रविवार, 5 मई 2013

संस्कृति-चिन्तन


मेरा आशय सिर्फ इतना था कि पहले का महत्वपूर्ण चिन्तन भी धार्मिक मान्यताओं में छिपा पड़ा है जिसे पहचानने की जरुरत है .सीधे-सीधे पक्ष या विपक्ष में मान्यताएं या पूर्वाग्रह विकसित करना उचित नहीं है .इसमें मार्क्स का द्वंद्वात्मक और वस्तुवादी दृष्टिकोण ही उचित है .शूद्रों के पूर्वजों जसे शिव के पौराणिक चरित्र को ही लें तो उसे पुरोहित वर्ग नें अधिग्रहीत कर लिया .इसी तरह बुद्ध को भी अवतार घोषित कर उनके वंशजों को वर्ण-क्रम में वहां पहुंचा दिया किआज उनके ही वंशज स्वयं को पहचान नहीं पाएँगे किउनके ही पूर्वजों को भगवन घोषित कर वर्ण-व्यवस्था में ऊँची कही जाने वाली जातियां भी पुंजती हैं .ब्राह्मणवाद का हौवा खड़ा कर क्या-क्या छोड़ते जाएँगे !अपनी संस्कृति और सभ्यता में भी जो कुछ भी अच्छा है उसे भी पहचानना और चुनना होगा .इसके लिए पूर्वाग्रह रहित ईमानदार विमर्श की जरुरत है .रिक्शे पर बैठे व्यक्ति में रिक्शा खींचरहे व्यक्ति की तुलना में श्रेष्ठता-बोध तो होगा ही .ईश्वर के नाम पर ही सही जिन लोगों ने सुखी होने का तंत्र विकसित कर लिया था ,उन्हें थकने वाला श्रम करते हुए जीवन-यापन यदि दंडात्मक प्रतीत हो रहा था तो इसमें आश्चर्य क्या ! सिर्फ महिमा-मंडान से ब्रेनवाश कर भिक्षा मांगने जैसे अपमानजनक कार्य को आध्यात्मिक बना दिया गया था . स्वाभिमान की दृष्टि से तो शूद्र और वैश्य के घर में जन्म लेना बेहतर है .विषमता तो आज भी है और सामाजिक आर्थिक वर्ग भी हैं ,सिर्फ उनका जातीय -जन्मना आधार हट गया है .ईश्वर केन्द्रित किसान सभ्यता का अपना श्रेष्ठता बोध था .निषिध चाकरी भीख -निदान कह कर किसानी को महिमा-मंडित कर दान-पुण्य से घेर कर बाजार-व्यवस्था से बाहर कर दिया गया था .उस पक्ष पर भी ध्यान दीजिए .




नयी पीढ़ी के मार्क्सवादियों को और सतर्क और समझदार होना होगा .मैंने एक जगह लिखा था किभारतीय चिन्तन के इस लिए अयोग्यहोते हैं किउनके लिए सही होना अपनी जाति के अनुरूप सोचना है .यहाँ सही-गलत इस तरह तय होता है किया तो आप बिरादरी के साथ हो सकते हैं या बिरादरी के बाहर.यह जातीय शुद्धतावाद जैसी मानसिकता है .अब मार्क्सवादी होना विवेक का नहीं अस्मिता का प्रश्न हो गया है .अगर ऐसे ही चलता रहा तो इस्लाम के बाद बंद बुद्धिजीवियों का दूसरा बड़ा सम्प्रदायबन जाएगा .लेकिन हमें स्वाभिमानी साहित्यकारों का सम्मान करना सिखाना चाहिए .हो सकता है कि अज्ञेय स्वाभिमानी रहे हों और महत्वकांक्षी भी या अधिक दूरदर्शी रहे हों कि दस-पांच वर्षों के वैचारिक दबदबे को स्वीकार नहीं कर पाएं हों .गलत तो सुकरात को भी समझा गया था .अज्ञेय सुकरात नहीं थे .लेकिन उनमे असहमत और उपेक्षित होने का सहस था .मैं ऐसे बहुत से मूर्खों और अति-चालाक अवसरवादियों को जानता हूँ जो बाजार-भाव देखकर और कामरेड कहने -कहलाने का गौरव-बोध जीने के लिए स्वयं को मार्क्सवादी घोषित किए फिरते रहे -बहुतेरे सामाजिक भाव्यीकरण के कारण -उनके लिए सब कुछ तय हो गया है जबकि मैं जितना ही मार्क्सवाद की अवधारानाओं को लेकर सोचता हूँ उतनी ही विचारधारात्मक समस्याए मुझे चिंतित कर रही हैं .

