शनिवार, 14 जून 2014

दुनिया का भविष्य और जनसंख्या वृद्धि का संकट

जनसत्ता 17 जुलाई, 2014 :में प्रकाशित -

 http://www.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=73737:2014-07-17-06-33-43&catid=21:samaj


विश्व की जनसँख्या जितनी तेजी से बढ़ रही है हम मनुष्यों के लिए यह धरती कम पड़ती जा रही है .यह दुनिया भी किसी गैस के बंद सिलेंडर की तरह ही है .जिसमें जैसे-जैसे गैस सिलेंडर में भरते जाते हैं , गैस के परमाणु आपस में तेजी से टकराने लगते हैं , तापमान बढ़ता जाता है और एक समय ऐसा आता है जब बढ़ते दबाव को न सह पाने के कारण सिलेंडर में विस्फोट  हो जाता है .वैश्विक तापमान वृद्धि के प्राकृतिक संकट से पहले मानवीय पर्यावरण ख़राब होने का संकट अधिक है ..आज के बढ़ते अपराध और बिगड़ती कानून व्यवस्था में इसकी झलक देखी जा सकती है .सायकिल एवं बसों के टायर पंचर होनें में भी यही सिद्धांत कई बार काम करता है .         
              देखा जाय तो एक सियार का काम एक मांद से चल सकता है लेकिन आदमी को तो रहने की आवश्यकता के हिसाब से नहीं बल्कि उसके धन और प्रदर्शन के रुतबे के हिसाब से घर चाहिए ..कंकरीट का जंगल बढ़ाता जा रहा है .खेती की जमीन को वे लोग हड़पते जा रहे हैं जो आमदनी के दुसरे जरियों के कारण महंगा अनाज भी खरीद सकते हैं .कृषि-भूमि खरीद कर उसका क्षेत्रफल कम करने के बावजूद उनपर कोई तात्कालिक प्रभाव नहीं पड़ने वाला है .         
             अनेक सांस्कृतिक - सामाजिक कारक हैं इस जनसंख्या वृद्धि के पीछे .भारतीय मूल के लोगों का धार्मिक कारणों से पुत्र मोह जो उन्हें पुत्र होने तक संतानोत्पत्ति करते रहने के लिए विवश करता है .इसमें बंश की अवधारणा और बांस नामक एक घास-कुल की वनस्पति से उपमा की भी नक्रारात्मक भूमिका है. . बांस की एक विशेषता होती है कि उसका नया पौधा बांस की जड़ के पास ही फूटता है .उसमे बीज नहीं पे जाते इस लिए वह दूर-दूर अन्यपौधों कि तरह नहीं उग सकता .इसका साम्य बस इतना ही है कि विवाह के बाद स्त्रिया विस्थापित हो जाति है जबकि पुरुष घर में ही बना रहता है .देखा जाय तो बेटी दुसरे परिवार में जैविक विशेषताएँ लेकर जाती है तो दुल्हमें बैठे -बैठे ही बाहर से आकर किसी परिवार या कुल  के गुण-तंत्र को बदल देती हैं .कहने के लकी सिर्फ आर्थिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूपों ही बना रहता है .फिर भी भारत में यह अंध -विश्वास इतना प्रचलित है कि एक उपमा ही जनसंख्या बढ़ा रहा है .इसी तरह शूद्रों का ब्रह्मा के पैरों से उत्पन्न होना भी एक उपमा ही है ,जो बहुतों को अपमानित करती रहती है .       
             .मानव जाति कई समूहों में बंटी है .हर समूह का सामाजिक व्यवहार .जीवन-दर्शन और जीने का मकसद अलग है .पूरी मानव जाति पुरातनपंथी और नवान्वेषी दो खेमों में बनती हुयी है। मानव जाति के भविष्य का आखिरी निर्णय उसकी सृजनशीलता ,संघर्ष और प्रतिरोध पर भी टिका हुआ है। कुछ हैं जो सिर्फ आस्था ,आतंकवाद और उत्पादन में लगे हुए हैं। कुछ परिवार नियोजन के सरकारी कार्यक्रमों को भी धर्म-विर्रुद्ध बताकर उसका उसका बहिष्कार करने वाले लोग हैं कुछ मानव जाति को उसकी सम्पूर्णता में नहीं बल्कि बल्कि अपनी जाति और कौम की संकीर्णता में देखने वाले लोग भी है। ऐसे लोगों की चिंता यह रहती है कि एक दिन उनकी जाति अल्पसंख्यक होकर लुप्त हो जाएगी और केवल कौम विशेष के लोग ही इस धरती पर दिखेंगे। ऐसे लोगों के लिए जवाब कुछ इस तरह ही होना चाहिए कि मानव जाति का बचना ज्यादा जरूरी है। वह किस कौम एवं विचारधारा के साथ बचाती है यह उतना महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है।         
             वैसे देखें तो आज की जनसंख्या में कुछ हैं जो आध्यात्मवादी हैं और अपनें पवित्र अस्तित्व की महिमा में डूबे हुए हैं .कुछ महान पवित्र आत्मा यानि कि परमात्मा के सम्मान में झुके हुए हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो भटक रहे हैं किसी नयी दुनिया की खोज में .यद्यपि ऐसे लोग बहुत ही कम हैं ,लेकिन हैं जिन्होंने बूढ़ी और अपर्याप्त होती जा रही दुनिया के असुरक्षित भविष्य का साक्षात्कार कर लिया है और उसकी सुरक्षा के लिए चिंतित भी हैं ..अध्यात्मवादी और समर्पण वादी दोनों ही चुपचाप बड़ी संख्या में या यह कहें कि जातीय स्तर पर अपना उत्पादन बढाने में लगे हैं .निश्चय ही यह दुनिया एक दिन ऐसे ही लोगों से भर जायेगी .जीवन की निरंतर बदती प्रतिस्पर्धा इन्हें पागल बनाएगी और अपराधी .इनके वंशज अपराध करेगे और दंगे .ऐसे में एक ही उपाय नजर आर्ता है कि जनसँख्या बदने दी जाये और नयी धरती खोजी जाये .इसमें अंतरिक्ष विज्ञानं का विकास हमारी सहायता कर सकता है .तब हम एक ही क्यों कई धरतियों पर फ़ैल कर बस सकते हैं .यदि ऐसा हो पाता है तो एक दिन उत्पादनवादियों के निरंतर उत्पादन से इस नरक हो चुकी दुनिया को छोड़कर बुद्धिमान और समर्थ खोजी किसी और ग्रह पर भागकर बस जायेंगे .सिर्फ नालायक ही रह जायेंगे इस धरती पर कीड़े -मकोड़ों की तरह .....     
          यद्यपि अतीत में मानव जाति नें धरती का भार कम करने के दूसरे उपाय भी किये हैं जो युद्ध आदि द्वारा सामूहिक आत्म ह्त्या से मिलता है। इसे कृष्ण और राम द्वारा धरती का भार कम करने वाले पौराणिक युद्धों में देखा जा सकता है। कहते हैं चंगेज खान नें भी अपने ढंग से यह भार कम किया था। दो विश्व-युद्धों की भी इसमें आंशिक भूमिका रही होगी। आंशिक इस लिए कि युद्धों से जनसँख्या का बहुत कम होना संदिग्ध है।  क्योंकि युद्धों में सिर्फ पुरुष ही मारे जाते रहे हैं और सभी जानते हैं कि प्रजाति वृद्धि का जविक तंत्र स्त्रियों के पास रहता है। यद्यपि यह भी सच है कि दांपत्य के संस्थागत स्वरूप के कारण वैधव्य का अभिशाप भी जीती रहीं हैं ,किंन्तु अतीत के सामंती युग में बहु पत्नी प्रथा के कारण जनसंख्या वृद्धि की दर अधिक कम नहीं हुई होगी।  बुद्ध के आन्दोलन में यदि युवा स्त्रियाँ भी भिक्षुणी बनी होंगी तो माना जा सकता है कि उससे जनसँख्या में वृद्धि न होने का उद्देश्य सिद्ध हुआ होगा।तिब्बत के बौद्धों में आज भी जनसँख्या नियमन के लिए बौद्ध भिक्षुणी के रूप में आजीवन अविवाहित रहने की भी प्रथा रही है। इसे जनसँख्या का सांस्कृतिक नियमन कह सकते हैं। फिलहाल तो  एक रास्ता चीन का तो दूसरा परम माननीय वाला भी है कि विवाह करिए पर सम्बन्ध स्थगित रखिये। एक अन्य विज्ञानं का सहारा लेकर निरोधक उपायों वाला है। भारत सरकार को चाहिए कि निरोधक बांटने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग से लेकर  डाक या राशन बांटने वाली दुकानों को दे दे। इस महान परियोजना के लिए ए. टी. एम्.  जैसी मशीन भी चौराहे-चौराहे  पर लगायी जा सकती है। सुलभ इंटर्नेशनल वाले दुबे जी भी यह कार्य करा सकते हैं।लेकिन वोट बैंक के चक्कर में भारत का लोकतंत्र आत्महंता जनसँख्या-वृद्धि की और बढ़ रहा है। एक राजनीतिक किंकर्तव्यवविमूढ़ता  समस्या को और बढ़ा रही है।

