गुरुवार, 10 मार्च 2016

गद्य-गीतों का अप्रतिम संसार :ललित चिन्तक उमेश प्रसाद सिंह

ललित निबन्धों का प्रगतिशील आधुनिक पाठ
                                    
                                                रामप्रकाश कुशवाहा
"चौपाल "-जुलाई -दिसंबर २०१४ के अंक में प्रकाशित  
संपादक -कामेश्वर प्रसाद सिंह 
ISSN2348-3466
कोठी नं .6 ,अरुणा नगर एटा 
जिला-एटा 207001 
मो० ९४१००६८९८४ 
ईमेल-kameshwarprasadsingh60@gmail.com



कोई साहित्यिक विधा ही यदि चुप होने लगती है तो सोचना पड़ता है कि ऐसा किन कारणों से हो रहा है . इसमें संदेह नहीं कि वैचारिक निबंध और लेख –आलेख तो लिखे जा रहे हैं ,लेकिन ललित निबंध लिखने वालों की कमी हुई हो ,लेकिन ललित निबंध लेखकों की कमी हुई है .शीर्ष और स्थापित नाम तो गिने –चुने ही हैं .
         हिंदी में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेद्वी और रामचंद्र शुक्ल के नीरस वैचारिक गद्य के बाद मनोरम कल्क्पना एवं रोचक बिम्बों –द्र्श्यवालियों  की छटा प्रस्तुत करती काव्यात्मक गद्य-संरचना वाली भाषा स्वयं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी तो बाण भट्ट की कादम्बरी और कालिदास साहित्य के पाठकीय अनुभवों से प्रेरित होकर हिंदी में लाये थे . ललित शब्द को उन्होंने कालिदास से लेकर लावण्य और माधुर्य जैसे आस्वादधर्मी विशेषणों की तर्ज पर आँखों को सुन्दर लगने वाले कल्पनाशील सोंदार्यात्मक वर्णन वाले गद्य के लिए प्रचलित किया था .इस तरह  लालित्य चाक्षुष सौन्देया का प्रतिमान-बोधक शब्द है .क्योंकि मधुर और लावन की तरह आँखों को लाल रंग आकर्षित करता  है .इस दृष्टि से उनके कुटज और देवदारु जैसे प्रसिद्ध निबंध आज भी व्यक्तिव्यंजक निबंधों एवं ललित गद्य के प्रतिमान बने हुए हैं..
            आरम्भ से ही ललित निबंध के विधाकारों नें लोक – संस्कृति को बढावा दिया है . ऐसे में जाने-अनजाने ललित निबंधों को लेकर यह धारणा बनी है कि ललित निबंध प्रायः संस्कृति-विमर्शपरक होते हैं .उनके व्यक्तित्व्व्यन्जक होने की धारणा भी है .लेकिन यह भी सच है कि हिंदी के ललित निबंध सिर्फ व्यक्तिव्यंजक निबंध ही नहीं हैं ,बल्कि वे काव्यात्मक  एवं लाक्षणिक एक विशिष्ट गद्य-संरचना भी हैं .हिंदी में ललित निबंधकारों की विरल किन्तु भव्य परंपरा में उमेश प्रसाद सिंह सबसे युवतम रोचक एवं समर्थ गद्यकार हैं .उनके निबंध ललित निबंधों की परंपरा में जो नया और मौलिक जोड़ते हैं ,वह उनके ललित चिन्तक या ललित विमर्शकार के रूप  में अधिक स्पष्ट ,पारदर्शी एवं प्रत्यक्ष युग-बोध की विचारपूर्ण अभिव्यंजना के चलते है .इसी कारण उमेश प्रसाद सिंह एक मधुर लयात्मक एवं मनोरम सौन्दर्य से परिपूर्ण अभिव्यक्ति वाले विचारक के रूप में सामने आते हैं .
          उमेश प्रसाद सिंह में लोक संस्कृति के सकारात्मक पक्षों की संरक्षण की चिंता और पहचान तो है लेकिन उनका सजग आधुनिकता बोध ललित निबंधकारों की पूर्ववर्ती पीढ़ी को अतिक्रांत करता है .अन्यथा ललित निबंधकारों की चुप्पी एवं उनकी परंपरा के सिमटने-चुकाने के कारणों की पड़ताल करें तो पता चलता है कि प्रेरणा के स्तर पर संस्कृत भाषा एवं भारतीय लोक संस्कृति की संरक्षण की चिंता , चिंतन की देशजता ,स्थानीयता एवं जातीयता के साथ अधिकांश ललित निबंधकार संस्कृति विमर्शकार की ऐतिहासिक भूमिका में भी हैं .ललित निबंध लेखन में आये गतिरोध का एक संभावित समाजशास्त्रीय कारण (दलित चिंतकों के नजरिए या तर्ज पर ) यह हो सकता है कि अब तक के ललित निबंध एवं निबंधकार प्रायः ब्राह्मण जातीयता वाली भारतीयता के ही सजग और सुचिंतित सांस्कृतिक पाठ प्रस्तुत करते रहे हैं .यह भी अनायास नहीं है कि उस परंपरा नें अपना सर्वोत्तम और अधिकतम देनेके बाद एक मौन धारण कर लिया है .(इस तथ्य को सामने रखते हुए कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी और विद्यानिवास मिश्र तो अपनी ब्राहमण जातीयता के दाय के कारण तो भूमिहार ब्राह्मण जातीयता से कुबेरनाथ राय और विवेकी राय का होना यदि निरा संयोग न माना जाय तो दलित उभार के इस दौर में इस विधा के चुप हो जाने के निहितार्थ स्पष्ट ही हैं .) उमेश प्रसाद सिंह के निबंधों की यह भी एक महत्वपूर्ण  रेखांकित करने योग्य  विशेषता है कि उनके निबंध लोक संस्कृति के पहली बार आधुनिक भारतीयता का परंपरा के प्रति मोह रहित ,गैर ब्राह्मणी ,तटस्थ एवं प्रगतिशील पाठ प्रस्तुत करते हैं .इस दृष्टि से विश्लेषण करने पर उमेश प्रसाद सिंह ललित निबंध लेखन में आए गतिरोध को तोड़ने वाले ,एक नए प्रस्थान-बिंदु की प्रस्तावना करने वाले ललित निबंधकार के रूप में सामने आते हैं .ये विशेषताएँ उनके पूर्ववर्ती निबंध संग्रह “हवा कुछ कह रही है “ में भी दिखाई पड़ी थीं.उसके प्रकाशन के साथ ही ललित निबंध विधा नें भी प्रगतिशीलता के आयाम प्राप्त कर लिए थे .इस नए निबंध-संग्रह  के माध्यम से उमेश प्रसाद सिंह नें समकालीन  यथार्थ को कई नए अछूते आयामों में भी देखने-दिखने का प्रयास किया है .उनके निबन्ध उच्च नैतिक और सात्विक जीवन-मूल्यों वाले मनुष्यों की विलुप्त होती जा रही दुर्लभ प्रजाति पर शोक के अविस्मरणीय वैचारिक गद्यगीत हैं .इन निबंधों में व्याप्त आत्मीय लोक-चिंता , साहसिक असहमति , अविस्मरणीय  रागपूर्ण आंचलिकता ,तत्वंवेषी जिज्ञासा ,सजग निरिक्षण तथा सूक्ष्म विवेचन की शक्ति इन्हें महत्वपूर्ण बनाती है .         