अंध-विश्वास : कारण और निवारण

मेरे फेसबुक मित्र श्री अनिल सिंह के अन्धविश्वास पर लिखे इन विचारों को पढ़े .अन्धविश्वास भी परिवेश से मिले सामाजिक ज्ञान का एक हिस्सा है .सामाजिक और सांस्कृतिक प्रशिक्षण-तंत्र इसे भी अन्य ज्ञानों की तरह ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहता है .इस तरह अन्धविश्वास भी समाज द्वारा व्यक्ति को दिए जा रहे ज्ञान का एक हिस्सा है .पूंजीवादी व्यवस्था का असुरक्षित तंत्र इसको और अपरिहार्य बना देता है .दुर्व्यवहार की स्थिति में पुरुषों से स्त्रियों का कमजोर होना भी उन्हें भाग्यवादी-नियतिवादी बनाने के लिए मजबूर करा सकता है .इस लिए मेरा मानना है की आप व्यवस्था को और अधिक सुरक्षित  और निरापद बनाए बिना लोगों को अन्धविश्वासी न बनाने का ठोस आवाहन नहीं करा सकते यद्यपि मित्र अनिल सिंह से मैं असहमत नहीं हूँ .उनके ये विचार महत्वपूर्ण है -

".सांइस पढ़ भर लेने से जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित हो. अपने आस -पास कई विग्यान -विषयों में दीछित पीएच .डी.उपाधि धारियों को जीवन और समाज के सामान्य संदर्भो में घोर अवैग्यानिक और अंधविश्वासपूर्ण आचरण करते देखकरनिराशा होती है. वास्तव में भारत ही नहीं समूचे एशियाई समाज में पुनर्जागरण और प्रबोधन जैसा कोई मुकम्मल आंदोलन चला ही नहीं. भारतीय संदर्भ में 19वीं सदी में पुनर्जागरण की जो एक लहर दिखती है वह भी अपनी प्रकृति में सुधारवादी अधिक है. रेडिकल बदलाव की भावना उसमें नहीं दिखती. आजादी के बाद भारतीय समाज में कोई ऐसा आंदोलन नहीं दिखता जिसका उद्देश्य समाज को ग्यान, बुद्धि, विवेक और तर्क संपन्न बनाना हो. इसलिये प्रो. यशपाल की बातों से अधिक गली में बैठे ज्योतिशी की बातें ज्यादा असर करती है और कोई मूर्ति दूध पीने लगती है, कहीं खारा समुद्री जल मीठा हो जाता है, चाँद पर दिखने लगती है किसी बाबा की आकृति, चड़ावा के बदले बरसती कृपा में लोग भीगने को आतुर हो जाते है उगलियों पर चढने लगती हैं अँगूठियाँ और किस्म किस्म के छल्ले. यहीं विग्यान पिछड़ने लगता है और समाज भी."हमारे अधिकतर अन्धविश्वास अविकसित सभ्यता के दौर की उपज हैं.यह तो सभी जानते हैं .लेकिन वे बार-बार बदले और विकसित समय में भी लौट क्यों आते हैं -इन प्रश्नों के कारणों की भी पड़ताल करनी चाहिए .रवीन्द्रनाथटैगोर नें लिखा है कि जो पीछे छूटगया है वह पीछे खींचेगा और जो नीचे गिर गया है वह झुकाएगा.बौद्धिक असमर्थता और अज्ञान के कारण बहुत से लोग स्थितियों-परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाते-बाजार और व्यवस्था द्वारा प्रदत्त बहुत से अवसर जिनपर कोई अकेला मनुष्य नियंत्रण नहीं प् सकता -व्यक्ति को भाग्यवादी बनाने वाली निरीहता को जन्म देते हैं .