गुरुवार, 7 जून 2012

सभ्यता अभियांत्रिकी






हम सब सभ्यता रूपी अभियांत्रिकी के पुर्जे हैं .हम अपने समय और समाज से इतने प्रभावित रहते हैं की हम उससे बाहर निकल कर कुछ सोच हीं नहीं पाते हैं . सबसे बड़ी समस्या उस भावुकता की है जो सच्चे जुडाव
से पैदा  होती है . यह एक तरह से बचपन के प्रति हमारी वफादारी ही है . इस तरह हमारी अच्छaई ही हमारी बुराई  बन जाती है.साम्प्रदायिकता की सबसे बड़ी समस्या यही है.हमारा ज्ञान ही हमें एक सभ्यतिक यंत्र बना देता है .हम सभी किसी न किसी संसकृति से संसकारित हैं .हमारा मस्तिस्क बचपन से प्राप्त  सूचनाओं और आदतों का अतिक्रमण नहीं कर पता. हम सभी अभी  अभी इसी धरती पर लिखे गये पृष्ठों की तरह है..हम यह सोच ही नहीं पते की प्रभाव के रूप में ही सही हमारी इच्छाएं  और मानसिकता तक दूसरो ने ही लिखी है.. हम जीवन भर क्रिआयें नहीं प्रतिक्रियाएं करते है .क्योकि हम जो कुछ करते या जीते है उसके निर्धारक प्रायः दूसरे ही होते है 

मंगलवार, 5 जून 2012

भारतीय आसितकों के लिए एक उत्तर-आधुनिक पाठ




छोटी संरचनाएं बड़ी संरचनाओं को रच रही हैं
और बड़ी संरचनाएं टूटकर बिखर रही हैं
छोटी संरचनाओं में.....

ग्रह-नक्षत्रों और अणुओं-परमाणुओं में
टूटकर बिखर गए इस बड़े ब्रहमाण्ड की तरह
बड़ा र्इश्वर भी टूटकर बिखर ्रगया है
जीवनों-आत्माओं की छोटी-छोटी र्इकाइयों में....
बदल गया है छोटे-छोटे र्इश्वरों की भीड़ में.....
छोटे-छोटे र्इश्वर रच रहे हैं
एक बड़ा र्इश्वर
तय कर रहे हैं एक बड़े र्इश्वर की निर्णायक इच्छाएं.....
तत्वत: अनेक घटिया और अराजक र्इष्वरों से
बना होता है सामूहिक र्इश्वर-समय
रचता हुआ निर्लज्जता का एक नया इतिहास....

अंधेरे में छिपे हुए सांप
झाडि़यों में छिपे बाघ
जल में छिपे हुए मगर
और भीड़ में छिपे हुए जहरखुरान की तरह
धोखेबाज कभी भी कर देगें आउट
किसी भी देह से उसकी आत्मा को
र्इश्वर की तरह.......

होते रहने और होने की कशमकश में
सब असमंजस में हैं
कुछ भी तय नहीं है
न ही जिन्दगी.....न ही मौत !
न ही सफलता...न ही असफलता !

नेतृत्व के लिए
कुछ बड़े संगठित र्इश्वरों की होड़ में
प्रायोजित होता रहता है इतिहास
रचे जा रहे सामूहिक पर्यावरण में
बने रहते हैं प्रभावी र्इश्वर नेतृत्व में
खोल और बन्द कर रहे हैं दूसरों के भाग्य.....

असितत्व की होड़ में टकरा रहा है एक-दूसरे से....
संघर्ष कर रहा है एक-दूसरे के विरुद्ध
इतना कि यहां जिन्दा रहने के लिए
प्रेम और विश्वास से अधिक डर और अविश्वास ही
सुरक्षा कवच है.......र्इश्वरीय बरदान है.......

इस उत्तर-आधुनिक समय में
किसी पर विश्वास न करना ही
संभावनाशील और बुद्धिमान बने रहना है
मैं न होता तो क्या होता की समझदारी के साथ
गुनगुनाते हुए गालिब को
बचाए रहना है अपनी जिन्दगी के रूप में
अपने र्इश्वर का अनितम स्टेशन.......यह दुनिया-
जो तत्वत: बनी है छोटे-छोटे र्इश्वरों से......... 

शनिवार, 2 जून 2012

शास्त्र-चर्चा : एक नए स्वर्ग के लिए




यह कविता धर्म ,मोक्ष और उद्धार के नाम पर बाबाओं द्वारा ठगे जाने के तकोर्ं का उचित निरसितकरण करती है । भारतीय दर्शन के अनुसार जन्म और मृत्यु-चक्र  के बन्धन में पड़ी आत्माओं का ही पुनर्जन्म होता है । इस दृषिट से देखने पर तथाकथित सभी धर्मगुरू अभी इस जन्म तक तो मुक्त नहीं ही हैं । 
जब उनका अपना ही उद्धार नहीं हुआ है तो वे दूसरों का उद्धार कैसे कर सकते हैं ?







जो सबसे अच्छे थे अब तक पैदा ही नहीं हुए शायद
कम अच्छे मारे गए गर्भपात में
कमतर अच्छे आकर भी छोड़कर चले गए दुनिया......
फिर हम आए हम !

क्या पता पुण्य क्षीण होने पर
देवताओं नें स्वर्ग से गिराए थे धक्के मारकर
या फिर हम कीट-पतंगों से रेंगते हुए
पिछले दरवाजे से यहां तक पहुंचे !

हमारे जन्म पर शास्त्रों ने आशीर्वाद नहीं कहे
अभुक्त थे जो हम-गिरे हुए लौकिक या नारकीय !
स्वर्ग मृत्यु के पार था इसलिए देवता भी नहीं थे हम
और मारे जाने के लिए अभिशप्त
अपने होने से ही प्रमाणित कि मुक्त नहीं हम ।

तो अच्छे लोगों के विरुद्ध निरन्तर घृणास्पद होती जाती नियति में
शास्त्रसम्मत यही है कि हममें से कोर्इ मुक्त नहीं हैं
अपने पवित्र संकल्पाों और प्रार्थनाओं के बावजूद
हम सभी पापी हैं और कुकर्मी.......
न होते तो हमारा जन्म ही क्यों होता- कहते हैं शास्त्र !

