बुधवार, 10 अगस्त 2016

कबीरदास : जल जलहिं समाना

(कबीर के जीवन-दर्शन मे व्याप्त मूल मानवीय संवेदना की खोज करने वाली मेरी यह लम्बी कविता मूलतः बीस वर्ष की अवस्था में १९७९-८० के आस-पास लिखी गयी थी .इस कविता को सर्वप्रथम प्रकाशित करने एवं बचाने का श्रेय कबीरचौरा ,वाराणसी स्थित कबीर मठ(मूल गादी ) के आदरणीय महंथ आचार्य श्री विवेक्दास जी को है .जल-जलहिं समाना 'शीर्षक इस कविता को उन्हें सौंपकर मैं लगभग भूल ही गया था .१९९८ में जब कबीर साहब की छठी शत वार्षिकी के अवसर पर उनके द्वारा प्रकाशित ढाई आखर 'पत्रिका में इस कविता को प्रकाशित एवं सुरक्षित देखा तो मेरे लिए इस कविता की पुनर्प्राप्ति जैसा ही था ,क्योंकि मेरे पास तब तक इस कविता की कोई भी मूल प्रति नहीं बची थी .इसी कविता को बाद में साहित्यिक पत्रिका " अभिनव कदम" में श्री जयप्रकाश धूमकेतु नें कई वर्षों बाद अब भी प्रासंगिक कह कर पुनर्प्रकाशित किया..इस कविता में युवा मन का निर्णायक विद्रोह साफ-साफ देखा जा सकता है.लिखते समय तथा आज भी इस कविता को पढ़ते समय मैं भावुक हो उठता हूँ.बहुत दिनों तक इस कविता को किसी भी धर्म ग्रन्थ से बढ़ कर पढ़ता रहता था.आज भी मुझे यह उतना ही संवेदनधर्मी और विचारोत्तेजक लगती है जितनी कि लिखते समय लगी थी . कबीर आज भी मेरे लिए आदर्श मानवता के सर्वकालिक प्रतिमान हैं.उनके पास एक सम्वेदना सम्मत विशुद्ध और अपना मानवीय स्वाभिमान को पोषित करने वाला ईश्वर है. वैसा ईश्वर और किसी के पास नहीं ।

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जल जलहिं समाना 
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धरती बांझ थी और आसमान पिता निरर्थक
नि:संतान था वह अपने पुत्र के बिना
प्रकृति विधवा थी और परम तत्त्व ओझल
तब अन्धकार की कोख में ज्योति की तरह वह उतरा......
तब चेतना डूबी थी विचारों की जड़ता में
और स्मृतियां जंगल में बदल गयीं थीं
पोथियों पर मूर्खताएं छपी थीं और ग्रन्थों में षडयन्त्र
कपटियों ने सारे प्रकाश को अपने पुत्रों-वंशजों के लिए
चुराकर बन्द कर लिया था
ज्ञान ऐश्वर्य के लिए था और ईश्वर व्यापारियों के लिए
परजीवियों का सत्य याचना के लिए-'मुल्ला का बांग' और 'पंडा का पाथर
मकड़ी जैसे अपने बुने जाल में पुकारती है कीट
धर्मग्रन्थों के शब्द कंटीली झाडि़यों में बदल गए थे- मारते हुए मनुष्य.....
जिन्हें कहा जा सकता है नीच-कहा जायेगा
बाझिन को बांझ.....कि दुखी का दु:ख सुखी के सुख का विषय है
निपूती का दु:ख.... गोद भरी मांओं की खुशी -हुआ ऐसा....
उतरा वह परम विवेक
जीवन-ज्यों सारे ब्रह्रााण्ड के गर्भ से अभी-अभी फूटा हुआ
निर्विकार अनाम पवित्र निस्सीम सागर-शिशु
आदिम मूल तत्त्व की तरह-अनन्त की ओर से
बंधीं और अनुर्वर मानव-जाति के लिए.....
तालाब में जैसे खिलता है कमल
शिशु मिला वह नीरू को अपूर्व
खुले आसमान के नीचे प्रकट हुर्इ दिव्य ज्योति
पुरानी बसितयों के अंधेरे सीलन भरे दुर्गन्धाते तहखानों और बूढ़ी कोठरियों से दूर
खुली हवा में-जंगल-सी अनछुर्इ-अबोध पवित्र और अनायास.....
किसका जीवन है यह !....सोचा नीरू नें
किसका जीवन है यह !....पूछा नीरू नें बार-बार
उसकी सारी प्रतिध्वनियां उस तक ही लौट आयीं.....