व्यक्ति अतार्किक कारणों को भी तलाशने लगता है .कई बार असंतुलित विकास के कारण वैज्ञानिक सुविधाओं का आभाव भी व्यक्ति को अंध-विश्वासी बनता है .उदहारण के लिए कुछ बीमारियाँ जींन  सम्बन्धी खराबियों के कारण होती हैं और दवाएं करने से भी ठीक नहीं होतीं -उचित जाँच के आभाव में अंध-विश्वास की और व्यक्ति को ले जा सकती हैं .बहुत से अन्धविश्वास सभ्यता के विकास के साथ खत्म हो जाएँगे .वैसे ही जैसे आधुनिक असरकारक दवाओं के अविष्कार के पहले तेज ज्वर होने पर लोग मनौतियाँ माननेलगते थे और चढ़ावे चढ़ने लगते थे .इस लिए यदि लोगों से अन्धविश्वास ख़त्म करना होगा तो उसका रास्ता अन्धविश्वास के लिए विवश करने वाली परिस्थितियों से बाहर निकलना होगा .देखा जाए तो चीजें उतनी आसान नहीं हैं .लोगों को सोचना आना चाहिए .बीते ज़माने का मनुष्य बहुत सी असमर्थताओं और ज्ञान की सीमाओं की उपज था .कई बार एक असमर्थ विश्वास से समर्थ अंध-विश्वास अधिक प्रभावी होता है .असल चीज संगठित अपराध और विश्वास से अकेले मनुष्य के लड़ने की प्रतिरोध की क्षमता की भी है .मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक असमर्थ और कुंठित मनुष्य ही अन्धविश्वास को चुनौती नहीं दे पाता.मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है .बहुत से अन्धविश्वास वह बचपन से ही प्राप्त सामाजिकता की विरासत से ही अर्जित कर लेता है . .बहुत से अंधविश्वास व्यवस्था पर आम आदमी की पकड़ न होने और उसे प्रभावित कर सकने की उसकी असमर्थता से भी जन्म लेते हैं.कल्पना कीजिए कि इस समय भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो रहा होता और हम सब सिर्फ फेसबुक पर अपनी भड़ास निकल रहे होते .अभी चीन वाले प्रकरण पर भी  बहुत  से मतदाताओं का ख्याल होगा कि अब तक स्थानीय सैनिक झड़प तो प्रतिरोध के लिए हो ही जानी चाहिए थी -जो कि नहीं होगी .सिर्फ दर्शक और श्रोता बनाने वाली इस तरह की असमर्थताओं की ,कुंठाओं की भी अन्धविश्वासी बनने-बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है .हमारा अतीत का सक्रिय पेशेवर - जातीय तंत्र तो जिम्मेदार है ही .गाँधी की आध्यात्मिक राजनीति प्रगतिशील होते हुए भी विज्ञानं की तुलना में धर्मं के अधिक नजदीक थी .मुझे लगता है किविज्ञानं के विकास के बावजूद धर्म और आध्यात्म का वैग्यनिककरण अभी बाकि है .यहाँ धर्म से आशय मेरा जीवन जीने की एक सामान्य समझदारी या पद्धति विक्सित करने से है .