हम सब विद्रोह के लिए अभिशप्त तिरष्कृत-त्रिशंकु की सन्ताने हैं
और हमारी मुकित सिर्फ विश्वामित्र बनने में है........
हमारे लिए प्रतिबनिधत स्वर्ग की अश्लील नागरिकता के समानान्तर
एक बार फिर रचने में है एक नया स्वर्ग !

त्र्रासदी पर पुनर्विचार.....

 ( मां  मित्रों और र्इश्वर के बहाने )


सिर्फ यही एक रास्ता है मेरे पास
कि बाहर के अंधेरे का सामना करने के लिए
अपने भीतर वापस लौट जाऊं !
कुछ वैसी ही कामना के साथ
जैसी कि मेरी मां की थी.....

मां ने बतलाया था-वह बहुत निराश थीं
जैसे अन्धकार के समुद्र में डूबती हुर्इ-सी
जब मैं उनके गर्भ में आया........
कि मैंने सुनहरे भविष्य की तरह तुम्हारी प्रतीक्षा की थी
जैसे अन्धकार के गर्भ से निकलता है सुबह का सूर्य
तुम्हारे अपना सूर्य बन जाने की कामना और सपने के साथ
पूरी की थी अन्तहीन अंधेरे की यात्रा
मैंंने तुम्हारे जन्म लेने की प्रतीक्षा में काटी थीं
न जाने कितनी रातें जाग-जागकरं.....

इसपुरुष-देह के साथ
मैं तो सिर्फ मसितष्कगर्भा ही बन सकता हूं
हां अपनी मांसपेशियों में भी कल्पना कर सकता हूं
नए सार्थक कमोर्ं को जन्म देने वाले सर्जक गर्भ की
ल्ेकिन मैं क्या करूं ! मैं जिसे किसी पर भी भरोसा नहीं है
किसी पर भी विश्वास नहीं है !
मैं जो अपने बाहर के सारे अन्धकार से जूझने के लिए
अपने भीतर की सृजनशीलता में डूबकर
दुनिया की सारी आशंकाओं और सारे भय को भूल जाना चाहता हूं
किसी श्रमिक की तरह बहते-बहाते अपने श्रम-जल के प्रवाह में
अनवरत बहते हुए अनन्त-काल तक जीना चाहता हूं मछलियों की तरह

मां के उस सपने को सच करते हुए
जिसमें वह मुझे चारों ओर से घिरे अन्तहीन समुद्र के बीच
तैरते देखकर पहले तो घबरा गर्इ थी
फिर यह जानकर आश्वस्त हुर्इ कि तैरना ही मेरी नियति है
कि मेरी नौकरी ही लगी है समुद्र के बीच तैरते पोत पर
रहने जीने और करते रहने के लिए.......

मां नें कहा था-जब यादों की ओर लौटना
घावों के इतिहास की ओर लौटना हो
अच्छा होगा कि पुराने इतिहास से बाहर रहकर
एक नए इतिहास को जन्म देने का प्रयास किया जाये
मां मुझे देखना चाहती थी नया इतिहास रचते हुए...


मां ने कहा था -अपने लिए सुखी होने के लिए
जन्म नहीं हुआ है तुम्हारा
ऐसे ही नहीं सूरज के उगने के साथ हुआ है तुम्हारा जन्म
तुम दुखी रहोगे.....जलते रहोगे अन्धे सूरज की तरह
दूसरों की अन्धकार से घबरार्इ आंखों के लिए
जिनके लिए जलोगे तुम
वे तुम्हें धन्यवाद भी नहीं कहेंगे
भूल जाएंगे अपनी आंखों के पीछे तुम्हारे जलने का सच
क्योंकि सभी को तुमसे सुखी रहने की आदत जो पड़ चुकी है
किसी को तुम्हारे सुख की ओर घ्यान भी नहीं जाता.....

मां ने कहा था तुम अपने हिस्से का भाग्य भी बांट देते हो
अपने मित्रों के बीच
कि मैं इतना भोला हूं कि जब भी मैं किसी से जुड़ता हूं
कुछ न कुछ खो बैठता हूं
वह मेरे मित्रों को किसी फूल पर मंडराते
आवारा पतंगो की तरह देखती थी
वह अच्छी तरह पहचान गयी थी कि
मै अपने मित्रों की जरूरत हूं
मित्र मेरी जरूरत नहीं हैं
वे सिर्फ मेरा समय बरबाद कर सकते है
वह भी अपने स्वार्थ के लिए
और एक दिन मुझे अकेला छोड़कर चल देंगे
अपनी जरूरतें पूरी हो चुकने के बाद......

कि तुम्हारे सारे मित्र फर्जी हैं
तुम्हारे सारे मित्र इसलिए फर्जी हैं क्योंकि उन्हें तुमने नहीं तलाशा है
बलिक वे ही धीरे-धीरे खिंचते आए हैं तुम्हारे पास
अपने स्वार्थ के अनुरूप तुम्हारी उपयोगिता की पहचान करते हुए
कि लोग पहचान गए हैं मेरे भीतर का बुद्धूपन
और यदि मैं अपनी जरूरत के अनुसार
अच्छे मित्रों की तलाश नहीं कर सकता
तब भी मुझे अच्छे मनुष्यों की तलाश करनी ही चाहिए......
यधपि मैं इतना मेहनती हूं कि
शायद ही मुझे किसी सहारे की आवश्यकता पड़े !

मां कहती थी कि तुम्हारे कोर्इ भी काम नहीं आएगा
तुम ही काम आने के लिए अभिशप्त हो दूसरों के
तब तक पत्नी नहीं आयी थी
जो बता पाती कि आप ही ठगे जायेंगे हर बार......
तब तक मैं यह पहचान नहीं पाया था कि
मेरे स्वभाव की सारी कमजोरियों का राज
मेरे उन सांस्कृतिक विश्वासों में छिपा है
जो मेरे प्रतिद्वद्वियाें और चुनौतियों से मुक्त- एकल
भारतीय र्इश्वर की तरह ही भोली आश्वस्त और अद्वितीय थीं
मां को मेरे बाद र्इश्वर पर ही सबसे अधिक भरोसा था
लेकिन सबसे अधिक डरती थी वह र्इश्वर से ही
वह संदिग्ध है ....उसकी लीला अपरम्पार है
और उसे कोर्इ भी नहीं समझ सकता
उसकी खुशामद के लिए सिर्फ एक ही जन्म काफी नहीं !
जो पूरे विश्वास में जीते हैं र्इश्वर उनके साथ मजाक किया करता है
पता नहीं यह र्इश्वर वही है या कोर्इ और......
कहते हुए हंसती थी मां

हमें सावधान रहना चाहिए
कि जब हम विनम्र प्रतीक्षा में होते हैं
मानव जाति का एक बुरा चेहरा
हमारे भीतर के स्थगित भोले असावधान मनुष्य को पहचान जाता है
जंगल में अपने आसान शिकार की तलाश में घूमती हुर्इ
भूखे बाघ की शातिर शिकारी आंखों केी तरह.....
र्इश्वर जो करता है अच्छा ही करता है के परम्परागत विश्वास के साथ
एक आम भारतीय के भोले बुद्धूपन के साथ
तब मैं पूरे गर्व के साथ अपनी अच्छाइयों के अनुरूप ही
अपने साथ अच्छे व्यवहार और स्नेहिल प्रशंसाओं की प्रतीक्षा में था.....

