रविवार, 24 फ़रवरी 2013

मार्क्सवाद पर पुनर्विचार-३

(द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर एक पुनर्चिन्तन )


हर विचारधारा की अपनी आधार संकल्पनाएँ और पारिभाषिकी होती है जिसे कोई भी विचारक अपनी विचारधारात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप ही विकसित करता है या फिर प्रायः अपनी पूर्ववर्ती विचार-परंपरा से चुनता है .ये अवधारणाएँ जिनका कोई भी विचारक या दार्शनिक साक्षात्कार करता है  या फिर चुनता ही है -उसकी विचारधारा की अभिव्यक्ति और उददेश्य का माध्यम होती हैं .मार्क्सवाद में ही देखें तो मार्क्स नें विकास के इतिहास को व्याख्यायित करने  तथा अपनी विचारधारा में भविष्य के लक्ष्य साम्यवादी  क्रांति की सुनिश्चितता प्रतिपादित करने के लिए हीगेल से अपनी प्रसिद्द स्थापना द्वन्द्वात्मक भोतिक्वाद के सूत्र लिए थे -यह सूत्र वाद-प्रतिवाद और संवाद के माध्यम से  मानव-विकास की भविष्योन्मुख गतिशीलता की व्याख्या करता है .हीगेल नें यह स्थापना ज्ञानात्मक विकास के लिए दी थी जिसे मार्क्स ने सभ्यता के भौतिक विकास की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया .यह सूत्र योरोपीय समाजो के मानव स्वभाव की मनोवैज्ञानिक व्याख्या भी करता है .इसमें उनका परम्पराओं के प्रति संरक्षणवादी-रुढ़िवादी दृष्टिकोण तथा भविष्य निर्माण के प्रति साहसिक जोखिम के साथ भविष्य की ओर सभ्यतागत  यात्रा  की सांस्कृतिक अभिवृत्ति भी प्रत्यायित हुई है .
इसमें संदेह नहीं की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद साम्यवादी क्रान्ति की सुनिश्चितता को स्थापित करने वाला सर्वाधिक सशक्त दार्शनिक उपकरण था .
                लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान तथा ज्ञान की अन्य शाखाओं के विकास के बाद भी क्या मानव-विकास को समझाने के लिए सिर्फ इसी सूत्र पर ही निर्भर रहा जा सकता है.हमें मानव-सभ्यता के विकास को ज्ञान के सूचनात्मक विकास के रूप में भी देखना चाहिए और यथास्थितिवादी आलस्य तथा सामूहिकता की अनुकरणात्मक जड़ता और सापेक्षता में विकसित होने के कुण्ठित कर देने वाले सामाजिक दबाव की भूमिका को भी समझना चाहिए .मानव की विकास-विरोधी जड़ता के पीछे उसका वर्ग-स्वार्थ भी हो सकता है-मनुष्य-के स्वभाव को समझने की दिशा में मार्क्स का यह अवदान मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पर्यावरण और पारिस्थितिकी के मानव स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन का ही एक हिस्सा है .मनुष्य के संसाधनों और उसके आर्थिक व्यव्हार का उसके वर्ग-चरित्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अधूरे वृत्त को पूरा करती है .
