सोमवार, 16 जनवरी 2017

"मैंने अपना ईश्वर बदल दिया है " पुस्तक की भूमिका का कुछ अंश

जब हम ईश्वर के अस्तित्व के बारे में सोच रहे होते हैं निश्चित रूप से पूरी दुनिया और अपने जीवन के अस्तित्व के प्रति आश्चर्य से भरे होते हैं .निश्चय ही यह अनुभूति एक बड़ी और उदात्त कविता की अनुभूति जैसी है .एक ऐसी कविता जो अपने अस्तित्व के लिए कृतज्ञता और धन्यवाद भावना से भरी हो .मुझे लगता है कि ईश्वर के प्रति हमारी आस्था के मूल में सम्पूर्ण अस्तित्व के प्रति हनारा कृतज्ञता ,आश्चर्य ,धन्यता और आत्मीयता से भरा वह अभिन्न सम्बन्ध ,रिश्ता और आकर्षण ही है जो आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में हममे प्रकट होता है .मेरे लिए सच्ची आध्यात्मिकता इसी उदात्त अनुभूति और अर्थवत्ता की खोज है | ईश्वर इसी बड़ी कविता का प्रतीकात्मक प्रत्यय है | मेरे लिए इसी उदात्त अनुभूति और कविता को जीना ही ईश्वर को जीना है | लेकिन संसार के सारे प्रचलित धर्म और उनके अंध अनुयायी इसी उदात्त कविता को जीने के अधिकार को रोकते हैं | प्राचीन काल से ही जंगली कुत्तों में मिलने वाले व्यवहार की तरह सिर्फ ,नेतृत्व ,शासक या राजा को ही नहीं रोका गया है या फिर साधु ,फकीर नबी ,पैगम्बर या अवतार माने जाने वाले गिने-चुने व्यक्तियों को ही उन्मुक्त अस्तित्व की यह आदिम कविता जीने का अधिकार मानव-जाति नें दिया है | मैं जब अपने अस्तित्व और अस्मिता को लेकर अपने हिस्से की उदात्त अनुभूति और कविता जीना चाहता हूँ –देखता हूँ उसकी सूचना मात्र से लोग घबरा जाते हैं | वे इस कविता को जीने से डराने लगते हैं .उन्हें यह खतरनाक बात लगती है कि कोई इस सृष्टि से अपने अभिन्न रिश्ते को सम्पूर्णता से रिश्ते को जीने की मांग कैसे कर सकता है ? विगत में यहूदियों के  नेतृत्व मूसा द्वारा लगाए गए ऐसे ही प्रतिबन्ध के कारण ईसा मसीह को ऐसी ही कविता जीने के अपराध में सूली पर चढ़ा दिया गया था  .
             मेरा सीधा सा प्रश्न है कि हम ब्रह्माण्ड से अपने रिश्ते को सीधे-सीधे क्यों नहीं जी सकते ? क्या सिर्फ इस लिए कि सामंती नेतृत्व वाले पिछले धार्मिक समाजों  नें सभी को ऐसा अधिकार जीने के लिए वर्जित किया है |क्योंकि जीवन अनेक रूपों-प्रारूपों में है और लगभग एक भीड़ के रूप में भी | .सामूहिकता और सामाजिकता की सह-अस्तित्वपूर्ण भावना हमें अपनी प्रजाति की सामूहिकता के पक्ष में इस सृष्टि को अकेले ही जीने के अधिकार से रोकती है | भारत में प्राचीन काल में इस कविता को जीने की घोषणा गिने-चुने लोगों नें ही की है .संख्य-दर्शन के प्रवर्तक कपिल ,महर्षि पतंजलि ,विश्वामित्र ,शंकराचार्य ,गोरखनाथ और कबीर आदि इतने ही नामों के लिए मैं अपनी स्वीकृति प्रदान कर पाता हूँ | महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध की कविता का भी अलग संवेदनात्मक  महत्त्व है लेकिन  वह सम्पूर्ण प्रकृति की तुलना में मानव-प्रकृति की दार्शनिक व्याख्या से अधिक सम्बंधित है | वह सीधे-सीधे सम्पूर्ण अस्तित्व को उदात्त भाव-रूप में जीने से सम्बंधित नहीं है | पश्चिम में ईसा ही इस कविता को जीने का दुस्साहस करते दिखते हैं | 
                 इस भावाधिकार को मैं सृष्टि को अपने अस्तित्व और अस्मिता से जोड़कर जीने के भावाधिकार के रूप में देखता हूँ | इस दृष्टि से इस्लाम भी  मुझे एक निषेधात्मक धर्म ही लगता है | जहाँ इस कविता को जीने से ही सभी को एक साथ मना  कर दिया गया है | इसी दृष्टि से इस्लाम और भारत के पुरोहित-जातीय धर्म को मैं प्रकृति निषेधात्मक धर्म ही मानता हूँ | ये दोनों एशियाई धर्म सृष्टि से जीवन के रिश्ते को सीधे-सीधे जीने देने के पक्ष में नहीं हैं | ये कबीले और जाति के पक्ष में व्यक्ति-जीवन को निरीह बनाने और बताने  वाले धर्म हैं | ये चाहते हैं कि मनुष्य उस अस्मिता को जिए ही नहीं और सृष्टि से अपने प्रत्यक्ष रिश्ते को प्रजाति के प्रत्यय के पक्ष में समर्पित कर दे | मैं जब अपने ईश्वर को बदलने की मांग कर रहा हूँ तो इसी निषेधात्मक निरीह बनाने वाले ईश्वर की अवधारणा  को अस्वीकार करने की घोषणा कर रहा हूँ |
            आज  हमारे समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके लिए ईश्वर एक कालातीत विषय हो चुका  है | मार्क्सवाद और वैज्ञानिक चेतना के प्रभाव से उन्हें लगता है कि ईश्वर को चिंतन और रचना का विषय बनाना ही समय की बर्बादी है | बहुत से लोग जो धार्मिक अर्चना और वर्जना की पुरानी आदतों से बाहर निकल गए हैं ;उनके लिए ईश्वर की अवधारणा  को स्वीकार करना एक खास तरह की जीवन-पद्धति और पूर्वाग्रहों सहित पिछड़े समय की सामाजिक आदतों को भी पुनः  स्वीकार करने जैसा है | यदि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ईश्वर की अवधारणा के बिना भी नैतिक और अनुशासित होकर जीना सीख गया है तो क्या जरुरत है उसे वहां से विस्थापित कर पुरानी दुनिया के विश्वासों में ले जाने की ? मार्क्स से सहमत होते हुए बहुत से ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो बिना ईश्वर के ही पूरे आत्म-विशवास के साथ जीना और सोचना चाहते हैं | क्योंकि अतीत में ईश्वर के नाम पर भी सवेदित जन-समुदायों नें बहुत से नरसंहार और सामुदायिक अपमान किए हैं | अतः हमें ईश्वर की अवधारणात्मक शुद्धता और उसमें शामिल मानव-व्यवहार के हिस्से को साफ़-साफ़ अलगाने का निर्णय लेना ही  होगा | ताकि हम तय कर सकें कि प्रभाव और दुष्प्रभाव अवधारणा की कमियों के कारण है कि संगठनों और उसके नेतृत्व के चलते !
             मुझे यह भी  लगता है कि ईश्वर और मनुष्य के रिश्ते पर विचार करते समय प्रकृति की पूर्ण अस्मिता को न जी पाने की उसकी अपूर्णता -जो उसे पूर्ण होने के लिए सामाजिकता की ओर ले जाती है ;उसे भी ध्यान में रखना होगा | भेड़िए ,हाथी मधुमक्खी एवं चींटी आदि प्रजातियों की तरह मनुष्य भी एक सामाजिक प्राणी है | इतिहास के जंगली चुनौतियों वाले दौर में जब चारों ओर शिकारी ,संकट और मृत्यु की संभावना ही विचरती होगी -बहुत से संकटों का सामना तो अतीत का मनुष्य समूह में ही कर पाया होगा , जैसे सुरक्षा में तैनात कुछ लोगों के जागने की कीमत पर कुछ लोगों को सोने दिया जाता है | इस तरह सामजिकता का जैविक आधार सामूहिकता में सुरक्षा की खोज का अचेतन भी है |
            मेरा यह भी मानना है कि सामाजिक प्राणियों में पूर्णता की मनोवैज्ञानिक खोज व्यक्ति स्तर पर संभव ही नहीं है | वह अपने से बाहर के वृहत्तर से जुड़ कर ही पूर्णता का अहसास जी सकता है | क्योंकि मनुष्य भी एक समूहजीवी प्राणी ही है इसलिए लाखों वर्षों के क्रम-विकास में इसका प्रजातीय व्यक्तित्व वैयक्तिक स्तर पर अपूर्णता जीने वाला ही है | इस दृष्टि से देखें तो अस्तित्व और अस्मिता का वृहत्तर अमूर्तन उसके अचेतन मनोवैज्ञानिक बनावट का एक हिस्सा और जरुरत  है | इसी मनोभूमि को जीते हुए वह अपनी  प्रजाति के द्वारा निर्धारित विश्वासों के प्रति अपनी आस्था और विशवास को  प्रकट करता रहता  है | तात्पर्य यह है कि अधिकांश सांस्कृतिक विशवास अलग-अलग प्रजातियों के द्वारा अतीत से लेकर आज तक अपने सामूहिक विवेक के सापेक्ष निर्धारित किए गए  सत्य हैं | यहाँ प्रवृत्यात्मक रूप से ईश्वर की जगह समुदाय, संप्रदाय और समाज को भी रखा जा सकता है –इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि वह इनमें से क्या जी रहा है और क्यों ? महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी शून्यता अथवा एकाकी निरर्थकता को किसी न किसी अवधारणा के माध्यम से प्रजाति की सम्पूर्णता के प्रति अपने समर्पण से भरेगा | इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक धरातल पर ईश्वर माता और पिता के संरक्षक भूमिका और उनके अभिभावकत्व का भी दार्शनिक प्रत्यायन है –वयस्क होने पर भी जीवन में माता-पिता की अनुपस्थितियों के क्षण के माता-पिता की तरह भी ईश्वर हमारे वृहत्तर भाव-अस्तित्व का एक हिस्सा है |
          अपनी इस ईश्वर विषय पर विशेष रूप से केन्द्रित  पुस्तक  “मैंने अपना ईश्वर बदल दिया है “ का धृष्टता और चुनौतीपूर्ण नाम रखते हुए दूसरों की तरह मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा है ; लेकिन यह प्रश्न उठ सकता है कि  ईश्वर जो लगभग सारी मानवजाति को ही समान रूप से अपने-अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त है उसे यदि मैं न मानने का दावा नहीं कर रहा हूँ तो फिर उसे बदलने की जरुरत ही क्यों आ पड़ी ! इस सत्य को देखते हुए कि भारत जैसे सांस्कृतिक देश में ईश्वर की अवधारणा और विश्वास तो बहुत बड़ी जनसँख्या की आजीविका का भी आधार है | यदि मेरी तरह दूसरे भी अपने-अपने ईश्वर की अवधारणा को  बदलने लगे तो एक बहुत बड़ी जनसँख्या को विस्थापित होना पड़ सकता है | अस्तित्व से लेकर अर्थ-व्यापार तक आस्था एक गंभीर प्रश्न है और थोडा भी परिवर्तन बड़े मानवीय और पर्यावरणीय प्रभावों को जन्म दे सकता है | 
              मैं जानता हूँ कि सबसे पहले लोगों को इस बात से ही आपत्ति होने लगेगी कि ईश्वर के होने और न होने पर तो बहस हो सकती है ; यदि ईश्वर सच ही उसी रूप में हुआ , जिस रूप में माना जाता है तो मनुष्य उसे बदलने की सोच भी कैसे सकता है ? यदि ऐसे किसी ईश्वर से हमें आपत्ति भी होगी तो हम सिर्फ उनसे स्वयं को बदलने का अनुरोध ही कर पाएंगे | यदि वास्तव में कोई ईश्वर नहीं हुआ तभी हमें ईश्वर के नाम पर मनुष्य जाति जो कुछ भी जी रहा है उसे बदलने और न मानने का अधिकार होगा | आस्तिकों के लिए इस तरह भी सोच सकते हैं कि एक स्थिति यह भी हो सकती है कि यदि थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि ईश्वर तो हैं लेकिन हम ही भटक गए हैं तो अपने विचारों को सुधारने की जरूरत होगी | क्योंकि मानव-जाति ईश्वर का होना मानने वालों और होना न मानने वालों के बीच बंटी है | इसे देखते हुए ही मैंने भी ईश्वर के होने और न होने दोनों ही सत्य को अपने विचारणीय लक्ष्य से बाहर कर दिया है |दूसरे शब्दों में मेरा लक्ष्य उन सार्थक मानवीय सत्यों को ही काव्यंकित करने का रहा है ,जिनका होना वर्त्तमान और भावी मानव-जाति के अस्तित्व के लिए मुझे सार्थक और प्रासंगिक लगा |दूसरे शब्दों में मैंने नकारात्मक भूमिका वाले आध्यात्मिक चिंतन को हानिकारक और भटकाव मानकर उनसे दूर रहने का प्रयास किया है |
                  उदहारण के लिए ईश्वरवादी चिंतन में सबसे अधिक हानिकारक बात मुझे सब कुछ ईश्वर के नाम पर छोड़ देने वालों की उस नकारात्मक मानसिक स्थिति से लगी जिससे पूर्ण समर्थन की मानसिकता को जीने वाले लोग सब कुछ ईश्वर पर छोड़कर अपने लिए निर्धारित कर्तव्यों से भी विमुख हो जाते हैं |इससे उनका आत्मरक्षक प्रतिरोध ख़त्म हो जाता है और वे उस मनोवैज्ञानिक सुरक्षातंत्र को जीने की स्थिति में नहीं रहते जिससे ईश्वर की अवधारणा ही कलंकित होती है | यह आध्यात्म का इतना खतरनाक प्रभाव है कि इसी सत्य को साधने-जीने के प्रयास में धर्मजीवी भारतीयों को हजार वर्ष की गुलामी दूसरे समुदायों की अधीनता के रूप में लिख गयी ;संभवत: यह सजा भारतीयों को कई हजार वर्षों तक अपनी जनसँख्या को सम्पूर्ण समर्पण का मादक दर्शन पिलाने के कारण ही मिली थी | इससे कम से कम संघर्ष की मानसिकता और चेतना वाला समाज निर्मित हुआ | इससे यह देश आनुवांशिक शासकों का स्वर्ग बन गया | राजा के पुत्र राजा होते रहे और मंत्री के पुत्र मंत्री ,सैनिक के पुत्र सैनिक होते रहे और किसान के पुत्र किसान | इससे कम से कम विरोध वाले पूरक समाज की रचना हुई | पीढ़ियों को व्यवस्था-निर्माण पर कम से कम सोचना पड़ा और कई-कई पीढ़ियाँ मजे-मजे उत्सव मानती हुई जीती रहीं | सबसे पहले तो ईश्वर की अवधारणा और उसपर मनुष्य की मानसिक निर्भरता को कम करने के लिए इस रिश्ते को बदलने की जरुरत इस लिए भी है कि जैसे ही हम अपने विवेक को दूसरों के हाथ में पूरी तरह सौंप देते है ,सैद्धांतिक गुलामी की शुरुआत तो उसी क्षण हो जाती  है |
                   यह समाज-मनोवैज्ञानिक प्रश्न उठाया जा सकता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए उसका ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण-भाव का लाभ अंतत: उसके समाज और समुदाय को ही मिलता है | इस सत्य के औचित्य को सिर्फ तभी स्वीकार किया जा सकता है जब नेतृत्व सजग और योग्य हो | अयोग्य नेतृत्व के समय यही निष्ठा ही नकारात्मक हो जाती है |या आत्मघाती हो सकती है और ऐसा करने वाले किसी भी जाति और धर्म के अनुयायियों की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है | इसलिए जो ऐसा सोचते हैं कि पुरखों नें जो-जो और जैसा कुछ कह रखा है उसे पूरी ईमानदारी से अक्षरशः न मानना ईश्वर की अवहेलना है तो ऐसा मानने वालों को मैं मूर्ख ही मानता हूँ | सच कहा जाए तो ईश्वर की अवधारणा का यही नकारात्मक दुरुपयोग ही बदलाव की आवश्यकता का प्रमुख आधार है | दूसरी बात यह है कि भारतीयों की एक बड़ी जनसंख्या को निष्क्रिय और निरर्थक बनाने में इस विचारधारा की महत्वपूर्ण भूमिका है | हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम जैसे ही अपने हिस्से का कोई कार्य ईश्वर के नाम पर छोड़ देते हैं प्रकारांतर से उस कार्य को करने का दायित्व अपने ही समाज के दूसरे लोगों को सौंप देते हैं | जिस समाज में ऐसा करने वाले बहुत से लोग हो जाएँगे वहां कुछ नया करने और बनाने की संभावना ही समाप्त हो जाएगी | उनकी निष्क्रियता से नेतृत्व पर भी काम का बोझ बढ़ेगा और एक दिन ऐसे अनुयायी असफल जनसँख्या में बदल जाएँगे |
           इन्हीं आधुनिक दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए ईश्वर की अवधारणा के सभी पक्षों को सतर्कतापूर्वक छानबीन करने की जरुरत है | क्योंकि हमारे विश्वासों -अविश्वासों से ईश्वर जैसी जनसंख्यात्मक अवधारणा का कुछ नहीं बनता और बिगड़ता लेकिन हमारा भूत,भविष्य और वर्तमान सभी कुछ खतरे में पड जाता है |

