शनिवार, 24 मई 2014

आस्तिकता का समाज - विज्ञान

भारत में विचारधारा विशेष को जीने और मानने वालों के लिए अच्छे दिन आ गए है। इस लिए कि वे जिस सांस्कृतिक पर्यावरण को जीना चाहते थे ,उसका अब समकालीन राजनीति से अब कोई विरोध और चुनौती नहीं है। उनके विरोधी हतोत्साहित हुए हैं और वे पूरी उन्मुक्तता के साथ अपने चित्त  जिएंगे। ऐसे में संभव है कि आध्यात्मिकता का अतिरिक्त महिमामंडन हो. इसमें मुख्य चिंतनीय बात यह है कि भारतीय संस्कृति की मुख्य धारा समर्पण वादी है। इसमें विरोध और असहमति जीने की कोई सशक्त जातीय परंपरा नहीं मिलती।
       मैं भी यह मानता हूँ कि ईश्वर के भरोसे जीना अत्यंत सुखदायी होता है। सच तो यही है कि बचपन में माता-पिता पर आश्रित होने के कारण हम  सभी समर्पण और आस्था वादी होते है। यह वह दौर होता है जब हम स्वयं को मिली दुनिया को पूरी तरह सच मानकर उसे पूरी सहमति के साथ जीने का प्रयास करते हैं। लेकिन जैसे - जैसे हम समझदार होते जाते हैं ,यथार्थ जगत के अभावों और अंतर्विरोधों से परिचित होते जाते  हैं ,हमारे लिए पूर्ण समर्पणवादी और आस्तिक होना मुश्किल होता जाता है। हम जैसे -जैसे व्यवस्था से मोहभंग के शिकार होते जाते हैं ,वैसे -वैसे भीतर से अपराध-बोध के शिकार होते जाते हैं कि हमारे बचपन का स्वर्ग छिन गया है।
      हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी समस्या को ईश्वर पर छोड़ने  मतलब सामाजिक स्तर  पर दूसरों के विवेक पर छोड़ना भी हो सकता है। यदि हम दूसरों से अयोग्य और मुर्ख है तो आस्तिक और समर्पण वादी होना फायदेमंद हो सकता है , विपरीत यदि दूसरे हमारी तुलना में बेवकूफ औरअयोग्य हुए तो  आस्तिक   होकर कुछ अच्छा घटने की प्रतीक्षा करना सिर्फ समय बरबाद करना ही होगा। ऐसी आस्तिकता और समर्पण से कोई भला होने वाला नहीं है। इसी लिए असंतुष्टों और बुद्धिमानों के लिए ज्ञानमार्गी होना ही उचित है और मूर्खों तथा अयोग्यों के लिए भक्तिमार्गी  होना।
        इस इस तरह विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया कि अगल-बगल मुर्ख और अयोग्य अधिक हों तो संशयवादी और ज्ञानमार्गी  होना ही श्रेयष्कर है। इसके विपरीत यदि अगल-बगल अधिक योग्य और बुद्धिमान व्यक्ति उपस्थित हों ,जिन पर भरोसा किया जा सकता हो तो चुपचाप दूसरों का नेतृत्व स्वीकार कर उन्हें सहयोग देना ही उचित है। ऐसे ऐसे में सिर्फ महत्वकांशा से वशीभूत होकर किया गया विरोध सिर्फ वातावरण ही ख़राब करता है। इससे समाज का भला नहीं होगा।   

शुक्रवार, 23 मई 2014

अरविंद केजरीवाल और उनकी फ्लॉप आप पर दृष्टिपात

आप यानि आम आदमी पार्टी जैसे एक राजनीतिक मंच की ऐतिहासिक जरुरत भारत को है। यह एक ऐसी जरुरी उपस्थिति की तरह है जैसे हाथी के लिए अंकुश। क्योकि विपक्ष कमजोर हुआ है , स्थिति में चर्चा में बने रहने के विशेषज्ञ अरविन्द केजरीवाल की सार्थक  भूमिका बनी रहेगी। अरविन्द वस्तुतः भारतीय राजनीति में फुटपाथ  हीरो हैं। यह व्यक्ति कहीं से भी सेलिब्रेटी नहीं लगता। बस में मिले तो कोई जल्दी सीट भी नहीं देगा। अरविन्द केजरीवाल में मध्यवर्ग की सारी कमजोरियां भी हैं। यह व्यक्ति कहीं से भी राजनीतिज्ञ नहीं बन पाया है। इस व्यक्ति की सीमा यह  है कि इसे आलोचना और विरोध की भाषा तो आती है ,लेकिन प्रेम  आत्मीयता की नहीं। यह मैं इस आधार पर कह रहा हूँ कि यह व्यक्ति अपना कुनबा एकजुट नहीं रख पाया। अन्ना हजारे हों या किरण बेदी सब इतनी जल्दी अलग -अलग रास्ते पर चले गए कि ऐसा संदेह होने लगा कि यह केजरी का क्रांतिकारी शुद्धतावाद है या महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व का दुष्प्रभाव !
        मैं एक कल्पना और करता रहा हूँ कि क्या यदि आप सफल हो जाती तो उस पार्टी में गए बुद्धिजीवियों की हैसियत वैसी ही बनी होती जैसी कि उनकी समाज में है। मुझे ऐसा क्यों लगता रहा है कि केजरीवाल अभी अपने व्यक्तित्व और भूमिका को लेकर सावधान नहीं हैं। जैसे कांग्रेस में जाने का मतलब अपने व्यक्तिव की स्वाधीनता खोकर राहुल गांधी की सर्वकालिक श्रेष्ठता को स्वीकार करना होता है ,वैसी ही दशा-दिशा अरविन्द केजरीवाल की पार्टी में जाने वाले बुद्धिजीवियों की भी दिख रही थी। य़दि ऐसा होता है तो आप भी एक दूसरी कांग्रेस बन कर ही रह जाएगी। यदि केजरीवाल नहीं बदले तो भारतीय राजनीति में एक नए लोकतांत्रिक मंच की आवश्यकता बनी  रहेगी। यदि केजरीवाल चाहते हैं कि  उनकी आप पार्टी संभावनाशील भूमिका में बनी रहे तो  उचित माध्यम बनने की साधना करनी होगी। अपना ही अध्ययन कर अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को को पहचानना होगा , अपना शोधन करना होगा। अभी तो  केजरीवाल को अपने और मुखर ,आत्मीय और उदार व्यक्तित्व की तलाश करनी होगी। वे दरअसल विध्वंसात्मक भूमिका और गतिविधियों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने कांग्रेस का सफल विध्वंस किया। उसे उसे सत्ता से बाहर  कर दिया। लेकिन सृजनात्मक विश्वसनीयता कम होने से भारतीय जनता मोदी के आश्वासनों को अजमाने की दिशा में मुड़ गयी।