य -व्यवस्था कृषक सभ्यता से उपजे  मानवीय सम्बन्धों की ही दें है। यही वह प्राथमिक अर्थतंत्र है,जिसके अभावों एवं अपर्याप्तताओं नें उस विनिमय-तंत्र का विकास किया है ,जिसे आज हैम बाजार-व्यवस्था के रूप में जानते हैं। यदि अवधारणा की शब्दावली के रूप में देखें तो पूंजी की गतिशीलता के आधार पर कृषि-सभ्यता को अचल या स्थिर-प्रकृति का पूंजीवाद और विनिमय आधारित पूंजीवाद को गतिशील या प्रवाही पूंजीवाद कहा  है। ऐसे में मार्क्सवाद का औद्योगिक पूंजीवाद ;जिसे मार्क्सवादी विचारधारा की दृष्टि से उत्पादक पूंजीवाद कहा जा सकता है।  मार्क्स नें अपनी क्रांति की अवधारणा में सामंती और औद्योगिक दोनों ही प्रकार के पूंजीवाद को शामिल किया है।  विनिमय आधारित प्रवाही पूंजीवाद के प्रति क्रांति सम्बन्धी अवधारणा देने की जरुरत उन्हें इसलिए नही पड़ी
कि तब तक वह सगठित और दैत्याकार रूप में विकसित नहीं  हुआ था।
               