ईश्वर पर सोचते हुए और ईश्वर की शिकायत करते समय हम इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि एक प्रभावी प्रत्यय के रूप में साहित्य का ईश्वर और इतिहास का ईश्वर ,आदर्श का ईश्वर और व्यवहार का ईश्वर ,भविष्य का ईश्वर और अतीत का ईश्वर एक ही लोक और काल से जुड़े होने के बावजूद एक नहीं है | परंपरागत ईश्वरवादी ईश्वर को सृष्टि की उदभावक एवं परिचालक शक्ति के रूप में अतीत एवं वर्तमान से देखते हैं ,जबकि जरूरत उसके अधिक से अधिक भविष्य में निवेश की है | वह उदात्त जीवनबोध और ब्रह्माण्डव्यापी अस्मिताबोध के लक्ष्य के रूप में अब भी हमारे जीवन के लिए उपयोगी और प्रासंगिक हो सकता है | वस्तुतः लेखकीय कल्पना एवं आकांक्षाओं के रूप में ही सही ,साहित्य और भविष्य हमारी सृजनशीलता के वर्त्तमान भावी आयामों एवं योजनाओं से संबन्धित होते हैं ,जबकि नियतिवाद के प्रमुख आधार - घटित इतिहास का सम्बन्ध, आदर्शों से अधिक अस्तित्व से जुड़े स्वार्थों और संगठित महत्वाकांक्षाओं से भी होता है | इतिहास में मानव-जाति अनेक बार आदर्शों और नैतिकताओं से परे सामूहिक या संगठनात्मक रूप से अनेक अप्रिय एवं आपराधिक घटनाओं को कारित-सृजित करती दिखती है |
सब कुछ ईश्वर की इच्छा से संचालित और उसके अधीन मानने वाले आध्यात्मवादी और सब कुछ भौतिक परिस्थितियों के समीकरण का परिणाम मानने वाले मार्क्सवादी दोनों ही समान रूप से मानव-जाति के विवेक और निर्णय की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करते | जबकि हम जानते हैं कि मानव-जाति की घटिया आदतें प्रायः उसके अस्तित्व की सुविधाओं और स्वार्थों-हितों से संचालित रही हैं | मेरी दृष्टि में इतिहास मानव-चरित को ही अधिक ईमानदारी से व्यक्त करता है आदर्श जीने के उसके संकल्पों और आदर्शों को कम ,जो कि साहित्य का क्षेत्र है | साहित्य का ईश्वर ही शिव या कल्याणकारी है ,क्योंकि वह हमारी उदात्त मनोभूमि के साथ हमर आचरण और व्यवहार में उतरता है | हमारे जीवन और समय का हिस्सा बनता है | एक सामूहिक सांस्कृतिक पाठ के रूप में एक बड़ी जनसँख्या या जन-समुदाय को जीवन-व्यवहार का एकल प्रारूप सौंपता है | कुछ-कुछ संगीत की तरह जो एक साथ सभी के मस्तिष्क में एक समान लय का संचरण करता है | इससे एक समानताधर्मी समाज निर्मित होता है|
इसके विपरीत इतिहास के कटु -आपराधिक अनुभवों पर आधारित एक नियतिवादी ईश्वर वस्तुतः इस तथ्य को स्वीकार करना ही है कि जो कुछ भी घटा है उस सारे से ईश्वर की सहमति रही है | वह सब ईश्वर की संलिप्तता और समर्थन से ही घटित हुआ है या कि इस सब में मानव जाति प्रत्यक्ष रूप में सिर्फ कार्य करती हुई दिखाई मात्र पड़ती है ; जबकि वास्तविक कर्ता अदृश्य शक्ति ईश्वर ही हैं !(मानों )
नियतिवादी सारे उत्थान और पतन का श्रेय ईश्वर को देते हुए मानव-समूहों और संगठनों की प्रभावी भूमिका पर संगठनों की सामूहिक सक्रियता किस प्रकार शताब्दियों के लिए मानव-भविष्य की वांछित दिशा को भटका देती है ,इस सत्य पर चुप्पी लगा जाते हैं | जबकि हम जानते हैं कि हमारे आदर्शबोध और नैतिक नियम अज्ञात भविष्य का सामना करते समय भी हमारी प्रजाति के लिए किसी टीम के नियमों की तरह हीकितने महत्वपूर्ण हैं | स्वस्थ सांस्कृतिक आदर्श हमारे अस्तित्व में सहायक हमारे वर्त्तमान और भावी व्यवहार के लिए संविधान की तरह हैं | क्योंकि साहित्य हमारी शुभ एवं सद इच्छाओं एवं कामनाओं की अभिव्यक्ति है | इसलिए मैं मानता हूँ कि हमारे साहित्य एवं आदर्शों के अवधारणात्मक उदात्त (ईश्वर!) की सार्थक भूमिका अब भी बची हुई है जबकि मानव-मन की दुर्बलताओं की नग्न अभिव्यक्ति करने वाला स्वार्थों एवं हितों पर आधारित इतिहास का नियतिवादी ईश्वर अवश्य ही आपराधिक होने से त्याज्य,कालातीत और संदिग्ध हो चूका है |

रविवार, 8 जनवरी 2017

भीड़ में

पूरा मेला बाजार बन जाए
और मैं उसकी भीड़ में गुम हो जाऊं
तब भी क्या मैं मैं नहीं रहूँगा .....
यह सच है कि भीड़ का चेहरा नहीं होता 
लेकिन जिस चेहरे को पहचानने का भ्रम जी रही भीड़
वह चेहरा एक मदारी का है