एक र्इश्वर-जो बुराइयों के लिए समर्पित हो
हमारी भूलों गलतियों और अपमानों से बना हुआ र्इश्वर
हमारे हिंसक प्रतिरोध और प्रतिशोध में अभिव्यकित पाता हुआ
एक पागल र्इश्वर का शैतान की तरह होना
जो हमारे विश्वासों को प्रश्नांकित करता रहे
ताकि हम बचे रह सकें एक बुरे आत्मविश्वास से
उन बाहरी बुरे प्रभावों से-जब हम अपने साथ
अच्छे व्यवहार की उम्मीद में दूसरों द्वारा ठगी के शिकार होते हैं....

शायद एक आसितक भारतीय होने के कारण
तब मैं पूरी तरह अपरिचित था उस बुरे र्इश्वर यानि कि शैतान से

मुझे अच्छे मनुष्यों की अब भी तलाश है
अच्छे मनुय यानि कि जो बार-बार ठगे गए हों और
दुनिया के बुरे चेहरे को देखने के सर्वथा अयोग्य हों
मुझे उन शक्की लोगों की भी तलाश है
जो किसी के अप्रत्याशित बुरे व्यवहार से हतप्रभ होकर
अपने ही भीतर सिमट गए हों
मुझे अब भी तलाश है उस मनुष्य की
जो अपनी नैतिकताओं को ढोते रहने के प्रयास में
समय और समाज से बाहर हो गया हो
मैं उस अदृश्य मनुष्य की खोज में हूं
जो अपने निर्वासन और अकेलेपन में र्इश्वर से होड़ ले रहा हो
मैं उसे ही अपना मित्र बनाना चाहता हूं

इस दुनिया में आने के बाद उसने मुझे बताया था
और मुझे अच्छा लगता कि सच ही कोर्इ र्इश्वर होता
कोर्इ भी असितत्त्व के मनहूस अकेलेपन में कैद होना नहीं चाहेगा
यह दुनिया जो असितत्त्व की अन्तहीन आवृत्ति से बनी है
मुझे अच्छा लगेगा कि मैं न सही कोर्इ दूसरा ही हो
जिसके होते हुए मैं पूरी तरह गैरजरूरी प्रमाणित हो सकूं
मैं किसी भी असितत्त्व के सम्मान में
अपनी सारी महत्त्वाकांक्षाओं को स्थगित करते हुए
अनन्तकाल तक प्रार्थना में झुके रह सकता हूं
लेकिन मैं भ्रमों से भरा हुआ जीवन जीना नहीं चाहता
मैं चाहता हूं कि मेरे सारे भ्रम टूट जाएं
अब तक जिया हूं चाहे जैसा
लेकिन मैं नंगे सच के साथ ही मरना चाहता हूं......

सच कहूं मैं..... मुझे बताया गया था
जो कुछ भी हो मेरे हिस्से का जीवन
सब कुछ इतना नियत कि र्इश्वर की ओर से ही हो जैसे.......
एक अटूट मजबूत विश्वास की तरह
मैं सफलता के संयोगों की निरन्तरता को
किसी चमत्कार की तरह र्इश्वरीय समझने लगा था
मैं समझता था बचे रह जाएंगे -
मैं और मेरे जैसे लोग जैसे अब तक उल्का पिण्डों की अनवरत मार
सहते हुए भी बची रह गयी है धरती
धरती पर चुपचाप बचा रह गया है जीवन

मित्रों में घबराहट फैलने लगी थी
और मित्रगण चुपचाप खिसकने और बदलने लगे थे
एक दिन पिता नें हाथ खड़े कर दिए कि बूढ़ा हो गया हूं मंैं
कि अब सहारे के लिए कोर्इ दूसरा र्इश्वर ढूढ़ो.....
मैं किसी समझदार र्इश्वर की प्रतीक्षा में था
जबकि असितत्त्व की आवृत्ति के साथ र्इश्वर अनेक भ््राामक विकल्पों में था
मेरा जीवन प्रेम के बाजार में खड़ा था-किसी एक के चयन के लिए...

कि जिस दिन नौकरी लगी
उस दिन पता चला कि प्रेम के बिकाऊ बाजार में
अब तक बचा हुआ हंू मैं अपनी बची हुर्इ कीमत के साथ....
मित्रगण झगड़ने लगे थे
अपनी-अपनी साली के साथ विवाह प्रस्ताव देने के लिए
कि जैसे वे हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहते थे मुझे
किसी उपयोगी की तरह अपने रिश्तों की स्थायी कैद में

मां नें कहा था-बहुत -सी बेवकूफियां
हम साथ-साथ कर जाते हैं
अन्धी प्रतिक्रियाओं के उन्माद में
बिना समझे....बिना सोचे
और यह भी कि जब हम अपने साथ हुए हादसों के लिए
दूसरों की संदिग्ध भूमिका की तलाश कर रहे होते हैं
हम स्वयं ही एक पक्ष बन चुके होते हैं
अपने ही साथ हुए अपराधों के लिए.....

गुरुवार, 31 मई 2012

केनोपनिषद की मनोवैज्ञानिक पुनर्रचना

केनोपनिषद को पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगा था कि यह दृष्टि तो जातिवाद और साम्प्रदायिकता से भी बाहर निकालने में सहायक हो सकती है । भाषा ही चित्तग्रस्तता और सभ्यताकरण का मुख्य आधार है । इसलिए विकृतियों से बाहर निकलने और उचित प्रतिरोध के लिए भाषा को ही आधार बनाना होगा । एक बुरी सभ्यता से निष्क्रमण और नर्इ सभ्यता के सृजन के लिए यह दृष्टि  महत्वपूर्ण हो सकती है ।

मुकित के लिए......