                     मानव-विकास की निरन्तरता और सोद्देश्य गतिशीलता की दृष्टि से मानव-जाति की अनुकरणात्मक जड़ता और उसके पीदियों में विभाजित अभिभावक प्रशिक्षण-तन्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है ..यह प्रशिक्षण-तंत्र ही जातीय एवं सांस्कृतिक मानसिक एवं व्यावहारिकअधिरचानाओं को जन्म देती है .  इन्हें हम मानव-व्यव्हार के स्थायित्व के तंत्र भी कह सकते हैं .इनमें मानव-व्यव्हार के नैतिक मूल्य भी शामिल हैं .जिनका विकास कृषि-आधारित पूंजीवाद यानि सामन्तवाद नें किया है .विकास की दृष्टि से समक्न्त्वाद यद्यपि एक पिछड़ी आर्थिक व्यवस्था है ,लेकिन भूमि जैसी स्थाई पूंजी के आनुवांशिक स्वामित्व  सम्बन्धी नियमों और वर्जना-मूल्यों के विकास की दृष्टि से कृषि सभ्यता पर आधारित पूंजीवाद सांस्कृतिक स्थायित्व के रूप में महत्वपूर्ण व्यवस्थापन पद्धति देता है .पारिवारिक संवेदना और आत्मीयता का धार्मिक-साहित्यिक भाव-तंत्र इसी काल  की मूल्य-निर्मितियों पर आधारित है .
                      मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के वाद के विरुद्ध उससे अगले चरण प्रतिवाद को एक सामाजिक-संगठित प्रतिरोध की मनोवृत्ति  के रूप में देखें तो क्या द्वंद्वात्मक विकास इतनी सीधी-सपाट दार्शनिक ढंग की आसानी से समझ ली जाने वाली प्रक्रिया है ? यदि परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी सीधी-सपाट रहती तो फिर द्वंद्व ही किस बात का रहता .सच तो यह है की मनुष्य के सभ्यता की विकास-यात्रा उसके अनुभव जगत जो कि सूचनाओं के विराट स्मृति-तंत्र के रूप में है -उसके सृजनात्मक विकास और उपयोग से जुडी है .यह स्मृति-तन्त्र संरक्षण की विविध प्रविधियों के कारण घटने के स्थान पर निरन्तर बढ़ता ही जाता है .यह समझदारी की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक अंतहीन प्रक्रिया के रूप में है .क्योंकि मामला मानव-जाति के एक हिस्से को वर्ग-स्वार्थ के कारण संगठित रूप में  उपयोग या शोषण की भूमिका में रखने का है .यह द्वन्द्ववाद हिंसक क्रान्ति और प्रतिरोध के स्तर तक भी चला जाता है .यह सामाजिक शक्तियों और सत्ता की विकासोन्मुख रस्सा-कशी है .यह एक भीड़ के बीच भीड़ में चलने और रास्ता बनाने जैसा है .मार्क्स का यह सिद्धान्त विकास की समझ का अनावश्यक सरलीकरण करता है .मार्क्स जैसे सजग विचारक नें इसका उपयोग साम्यवाद की क्रन्तिकारी सम्भाव्यता,उसके सुनिश्चित भविष्य की अपरिहार्यता प्रस्तावित करने के लिए किया था.इसमें आज भी सामाजिक गतिशीलता के कुछ सकारात्मक सन्देश अवशिष्ट हैं .वह यह कि चीजें इतनी आसान नहीं हैं.हमें निरस्त करनें और स्वीकार करने की जटिल सामाजिक मानसिक प्रक्रिया से अनवरत गुजरना होगा.वाद को नए ज्ञानात्मक सृजन  और प्रतिवाद को रुढ़िवादी प्रतिरोध तथा सम्वाद को उदार विकासवाद के राजनीतिक-सामाजिक व्यव्हार के रूप में देखा तो जा सकता है लेकिन एक दार्शनिक सूत्रीकरण होने के कारण सदैव ही सांप वहां नहीं मिलेगा जहाँ होने की घोषणा की जाएगी.समझदारी की एक सूत्रबद्ध प्रक्रिया में होने के कारण ज्ञानात्मक विकास अप्रत्याशित होने के बावजूद व्याख्या के लिए एक श्रृंखला-बद्ध पद्धति की रचना करता है .निर्माण और सृजन के भटकावों के बावजूद नीव से लेकर शिखर तक हम एक पूर्वापर प्रक्रिया के परिणाम होंगे .काल का परम्परागत भारतीय प्रतीक सर्प ही है .अज्ञात और अन्वेषण के विचलन या भटकाव की गतिकी को जोड़ दें तो सर्पिल गति ही सभ्यता के विकास की बनती है ,जैसा कि अपने आशयों में मार्क्सवाद भी है .

