शुक्रवार, 30 जून 2017

मनुष्य और सर्प

कक्षा में गोरखनाथ और कुण्डलिनी से सम्बंधित की गयी अपनी एक टिप्पणी याद आ रही है ,जिसमें मैंने कहा था कि लाखों वर्षों के विकासक्रम में भटकने और बिछुड़ने के बावजूद मस्तिष्क से लेकर पूंछ तक कुत्ता, बिल्ली ,भैस ,शेर,बन्दर और आदमी भी सभी सांप के ही विकासात्मक रूपांतर और विविध रूप लगते हैं | देखा जाय तो सांप का विष भी उसकी लार ही है और इन्सान का विष उसके क्रोध के रूप में उसके दिमाग में चला गया है | वैसे तो वह निर्विष सांप की तरह है ,क्योंकि उसके काटने से कोई नहीं मरता लेकिन उसने मारने के नए तरीके विकसित कर लिए हैं | सांप सरीसृप है ,उसमें अविकसित हाथ और पैर के अवशेष तो मिलते हैं लेकिन पूँछ वाले अन्य जानवरों और आदमी के तंत्रिका तंत्र में हाथ और पैर के लिए दो शाखाओं के रूप में अलग या अतिरिक्त रूप से तंत्रिका तंत्र का विस्तार हुआ है | बाकी सभी कुछ सर्पवत ही है | दो आँखे ,दो नाक ,जीभ फेफड़े ,स्त्री-पुरुष सभी मनुष्य की तरह ही है |
जब कभी मैं किसी को मोटर सायकिल चलाते हुए देखता हूँ और इस नजरिए से सोचता हूँ कि प्रकृति का कैसा चमत्कार है कि सांप की प्रजाति की ही एक शाखा जैविक रूप से विकसित और परिष्कृत होकर आज मोटर सायकिल और वायुयान चला रही है,एक-दूसरे से लड़ते हुए एक-दूसरे की हत्याएं कर रही है तो प्रकृति के विकास क्रम पर रोमांचित और अभिभूत हो जाता हूँ ....
कक्षा में गोरखनाथ और कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित की गयी अपनी एक टिप्पणी याद आ रही है ,जिसमें मैंने कहा था कि लाखों वर्षों के विकासक्रम में भटकने और बिछुड़ने के बावजूद मस्तिष्क से लेकर पूंछ तक कुत्ता, बिल्ली ,भैस ,शेर,बन्दर और आदमी भी सभी सांप के ही विकासात्मक रूपांतर और विविध रूप लगते हैं | देखा जाय तो सांप का विष भी उसकी लार ही है और इन्सान का विष उसके क्रोध के रूप में उसके दिमाग में चला गया है | वैसे तो वह निर्विष सांप की तरह है ,क्योंकि उसके काटने से कोई नहीं मरता लेकिन उसने मारने के नए तरीके विकसित कर लिए हैं | सांप सरीसृप है ,उसमें अविकसित हाथ और पैर के अवशेष तो मिलते हैं लेकिन पूँछ वाले अन्य जानवरों और आदमी के तंत्रिका तंत्र में हाथ और पैर के लिए दो शाखाओं के रूप में अलग या अतिरिक्त रूप से तंत्रिका तंत्र का विस्तार हुआ है | बाकी सभी कुछ सर्पवत ही है | दो आँखे ,दो नाक ,जीभ फेफड़े ,स्त्री-पुरुष सभी मनुष्य की तरह ही है |
जब कभी मैं किसी को मोटर सायकिल चलाते हुए देखता हूँ और इस नजरिए से सोचता हूँ कि प्रकृति का कैसा चमत्कार है कि सांप की प्रजाति की ही एक शाखा जैविक रूप से विकसित और परिष्कृत होकर आज मोटर सायकिल और वायुयान चला रही है,एक-दूसरे से लड़ते हुए एक-दूसरे की हत्याएं कर रही है तो प्रकृति के विकास क्रम पर रोमांचित और अभिभूत हो जाता हूँ ....

सोमवार, 12 जून 2017

राज्य की अवधारणा और लोकतंत्र

व्यवस्था का आदिम कबीलाई ढांचा और उसका अचेतन साथ-साथ जीने के स्थान पर हिंसक ढंग से अपने साथियों(नागरिकों) को जीतने का विधिसम्मत आमंत्रण देता है और फिर शुरू हो जाता है गुलामी और स्वामित्व का मान्यता-प्राप्त आदिम खेल- जिसमें मानवीय समाज और जनसँख्या दबे और दबाने वालों में बाँट दी जाती है | अपेक्षा यह की जाती है कि दबने वाले दबाने वालों का सम्मान एवं अभिवादन करें क्योंकि वे संवैधानिक रूप से दबाने के लिए ही चयनित है | मेरी चिंता और मेरा प्रश्न यह कि जीतने की होड़ को साथ-साथ जीने की होड़ से विस्थापित किया जा सकता है ? हम अपनी सत्ता और व्यवस्था को मध्य-युगीन ढांचे और आदतों से बाहर क्यों नहीं निकाल पा रहे हैं ? क्या राज्य संस्था का चरित्र ही लोकतंत्र विरोधी है ? तब हमें लोकतंत्र की नहीं बल्कि राज्य की अवधारणा ,संरचना एवं चरित्र कि ही पुनर्परीक्षा करनी चाहिए और निकलना चाहिए एक नयी परिकल्पना की तलाश में ...मुझे लगता है एक दिन नागरिक प्रशासन को सभ्य नागरिक समाज और संस्कृति तक पहुंचाना ही होगा ताकि सैनिक बल द्वारा शासित असभ्य एवं असुरक्षित समाज एक अधिक सभ्य स्वयं अनुशासित समाज में रूपांतरित हो सके ...

रविवार, 11 जून 2017

ब्राह्मणवाद :मार्क्सवादी दृष्टि से

हिन्दू-जातीय -ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक और काव्यात्मक होने के कारण साहित्यिक महत्त्व का भी है | पूजा-पद्धति में उदात्त भाव-समर्पण और भांति-भांति की सामग्री के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने या उसकी और लौटने का भाव भी आकर्षित करता है | यह अभिव्यक्ति मैंने मार्क्सवाद सम्मत मानकर ही की थी | उसका परंपरागत स्वरूप सामन्ती पूंजीवादी युग से पूर्व का है और प्रागैतिहासिक आदिम मनुष्य तक भी पहुंचता है | इसीलिए इसके कुछ हिस्से से मुझे मार्क्सवाद का विरोध नहीं लगता | दान को महिमामंडित करने के कारण पूँजी-संग्रह का विरोध और वितरण को प्रोत्साहित करने के कारण भारतीय धार्मिकता में भी एक भिन्न किस्म का आर्थिक आदर्शवाद रहा है | लेकिन इसी ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद का एक गर्हित और निकृष्ट पक्ष भी सामने आता है जो इसका सामंतकालीन कुलीनतावादी वर्णवादी चेहरा है | इसमें आम जीवन के महत्त्व और दिव्यता का व्यापक निषेध मिलता है | ईश्वरता को कुछ कुलीन राजघरानों में ही सीमित कर दिया गया है | निर्धनता और हीनता को पूर्व जन्म के पाप से जोड़ दिया गया है | पूंजीपतियों एवं आभिजात्य वर्ग की शोषक श्रेष्ठता को भी आध्यात्मिक स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है | वर्ण व्यवस्था के साथ दुर्भाग्य को नियति और प्रारब्ध से जोड़ दिया गया है |यहीं से ब्राह्मणवाद गर्हित हो जाता है और निंदनीय भी है; क्योंकि वह मध्ययुग में आकर यथास्थितिवादी ,अप्रतिरोधी एवं भेदभाव आदि को बढ़ावा देते हुए मानवताविरोधी हो जाता है | इन दोनों चेहरों को देखते हुए ही हमें अपनी सम्यक धारणा बनानी चाहिए |