शनिवार, 24 मई 2014

आस्तिकता का समाज - विज्ञान

भारत में विचारधारा विशेष को जीने और मानने वालों के लिए अच्छे दिन आ गए है। इस लिए कि वे जिस सांस्कृतिक पर्यावरण को जीना चाहते थे ,उसका अब समकालीन राजनीति से अब कोई विरोध और चुनौती नहीं है। उनके विरोधी हतोत्साहित हुए हैं और वे पूरी उन्मुक्तता के साथ अपने चित्त  जिएंगे। ऐसे में संभव है कि आध्यात्मिकता का अतिरिक्त महिमामंडन हो. इसमें मुख्य चिंतनीय बात यह है कि भारतीय संस्कृति की मुख्य धारा समर्पण वादी है। इसमें विरोध और असहमति जीने की कोई सशक्त जातीय परंपरा नहीं मिलती।
       मैं भी यह मानता हूँ कि ईश्वर के भरोसे जीना अत्यंत सुखदायी होता है। सच तो यही है कि बचपन में माता-पिता पर आश्रित होने के कारण हम  सभी समर्पण और आस्था वादी होते है। यह वह दौर होता है जब हम स्वयं को मिली दुनिया को पूरी तरह सच मानकर उसे पूरी सहमति के साथ जीने का प्रयास करते हैं। लेकिन जैसे - जैसे हम समझदार होते जाते हैं ,यथार्थ जगत के अभावों और अंतर्विरोधों से परिचित होते जाते  हैं ,हमारे लिए पूर्ण समर्पणवादी और आस्तिक होना मुश्किल होता जाता है। हम जैसे -जैसे व्यवस्था से मोहभंग के शिकार होते जाते हैं ,वैसे -वैसे भीतर से अपराध-बोध के शिकार होते जाते हैं कि हमारे बचपन का स्वर्ग छिन गया है।
      हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी समस्या को ईश्वर पर छोड़ने  मतलब सामाजिक स्तर  पर दूसरों के विवेक पर छोड़ना भी हो सकता है। यदि हम दूसरों से अयोग्य और मुर्ख है तो आस्तिक और समर्पण वादी होना फायदेमंद हो सकता है , विपरीत यदि दूसरे हमारी तुलना में बेवकूफ औरअयोग्य हुए तो  आस्तिक   होकर कुछ अच्छा घटने की प्रतीक्षा करना सिर्फ समय बरबाद करना ही होगा। ऐसी आस्तिकता और समर्पण से कोई भला होने वाला नहीं है। इसी लिए असंतुष्टों और बुद्धिमानों के लिए ज्ञानमार्गी होना ही उचित है और मूर्खों तथा अयोग्यों के लिए भक्तिमार्गी  होना।
        इस इस तरह विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया कि अगल-बगल मुर्ख और अयोग्य अधिक हों तो संशयवादी और ज्ञानमार्गी  होना ही श्रेयष्कर है। इसके विपरीत यदि अगल-बगल अधिक योग्य और बुद्धिमान व्यक्ति उपस्थित हों ,जिन पर भरोसा किया जा सकता हो तो चुपचाप दूसरों का नेतृत्व स्वीकार कर उन्हें सहयोग देना ही उचित है। ऐसे ऐसे में सिर्फ महत्वकांशा से वशीभूत होकर किया गया विरोध सिर्फ वातावरण ही ख़राब करता है। इससे समाज का भला नहीं होगा।   

शुक्रवार, 23 मई 2014

अरविंद केजरीवाल और उनकी फ्लॉप आप पर दृष्टिपात

आप यानि आम आदमी पार्टी जैसे एक राजनीतिक मंच की ऐतिहासिक जरुरत भारत को है। यह एक ऐसी जरुरी उपस्थिति की तरह है जैसे हाथी के लिए अंकुश। क्योकि विपक्ष कमजोर हुआ है , स्थिति में चर्चा में बने रहने के विशेषज्ञ अरविन्द केजरीवाल की सार्थक  भूमिका बनी रहेगी। अरविन्द वस्तुतः भारतीय राजनीति में फुटपाथ  हीरो हैं। यह व्यक्ति कहीं से भी सेलिब्रेटी नहीं लगता। बस में मिले तो कोई जल्दी सीट भी नहीं देगा। अरविन्द केजरीवाल में मध्यवर्ग की सारी कमजोरियां भी हैं। यह व्यक्ति कहीं से भी राजनीतिज्ञ नहीं बन पाया है। इस व्यक्ति की सीमा यह  है कि इसे आलोचना और विरोध की भाषा तो आती है ,लेकिन प्रेम  आत्मीयता की नहीं। यह मैं इस आधार पर कह रहा हूँ कि यह व्यक्ति अपना कुनबा एकजुट नहीं रख पाया। अन्ना हजारे हों या किरण बेदी सब इतनी जल्दी अलग -अलग रास्ते पर चले गए कि ऐसा संदेह होने लगा कि यह केजरी का क्रांतिकारी शुद्धतावाद है या महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व का दुष्प्रभाव !
        मैं एक कल्पना और करता रहा हूँ कि क्या यदि आप सफल हो जाती तो उस पार्टी में गए बुद्धिजीवियों की हैसियत वैसी ही बनी होती जैसी कि उनकी समाज में है। मुझे ऐसा क्यों लगता रहा है कि केजरीवाल अभी अपने व्यक्तित्व और भूमिका को लेकर सावधान नहीं हैं। जैसे कांग्रेस में जाने का मतलब अपने व्यक्तिव की स्वाधीनता खोकर राहुल गांधी की सर्वकालिक श्रेष्ठता को स्वीकार करना होता है ,वैसी ही दशा-दिशा अरविन्द केजरीवाल की पार्टी में जाने वाले बुद्धिजीवियों की भी दिख रही थी। य़दि ऐसा होता है तो आप भी एक दूसरी कांग्रेस बन कर ही रह जाएगी। यदि केजरीवाल नहीं बदले तो भारतीय राजनीति में एक नए लोकतांत्रिक मंच की आवश्यकता बनी  रहेगी। यदि केजरीवाल चाहते हैं कि  उनकी आप पार्टी संभावनाशील भूमिका में बनी रहे तो  उचित माध्यम बनने की साधना करनी होगी। अपना ही अध्ययन कर अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को को पहचानना होगा , अपना शोधन करना होगा। अभी तो  केजरीवाल को अपने और मुखर ,आत्मीय और उदार व्यक्तित्व की तलाश करनी होगी। वे दरअसल विध्वंसात्मक भूमिका और गतिविधियों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने कांग्रेस का सफल विध्वंस किया। उसे उसे सत्ता से बाहर  कर दिया। लेकिन सृजनात्मक विश्वसनीयता कम होने से भारतीय जनता मोदी के आश्वासनों को अजमाने की दिशा में मुड़ गयी।

