अरे देवता !
सारी आबादी को
सिर्फ प्रार्थना और प्रतीक्षा के लिए ही
प्रशिक्षित कर रखा है
कुछ मनुष्यों के लिए भी छोड़ा होता
एक मानसिक विकलांग
और निठल्ली - निकम्मी भीड़ मे
बदल गए हैं लोग ।
जीवन का रास्ता चिन्तन का है । चिन्तन जीवन की आग है तो विचार उसका प्रकाश । चिन्तन का प्रमुख सूत्र ही यह है कि या तो सभी मूर्ख हैं या धूर्त या फिर गलत । नवीन के सृजन और ज्ञान के पुन:परीक्षण के लिए यही दृष्टि आवश्यक है और जीवन का गोपनीय रहस्य । The Way of life is the way of thinking.Thinking is the fire of life And thought is the light of the life. All are fool or cheater or all are wrong.To create new and For rechecking of knowledge...It is the view of thinking and secret of life.
मंगलवार, 31 जुलाई 2018
अधियाचन
रविवार, 29 जुलाई 2018
हॅसता हुआ बाजार (कुछ टिप्पणियाँ)
रामप्रकाश कुशवाहा जी की सद्यः प्रकाशित पुस्तक-
" हंसता हुआ बाज़ार " काव्य संकलन, बाज़ार के चरित्र पर 66 वैचारिक कविताओं का संग्रह एक किताब में पहली बार तब्दील, इसके तीखे गवेषणात्मक और लंबे सार्थक तान - वितान को देखते - समझते - विचारते हुए इसे 'बाज़ार महाकाव्य ' कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं ।
(सौमित्र )
"हॅसता हुआ बाजार " की कविताएँ बाज़ार के प्रति कवि की अधिकतम समझदारी का निवेश है । इन कविताओं मे अनेक सूक्तियों-सूत्रों ,दृश्यों- दृष्टान्तो के माध्यम से उसने अपनी दृष्टियो- निष्कर्षों को दूसरों के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास किया हे । इसकी कई कविताएँ बाजार मे मिलने वाले धूर्तों, ठगी, अपराधियों और हत्यारों की गम्भीर मनोवैज्ञानिक पहचान कराती है । स्पष्ट है कि ऐसी कविताएं सिर्फ कवि कहलाने के लिए नही लिखी गयी हैं ।
राम प्रकाश कुशवाहा जी की कविताएँ कलात्मक युक्तियों के सहारे विकसित नही होती बल्कि अपना रूपाकार गहरी दार्शनिक निष्पत्तियों में ग्रहण करती हैं। 'हँसता हुआ बाजार' ऐसी ही चिंतनपरक कविताओं का संग्रह है।कवि की चिंता के केन्द्र में 'बाजार' है हिन्दी का पहला दार्शनिक कवि कबीर भी ऐन बाजार के बीच खड़े होकर उसका मूल्यांकन करता है।'कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठा हाथ'।तब से बाजार हमारी जरूरतों से आगे निकलकर हमारी चेतना को आक्रान्त करने की हद तक ताकतवर बन चुका है।वह ताकतवर ही नहीं अमानवीय, शोषणकारी है और ग्लोबल है। गद्य में इसपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है पर कविता के फार्म में यह पहला विमर्श परक संकलन है।
(अनिल अविश्रान्त)
हँसता हुआ बाजार
राम प्रकाश कुशवाहा
प्रतिश्रुति प्रकाशन,कोलकाता
जिन्दगी और कल्पना
पहले मै कल्पनाओं को ही
जीवन समझ कर जीता रहा
सोचता था कल्पनाओ को बचा लूँगा
तो सुरक्षित बच जाएगा जीवन
कि एक दिन देख लिया मैने
कल्पना के बादल के पीछे
सूरज की तरह छिपा हुआ
खुली हुई धूप सा वास्तविक जीवन
धूसर मटमैली खुरदुरी धरती
जीवन का हरा सागरीय विस्तार
कि जीवन बचा रहेगा
तो चलती रहेंगी कल्पनाएँ
अब मै कल्पनाओं पर नहीं
कल्पनाओ को जीते हुए जीवन पर
रीझता रहता हूँ
रामप्रकाश कुशवाहा
बुधवार, 11 जुलाई 2018
हंसता हुआ बाजार
