गुरुवार, 24 सितंबर 2020

विचारशीलता और विचारधारा

विचारशीलता और  विचारधारा 


 मेरी दृष्टि में समय,सूचना और सभ्यता के विकास के सापेक्ष होने के कारण कोई भी विचार या विचारधारा पूर्णता को प्राप्त रुप में स्थिर हो ही नहीं सकती । इसी कारण मेरे लिए विचारशीलता, विचार करने की शक्ति और उसका कौशल मानव सभ्यता के विकास की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है । यह विचारधाराओं के पिछले इतिहास और अनुभव से प्राप्त सीख है और यदि वादी होना बहुत जरुरी हो तो मैं संभावना और विचारवादी ही होना चाहूँगा । वैसे भी मैं दर्शन की पृष्ठभूमि से नहीं बल्कि मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि से आया हूँ । मेरे लिये तथ्यों की प्रतीक्षा और उचित सम्मान के बावजूद निष्कर्ष (अन्तिम) अधिक मायने नहीं रखते बल्कि सोचना ही अधिक महत्वपूर्ण है । मुझे बहुवैकल्पिक सृजनधर्मी होने से अनेकांतवाद प्रिय है । मैं सिर्फ समझदार बनने- बनाने के लिये ही लिखना और सोचना पसंद करता हूं । शिक्षक एव्ं विज्ञान की पृष्ठभूमि से आने के कारण हानि और लाभ तथा गुण और दोष दोनो पर समान ध्यान देता हुँ। क्योंकि हर नयी सूचना ही हमारे-आपके निष्कर्ष बदल सकती है-इसके लिये मैं तैयार रहता हुँ । अधिकांश लोग उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर ही जल्दी से जल्दी इसलिये निष्कर्ष पाना चाहते हैं क्योंकि वे विचार की थकाने वाली मानसिक प्रक्रिया से जल्दी से जल्दी बाहर निकलकर आराम पाना या सुखी होना चाहते हैं । इसे मैं आलस्य,आराम पाने की जड़ता के रुप में देखता हूँ । यही जड़ता यथास्थिति और रुढ़िवाद को जन्म देती है ।

क्योंकि अधिकांश संगठन और उनके नेतृत्व की पद्धति और तंंत्र आदिम हैं और वे समावेशी वैचारिकता का सम्मान करते नहीं दिखते इसीलिए मैं अभी तक उपलब्ध राजनीतिक दलों की शक की नजर से देखने के लिये विवश हुँ । मैं अभी भी किसी आदर्श-आगामी की तलाश और प्रतीक्षा में हुँ और आपको मेरी प्रतिबद्धता को लेकर अनावश्यक शिकयतपूर्ण नहीं होना चाहिए ।
यद्यपि विचारधाराओं की प्रगतिशील और स्वस्थ परम्परा का पुनर्शोधंन करते रहने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन संशय एव्ं द्वंद्व की स्थिति में वैज्ञानिक आधुनिकता को ही निर्णायक होना चाहिए । उसमें भटकाव का जोखिम हो तब भी क्योंकि भविष्य के लिये भी सही होने की परीक्षा उसकी ही की जानी है ।
जहाँ तक साहित्य का प्रश्न है कला होने के साथ वह भी लोकशिक्षा का एक सशक्त माध्यम भी है । उसका उद्देश्य सिर्फ पूर्वनिर्धारित ज्ञान देने तक ही सीमित कभी नहीं हो सकता । यदि वह ज्ञान की खोज के लिये उचित-अनुचित की परख, आवश्यक प्रशिक्षण और सामर्थ्य भी नही देता ।