जिंदगी,आस्था और विश्वास

जिंदगी में कुछ काम मैं अपने लिए करता हूँ और कुछ उन दूसरों के लिए ,जो सगे हैं और इतने सगे हैं कि पूरी दुनिया में अरबों की जनसँख्या छोड़कर सिर्फ मेरे ही हिस्से पड़े हैं .पहले पिताजी थे .वे कवियों को नाचने-गाने वाले समुदाय का एक हिस्सा समझते थे .उनके द्वारा कवियों को हिकारत से देखने के कारण ही छुप-छुप कर कविताएँ लिखता हुआ भी कभी कवि कहलाने के बारे में सोचा नहीं , न ही कभी उपनाम ही लगाया .अब यह उदासीनता मेरे स्वभाव का एक हिस्सा और लगभग स्थायी भाव जैसी हो गयी है .जबतक माँ रहीं तब तक माँ के हिस्से को भी उनकी भावनानुसार जीता रहा .उनकी पीढ़ी से सांस्कृतिक असहमति के बावजूद उन्हें पूर्ण सम्मान दिया .कुछ इस तरह सोचता रहा कि अंधविश्वासपूर्ण होते हुए भी सिर्फ वैचारिक असहमति के लिए हमें असहिष्णुता प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए .उग्र प्रगतिशीलता के नाम पर किसी पर अपना विश्वास इस तरह बलात नहीं थोपना चाहिए कि वे सुबह-शाम बिलकुल मेरी तरह क्यों नहीं सोचने लग रहे हैं .सांस्कृतिक परिवर्तन वैसे भी तात्कालिक और वैयक्तिक मामला नहीं है .उसके स्थायित्व और सामूहिकता का सम्मान करते हुए ही नयी पीढ़ी की आवश्यकताओं के अनुरूप बदलाव के लिए सुझाव देना उचित होगा .
               विवाह होने के बाद भी पारिवारिक स्तर पर मेरे लिए क्रांतिकारिता जीना लगभग असंभव ही था ,क्योंकि पत्नी विवाह से पूर्व ही एक वाहन दुर्घटना में अपने पिता और भाई को खो चुकी थीं .वे मनोवैज्ञानिक रूप से इतनी असुरक्षित थीं कि जीवन के प्रति मेरे मेरे आध्यात्मिक सम्मान भाव को देखकर ही भीतर ही भीतर वे जैसे डरती रहती थीं .कुछ ऐसे ही जैसे स्वाभिमान से जीना ही किसी का अपमान कर देना हो .भारतीय धर्म जिसे ब्राहमणों नें जातीय रूप से विकसित किया है उसमें विनम्रता और अहंकार रहित होने पर विशेष बल दिया जाता है .अहंकार आध्यात्मिकता का शत्रु है .इस सामूहिक प्रशिक्षण से जनता का एक बड़ा हिस्सा यथास्थितिवादी और विनम्र बना रहता था .आज हम समझ पाते हैं कि यह भक्तिपंथ सामाजिक रूप से न सिर्फ ईश्वर के समक्ष झुकने का प्रशिक्षण देता था बल्कि राजा और सामंत प्रभु वर्ग के समक्ष झुकने का भी जो किसी भी बात पर कभी भी किसी की गरदन उड़ा सकते थे और उस समय उन्हें रोकने वाला कोई भी क़ानून नहीं था .इस तरह प्रकारांतर से इस भक्ति पन्थ नें जनसामान्य के एक बड़े हिस्से को संगठित प्रभु-वर्ग से मारे जाने से बचाया . बुद्ध क्योंकि गणतंत्र के नागरिक थे महाजनपदों के राजतंत्र का आध्यात्मिक पाठ उन्हें सही नहीं लगा .दुःख के होते हुए उनके लिए ईश्वर की प्रशंसा करना दार्शनिक दृष्टि से भी संभव न था .आज के लोकतान्त्रिक समय में भी जनता को विनम्र और सिर्फ अनुयायी बनाए रखने में धर्म की परंपरागत भूमिका ख़त्म नहीं हुई है .भारत में ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण जाति द्वारा संगठित रूप से बनाए गए इसी मनोवैज्ञानिक स्वर्ग का लाभ पहले हिन्दू राजाओं और सामंतों नें उठाया ,फिर मुगलों ने,अंग्रेजों ने और स्वतंत्रता के बाद नेहरू परिवार नें और अब अन्य क्षेत्रीय दलों के स्वामी राजनीतिक परिवार ले रहे हैं .यह स्थिति आगे भी देर तक चलती रहेगी क्योंकि परंपरागत धार्मिक और जातीय संगठन अब भी विभिन्न रीति-रिवाजों ,मान्यताओं और उत्सवों के साथ पूरी तरह सक्रिय हैं .इस तरह भारतीय मूल की जनसँख्या की समस्या यह है कि उनका दार्शनिक और सांस्कृतिक ढांचा सामंती एवं मध्ययुगीन है.
                 भारत में दूसरी बड़ी जनसँख्या इस्लाम के अनुयायियों की है .एशियायी मूल का धर्म होने से वह भी भक्तिपंथी ही है .वह भी आध्यात्मिक धरातल पर अल्लाह के प्रति तो सामाजिक धरातल पर इस्लामी कबीले के प्रति पूर्ण समर्पण की मांग करता है .इस तरह उसका भी मनोवेज्ञानिक पर्यावरण व्यक्ति के विवेक की स्वतंत्रता का निषेध करने वाला ही है .हिदुत्व में ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता ब्राहमणों के आधिपत्य से होकर जाता है तो इस्लाम में उसके प्रवर्तक की अपरिहार्य मध्यस्थता से . इन दोनों धर्मों में जन्मे हुए लोग इनकी सामाजिक सांस्कृतिक ऐतिहासिक विशिष्ट स्थिति की अवहेलना नहीं कर सकते .यद्यपि कुछ समानांतर सम्प्रदायों की उपस्थिति जैसे जैनियों के अनेकान्तवाद और बौद्धों के प्रभाव के कारण दार्शनिक शंकराचार्य, गोरखनाथ और कबीर से होते हुए हिंदुत्व में ऐसी गुंजाईश बनी कि मनुष्य अपने आध्यात्मिक स्वाभिमान को जी सके .विवेक की स्वतंत्रता का यह पर्यावरण भारतीय लोकतंत्र की दीर्घायुता के लिए जरुरी है .
                 आवयविक सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हिंदुत्व और ईसाइयत में ईश्वर और मनुष्य का रिश्ता पिता-पुत्र वाला होने से प्रकारांतर से मनुष्य को ईश्वर के सारे अधिकार प्राप्त हो जाते हैं .इसमें से आध्यात्मिक समानता का भी अधिकार है .इसमें ईश्वर एक सम्मानित पूर्वज की तरह विशिष्ट बना रहता है -उत्तराधिकार में वर्त्तमान मनुष्य को सब कुछ सौंपने के बावजूद .इस्लाम अपने सूफी मत के माध्यम से प्रेम की एकता के माध्यम से यह प्रयत्न करता है .
हिदी का प्राध्यापक होने और भक्तिकाल को आधुनिक दृष्टि से पढ़ाने के पेशेवर दबाव में इतने सम्प्रदायों और उनके भिन्न -भिन्न ईश्वरों से सामना हुआ कि मैं अपनी पत्नी के स्तर पर एकांत भक्ति-भाव में फिर वापस नहीं लौट सकता .फिर भी मैं ईसाइयत ,बौद्ध ,हिदुत्व और इस्लाम में अलग-अलग तरह की कविता देख पाता हूँ .इस्लाम के अनुयायी किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह अपने ईश्वर को जीते दिखाई देते हैं तो हिंदुत्व को पर्यावरण के सबसे बडे संरक्षक धर्म के रूप में प्रासंगिक पाता हूँ .बुद्धत्व मानसिक सोंदर्य तो ईसाइयत करुणा और सेवाभाव देकर मानवता के लिए अब भी प्रासंगिक है .इस दृष्टि से मार्क्सवाद भी शोषण और असमानता के विरुद्ध प्राचीन घृणा का ही विस्तार है .

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

अच्छे दिन और ...

क्या बिकना इतना जरुरी है कि
बिना बिके जिया ही न जाय !
या जीने के लिए ही बिकना बहुत जरुरी है ?
हम जीने के लिए हांफते रहें या बिकने के लिए ...
तुम रोज गिनते हो कि इतने लोग बिके
वह रोज गिनता है कि वह आज भी बिकने से बच गया
यह जरुरी नहीं है कि जो न बिके वह ख़राब माल ही हो
बहुत कीमती चीजें भी बिकने से रह जाया करती हैं
अपने सबसे महंगे खरीदार की प्रतीक्षा में
और जिसने बिकने से इंकार कर दिया हो
और जो मूल्यांकन के लिए भी उपलब्ध नहीं है
बिकाऊ नहीं है जो
पड़ा है किसी घर में बाजार से दूर
बाजार से बाहर
क्या वह समय में नहीं है ?
सिर्फ प्रतीक्षा करो चचा !
अपने अच्छे दिन आने की
प्रार्थना करो कि उसके बुरे दिन जल्दी आए
या फिर परिस्थितियों की घेराबंदी में वह घुटने टेक दे
कि किसी सुबह तुम दूकान खोलो
और वह बिकने के लिए हाजिर दिखे तुम्हारी देहरी पर !
दूकान खोलकर बैठे रहो चचा !
उसे अभी बिकना नहीं हैं
न ही किसी को खरीदने जाना है बाजार ...
                                                                   रामप्रकाश कुशवाहा की कविताएँ 
पत्नी के सम्मान में
( राग - बंध -अंध )

पत्नी के सम्मान में    
वापस लौट आये दुनिया के सारे अन्धविश्वास
वे भी जिन्हें  कभी मैंने  नापसन्द किया था 
जिनसे मै असहमत हुआ और जिन्हें अपने विवाहपूर्व काल में 
निर्णायक और घोषित रूप में कभी ख़ारिज भी  !

पत्नी को मेरी सारी निरीह्ताओं का पता है 
जैसे कि मै अपना ईश्वर बदल सकता हूँ लेकिन बोंस नहीं 
कि मध्यवर्ग का हर पुरुष अपनी दृश्य -अदृश्य मूँछ के साथ 
यथा -अवसर हिलाने के लिए एक अह्लाद्वर्धक पूँछ भी रखता है 
बेंत के विकल्प में सहलाना-क्रिया जैसे !

उन्हें चाहिए सुरक्षा का जोखिम-मुक्त आश्वासन 
जो मेरे हाथ में बिलकुल ही नहीं है 
क्या मै सुबह का घर से निकला शाम को सही-सलामत 
परिवार में वापस आ सकता हूँ !

क्या दूसरो के झूठ और शरारतों को पकड़ने वाला 
एंटीवायरस साफ्टवेयर है मेरे पास
क्या मुझमे बजट की बारीकियों और मंहगाई के आपसी रिश्तों  की 
थोड़ी भी समझ है !
और एक समझदार पूर्वानुमान के साथ बचत की सतर्कता भी 

पत्नी  ही हैं जो इस दुनिया में  सिर्फ एकमात्र मुझे ही सुधार सकती हैं 
और सबसे अधिक दुनिया की सुधार वाले मेरे असमभव सपनों से ही 
डरती है 
उन्हें मेरी निरपेक्ष और अकेली बहादुरी से डर लगता है 

सुनो जी ! तुम सारे बूद्धि-जीवी ही कटे -कटे रहते हो 
बिना जुड़े और जोड़े न  डकैत बना  जा सकता है न नेता 
जेबकतरे भी सामूहिक अभिनय से लोगो को लूट लेते हैं 
अकेली समझदारी तो मूर्खों के गैंग द्वारा भी रौंद कर मारी जा सकती है

मुझे कोई भ्रम नहीं है 
मै जानता हूँ इस दुनिया में जीवित लोगों की तुलना में 
मरे हुओ से सहमत होना अधिक आसान होता है 
असहमति अकेला बनाती है और असामाजिक भी 

मेरी पत्नी जो सामाजिक धोखा-धड़ी अपराध और दुर्घटना की शिकार
एक डरे हुए परिवार से है 
मुझे पूरी सावधानी और समझदारी के साथ उन्ही को जीना है 
उनके अविश्वासो और आशंकाओं के साथ अनुत्तरित 

घूस और पैरवी दोनो ही न देने -करने के स्वाभिमानी पागलपन में
योग्य होते हुए भी मैंने और इस समाज ने मिलकर उन्हें रखा है बेरोजगार
इसे तिकड़म की अभियांत्रिकी की अयोग्यता कहें या ईश्वर की इच्छा !

यह जरुरी तो नहीं कि मै जिस तरह सोच और समझ रहा हूँ 
उसी तरह सोचें और समझें आप
अभी जो भक्तिसंगीत का रिंगटोन बज रहा है
उसे बिना किसी अन्यथा और टिप्पणी के फ़िलहाल धैर्यपूर्वक  सुने !  


वैसे भी मै अभी नौकरी कर रहा हूँ समझे  आप !
कोई भी पार्टी न बनाने के  संवैधानिक अनुबंध के साथ

प्रेम के बादशाह शाहजहाँ  के लिए



उसकी प्रेम की सत्ता है या एक  सत्ताधारी  का प्रेम 
प्रदर्शन संकोच और अभिजात्य की पूरी गरिमा से ढंका हुआ 
सुरक्षा और प्रतीक्षा की चाहरदीवारी में बंद मनों की 
दिन -दिन तड़पती मुक्ति-उडान 

सत्ता की वर्जनाओं ने उन्हें एक अभिशाप की तरह छिपाकर रखा है 
उसका प्रेम और उसके परिवार की स्त्रियाँ 
सभी एक प्रतिष्ठित समूह की सुंदरियाँ थीं 

कम सुन्दर होते हुए भी कुलीनता की गरिमा से युक्त  और असाधारण 
विशिष्टता का अभिशाप लिए 
जहाँआरा कुँवारियाँ जिन्हें सत्ता की मर्यादा की रक्षा के लिए 
अदृश्य यानि पर्दानशीं कर रखा गया था 


प्रेम का बादशाह अपनी बेगम के साथ अब भी सोया है शान से 
पूरी अदब और सुरक्षा के साथ 
वह समयातीत और सत्ता से बेदखल होने के बावजूद 
एक जीवंत और शानदार उपस्थिति है 
औरन्गजेब की कैद के बावजूद उसकी आत्मा मुक्त रही लोकोत्तर प्रेम के लिए 
वह  उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सका 

प्रेम का बादशाह आज भी भर रहा है आगरे की जनता का पेट 
उसने अपनी सत्ता को कितना सुन्दर बना दिया था 
तबले की संगत पर 
आज भी उसके लिए मुँह से निकलता है-आह ताज!वाह ताज !