अभी-अभी मिली पुस्तक "हॅसता हुआ बाजार " की कविताएँ बाज़ार के प्रति मेरी अब तक की अधिकतम समझदारी का निवेश है । इन कविताओं मे अनेक सूक्तियों-सूत्रों ,दृश्यों- दृष्टान्तो के माध्यम से मैने अपनी दृष्टियो- निष्कर्षों को दूसरों के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास किया हे । इसकी कई कविताएँ बाजार मे मिलने वाले धूर्तों, ठगी, अपराधियों और हत्यारों की गम्भीर मनोवैज्ञानिक पहचान कराती है । स्पष्ट है कि ऐसी कविताएं सिर्फ कवि कहलाने के लिए न्ही लिखी गयी हैं ।इन कविताओं के पाठक यदि इन्हें पढने के बाद कुछ अपराधों और दुर्घटनाओं का शिकार होंने से बच गए तो मै अपना श्रम सार्थक समझूँगा।
इस पुस्तक का अतिरिक्त और विशेष आकर्षण युवा आलोचक नलिन रंजन सिंह की"बाजरा से गुजरा हूँ खरीददार नही हूँ "शीर्षक विमरर्शात्मक प्रस्तावना और आवरण पृष्ठ पर प्रिय कवि प्रिंयंकर पालीवाल की अर्थ- समृद्ध टिप्पणी है ।
मंगलवार, 10 अप्रैल 2018
मोक्ष
इस दुनिया में होते हुए भी
न होने की तरह जीना है
जो जाति बोधक कर्म है
सिर्फ वही - वही जीना है
नियत से अलग और अधिक
जो भी जिएगा वह कमीना है
इसलिए कहे गए से
अलग होने और जीने की
कभी सोचना ही मत
क्योकि तुम्हारी सारी ऐसी
दुःसाहसपूर्ण इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं
पाप और अवैध होगी
अनवरत् शुद्धि के लिए
समय के देवताओं और इन्द्र के पक्ष मे
तुम्हे जीवनभर निरन्तर
सिर्फ खारिज करते रहना होगा
स्वयं को दूसरों के पक्ष मे !
उससे अधिक न होना है
इस दुनिया में होते हुए भी
न होने की तरह जीना है
जो जाति बोधक कर्म है
सिर्फ वही - वही जीना है
नियत से अलग और अधिक
जो भी जिएगा वह कमीना है
इसलिए कहे गए से
अलग होने और जीने की
कभी सोचना ही मत
क्योकि तुम्हारी सारी ऐसी
दुःसाहसपूर्ण इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं
पाप और अवैध होगी
अनवरत् शुद्धि के लिए
समय के देवताओं और इन्द्र के पक्ष मे
तुम्हे जीवनभर निरन्तर
सिर्फ खारिज करते रहना होगा
स्वयं को दूसरों के पक्ष मे !
एक पौराणिक जिज्ञासा
क्या हुआ बालि का !
उसका सब कुछ लूटने के बाद
उसके हाथ- पैर बांधकर
किसी कुएं मे फेंक आए उसे ?
उसकी उस भोली प्रजा का क्या हुआ
कहा गया जिससे
तुम्हारा राजा
धरती के स्थान पर
पाताल का राजा बना दिया गया है
(कुँए में फेककर )
उसकी हत्या करने के बाद ?
बुधवार, 28 मार्च 2018
हँसता हुआ बाज़ार
बाज़ार पर केन्द्रित विशेष कविताओं का कविता-संग्रह
रामप्रकाश कुशवाहा
प्रतिश्रुति प्रकाशन
(Pratishruti Prakashan 7A Bentinck Street Kolkata 700001)
ईश्वर
तो बनाया ईश्वर के होने या उपस्थिति का बोधक यानि मानवीकरण। इन्ही दोनो छोरों के बीच इस दुनिया की सारी सम्भावनाएं खत्म हो जाती है । लेकिन कभी कभी मै ऐसा सोचे बिना नहीं रह पाता कि निर्जीव प्रकृति से मनुष्य जीवन तक की यात्रा के बाद प्रकृति को एक ईश्वर बनाने के लिए विकास क्रम मे क्या करना होगा ! सम्भवतः एक ऐसी सचेतन सत्ता जिसकी सूक्ष्म मानसिक तरंगों पर प्रकृति के सूक्ष्म अणु भी नृत्य कर सकें । दूसरे शब्दों में ईश्वर उस बिन्दु पर ही स्थिति होगा, जिस बिन्दु पर जड और चेतन की सीमा रेखा समाप्त या प्रारम्भ होती है । जीवन की उस सम्भावनात्मक अमरता मे भी जो इस सृष्टि के विनाश के बाद भी गुणधर्म के आधार पर एक बार फिर इस सृष्टि के जैविक पुनर्जन्म का आश्वासन देती है । क्षमा करना स्टीफन हॉकिंग! मुझे तो इसी सम्भावना मे ही जीवन के अमरत्व के दर्शन होते हैं ।
कवितांजलि
वे नहीं बोलेंगे तो सुबह नहीं होगी
मुर्गे बोलें तो सुबह हो