        इस तरह  मध्यवर्ग के लिए पूंजीवादी व्यवस्था से निष्क्रमण और विद्रोह का कोई ठोस मनोवैज्ञानिक आर्थिक आधार नहीं बनता .इसलिए भी कि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रिया में आनी थी .लेनिन ने अवश्य ही सर्वहारा  सर्वहारा वर्ग के पक्ष में उसके नैतिक समर्थन और वर्गांतरण की परिकल्पना दी .
                    समाजशास्त्रीय और आर्थिक विकास की दृष्टि से देखें तो मध्यवर्ग एक यात्रा-शील स्थिति है .पूंजीवादी व्यवस्था में वैयक्तिक आर्थिक मुक्ति निम्न-वर्ग से निकलकर उच्च -वर्ग में शामिल हो जाने से ही सम्भव है .पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक निम्न वर्ग में जन्मे व्यक्ति के लिए निम्न वर्ग से बाहर निकल कर उच्च वर्ग में शामिल हो जाना ही चरम पुरुषार्थ है .उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा के साथ मध्य वर्ग का हर व्यक्ति वयक्तिक आर्थिक मुक्ति के एक सपने को जी रहा होता है .यह सपना पूंजीवादी व्यवस्था की सुरक्षा सम्बन्धी संरचनात्मक आश्वासनहीनता से पैदा होता है .पूंजीवादी व्यवस्था हर व्यक्ति को आर्थिक असुरक्षा की परिस्थितियों में डाल देती है .इस मनोविज्ञान के कारण एक अन्तहीनहोड़ का जन्म होता है .अस्तित्व की एक निर्मम प्रतिस्पर्धा पूंजीवाद को अमानवीय बनाती है .इसके विकल्प  में साम्यवाद
पूंजी के सामूहिक और साझे निर्माण और उपभोग की परिकल्पना देता है .देखा जय तो सामूहिक सृजनशीलता के आवाहन के कारण साम्यवाद को सामूहिक पूंजीवाद और पूंजीवाद को वैयक्तिक पूंजीवाद कहा जाना चाहिए .इस प्रकार साम्यवाद पूंजीवादी व्यवस्था का स्वर्ग है तो वैयक्तिक पूंजीवाद नरक .फिर प्रश्न उठता है कि भारतीय मध्यवर्ग अपने अधिकांश में साम्यवादी हिंसक क्रान्ति को अराजकता पूर्ण भयावह दुष्कल्पना के रूप में क्यों देखता है ? इसका कारण यही है  कि मार्क्स द्वारा प्रतिपादित साम्यवादी क्रान्ति की परिकल्पना में यहूदी धर्म की सांस्कृतिक असहिष्णुता और उनकी धार्मिक कथाओं में मिलने वाली बर्बर शुद्धता और उच्छेदवादी नरसंहारों का सांस्कृतिक अचेतन छिपा हुआ है .ऐसे में क्रांतिकारी बनना नायकत्व की मध्ययुगीन मानसिकता और परिकल्पना की भी विरासत है .अन्यथा जब सामूहिक पूंजीवादी सृजनशीलता तक ही जन-मानस को ले जाने की बात है तो ऐसे साम्यवाद को अहिंसक साम्यवाद के रूप में भी सामूहिक आर्थिक ,सामाजिक,राजनीतिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा के रूप में प्रचारित किया जा सकता है .इसके लिए सामूहिक पूंजी की सृजनशीलता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था-संरचनाएं और मानसिकता विकसित करनी होंगी .अपने हिंसक सांस्कृतिक अचेतन के कारण अठारहवी शताब्दी का परंपरागत मार्क्सवाद एक प्रतिक्रियाजीवी तनावपूर्ण असभ्य मानवीय समाज की रचना ही करेगा .  इस लिए मार्क्स के प्रति उचित श्रद्धांजलि तो यही होगी की साम्यवाद के भावी प्रारूप की खोज नए सिरे से सामूहिक पूंजीवाद की परिकल्पना के रूप में आधिक सभ्य ,शिष्ट ,स्वाभाविक और अहिंसक तरीके से किया जाय .संस्थागत या राजनीतिक क्रान्ति का एक पूंजीवादी तरीका यह भी हो सकता है कि सरकार हत्या करने की जगह मुद्रा या मुवावजा देकर सारी जमीने स्वयं खरीद ले .इसके बाद वह जन-जीवन के पुनर्नियोजन के लिए स्वतन्त्र हो जाएगी .मानव जाति के सुरक्षित अस्तित्व के लिए यह कार्य जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है .ऐसा न होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हो रहा है कि भवन व्यक्ति की आवश्यकता और संख्या के अनुसार,जरुरत के हिसाब से नहीं बनाए जा रहे हैं ,बल्कि पूंजी-प्रदर्शन और प्रतिष्ठा के अनुसार बनाए जा रहे है .इस कारण से बढ़ती जनसँख्या के विपरीत कृषि-योग्य भूमि निरन्तर ही कम होती जा रही है .अनियन्त्रित-अनियोजित स्थापत्य में शहरों का विकास आधुनिक युग की सबसे गम्भीर समस्या है ,जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है .
         अपनी इस दृष्टि के कारण समकालीन प्रगतिशील विचारक मुझे शैक्षणिक या ज्ञानात्मक अतीतीकरण के शिकार लगते हैं .यह एक परिकल्पनात्मक पिछड़ापन है ,जिसकी ओर स्वयं को प्रगतिशील होने का श्रेष्ठताबोध जीने वाले बुद्धिजीवियों का ध्यान ही नहीं जाता .उन्हें क्रन्तिकारी नायकत्व के मध्य-युगीन माडलों और उसकी महत्वकांक्षी स्वप्न्दर्शिता से बाहर निकालने में अभी वक्त लगेगा.


