मंगलवार, 26 जून 2012

प्रेम-त्रासदी

उन दिनों प्रेमी का असितत्व और चेहरा
कहीं खोया हुआ था दुनिया की भीड़ के बीच
जिसकी अनथक तलाश करनी थी हमें
मित्रगण पिट रहे थे
और रात-रात भर जाग कर काट रहे थे अपना समय
प्रेम की असफल तलाश में...

उन दिनों सड़क पर प्रेम खोजने से अच्छा था
बन्द कमरे में बिस्तर पर लेटकर
की गयी प्रेम की कल्पनाएं ....
इस तरह हमारा काफी लम्बा समय 
प्रेम की प्रतीक्षा और उसकी तैयारियों में निकल गया

लम्बे समय तक हम यही तय नहीं कर पाये कि
हमें प्रेम करने की पहल करनी है
या करनी है किसी और द्वारा प्रेम में पहल की प्रतीक्षा.....
सड़कों पर लड़कियां कम थीं
और उनसे टकराने के अवसर और भी कम
या फिर ऐसी थीं जिन्हें कोर्इ भी
पसन्द करने से बचना चाहता था

निर्दोष चेहरे बहुत कम थे
और सच्चे और सही प्रेम की तलाश में
अपनी हार स्वीकार चुके मेरे मित्र
फिल्मी नायिकाओं के पोस्टरों से काम चला रहे थे
या फिर चुपके-वुपके यात्रा काते हुए भी टकरा जा रहे थे
एक ही पसन्द के चौराहे पर

कर्इ बार बाल-बाल बचे हम
हो सकने वाली भीषण टक्कर से
कर्इ बार मित्रों को सहलाते-समझााते और स्वस्थ करते रहे
प्रेम के भीषण टक्कर से हुर्इ नुकसान से......

कर्इ बार हम ऐसे अनुभव से गुजरे
जब कल्पना छिन गयी
और पूरी तरह जमीन पर आ गये हम
लेकिन बिना नाम-पता पूछे खो गयी चिटिठयों की तरह ही
खत्म हो गए प्रेम के ऐसे संभावित पड़ाव
तो कर्इ बार र्इष्र्या से बीमार मित्रों को बचाने के लिए
प्रेम के अवसरों का बहिष्कार कर आगे बढ़ गए हम

सच तो यह है कि प्रेम की तलाश में निकलना
मेरे लिए एक श्रमसाध्य और त्रासद अनुभव की तरह रहा
मैं एक युद्ध में फंसा था सामाजिक अपमान के
और मेरा अधिकांश समय उसके प्रतिकार की तैयारियों में नष्ट हो रहा था
मेरे लिए प्रेम में भटकने से अधिक महत्त्वपूर्ण था
मेरा उर्वर और सृजनात्मक मानसिक समय
मैं किसी भी प्रिय-अप्रिय अनुभव-क्षण के कालिक-विस्तार में फंसना नहीं चाहता था.....

अनितम निष्कर्ष यह कि
घर के भीतर रहने और उसे बाहर से देखने के अनुभव की तरह
जनसंख्या की आवृतित के साथ
प्रेम के वैकलिपक तलाश की दुविधा कर्इ बार बनी रहती है
सबके लिए संभव नहीं है मिल पाना वांछित और निर्विकल्प प्रेम

अनुभव के ऐसे ही एक विशेष क्षण में
मैंने उसे देखा
उसका होना एक अपरिहार्य विचार की तरह
छा रहा था मेरे मन-मसितष्क पर
मैंने उसके बारे में सोचा....और-और सोचा तथा
उसके विकल्पों के द्वन्द्व से बाहर निकलने की प्रतीक्षा की......
मैं उसे विचारों से बाहर निकालकर
जीवन में भी जीना चाहता था
मैंने सोचा और सोचा-उसके बारे में और सोचना
मेरे लिए एक पीड़ादायक विचार की तरह था
मैंने उसे अपने विचारों की दुनिया से निकाल बाहर किया
और वापस अपने पास लौट आया....
औसत प्रेम बाजार के किसी सामान को अपना बनाकर
उसे घर में बदल देने वाले अनुभव में पूरा होता है ।

कवियों के बारे में

यह कविता
कर्इ कवियों के व्यकितगत जीवन
के सर्वेक्षण पर आधारित
एक तथ्यात्मक विचार मात्र है !

सर्वेक्षण में अधिकांश कवि दूसरों के प्रति
सामान्य से अधिक शिकायतों से भरे थे
वे दूसरों के प्रति बहुत अधिक अपेक्षाओं से भरे थे
वैसे तो थे वे दुनिया के सबसे संवेदनशील प्राणी
दु:ख के तापमापी यन्त्र की तरह
डूबते-उतराते हुए अपने ही भीतर व्याप्त दु:ख में.....

अधिकांश कवि इतने आत्मकेनिद्रत थे कि
दूसरों के दु:ख के प्रति संवेदनशील और र्इमानदार रह पाना
उनके लिए संभव ही नहीं था.......
उनके असन्तोष का स्तर इतना अधिक था कि
उनके आस-पास के लोग
वंचित होते हुए भी सन्तुष्ट और सुखी होने की सीमा तक
चुपचाप जीना सीख गए थे....

अधिकांश कवि बहुत भीतर से
चालाक और सतर्क थे
लेकिन बाहर से वे बेवकूफ और बेकार 
प्रचारित हो गए थे
दूसरे शब्दों में वे मजाक के स्तर पर
कवि होने के लिए याद किए जाते थे......

अधिकांश कवि दूसरों के बारे में
सोचने के प्राय: अयोग्य होते हैं
लेकिन वे अपने बारे में इतनी गहरार्इ से सोचते हैें कि
उनका सोचना सबका सोचना बन जाता है 

सवेक्षण से यह भी पता वला कि
यधपि सारे कवि आत्मकेनिद्रत होते हैं
लेकिन उनका रोना इतनी दूर तक
दूसरों को सम्बोधित होता है कि
प्राय: उनके आत्मकेनिद्रत होने की ओर
हमारा ध्यान ही नहीं जाता....

दूसरे शब्दों में 
बचपन में सबसे ज्यादा रोने वाले बच्चों के
कवि होने की संभावना ज्यादा होती है....

अच्छे कवि इतना अच्छा रोते हैं कि
उनका रोना हमारे समय का
प्रामाणिक रोना बन जाता है....
इसतरह रोते हैं कि उनका रोना
सारी दुनिया का रोना बन जाता है ।

रविवार, 24 जून 2012

समय में कौए

(यह कविता आपातकाल के दिनों में ही स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से किए जा रहे माननीय प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन के साथ एक कौए का पाश्र्व स्वर गूंजने पर लिखी गयी थी । अधतन प्रासंगिकता के कारण डायरी के पन्नों से बाहर प्रकाशित देखना जरूरी लगा)


1.

टी0वी0 पर गूंज रही है उस कौए की कर्कश आवाज
(माननीय) प्रधानमंत्री जी के भाषण के साथ
हम सिर्फ उसे सुन सकते हैं उड़ा नहीं सकते
इस वक्त आवाज निकालकर या लगभग डांटते हुए
उसे उड़ा देना या चुप करा देना संवैधानिक शिष्टाचार के खिलाफ है...
प्रधानमंत्री भी उसे उड़ा नहीं सकते या फिर
किसी को उसे उड़ाने के लिए कह नहीं सकते....
वे अपना पूर्वलिखित भाषण पड़ रहे हैं
उसमें उस कौए के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है

कविता की भाषा से बाहर वास्तविकता में संभवत:
वह इतने अधिक मनुष्यों की चुप और शान्त उपसिथति को समझ नहीं पा रहा है
या फिर वह माननीय प्रधानमंत्री जी की एकल आवाज सेले रहा है होड़़
या फिर आतंकवादियों की किसी विध्वंसक साजिश की ओर
वह अपनी ही भाषा में कोर्इ जरूरी रहस्यमय संकेत करना चाहता हो

अंगरक्षक उस पर गोली भी नहीं चला सकते क्योंकि तब
कोए के साथ गोली की आवाज भी पूरे राष्ट्र में गूंज जाएगी
उसकी आवाज निर्णायक अनितम और अपरिहार्य है
वह अब हमारी पसन्द और नापसन्द से परे है
जाने क्या कुछ बोलता हुआ
उसे अब किसी का भी भय नहीं
उसे अभयदान मिल चुका है और अब वह निर्भय कौआ है
अब उसे ही यह तय करना है कि वह क्या कुछ
और कब तक बोलता रहे और कब उड़ जाए
चुने गए राजनीतिज्ञो के समानान्तर
अब वह एक संवैधानिक रूप से संरक्षित प्रतीकात्मक कौआ बनता जा रहा है

सीधे प्रसारण में राजनीतिज्ञों की तरह गूंज रही है उसकी आवाज
प्रिय या अप्रिय होने की चिन्ता से मुक्त
सत्ता द्वारा संरक्षित एक प्रतीकात्मक उपसिथति की तरहं....
जैसे वह आश्वस्त हो कि इस वक्त उसकी उपसिथति का
अब कोर्इ विकल्प नहीं है-वह बोल सकता है
 जो और जैसा चाहे......उसके सही या गलत होने के बावजूद
 लोगों को उसे सुनना ही पड़ेगा....


2.


व्यकितगत रूप से मुझे चुने गए राजनीतिज्ञ भी पसन्द नहीं थे
मैंने उन्हें अपना अमूल्य मत भी नहीं दिया था
वे जिन दलों के प्रत्याशी थे
उनके स्थानीय सदस्य और कार्यकर्ता भी उन्हें बिल्कुल नहीं जानते थे
कि वेे कौन हैं और क्या करना चाहते हैं
इसतरह वे एक अप्रत्याशित प्रत्याशी थे नेतृत्व के
व्यकितगत रूप से वे एक गूंगे प्रत्याशी की तरह थे जिनके साथ
लिखित आवाज के रूप में पार्टी का घोषणापत्र था...

मुझे कौए भी पसन्द नहीं हैं और नही उनकी कर्कश-कटु आवाज
मैंने उन्हें गौरैया के अंडों को बिना बच्चे बने ही फोड़कर
किसी आतंकवादी की तरह पी जाते देखा है
अपनी हिंसक प्रवृतित और संगठित व्यवहार के कारण
वे प्राय: गलत इतिहास पुरुषों जैसे ही होते हैं
जिन्हें समय की विडम्बनाओं के साथ सिर्फ सहा जाता है और सहना पड़ता है
मुझे तो समय के राजनीतिज्ञ भी कौओं जैसे ही लगे
जो शिशु हाथों की रोटियों की तरह
आम जन की भावनाएं एवं विचार छीनकर
व्यवहार और शब्दों तक पहुचने के पहले ही उड़ और उड़ा ले जाते हैं
इस तरह कौआ मेरे लिए मेरे जीवन और पर्यावरण की
बलात,हिंसक और अप्रिय उपसिथति एवं अवांछित समय है......