गुरुवार, 8 जून 2017

रावण : एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

 संस्कृत में रावण रचित शिव-स्त्रोत उपलब्ध है और वीर रस से भरा बड़ा ही रोमांचक है |  |परंपरा यह मानती है कि रावण एक अच्छा कवि भी था | उसकी गलती इतनी ही थी कि वह माँ के कुल से अनार्य था और सीता के प्रेम में पड गया था और सही-गलत सब भुला बैठा | राम को रिश्तेदार बना लेने के लिए अपनी बहन सूपर्णखा भेजी तो उसे कुरूप बना कर वापस कर दिया गया | अपने बहन के अपमान का बदला लेने का उसने एक असफल प्रयास किया | यहाँ तक वह ठीक था लेकिन जब उसने राम के स्थान पर राम की निरपराध स्त्री सीता को उसकी सजा देनी चाही तो तत्कालीन समाज नें उसका साथ ही छोड़ दिया | यद्यपि यह एक सच है कि शिव का धनुष तोड़ कर शिव के अनुयायी समुदाय को आर्यों नें अपमानित किया था और वह भी रावण को विवाह में आमंत्रित कर उसके सामने धनुष तोड़वा कर |इस तरह आज के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में रावण का भी एक न्यायिक पक्ष बनता है | 

पाठकनामा


मार्क्सवाद का राजनीतिक और सांस्कृतिक पाठ : ब्राह्मणवाद के सन्दर्भ में

मुझे लगता है कि कुछ समयं तक मार्क्सवाद को सिर्फ व्यवस्था और राजनीति तक ही सीमित रखना था | उसकी सांस्कृतिक असहिष्णुता जो कुछ-कुछ मूसा के यहूदी धर्म और इस्लाम जैसी रही -उसे ले डूबी | अरे भाई तुम शोषण-मुक्त व्यवस्था बनाते -सिर्फ रोजीरोटी और बराबरी देने के नाम पर सोवियत रूस से लेकर भारत तक हर जगह सभी के सांस्कृतिक स्मृति के विलोपन की बात करने लगे | अब सभी सभ्यताओं का अतीत धार्मिक है | धर्म के वैचारिक उच्छेद के कारण अतीत की सारी स्मृतियाँ ही बिना सामानांतर वैकल्पिक विकास के ही उच्छेद योग्य घोषित कर दीी गयीं | कई ऐसे धार्मिक मेले हैं जिनकी इलाके में जन-मन की नीरसता को दूर करने में समाज-मनोवैज्ञानिक भूमिका भी है | होली जैसा विशुद्ध मौज-मस्ती का पागलपन के दौरे जैसा अद्भुत अतार्किक पर्व है | स्वयं को ,मार्क्सवादी घोषित कीजिए और मनहूस की तरह जाकर घर में बैठ जाइए | इसीलिए मैं हमेशा ही मार्क्सवादी दृष्टि और बोध को स्वीकार करते हुए भी उसकी संगठनात्मक असहिष्णु ,हिंसक किस्म का शुद्धतावाद और उसको बिना किसी प्रश्न किए तुरंत सही मान लेने के शत-प्रतिशत समर्पण की माँग से असहमत होने के कारण विवेक की नैतिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए स्वयं को सामुदायिक मार्क्सवादी घोषित करने से बचता रहा | यह कोई भी देख सकता है कि मेरे विश्लेषण और स्थापनाओं की पृष्ठभूमि में मार्क्सवाद की समझ भी अनिवार्य रूप से रहती है | फिर भी विचारधारात्मक रुढ़िवाद का मैं विरोधी हूँ और मुझे लगता है कि मानवता के विवेकपूर्ण भविष्य के लिए तथा ईमानदार विचारक होने की स्वतंत्रता के लिए दक्षिण-पंथ और वामपंथ दोनों ही अँध-भक्त समूहों से ही उचित दूरी बनाए रखनी होगी |
               दरअसल राजनीतिक कारणों से ही( जिसमें साम्यवादी कांग्रेसी सेक्युलरवादी ,दलित और पिछड़ी की राजनीति करने वाली सभी दलों की विचारधारा सम्मिलित है ) ब्राह्मण वाद और हिन्दू धर्म पर भी कभी ठीक से मार्क्सवादी आधारों पर वैचारिक बहस नहीं हुई है | संस्कृत भाषा और भाषा-विज्ञान के उन्नत विकास के कारण ब्राह्मणवादी कर्मकांड का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक एवं काव्यात्मक भी है  |
इन कर्मकांडों का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक और काव्यात्मक होने के कारण साहित्यिक महत्त्व का भी है | पूजा-पद्धति में उदात्त भाव-समर्पण और भांति-भांति की सामग्री के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने या उसकी और लौटने का भाव भी आकर्षित करता है | समाजशास्त्रीय दृष्टि से उसमें आदिम मनुष्य की कविता और उदात्त समर्पण की भावना भी छिपी हुई है | यह उसका साहित्यिक गुणवत्ता वाला पक्ष है और मुझे नहीं लगता कि उसका अनावश्यक विरोध किया जाना चाहिए | यह पक्ष मुझे मार्क्सवाद का विरोधी नहीं लगता | उसका परंपरागत स्वरूप सामन्ती पूंजीवादी युग से पूर्व का भी  है और प्रागैतिहासिक आदिम मनुष्य तक भी पहुंचता है |  दान को महिमामंडित करने के कारण पूँजी-संग्रह का विरोध और वितरण को प्रोत्साहित करने के कारण भारतीय धार्मिकता में भी एक भिन्न किस्म का आदर्शवाद रहा है | लेकिन इसी ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद का एक गर्हित और निकृष्ट पक्ष भी सामने आता है जो इसका सामंतकालीन कुलीनाताचादी चेहरा है | इसमें आम जीवन के महत्त्व और दिव्यता का व्यापक निषेध मिलता है | ईश्वरता को कुछ कुलीन राजघरानों में ही सीमित कर दिया गया है | निर्धनता और हीनता को पूर्व जन्म के पाप से जोड़ दिया गया है | पूंजीपतियों एवं आभिजात्य वर्ग की शोषक श्रेष्ठता को भी आध्यात्मिक स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है | वर्ण व्यवस्था के साथ दुर्भाग्य को नियति और प्रारब्ध से जोड़ दिया गया है |यहीं से ब्राह्मणवाद गर्हित हो जाता है और निंदनीय भी है क्यों कि वह मध्ययुग में आकर यथास्थितिवादी ,अप्रतिरोधी एवं भेदभाव आदि को बढ़ावा देते हुए मानवताविरोधी हो जाता है | इन दोनों चेहरों को देखते हुए ही हमें अपनी सम्यक धारणा बनानी चाहिए || वैसे भी सांस्कृतिक कार्यक्रम फुरसत की आस्वाद धर्मिता का हिस्सा हुआ करते हैं | भोजन से लेकर भजन तक वे भी मानवीय सृजनशीलता का एक पाठ प्रस्तुत करते हैं | चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी संप्रदाय और सूफी संगीत में दिल को छू लेने वाली ऐसी ही मौलिक सृजनशीलता मिलाती है | इसीलिए ऐसे विरोध को मैं गैर-जरुरी घृणा का विस्तार मानता हूँ | जब आप एक बार किसी से घृणा करने लगते हैं तो उसकी अच्छी बातें भी आपको बुरी लगने लगती हैं| मनुस्मृति की बहुत सी बातें भारत के बौद्धों के उच्छेद काल से जुडी और उसका राजनीतिक साजिशी पाठ प्रस्तुत करती हैं | पहले के लोगों द्वारा ऐसे षडयंत्र को समझ पाना संभव नहीं था | आज तो कोई भी ब्राह्मण घराने में जन्मा युवक उन साजिशों को समझ सकता है | यदि ऐसा होता तो अवर्ण-सवर्ण का भेदभाव अप्रासंगिक होता लेकिन ...|?
              यह एक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक सच्चाई है कि यदि कोई प्राचीन शैली की पूजा करता है और ब्राह्मण बिरादरी से है तो पुरखों की परंपरा और लिखित स्मृतियों का उत्तराधिकारी दबाव ज्यादा होने के कारण उसका संरक्षणवादीो और समर्पणवादी होना आश्चर्य का विषय नहीं है | ब्राह्मणवाद (पुरोहितवाद) की निंदा का आधार उसका असमानतावादी जातीय पूर्व्बग्रह होना चाहिए न कि उसका साझा सांस्कृतिक पाठ जिसमें लम्बे भारतीय जीवन के अनुभव समाए हुए हैं | यह एक मार्क्सवाद सम्मत तथ्य है कि सामंती पूंजीवाद ने ही उन सभी अवधारणाओं और नैतिक मूल्यों का विकास किया है जो आज भी हमारे सभी समाज की संरचना और व्यवस्था के आधार है | अब राम की भक्ति को ही ले लीजिए -यह कथा एक पत्नी विवाह और पारिवारिक एकता को प्रोत्साहित करती है | यह सच है कि मध्य काल में इसके प्रचार-प्रसार का ठेका ब्राह्मण जातीय बुद्धिजीवियों के पास रहा है | इसी तरह शिव शूद्र पौराणिक नायक है | ईमानदारी से सवर्ण इसे स्वीकार कर लें और उसका प्रचार करें तो शूद्रों को सिर्फ रविदास और अम्बेडकर से ही काम चलाना नहीं पड़ेगा | ब्राह्मणवाद से मोक्ष के लिए भी उसको ठीक-ठीक समझना होगा | जातीय विद्वेष के आधार और सांस्कृतिक दाय दोनों को ही अलग-अलग और सही-सही समझने-समझाने की जरुरत है |
              सिर्फ पीपल का ही उदहारण ले लें तो नास्तिक भाव से भी चिड़ियों की बीट से उगे इस पौधे को उखाड़ कर उसे बड़ा होने तक सिचित करने की जरुरत है | धार्मिक बड़े पेंड़ को बिना मतलब सींचता है तो नास्तिक विवेक से छोटे पोधे को सींचे -लेकिन सींचे तो | जीवन का सूना क्षितिज भरने और बहुरंगी बनाने में प्राचीन मनुष्य की सृजनशीलता का अपना महत्त्व है \आत्मस्थ निष्क्रिय चिंतकों की कोई सांस्कृतिक भूमिका नहीं बनती |प्राचीन काल के भी गुफा गेही ऋषियों (पुरखे बुद्धिजीवियों ) को भुला दिया गया | सांस्कृतिक नायक वाही बने जिन्होंने लोक के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर साझा जीवन जिया | इसलिए कट्टर बुद्धिवादी भी अपनी सीमा को समझें और हो सके तो नए पर्व और उत्सव पैदा करें |बिना विकल्प दिए जीवन को नीरस बनाना समझदारी नहीं है |

