शुक्रवार, 7 जून 2013

ज्ञानेन्द्रपति : समय -संवेदन और जीवन-विमर्श के भाष्यकार

(साहित्यिक पत्रिका -"चिन्तन-दिशा" के  ,जनवरी-मार्च २०१३अंक में  ,संपादक-हृदयेश मयंक ,ए -७०१,आशीर्वाद -१,पूनम सागर काम्प्लेक्स ,मीरा रोड (पूर्व)मुम्बई-४०११०७ से प्रकाशित )

ज्ञानेन्द्रपति  :  समय -संवेदन और जीवन-विमर्श के  भाष्यकार                                               


 ज्ञानेन्द्रपति निराला  और  नागार्जुन की उदात्त संवेदना वाली कवि-परंपरा में सक्रिय समकालीन हिंदी कविता का एक बड़ा नाम है .मुक्तिबोध  के बाद हिंदी की अपनी भव्य या या शानदार कविता (क्लासिक कविता के अर्थ में ) के गंभीरतापूर्वक सक्रिय एकमात्र कवि है .यद्यपि प्रतिभा और सम्भावना के स्तर पर आलोकधन्वा उनके के साथ सहयात्री रहे है ,लेकिन फ़िलहाल तो अपनी बहुआयामिता के कारण अप्रतिस्पर्धी है .उनकी इस उदात्त काव्यप्रतिभा का निदर्शन उनके पहले ही प्रकाशित काव्यसंग्रह 'आँख हाथ बनते हुए '(1970) में संकलित  कविता 'एक गर्भवती औरत के प्रति कविताएँ ' में देखी जा सकती है .यह कविता स्त्री का उसके मातृत्व के लिए ससम्मान ब्रह्माण्ड व्यापी बिम्ब में रूपायन करती है .पहली कविता एक स्त्री -जीवन के अस्तित्वगत अर्थवत्ता को एक विराट और सर्वव्यापी प्रत्यक्षीकरण के रूप में प्रस्तुत करती है।  यह कविता अपनी विशेषताओं के लिए सिर्फ हिंदी की ही नहीं ,बल्कि विश्वकविता की भी महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है .कविता इस प्रकार है-'यह तुम्हारा उदर ब्रह्माण्ड हो गया है ./इसमे क्या है ?एक बन रहा शिशु भर ?/झिल्ली में लिपटी मांस पहनती चेतना .बस ?/कितनी फैलाती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की /तुम क्या जानो /कि अन्तरिक्ष तक चली गई है यह विरूप गोलाई और ये /पेड़-पौधे ,माकन,सड़कें ,मैं ,यह पोल ,वह कुत्ता ,उछलता वह मेढक /रंभाती गाय ,बाड़ कतरता माली ,क्षितिज पर का सूरज /सब उसके  अन्दर चले गये हैं /और तुम भी .''इस कविता में वह दार्शनिक प्रत्यायन का गुण भी  जा सकता है , जो ज्ञानेन्द्रपति  की कविताओं की मूलभूत विशेषता है . यह विशेषता उनकी कविताओं को तात्कालिक संवेदना से स्थाई प्रज्ञा की खोज की ओर ले जाती है .काल या समय को जीना और उसका अतिक्रमण यानि संवेदना और बोध दोनों की ही कविता में निष्पत्ति ज्ञानेंद्रपति की कविताओं को विशिष्ट बनती है .उनकी कविताओं में मिलने वाली यह दृष्टि या आँख इतिहास,परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक सभ्यता के सम्यक बोध से एक प्रबुद्ध सर्जक संस्कार के रूप में ज्ञानेन्द्रपति में आई है .यही कारण है कि ज्ञानेन्द्रपति का कवि अपने समय में भी है और सर्वकालिक भी .उनकी कविताएँ जीवन और कला,संवेदना और सृजन दोनों की ही साधना और दक्षता का परिणाम है। यही वह  है जो उनकी कविताओं को नक्सलबाड़ी  आन्दोलन से प्रेरित होकर अपनी काव्ययात्रा का आरम्भ करने वाले समकालीन अन्य जनकवि अरुणकमल और आलोकधन्वा से अलग करती है .अरुणकमल तात्कालिक संवेदना से ऊपर नहीं उठ पाते और आलोकधन्वा आन्दोलनकाल से अर्जित अपनी प्रसिद्ध आवेशमयी कलात्मक मुद्रा और भंगिमा से। उनकी पीदी के कवियों में यह अतिक्रमण सिर्फ ज्ञानेंद्रपति में दीखता है .