मुझे तो मुर्गे वाली सुब्ह ही पसन्द है
आई एस आई और आई एस ओ मार्का सुबह
तो मुर्गो वाली ही होती है
मुझे बताया गया है
सकारी मुर्गे जब भी जहाँ भी जैसा भी बोलें
सिर्फ़ वही और वहीं
सुबह होती है
रेग रही है समय की ट्रेन
धीरे-धीरे बीतती हुई सी
रीतती हुई सी जिन्दगी
रीत नहीं रही है
बल्कि भरती जा रही है
सपनों से
अपनों से
18/03/2018
वे भय में हैं या विनम्रता में
उनका विनम्र एवं पवित्र समर्पण मुझे अभिभूत करता है
उनकी आस्था मुझे ईर्ष्यालु बनाती है
उनका विश्वास मुझे अविश्वास से भर देता है
ये पीढ़ी दर पीढ़ी
सदियों से छले हुए लोग हैं
उनकी आस्था अटूट है
और उनकी जनसँख्या पर्याप्त
और वे सभी चुपचाप अपनी प्रजाति कि अमरता के लिए
समर्पित हैं
मैं जनता हूँ कि वे बार-बार मारे जाने के बावजूद
बचे रहेंगे
कि अस्तित्व की इतनी पुनरावृत्ति है कि
इतनी दुर्घटनाओं -आशंकाओं के बावजूद वे सुरक्षित हैं
उनकी अच्छाइया सारी बुराइयों पर भारी है।
तब से धरती पर दौड रहा है कुत्ता
एक जीवन के रुप में यह कुत्ता
इस वक्त के विश्व का विशुद्ध वर्तमान है
सृष्टि की आदिम कोशिका से मिला हुआ जीव - द्रव्य
उसके स्पन्दन और धडकन
चुप-चाप गुडी- मुडी बैठने के बावजूद
वह एक जैविक मशीन की सक्रिय उपस्थिति है
यह उतनी ही उम्र का नहीं है
ज़ितनी उम्र का इसे जन्म से अब तक की उपस्थिति के आधार पर देख रहा हूँ मैं
अपने आने से पहले से जान रहा है वह
घूमती हुई धरती पर
पृथ्वी की गतिशीलता से होड़ लेता हुआ
तेजी से दौड रहा है कुत्ता
काल चक्र के समानांतर
( गुज़रते समय मे कवि और कविता)
और भी बहुत सारे लोग थे उन्के समय मे
जो कविता नहीं कर रहे थे और
चुपचाप जी रहे थे अपनी ज़िन्दगी
घर के लोगों से घर की भाषा बोलते हुए
एक ऐसे समय मे जब कविता
सिर्फ बाजार की भाषा बोल रही थी
सिर्फ एक आदत थी
जहाँ कुछ लोग बोलतें- बडबडाते हुए
अपने सम्वादी कलरव से भर रहे थे सुने समय को
हर चुप उदास थका हुआ
बोलने को अनिच्छुक आदमी
जनता कहा जाता है
और बोलने वाला कवि
एक अलिखित इतिहास की तरह जीता रहता है
समय मे हुए किसी अदृश्य निवेश की तरह
चुप्पी पसंद लोगो में सिर्फ चिढ़ और खीज पैञदा करते है
ऐसे लोग प्रायः हिकारत और मजाक से देखते रहते है
कवियों और उनकी कविताओ को
चुपचाप करते रहते हुए दुनिया के सारे काम
बिल्कुल मेरे पिताजी की तरह !
दृश्य का डूब जाना है
एक पहाड़ी झरने के पीछे
जलते हुए जीवन का
अपने सारे वस्त्र उतार कर
कूद पड़ना है
अथाह खारे समुद्र में .....
क्रान्ति का सारा मज़मून
सिर्फ़ मेरी दस्तखत बाकी थी
और उसके बाद कर दी जानी थी क्रान्ति शुरू हो जाने की घोषणा
मै सहसा उठा और अपनी असहमति को
यत्नपूर्वक बचाए हुए
भविष्य के संकरे दरवाजे की तरफ भागा
बीतते- गुजरते परिदृश्य से
चुपचाप दर्शकों मे शामिल
सिर्फ़ देखते हुए गुजरते जुलूसों के दृश्य को
अपने पीछे कुचलती हुई घास
और ढेर सारी गन्दगी छोड़ जाता है
और अपने हिंसक आवेश की हत्यारी स्मृतियों का
कभी भी न भुलाया जा सकने वाला निर्मम इतिहास
और मेरी आंखों में
जोश की जगह होश देखकर डर जाते हैं
चीखता है एक असहिष्णु स्वर-
अपने बीच से नहीं है यह विधर्मी -
भगाओ इसे
मै भी स्वयं को वहाँ से भाग जाने के प्रति
सहमत पाता हूँ
पिछले अनुभवों से डरा हुआ मै
निर्णायक जोश से बार- बार भागता हूँ
अकेले पड़ते होश की तरफ
मेरे जैसे लोग कितने हैं
क्या इतने है कि एक दिन निकाला जा सके
सिर्फ होश वालों का जुलूस ?
