मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

असभ्य भाषा और असमानतावादी वैचारिकी का सामाजिक तंत्र

हिंदी समाज की सबसे बड़ी समस्या मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो वह वनमानुष या औरंगउटान है जो जब तब हमारी बोलचाल की भाषा में हमारी अचेतन आदत का हिस्सा बना बाहर आ ही जाता है . भाषा का सबसे असभ्यतम हिस्सा उन गालियों का है.जो स्त्री जाति की लैंगिक समानता और सम्मान पर आधारित न होकर असमानता और अपमान पर आधारित हैं. उनमें कुछ ऐसा अचेतन छिपा है जैसे स्त्री होना दूसरे दर्जे का नागरिक होना है और अपमान की विषय-वस्तु है.भाषा में शब्दों के बाद भेद-भाव वाली भाषा की अभियांत्रिकी व्याकरण के स्तर पर मिलती है.प्राचीन काल जब भारत में स्त्री-पुरुष असमानता का भेद-भाव बहुत नहीं था तब भाषा भी बहुत विभेदकारी नहीं थी और राम तथा सीता दोनों के साथ 'गच्छति लग सकता था. मध्यकाल में इस्लाम के भेदकारी संस्कार नें राम और सीता को अलग-अलग 'जाता-जाती' कर दिया.
हिंदी में भाषिक असमानता,अपमान और अमानवीयता का सर्जक कबाड़ जातीय पूर्वाग्रहों के प्रचारक शब्दों में भी छिपा है.जिसे मानसिक रूप से कुछ पिछड़े लोग लज्जित होने के स्थान पर समूह-आपराधिक ढंग से अगड़ा होने का साधन समझते हैं.क्योंकि कुछ लोग ऐसी अनैतिक विरासत से असभ्यी सुख-लाभ करना चाहते हैं .इसलिए अवैध हथियारों की तरह उनका इश्तेमाल करना गर्व की वस्तु समझते हैं. राजनीति के अतिरिक्त भाषा ही इस विषमता की सबसे सशक्त प्रचारक है. ये वर्जित, निन्दित और घृणित शब्द यथार्थ में तो नहीं किन्तु आभासी रूप में असमनातावादी श्रेष्ठता का भ्रम सृजित करते रहते हैं.
यह दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य है कि एशियाई मूल कीहिन्दू और मुसलमान दोनों ही जातियों के धर्म अन्त:;उपस्थित पुरोहितवादी सामूहिक अचेतन के कारण अपनी जाति और व्यक्ति केन्द्रित महिमामंडन के सांप्रदायिक प्रयास में सम्पूर्ण मानव-जाति की सृजन और अस्तित्वपरक संभावनाओं का मजाक उड़ाते हैं और उनकेप्रति अनास्था व्यक्त करते हैं.बहुत से लोग जो पिछले ज़माने के आध्यात्म के सामंती पृष्ठभूमि को नहीं समझ पाते वे नहीं समझ पाते कि उनके आध्यात्म का भी कोई आपराधिक चेहरा हो सकता है और वह उनके महान ईश्वर को ही अप्रतिष्ठित करता है .उदहारण के लिए शूद्र भी एक आध्यात्मिक श्रेष्ठता की अवधारणा का ही अवधारणात्मक और वैचारिक प्रति-पक्ष है. ईश्वर के नाम पर विकसित यह जातीय दंभ भी दूसरों में हीनता का प्रचार कर स्वयं को अनैतिक रूप से महिमा-मंडित करता है. हिदुत्व केसाथ-साथ इस्लाम भी ऐसी ही आध्यात्मिकता को लेकर मानवता विरोधी होने का अभिशाप झेल रहा है..हिन्दुओं में जहाँ सत्य (और ईश्वर को भी ) को जाति का बंधुआ बनाया गया है वहीँ इस्लाम सिर्फ एक ही महान व्यक्ति की गवाही पर आधारित है .इस अवधारणा में किसीदूसरे मनुष्य की संभावित महानता का निषेध भी छिपा है. मेरी दृष्टि में यह संरचना श्रद्धेय के परिवार की पुरोहितीय पृष्ठभूमि के कारण ही है.जिसके कारण भावी मानव जाति के भी किसी भी मनुष्य की ईश्वर से साक्षात्कार की सैद्धांतिक गुंजाइश नहीं बचती. मेरा मानना है कि व्यक्तिगत रूप से कोई कितना भी बुद्धिमान हो ले उसे अपनी बुद्धिमानी की सृष्टि के लिए और भविष्य की बुद्धिमानी के लिए भी मानवजाति की सृजनात्मक संभावनाओं पर आस्था रखनी ही चाहिए. किसी एक व्यक्ति की तुलना में सम्पूर्ण मानव-जाति अधिक श्रद्धास्पद और महिमाशाली अस्तित्व है.
हिंदी में मिलने वाले बहुत से अपशब्द तो आध्यात्मिक मूल के धातु एवं अर्थों को छिपाए हुए हैं- जैसे चूतिया शब्द को ही लें तो इसके पीछे संस्कृत का च्युत शब्द है जिसका अर्थ है गिरा हुआ या पतित लेकिन अर्थ-परिवर्तन से यह आध्यात्मिक पतन कराने वाली स्त्री से जोड़ दिया गया है . इसी तरह दो- तीन दिन पूर्व मेरे एक अभिन्न मित्र नें मेरे शब्द - ज्ञान में यह कहकर इजाफा किया कि जिस छक्का को मैं छ: से बना मानता हूँ वह अपने पीछे हिजड़े का अर्थ भी छिपाए हुए है . यह सच है कि इस अर्थ के लिए भी हिंदी समाज ही जिम्मेदार है - लेकिन यदि ऐसा एक असभ्य समाज नें दिया है तो हमें उसके प्रचलन का निषेध करना चाहिए. लेकिन इस ज्ञानार्जन में एक बात मुझे खटकी. वह यह कि जैविक हीनता याजीनेटिक विकृति के शिकार किसी लैंगिक विकलांग को उसकी हीनता के लिए इसप्रकार अपमानित करना चाहिए जिस प्रकार हिजड़ा शब्द का प्रयोग करते हुए हम करते हैं. मित्र में भी मुझे हिजड़ा को हिकारती दृष्टि से देखने वाला परंपरागत असावधान मध्ययुगीन अचेतन व्यक्तहोता दिखा .
मुझे अष्ट्रावक्र ऋषि याद् आए जिन पर जनक के दरबार में उनकी विकलांगता पर हंसा गया था और उन्होंने प्राकृतिक विकलांगता पर हंसने वालों को मूर्ख कहा था . अपने एकाक्षी होने पर हंसने या उपहास करने वालों को जायसी ने भी ठीक नहीं माना . उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं - मोहि पर हंसहु या हंसहु कुम्हारहू. अर्थात तुम मुझ पर हंस रहे हो या मुझको बनाने वाले कुम्हार पर !
यही सोचकर मैंने अपनी एक कविता में जो' नया-ज्ञानोदय में प्रभाकर श्रोत्रिय जी के समय छपी थी नपुंसक लिंगियों के लिए' अंतज' शब्द प्रस्तावित किया था- जिसका तात्पर्य था सबसे अंत में पैदा होने वाला. क्योंकि उनसे वंश - परंपरा आगे नहीं चल पाती इस लिए उन्हें अंतज कहा था. अन्यथा एक मनुष्य के रूप में जीवित उपस्थिति तो वे भी हैं ! हम एक संवेदनशील मानवीय समाज की रचना से कितने दूर हैं अब भी?

रामप्रकाश कुशवाहा
१२.१०.१६

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

जाति-दंश

(सुनील यादव के लिए)




कट्टरता पड़ोस में बची रहेगी 
तो तुममें भी लौट आएगी एक दिन
एक दिन आक्रामक क्रोध का सामना करते-करते हो जाओगे हिंसक
पडोसी जीते हुए अपनी जाति और धर्मएक दिन शोधेगा खोदेगा पूछेगा
उस दिन अतीत से पूछकर तुम्हें बतानी ही होगी अपनी जाति
और वह जाति मनुष्यता की न होकर
किसी जानवर के नाम पर होगी !
इस देश में जन्मे हो तो भागकर कहाँ तक जाओगे अपनी जाति छोड़कर
अपने जातीय नायकों को तलाशो
नहीं मिले जाति का कोई यशस्वी प्रेत
तो दंड-बैठक करो और करो कुछ ऐसा कि
तुम्हारी जाति में भी जातीय नायक पैदा हो सकें ....
अधिक शरमाने और भरमाने की जरुरत नहीं है
आदर्श,क्रांति और प्रतिशीलता के नाम पर
यूटोपिया के आसमान से गिरने पर
अटकने के लिए खजूर तलाशो
ताकि आसमान से गिरो तो खजूर पर अटक सको
न कि सीधे गिर पड़ो जमीन पर
तलाशो अपना विकल्प
क्योंकि मूर्खता का बचा हुआ एक भी रोगी
सारी दुनिया में संक्रामक मूर्खता फैला सकता है
उनके नारों को सुनते हुए भी
क्रांति हो जाने के भुलावे में भूखा मत सोओ
खोमचा लगाकर भी बचो और बचाओ अपना अस्तित्व
ताकि परिवर्तन के दर्शकों और कर्णधारों में तुम भी हो सको शामिल....
जाति –प्रथा समाप्त हो जाए तो ठीक
समाप्त न होने तक रचो अपना स्वाभिमान
अपनी उपलब्धियां अपनी कहानियां
ताकि सारी रात चलने वाली कहानियां
सुबह होने तक भी ख़त्म न हों
थक जाएँ कहानियां सुनाकर तुममें हीनता-ग्रंथि उपजाने वाले
सृजित कर लो प्रतिरोध की इतनी गालियाँ
कि उन्हें गाते हुए पहुंचा जा सके नयी सभ्यता के निर्माण तक !

