बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

समय-चरित

समय-चरित 


चींजें नफ़रत से भरी हुई हैं
जो होना चाहिए था वह नहीं हो रहा है और
जो नहीं होना चाहिए था हो रहा है वह

जिस दिन फूल सबसे अधिक खिले थे
बह रही थी सबसे सुन्दर सबसे सुखकर हवा
उस दिन दूरदर्शन पर बज रहा था मातमी धुन
रो रहा था रेडियो तिन दिनों के राष्ट्रीय शोक की सूचना के साथ

चीजें चुपचाप हाथ से खिसक रही थीं
बाज़ार बोलना सीख रहा था अपनी अपनी भाषा
ए .टी .एम .सिर्फ हजार रूपए की नोट उगल रहे थे
दूकानदार छोटे नोटों के अभाव को देखते हुए
बढ़ा कर बोल रहे थे वस्तुओं के दाम

बढ़ती हुई असुरक्षा के साथ लोग
लौट रहे थे जातिवाद के सबसे  विश्वसनीय प्लेटफार्म पर
आवारागर्दी से पिछड़ते हुए युवा
बढ़ती हुई कुंठा और अवसाद के साथ
और आक्रामक ,हिंस्र व बलात्कारी होते जा रहे थे

विचारक अधिकांशतः बेरोजगार थे और कुछ नौकरी में
निरुद्देश्य कार्यकर्ता घूम रहे थे सडकों पर
मंच को हथियाने के बाद डकैत
अपने हथियारों से बारूदी राख साफ कर रहे थे

गेहूँ के दाम पहली बार आसमान छू रहे थे
खुश था किसान कि धरती के सोना ने
पहली बार बाजार में उचित सम्मान पाया है
वित्तमंत्री बिगड़ रहे थे अपने सचिव पर
कि कैसे हुई चूक और अब तक पहुँची क्यों नहीं
विदेश से मगाई गई गेहूं की खेप
और किन परिस्थितियो में पिछड़ गए सरकारी जलयान ...

सब कुछ इतना आकर्षक था कि स्वप्न हो जैसे
मुख्या-धारा का घटिया नायक मुस्करा रहा था
सामूहिक मोहभंग घटित करने के बाद
किताबों से बाहर  निकलकर
जंगलों में गीत गा रहे थे वैकल्पिक नायक बनने के सपने

चीजें जटिल होती जा रही थीं
और एक नासमझ पर्यावरण
अतिउत्साह में
सब-कुछ को मटियामेट कर देना चाहता था ...

समय का सच

बेशर्म श्रेष्ठता
हिंसक बल
बहुमत की मूर्खतापूर्ण दादागिरी
और आधिकारिक विचारहीनता
इस अनैतिक समय का
सबसे बड़ा जीवन -मान है। …