वे पर्यावरण की सम्पूर्ण चिता के कवि हैं -कविताओं में उपस्थित यह पर्यावरण प्रकृति से लेकर मनुष्य तक ,सुदूरवर्ती विकास-वंचित गाँव से लेकर प्राचीन और आधुनिक सभ्यता के संरक्षक और वाहक नगरों और महानगरों तक,इतना ही नहीं संवेदनात्मक,मानसिक और सांस्कृतिक स्तर तक भी फैला है . हर कविता में कवि एक सम्पूर्ण दृष्टि स्वायत्त करना चाहता है।उसकी दृष्टि संवेदना और विमर्श दोनों पर है .संशयात्मा में संकलित उनके 'टी 0वि 0युग के कवि 'शीर्षक कविता को उदहारण स्वरूप देखा जा सकता है .अपने राजनितिक उद्देश्य के लिए भावी पीढ़ी को भी भ्रष्ट करने की कूट साजिशो  के एक आधुनिक माध्यम के रूप में टी0वी 0 और उसके  कवियों की भूमिका की पड़ताल कवि मिथकीय धरातल पर करता है .यह मिथकीय बिम्ब सत्ता के पुरातन जनविरोधी चरित्र का भी खुलासा करता है -   "सत्ता की पूतनाएँ /पहचानती राजसत्ता को चुनौती दे सकने वाले अंग-लक्षण "(संशयात्मा ,पृ 093)ज्ञानेन्द्रपति की बहुत -सी कविताए एक संवेदनशील गंभीर विचारक का समय -विमर्श हैं .वे समकालीन अव्यवस्था से एक प्रतिबद्ध कवि के मानसिक संघर्ष या मुठभेड़ की तरह हैं।इस क्रम में उनकी कविताएँ 1970 के बाद के भारतीय समाज और इतिहास का संवेदनात्मक और वैचारिक पड़ताल पर्स्तुत करती हैं।उनकी कविताएँ कवि की ओर से एक आदर्श संवेदनशील मानवीय समाज और व्यवस्था की प्रस्तावना  की तरह है। वे मुक्तिबोध और धूमिल के बाद के समय के सबसे प्रमाणिक भाष्यकार कवि हैं। उनकी कविताएँ एक लम्बे समय के विद्रूप यथार्थ की न सिर्फ साक्षी हैं ,बल्कि उनसे जूझते हुए परिदृश्य में उपस्थित हर उलझन को सुलझाती चलती हैं। उनके पास विचारधाराओं की जनपक्षधर सूक्ष्म विश्लेषक वैज्ञानिक समझ है। विवेक की पूर्वाग्रह रहित वह निर्मम तटस्थता है जो किसी महत्वपूर्ण साहित्यकार को देर तक विश्वसनीय और प्रासंगिक बनाये रखती है .वह अद्यतन समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टि है ,जो उनकी कविताओं को हिंदी के पूर्ववर्ती कविओं की कविताओं में व्यक्त समझ से अधिक परिष्कृत और निर्दोष बनती है .          वर्ष 2004 में राधाकृष्ण से प्रकाशित उनके 'संशयात्मा ' संग्रह में प्रकाशित कविताओं के शीर्षक पर ही दृष्टिपात करें तो उनकी कविताओं की बहुआयामिता और विषय -विस्तार का पता चलता है .गाँव के घर,आदिवासी गाँव से गुजरती सड़क ,झारखण्ड के पहाड़ ,धूमिल की खेवली ,,जर्सिडीह स्टेशन ,बिड़ला का तारामंडल                हिन्दी में प्रबंध -काव्य और  महाकाव्य शब्द प्रायः पर्यायवाची की तरह प्रयुक्त होता रहा है ,लेकिन प्रबन्ध -कवि होना महाकवि होना कभी नहीं रहा है .कवित्व की सामर्थ्य एवं पुरुषार्थ संभवतः उसकी संवेदनात्मक व्याप्ति एवं यात्रा में है .उसकी अन्तर्दृष्टि एवं कलात्मक जीवन्तता में है.कवि की नवान्वेषी समझ एवं उसकी दूरदर्शिता जो प्रायः घटनाशीलता की प्रवृत्यात्मक पहचान तथा काव्यात्मक अनुभव की भविष्योन्मुख सार्थकता पर आधारित होती है -किसी कवि के रचनाकर्म को महत्वपूर्ण बनाती है। कविता   पर विचार करते समय किसी कवि और उसकी कविता का सिर्फ बाह्य  रूपाकार ही महत्वपूर्ण नहीं होता ,बल्कि उसके काव्यात्मक मानस का  देने वाली अभिव्यक्ति की  काव्यात्मक संरचना भी महत्वपूर्ण है ,जो उस कवि की संवेगात्मकता के साथ-साथ उसकी मौलिक कल्पनाशीलता को भी व्यक्त  करे .