बुधवार, 10 अगस्त 2016

कबीरदास : जल जलहिं समाना

(कबीर के जीवन-दर्शन मे व्याप्त मूल मानवीय संवेदना की खोज करने वाली मेरी यह लम्बी कविता मूलतः बीस वर्ष की अवस्था में १९७९-८० के आस-पास लिखी गयी थी .इस कविता को सर्वप्रथम प्रकाशित करने एवं बचाने का श्रेय कबीरचौरा ,वाराणसी स्थित कबीर मठ(मूल गादी ) के आदरणीय महंथ आचार्य श्री विवेक्दास जी को है .जल-जलहिं समाना 'शीर्षक इस कविता को उन्हें सौंपकर मैं लगभग भूल ही गया था .१९९८ में जब कबीर साहब की छठी शत वार्षिकी के अवसर पर उनके द्वारा प्रकाशित ढाई आखर 'पत्रिका में इस कविता को प्रकाशित एवं सुरक्षित देखा तो मेरे लिए इस कविता की पुनर्प्राप्ति जैसा ही था ,क्योंकि मेरे पास तब तक इस कविता की कोई भी मूल प्रति नहीं बची थी .इसी कविता को बाद में साहित्यिक पत्रिका " अभिनव कदम" में श्री जयप्रकाश धूमकेतु नें कई वर्षों बाद अब भी प्रासंगिक कह कर पुनर्प्रकाशित किया..इस कविता में युवा मन का निर्णायक विद्रोह साफ-साफ देखा जा सकता है.लिखते समय तथा आज भी इस कविता को पढ़ते समय मैं भावुक हो उठता हूँ.बहुत दिनों तक इस कविता को किसी भी धर्म ग्रन्थ से बढ़ कर पढ़ता रहता था.आज भी मुझे यह उतना ही संवेदनधर्मी और विचारोत्तेजक लगती है जितनी कि लिखते समय लगी थी . कबीर आज भी मेरे लिए आदर्श मानवता के सर्वकालिक प्रतिमान हैं.उनके पास एक सम्वेदना सम्मत विशुद्ध और अपना मानवीय स्वाभिमान को पोषित करने वाला ईश्वर है. वैसा ईश्वर और किसी के पास नहीं ।

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जल जलहिं समाना 
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धरती बांझ थी और आसमान पिता निरर्थक
नि:संतान था वह अपने पुत्र के बिना
प्रकृति विधवा थी और परम तत्त्व ओझल
तब अन्धकार की कोख में ज्योति की तरह वह उतरा......
तब चेतना डूबी थी विचारों की जड़ता में
और स्मृतियां जंगल में बदल गयीं थीं
पोथियों पर मूर्खताएं छपी थीं और ग्रन्थों में षडयन्त्र
कपटियों ने सारे प्रकाश को अपने पुत्रों-वंशजों के लिए
चुराकर बन्द कर लिया था
ज्ञान ऐश्वर्य के लिए था और ईश्वर व्यापारियों के लिए
परजीवियों का सत्य याचना के लिए-'मुल्ला का बांग' और 'पंडा का पाथर
मकड़ी जैसे अपने बुने जाल में पुकारती है कीट
धर्मग्रन्थों के शब्द कंटीली झाडि़यों में बदल गए थे- मारते हुए मनुष्य.....
जिन्हें कहा जा सकता है नीच-कहा जायेगा
बाझिन को बांझ.....कि दुखी का दु:ख सुखी के सुख का विषय है
निपूती का दु:ख.... गोद भरी मांओं की खुशी -हुआ ऐसा....
उतरा वह परम विवेक
जीवन-ज्यों सारे ब्रह्रााण्ड के गर्भ से अभी-अभी फूटा हुआ
निर्विकार अनाम पवित्र निस्सीम सागर-शिशु
आदिम मूल तत्त्व की तरह-अनन्त की ओर से
बंधीं और अनुर्वर मानव-जाति के लिए.....
तालाब में जैसे खिलता है कमल
शिशु मिला वह नीरू को अपूर्व
खुले आसमान के नीचे प्रकट हुर्इ दिव्य ज्योति
पुरानी बसितयों के अंधेरे सीलन भरे दुर्गन्धाते तहखानों और बूढ़ी कोठरियों से दूर
खुली हवा में-जंगल-सी अनछुर्इ-अबोध पवित्र और अनायास.....
किसका जीवन है यह !....सोचा नीरू नें
किसका जीवन है यह !....पूछा नीरू नें बार-बार
उसकी सारी प्रतिध्वनियां उस तक ही लौट आयीं.....
यह मेरे लिए है-उसने आसमान की ओर
कृतज्ञता से भरे अपने दोनों हाथ उठाए और झुक गया धरती की ओर
उठाने के लिए एक अपूर्व दिव्य शिशु......
जो किसी का नहीं है ,सबका है-आसमान नें कहा
मेरी धरती पर जो भी जन्मा है-मेरा है....मेरी ओर से है
विरासत है....प्रतिनिधि है सम्पूर्ण अस्तित्व का-दुहराया ब्रहमाण्ड नें बार-बार......
जो किसी का नहीं है ,सबका है
सारे मायावी जोड़-तोड़ और अंकों की भीड़ के लिए
यह सिर्फ एक मानव-शिशु ही नहीं एक विराट शून्य है-सत्य-स्फुर्लिंग !
काल-जनित विकृतियों के....इतिहास के दुखती स्मृतियों के
उन्मादों-अपराधों.... पापों-दुर्घटनाओं के सारे प्रदूषणों का अन्त यह.......
यह किसी का नहीं है ,सभी का है-सबके लिए.....सब कुछ की ओर से
भटके समाज के हर गणित को शून्य करता हुआ
निरस्त करता हुआ सारे गलत-जीवन छलका ज्यों
मानव-जाति की रुद्ध दीवारों वाली सारी परम्पराएं तोड़ ---
पूरे सागर-जल में विलीन होने के लिए
जीवन-जीवन से मिला ज्यों जल मिला जल से
जले हुए घरौंदे के बाहर का पूरा धरती घर
पत्थर और पत्तों की छत नहीं जिसकी
छत आलोक्गर्भा उन्मुक्त अंतरिक्ष की
उस अस्तित्व से जुडा अर्थ
जो है और अंटता नहीं देह और पन्नों के भीतर
मन की निर्द्वंद्व फड़कन –उल्लास असीम
उस होने के समानांतर –
समाज ज्यों उल्लुओं की जमात
अँधेरे खोहों में छुपी हुई
या उलटे लटके चमगादड़ों की फौज –बर्बर...रक्तपायी ..
.
घर लाया उसे
संपूर्ण मानव-जाति की ओर से उपजा
मुक्त और दिव्य शिशु
नीरू एक विदेह पिता
पिता –आत्मा से और मन से
पवित्र भाव से और अनुभूति से
बुद्धि से और चेतना से
युगों से अतृप्त की तृप्ति
आत्मा का पिता बना नीरू –आत्मा के पुत्र का
कबीर कहा उसे
घर लाया
जैसे बुझे हुए चूल्हे के लिए
यत्न से उठाकर लाया गया अंगार
जल उठा घर – नगर...दहक उठी बस्तियां
मंदिरों-मस्जिदों के कठघरे में पड़े रुद्ध सत्य को
भूकंप सा कंपाता हुआ अनंत-सत्य
सम्पूर्ण धरती के लिए
अपना मुक्त सन्देश लिखता हुआ ....
घर पहुंचा नीरू और शिशु को
अपनी निपूती पत्नी नीम को दिया दिव्य उपहार-सा
बड़ा होकर वह भी जुलाहा बना
लेकिन सिर्फ देह का नहीं
नंगी मानवता की आत्मा का भी ....
उसके बुने वस्त्रों की रुई चेतना की थी
और सूत विचार के
तर्कों के तकले पर काते गए विचार
उसके वस्त्रों के ताने सत्य के थे और बाने प्रेम के
सत्य और प्रेम के ताने बाने से
बुना उसनें एक नया दिव्य वस्त्र
एक नया ईश्वर विद्रोही और असंतुष्ट
बिके हुए संकीर्ण ईश्वर के खिलाफ
एक आत्मिक स्वाभिमान –सा
और मुक्त हस्त बांटा अपना क्रांतिकारी ईश्वर
भूखे-नंगों के बीच
अज्ञान में पड़े ज्ञान के अंधों के बीच
सर्वव्यापी को किया सर्वसुलभ
अदृश्य को किया दृश्य
निर्गुण को गुणात्मक किया
समदर्शी को समदर्शित
जीवन भर बुनता रहा आत्मा के वस्त्र
सजाता रहा जीवन
पहनाता रहा नंगी आत्माओं को पुकार-पुकार कर
कोई नहीं गाया
झूठी दुनियावों का दर्द उभड आया
सिर्फ गाता रहा कबीर
एक बड़े घर के लिए
छोटे खिलौना घरों को जलाकर
निकलने के लिए पुकारा उसने
उसका चुनौती भरा स्वर
खुली धुप में भी न देख पाती हुई
उलूकी आँखों वाली मिचमिची दुनिया के लिए था ...
एक विराट चुम्बक की तरह
हिन्दू-मुसलमानों में बंटे-बिखरे जीवनों को
लौह-कणों की तरह खींचा
पंडितों-पुरोहितों-मुल्लाओं द्वारा
मंदिरों और मस्जिदों को धर्म बेचने की दूकानों में
बदल दिए जाने के खिलाफ
पण्डे घबराए और मुल्ला
दूकानें सूनी पड़ने लगीं ग्राहकों के बिना.....
पंडों और मुल्लों नें कहा –
यह जुलाहे का पुत्र तो
हमारी दूकान बंद करा देगा
क्या और कैसे खाएंगे हम ?
यह कपड़ा बुनता है और जीता है
पद रचता है हमारे विरुद्ध
इसके रहते चल नहीं पाएगा
लोक आस्थाओं पर टिका हुआ
हमारा सनातन व्यापार ....
क्या शैतान हमारी कुछ भी सहायता नहीं करेगा ?
तब वे बादशाह के पास गए
बादशाह नें कबीर को बुलाया और देखा
वह उन सभी से सुन्दर भव्य और पवित्र था
जो चाहते थे उसके विरुद्ध मृत्यु का आदेश !
बादशाह धर्मसंकट में पड़ा
उसनें भीतर ही भीतर अपनें ईष्ट से प्रार्थना की
और प्रणाम किया उसे
कि वह स्वयं निरपराध रहेगा ....
प्रकट में उसने कहा –
यदि यह सारी दुनिया की आत्मा की ओर से है
और है परम ज्योति की ओर से
तो उसे पहचान लेगा पशु भी
उसनें कहा- हाथी लाओ और इसे
उसके विकराल पैरों से कुचलवा दो
इसे कोई मनुष्य नहीं मारेगा
क्या पता कि यह सारी मनुष्यता के लिए हो !
हाथी आया और उसनें चारों ओर उमड़ती
मूर्ख तमाशाई मनुष्यों की भीड़ के बीच
मैदान में जंजीरों से बंधा एक दिव्य मनुष्य देखा
उसनें पहचाना और प्रणाम किया
यह सारी दुनिया की आत्मा की ओर से है
जानकार बचाया और रास्ता काटते निकल गया
महावत नें उसे फिर-फिर अंकुश मारे
उसनें इनकार किया
बादशाह नें सिर झुका लिया
मुल्ला और पंडित घबराए
शैतान की हार देख
जनता नें हर्ष-ध्वनि की......
पंडितों और मुल्लाओं नें फिर सोचा
यह जुलाहे का पुत्र बचा निकला तो
वे सब नंगे हो जाएंगे
बंद हो जाएगी उनकी दूकान
उन सब नें बादशाह से फिर कहा –
यह हाथी तो भीड़ में भी लोगों को
बचाकर चलना जानता है
यह कुचल कर क्यों मारेगा कबीर को
इसे जंजीरों से बांधकर नदी में फेंक दिया जाए
डूब मरने के लिए .....
बादशाह नें कहा- यह ठीक है
इसे किसी मनुष्य के हाथों नहीं मरना चाहिए
क्या पता यह सारी मनुष्य जाति के लिए हो
नदी भी सारी दुनिया की आत्मा के अधीन है
इसकी मृत्यु का निर्णय भी करे नदी ....
जब कोतवाल उसे
नदी में डूबाने के लिए ले जा रहा था
उसके बनाए हुए पद आकाश तक गूंजे
फूट पड़े हजार-हजार कंठों से उसके गीत
साधुओं से भर गया पथ
जनता धिक्कार उठी
फिर भी बादशाह के आदेश और
बुराइयों की आत्मा की इच्छा से विवश
कोतवाल नें उसे मन के भीतर प्रणाम किया
क्या पता कि सारी दुनिया की सच्चाइयों की आत्मा
उस पर कोप करे
कोतवाल नें सहमें हाथों से उसे डुबाने के लिए
जंजीरों में उसे जकड़ा
शैतान के धर्मों नें उसे नदी में
बांधकर फेंक देने के लिए कहा था
ताकि कबीर डूब मरे
नदी नें पहचाना और इनकार किया
जंजीरें फिसल गयीं .....
वह बंधे हुओं को खोलने के लिए आया था
हुआ मुक्त
वह डूबते हुओं को
दुखों की नदी के पार बुलाने के लिए आया था
तैरता निकल गया उस पार ......
जनता के सहस्र –कंठों नें हर्ष-ध्वनि की .