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

ऐरिक हाब्सबाम की इतिहास- दृष्टि और मार्क्सवाद






ऐरिक हाब्सबाम के लिए मार्क्स  सिर्फ एक विचारधारा ही नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक उपस्थिति भी हैंं । यधपि  एक इतिहासकार के लिए किसी भी उपस्थिति को अस्वीकार करना प्राय: असंभव ही है । यधपि वह किसी से सहमत या असहमत होने एवं  विषय की प्रकृति के कारण  र्इमानदारी से महसूस और स्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हैं  । लेकिन एरिक की मार्क्सवाद  के प्रति पक्षधरता एवं प्रेम सिर्फ इतिहासकार होने के कारण ही नहीं है ।  मार्क्स उनके लिए  आधुनिक भौतिकवादी वैज्ञानिक सभ्यता और क्रांतिकारी  युग-परिवर्तन के स्वाभाविक दार्शनिक हैं । इसीलिए वे विचारक मार्क्स और उनकी विचारधारा कोे एक स्वााभाविक विकासक्रम में देखे जाने का आग्रह करते हैं । मार्क्सवाद उनकी दृषिट में आधुनिक भौतिकवादी वैज्ञानिक जीवन -दर्शन का स्वाभाविक विकास एवं निष् पतित है ।  आधुनिक युग के लिए वह उतना ही स्वाभाविक औा अपरिहार्य दर्शन है ,जितना कि डार्विन का विकासवाद ।  मार्क्स उनकी दृष्टि में आधुनिक पूंजीवाद और औधोगिककरण युग के अपरिहार्य दार्शनिक हैं- एक स्वााभाविक मांग हैं ।
          इसीलिए एरिक हाब्सबाम मार्क्स की उस उपस्थिति को भी एक इतिहासकार के रूप में देख पाते हैं,जिसे राजनीतिक घटनाओं और सत्ता के आधार पर देखने वाले नहीं देख पाते हैं । एरिक के लिए  मार्क्स आधुनिक विचारशीलता की एक अन्त:प्रेरणत्मक दृष्टि हैं । उनके लिए मार्क्स  उसीप्रकार आधुनिक भौतिकवादी वैज्ञानिक सभ्यता-युग की बौद्धिकता के महत्वपूर्ण वैचारिक आयाम हैं ,जिस तरह कि गेलीलियो,डार्विन,,न्यूटन,फ्रायड या आइन्स्टीन । एक विचारक के रूप् में मार्क्स के दृष्टि -संयोजन में उनके भौतिकवादी वैज्ञानिक युग की पृष्ठभूमि छिपी हुर्इ है । इसीकारण से मार्क्स को सहसा उसीप्रकार अप्रासंगिक या खारिज नहीं किया जा सकता ,जैसे कि आधुनिक वैज्ञानिक युग एवं सभ्यता को  अप्रासंगिक या खारिज नहीं किया जा सकता ।
            ऐरिक हाब्सबाम के लिए अतीत से तात्पर्य उन संवैधानिक,प्रशासनिक और संस्थागत स्मृतियों और अनुभवों से भी है , जिनके विकास में बौद्धिक मानवीय प्रयासों की एक लम्बी श्रृंखला छिपी हुर्इ है । यह सिर्फ राजनीतिक ही नहीं है ,बलिक समाज को प्रभावित करने वाली उस अभियानित्रकी के रूप में भी है ,जिसके सुधारों और परिष्कारों का भी स्मृति और इतिहास है । जिसकी समझ भविष्य के नए निर्माण का आधार बनती है । मार्क्स की चर्चा करते हुए हाब्सबाम  समाजवाद के उस यूटोपिया प्रभाव की भी चर्चा कीते हैं जो एक कार्यात्मक प्राप्तव्य या लक्ष्य आदर्श के रूप में गुजरते वर्तमान को प्रभापित करता है । अच्छे समाज का यूटोपियन माडल या बांछित राजनीतिक व्यवस्था भी समाज एवं व्यवस्था के विकास की दिशा को प्रभावित करती है । संस्थाओं और मूल्यों के प्रकार्यात्मक स्वरूप् और निर्माण को भी अतीत के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्ष ही प्रभावित करते हैं ।
          एक विचारधारावादी मार्क्स का समर्थक मार्क्स को एक आकसिमक -अप्रत्याशित  आविष्कारक परिघटना के रूप् में देखता है । वह उन्हें सम्पूर्ण रूप से एक समग्र प्रारम्भ-बिन्दु के रूप में देखता है । जबकि हाब्सबाम उन्हें मानव-सभ्यता के स्वाभाविक ज्ञानात्मक विकास-क्रम में उपसिथत  युग-प्रवर्तक विचारक के रूप् में देखने का आग्रह करते हैं ।मार्क्स की विचारधारा में निहित उन आधुनिक अन्तदर्ृषिटयों को पहचानने का आग्रह करते हैं,उन सूत्रों को भी-जो एक विचारक और विचारधारा के रूप में मार्क्स के विवेक-संयोजन को संभव करते हैं ।
          कोर्इ असिमतावादी गैरमार्क्सवादी सोवियत रूस के पतन के बाद सहसा ही मार्क्स को पूरी तरह खारिज मान सकता है । कुछ वैसे ही जैसे तालिबानियों नें गौतमबुद्ध की प्रतिमा का ध्वंसकर उन्हें अनुपसिथत करना चाहा । इस दृष्टान्त के माध्यम से एरिक हाब्सबाम की  इतिहासकार की दृषिट को समझना तभी संभव हो सकता है ,जब हम यह कल्पना करें कि तालिबान के विस्फोटकों नें  बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा को जब ढहाया होगा तब उस विशालकाय प्रतिमा को बनाने वाली चटठानें वहीं मलबे एवं पत्थरों के रूप् में गिरी होंगी । विध्वंस के बाद भी एक विशालकाय मलबे का ढेर वहां होगा ही होगा । ऐसे ही मार्क्स की विचारधारा के निर्माता तत्व भी मार्क्स के पूर्व एवं उनके समकाल में उपसिथत तत्व रहे होगे ।  मार्क्सवाद को अप्रासंगिक एवं कालातीत घोषित कर देने के बाद भी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के उन महत्वपूर्ण तत्वों की उपसिथति को उसके प्रभावों में देखा जा सकता है । उन  शकितयों और प्रवृतितयाेंं की पहचान के रूप में भी जो पूर्ण विसर्जित नहीं की जा सकतीं ।
          इसी इतिहास-दृषिट के कारण वे अपनी पुस्तक 'आन हिस्æी  की भूमिका में स्वीकार करते हैं कि  मार्क्स के बिना मैं सामाजिक रूचि का विकास कदापि नहीं कर पाता । माक्र्स और सक्रिय क्रानितकारी युवा मार्क्सवादियों नें मुझे अनुसंन्धान का विषय और प्रेरणा दी,जिसके कारण मैं लिख सका ।मार्क्स की भौतिकवादी इतिहास-दृषिट इतिहास के अध्ययन की सवोर्ंत्तम दिशा-निर्देशक है । चौदहवीं शताब्दी के महान विद्वान इब्न खाल्दून नें इतिहास को विभिन्न कायोर्ं और पेशे वाले मनुष्यों की गतिविधियां माना है । हाब्सबाम यह स्वीकार करते हैं कि यह दृषिट ही आधुनिक पूंजीवाद और योरोपीय मध्य-युग के बाद उसकी परिचालक परिवर्तनों को समझनें की कुन्जी रही है । (पृ0 11) एरिक हाब्सबाम के लिए मार्क्सवाद आधुनिक विश्व कोसमझने ंके लिए अन्तदर्ृषिट के विकास का एक प्रातिभ बौद्धिक निवेश है ।
 दरअसल विश्वप्रसिद्ध बि्रटिश साहित्यकार टी.एस. इलियट की तरह एरिक हाब्सबाम भी एक सातत्यवादी विचारक हैं । उनके लिए भी अतीत कोर्इ निरसितयोग्य  अवधारणा नहीं बलिक प्रवाहित वर्तमान के रूप् में एक सतत बोध-आयात्मक उपसिथति है । अपनी पुस्तक 'आन हिस्æी की भूमिका में वे जिखते हैं -'' अतीत जिसका हम अध्ययन करते हैं ,पह हमारे मसि तष्क की (अवधारणात्मक ) निर्मित है । यह एक औचित्यपूर्ण सैद्धानितक वैधता के साथ निर्मित होता है ,भले ह ीवह तार्किक और साक्ष्यपूर्ण (प्रमाण सम्मत ) न हो और यह अतीत विश्वासों की भावात्मक व्यवस्था के रूप् में होता है ।( पृ0 8) इसतरह एरिक हाब्सबाम की यह दृषिट इतिहस को अतीत की घटनाओं से अलग एक स्वतंत्र मानसिक पाठ के रूप् में देखे जानें का आग्रह करती है । 'बाबरी मसिजद के विध्वंस पर उनकी प्रतिक्रिया को देखें तो  उनकी इसी इतिहास-दृषिट का विस्तार है ।  जिसके अनुसार वे सिर्फ घटनाओं को ही नहीं ,बलिक मानसिकता को भी एक निर्णायक परिघटना की तरह देखने का आग्रह करते हैं ।  मिथकीयकरण जब जनता के व्यवहार का हिस्सा बनता है तो वह भी इतिहास की जीवित परिघटना के रूप में विचारणीय बन जाता है ।  ( समकालीन सोच,पृ0 13,रोमिला थापर का 'ऐरिक हाब्सबाम की याद में शीर्षक आलेख,,अनुवादक ध्रुवकुमार सिंह )
            अपनी पुस्तक 'आन हिस्ट्री   के 'द सेंस आफ पास्ट शीर्षक अध्याय में हाब्स बाम अतीत को मानवीय बोध के स्थार्इ आयाम के  रूप में देखते हैं ।  जो उसकी संख्या,मूल्यों तथा सामाजिक व्यवहार की अन्य पद्धतियों को समझने के लिए अपरिहार्य सूचनात्मक आयाम की तरह है । एक इतिहासकार की मुख्य समस्या अतीत के इस बोध की प्रकृति को विश्लेषित करने तथा उसके परिवर्तनों और रुपान्तरणें को समझने की रहती है । ( वही,पृ0 13 )  हाब्सबाम के अनुसार बहुत-सी सशक्त रूढि़यां,रीतियां और परम्पराएं  , जो यधपि अतीत के मनुष्य के स्वीकार का परिणाम होती हैं ,वर्तमान के मनुष्य को भी प्रभावी ढंग से बांधे रहती हैं ।  इसतरह अतीत को समझे बिना पर्तमान मनुष्य को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता ; क्योंकि वर्तमान मनुष्य की सामाजिक आदतें अतीत के सामूहिक विषयों का ही परिणाम है । अतीत वर्तमान मनुष्य के लिए भी पुरानी बोतल में नयी शराब की तरह है । वे दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि  आधुनिकता की प्रक्रिया के विधार्थी  बीसवीं शताब्दी के भारत को समझने ंके लिए परम्परा की प्रबल ग्रनिथयों के साक्षात्कार से गुजरते हैं । चाहे वह गुजरना जानबूझकर अर्थात सचेतन रूप् में हो या अनायास की व्यावहारिक विवशता में  । यह प्रक्रिया भी उसे अतीत के पुनरान्वेषण की ओर ले जाती है ।( पृ0 15 )
  इस तरह हम देखें तो सामाजिक परिवर्तन की यह प्रक्रिया,चाहे वह परम्परा-सन्दर्भी ही क्यों न हो-अतीत वर्तमान को निरन्तर ही प्रभावित करता हुआ रूप् देता रहता है ।  आधुनिकतावादी सारे परिवर्तनों के बावजूद विश्वास की एक स्थार्इ व्यवस्था मनुष्य के वर्तमान व्यवहार को एक वृत्तीय या घुमावदार परिवर्तन के रूप में प्रदर्शित करती है । एरिक हाब्सबाम के अनुसार अतीत के इसी निर्णायक प्रभाव के कारण वर्तमान का मनुष्य एक साथ ही नया-पुराना या पुराना-नया के रूप में बना रहता है ।
       मार्क्सवाद की पूर्वपीठिका पर प्रकाश डालते हुए उसपर की गयी उनकी यह वैचारिक टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि   इसका इतिहास में मुख्य योगदान परिकल्पनाओं का परिचय है ,प्राकृतिक विज्ञान और  सामाजिक अनुसंधनों से प्रेरित दृतितयों और प्रतिदशोर्ं(माडलों) का इतिहास में अनुप्रयोग है । इस दृषिट से डार्विन के विचारों को एक निर्णायक ऐतिहासिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है ।  परिवर्तन का एक विकासवादी सिद्धान्त ,जो यधपि जीवविज्ञान के क्षेत्र का है ।  ऐतिहासिक परिवर्तनों को समझने की दृषिट से  मुख्य योगदान सामाजिक विज्ञानों पर आधारित ( विशेषत: अर्थशास्त्र के जर्मन ऐतिहासिक स्कूल ) विशेषत: कार्ल मार्क्स का सामाजिक परिवर्तनों में अर्थ के निर्णायक होनें के सिद्धान्त का है ।
        मार्क्स ऐसे प्रथम विचारक हैं जिन्होंने ऐतिहासिक विकास केे आर्थिक आधार और उसके महत्व को सर्वप्रथम रेखांकित किया  । अथवा यह कहें कि मानवता के इतिहास का सामाजिक आर्थिक सफलता की व्यवस्था के आधार पर इतिहास लिखा । उन्होंने इतिहास में वर्ग और वर्ग संघर्ष के वास्तविक आधारों का परिचय कराया  ।  इसी सन्दर्भ में एरिक हाब्सबाम अभद्र(वल्गर) मार्क्सवादियों में लोकप्रिय मार्क्स के उन सूकित वाक्यों को भी रेखांकित करते हैं,जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-  इतिहास के सामाजिक परिवर्तनों में अर्थशास्त्रीय तत्व आधारभूत प्रमुख कारक हैं ,जिनपर अन्य कारक आधारित हैं । आर्थिक आधार मानव-विकास की केन्द्रीय संरवना है । कि मार्क्सवाद इतिहास-दृषिट ऐतिहासिक घटनाओं के वैयकितक और अतार्किक घटनाशील स्वरूप को नकारता है । कि ऐतिहासिक अनुसंधान के क्षेत्र में पूंजीवादी विकास और औधोगिककरण में मार्क्स की रूचि ऐतिहासिक अध्ययन के क्षेत्र में मार्क्स का विशेष योगदान है  इत्यादि के रूप् में रेखाकित की जा सकती है ( आन हिस्ट्री .पृ0 192-193) इस तरह ऐतिहासक अध्ययन के क्षेत्र में मानवजाति के विकास को सामाजिक संघर्ष के रूव में व्याख्यायित करना मार्क्स का सबसे महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है ।  आधुनिक पूूंजीवाद और औधोगिककरण के  अर्थ-संरचनात्मक विश्लेषण और उसके तार्किक आधरों को निर्मित करने के लिए हाब्सबाम माक्र्स की सराहना करते हैं । उनकी दृषि ट में मार्क्स का ऐतिहासिक अवदान विभिन्न मानव-समुदायों के कार्यात्मक पार्थक्य और उनके विकासात्मक रूपान्तरण को समझनें और निश्चय के लिए एक यानित्रक दार्शनिक पद्धति का आविष्कार करना था ।( आन हिस्æी,पृ0 198 ) प्राचीन मानव-विकास में उसकी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की अभियानित्रकी और उसके अन्तर्विरोधें की भूमिका को मानव-प्रगति और परिवर्तन के सन्दर्भ में समझना था ।(वही ,पृ0 202 ) यधपि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि विश्लेषण माक्र्सीय द्वन्द्वात्मक माडल प्रयोग एवं व्यवहार में उतना आसान और सीधा-सपाट नहीं है ,जितना कि भद्र और अभद्र माक्र्सवादी उसे समझते हैं ,क्योंकि क्रानितकारी परिवर्तनों और समाज की सिथर कि्रयाशीलता को समझनें में उनकी मनमानी व्याख्या की जा सकती है । ( वही,पृ0 202 ) फिर भी मार्क्स का यह अवदान कम महत्वपूर्ण नहीं है । नयी पीढी के इतिहासकारों को विश्लेषण पद्धति,प्रेरणा और विवेक देने के कारण ऐरिक हाब्सबाम मार्क्सवाद को एक दार्शनिक स्कूल की शैक्षणिक भूमिका में पाते हैं । वही.पृ0 206 )
          इतिहासकारों पर माक्र्स का महत्वनूर्ण प्रभाव सिर्फ उनके वैचारिक निष्कषेर्ं के कारण ही नहीं है बलिक मानव विकास के अतीत की समस्याओं और प्रवृतितयों को समझनें के क्रम में प्रस्तुत किए गए सूक्ष्म निरीक्षणों का अभूतपूर्व और मानक माडल प्रस्तुत करने के कारण भी है । ( माक्र्स एन्ड हिस्æी शीर्षक आलेख,'आन हिस्æी पृ0 210)  माक्र्सवादी और गैरमाक्र्सवादी दोनों ही प्रकार के इतिहासकार इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करते समय किसी न किसी रूप में उस समझ को आत्मसात किए हुए हैं । भले ही प्रत्यक्ष या मूल रूप में माक्र्स की स्थापनाएं आज आलोचना का विषय बन गयी हों ।( वही,पृ0 211)
           मार्क्सवाद पर प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए ऐरिक हाब्सबाम ऐरिक वुल्फ को उदधृत करते हुए कहतेे हैं कि उत्पादन की वास्तविक प्रक्रिया पर विचार करते समय मार्क्स और एंगेल्स 'मानव और प्रकृति के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध,आजीविका,सामाजिक श्रम और संस्थाओं की प्रकृति का संशिलष्ट विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं । (वही,पृ0 212 ,यूरोप एण्ड द पीपुल विदाउट हिस्æी से उदधृत )  उत्पादन की प्रकृति और मनुष्य के आपसी रिश्तों में एक प्रक्रियात्मक शकित की भूमिका मार्क्स कर एक महत्वपूर्ण अवधारणा है ,जो आर्थिक आधार को समाज की सर्वोच्च संरचना के रूप् में व्याख्यायित करता है । ( वही ,पृ0 213 ) साम्यवाद की परिकल्पना मार्क्स द्वारा मानव-अतीत की की गयी अर्थ आधारित छानबीन और विश्लेषण का ही आमनित्रत या आगामी निष्कर्ष है । उसे ऐरिक हाब्सबाम एक विचारधारात्मक संगति में ही देखते हैं । मनुष्य के भौतिकवादी सामाजिक जीवन और उसकी मानसिक चेतना के  आधारभूत रिश्तों की खोज को ऐरिक हाब्सबाम मार्क्स द्वारा संस्कृति से निकाले गए निश्कर्ष के रूप् में देखते हैं । मार्क्स के इस सुझाव की प्रशंसा करते हैं कि ऐतिहासिक परिवर्तनों को उत्पादन की प्रकृति में बदलाव से ही समझा जा सकता है । ( पृ0214 ) मार्क्स क ी इतिहास-दृषिटको निष्कर्षत्मक रूप् में हाब्सबाम इस रूप् में वयाख्यायित करते हैं-मनुष्य अपने इतिहास को सिर्फ बनाता है लेकिन उको चुनता नहीं है । क्योंकि अतीत के आर्थिक आधार तथा परिसिथतियों वाला समाज उसे विरासत में वर्तमान के रूप् में प्राप्त होता है । उसकी दूसरी विरासत वर्ग और वर्ग-संघर्ष की होती है । पूंजीवादी इतिहास पर बहस के लिए मार्क्स के लिए दोनों अवधारणाएं अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है।
 इसतरह हम देखें तो आज के इतिहासकारों के लिए चाहे वे मार्क्सवादी हों या नहीं; मार्क्स एक अघोषित एवं सर्वव्यापी समझ में परिणति हो गए हैं । हाब्सबाम के अनुसार भावी इतिहासकारों के लिए उनका मार्क्सवादी होना या न होना एक अनावश्यक प्रश्न बन जाएगा । ऐसा इसलिए भी होगा कि ऐसी यूटोपया को जीना भविष्य के जटिल सामाजिक विकास को देखते हुए सीधे-सीधे संभव नहीं हो पाएगा ,भविष्य के (यानित्रक) समाज में वर्ग और वर्ग-संघर्ष की पहचान भी उतनी आसान नहीं होगी-बावजूद इसके यह भी सच ीै कि भविष्य के मनुष्यों के सामनें भी मार्क्स  का यह प्रश्न बना ही रहेगा कि हमें मिला हुआ वर्तमान विश्व कहां से आया है और मानवजाति एक बेहतर भविष्य को कैसे प्राप्त कर सकती है ?  