शनिवार, 27 मई 2017

काशीनाथ सिंह का' उपसंहार' उपन्यास

काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'उपसंहार 'को पढ़ते हुए मुझे लगातार नामवर सिंह याद आते रहे | मुझे लगता रहा कि काशीनाथ सिंह ने प्रसिद्धि की कीमत पर नामवर जी की गृह-कथा -अपने ही स्वजनों की असंतुष्टि और नाराजगी को कृष्ण कथा के माध्यम से आत्म -प्रक्षेपित किया है | हर सार्वजनिक व्यक्तित्व कहीं न कहीं पारिवारिक और निजी जीवन के मोर्चे पर हारता और स्वयं को घायल करता रहता है | 'उपसंहार' उपन्यास का सबसे कमजोर बिंदु यह है कि इसमें कुछ पौराणिक अंधविश्वासों का ज्यों का त्यों इश्तेमाल कर लिया गया है और सबसे ताकतवर पक्ष यही है कि इसमें कृष्ण के बहाने नामवर सिंह की प्रसिद्धि ,मनोदशा और नियति पर निवेश रूप में एक व्यंजनाधर्मी सूक्ष्म विश्वसनीय विमर्श उपस्थित है |दरअसल 'उपसंहार 'के कृष्ण (और वास्तविक जीवन में नामवर दोनों ही ) सामंती शैली की अभिजन श्रेष्ठता को जीते हैं और गणतंत्र /लोकतंत्र के बावजूद अपने समुदाय को अपने निर्णयों पर इतना आश्रित बनते जाते हैं कि अंत में लोगों को नालायक बनाता हुआ ईश्वरीय छवि में लिपटा व्यक्तिवाद ही बचता है | यह असम्वादी व्यक्तिवाद ही कृष्ण का एकाकी अभिशप्त अकेलापन है (और हिन्दी साहित्य में संभवतः नामवर का भी ) इस उपन्यास में खुलकर तो नहीं लेकिन दबे सांकेतिक रूप में ब्राह्मणवादी छवि निर्माण पर टिप्पणियां उपलब्ध हैं | काशीनाथ सिंह के इस उपन्यास की इस दृष्टि से प्रशंसा की जानी चाहिए कि यह कृष्ण के लौकिक से लोकोत्तर बनने-बनाने की प्रक्रिया में कृष्ण के असमाजीकरण और अमानवीकरण का गंभीर एवं सजग चित्रण करते हैं | दुर्वासा द्वारा कृष्ण को नंगा होकर खीर पोतने का आदेश देना ऐसा ही ब्राह्मणीकरण करने वाला प्रसंग है ,जिसे कृष्ण व्यवस्था का अंग बन जाने के बाद निस्तेज भाव से किसी आज्ञाकारी शिशु की भांति स्वीकार करते हुए दिखाए गए हैं | कृष्ण के चरित्र को देखते हुए यह पौराणिक प्रसंग प्रक्षेपित लगता है और वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण दुर्वासा को सामंती-अवतारी कृष्ण से भी सर्वोपरि सिद्ध करता है | आखिर ईश्वर बनाने और घोषित करने वाला वर्ण ईश्वर बनने वाले वर्ण से ऊपर और श्रेष्ठ होना ही चाहिए | कृष्ण यदि यहाँ विद्रोह कर देते या इनकार कर  देते तो उनका ईश्वर-पद छीना जाना तो तय ही था | फिर अवतारी कृष्ण को मृत्यु  जैसे घोर पार्थिव सत्य का भी सामना करना था | ब्राह्मण दुर्वासा द्वारा अमर बनाने वाली इस खीर के लेपन से कृष्ण का तलवा छूट जाता है और वहीँ से वे व्याघ्र द्वारा मार दिए जाते हैं | कोई चाहे तो दिव्य बनाने की इस इंजीनियरिंग को भी अपने विमर्श में शामिल कर सकता है | 

बुधवार, 17 मई 2017

ईश्वर और पर्यावरण

ईश्वर और पर्यावरण
( भारत और पाकिस्तान के विभाजन से सम्बंधित स्वर्गीया गुरुशरण कौर के संस्मरणों के आधार पर )

एक सुबह पता चला कि ईश्वर खिसक गया चुपके से
या फिर बदल गया है
लोगों के हाथों में उग आए हैं घातक हथियार

खुशी के घोड़े पर बैठकर गश्त लगाता हुआ
अपनी श्रेष्ठता के दम्भ पर इतराता आसमान
भहरा कर गिर पड़ता है एक दिन
अपनी-अपनी पुश्तैनी हवेलियों और
जलते हुए चूल्हों को छोड़कर
डरे हुए चूहों की तरह निकल भागते हैं लोग
भोली आस्था पर टूट पड़ता है इतिहास डकैतों की तरह....
आस्था का सर्वशक्तिमान ईश्वर  पिछड़ जाता है
अनपढ़-असावधान आस्थाओं से खेलने वाले राजनीतिज्ञों से....