3.



समय और पर्यावरण में कौए
हर दिन-हर सुबह...हर शाम मेरे छत की मुंडेर पर
अपनी खुफिया आंखे लिए आ बैटता है
और फिर ध्वनि एवं विचार-प्रदूषण की तरह
घण्टों करता रहता है अपनी अपरिहार्यता की मुनादी
कुठ ऐसे कि खबरदार ! अपनी औकात से बाहर
जो कुछ भी सोचा तो.....

दूसरे दिन वह फिर आ जाता है
हलो ! कहकर व्यंग्य से मुस्कराता है
कुचर-कुचर करता हुआ डरावनी आवाज में फिर शुरू हो जाता है
लड़ाता और धमकाता है बहसें
एक ही बात को कर्इ-कर्इ माध्यमों से कर्इ-कर्इ बार
प्र्रसारित करवाता है-ऐसा है मेरा समय...वैसा है मेरा समय
कुछ ऐसा ही बार-बार दुहराता है

अपनी भददी आवाज की कर्कश धार से
चोंचों की मार से मेरे विचारों को लहूलुहान करता
छीन लेता है मेरे अन्तर में
अंकुरित होने के लिए छटपटाते
बीज जैसे हर नन्हें नए कोमल चूजे विचार....
वह मुझे पूर्ण सहमत देखना चाहता है
वही नहीं चाहता कि मेरे भीतर पल रहा हो कोर्इ
वैचारिक संभावना का वैकलिपक प्रतरोध
मेरे भीतर का विचार उसके सिद्धान्तत:
उसके सही ही होने के दावे को स्वीकार नहीं करता
जबकि वह पूरी ताकत के साथ मेरे मसितष्क में भी
अपने ही विचरों का उपनिवेश देखना चाहता है
वह मेरे प्रतिरोध पर क्षुब्ध आक्रोशित और आक्रामक है....

कहां मैं हूं गलत-मैं हाथ जोड़कर पूछना चाहता हूं उससे
और मेरे हर पूछनें के साथ उसकी खुली खोंच
किसी खूंखार सैनिक की निशाने पर तनी गन की तरह
विस्फोटक धमाकों में गूंजती रहती है खांव-खांव-खांव-खांव....
अब वह मुझसे शानित और व्यवस्था के अनुशासन के रूप में
पूर्ण स्थगन मांगने लगा है.....

शायद वह मुझे भी समझने लगा है आतंकवादी
ऊपर के किसी खुफिया निर्देश पर
जैसे कि उनके लोकतंत्र के असितत्व को भी हो खतरा
मेरे भूमिगत सृजनात्मक सपनों और मेरे आदर्श मानवतावाद से
बहुत ही खतरनाक क्रानितकारी है यह
करता है सम्पूर्ण मनुष्यता की बातें
किसी भी देश की सरकार को संकीर्ण वर्ग और आतंक समझता
अपने-आप को प्रतिबद्ध समुदायवादी समझता है मनुष्यता का
हर देश की पुलिस को रखनी चाहिए इस पर खुफिया नज़र
यह भयानक बुद्धि-अपराधी किसी भी देश के देश-भकित प्रचार को
एक मध्ययुगीन आदर्शवादी निष्ठा और
सारी मानवता के खिलाफ षडयन्त्र समझता है-घेर लो इसे !
कौओं का कमाण्डर कांव-काव चीखता हुआ
अपने सैनिकों को देता है निर्देश
जबकि मैं अभी भी नहीं डर रहा
उसकी भावनाओं की तात्कालिक वैधता का करता हुआ सम्मान
उसकी भी दृषिट पर सहानुभूति से विचार करता
भीतर अपनी असहमति छिपाए संवैधानिक लाचारी में ही सही
उसे पूरे सम्मान के साथ कांव-कांव नांव-नांव करने की देता हुआ सहमति ।ं
समय के कौए तो चीख रहे और तेज
सिर के बहुत पास तक लड़ाकू हेलिकाप्टरों-सा उतर आए
अपने ऊपर उनके भ्रमों से बुरी तरह परेशान
उनके आरोपों का प्रतिवाद करता
दोनों हाथ उठाए आत्मसमर्पण की मुद्रा में
मैं निकल आता बाहर...खुले मैदान में मुझे देखकर
और सतर्क हो जाता है कौओं का कमाण्डर
देता वह कौओं को जल्दी-जल्दी आदेश-निर्देश....

मैं कौंओं का एकतरफा बहरापन और
सिर्फ उन्हें बोलते सुनते रहनें की अपनी निरीह नियति पर क्षुब्ध
अपनी असहाय सिथति का आकलन कर
हाथ उठाकर चीखता-सा और असमय बोलने के अपने अपराध को
स्वीकार करता-सा निरपराध
अब भी कहता कि- हां ! मैंने फेंके थे विचारों के ढेले
इन्कार नहीं कर रहा....पर तुमनें भी चलार्इ कम बो(गो)लियां
मारे कम जन ? शानित और व्यवस्था का ले-लेकर नाम.....
हां ! मैं स्वीकारता कि फेंके थे ढेले विचरों के
अपने भीतर असहमति का करता दु:साहस
पर सब कुछ सिर्फ नागरिक होने के लिए....
झूठा नहीं नागरिक-देखता-सुनता-समझता-सोचता-चुनता हुआ
गुस्साता पर ढेलों से बार-बार खींचता हाथ
हां ! स्वीकारता कि लगे जो तुमको विचारों के ढेले.....
सबने तुमको गौरैया के अंडों को
फोड़-फोड़कर खा जाते देखा......

कौए तो शायद और गुस्सा हो उठे तबसे
लड़ाकू विमान की तरह आवाजों की बमबारी करते
मेरे सिर के ऊपर...नीचे तक मंडराते
और लो...यह उसनें अपनी दंभी हिंसक चोच भी मार दी
लोकतंत्र है तो क्या सत्ता के मद में...संगठन में...
बहुमत में है कौआ-कुछ ऐसे कि जैसे भरी सड़क पर
बरस रही लाठियां पुलिस की.....

और मैंने भी फिर उठा लिया है ढेला
गुस्साते कौओं पर....और चीखना कौओं का भी तेज हो गया
ढेले ऐसे विचारों के कि देश अभी आजाद नहीं हुआ
देह अगर आजाद हुआ तो और नहीं कुछ-
मन,बुद्धि ,विचार,भाव और कल्पना.......
पहचान रहा कि कहता तो स्वयं को दिल्ली का ही कौआ
पर लन्दन का....यदि होता कौआ दिल्ली का
पहचानता अपने लोगों को और विरुद्ध अपने ही हित के
नागरिकों को लोकतंत्र की उलट दिखाते
औरों का हिस्सा कुछ जन मिलकर खाते
अपनों का ही खाते—और उड़ाते ...और बीटते कौए
ये कौए तो दिल्ली में पर दिल्ली के भी नहीं
न्याय की भाषा में रचते अन्याय का विषाक्त इतिहास
कहने को ही अनुशासन और व्यवस्था के कर्ता
पर सच में तो भोग-रोग,शराब-साकी की डूब मचाते खूब अपहर्ता....

लगता ह ैअब और क्षुब्ध हैं कौए
मेरा अपने ही खिलाफ यह बड़-बड़ सुनकर
और तेज संगीनों जैसी हिलती उनकी चोंच....
उनकी बढ़ती कर्कश चीख के साथ
मेरा भी बढता जा रहा विचारक गुस्सा
देख रहे हाथें में क्या है मेरे
यह ढेले जो बंधे हुए से शब्द तीखे विचारधार किनारों वाले
खींचकर मारूंगा मैं भी यदि चुप नहीं हुए तो
तू तो केवल चयनित घोषित वुद्धिमान मात्र है समझदार नहीं है
अर्थ की अनर्थकारी इतिहास की विडम्बना से चयनित
चयनक को तू मूर्ख समझता और बनाता.....

वैसे ही तो मैं भी नागरिक जैसे तुम
मैं अब भी वापस न लेता कहता यह
हौए हो तुम कौए-जो भटके इतिहास-समय में
रोटियां खोदते श्रमजीवी जन की न फुरसत का लाभ उठाकर
सिर,कन्धे और पीठ नोचते
कांव-कांव से भरते आसमान
क्षितिज तक धौंस जमाते...तनिक नहीं शरमाते
सेवा के अवसर में सत्ता-मदमाते...

शुक्रवार, 22 जून 2012

जीवनोत्तर विमर्श.....


जीवनोत्तर विमर्श.....

मैं एक देह हूं जिन्दा फिर भी
मेरी चिन्ता यह कि मेरी मृत्यु के पश्चात
विचारपूर्ण ढंग से मेरी देह के साथ
होना कैसा चाहिए अच्छा कि्रया-कर्म.....

पहला विचार तो यह कि
क्या ही अच्छा होता यदि मैं ऐसे ही
खुली हवा में छोड़ दिया जाता मरनें पर
दूर-दूर तक धरती होती...आसमान भी ऊपर
और कोर्इ मनुष्य न होता(अ)शानित के लिए......

तब भी मरा सड़ जाना तो तय है-जानते हैं जीववैज्ञानिक
कि भोजन हूं तो मैं भी-कि बच्चे ! गिद्ध और कौओं से
यदि तुम बच भी जाते हो तो
हमारे जाने-पहचाने कीटाणुओं से बच भी पाओगे कैसे !
तो न बचूं-मेरा जाता ही क्या जो
छोड़ चला जाने पर कोर्इ ले-ले !
जीवन भर मैं खाता रहा जीव-सम्पदा
मरनें पर वे खा जायं तो ही है अच्छा !