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

आंशिक साम्यवाद की परिकल्पना

ऐसा लगता है कि  भारतीय नेतृत्व वोट बैंक की राजनीति के कारण सिर्फ जनसंख्या -विस्फोट की प्रतीक्षा करता रहता है। मानव -संसाधन की दृष्टि से जनसंख्या का बेतहाशा उत्पादन है तो एक बड़ी जनसंख्या का असफल और अयोग्य होना स्वाभाविक ही है। बाजारवादी व्यवस्था में बिकने की दृष्टि से अयोग्य यानि कि मूल्यहीन जनसँख्या के पुनर्वास के लिए भी बड़ी परियोजनाएं चाहिए। इसके लिए किसी बड़े विरोध यानि क्रांति की प्रतीक्षा करना भी एक मूर्खता ही है।  इसलिए कि क्रान्ति के बाद भी व्यवस्था की सृजनशीलता और  की जरुरत पड़ेगी । व्यक्ति की  निर्बाध सृजनशीलता को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से तो पूंजीवादी व्यवस्था ही सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए कि वह व्यक्ति को असीमित पूंजी के सृजन का अवसर और अधिकार देती है। इस दृष्टि से वह व्यक्ति की प्रतिभा को सर्वश्रेष्ठ  पुरस्कार देने वाली व्यवस्था है। ऐसे में अयोग्य एवं असफल जनसँख्या के जीवनाधिकार के लिए आंशिक साम्यवाद की परिकल्पना करनी होगी। ऐसी जनसंख्या के लिए समानांतर रूप से सुरक्षित क्षेत्र एवं तंत्र की रचना करनी होगी।
                   मेरा सुझाव है कि गांवों में हर ग्राम-पंचायत में कुछ ऐसी भूमि होनी चाहिए जो सरकारी हो और जिसपर सामूहिक खेती किया जा सके। ग्राम-पंचायत के अधीन कुछ ऐसे उत्पादन और दुकाने होनी चाहिए जिस पर गांव के अयोग्य लोगों को रोजगार मिल सक. . . कुछ आश्रय -केंद्र और भण्डारे ऐसे होने चाहिए जहाँ ऐसी नालायक जनसंख्या निःशुल्क भोजन पा सके।  इस तरह हमें मिलीजुली व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए।
                        गांवों में बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास खेत हैं और वे खेती नहीं करते या फिर वे खेती की स्थिति में ही नहीं हैं। उनके पास इसलिए खेत हैं क्योंकि उनके पुरखों के पास थे। बहुत से लोग खेत बेचते भी रहते हैं। जैसे दूसरे लोग खेत खरीदते रहते हैं ,वैसे ही सरकारें भी तो खरीद सकती हैं। यह दूसरा दौर  इसलिए जरूरी है कि पिछली सरकारों नें भूमिहीनों को ग्राम सभा के चरागाह तक आबंटित कर दिए हैं। ऐसे में गांवों   में सामूहिक भूमि बची ही नहीं है। ऐसे में सरकारें कानून बनाकर भूमि अपहरण करने के स्थान पर भूमि- क्रय भी तो कर सकती हैं। ऐसा करना मानवीय सहायता और न्यूनतम सुरक्षा के लिए आवश्यक है। अन्यथा यह भी सच है कि  अधिक संरक्षण लोगों को नकारा भी बनाता है। सरकारी योजनाएं जिस तरह समय - असमय कार्यान्वित होती हैं ,वह कई बार समाज के आर्थिक पर्यावरण को बिगाड़  भी देता है। मनरेगा की योजनाएं कई बार उस बहुमूल्य समय में कार्यान्वित की गयी हैं जब किसानो को मजदूरों की विशेष जरुरत थी। ऐसी विषमता एवं विसंगति से बचा जाना चाहिए। क्योंकि गलत समय की गयी शासकीय सहायता शासन को ही खलनायक की भूमिका में ल देती हैं। ऐसी सहायताएं पूरक समय सारणी में संपन्न होनी चाहिए।

सोमवार, 10 मार्च 2014

विवेक की साधना

 हाँ मुझे करनी है विवेक की साधना
मुझे जीना सीखना होगा ईश्वर एवं पिता के बिना 
जैसा कि मुझे बताया गया था 
कि परमपिता ईश्वर सबकी इच्छाओं और सबके स्वार्थों का प्रतिनिधि है 
इस पतनशील सामूहिकता के समय में 
उसकी जिम्मेदार सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में 
मुझे उससे असहमति के लिए भी तैयार रहना होगा 
और एक लम्बे निर्वासन और उपेक्षा के लिए भी 

सम्भव है मनुष्य को अपना बंधुआ बनाये रखने वाली 
मनुष्यविरोधी सत्ताधारी शक्तियां मुझे पसंद न करें 
शक्त्तियां जो सामूहिक मूर्खता को 
सामूहिक समझदारी के रूप में विज्ञापित करती रहती हैं 
जिन्होंने एक बड़ी भीड़ को 
अपने बुने भ्रमजालों में फंसा लिया है 
और किसी अनुचित जातीय एकता की तरह अश्लील 
आश्वस्त और निर्लज्ज हो गयी हैं 

फिलहाल तो अब तक का भय,दुःख और मृत्यु कारक ईश्वर 
एक भगदड़ की तरह है 
जो रौंदते समय में नहीं सोच पाता कि 
कौन कुचला जा रहा है और क्यों ?

फिलहाल तो ईश्वर एक निर्णायक त्रासदी है 
जिसपर किसी भी टिप्पणी का कोई अर्थ नहीं है। 

विवेक की साधना

 हाँ मुझे करनी है विवेक की साधना
मुझे जीना सीखना होगा ईश्वर एवं पिता के बिना 
जैसा कि मुझे बताया गया था 
कि परमपिता ईश्वर सबकी इच्छाओं और सबके स्वार्थों का प्रतिनिधि है 
इस पतनशील सामूहिकता के समय में 
उसकी जिम्मेदार सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में 
मुझे उससे असहमति के लिए भी तैयार रहना होगा 
और एक लम्बे निर्वासन और उपेक्षा के लिए भी 

सम्भव है मनुष्य को अपना बंधुआ बनाये रखने वाली 
मनुष्यविरोधी सत्ताधारी शक्तियां मुझे पसंद न करें 
शक्त्तियां जो सामूहिक मूर्खता को 
सामूहिक समझदारी के रूप में विज्ञापित करती रहती हैं 
जिन्होंने एक बड़ी भीड़ को 
अपने बुने भ्रमजालों में फंसा लिया है 
और किसी अनुचित जातीय एकता की तरह अश्लील 
आश्वस्त और निर्लज्ज हो गयी हैं 

फिलहाल तो अब तक का भय,दुःख और मृत्यु कारक ईश्वर 
एक भगदड़ की तरह है 
जो रौंदते समय में नहीं सोच पाता कि 
कौन कुचला जा रहा है और क्यों ?