गुरुवार, 16 नवंबर 2017
त्रासदी पर पुनर्विचार
त्रासदी पर पुनर्विचार.....
( मां मित्रों और र्इश्वर के बहाने )
सिर्फ यही एक रास्ता है मेरे पास
कि बाहर के अंधेरे का सामना करने के लिए
अपने भीतर वापस लौट जाऊं !
कुछ वैसी ही कामना के साथ
जैसी कि मेरी मां की थी.....
मां ने बतलाया था-वह बहुत निराश थीं
जैसे अन्धकार के समुद्र में डूबती हुर्इ-सी
जब मैं उनके गर्भ में आया........
कि मैंने सुनहरे भविष्य की तरह तुम्हारी प्रतीक्षा की थी
जैसे अन्धकार के गर्भ से निकलता है सुबह का सूर्य
तुम्हारे अपना सूर्य बन जाने की कामना और सपने के साथ
पूरी की थी अन्तहीन अंधेरे की यात्रा
मैंंने तुम्हारे जन्म लेने की प्रतीक्षा में काटी थीं
न जाने कितनी रातें जाग-जागकरं.....
इसपुरुष-देह के साथ
मैं तो सिर्फ मसितष्कगर्भा ही बन सकता हूं
हां अपनी मांसपेशियों में भी कल्पना कर सकता हूं
नए सार्थक कमोर्ं को जन्म देने वाले सर्जक गर्भ की
ल्ेकिन मैं क्या करूं ! मैं जिसे किसी पर भी भरोसा नहीं है
किसी पर भी विश्वास नहीं है !
मैं जो अपने बाहर के सारे अन्धकार से जूझने के लिए
अपने भीतर की सृजनशीलता में डूबकर
दुनिया की सारी आशंकाओं और सारे भय को भूल जाना चाहता हूं
किसी श्रमिक की तरह बहते-बहाते अपने श्रम-जल के प्रवाह में
अनवरत बहते हुए अनन्त-काल तक जीना चाहता हूं मछलियों की तरह
मां के उस सपने को सच करते हुए
जिसमें वह मुझे चारों ओर से घिरे अन्तहीन समुद्र के बीच
तैरते देखकर पहले तो घबरा गर्इ थी
फिर यह जानकर आश्वस्त हुर्इ कि तैरना ही मेरी नियति है
कि मेरी नौकरी ही लगी है समुद्र के बीच तैरते पोत पर
रहने जीने और करते रहने के लिए.......
मां नें कहा था-जब यादों की ओर लौटना
घावों के इतिहास की ओर लौटना हो
अच्छा होगा कि पुराने इतिहास से बाहर रहकर
एक नए इतिहास को जन्म देने का प्रयास किया जाये
मां मुझे देखना चाहती थी नया इतिहास रचते हुए...
मां ने कहा था -अपने लिए सुखी होने के लिए
जन्म नहीं हुआ है तुम्हारा
ऐसे ही नहीं सूरज के उगने के साथ हुआ है तुम्हारा जन्म
तुम दुखी रहोगे.....जलते रहोगे अन्धे सूरज की तरह
दूसरों की अन्धकार से घबरार्इ आंखों के लिए
जिनके लिए जलोगे तुम
वे तुम्हें धन्यवाद भी नहीं कहेंगे
भूल जाएंगे अपनी आंखों के पीछे तुम्हारे जलने का सच
क्योंकि सभी को तुमसे सुखी रहने की आदत जो पड़ चुकी है
किसी को तुम्हारे सुख की ओर घ्यान भी नहीं जाता.....
मां ने कहा था तुम अपने हिस्से का भाग्य भी बांट देते हो
अपने मित्रों के बीच
कि मैं इतना भोला हूं कि जब भी मैं किसी से जुड़ता हूं
कुछ न कुछ खो बैठता हूं
वह मेरे मित्रों को किसी फूल पर मंडराते
आवारा पतंगो की तरह देखती थी
वह अच्छी तरह पहचान गयी थी कि
मै अपने मित्रों की जरूरत हूं
मित्र मेरी जरूरत नहीं हैं
वे सिर्फ मेरा समय बरबाद कर सकते है
वह भी अपने स्वार्थ के लिए
और एक दिन मुझे अकेला छोड़कर चल देंगे
अपनी जरूरतें पूरी हो चुकने के बाद......