मार्क्सवाद पर पुनर्विचार-२

       राजनीतिक तंत्र और आर्थिक तंत्र  दोनों ही मनुष्य के सामाजिक-सामूहिक -संगठित तथा बहिर्मुखी  जीवन-व्यापार  और व्यव्हार हैं क्योंकि राज्य की सम्प्रभुता उसके  भौगोलिक सीमांकन से भी प्रभावित और सीमित  होती है ,इसलिए संगठित क्षेत्र की सृजनशीलता के लिए आर्थिक क्षेत्र ही  अब भी संभावनापूर्ण है .
सामूहिक और संगठित सृजनशीलता की दृष्टि से राजनीतिक व्यवस्थाओं की संभावनाएं  कुण्ठित हुई हैं .लेकिन आर्थिक संगठनों की सृजनशीलता की संभावनाएं अब भी बची हुई हैं..वैश्वीकरण ने राज्यों को सहचर और सहगामी बनाने के लिए मजबूर किया है .सच तो यह है कि प्रसार या विस्तार की दृष्टि से राजनीतिक व्यव्हार का ऐतिहासिक दौर अब समाप्त हो चूका है .संगठित मानव-शक्ति की दृष्टि से यह समय आर्थिक सेनाओं की विश्व-विजय का है .
          सत्ता का केन्द्र आर्थिक संगठनों की ओर चला गया है .बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शक्ति और सत्ता के नए केंद्र हैं .मार्क्स के वर्ग की अवधारणा के स्थान पर आर्थिक संगठनों को रखकर ही हम इन संगठनो के बाहर की मानव-जनसँख्या में नए  विश्व के लिए सर्वहारा की खोज करा सकते हैं .कहने का तात्पर्य यह है कि स्थिर आर्थिक समाजों के सर्वहारा गिने-चुने टापुओं में ही कैद रहा गए हैं .नए  ज़माने के सर्वहाराओं की खोज इन आर्थिक संगठनो से बहिष्कृत हाशिए की जनसँख्या में ही करनी होगी .

        मेरी दृष्टि में राजनीतिक सत्ता को सदैव ही साम्यवादी होना चाहिए और आर्थिक व्यवस्था को पूंजीवादी .सिर्फ ऐसा करना ही एक संतुलित समाज को जन्म दे सकेगा .एक आदर्श चरवाहा अपनी भेड़ों को चराने की स्वतंत्रता तो देता है ,लेकिन ऐसा नहीं करता कि भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर ही बैठ जाए या फिर  उनकी घास पर और उन्हें चरने ही न दे .सर्जना ही नदी के प्रवाह की मुख्या दिशा है ,जबकि वर्जना की भूमिका अगल-बगल के
कगारों की ही है .क्योंकि पूंजी-निर्माण भी मनुष्य का एक सृजनात्मक व्यव्हार है ,इस लिए उसे उल्लास और स्वतंत्रता कजी दिशा के रूप में ही लेना चाहिए ,उसे अविश्वास और असुरक्षा के नकारात्मक विधि-निषेधों में कास-बांधकर अवरुद्ध करना मुझे  आत्मघाती कदम लगता है .क्योंकि पूंजी का सृजन भी एक आह्लादक मानव-व्यवहार है इसलिए इसे स्वस्थ मनुष्यों के  लिए छोड़ देना चाहिए .इसलिए भी कि पूंजीवाद निरंकुश और निर्बाध स्वतंत्रता प्रदान करने वाली व्यवस्था है,वह मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण संभावनाओं को अभिव्यक्त करने का सामाजिक अवसर प्रदान करती है -इसलिए भी सिद्धान्ततः इसे बहुत गलत तो नहीं ठहराया जा सकता ,लेकिन यह भी सच है की इसका गुण ही इसका दोष है .-यह सामूहिकता के पर्यावरण का उल्लंघन सिखाती है .इसलिए सिर्फ साम्यवादी सत्ता ही पूंजीवादी समाज की दायित्वहीनता  और महात्वाकांक्षी संवेदनहीनता के दोषों को दूर कर सकती है .यह एक विरोधाभासी प्रतीति वाली बात है ,लेकिन मानसिक विकलांगों,अयोग्यों  तथा कुंठितों  की सुरक्षा के लिए शासन का साम्यवादी होना ही उचित है .इसके लिए एक आंशिक या सह - साम्यवादी व्यवस्था की परिकल्पना भी की जा सकती है .
     