जिन्ना की कुंठित महत्त्वाकांक्षाओं ने ढक लिया है उनके प्रार्थना के ईश्वर को
और छीन ली है पूर्वजों से मिली स्मृतियों की जड़ें
माउण्टबेटन के साथ पी गई शराब की चुस्कियों में डूबकर
बन्द कमरे में रेखाएं खींचने वाली कलम
उनकी धरती को किसी आलू पर रखी गई तलवार-सा चीर देती है.......
कि एक सुबह सूख जाता है
सूफियाने-सयाने सन्तों की वाणी का दिव्य-पवित्र प्रवाह
और सतलज ,रावी,व्यास,चिनाब एवं सिन्धु नदी की धाराए
पीकर वमन करने लगती हैं मानव-रक्त का....

कि एक सुबह घायल ईश्वर भाग खड़ा होता है
भीड़ और भगदड़ के बीच अपने प्यारे निरीह बन्दों को
अकेले निरुपाय लुटने-पिटने और मरने के लिए छोड़कर.....
एक-दूसरे की खून की प्यासी देहों को
युद्ध में क्षतिग्रस्त हुए हवाई अड्डों की तरह छोड़कर
ईश्वर खिसकता जाता है चुपचाप
लोगों की बुझती हुई संवेदनाओं के साथ
जैसे बुझता हुआ दीपक
घिरता जाता है अन्धकार से

एक दिन किसी ठगी हुई विकलांग आत्मा की रक्तरंजित स्मृतियों के साथ
किसी पीड़ादायक दुःस्वप्न की तरह याद आता है ईश्वर
उन झूठी पड़ गयी प्रार्थनाओं के रूप में
जो अनसुनी कर दी गयी थीं
सुख की सारी भाग्य-रेखाओं के ऊपर
एक हिंसक मानवीय पर्यावरण द्वारा पोत दिया गया था
खून को रंग की तरह......

अब बचा हुआ ईश्वर यदि कहीं है तो
सिर्फ दुःख और करुणा के रूप में है
असमय छीन ली गयी स्मृतियों की उन कटु यादों के रूप में है
जिन्हें न तो धोया जा सकता है और न ही बदला
उस उदास थके मन के रूप में है
जो अकारण पसीज-पसीज उठता है
दूसरों को दुखी देखकर
बार-बार ठगा जाता रहता है
दूसरों के प्रति अपने सहानुभूतिशील मन के साथ....
अनजाने में रचता जाता है एक सुखमय ईश्वर
दूसरों के असुरक्षित जीवन के लिए
जैसे तलवारों के वार के सामने ढाल बनकर खड़ा हो जाता है....

कुछ ऐसे कि बड़ी आत्माएं प्रायः मूर्ख हुआ करती हैं
लेकिन हिम्मत के साथ.....
करती जाती हैं दूसरों को अच्छा समझने की एकतरफा मूर्खताएं
और हर बार फिर ठगे जाने पर यह सोचकर वे चुप लगा जाते हैं
कि अब भी नहीं सुधरा......
पुकारते रहते हैं अविश्वासी लोगों को
अपने विश्वासी और करुणाशील ईश्वर की ओर
धूर्त आस्था के ईश्वर को किसी लाचार-व्यसनी मच्छर की तरह
बर-बार काटने के लिए छोड़कर
या किसी सिंह की तरह उसे उसके जीवन के लिए आवश्यक
आदिम हिंसा में- जो अपनी छोटी नन्हीं आंत के कारण
बकरी की तरह घास खाने पर मर ही जाएगा......

हम सबसे अच्छा जब जी रहे होते हैं तो
सृजन की एक अन्तहीन-अनथक दौड़ में होते हैं
अपने अभावों की पूर्ति के लिए
जब हम अपने लिए भी रच रहे होते हैं
सौंप रहे होते हैं  दूसरों को भी
कुछ प्रेरणाएं ...कुछ रास्ते.....कुछ आदतों का संसार
हर पल नई आती हुई दुनिया के नाम.......

कि हम जब भी बदल रहे होते हैं अपनी नियति
बदल रहे होते हैं अपना ईश्वर
कि हमारा भी रचा हर पर्यावरण
हमारे लिए रच रहा होता है एक नया ईश्वर
और इस तरह कई-कई ईश्वर को बदलते और जीते रहते हैं हम.......

कि कभी हम एक पिता पर्यावरण में होते हैं
अपने सुख-दुख और आदतों के साथ
जब एक पिता पीढ़ी द्वारा प्रदत्त पर्यावरण को
पिता ईश्वर की तरह जीते-मरते रहते हैं.....

कभी-कभी तो हम बलात् निकाल दिए जाते हैं बाहर
अपने पिता पर्यावरण से
हम अपने ईश्वर को पिछड़ते और बिछड़ते हुए देखते रहते हैं
हम निकल जाते हैं अभावों की कटु सच्चाइयों की  कड़ी धूप में
उदासी के अन्तहीन शून्य में निर्ममतापूर्वक फेंक दिए जाते हैं हम.....

कि दूसरों की दुर्भावनाओं और साजिशों के माध्यम से
हमारे सुख-सौभाग्य को छीन लेने वाला ईश्वर
जीवितों के नर्क में बदल देता है हमारे पर्यावरण को
हम ईश्वर के पर्यावरण से वंचित
बिना ईश्वर के हो जाते हैं
जैसे सभ्यता से मारकर खदेड़ दिया गया व्यक्ति का जीवन
एक हतप्रभ विलाप में बदल जाता है....

हम जब बलात् निकाल दिए जाते हैं
अपने पिता पर्यावरण से बाहर
फिर तो हमें रचना ही पड़ता है
अपना अलग पर्यावरण और अपना अलग ईश्वर भी.......  

इसतरह अपने अनुभवों के प्रतिरोध से हम बचा सकते हैं
दूसरों के सपनों में पल रहा ईश्वर
अपना सब कुछ खो देने के बाद भी
एक लुटेरे और हिंसक ईश्वर के खिलाफ
हम रच सकते हैं अपना नया और संशोधित ईश्वर
कुछ ऐसे कि जब हम अपने पर्यावरण को बदलते हुए
अपनी नियति को बदल रहे होते हैं
बदल रहे होते हैं अपना ईश्वर......

हम जो रच सकते हैं ईश्वर
यानि कि ईश्वरत्व हममे हैं
हम हो सकते हैं ईश्वरत्व के प्रतिनिधि
अपनी समर्थ ,सक्रिय और सृजनशील करुणा से
सींच सकते हैं सभी सूखी आत्माओं को.....
उसके जीवित विकल्प की तरह......