     नदी सूखने की सदी में ‘ संग्रह के पहले ही निबंध ‘ मैं इन्द्रधनुष से खेलूँगा ‘की कलात्मक संरचना को देखें तो अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति , गहन संवेदनशीलता ,मनोरम कल्पनाशीलता और  संश्लिष्ट काव्यात्मक –कथात्मक गद्यभाषा के चलते वे एक प्रौढ़ और सिद्ध ललित निबंधकार के रूप में सामने आते हैं . अपनी प्रगीतात्मकता कमे साथ उनका पहला ही निबंध एक गद्य-प्रगीत है .’मैं इन्द्रधनुष से खेलूंगा ‘ निबंध का इन्द्रधनुष जीवन की संभावनाओं तथा उसके सुखद भविष्य के आकाश का इन्द्रधनुष है .लेखक नें इन्द्रधनुषको बेहतर जीवन के सपने देखने ,रचने और जीने की आजादी  के विविध अर्थ –छवियों में प्रयुक्त किया है .निबंधकार कल्पना को जीवन की सृजनात्मक उड़न के रूप में देखता है . इन्द्रधनुष की तरह ये सपने विश्वास और बेहतर मानवीय संबंधों के सरस-सुरक्षित वातावरण में ही देखे जा सकते हैं . उसकी दृष्टि में यथार्थ ( अपराधिक एवं भ्रष्ट ) की विभीषिका इस पक्षी की उड़ान को दबोच लेती है . उसकी दृष्टि नें समाधान की राह सृजनशीलता की रह है-अपनी रह चलना सृजनशीलता की रह चलना है; तभी कुछ मिलेगा .इस निबंध में घर ,धरती और रागात्मक रिश्तों को केंद्र में रखकर जीवन के बिगड़ते पर्यावरण का काव्यात्मक रूपक प्रस्तुत किया गया है उमेश की दृष्टि में यह इन्द्रधनुष स्वस्थ सामाजिकता और पारस्परिक विश्वास वाले वातावरण में ही संभव है .लेखक का सुझाव है कि बिना किसी प्रत्याशा के अच्छाई के इन्द्रधनुष रचाने की दिशा में सतत यत्नशील बने रहने से ही मानवता का भविष्य सवर सकता है -
              रोशनी का रंग ‘ में उमेश प्रसाद सिंह लोकतंत्र की गरिमा और आदर्शों की महत्ता के साथ उसे और गंभीर जीवन-बोध के साथ जीने की वकालत करते हैं –क्योंकि सिर्फ एकमात्र यही व्यवस्था मनुष्य की स्वतंत्रता का सम्मान करती है .इसतरह यह निबंध लोकतंत्र को जीवन के लिए आदर्श मूल्य ,पद्धति और पर्यावरण के रूप में गंभीरता से देखने की प्रस्तावना करता है .निबंधकार का निष्कर्ष यह है कि ‘लोकतंत्र केवल शासन –प्रणाली नहीं है , लोकतंत्र सर्वोत्तम जीवन-मूल्य भी है .बगैर जीवन-मूल्य के रूप में लोकतंत्र को जीने के पहले उसे शासन-प्रणाली के रूप म एन सफल बनाना असंभव है .स्वयं से भी घूस मांगे जाने से पीड़ित एक स्वाधीनता सेनानी के अनुभव को आधार बना कर लिखा गया यह लेख वैचारिक होते हुए भी रिपोर्ताज और संस्मरण दोनों विधाओं की विशेषताएँ समेटे हुए है .
        ‘ कुरुक्षेत्र कहाँ है ‘एक ऐसे बहादुर देशभक्त सैनिक की जीवन-गाथा है जो उच्च नैतिक जीवन-मूल्यों को जीता हुआ अपनी बहादुरी के लिए जीवित किम्वदंती बन जाता है लेकिन विडम्बना यह है कि देश के बाहरी दुश्मनों को जीतने वाला यह सैनिक देश के आतंरिक मोर्चे पर ही शहीद हो जाता है .
     ‘ महाभारत के समय में क्या कर रहे होंगे व्यास ‘ को सिर्फ इस संग्रह का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिंदी साहित्य का एक अविस्मरणीय , अद्वितीय और प्रासंगिक लेख माना जा सकता है .यह निबंध राजनीतिक इतिहास-निर्माण के दौर में साहित्य-सर्जकों के द्वारा इतिहास -निर्माण की नियति,सार्थकता और उनकी ऐतिहासिक भूमिका जैसे प्रश्नों को समकालीन सन्दर्भों में उठाता और उनकी गहन पड़ताल करता है .कुछ स्थल उद्धरणीय हैं –“मैं व्यास से पूछना चाहता हूँ कि व्यास के होते हुए भी महाभारत का होना संभव कैसे हो सका .इतने बड़े कवि की मौजूदगी में इतना भयानक संहार कितना आश्चर्यजनक है .मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या महाभारत के दौर में कविता व्यर्थ हो जाती है’(पृष्ठ 30) तथा अयोध्या –विवाद पर यह सर्वाधिक दुर्लभ टिपण्णी कि ‘ कितना अजीब है कि जिस राम को तुलसी नें अयोध्या से उठाकर इस धरती के कोने –कोने में प्रतिष्ठित किया है उसे हम सब और से धकेल कर फिर अयोध्या में ले जाते हुए देखा रहे हैं .मंदिरों से निकलकर लाखों मानों में समाए एक महान चरित्र को हम फिर मंदिर में बैठने के लिए एक और महाभारत का आवाहन करते देख रहे हैं .”(पृष्ठ 32 )..”.जिस समय धरती का सबसे बड़ा युद्ध लड़ा जा रहा था ,उसी समय व्यास इतिहास की सबसे बड़ी कविता रच रहे थे .महाभारत में व्यास ,कविता में उस शक्ति की सृष्टि कर रहे थे ,जिसे लेकर आदमी के भीतर घोर से घोर समर के संकट में भी उतरने का साहस बना रहे .” (पृष्ठ 34)