ऐसा इसलिए  जरुरी है कि  यह कल्पनाशीलता ही उसे सामान्य मनुष्य की कल्पनाशीलता की   सीमा से आगे और  महत्वपूर्ण बनाती है .यह विशिष्टता ही सामान्य मनुष्य के कथन से उसके कथन को अलग और महत्वपूर्ण बनती है .आचार्य शुक्ल  ने इसे ही विशेष के माध्यम से सामान्य तक पहुँचने की प्राविधि के रूप में  देखा और उसे सामान्यीकरण कहा कहा है .,मुंबई का समुद्र -तट ,अस्पताल का लाशघर ,ढेलहवा  बाबा ,फजिर की अजान ,थायलंड और कंचनजंघा ,नन्हा-सा कीड़ा ,,मेढक ,कछुअशिशु ,गिद्ध-वृक्ष ,प्लास्टिक के सुग्गे,खेसाड़ी  दाल ,भाप-इंजन ,चन्द्रबिन्दु,मूर्धन्य ष ,कवी मन बहादुर सिंह की हत्या,,मानव-बम ,गमछे की गंध ,खर्पट्टू,सगीर मिया ,इथियोपिया ,खाड़ी -युद्ध ,सैलून ,वाहनों कपिछा करती पत्तियां और बच्चे  तथा गणतंत्र दिवस सभी कुछ है .        एक ऐसे समय में जबकि कविता लिखने वाले कवियों की संख्या हजारों में है ,कई पीढियां संचार माध्यमों से अपने -अपने रिश्ते के साथ सक्रिय हैं ,किसी कवि के सापेक्षिक महत्व की तलाश की कसौटी उसकी अछूती संवेदन्शीलता और यथार्थ की प्रथम अन्वेषी दृष्टि ही हो सकती है .इस कसौटी पर परखें तो मुझे नहीं लगता कि किसी समकालीन कवि के पास  'क्षितिज -शोक 'उत्तर -परमात्मा 'और 'फजिर की अजान ' जैसी कवितायेँ हैं .ज्ञानेन्द्रपति हिंदी के एक मात्र कवि हैं ,जिनमे मुक्तिबोध द्वारा अभीप्सित वर्ग -मुक्ति या वर्ग के अतिक्रमण का ईमानदार और निर्दोष आत्मसंघर्ष पूर्णरूपेण चरितार्थ हुआ हो .कम से कम साम्प्रदायिकता के विरुद्ध भी ज्ञानेन्द्रपति जैसा आत्मीय ,मानवीय और आह्लादक दृष्टिकोण या भावनीति किसी और के पास नहीं है .उनकी कविता " एक मंदिर की उन्नति -कथा 'अपनी निर्मम,नि:संग और स्पष्ट आलोचना के लिए निराला की उस कविता की यद् दिलाती है जिसमे वे बंदरों को चने खिलाने और मलिन भिखारी मनुष्य को 'दूर हट राक्षस 'कहने वाले अमानवीय (अ )धार्मिक की भर्तस्नाकरते हैं .यह कविता धर्मोपजीवी अर्थतंत्र की गहन पड़ताल कराती है . एक आदिवासी गाँव से गुजरती सड़क 'कविता सड़क के निर्माण के प्रयोजन से जोड़ कर उस सड़क का व्यक्तित्व -निर्माण और उसका प्रत्यक्षीकरण कराती है -                        ''चमक पड़ा मर्म /आदिवासी गाँव की छाती से गुजरती सड़क का /की हमारी शोषण की सभ्यता का /कि जिसकी बाँह राजधानी से /यहाँ तक यह आई है /लुटेरी बाँह /टटोलती इसकी छाती के कोयले आत्मा का अबरख / यह सड़क/ कि यह नहीं राजधानी से बहती आई सभ्यता की नदी / कि इससे नहीं कोई सम्बन्ध /इसके किनारे बसे हुओं का /सिवा इसके कि /पिपासु पहियों के नीचे आ जाते हैं जब -तब /इनके चूजे और बच्चे /और अड़हुल -सा खिला किसी युवती का यौवन रौदा जाता है .''(संशयात्मा ,पृ o 21)           आधुनिक नगरीय विकासात्मक विध्वंस की इतनी कटु टिप्पणी किसी और हिंदी कवि के यहाँ नहीं मिलती ,जैसी कि उनकी कविता " क्षितिज -शोक " में -    "एक दिन अचानक / शहर अपना एक और नाख़ून बढ़ा देता है  /उठ आता है आकाश में एक और कंकरीट के कुकुरमुत्ते का शीश ".