फिलहाल तो ईश्वर एक निर्णायक त्रासदी है 
जिसपर किसी भी टिप्पणी का कोई अर्थ नहीं है। 

रविवार, 2 मार्च 2014

नामवर होने के लिए

नए  आलोचक मित्र नें कहा -कविता लिखते हो !
सिर्फ कविता लिखने से ही काम नहीं चलेगा
कोई आलोचक भी होना चाहिए तुम्हारे पास

मैंने कहा-आलोचक  बनना  चाहते हो !
कोई वाणिज्यिक* है तुम्हारे पास !
फिर क्या ख़ाक बनोगे और बनाओगे लोगों को नामवर* !

*व्यवसायी, वणिक,  प्रकाशक,  बनिया
**नामी ,प्रसिद्ध।


गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

परिशंसा --महाशिवरात्रि की रात्रि में जागते हुए चिंतन

 मैं नहीं जानता कि वे स्वार्थ में हैं या प्रेम में
वे भय में हैं या विनम्रता में
उनका विनम्र एवं पवित्र समर्पण मुझे अभिभूत करता है
उनकी आस्था मुझे ईर्ष्यालु बनाती है
उनका विश्वास मुझे अविश्वास से भर देता है

हे प्रभु !क्या चमत्कार है कि
ये पीढ़ी दर पीढ़ी
सदियों से छले हुए लोग हैं
उनकी आस्था अटूट है
और उनकी जनसँख्या पर्याप्त
और वे सभी चुपचाप अपनी प्रजाति कि अमरता के लिए
समर्पित हैं
मैं जनता हूँ कि वे बार-बार मारे जाने के बावजूद
बचे रहेंगे
कि अस्तित्व की इतनी  पुनरावृत्ति है कि
इतनी  दुर्घटनाओं -आशंकाओं के बावजूद  वे  सुरक्षित हैं

हे प्रभु ! इतनी क्रूरता के बावजूद वे कितने आश्वस्त एवं आभारी हैं
उनकी अच्छाइया सारी बुराइयों पर
और सारी असुविधाओं के बावजूद
उनका जीवन उनकी मृत्यु पर  भारी है।


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

भारतीय धर्म एवं संस्कृति का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

भारतीय धर्म एवं संस्कृति की मुख्य दार्शनिक  विशेषता एक संपूर्ण आत्मीय तथा एकतापूर्ण पर्यावरण के निर्माण में थी ,यद्यपि व्यवहार में वह समाज के आवयविक सिद्धान्त की  समर्थक तथा  आनुवांशिक एवं जातीय राजतंत्र की पोषक होने के कारण सामुदायिक स्तर  पर घोर रूढ़िवादी रही  है। उसने सामाजिक स्तर पर श्रेष्ठता और हीनता के मनोवैज्ञानिक प्रतिमान गढ़े।   ऐसा प्रतीत होता है कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से वह एक बन्द कबीले के अन्तः सम्बन्धों की आतंरिक संरचना एवं प्रस्थिति का सामुदायिक विस्तार है। धीरे-धीरे एक कबीले का पुरोहित आस-पास के अन्य कबीलों का भी पुरोहित बनता गया और एक विशिष्ट जातिवादी समाज की रचना होती गयी। जैसी कि कहावत है कि ज्योतिष-विद्या  सिर्फ ज्योतिषी की ही आजीविका चला सकती है -भारतीय दर्शन और उसकी अवधारणाओं में पुरोहित-वर्ग तटस्थ भूमिका ,उदासीनता , निठल्लेपन एवं परजीविता की आत्मा समाई हुई है। उसके समर्पण का दर्शन दूसरों के वर्चस्व और अधीनता को बिना किसी विरोध या प्रतिरोध के स्वीकारने का सन्देश देता है। इसे मुख्य धारा की धार्मिकता यानि ब्राह्मण-जातीयता के पार्श्व -प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। यह जातीय मनःस्थिति ब्राह्मण को जातीय  श्रेष्ठता का दम्भ तो  देती है ,लेकिन आर्थिक रूप से दान-दक्षिणा के रूप में परजीविता का महिमा-मंडन भी करती है। संतोष-जीविता का यह महिमा-मंडन इस रूप में भारतीय संस्कृति के अनुयायियों में  सृजनात्मक असंतोष का निषेध करती है। उसका सन्तोषजीविता का सन्देश एक बड़ी जनसंख्या को भाग्य एवं प्रतीक्षा- जीवी बनाता है। सामाजिक भूमिकाओं का आवयविक विभाजन, हर व्यक्ति से उसके लिए निर्धारित जातीय चरित्र और भूमिका की मांग करने लगता है। इससे एक स्थिर किन्तु गतिहीन समाज की रचना होती है।
                इसके बावजूद भारतीय संस्कृति में जो सबसे आकर्षक बात जो मुझे दिखाई पड़ती है ,वह पवित्रता के बहाने काम-चिंतन का दमन या फिर उसका उदात्तीकरण है। काम भावना पर विजय को जीवन के पुरुषार्थ या चुनौती के रूप में लेने के कारण उसने साधु -संतों के रूप में काम -मुक्त व्यक्तिव का भी आदर्श प्रस्तुत किया था तो दूसरी ओर  कृष्ण की  श्रृंगार-गाथाएं ,आध्यात्मिकता के बहाने काम -भावना के विरेचन की मनोवैज्ञानिक व्यवस्था भी करती हैं। यदि अरस्तू का कैथार्सिस या विरेचन की अवधारणा सही है तो कृष्ण-कथा की इस सांस्कृतिक भूमिका को भी स्वीकार करना होगा। इसके विपरीत राम-कथा के समाज-वैज्ञानिक प्रभाव के अध्ययन से जो बातें सामने आती हैं ,उसमें आक्रमण के स्थान पर प्रत्याक्रमण एवं प्रतिरोध की क्षमता का महिमामण्डन प्रमुख है। यह सम्भवतः राम-कथा का ही प्रभाव है कि आज भी भारतीयों पर वैश्विक पर्यावरण बिगाड़ने का आरोप कम ही लगाया जा सकता है। किसी के विश्लेषण में मैंने पढ़ा था कि सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से राम का चरित्र अनारम्भी  है। राम का चरित्र संयम में रहने का सन्देश देता है। दूसरों के अस्तित्व का सम्मान करने एवं हिंसा की पहल न करने का सन्देश भी। राम-कथा किसान-जीवन के ताने -बाने के लिए या यह कहें कि जन-सामान्य के लिए सिर्फ एकल दांपत्य की प्रथा के आदर्श प्रतिमान की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है ,बल्कि वह कुटुम्बा-निर्माण की आधारभूत दार्शनिकी भी उपलब्ध कराती है। वह अर्थ और पूंजी के  पारिवारिक विभाजन को हतोत्साहित करती है :सामूहिक श्रम का प्रोत्साहित कराती है। इस तरह साझी खेती को बढ़ावा देती हुई मेड़ बंदी की कुप्रवृत्ति को भी कम करती है।
                       यद्यपि सामाजिक संवेदनशीलता  और दायित्वबोध के  चारित्रिक आदर्श का केंद्रीय एवं प्रारंभिक मिथकीय चरित्र  विष्णु से सम्बंधित है। परवर्ती महापुरुषों के लिए उनका पौराणिक चरित्र एक स्थायी मानक है। इन कथा-नायकों के चरित्र में ऐसे पर्याप्त तत्व हैं ,जो भारतीयों के लिए ब्राह्मण-जातीय
 परजीवी  धार्मिकता का संतुलनकारी  प्रतिपाठ प्रस्तुत करते हैं। इन सब के बावजूद यह ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि प्राचीन भारत में ज्ञान के प्रकाशक एवं संरक्षक के रूप में ब्राह्मण जाति की एक ऐतिहासिक  एवं महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज के समतावादी युग में प्रतिगामी दिखने एवं होने के बावजूद वह अपनी समय-सापेक्षता में कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। उसने एक मानक एवं परिष्कृत केंद्रीय भाषा विकसित की। प्राचीन भारत के बहुभाषी समाज में संस्कृत के विद्वानों नें ज्ञान के संरक्षक के साथ-साथ दुभाषिए की भी भूमिका निभाई। काश्मीर का संस्कृतज्ञ सुदूर दक्षिण के किसी भी राजा के दरबार में रहने वाले संस्कृतज्ञ से संवाद स्थापित कर सकता था। स्थानीय एवं भिन्न भाषाओँ कि बहुलता के बीच जातीय रूप से ही सही ब्राह्मणों की यह भूमिका असाधारण ही कही जाएगी। उनके पास ज्ञान और स्मृतियों के संरक्षण और विज्ञापन का आज की मीडिया की तरह ही ऐसा सशक्त  जातीय तंत्र था कि जिसको भी चाहा भगवान बना दिया।

परजीविता का महिमामंडन
jansatta.com
http://www.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=61988%3A2014-03-15-05-41-10&catid=21%3Asamaj

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

समय-चरित

समय-चरित 


चींजें नफ़रत से भरी हुई हैं
जो होना चाहिए था वह नहीं हो रहा है और
जो नहीं होना चाहिए था हो रहा है वह

जिस दिन फूल सबसे अधिक खिले थे
बह रही थी सबसे सुन्दर सबसे सुखकर हवा
उस दिन दूरदर्शन पर बज रहा था मातमी धुन
रो रहा था रेडियो तिन दिनों के राष्ट्रीय शोक की सूचना के साथ

चीजें चुपचाप हाथ से खिसक रही थीं
बाज़ार बोलना सीख रहा था अपनी अपनी भाषा
ए .टी .एम .सिर्फ हजार रूपए की नोट उगल रहे थे
दूकानदार छोटे नोटों के अभाव को देखते हुए
बढ़ा कर बोल रहे थे वस्तुओं के दाम

बढ़ती हुई असुरक्षा के साथ लोग
लौट रहे थे जातिवाद के सबसे  विश्वसनीय प्लेटफार्म पर
आवारागर्दी से पिछड़ते हुए युवा
बढ़ती हुई कुंठा और अवसाद के साथ
और आक्रामक ,हिंस्र व बलात्कारी होते जा रहे थे

विचारक अधिकांशतः बेरोजगार थे और कुछ नौकरी में
निरुद्देश्य कार्यकर्ता घूम रहे थे सडकों पर
मंच को हथियाने के बाद डकैत
अपने हथियारों से बारूदी राख साफ कर रहे थे

गेहूँ के दाम पहली बार आसमान छू रहे थे
खुश था किसान कि धरती के सोना ने
पहली बार बाजार में उचित सम्मान पाया है
वित्तमंत्री बिगड़ रहे थे अपने सचिव पर
कि कैसे हुई चूक और अब तक पहुँची क्यों नहीं
विदेश से मगाई गई गेहूं की खेप
और किन परिस्थितियो में पिछड़ गए सरकारी जलयान ...