कि तुम्हारे सारे मित्र फर्जी हैं
तुम्हारे सारे मित्र इसलिए फर्जी हैं क्योंकि उन्हें तुमने नहीं तलाशा है
बल्कि वे ही धीरे-धीरे खिंचते आए हैं तुम्हारे पास
अपने स्वार्थ के अनुरूप तुम्हारी उपयोगिता की पहचान करते हुए
कि लोग पहचान गए हैं मेरे भीतर का बुद्धूपन
और यदि मैं अपनी जरूरत के अनुसार
अच्छे मित्रों की तलाश नहीं कर सकता
तब भी मुझे अच्छे मनुष्यों की तलाश करनी ही चाहिए......
यधपि मैं इतना मेहनती हूं कि
शायद ही मुझे किसी सहारे की आवश्यकता पड़े !
मां कहती थी कि तुम्हारे कोर्इ भी काम नहीं आएगा
तुम ही काम आने के लिए अभिशप्त हो दूसरों के
तब तक पत्नी नहीं आयी थी
जो बता पाती कि आप ही ठगे जायेंगे हर बार......
तब तक मैं यह पहचान नहीं पाया था कि
मेरे स्वभाव की सारी कमजोरियों का राज
मेरे उन सांस्कृतिक विश्वासों में थी जो
प्रतिद्वंद्वियों और चुनौतियों से मुक्त- एकल
भारतीय र्इश्वर की तरह ही भोली आश्वस्त और अद्वितीय थीं
मां को मेरे बाद र्इश्वर पर ही सबसे अधिक भरोसा था
लेकिन सबसे अधिक डरती थी वह र्इश्वर से ही
वह संदिग्ध है ....उसकी लीला अपरम्पार है
और उसे कोर्इ भी नहीं समझ सकता
उसकी खुशामद के लिए सिर्फ एक ही जन्म काफी नहीं !
जो पूरे विश्वास में जीते हैं र्इश्वर उनके साथ मजाक किया करता है
पता नहीं यह र्इश्वर वही है या कोर्इ और......
कहते हुए हंसती थी मां
हमें सावधान रहना चाहिए
कि जब हम विनम्र प्रतीक्षा में होते हैं
मानव जाति का एक बुरा चेहरा
हमारे भीतर के स्थगित भोले असावधान मनुष्य को पहचान जाता है
जंगल में अपने आसान शिकार की तलाश में घूमती हुर्इ
भूखे बाघ की शातिर शिकारी आंखों केी तरह.....
र्इश्वर जो करता है अच्छा ही करता है के परम्परागत विश्वास के साथ
एक आम भारतीय के भोले बुद्धूपन के साथ
तब मैं पूरे गर्व के साथ अपनी अच्छाइयों के अनुरूप ही
अपने साथ अच्छे व्यवहार और स्नेहिल प्रशंसाओं की प्रतीक्षा में था.....
एक र्इश्वर-जो बुराइयों के लिए समर्पित हो
हमारी भूलों गलतियों और अपमानों से बना हुआ र्इश्वर
हमारे हिंसक प्रतिरोध और प्रतिशोध में अभिव्यकित पाता हुआ
एक पागल र्इश्वर का शैतान की तरह होना
जो हमारे विश्वासों को प्रश्नांकित करता रहे
ताकि हम बचे रह सकें एक बुरे आत्मविश्वास से
उन बाहरी बुरे प्रभावों से-जब हम अपने साथ
अच्छे व्यवहार की उम्मीद में दूसरों द्वारा ठगी के शिकार होते हैं....