(संशयात्मा,पृ 0 48)इसी तरह मुक्त अर्थव्यवस्था और भूमंडलीकरण युग के बाजार के चरित्र का सर्वश्रेष्ठ एवं अपरिहार्य रूपक उनकी कविता 'उत्तर -परमात्मा 'प्रस्तुत करती है .क्षितिज -शोक,उत्तर -परमात्मा और फजिर की अजान कवि ज्ञानेन्द्रपति की ऐसी निर्विकल्प  मौलिक कविताएँ हैं ,जैसी की किसी ने नहीं लिखी .निर्विवाद श्रेष्ठता की अद्वितीय एवं अनन्य .      फजिर की अजान को चिड़ियों की चहचहाहट की तरह जीवन के सूनेपन में अस्तित्व और उपस्थिति का रंग भरने वाली आत्मीय आवाज की तरह ज्ञानेन्द्रपति ने इसी शीर्षक कविता में चित्रित किया है .कवि  उसे संप्रदाय विशेष की नहीं,बल्कि मानवीय जीवन और संवेदना की अपरिहार्य आवाज की तरह देखना और दिखाना चाहता है।इस कविता को पढ़ कर बचपन के अबोध मन से सुनी गयी अजान की उन आवाजों की याद ताज़ा हो जाती है ,जब सिर्फ बालसुलभ जिज्ञासा ही थी,सम्प्रदाय कलुषित मन नहीं -             फजिर की अजान /लाने चली  सूरज को /आकाशालंघी आलाप की लम्बी रस्सी से खींच /खिंचा चला आता है  में पानी /करता तर खुली टोंटियो वाले /देर से सन्नाते नलको के खुश्क हलक /और जग उठती है हलक में फंसी /दमदार बूढी देहों की दमदार खांसियाँ ''भारतीय भोर की आहट की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कराती यह कविता साम्प्रदायिक सौहार्द के एक नए युग के आवाहन के संकल्प के साथ खत्म होती है।           ज्ञानेंद्रपति प्रगतिशील उदात्त  एवं भव्य कविता की परिकल्पना के कवि है। उनमे भाषिक सामर्थ्य की वह  है जो उनसे पूर्ववर्ती कवियों में सिर्फ निराला और मुक्तिबोध में ही देखने को मिलती है .लेकिन उनकी बहुआयामी जीवन-साक्षात्कार और विमर्श के कवि होने की सृजनात्मक यात्रा ऐतिहासिक रूप से मुक्तिबोध को सिर्फ क्रन्तिकामी विक्षोभ के कवि के कवि के रूप में सीमित करती है .ज्ञानेंद्रपति की कविताओं को पढ़ने के बाद मेरे मन में मुक्तिबोध और उनके कविकर्म की तुलना को लेकर जो बिम्ब उभरता है,उसमे मुक्तिबोध के बाढ़ के समय की नदी के रूप में  आते है तो ज्ञानेन्द्रपति वर्षपर्यंत की प्रवाहशील नदी के रूप में ,जो जीवन-संघर्ष के हर रूप की साक्षी है .   नक्सलबाड़ी आन्दोलन की भाव -भूमि से प्रेरित ज्ञानेन्द्रपति और  उनकी पीढ़ी के आलोकधन्वा और अरुणकमल जैसे कवियों को  मै गुणवत्ताशील किन्तु आवेशपूर्ण क्रन्तिकारी नारे लिखनेवाली सीमित विषयवस्तु वाली ख्यातिलब्ध कवियों की त्रयी मानता था .आवेशधर्मी कविताओं के लिए आलोकधन्वा और ज्ञानेन्द्रपति समान प्रतीति के प्रतिस्पर्धी लगते थे।अरुणकमल की स्थिति ठंढा-लोहा जैसी थी .इसका कारण यह रहा है कि अरुणकमल की कविताएँ एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की मुद्रा और भंगिमा के चरित्र में संरचित है . इस त्रयी में ज्ञानेन्द्रपति इस लिए विशिष्ट हैं कि वे अपने समय के सबसे प्रामाणिक और व्यापक भाष्यकार और प्रतिनिधि चितेरे कवि हैं।अपने समय की सर्वाधिक विश्वसनीय और विचारपूर्ण समझ उनके पास है .           ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित और किताबघर द्वारा प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कविताओ के संचयन 'कवि ने कहा ' में संकलित 'कुछ कविताएँ और कुछ कविताएँ 'शीर्षक कविता में अपनी रचना-प्रक्रिया पर उनकी काव्यात्मक टिप्पणी इस प्रकार है-  'कुछ कविताएँ तो मै /खेतों से शकरकंद की तरह / खोद कर लाया / कुछ कविताएँ/तितलियों की तरह /खुली खिड़की से /घुस आयीं मेरे घर /कि अपने घर कुछ कविताओं के लिए मै /कितना-कितना घूमा /गो-यूथों के पीछे-पीछे /चरवाहे बालक-सी /कि साँझ उन्हें/दुह सकूँ /धारोष्ण .../कुछ कविताएँ  /कई -कई बिट्वन की कुतिया -माता सरीखी /दुधीले थन और गीली थूथन लिए लगी चली आई सड़क से /पीछे -पीछे मेरे दुआरे .'(कवि ने कहा ,पृ0 139-140) इस काव्य -उद्धरण में ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं और कवि की रचना-प्रक्रिया के सारे संकेत उपस्थित हैं।संवेदनात्मक परकाया प्रवेश,पर्यवेक्षण ,काव्य-श्रम और चिंतन और कवि स्वभावजन्य अयाचित प्रातिभ उपलब्धि -सभी काव्य-रूप एवं संरचनाएँ .            ज्ञानेन्द्रपति की ट्राम में एक याद ' कविता जो प्रायः अपनी पहली पंक्ति 'चेतना पारीक ,कैसी हो?'की याद से अधिक जानी जाती है .प्रथम द्रष्टया जो क्रन्तिकारी प्रेम-प्रभाव की कविता लगती है। दरअसल सामान्य स्त्री -जीवन की नियति और  त्राषद संभावनाओं की पृष्ठभूमि पर बुनी गयी है .अठारह प्रश्नचिन्हों से युक्त यह कविता पूर्वार्ध में जहाँ आधुनिक स्त्री के सकारात्मक पक्षों को याद करती हुई स्वस्थ एवं आदर्श आधुनिक प्रगतिशील स्त्री -जीवन का एक प्रतिरूप प्रस्तुत करती है ,वहीँ उत्तरार्ध मेंलेती हैं . अस्तित्व की महत्ता ,सार्थकता और वैभव का अविस्मर्णीय  आख्यान बन जाती है -                   इस महावन में फिर फिर भी एक गौरैये की जगह खाली है                   एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है                   महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है                   विराट धक्-धक् में एक धड़कन कम है ,कोरस में एक कंठ कम है                   तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते है ,उतनी जगह खाली हैज्ञानेन्द्रपति को मानवीय  और दुश्चिंताओं की अदभुत पहचान है .चाहे ' शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है 'में संकलित कविता 'बनानी बनर्जी 'का दुस्वप्न  हों या फिर 'गंगा-तट 'में संकलित कविता 'वे दो दाँत -तनिक बड़े 'कविता की नायिका मंजु श्रीवास्तव का सांवला रंग और तनिक बड़े दो दाँत हों -'जो डेंटिस्ट की नहीं ,एक चिंता की रेतियो से रेते जाते हैं।'यह करुणाशील कवि की मर्मभेदी आँख है जो लगाकर लोक -विचलन की शिकार दुखी आत्माओं की मानसिक यातना को सहृदय संवेदना के साथ पढ़ लेती हैं .ज्ञानेंद्रपति की कविताओं की यह सबसे प्रिय भूमिका है .यह शायद काव्य-विधा की ही आदिम भूमिका है .जो एक करुनाकातर संवेदनशील मानव-मन की सृष्टि करना चाहती हैं . बहुत -सी कविताएँ इसी भाव -स्म्वेद्य मनोभूमि की देखि जा सकती हैं .चाहे 'एक रेल  डिब्बे में'झाड़ू लगाकर भीख की जगह  के लिए पारिश्रमिक मांगने वाला दयनीय बच्चा हो -कवि की आँखों ने कई बार सामान्य मनुष्य से अदेखी  जाने वाली निरिह्ताओं को भी काव्य -विषय बनाया है .      