(रचना-काल १९७८)
                                                                                           रामप्रकाश कुशवाहा

रविवार, 31 जुलाई 2016

रोते हुए बच्चे के लिए कविता

रोते हुए बच्चे के लिए कविता
०----------------------------------------
एक दिन आएगा
जब तुम्हें रोना भी उतना ही व्यर्थ लगने लगेगा
जितना कि हंसना !
एक दिन आएगा जब दुखी होकर सोचना?
पतझड़ के पत्तों की तरह झड़ जाएगा तुम्हारे जिस्म से
एक दिन आएगा-जब तुम्हें
जुलाई महीने की वर्षा की झड़ी जैसी
बात-बात में आएगी हंसी
एक दिन आएगा जब सांप के बूढ़े केंचुल की तरह
चुपचाप छोड़कर तुम्हें खिसक जाएगा दुख.......
एक दिन आएगा जब तुम हंसना सीख जाओगे
एक दिन आएगा
जब तुम अपने रोने की इच्छा पर ही
हंस दांगे फिस्स-से !
एक दिन आयेगा
जब सामने आकर खड़ी होगी तुम्हारी मौत
और उसे देखकर रुक ही नहीं रही होगी तुम्हारी हंसी !
(वर्त्तमान साहित्य में पूर्वप्रकाशित )

रोना कोई दृश्य नहीं है
०--------------------------०
रोना कोई दृश्य नहीं है दृश्य का डूब जाना है
एक पहाड़ी झरने के पीछे
जलते हुए जीवन का अपने सारे वस्त्र उतारकर
कूद पड़ना है अथाह खारे समुद्र में.....
यहाॅं कहीे दूर तक
रोने की कोई जगह दिखाई नहीं देती
इस शहर में देर तक मुस्कराने के बाद
रोने के लिए किधर जाते होंगे लोग !?


