गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

परिशंसा --महाशिवरात्रि की रात्रि में जागते हुए चिंतन

 मैं नहीं जानता कि वे स्वार्थ में हैं या प्रेम में
वे भय में हैं या विनम्रता में
उनका विनम्र एवं पवित्र समर्पण मुझे अभिभूत करता है
उनकी आस्था मुझे ईर्ष्यालु बनाती है
उनका विश्वास मुझे अविश्वास से भर देता है

हे प्रभु !क्या चमत्कार है कि
ये पीढ़ी दर पीढ़ी
सदियों से छले हुए लोग हैं
उनकी आस्था अटूट है
और उनकी जनसँख्या पर्याप्त
और वे सभी चुपचाप अपनी प्रजाति कि अमरता के लिए
समर्पित हैं
मैं जनता हूँ कि वे बार-बार मारे जाने के बावजूद
बचे रहेंगे
कि अस्तित्व की इतनी  पुनरावृत्ति है कि
इतनी  दुर्घटनाओं -आशंकाओं के बावजूद  वे  सुरक्षित हैं

हे प्रभु ! इतनी क्रूरता के बावजूद वे कितने आश्वस्त एवं आभारी हैं
उनकी अच्छाइया सारी बुराइयों पर
और सारी असुविधाओं के बावजूद
उनका जीवन उनकी मृत्यु पर  भारी है।