प्रतीति को नहीं ,प्रतीति की प्रक्रिया को देखो,
मुक्ति के लिए.......

वह ज्ञान है समानान्तर सत्य के
प्राणों का मन का-प्राणों ,आंखों ,कानों का
जिहवा और त्वचा का-स्वाद और स्पर्श -ऐनिद्रय !

कौन है वह चेतन-अनुभूतिमय...सृष्टि में जड़ों सा उतरता हुआ
सब कुछ को जीवन्त ऊर्जस्वित क्रियमाण करता हुआ-क्या है वह ?

प्रतीति को नहीं, प्रतीति की प्रक्रिया को देखो !
श्रवणकों का श्रवण....मानस का मन.....वाचकों की वाणी
चक्षुओं का दर्शन और प्राणियों का प्राण.......

क्योंकि उसको जानना भी उसको जानना नहीं है
क्योंकि उसका जानना-भाषा का जानना है
भाषा में जानना है....भाषा से जानना है......

यदि 'तू जान सका उसे भाषा के बाहर भी
भाषा से ऊपर भी....भाषा से हटकर भी
तब 'तू उसे जानता है और जानता है उसका होना
और होना अपना भी-प्रक्रिया में होना ''मनुष्य का और ब्रह्म का
होना चेतना का और जीवन का
होना आत्मा का और परमात्मा का
होना सर्जक और सृष्टि -भाषा से ....भाषा में....भाषा तक....भाषा की !

तब 'तू उठ सकेगा ऊपर
होना मनुष्य से और ब्रह्म  से.....आत्मा से और परमात्मा से
प्रकृति से और प्राण से......जीवन से और बुद्धि से
चेतना से और चित्त से.....

तभी 'तू हो सकेगा सभी कुछ
सृष्टिमय...धारासार प्रवाहित अपने अस्तित्व को देख सकेगा
जान सकेगा मुक्त अस्तित्व -मुक्ति - सत्य
भूत में...भविष्य में और वर्तमान में......
अन्यथा उसे जानते हुए भी न जानेगा 'तू
उसे देखते हुए भी न देखेगा 'तू
क्योंकि उसको जानना भाषा को भाषा का
भाषा में जानना नहीं है
न ही उसको देखना -आंखों का आंखों से देखना है
वह जो जानता है भाषा और देखना ....और है !

सत्य के लिए....मुकित के लिए....ज्ञान के लिए....दृष्टि के लिए
सृष्टि की प्रक्रिया की वैज्ञानिक प्रतीति की सृष्टि के लिए
प्रतीति को नहीं , प्रतीति की प्रक्रिया को देखो
समष्टि के भ्रामक भटकाव से मुकित के लिए.....

शानित-सन्देश (साक्ष्यीकृत कुरान)


कुरान और मुहम्मद साहब से आधुनिक मानव-जाति यह सीख सकती है कि कैसे हम सब कुछ जान लेने के युगीन विश्वास के कारण इस जीवन और सृषिट को ही एक चमत्कार की तरह नहीं देख पाते । हम जिस सृषिट के एक अभिन्न अंग हैं उसके प्रति एक अन्तरंग लगाव ,तादात्म्य या फिर आत्मीयता की भावना हममे होनी ही चाहिए । यह समर्पण,सम्मान और कृतज्ञता एक आदिम अपरिवर्तनीय स्वभाव की तरह मानव-जाति में बनी रहनी चाहिए ।


एक

''उसके साथ रहो
वह जो आसमान में है
और जमीन में है
वह जो आसमान है और जमीन है
वह जो तुम हो
और तुमसे है
तुममें है !

दो

तुम जानते हो ,खुदा जानता है
जो तुम जानते हो ,जानता है खुदा
तुम्हारा जानना खुदा का जानना है
खुदा सब जानता है ,तुम जानते हो ।
इसलिए कुछ भी ऐसा मत करो
जो सिर्फ दूसरों को दिखाने और भरमाने के लिए हो
अपने भीतर की एकान्त सत्यनिष्ठा में

अपने जीवन को मुसल्लम र्इमान के साथ जीते हुए
मुसलमान बनो-क्योंकि मुसलमान बनना
झूठ से बचते हुए सच्चाइयों को
पूरी र्इमानदारी और साहस के साथ जीना है....


तीन

जीवन स्वयं एक चमत्कार है
और यह सारी कायनात-
एक-दूसरे के गुरूत्व-आकर्षण की अदृश्य रसिसयों से बंधे
आसमान में टंगे हुए सूरज ,चांद और सितारे
घूमती हुर्इ धरती ,बहती हुर्इ हवा,उगे हुए पहाड़
फूटते हुए ज्वालामुखी,अंकुरित होते बीज,उगते हुए पौधे
दौड़ते और खेलते हुए बच्चे भी !

वे भूल चुके हैं जीवन की दिव्यानुभूति......
वे सब कुछ जानने के भ्रम में ंअपना अबोध आश्चर्य भूल गए हैं
वे सब डूब गए हैं ऊब और उदासी के महासागर में
वे खो चुके हैं अपनी जिज्ञासाएं
वे पूरी दुनिया देख लेने के अहंकार में
आंखों वाले अन्धे की तरह जी रहे हैं अपना अभिशप्त जीवन
वे अपना देखना भूल गए हैं अपना जीना भूल गए हैं
वे मुझसे मांगते हैं कोर्इ नया चमत्कार
मैं उन्हें सौंपता हूं
जीवन्त असितत्त्व की चिर-नवीन सर्वव्यापी सत्ता को
चिरन्तन चमत्कार की तरह देखने वाली चमत्कारपूर्ण दृषिट !

( चमत्कार है बिना आंखों वाले पेड़ों में
कीट-पतंगों और तुम्हारी आंखों के लिए
रंग-बिरंगे फूलों का होना.....
चमत्कार है पाौधों के उच्छवास यानि आक्सीजन का
हमारे असितत्व के लिए प्राणवायु होना.....
चमत्कार है हमारे उचिछष्ट कार्बन डार्इ आक्साइड का
पौधों के लिए प्राण-वायु होना.....