बादशाह-दो 

(बादशाह अकबर के लिए)


सब विश्वास में हैं 
और बादशाह भी 
विश्वास करने  के बादशाह को
विश्वास करने वाली प्रजा ही चाहिए 

हर तलवार चलाने वाला बादशाह चाहता है कि
उसके तलवार चलाने के दिनों को भुला दिया जाय 

बादशाह-तीन 

(बाबर के लिए )


उनके लिए जीतना बहुत ही जरुरी था 
वे आपने घर से उजड़े हुए लोग थे 
उन्हें कहीं बसने के लिए 
जीतना बहुत ही जरुरी था 
क्योंकि वे लड रहे थे 
आपनी मुक्ति और पुनर्जीवन के लिए

शब्दोत्सव में

कुछ शब्दों को दुहाराएंगे 
कुछ को नया बनाएँगे
कुछ को अगली बार रचेंगे 
कह-सुनकर मुस्काएंगे 

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

माताओं का सृजन-लोक

सम्पूर्ण सृष्टि में माँ का स्थान बहुत ऊंचा है . सच तो यही है कि जीवन और मृत्यु के आर-पार फैले हुए रिश्ते का नाम ही है माँ .माँ  सिर्फ  हमारे  अस्तित्व की ही नहीं बल्कि हमारी सामाजिकता की भी जननी हैं . किसी भी प्राणी का अपनी माँ और उसकी संतान के बीच का अटूट रिश्ता ,उसके जन्म के पहले ही उसके गर्भकाल से ही शुरू हो जाता है .हर प्राणी के लिए यह समय भी उसके अचेतन-अविकसित अस्तित्व को सुरक्षा का अव्यक्त अहसास सौंपता है .
        मैं कभी कभी मौज में ऐसा भी सोचता हूँ कि बच्चे अपनी माँ से डर न जाएँ ऐसा सोचकर ही प्रकृति नें स्त्रियों को दाढ़ी नहीं दी होगी . इसके विपरीत पुरुषों को इसलिए दाढ़ी दी होगी कि वह दूसरे प्रजाति के पशुओं और यहाँ तक कि बबर शेरो को भी डरा सके .एक प्रजाति के जैविक अस्तित्व को संभव करने से लेकर उसके संरक्षण तक के समस्त दायित्व प्रकृति नें स्त्री जाति को ही मुक्त होकर सौंपे हैं .यहाँ तक कि दुनिया के सभी महापुरुष दया ,ममता ,करुणा आदि स्त्रियोचित गुणों से समृद्ध होने के कारण ही महापुरुष बन पाए .अन्यथा पुरुष हारमोन का चरित्र, स्वभाव और प्रभाव तो हिंसक ही है .उसे संभवतः प्रकृति नें अपनी प्रजाति की रक्षा के लिए लड़ने और मरने के लिए ही बनाया है जैसा कि पशु-जगत  में भी देखा जाता  है .
बंदरिया माँ के लिए तो लोक में यह मान्यता और कहावत ही है कि बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को भी सीने से लगाए हुए  घूमती है . माँ के वात्सल्य के लिए एक दृष्टान्त ही बंदरिया का दिया जाता  है , स्तनधारियों के अतिरिक्त अंडज जिनमें सरीसृप और पक्षी-वर्ग दोनों ही शामिल हैं; माता को अपनी संतति रक्षा में जिसप्रकार संलग्न देखा जाता है वह ममता और मातृत्व के मामले में कई बार मानवी माओं को भी पीछे छोड़ने वाला होता है .
       यद्यपि अपनी प्रजाति की चिंता तो सभी जातियों के नरों में भी पाई जाती   है लेकिन तुलना में गर्भधारण से लेकर स्तनपान करने और  शैशव की असहायावस्था से निकलकर वयस्क बनने तक माँ की भूमिका, पिता की भूमिका से कुछ अधिक ही गहरी और निर्णायक होती है . वैसे भी अपनी सौ वर्ष लम्बी आयु और लगभग बीस वर्ष के लम्बे विकासकाल के साथ मनुष्य का बचपन कुछ अधिक और पर्याप्त लम्बा अभिभावकीय संरक्षण मांगता है .
          पशु जगत में भी  लकडबग्घों और हाथियों का परिवार तो माँ-प्रधान ही होता है . दरअसल सामाजिकता का आधार भी माँ और संतान के बीच के रिश्ते हैं .  विद्वानों की यह भी धारणा है कि आदिम मानव का परिवार भी मातृ-प्रधान समाज ही रहा होगा . मार्क्स के अनुसार तो पूँजी और संपत्ति के विकास नें ही मानव-सभ्यता को पुरुष-प्रधान समाज में बदल दिया .संतान की उत्पत्ति और उसके पालन में लगी रहने के कारण स्त्री जाति पिछड़ती चली गयी .इसके बावजूद परिवार संस्था की पुरातन संरचना में स्त्री का केन्द्रीय महत्त्व मध्यकाल में भी सुरक्षित ही रहा है .
         संतानों के पालन-पोषण में मातृ-मात्र का निवेश शरीर से लेकर मन और आत्मा के स्तर तक देखा जा सकता है . गर्भधारण से लेकर दुग्धपान तक तो माँ की देह का ही आश्रय है .यद्यपि पशुपालन के साथ इस आश्रय का वृत्त गाय माता से लेकर भैंस मौसी तक और उससे भी आगे मातृभूमि तक भी चला गया है .इस तरह सारी पृथ्वी ही हमारी माँ है .यह जननी महाभाव का विस्तार है .जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसीका भाव-आधार भी यही है . यद्यपि पुरुष-प्रधान आध्यात्म ममता-मोह की काफी भर्त्सना करता  है ; लेकिन सच्चाई यही है कि स्त्री ही सारी सृष्टि  के जैविक अस्तित्व ,समुदाय और सामाजिकता का भी आधार  है . मध्यकालीन भारतीय समाज ममत्व का जिसप्रकार निष्ठुरता की सीमा तक भर्त्सना करता रहता था वह मानवीय दृष्टि से उचित नहीं था.यह मुझे उसी प्रकार वास्तविक सत्य को छिपाने और भ्रमित करने वाला लगता  है ,जैसा कि भिक्षा और दान माँगने वाला भिक्षा देने वाले को सब कुछ को मिटटी और व्यर्थ होने का उपदेश देता  है . इस तथ्य और सत्य को छिपा कर कि यदि सब व्यर्थ है तो तुम मांग क्यों रहे हो भाई . दरअसल गृहस्थ ही सभी धार्मिक व्यापारों का भी आधार है और गृह का केंद्र है नारी का मातृ रूप . उसी को केंद्र में रखकर सभ्यता की संपूर्ण ईकाइयों का विकास हुआ है .
     वस्तुतः मानवीय चेतना सामान्यीकरण और विशेषीकरण के दो सीमांतों को स्पर्श करते हुए प्रवाहित होती है . इसे व्याकरण की भाषा में जातिवाचक संज्ञा और व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं . जातिवाचक संज्ञा हमारे सामान्य बोध की उपज है और व्यक्तिवाचक संज्ञा हमारे विशेष बोध की उपज . यह देखा जाता है कि जंगल में पशुओं के बच्चे भी अपनी माँ की विशेष पहचान रखते हैं . यह विशेषता मानव-शिशुओं में भी होती है . वे अपनी माँ और दूसरी स्त्री में फर्क करने लगते हैं . अपरिचित स्त्री चहरे को देखकर शिशुओं का रोने लगना बोध के विशेषीकरण से ही संभव होता है . श्रीकृष्ण की कथा में तो  शिशु श्रीकृष्ण अपरिचित स्तन को देखकर ही उन्हें विषाक्त दूध पिलाने आयी पूतना को दांत गड़ाकर मार ही डालते हैं .यह दूसरी बात है कि पूतना शब्द भी प्रतीकात्मक और सांकेतिक है और वह संतानहीन स्त्रियों में मिलने वाले ईर्ष्या-भाव के प्रति ही हमें सजग करता है . अपने पुत्र-प्राप्ति के लिए दूसरे के पुत्रों की बलि जैसी घटनाएँ तो पिछड़े समुदायों से आज भी सुनने को मिलती हैं .
       मुझे तो श्रीकृष्ण के ईश्वरत्व का मनोवैज्ञानिक रहस्य भी जन्म देने वाली देवकी माँ से अलग यशोदा माँ के त्यागपूर्ण मातृत्व में ही दिखता है . कहते हैं कि इस दम्पति नें श्रीकृष्ण को बचाने के लिए अपनी नवजात पुत्री ही कंस के हाथों में सौंप दी थी . सिर्फ देवकी के श्रीकृष्ण तो एक सामान्य राजपुत्र बनकर ही रह जाते लेकिन श्रीकृष्ण का सामान्य प्रजा में से एक लोक- माँ यशोदा का पुत्र होना भी उन्हें लोक से न सिर्फ जोड़ता है बल्कि ऐसा ऋणी बना देता है कि वे जीवन भर उसका कर्ज उतारते हुए ही भगवान की कोटि तक पहुँच जाते हैं . मैं यहाँ जानबूझकर उन्हें पुराणों की तरह पहले से भगवान मानकर नहीं चल रहा हूँ .क्योंकि उन्हें भी भगवान होना प्रमाणित करने के लिए जीवन भर परीक्षा देनी पड़ी थी .यह परीक्षा लोक नें ली थी ,कंस नें ली थी और अंत में उन्हें ग्वाल कहने और समझने वाले दुर्योधन नें भी ली थी . श्रीकृष्ण इसीलिए दिव्य शिशु हैं कि वे दो माओं का मातृत्व पाने और जीने वाले असामान्य शिशु हैं . यह असामान्यता ही उनकी विशिष्टता है .यही सौभाग्य ही उन्हें लोकोत्तर और दिव्य शिशु बनाता  है . वे नन्द गोप के पूरे कबीले द्वारा संरक्षित और पाले गए शिशु हैं . वे ब्रज की संपूर्ण महिलाओं द्वारा स्नेह-सिंचित शिशु हैं . यह तथ्य आज भी देखा जा सकता है कि जिन शिशुओं को अधिक से अधिक हाथों में पलने और स्नेह पाने का अवसर मिलता है वे तुलना में उन शिशुओं से अधिक सामाजिक होते हैं जिन्हें सिर्फ अपनी माँ का ही स्नेह मिला होता है .
       दो माओं का मातृत्व पाने वाले श्रीकृष्ण की तुलना में अपनी आँखों पर पट्टी बांधने वाली गांधारी के असामान्य मातृत्व नें जिस जिद्दी और खलनायक संतान का विकास किया वह दुर्योधन है . कल्पना किया जा सकता है कि गांधारी नें कभी अपने शिशु की आँखों में झांक कर देखा ही नहीं होगा . दुर्योधन मातृत्व की दृष्टि से एक अभिशप्त ,दुर्घटनाग्रस्त और लावारिस बच्चा ही था .  माली यदि अपने लगाए उपवन से उदासीन हो जाए तो वह उपवन एक दिन वन में बदल जाएगा . अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर गांधारी माँ नें चाहे अपने पतिव्रता होने का असाधारण  आदर्श उपस्थित किया हो लेकिन उसके उस आदर्श में उसके पुत्र के लिए जगह नहीं थी .ऐसे मातृ-स्नेह से वंचित अतृप्त शिशु को एक दिन दुर्योधन ही होना था . मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर भीष्म का शैशव भी ऐसा ही विकलांग शैशव है . यद्यपि अपने पूर्व शिशुओं की हत्या से क्षुब्ध शांतनु अपनी प्रेयसी गंगा को शिशु भीष्म को नहीं मारने देते . गंगा उन्हें पालती भी हैं लेकिन एक हठधर्मी क्रूरता का माँ से मिला उत्तराधिकार ,युवा पुत्र की चिंता करने के स्थान पर स्वयं के प्रेम को जीने वाले पिता के प्रति वितृष्णा (याद करें सत्यवती और शांतनु का वह प्रसंग जिसकी शर्तों को पूरा करने के लिए भीष्म को आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी) तथा गंगा जैसी माँ ; जो भीष्म को शांतनु को सौंपने के बाद कभी उनकी जिंदगी में वापस लौटी ही नहीं भीष्म की प्रतिज्ञा भी अपने भाइयों की हत्यारिन एवं उदासीन माँ के प्रति उसी प्रकार अनुभव जन्य घृणा एवं विरक्ति का परिणाम है जैसा कि राम नें कभी तीन रानियों वाले पिता दशरथ के पारिवारिक जीवन का हश्र देखकर सिर्फ एक ही पत्नी से संतोष किया यहाँ तक कि अपनी इकलौती पत्नी सीता को गवां कर भी दूसरी शादी का दृष्टान्त उपस्थित नहीं किया . इस तरह वे एकल दांपत्य के प्रेरक और प्रवर्तक आदर्श पूर्वज बनें . राम का चरित्र भी अपनी माँ कौशल्या के चरित्र की तरह ही अंतर्मुखी और दूसरों के जीवन में अनुचित हस्तक्षेप न करने वाला है . इससे भी माँ की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है .
     रामकथा के अनुसार राम को बचपन में ही विश्वामित्र द्वारा मांगे जाने पर पिता दशरथ ही नहीं बल्कि अपनी माँ कौशल्या से भी दूर जाना पड़ा था . आगे चलकर सीता के त्याग और शम्बूक वध के प्रसंग में राम में जो चारित्रिक क्रूरता और संवेदनहीनता मिलती है ,उसका सम्बन्ध असमय तोड़े गए पुष्प की तरह माँ से कम आयु में ही अलग कर दिए गए राम के इसी वात्सल्य कुपोषण में मिलता है .स्वाभाविक है कि अपनी माँ के बिना जीना सीख लेने वाला बच्चा वयस्क होने पर अपनी पत्नी सीता के बिना भी जी सकता  है .
           स्पष्ट है कि माँ सिर्फ धरती की प्रतीक और उसकी प्रतिनिधि ही नहीं है बल्कि उसका गुण-धर्म ,प्रभाव और महत्त्व भी धरती के सामान ही हैं .जैसे धरती का उचित पोषण एक स्वस्थ पौधे का विकास करता है उसीप्रकार माँ के स्नेह एवं स्वस्थ मातृत्व की छत्रछाया में ही स्वस्थ मनुष्य का विकास होता है .आधुनिक असामान्य मनोविज्ञान भी यह मानता है कि व्यक्ति जो कुछ भी बनता है उसके पीछे उसके बचपन के रिश्तों और संबंधों के स्वरूप से निश्चित सम्बन्ध होता है . सभी अपराधी बचपन में अपनी माँ द्वारा उपेक्षित संताने ही हैं ,चाहे यह कुपोषण अधिक संतानों की भीड़ के कारण ही क्यों न हुआ हो . कौरवों के बुरा और लड़ाकू होने का यह भी एक मनोवैज्ञानिक कारण रहा होगा . आखिर सौ पुत्रों की भीड़ कोई कम तो नहीं होती !




गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

दो कविताएँ

1 .
जो कि मैं हूँ !

वह नीले तरल-सा पसरा आसमान
वह क्षितिजों का मोहक सौन्दर्य
वह अंधियारे परदे में टके ग्रहन्ताराओं की उजली चमक,
वह अन्तहीन सागर रोशनी सूरज की
झरनों की झर-झर, सर-सर हवाओं की
क्या वह मैं नहीं हूं।
या कि बस इतना ही हूं मैं
कदमों पर रेंगती हुई नन्हीं काया-छाया
तलवों से हथेलियों तक चेहरे से चुड़ी
एक रुढ़ पहचान के रूप में
अपनी सिमटी निजता पर घबराया.....
या कि झूठ है सब! वह अहं वह पहचान
क्योंकि समूची धरती नहीं है वह
नहीं है भरा-पूरा संसार
एक ओर अखण्ड
जो कि मै हूं।









२.
दूसरा जन्म

मैं लौट रहा हूँ
अपने उस विशाल साम्राज्य की ओर
जो संकीर्ण स्वार्थ की तात्कालिकताओं में बन्द नहीं है
अपरिचित है मेरा स्वत्व
अन्तहीन है मेरा आत्म
विलक्षण है मेरा जीवित स्पन्दन
मैं अपने उस आदिम आश्चर्य की ओर
पुन: लौट रहा हूँ वापस
जो अपने होने का आत्महन्ता अवमूल्यन
नहीं करता..............
हां मैं लौट रहा हूँ
उस अनन्तधर्मा विस्मय की ओर
जो संज्ञानों की जड़ता से मुक्त
जीवन का दूसरा जन्म है

बुधवार, 16 नवंबर 2016

अर्थशास्त्र










कुछ कहते हैं कि यह देश चल रहा ईश्वर के भरोसे
मैं कहता हूँ कि नहीं अब भी इसे चला रही करोड़ों परिवार संस्थाएं
उसी के ही जिम्मे है घर में जन्में मानसिक विकलांगों
एवं पागलों का भी भरण-पोषण
वही पालती है देश में जन्में बेरोजगारों को
घर ,खेत संपत्ति बेचकर भी करती रहती है बीमारों का इलाज
कि अब भी बूढ़ों के लिए परिवार ही अंतिम शरणालय है
न कि हमारी 'रकारें ...
अब भी बहुत से गाँव अँधेरे में डूबे हुए हैं
अब भी बहुत सी बस्तियों में सड़कें पहुंचना नहीं चाहती
अब भी बहुत से लोग अपनी जेब पर हाथ रखे शांति से मर जाना पसंद करते हैं
मंहगे अस्पतालों में इलाज के लिए जाने के स्थान पर
अब भी अभिभावक मरीज इलाज में मरते हुए घर को बचाने के लिए
बिना किसी को बताए निकाल भागते हैं घर के एकांत की ओर
अब भी 'रकारों को मालूम नहीं है कि
परिवार संस्था के बजट में शामिल रहता है
घर के उन सारे निकम्मों और निठल्लों का भोजन
जिनका पंजीकरण 'रकार के किसी भी रजिस्टर में नहीं रहता
'रकारों को अब भी नहीं मालूम कि
दिखाती हुई आय के बावजूद भी गरीब हो सकता है किसी घर का मुखिया
कि अमीरी सिर्फ रुपयों के आने से ही नहीं बल्कि
रुपयों के जाने से भी तय होनी चाहिए
तय होनी चाहिए अभिभावक आयकरदाता के दायित्वों
और उस परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर भी
सड़क ,बिजली ,पानी ,दवाएं और शिक्षा न दे पाने वाली 'रकारे
मानती और जानती ही नहीं कि भारत में
परिवारों की ही होती है आय व्यक्ति की नहीं
और आय और व्यय के निर्धारण में
इन सांस्कृतिक -सामाजिक जमीनी सच्चाइयों को भी शामिल करना चाहिए
न कि लागू करना चाहिए पश्चिम का व्यक्तिवादी अर्थशास्त्र !
अब तक की अपनी सारी जानकारी ,समझदारी
प्राप्त शिक्षाओं और अर्जित उपाधियों के आधार पर
पूरी ईमानदारी और देशभक्ति के साथ
जनहित में मैं यह सत्यापित करता हूँ कि
अभी भी हमारा लोकतान्त्रिक शासन-तंत्र
जगह-जगह अनुपस्थित है और अनभि्ज्ञ है अपनें ही तमाम दायित्वों से
अभी हमारी 'रकारों को तो ठीक से 'रकार भी होना नहीं आया ....
न ही वहां उपस्थित होना आया जहाँ उन्हें उपस्थित होना ही चाहिए
( न ही नेताओं को ठीक से नेता होना भी !)
('रकारों से क्षमा याचना सहित )

बुधवार, 2 नवंबर 2016

हिन्दी की साहित्यिक चिंताएं

(पूर्व में प्रकाशित एक लेख का प्रासंगिक अंश )