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

प्रेम भारद्वाज के लिए


आँखें बाहर का देखने के लिए ही बनी हैं

जो आँखों के भीतर ही बस गया हो 

उसे कैसे देख पाएंगी वे

जीने के लिए ही दिए गए हैं

अपने अस्तित्व में लौटना और जीना चाहता हूँ मैं 
मैं किसी से क्यों लड़ रहा हूँ 
कौन है मेरा दुश्मन 
किसके विरुद्ध जी रहा हूँ मैं 
किसके लिए जी रहा हूँ 
भाग रहा हूँ किसको छोड़कर ....

अपने अस्तित्व में लौटना चाहता हूँ मैं 
जीना चाहता हूँ अपने अस्तित्व को 
जानता हूँ 
अपने अस्तित्व को जीना 
आसान नहीं है 
अपनी उपस्थिति को सबकी उपस्थिति के साथ 
अपने होने को सबके होने के साथ 
जनता हूँ की मेरा होना सिर्फ मेरा ही होना नहीं है 
मैं एक सामूहिक उपस्थिति का हिस्सा हूँ ....

अपने अस्तित्व को जीना चाहता हूँ मैं 
मैं जनता हूँ मेरा अस्तित्व सिर्फ मेरा अस्तित्व ही नहीं है 
मैं असंख्य परमाणुओं की युगलबंदी हूँ
असंख्य आवाजों का समवेत गान हूँ 

अपने अस्तित्व को जीना चाहता हूँ मैं 
मेरा अस्तित्व 
जिसमे मेरा सूरज भी है 
और मेरी धरती भी 
मेरी चिड़ियाएँ ...मेरी गाय...मेरा कुत्ता 
मेरे वन-प्रान्तर....मेरे पहाड़ 
मेरी नदियाँ और मेरे रास्ते हैं 
असंख्य पेड़ों से गुजरते हुए 
उनसे मैं करना चाहता हूँ हाथ हिला-हिला कर संवाद 
कि अपने अस्तित्व को समूचे अंतरिक्ष 
समूचे ब्रह्माण्ड के साथ जीना चाहता हूँ मैं 
लौटना चाहता हूँ 
अपने बंधुओं के पास 