           विचारधाराओं को लेकर  अन्य महत्वपूर्ण समस्या यह है कि विचारधाराओं के प्रति स्मृति-संरक्षणवादी नजरिए के कारण अकादमिक एवं शैक्षणिक चिंतन प्रायः शुद्धतावादी ही होता है .प्रत्ययों से अति-परिचय के कारण कई बार शब्दावली या अभिव्यक्ति के स्तरपर वह मानवीय अप्रासंगिकता एवं निरर्थकता को पहचान नहीं पाता.उनका पुनरावर्ती प्रयोग करता रहता है .अवधारणात्मक संकल्पनाओं को कि बार सच न होते हुए भी सच के रूप में प्रस्तुत करता रहता है .इसे हम पिछली समझ के आधार-पृष्ठभूमि या पर्यावरण के रूप में भी देख सकते हैं .
     नए विचारों से अधिक महत्वपूर्ण सार्थक और निरापद विचारों का चयन एवं सृजनात्मक संयोजन कर एक परिस्कृत और अधिक गतिशील संभावनाओं वाली व्यवस्था कि खोज करना है .विचारधाराओं कि पूर्वाग्रह रहित पड़ताल जरुरी है .अलग-अलग सफल वैचारिक प्रारूपों एवं अनुभवों को व्यवस्था की आधारभूत संरचनाओं के निर्माण और विकास में इश्तेमाल करना होगा .दरअसल मानव समाज की जरूरतों के अनुसार वैचारिकी विकसित करने कि जरुरत है ,न कि वैचारिकी की पड़ताल एवं जरुरत के अनुसार मानव-समाज को अनुचित-अस्वाभाविक-अवैज्ञानिक रूप में दुष्प्रभावित करने की.उदहारण के लिए सब जानते हैं कि द्वंद्ववाद को मार्क्स नें हिगेल से लिया था और उसे साम्यवाद कि परिकल्पना के अनुसार पुनार्काल्पित किया .इस संसर्ग से सभ्यता कि वर्तमान सृजनशीलता
         एक व्यापक मानव-जाति के आर्थिक व्यव्हार को समझने और समझाने की दृष्टि से मार्क्स का विश्लेषण आधुनिक वैचारिकी को आधारिक सूत्र और दृष्टिया उपलब्ध करता है .क्योंकि संवेदनात्मक द्रष्टि से मार्क्सवाद के उद्देश्य की नैतिक पवित्रता असंदिग्ध है ;इस लिए उसके दार्शनिक पक्षों को भी निर्विवाद और अपरिवर्तनीय मन लिया जाता है .उसमे कुछ भी निरर्थक और अनावश्यक खोजना वर्ग-शत्रु का हमला भी हो सकता है .क्योंकि भारत में वह पश्चिम की पवित्र धरोहर है ,इसलिए भारतियों को यह अधिक स्वीकार्य होगा कि स्वयं पश्चिम ही उसमे परिवर्तन संशोधन करे .वैसे भी भारतीय मेधा संरक्षण वादी है .वह नई पहल में कम ही विश्वास करती है . मार्क्सवाद की दार्शनिकी में भी बहुत से परम्परा से अर्जित तत्व हैं -उनमें से एक हीगल से लिया गया द्वंद्ववाद भी है .यह विकास की सामाजिक प्रक्रियाओं का विचलित प्रत्ययीकरण करता है .रुढ़िवादी और विकासवादी शक्तियों के द्वंद्व को मानवीय और समाजशास्त्रीय रूप में भी समझने और समझाने की जरुरत है .वर्ग -स्वार्थ के मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण मार्क्स का मानव-जाति के इतिहास में आर्थिक प्रवृत्तियों और व्यव्हार का सूत्रीकरण प्रायः ठीक और प्रामाणिक है .लेकिन मेरा मानना है कि मनुष्य की ज्ञानात्मक प्रगतिशीलता से अधिक उसकी विकास विरोधी जड़ताओं और आदिमताओं को भी समझाने की जरुरत है .ऐसे में तो और भी जब जीनेटिक आधार वाली जड़ताएँ होने की वैज्ञानिक संभावनाएं बढ़ गई हैं .इसके बावजूद मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण सन्देश मानवीय व्यवस्था को यथास्थितिवादी स्वीकार की सामूहिक मानसिकता से बाहर निकालकर उसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की सृजनशीलता के दायरे में लाना है .प्राचीन धार्मिकों की तरह हमें ईश्वर और स्वर्ग का सृजन करने के स्थान पर वर्तमान मानवीय व्यवस्था को और मानवीय और निर्दोष बनाने पर विचार करना चाहिए .और इसके लिए मार्क्सवाद से भी अधिक महत्वपूर्ण है मार्क्स के बाद के मानवीय विकास की जटिलताओं को समझना .वर्तमान विश्व राजनीतिक नेतृत्व से आर्थिक नेतृत्व की ओर स्थानांतरित हो गया है .राजनीतिक संस्थाओं की तुलना में आर्थिक संस्थाएं मानव -सभ्यता की संरचनाओं को अधिक तीव्रता से प्रभावित कर रही हैं .विश्व प्रायः आर्थिक सक्रियताओं द्वारा अधिक रूपान्तरित हो रहा है .दूसरे शब्दों में विश्व राष्ट्रों से अधिक कंपनियों के उत्पादों से अधिक रूपान्तरित हो रहा है .क्योंकि यांत्रिक उत्पाद श्रम की प्रकृति को ही बदल दे रहे है 'इसलिए वर्ग-संरचना और उसकी मात्रात्मक उपस्थिति का स्वरूप भी बदला है .आज स्थानीय आर्थिक शोषण से अधिक प्रभावी अन्तर-राष्ट्रीय शोषण हो गया है .विषमता व्यक्ति और वर्ग स्तरीय ही नहीं बल्कि राष्ट्र स्तरीय और कंपनी स्तरीय भी है .बहुराष्ट्रीय होने के साथ-साथ कंपनियों का संगठनात्मक और जनसंख्यात्मक ढांचा विस्तृत हुआ और बढ़ा है .इस विषमता को भी मार्क्सवादी चिंतन के दायरे में लाना होगा .क्योंकि मार्क्सवाद साम्यवाद का पर्याय बन चूका है.