कि अन्ततः हम भी एक फसल हैं
सोचने -समझने वाली फसल
स्वयं को धन्य और दूसरों को अन्य कहते हुए
गेहूं से लेकर सूअर तक फैले अपने जैविक-जीनोमिक रिश्ते को झुठलाते
बकरी की देह और मन को मरने की चीज
और उसके वजूद को सिर्फ खाने के लिए कहकर
किसी उपजाऊ फसल की तरह ही
हम खिला-खिलाकर मुर्गियों की देह में
उगाते रहते हैं अण्डे....अण्डे....मोर एण्ड मोर अण्डे....

जैसे इमली में बनता है टार्टेरिक एसिड
और नीबू में सायट्रिक
जैसे सांप की विष-ग्रन्थियों में
हमारी लार की तरह ही भरता रहता है विष
हमारी देह भी एक फसल है सोचने वाली.....

हाँ...हमें अपनी जाति की अमरता को
बचाए रखने के लिए
अपनी जाति को बचाए रखना होगा
ताकि बनते-बिगड़ते समीकरणों के साथ
क्या पता हमारा जीन एक बार फिर दुहरा जाय
हजारों वर्ष पहले जन्में किसी
माननीय पूर्वज के ईमानदार जीन से
या बदलकर पूरी तरह नया हो जाय वह
और एक ऐसा मनुष्य जन्म ले
जैसा पहले कभी नहीं जन्मा.....

जब हम आने वाली पीढ़ी के लिए
रच रहे होते हैं एक सुरक्षित पर्यावरण
सौंप रहे होते हैं सुख,साधनों और सुविधाओं की नियति
सौंप रहे होते हैं किसी ईश्वर की तरह......

इस तरह ईश्वर की निष्क्रिय तलाश से अधिक महत्वपूर्ण हैं
ईश्वर बनना .......स्वयं को प्रस्तुत और उपलब्ध करना 
एक  नए बेहतर और महान विकल्प के नाम ...

जबकि दुनिया में एक भी अच्छे आदमी का बचे रहना
ईश्वर और ईश्वरता के होने की संभावनाओं का भी बचे रहना है
इसलिए ईश्वर न भी हो

एक अच्छे आदमी का होना ईश्वर का होना है !

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

जाति-विमर्श

जब तक किसी समूह के सदस्य एक-दूसरे के अधिकतम समरूप बने रहने के प्रयास में दूसरे समूह से भिन्न बने रहेंगे भारत में जाति -प्रथा नाम-रूप बदलकर किसी न किसी रूप में बनी रहेगी | जातिविहीनता का आदर्शवाद तभी संभव है जब सभी असामाजिक हो जाएँ और समूह के आदर्शों को जीना बंद कर दें | जाति भी मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने के कारण ही अस्तित्व में बने हुए हैं | भारत में जातिवाद किसी ब्राह्मण या ब्राह्मण समुदाय द्वारा बनाया गया नहीं है ,बल्कि उसकी ऐतिहासिक पारिस्थितकी की उपज है |उपजाऊ देश होने के कारण प्राचीन काल से ही अलग-अलग समूह भारत में बसने के लिए आते गए और जातियाँ बढ़ती गयीं | यदि दूसरे की सामूहिक भिन्नता को स्वीकार करना ही जातिवाद है तो ऐसे जातिवाद को भारत के लिए प्रगतिशील भी माना जा सकता है | हम सभी जानते हैं कि मध्यकाल में जब पुलिस व्यवस्था हमेशा ही ठीक नहीं रही होगी तो जातियों नें ही अपने सदस्यों का चारित्रिक नियमन किया होगा | जाति प्रथा भी मनोवैज्ञानिक दंड और पुरष्कार-प्रथा के आधार पर ही हजारों वर्षों तक ऐसा करती रहीं | जाति प्रथा की यह प्रगतिशील भूमिका थी | सबको समान रूप में जीने के लिए दबाव बनाना भी हिंसा है | जाति -प्रथा नें अलग-अलग समूहों को अलग -अलग रीति-रिवाजों को जीने की स्वायत्तता दी | भारत में जातिप्रथा इसलिए बुरी है कि धार्मिक आधार पर श्रेणीकरण करने के कारण कुछ लोगों को निचले दर्जे पर कर दिया गया | ऐसा महावीर स्वामी और बुद्ध धर्म में प्रचलित अहिंसावाद से हुआ होगा | इससे चर्म-उद्योग से जुडी जातियां अधिक घाटे में रहीं और अछूत तक करार दी गयीं | आज वैश्विक अनुरूपता की धारा बह रही है | नस्लीय या अनुवांशिक भिन्नता को छोड़ दे तो समान शिक्षा-दीक्षा और रहन-सहन के कारण आज समूह की भिन्नता भी कम हो रही है | आज जाति-प्रथा किसी बौद्धिक या वैचारिक आधार पर नहीं बल्कि वैवाहिक सुविधा , आलस्य और सामाजिक तंत्र के आधार पर बची हुई है | इसकी शक्ति भी सामाजिकता की ही शक्ति है | क्योकि कुछ जातियों का राजनीतिकरण हो चुका है इसलिए उनका संगठनात्मक हित जाति प्रथा को बनाए रखने में हो गया है | इस कारण ही जाति से बाहर निकलने के वैयक्तिक प्रयास प्रभावी नहीं हो रहे हैं |