       उमेश प्रसाद सिंह समकालीन समाज के ज्वलंत और संवेदनशील प्रश्नों को मुकम्मल तैयारी और लयात्मक कल्पनाशीलता के साथ उठाते हैं .रूपक .कविता ,कथा,वृत्तांत ,लोकोक्तियाँ ,कहावतें ,धर्म,पूरण ,रीति-रिवाज ,साक्ष्य –दृष्टान्त आदि सभी शैलियों का निवेश उनके निबंधों को एक संश्लिष्ट कलात्मक संरचना देता है .अभिव्यक्ति में एक  संवादधर्मी आत्मीयता जो उनके चित्त की सहजता से जन्म लेती है कलात्मक संश्लिष्टता के बावजूद निबंधों का अत्यंत ही मोहक और मनोरम लोक रचते हैं .उनके निबंध एक कलात्मक अंतर्जगत की सृष्टि करते हैं ,जो पूरी प्रमाणिकता के साथ वास्तविक दुनिया के समान्तर विश्वसनीय . सार्थक एवं चयनधर्मिता की दृष्टि से नाटकीय हैं .इलिएट के प्रसिद्ध वस्तु-साहचर्य या विभावन व्यापर की तरह वे अपने निबंधों में भाव सम्बंधित पूरा वातावरण और पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते चलते हैं . अभिव्यक्ति और प्रस्तुति के कलात्मक नियोजन से निर्मित उनके निबंधों का कलात्मक सौन्दर्यलोक लालित्य का ऐसा मोलिक प्रतिमान रचता चलता है कि वह पूर्ववर्ती ललित निबंधकारों से न सिर्फ भिन्न है बल्कि उमेश प्रसाद सिंह की नितान्त अपनी है .
         एक लेखक के रूप में उनका महत्त्व यह है कि उमके पास एक प्रौढ़ –प्रांजल निजी विशेषताओं और व्यक्तित्व वाली गद्यभाषा है .एक ऐसी निजी भाषा जो सौन्दर्य के उच्च स्तरीय  प्रतिमानों की स्पष्ट विज्ञप्ति करती चलती है –वैशिष्ट्य में इतनी अलग कि किसी भी दुसरे हिंदी लेखक के पास नहीं है .यही कारण है कि उनके निबंध पढ़ते समय किसी सिद्ध गायक की गायकी सुनने पर साधना या रियाज के अनुमान की तरह गद्यभाषा एवं उसकी सर्जना की दीर्घकालीन साधना का पता देते हैं .आकर्षक किन्तु गंभीर विचारशीलता एवं अनूठी कल्कात्मक अभिव्यंजना उनके निबंधकार को इस विधा के एक सक्षम एवं महत्वपूर्ण उत्तराधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित करती है .
        उमेश प्रसाद सिंह के ललित निबंधों को सिर्फ काव्यात्मक कहना ही उचित नहीं होगा ,दरअसल उनके अधिकांश निबंध एक दीर्घ गद्य-प्रगीत हैं .प्रगीत की आत्माभिव्यक्ति एवं अन्विति जैसी सारी विशेषताएँ उनके निबंधों में मिलाती हैं , कल्पना और संगीत की युगल आस्वद् धर्मिता  उनके निबंधों को विलक्षण संरचना देती है तो जीवन का गहनतर निरीक्षण जो प्रायः आत्मनिरीक्षण का  परिणाम है उनके निबंधों को ,गहराई की ऊँचाई वाले अर्थ में महिमा प्रदान करते हैं . उनके अधिकांश निबंध गुजरते जीवन-समय के काव्यात्मक रूपक एवं वृत्तान्त हैं .       
      नदी सुख रही है ‘ में संकलित  उमेश प्रसाद सिंह के ये ललित वैचारिक निबंध अपनी बहुआयामी संरचनात्मक रम्यता ,रागादीप्त कल्पनाशीलता  तथा गहन विचारशीलता के कारण अत्यंत विशिष्ट बन पड़े हैं .दरअसल उनके सारे निबन्ध दीर्घ गद्य कविताएँ हैं .अपने भावों ,विचारों और मनस्थितियों के सम्प्रेषण के लिए उन्होंने मुहावरे ,प्रतीक ,उपमा और सांगरूपक आदि का कुशल इश्तेमाल किया है .प्रथम द्रष्टया कल्पनाशील एवं भाव-प्रवण प्रतीत होते हुए भी उनके सभी निबंध अपनी अन्तिम निष्पत्ति में वैचारिक ही हैं .ये निबन्ध जिस बिम्बधर्मी काव्यात्मक रचाव वाली गद्यभाषा में सृजित हुए हैं ,उसमें देशज-आंचलिक शब्दावली तथा लोकजीवन के पारंपरिक अनुभवों एवं सांस्कृतिक स्मृतियों कि महत्वपूर्ण समृद्धिकारी भूमिका में है .