शनिवार, 4 मई 2013

आमंत्रण : - सभ्यता-विमर्श के नए सामूहिक ब्लॉग के लिए


http://sabhyata-wimarsh.blogspot.in

आमंत्रण-स्वयं को जनने के लिए

हम जिस दौर में हैं -सिर्फ यही सोचना जरुरी नहीं है की हम क्या सोच रहे हैं ,बल्कि यह भी कि हम ऐसा क्यों सोच रहे हैं .हमारा अधिकांश सोचना हमारे सामुदायिक आदत का हिस्सा होता है .हम उस आदत को भी बिलकुल अपना बनाकर पेश करते-रहते हैं .ऐसा करते हुए हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं .क्योंकि हमें एक समुदाय की सुरक्षा मिली होती है .हम अपने समुदाय-विशेष से आत्मीयता के साथ जुड़े रहते हैं .यह आत्मीयता हमें आश्वस्त करता रहता है .लेकिन इस सुरक्षा का एक विलोम भी है .हम जितना ही किसी समुदाय-विशेष से अभिन्न होते हैं उतना ही किसी समुदाय-विशेष से भिन्न भी होते हैं .यह भिन्नता हमें दूर तो कराती ही है 'दूसरों को डरती भी है .हम दूसरों को अपनी भिन्नता से असहज और दूर करते रहते हैं .ऐसे में हमें अपनी-अपनी आदिमताओं को छोड़कर एक वैश्विक मनुष्य होने के लिए उदारता की खोज करनी होगी .
       दूसरी बात यह है कि हमें जो दुनिया मिली है ,हम अपनी सृजनशीलता से उसे बना सकते है 'उसमें कुछ जोड़ सकते हैं और अपनी विध्वंसात्मक मूर्खताओं से उसे बिगाड़ भी सकते हैं .हमारी सामूहिकता और संगठन बहुत से अविश्वसनीय कामों को कराती -करती रहती है .सामूहिक शक्ति नें अविश्वसनीय निर्माण किए और करे हैं .हमें इस शक्ति को पहचान कर उससे अपने पर्यावरण को बचाना होगा .
     यह ब्लॉग इन्ही चिंताओं को लेकर सृजित किया जा रहा है .अपनी सभ्यता,संस्कृति और पर्यावरण को लेकर यदि आप भी कुछ दूसरों से साझा करने योग्य सोचते हों तो कृपया निम्न ई-मेल पते पर प्रकाशनार्थ प्रेषित करें-
                                 sabhyatawimarsh@gmail.com

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

आध्यात्म और ईश्वर का प्रश्न ..

कल मेरे मित्र श्री कान्त पाण्डेय  ने ईश्वर के बारे में मेरे एकांत व्यक्तिगत विचार जनने की जिज्ञासा व्यक्त की .एक विचारक के रूप में ऐसे प्रश्नों का संक्षिप्त-सीधा उत्तर देने में मुझे कठिनाई का अनुभव होता है .समस्या ईश्वर के होने न होने को लेकर नहीं है .समस्या किसी अवधारणा की जटिल साभ्यातिक -सांस्कृतिक निर्मित को लेकर है .एक मानवीय पर्यावरण के रूप में ये चीजें एक-दुसरे से इतनी सम्बद्ध और अंतर्ग्रथित हैं कि जन्म से ही सम्बद्ध किसी जुड़वे बच्चे के आपरेशन का मामला लगता है .भारत में आध्यात्मिकता प्रायः एक जीवन-पद्धति और परंपरागत मनोविज्ञान के रूप में भी है .,आदर्श मानक व्यवहार,शिष्टाचार ,मानव-अस्तित्व की पारिभाषिकी,अस्मितापरक आस्था और आत्म विश्वास ,एक आदर्श सामाजिक व्यव्हार सभी कुछ आध्यात्म और धार्मिकता में सम्मिलित है .ऐसे में ईश्वर सम्बन्धी प्रश्न मुझे नए ढंग से सोचने के लिए विवश करता है .रायः मुझे आध्यात्म-विज्ञानं और ईश्वर में विश्वास दोनों भिन्न बातें लगाती हैं .आध्यात्म विज्ञानं को यदि जीवन जीने के विज्ञानं के रूप में देखें तो इसमें ईश्वर के होनें या न होने से कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता .सम्पूर्ण प्रकृति के प्रति हमारा अस्तित्वगत रिश्ता भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है ईश्वर के होने और न होनें में .जीवन के अस्तित्व को लेकर वह प्राथमिक अज्ञानता और आश्चर्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है किसी आध्यात्मिक चिन्तन के लिए .तब जब कि सम्पूर्ण प्रकृति के प्रति हमारा अपना भी रिश्ता है .ईश्वर के अधिकार की मानसिकता जिसे प्रायः सीमित ही करती है .
         एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि तात्विक ईश्वर अस्मितापरक चिन्तन का एक हिस्सा है ,जबकि ईश्वर की रूहानी उपस्थिति में विश्वास  एक बिलकुल भिन्न मामला है ..किसी अदृश्य चेतना और विवेक  की उपस्थिति में विश्वास बहुत कुछ किसी प्रेत में विश्वास करने जैसा है .वह अपने से बा हर के किसी प्रभावी सत्ता में विश्वास के सामान है .सामाजिक मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो अपने से बहार की किसी परायी सत्ता पर विश्वास शेष समाज के प्रति व्यक्ति के अच्छे रिश्ते का भी अचेतन या मानसिक विश्वास का तंत्र रचता है .यह दूसरों से अत्यधिक प्रभावित व्यक्तित्वों की मनोरचना के लिए अधिक अनुकूल होता है .स्वावलम्बी धर्म और परावलम्बी धर्म की दो धाराएं हमेशा से ही रही हैं आध्यात्म यदि स्वावलम्बी दर्शन के रूप में है तो वह किसी बाहरी सत्ता के प्रति परावलम्बी दर्शन से भिन्न होगा..