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

धर्म-विमर्श

धर्म-विमर्श 

आज धर्म पर पुनर्विचार की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि पहले का मनुष्य आज की तरह तार्किक नहीं था | अच्छी और उपयोगी बातों को धर्म के नाम पर समाज में फैला दिया जाता था | यह मान लिया जाता था कि ये बाते स्वयं सिद्ध या चिन्तक-मनीषियों द्वारा कही गयी हैं और उन्हें बिना प्रश्नांकित किए मानना जरुरी है | धर्म किस प्रकार नेतृत्व वर्ग के आदेशों से जुडा है इसका पता बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट के मूसा के नेतृत्व में मश्र से यहूदियों के महा-निष्क्रमण से चलता है |मूसा जब पहाड़ी पर चढ़ कर चिंतन कर रहे थे,उस समय अपने अनुयायियों की धैर्यहीनता तथा सभी के सोने को पिघलाकर एक देवता बनाकर पूजने का प्रयास करने वाले अपनें ही बीच के दूसरे नंबर के नेतृत्व को तथा उसकी बात मानने वालों को बर्बरतापूर्वक हत्या करवाते हैं | यहूदियों के लिए मूसा के निर्देश कितने महत्वपूर्ण थे कि बहुत बाद में ईसा मसीह को भी उसी के आधार पर सूली यानि ऊँचे पर लटका दिया गया | यहूदी आज भी मूसा के उपदेशों से ही संचालित होते हैं जबकि ईसा मसीह के अनुयायियों नें बाद में यहूदियों को समझना छोड़ कर दूसरी जातियों को उपदेश देना शुरू किया | यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्र की अवधारणा का जन्म भी मूसा के द्वारा यहूदियों को संगठित करने की घटना से ही जोड़ा जाता है | मूसा नें यहूदियों को संगठित किया | उस संगठित शक्ति के नेतृत्व नें यहूदियों नें नगर के नगर लुटे और भयंकर कत्लेआम कर काला सागर के पास की वह थोड़ी सी जमीन वापस छीनी जो उनके अनुसार उनके पुरखों की थी | यहूदी धर्म की यह जनसँख्या यहूदियों के लिए खतना अनिवार्य करने वाले उनके पहले पैगम्बर ईब्राहिम के लगभग हजार वर्ष बाद जब खतना किए हुए लोगों की एक बड़ी संख्या मिश्र में हो जाती है .बहुत पहले युसूफ के साथ मिश्र में आए यहूदियों के वंशज मूसा के नेतृत्व में एक -दूसरे को पहचान कर मूसा के नेतृत्व में मिश्र से बाहर निकलने का सफल प्रयास करते हैं |एक संगठित सैन्य शक्ति के रूप में एक लड़ाकू धर्म ,जाति और राष्ट्र के संस्थापक बनते हैं जो यहूदी कहलाती है | मूसा नें यहूदियों को संगठित सैन्य शक्ति के रूप में जो नया चेहरा दिया उसका धर्म की मानवीय संवेदना से कुछ लेना-देना नहीं था | वह इस अंधी आस्था पर आधारित था कि यहोवा के नाम पर जिसका भी खतना हुआ है ,वह दूसरे मनुष्यों से विशिष्ट है | यह सीधे-सीधे दूसरों को हेय और स्वयं यानि यहूदियों को श्रेष्ठ समझने वाला धर्म था | यह विशिष्टता-बोध जीता था और दूसरों का अपमान करता था | इस्लाम के प्रवर्तक स्वयं मुहम्मद साहब के ऊपर भी नीचा देखने की भावना से कूड़ा फेकने का जिक्र मिलता है | इस प्रकार धर्म के नाम पर संगठित श्रेष्ठता और संगठित अपमान करने वाली कट्टरता का सम्बन्ध यहूदियों से है |
           मुहम्मद साहब नें इस्लाम की खतना प्रथा यहूदियों से ही ली थी |.हाँ अरबी भाषा के पहले अक्षर अल्लिफ के अनुसार उन्होंने ईश्वर को यहोवा न कहकर अल्लाह कहा जिसका आशय था सृष्टि में पहला (जैसे अल्लिफ अरबी वर्ण माल का पहला अक्षर है उसी प्रकार दुनिया के पीछे सक्रिय पहली शक्ति को उन्होंने अल्लाह कहा | मुहम्मद साहब की जीवन गाथा पढ़ाकर ऐसा लगत है कि प्र्तारम्भ में उनका उद्देश्य गौतम बुद्धा और ईसा मसीह की परंपरा का ही मसीहा बनने का था लेकिन जब विरोधियों द्वारा उन पर प्राणघातक हमले बढ गए तो उन्होंने अपना रास्ता मूसा की शैली का कर लिया | खतना और कट्टरता दोनों ही इस्लाम में मूसा के यहूदियों वाली ही रही है | यही कट्टरता जब भारत में आयी तब यहाँ के लोगों को मूर्तिपूजक मानकर वही प्रयोग भारतीयों के साथ भी हुए | प्रतिक्रिया में संगठन के महत्व को देखते हुए मध्य युग में खालसा और सिक्ख पंथ का गठन गुरु गोविन्द सिंह नें किया | वे स्वयं तो मारे गए लेकिन उनकी नीव का भवन बाद में महाराणा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिक्खों नें देखा | ईसाईयों नें ईसा मसीह के नेतृत्व और प्रभाव में सेवा का संगठन बनाया लेकिन मूसा की हिंसक संगठन वाली परंपरा इस्लाम के अनुयायियों की परंपरा सिक्खों में होती हुई ब्रिटिश काल में निर्मित होने वाले हिन्दू संगठनों तक पहुंची | इसे मैं इतिहास में एंटीबाडी बनने की ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखता हूँ | वह मुसलमानों की तरह ही एक ऐतिहासिक अनुभव प्रक्रिया का परिणाम है -यह कट्टरता की पर्तिक्रियात्मक प्रक्रिया के रूप में है | हिन्दू नामकरण से लेकर उसका चरित्र गढ़ने तक इस्लाम के ऐतिहासिक अनुभव ही इसे शक्ति और उर्जा देते रहे हैं | मैं आज भी दुनिया की किसी कट्टरता के पीछे मूसा का असहिष्णु और क्रोधी चेहरा झांकते हुए पाता हूँ |
               मैं जनता हूँ कि धर्म का यह भारतीय चेहरा नहीं है हाँ इसे संगठन का चेहरा अवश्य कहा जा सकता है -एक ऐसा संगठन जिसे मुस्लिम कट्टरता नें रचा है अपनी प्रतिक्रिया में | भारत के मसीहाओं का असली चेहरा बुद्ध और महात्मा गाँधी के चहरे से मिलता-जुलता हो सकता है ,ईसा मसीह से भी | मुहम्मद साहब का प्रारंभिक आचरण बताता है कि वे भी ईसा मसीह की तरह के ही पैगम्बर होना चाहते थे लेकिन परिस्थितियों नें उन्हें मूसा की शैली का पैगम्बर बना दिया | मुझे् ल गता है कि उनकी आत्मा की शांति के लिए इस्लाम के अनुयायियों को ही आगे आना होगा | वे इंसानियत के प्रति अपने कर्तव्यों को समझकर लचीले बनेंगे तभी वे अपने जैसे सनकी कबीले के बनाने के स्थान पर इंसानियत का एक बार फिर फैलाना देख पाएगे |

        ( क्योंकि सबसे पहले मूसा नें ही एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना की थी जो सिर्फ यहूदियों के लिए हो  |यहूदियों को सगा और श्रेष्ठ और दूसरों को पराया मानने वाला दुनिया का पहला सांप्रदायिक संगठन वही था | क्योंकि मुहम्मद साहब नें यहूदियोे की प्रतिस्पर्धा में अपना धार्मिक संगठन 'इस्लाम 'खड़ा किया था ,इसलिए ईसाई धर्म से कुछ कथाएँ लेने के बावजूद इस्लाम यहूदी धर्म का ही प्रति-रूप है | यही कारण है कि जैसे यहूदी दूसरे समुदायों के साथ नहीं रह सकते वैसे ही मुसलमान भी नहीं रह सकते | क्योंकि यह मूसा के शुद्धतावादी नरसंहारों का ऐतिहासिक अचेतन छिपाए है | इस लिए हर बढ़ती जनसँख्या के साथ यह भी अलग राष्ट्र मांगता रहेगाा |दूसरी कौमें नहीं देना चाहेंगी तो उन्हें लड़ना ही होगा | इसराइल ,पाकिस्तान और कश्मीर यह सब एक ही ऐतिहासिक -सांस्कृतिक अचेतन की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं | बिना मानवतावादी आधुनिकतावादी विज्ञानवादी मुस्लिम नवजागरण के मुझे भी कश्मीर समस्या का कोई हल  नहीं दिखता |)
        धर्म की पिछली यात्रा को देखकर मैं आज भी आश्चर्य से भर जाता हूँ कि मध्य युग के संगठित अपराधियों नें ईश्वर को भी नहीं छोड़ा |आज भी उनका व्यवहार नहीं बदला है | वे क्योंकि तलवार से हत्या कर सकते थे इसलिए वे इसकी घोषणा कर सकते थे कि ईश्वर उनसे सहमत है | एक मित्र नें मुझसे धर्म की परिभाषा पूछी थी -क्या मैं ऐसा कह सकता हूँ कि प्राचीन काल से ही संगठनों की दादागिरी ही धर्म है | धर्म वही है जिसे विजेता कहता है ....
              भाग्य और प्रारब्धवाद के आधार पर राजा के पक्ष में जनमत तैयार करते ब्राह्मण अपनी भूमिका में बने रहे और उनकी इस भूमिका का लाभ बाद में मुग़ल शासकों को भी मिला | आज भी यह तंत्र आनुवंशिक व्यवस्था का सम्मान करता है | आज के भारतीय लोकतंत्र में ही कई ऐतिहासिक घराने सक्रिय हैं |एक बार निष्ठां तय हो जाती है तो उसमें भगवान की खोज शरू हो जाती है | जिसे देखो और जिधर देखो उधर ही यह तंत्र भक्त पैदा करता रहता है |ये भक्त अपनी जिम्मेदारियों से निरंतर भागते रहते हैं और जिम्मेदारियों का निरवाह करने के लिए एक अदद भगवान की खोज में लगे रहते हैं | यद्यपि इतिहास में कुछ बहुत चालाक ब्राह्मणों नें ब्राहमणों के तटस्थ रहने के जातीय निर्देश को नहीं माना और स्वयं राज सत्ता हथिया ली | इनमें से पुष्यमित्र शुंग का नाम सर्वोपरि है | भारत में गुलामी का मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करने वाले आध्यात्म के नाम पर समर्पण वादी भक्ति का प्रचार किया गया  |