उनकी  एक पंखुरी  और कविता ओशो वचन के   सौन्दर्यचेता प्रभावों का अंकन एक मित्र पर पड़े  के रूप में कर ती है .' हल्की-सी उदासी तुम्हे  है ' के   कवि  अपने जीवनानुभवो का साझा करता है .अपने कवि की  भूमिका को ज्ञानेन्द्रपति नेने  अपनी 'क्यों न 'शीर्षक   कविता में इस रूप में व्यक्त  किया है -'क्यों न कुछ निराला लिखें /इक नयी  लिखें/ का राज चौतरफा चौतरफ/एक  तीली उजाला लिखें  xxx खल  पोतें दुन्या  पर एक ही  रंग /हम वैनिआहपीनाला लिखें'.इसी तरह 'कबिरा खड़ा बाजार में ' कविता कबीर की नियति को समकालीन नकारात्मक  संभावनाओ के परिप्रेक्ष्य में रखकर पुनर्मुल्यांकन करती है .कबीर साहब की छह सौवीं जयंती के उत्सव के बहाने यह कविता कबीर का उत्सव मना रहे दो वर्गों के चरित्र के माध्यम से यथार्थ का बहुआयामी चरित्र उकेरती है .यथार्थ अभिजन और सामान्यजन के अलग-अलग चेहरों को देखने -दिखाने वाली कविता यथार्थबोध का कलान्तरण भी प्रस्तुत करती है .कबीर के समय का यथार्थ और वर्त्तमान समय का यथार्थ-यह कविता यथार्थ के कलान्तरण का शोधपूर्ण साक्षात्कार है .कबीर पर आयोजित विचारगोष्ठी में शामिल राज्यपाल और प्रोफ़ेसर के ज्ञान और माया के द्वैत पर व्यंग्यात्मक वाले टिप्पणी कराती हुई यह कविता कबीर के बहाने आज की तारीख में भी लावारिस शिशुओ के आपराधिक हश्र तथा कालीन उद्योग में बाल -श्रम के शोषक इस्तेमाल की समस्या की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है .               ज्ञानेन्द्रपति ऐसे ऐसे  कवि नहीं  कि उनकी  कविताओं पर विहंगम या दूरवर्ती आलोचना लिखी जाय ,न ही उनमे प्रतिभाहीन निष्ठा से  उपजीहुई वह एकयामिता ही मिलती है कि वाद के  मंच पर बैठी हुई पूर्व-नियोजित एवं प्रत्याशित आलोचना पहले से हीही आपने  करते करते आलोचना-मान लिए स्वागत में बैठी हो . उनकी प्रतिभा ने नई सृजनशीलता के बीहड़ में भटकने का वह जोखिम भरपूर मिलता है,जिसने प्रगतिशीलता के रीतिकाल में भी प्रगतिशील कविता की प्रतिष्ठा बचाई अन्तर्दृष्टि है .अनुभूति,संवेदना या काव्यवस्तु के स्तर पर्ग्यानेंद्र्पति काव्यात्मक दुहराव या आदत के कवि नहीं है .उनकी हर कविता जीवन के साक्षात्कार की शत-प्रतिशत मौलिक सृजित परिघटना होती है ,लेकिन अभिव्यक्ति की  अपनी विशिष्ट शैली के कारण काव्यरूप के स्तर  पर उनकी कविताये जो निजी  पहचान संप्रेषित कराती हैं -वह कुछ रीझ और कुछ भाषिक व्यसन के साथ कलात्मक सम्पूर्णता का विशिष्ट  वितान अवश्य रचती है .उनकी इधर प्रकाशित" मनु को बनाती मनई " कविता -संग्रह की कविताएँ अपने शीर्षक के अनुरूप ही मानव-सभ्यता के स्त्री-पक्ष की पड़ताल कराती हैं.ज्ञानेन्द्रपतिका यह संग्रह संवेदनात्मक धरातल पर स्त्री-विमर्श के अधूरे वृत्त को पूरा करने के लिए पुरुष-मन के स्त्रियोचित रूपांतरण की प्रस्तावना करती हैं .ये कविताएँ मानव-जाति के अस्तित्व में स्त्री जाति के सकर्मक योगदान का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं .इन कविताओं में उपस्थित दुनिया मानव-जाति की आधी आबादी की छोटी-छोटी सक्रियताओं की दुनिया है ,जो पुरुष प्रधान दम्भी और बड़बोले अंधे  समाज  से प्रायः अनदेखा ही रह जाती है .