शायद एक आस्तिक भारतीय होने के कारण
तब मैं पूरी तरह अपरिचित था उस बुरे र्इश्वर यानि कि शैतान से
मुझे अच्छे मनुष्यों की अब भी तलाश है
अच्छे मनुय यानि कि जो बार-बार ठगे गए हों और
दुनिया के बुरे चेहरे को देखने के सर्वथा अयोग्य हों
मुझे उन शक्की लोगों की भी तलाश है
जो किसी के अप्रत्याशित बुरे व्यवहार से हतप्रभ होकर
अपने ही भीतर सिमट गए हों
मुझे अब भी तलाश है उस मनुष्य की
जो अपनी नैतिकताओं को ढोते रहने के प्रयास में
समय और समाज से बाहर हो गया हो
मैं उस अदृश्य मनुष्य की खोज में हूं
जो अपने निर्वासन और अकेलेपन में र्इश्वर से होड़ ले रहा हो
मैं उसे ही अपना मित्र बनाना चाहता हूं
इस दुनिया में आने के बाद उसने मुझे बताया था
और मुझे अच्छा लगता कि सच ही कोर्इ र्इश्वर होता
कोर्इ भी असितत्त्व के मनहूस अकेलेपन में कैद होना नहीं चाहेगा
यह दुनिया जो असितत्त्व की अन्तहीन आवृत्ति से बनी है
मुझे अच्छा लगेगा कि मैं न सही कोर्इ दूसरा ही हो
जिसके होते हुए मैं पूरी तरह गैरजरूरी प्रमाणित हो सकूं
मैं किसी भी अस्तित्व के सम्मान में
अपनी सारी महत्त्वाकांक्षाओं को स्थगित करते हुए
अनन्तकाल तक प्रार्थना में झुके रह सकता हूं
लेकिन मैं भ्रमों से भरा हुआ जीवन जीना नहीं चाहता
मैं चाहता हूं कि मेरे सारे भ्रम टूट जाएं
अब तक जिया हूं चाहे जैसा
लेकिन मैं नंगे सच के साथ ही मरना चाहता हूं......
सच कहूं मैं..... मुझे बताया गया था
जो कुछ भी हो मेरे हिस्से का जीवन
सब कुछ इतना नियत कि र्इश्वर की ओर से ही हो जैसे.......
एक अटूट मजबूत विश्वास की तरह
मैं सफलता के संयोगों की निरन्तरता को
किसी चमत्कार की तरह र्इश्वरीय समझने लगा था
मैं समझता था बचे रह जाएंगे -
मैं और मेरे जैसे लोग जैसे अब तक उल्का पिण्डों की अनवरत मार
सहते हुए भी बची रह गयी है धरती
धरती पर चुपचाप बचा रह गया है जीवन
मित्रों में घबराहट फैलने लगी थी
और मित्रगण चुपचाप खिसकने और बदलने लगे थे
एक दिन पिता नें हाथ खड़े कर दिए कि बूढ़ा हो गया हूं मंैं
कि अब सहारे के लिए कोर्इ दूसरा र्इश्वर ढूढ़ो.....
मैं किसी समझदार र्इश्वर की प्रतीक्षा में था
जबकि अस्तित्व की आवृत्ति के साथ
र्इश्वर अनेक भ्रामक विकल्पों में था
मेरा जीवन प्रेम के बाजार में खड़ा था-
किसी एक के चयन के लिए...
कि जिस दिन नौकरी लगी
उस दिन पता चला कि प्रेम के बिकाऊ बाजार में
अब तक बचा हुआ हूँ मैं अपनी बची हुर्इ कीमत के साथ....
मित्रगण झगड़ने लगे थे
अपनी-अपनी साली के साथ विवाह प्रस्ताव देने के लिए
कि जैसे वे हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहते थे मुझे
किसी उपयोगी की तरह अपने रिश्तों की स्थायी कैद में
मां नें कहा था-बहुत -सी बेवकूफियां
हम साथ-साथ कर जाते हैं
अन्धी प्रतिक्रियाओं के उन्माद में
बिना समझे....बिना सोचे
और यह भी कि जब हम अपने साथ हुए हादसों के लिए
दूसरों की संदिग्ध भूमिका की तलाश कर रहे होते हैं
हम स्वयं ही एक पक्ष बन चुके होते हैं
अपने ही साथ हुए अपराधों के लिए.....
प्रतिद्वंद्वियों और चुनौतियों से मुक्त- एकल
र्इश्वर अनेक भ्रामक विकल्पों में था
किसी एक के चयन के लिए...
हम चाहते हैं.....
तुम्हारे दिए और जिए हुए सच
हमारे प्रश्नों से घायल हो चुके हैं
हम तुम्हारी गलितयों-मूर्खताओं को
वैसे ही जानते हैं
जैसे आने वाली पीढि़यां जानेंगी
हमारी मूर्खताओं को
हम तुम्हारी दी हुर्इ निष्ठाओं से छले गए हैं
हम घर से बेघर
समय से असमय हुए हैं.....
तुम्हारी दी हुर्इ दाढि़यां
नोच डालनें की हद तक
खुजली पैदा करती हैं
हमें लहूलुहान करती हुर्इ-
हम नहीं चाहते कि हमारा नाम
तुम्हारी बनार्इ हुर्इ जातियों के
एक र्इमानदार कुली के रूप में लिखा जाये....
ळम अपने वंशजों को
अपना भारवाहक बनाने वाली
तुम्हारी हिंसक परम्परा के खिलाफ हैं
हमें नहीं चाहिए
आदमी की खाल उघेड़कर
उसके लहू में डुबोकर लिखे गए
तुम्हारे सनातन दिव्य ग्रन्थ
हम तुम्हारी
सभी को मारकर जीनें वाली
अमरता के खिलाफ हैं.....