शनिवार, 18 जनवरी 2014

सभ्यता और शैतान

मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि
मैं  शैतान  होने पर पूरा विश्वास करता हूँ
मैं मानता हूँ कि ईश्वर भले ही मानवजाति   की
एक आदर्शवादी कल्पना हो
लेकिन शैतान तो वास्तव में है !

मैं चाहता हूँ कि जब सामने आकर कोई  बस रुके
निर्भया यह बिलकुल न सोचे कि
उसे   लेकर मेरे लिए लाया लाया है कोई देवदूत
वह यह भी सोचे कि
उसे मृत्यु और दुष्कर्म के देवता
शैतान नें भेजा होगा। ।
कि जनता अपने नेताओं  में छिपे
शैतानी मन्सूबों को  भी पढ़ना सीखे
द्वार खोलने से पहले सोच ले उसकी आहट

शैतान जो चिरंतन शत्रु है मानवजाति का
उसकी चूकों और चुनौतियों के पीछे है
उसके हिंसक काले बर्बर अतीत में है
उसकी सभ्यता और संस्कृति का
सर्वकालिक अचेतन है।

इसतरह मुझे शैतान के होने पर
उतना ही विश्वास है
जितना कि इस बात पर कि
ईश्वर का होना
मानव जाति  की आदर्शवादी कल्पना है
बात सिर्फ इतनी ही है कि मनुष्य चाहता है कि
वास्तव में   ईश्वर हो !

मैं नास्तिक नहीं हूँ
क्योंकि वैसे भी यह समय
पूंजीवादी व्यवस्था में  अराजक असुरक्षा का है
जहा सभी को उसकी अपनी समझ और सामर्थ्य पर
लड़ने ,जीतने और जीने के लिए छोड़ दिया गया है
इसतरह यह समय कहीं से भी मानवतावादी नहीं
सिर्फ सिरफिरे शैतान का है

जब तक चूक  और चुनौतियां है
म्रत्यु और जीवन की निरीहाताएं  हैं
शैतान बना रहेगा सिद्धान्त रूप में
जबतक मनुष्य का अप्रत्याशित आदमखोर व्यवहार है
उसके भीतर अपराधी प्रवृत्तयों के करक अनसुलझे जीन  हैं
शैतान की सैद्धांतिक सत्ता बनी रहेगी। …


बुधवार, 15 जनवरी 2014

द्वंद्व-युद्ध

जहाँ तक सम्भव हुआ है
मैंने उस बुराइयों की आत्मा का भी सम्मान किया है
इस  विश्वास के साथ कि
एक दिन वह अपनी ही घृणा और अहंकार के बोझ से थक जाएगा
समझ जाएगा एक दिन
युद्ध और जीतने की इच्छा की निरर्थकता
जिसमें  मेरी कभी भी दिलचस्पी नही रही है। .......