यह तो अच्छा ही रहेगा
सहमत भी होता-सा पाता हूं
किसी भी भूखे का भोजन बन जाना सबसे अच्छा
लेकिन मैंने सुना कि नहीं कहीं ऐसा है निर्जन
जहां नहीं मनुष्य दूसरा दूर-दूर तक
यह भी कि ये कीटाणु बहुत होते हैं गन्दे
खाते समय सड़ा-सड़ाकर फलाते हैं दुर्गन्धों को
ते यह जिन्दा मनुष्य की घ्राणेनिद्रयों के
होगा विरुद्ध तो निश्चय ही विद्रोह जो होगा नहीं बचूंगा
डाक्टरगण भी सहमत होंगे निश्चय
नहीं सह सकेगे तो नष्ट के लिए
हिन्दू हाथ जला ही देंगे
और मुसलमान जो मुझे ढक देंगे कब्र में और र्इसार्इ
तो ऐसे ही बच पाएंगे सड़ने वाले संकट से वे......

लेकिन मजा तो ऐसे में ही आएगा कि
जैसे भी इस समय सोचकर आ रहा मजा अब से ही
कि सोचूं कि यह धरती भी मौत से
होगी हिन्दू या मुसलमान-र्इसार्इ.....

जलते हुए आग के गोलों से ठंडी हो निकली धरती
जन्म से तो हिन्दू ही है विश्वासों में
दशरथ को फल दाता राम-पिता भी अगिन महोदय ही थे
जीवन का जो कुछ भी सब निकला है आग से-
वैज्ञानिकों का समर्थन दिलाते हिन्दू होंगे खुश.......

पर मेरी तो चिन्ता ही दूसरी
यदि धरती की मौत भी होगी
तो वह मरेगी मौत कौन-सी !
हिन्दू की या मुसलमान सरीखी ?
क्या वह किसी जलते सूरज में जाकर जल जाएगी !
या वह ठंडी होते-होते जीवन का ही बन जाए्रगी कब्र ?
जे भी हो निकली तो वह है आग से ही
फिर तो मैं अत्यन्त हो रहा हुलसित
मुसलमान और र्इसार्इ के पूर्वज जीवन-अणु भी आग-पुत्र हैं
मरें मौत चाहे जो.....

फिर तो यह भी सोच लिया कि
हर हिन्दू या सिक्ख-र्इसार्इ
मुसलमान,पारसी,बौद्ध-जन
और सभी माक्र्सीय नासित-जन
सिद्धान्तत: सब ही हैं जन्म से हिन्दू
और प्रश्न मौत धरती की तो
यह धरती यदि
फिर आग के गोलों में ही लय न हुर्इ
ठंडी हो गयी कब्र सरीखी
त्ब तो सारे हिन्दू भी मौत मरेंगेे
मुसलमान और र्इसार्इ ही की
पर यदि मैं हिन्दू होता तो
सोच-सोचकर ख्ुश यह होता
क्योंकि यह दुनिया तो मरनी है एटम बम से ही
फिर तो कोर्इ धर्म-जाति हो
सब मनुष्य-जन मरेंगे निश्चय
एक हिन्दू की ही मौत !
   

पिता-अपराध सो-च-ते हुए....

तुम डर रहे हो
क्योंकि तुम्हें डरते रहने के लिए कहा गया था
इसके पहले कि तुम स्वयं कुछ सोचो और रचो
तुम्हें भी सौंपी गयी थी एक दुनिया
पहले से भी रची और सोची गयी ।

तुम सुविधाओं में और सुरक्षाओं में पले हो
तुम्हें जहरीले पौधों और जन्तुओं की पहचान करायी गयी है
तुम्हें सौंपी गयी हैं अनेक अव्याख्यायित वर्जनाएं
ताकि तुम उन्हें समझ पाने तक बचे रह सको....
इसतरह तुम एक उत्पाद हो पिछली पिता-पीढ़ी की समझदारी के......
तुमने जीने की आदतें सीखी हैं और कला
तुमनें डर सीखें हैं और दूसरों द्वारा विरासत में मिले हुए विश्वास.....

तुम कल तक बच्चे थे और आज बनने जा रहे हो पिता
तुम एक अवसर हो डरनें और न डरने के नए चयन के लिए
तुम एक जैविक पिता ही नहीं हो
तुम एक सांस्कृतिक और साभ्यतिक पिता भी हो
एक दुर्लभ अवसर हो नए आरम्भ के लिए.......

उठो ! यह तुम्हारे सोने का वक्त नहीं है ,सोचने का है
बहुत हो लिया अब अपने छत के ऊपर
खुली हवा में निकल आओ
यदि छत न हो ता मैदान में......

सबसे पहले अपने नाम के बारे में सोचना है तुम्हें
और यह किसी भी भाषा का हो सकता है शब्द
इसे संज्ञा भी कहते हैं.....

संज्ञा हर भाषा के वे शब्द होते हैं
जो दूसरी भाषाओं में भी जाकर बनें रहते हैं अपरिवर्तनीय
जिनका नहीं किया जा सकता कोर्इ अनुवाद
ये शब्द आते-जाते हैं बस उधार यूं ही...ऐसे ही
देश और भाषा से पक्षिओं सरीखे
जन-जन से ज्यों पेड़-पेड़ से उड़ते रहते और बैठते.....

अब सोचो - तुम क्यों हो राम !
यधपि यह है ही सहज पर बात कठिन
हालांकि है भाषा की ही समस्या
कि तुम्हें राम ही क्यों कहा गया ?
जबकि पीटर ,डैनी ,रहीम,करीम-करीमन कुछ भी
कहा जा सकता था.....

अब सोचो कितने वर्ष उम्र है तुम्हारी
पांच वर्ष ! दस वर्ष ? बीस ? पच्चीस ? पचास ?
अच्छा तो तुम चालीस वषोर्ं से हो हिन्दू
और तुम पचास साल से मुसलमान
पर इतना ही नहीं
दस वर्ष पहले जन्में बच्चे को
बिना पूछे ही उससे तुमनें उसे बना रखा है हिन्दू ?
उसनें मुसलमान आठ वषोर्ं से
पांच वर्ष से उसनें सिक्ख 
ऐसे ही और-और.....

आखिर तुम हो कौन
होते कौन हो
किसी के होने के ऊपर
अपना होना थोप रहे जो !

श्रीमान मियां और पंडित जी !
पूछा तो नहीं था आप-आपने अपने-अपने बच्चों से
कि तुम जन्म लेना चाहते हो या नहीं !
तुम हिन्दू बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम गोरा या काला,अफ्रीकन या बि्रटिश बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम अमुक भाषा-भाषी या देश होना चाहते हो या नहीं -
वैसे ही जैसे तुमसे नहीं पूछा था तुम्हारे पिताओं नें
हिन्दू या मुसलमान,हिन्दी-उदर्ू या तमिल बनाते हुए.......

यधपि आप हैं और होते हुए भी पिता
बिना पूछे स्वयं को उसका अपना पिता बताकर
उसकी नन्ही पीठ पर लद जाने वाले
उसके मन-मसितष्क पर संकीर्ण असिमताओं की इबारत लिख देने वाले....
जबकि हर पिता अपनी सन्तान के साथ
उसके जन्म के साथ ही कर देता है
एक प्राकृतिक अपराध
बिना पूछे एक नए मनुष्य जीवन को धरती पर लाकर
अपनी वासना और कामना की आड़ में
किसी निरीह शिकार की तरह घायल प्शु-सा पटक देना
रोग-शोक,दु:ख और मृत्यु की युद्धभूमि में
एक असमाप्त और अन्तहीन लड़ार्इ लड़ने के लिए.....

हां-हां महोदय ! पितृ-ऋण नहीं
पिता-एक प्राकृतिक अपराधी सन्तान का
भुगते जो उसके पालन-पोषण की सजा
सजा पूरी हो क्षमा मिल जाने तक.....

हां-हां महोदय । यह होगा आपका अपराध
एक पुत्र को जन्म देना या पुत्री को
उतना ही जितना एक रूत्री की बिना सहमति के
किए सम्पर्क पर होने वाली सार्वजनिक भत्र्सना बलात्कार की !

कि एक मानव-शिशु हमेशा ही होता है-
एक प्राकृतिक बलात्कार का शिकार और परिणाम
चहे वह विवाहित दम्पति से जन्मा हो या फिर अवैध सम्बन्ध से....
दूसरा बलात्कार कि उसको दे दिया एक नाम
तीसरा कि बिना पूछे ही उससे दे दिया एक धर्म
और उसका पिता होने का करते हुए दुरुपयोग
लगे पीटनेढालने उसे आतंकवादी अनुशासन में
अपनी सनकों की शिक्षा का पाठ पढ़ाते हुए
अपने र्इश्वर और खुदा को भी बुला लिया
अपने बलात्कार के परिणाम से अपने होने का 
अनधिकृत हिस्सा मांगने....
जाओ पिता ! अब भी समय है कि
उसके उगनें में हस्तक्षेप न करते हुए
संकीर्णताओं से परे की उदारता के साथ
उसे फूलने-फलने और विकसने दो
होने दो मनुष्य-उसे छोटा मत समझो
मत बनाओं उसे अपने अहंकार का चौकीदार
बौनसार्इ या फिर निजी जागीर उसे
क्योंकि वह ह ैअब तक के सम्पूर्ण मानव-जाति के वैशिवक
उत्तराधिकार में मिले अनुभवों और सूचनाओं से समृद्ध
तुम तक बूढ़ी हुर्इ मानव-जाति का सहज उत्तराधिकारी !
तुम्हारा शिशु होते हुए भी अब तक की सभ्यता का
तुमसे भी बूढ़ा सदस्य मनुष्य होगा वह
वह ज्ञान-वृद्ध शिशु !

जाओ पिता ! और मांगो उस नवजात मनुष्य से
घुटने टेककर,उसके मस्मत को चूमते हुए मांगो क्षमा
यदि तुम मां भी हो चाहे
यदि तुम पिता भी हो चाहे
यदि तुम र्इश्वर,खुदा या गाड भी हो चाहे......

उसे चूमो ! उसे पुकारो ! और उससे मांगों क्षमा
उसके साथ खेलते और उसे प्रसन्न करते हुए
उसके लिए दूध और रोटियों की खोज में
भटको सारी धरती !

और यह मत भूलो कि
एक जिन्दा मनुष्य की हत्या कर देने से
अधिक भयानक पाप है
एक नए मनुष्य के जीवन को
उसकी इच्छा के विरुद्ध बिना पूछे इस धरती पर
भूख ,रोग और संकटों से लड़ने के लिए बुला लेना.....

उसके सामने टेककर घुटनें
उससे मांगते हुए क्षमा
उसे धीरे से अपनी बाहों में उठाओ !
शायद वह हंस दे और तुम्हारी सजा
पूरी तरह माफ कर दी जाय......