रामप्रकाश कुशवाहा

विश्वासहीन

मैं इस दुनिया को पहली बार देख रहा हूॅं
मैं इस दुनिया को पहली बार जानना चाहता हूॅं
मैं इस दुनिया को पहली बार जीना चाहता हूॅं
मैं उन रोमांचक यात्रा-वृत्तान्तों का क्या करूंगा !
ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के मापे गए दुर्गम शिखर
व्यर्थ हैं मेरे लिए......
जबकि मुझे दर्ज करनी है अपनी पिंडलियों में
असंभव चढ़ानों से जूझती दर्द भरी मधुर थकानें
मैं अपने सृजनात्मक भटकावों का मजा लेना चाहूॅंगा
बिल्कुल नई पारी के खेल की तरह
पिछला सब कुछ भूलकर............
तुम मुझे डराओ नहीं कि अब कुछ भी नहीं हो सकता
तुम मुझे रोको मत कि अब व्यर्थ होंगे सारे प्रयास
तुम्हारे नकारात्मक अनुभवों के कूड़े से
किसी पर्वत-श्रृंखला की तरह ढक गया हो
मेरी सभी दिशाओं का क्षितिज तब भी........
यह दुनिया कितनी भी पुरानी हो
कितना भी पुराना हो इस धरती पर विचरता हुआ जीवनचक्र
इस दुनिया का वर्णन करते हुए
मैं किसी थके-बूढ़े आदमी की तरह हकलाना नहीं चाहता......
मैंने तुम्हारी सारी कहानियाॅं सुनी है
और समझा है बस इतना ही कि
तुम मुझे सौंप रहे हो कुछ और कहानियां रचने की उर्वर विरासत
मैं तुम्हारी नापसन्द कहानियों को बदलना चाहता हॅंू
उनके असफल चरित्रों को फिर से जीना सिखाना चाहता हूॅं
मुझे जगह-जगह फटी हुई मूर्खताएं दिख रही हैं तुम्हारी कहानियों में.....
उनमें घटनाएं कम हैं और वर्णन ज्यादा.........
कि मै तुम्हारे सारे विचारों से ऊबा हुआ
एक अतृप्त विचारक हूॅं
अपनी शर्तों पर उड़ान भरना चाहता हूॅं अपने हिस्से का अन्तरिक्ष
हाॅं मैं रचना चाहता हूॅं अपने हिस्से की अपनी दुनिया
मैं सिर्फ मूर्खों ,तानाशाहों और अपराधियों द्वारा रची गई दुनिया को
उनकी ही बनाई गई शर्तों पर क्यों जीता रहूॅं
हाॅं मैं परखना चाहता हूॅं अपने विश्वास
रचना चाहता हूॅं अपनी आस्थाएं......
हाॅं मैं खेलना और जीना चाहता हूॅं अपने विचारों को
पूरी मौज़ और जिन्दादिली के साथ.......
कि जीवन के साथ-साथ मरना नहीं चाहिए
सक्रिय विचारशील जीवित मस्तिष्कों का होना......
कि होते रहना ही चाहिए एक नए विचारक का जन्म
टेनिस,फुटबाल,क्रिकेट या फिर तेज-रफ्तार कारों की दौड़ की तरह
हर बार नए विचारकों की एक नई जोशीली रोमांचक टीम को
इस दुनिया को और सुन्दर और रोमांचक बना देने के
कभी भी खत्म न होने वाले खेल में शामिल होना ही चाहिए........
मेरी दृष्टि में तुम्हारा सारा चिन्तन
विचारों के एक तात्कालिक प्रारूप की तरह है
मैंने पढ़े हैं तुम्हारे विचार और प्रभावित भी हूॅं
लेकिन मैं सबसे अधिक प्रभावित हूॅं इस विचार से
कि सिद्धान्ततः मैं किसी भी विचारक पर विश्वास नहीं करता.....


रामप्रकाश कुशवाहा

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

एक ही दुनिया में...

इस दुनिया में जो भी है मेरी तरह,मेरे साथ

मुझे छोड़ना ही चाहिए था-उसके भी लिए...

उसको भी साथ-साथ होने देने यानि जीने और करने की जगह.....

जबकि मैं था और मुझे ही अनुपसिथत मानकर

मेरे भी न होने की घोषणा कर दी गयी थी,,,,,



कायदे से तो मुझे लौट आना चाहिए था

उस और उनकी वर्चसिवत दुनिया में बिना हुए

जैसे किसी सोते हुए बच्चे को सोने देते हुए

चुपचाप सोते छोड़कर खिसक जाते हैं लोग

जैसे छोटे-छोटे सपनों से बाहर निकलने के बाद

जागे हुए बुद्ध निकल गए थे

यशोधरा को अपने निजी सपनों में सोते हुए छोड़कर....

जैसे एक दौड़ती हुर्इ सुपरफास्ट एक्सप्रेस æेन

आगे बढ़ जाती है अनेक छोटे-छोटे स्टेशनों को

पीछे छोड़कर-छूट जाने के इस अपरिहार्य अभिशाप के बावजूद

क्या रोमांचक नहीं है एक ही समय में अलग-अलग सपनों को जीने की स्वतंत्रता !



हमारे सपने अलग थे और हम साथ-साथ नहीं हो सकते थे

हमारे अलग-अलग सपनों ,इच्छाओं और आकांक्षाओं के रास्ते थे अलग

जैसे एक ही ब्रहमाण्ड में अलग-अलग नक्षत्रों की उपसिथति थे हम

एक ही समय में अलग-अलग दुनियावों के निर्माता थे

ऐसे में तुम्हारे असहयोग और भटकावों के लिए

यदि तुम जिम्मेदार नहीं हो तो सिर्फ अच्छाइयों की खोज में लगा हुआ

मेरा वैज्ञानिक मन और तुम्हारी दुनिया के विरूद्ध मेरा होना......



मेरा होना जो बहुतों की तरह स्तब्ध कर गया था तुम्हें भी

मेरा होना जो एक न बदल पाते हुए आदमी का होना नहीं था

बलिक मेरा होना बेवजह बदलने के लिए तैयार न हुए आदमी का होना था

उस समय तक बताया भी नहीं गया था

कि मुझे क्योंकर तुम्हारे सम्मान में झुकना चाहिए....

एक शोर सा मच रहा था तुम्हारे होने का

और मुझे एक अश्लील पर्यावरण के बीच घेर लिया गया था

मैं महसूस करने लगा था तुम्हारे सपनों की संकीर्णताओं की चुभन

एक बेहतर जिन्दगी के लिए खेले गए खेल मेें

तुम्हारे हर हत्यारे आक्रमण के बावजूद

मुझे जिन्दा बचकर निकलना था

कैंसरग्रस्त कोशिकाओं के प्रतिस्पद्र्धी होड़ की तरह

या तो तुम्हें होना था या तो मुझे

विनम्रता एक साजिश थी और अनुरोध सिर्फ परिहास.....



यदि मैं परीक्षा के नाम पर खारिज किए जाने की

अन्तहीन निर्णायक क्रूरता के बावजूद बच गया हूं तो

अब तुम्हें प्रश्नांकित और अभिशप्त होना ही है

क्योंकि होता ही होता है सारी क्रानितयों का अन्त

एक न्यायिक एवं सापेक्ष हिंसा में.........



हां मैं स्रष्टा हूं-अपनी ही शतोर्ं पर होते और जीते रहने की जिद

तथा अपनी आपत्तियों का

कि मैं अपनी सम्पूर्ण आस्था और समर्पण के बावजूद

विरासत और उपहार में मिली हुर्इ दुनिया की

मूर्खताओं को सह नहीं पाया....

हां मैं स्रष्टा हूं अपनी अरुचि और असहमतियों का

हां मैं स्रष्टा हूं अपनी नाराजगी से उपजे पुनर्विचारों का

हां मैं अपराधी हूं कि तुम्हारी यानि अपनी ही दुनिया को नापसन्द करता हूं

हां मैं अपने अस्वीकार की स्वतंत्रता में बचा हुआ -

एक अस्वीकारक स्रष्टा हू

तुम्हारी सृषिट के समानान्तर विकसित

एक प्रतिरोधी प्र्रति-सृषिट का !ं

ताकि हम जीत सकें सारी दुनिया! …

जीवन के एक रूप को जीतता हूँ तो दूसरा रूप
आकर खड़ा हो जाता है कुछ नयी चुनौतियां लेकर
मुझे परिस्थितियां  सजीव खलनायक की भूमिका  दिखती हैं
उसमें इतने आयाम छिपे है और इतनी निरीहताएं
 सक्रमण की दूसरों का रोना भी रोना बन जाता है
दूसरों का हारना देखकर लगता है की हार रहा हूँ मैं भी
जोखिमों की अंतहीन श्रृंखला
आंबे वाले समय में दुश्मनों की तरह छिपी हुयी आती हैं
कि  उनका सामना करने के लिए
हमें अपना अभ्यास ,कौशल और व्यायाम बनाए रखना चाहिए
ताकि इस धरती से बनी रहे अपनी पकड़
हमें अपनी देह में डूबकर जीन सीखना होगा
हमें सबसे पहले अपनी देह को जीतना होगा
ताकि हम जीत सकें सारी दुनिया। … 

दर्शक दीर्घा से

हर सुबह अखबार में छपता है
तीन मरे तेरह घायल 
अखबार जो काली स्याही से छपे होते है 
छिपा लेते है सडकों पर फैले हुए लाल रक्त ....