चमत्कार है सूरज की रोशनी को जीने के लिए
हमारे भीतर आंखों का उगना
अपने स्वर-यन्त्रों से हवा को पीटते हुए
किसी सन्देशयुक्त पुकार की तरह हवा में दूर-दूर तक फैल जाना
चमत्कार है किसी जीवन की सहायता के लिए गूंजती पुकार को सुनते ही
हमारे कानों का रोमांच और पीड़ा से थरथराना

चमत्कार है अपनी-अपनी जाति को
लाखों-करोड़ों वषोर्ं तक बचाए रखने के साझे प्रयास के लिए
पुरुष के लिए स्त्री और स्त्री के लिए पुरुष का होना......

कि हमारा होना स्वयं एक चमत्कार है और
अपने होने और होते रहने की निरन्तरता में
समग्र असितत्व की सम्पूर्ण सत्ता के प्रति
अपने आश्चर्यपूर्ण असितत्त्व के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही
इबादत में पढ़ना है नमाज !)


चार

उत्Üाृंखलता ही दोज़ख है और नैतिक अनुशासन ही बहिश्त
जीवन एक अवसर है और मृत्यु है खुदा
जो तुम्हारी सारी अराजक उपलबिधयों को व्यर्थ कर देगा
और कयामत का दिन न्याय का दिन है.......

क्या यह उचित नहीं कि तुम एक सार्थक मौत मरो !
क्या यह गलत नहीं कि तुम एक और सच्ची दुनिया से अलग
झूठी दुनियाओं का सब्ज़बाग रचो और फंसो !


पांच


''विश्वास करो
मैं स्वयं कहीं नहीं हूं
और तुम्हें भी
सब कुछ होते हुए भी
कहीं नहीं होने के लिए कहता हूंं
ताकि तुम हो सको
वैसा ही एकमात्र और सब कुछ
जैसा कि खुदा है ।

छ:

तुम समझते क्यों नहीं कि मैंने तुमको तुम्हारी धरती.....
तुम्हारा जीवन-र्इमान की आसान शतोर्ं के साथ
चुपके से तुम्हें फिर वापस कर दी है.....

खुदा जो सिर्फ अच्छाइयों की ही पवित्र आत्मा है
खुदा जो स्वयं अच्छा है और सिर्फ अच्छाइयों को ही पसन्द करता है
खुदा जो पिता की मृत्यु के बाद भी अपने भीतर
जीवन के साथ-साथ जीवित बचा रहने वाला चिरन्तन पिता है
उसे करो याद और उसकी तरह बनो.....
(इतने अच्छे बनो,जितना कि खुदा है )
तुम्हारा चाहना खुदा के चाहने की तरह हो
कुछ वैसा ही सोचो कि जैसा सोचना खुदा की पसन्द की तरह हो
तुम कुछ ऐसा करो कि तुम जो करो उसे खुदा पसन्द करे.....

( क्योंकि सब जानता है वह
और सबका जानना उसका जानना है )
इसलिए कि तुम कुछ भी न करने लगो
यह जरूरी है कि तुम खुदा का पैगाम सुनों
(क्योंकि सर्वसत्यमान न्यायिक सच है खुदा-सम्पूर्ण र्इमान है
और उसका चाहना सिर्फ जीवन की पवित्र अच्छाइयों का चाहना है )
क्योंकि वह सब कुछ को पसन्द नहीं करता ।

सात

( जबकि खुदा एक क्रानित है
यदि तुम समझ सको
और मैं एक क्रानित का सन्देशवाहक
यदि तुम देख सको.......)

सिर्फ इन्सान होना से बहुत बड़ी बात है
'मुसलमान भी होना.......
(जबकि मुसलमान होना एक जाति नहीं एक पद है )
क्योंकि मुसलमान होना सिर्फ दूसरों को दिखाने के लिए अच्छा होना नहीं है
मुसलमान होना कभी पाखण्ड नहीं करना और झूठ नहीं बोलना है
मुसलमान होना कभी भी किसी को धोखा देना नहीं है
मुसलमान होना दुनिया की आंखों से दूर.....सबसे छुपकर भी
अपने जीवन और मन के एकान्त में भी
विनम्र ,अच्छा और सच्चा होना है......

सिर्फ ऐसा होता और जीता हुआ ही
अपनी अन्तरंग सत्यनिष्ठा1 को अपने जीवन के गहरे एकान्त में जीता हुआ
एक सच्चा मुसलमान कभी भी गुनाह नहीं करता
न ही होता कभी गुमराह न ही करता
वह अपनी अच्छाइयों की विनम्रता में किसी का आपराधिक अपमान नहीं करता
तुम भी हो सकोगे-यदि 'सच्चा हो सके तुम भी ।

और यह कि सच को नकारते हुए
तुम कभी भी 'मुसलमान नहीं बन सकोगे
क्योंकि खुदा 'सच है और 'सच है खुदा
और वह तुम्हारे भीतर भी है.....और सब जानता है वह
जो कुछ भी तुम जानते और करते हो
कुछ भी ऐसा न करो कि जिसे करते हुए तुम शैतान की ओर से
करते हुए पाये जाओं ....
क्योंकि खुदा सिर्फ अच्छाइयों का सच है और वह
शैतान की तरह बुराइयों के सच को करना और जीना पसन्द नहीं करता
अच्छाइयों को भूलकर भटक जाना खुदा को भूल जाना है
और दिव्य जीवन को छोड़कर छायाओं को पूजना-बुतपरस्ती !







पुनर्प्रस्तुति

('कुरान तीसरा पारा-सूरह आल उमरान ,81वीं,82वी. एवं 83वीं आयत)

''और जब सर्वसत्यमान1 अपने सन्देशकों2 में सन्देशित हुआ
इस अन्तर्सत्यापन के साथ कि
जब मैं तुममे उदघाटित हुआ
तुम्हें तुम्हारे प्राप्त 'सत्य-विचार और मुकित-युकित का
प्रथम साक्षी-विचारक अनिवार्य नियुक्त करता हुआ.......

फिर कभी तुम्हारे पास-तुम्हारे लिए
कोर्इ सत्य-विचार-सन्देशक3 प्रेषित करूं-
( क्योंकि सत्य-विचार की सतत अनिवार्य
प्रचारक-प्रक्रिया है सन्देशक )
जो तुम्हें तुम्हारे जीवन सत्य की प्रामाणिक पहचान दे
तो तुम्हें जरूर उस पर र्इमान लाना होगा
और अवश्य करनी होगी उसकी सहायता........