             उमेश प्रसाद सिंह के निबंधों को पढ़ना उनके काव्यात्मक गद्य ,लोक से प्राप्त अनुभवों की ऐन्द्रिक एवं सजीव प्रस्तुति तथा अंतर्व्यापी गहन विचारशीलता के कारण किसी रंगीन चलचित्र को देखने से कम नहीं है .इस अनुभव का रहस्य उनकी ऐन्द्रिक बिम्बों एवं दृश्यावलियों का सम्प्रेषण करने में समर्थ उस गद्य भाषा में है जो लेखक के आशय ,रूचि –अरुचि तथा मनःस्थिति को भी अत्यंत सूक्ष्मता एवं सामर्थ्य के साथ व्यंजित कर पाती है .पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि किसी लम्बी कविता की पंक्तियों को ही गद्य की शैली में रख दिया गया है –“न किसी का मान है ,न कहीं ईमान है ,फिर भी गजब का इत्मीनान है .”(पृष्ठ 138) लोकसूक्तियों और सुभाषितों की तो लड़ी ही उनकी भाषा पिरोती चलती है –“हवा का चारण हो जाना ,समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है .(व्ही ,पृष्ठ 138 ) लोक –अनुभवों का सीधे बिम्बात्मक इश्तेमाल उमेश की गद्य-भाषा को विशिष्ट बनाता है –“किसी के आने से आँखों में फुल खिल उठाते हैं ,मगर किसी का आना इस कदर होता है कि सांसों का सरगम करह उठता है .रास रचाने में लीं जल-तरंगें विवर्ण हो जाती है .उल्लास की समूची फसल असमय में ही पियारा कर पाक जाती है .दाने-दाने में छलकता हुआ रस सुखाकर सियारा जाता है .पद-पद पर विहंसती हुई गंध बिला जाती है .”(पृष्ठ 136)
        ‘एक साँझ की ऊँचाई ‘ शीर्षक निबंध मिथकीय ,पौराणिक एवं सांस्कृतिक विश्वासों में पराधीनता एवं गुलामी के संस्कारों की खोज बादलों के प्रतीक के माध्यम से करती है .बादलों का किसी इंद्रा के आधिपत्य में होना लेखक को स्वीकार नहीं .वह लोकतान्त्रिक मुक्ति की चेतना के साथ उनके अस्तित्व और अभिदान को महिमामंडित और पुनर्व्याख्यायित करना चाहता है .मार्क्स द्वारा रजा के स्थान पर श्रमिकों को इतिहास-निर्माता के रूप में महिमामंडित करने की तरह .  
     ‘मुक्ति की मर्यादा ‘ शीर्षक निबंध आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेद्वी के साहित्यिक-सांस्क्रतिक अवदान का नई पीढ़ी के साहित्यकार द्वारा किया गया सार्थक पुनर्मूल्यांकन है .लेखक नें उन्हें भयमुक्त करने वाले और मानवमन की अदम्य जिजीविषा की आराधना के मंत्रस्रष्टा साहित्यकार के रूप में याद किया है .साथ ही व्यवस्था से असहमति को सत्य के संधान तथा मानव सभ्यता के विकास की दृष्टि से मूल्यवान मानने के लिए उनकी सराहना की है .क्योकि ‘जीवन के पक्ष में खड़ी असहमति को ;विद्रोह को जब द्विवेद्वी जी अपना समर्थन देते हैं ‘विद्रोह भी एक व्यवस्था बन जाता है (पृष्ठ 105)
‘मदारी की जबान में इतिहास का पाठ’ शीर्षक निबंध लोकतान्त्रिक समय में अलोकतांत्रिक एवं निरंकुश सत्ता-चरित्र पर लिखा एक काव्यात्मक एवं व्यंग्यात्मक भर्त्सना –पत्र ही है सारी बात बसंत .ग्रीष्म .हवा और पेड़ के रूपक के माध्यम से की गयी है .आदमी के कद से उसकी परछाई का बड़ी दिखने की मारक टिपण्णी जहाँ विज्ञापित सच और वास्तविक सच के अंतर के प्रति सजग करती है तो न्याय नैतिकता और सत्य जैसे मूल्यों के बाजारवादी हश्र को .सूरज को खरीद लेने ‘ के मुहावरे के माध्यम से चोट की गयी है .स्वस्थ आस्था की गहरी जड़ें ही पेड़ों की तरह मनुष्य को भी सूखने से बचा सकती हैं –ऐसा लेखक का मत है
     ‘मेरे अवगुण चित न धरो ‘.निबंध में उपभोक्ता सेवा युग के आदुनिक दुनियादार गुरुओं की मूल्यहीनता और चरित्रहीनता का व्यंग्यात्मक पुनर्पाठ प्रस्तुत किया गया है .इस निबंध में एक सफल आचार्य के व्याख्यान के शिल्प में शाश्वत मूल्य वाले पाठ्यक्रम और पाठ से अलग ,जीवन में सफलता के अनैतिक व्यवहार –सूत्रों का अत्यंत सूक्षमता एवं परिहास के साथ विडंबनात्मक अंकन है –‘कुछ भी करना है करो प्रभु को खुश करके .हमारे आजाद देश की खुशामदी संस्कृति का स्रोत भक्ति –काव्य से ही फूटता है इसके लिए हमारा राष्ट्र भक्त कवियों का ऋणी है.
     कंचन-मृग में निबंधकार नें विविध मानवीय जीवनानुभवों एवं हरसंभव आयामों में रामकथा के पौराणिक सीता-हरण प्रसंग को रखकर देखा है .यह निबंध मनुष्य की सर्वकालिक अर्थाग्रस्त मानसिकता को मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों ही स्टारों पर विश्लेषित करने का प्रयास करता है .वह कभी उकता कथा-प्रसंगा का स्वाभाविक विश्लेषण करता है-सीता का मन होता तो ...(पृष्ठ १५५ ) तो कभी वर्त्तमान समय के मारीचों के आर्थिक व्यवहार को समझाने-समझंने के लिए नाटकीय काव्यरूपक में बदल देता है . इस तरह यह निबंध आर्थिक आसक्ति से लेकर अतिक्रमण तक कंचन-मृग का साहित्यिक-सामाजिक -मनोवैज्ञानिक निरूपण प्रस्तुत करता है .लेखक का यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है कि 'जो न होते हुए भी होने जैसा बहस होता है ,शायद वह ही कंचन-मृग होता है . 