जो मुझे जीने के लिए ही दिए गए हैं

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

सभ्यता का प्रवाह : मुद्रा और ईश्वर

विचारधाराओं की जड़ता से अलग यदि मानव-सभ्यता के प्रवाह और उसकी दशा-दिशा को समझाने की कोशिश करें.तो मानवीय व्यवस्था और व्यव्हार की दो बड़ी संरचनाएं सामने आती है .एक है मानवीय व्यव्हार के मूल्य दूसरा है आर्थिक व्यव्हार के मूल्य .व्यव्हार की ये दोनों ही पद्धतियाँ ज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक अमूर्त नियमों,प्रतीकों और अवधारणाओं  से संचालित होती हैं .मुद्रा अर्थ जगत का केन्द्रीय प्रतीक है तो ईश्वर धर्म-जगत का .एक समानांतर मनोलोक का तन्त्र उसके वास्तविक और मानसिक जगत को एक सूत्र में पिरोता है .इसमें एक संपत्ति -जगत का प्रतीक है तो दूसरा मानवीय अस्तित्व की अर्थवत्ता का .अपने व्यव्हार के अनुसार ही मुद्रा एक मूर्त प्रतीक है और ईश्वर एक अमूर्त प्रतीक.दोनों ही उसकी सभ्यता के महत्वपूर्ण नियामक सत्ताएँ हैं  .इसलिए मुझे लगता है की ईश्वर उसके ज्ञान-लोक की महत्वपूर्ण उपस्थिति रहा  है .चाहे वह अपने से इतर के मानवीय ससार की छाया या प्रतिनिधि उपस्थिति के रूप में ही क्यों न हो.समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो ईश्वर के प्रति सम्मान और शेष समाज के प्रति सम्मान में कोई विशेष अन्तर नहीं रहा है.दोनों ही सामूहिक मानव- व्यव्हार की एक ही परिणामी एकता तक पहुंचतेऔर पहुंचाते रहे हैं.दूसरी ओर अर्थ-जगत की आर्थिक सुरक्षा संपत्ति के ऐश्वर्य और प्रभुता को रचती रही है..संपत्ति के विकास के सुरक्षा-तन्त्र नें धरती पर के ईश्वरों को रचा है तो ईश्वर के प्रतीकों के इर्द-गिर्द रहने वाले ईश्वरत्व के दावेदार जातीय प्रतीकों को भी .इन सभी को कृषक सभ्यता नें अपने स्थाई उत्पादन तंत्र के बल पर आनुवांशिक निरंतरता की आधार-भूमि पर रचा था .
                आधुनिक सभ्यता नें व्यापक शिक्षा-व्यवस्था के बल पर आनुवांशिक विशेषाधिकार वाली जातीय प्रशिक्षण-तन्त्र को अतिक्रमित किया है .उसके नियतिवादी स्थायित्व में व्यतिक्रम पैदा किया है .यह एक सृजनशील प्रतिस्पर्धा वाला अस्थिर एवं तनावपूर्ण समाज है .उत्तर-आधुनिक विखंडन वादियों को मूल्यात्मक उच्छेद की इस पारिस्थितकी पर भी विचार करना चाहिए .सभ्यतागत स्थायित्व का यह तन्त्र
जो कृषि-सभ्यता की लगभग अपरिवर्तनीय और टिकाऊ उत्पादन-व्यवस्था और उस प्रक्रिया में उपजे मानवीय संबंधों  पर आधारित था ,उसके परम्परागत लगभग सभी मूल्य-व्यवस्था की रचना करते है ..लेकिन यहीं उसके व्यवस्थागत व्यव्हार का दूसरा-पक्ष भी है -स्थाई उतपादन संबंधों से दूरवर्ती अप्रत्यक्ष  तथा गतिशील अर्थ-तन्त्र नें  धन-संग्रह के रूप में जिस बाजार और महाबाजार(नगर) व्यवस्था का निर्माण किया है -वह उसी मूल्य-व्यवस्था का समानांतर प्रति-रूप है .ज्ञान-तन्त्र के रूप में  ये दोनों एक ही प्रभुत्व-तन्त्र के दो रूपों की रचना करते है .
                  पूंजी धरती पर एक सुरक्षित स्वर्ग का निर्माण कराती है .मुद्रा का एक रहस्यमय संसार  उसकी आस्था और विश्वास के उस पर्यावरण को निर्मित करता है,जिसे स्वर्गिक और ईश्वरीय कहा जा सकता है ..इस दृष्टि से देखें तो मुद्रा का अर्थ-ससार और मूल्यों का अर्थ-ससार दोनों ही एक -दुसरे के पूरक और समानांतर ही हैं .इसी लिए दोनों ही समाज में एक -साथ देखे जाते हैं .एक अर्थ-ग्रस्त मानव के लिए दोनों ही रहस्यमय और अविश्वसनीय है .उसे अपना ही भाग्य स्वप्न-सदृश लगता है .वह कृतज्ञ मन से इस रहस्य मय ससार को देखता है .वह श्रद्धा निवेदित करता है .उस ईश्वर के पर्यावरण को जीता है ,जो सब कहीं है .

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

भारतीय आध्यात्मिकता ,ईश्वर और लोकतन्त्र

               ( सत्ता का संस्कृति विमर्श )         