''क्या तुमने स्वीकार किया !
''हमनें स्वीकार किया ।
-इसके साक्षी रहो
और मैं भी तुम्हारे साथ इसका साक्षी हूं !

( जबकि सभी स्वीकार या अस्वीकारपूर्वक
स्वेच्छया या बलात
उसी 'खुदा की ओर जाने वाले हैं
क्योंकि अनिवार्य निर्णायक मृत्यु-दाता है 'खुदा
और कयामत का दिन मृत्यु का दिन है
और मृत्यु का दिन
जीवन के वास्तविक न्यायिक अर्थ-विचार का
सार्थक जीवन-सत्य की व्यवस्था के लिए

जबकि अन्तत: जीवन-शेष हो सभी
फिर वापस आसमान और जमीन हो जाने हैं
जबकि सभी ''सब कुछ में वापस डूब जाने हैं
और 'सब कुछ है खुदा
उससे ही होकर.....उस तक ही सभी वापस लौट जाने हैं)

कहोकि हम खुदा पर र्इमान लाए
(जबकि''निरपेक्ष सर्वासत्यमान है खुदा )
जो सत्य-विचार हम पर उदघाटित हुए
और जो पवित्र विचार इब्राहीम और इस्मार्इल,इसहाक़ और याकूब
और उनके उत्तराधिकारियों पर उतरे.......

और जो सत्य-विचार र्इसा और मूसा
और दूसरे सत्य-विचारकों को
निरपेक्ष 'सर्वसत्यमान से सन्देशित हुए
सब पर र्इमान लाए......
हम उन सत्य-विचारक सन्देशकों में से
किसी पर कोर्इ दुराव नहीं करते
क्योंकि उनके सापेक्ष.....उनकी तरह
हम सभी उसी निरपेक्ष सर्वसत्यमान वास्तव1 के समर्पक हैं !



जे हा द


गोया ऐसे कि
इस्लाम कोर्इ जाति हो-खुदा से नाराज !
कि तुमने सारी दुनिया को मुसलमान क्यों नहीं बनाया.......!
क्यों नहीं सिखार्इ सबको अरबी ?
और पैगम्बर से उसके दूत नें क्यों कहा कि
दुनिया की सारी कौमों और भाषाओं के लिए
पवित्र सन्देश देने वाली पुस्तकें उतारी गर्इ है !

गोया ऐसे कि
हे खुदा ! तुम इतने निकम्मे हो कि
हम तुम्हारी रक्षा ए.के. सैंतालिस, आर.डी.एक्स और
शाहीन-एक ,दो ,तीन से करेंगे ।

गोया हे खुदा !
वे तुम्हारे नाम पर तुम्हारी बनार्इ दुनिया
और उसमें रहने वालों के दुश्मन बन गए हैं........
कि अब उनका विरोध ही सच्चा जे हा द है
जिन्होने इस्लाम यानि शानित का
अपनी खूरेंजी से कत्ल कर दिया है ।




मंगलवार, 29 मई 2012

एक भूमिगत साहित्य-धर्मी का स्मृति-लेख



स्वर्गीय रामसूरत सिंह राजीव के लिए

तुम्हारे लिए धरती किसी ग्लोब की तरह गोल नहीं
बलिक सोना बनाने के सूत्र खोजते
किसी मध्ययुगीन कीमियागर के रहस्यमय किताब जैसी ही रही होगी
अक्षरों की काली झाडि़यों में दौड़ लगाते किसी उजले खरगोश
या फिर छपे हुए अक्षरों की मिठास के लिए पागल किसी चींटे की तरह
कितनी रहस्यमय थी तुम्हारी हर पल पढने के लिए आतुर और तत्पर
कभी भी न थकने वाली आंखों की सक्रिय चुप्पी !
एक कभी खत्म न होने वाली यात्रा के रोमांचक प्रस्थान की तरह......

जैसे साहितियक पत्रिकाओं के हर नए अंक को पढ़ना अपने नाम लिखी
किसी प्रिय की चिटठी पढ़कर संवेदित और संवादित होना हो--------
जैसे कविता लिखने से अधिक महत्वपूर्ण हो जीवन में कविता को जीना
किताबों की सारी ताजी प्राण-वायु
अपने मसितष्क में फेफड़ों की तरह खींचकर
सागर की गहराइयों में उतर जाने वाले गोताखोर की तरह-----------

जैसे पढ़ना ही जीना हो और हो मसितष्क के अन्तरिक्ष में
ज्ञान के नवजन्में सूरज का अभी-अभी पहली बार उगना
बहना भावों की मन्द-मन्द हवाएं-----------चलना विचारों के विध्वंसक तूफान
घटित होना स्मृति के जीवित इतिहास में
जीना अपनी ही चेतना के जीवन्त स्मृति-कौंध का विस्मयपूर्ण रोमांच--------

कि कविता को दिखना ही चाहिए जीवन की तरह
और जीवन को किसी तेज-तर्रार खिलाड़ी की तरह उछल कर
छू लेना ही चाहिए -अपनी कल्पना की सर्वोच्च ऊंचार्इ तक उछली गेंद
जीवन को स्वयं ही एक अविस्मरणीय कविता में बदल देने के लिए------------
कि आदमी को होना और दिखना चाहिए कुछ ऐसे कि जैसे कोर्इ
संवेदनशील ,र्इमानदार और नैतिक कल्पना ही
दिख रही हो कविता बनकर--------
कि जीवन को दिखना चाहिए असंख्य नक्षत्रों और सूरज की तरह
अंधेरे में जिन्दा असंख्य गुमनाम आंखों के नाम-----------
चुपके-चुपके किसी कविता की तरह रचते हुए अपना होना
गरजना और बरसना ही चाहिए किसी बादल की तरह----------
कि अंधेरे में छिप जाते हैं सारे रंग और जीवन व्यक्त नहीं हो पाता !