मैं तो बिना लड़े ही
उसे विजयी घोषित कर देने की योजना पर अमल करता रहा हूँ
इसलिए कि लड़ना कभी भी
मेरे जीवन की प्राथमिकता में नहीं था
वह सिर्फ इतनी सी बात से मुझसे चिढ़ता रहा है कि
उसकी इच्छा और योजना के अनुरूप
उसकी चुनौतियों और पुकार को अनसुना करते हुए
मैं उससे लड़ने उसकी ही शर्तों पर बहर क्यों नहीं  आया। ....

यह उसकी नाराजगी हो सकती है कि
मैं उसके खेल में शामिल क्यों नहीं हुआ !
कि मेरे हटाने के बाद उसे जीतने के लिए कुछ विशेष नहीं था
वह सिर्फ इतना नहीं जानता कि
सभी को अपने से बाहर देखने की आदत में निहित है
उसके शैतान होने का रहस्य
उसे नहीं मालूम है तो सिर्फ आत्मीयता की परिभाषा !

वह परायेपन की मुद्रा के साथ जीतना चाहता है
सारी दुनिया के साथ मुझे भी
जबकि मैं आत्मीयता से
उसे पता ही नहीं है शयद बाजारू होना
सारी चालाकियों के बावजूद सिर्फ धूर्त और आवारा होना है
और होना है घर से बेघर। ……

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

स्व-रुप

यह दुनिया जो एक मकड़ी के जाले की तरह है
और मैं भी हूँ उस जाले का एक तार
दूसरों से जुड़ा हुआ
जोड़ता हुआ दूसरों से
दूसरों से बंधा हुआ
बांधता  हुआ दूसरों को
मेरा हिलना हिलाता है दूसरों को
मेरा टूटना तोड़ देता है -
संवेदना के कोमल तार
इसी जले पर दौड़ती है समय की मकड़ी

मैं एक अदृश्य बुनावट का हिस्सा हूँ समाज की
मेरा होना सिर्फ अकेले का
अपनें असम्बद्ध एकांत में होना नहीं है
शायद इसीलिए जब मैं दूसरों को तोड़ता हूँ
स्वयं टूट जाता हूँ
जब मैं छोड़ता हूँ दूसरों को
स्वयं  छूट जाता हूँ
मेरी यात्रा एक सामूहिक यात्रा है सम्पूर्ण मानव -जाति की

शायद इसीलिए
मेरे सौभाग्य का  ईश्वर
मेरे मित्रों और मेरे चाहने वालों की
शुभकामनाओं से बना हुआ है
दूसरों को मुझसे मिलाने वाली ख़ुशी में रचा-बसा है
मेरी आत्मा का सच्चिदानन्द !

और मेरे दुर्भाग्य का शैतान भी
मुझे नापसन्द करने वालों की घृणा में छिपा हुआ है
उनकी अरुचि से बना हुआ है
मेरे निर्णयों के प्रति असहमतियों से बना है
मेरे अस्तित्व और सार्थकता का प्रतिपक्ष  …

मेरा अच्छा या बुरा होना
सिर्फ मेरे भीतर का ही
मेरे भीतर तक ही होना नहीं है।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

सच में ...