कि आयेगी सरकार.....

   
लोकतंत्र की मौज मनाती हस्ती जड़,
और तंत्र का शोक मनाती बस्ती जड़
इतने जड़ कि जैसे नदी किनारे बिखरे पत्थर
इतने जड़ कि जितना मौन पहाड़......
अन्तहीन प्रतीक्षा में सोयी अलसायी.......

पहले जैसे कि वे देख रहे होते थे
सूना आसमान कि
आयेगी बरसात और बादल.......

कुछ वैसे ही
हां कुछ वैसे ही
जैसे आने वाली होती है बारात
नहीं गयी आदत जो
वह अलाव संस्कृति
घोर प्रतीक्षा की सूनी पत्तलें बिछाए
धैर्य-धीर से
कि आयेगी सरकार
कि कर देगी सब काम
कि डाक्टर और मजदूर बनकर
हाथ पर हाथ धरे बैठे
हो जायेगा काया पलट
बन जायेंगे रास्ते -मकान
खुल जायेंगे बन्द दरवाजे और
बन्द खिड़कियां सुख की
कि आयेगी सरकार
जैसे नहर में पानी
जैसे बिजली,जैसे सड़क
जैसे गर्मी और बरसात......





शुक्रवार, 15 जून 2012

नीत्शे को पढ़ते हुए


जीवन और मृत्यु-चिन्तन.....

      (नीत्शे को पढ़ते हुए )




1.


स्वयं को जीनें की स्वतंत्रता
अपनें असितत्व में उपसिथत  जीवन-विवेक
क्षत-विक्षत हो जाता है संवेदना की सुनामी से....
फर्क है नि:संग मै और सम्बद्ध मै में
कि केवल आत्मस्थ होना स्वस्थ होना नहीं है
न ही अकेली इयत्ता
सहजीवन की सम्पूर्ण इयत्ता ही हो सकती है

संभव है कि हमारा पर्यावरण समय
जो कि बना हुआ है दूसरों की इच्छाओं से
हमेशा ही हमारे अनुकूल न हो
कि नियति
दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करनें की भी हो सकती है
हो सकता है दूसरों की साजिशों के रूप में भी......

कि कभी-कभी नियतिवादी होना
दूसरों की अनुचित इच्छाओं और
अपराधी समय का सम्मान करना भी हो सकता हैं
तो कभी प्रेम में सहते जाना किसी की बेहूदगी
कि नियतिवादी होना
किसी शिकार की प्रतीक्षा में बैठे शिकारी की
रोमांचित प्रतीक्षा में भी घटित हो सकता है
या फिर किसी आलसी की अन्तहीन प्रतीक्षा में....

स्वयं को जीना जरूरी है
और जरूरी है स्वयं को जानना भीै
कि असितत्व में जीना
अभी-अभी के प्रवहमान वर्तमान में जीना
नहीं जीना है भूत और भविष्य की कल्पनाओं को
जरूरी है ऐसा जीना इतिहास से बाहर रहने के लिए
और रचनें के लिए एक नया इतिहास भी....
कि ऐसा जीना समयातीत आदतों के प्रति
समय में जीते मनुष्य की सजगता है

क्या नीत्शे कभी भी नहीं जान पाया होगा
किसी मेले के सुखकर रहस्य !


2.


दौड़.....कैसी दौड
कहां तक की दौड़
किसकी दौड़
इस अनजाने धावकों की भीड़ में
एक-दूसरे को पीछे छोड़ते हुए
आगे जानें वालों का सच ही कोर्इ लक्ष्य भी है क्या !
शायद नहीं ! कौन कहता है कि
ये सारे नक्षत्र
सूरज-चांद-सितारे
हमारी धरती के इर्द-गिर्द नहीं घूमते !
कहां घूमती है धरती
सूरज के चारों ओर
सूरज ही तो घूमता है !
आज चाहे मानव-जाति की युगों से आ रही धारणा
भ्रम सिद्ध हो चुकी हो
किन्तु उसकी प्रवृतितयां
इस संसार के प्रति अब भी वही हैं

संसार में अपनी अनिर्वचनीय महत्ता का
प्रतिपादन करता हुआ
हर व्यकित
यही तो सोचता है
स्ांसार मात्र उसी के लिए है
उसकी अनुपसिथति में अधूरे-अपूर्ण
सारहीन-निरर्थक-गतिहीन
और एक दिन समय उसे धीरे से
अंधेरे कोनें में छोड़कर चल देता है ।


मौत नहीं असितत्वहीनता कहो
इस अनन्त शून्यवत यात्रा में
कौन-सा बिन्दु उसके प्रारम्भ का है
और कौन-सा अन्त का
कौन कह सकता है जीवन की यह यात्राा
अनसितत्व से असितत्वहीनता तक ही तो है?
किन्तु -फिर भी कितना धूर्त हूं मैं
तब जबकि मैं इस अनन्त सृषिट के
शाश्वत मैं का वाहक बना
रातोंरात कितना स्वार्थी बन बैटा मैं
वह मैं  जो मेरी इच्छा का नहीं
जिसकी इच्छा का मैं परिणाम था
उसे मैंने बांध लेने का हास्यास्पद प्रयास किया
हमेशा के लिए अपनें-आप से
और जिन प्रयत्नों में लगा हुआ
मैंने गुजार दी अपनी दुर्लभ यात्रा
कुछ भी कहां देखा-
मेरी दुष्कृत्यों में डूबी हुर्इ आंखों के सामने
चाहे हिम आये या हरीतिमा
मनोरम स्वर छलके या सौन्दर्य
कुछ भी नहीं देखा मैंने
तब स्वाथोर्ं में लिप्त मैंने सोचा था कि
ये दृश्य अनन्त काल तक यूं ही भटकते रहेंगे मेरे लिए
ल्ेकिन तब
मुझे क्या पता था कि
एक दिन समय मुझसे दृश्यों को नहीं
आंखें ही छीन लेगा
और जिस मैं से आत्मसात अभिन्न हुआ मैं
विराट मैं का वहन करता हुआ
एक दिन कुचल दिया गया
छल दिया गया
वह मैं जो कुछ ही क्षण के लिए
मुझे भिगोकर ओत-प्रोतकर देनें के लिए था
जानें कब छोड़कर मुझे जानें कहां
और मूंद ली मैंने भयभीत होकर अपनी आंखें
चीख पड़ा-
मौत छीन रहा है मेरा जीवन
और मुस्कराता हुआ वह
मुझे बुझाकर आगे बढ़ गया
मौत नहीं असितत्वहीनता कहो
जो जीवन के पहले भी सत्य था और बाद में भी.....


3.


असितत्व महत्वपूर्ण है
फिर भी मैं अपनें होनें को
दूसरों की हिकारत भरी आंखों से देखना चाहता हूं
समझना चाहता हूं दूसरों की श्रेष्ठता
घृणा और र्इष्र्या का मतलब
मैं समझना चाहता हूं स्वयं को
हंसना चाहता हूं स्वयं पर
पूरे उपहास के साथ
कि वह क्या है जो मुझसे
मेरे नीच और घटिया होने का अभिनय मांगती है
मैं समझना चाहता हूं
अपने विरुद्ध दूसरों के सुख का मतलब....
दूसरों से जुड़ते ही क्यों लगता है कि
वे अपनी मानसिकता लादना चाहते हैं मेरे वजूद पर
कभी-कभी तो पागलपन भी !
कभी-कभी तो लगता है कि
उनकी गोल से छूटकर निकल भागते ही
उनका खेल खत्म हो जाएगा....
दूसरों पर लदे हुए लोग
गिरकर ही जान सकेगे अपना भार....

एक दूसरे पर बिना लदे हुए
जीवन जीनें की सहचर स्वतंत्रता के साथ
फैल नहीं सकता क्या संक्रमण मुस्कान का !

मैं शुभ नहीं अशुभ
सौन्दर्य नहीं विद्रूपता मांगता हूं
सुख नहीं दु:ख की मांग करता हूं मैं
जितना दे सकता हो तू मुझे दे-
वह सब जो तेरा पाप हो
वह सारा जितना तेरा नरक होे
कि तू खुश रहे और बदल जाये एक दिन
कि तू जान सके कि संवेदनशीलता के तार
असंम्बद्ध आंखों को भी रुला देती हैं
कि आत्मीयता और संवेदनशीलता के हर क्षण में
दूसरों का दु:ख भी अपना दु:ख बन जाता है
कि दूसरों को कष्ट से बचानें और
सुखी बनाने के लिए जिया गया दु:ख भी
सुख और सन्तोष का एक अर्थ पा जाता है.....

यधपि दु:खों के अनुभव और वयस्कता नें मुझे पथरा दिया है
फिर भी मैं एक बार फिर रोना चाहता हूंं
दे दो मुझे मेरा आंसू
जो जाने-अनजाने में
तुझ तक फेंक दिया था मैंने
कल का अस्वीकार हुआ दर्द
आज मैं पुन: मांगता हूं तुमसे
इस संसार-समुद्र की भीषण जन-कोलाहल से
थोड़ा भी नहीं बवना चाहता मैं !
किसी भी लहर के थपेड़े से
नहीं बचाना चाहता अपनें जीवन की नाव........
कल तक रोता हुआ मैं
आज सच ही कितना गरीब हो गया हंू
आज न मेरे पास
डरने के लिए कोर्इ भय है
न चीखने के लिए कोर्इ दर्द ही
फिर वेगों-संवेगों से परे
ऐसा स्तब्ध जीवन लेकर
मैं करूंगा भी क्या ?

मैं जानता हूं कि कइयों की तरह
मुझे भी जीवन में
अपमान के इतनें सारे अनुभवों के बाद
एक दिन सम्मानित होना भी
किसी के प्रायशिचत के बोध की तरह
अपमान से भर जाएगा.....

इसे कोर्इ भी जानना चाहे जान सकता है
मैं सौन्दर्य में नहीं कीचड़ों में पला हूं
पुण्य नहीं पाप में पला हूं
स्वर्ग नहीं नरक में जन्मा
सुख नहीं दु:ख में जीता हुआ प्राणी हूं मैं
फिर तुम्हारा सुख,सौन्दर्य और स्वर्ग
मेरे किस काम का !


गुरुवार, 14 जून 2012

कुछ कविताएं

एक भावी प्रधानमंत्री की आत्म-विज्ञपित


मैं प्रधानमंत्री हो सकता हूं
जैसे कि कोर्इ भी हो सकता है प्रधानमंत्री.......