रोती हुई स्त्रियाँ और बच्चे 
दूर कही खो जाते है 
खबरों की भीड़ के पीछे 

सुबह की गर्म चाय के साथ 
हम अपने सुरक्षित बचे रह जाने की 
खुशियाँ मानते हैं 
खुशियां मनाते हैं कि 
सुरक्षित बच गए है सारे स्वजन 

कि  अब भी बची हुई है 
हमारे निकट संबंधों की दुनिया 
हमारी जानी - पहचानी दुनिया बची हुई है 

सड़क पर पड़ी लावारिस लाश के 
अन्त्य कर्म के लिए 
क्रमशः पुलिस है कुत्ते है कीड़े हैं 

घटनाओं और बाहरी दुनिया से अलग हम जी रहे हैं 
अख़बारों में छप जाने से बचते-बचाते 
सुबह के अखबार और चाय के साथ 
गुनगुनी प्यारी धुप के साथ 
और अपनी बची हुई दुनिया के लिए 
सभी के प्रति अंतहीन आभार के साथ 
बैठे हुए दर्शक दीर्घा में 

पर्यावरण का स्वर्ग

बाइबिल में लिखा है कि स्वर्ग का वर्जित फल खाने के कारण ही एडम और ईव स्वर्ग के राज्य से ईश्वर द्वारा निकाल दिये गए थे। इस मिथक में वर्जना एवं अनुशासन के महत्व को भी महिमामन्डित किया गया है। मानव जाति में प्राचीन काल से प्रचलित अधिकांश वर्जनाओं का सम्बन्ध प्रकृति के अनुशासनों से है।
। आज भी मानव जाति वर्जनाओं को तोड़ती हुई,अपने ही हाथों अपने पर्यावरण का विनाश करती हुई स्वयं को उत्तराधिकार में प्राप्त पर्यावरण के स्वर्ग से बाहर कर रही है।अपने ही स्वर्ग से निकाली जा रही है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

समय-पाठ

०००००००० 
वे हैं 
उनके होने में संदेह नहीं 
उनका सिर्फ इतना ही दोष है 
कि वे हिंसक और अशिष्ट ढंग से हैं
उनका होना एक-दुसरे को व्यर्थ और निरस्त करता है

समय के संधान में यह निर्णय नहीं किया जा सकता
कि वे बाली हैं या सुग्रीव
मालाएँ दोनों ओर सामान हैं और मल्यार्पक भी
समय किसी निर्मम रस्सा कशी की भूमिका में है
सिर्फ दर्शक की भूमिका में
अनिर्णय की स्थिति का शिकार

वे सभी अपने जीवनाधिकार और हस्ताक्षर के लिए लड़ रहे हैं
एक दूसरे की हत्या और मृत्यु से ही होना है निर्णय
समय के सच्चे इतिहास-पुरुष का

जनता अपने आदिम अनुभव के साथ चुपचाप खड़ी है
हर लडाई के परिणाम में बचे हुओं के इंतजार में
जनता अपने भीतर की नापसंदगी के साथ
समेत रही है अपने हिस्से की निष्ठाएं
जनता अब बेवफाई के निर्णायक मूड में है
प्राचीन काल की उन बेवफा किन्तु समझदार स्त्र्यों की तरह
जिन्होंने सारी निगरानी और भय के बावजूद
समय पर भारी बनैले पशुओं के स्थान पर
भयभीत समझदारों के जीन
अत्यंत गोपनीय मिशन के साथ
अगली पीढ़ी तक पहुंचाए

कि डरा और सताया हुआ समय
बिना किसी शोर के
चुपके-चुपके पढ़ता है भीगी आँखों के पीछे से'''
और डराया हुआ समय
अपने विज्ञापित दु:स्वप्नों के बावजूद
हटाई हुई नज़रों और बंद नथुनों के साथ
किसी कूड़ा-स्थल की तरह
होता रहता है अपमानित अनंत-काल तक

सिर्फ बाजार में होना और जीना ही काफी नहीं है
उस प्रेयसी पहचान के लिए
जिसके लिए धरती से लेकर आसमान तक
मचा हुआ है घमासान
और जिंदगी के नाम पर बताई गयी सारी राहें
सिर्फ पहुंचना जानती हैं श्मशान (मसान !)

० रामप्रकाश कुशवाहा
०५..०७.२०१६

बुधवार, 22 जून 2016

आलोचना-समय

मुझे बाजार और राजनीतिक समय के विवेक पर विश्वास कभी नहीं रहा है (यहाँ बाजार से मेरा आशय कालाबाजारी से है , जिसमें मूल्य बढ़ाने के लिए जमाखोरी आदि करके कृत्रिम अभाव भी पैदा किया जाता है.जरुरी नहींकि उसका मूल्यांकन ईमानदार ही हो.मेरी अभिव्यक्ति में बाजार उपलब्ध इतिहास, कृत्रिम एवं प्रायोजित समय का भी द्योतक है.)मैंने विलक्षण प्रतिभाशालियों को अपनी श्रेष्ठता का आत्मविश्वास न छिपा पाने के कारण बेरोजगार होकर नष्ट होते हुए देखा है.उनका अपराध सिर्फ इतना ही था कि वे व्यवस्था द्वारा उच्च पदों पर बैठाए गए नालायकों का औपचारिक सम्मान नहीं कर पाए. मुझे बिना समाज को साथ लिए घोषित और विज्ञापित महानताएं संदिग्ध लगती हैं.दरअसल होता यह है कि बहुत चर्चित जगहें महत्वकांक्षी अयोग्यों को कूट-रचना कर सफल होने के लिए उत्तेजित करती हैं. अंततः बाजार के नियम सार्वजनिक छवियों पर लागू होते ही हैं. विज्ञापितों में से कुछ की महानता को तय करने वाले भी सामान रुचियों और पक्षधरता वाले लोग रहे हैं. मेरा सदैव से यह मानना रहा है कि सामाजिक सार्थकता और सृजनात्मक विशिष्टता दोनों के आधार पर ही किसी रचनाकार के अवदान का मूल्यांकन होना चाहिए - न कि समर्थकों और निंदकों के संख्याबल के आधार पर.
मेरा यह भी मानना रहा है कि पूर्वाग्रह रहित विश्लेषण के आधार पर बाजार द्वारा विज्ञापित कई नाम ,जितना कि वे विज्ञापित किए गए हैं- तटस्थ विश्लेषण के बाद उससे कमतर भी सिद्ध हो सकते हैं और कई उससे बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं , जितना कि वे जाने जाते हैं.ऐसा साहित्यिक विपणन प्रभाव और राजनीतिक आधारों पर संभव है.
हिंदी साहित्य में बहुत कुछ अमूल्यांकित अथवा संदिग्ध मूल्यांकित विज्ञापित है.बहुत कुछ ऐसा है जिसे विज्ञापित होना चाहिए था लेकिन उसे समय-सम्बन्ध के समीकरणों नें मंच से नेपथ्य में विस्थापित कर दिया. हिंदी साहित्य की सृजनशीलता को वैयक्तिक और सामूहिक (संगठनात्मक) दोनों ही प्रकार की सामाजिकता नें संदिग्ध और प्रदूषित भी किया है . पूर्व-निर्धारित शर्तों के आधार पर व्यापक पैमाने पर सृजनशीलता का निषेध भी प्रस्तुत किया गया है और लोगों की मानसिक ऊर्जा को अतीतागामी यूटोपिया एवं कल्पनाजीविता की ओर मोड़ने की साजिश भी हुई है.

बुधवार, 15 जून 2016

कविताएँ

समय में और समय में नहीं
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मैं अपने समय में हूँ
मैं इतना स्वतन्त्र हूँ कि
अपने हिस्से के समय को जी सकता हूँ !
लेकिन 'माफ़ कीजिएगा'-मैं अपने प्रति
पुरे सम्मान और सहानुभूति के साथ
आपका अपने समय में न होने का
शोक-गीत लिखना चाहता हूँ !

आपकी तरह मैं भी बीते हुए कल की संतान हूँ
लेकिन आप तो बीता हुआ कल ही हैं
मेरे
समय में और समय में नहीं
 समय के जीवित अतीत !



मित्र का होना


जब सारे शहर में जेबकतरे फैले हुए थे 
मुझे अपने मित्र की याद आ रही थी
मैं सोच रहा था 
कितना फर्क पड जाता है 
इस दुनिया में किसी अपने के मित्र होने या न होने पर 
किस तरह एक अजनबी शहर रिश्तेदार बन जाता है 
एक छोटी सी सूचना के बाद....



अच्छे आदमी


अच्छे आदमी स्व्यं में  महत्वपूर्ण घटना हैं
अच्छे आदमी जो कभी चिढ़ाते रहे हैं शैतान को
सच करते रहे हैं धरती पर होना ईश्वर का

अच्छे आदमी ईश्वर के बिना भी अच्छे रह सकते हैं
जब वे नाराज होते हैं और किसी को भी नहीं मानते
जब वे खुश रहते हैं और आमंत्रण कि मुद्रा में होते हैं
अच्छे आदमी अच्छे ही रहते है 




बिकना 



लोग अपनी  आत्मा बेचकर अहंकार खरीदते हैं
मैं नहीं बिका तो क्या आसमान टूट पड़ेगा
सिर्फ यही न कि मैं धरती में धंस जाऊँगा
या बहुत हुआ तो पाताल तक

न बिकना भी तो सुरक्षित होना है
बाजार को नापसंद करते हुए
घर बसाना भी कोई बुरा सौदा नहीं

लोग घर बेचकर बाजार खरीदते हैं

मुझे  नहीं बेचना  अपना घर ....