समीक्षित पुस्तक –नदी सूखने की सदी में
लेखक – उमेश प्रसाद सिंह
प्रकाशक – बैनियन ट्री पब्लिशर्स ,1376  कश्मीरी गेट ,नईदिल्ली -110006
मूल्य- 350 रु ०  

सोमवार, 7 मार्च 2016

आस्था

महाशिवरात्रि पर कुछ लिखने के लिए सोचते समय .मुझे लगता है इस रात्रि की कल्पना भय ,अन्धकार और नींद के विरुद्ध जागने के लिए की गयी होगी .इसे सोने की प्रकृति के विरुद्ध जागरण का संकल्प भी कहा जा सकता है .बचपन में इस तिथि को मित्रों के साथ जाग कर देखा था .उस रात जागना भी किसी युद्ध से कम नहीं लगा था .ऐसी आध्यात्मिक साधनाएँ सिर्फ अपनी ही गवाही पर चलती हैं .जैसे जगे तो प्रमाणपत्र ले लिया कि एक रात जगा था .वैसे भी एक रात की नींद जीत लेना कम तो नहीं है .कुछ दे कर ही गया होगा .और कुछ नहीं तो संस्मरण ही .बाकी शिव जी के जिम्मे है .एक रहस्य की बात यह है कि मुझे बड़े लोगों को खुश करने की कला नहीं आती .उलटे उनके नाराज होने का डर अधिक सताता है .व्यक्तिगत रूप में मैं ईश्वर को कम से कम परेशान करना चाहता हूँ .मैं कुछ ऐसा सोचता हूँ कि मेरे परेशान न करने से ईश्वर का जो समय और दिमाग बचेगा उसके इश्तेमाल से ईश्वर दूसरों का भला कर पाएगे .छोटी-मोटी इच्छाएँ मैं परिश्रम से ही पूरी करना चाहता हूँ .कम से कम जीवन-सुविधाओं एवं ख़राब या सामान्य समझी जाने वाली जीवन की परिस्थितियों में भी जीने का अभ्यास बनाए रखा है.दूसरे शब्दों में कहें तो आवश्यकताएं , इच्छाएँ एवं आदतें इतनी सामान्य रखी हैं कि कभी ऐसा लगा ही नहीं कि ईश्वर को बुलाना पड़ेगा अब ! नौकरी भी वही की जो साक्षात्कार की भीड़ में स्वतःस्फूर्त ढंग से बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मिली .पिताजी नें इतने सम्मान से रखा था कि चापलूसी करना सीखा ही नहीं पाया.उनका भी रवैया अधिक श्रम की कीमत चुकाते हुए भी - कष्ट सहकर ईमानदार बने रहने का था.संभवतः इसी पृष्ठभूमि और संस्कार के कारण ही पूजा कर ईश्वर का ध्यान आकर्षित करने से उलट मेरा प्रयास यह रहा कि ईश्वर मेरी आराम देने और उसे कम से कम छेडने की नीति से प्रसन्न होगा -ऐसा मैं किशोरावस्था में भी सोचता था और आज भी कुछ वैसा ही प्रयास है.कुछअधिक संवेदनशील होने पर ईश्वर का चरित्र ही संदिग्ध लगता रहा है.इसे भी मैंने कदाचित उसके वास्तव में होने पर उसके सुधार की भावना से ही नहीं छिपाया है.कई बार लिखा है.वेसे भी मेरी दिलचस्पी मनुष्य के ईश्वर उसके सामाजिक व्यवहार,उसके नफा-नुकसान,उसकी महत्वाकांक्षाओं को समझने में अधिक है.क्योंकि मानवीय ईश्वर सीधे-सीधे मनुष्य जाति के स्वार्थों का प्रतिरूप मुझे दिखता है.जमीनी ईश्वर के बारे में मार्क्स की टिप्पणियों से भी पूरी तरह सहमत पाता हूँ.अन्धविश्वासों सेमुक्त होने का सबसे अच्छा तरीका यह लगता है कि मानवजाति की उस जनसँख्या से सीखा जाय जो बिना उस अंध-विश्वास के निर्द्वंद्व जीती है.

रविवार, 6 मार्च 2016

असुरक्षा का अन्धकार

जीवन के साथ मृत्यु और अन्धकार का अचेतन भय हमें अपने पूर्वजों से ही मिला है .हम अपनी सुरक्षा की चिंता के साथ डरते और सावधान रहते हैं .यह भय हमें आगामी खतरों के प्रति भी सावधान करता है .हमारे पूर्वज जंगलों में अधिक असुरक्षित परिस्थितियों में रहे थे .प्रकृति उनके लिए सिर्फ मित्रवत ही नहीं थी .वह शत्रुवत भी थी .हमारा डरना उन्हीं पूर्वजों से विरासत में मिला है .हमारे दुह्स्वप्न भी उसी श्रंखला की जीवन-प्रक्रियाएं हैं .प्रायः सभी संस्कृतियों में नकारात्मकता को अलौकिक शक्तियों से जोड़ा गया है .पश्चिम में शैतान और भारत में असुर शक्तियों की परिकक्पना ऐसी ही हैं .बाद में अधिक व्यवस्थित समाज होनें पर भारत में असुरक्षा चिंता कम हो गयी .असुर भारतीयों की दार्शनिक चिंता और चिंतन से बाहर हो गए .सांख्य दर्शन के प्रभाव स्वरूप गीता में अधोपतन की जिम्मेदारी स्वयं व्यक्ति पर ही डाल दी गयी -आत्मा आप ही अपना मित्र है और शत्रु है -के रूप में .विश्व को त्रिगुणात्मक माना गया -इस तरह तामसी गुण के आधार पर आसुरी शक्तियां आसुरी प्रवृत्तियां हो गयीं .स्पष्ट है कि इस समय तक मानवेतर प्रकृति से चुनौतियां कम हो गयीं थीं .बड़ी बस्तियां और नगरों का विकास होने से तथा अस्त्र-शास्त्रों का विकास हो जाने से जंगल मनुष्य के लिए अधिक भयप्रद नहीं रह गए थे .उसे अस्तित्वगत चुनौतियां मानवीय जगत के भीतर से ही मिलनी शुरू हो गयी थीं .सुरक्षित रहने के लिए अधिक शक्तिशाली होना जरुरी हो गया था .व्यायाम से शक्तिवृद्धि करना इस दौर की प्रमुख आवश्यकताएं थीं ,पहले तीरों के विकास नें और फिर बंदूकों के विकास नें बलशाली होने को अनावश्यक बना दिया .अब कम शक्तिशाली व्यक्ति भी किसी की हत्या कर सकता था .
             भारत के सांस्कृतिक इतिहास में इस्लाम-पूर्व का लम्बा समय व्यवस्थित सामाजिक व्यवस्था का रहा है .चुनौतियां इतनी कम रही हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी राजघराने आनुवंशिक रूप से बने रहे .एक आनुवंशिक स्थिर समाज सामनें आया .समाज तात्कालिक विधि-निषेधों से नहीं बल्कि परम्पराओं से संचालित होने लगा .भारत में जाति-प्रथा के सर्वस्वीकृत होने का भी यही समय है .इसी समय कोई सांसारिक चुनौती न होने के कारण एक और राजतंत्र तो दूसरी ओर एकल ईश्वर का प्रभुत्व सर्वमान्य हो गया .भारत की उर्वर प्रकृति नें यहाँ के जीवन को इतना आश्वस्त किया कि शैतान या असुर -चिंतन भारतीय संस्कृति और धर्म-चिंतन से बहार ही निकल गया . इस्लामी आक्रमणकारियों के आने पर यहाँ के राजाओं के स्थान पर बादशाह प्रतिष्ठित हो गए और भारतीय चिंतन में इस्लाम के शैतान इबलीस की भी प्रविष्टि भारतीय धर्म और दर्शन में देखने को नहीं मिलती .व्यवस्था न बदलने और प्रजा का संरचनात्मक जीवनस्तर और स्वरूप वही रहने से उसका ईश्वर भी नहीं भी नहीं बदला .
             यद्यपि असुरक्षाएं अब भी बनी हुई हैं .यदि मनुष्य जीनेटिक और आनुवंशिक रूप से ही अपराधी है तो भी समाज के भीतर से भी आतंरिक चुनौतियां और असुरक्षाएं बनी रहेगीं.यहं तक कि साम्यवादी व्यवस्था में भी प्रेम-हिंसा और यौन हिंसा बनी रह सकती है .व्यक्तिगत रूचि-अरुचि पसंद-नापसंद का प्रश्न बना ही रहेगा -लोग अपमानित होने पर प्रतिहिंसक भी हो सकते हैं -यह संभावना बनी रहेगी ..जर जोरू और जमीन के मुहावरे के अनुसार तो धन की विषमता के बाद यौन-सम्बन्ध मानव-मानव के बीच विवाद का दूसरा प्रमुख कारण है .तीसरा कारण भूमि है .राहुल सांकृत्यायन  नें अपने यूटोपिया परक उपन्यास 'बाईसवीं सदी '  में निजी संपत्ति के समाप्त होते ही विश्व को अपराध-मुक्त मान लिया है .यह सच है कि दांपत्य के निजी करण  या विवाह-संस्था के उदय का कारण निजी संपत्ति और पूंजीवादी व्यवस्था में उत्तराधिकार का प्रश्न ही है .इस तरह यौन-हिंसा की समाप्ति भी मनुष्य जाति को बिना वस्त्र और धन से हीन किए बिना संभव नहीं है .ऐसा करना पुनः जंगली जीवन की और लौटना ही होगा .