मैं प्रधानमंत्री हो भी सकता हूं और नहीं भी
मैं प्रधानमंत्री हो सकता हूं यदि मैं
भ्ूातपूर्व प्रधानमंत्री का निजी सचिव -
यानि चपरासी भी होता..............

मैं प्रधानमंत्री हो सकता था
यदि कैमरे भूतपूर्व प्रधानमंत्री से मिलने के लिएं
पहले मुझसे उनसे मिलने का समय
और पता पूछते होते..........
मैं प्रधानमंत्री बन सकता था-
यदि पहले मैं दिखलार्इ पड़ता फिर प्रधानमंत्री.........

यदि प्रधानमंत्री मेरे कानों में कुछ कहकर मुस्कराते होते
चाहे वे धीरे से यही पूछते होते कि
तूने मेरी बीबी को गोलगप्पे खिलाये या नहीं ?
कि इतना सुनते ही कैमरों के कान खड़े हो जाते
फलैशों में मच जाती सुनसुनी
कि जब प्रधानमंत्री उससे पूछकर ही प्रधानमंत्री प्रधानमत्री होते तो
फिर वही यानि कि मैं ही अगला प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता-सा......

तो मैं प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकता
मुझे प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनना चाहिए.........
जबकिे प्रधानमंत्री बनना इतना आसान कि
प्रधानमंत्री से हंसी-मजाक करने वाला भी
बन सकता हुआ हंसते-हंसते प्रधानमंत्री
                                                
एक चौंकाते मजाक में कुछ ऐसे कि -लो!तुझे प्रधानमंत्री किया !
या सेवा निवृत्त होते प्रधानमंत्री का निजी जासूस भी........

पुस्तकानुसार मतदान के ठीक पहले तक
सभी ही हो सकते प्रधानमत्री-से
शराब पीते या फिर भीख मांगते हुए भी-सिद्धान्तत:
मतदान के बाद सड़क के किनारे ठेले पर सब्जी बेचने वाले को तो
होना भी नहीं चाहिए कभी भी देश का प्रधानमंत्री
मैं भी चुनकर कभी नहीं जो हूं अल्पसंख्यक जाति से
पढ़ा-लिखा होकर समझदार भी बेकार
अवसर मिलने पर ठीके पर भी सुधार सकता हुआ
देश और दुनिया- रूस ,पाकिस्तान ,अमेरिका और इराक.....
पर अल्पसंख्यक जाति से होता हुआ कभी नहीं होने का-
जीतकर वोट से

                       
फिलहाल तो एक अरब के बांझ नागरिकों में से
मैं भी हूं एक फ्लाप नागरिक......
खूब मजे काटता....आराम फरमाता...आनन्द से
मुझे पिटना थोड़े ही है प्रधानमंत्री बनने ( के लिए
माननीया...............जी से मिलने ) के चक्कर में !
न ही मैं कभी मन्दिर बनवाने का ही रच सकता हूं झूठ.......

मैं भी जो ठीके पर सुधार सकता हूं अपना देश
मैं जो अल्पसंख्यक जाति से होने के कारण
कभी भी नहीं जीत सकता कोर्इ चुनाव
मैं जो र्इस्ट इंडिया कम्पनी की वारिस सरकार को
चलाने के लिए बनी राजनीतिक पार्टियों उर्फ कम्पनियों की तरह
कब्जाकर बार-बार नहीं ले सकता देश चलाने का ठीका -
मैं अवसर पाने की प्रतीक्षा के बिना रोज सुबह
खुली हवा में जंगल की सैर के लिए निकलता हूं
किसी भावी प्रधानमंत्री जैसी शान से
(जैसे अकेला मैं ही होऊं
इतिहास के रिजर्व कोटे का भूमिगत प्रधानमत्री ! )
राम के बनवास या पांडवों के अज्ञातवास की तरह
चुपचाप बढ़ाता हुआ अपने प्रधानमंत्रित्व का गर्भकाल.....
                                              
मैं जो किसी जिताऊ वोट-बैंक वाले
बहुसंख्यक जाति से नहीं हूं
मैं बनूंगा प्रधानमत्री यदि सभी जाति से ऊपर उठकर वोट दें
मै जो ठीके पर भी सुधार सकता हूं देश यदि सुधरें मतदाता........
मैं प्रधानमंत्री कभी भी नहीं हो सकता हूं
जैसे कि कोर्इ भी......हर कोर्इ नहीं बन सकता है प्रधानमंत्री !
जब तक.........







उनसे मैं मांगता हूं क्षमा.....



जिनकी जाति में मैं पैदा नहीं हुआ
उनसे मैं मांगता हूं क्षमा....
जिनके कुल जैसा मेरा कुल नहीं था
जिनके घर जैसा घर नहीं था मेरे पास
जिनके देश धर्म और सम्प्रदाय में पैदा नहीं हो सका मैं
उनसे मैं मांगता हू़ क्षमा !
जिनके समय में मैं पैदा नहीं हुआ
जिनकी चमड़ी के रंग सा रंग नहीं है मेरा
जिनकी  आंखों जैसी आंखें नहीं हैं मेरे पास
और न ही जिनकी नाक  जैसी नाक है मेरी
जिनकी भद्र-अभद्र हरकतों जैसी हरकतें नहीं कर पाता मैं
उन सभी से मैं मांगता हूं क्षमा !
सच मानिए ! इन सब में मेरा कोर्इ कसूर नहीं
कोर्इ भ्री दोष नहीं है मेरा !
सभी के प्रति अपनी निश्छल सहानुभूति के बावजूद
मैें इस बात के लिए क्या कर सकता हूं-
यदि मेरे पुरखे भोजन और पानी की खोज में
उनके पुरखों से दूर
धरती के किसी दूसरे छोर की ओर भटक गए
रीझ गए किसी फलदार पेड़ की घनी छाया पर
या फिर घनी झाडियों में गुम हो गए
किसी शिकार का पीछा करते हुए निकल गए
जंगलों और पहाड़ों के उस पार
जाकर बस गए मिटटी के किसी अज्ञात उपजाऊ समतल प्रदेश पर.....

और इस प्रकार निकल गए मेरे पुरखे
उनके पुरखों की जिन्दगी से
हमेशा-हमेशा के लिए बाहर और दूर
जिसके कारण आज तक मैं उन्हें जीने के लिए
उनकी जिन्दगी में वापस नहीं लौट पाया हूं !
इस समय भी इस धरती पर
हंस-बोल खा-पी रहे हैं अरबों-खरबों लोग
जिनके समय में होते हुए भी
जिनके साथ हंसते-बोलते खाते-पीते हुए
उन्हें मैं जी नहीं पाया !

असितत्व के सारे विभाजनों के बीच और बावजूद
मोहभंग वाली बात यह है कि
यदि कदाचित मांओं और पिताओं की जोडि़यां
विवाह के पहले ही आपस में बदल गयी होतीं तो
तब भी मैं और आप न सही
कोर्इ न कोर्इ तो अपरिहार्यत: पैदा हो ही जाता
अपने कुलजाति और धर्म की नैसर्गिकता और
थोपी गयी सारी वर्तमान पहचानों कोे झुठलाता हुआ
निरपराधभौंचक और अवाक !

जिस किसी को भी
अपनी जाति,कुल और सम्प्रदाय की श्रेष्ठता को लेकर
ग्लानि ,लज्जा या खेद है



  त्रासदी पर पुनर्विचार.....
 ( मां  मित्रों और र्इश्वर के बहाने )


सिर्फ यही एक रास्ता है मेरे पास
कि बाहर के अंधेरे का सामना करने के लिए
अपने भीतर वापस लौट जाऊं !
कुछ वैसी ही कामना के साथ
जैसी कि मेरी मां की थी.....

मां ने बतलाया था-वह बहुत निराश थीं
जैसे अन्धकार के समुद्र में डूबती हुर्इ-सी
जब मैं उनके गर्भ में आया........
कि मैंने सुनहरे भविष्य की तरह तुम्हारी प्रतीक्षा की थी
जैसे अन्धकार के गर्भ से निकलता है सुबह का सूर्य
तुम्हारे अपना सूर्य बन जाने की कामना और सपने के साथ
पूरी की थी अन्तहीन अंधेरे की यात्रा
मैंंने तुम्हारे जन्म लेने की प्रतीक्षा में काटी थीं
न जाने कितनी रातें जाग-जागकरं.....

इसपुरुष-देह के साथ
मैं तो सिर्फ मसितष्कगर्भा ही बन सकता हूं
हां अपनी मांसपेशियों में भी कल्पना कर सकता हूं
नए सार्थक कमोर्ं को जन्म देने वाले सर्जक गर्भ की
ल्ेकिन मैं क्या करूं ! मैं जिसे किसी पर भी भरोसा नहीं है
किसी पर भी विश्वास नहीं है !
मैं जो अपने बाहर के सारे अन्धकार से जूझने के लिए
अपने भीतर की सृजनशीलता में डूबकर
दुनिया की सारी आशंकाओं और सारे भय को भूल जाना चाहता हूं
किसी श्रमिक की तरह बहते-बहाते अपने श्रम-जल के प्रवाह में
अनवरत बहते हुए अनन्त-काल तक जीना चाहता हूं मछलियों की तरह

मां के उस सपने को सच करते हुए
जिसमें वह मुझे चारों ओर से घिरे अन्तहीन समुद्र के बीच
तैरते देखकर पहले तो घबरा गर्इ थी
फिर यह जानकर आश्वस्त हुर्इ कि तैरना ही मेरी नियति है
कि मेरी नौकरी ही लगी है समुद्र के बीच तैरते पोत पर
रहने जीने और करते रहने के लिए.......

मां नें कहा था-जब यादों की ओर लौटना
घावों के इतिहास की ओर लौटना हो
अच्छा होगा कि पुराने इतिहास से बाहर रहकर
एक नए इतिहास को जन्म देने का प्रयास किया जाये
मां मुझे देखना चाहती थी नया इतिहास रचते हुए...


मां ने कहा था -अपने लिए सुखी होने के लिए
जन्म नहीं हुआ है तुम्हारा
ऐसे ही नहीं सूरज के उगने के साथ हुआ है तुम्हारा जन्म
तुम दुखी रहोगे.....जलते रहोगे अन्धे सूरज की तरह
दूसरों की अन्धकार से घबरार्इ आंखों के लिए
जिनके लिए जलोगे तुम
वे तुम्हें धन्यवाद भी नहीं कहेंगे
भूल जाएंगे अपनी आंखों के पीछे तुम्हारे जलने का सच
क्योंकि सभी को तुमसे सुखी रहने की आदत जो पड़ चुकी है
किसी को तुम्हारे सुख की ओर घ्यान भी नहीं जाता.....