सब कुछ इतना आकर्षक था कि स्वप्न हो जैसे
मुख्या-धारा का घटिया नायक मुस्करा रहा था
सामूहिक मोहभंग घटित करने के बाद
किताबों से बाहर  निकलकर
जंगलों में गीत गा रहे थे वैकल्पिक नायक बनने के सपने

चीजें जटिल होती जा रही थीं
और एक नासमझ पर्यावरण
अतिउत्साह में
सब-कुछ को मटियामेट कर देना चाहता था ...

समय का सच

बेशर्म श्रेष्ठता
हिंसक बल
बहुमत की मूर्खतापूर्ण दादागिरी
और आधिकारिक विचारहीनता
इस अनैतिक समय का
सबसे बड़ा जीवन -मान है। …

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

आस्था का संकट

मैं जब दरवाजा खोलता हूँ मुझे नहीं पता कि
दरवाजे के बाहर जो खड़ा है आगंतुक
उसका चरित्र कैसा है !
मैं जब दरवाजा खोलता हूँ
किसी सज्जन के आगमन की प्रत्याशा के साथ
बाहर स्वजन के स्थान पर खड़ा मिलता  है दुर्जन

मैं दरवाजा बंद रखने पर स्वयं को सुरक्षित समझता हूँ
मैं जब दरवाजा बंद रखता हूँ
होता है स्वजन का अपमान
मेरा स्वजन बाहर भटकता है लावारिस
मैं जब दरवाजा खोलता हूँ स्वजन के लिए
स्वजन को धक्का देकर मेरे घर में घुस आता है हत्यारा

इस तरह दरवाजा खोलना एक साथ ही
स्वागत और असुरक्षा है
मुझे नहीं पता कि मैं जब खोलूंगा द्वार
उससे कौन आएगा भीतर
ईश्वर या शैतान ?
कि विश्वास के उस भावुक दुर्बल क्षण  में
विश्वासघाती दुर्घटना
सारे जीवन को नकारात्मकता से भर देती है।

हे पिता ! हे पूर्वजों !
तुम्हारी दी हुई आस्था नें
असुरक्षित कर दिया है मुझे
मेरी एक ही आस्था
ईश्वर और शैतान दोनों को ही  मुक्त आमंत्रण देती  है /

कि मुझे यह नहीं पता है कि
मैं जब-जब भी खोलूंगा  द्वार
उससे कौन आएगा मेरे भीतर
ईश्वर य़ा शैतान ?
जबकि हर आस्था परनिर्भरता विकसित करती ही है। 

बुधवार, 29 जनवरी 2014

आप की भूमिका और भविष्य

कल" समकालीन सोच" से जुड़े मेरे एक मार्क्सवादी कवि मित्र जे ०के ० सिंह (पूरा नाम जितेन्द्र  कुमार सिंह जो समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं  ) अरविन्द केजरीवाल के वर्ग को लेकर परेशान थे। वे इसे एक सुधारवादी आंदोलन मानकर असली क्रांति को भटकाने  वाला यानि दूर करने वाला आंदोलन मान रहे थे। उनकी दृष्टि में यह इतिहास की एक साजिश है। वे इस बात के लिए भी दुखी थे कि इस साजिश के कारण अब क्रांति उनके जीवन-काल  में नहीं हो पाएगी। इस आंदोलन नें एक बार फिर वास्तविक क्रांति की आतंरिक ऊर्जा को जनमन से दूर कर दिया है। उन्होंने अपने सोचने पर मेरी व्यक्तिगत राय चाही।  मैंने उन्हें बताया कि यह आपके समझने यानि अण्डर-स्टैंडिंग की व्यक्तिगत समस्या है। मैं यह भी उन्हें कहने के लिए सोचता रहा कि आपमें एक विचारधारात्मक अक्षमता विकसित हो गयी है ,जिसके कारण मार्क्सवाद के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं पाते। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि आप इस समस्या को कुछ इस तरह से सोचें -कि आपने (विचारधारा  के रूप में ) मार्क्सवाद की एक नहर बनायीं थी और सोचा था कि इतिहास का पानी सिर्फ इसी नहर से निकले लेकिन इतिहास के जीवंत प्रवाह नें पहले ही बंधे को तोड़ दिया और नाले के रूप में बह निकला। अब यह नाला ही सही पानी तो इसी नाले से हीबह रहा है। इस बहाने को मानसिक रूप से स्वीकार करने में आपको वक्त लगेगा।
             फिलहाल उनकी चिंता यह थी कि वे केजरीवाल की विचारधारा को किस परंपरा से जोड़ें !स्वाभाविक है कि टोपी के आधार पर वे इसे गांधी की परंपरा और कांग्रेस से जोड़ते तो कुमार विश्वास के मोदी प्रेम के आधार पर भाजपा से।  उन्होंने अंतिम निष्कर्ष यह निकाला कि वास्तव में यह अभी तक तो गांधी की परम्परा वाली कांग्रेस से ही जुड़ती है ,आगे भविष्य ही जाने। इसमें बहुत से मोटा वेतन पाने वाले लोग भी शामिल हैं ,इस आधार पर इसे पूंजीवाद का हरावल दस्ता भी माना जा सकता है-एक अन्य मित्र नें सुझाया । मैंने चुटकी ली कि जनमहकवि घाघ नें जो सूत्र दिया है वह तो "निषिद्ध चाकरी भीख निदान" वाला है- इस आधार पर तो सारे नौकरशाह भिखारी ही माने जाने चाहिए और इसी आधार पर सर्वहारा भी । वैसे भी उनका जीवन स्तर इतना खर्चीला तो होता ही है कि नौकरी छूटते ही भीख मांगने लगें। दूसरे कितना भी अधिक वेतन पाने वाला हो ,नौकरशाह होता है हिस्सा मध्यवर्ग का ही।
              बहस में यह भी बात सामने आई कि इस आंदोलन में बहुत से घटिया लोग भी महिमामंडित हो गए हैं। अगर केजरीवाल जन भावना के निमित्त के रूप में अपनी ऐतिहासिक  भूमिका को  नहीं पहचान पाए तो अन्य पार्टियों के नेताओं की तरह कुछ निकटवर्ती अवसरवादियों से घिर जाएंगे और उनका भी वाही हश्र होगा जो आज कांग्रेस और भाजपा का है। आप एक  इतिहास की एक स्वाभाविक उपस्थिति तभी बन पाएगा जब केजरीवाल भी आप को बहते पानी की तरह योग्य बुद्धिजीवियों के लिए एक ईमानदार  तटस्थ मंच के रूप में विकसित कर पाएंगे। कांग्रेस की स्थापना ह्यूम नें कि थी लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका ह्यूम की प्रत्याशा से काफी दूर निकला गयी। नदियों कि तरह आंदोलन भी इतिहास की अपनी जरुरत के अनुसार आतंरिक वेग से संचालित होते हैं। बहुत से लोग (अण्णा हजारे की तरह ) अपनी भूमिका निभाकर अप्रासंगिक होकर पीछे छूट सकते हैं ,लेकिन आप को एक वैकल्पिक मंच के रूप में योग्य राजनीतिज्ञों की तलाश जारी रखनी चाहिए। हो सकता है कि आप की कोई पिछली शानदार परंपरा नहीं हो। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जीवित इतिहास में उपस्थित वर्तमान का एक हिस्सा है  वह अतीत के अनुभवों से कम संचालित होकर भी यदि वर्त्तमान के अनुभवों और आवश्यकताओं से संचालित होता है तो -यह भी एक ऐतिहासिक भूमिका बनती है।


शनिवार, 25 जनवरी 2014

श्रद्धा का समाजशास्त्र !

तुमको जीना यथास्थिति को जीना  है
तुम्हारी भक्ति स्वीकृति है
दूसरों  की सत्ता की  अधीनता की
तुमको जीना
सहमति है पूर्ण यथास्थिति से
और पूरी तरह कर देना है स्थगित स्वयं को
दूसरों की इच्छा के सम्मान के पक्ष में
समर्पित होकरव्यक्तित्वहीन हो जाना है पूरी तरह.…

हे प्रभु (वर्ग)!
मैं असहमत हूँ
असंतुष्ट हूँ तुम्हारी बनायीं दुनिया से
इसलिए तुम मेरी अश्रद्धा के लिए
मुझे नरक (जेल ) देने की  मत सोचो।

आखिर मुझे भी तो अपनी दुनिया
रचने का अधिकार मिलना ही चाहिए
विकल्प रचने का अधिकार
अपने हिस्से की सृजनशीलता से



रविवार, 19 जनवरी 2014

मध्यवर्ग की भूमिका

सर्वहारा आधारित क्रान्ति की अवधारणा के कारण वामपन्थी क्रान्ति की दृष्टि से मध्यवर्ग की उपयोगिता एवं भूमिका नगण्य ही है .ज्ञानार्जन और बुद्धि -व्यवसाय में सबसे अधिक समय और जीवन का निवेश मध्य-वर्ग ही करता है .बौद्धिक विकास में लगे रहने के कारण वह बहुत ही कम अन्तराल के बाध्यकारी नेतृत्व का शिकार होता है .दूसरे शब्दों में कहें तो वह बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण नहीं बल्कि आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक कारणों से इतिहास में बाध्यकारी नेतृत्व को     स्वीकार करता है .सर्वाधिक प्रतिरोध और सजगता के कारण उसकी भूमिका को लेकर सबसे अधिक भर्तस्ना-पत्र लिखे गए हैं .उसके आत्म-विश्वास को तोड़ने एवं उसे विचलित करनें की कोशिशें हुई हैं .इसमें संदेह नहीं कि औसत,सन्दिग्ध एवं अस्पष्ट समझ की वह अनदेखी करता है .