सच -मच ही वह एक  बड़ा आदमी नहीं था। लेकिन उसकी जिंदगी एक बड़े सपने के नाम समर्पित अवश्य थी। जीते-जी और अपनी मृत्यु के बाद भी वह स्वयं को एक बड़े सपने के स्मारक में बदल देना चाहता था।
        एक पुरानी सड़क ,जिसे सार्वजनिक निर्माण -विभाग नें पुराने समय की घुमावदार सदका को सीधी करते समय छोड़ दिया था -वहीं उसने मिटटी से थपथपाकर रची थी एक आदमकद कब्र।  नया हरा वस्त्र खरीद बाजार से और उसे  पुरे सम्मान -प्रदर्शन के साथ ढँक  दिया। सांध्यकालीन भ्रमण में मैंने उसे ऐसा करते देखा तो पूछा -"बाबा ! इसमें लाश तो किसी की  है नहीं फिर कब्र किसकी बना रहे हैं ?"
           उसने कहा -"सैय्यद  की।  सैय्यद  नें सपना दिया है कि उनके  लिए एक कब्र बनाकर उसमें बसा दो। "
मेरी तरह आस-पास के और लोगों नें भी देखा। किसी कि निजी जमीन पर कब्र नहीं बन रही थी। वह जो कह रहा था वह पूरी तरह उसी के अपने ईमान  पर ही टिका था  और उसकी सच्चाई के लिए भी वही जिम्मेदार था। दूसरे उसके सच के प्रति पूरी तरह उदासीन थे। आस-पास के ग्रामीणो नें अवश्य ही उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया और उसे पेशेवर माना।  शायद इसीलिए नए सैय्यद  के प्रति इलाके में आस्था का आभाव था।  कुछ इसलिए भी कि स्थानीय जनता के पास अपने सैय्यद  पहले से ही थे।  पुराने सैय्यद यद्यपि सड़क से दूर थे लेकिन स्थानीय जनता में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी।  राजमार्ग पर होने के कारण नए  सैय्यद  का प्रभाव-क्षेत्र
बाहर से आने वाले चालकों और सवारियों पर विशेष था। दुर्घटना और अश्रद्धा करने पर अनिष्ट के भय नें नए  सैय्यद को भी अपने ढंग से स्थापित करा दिया और उनकी मजार को अधिक भव्य करा दिया।
             वैसे भी डौडियाखेड़ा के खजाने कि तरह उसके दिमाग और दावे का ऐसा एक्स रे सम्भव नहीं था कि उसके सपनों की असलियत का पता लगाया जा सकता। मुख्य सड़क से हटकर उपेक्षित जगह पर बने होने के कारण सार्वजानिक निर्माण विभाग के कर्मचारियों और अधिकारीयों को उसकी अनधिकृत कब्र पर कोई आपत्ति नहीं थी।
                सड़क के किनारे दृष्टि सीमा में लोग सहसा एक जीती -जगती  कब्र देखकर डरने लगे। किसी भी पल हो सकने वाली दुर्घटना  से मृत्यु का नजदीकी रिश्ता तथा कब्र के स्वामी  की काल्पनिक अवमानना उनकी जेबों को ढीली  करने लगी थी। बहुत दिनों बाद लौटा तो देखा मैंने कि उस मजार की ऊंची दीवारें और भव्य छत जीवन को अब भी अपना हिस्सा देने के लिए डरा रहीं थीं। मजार का संस्थापक निर्माता सम्भवतः इस दुनिया में नहीं था। मजार का निर्माता बूढ़ा होकर स्वयं एक कब्र में बदल चूका था। जा लेटा था उसी स्वनिर्मित कब्र कि बगल में। अब उस मिटटी में सचमुच एक लाश थी। अब वह बिलकुल ही झूठा नहीं था। सड़क पर भीड़ बढ़ रही थी और उसी अनुपात में दुर्घटनाएं भी। अब लोग बहुत बड़ी संख्या में उसकी मजार पर सिजदा कर  रहे थे। उसका बड़ा होने का सपना पूरा हो चूका था। (सत्य घटना पर आधारित यह संस्मरण गुमनाम,उपेक्षित और अचर्चित कब्रों के नाम समर्पित हैं )
             

रविवार, 12 जनवरी 2014

एक गोपनीय विभागीय आख्या

कुछ -छोटी -छोटी अड़चनें हैं
एक मंदिर
एक मजार
जिनके कारण अक्सर ही
ट्रैफिक जाम हो जाया  करता है। … 

दो चेहरे वाला आदमी

मैं उस आदमी से परेशान हुँ
जिसे मैं अपना मित्र समझता था
और जिसने आज तक मेरे साथ कुछ भी बुरा नहीं किया है
न ही सोचा है
लेकिन मैंने दूसरों के साथ उसे पाया है बुरा सोचते