मां ने कहा था तुम अपने हिस्से का भाग्य भी बांट देते हो
अपने मित्रों के बीच
कि मैं इतना भोला हूं कि जब भी मैं किसी से जुड़ता हूं
कुछ न कुछ खो बैठता हूं
वह मेरे मित्रों को किसी फूल पर मंडराते
आवारा पतंगो की तरह देखती थी
वह अच्छी तरह पहचान गयी थी कि
मै अपने मित्रों की जरूरत हूं
मित्र मेरी जरूरत नहीं हैं
वे सिर्फ मेरा समय बरबाद कर सकते है
वह भी अपने स्वार्थ के लिए
और एक दिन मुझे अकेला छोड़कर चल देंगे
अपनी जरूरतें पूरी हो चुकने के बाद......

कि तुम्हारे सारे मित्र फर्जी हैं
तुम्हारे सारे मित्र इसलिए फर्जी हैं क्योंकि उन्हें तुमने नहीं तलाशा है
बलिक वे ही धीरे-धीरे खिंचते आए हैं तुम्हारे पास
अपने स्वार्थ के अनुरूप तुम्हारी उपयोगिता की पहचान करते हुए
कि लोग पहचान गए हैं मेरे भीतर का बुद्धूपन
और यदि मैं अपनी जरूरत के अनुसार
अच्छे मित्रों की तलाश नहीं कर सकता
तब भी मुझे अच्छे मनुष्यों की तलाश करनी ही चाहिए......
यधपि मैं इतना मेहनती हूं कि
शायद ही मुझे किसी सहारे की आवश्यकता पड़े !

मां कहती थी कि तुम्हारे कोर्इ भी काम नहीं आएगा
तुम ही काम आने के लिए अभिशप्त हो दूसरों के
तब तक पत्नी नहीं आयी थी
जो बता पाती कि आप ही ठगे जायेंगे हर बार......
तब तक मैं यह पहचान नहीं पाया था कि
मेरे स्वभाव की सारी कमजोरियों का राज
मेरे उन सांस्कृतिक विश्वासों में थी जो 
प्रतिद्वद्वियों और चुनौतियों से मुक्त- एकल
भारतीय र्इश्वर की तरह ही भोली आश्वस्त और अद्वितीय थीं
मां को मेरे बाद र्इश्वर पर ही सबसे अधिक भरोसा था
लेकिन सबसे अधिक डरती थी वह र्इश्वर से ही
वह संदिग्ध है ....उसकी लीला अपरम्पार है
और उसे कोर्इ भी नहीं समझ सकता
उसकी खुशामद के लिए सिर्फ एक ही जन्म काफी नहीं !
जो पूरे विश्वास में जीते हैं र्इश्वर उनके साथ मजाक किया करता है
पता नहीं यह र्इश्वर वही है या कोर्इ और......
कहते हुए हंसती थी मां

हमें सावधान रहना चाहिए
कि जब हम विनम्र प्रतीक्षा में होते हैं
मानव जाति का एक बुरा चेहरा
हमारे भीतर के स्थगित भोले असावधान मनुष्य को पहचान जाता है
जंगल में अपने आसान शिकार की तलाश में घूमती हुर्इ
भूखे बाघ की शातिर शिकारी आंखों केी तरह.....
र्इश्वर जो करता है अच्छा ही करता है के परम्परागत विश्वास के साथ
एक आम भारतीय के भोले बुद्धूपन के साथ
तब मैं पूरे गर्व के साथ अपनी अच्छाइयों के अनुरूप ही
अपने साथ अच्छे व्यवहार और स्नेहिल प्रशंसाओं की प्रतीक्षा में था.....

एक र्इश्वर-जो बुराइयों के लिए समर्पित हो
हमारी भूलों गलतियों और अपमानों से बना हुआ र्इश्वर
हमारे हिंसक प्रतिरोध और प्रतिशोध में अभिव्यकित पाता हुआ
एक पागल र्इश्वर का शैतान की तरह होना
जो हमारे विश्वासों को प्रश्नांकित करता रहे
ताकि हम बचे रह सकें एक बुरे आत्मविश्वास से
उन बाहरी बुरे प्रभावों से-जब हम अपने साथ
अच्छे व्यवहार की उम्मीद में दूसरों द्वारा ठगी के शिकार होते हैं....

शायद एक आसितक भारतीय होने के कारण
तब मैं पूरी तरह अपरिचित था उस बुरे र्इश्वर यानि कि शैतान से

मुझे अच्छे मनुष्यों की अब भी तलाश है
अच्छे मनुय यानि कि जो बार-बार ठगे गए हों और
दुनिया के बुरे चेहरे को देखने के सर्वथा अयोग्य हों
मुझे उन शक्की लोगों की भी तलाश है
जो किसी के अप्रत्याशित बुरे व्यवहार से हतप्रभ होकर
अपने ही भीतर सिमट गए हों
मुझे अब भी तलाश है उस मनुष्य की
जो अपनी नैतिकताओं को ढोते रहने के प्रयास में
समय और समाज से बाहर हो गया हो
मैं उस अदृश्य मनुष्य की खोज में हूं
जो अपने निर्वासन और अकेलेपन में र्इश्वर से होड़ ले रहा हो
मैं उसे ही अपना मित्र बनाना चाहता हूं

इस दुनिया में आने के बाद उसने मुझे बताया था
और मुझे अच्छा लगता कि सच ही कोर्इ र्इश्वर होता
कोर्इ भी असितत्त्व के मनहूस अकेलेपन में कैद होना नहीं चाहेगा
यह दुनिया जो असितत्त्व की अन्तहीन आवृत्ति से बनी है
मुझे अच्छा लगेगा कि मैं न सही कोर्इ दूसरा ही हो
जिसके होते हुए मैं पूरी तरह गैरजरूरी प्रमाणित हो सकूं
मैं किसी भी असितत्त्व के सम्मान में
अपनी सारी महत्त्वाकांक्षाओं को स्थगित करते हुए
अनन्तकाल तक प्रार्थना में झुके रह सकता हूं
लेकिन मैं भ्रमों से भरा हुआ जीवन जीना नहीं चाहता
मैं चाहता हूं कि मेरे सारे भ्रम टूट जाएं
अब तक जिया हूं चाहे जैसा
लेकिन मैं नंगे सच के साथ ही मरना चाहता हूं......

सच कहूं मैं..... मुझे बताया गया था
जो कुछ भी हो मेरे हिस्से का जीवन
सब कुछ इतना नियत कि र्इश्वर की ओर से ही हो जैसे.......
एक अटूट मजबूत विश्वास की तरह
मैं सफलता के संयोगों की निरन्तरता को
किसी चमत्कार की तरह र्इश्वरीय समझने लगा था
मैं समझता था बचे रह जाएंगे -
मैं और मेरे जैसे लोग जैसे अब तक उल्का पिण्डों की अनवरत मार
सहते हुए भी बची रह गयी है धरती
धरती पर चुपचाप बचा रह गया है जीवन

मित्रों में घबराहट फैलने लगी थी
और मित्रगण चुपचाप खिसकने और बदलने लगे थे
एक दिन पिता नें हाथ खड़े कर दिए कि बूढ़ा हो गया हूं मंैं
कि अब सहारे के लिए कोर्इ दूसरा र्इश्वर ढूढ़ो.....
मैं किसी समझदार र्इश्वर की प्रतीक्षा में था
जबकि असितत्त्व की आवृत्ति के साथ र्इश्वर अनेक भ््राामक विकल्पों में था
मेरा जीवन प्रेम के बाजार में खड़ा था-किसी एक के चयन के लिए...

कि जिस दिन नौकरी लगी
उस दिन पता चला कि प्रेम के बिकाऊ बाजार में
अब तक बचा हुआ हंू मैं अपनी बची हुर्इ कीमत के साथ....
मित्रगण झगड़ने लगे थे
अपनी-अपनी साली के साथ विवाह प्रस्ताव देने के लिए
कि जैसे वे हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहते थे मुझे
किसी उपयोगी की तरह अपने रिश्तों की स्थायी कैद में

मां नें कहा था-बहुत -सी बेवकूफियां
हम साथ-साथ कर जाते हैं
अन्धी प्रतिक्रियाओं के उन्माद में
बिना समझे....बिना सोचे
और यह भी कि जब हम अपने साथ हुए हादसों के लिए
दूसरों की संदिग्ध भूमिका की तलाश कर रहे होते हैं
हम स्वयं ही एक पक्ष बन चुके होते हैं
अपने ही साथ हुए अपराधों के लिए.....



हम चाहते हैं.....



तुम्हारे दिए और जिए हुए सच
हमारे प्रश्नों से घायल हो चुके हैं
हम तुम्हारी गलितयों-मूर्खताओं को
वैसे ही जानते हैं
जैसे आने वाली पीढि़यां जानेंगी
हमारी मूर्खताओं को
हम तुम्हारी दी हुर्इ निष्ठाओं से छले गए हैं
हम घर से बेघर
समय से असमय हुए हैं.....

तुम्हारी दी हुर्इ दाढि़यां
नोच डालनें की हद तक
खुजली पैदा करती हैं
हमें लहूलुहान करती हुर्इ-
हम नहीं चाहते कि हमारा नाम
तुम्हारी बनार्इ हुर्इ जातियों के
एक र्इमानदार कुली के रूप में लिखा जाये....

ळम अपने वंशजों को
अपना भारवाहक बनाने वाली
तुम्हारी हिंसक परम्परा के खिलाफ हैं
हमें नहीं चाहिए
आदमी की खाल उघेड़कर
उसके लहू में डुबोकर लिखे गए
तुम्हारे सनातन दिव्य ग्रन्थ
हम तुम्हारी
सभी को मारकर जीनें वाली
अमरता के खिलाफ हैं.....

तुम्हारा हमारे समय पर लदकर
बलात जीवित रहना
एक अप्राकृतिक अपराध है
हम न्याय चाहते हैं
हम तुम्हारी मृत्यु चाहते हैं पितामह !
हम चाहते हैं कि
आने वाली पीढि़यों को भी
नयी सभ्यता के लिए
अपना नया पितामह चुनने का
अधिकार मिले
बताओं !
बताओ कि तुम्हारी मृत्यु कैसे होगी ?



