बुधवार, 14 नवंबर 2018

आत्म कथा

मैं जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र था तो सोवियत रूस मे मार्क्सवादी नौकरशाही  के असफल होने के बावजूद सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद और भगतसिंह के अधूरे सपनों को पूरा करना चाहता था । इसी चक्कर मे देर तक शादी भी नहीं की एक बार देश सेवा के लिए विवेकानन्द की तरह घर छोड़ कर हमेशा के लिए निकल जाने की भी तैयारी कर ली धी ।(विवाह से पहले )। काफी मन्थन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सन्यासी जीवन आम गृहस्थो के लिए सही आदर्श नहीं  हो सकता । 
        लोकतंत्र की संरचनात्मक संभावनाओं को भीतर से समझने के लिए प्रबन्ध तन्त्र द्वारा संचालित अत्यंत  चर्चित बडे महाविद्यालय कमला नेहरू भौतिक एवं सामाजिक  विज्ञान संस्थान, सुलतानपुर की नौकरी छोड़कर उतार प्रदेश की राजकीय उच्च शिक्षा सेवा में आया ।पहली नियुक्ति तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश  यानि  उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद के भिकियासैण तहसील के अन्तर्गत स्यालदे घाटी स्थित राजकीय महाविद्यालय में हुई । वहाँ  समारोहक ,अनुशास्ता और राष्ट्रीय सेवा योजना के प्रभारी के रूप मे छात्रों के माध्यम से उस क्षेत्र में मैने जो महत्वपूर्ण कार्य कराए उसमें लगभग दस गावों को प्रभावित करने वाली, पहाड़ की चोटी पर गलत उंचाई पर लगाई गई 25000 गैलन की  पानी की टंकी को  इंजीनियर के निर्देशानुसार छात्रों के समूह द्वारा सही उंचाई पर उतरवाकर लगवाना, भूस्खलन  के  शिकार कई पहाड़ी गावो के सम्पर्क मार्ग की मरम्मत, पहाड़ काटकर स्कूल परिसरों का विस्तारीकरण जैसें महत्वपूर्ण कार्य कराकर विभाजन के उस दौर मे भी वहाँ की जनता से भी इतनी आत्मीयता और स्नेह प्राप्त कर चुका था कि बाद मे मैदानी संवर्ग मे होने के कारण मेरा जब शासन द्वारा युसुफपुर-मुहम्मदाबाद ,गाजीपुर के शहीद स्मारक राजकीय महाविद्यालय के लिए स्थानान्तरण हुआ तो वहाँ के स्थानीय नेताओं ने यह पता लगाने की असफल कोशिश की कि मेरा स्थानान्तरण रुकवाया जा सकता है क्या ?  मुझे  यह बताते हुए आनंद- स्मरण हो रहा है कि वहीं मुझे  एक अच्छे  समानधर्मी मित्र डाॅ सन्तोष मिश्र भी मिले जिन्होंने मेरी ही तरह रायबरेली के मैदानी क्षेत्र के होते हुए भी पहाड़ की जनता का काफी स्नेह और यश प्राप्त किया । समुद्र तल से 1300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्यालदे के महाविद्यालय मे मै एक नर्सरी और काफी लगवाएं गए पेड छोड़कर आया था ।  जनसेवा के अपने सक्रिय जीवन के कारण ही मैंने और मेरे माननीय अनुज सन्तोष मिश्र जी ने,जिनकी तैनाती आजकल हल्द्वानी में है, इतना स्नेह प्राप्त  तथा सार्थकता की अनुभूति देने वाला जीवन जिया है कि अब घरछोडुआ सन्यासी और क्रान्तिकारी न हो पाने का रंच मात्र भी मलाल नहीं रह गया है ।

( क्रमशः)

देवी

देवी

वह थकी हुई  है
शान्ति के लिए जा रही है
दुनिया के जंजालो से ऊब कर
विश्राम के लिए
पहाड़ के सबसे ऊंचे शिखर पर बसी
पत्थर की देवी के पास

अपनी स्वयं की रची हुई दुनिया
जिसे वह पीछे छोड आयी है
अब भी पुकार रही है उसे
किसी चुलबुले  बच्चे की तरह
बार- बार मचल कर घनघना रहा है
उसका मोबाइल फोन

क्या उसे पता होगा
कि सिरजनहार देवी की
वह  स्वयं भी है
एक साक्षात् प्रतिनिधि
जीवित प्रतिरूप !

रामप्रकाश कुशवाहा
17-10-2018