गुरुवार, 3 मार्च 2016

इंदिरा गाँधी और आपातकाल

भारतीय लोकतंत्र के आपातकालीन निहितार्थ
                                       
                                           रामप्रकाश कुशवाहा


आपातकाल का जो सबसे अधिक कुत्सित पक्ष था -वह था अभिव्यक्ति की आजादी का छिनना। न्यायपालिका को अपने ढंग से एक तरह से आपातकाल लगाने से पहले ही प्रभावित कर दिया गया था-इंदिरा गाँधी को आरोप -मुक्त करने के लिए। लेकिन नेहरू-गाँधी परिवार का भारतीय जनता से जो रिश्ता था। इंदिरा गाँधी की तानाशाही विश्व की तानाशाहियों की सापेक्षता में कई दृष्टियों से अलग ही मानी जाएगी। वह एक चुनी हुई सरकार को सत्ता से बेदखल कर सत्ता में आने का मामला नहीं था। वह जनता द्वारा वैधानिक ढंग से एक चुनी गयी सरकार का अपनी वैधानिकता पर लगाए गए एक आरोप और उससे सम्बंधित न्यायिक निर्णय से एक सरकार का असहमत होकर सत्ता में बने रहने के प्रयास के रूप में था। देखा जाय तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नामकरण के बावजूद उनकी पार्टी को जनसामान्य इंदिरा कांग्रेस के रूप में ही जानता और मानता था। कांग्रेस के विभाजन के बाद अघोषित रूप से वे अपनी पार्टी की पर्याय बन गयी थीं। न्यायालय के विरोधी निर्णय के बाद इंदिरा गाँधी चाहतीं तो स्वयं पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपरोक्ष संचालन करते हुए भी किसी और को प्रधानमंत्री के रूप में प्रतिनियुक्त कर सकती थीं। यद्यपि छःवर्ष तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने वाले न्यायलय के निर्णय नें उनको संसद भंग कर फिर से जनता के सामने निर्वाचन के लिए जाने से पहले ही वंचित कर दिया था। आरोप के औचित्य की दृष्टि से देखें तो पार्टी लोकतंत्र और उसकी मुखिया होने के कारण इंदिरा कांग्रेस पूरे देश में जीती थी.इसलिए सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र में उनका स्वयं का निर्वाचन अवैध घोषित होने के बावजूद वे बहुमत से चुनी गयी सरकार की मुखिया थीं। उन्होंने न्यायालय को प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों का सम्मान नहीं किया। ऐसा करना किसी देश के राजनीतिक अभिसमयों -परम्पराओं की दृष्टि से जरूरी था। यद्यपि आपातकाल को भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय मान लिया गया है। इसके बावजूद इसकी पृष्ठभूमि और उसके कारको की और पड़ताल जरूरी है;साथ ही उठने वाले कुछ अन्य प्रश्नों का भी।मुझे यह नहीं पता कि किसी भ्रष्ट या चापलूस नौकरशाह नें स्वयं तो नहीं इतनी सेवाएँ दे दीं कि वह उनके विरुद्ध एक प्रमाण ही बन गया .राजनीतिज्ञ प्रायः सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के लिए ऐसा करते हैं .न्यायलय नें अवश्य ही इस बिंदु पर ध्यान दिया होगा .
     पहला प्रश्न तो भारत की सुरक्षा नीति का है। रामधुन गाते हुए महात्मा गाँधी की हत्या के बाद भी इस देश के राजनीतिज्ञों नें कुछ नहीं सीखा। फलतः देश का इतिहास तीन गांधियों (इंदिरा और राजीव ) की निर्मम हत्या का साक्षी बना। राजनारायण के वाद और इंदिरा गाँधी के चुनाव को अवैध घोषित कर देने वाले प्रसंग में एक विचारणीय परिस्थिति आती है कि चुनाव आचार-संहिता लागू होते ही प्रधानमंत्री को जो अब भी कार्यकारी के रूप में कार्य कर रहा होता है -अपने निर्वाचन क्षेत्र में प्रधानमंत्री रह चुकने के सुरक्षात्मक विशेषाधिकारों के साथ जाना चाहिए या नहीं !सिद्धान्ततःवह एक आम नागरिक की तरह ही जनता के पास मतदान के आग्रह के लिए जाता है। ध्यान देने की बात है कि नयी सरकार के गठन के पूर्व तक देश की सुरक्षा और प्रशासन का दारोमदार अब भी उसी पर है। युद्ध छिड़ जाने या बाहरी आक्रमण की स्थिति में वह ही वैधानिक शासक के रूप में कार्य करेगा। ऐसी स्थिति को देखते हुए इंदिरा जी से चुनावी भाषणों के लिए पैदल चलना या रिक्शे पर चलने की मांग करना अनौचित्य पूर्ण लगता है। क्योकि जनता यदि नापसंद करना चाहेगी तो सरकारी वायुयान से आने के बाद भी यदि चुनावी धांधली सरकारी मशीनरी नहीं करती है तो किसी भी प्रत्याशी को चुनने से इंकार कर सकती है। इस समस्या का निराकरण पार्टियाँ अपने स्तर पर किराये के वायुयान और हेलिकाप्टर लेकर करती हैं। यदि हम एक मानवीय समस्या के रूप में इंदिरा गाँधी को ही उदाहरण बना कर देखें तो स्वराज भवन और आनंद भवन को राष्ट्र को सौंपकर संग्रहालय बना देने के कारण -यदि दिल्ली में उनकी अपनी संपत्ति नहीं रही हो या केवल सरकारी आबंटित बंगले में ही रहती रही हों तो वे तकनीकी रूप से बेघर का दर्जा प्राप्त कर सकती थीं। राजनीति भी क्योकि एक पेशा है ,एक पेशेवर राजनीतिज्ञ से यह उम्मीद करना कि वह अपनी आजीविका के लिए कोई और भी धंधा करता रहे -वह एक पूंजीवादी व्यवस्था का संचालन तो करे लेकिन स्वयम गाँधीवादी ढंग से भिक्षा-याचन यानि चंदा उगाही करे -काफी अपमानजनक और निरीह बनने वाला आदर्श है। प्रश्न यह है कि हमारा संविधान इस समस्या को लेकर इतना विवेक-चुप क्यों है कि यदि भारत में पार्टी लोकतंत्र रहना है तो उन पार्टियों का वित्त पोषण कैसे होगा ! इसके लिए कुछ सीमा निर्धारित कर कोई कर भी लगाया जा सकता था। उन्हें अपने ढंग से चंदा लेकर वित्त-व्यवस्था के लिए असुरक्षित छोड़ दिया गया है। महात्मा गाँधी की परंपरा में वे भी भारतीय पूंजीपतियों पर निर्भर हैं। वे चंदे के लिए आदान-प्रदान योजना के अंतर्गत उचित-अनुचित लाभ पहुंचाती रहती हैं। इससे हुआ यह है कि भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह वित्त निर्भरता के कारण पुजीपतियों के हाथ में चला गया है। 