 हत्याएं




कुछ तो गलत हुआ ही है
लेकिन इतना तो होता ही रहता है गलत
अच्छा करने और करवाने की जिद में
काफी कुछ ठीक नहीं हुआ है लेकिन हो सकता था
फिर भी सब तो सही नहीं हो सकता !
इतिहास को मुटठी में रखने के लिए
बहुत सारी शकितयों का रखना होता है ध्यान.....

कुछ हत्याएं हुर्इ हैं....हो रही हैं और हो सकती हैं
इतिहास को पूरे सूझ-बूझ के साथ
प्रायोजित करते हुए भी........

जब दु:ख उनके मरने या उन्हें मारने का नहीं
बलिक मारने के पूरे प्रयास के बाद भी
बचे रह जाने की खतरनाक संभावनाओं का भी होगा

कुछ हत्याएं तो हो ही जाती हैं
आसानी से सुलभ और सुरक्षित लक्ष्य की तलाश में
सम्पूर्ण निरर्थकता में घटित दुखान्त की तरह
कुछ हत्याएं घटित हो जाती हैं
निशानेबाजी के अभ्यास में भी
कुछ तो शौकिया.....यू ही-मैं भी कर सकता हूं कि नहीं !
कुछ हत्याएं करनी पड़ती हैं
हत्या करने की शकित को प्रमाणित करने के लिए

हत्याएं आंशिक होती हैं और पूर्ण
हत्याएं मानसिक होती हैं और वास्तविक
चोरों और डकैतों का फर्क रहता ही रहता है
उनकी अपनी जरूरत और हिम्मत के समानुपात में....
सारी नापसन्दगी के बावजूद
मेरी परेशानी की वजह यही है कि
सिद्धान्तत: तब-तब मैं डर जाता हूं
जब मुझे भी लगने लगता है कि दुनिया तो तभी बदल पायेगी
जब वे बीत जाएंगे अपने बीते जमाने के विचारों के साथ

जब मैं अश्लील उपसिथति की तरह
कुछ लोगों का होना देखता हूं और तरस खाता हूं

एक कभी भी गिरकर भीड़ को मार देने वाली
आशंकाओं वाली हत्यारी छाया देने वाले वृक्ष के रूप में उपसिथत
अप्रासंगिक समय के लिए तो मौत की सुर्इ दे देने के पक्ष में
संवैधानिक संशोधन कर ही देना चाहिए

जिस मुकदमें में सारे गवाह पक्षæोही हो गए हों
ऐसे संनिदग्ध हत्यारों के लिए भी होनी चाहिए कोर्इ विशेष जेल

वे सारे हत्यारे
जो हत्याओं के असफल प्रयास के बाद
एक बार फिर जीना चाहते हैं
एक गुमनाम मासूम सज्जन की तरह.....
या वे सर्वविदित किन्तु अनिर्णीत हत्यारे
जो सन्देह का लाभ पाने के लिए
अपने हाथों की जा रही हत्याओं के प्रचार से डरते हैं
या फिर वे जो हत्या करने के लिए आसान
शिकार के रूप में पाते हैं गुमशुदा चेहरों को.....
जहां कुछ हत्यारे प्रचारित चेहरों की तलाश में रहते हैं
हत्या के पश्चात गुमशुदगी से बाहर निकलने के
स्वर्णिम अवसर के रूप में......

हत्यारे जो करते रहते हैं हत्याएं
अपने जीवित बचे रहने के एकमात्र विकल्प के रूप में
उनके मारे जाने के बाद भी हत्यारों के बनने का
बना रह सकता है पेशेवर सिलसिला
क्या पता उकसाने वाली कहानियों के रूप में
या पागल क्रोधी जीन के रूप में
जो कभी भी किसी को बर्दाश्त नहीं कर पाता

एक दिन दो हत्याएं करने वाले के पास
चार हत्याएं करने वाला बेटी का रिश्ता लेकर पहुंचेगा
और दूसरी पीढ़ी में दस हत्याएं करने वाला पुत्र पैदा होगा
यह भी संभव है कि हत्यारे का पुत्र पैदा होते ही मार दिया जाय
और एक दिन खत्म हो जाय उसका वंश भी !

मैं जब भी कक्षा में कहता हूं
कि जो बहादुर थे वे इतिहास में लड़-लड़ाकर मर-मरा गए
सही-सही वही बचे जो कायर थे
इसलिए बचना है तो एक समझदार कायर बनो
क्योंकि जो डर सकता है वही बच सकता हैे
डरना हमें समझदार बनाता है और जीने का सही ढंग और रास्ता भी सुझाता है
क्योंकि सिर्फ सच्चा कायर ही बुद्धिमान हो सकता है
सिर्फ वही अपने मारे जाने के पहले भी अपना मरना देख सकता है
कहता हूं तो अविश्वास से हंसते हैं बच्चे
कर्इ तो हंसते -हंसते मर मर जाते हैं
बिना डरे बहादुर बनने के प्रयास में.......ं

इसके बावजूद हत्याओं और हत्याओं के बारे में
मेरा अनितम निष्कर्ष यह है कि
बचे रहना है तो छिप जाओ कायरों की तरह....कायरों के बीच
हत्यारों के मारे जाने और एक दिन सब कुछ कायरों के नाम छोड़कर
चले जाने वाले दिन की प्रतीक्षा करते हुए
समय के पिछवाडे भी जगह मिले तब भी.....
गुपचुप चलाते और बढ़ाते रहो अपना वंश
एक निष्कर्ष यह भी है कि एक दिन निरन्तर बढ़ती जनसंख्या के साथ
बढ़ती प्रतिस्पद्र्धा-सभी कायरों को बहादुर बना देगी
हत्यारे अनितम दौर की हत्याएं करने से ठीक पहले
मिल-बैठकर समझौता करेगे
बनाएंगे संविधान कि अब से सभी लोग कायरों की तरह जिएंं.....
संभव है तलाशा जाय धरती के सबसे विनम्र कायर का जीन
मानव जीवन को बचाए रखने के अनितम विकल्प के रूप में .....



यह समय




युद्ध का समय है यह
लड़नें से अच्छा है सुलह-संवाद
घायल होने से अच्छा है बचना
मरने से अच्छा है पैदा ही न होना......

इस तरह
समस्याओं से भरे
इस उत्तर -समय में
युद्ध जीतने का यह एक ही अस्त्र शेष है
निरोध !!

युद्ध में ब्रेक का समय है यह
उस तथाकथित स्वतंत्रता के खिलाफ
जो एक गैरजिम्मेदार पीढ़ी द्वारा
अराजकता में बदल दी गर्इ थी !
दुर्घटनाओं के नंगा नाच का समय है यह-
जनसंख्या के विस्फोट तक
शर्महीन !

हंसिए नहीं !
सभ्यता और विज्ञान की यात्रा में ही
पहुंचे हैं हम
इस सवाल तक-
यह ठीक है कि सभी विज्ञान पढ़ें
वैज्ञानिक बनें
लेकिन वे खाएंगे क्या ?
क्या करेंगे !
इतने वैज्ञानिक क्यों ?




रोना कोइ दृश्य नहीं


रोना कोइ दृश्य नहीं है
दृश्य का डूब जाना है
एक पहाड़ी झरने ंके पीछे...
जलते हुए जीवन का
अपनें सारे वस्त्र उतार कर
जीवन का कूद पड़ना है
अथाह खारे समुद्र में.......

यहां कहीं दूर तक
रोने की कोर्इ जगह
दिखार्इ नहीं देती....
इस शहर में
देर तक मुस्करानें के बाद
रोने के लिए
किधर जाते होंगे लोग !






जल जलहिं समाना....













धरती बांझ थी और आसमान निरर्थक
नि:संतान था पिता अपने पुत्र के बिना
प्रकृति विधवा थी और परम तत्त्व ओझल
तब अन्धकार की कोख में ज्योति की तरह वह उतरा......

तब चेतना डूबी थी विचारों की जड़ता में
और स्मृतियां जंगल में बदल गयीं थीं
पोथियों पर मूर्खताएं छपी थीं और ग्रन्थों में षडयन्त्र
कपटियों ने सारे प्रकाश को अपने पुत्रों-वंशजों के लिए
चुराकर बन्द कर लिया था

ज्ञान ऐश्वर्य के लिए था और र्ठश्वर व्यापारियों के लिए
परजीवियों का सत्य याचना के लिए-'मुल्ला का बांग' और 'पंडा का पाथर
मकड़ी जैसे अपने बुने जाल में पुकारती है कीट
धर्मग्रन्थों के शब्द कंटीली झाडि़यों में बदल गए थे- मारते हुए मनुष्य.....

जिन्हें कहा जा सकता है नीच-कहा जायेगा
बाझिन को बांझ.....कि द:ुखी का दु:ख सुखी के सुख का विषय है
निपूती का दु:ख.... गोद भरी मांओं की खुशी -हुआ ऐसा....

उतरा वह परम विवेक
जीवन-ज्यों सारे ब्रह्रााण्ड के गर्भ से अभी-अभी फूटा हुआ
निर्विकार अनाम पवित्र निस्सीम सागर-शिशु
आदिम मूल तत्त्व की तरह-अनन्त की ओर से
बंधीं और अनर्वर मानव-जाति के लिए.....

तालाब में जैसे खिलता है कमल
शिशु मिला वह नीरू को अपूर्व
खुले आसमान के नीचे प्रकट हुर्इ दिव्य ज्योति
पुरानी बसितयों के अंधेरे सीलन भरे दुर्गन्धाते तहखानों और बूढ़ी कोठरियों से दूर
खुली हवा में-जंगल-सी अनछुर्इ-अबोध पवित्र और अनायास.....

किसका जीवन है यह !....सोचा नीरू नें
किसका जीवन है यह !....पूछा नीरू नें बार-बार
उसकी सारी प्रतिध्वनियां उस तक ही लौट आयीं.....

यह मेरे लिए है-उसने आसमान की ओर
कृतज्ञता से भरे अपने दोनों हाथ उठाए और झुक गया धरती की ओर
उठाने के लिए एक अपूर्व दिव्य शिशु......


जो किसी का नहीं है ,सबका है-आसमान नें कहा
मेरी धरती पर जो भी जन्मा है-मेरा है....मेरी ओर से है
विरासत है....प्रतिनिधि है सम्पूर्ण असितत्त्व का-दुहराया ब्रहमाण्ड नें बार-बार......