                वस्तुतः मध्यवर्ग की अवधारणा का विकास पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों के विचारकों द्वारा प्रतिक्रांति एवं क्रांतिविरोध और अवरोध को समझने के लिए किया गया था। मध्यवर्ग के वर्ग-चरित्र और  रुझानों'प्रवृत्तियों और उसके मनोविज्ञान को  समझने की दिशा में मार्क्सवादी खेमा भी रूढ़ मुहावरों 'सरलीकरण और और विचारधारात्मक संभाव्यतावाद से आगे नहीं जा पाया है। स्वयं मार्क्सवादी विचारधारा सर्वहारा और पूंजीपति वर्ग ,उच्च और निम्न वर्ग के बारे में ही विस्तार से सोचती है। उसके थीसिस और एजेंडे में मध्यवर्ग की अधिक भूमिका नहीं थी। क्योंकि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रया में आनी थी  ंअध्यवर्ग मार्क्स के लिए भी क्रांतिकारी असंतोष की दृष्टि से शून्य और अनुपयोगी था।  वह बहुत कुछ दर्शक और तटस्थ जनसँख्या का हिस्सा था ,जो संगठित क्रांतिकारी शक्तियों का न  समर्थन करा सकता था और न विरोध !
             मध्यवर्ग को प्रायः उपभोक्ता वर्ग या समुदाय में देखने का नजरिया नजरिया भी ठीक नहीं है। क्योंकि वह बौद्धिक विकास और सृजनशीलता के प्रति समर्पित केंद्रीय जनसमूह है। चेतन एवं प्रशिक्षित होने के कारण उसमें सजग प्रतिरोध की क्षमता है। नेतृत्वकारी शक्तियों द्वारा उनका सहज अनुकूलन या अनुयायीकरण सम्भव नहीं है। इसी प्रतिरोध के कारन ही  नेतृत्व के अभिलाषी महत्वाकांक्षी  बुद्धिजीवियों के सहज अनुगामी नहीं बना सकते। 
            मध्यवर्ग की अब तक की भूमिका को देखते हुए जनवादी क्रांति के बाद भी नयी क्रांतिकारी व्यवस्था के संरक्षण में मध्यवर्ग की भूमिका के महत्वपूर्ण होने की सम्भावना देखी जा सकती है। उसका सृजनात्मक
एवं अग्रगामी असंतोष व्यवस्था के परिष्करण -परिवर्धन और गतिशीलता को बनाए रखा सकता है। 
              मार्क्सवादी विचारधारा की दृष्टि से समझने का प्रयास करें तो सामंतवाद कृषि-सभ्यता का पूंजीवादी व्यवस्था-प्रारूप है तो सामंतवाद कृषक-व्यवस्था का राजनीतिकृत तंत्र-प्रारूप है। कृषक व्यवस्था का पूंजीवाद  अनुवांशिकता के आधार पर भूमि-स्वामित्व की।  असमानता के आधार पर भूमिहीन के रूप में एक भिन्न प्रारूप वाले शोषित -सर्वहारा जन को जन्मा देता है। लेकिन दूसरी और  नैतिक मूल्य -व्यवस्था कृषक सभ्यता से उपजे  मानवीय सम्बन्धों की ही दें है। यही वह प्राथमिक अर्थतंत्र है,जिसके अभावों एवं अपर्याप्तताओं नें उस विनिमय-तंत्र का विकास किया है ,जिसे आज हैम बाजार-व्यवस्था के रूप में जानते हैं। यदि अवधारणा की शब्दावली के रूप में देखें तो पूंजी की गतिशीलता के आधार पर कृषि-सभ्यता को अचल या स्थिर-प्रकृति का पूंजीवाद और विनिमय आधारित पूंजीवाद को गतिशील या प्रवाही पूंजीवाद कहा  है। ऐसे में मार्क्सवाद का औद्योगिक पूंजीवाद ;जिसे मार्क्सवादी विचारधारा की दृष्टि से उत्पादक पूंजीवाद कहा जा सकता है।  मार्क्स नें अपनी क्रांति की अवधारणा में सामंती और औद्योगिक दोनों ही प्रकार के पूंजीवाद को शामिल किया है।  विनिमय आधारित प्रवाही पूंजीवाद के प्रति क्रांति सम्बन्धी अवधारणा देने की जरुरत उन्हें इसलिए नही पड़ी
कि तब तक वह सगठित और दैत्याकार रूप में विकसित नहीं  हुआ था।
               
        इस तरह  मध्यवर्ग के लिए पूंजीवादी व्यवस्था से निष्क्रमण और विद्रोह का कोई ठोस मनोवैज्ञानिक आर्थिक आधार नहीं बनता .इसलिए भी कि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रिया में आनी थी .लेनिन ने अवश्य ही सर्वहारा  सर्वहारा वर्ग के पक्ष में उसके नैतिक समर्थन और वर्गांतरण की परिकल्पना दी .
                    समाजशास्त्रीय और आर्थिक विकास की दृष्टि से देखें तो मध्यवर्ग एक यात्रा-शील स्थिति है .पूंजीवादी व्यवस्था में वैयक्तिक आर्थिक मुक्ति निम्न-वर्ग से निकलकर उच्च -वर्ग में शामिल हो जाने से ही सम्भव है .पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक निम्न वर्ग में जन्मे व्यक्ति के लिए निम्न वर्ग से बाहर निकल कर उच्च वर्ग में शामिल हो जाना ही चरम पुरुषार्थ है .उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा के साथ मध्य वर्ग का हर व्यक्ति वयक्तिक आर्थिक मुक्ति के एक सपने को जी रहा होता है .यह सपना पूंजीवादी व्यवस्था की सुरक्षा सम्बन्धी संरचनात्मक आश्वासनहीनता से पैदा होता है .पूंजीवादी व्यवस्था हर व्यक्ति को आर्थिक असुरक्षा की परिस्थितियों में डाल देती है .इस मनोविज्ञान के कारण एक अन्तहीनहोड़ का जन्म होता है .अस्तित्व की एक निर्मम प्रतिस्पर्धा पूंजीवाद को अमानवीय बनाती है .इसके विकल्प  में साम्यवाद
पूंजी के सामूहिक और साझे निर्माण और उपभोग की परिकल्पना देता है .देखा जय तो सामूहिक सृजनशीलता के आवाहन के कारण साम्यवाद को सामूहिक पूंजीवाद और पूंजीवाद को वैयक्तिक पूंजीवाद कहा जाना चाहिए .इस प्रकार साम्यवाद पूंजीवादी व्यवस्था का स्वर्ग है तो वैयक्तिक पूंजीवाद नरक .फिर प्रश्न उठता है कि भारतीय मध्यवर्ग अपने अधिकांश में साम्यवादी हिंसक क्रान्ति को अराजकता पूर्ण भयावह दुष्कल्पना के रूप में क्यों देखता है ? इसका कारण यही है  कि मार्क्स द्वारा प्रतिपादित साम्यवादी क्रान्ति की परिकल्पना में यहूदी धर्म की सांस्कृतिक असहिष्णुता और उनकी धार्मिक कथाओं में मिलने वाली बर्बर शुद्धता और उच्छेदवादी नरसंहारों का सांस्कृतिक अचेतन छिपा हुआ है .ऐसे में क्रांतिकारी बनना नायकत्व की मध्ययुगीन मानसिकता और परिकल्पना की भी विरासत है .अन्यथा जब सामूहिक पूंजीवादी सृजनशीलता तक ही जन-मानस को ले जाने की बात है तो ऐसे साम्यवाद को अहिंसक साम्यवाद के रूप में भी सामूहिक आर्थिक ,सामाजिक,राजनीतिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा के रूप में प्रचारित किया जा सकता है .इसके लिए सामूहिक पूंजी की सृजनशीलता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था-संरचनाएं और मानसिकता विकसित करनी होंगी .अपने हिंसक सांस्कृतिक अचेतन के कारण अठारहवी शताब्दी का परंपरागत मार्क्सवाद एक प्रतिक्रियाजीवी तनावपूर्ण असभ्य मानवीय समाज की रचना ही करेगा .  इस लिए मार्क्स के प्रति उचित श्रद्धांजलि तो यही होगी की साम्यवाद के भावी प्रारूप की खोज नए सिरे से सामूहिक पूंजीवाद की परिकल्पना के रूप में आधिक सभ्य ,शिष्ट ,स्वाभाविक और अहिंसक तरीके से किया जाय .संस्थागत या राजनीतिक क्रान्ति का एक पूंजीवादी तरीका यह भी हो सकता है कि सरकार हत्या करने की जगह मुद्रा या मुवावजा देकर सारी जमीने स्वयं खरीद ले .इसके बाद वह जन-जीवन के पुनर्नियोजन के लिए स्वतन्त्र हो जाएगी .मानव जाति के सुरक्षित अस्तित्व के लिए यह कार्य जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है .ऐसा न होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हो रहा है कि भवन व्यक्ति की आवश्यकता और संख्या के अनुसार,जरुरत के हिसाब से नहीं बनाए जा रहे हैं ,बल्कि पूंजी-प्रदर्शन और प्रतिष्ठा के अनुसार बनाए जा रहे है .इस कारण से बढ़ती जनसँख्या के विपरीत कृषि-योग्य भूमि निरन्तर ही कम होती जा रही है .अनियन्त्रित-अनियोजित स्थापत्य में शहरों का विकास आधुनिक युग की सबसे गम्भीर समस्या है ,जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है .
         अपनी इस दृष्टि के कारण समकालीन प्रगतिशील विचारक मुझे शैक्षणिक या ज्ञानात्मक अतीतीकरण के शिकार लगते हैं .यह एक परिकल्पनात्मक पिछड़ापन है ,जिसकी ओर स्वयं को प्रगतिशील होने का श्रेष्ठताबोध जीने वाले बुद्धिजीवियों का ध्यान ही नहीं जाता .उन्हें क्रन्तिकारी नायकत्व के मध्य-युगीन माडलों और उसकी महत्वकांक्षी स्वप्न्दर्शिता से बाहर निकालने में अभी वक्त लगेगा.