           यह स्थापना अजीब सी लग सकती है कि भारतीय आध्यात्म का एक बड़ा हिस्सा  ईश्वर या ब्रह्म-चिन्तन के बहाने ही ज्ञान के धरातल पर  ईश्वर की अवधारणा का ही प्रतिरोध रचता जाता है .यह ईश्वर के सर्वव्यापी आतंक के आगे मानवीय ज्ञान की छोटी सी सेंध के रूप में है .उपनिषदों में भारतीय चिन्तक आत्मा की खोज करते हुए भाषा और शब्दों की दुनिया से बाहर निकल जाते हैं .वे इस बोध तक जा पहुंचाते हैं कि भाषिक ज्ञान एक माध्यम है और यह अद्तित्व की शुन्यवत आधार-जड़ता का विकल्प नहीं  बन सकता .काल  की परिवर्तन शीलता के सापेक्ष अस्तित्व की एक काल -निरापेक्ष  उपस्थिति भी है .
            गीता और बौद्ध-साहित्य दोनों में ही मिलाने वाली स्थिति-प्रज्ञ की अवधारणा आध्यात्म-चिन्तन को मानवीय जीवन का शास्त्र बना देती है .योग को कर्म का कौशल बताने का भी आशय  धर्म को आचरण और व्यव्हार के सौन्दर्य के रूप में व्याख्यायित करना था .इस अर्थ में तो योग जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला है .यह भारतीय दृष्टिकोण इस्लाम आदि पश्चिमी धर्मों में मिलाने वाली ईश्वर की प्रेत जैसी (रूहानी ताकत ) की अवधारणा से बिलकुल भिन्न चीज है .यह अपने दैहिक -मानसिक अस्तित्व में डूबकर जीने जैसा है  और शेष ब्रह्माण्ड से अपने अस्तित्व के रिश्तों को याद करने जैसा भी .यह उदात्त कविता जैसी किसी संवेदनात्मक-संवेगात्मक बोध का जीना है .इस विद्या के बाद ही सृजन के केंद्र में स्वयं को भी रखकर कोई मनुष्य अपने लिए ईश्वर जैसी दिव्यता की मांग कर सकता था .ईश्वर का अवतार मने जाने वाले भारतीय महापुरुष ज्ञान की इसी तात्विक प्रक्रिया और आत्म-विश्वास के आधार पर ही उदात्त जीवन जी पाए .यह दूसरी बात है कि स्थितिप्रज्ञ की यह अवधारणाशांति के लिए जितनी उपयोगी रही है क्रांति के लिए उतनी ही विरोधी और प्रतिरोधी भी .यह इसका नकारात्मक पक्ष रहा है .जिसने भारत को गुलामों का स्वर्ग भी बनाया .
              धर्म का दूसरा पक्ष जो मनुष्य को एक अनुयायी यन्त्र-मानव (रोबोट ) में बदलता है -मध्ययुगीन सामंती व्यवस्था में बड़े संगठित साम्राज्य -निर्माण की प्रगतिशील आकांक्षाओं से पैदा हुआ था  .समर्पण की मानसिकता और अनुयायिओं का मनोविज्ञान  इस धार्मिकता को एक बड़े संगठन के निर्माण के उपकरण के रूप में विकसित करता है .ईसाईयत में ईसामसीह के जीवन और व्यक्तित्व के माध्यम से मानवीय प्रतिरोध उपस्थित हुआ है .बौद्ध धर्म में यह प्रतिरोध मनुष्य को केंद्र में रखकर विवेक-स्वातंत्र्य की खोज के रूप में हैं  तो इस्लाम में जो कुछ भी सकारात्मक है ,वह मुहन्माद साहब के के आदर्श आचरण की स्मृति के रूप में ही है .इस दृष्टि से देखा जाए तो मध्य-युग में महकवि तुलसीदास बाल्मीकिकी राम कथा का इस्लामीकरण ही करते हैं .वे भारतीय परम्परा के आध्यात्म के स्थान पर वे राम की सर्वकालिक ईश्वरीय प्रेत के रूप में उपस्थिति की भी मान्यता देते प्रतीत होते हैं .