           कहने का तात्पर्य यह है कि दलों के वित्त पोषण सम्बन्धी इस संवैधानिक मौन के कारण भारत का लोकतंत्र बिना व्यावहारिक भ्रष्टाचार के नहीं चलाया जा सकता .यह उसकी असैद्धांतिक किन्तु व्यावहारिक अपरिहार्यता है . फिर भी विपक्षी को फंसाने या दूसरी पार्टियों के नेताओं की इज्जत उतारने के लिए इस संवैधानिक अपर्याप्तता का प्रयोग किया जाता है .यह भारतीय नौकरशाही के लिए एक सर्वमान्य सत्य है कि विशुद्ध नैतिकता और व्यवस्था-संचालन में कार्यात्मक विरोध है . में ऐसा मानता हूँ कि इंदिरा गाँधी भी भारतीय संविधान की कार्यात्मक अनुभवहीनता की शिकार हुईं .संविधान निर्माताओं नें इसके कार्यात्मक पक्ष और तंत्र-संचालन पर पर्याप्त विचार नहीं किया था .एक अंतर्विरोध यह भी है कि मतदान का नागरिक अधिकार व्यक्तिगत है लेकिन उसपर ढांचागत दबाव किसी संगठन या दल के प्रत्याशी को मत देने का रहता है .इस तरह उसपर निरंतर व्यक्ति को नहीं बल्कि संगठन को मत देने का दबाव रहता है . 
      मैं ऐसा मानता हूँ कि इंदिरा गाँधी भी विरासत में मिली इसी संवैधानिक अस्पष्टता की शिकार हुई थीं। राजनीतिक पार्टियों पर वित्त-संग्रह के इस दबाव नें अनेक असंवैधानिक चोर रास्ते सृजित किए। उसमें से ठीकेदारी प्रथा ,दलालों को पोषण ,सरकारी कामों को मूल्य बढ़ा कर करना आदि भ्रष्टाचार प्रमुख है ! इसी वित्त संग्रह के गोपनीय तरीकों को सार्वजनिक कर विश्वनाथप्रताप सिंह नें काफी श्रेय अर्जित किया और सत्ता में आए .ऐसे ही प्रयास में राजीव गाँधी की सरकार विश्वनाथ प्रताप सिंह के द्वारा बाफोर्स घोटाला प्रकरण में अपमानित हुई .जबकि यह कांग्रेस पार्टी के वजूद के लिए अत्यंत आवश्यक और सामान्य बात थी .गाँधी जी स्वयं बिरला एवं अन्य उद्योगपतियों से मिले वित्त पर निर्भर करते थे .कांग्रेस के लिए चंदा उगाही एक नैतिक प्रश्न कभी भी नहीं रहा .इसीलिए उसने इसे संवैधानिक स्वरूप देने की कोशिश भी कभी नहीं की . यह इतना आम है कि सरकारी कार्यक्रमों में अतिथियों के लिए काजू और किसमिस का पैसा वास्तव में कोलतार के क्रय-मूल्य में शामिल हो सकता है।
         मुझे याद है काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में आयोजित सेमिनार में भ्रष्टाचार पर अपना शोध -पत्र पढ़ाने वाले राजनीति विज्ञानं के एक प्रोफ़ेसर से प्रश्न -प्रहार में जब मैंने यही प्रश्न पूछा और कहा था कि बाफोर्स और चारा -घोटाला जैसी समस्याए भारतीय संविधान की एक खामी या चुप्पी की भी उपज है। यदि आपने पार्टी लोकतंत्र स्वीकार किया है तो पार्टियों के वित्त -पोषण की संवैधानिक व्यवस्था भी देनी चाहिए थी। जो व्यय अपरिहार्य है उसे परदे के पीछे से संदिग्ध शैली में कराना संगठनात्मक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है। यह भी संभव है कि एक साजिश के तहत सत्तासीन नेताओं ने जानबूझ कर ऐसा कर रखा हैे कि किसान , मजदूर या मध्य-वर्ग के बुद्धिजीवी आसानी से चुनाव लड़कर चुनौती न दे सकें। -अनैतिक दिखते हुए भी बोफोर्स घोटाला ,चारा घोटाला इस संवैधानिक खामी और अपर्याप्तता की भी उपज है. जिन आधारों पर इदिरा जी का चुनाव अवैध न्यायलय ने माना था उसकी कीमत देश को बाद में राजीव गाँधी की हत्या के रूप में सामने आई .इंदिरा जी की गलती सिर्फ इतनी थी  कि उन्होंने चुनाव एक सामान्य प्रत्याशी के रूप में नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के रूप में लड़ा था.राजनारायण जी का आरोप संवैधानिक रूप से या यह कहें कि कानूनी तकनीकी स्तर पर सही था.उनपर काला धन लेकर चुनाव लड़ते रहने का आप आरोप भी लगा सकते है ,उनकेू आनंद भवन् और स्वराज भवन की कीमत कितनी होगी,आमदनी काो कोई निजी जरिया नहीं था .उनके पास.,संविधान में कोई प्रावधान नहीं था कि चुनाव खर्च के लिए टैक्स लगाकर पार्टियों को धन उपलब्ध कराया जाय। फिर इतने बड़े देश और पार्टी का संचालन कैसे किया या किया जा सकता है -यह प्रश्न क्यों विचारणीय नहीं है .,इसी खामी को पार्टियाँ काले धन से पूरा करती हैं.राज्य प्रत्याशी बनते ही चुनाव का खर्च क्यों नहीं उठाता-ऐसा संभव है कि स्वतंत्रता के पूर्व से चली आती चंदा परंपरा के कारण कांग्रेस को कभी लगा ही नहीं हो कि इसके लिए किसी संवैधानिक प्रावधान की जरुरत है। इन परिस्थितियों में अनुचित संसाधनों से चुनाव लड़कर यदि इंदिरा जी हतप्रभ और अपमानित हुईं-और उसकी प्रतिक्रिया में आपातकाल लगाया-उनका भी एक पक्ष तो बनता ही है कि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा बचाने केलिए आपातकाल लगाया. न्यायालय ने उनपर आगामी छः वर्षों तके चुनाव लड़ने के अयोग्य होने की सजा भी सुनाई थी-ऐसे में उनके पास कोई विकल्प ही नहीं था.अपनी विशिष्ट मनोवैज्ञानिक बनावट के कारण भी वे लोकतंत्र की शपथों को भूलते हुए ब्रिटिश उत्तराधिकार वाली प्रशासन शैली की और अग्रसर होती गयीं.