लेकिन जब मैं उसे
दूसरों के बारे में कुछ बुरा सोचते देखता हूँ
उससे घृणा  करने लगता हूँ
बनता है जब वह दूसरों का दुश्मन
मुझे वह अपना भी दुश्मन लगने लगता है

वह कई बार मुझसे पूछता है -
मैंने तो आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा  !
अपने इस मासूम अर्धसत्य के साथ
वह मुझे दुनिया का सबसे बुरा आदमी लगाने लगता है

इसे मैं ऐसे भी सोचना चाहता हूँ
कि किसी बुरे आदमी की बुराई का गवाह होना कितना बुरा है
जबकि वह दूसरों के लिए हमेशा नियम की बातें किया करता है
सिर्फ स्वयं को पूरी चालाकी के साथ
सारे नियम क़ानून से स्वयं को मुक्त और ऊपर समझता है

अपने आदर्शवादी चेहरे के बावजूद मेरी दृष्टि में
वह एक चतुर और सजग बेईमान है
ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आधा बेईमान हो और आधा ईमानदार
या किसी के लिए ईमानदार और किसी के लिए बेईमान

मेरी दृष्टि में बेईमानी सिर्फ किसी एक व्यव्हार में न होकर
पुरे स्वभाव और मानसिकता में होती है
कि दूसरों के बारे में बुरा सोचना भी एक हिंसा है
एक क्रूरता जो कि संवेदनशून्यता से जन्म लेती है

कि सिर्फ अपने ही बारे में सोचता हुआ
दूसरों के बारे में पूरी तरह उदासीन आदमी
एक बुरा आदमी हो सकता है
कि जो दूसरों के बारे में बुरा सोचे
उसे सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए एक अच्छा आदमी मानना
मुझे ही अपनी दृष्टि में एक बुरा आदमी बना देगा

जब वह दूसरों यानि समाज के लिए बुरा है
मेरे भी लिए एक बुरा आदमी है
सौहार्द के मानवीय पर्यावरण को दूषित करने वाला
व्यवहार की क्रूरता का प्रचारक
एक आत्मकेंद्रित और संवेदनशून्य बुरा आदमी !

मुझे अपनी मित्रता पर संदेह है
उस दो चेहरे वाले आदमी के साथ !

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

प्रेम-पारिभाषिकी

उजड़े हुए लोग कभी प्रेम नहीं कर पाते
उजड़े हुए लोग प्रायः अभिशप्त  होते  हैं दुनिया में कहीं भी न बस पाने के लिए
उजड़े हुए लोगों की कहीं भी कोई दुनिया नहीं होती
उजड़े हुए लोग कभी भी नहीं कर पाते किसी से प्रेम
उजड़े हुए लोग कभी भी उजड़ जेन की आशंकाओं को जीते रहते हैं ....

जबकि प्रेम करना सिर्फ आकांक्षा ही नहीं
एक आदत भी  है
हर पल के जीवन की आवृत्ति में
खोज है सुख और विश्वास के पर्यावरण की
बसने की बस्ती में

अनुभूति के एक पर्यावरण से
अनुभूति के दूसरे पर्यावरण में
जीवन के  स्थानांतरण के बाद
खोए हुए जीवन की तलाश है
जैसे कि माँ से पत्नी तक एक पुरुष की
या पिता से पति तक एक स्त्री की
प्रिय संबंधों का पुनरावर्तन है

प्रेम किसी अन्य अस्तित्व की
अपने  अस्तित्व में स्वीकृति है
आत्मीयता का उन्मुक्त आमंत्रण है
अपने होने का सहचर विस्तार है
केवल इसी अर्थ में प्रेमी होना एक स्वभाव भी है

कुछ लोग शिकारियों कि तरह
दूसरों के भीतर अपने हिस्से का प्रेम तलाशते हैं
और प्रेम के हत्यारे यानि बलात्कारी बन जाते है