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

झाँसी की रानी

एक कविता जिसे बचपन से गुनगुनाते हुए बड़ा हुआ हूँ .एक रानी जो इस बात के लिए बचपन से ही दुखी करती रही है कि हम उसके समय और उसकी सेना में क्यों नहीं थे ? हम रहते तो संभव है हम भी मार दिए जाते -लेकिन इससे क्या !बचपन में हम सोचते ऐसा ही कुछ थे .कई दुर्घटनाओं.युद्धों आदि में अपना न होना खटकता है.इहमारे ही सम्मान के लिए लड़ कर वीर गति को प्राप्त होने वाली- इस दुखी करने वाली रानी और उनपर जोश से भर देने वाली कविता रचनेवाली कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की स्मृति को प्रणाम -
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी...झाँसी की रानी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

By: सुभद्रा कुमारी चौहान
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झाँसी की रानी



खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

By: सुभद्रा कुमारी चौहान


गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

आस्तिकता , नास्तिकता और ईश्वर का मानवीय परिप्रेक्ष्य

राहुल संकृत्यायन के जन्म-दिन पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिला .राहुल के सन्दर्भ में गौतम बुद्ध के अनीश्वरवाद की चर्चा हुई और मार्क्स की नास्तिकता की भी .इस अवसर पर मुझे भी वैचारिक शरारत सूझी इस अवसर पर मैंने कहा कि जो भी व्यवस्था के पक्ष में होगा और उससे संतुष्ट होगा वह आस्तिक होगा और जो भी व्यवस्था से नाराज या असंतुष्ट होगा उसे न चाहते हुए भी नास्तिक होना पड़ सकता है .इसलिए कि सुक्ष्म दार्शनिक स्तर पर करुणा और ईश्वर की सर्व्शाक्तिमंवादी आस्था में अंतर्विरोध है . बहुत से लोग इस तार्किक अंतर्विरोध को देख नहीं पाते.
         आध्यात्मिकता के इस मूल विश्वास को ही देंखें कि यह दुनिया ईश्वर नें बनायीं है और उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता तक नहीं हिलता-इस अवधारणा के आधार पर किसी दुर्घटना के अवसर पर मानवीय कर्तव्य का निर्धारण नहीं हो सकता .जैसे यदि किसी की टाग(पैर ) टूट जाए तो हरि-इच्छा वादियों की तरह यह मान लें कि अमुक व्यक्ति की टांग(पैर ) ईश्वर की इच्छा  से ही टूटी है या ईश्वर की ही इच्छा थी कि उसकी टांग(पैर )  टूटे तो किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाने का प्रयास भी ईश्वर की इच्छा के खिलाफ और विद्रोह ही मान जाएगा .ऐसा इस लिए है कि ईश्वर की इच्छा का सम्मान अंतत यथास्थिति का सम्मान ही प्रमाणित होता है .जब आप मानवीय कर्तव्य के रूप में करुणा करते हैं तो दुःख के विरोध में और कान्तिकारी भूमिका में होते हैं .इसी तरह किसी पूर्व-स्थापित सत्ता या वर्चस्व का विरोध करना भी ईश्वर से असहमत होकर ही संभव है .इसी दार्शनिक जरुरत के कारण बुद्ध को अनीश्वरवादी होना पड़ता है .स्पष्ट है की ईश्वर उनके लिए खलनायक है .यहाँ ईश्वर प्रकृति का पर्याय बन जाता है .यदि ईश्वर नें ही यह दुःख-पूर्ण दुनिया बनायीं है तो उससे सहमत होना दुख में बने रहना होगा ;दुख के कारणों का समर्थन करना होगा .ऐसे में दुख हटाना है या दुःख से लड़ना है तो ईश्वर यानि व्यवस्थ यानि यथास्थिति से असहमत हुए बिना संभव ही नहीं है