हिन्दी के समकालीन सहित्यिक परिदृश्य का ईमानदार विश्लेषण , उसकी सृजनशीलता को दुष्प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सही ढंग से समझे बिना संभव ही नहीं है । हिन्दी जाति के अपने यथार्थ के अनुसार उसकी सृजनात्मक समस्याएं और चुनौतियाॅं क्या हैं ? किन सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों से हिन्दी का लेखक वैश्विक धरातल पर कोई बड़ी साहित्यिक कृति देने में अब तक असफल रहा है ? वे कौन से सामूहिक एवं सापेक्षिक भटकाव हैं ,जिनके कारण विकास के अपेक्षाकृत अपने छोटे से काल में अनेक प्रायोजित वाद और विवाद पैदा करके भी वैश्विक धरातल पर कोई भी महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक चुनौती देने में हिन्दी जगत प्रायः असमर्थ रहा है ? आत्ममूल्यांकन की प्रक्रिया में ऐसे बहुत से प्रश्न सामने आ सकते हैं । कुछ ऐसे भी कि ‘क्या यह सच नहीं है कि पूर्व में भी आधुनिक हिन्दी कविता का स्वर्ण युग कहे जाने वाले छायावाद के कवियों की भरपूर प्रशंसा भी हम उनके प्रभावकों जैसे रवीन्द्रनाथ टैगोर,शेली,कीट्स आदि का नाम छिपाकर ही कर पाते हैं ! क्या यह सच नहीं है कि जोखिम से बचने एवं जातीय सुरक्षा पाने की अभ्यस्त हिन्दी जाति और उसके सम्पादक ,अपने लेखकों से प्रायः बिरादराना प्रभाव एवं अनुशासन में लिखी गयी रचनाओं की ही मांग करते हंै ?
क्या यह एक ईमानदार तथ्य नहीं है कि पश्चिम की तरह हिन्दी में सृजन की सामाजिकता को , मात्र स्कूल बनाने की प्रवृत्ति के रूप में ही नहीं देखा जा सकता ! पश्चिम की मौलिक सृजनशीलता से अलग हिन्दी का साहित्यिक समाज ‘जातीय’(समूह-अनुमोदित) रचनाधर्मिता को ही अचेतन रूप से बढ़ावा देता रहा है । स्पष्ट रूप से यहाॅं मेरा आशय डाॅ0 रामविलास शर्मा की हिन्दी जाति से नहीं है ,बल्कि मौलिक एवं विशिष्ट सृजन की विरोधी सर्वमान्य-सामान्य को सृजित करने के उस अघोषित मनोवैज्ञानिक दबाव से है, जिसके कारण हर नए लेखक को अपनी ही तरह का नहीं लिखना पड़ता है बल्कि वैसा कुछ लिखना पड़ता है, जैसा लिखना दूसरों को बदलने की अधिक चुनौती न देता हो और जैसा लिखने पर लिखे हुए की स्वीकृति की संभावनाएं बढ़ जाती है। इस प्रवृत्ति की व्याख्या बाजार के मांग एवं पूर्ति के नियम से भी नहीं की जा सकती है ,क्योंकि यह सृजन की सामाजिक अनुकूलता यानि दूसरों जैसा होने की होड़ को प्रोत्साहित करती प्रतीत होती है । हजारों वर्षों से प्राप्त जाति-जीवी होने का संस्कार हिन्दी सृजनशीलता कोे पूर्ण मौलिक विकल्प की खोज करने ही नहीं देता। इसे और स्पष्ट करते हुए कहें तो प्रकाशित होने और समर्थन पाने के अचेतन मानसिक दबाव में हम वैसा कुछ भी नहीं लिख और रच सकते , जो हिन्दी बिरादरी के संस्कार,सोच और मुहावरे से बाहर की उपस्थिति हो ।
इस तरह अपनी रूढ़िवादी पृष्ठभूमि और पारम्परिक संस्कार के कारण ;जाति में जीवित और सुखी रह पाने के अपने अचेतन असुरक्षा बोध के कारण हिन्दी मनीषा बहुत जल्दी ही जाति बनाने लग जाती है । उसका अधिकांश लेखन तर्ज की मर्ज का शिकार है । हिन्दी में ऐसी कई पत्रिकाएं हैं ,जिनके स्वनामधन्य सम्पादकों की कृति-आस्वाद की आदतें एवं उनके मानक तीस वर्षों से भी नहीं बदले । ऐसी पत्रिकाओं ने अपने प्रभाव-क्षेत्र के लेखकों और उनके लेखन से प्रभावित होकर पढ़ती-लिखती आ रही परवर्ती पीढ़ी को कुछ इस प्रकार अपनी रुचि,सोच, पसन्द-नापसन्द, स्वीकार-अस्वीकार की निजी बौद्धिक सीमा में नियन्त्रित और निर्देशित किया है कि हर पत्रिका और उसके द्वारा प्रकाशित साहित्य अपने अनुप्रभावित लेखक-समूह के साथ एक अलग जातीय स्कूल में बदल गए हैं ।
हिन्दी पाठकों और लेखकों को सृजन की पृष्ठभूमि के रूप में प्राप्त सामाजिक यथार्थ को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो उन्नीसवीं शताब्दी के औद्याोगिक क्रान्ति से लेकर, बीसवीं शताब्दी के कम्प्यूटर क्रान्ति तक, उसके अर्थ-तन्त्र एवं समाज नें स्वरूप बदला है । व्यापक उपभोक्ता वर्ग तक पहुॅंचने के लिए विकसित विपणन तन्त्र ने मजदूरों को कारखानों से निकालकर सर्विस सेन्टरों एवं शो रूमों के प्रशिक्षित कर्मचारियों एवं कुलियों में बदल दिया है । आधुनिक आटोमेटिक मशीनों ने कारखानों से मजदूरों की भीड़ को बाहर कर दिया है । अब उनके लिए सेल्स मैन की भूमिका ही बची है । पूंजीपतियों की गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा और उपभोक्ताओं को आकर्षित करने अर्थ-युद्ध के बीच अतिरिक्त मूल्य एक काल्पनिक अवधारणा बन गयी है और उसके स्थान पर मध्यवर्गीय जीवन को पालने में सहायक विनिमय मूल्य एवं दलाल संस्कृति निर्णायक प्रमाणित हुई है । इस सैद्धान्तिक अन्तर्विरोध से आंखे चुराते हुए भारतीय वामपन्थ पहले भारतीय किसानों की ओर बढ़ा फिर बढ़ती हुई जनसंख्या और बंटती जमीनों के यथार्थ से पलायन कर वन-विभाग सम्बन्धी कानूनों से भूमि के सरकारी अधिग्रहण के विरुद्ध उपजे असन्तोष को हवा देने के लिए जंगलों की ओर निकल गया । एक समग्र एवं आदर्श साम्यवादी व्यवस्था और समाज के निर्माण में आने वाली चुनौतियों से मुॅंह चुराते हुए ,वैश्विक एवं औद्योगिक पूंजीवाद से बचते-बचाते भारत में सर्वहारा की खोज आदिवासियों को वामपन्थ में दीक्षित करने के रूप में पूरी हुई है या बनते हुए बाधों से हुए विस्थापितों के पुनर्वास की चिन्ता और संघर्ष के रूप में । भारतीय सामाजिक यथार्थ और उसके बुद्धिजीवियों के ऐसे ही कुछ वैचारिक सीमान्त है।
सच तो यह है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हिन्दी का साहित्यकार, गांधीवाद और माक्र्सवाद की आदर्शवादिता से प्रभावित रहने के कारण वस्तुनिष्ठ हो ही नहीं पाता है । वह किसी नए प्रस्थान के लिए असमर्थ ,पराश्रित और मोहाच्छन्न है । उस समय तक जाति और सम्प्रदाय जैसी समस्याओं कांे विमर्श का विषय बनानें में वह अपनी हेठी समझता है । कुटुम्बीय परिवार की पृष्ठभूमि तथा जातीय समाज की मनोरचना के कारण, स्त्री-स्वातन्त्र्य एवं विमर्श का पाश्चात्य स्वरूप यहाॅं आ ही नहीं सका ; क्योंकि आर्थिक वर्गान्तरण से जातीय वर्गान्तरण, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अधिक जटिल और संघर्षपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया है । पश्चिम में जाति से अधिक कुलीनता-अकुलीनता की अवधारणा नें वर्गान्तर किया है । इसलिए वर्ग-विभाजन का आर्थिक आधार ही उनके लिए पर्याप्त था । इसके अतिरिक्त अपनी पिरामिडीय संरचना के कारण पूॅंजीवादी व्यवस्था का अधिकार-तन्त्र निम्नस्तरीय एवं अकुशल व्यक्तियों को भी शोषण के बावजूद उनका इस्तेमाल करते हुए उन्हें संरक्षित भी करता था । संभवतः जटिल विकास के इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से बचने के लिए भारतीय वामपन्थ नें वन-विभाग से शोषितों के रूप में आदिवासियों एवं जनजातियों की खोज की । हिन्दी के अधिकांश प्रगतिशील साहित्यकार ,भारतीय वामपन्थ के विकास ,शोषण एवं संघर्ष की मुख्य भूमि को छोड़कर ,सशस्त्र संघर्ष के बावजूद नक्सलवाद की वैचारिक पलायनवादिता को सृजन एवं विचार की चुनौती के रूप में देखते ही नहीं ।
अपनी भोली-ईमानदार प्रतिबद्धता एवं संवेदनशीलता के साथ हिन्दी में माक्र्सवादी सिद्धान्तों और वामपन्थी क्रान्ति के सपनों पर आधारित प्रगतिशील साहित्य एक ऐतिहासिक सच्चाई है ; लेकिन इस सच्चाई ने जिस प्रतिगामी साहित्यिक सच्चाई को जन्म दिया है ,वह है सामाजिक यथार्थ का साहित्यिक यथार्थ में रूपान्तरण न कर पाने की विफलता । एक अवरुद्ध समाज अपने यथार्थ को देर तक परिवर्तित नहीं कर पाता । ऐसे में बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के कथाकार प्रेमचन्द का , इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक प्रासंगिक बने रहना , उनकी प्रतिभा की महानता को जितना प्रमाणित करता है ,उससे अधिक भारतीय समाज के अवरूद्ध यथार्थ की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है । हिन्दी क्षेत्र के अपरिवर्तित यथार्थ नें उसके बहुआयामी साहित्यिक उपयोग की सम्भावना को सीमित किया है । यदि कथा-साहित्य को लें तो यथार्थ की अपरिवर्तनीयता नें लम्बे समय से हिन्दी की कथात्मक सृजनशीलता को औसत और आवृत्तिपरक बनाए रखा है । लम्बे समय तक कुण्ठित यथार्थ के चित्रण से हिन्दी के पाठकों एवं लेखकों का बौद्धिक अन्तराल घट रहा है । लेखक ऐसा नहीं लिख पा रहा है कि उसका लिखा पाठक को पढ़ने की चुनौती दे । वास्तविक घटनाएं जो लिखित रूप में ही समाचार-पत्रों और दृश्य मीडिया के माध्यम से पहुॅंचती हैं ,वह तेजी से बढ़ते विकास के साथ अधिक लांेमहर्षक और अविश्वसनीय होती जाती हैं । आखिर समकालीन यथार्थ भी समकालीन समाज के मनुष्यों की सामूहिक सृजनशीलता का परिणाम अर्थात् मानवीय उत्पाद ही है , चाहे वह अपराध या भ्रष्टाचार ही क्यों न हो !
सैद्धान्तिक दृष्टि से साहित्यिक सृजनशीलता भी अनुपस्थित को उपस्थित करने की कला है और इस प्रकार कोई भी सृजन सदैव ही पृष्ठभूमि का अतिक्रमण है । वह वर्तमान के यथार्थ का उपयोग करते हुए भी उपलब्ध वर्तमान का अतिक्रमण है । वह चाहे आदर्शपरक हो या यथार्थपरक सृजित यथार्थ सदैव ही मनुष्य की चेतना द्वारा पूर्व यथार्थ के अतिक्रमण के रूप में घटित होता है। यह अतिक्रमण न घटित कर पाने के कारण ही हिन्दी में प्रकाशित यथार्थवादी कहानियों की एक बड़ी संख्या अपने समकालीन यथार्थ की भाषिक अभिव्यक्ति मात्र हैं । वे सामाजिक यथार्थ का साहित्यिक यथार्थ में सफल रूपान्तरण नहीं कर पातीं ,क्योंकि साहित्यिक यथार्थ एक सृजित यथार्थ होता है ।
अपने समकालीन यथार्थ का साहित्यिक सृजनशीलता में भी अतिक्रमण न कर पाने की अपनी ऐतिहासिक एवं प्रवृत्तिगत सीमाओं तथा विशुद्ध भारतीय शैली के बिरादराना चयन के बावजूद , व्यावसायिक दबाव न होने से लघु पत्रिकाओं नें कई मौलिक एवं प्रयोगधर्मी रचनाएं भी प्रकाशित कीं । उनमें सच को और निर्भयता से प्रस्तुत करने का गैर-व्यावसायिक साहस भी दिखा; लेकिन, यह भी सच है कि हर दौर में लघु पत्रिकाओं के सम्पादको में एक बड़ी संख्या साहित्यकार बनने के अभिलाषी नवोदित साहित्यकारों की ही रही है । स्वयं साहित्यकार न होते हुए भी ऐसे सम्पादक साहित्यिक रचनाओं के लिए मेजबान की भूमिका में थे । एक देश द्वारा दूसरे देश को मान्यता देने की शैली में-दूसरी साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं को अपने साथ नाम-पते विज्ञप्ति करने की अच्छी प्रथा नें हिन्दी में लघु-पत्रिकाओं के आन्दोलन को एक लोकतान्त्रिक साहित्यिक संस्कृति का निर्माता बना दिया । लघु-पत्रिकाओं ने नवोदित साहित्यकारों के लिए न सिर्फ आरम्भी मंच उपलब्ध कराया बल्कि उनके प्रशिक्षण-केन्द्र के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है । इसी साहित्यिक परिदृश्य का एक दूसरा पहलू यह है कि सम्पादकीय दृष्टिहीनता के कारण हिन्दी का साहित्यिक परिदृश्य सामान्य रचनाओं से पट गया है। स्थगित सामाजिक यथार्थ से टकराते-टकराते हिन्दी का प्रगतिशील साहित्य और साहित्यकार भी स्थगित साहित्यिक यथार्थ का निर्माता और चितेरा बन गया है । उसके द्वारा सृजित कथा-वस्तु, उठाई गई समस्याएं और विचार सभी कुछ पुनरावर्ती हो गए हैं ।
व्यावसायिक पूंजी के दबाव से मुक्त होने के कारण , हिन्दी की लघु-पत्रिकाओं नें समानान्तर सिनेमा की तरह ही एक समानान्तर साहित्यिक पाठक-वर्ग भी पैदा किया है । अलग-अलग ग्रहों को केन्द्र में रखकर जैसे अन्तरिक्षीय पदार्थ एकत्रित होकर अनेक सूर्य बना देते हैं ; हिन्दी के अनेक प्रतिभाशाली साहित्यकारों के नाम से जुडी साहित्यिक पत्रिकाएं अपना नियमित पाठकवर्ग एवं आर्थिक संसाधन विकसित कर चुकी हैं । उनसे जुड़े साहित्यकार एवं प्रशंसक भी उनकी ताकत हैंे। कुछ साहित्यिक पत्रिकाएं तो लेखकों का अलग स्कूल ही बना रही हैं । इसे स्थानीयता का प्रभाव कहें या आंचलिकता का - हिन्दी की कई पत्रिकाओं नें निजी लेखक टीम विकसित कर ली है । ऐसी पत्रिकाओं ने अपने पाठकों को भी विशेषीकृत किया है । मनोविज्ञान का एक निष्कर्ष है कि जुड़वा बालकों का सही विकास नहीं होता क्योंकि वे एक-दूसरे का ही अनुकरण करते रह जाते हैं । किसी तीसरे के प्रति बिल्कुल उदासीन रहने के कारण कुछ नया नहीं सीख पाते । हिन्दी की अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी प्रायोजित लेखन का शिकार होकर अपने अलग वैचारिक साहित्यिक पूर्वाग्रह विकसित कर लिए हैं । साहित्य के इतिहास पर चढ़ाई करने वाले अलग साहित्यिक गिरोह के रूप में सम्पादकीय आत्मश्लाधा एवं महत्त्वपूर्ण होने के भ्रम के साथ सिर्फ वार्द्धक्य ही नहीं, बल्कि मौलिक एवं नई सृजनशीलता की दृष्टि से मृत्यु की ओर भी बढ़ रही हंै। इसे हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उसकी शीर्ष साहित्यिक पत्रिकाएं भी किसी दल या व्यक्ति-विशेष का साहित्यिक ‘फ्रण्ट’ नजर आने लगी हैं । निजी जीवन में चरित्रहीनता के आरोपों का सामना कर रहे कुछ सम्पादकों नें तो किसी अन्धे-बहरे की तरह व्यापक सहित्यिक समाज और सरोकारों से स्वयं को काट लिया है । वे अपने ऊपर लगे आरोपों के मानसिक प्रतिरोध में निर्लज्ज ,असंवादी ,सीमित ,संकीर्ण एवं असामान्य हो गए हैं । यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीति की सभी बुराइयों के प्रतिनिधि व्यवहार, हिन्दी-साहित्य की रचनाधर्मिता और विकास के परिदृश्य को भी विद्रूपित कर रहे हैं ।