जैसे साहित्य-रचना कोर्इ उल्लसित मौज हो सागर की
या फिर मसितष्क की परखनली में रखे मन के तरल में घटित होती
भावों की कोर्इ उन्मुक्त रासायनिक अन्त:क्रिया हो-----
जैसे सिर्फ साहित्य ही सच्चा और जीवित वारिस हो नए समय का
और साहित्य को पढ़ना ही सच्ची पूजा हो और इबादत
जैसे पढ़ना स्वयं में ही जीवन्मुकित हो------------
जैसे हर साहित्यप्रेमी पुषिटमार्गीय भक्त हो
और उसका साहित्य पढ़ना ही अच्छा और भला मनुष्य बन जाना हो....
कि सिर्फ साहित्य-मर्मी ही सच्चा धर्मी हो सकता है....और एक संवेदनशील
सâदय होना ही समय के अधतन उत्तराधिकार में आधुनिक सन्त होना है ....
जैसे साहित्य जिए जा रहे जीवन का द्वितीयक उत्पाद हो
गाय का दूध पीते बछड़े के मुख से झरती-बहती
जीवन के फेन की तरह-----------

आखिर ऐसा क्यों हुआ कि बिना किसी विकलांगता के----------
अपनी प्रकृति-प्रदत्त समर्थ-सक्षम प्रतिभा के बावजूद
विकलांगों की भीड़ में शामिल होने से तुमने इन्कार कर दिया !
या कहीं सर्वश्रेष्ठ बेहया नायक की खोज में निकली हुर्इ
जमाने की पागल भीड़ की हास्यास्पद मंशा को भांपकर
तुम चुपके से खिसक लिए !
याकि निर्लज्ज आत्मश्लाघा के नायकत्व-दौर में
निरंकुश महत्वाकांक्षाओं की
पागल होड़ को देखकर ही अपने भीतर छुर्इ-मुर्इ-सा शरमा गए थे तुम ?

कुछ ऐसे कि जैसे किसी कवि की कविता का छपना ही
उस कवि का बाजार में बिकने के लिए बैठ जाना हो
जैसे प्रकाशित होना स्वयं में ही एक संवादहीन अशिष्ट होड़ हो
जैसे अपने-अपने असितत्व की आक्रामक और हिंसक भगदड़ हो
जैसे बाजार में किताब की तरह बिकने में भी आती हो शर्म
जैसे घोबी के कुत्ते के घर और घाट के बीच पड़ता हो वह बाजार
जिसको पार करने के प्रयास में
जीवन किसीे आवारा कुत्ते की तरह खो जाएगा

कि इस सृषिट में अरबों-खरबों प्रयोगों को खारिज करने के बाद
जैसे विकसित हुआ है मनुष्य जैसे अरबों-खरबों मनुष्यों नेंं
निरन्तर जन्मते-मिटते हुए पूरी की है
अन्तहीन जीवन-चक्र की अनथक यात्रa
या फिर डार्विन के विकासवाद के योग्यतम की उत्तरजीविता और
अयोग्यतम के मृत्यु-वरण का व्यंग्य-विलोम घटित हुआ था
तुम्हारे जीवन में-
विनम्रतम की मृत्यु के रूप में------जैसे कि जीवन का महत्त्वाकांक्षी न होना
एक आत्महंता मनोभाव हो और दूसरों के असितत्व के सम्मान में
अपने असितत्व और उपसिथति को निरन्तर निरस्त करते जाना
एक आत्मघाती शिष्टाचार में अपनी ही मृत्यु का वरण हो
मैंने तुम्हें अपनी ही लिखी-अधलिखी प्रकाशित-अप्रकाशित कविताओं को
मरे हुए चूहे की तरह रददी की टोकरी में फेंकते देखा
किसी ऊबे हुए सम्पादक की तरह
अपनी ही सध: लिखी रचनाओं के विरुद्ध

कुछ ऐसे कि जैसे सृषिट की
अरबों-खरबों वर्ष लम्बी अनथक विकास-यात्रा में
रामसूरत सिंह राजीव किसी लुप्तप्राय मैमथ या डाइनोसोर की तरह
हमेशा के लिए भुला दिया जाने वाला साहित्य का कोर्इ
विफल जैविक प्रयोग हो----------एक अवांछनीय उपसिथति हो-----------
जिसे एक दिन गिरी हुर्इ पतितयों की तरह चुपचाप सड़ जाना हो
किसी भावी नर्इ पीढ़ी-बेहतर नर्इ फसल के नाम----------
या जैसे दूसरों के नाम अपने खेत लिख चुके
किसी भूतपूर्व किसान की तरह
अपना सारा समय---------सारी इच्छाएं लिख दी गयी हाें अपने किसी अन्तरंग-आत्मीय मित्र के नाम------

मैं तुम्हारी स्वयं को निरस्त करते जाने वाली विनम्रता
और साहितियक शिष्टाचार से हतप्रभ हूं
इस शिकायत के साथ कि तुमने अरबों-खरबों पुस्तकों की
जनसंख्या वाले ग्रन्थागारों में छिपी किसी छिपकली की तरह ही सही
चुपचाप दम साधे छिपे रहने का कोर्इ नन्हा सपना क्यों नहीं पाला !?
कि क्या तुम्हारी कविताएं प्रकाशकों के आगे-पीछे घूमते-छपतें
तथाकथित विज्ञापित और भव्यीकृत साहित्यकारों की
ग्रन्थावलियों में प्रकाशित
हाल-चाल पूछने वाली चिटिठयों से भी गर्इ-गुजरीं थींं !?
या तुमने भयावह पूंजीतन्त्र के किसी भू-स्खलित पहाड़ की तरह
टूटते समय के विशालकाय मलबे के नीचे चुपचाप दबना स्वीकार कर लिया था !?

मैं तुम्हारी आत्मीय और स्वप्नदर्शी आंखों को
एक बार फिर पढ़ना चाहता हूं
उन लिखी-अधलिखी कविताओं को भी-
जिन्हें जैसे लिखते-लिखते सहसा छोड़कर
तुमने कहा होगा कि -अब मेरे लिखने की कोर्इ जरूरत ही नहीं !
शायद तभी मैने कभी तुम्हें दक्षिणी ध्रुव के असफल खोजी स्काट की तरह
कभी भी उदास और आशंकित नहीं देखा कि मुझसे भी पहले कोर्इ एंडर्सन
पहुंच गया होगा साहित्य की रचनात्मक सार्थकता के
चरम सीमान्त दक्षिणी ध्रुव पर
मुझसे भी पहले-जैसे साहित्य कोर्इ अनितम लक्ष्य नहीं अपितु यात्रा हो और
असमाप्त यात्रा में थकान के पड़ाव भी किसी यातना से कम नहीं होते--------