कंक – संवेदना


अज्ञातवास में राजा विराट के यंहा 
एक अधीनस्थ  कर्मचारी गुमनाम कंक बनाकर रहना भी 
क्या  और  कितना ही अजीब  अनुभव  रहा होगा  सर्वकालिक  ज्येष्ठ  भ्राता  युधिष्ठिर !
कैसा लगा होगा तुम्हें यह मध्यवर्गीय  अनुभव 
कितना घुटे होगे निषिद्ध  चाकरी  का अनुबंध निर्वाहते  हुए !
यह भी  संभव है  कि तुमने  कूब  मजा  लिया होगा -
हाँ  साहब !  जी साहब ! क्या  खूब साहब !  और  क्यों  नहीं  साहब  बोलते हुए 
और  जब तुम ऐसा  कर रहे होगे तो भीतर से 
यानि  कि  तुम्हारी अंतरात्मा के अनकहे होठों से 
रजा  विराट के  प्रति  क्या वैसी  ही  फूटती होगी  गाली 
जैसी  कि  आज ?
साहब  हो  गया  है तो  अपने को  पता  नहीं  क्या  समझता है ...
खडूस है 
चापलूसी  नहीं  करो तो पचता  ही नहीं खाना 
क्या  डोंट खाने  के  बाद  तुम्हारे भी  मन में उठाता  था वैसा 
आपराधिक  दुर्भाव -कि  मन करता है उसको  अपना जूठा पानी पिला दूं 
उसके शरबत में क्यों  न मिला दूं  अपनी पेश -आब ...
जी हजूरी  करते हुए  भीतर  से  आते  थे 
ऐसे -ऐसे तुममें भी  कितने  कुविचार  
मैं  जानता हूँ  कि तुम्हें  काफी  अप्रिय  और  कटु  अनुभव  करना  पड़ा होगा 
क्योकि  तुम युधिष्ठिर  होते हुए भी 
अज्ञातवास की आजीविका के  लिए 
कंक  होने  का सिर्फ  अभिनय  कर रहे थे 
यह  भी  हो सकता है कि  तुम अपनी दुर्भाग्यपूर्ण 
अल्पकालिक स्थिति का  मजा ले रहे होगे 
जीवन के विराट मंच पर 
एक अपरिहार्य -आवश्यक अभिनय मात्र मानकर 
नौकरी में  अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छिपाकर 
एक ओढ़े हुए कृत्रिम प्रायोजित व्यक्तित्व के साथ जीना 
तुम्हे कैसा लगता रहा भ्राता युधिष्ठिर  !



शेयर 


सिर्फ मैं ही नहीं हूँ 
दूसरे भी हैं मेरे साथ
मेरे समय में .....
सब मेरे लिए नहीं हो सकता
न मैं सभी के लिए हो सकता हूँ
हमें जीना जानना और अधिकार
सभी कुछ बाटना होगा ....
हम सिर्फ इतना ही जान सके हैं अब तक
कि हवा अधिक दबाव से
कम दबाव के क्षेत्र की ओर बहती है
और जल प्रवाहित होता है
ऊपरी तल से निचले तल की ओर ...
लेकिन ज्ञान !
हम अपनी अज्ञानता पर शरमाते हुए भी
चुपके-चुपके दूसरों से सीखते और
स्वयं को सुधारते जाते हैं ,,,,
समस्या कुछ इस तरह है कि
हमारे कसबे में
ज्ञान की एक साथ खुल गयी हैं कई दूकाने
सडक के दोनों ओर
ज्ञान भिक्षुओं का इंतज़ार कर रहें हैं
प्रदाता कोच और उनकी कोचिंग ...
वहां बैठा हर ज्ञानी
पूरेआश्वासन के साथ
जीवन का पूरा सत्र मांगता है ....
सुना है ज्ञानी होना आसान है
लेकिन समझदार होना कठिन
बहुत पहले मेरे गुरु नें दी थी यह चेतावनी
यदि तुम सफलता चाहते हो तो
अपनी अतिरिक्त समझदारी को छिपाए रहो
कि अपने समय के औसत दिमाग से
अधिक समझदार होना खतरनाक है
कि सुकरात मारा गया था अपनी समझदारी
न छिपा पाने के अपराध में
और युधिष्ठिर सिर्फ नैतिक और मूल्यजीवी बने रहने के प्रयास में
पत्नी द्रौपदी से हाथ धो बैठा ....
गुरु नें कुछ ऐसी भी दी थी सीख
कि सिर्फ अपने अहंकार को ही नहीं
अपने स्वाभिमान की उगी हुई सींगों को भी
यत्नपूर्वक छिपाए रहो ..
लोग उनका खुलेआम दिखना बर्दाश्त नहीं करते
कि तन कर खड़े होने से
झुककर बैठना अधिक आरामदायक होता है ''
उनकी सारी सीखों के बाद भी
बार-बार कर जाता हूँ गलतियाँ
जहाँ चुप रहना चाहिए बोल जाता हूँ वहां
जहाँ रुक जाना चाहिए उसके बाद भी लिखता जाता हूँ अलेख्य
उन्होंने यह भी कहा था कि
सुनिश्चित सफलता के लिए-
किसी भी साक्षात्कार में वैसा कुछ भी नहीं बताना
जिसे तुम सच समझते हो और वह वास्तव में सही भी हो
या जो सही होते हुए भी हो इतना मौलिको कि लोग
उसका विश्वास ही न कर सकें
बताना सिर्फ वही और उतना और वैसा ही सच
जितना कि प्रश्न पूछने वाला सच के रूप में जानता हो
जैसा कि सामने वाला जानता हो
और तुमसे भी सुनना चाहता हो ...
गोया ऐसे कि तुम्हें सच को नहीं बल्कि
सच के बारे में पूछने वाले को बूझना है
कि मौकरी पाना है तो सच के दंभ को नहीं
विद्वानों की अज्ञानता के प्रति सम्मान-भाव जीना सीखो
उन्हें प्रभावित करते हुए भी उन्हें इसका पता ही न लगने दो
कि वे तुमसे कितना कम जानते हैं....
(मानों सबसे सफल और सच्चे ज्ञानी
सिर्फ अपने ज़माने की दुर्बलुाताओं से
कदमताल करने वाले लोग हैं )
हे गुरुवर ! तुम्हारी दी हुई सारी शिक्षाएं याद हैं मुझे
लेकिन मैं उनका अतिक्रमण करने का अपराध करता रहा हूँ
अब मैं भी आपकी तरह बूढ़ा और अनुभवी हो चला हूँ
लेकिन मुझे लगने लगा है कि
हमेशा सुरक्षित और अनुशासित जीवन जीना
मानव जाति के हित में नहीं होता
कि इस दुनिया को बदलने के लिए
कुछ रोमांचक और मौलिक मूर्खताएं भी घटित होती रहनी चाहिए
कभी-कभी निकलना ही चाहिए बुद्धं की तरह
महल और सुख की सारी चिंताएं छोड़ कर ...
चुनना चाहिए अपमानों और अपराधों का शिकार होने की
संभावनाओं वाला जोखिमपूर्ण वर्जित रास्ता
नए बेहतर रास्तों की खोज के लिए ....
बाहर के सारे रस्ते भीड़ से भरे हुए हैं
बेहतर क्या होगा किसी के भी लिए -
वह यात्रा स्थगित कर दे और घर से ही न निकले
निकले और वह भी डूब जाए भीड़ को चीरते-तैरते हुए अपने गंतव्य की ओर
भीड़ के छटने का और पथ के मुक्त होने का इंतजार करे
स्वयं रुका रहे दूसरों को रास्ता देने के नाम पर
या दूसरों के साथ चले ....
सच तो यह है कि इसमे से कुछ भी सोचनीय नहीं है
कि जनसँख्या-वृद्धि ( भीड़} मानव जाति के उत्तरधिकरियो
प्रतिनिधियों का वैकल्पिक उत्पादन है
कि हर व्यक्ति वैकल्पिक और फालतू रूप से पैदा हुआ है
मानव-जाति की सुरक्षा और अस्तित्व की निरंतरता के लिए
हर व्यक्ति अपनी ओर से कुछ बोलना चाहता है और शोर उत्पन्न कर रहा है
एक समय में कुछ लोगों के चुप होने की जरुरत है कि
कुछ अच्छा बोलते लोगों को साफ-साफ सुना जा सके
इस सच्चाई की परवाह किए बिना कि
कि एक समय में अधिकांश लोग
एक जैसा ही सोचते-समझते और बोलते हैं ..
शर्त सिर्फ इतनी ही है कि जो बोल चुके हैं
उनका चुप होकर बैठ जाना जारी रहना चाहिए
कुछ बोलते लोग एक ही बात दुहराए जा रहे हैं मंच पर
यद्यपि वे थक गए हैं
फिर भी बोलते हुए दिखना चाहते हैं देर तक
मेरे पास अपने बोलने का कोई वाजिब कारण नहीं है
सिर्फ इस चिढ़ के अतिरिक्त
कि जो बोला जा रहा है उससे मेरी असहमति बढ़ गयी है
तब जबकि मैं न भी बोलूँ
सभी को सुनते रहने के लिए अभिशप्त हूँ
अस्तित्व की आवृत्ति एवं बारम्बारता वाली दुनिया में
जबकि संगठित होकर अपराध करने वाले गलत्कारियों की संख्या बढ़ गयी है
हमें इस दुनिया को शेयर करते हुए ही जीना चाहिए
छोड़ कर बार-बार हटने की इच्छाओं के बावजूद
मैं अभी फेसबुक पर बना रहना चाहूँगा
शेयर करते हुए
जो जहाँ और जितना है
वहां और उतना उसके लिए उसके हिस्से की दुनिया छोड़कर ....
( श्रद्धेय गुरुवर स्वर्गीय विजय शंकर मल्ल जी की पावन स्मृति को समर्पित )
३१.०५.२०१६


मातृ-शोक


माँ की अन्तिम यात्रा के बाद
कुछ हुआ है ऐसा कि
जब मैं लौटना चाहता हूँ घर को
घर अब घर की तरह नहीं रह गया है
वह उदास और धूसर है
किसी भी जीवन-संवाद से वंचित
उनकी जड़ता की अन्तिम स्मृति की तरह ....