               इस मनोग्रंथि का ही एक रूप इस्लाम के अनुयायियों में देखा जाता है ,उनके यहाँ सही-गलत का विवेक न होकर सिर्फ सफल-असफल का विवेक है .इसी मनोविज्ञान के करण वे लादेन और सददाम की सफलता को ईश्वर की इच्छा से समर्थित मानकर चुप्पी लगा जाते हैं .इसलिए कि तबाही में सफल हुआ तो ईश्वर की सहमति रही होगी ही .लेकिन जैसे ही ऐसे लोग मार दिए जाते हैं वे उसी मानसिकता से चुप्पी लगा लेते हैं कि ईश्वर की इच्छा नहीं रही होगी तभी ऐसे लोग मारे गए हैं .इसी मनोविज्ञान के करण इस्लाम के अनुयायियों में सही-गलत का विवेक बहुत काम है.
                  यदि वाल्मीकि रामायण पढ़ें तो पाएँगे कि रावण के मारे जाने के बाद जब ऋषियों-चारणों द्वारा उन्हें ईश्वर का अवतार घोषित किया जा रहा है तो वे स्पष्ट कहते हैं कि मैं दशरथ-पुत्र राम स्वयं को मनुष्य मनाता हूँ..प्रश्न साफ है कि यदि राम स्वयं ईश्वर थे तो फिर वे लड़ किससे रहे थे .राम के सामने यह प्रश्न रहा होगा कि उनके बारे में बुरा सोचने वाला कौन है .इस तरह राम व्यवस्था,यथास्थिति से असहमत होकर उससे प्रतिरोध के करण ही ईश्वर माने गए  अन्यथा अपनी इच्छा से पत्ता तक हिलाने वाले ईश्वर नें तो उनका पत्ता साफ ही कर दिया था .बुद्ध भी अपनी संवेदना और दुःख से असहमत होने के कारण ईश्वर से असहमत थे .पश्चिमी संस्कृति नें इस समस्या का दूसरा समाधान निकाला है . वे अच्छे परिणाम वाली घटनाओं को ईश्वर की और से और बुरे परिणाम वाली घटनाओं को शैतान की और से मान लेते हैं .
               इस तरह हमें मान लेना चाहिए कि वर्तमान से यथार्थ से असहमत होने वालों का नास्तिक होना बुरा नहीं है .यह एक नए सर्जन के साहस से जन्म लेता है .वैसे भी यदि प्रकृति का एक नाम सृष्टि है तो सृजन ही मनुष्य का धर्म और कर्त्तव्य हुआ .भारत में इस आध्यात्मिक समस्या का समाधान विष्णु की परिकल्पना से निकल लिया गया है .वे नियति के प्रति मानवीय प्रतिरोध के प्रतीक हैं .वे गलत सफल के प्रति सही के सफल के लिए संघर्ष करते रहते हैं .इस तरह वे ऐसे ईश्वर हैं जो ईश्वर से ही जूझते और संघर्ष करते रहते हैं .गीता में कृष्ण भी गलत लोगों का सफल होना समाज के लिए हितकर नहीं मानते.यद्यपि शब्दावली कुछ इसप्रकार हैं कि सफल मनुष्य जिस तरह का आचरण करते हैं लोक उसी प्रकार का अनुसरण करता है .प्रकारान्तरसिसमें यह सन्देश छिपा है कि सही मनुष्य को सफल होना ही चाहिए .
        इतना कुछ कहने के बाद यह भी कह देना उचित समझता हूँ कि प्राचीन ब्राह्मण जाति की भूमिका एक प्रकाशक की ही रही है.इसने आदर्श चरित्रों आध्यात्मिकीकरण करके उसका पेशेवर उपयोग भर किया है .ऐसा उसनें सभी चरित्रों के साथ किया है ;लेकिन एक सीमा से अधिक वह पेशेवर होने के करण ही चरित्रों के वर्ग और वर्ण चरित्र नहीं बदल सकी है .अच्छी बात यही है कि राम और कृष्ण जैसे उसके आदर्श नायक सकर्मक सौन्दर्य और आचरण वाले सक्रिय वर्णों से आए चरित्र हैं .इसीलिए पुरोहिती संस्करण से अलग भी उनके द्वारा चयनित ,प्रचारित एवं प्रसारित आदर्श चरित्रों की सार्थक सक्रिय भूमिका  बनी रहती है .इसलिए भारत का सब कुछ ही ब्राह्मणवादी कह कर त्याग देने योग्य नहीं है .उनके नायकों की साहित्यिक संभावनाओं का तटस्थ मूल्याङ्कन कर ही  उनके सार्थक या निरर्थक होने का निष्कर्ष निकलना उचित होगा .
            इन तथ्यों को देखते हुए आशा है अगली बार आप भी स्वयं को आस्तिक या नास्तिक घोषित करने के पहले यह सोच लें कि आप यथास्थिति वादी तो नहीं हैं !