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

भारतीय धर्म एवं संस्कृति का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

भारतीय धर्म एवं संस्कृति की मुख्य दार्शनिक  विशेषता एक संपूर्ण आत्मीय तथा एकतापूर्ण पर्यावरण के निर्माण में थी ,यद्यपि व्यवहार में वह समाज के आवयविक सिद्धान्त की  समर्थक तथा  आनुवांशिक एवं जातीय राजतंत्र की पोषक होने के कारण सामुदायिक स्तर  पर घोर रूढ़िवादी रही  है। उसने सामाजिक स्तर पर श्रेष्ठता और हीनता के मनोवैज्ञानिक प्रतिमान गढ़े।   ऐसा प्रतीत होता है कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से वह एक बन्द कबीले के अन्तः सम्बन्धों की आतंरिक संरचना एवं प्रस्थिति का सामुदायिक विस्तार है। धीरे-धीरे एक कबीले का पुरोहित आस-पास के अन्य कबीलों का भी पुरोहित बनता गया और एक विशिष्ट जातिवादी समाज की रचना होती गयी। जैसी कि कहावत है कि ज्योतिष-विद्या  सिर्फ ज्योतिषी की ही आजीविका चला सकती है -भारतीय दर्शन और उसकी अवधारणाओं में पुरोहित-वर्ग तटस्थ भूमिका ,उदासीनता , निठल्लेपन एवं परजीविता की आत्मा समाई हुई है। उसके समर्पण का दर्शन दूसरों के वर्चस्व और अधीनता को बिना किसी विरोध या प्रतिरोध के स्वीकारने का सन्देश देता है। इसे मुख्य धारा की धार्मिकता यानि ब्राह्मण-जातीयता के पार्श्व -प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। यह जातीय मनःस्थिति ब्राह्मण को जातीय  श्रेष्ठता का दम्भ तो  देती है ,लेकिन आर्थिक रूप से दान-दक्षिणा के रूप में परजीविता का महिमा-मंडन भी करती है। संतोष-जीविता का यह महिमा-मंडन इस रूप में भारतीय संस्कृति के अनुयायियों में  सृजनात्मक असंतोष का निषेध करती है। उसका सन्तोषजीविता का सन्देश एक बड़ी जनसंख्या को भाग्य एवं प्रतीक्षा- जीवी बनाता है। सामाजिक भूमिकाओं का आवयविक विभाजन, हर व्यक्ति से उसके लिए निर्धारित जातीय चरित्र और भूमिका की मांग करने लगता है। इससे एक स्थिर किन्तु गतिहीन समाज की रचना होती है।
                इसके बावजूद भारतीय संस्कृति में जो सबसे आकर्षक बात जो मुझे दिखाई पड़ती है ,वह पवित्रता के बहाने काम-चिंतन का दमन या फिर उसका उदात्तीकरण है। काम भावना पर विजय को जीवन के पुरुषार्थ या चुनौती के रूप में लेने के कारण उसने साधु -संतों के रूप में काम -मुक्त व्यक्तिव का भी आदर्श प्रस्तुत किया था तो दूसरी ओर  कृष्ण की  श्रृंगार-गाथाएं ,आध्यात्मिकता के बहाने काम -भावना के विरेचन की मनोवैज्ञानिक व्यवस्था भी करती हैं। यदि अरस्तू का कैथार्सिस या विरेचन की अवधारणा सही है तो कृष्ण-कथा की इस सांस्कृतिक भूमिका को भी स्वीकार करना होगा। इसके विपरीत राम-कथा के समाज-वैज्ञानिक प्रभाव के अध्ययन से जो बातें सामने आती हैं ,उसमें आक्रमण के स्थान पर प्रत्याक्रमण एवं प्रतिरोध की क्षमता का महिमामण्डन प्रमुख है। यह सम्भवतः राम-कथा का ही प्रभाव है कि आज भी भारतीयों पर वैश्विक पर्यावरण बिगाड़ने का आरोप कम ही लगाया जा सकता है। किसी के विश्लेषण में मैंने पढ़ा था कि सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से राम का चरित्र अनारम्भी  है। राम का चरित्र संयम में रहने का सन्देश देता है। दूसरों के अस्तित्व का सम्मान करने एवं हिंसा की पहल न करने का सन्देश भी। राम-कथा किसान-जीवन के ताने -बाने के लिए या यह कहें कि जन-सामान्य के लिए सिर्फ एकल दांपत्य की प्रथा के आदर्श प्रतिमान की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है ,बल्कि वह कुटुम्बा-निर्माण की आधारभूत दार्शनिकी भी उपलब्ध कराती है। वह अर्थ और पूंजी के  पारिवारिक विभाजन को हतोत्साहित करती है :सामूहिक श्रम का प्रोत्साहित कराती है। इस तरह साझी खेती को बढ़ावा देती हुई मेड़ बंदी की कुप्रवृत्ति को भी कम करती है।
                       यद्यपि सामाजिक संवेदनशीलता  और दायित्वबोध के  चारित्रिक आदर्श का केंद्रीय एवं प्रारंभिक मिथकीय चरित्र  विष्णु से सम्बंधित है। परवर्ती महापुरुषों के लिए उनका पौराणिक चरित्र एक स्थायी मानक है। इन कथा-नायकों के चरित्र में ऐसे पर्याप्त तत्व हैं ,जो भारतीयों के लिए ब्राह्मण-जातीय
 परजीवी  धार्मिकता का संतुलनकारी  प्रतिपाठ प्रस्तुत करते हैं। इन सब के बावजूद यह ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि प्राचीन भारत में ज्ञान के प्रकाशक एवं संरक्षक के रूप में ब्राह्मण जाति की एक ऐतिहासिक  एवं महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज के समतावादी युग में प्रतिगामी दिखने एवं होने के बावजूद वह अपनी समय-सापेक्षता में कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। उसने एक मानक एवं परिष्कृत केंद्रीय भाषा विकसित की। प्राचीन भारत के बहुभाषी समाज में संस्कृत के विद्वानों नें ज्ञान के संरक्षक के साथ-साथ दुभाषिए की भी भूमिका निभाई। काश्मीर का संस्कृतज्ञ सुदूर दक्षिण के किसी भी राजा के दरबार में रहने वाले संस्कृतज्ञ से संवाद स्थापित कर सकता था। स्थानीय एवं भिन्न भाषाओँ कि बहुलता के बीच जातीय रूप से ही सही ब्राह्मणों की यह भूमिका असाधारण ही कही जाएगी। उनके पास ज्ञान और स्मृतियों के संरक्षण और विज्ञापन का आज की मीडिया की तरह ही ऐसा सशक्त  जातीय तंत्र था कि जिसको भी चाहा भगवान बना दिया।

परजीविता का महिमामंडन
jansatta.com
http://www.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=61988%3A2014-03-15-05-41-10&catid=21%3Asamaj

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

समय-चरित

समय-चरित 


चींजें नफ़रत से भरी हुई हैं
जो होना चाहिए था वह नहीं हो रहा है और
जो नहीं होना चाहिए था हो रहा है वह