हिंदुत्व-विमर्श

कोई श्रेष्ठ सभ्यता यदि अपनी विशेषताएँ भूलकर प्रतिक्रिया में जब किसी अन्य समुदाय की बुराइयाँ अपनाने लगे तो इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता | इससे दोहरी क्षति होती है -वह सभ्यता अपने वास्तविक स्वरूप से भटक जाती है ,वह प्रतिक्रिया में दूसरे समुदाय की बुराइयाँ अपनाने लगती है | हिंदुत्व को लेकर कुछ भी चिंतन करने पर मित्र बुरा मानने लगते हैं यही दिक्कत इस्लामी समुदाय के साथ भी है | हिंदुत्व के मुद्दे पर मेरी असहमति मात्र इतनी ही है कि इस्लाम समुदाय,देशों और उनकी राजनीति की भी मूल-प्रकृति कबीलाई है ;ऐतिहासिक कारणों से ही सही प्रतिक्रिया और अनुकरण में भारतीय सभ्यता को भी हिंदुत्व के एक बन्द कबीले के रूप में विकसित करने या ढालने का प्रयास नहीं होना चाहिए | इससे हम प्रतिगामी हो जाएँगे और डेढ़ हजार वर्ष पीछे की मानसिकता को जीने वाले एक बड़ी जनसंख्या के बेमतलब प्रतिस्पर्धी एवं प्रतिरूप बन जाएंगे जो सवयम परिवर्तन और आधुनिकता को सही ढंग से जी और समझ नहीं पा रहा है | हमारे वर्तमान नीति नियंता इसके प्रति कितने सजग हैं ,यह अभी भविष्य के गर्भ में है |

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

सनातन

मध्य काल में भारत में रहने वाले जिसके भी पुरखे मुसलमान बनने से बच गए वे सभी आज हिन्दू कहे और समझे जाते हैं | हिन्दू नाम ही गैर मुस्लिम गैर ईसाई भारतीय प्रजा होने का सूचक है - ऐतिहासिक तथ्य यही है कि यह शब्द गैर मुस्लिम प्रजा का ही सूचक रहा है मुसलमान शासकों के लिए | मेरी दृष्टि में तो स्वयं को हिन्दू कहना भी अतीत की गुलामी है | इससे बेहतर तो होगा कि हम सब भारतीय मूल के लोग स्वयं को सनातनी ही कहें - सनातन धर्म के अर्थ में यह शब्द प्रचलित भी है | भारतीय मूल की जनसँख्या की आदिम स्वतंत्रता के सम्मान में | यही एक ऐसी सभ्यता है जो अनेकांतवादी है | इसमें ईश्वर को माना जा सकता है ,ईश्वर को नहीं माना जा सकता है ,चुटिया रखी जा सकती है ,चुटिया नहीं रखी जा सकती है ,कपड़ा पहना जा सकता है ,कपड़ा नहीं पहना जा सकता है ,दाढ़ी रखी जा सकती है दाढ़ी नहीं रखी जा सकती है ,बाल बढ़ाने और मुंडन कराने दोनों की ही स्वतंत्रता प्राप्त है ,नहा कर हुआ जा सकता है और बिना नहाए भी हुआ जा सकता है | पूजा किया जा सकता है और पूजा नहीं भी किया जा सकता है | जब राम ,कृष्ण और बुद्ध हिन्दू नहीं कहलाते  थे तो उनके वंशजों को क्यों हिन्दू कहते हो भाई ! एक शानदार सभ्यता के शानदार अतीत का सम्मान करो | उसे सनातनी नहीं कह सकते तो हिन्दू कह कर अपमानित क्यों करते हो ? दूसरों को हिन्दू कहलाना पसंद हो तो हो मुझे तो हिन्दू कहे जाना ही अपनी महान सांस्कृतिक विरासत से पद-च्युत होना लगता है ....मुझे तो गर्व है स्वयं को भारतीय मूल का मुक्त मनुष्य होने पर | इसकी स्वतंत्रता विवेक और मुक्त मनुष्यता की भी स्वतंत्रता है | वसुधैव कुटुम्बकम की भारतीय अवधारणा भी इसी सच्चाई की उद्घोषणा है | यह सांस्कृतिक मुक्ति का भी क्षेत्र है | प्रकृति,ईश्वर और इतिहास नें जिसे अब तक मुक्त ही रखा है ,उसे आगे भी मुक्त रहने दो ! मेरी दृष्टि में भविष्य के संप्रदाय मुक्त आदर्श विश्व के लिए इस मुक्त जनसँख्या और उसके मूल्यों का पूरे स्वाभिमान ,श्रेष्ठता-बोध और वैचारिक स्वातंत्र्य के साथ बचे रहना जरुरी है| संकीर्णता के विरुद्ध मुक्ति के एक प्रेरक दृष्टान्त के रूप में ....

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

कालनेमि और दु:शासन

हम भारतीयों के लिए रामकथा का कालनेमि और महाभारत का दु:शासन अत्यंत ही चेतावानीपूर्ण एवं उपयोगी चरित्र हैं | कालनेमि को मैं मूर्ख शुभचिंतक के रूप में देखता हूँ | ऐसा मूर्ख शुभचिंतक जो कभी-कभी प्रशंसा से ही नुकसान पहुंचा देता है | रामकथा में कालनेमि का अपराध यह था कि राम की प्रशंसा में उसने हनुमान का इतना समय बरबाद कर दिया था कि लक्ष्मण की संजीवनी बूटी के अभाव में जान भी जा सकती थी | इस दृष्टि से कभी-कभी चाय और नाश्ता करने के चक्कर में ट्रेन छुड़ा देने वाले रिश्तेदार भी कालनेमि की भूमिका में ही होते हैं | इसीतरह अपनी पार्टी के सत्ता में आते ही उचित-अनुचित की परवाह किए बिना आपराधिक आचरण करने वाले भक्त कई बार दु :शासन की निंदनीय भूमिका में होते हैं |जिसप्रकार महाभारत में शकुनी के जुआ जीतते ही दु:शासन द्रौपदी के ही निर्लज्ज अनावरण में लग गया था ,वैसे ही दु:शासन के कलयुगी उत्तराधिकारी भी थोडा -सा ही मौका पाते ही निर्लज्जतापूर्वक नाचने लगते हैं |
इधर मैंने दु:शासनों से सम्बंधित कई खबरें पढ़ीं | दो निलंबित पुलिस वाले जो रिश्ते के भाई और बहन को पकड़ कर उन्हें घूस न देने पर आपस में रोमियो जूलिएट मानकर बंद कर देने की धमकी दे रहे थे | उन दु:शासनों को यह नहीं पता था कि पुलिस के नाकारा होने के कारण ही पारिवारिक अंगरक्षक के रूप में भाई साथ में भेजे जाते हैं | 
इस तरह के मनबढ़ दु:शासन भक्त अपनी पार्टी की गलत छवि जनता के बीच फैलाते हैं और अपनी पार्टी के पुण्य को ही क्षयित करते हैं और उम्र कम करते हैं | इससे एक अघोषित आपातकाल होने का वातावरण सृजित होता है | जिससे पार्टी की छवि धूमिल होती है | माननीय मुख्यमंत्री जी को अपनी पार्टी के ऐसे दु:शासनों से सजग रहना चाहिए | इससे उन मुक्त-विवेकी मतदाताओं को गहरी ठेस लगती है जो अपने द्वारा दिए गए मत का अहंकार पूर्ण और आपराधिक प्रयोग देखकर अगली बार दम्भी पार्टी को सजा देने की सोचने लगते हैं | किसी भी पार्टी के लिए इन सज्जन जज मतदाताओं की अनदेखी करना आत्म-विनाशक ही कहा जाएगा |