जैसे गुजराती हुई ट्रेन से दृश्य बदलता है
जितनी तेजी से दृश्य बदलता है
उतनी तेजी से भागता हुआ लगता है समय
बचपन में हमारा सोना-जागना –उठाना –गिरना खेलना
खाना-पीना हँसाना –बोलना चीखना
चाहे वह आँगन में ही क्यों न रहा हो
वे सारे दृश्य एक पीछे छुट गयी यात्रा की तरह लगते हैं ...

पड़ोसियों के ढेर सारे बच्चो सहित हम सारे नन्हे मित्र
आज एक बड़ी परियोजना के हिस्से की तरह याद आते हैं
उन दिनों जब ढेर सारी माएं
नयी पीढ़ी की उंगलियाँ पकड़ कर उन्हें चलना सीखा रही थीं
उस भीढ़ में माँ मेरे लिए  कुछ खास थीं
और मैं भी उनके लिए
यह एक विशिष्टता और अनन्यता का रिश्ता था .....
पिता की उनपर सारी आसक्ति और रीझ के बावजूद
तब तक मैं यह नहीं जानता था कि
मेरी माँ भी एक परी थीं
और दिखाई न देने के बावजूद
अपने भीतर छिपाए हुए हैं एक अदृश्य पंख
और एक दिन उड़ जाएंगी एक अज्ञात देश समय के साथ
सारे पुत्र मोह के बावजूद अपने वार्धक्य की अशक्तता से लाचार
अपने पुत्र को लोक और समय में छोड़कर......

इस सच के साथ कि दुनिया की सारी मृत्युएँ एक दुर्घटना ही होती हैं
चाहे वे कितनी ही प्राकृतिक क्यों न हो
इस सच के साथ कि आदमी का बच्चा
जितना लम्बा समय सयाना होने में लगता है
उससे कम समय नहीं लगता उसे बूढ़ा होकर मरने में ...
इस सच के साथ कि सारे ईश्वर ,सारे धर्मं और क़ानून
या फिर बिना ईश्वर धर्म या क़ानून के
हर मनुष्य का यह सामाजिक जीवनाधिकार है कि
उसे सेवादार  शांतिपूर्ण  सुखद और सम्मानित म्रत्यु मिले
तमाम असुविधाओं के बीच मैं अपनी माँ को धरती की तरह बचाए रखना चाहता था ...
अकेले में बुदाबुताते हुए
कि हे काल इतनी भी जल्दी क्या है
माँ से भी मैं कहता ही रहता था
कि बुढ़ापा और म्रत्यु तो जीवन का भद्दा मजाक है
वह जीवन का वांछित नहीं ,बल्कि जीवन की मजबूरी है
उसके बारे में सोचकर क्या चिंता करना
आप सिर्फ शांतिपूर्वक  जीने पर ध्यान दें
वृद्धावस्था की लाचारी के अपने सारे अपमानबोध के बावजूद
वे धीरे-धीरे बुढ़ापे को  जीने की जिदा के साथ जीतते हुए जीना सीखा रही थीं ....

जीने की भरपूर इच्छा के विरुद्ध
उनकी म्रत्यु भी एक दुर्घटना ही थी
जब उनकी देह नें उनकी एक न सुनी ...
उस पल को याद कर
मैं अभी भी कविता लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूँ ...

मैं नहीं जानता कि माँ के मरने का भूकंप से क्या रिश्ता हो सकता था
माँ का धरती से क्या रिश्ता हो सकता है
उनकी म्रत्यु के बाद क्यों विचलित हो गयी धरती !
गत १८ अप्रैल २०१५ को घर के आँगन की अनापेक्षित घास नोचते हुए
किसने उनकी साँस पर प्रतिबन्ध लगा दिया
बिना मुझसे पूछे ....वह भी तब
जबकि निश्चय ही वे
मेरे आने की आहट की प्रतीक्षा में होंगी
काल जिसकी आत्मा निश्चय ही किसी निर्मम हत्यारे मनुष्य की है
या फिर वह अन्धकार की सारी कालिमाओं से बना हुआ कोई महासर्प ही होगा
जो चिढ़ता होगा जीवन की हर मुस्कान से
या फिर एक अर्थहीन और मुर्खता पूर्ण यांत्रिक स्थगन
जिसके फलस्वरूप मेरी माँ धरती पर ही चिर निद्रा में सो गयीं
जबकि वे मुझे यानि कि अपनी जैविक कलाकृति को
आँखे  हमेशा के लिए बंद हो जाने तक जीते रहना चाहती थीं ..

काल का रावण उनके बेटे कलयुगी राम को
एक बार फिर नौकरी रूपी सोने के हिरन का पीछा कराते
उनके अन्तिम पल से बहुत दूर लेकर चला गया था
मेरे अधिकारी का कहना था कि नौकरी देश के सेवा के लिए की जाती है
और नौकरी यानि मातृभूमि यानि  कर्तव्य के लिए
माँ का शहीद हो जाना भी एक तुच्छ घटना है
कि नौकरी जनहित में की जाती है जबकि माँ हमेशा व्यक्तिगत होती है
यह एक यांत्रिक , अमानवीय और संवेदनशून्य सत्ता का तर्क था
जिसके विरुद्ध मैं पूरे दो वर्ष तक
रात्रि सेवा और संग के लिए उनके पास पहुंचता रहा ....

चालाकियों और झूठ के इस गंदे-अंधे दौर में
उनके अविश्वास के सम्मान में
कई बार इच्छा हुई कि मैं अपनी लाचार माँ के प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करूँ
कि बुढ़ापा किसी भी बीमारी से बढ़ कर है
कि पागलो,बूढों,विकलांगों,बेरोजगारों से लेकर अयोग्यों एवं असफलों तक
परिवार अब भी अन्तिम शरण और जीवित संस्था है
जबकि सरकारें अब भी गैरजिम्मेदार और बाजारू
कभी –कभी तो मध्ययुगीन कबीलों के वारिसों से संचालित ...

मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरी माँ नें जितने वर्षों तक मुझे
अपनी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया
और अपने हांथों अपना भोजन पका लेने तक मुझे बड़ा किया
उतने वर्षों तक मेरी भुजाओं का सहारा माँगने का उन्हें अधिकार है ...

मेरे कार्यस्थल के सर्वाधिक भ्रष्ट पतित और झूठे (अ )सहयोगी
माँ के प्रति मेरी सतत चिंता को
माँ के नाम पर मांगी गयी मेरी अवकाश –प्रार्थनाओं को
मेरी दीर्घकालिक यानि कि स्थाईचालाकी का हिस्सा मानते थे ....

तो क्या मेरी माँ इस लिए दिवंगत हो गयीं कि
मेरी माँ सबको अपने अन्तिम संस्कार दिवस पर बुलाकर
यह दिखाना चाहती थीं कि देखो मेरा बीटा झूट नहीं बोल रहा है
कि मैं सचमुच ही अस्वस्थ थी अन्यथा यह दुनिया छोड़कर जाती ही क्यों !

यह समाज जो इतना झूठा और असम्वेदनशील हो गया है कि
कि वह सच बोलने वाले को मुर्ख या झूठा समझता है
उनका इतने अपमानो के बीच जीना और जाना
दोनों ही जैसे धरती को बर्दाश्त नहीं हुआ
उनकी अनैक्छिक एवं अवांछित मृत्यु को यादकर ही जैसे यह धरती क्रोध से कम्पने लगी 
शायद जंगलों के काटे जाने और शेरों के मार दिए जाने से
पूरी तरह नरभक्षी हो चुका काल भूखा था
उसे अपनी क्षुधा –शांति के लिए अभी भी और माओं की जरुरत थी
मैं अपने ही दुख और क्षोभ से बुरी तरह डर गया था
मैंने अपने मातृशोक और भूकंप में अजीब सा रिश्ता देखा
मैंने अपनी माँ कीई आत्मा की शांति के लिए
भविष्य में शान्तिचित्त बने रहने और दुख-बोध को
न जीने का संकल्प लिया     


चेहरों की यह किताब ....