स्त्री की वृहत्तर और उदात्त अन्विति इन कविताओं की विशेषता है .स्त्री जीवन के अलग-अलग  यथार्थ-भूमि से लिए गए   छोटे-छोटे चित्र  स्त्री जीवन का बहुआयामी ,सम्पूर्ण और औपन्यसिक वृत्तान्त रचाते हैं .इस दृष्टि से यह स्त्री-जीवन के विविध -पक्षों पर लिखी गयी एक शोधपरक महत्वाकांक्षी कृति है .         स्त्री-विमर्श को सभ्यता-विमर्श के व्यापक फलक से देखे जाने का रचनात्मक आग्रह करती हैं .ये कविताएँ स्त्री के पक्ष में खड़े होकर पुरुष-मन की काव्यात्मक प्रस्तावना और संवेदनात्मक अपील करती हैं .यह विमर्श के उस अधूरे वृत्त को पूरा करने का प्रयास है,जो केवल स्त्री-विमर्श के दायरे में संभव नहीं है .जैसे समाज का सम्पूर्ण रूपान्तरण बिना जाति-विमर्श के केवल दलित विमर्श से ही संभव नहीं ,जैसे शोषक विमर्श के बिना शोषित विमर्श जैसी कोई चीज नहीं हो सकती ;वैसे ही स्त्री-विमर्श के वृत्त को पूरा करने के लिए स्त्री केन्द्रित पुरुष-विमर्श भी करना ही होगा .जो लोग सिर्फ अलग पहचान के लिए इस तरह के विभाजन को बढ़ावा दे रहे हैं ,उन लोगों को स्त्रियों द्वारा प्रस्तुत स्त्री-विमर्श के साथ  इस संवेदनशील पुरुष कवि  द्वारा प्रस्तुत स्त्री-विमर्श को भी पढ़ना चाहिए .दरअसल दाम्पत्य समाज -निर्माण और सामाजिकता की प्राथमिक इकाई है .स्त्री के अस्तित्व का सिर्फ प्राकृतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और सभ्यतागत पक्ष भी है .इस लिए एक स्वस्थ विमर्श सभ्यता-विमर्श के रूप में ही हो सकता है .ज्ञानेन्द्रपति के इस संग्रह की भी अधिकांश कविताएँ  स्त्री जीवन के संवेदनशील और मार्मिक निरिक्षण की प्रक्रिया में सृजित हुई  हैं.इन कविताओं में भी ज्ञानेन्द्रपति जीवन के गहन अनुभवों और साक्षात्कार के कवि के रूप में सामने आते हैं .
               संकलन की पहली ही कविता "वह"स्त्री-नियति का सम्पूर्ण बिम्ब प्रस्तुत करती है -"उसके होंठ प्रेमिका के होंठ हैं /उसकी छातियाँ माँ की छातियाँ हैं /उसके हाथ मजदूर के हाथ हैं /इस दुनिया के भीतर गिरती-पड़ती /वह नहीं जानती /कि वह इसे लुढ़काए भी लिए जा रही है ".स्त्री के शिशु-रूप  की निष्पापता,वर्जनाओं और असुरक्षा से मुक्त उसके बल-सुलभ जिज्ञासा के मानवाधिकार को "तितली की तरह मडराती हुई "शीर्षक कविता बहुत ही संवेदनशील द्गंग से प्रस्तुत करती है .कविता स्नेह का एक आशंका मुक्त पाठ प्रस्तुत करती है .अभिभावकों का नेपथ्य विश्वास और पराए स्त्री-शिशु के प्रति सहज-आत्मीय स्नेह की दुर्लभता ही इस कविता को महत्वपूर्ण नहीं बनातीबल्कि अपनी जिज्ञासाओं के कारण अपराध का शिकार होने वाली स्त्री-शिशुओं की दुर्घटनात्मक सामाजिक स्मृति के परिप्रेक्ष्य में जिज्ञासु स्त्री-शिशु का तितली की तरह मडरा सकने का मानवाधिकार इस कविता को अतिरिक्त महत्ता प्रदान करता है .ज्ञानेन्द्रपति की ये कविताएँ एक स्वस्थ और संवेदनशील उदात्त भाव -बोध और मन  वाले प्रबुद्ध नागरिक के निर्माण का सृजनात्मक प्रयास और प्रस्तावना हैं .  काश!आकाश "कविता श्लीलता-अश्लीलता से मुक्त अपने नैसर्गिक बनावट के साथ स्त्री की सामाजिक स्वीकार्यता से है .