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

कहना तो पड़ेगा ...

जब सभी लोग एक ही दिशा में चलने लगते हैं
तो मैं अनहोनी की आशंका से घिर उठता हूँ
मुझे लगता है भगदड़ में मरेंगे सब
शास्त्रों में तो एक पिता को अपनी संतान के साथ भी
नाव पर बैठने का निषेध किया गया है
यहाँ तो चल रहा है पूरा का पूरा कुनबा ही
एक ही दिशा में और एक ही नाव पर सवार
और नदी की लहरें हैं कि किसी मगरमच्छ की तरह
घात लगाकर घूमती जा रही है .....

(भीड़ भीरु हूँ मैं
अभी मिलूंगा मैं सिर्फ अपने पास
स्वयं को दुहराने और बाहर निकालने का मेरा  कोई इरादा नहीं है)

कविता

'क ' से कथन और ''वि ' से विशेष का अर्थ लेते हुए मैं विशेष या विशिष्ट ढंग से कथन करने वाले को कवि तथा विशिष्ट ढंग से कथित को काव्य मानना चाहूँगा |

होली

 o इधर कुछ ऐसे पोस्ट देखने को मिले हैं कि जिसमें होलिका के एक स्त्री -प्रह्लाद की बुआ,को जलाने के आधार पर होली त्यौहार का ही विरोध किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में मुझे जो कहना है वह कुछ इस प्रकार है कि हिन्दी में तो इ और आ स्वर की उपस्थिति मात्र से शब्द को स्त्री मान लिया जाता है।संस्कृत में पुलिंग,स्त्रीलिंग के साथ नपुंसक लिंग भी मिलता है। इस तथ्य को देखते हुए यह सोचना ठीक नहीं होगा कि कोई स्त्री वाची शब्द वास्तविक स्त्री का भी द्योतक है। हिन्दी और संस्कृत में होलिका और होली शब्द भी अन्त में आ और ई होने के कारण स्त्रीलिंग है। इसी लिए पौराणिक कथा में भी होलिका को स्त्री माना गया है। इस तथ्य को देखते हुए कि संस्कृत में हवन,स्वाहा और हवि शब्द भी मिलता है।अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए ईधन सामग्री डालने के अर्थ में। इस दृष्टि से होलिका शब्द की व्युत्पत्ति हविका ,हविकावली, हविपत्तिका आदि शब्दों से हवलिका होते संभावित है ।'
           यह आदिम काल से चला आने वाला लोकपर्व है। यह साधारण किसान अनुभव है कि घास और झाड़ियों में आग लगाने पर हरी पत्तियाँ बची रह जाती हैं।ये हरी पत्तियां ही प्रह्लाद हैं और पुरानी पत्तियों का जलना ही नयी पत्तियों की बुआ होलिका का जलना है। प्रह्लाद का शब्दार्थ भी प्र -आह्लाद से श्रेष्ठ आनंद या उल्लास हुआ। इस व्युत्पत्ति के अनुसार  होलिका को जो भी हो चुका है यानि पतझड़ में गिरे पुराने पत्तों के जलाने एवं प्रह्लाद के बचने को वसन्त के नए पत्तों या पल्लवों के आगमन से सम्बंधित माना जा सकता है ।
            इस लोक पर्व को पुरोहिती पाठ से न देखने पर ही इसका महत्व और रहस्य खुलता है। हिरण्यकश्यप का वध भी हिरण्य यानि सोने के समान पकी हुई फसल का काटना है। नरसिंह के रूपक में किसान के सिंह केसमान पराक्रम का मानवीकरण है। झस मिथकीय कथा को रूपक के रूप में देखने से ही इसका काव्यात्मक निहितार्थ खुलता है।जैसे फसल को काटने के लिए होने हिंसात्मक कार्य की तुलना सिंह के शिकार से करते हुए उसे नरसिंह के रूप में देखा गया है।होली समबन्धी मिथक में आए सभी नाम इतने सुस्पष्ट हैं कि कथा की कालपनिकता पर विवाद न करते हुए उसके प्रतीकार्थ के महत्व की ओर ध्यान देना चाहिए।
दरअसल होली एक बहुत पुराने समय से चला आ रहा ॠतु पर्व है । होलिका दहन में हो शब्द भाषा वैज्ञानिक नियमानुसार भव शब्द से भी अपभ्रंश काल में निकला हो सकता है ।  इस रोचक भारतीय किसान लोकपर्व को बेवजह बदनाम करना ठीक नही है। इस ॠतुपर्व होली की आप सभी मित्रों को बधाई। निरर्थक अतीत को जलाकर नव्यतम और श्रेष्ठतम सुख प्राप्त करने के लिए आप सभी को शुभकामनाएँ
LikeShow more reactions
Comment

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

आदमीजात से ....

श्रेष्ठता एक अपराधपूर्ण स्वांग है
और हास्यास्पद भी
जो एक अच्छे-भले आदमी को जोकर बना देती है ...
कैसे कि -लाल मुंह वाला बन्दर
काले मुंह वाले बन्दर से श्रेष्ठ कैसे हुआ !
यद्यपि माना कि लाल मुंह वाला बन्दर
अपने गोरेपन के कारण
सवर्ण कहा जा सकता है
लेकिन वह काले बन्दर के अपने होने के वजूद को
कमतर कैसे कर सकता है ?
माना कि बंदरों में भी हम
बबर शेर की तर्ज पर बबर बन्दर हैं
और हम बर्बर भी कम नहीं ......
यह भी हम आदिकाल से ही
स्वांगपूर्ण रहे हैं
मरे हुए खालों में छिपकर
हमारे पुरखों नें अपनी जान बचायी है
लेकिन आज की तारीख में भी
जिन जातियों के नाम हिंसक पशुओं के नाम पर हैं
यानि कि वे बबर बन्दर जो सिंह होने का स्वांग करते रहे हैं
उन्हें अब शर्म आना ही चाहिए
क्योंकि जातीय स्वांग को सच मानते हुए वे
कुछ अन्य बबर बंदरों के
भेंड़ और बकरी होने की अफवाह फैलाते आ रहे हैं|
रामप्रकाश कुशवाहा
(30 जनवरी 2002 की लिखी एक कविता -डायरी के पृष्ठों से)