आदमी का शक्ल लेकर घुमती हैं यहाँ
बेहद अक्लमंद और कम - अक्ल दोनों ही
अपने होने को प्रदर्शित कर रहे होते हैं
ऐसा लगता है कि जैसे किसी चोर-दरवाजे से
झांक कर देख रहे हों लोगों के भीतर का सच .....
कुछ चुपचाप अकेले  पड़े हैं फेसबुक पर
तो कुछ गिरोह बंद रूप में
कुछ बेहद शालीन तो कुछ खतरनाक इरादों के साथ
कुछ सुखद झोंकों की तरह तो कुछ तूफानी
कुछ इंसानियत से भरे तो कुछ शैतानी
अजब -गजब है फेसबुक यानि चेहरों की यह किताब ....
साहित्यिक इतिहास का समाजधर्मी पुनः पाठ



यह दुनिया


यह दुनिया जो एक मकड़ी के जाले की तरह है
और मैं भी हूँ उस जाले का एक तार
दूसरों से जुड़ा हुआ
जोड़ता हुआ दूसरों से
दूसरों से बंधा हुआ
बांधता हुआ दूसरों को
मेरा हिलना हिलाता है दूसरों को
मेरा टूटना तोड़ देता है -
संवेदना के कोमल तार
इसी जाले पर दौड़ती है समय की मकड़ी

मैं एक अदृश्य बुनावट का हिस्सा हूँ समाज की
मेरा होना सिर्फ अकेले का
अपनें असम्बद्ध एकांत में होना नहीं है
शायद इसीलिए जब मैं दूसरों को तोड़ता हूँ
स्वयं टूट जाता हूँ
जब मैं छोड़ता हूँ दूसरों को
स्वयं छूट जाता हूँ
मेरी यात्रा एक सामूहिक यात्रा है सम्पूर्ण मानव -जाति की

शायद इसीलिए
मेरे सौभाग्य का ईश्वर
मेरे मित्रों और मेरे चाहने वालों की
शुभकामनाओं से बना हुआ है
दूसरों कोमुझसे मिलाने वाली ख़ुशी में रचा-बसा है
मेरी आत्मा का सच्चिदानन्द !

और मेरे दुर्भाग्य का शैतान भी
मुझे नापसन्द करने वालों की घृणा में छिपा हुआ है
उनकी अरुचि से बना हुआ है
मेरे निर्णयों के प्रति असहमतियों से बना है
मेरे अस्तित्व और सार्थकता का प्रतिपक्ष

मेरा अच्छा या बुरा होना
सिर्फ मेरे भीतर का ही
मेरे भीतर तक ही होना नहीं है।



शून्यकाल के नायक


बाजार में एक ही शिखर था
बिल्कुल एवरेस्ट की तरह
घटता-बढ़ता रहता था लेकिन
झुककर किसी ऊंट की तरह कर्इ बार
किसी अदने से व्यकित को भी बिठा लेता था अपनी पीठपर
फिर उसे बहुत दूर से दिखता और दिखाता था किसी शाहंशाह की तरह
एक ही एवरेस्ट की पीठ पर सब चढ़ना चाहते थे एक दिन
कूबड़ ही एवरेस्ट का था समय का पैमाना बना हुआ
दूल्हे और बारात के आने की प्रतीक्षा और पूर्वाभ्यास में
कुछ लोग बैठकर ऊंघ रहे थे एवरेस्ट की पीठ पर
समय के सूनेपन को भरते हुए
शून्यकाल के नायक!
बाजार में
यह एक मेले का एवरेस्ट था
जहां कुछ शराबी
अपने-अपने सिर पर अपने जीवन का बोझ उठाए
थकी हुर्इ यात्री भीड़ की पीठ पर
इतिहास की दिशा का पोस्टर चिपका रहे थे ।

समय के कैंसर


जब हम एक जगह किसी मानवीय भूमिका में उपस्थिति होते हैं तो
उसी समय किसी अन्य मानवीय भूमिका के लिए
सामाजिक रूप से अनुपस्थित भी होते हैं
जब हम बन जाते हैं व्यवस्था के एक हिस्से के पुर्जे
दूसरे हिस्सों के लिए होते जाते हैं असंगत
कोई भी सर्वव्यापी नहीं हो सकता
एक व्यक्ति के रूप में
लेकिन प्रभाव के रूप में हो सकता है
उन संगठनो के कारण
जो एक व्यक्ति के विवेक कोसभी का विवेक बना देते हैं
होते हैं जिनके पास अपने ही समय के बंधुआ मस्तिष्क
और जो महानता की ओट में शर्मनाक ढंग से
दूसरों को स्थगित और निरस्त करते हुए 
दूसरों के नाम पर सोचते हैं
और बन जाते हैं समय के कैंसर



अवसाद 

उतना सौंदर्य कहाँ जी पाउँगा 
इस दुनिया के नेपथ्य में चली गयी है वह दुनिया 
जिसे मैं दुनिया जानता था 
पहले पिता गए 
और आँगन में उतर आई चिलचिलाती धूप 
पेड़ चुपचाप अतीत में  गए 
कंकरीट का जंगल  देखकर 
हवाएं मुंह ढक कर खांसने लगीं 
फिर माँ वाष्प बनकर अदृश्य हो गईं 
समय का असहनीय सूरज तपने लगा सर पर 
मैं एक घबराई हुयी भीड़ के पैरों तले फेंक दिया गया हूँ  

दर्शकदीर्घा से 

हर सुबह अखबार में छपता है 
तीन मरे तेरह घायल 
अखबार जो काली स्याही से छपे होते है 
छिपा लेते है सडकों पर फैले हुए लाल रक्त ....

रोती हुई स्त्रियाँ और बच्चे 
दूर कही खो जाते है 
खबरों की भीड़ के पीछे 

सुबह की गर्म चाय के साथ 
हम अपने सुरक्षित बचे रह जाने की 
खुशियाँ मानते हैं 
खुशियां मनाते हैं कि 
सुरक्षित बच गए है सारे स्वजन 

कि  अब भी बची हुई है 
हमारे निकट संबंधों की दुनिया 
हमारी जानी - पहचानी दुनिया बची हुई है 

सड़क पर पड़ी लावारिस लाश के 
अन्त्य कर्म के लिए 
क्रमशः पुलिस है कुत्ते है कीड़े हैं 

घटनाओं और बाहरी दुनिया से अलग हम जी रहे हैं 
अख़बारों में छप जाने से बचते-बचाते 
सुबह के अखबार और चाय के साथ 
गुनगुनी प्यारी धुप के साथ 
और अपनी बची हुई दुनिया के लिए 
सभी के प्रति अंतहीन आभार के साथ 
बैठे हुए दर्शक दीर्घा में 



द्रौपदी-प्रसंग'

यद्यपि तुम जानते थे कि व्यास जी का कैमरा लगा हुआ है
पूरे देश और उसके भविष्य के लिए
हो रहा है उसका आन -लाइन प्रसारण ....

क्या कहीं भीतर से जाग उठा था तुम्हारा शरारती विचारक !
या तुम मारना चाहते थे समूची भारतीय संस्कृति के गाल पर
प्रश्न का एक करारा तमाचा?
कि कन्या को भी दान में लेने-देने की वस्तु मानते हो
तो लो मैंने दिया

या फिर नकारात्मक मानसिकता के अभिशप्त क्षणों में
तुमने अर्जुन के कौशल और पुरुषार्थ से जीती हुई
और माँ की आज्ञा से मुफ्त में मिली द्रौपदी को
सिर्फ अपना अधिकार जताने के लिए यूं ही दान कर दी....

क्या दाम्पत्य के अन्तरंग क्षणों में
सिर्फ अर्जुन को वरण करने वाली द्रौपदी
तुम्हें कभी भी भीतर से अपना पति
स्वीकार नहीं कर पायी ?

क्या कुंती नें भी अपनी बहू को
सिर्फ इसी लिए पांच पतियों के बीच बाँट दिया कि
कल उनकी बहू सबकुछ जानने के बाद
अपनी सास के चरित्र पर उंगली न उठाए
कि उसकी बहू अपनी सास को नियोग के लिए
अलग-अलग पुरुषों से समागम करने वाली स्त्री न समझे...

या तुम द्रौपदी के असमान व्यवहार से
उपेक्षित आहत अपमानित और दुखी थे
भीतर ही भीतर दुर्योधन की तरह ही
उसकी प्रखर तर्क-बुद्धि से आतंकित और
उसके व्यंग्य बाण मारने की प्रवृत्ति से आहत थे...

या तुम्हें भीतर ही भीतर पूरा अंदेशा था
और सुनियोजित थे तुम कि
कौरव सत्ता का घृणास्पद चेहरा
पूरी तरह खुलकर सामने आए
और तुमने पूरी तरह कर दिया
अपने कुटुम्ब को उनके हवाले
उनके विवेक की प्रकृति और स्वभाव के
सार्वजनिक निदर्शन के लिए