           विचारधाराओं को लेकर  अन्य महत्वपूर्ण समस्या यह है कि विचारधाराओं के प्रति स्मृति-संरक्षणवादी नजरिए के कारण अकादमिक एवं शैक्षणिक चिंतन प्रायः शुद्धतावादी ही होता है .प्रत्ययों से अति-परिचय के कारण कई बार शब्दावली या अभिव्यक्ति के स्तरपर वह मानवीय अप्रासंगिकता एवं निरर्थकता को पहचान नहीं पाता.उनका पुनरावर्ती प्रयोग करता रहता है .अवधारणात्मक संकल्पनाओं को कि बार सच न होते हुए भी सच के रूप में प्रस्तुत करता रहता है .इसे हम पिछली समझ के आधार-पृष्ठभूमि या पर्यावरण के रूप में भी देख सकते हैं .
     नए विचारों से अधिक महत्वपूर्ण सार्थक और निरापद विचारों का चयन एवं सृजनात्मक संयोजन कर एक परिस्कृत और अधिक गतिशील संभावनाओं वाली व्यवस्था कि खोज करना है .विचारधाराओं कि पूर्वाग्रह रहित पड़ताल जरुरी है .अलग-अलग सफल वैचारिक प्रारूपों एवं अनुभवों को व्यवस्था की आधारभूत संरचनाओं के निर्माण और विकास में इश्तेमाल करना होगा .दरअसल मानव समाज की जरूरतों के अनुसार वैचारिकी विकसित करने कि जरुरत है ,न कि वैचारिकी की पड़ताल एवं जरुरत के अनुसार मानव-समाज को अनुचित-अस्वाभाविक-अवैज्ञानिक रूप में दुष्प्रभावित करने की.उदहारण के लिए सब जानते हैं कि द्वंद्ववाद को मार्क्स नें हिगेल से लिया था और उसे साम्यवाद कि परिकल्पना के अनुसार पुनार्काल्पित किया .इस संसर्ग से सभ्यता कि वर्तमान सृजनशीलता
         एक व्यापक मानव-जाति के आर्थिक व्यव्हार को समझने और समझाने की दृष्टि से मार्क्स का विश्लेषण आधुनिक वैचारिकी को आधारिक सूत्र और दृष्टिया उपलब्ध करता है .क्योंकि संवेदनात्मक द्रष्टि से मार्क्सवाद के उद्देश्य की नैतिक पवित्रता असंदिग्ध है ;इस लिए उसके दार्शनिक पक्षों को भी निर्विवाद और अपरिवर्तनीय मन लिया जाता है .उसमे कुछ भी निरर्थक और अनावश्यक खोजना वर्ग-शत्रु का हमला भी हो सकता है .क्योंकि भारत में वह पश्चिम की पवित्र धरोहर है ,इसलिए भारतियों को यह अधिक स्वीकार्य होगा कि स्वयं पश्चिम ही उसमे परिवर्तन संशोधन करे .वैसे भी भारतीय मेधा संरक्षण वादी है .वह नई पहल में कम ही विश्वास करती है . मार्क्सवाद की दार्शनिकी में भी बहुत से परम्परा से अर्जित तत्व हैं -उनमें से एक हीगल से लिया गया द्वंद्ववाद भी है .यह विकास की सामाजिक प्रक्रियाओं का विचलित प्रत्ययीकरण करता है .रुढ़िवादी और विकासवादी शक्तियों के द्वंद्व को मानवीय और समाजशास्त्रीय रूप में भी समझने और समझाने की जरुरत है .वर्ग -स्वार्थ के मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण मार्क्स का मानव-जाति के इतिहास में आर्थिक प्रवृत्तियों और व्यव्हार का सूत्रीकरण प्रायः ठीक और प्रामाणिक है .लेकिन मेरा मानना है कि मनुष्य की ज्ञानात्मक प्रगतिशीलता से अधिक उसकी विकास विरोधी जड़ताओं और आदिमताओं को भी समझाने की जरुरत है .ऐसे में तो और भी जब जीनेटिक आधार वाली जड़ताएँ होने की वैज्ञानिक संभावनाएं बढ़ गई हैं .इसके बावजूद मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण सन्देश मानवीय व्यवस्था को यथास्थितिवादी स्वीकार की सामूहिक मानसिकता से बाहर निकालकर उसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की सृजनशीलता के दायरे में लाना है .प्राचीन धार्मिकों की तरह हमें ईश्वर और स्वर्ग का सृजन करने के स्थान पर वर्तमान मानवीय व्यवस्था को और मानवीय और निर्दोष बनाने पर विचार करना चाहिए .और इसके लिए मार्क्सवाद से भी अधिक महत्वपूर्ण है मार्क्स के बाद के मानवीय विकास की जटिलताओं को समझना .वर्तमान विश्व राजनीतिक नेतृत्व से आर्थिक नेतृत्व की ओर स्थानांतरित हो गया है .राजनीतिक संस्थाओं की तुलना में आर्थिक संस्थाएं मानव -सभ्यता की संरचनाओं को अधिक तीव्रता से प्रभावित कर रही हैं .विश्व प्रायः आर्थिक सक्रियताओं द्वारा अधिक रूपान्तरित हो रहा है .दूसरे शब्दों में विश्व राष्ट्रों से अधिक कंपनियों के उत्पादों से अधिक रूपान्तरित हो रहा है .क्योंकि यांत्रिक उत्पाद श्रम की प्रकृति को ही बदल दे रहे है 'इसलिए वर्ग-संरचना और उसकी मात्रात्मक उपस्थिति का स्वरूप भी बदला है .आज स्थानीय आर्थिक शोषण से अधिक प्रभावी अन्तर-राष्ट्रीय शोषण हो गया है .विषमता व्यक्ति और वर्ग स्तरीय ही नहीं बल्कि राष्ट्र स्तरीय और कंपनी स्तरीय भी है .बहुराष्ट्रीय होने के साथ-साथ कंपनियों का संगठनात्मक और जनसंख्यात्मक ढांचा विस्तृत हुआ और बढ़ा है .इस विषमता को भी मार्क्सवादी चिंतन के दायरे में लाना होगा .क्योंकि मार्क्सवाद साम्यवाद का पर्याय बन चूका है.

शनिवार, 18 जनवरी 2014

सभ्यता और शैतान

मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि
मैं  शैतान  होने पर पूरा विश्वास करता हूँ
मैं मानता हूँ कि ईश्वर भले ही मानवजाति   की
एक आदर्शवादी कल्पना हो
लेकिन शैतान तो वास्तव में है !

मैं चाहता हूँ कि जब सामने आकर कोई  बस रुके
निर्भया यह बिलकुल न सोचे कि
उसे   लेकर मेरे लिए लाया लाया है कोई देवदूत
वह यह भी सोचे कि
उसे मृत्यु और दुष्कर्म के देवता
शैतान नें भेजा होगा। ।
कि जनता अपने नेताओं  में छिपे
शैतानी मन्सूबों को  भी पढ़ना सीखे
द्वार खोलने से पहले सोच ले उसकी आहट

शैतान जो चिरंतन शत्रु है मानवजाति का
उसकी चूकों और चुनौतियों के पीछे है
उसके हिंसक काले बर्बर अतीत में है
उसकी सभ्यता और संस्कृति का
सर्वकालिक अचेतन है।

इसतरह मुझे शैतान के होने पर
उतना ही विश्वास है
जितना कि इस बात पर कि
ईश्वर का होना
मानव जाति  की आदर्शवादी कल्पना है
बात सिर्फ इतनी ही है कि मनुष्य चाहता है कि
वास्तव में   ईश्वर हो !

मैं नास्तिक नहीं हूँ
क्योंकि वैसे भी यह समय
पूंजीवादी व्यवस्था में  अराजक असुरक्षा का है
जहा सभी को उसकी अपनी समझ और सामर्थ्य पर
लड़ने ,जीतने और जीने के लिए छोड़ दिया गया है
इसतरह यह समय कहीं से भी मानवतावादी नहीं
सिर्फ सिरफिरे शैतान का है

जब तक चूक  और चुनौतियां है
म्रत्यु और जीवन की निरीहाताएं  हैं
शैतान बना रहेगा सिद्धान्त रूप में
जबतक मनुष्य का अप्रत्याशित आदमखोर व्यवहार है
उसके भीतर अपराधी प्रवृत्तयों के करक अनसुलझे जीन  हैं
शैतान की सैद्धांतिक सत्ता बनी रहेगी। …


बुधवार, 15 जनवरी 2014

द्वंद्व-युद्ध

जहाँ तक सम्भव हुआ है
मैंने उस बुराइयों की आत्मा का भी सम्मान किया है
इस  विश्वास के साथ कि
एक दिन वह अपनी ही घृणा और अहंकार के बोझ से थक जाएगा
समझ जाएगा एक दिन
युद्ध और जीतने की इच्छा की निरर्थकता
जिसमें  मेरी कभी भी दिलचस्पी नही रही है। .......

मैं तो बिना लड़े ही
उसे विजयी घोषित कर देने की योजना पर अमल करता रहा हूँ
इसलिए कि लड़ना कभी भी
मेरे जीवन की प्राथमिकता में नहीं था
वह सिर्फ इतनी सी बात से मुझसे चिढ़ता रहा है कि
उसकी इच्छा और योजना के अनुरूप
उसकी चुनौतियों और पुकार को अनसुना करते हुए
मैं उससे लड़ने उसकी ही शर्तों पर बहर क्यों नहीं  आया। ....

यह उसकी नाराजगी हो सकती है कि
मैं उसके खेल में शामिल क्यों नहीं हुआ !
कि मेरे हटाने के बाद उसे जीतने के लिए कुछ विशेष नहीं था
वह सिर्फ इतना नहीं जानता कि
सभी को अपने से बाहर देखने की आदत में निहित है
उसके शैतान होने का रहस्य
उसे नहीं मालूम है तो सिर्फ आत्मीयता की परिभाषा !

वह परायेपन की मुद्रा के साथ जीतना चाहता है
सारी दुनिया के साथ मुझे भी
जबकि मैं आत्मीयता से
उसे पता ही नहीं है शयद बाजारू होना
सारी चालाकियों के बावजूद सिर्फ धूर्त और आवारा होना है
और होना है घर से बेघर। ……

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

स्व-रुप

यह दुनिया जो एक मकड़ी के जाले की तरह है
और मैं भी हूँ उस जाले का एक तार
दूसरों से जुड़ा हुआ
जोड़ता हुआ दूसरों से
दूसरों से बंधा हुआ
बांधता  हुआ दूसरों को
मेरा हिलना हिलाता है दूसरों को
मेरा टूटना तोड़ देता है -
संवेदना के कोमल तार
इसी जले पर दौड़ती है समय की मकड़ी

मैं एक अदृश्य बुनावट का हिस्सा हूँ समाज की
मेरा होना सिर्फ अकेले का
अपनें असम्बद्ध एकांत में होना नहीं है
शायद इसीलिए जब मैं दूसरों को तोड़ता हूँ
स्वयं टूट जाता हूँ
जब मैं छोड़ता हूँ दूसरों को
स्वयं  छूट जाता हूँ
मेरी यात्रा एक सामूहिक यात्रा है सम्पूर्ण मानव -जाति की

शायद इसीलिए
मेरे सौभाग्य का  ईश्वर
मेरे मित्रों और मेरे चाहने वालों की
शुभकामनाओं से बना हुआ है
दूसरों को मुझसे मिलाने वाली ख़ुशी में रचा-बसा है
मेरी आत्मा का सच्चिदानन्द !

और मेरे दुर्भाग्य का शैतान भी
मुझे नापसन्द करने वालों की घृणा में छिपा हुआ है
उनकी अरुचि से बना हुआ है
मेरे निर्णयों के प्रति असहमतियों से बना है
मेरे अस्तित्व और सार्थकता का प्रतिपक्ष  …

मेरा अच्छा या बुरा होना
सिर्फ मेरे भीतर का ही
मेरे भीतर तक ही होना नहीं है।