अधिकांश लोग ईश्वर की अवधारणा को सर्वकालिक और सर्वशक्तिमान सत्ता की उपस्थिति के रूप में स्वीकार करते हुए उसके सामाजिक स्रोत,सामाजिक भूमिका और मानवीय परिणामों को अनदेखा करते हैं .वे यह भूल जाते हैं कि भारतियों की अधिकांश सांस्कृतिक अवधारणाओं का विकास एक जाति विशेष ने किया है .अपने पेशेगत कारणों से इस जाति विशेष नें जो अपने लिए भी चरित्र ,नीति और मर्यादाएं निर्धारित की ,वे राजतंत्र व्यवस्था की निष्ठां के कारण ,इस सीमा तक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से हीन विकसित किया गया है कि वह पूरी भारतीय संस्कृति को एक आज्ञाकारी शासित संस्कृति में बदल देता है .
               सबसे पहले तो पुनर्जन्म ,भाग्यवाद और कर्मवाद की अवधारणा के कारण यह राजा को ईश्वर की इच्छा ,प्रारब्ध एवं नियति के अनुसार राजप्रप्ति के रूप में पहले से ही विशिष्ट मानव घोषित करती है .इसमें संदेह नहीं कि इन विश्वासों नें अंतर्समुदायिक विश्वासघात ,नेतृत्व की अराजकता और महत्वकांक्षी प्रतिस्पर्धा को रोका है .दरअसल यह पूरी संस्कृति और धार्मिक आचार-संहिता वंशानुगत उत्तराधिकार को केंद्र में रखकर रची गई थी .इसमें निःसंतान होनें तक कोई भी राजतंत्र कई पीढ़ियों तक चलता रह सकता था .
                यद्यपि कई बार तो मंत्री और सेनापति का पद भी आनुवांशिक था लेकिन राजा को यह अधिकार था की वह जाती-विशेष से ही किसी अन्य योग्य ब्राह्मण को भी मंत्री के रूप में चुन सकता था .यद्यपि साचा तो यही है कि हर परिवार के अपने वंशानुगत पुरोहित परिवार होते थे .उसी तरह मंत्री के परिवार से ही कोई मंत्री बन सकता था .इस व्यावस्था नें मंत्री बनाने की कूटनीतिक साज़िशों और प्रतिस्पर्धा को रोका .
                   दरअसल यह एक स्थाई कृषि-आधारित समाज की सांस्कृतिक व्यवस्था थी ,जिसमें किसान का कृषि -क्षेत्र और उपज सामर्थ्य तक सुनिश्चितथी .कृषि-आधारित स्थाई संस्कृति ने ये सारे सामाजिक-सांस्कृतिक चरित्र और भूमिकाएँ निर्धारित की थीं .इसी के अनुरूप जातीय चरित्र और उसका संस्कारगत प्रशिक्षण -तंत्र भी विकसित किया था .
                      ब्राह्मण-वर्ण का जातीय चरित्र उसके राजनीतिक उसके राजनीतिक व्यवस्था से महत्वाकांक्षा -शुन्य रहने की मांग करता था .समाज में राजा के बाद की पद व्यवस्था के कारण यह जाती जिस धर्मं-व्यवस्था और संस्कृति की अचेतन प्रस्तावना कराती है वह किसी और के नेतृत्व का समर्थनकारी व्यक्तित्व रचता है .वह शासक को सम्मान से देखने की संस्कृति का प्रस्तावक है .आपनी इस मानसिक व्यवस्था के कारण ब्राह्मण-जाति और उसके द्वारा प्रस्तावित संस्कृति किसी भी शासक के लिए अनुकूल और समर्थन की भूमिका में रही है .
                      क्योंकि भारतीयों की अधिकांश धार्मिकता और संस्कृति के केंद्र में ब्राह्मण-दृष्टि और मानसिकता की ही केन्द्रीय भूमिका है ,इस लिए इनकी मानसिकता के अनुरूप भारतीयों का धर्मं और ईश्वर भी शासक-समर्थक मानसिकता को पोषित करता है .वह दरअसल राजतन्त्र और वंशानुगत उत्तराधिकार की संरक्षक अवधारणा और विश्वास के तन्त्र के रूप में है .
                      इसका नियतिवाद क्योंकि कृषि -सभ्यता का स्थायित्व वाद ही है ,इसी लिए इसकी ईश्वर और धर्मं सम्बन्धी सभी सांस्कृतिक अवधारणायें यथास्थितिवाद की पोषक तथा बेहतर नेतृत्व की दृष्टि से प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की निषेधी हैं .यह संस्कृति भारतीयों में व्यापक लोकतांत्रिक उदासीनता को जन्मा देती है .इसका दूसरा दुष्परिणाम भारतीय राजनीति में परिवारवाद की स्वीकृति और व्यापक जनसमर्थन है .इससे भारत में लोकतान्त्रिक सत्ता कुछ ही परिवारों में सिमट कर रह गई है .अच्छा या बुरा जो कुछ भी हो रहा है ,उन्ही के माध्यम से हो रहा है .क्योंकि भारतीयों की दार्शनिक,धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणाएं बहुत कुछ चारण जाती की भूमिका वाली पुरोहित जाति नें रची है,इसलिए यह शासक -वर्ग को चुनौतियों से परे  का  सत्ता का स्वर्ग -लोक प्रदान करता है .