एक सीमा तक हिन्दी-साहित्य के वर्तमान परिदृश्य को , उसके राजनीतिक यथार्थ का ही साहित्यिक रूपक कहा जा सकता हैं । यथार्थ की अनुकूल या प्रतिकूल सृजनात्मक सम्भावनाओं पर विचार करने के स्थान पर उसका साहित्यकार प्रायः अपने समकालीन इतिहास और यथार्थ का साहित्यिक रूपान्तरण प्रस्तुत करता है । इससे उसके लेखन में मानवीय सृजनशीलता के अन्य आयाम नहीं उभर पाते । उसका अधिकांश साहित्य सम्पूर्ण मानव-जाति के नाम सृजित ,सम्बोधित और सम्प्रेषित भी नहीं है । वह कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम सम्बोधित निजी पत्र बनकर रह गया है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हिन्दी का साहित्यकार जिन मूल्यांकन-मानों की कल्पना कर साहित्य सृजित करता है , उसकी हैसियत मात्र एक स्कूल की ही है । एक आंचलिक या क्षेत्रीय सच्चाई की तरह उसके साहित्यिक समाज नें सराहना और समीक्षा के नाम पर मूल्यांकन-मान के रूप में जो फतवे जारी किए है-वे काफी बचकाने अथवा नीरस है।
हिन्दी-साहित्य में भी वर्चस्व और प्रभुत्त्व के कांग्रेसनुमा सत्ता-केन्द्रों के साथ , अनेक क्षेत्रीय शक्तियाॅं और क्षत्रप काबिज हो गए हैं या काबिज होने का प्रयास कर रहें हैं । कुछ पुराने उजड़े हुए साहित्यिक-केन्द पुनःः संगठित हो रहे है। कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने अपनी उपेक्षा से आहत मन की प्रतिक्रिया में साहित्यिक पत्रिकाएं निकाल ली हैं । हिन्दी का साहित्यिक चरित्र भारतीय राजनीति के चरित्र का ही अनुकरण करता प्रतीत होता है । जिस प्रकार नेहरू और शास्त्री के बाद आपात काल के कांग्रेस नें सत्ता और इतिहास को बन्धक बनाने के प्रायोजित प्रयास में , काल-पात्र गड़वाने से लेकर प्रतिभा-नियोजन के लिए पार्टी से योग्यों का निष्कासन किया -व्यक्तित्व और चरित्र से हीन चाटुकारों को मुख्यमंत्री बनाकर जनता के ऊपर थोपने का असफल एवं आत्मघाती प्रयास किया और जिसका ही प्रतिक्रियात्म्क परिणाम यह हुआ कि तिरस्कृत-निष्कासित प्रतिभाओं ने अलग पार्टी ही बना ली और आगे चलकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक बने । इतिहास और सत्ता का मुख्य राजमार्ग साजिशन बन्द कर दिए जाने से समर्थ प्रतिभाओं ने स्वतंत्रता,प्रतिरोध और विकल्प के लिए क्षेत्रीय पार्टियाॅं बनायीं । कुछ-कुछ वैसा ही -व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा,राग-द्वेष,उपेक्षा तथा स्थापन-विस्थापन के भितरघातों के प्रतिक्रियात्मक सन्तुलन नें हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को बहुवैकल्पिक एवं विविधतापूर्ण बना दिया है ।
इस रूढ़िवादी देश में जैसे आजादी के पूर्व कुछ ही नेताओं ने मिलकर भारत-’पाकिस्तान के रूप में कई करोड़ भारतीयों का भविष्य और वर्तमान बिगाड़ दिया ,वैसे ही हिन्दी के साहित्यिक इतिहास को कुछ गिने-चुने वर्चस्वशाली मस्तिष्क ही बना-बिगाड़ और बांट रहे है। सम्बन्धों एवं रुचियों पर आधारित उनकी स्मृतियाॅं एवं उनका प्रायोजित चयन ही हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में विज्ञापित हो रहा है । इधर इस आरोप का प्रतिपक्ष भी देखने में आ रहा है -स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक के पाठ्यक्रमों में गैर-मानक साहित्य और साहित्यकारों की अराजक प्रविष्टि के रूप में । लघु पत्रिकाओं की बढ़ती हुई संख्या के पीछे साहित्य में सक्रिय प्रायोजित सृजनशीलता तथा वर्चस्व के यथार्थ से असहमत साहित्यिक विपक्ष और प्रतिरोध की समानान्तर साहित्यिक संस्कृति के निर्माण का संघर्ष भी है।
‘समकालीन सोच’ के प्रवेशांक (जून 1989) में व्यक्त डाॅ0 पी0एन0सिंह की इस विचारपूर्ण समझ का विस्तार करना भी हिन्दी समाज और साहित्य के विश्लेषण में सहायक होगा कि ‘ अभी हमारी सामाजिक चित्ति मुख्यतः मध्ययुगीन है,जिसमें आदिम अवशेषों की भी कमी नहीं है । हमारा वैज्ञानिक और ऐतिहासिक ज्ञान हमारी सामाजिक चेतना एवं आचरण की वस्तु नहीं है , अभी यह मात्र सूचना की चीज है । हमारे वैज्ञानिक एवं विद्वान सामाजिक संवेदना के स्तर पर अपढ़ हैं । हमारे यहाॅं शास्त्रज्ञों का नहीं ,बल्कि बुद्धिधर्मियों का हमेशा अभाव रहा है ।’ इस अभाव की पूर्ति हिन्दी समाज अन्तर्निभरता और अन्तर्सहमति से करता है । उसके जातीय या प्रवृत्तिपरक सृजनधर्मिता का राज भी यही है । इसके कारण ही वह प्रायः प्रतिभा-स्वातंत्र्य को एक विजातीय एवं विपक्षी तत्त्व के रूप में देखता है । नए लेखकों को एक पूर्वनिर्धारित द्रैक पर चलकर आने का अग्रिम प्रस्ताव भेजता है । लेखन में नव-रीतिवादी आवृत्ति की परिस्थितियाॅं पैदा करता है ।
इस जड़ता को तोड़ने के लिए सभ्यता के विकास-क्रम में सामने आयीं अद्यतन सूचनाओं को हिन्दी के आम लेखकों-पाठकों तक उपलब्ध कराने की जरूरत है । अधिक से अधिक विदेशी साहित्य को हिन्दी भाषा में उपलब्ध कराने की भी जरूरत है । हिन्दी के ऐसे साहित्यिक परिदृश्य पर यह सुझावपरक टिप्पणी की जा सकती है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की उच्चस्तरीय पाठ्य-सामग्री सर्वसुलभ न होने के कारण हिन्दी मनीषा के सृजनात्मक उत्पाद भी किसी अपढ़ एवं अप्रशिक्षित मस्तिष्क की उपज की तरह सामनें आते हैं । क्योंकि सामाजिक यथार्थ के साहित्यिक यथार्थ एवं कृति में रूपान्तरण की प्रक्रिया रचनाकार के बौद्धिक श्रम ,सोच , दृष्टि एवं ज्ञान के समन्वय के पश्चात् ही किसी विशिष्ट कृति के सृजन के रूप में पूरी हो पाती है ।
हिन्दी के सहित्यिक परिदृश्य के समाज-वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए हिन्दी सिनेमा से उधार लिए गए व्यावसायिक और समानान्तर जैसे शब्दों से बेहतर विशेषण मुझे दूसरे नहीं दीखते। व्यवसायिक के स्थान पर लोकप्रिय शब्द का भी प्रयोग किया जा सकता है ;लेकिन, हिन्दी में भारतेन्दु ,देवकीनन्दन खत्री ,प्रेमचन्द,दुष्यन्त और हरिवंशराय बच्चन जैसे गिने-चुने लेखकों को छोड़कर किसी को लोकप्रिय साहित्यकार कहना भी इस शब्द का अपमान करना ही होगा । व्यावसायिकता से मेरा प्रयोजन पेशेवर रूप से प्रायोजित साहित्य से है । लोकप्रिय में प्रभावी नेतृत्त्व उपभोक्ता या पाठक वर्ग का रहता है जबकि व्यावसायिक में व्यवसायी का-यद्यपि वह अपनी सारी रीति एवं नीति उपभोक्ता या पाठक को केन्द्र में रखकर ही बनाता है, लेकिन बाजार पर निर्भर रहने के कारण प्रायः पाठक वर्ग उसकी सृजनशीलता एवं श्रम पर आश्रित तथा प्रतीक्षा में ही रहता है । एक बार बिकाऊ माल की सही पहचान हो जाने के बाद साहित्यिक प्रवृत्तियाॅं आवृत्ति या व्यसन के रूप में, रूप बदल-बदलकर थोड़े हेर-फेर के साथ पाठकों तक पहुॅंचने लगती है । यही कारण है कि व्यावसायिक पत्रिकाएं प्रायः यथा-स्थितिवादी होती हैं ;रूप ,सौन्दर्य एवं आस्वादधर्मी होती हैं।
सामान्यतः लघु पत्रिकाओं के आन्दोलन को बाजारवाद और उपभोक्ता-संस्कृति के समानान्तर रचनात्मक प्रतिरोध की संस्कृति के रूप में देखा जाता है । इस देखने का ठोस आधार भी है । उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव से विकृत रचनाशीलता का सबसे प्रामाणिक उदाहरण हिन्दी फिल्मों की वर्तमान दशा-दिशा है । लोकप्रियता के अर्थशास्त्र नें उसे नुस्खों के अजायबघर में बदल दिया है । हिट-पिट के उसके लम्बे इतिहास नें उसकी व्यावसायिकता को एक कला-संस्कृति में बदल दिया है । हिन्दी की व्यावसायिक पत्रिकाओं ने भी साहित्यिक सृजनशीलता को एक अलग कलात्मक रूढ़ि दी है । इस रूढ़ि की एक कलात्मक उपलब्धि है- हिन्दी में गीत और नवगीत लेखन की निरन्तरता तथा पारिवारिक कहानियों की आवृत्तिपूर्ण उपस्थिति आदि ; लेकिन हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य में विचारहीन विचारशीलता अथवा अवरुद्ध विचारशीलता के यथार्थ का भी ठोस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य है ।
इस परिदृश्य को देखते हुए आश्चर्य नहीं कि हिन्दी की मुक्त विचारशीलता का अधिकांश हिस्सा लघु-पत्रिकाओं में छपकर ही सामने आता है । हिन्दी का प्रबुद्ध पाठक वर्ग लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्य को समानान्तर साहित्य के रूप में स्वीकार करता है । साहित्यिक सृजनशीलता के अधिक ईमानदार और बहुआयामी स्वरूप लघु-पत्रिकाओं के माध्यम से ही हिन्दी में सामने आ रहा है । व्यावसायिकता के दबावों से मुक्त गम्भीर विचारशीलता एवं प्रतिरोध की साहित्यिक संस्कृति को जन्म देने के कारण हिन्दी का समानान्तर साहित्य , बौद्धिक स्वातंन्न्य का असंगठित क्षेत्र बनकर भी उभरा है । असंगटित इसलिए कि एक-दूसरे को महत्त्व एवं स्वीकृति देने के बावजूद हिन्दी का यह साहित्यिक परिदृश्य अन्तरिक्ष में फैले तारों अथवा भारतीय राजनीति में सक्रिय क्षेत्रीय दलों की तरह इतना बिखरा हुआ है कि यदि वैयक्तिक ग्राहक न हो तो हिन्दी क्षेत्र के अधिकांश शहरों और कस्बों में इन पत्रिकाओं की सार्वजनिक उपस्थिति देखने को नहीं मिलती । बुक स्टालों पर इनकी अनुपस्थितिं एक सामान्य पाठक के लिए समकालीन सृजनशीलता के इतिहास से भी अनुपस्थित करती है । व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच स्थानीय लघु-पत्रिकाएं ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाती हैं ; फिर भी ये लघु-पत्रिकाएं हिन्दी-क्षेत्र एवं हिन्दी क्षेत्र से बाहर भी साहित्यिक सृजनशीलता का सार्थक परिवेश एवं उपनिवेश निर्मित करती हैं ।
गम्भीरता से देखा जाय तो सम्पादक साहित्यिक इतिहास के निर्माण का प्रथम द्वार ही है ।
वह रचना का प्रथम किन्तु मौन समीक्षक होता है । वह रचना का प्रस्तावक होता है । इधर हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में यह भूमिका किसी व्यक्ति-विशेष की नहीं बल्कि व्यक्ति-समूह की होने लगी है । यह चेहरा-विहीन सम्पादन का दौर है । अब यदि कोई रचना अस्वीकृत होती है तो सम्पादकीय टीम में शामिल पता नहीं किसने किया । अब इतिहास में वैसा आरोप नहीं लगाया जा सकता , जैसा कि निराला की ‘जुही की कली’ कविता न छापने पर महावीर प्रसाद द्विवेद्वी के सठियाने की बात ध्यान में आती है । इधर कई साहित्यिक पत्रिकाएं एक साझे मंच में बदल गई हैं और ‘खण्डे-खण्डे सम्पादक भिन्ना ’ जैसी स्थिति हो गई है । अतिथि सम्पादक , चयन सम्पादक ,कार्यकारी सम्पादक और वैधानिक सम्पादक जैसी अनेक कोटियाॅं बन गई है । सम्पादन में ‘अन्य-पुरुष’ के प्रचलन नें आहत लेखक द्वारा सम्पादक को गाली दिए जाने की सम्भावना ही समाप्त कर दी है । पत्रिकाओं और लेखकों की भीड़ में रचना की स्थिति कन्या जैसी हो गयी है ।
एक जगह से खेद सहित वाला जवाब मिल गया तो प्रकाशन रूपी विवाह के लिए दूसरी पत्रिका का दरवाजा देखिए। अधिक चिन्ता की कोई बात नहीं -क्योंकि जो पढ़ रहा है वही पढ़ रहा है और वह कहीं भी पढ़ लेगा । हिन्दी का नए दौर का जो साहित्यिक परिदृश्य है उसमें लेखक ही पाठक है और पाठक ही लेखक । व्यसनी है तो छपने की लालच में खरीदेगा ही और पढेगा ही । छपेगा तो लेखक कहलाएगा नहीं तो पत्र लिखेगा कि अगली बार जब वह छपे तो उसके छपने पर भी पत्र लिखने वाले रहें । अन्यथा नाराज होने पर सभी मौन साध लेंगे ।
सच तो यह है कि भारत के लिए प्रगतिशीलता का एक ही सही तात्पर्य हो सकता है-अपनी सृजनशीलता के माध्यम से अतीत के यथार्थ में परिवर्तनकारी हस्तक्षेप । इस दृष्टि से मैं उन्हीं सम्पादकों का सम्पादन-कर्म सार्थक मानता हूॅं , जो किसी न किसी रूप में अतीत से मुक्त होने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं । यह प्रक्रिया बेहतर भविष्य के सपने के साथ बेहतर विकल्प की तलाश के बिना सम्भव ही नहीं है । एक सार्थक साहित्यिक सृजन इसी यात्रा में ही घटित हो सकता है ।