तुम्हारा हमारे समय पर लदकर
बलात जीवित रहना
एक अप्राकृतिक अपराध है
हम न्याय चाहते हैं
हम तुम्हारी मृत्यु चाहते हैं पितामह !
हम चाहते हैं कि
आने वाली पीढि़यों को भी
नयी सभ्यता के लिए
अपना नया पितामह चुनने का
अधिकार मिले
बताओं !
बताओ कि तुम्हारी मृत्यु कैसे होगी ?
हत्याएं
यह समय
युद्ध का समय है यह
लड़नें से अच्छा है सुलह-संवाद
घायल होने से अच्छा है बचना
मरने से अच्छा है पैदा ही न होना......
इस तरह
समस्याओं से भरे
इस उत्तर -समय में
युद्ध जीतने का यह एक ही अस्त्र शेष है
निरोध !!
युद्ध में ब्रेक का समय है यह
उस तथाकथित स्वतंत्रता के खिलाफ
जो एक गैरजिम्मेदार पीढ़ी द्वारा
अराजकता में बदल दी गर्इ थी !
दुर्घटनाओं के नंगा नाच का समय है यह-
जनसंख्या के विस्फोट तक
शर्महीन !
हंसिए नहीं !
सभ्यता और विज्ञान की यात्रा में ही
पहुंचे हैं हम
इस सवाल तक-
यह ठीक है कि सभी विज्ञान पढ़ें
वैज्ञानिक बनें
लेकिन वे खाएंगे क्या ?
क्या करेंगे !
इतने वैज्ञानिक क्यों ?
रोना कोइ दृश्य नहीं
रोना कोइ दृश्य नहीं है
दृश्य का डूब जाना है
एक पहाड़ी झरने ंके पीछे...
जलते हुए जीवन का
अपनें सारे वस्त्र उतार कर
जीवन का कूद पड़ना है
अथाह खारे समुद्र में.......
यहां कहीं दूर तक
रोने की कोर्इ जगह
दिखार्इ नहीं देती....
इस शहर में
देर तक मुस्करानें के बाद
रोने के लिए
किधर जाते होंगे लोग !
जल जलहिं समाना....

धरती बांझ थी और आसमान निरर्थक
नि:संतान था पिता अपने पुत्र के बिना
प्रकृति विधवा थी और परम तत्त्व ओझल
तब अन्धकार की कोख में ज्योति की तरह वह उतरा......
तब चेतना डूबी थी विचारों की जड़ता में
और स्मृतियां जंगल में बदल गयीं थीं
पोथियों पर मूर्खताएं छपी थीं और ग्रन्थों में षडयन्त्र
कपटियों ने सारे प्रकाश को अपने पुत्रों-वंशजों के लिए
चुराकर बन्द कर लिया था
ज्ञान ऐश्वर्य के लिए था और र्ठश्वर व्यापारियों के लिए
परजीवियों का सत्य याचना के लिए-'मुल्ला का बांग' और 'पंडा का पाथर
मकड़ी जैसे अपने बुने जाल में पुकारती है कीट
धर्मग्रन्थों के शब्द कंटीली झाडि़यों में बदल गए थे- मारते हुए मनुष्य.....
जिन्हें कहा जा सकता है नीच-कहा जायेगा
बाझिन को बांझ.....कि द:ुखी का दु:ख सुखी के सुख का विषय है
निपूती का दु:ख.... गोद भरी मांओं की खुशी -हुआ ऐसा....
उतरा वह परम विवेक
जीवन-ज्यों सारे ब्रह्रााण्ड के गर्भ से अभी-अभी फूटा हुआ
निर्विकार अनाम पवित्र निस्सीम सागर-शिशु
आदिम मूल तत्त्व की तरह-अनन्त की ओर से
बंधीं और अनर्वर मानव-जाति के लिए.....
तालाब में जैसे खिलता है कमल
शिशु मिला वह नीरू को अपूर्व
खुले आसमान के नीचे प्रकट हुर्इ दिव्य ज्योति
पुरानी बसितयों के अंधेरे सीलन भरे दुर्गन्धाते तहखानों और बूढ़ी कोठरियों से दूर
खुली हवा में-जंगल-सी अनछुर्इ-अबोध पवित्र और अनायास.....
किसका जीवन है यह !....सोचा नीरू नें
किसका जीवन है यह !....पूछा नीरू नें बार-बार
उसकी सारी प्रतिध्वनियां उस तक ही लौट आयीं.....