जिस दिन फूल सबसे अधिक खिले थे
बह रही थी सबसे सुन्दर सबसे सुखकर हवा
उस दिन दूरदर्शन पर बज रहा था मातमी धुन
रो रहा था रेडियो तिन दिनों के राष्ट्रीय शोक की सूचना के साथ

चीजें चुपचाप हाथ से खिसक रही थीं
बाज़ार बोलना सीख रहा था अपनी अपनी भाषा
ए .टी .एम .सिर्फ हजार रूपए की नोट उगल रहे थे
दूकानदार छोटे नोटों के अभाव को देखते हुए
बढ़ा कर बोल रहे थे वस्तुओं के दाम

बढ़ती हुई असुरक्षा के साथ लोग
लौट रहे थे जातिवाद के सबसे  विश्वसनीय प्लेटफार्म पर
आवारागर्दी से पिछड़ते हुए युवा
बढ़ती हुई कुंठा और अवसाद के साथ
और आक्रामक ,हिंस्र व बलात्कारी होते जा रहे थे

विचारक अधिकांशतः बेरोजगार थे और कुछ नौकरी में
निरुद्देश्य कार्यकर्ता घूम रहे थे सडकों पर
मंच को हथियाने के बाद डकैत
अपने हथियारों से बारूदी राख साफ कर रहे थे

गेहूँ के दाम पहली बार आसमान छू रहे थे
खुश था किसान कि धरती के सोना ने
पहली बार बाजार में उचित सम्मान पाया है
वित्तमंत्री बिगड़ रहे थे अपने सचिव पर
कि कैसे हुई चूक और अब तक पहुँची क्यों नहीं
विदेश से मगाई गई गेहूं की खेप
और किन परिस्थितियो में पिछड़ गए सरकारी जलयान ...

सब कुछ इतना आकर्षक था कि स्वप्न हो जैसे
मुख्या-धारा का घटिया नायक मुस्करा रहा था
सामूहिक मोहभंग घटित करने के बाद
किताबों से बाहर  निकलकर
जंगलों में गीत गा रहे थे वैकल्पिक नायक बनने के सपने

चीजें जटिल होती जा रही थीं
और एक नासमझ पर्यावरण
अतिउत्साह में
सब-कुछ को मटियामेट कर देना चाहता था ...

समय का सच

बेशर्म श्रेष्ठता
हिंसक बल
बहुमत की मूर्खतापूर्ण दादागिरी
और आधिकारिक विचारहीनता
इस अनैतिक समय का
सबसे बड़ा जीवन -मान है। …

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

आस्था का संकट

मैं जब दरवाजा खोलता हूँ मुझे नहीं पता कि
दरवाजे के बाहर जो खड़ा है आगंतुक
उसका चरित्र कैसा है !
मैं जब दरवाजा खोलता हूँ
किसी सज्जन के आगमन की प्रत्याशा के साथ
बाहर स्वजन के स्थान पर खड़ा मिलता  है दुर्जन

मैं दरवाजा बंद रखने पर स्वयं को सुरक्षित समझता हूँ
मैं जब दरवाजा बंद रखता हूँ
होता है स्वजन का अपमान
मेरा स्वजन बाहर भटकता है लावारिस
मैं जब दरवाजा खोलता हूँ स्वजन के लिए
स्वजन को धक्का देकर मेरे घर में घुस आता है हत्यारा

इस तरह दरवाजा खोलना एक साथ ही
स्वागत और असुरक्षा है
मुझे नहीं पता कि मैं जब खोलूंगा द्वार
उससे कौन आएगा भीतर
ईश्वर या शैतान ?
कि विश्वास के उस भावुक दुर्बल क्षण  में
विश्वासघाती दुर्घटना
सारे जीवन को नकारात्मकता से भर देती है।

हे पिता ! हे पूर्वजों !
तुम्हारी दी हुई आस्था नें
असुरक्षित कर दिया है मुझे
मेरी एक ही आस्था
ईश्वर और शैतान दोनों को ही  मुक्त आमंत्रण देती  है /

कि मुझे यह नहीं पता है कि
मैं जब-जब भी खोलूंगा  द्वार
उससे कौन आएगा मेरे भीतर
ईश्वर य़ा शैतान ?
जबकि हर आस्था परनिर्भरता विकसित करती ही है।