जैसे एक पौधा छोड़ जाता है
अपने बीते दिनों की खाद अपनी जड़ों-पैरों के पास
जैसे न जाने कितने गुमनाम चेहरों का अभिवादन स्वीकार करता हुआ
अपनी यानित्रक-अभ्यस्त पथरार्इ मुस्कान के साथ
राजपथ पर आगे बढ़ता जाता है अपने समय की सारी क्रूरता को
अपनी बन्द मुटिठयों और कसे जबड़े में भींचे कोर्इ प्र-सिद्ध महानायक !
तुम वैसा क्यों नहीं कर सके क्यों नहीं देखे तुमने वैसे सपने
सबकी नींद में योग्यता और प्रतिभा के आतंक के साथ
कभी भी न भुला पाने के लिए उतर जाने के लिए

तुम्हारे चेहरे को देखकर सोचता रहता था मैं
कि जवाहरलाल नेहरू मेरे पडोस में नाम बदलकर रहते हैं
बड़ों की जीवन-चर्या से ऊबे बच्चों के लिए कविताएं लिखकर
अपने आत्मस्थ जीवन के एकान्त में खुश होते-मुस्कराते हुए
'सरस्वती में छपकर भी उदास रहते हुए और
'बालभारती में छपते ही आस-पास के बच्चों को पढ़ाते और चहकते हुए
तुम 'सरस्वती से सीधे बालभारती की ओर मुड़ गए
यानि कि सीधे एक गरिमामयी इतिहास से भविष्य के नाम

क्या तुम इस लिए चुप लगा गए थे कि
जो कुछ लिखा जा रहा था वह तुम्हें पसन्द नहीं था
या वैसा कुछ भी नहीं लिखा जा रहा था जैसा तुम चाहते थे पढ़ना
या तुम स्वयं ही बन गए थे साहित्य को पढ़ते हुए एक कविता !

कि वे जो स्वयं दूसरा गांधी नहीं बन पाते हुए
एक दिन बन जाते हैं गोड़से की तरह गांधी के हत्यारे
या कुछ वे जो एक दिन बन सकते हुए भी गांधी-एक दिन
स्वयं को दूसरा गांधी बनने देने से इन्कार कर देते हैं-------
क्ुछ इस तरह कि अब किसी दूसरे गांधी की कोर्इ जरूरत ही नहीं है
जबकि हम पहले ही पा चुके हैं एक प्रामाणिक गांधी

मेरे लिए अब भी रोमांच और जिज्ञासा का विषय है ऐसा सोचना
कि तुमने कितनी सहजता और विरकित के साथ एक नामवर को
अपने पास से स्वर्णिम अवसर की तरह गुजर जाने दिया----------
कौन विश्वास करेगा कि तुमने किसी शब्द-हस्त नामवर को
पूरी अन्तरंगता और आत्मीयता के साथ छूने भर की दूरी से
एक नया इतिहास रचने के लिए-----------
जंगल के किसी शानदार राजा की तरह गुजर जाने दिया था

जैसे अच्छी साहितियक कृतियों के सृजन-आपूर्ति से वंचित
साहित्य के हजारों टन गन्ने की पेरार्इ की क्षमता वाले
किसी बन्द पड़े या संकटग्रस्त चीनी मिल की तरह
साहित्य के बाजार के बीच स्थगित और अतृप्त
किसी रोमांचक कृति और घटना की खोज में घूमते-बीततेे
अपने अविस्मरणीय अतीत के सह-आवासी-विधार्थी मित्र नामवर को
चारों ओर फैले हिन्दी के खेत में कलम चलाते किसान की तरह छोड़कर
रस से भरे गन्ने की सही साहितियक फसल के इन्तजार में----------

जैसे कोर्इ गुमनाम प्रशंसक अपने आश्चर्य को
पुष्पहार की तरह अपनी र्इष्र्यामुक्त सहज शुभकामनाए
अपने प्रिय विजेता के गले मे डालकर पीछे हट जाए
खेल का रोमांचक मैदान छोड़कर तुम कब चुपके से आकर बैठ गए
पूरी र्इमानदारी ,तन्मयता और प्रेम के साथ
अनथक तालियां बजाती हुर्इ दर्शकों की भारी भीड़ के बीच

क्या तुमने बाजार को एक गन्दे नाले की तरह देखा
और फिर अपने घर वापस लौट आए-साहित्य का पूरा बाजार
जैसे अपने योग्य और विशेषज्ञ मित्र नामवर सिंह के लिए एकछत्र छोड़कर..
गांधी इण्टर कालेज कूबा,आजमगढ़ में किसी रामप्रकाश के
भीतर के कवि को किसी गुमनाम-विनम्र माली की तरह सींचनs

किसी लहराते समुद्र की तरह दूर-दूर तक फेले कूबा के ऊसर को
प्रतिभाओं की फसल के लिए उर्वर-
उपजाऊ हरे-भरे खेत में बदल देने के लिए
किसी कुम्हार की तरह गढ़ने के लिए कोर्इ
नित्यानन्द,तुषार और रामप्रकाश

जैसे कोर्इ मध्ययुगीन किसान अपने किसी प्रिय बहाुदुर योद्धा को
अपनी नि:शेष प्रशंसा के साथ पुरस्कार स्वरूप
अपना उगाया सारा अन्न-भंडार देकर
वापस मुड़ जाये अपने खेतों की ओर
अपने कन्धे पर हल उठाए सोंधी मिटटी की गंध सूघने
पुकारने के लिए नर्इ-नर्इ फसल
जैसे सत्याग्रह से आजादी की जीती हुर्इ लड़ार्इ हारने के बाद
अपने आश्रम में हमेशा की तरह चरखा चलाने से ऊबे हुए गांधी
बच्चों को मानसिक आजादी का पाठ पढ़ाने लगे हाें

कुछ ऐसे कि जैसे अन्तत: सारे आक्रामक विज्ञापनों
और विपणनों के बावजूद
हम एक दिन लौट आते हैं चील की तरह
अपने पंजे में दबाए हुूए एक मरे हुए इतिहास का टुकड़ा लेकर
अपनी थकी-हत्यारी आकांक्षाओं के साथ-अपने
असितत्व के एकान्त घोसले में
और एक दिन अपनी सभी महत्वाकांक्षाओं के अन्त की घोषणा के साथ
अपने भीतर की समस्त ऊर्जा को
विनम्रतापूर्वक सौंप देना चाहते हैं मिटटी के नाम
एक लम्बे विश्राम के बाद उर्वरा-शकित के पुन: प्रस्थान-बिन्दु की तरह !
एक सबसे अच्छे पौधे की जड़ के नीचे छिपा देते हुए अपने वज़ूद को