जो किसी का नहीं है ,सबका है
सारे मायावी जोड़-तोड़ और अंकों की भीड़ के लिए
यह सिर्फ एक मानव-शिशु ही नहीं एक विराट शून्य है-सत्य-स्फुर्लिंग !
काल-जनित विकृतियों के....इतिहास के दुखती स्मृतियों के
उन्मादों-अपराधों.... पापों-दुर्घटनाओं के सारे प्रदूषणों का अन्त यह.......

यह किसी का नहीं है ,सभी का है-सबके लिए.....सब कुछ की ओर से
भटके समाज के हर गणित को शून्य करता हुआ
निरस्त करता हुआ सारे गलत-जीवन छलका ज्यों
मानव-जाति की रुद्ध दीवारों वाली सारी परम्पराएं तोड़ ---
                                                                                   More......






लड़की









1.



उसका समय उसके पास है
दर्पण में उग रहा है एक अजनबी चेहरा
और मन में एक अनिवार्य भय
कभी भी यह जीवन
किसी और को दे दिया जाएगा....







2.


अठारह वर्ष लग जाएंगे सीखते हुए लड़की
अठारह वर्ष तक लिखे जाएंगे
उसके वक्ष पर आवश्यक नारी अर्थ
अठारह वर्ष लग जाएंगे
उसको और
उसकी मनुष्यता को विभाजित करने में !

3.


लड़की प्रकृति में है और भाषा में भी
लड़की शब्दों में है और व्याकरण में भी
लड़कों से अलग लड़कों के पास
लड़कों के लिए......
लड़के प्रकृति में हैं और बातों में भी
लड़की से अलग.....लड़की के पास
लड़की के लिए.....
मनुष्य कहां है ?



4.


लड़की जानती है
कि उसके भीतर
कहीं भी नहीं है लड़की
फिर भी वह
जब कभी बाजार में निकलती है
लड़की हो जाती है

5.


कांटे उतने ही सत्य हैं
जितने कि नंगे पैर
लड़की के तलवों में उनका चुभ जाना....
लड़की न भी हो लड़की
उसे डर लगता है
गली के मोड़ पर
उसकी प्रतीक्षा में खड़े
घूरते हुए लड़कों द्वारा
कभी भी लड़की
बना दिए जाने से.....



















6.



वह जो चोर की तरह
बढ़ती हुर्इ लड़की को
घबराते देखता है
लड़की का पिता है....

वह जो चुपचाप
घिसता हुआ
लड़की के बढ़ने का अर्थ
बूझता है
लड़की का पिता है


7.


जब कभी भूल जाएगी लड़की
डरने की कोर्इ बात नहीं !
उन्हें याद है कि
उनके पड़ोस में
रहती है एक लड़की....

8.


कभी-कभी
सीढि़यां चढ़ती हुर्इ
उंची आकांक्षाओं वाली जूतियों पर
संभलकर चलती
सहसा लड़खड़ाकर
गिर पड़ती है लड़की
उसे अपनें गिरने का नहीं
गिरते हुए देख लिए जाने का दु:ख सताता है......


9.


शहर के दंगे में
सड़क पर घायल र्इश्वर कराहता है-
मैं खुदा भी हो सकता था
यदि भाषा नें
मार नहीं दिया होता
लड़की उसके पास जाती है
और पूछती है
यह क्या इतना अनिवार्य है कि
तुम्हारी तरह
में भी मारी जाती रहूं
शब्दों के पथराव से !

10.


कि्रयाएं संज्ञा बन गयी हैं
और भ्रम ही शब्द
अन्यथा कहीं भी नहीं थे
स्त्री और पुरुष
जति और धर्म
खुदा और र्इश्वर
सिर्फ भाषा के सिवाय
न ही लड़की.....




अब तक की सबसे अच्छी कविता....



शहर के सबसे बड़े मैदान में
वे वहां एकत्रित हुए
चुनाव करने-
अब तक की सबसे अच्छी कविता
और सबसे बड़ा कवि
अब तक के सबसे सही लोग.....

कविताएं पहले मुगोर्ं की तरह लड़ीं
बहुत पहले भी लड़ा करते थे जैसे मेलों में पशु

कविगण अपनी-अपनी कविताओं को
आवाज लगाते ,चीखते -चिल्लाते
अपनी-अपनी जगहें छोड़कर
उठ खड़े हुए....

कि सबसे पहले अचानक
मैदान के बीच से गुजरा
एक घायल लहूलुहान आदमी
भयानक चीख की तरह
डसे गुण्डों नें मार दिया था छुरा

कविताएं अब गुण्डों की तरह लड़नें लगीं थीं

फिर एक औरत गुजरी-अद्र्ध-विक्षिप्त
फटा ब्लाउज और
तार-तार चीथड़े हुए वस्त्र पहनें....

यह गलत्कार का मामला है
किसी कविता नें कहा
गलत्कारी को सजा मिलनी चाहिए
लेकिन थानेदार भी एक पुरुष है
और उसकी गलत्कार में भी
हो सकती है सहानुभूति !
एक अन्य कविता नें कहा

यह बहस की अच्छी शुरुआत है-
कुछ और कविताओं नें कहा,
हमें सरकार के खिलाफ
आवाज उठानी चाहिए

आखिर जनता
ऐसी निकम्मी सरकार को
चुनती ही क्यों है ?

फिर कविताएं
जासूसी कुत्तों की तरह
अपना सिर झुकाए, जमीन सूंघती
अपने-अपने कवियों के पास
वापस लौट आर्इं.....

यह एक बहुत ही पेंचीदा प्रश्न था
और हम कुछ भी नहीं कर सके-
कविताओं नें कहा, कवियों नें भी






बुढ़ापे का पुत्र

       (एक मित्र की कविता पढ़कर प्रसिद्ध आलोचक की शानदार वापसी पर)

   
          वही दरख्त है
       जिसके नीचे बैठा करता था राजा
       यहां दूर-दूर तक किसी का भी प्रवेश वर्जित था
       मेरे जैसे लोग
       'माथे पर चौखट रखकर चले जाते थे....

मैं जब आया
राजा को छोड़कर चले गए थे
उसके अपने सारे लोग
उसकी तलवार म्यान से बाहर निकलकर
घूल में फिंकी पड़ी थी.....

शहर में अफवाह थी कि मर चुका है राजा
मैंने ऐसे ही जिज्ञासावश उसके चरण छुए
एक इतिहास को प्रणाम करनें के अतिरिक्त
मेरी और कोर्इ भी नहीं थी मंशा
झुकते हुए मैंने उसके चरणों को छुआ
और उसकी सांसे चलने लगीं
राजा जागा
लपककर उसनें उठार्इ अपनी तलवार
बिल्कुल कलम की तरह !

खुशी से पागल नाच उठा मैं
राजा जिन्दा है जिन्दा !
राजा की आंखों से आंसुओं की धार फूट चली
''तुमनें मुझे शापमुक्त किया वत्स !
युग बीत गए
प्रतीक्षा करते
थक आए कोर्इ
छाती जुड़ा गर्इ तुमसे मिलकर
तुम मेरे बुढ़ापे के पुत्र हो
निपूता नहीं मरूंगा मै।
चलेगा मेरा वंश !

कि हे ढिढोरचियों !
दसों दिशाओं का कान पीट दो कि
पुत्र हुआ है मेरे
मेरी 'चुचुकी छातियों में दूध उतर आया है।


मिट चुका होता


सब कुछ मिट चुका होता
यदि कदमों नें मांगे होते जिन्दगी से बने बनाए रास्ते
खुले दरवाजे और अड़ गए होते
बन्द द्वार और
पन्थहीनता का ठहराव लिए !
उजड़ गए होते
जंगल,बन,पलाश
सारे के सारे तब........


हादसा



सब व्यर्थ हुआ
एक बारात-
दूल्हन और
न्यौछावर के फेंके गए
कुछ खनकते सिक्के
बटोरनें में
पूरी की पूरी पीठ़ी
खो गयी......


बदलाव



मौसम जब बदलता है तो
चूहे के बिल में भी बदलता है
चूहे के बिल को छोड़कर
निकल भागता है सांप
चूहा भी बदलता है
बदल जाते हैं लोग-बाग
मौसम जब बदलता है ।



विचार भी एक पर्यावरण है



फिलहाल मैं किसी भी सपने को जी नहीं सकता हूं
मुझे यह भी नहीं मालूम कि
मैं किसी के सपने का हिस्सा हूं भी या नहीं
मैं एक संवेदनशील मन के ददोर्ं को बड़ाना नहीं चाहता
यहां एक आदमी सो रहा है बच्चों की तरह.......

नुकीले चटटान की तरह
चुभ रहे हैं खुरदुरे अहसास
जीवन खा रहा ज्यों ठोकर
बन्द गलियारों में.....
लोगों के चुभते हुए
हिंसक व्यकितयों के बीच से गुजरते हुए
लोगों के पथरीले मन के पर्यावरण से
बचते-बचाते जीने के लिए
गलत विचारों को जी रहे आदिम मसितष्कों का समय
अप्रासंगिक विचारों के खण्डहरों का शहर
आक्रामक हत्यारी इच्छाओं के पशुओं से भरा हुआ.....

जबकि विचार भी एक पर्यावरण है
मैं अपने प्र्यावरण को बदल देना चाहता हूं.......
उनकी इच्छाएं जेबकतरों के उंगलियों की तरह
फिर रही हैं लोगों की उपलबिध्यों की जेब पर
उनकी उंगलियां हत्यारों की तरह बढ़ रही हैं
लोगों की धड़कनों पर......

उनकी इच्छाओं नें जीत लिया है समय
उनकी इच्छाओं नें दूसरों की इच्छाओं को स्थगित कर रखा है !
दर्द इतनें अधिक हैं कि
मैं बाहर का सब कुछ अस्वीकार करता हुआ
सिर्फ अपने सकि्रय असितत्व में डूबा हुआ ही
पार कर पाउंगा बाहर का यह पागल समय
भर पाउंगा अपने भीतर और बाहर की सारी अनुपसिथतियों को
भंग कर पाउंगा अपने भीतर का निष्ठुर एकान्त......

एक अविस्मरणीय इतिहास की तरह
सौन्दर्य में नहीं ,संवेदना में हुआ है
एक साहित्यकार का अन्त !




एक चिटठी



क्या ही अच्छा होता कि
एक चिटठी लिखता
और बदल जाता सारा देश
एक चिटठी मिलती और
फिर से लिखा जाता
देश का संविधान......