सोमवार, 15 अप्रैल 2024

वक्त का वक्तव्य !

 वक्त का वक्तव्य!


कभी मैं भी

ज्ञान प्राप्त करने की खुशी को
सभी से साझा करना चाहता था
कि मैने पाया
सबके दिमाग के कैसेट-सीडी
पहले से ही भरे हुए हैं
कि सत्य हर मस्तिष्क की समझदारी के
सापेक्ष हुआ करता है
कि सत्य शैशवकाल की अबोधता से
वयस्क जीवन की बोधता के बीच
की गयी जीवन की यात्रा है
और वह हर मस्तिष्क के बोध के सापेक्ष हुआ करता है
मेरा मस्तिष्क जितना और जैसा सोच पाता है
लगभग वैसा ही और उतना ही हो सकता है
मेरे द्वारा जिया गया सत्य !
और यह भी कि
मानव जाति का तथाकथित सत्य
स्मृति और बोध के सांस्थानिक उपस्थित के रूप में ही
प्राय:होता है-मानवीय समय और विकास के सापेक्ष !
प्राय: बंद समूहों की साझी एवं प्रतिस्पर्धी
समझदारी के रूप में
मै ज्ञान की शाश्वतता में नहीं
उसकी जीवन-केन्द्रित उपयोगिता में विश्वास करता हूॅ
यद्यपि जीवन के धरातल पर
सभी का अनुभव लगभग एक जैसा ही था कि
सारे ज्ञान कन्फ्यूजियाते हैं
उनसे जितना पाते हैं
उससे अधिक गंवाते और उलझाते हैं ..
यह भी कि लोग थक और ऊब चुके हैं
लाखों टन विरासत में मिले
ज्ञान के कचरे से ...
शायद यही वे कारण भी है कि
मैं अपनें ज्ञान को ज्ञान घोषित करनें में
सतत संकोचशील रहा हूँ
इसके बावजूद कि
मैने कचरे से बाहर निकलने की
सरल युक्ति वास्तव में पा ली थी !
आज की तारीख में
मैं ज्ञान को पाने की गर्व भरी खुशी और
उसे बांटने की दिलचस्पी
लगभग पूरी तरह खो चुका हूॅ
एक ऐसे दौर से गुजरते हुए
जिसमें चुप रह जाना भी
सुखी हो जाना है -
मैं ऐसा सुखी हो गया हूँ
यद्यपि मैं सभी को
अपनें-अपनें दिमाग से बाहर निकलकर
साथ-साथ हँसते-बोलते,घूमते-फिरते
कुछ सामूहिक-सा करते देखना चाहता हूँ
कि अब सिर्फ बोलते रहने का नहीं
कुछ करने का भी वक्त आ गया है ।