यह मेरे लिए है-उसने आसमान की ओर
कृतज्ञता से भरे अपने दोनों हाथ उठाए और झुक गया धरती की ओर
उठाने के लिए एक अपूर्व दिव्य शिशु......
जो किसी का नहीं है ,सबका है-आसमान नें कहा
मेरी धरती पर जो भी जन्मा है-मेरा है....मेरी ओर से है
विरासत है....प्रतिनिधि है सम्पूर्ण असितत्त्व का-दुहराया ब्रहमाण्ड नें बार-बार......
जो किसी का नहीं है ,सबका है
सारे मायावी जोड़-तोड़ और अंकों की भीड़ के लिए
यह सिर्फ एक मानव-शिशु ही नहीं एक विराट शून्य है-सत्य-स्फुर्लिंग !
काल-जनित विकृतियों के....इतिहास के दुखती स्मृतियों के
उन्मादों-अपराधों.... पापों-दुर्घटनाओं के सारे प्रदूषणों का अन्त यह.......
यह किसी का नहीं है ,सभी का है-सबके लिए.....सब कुछ की ओर से
भटके समाज के हर गणित को शून्य करता हुआ
निरस्त करता हुआ सारे गलत-जीवन छलका ज्यों
मानव-जाति की रुद्ध दीवारों वाली सारी परम्पराएं तोड़ ---
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लड़की
किसी और को दे दिया जाएगा....
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वह जो चोर की तरह
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अब तक की सबसे अच्छी कविता....
बुढ़ापे का पुत्र
(एक मित्र की कविता पढ़कर प्रसिद्ध आलोचक की शानदार वापसी पर)
मिट चुका होता
सब कुछ मिट चुका होता
यदि कदमों नें मांगे होते जिन्दगी से बने बनाए रास्ते
खुले दरवाजे और अड़ गए होते
बन्द द्वार और
पन्थहीनता का ठहराव लिए !
उजड़ गए होते
जंगल,बन,पलाश
सारे के सारे तब........
हादसा
सब व्यर्थ हुआ
एक बारात-
दूल्हन और
न्यौछावर के फेंके गए
कुछ खनकते सिक्के
बटोरनें में
पूरी की पूरी पीठ़ी
खो गयी......
बदलाव
चूहे के बिल में भी बदलता है
चूहे के बिल को छोड़कर
निकल भागता है सांप
चूहा भी बदलता है
बदल जाते हैं लोग-बाग
मौसम जब बदलता है ।
विचार भी एक पर्यावरण है
फिलहाल मैं किसी भी सपने को जी नहीं सकता हूं
मुझे यह भी नहीं मालूम कि
मैं किसी के सपने का हिस्सा हूं भी या नहीं
मैं एक संवेदनशील मन के ददोर्ं को बड़ाना नहीं चाहता
यहां एक आदमी सो रहा है बच्चों की तरह.......
नुकीले चटटान की तरह
चुभ रहे हैं खुरदुरे अहसास
जीवन खा रहा ज्यों ठोकर
बन्द गलियारों में.....
लोगों के चुभते हुए
हिंसक व्यकितयों के बीच से गुजरते हुए
लोगों के पथरीले मन के पर्यावरण से
बचते-बचाते जीने के लिए
गलत विचारों को जी रहे आदिम मसितष्कों का समय
अप्रासंगिक विचारों के खण्डहरों का शहर
आक्रामक हत्यारी इच्छाओं के पशुओं से भरा हुआ.....
जबकि विचार भी एक पर्यावरण है
मैं अपने प्र्यावरण को बदल देना चाहता हूं.......
उनकी इच्छाएं जेबकतरों के उंगलियों की तरह
फिर रही हैं लोगों की उपलबिध्यों की जेब पर
उनकी उंगलियां हत्यारों की तरह बढ़ रही हैं
लोगों की धड़कनों पर......
उनकी इच्छाओं नें जीत लिया है समय
उनकी इच्छाओं नें दूसरों की इच्छाओं को स्थगित कर रखा है !
दर्द इतनें अधिक हैं कि
मैं बाहर का सब कुछ अस्वीकार करता हुआ
सिर्फ अपने सकि्रय असितत्व में डूबा हुआ ही
पार कर पाउंगा बाहर का यह पागल समय
भर पाउंगा अपने भीतर और बाहर की सारी अनुपसिथतियों को
भंग कर पाउंगा अपने भीतर का निष्ठुर एकान्त......
एक अविस्मरणीय इतिहास की तरह
सौन्दर्य में नहीं ,संवेदना में हुआ है
एक साहित्यकार का अन्त !
एक चिटठी
क्या ही अच्छा होता कि
एक चिटठी लिखता
और बदल जाता सारा देश
एक चिटठी मिलती और
फिर से लिखा जाता
देश का संविधान......
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