यह मेरे लिए है-उसने आसमान की ओर
कृतज्ञता से भरे अपने दोनों हाथ उठाए और झुक गया धरती की ओर
उठाने के लिए एक अपूर्व दिव्य शिशु......
जो किसी का नहीं है ,सबका है-आसमान नें कहा
मेरी धरती पर जो भी जन्मा है-मेरा है....मेरी ओर से है
विरासत है....प्रतिनिधि है सम्पूर्ण अस्तित्व का-दुहराया ब्रहमाण्ड नें बार-बार......
जो किसी का नहीं है ,सबका है
सारे मायावी जोड़-तोड़ और अंकों की भीड़ के लिए
यह सिर्फ एक मानव-शिशु ही नहीं एक विराट शून्य है-सत्य-स्फुर्लिंग !
काल-जनित विकृतियों के....इतिहास के दुखती स्मृतियों के
उन्मादों-अपराधों.... पापों-दुर्घटनाओं के सारे प्रदूषणों का अन्त यह.......
यह किसी का नहीं है ,सभी का है-सबके लिए.....सब कुछ की ओर से
भटके समाज के हर गणित को शून्य करता हुआ
निरस्त करता हुआ सारे गलत-जीवन छलका ज्यों
मानव-जाति की रुद्ध दीवारों वाली सारी परम्पराएं तोड़ ---
पूरे सागर-जल में विलीन होने के लिए
जीवन-जीवन से मिला ज्यों जल मिला जल से
जले हुए घरौंदे के बाहर का पूरा धरती घर
पत्थर और पत्तों की छत नहीं जिसकी
छत आलोक्गर्भा उन्मुक्त अंतरिक्ष की
उस अस्तित्व से जुडा अर्थ
जो है और अंटता नहीं देह और पन्नों के भीतर
मन की निर्द्वंद्व फड़कन –उल्लास असीम
उस होने के समानांतर –
समाज ज्यों उल्लुओं की जमात
अँधेरे खोहों में छुपी हुई
या उलटे लटके चमगादड़ों की फौज –बर्बर...रक्तपायी ..
.
घर लाया उसे
संपूर्ण मानव-जाति की ओर से उपजा
मुक्त और दिव्य शिशु
नीरू एक विदेह पिता
पिता –आत्मा से और मन से
पवित्र भाव से और अनुभूति से
बुद्धि से और चेतना से
युगों से अतृप्त की तृप्ति
आत्मा का पिता बना नीरू –आत्मा के पुत्र का
कबीर कहा उसे
घर लाया
जैसे बुझे हुए चूल्हे के लिए
यत्न से उठाकर लाया गया अंगार
जल उठा घर – नगर...दहक उठी बस्तियां
मंदिरों-मस्जिदों के कठघरे में पड़े रुद्ध सत्य को
भूकंप सा कंपाता हुआ अनंत-सत्य
सम्पूर्ण धरती के लिए
अपना मुक्त सन्देश लिखता हुआ ....
घर पहुंचा नीरू और शिशु को
अपनी निपूती पत्नी नीम को दिया दिव्य उपहार-सा
बड़ा होकर वह भी जुलाहा बना
लेकिन सिर्फ देह का नहीं
नंगी मानवता की आत्मा का भी ....
उसके बुने वस्त्रों की रुई चेतना की थी
और सूत विचार के
तर्कों के तकले पर काते गए विचार
उसके वस्त्रों के ताने सत्य के थे और बाने प्रेम के
सत्य और प्रेम के ताने बाने से
बुना उसनें एक नया दिव्य वस्त्र
एक नया ईश्वर विद्रोही और असंतुष्ट
बिके हुए संकीर्ण ईश्वर के खिलाफ
एक आत्मिक स्वाभिमान –सा
और मुक्त हस्त बांटा अपना क्रांतिकारी ईश्वर
भूखे-नंगों के बीच
अज्ञान में पड़े ज्ञान के अंधों के बीच
सर्वव्यापी को किया सर्वसुलभ
अदृश्य को किया दृश्य
निर्गुण को गुणात्मक किया
समदर्शी को समदर्शित
जीवन भर बुनता रहा आत्मा के वस्त्र
सजाता रहा जीवन
पहनाता रहा नंगी आत्माओं को पुकार-पुकार कर
कोई नहीं गाया
झूठी दुनियावों का दर्द उभड आया
सिर्फ गाता रहा कबीर
एक बड़े घर के लिए
छोटे खिलौना घरों को जलाकर
निकलने के लिए पुकारा उसने
उसका चुनौती भरा स्वर
खुली धुप में भी न देख पाती हुई
उलूकी आँखों वाली मिचमिची दुनिया के लिए था ...