रामप्रकाश कुशवाहा

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

कुछ सूक्तियां मैंने भी रची हैं -

जिंदगी के पक्ष में होना 
बहती हुई नदी के पक्ष में होना है 
अभी बिलकुल अभी के जीवित वर्त्तमान के पक्ष में होना है 
एक जलते हुए जीवन के बुझने की चिंता के साथ जीना है 
करना है आँधियों से सीधा संवाद 
अन्धकार में डूबे एवं अपने गंतव्य को जाते रास्ते से चिपके रहना है
उजाला होने तक या बिना उजाले के भी
चलते जाना है अपनी चुनी हुई राह
जिन्दगी के पक्ष में होना
अतीत की सूखी हुई नदी के गीत गाना नहीं है
जिंदगी के पक्ष में होना
ताजी और भीगी हुई नदी से सीधे बात करना है .






कुछ सूक्तियां मैंने भी रची हैं -


० यदि स्वर्ग का कोई रास्ता है तो वह कठोर परिश्रम के नरक से होकर ही गुजरता है .
० दुर्भाग्य को नहीं होतीं आँखें कि वह
 निरंतर असफलताएँ देने के लिए मनुष्य के भाग्य की निगरानी करता रहे .
० बौड़म दास की कुटिया 
दुनिया हुई गजेडी
                                                                                                                 रामप्रकाश कुशवाहा







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सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

माओं का सृजन-लोक

सम्पूर्ण सृष्टि में माँ का स्थान बहुत ऊंचा है . सच तो यही है कि जीवन और मृत्यु के आर-पार फैले हुए रिश्ते का नाम ही है माँ .माँ  सिर्फ  हमारे  अस्तित्व की ही नहीं बल्कि हमारी सामाजिकता की भी जननी हैं . किसी भी प्राणी का अपनी माँ और उसकी संतान के बीच का अटूट रिश्ता ,उसके जन्म के पहले ही उसके गर्भकाल से ही शुरू हो जाता है .हर प्राणी के लिए यह समय भी उसके अचेतन-अविकसित अस्तित्व को सुरक्षा का अव्यक्त अहसास सौंपता है .
        मैं कभी –कभी मौज में ऐसा भी सोचता हूँ कि बच्चे अपनी माँ से डर न जाएँ ऐसा सोचकर ही प्रकृति नें स्त्रियों को दाढ़ी नहीं दी होगी . इसके विपरीत पुरुषों को इसलिए दाढ़ी दी होगी कि वह दूसरे प्रजाति के पशुओं और यहाँ तक कि बबर शेरो को भी डरा सके .एक प्रजाति के जैविक अस्तित्व को संभव करने से लेकर उसके संरक्षण तक के समस्त दायित्व प्रकृति नें स्त्री जाति को ही मुक्त होकर सौंपे हैं .यहाँ तक कि दुनिया के सभी महापुरुष दया ,ममता ,करुणा आदि स्त्रियोचित गुणों से समृद्ध होने के कारण ही महापुरुष बन पाए .अन्यथा पुरुष हारमोन का चरित्र, स्वभाव और प्रभाव तो हिंसक ही है .उसे संभवतः प्रकृति नें अपनी प्रजाति की रक्षा के लिए लड़ने और मरने के लिए ही बनाया है –जैसा कि पशु-जगत  में भी देखा जाता  है .
बंदरिया माँ के लिए तो लोक में यह मान्यता और कहावत ही है कि बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को भी सीने से लगाए हुए  घूमती है . माँ के वात्सल्य के लिए एक दृष्टान्त ही बंदरिया का दिया जाता  है , स्तनधारियों के अतिरिक्त अंडज –जिनमें सरीसृप और पक्षी-वर्ग दोनों ही शामिल हैं; माता को अपनी संतति रक्षा में जिसप्रकार संलग्न देखा जाता है –वह ममता और मातृत्व के मामले में कई बार मानवी माओं को भी पीछे छोड़ने वाला होता है .
       यद्यपि अपनी प्रजाति की चिंता तो सभी जातियों के नरों में भी पाई जाती   है लेकिन तुलना में गर्भधारण से लेकर स्तनपान करने और  शैशव की असहायावस्था से निकलकर वयस्क बनने तक माँ की भूमिका, पिता की भूमिका से कुछ अधिक ही गहरी और निर्णायक होती है . वैसे भी अपनी सौ वर्ष लम्बी आयु और लगभग बीस वर्ष के लम्बे विकासकाल के साथ मनुष्य का बचपन कुछ अधिक और पर्याप्त लम्बा अभिभावकीय संरक्षण मांगता है .
          पशु जगत में भी  लकडबग्घों और हाथियों का परिवार तो माँ-प्रधान ही होता है . दरअसल सामाजिकता का आधार भी माँ और संतान के बीच के रिश्ते हैं .  विद्वानों की यह भी धारणा है कि आदिम मानव का परिवार भी मातृ-प्रधान समाज ही रहा होगा . मार्क्स के अनुसार तो पूँजी और संपत्ति के विकास नें ही मानव-सभ्यता को पुरुष-प्रधान समाज में बदल दिया .संतान की उत्पत्ति और उसके पालन में लगी रहने के कारण स्त्री जाति पिछड़ती चली गयी .इसके बावजूद परिवार संस्था की पुरातन संरचना में स्त्री का केन्द्रीय महत्त्व मध्यकाल में भी सुरक्षित ही रहा है .
         संतानों के पालन-पोषण में मातृ-मात्र का निवेश शरीर से लेकर मन और आत्मा के स्तर तक देखा जा सकता है . गर्भधारण से लेकर दुग्धपान तक तो माँ की देह का ही आश्रय है .यद्यपि पशुपालन के साथ इस आश्रय का वृत्त गाय माता से लेकर भैंस मौसी तक और उससे भी आगे मातृभूमि तक भी चला गया है .इस तरह सारी पृथ्वी ही हमारी माँ है .यह जननी महाभाव का विस्तार है .’जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का भाव-आधार भी यही है . यद्यपि पुरुष-प्रधान आध्यात्म ममता-मोह की काफी भर्त्सना करता  है ; लेकिन सच्चाई यही है कि स्त्री ही सारी सृष्टि  के जैविक अस्तित्व ,समुदाय और सामाजिकता का भी आधार  है . मध्यकालीन भारतीय समाज ममत्व का जिसप्रकार निष्ठुरता की सीमा तक भर्त्सना करता रहता था वह मानवीय दृष्टि से उचित नहीं था.यह मुझे उसी प्रकार वास्तविक सत्य को छिपाने और भ्रमित करने वाला लगता  है ,जैसा कि भिक्षा और दान माँगने वाला भिक्षा देने वाले को सब कुछ को मिटटी और व्यर्थ होने का उपदेश देता  है . इस तथ्य और सत्य को छिपा कर कि यदि सब व्यर्थ है तो तुम मांग क्यों रहे हो भाई . दरअसल गृहस्थ ही सभी धार्मिक व्यापारों का भी आधार है और गृह का केंद्र है नारी का मातृ रूप . उसी को केंद्र में रखकर सभ्यता की संपूर्ण ईकाइयों का विकास हुआ है .
     वस्तुतः मानवीय चेतना सामान्यीकरण और विशेषीकरण के दो सीमांतों को स्पर्श करते हुए प्रवाहित होती है . इसे व्याकरण की भाषा में जातिवाचक संज्ञा और व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं . जातिवाचक संज्ञा हमारे सामान्य बोध की उपज है और व्यक्तिवाचक संज्ञा हमारे विशेष बोध की उपज . यह देखा जाता है कि जंगल में पशुओं के बच्चे भी अपनी माँ की विशेष पहचान रखते हैं . यह विशेषता मानव-शिशुओं में भी होती है . वे अपनी माँ और दूसरी स्त्री में फर्क करने लगते हैं . अपरिचित स्त्री चहरे को देखकर शिशुओं का रोने लगना बोध के विशेषीकरण से ही संभव होता है . श्रीकृष्ण की कथा में तो  शिशु श्रीकृष्ण अपरिचित स्तन को देखकर ही उन्हें विषाक्त दूध पिलाने आयी पूतना को दांत गड़ाकर मार ही डालते हैं .यह दूसरी बात है कि पूतना शब्द भी प्रतीकात्मक और सांकेतिक है और वह संतानहीन स्त्रियों में मिलने वाले ईर्ष्या-भाव के प्रति ही हमें सजग करता है . अपने पुत्र-प्राप्ति के लिए दूसरे के पुत्रों की बलि जैसी घटनाएँ तो पिछड़े समुदायों से आज भी सुनने को मिलती हैं .
       मुझे तो श्रीकृष्ण के ईश्वरत्व का मनोवैज्ञानिक रहस्य भी जन्म देने वाली देवकी माँ से अलग यशोदा माँ के त्यागपूर्ण मातृत्व में ही दिखता है . कहते हैं कि इस दम्पति नें श्रीकृष्ण को बचाने के लिए अपनी नवजात पुत्री ही कंस के हाथों में सौंप दी थी . सिर्फ देवकी के श्रीकृष्ण तो एक सामान्य राजपुत्र बनकर ही रह जाते लेकिन श्रीकृष्ण का सामान्य प्रजा में से एक लोक- माँ यशोदा का पुत्र होना भी उन्हें लोक से न सिर्फ जोड़ता है बल्कि ऐसा ऋणी बना देता है कि वे जीवन भर उसका कर्ज उतारते हुए ही भगवान की कोटि तक पहुँच जाते हैं . मैं यहाँ जानबूझकर उन्हें पुराणों की तरह पहले से भगवान मानकर नहीं चल रहा हूँ .क्योंकि उन्हें भी भगवान होना प्रमाणित करने के लिए जीवन भर परीक्षा देनी पड़ी थी .यह परीक्षा लोक नें ली थी ,कंस नें ली थी और अंत में उन्हें ग्वाल कहने और समझने वाले दुर्योधन नें भी ली थी . श्रीकृष्ण इसीलिए दिव्य शिशु हैं कि वे दो माओं का मातृत्व पाने और जीने वाले असामान्य शिशु हैं . यह असामान्यता ही उनकी विशिष्टता है .यही सौभाग्य ही उन्हें लोकोत्तर और दिव्य शिशु बनाता  है . वे नन्द गोप के पूरे कबीले द्वारा संरक्षित और पाले गए शिशु हैं . वे ब्रज की संपूर्ण महिलाओं द्वारा स्नेह-सिंचित शिशु हैं . यह तथ्य आज भी देखा जा सकता है कि जिन शिशुओं को अधिक से अधिक हाथों में पलने और स्नेह पाने का अवसर मिलता है –वे तुलना में उन शिशुओं से अधिक सामाजिक होते हैं जिन्हें सिर्फ अपनी माँ का ही स्नेह मिला होता है .
       दो माओं का मातृत्व पाने वाले श्रीकृष्ण की तुलना में अपनी आँखों पर पट्टी बांधने वाली गांधारी के असामान्य मातृत्व नें जिस जिद्दी और खलनायक संतान का विकास किया वह दुर्योधन है . कल्पना किया जा सकता है कि गांधारी नें कभी अपने शिशु की आँखों में झांक कर देखा ही नहीं होगा . दुर्योधन मातृत्व की दृष्टि से एक अभिशप्त ,दुर्घटनाग्रस्त और लावारिस बच्चा ही था .  माली यदि अपने लगाए उपवन से उदासीन हो जाए तो वह उपवन एक दिन वन में बदल जाएगा . अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर गांधारी माँ नें चाहे अपने पतिव्रता होने का असाधारण  आदर्श उपस्थित किया हो लेकिन उसके उस आदर्श में उसके पुत्र के लिए जगह नहीं थी .ऐसे मातृ-स्नेह से वंचित अतृप्त शिशु को एक दिन दुर्योधन ही होना था . मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर भीष्म का शैशव भी ऐसा ही विकलांग शैशव है . यद्यपि अपने पूर्व शिशुओं की हत्या से क्षुब्ध शांतनु अपनी प्रेयसी गंगा को शिशु भीष्म को नहीं मारने देते . गंगा उन्हें पालती भी हैं लेकिन एक हठधर्मी क्रूरता का माँ से मिला उत्तराधिकार ,युवा पुत्र की चिंता करने के स्थान पर स्वयं के प्रेम को जीने वाले पिता के प्रति वितृष्णा (याद करें सत्यवती और शांतनु का वह प्रसंग जिसकी शर्तों को पूरा करने के लिए भीष्म को आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी) तथा गंगा जैसी माँ ; जो भीष्म को शांतनु को सौंपने के बाद कभी उनकी जिंदगी में वापस लौटी ही नहीं – भीष्म की प्रतिज्ञा भी अपने भाइयों की हत्यारिन एवं उदासीन माँ के प्रति उसी प्रकार अनुभव जन्य घृणा एवं विरक्ति का परिणाम है जैसा कि राम नें कभी तीन रानियों वाले पिता दशरथ के पारिवारिक जीवन का हश्र देखकर सिर्फ एक ही पत्नी से संतोष किया – यहाँ तक कि अपनी इकलौती पत्नी सीता को गवां कर भी दूसरी शादी का दृष्टान्त उपस्थित नहीं किया . इस तरह वे एकल दांपत्य के प्रेरक और प्रवर्तक आदर्श पूर्वज बनें . राम का चरित्र भी अपनी माँ कौशल्या के चरित्र की तरह ही अंतर्मुखी और दूसरों के जीवन में अनुचित हस्तक्षेप न करने वाला है . इससे भी माँ की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है .
     रामकथा के अनुसार राम को बचपन में ही विश्वामित्र द्वारा मांगे जाने पर पिता दशरथ ही नहीं बल्कि अपनी माँ कौशल्या से भी दूर जाना पड़ा था . आगे चलकर सीता के त्याग और शम्बूक वध के प्रसंग में राम में जो चारित्रिक क्रूरता और संवेदनहीनता मिलती है ,उसका सम्बन्ध असमय तोड़े गए पुष्प की तरह माँ से कम आयु में ही अलग कर दिए गए राम के इसी वात्सल्य कुपोषण में मिलता है .स्वाभाविक है कि अपनी माँ के बिना जीना सीख लेने वाला बच्चा वयस्क होने पर अपनी पत्नी सीता के बिना भी जी सकता  है .
           स्पष्ट है कि माँ सिर्फ धरती की प्रतीक और उसकी प्रतिनिधि ही नहीं है बल्कि उसका गुण-धर्म ,प्रभाव और महत्त्व भी धरती के सामान ही हैं .जैसे धरती का उचित पोषण एक स्वस्थ पौधे का विकास करता है उसीप्रकार माँ के स्नेह एवं स्वस्थ मातृत्व की छत्रछाया में ही स्वस्थ मनुष्य का विकास होता है .आधुनिक असामान्य मनोविज्ञान भी यह मानता है कि व्यक्ति जो कुछ भी बनता है उसके पीछे उसके बचपन के रिश्तों और संबंधों के स्वरूप से निश्चित सम्बन्ध होता है . सभी अपराधी बचपन में अपनी माँ द्वारा उपेक्षित संताने ही हैं ,चाहे यह कुपोषण अधिक संतानों की भीड़ के कारण ही क्यों न हुआ हो . कौरवों के बुरा और लड़ाकू होने का यह भी एक मनोवैज्ञानिक कारण रहा होगा . आखिर सौ पुत्रों की भीड़ कोई कम तो नहीं होती !