      विरासत की अभिमानिनी इंदिरा गाँधी यदि अपने श्रेष्ठता के अहंकार के कारण मनोवैज्ञानिक रूप से असामान्य न हो गयीं होती तो उनके लिए सीमित आपातकाल लगाना अधिक शिष्ट होता। तब नेताओं को गिरफ्तार कर ,साहित्यकारों को जेल भिजवा कर उन्होंने अपनी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया को प्रतिशोधात्मक विस्तार नहीं दिया होता। इससे आपातकाल एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक त्रासदी में बदल गया। अन्यथा नेहरू परिवार की होने के कारण इंदिराजी की देश निष्ठा असंदिग्ध थी -आपातकाल को भारत में लोकतंत्र का स्थगित होना माना जाता है-सैद्धांतिक आदर्शवाद की दृष्टि से गलत होते हुए भी भारत में अंग्रेजी राज्य की तरह उसके भी ऐतिहासिक फायदे और भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसने स्वातंत्र्योत्तर भारत में आम जनता को कांग्रेस पार्टी का विकल्प तलाशने के लिए गंभीरता से प्रेरित किया। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रान्ति के आवाहन नें देश को दूसरी आजादी की परिकल्पना दी। यद्यपि यह दूसरी आजादी जनता पार्टी के अंतर्विरोधों से अंततः दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। लेकिन इसने नयी संभावनाओं के द्वार खोले। कई प्रधानमंत्री और कई मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी से बाहर से बने। इसे राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में देखा जाना उचित ही है। अब देश के पास विकल्प है। देश एक अधिक आत्मविश्वास पूर्ण लोकतंत्र के दौर से गुजर रहा है। अब लोकतान्त्रिक तानाशाही के हश्र का ऐतिहासिक दृष्टांत भी देश के पास है। जनता अधिक पेशेवर और दक्ष हुई है। इसका उदाहरण मोदी के प्रभुत्व के लगभग सामानांतर ही केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने वाला जनाधार देने में भी देखा जा सकता है।
    आज आपातकाल राजनीतिक प्रतिरोध का भी एक ऐतिहासिक अनुभव भी है। दरअसल हर ऐतिहासिक अनुभव क्रिया-प्रतिक्रिया की लम्बी श्रंखला को जन्म देते . इसीलिए बुरे अनुभव भी व्यर्थ नहीं जाते उपयोगी ही होते हैै. यद्यपि मेंरी और मेरे समवयस्क मित्रों की युवावस्था संपूर्ण क्रान्ति के नारों को दुहराती हुई भारतीय सविधान का दुरुपयोग करने के कारण इंदिरा जी से घृणा करते हुए बीती है.उन दिनों मैं भी राजनीति विज्ञानं का विद्यार्थी था. यह भी एक कारण था कि किताबों में वर्णित लोकतंत्र से भारतीय लोकतंत्र कुलीनतंत्र लगता था। आपातकाल से एक फायदा अनुभव का ही है-जो वैक्सीनेशन और प्रतिरोध की ऐतिहासिक स्मृति ही देता है। यह देश के दीर्घकालिक हित में है कि वह हम भारतीयों की कुलीनतावाद में यानि खानदानी निष्ठां की पराकाष्ठा से लोकतान्त्रिक स्वाभिमान की ओर मोड़ता है। यह सीख मिलती है कि भारतीय विवेक कभी भी किसी व्यक्ति या समूह का बंधुआ बनकर नहीं रहा है। 
      अब जब कि इतिहास में भारतीय लोकतंत्र का वह अपमान-काल बीत गया है। उसकी आलोचना के साथ -साथ और बावजूद भी प्रशंसा के जो बिंदु बनते हैं उसमें सबसे ऊपर है नसबन्दी कार्यक्रम-जिसको उसके बाद कभी भी भारतीय राष्ट्र नें गंभीरता से नहीं लिया। प्रशंसा का दूसरा बिंदु है कि आपातकाल में ही भारतीय प्रशासनिक तंत्र या नौकरशाही की अधिकतम कार्यकुशलता का प्रदर्शन हुआ..तीसरी उपलब्धि है भारतीय जनता द्वारा द्वारा गैरकांग्रेसी सत्ता की वैकल्पिक तलाश.जेल में ही -सही एक साथ बंद होने पर विपक्षी नेताओं की तात्कालिक दोस्ती-जो जनतापार्टी के सत्ता में आने पर तत्कालीन नेताओं के सत्ता-लोलुप चेहरों का बेनकाब होना.यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल के बाद हुई उनकी हार में भारतीय जनता की विशुद्ध नकारात्मक प्रतिक्रिया शामिल थी या जयप्रकाश नारायण का भारतीय जनमानस को उकसाने वाला नया आशावाद जिसकी पृष्ठभूमि पर जनता पार्टी सत्ता में आई और इसी काल में अपनी संयमित एवं शिष्ट भूमिका के कारण जनसंघ नाम से पीछा छुड़ाकर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई .जिसकी चरम परिणति हम मोदी की सत्ता के रूप में देखा रहे हैं .इसमें संदेह नहीं कि आपातकाल ने अनेक मोहभंग कराए और भारतीय लोकतंत्र के सभी पक्षों को अधिक समझदार भी बनाया; साथ ही कई अनुत्तरित प्रश्न भी छोड़े हैं ,जिनका समाधान भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ भविष्य के लिए जरूरी है .