वर्जनाओं -वासनाओं से लिपटे  बीमार पुरुष -दृष्टि वाले समाज में उनके छिनते समजकाश  की चिंता यह कविता इस टिपण्णी के साथ प्रस्तुत करती है कि'अपने अस्तित्व के प्रति कोई अपराध-बोध महसूस न करें वे.'"एक नई -नकोर लेडीज साईकिल " कविता का साहित्यिक सोंदर्य उस मनोवैज्ञानिक प्रत्याक्षीकरण में है जिसे मानवीकरण कहा जाता है .एक नए स्त्री-जीवन की उड़ान के प्रतीक के रूप में साईकिल का मानवीकरण  उदात्त जीवनबोध और बिम्बों के साथ किया गया है .माँ और बेटी का रिक्शे के पीछे नई साईकिल का लड़ कर लाना एक नए स्त्री जीवन के प्रति सम्मान का प्रतीक बना देता है . कवी उसे एक महँ दृश्य घोषित करता है .साईकिल का धरती पर न होना कल्पनाओं-संभावनाओं और आकांक्षाओं  की भविष्य-भूमि में एक नए स्त्री -जीवन का स्वागत है -" एक नई -नकोर लेडीज साईकिल/क्षितिज की और जाती हुई /अनगिन गतियों के वर्तुल बीज /उर में जुगोये मौन  ""ज्ञानेन्द्र पति की अनेक कविताओं में  बाजारवाद की अंधी दौड़ में   लुप्त होते सांस्कृतिक मनुष्य और उसके आर्थिक यथार्थ की मानवीय पड़ताल मिलती है .यह सांस्कृतिक मनुष्य धार्मिक मनुष्य नहीं ,बल्कि एक सभ्यतागत(स्त्री -) मनुष्य है .उत्सव का सांस्कृतिक पर्यावरण एक अलग अर्थ-तन्त्र  की रचना भी करता है .ज्ञानेन्द्र पति नें इन पेशों में निहित मानवीय सम्भावनाओं और संदेशों की भी आधुनिक दृष्टि  से पड़तालकी है ."दीवाली बे -दीया  कविता ऐसे ही एक उदास पेशे का शोक-गीत है-"एक कुम्हार की सधी उँगलियों नें तराश कर /उनमें जलने की उम्मीद भरी है /जलने की एक बुझी-बुझी -सी उम्मीद "कालोनी की सडकों पर दिए बेचने के लिए आवाज लगा रही माँ -बेटी के बहाने कवी नें ऐसे लोगों की का्यखबर ली है .इन कविताओं में ज्ञानेन्द्रपति जीवन-नियति की विविधता के साथ-साथ स्त्री जीवन के वर्गीय रूपों और रहस्यों का भी काफी दिलचस्प और विशेषज्ञ विश्लेषण प्रस्तुत करते है .उनकी गोलगप्पे कविता में एक सेठ घराने की स्थूल-का्य निष्क्रिय माँ -बेटी  के सुख -दुर्वह जीवन में  चिंतनीय कैलोरी अर्जन को एक नागरिक चेतावनी के रूप में "डायनासोर के बिस्तुइया रूप "कह कर औरों से साझा करता है .बाटी वाली ताई कविता बाजार में घर की संवेदनात्मक उपस्थिति वाली ताई की उर भारी बटिया तथा उसके घर गंधी ठेले का काव्यात्मक रेखा-चित्र है .एक संवेदनात्मक त्रिकालदर्शिता ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं को दूसरों के लेखन से अलग और विशिष्ट बनाती है .परम्परा और इतिहास बोध के साथ सजग भविष्य -बोध और वर्तमान यथार्थ तथा जड़ता से उपजी पर्यावरण -विनाश की आशंकाओं को सृजनात्मक हस्तक्षेप से दूर करने वाली सक्रिय अंतर्दृष्टि उनके कवि -कर्म को एक विशिष्ट सार्थक आयाम स\देती है .उनकी सभी कवितायेँ  समवेदन धर्मी बुद्धि की प्रस्तावना करती हैं .वे जीवन के प्रति सार्थक आसक्ति और स्वस्थ राग की खोज करती हैं.ज्ञानेन्द्रपति सही व्यवस्था की खोज के वामपन्थी प्रश्नों को सुरक्षित रखते हुए ,बिना किसी समझौते के संवेदनशील मनुष्य की खोज की यात्रा जारी रखते हैं . अपनी कविताओं में उनकी कविताएँ अनेक सांस्कृतिक -सामाजिक संरचनाओं में पड़े मनुष्य और मनुष्यता की खोज करती हैं .उनका कवि जितना भावुक और संवेदनशील है ,उतना ही बुद्धि-धर्मा भी .