एक विराट चुम्बक की तरह
हिन्दू-मुसलमानों में बंटे-बिखरे जीवनों को
लौह-कणों की तरह खींचा
पंडितों-पुरोहितों-मुल्लाओं द्वारा
मंदिरों और मस्जिदों को धर्म बेचने की दूकानों में
बदल दिए जाने के खिलाफ
पण्डे घबराए और मुल्ला
दूकानें सूनी पड़ने लगीं ग्राहकों के बिना.....
पंडों और मुल्लों नें कहा –
यह जुलाहे का पुत्र तो
हमारी दूकान बंद करा देगा
क्या और कैसे खाएंगे हम ?
यह कपड़ा बुनता है और जीता है
पद रचता है हमारे विरुद्ध
इसके रहते चल नहीं पाएगा
लोक आस्थाओं पर टिका हुआ
हमारा सनातन व्यापार ....
क्या शैतान हमारी कुछ भी सहायता नहीं करेगा ?
तब वे बादशाह के पास गए
बादशाह नें कबीर को बुलाया और देखा
वह उन सभी से सुन्दर भव्य और पवित्र था
जो चाहते थे उसके विरुद्ध मृत्यु का आदेश !
बादशाह धर्मसंकट में पड़ा
उसनें भीतर ही भीतर अपनें ईष्ट से प्रार्थना की
और प्रणाम किया उसे
कि वह स्वयं निरपराध रहेगा ....
प्रकट में उसने कहा –
यदि यह सारी दुनिया की आत्मा की ओर से है
और है परम ज्योति की ओर से
तो उसे पहचान लेगा पशु भी
उसनें कहा- हाथी लाओ और इसे
उसके विकराल पैरों से कुचलवा दो
इसे कोई मनुष्य नहीं मारेगा
क्या पता कि यह सारी मनुष्यता के लिए हो !
हाथी आया और उसनें चारों ओर उमड़ती
मूर्ख तमाशाई मनुष्यों की भीड़ के बीच
मैदान में जंजीरों से बंधा एक दिव्य मनुष्य देखा
उसनें पहचाना और प्रणाम किया
यह सारी दुनिया की आत्मा की ओर से है
जानकार बचाया और रास्ता काटते निकल गया
महावत नें उसे फिर-फिर अंकुश मारे
उसनें इनकार किया
बादशाह नें सिर झुका लिया
मुल्ला और पंडित घबराए
शैतान की हार देख
जनता नें हर्ष-ध्वनि की......
पंडितों और मुल्लाओं नें फिर सोचा
यह जुलाहे का पुत्र बचा निकला तो
वे सब नंगे हो जाएंगे
बंद हो जाएगी उनकी दूकान
उन सब नें बादशाह से फिर कहा –
यह हाथी तो भीड़ में भी लोगों को
बचाकर चलना जानता है
यह कुचल कर क्यों मारेगा कबीर को
इसे जंजीरों से बांधकर नदी में फेंक दिया जाए
डूब मरने के लिए .....
बादशाह नें कहा- यह ठीक है
इसे किसी मनुष्य के हाथों नहीं मरना चाहिए
क्या पता यह सारी मनुष्य जाति के लिए हो
नदी भी सारी दुनिया की आत्मा के अधीन है
इसकी मृत्यु का निर्णय भी करे नदी ....
जब कोतवाल उसे
नदी में डूबाने के लिए ले जा रहा था
उसके बनाए हुए पद आकाश तक गूंजे
फूट पड़े हजार-हजार कंठों से उसके गीत
साधुओं से भर गया पथ
जनता धिक्कार उठी
फिर भी बादशाह के आदेश और
बुराइयों की आत्मा की इच्छा से विवश
कोतवाल नें उसे मन के भीतर प्रणाम किया
क्या पता कि सारी दुनिया की सच्चाइयों की आत्मा
उस पर कोप करे
कोतवाल नें सहमें हाथों से उसे डुबाने के लिए
जंजीरों में उसे जकड़ा
शैतान के धर्मों नें उसे नदी में
बांधकर फेंक देने के लिए कहा था
ताकि कबीर डूब मरे
नदी नें पहचाना और इनकार किया
जंजीरें फिसल गयीं .....
वह बंधे हुओं को खोलने के लिए आया था
हुआ मुक्त
वह डूबते हुओं को
दुखों की नदी के पार बुलाने के लिए आया था
तैरता निकल गया उस पार ......
जनता के सहस्र –कंठों नें हर्ष-ध्वनि की .

(रचना-काल १९७८)
                                                                                           रामप्रकाश कुशवाहा