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

विमर्शात्मक आलोचना का प्रतिमान


पुस्तक-"कुबेरनाथ राय :सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि
लेखक -डॉ ० पी .एन.सिंह
प्रकाशक-प्रतिश्रुति प्रकाशन ,7 a बेंटिक स्ट्रीट ,कोल्कता-700001
     दूरभाष -      22622499
MAIL-prakashan@gmail.com





आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी के बाद अपनी मौलिक शैली के साथ ललित निबंधकार के रूप में स्थापित श्री कुबेरनाथ राय की साहित्यिक विशेषताओं का आलोचनात्मक विवेचन डॉ ०पी.एन.सिंह की पुस्तक "कुबेरनाथ राय :सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि " से पूर्व इतनी सूक्षमता ,गंभीरता और प्रामाणिक विशेषज्ञता के साथ नहीं मिलता.चाक्षुष सौन्दर्य -प्रतिमान के रूप में 'लालित्य 'शब्द का प्रचालन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नें कालिदास के साहित्य से लेकर किया था .उनके पूर्व ऐसे निबंधों के लिए वैयक्तिक या स्वच्छंद शैली के निबंध जैसे विशेषण प्रचलित थे .चाक्षुष सौन्दर्य -प्रतिमान होने के करण ललित-निबंधों में मनोरम कल्पनाशीलता ,स्मृति -परकता ,सजीव एवं रागपूर्ण दृश्यात्मकता के साथ उपस्थित होती है .आचार्य द्विवेदी की भांति ही कुबेरनाथ राय के ललित निबंधों में मौलिकता एवं जिज्ञासा से भरपूर ,दृश्य-बिम्बों -ऐन्द्रिक छवियों से समृद्ध बौद्धिक यायावरी मिलाती है .
                   पुस्तक में ६८ पृष्ठ तथा ६ पृष्ठ लम्बी सन्दर्भ -सूची वाला महाकाव्यात्मक मुख्य लेख "कुबेरनाथ राय :सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि " हिंदी आलोचना में न्य प्रतिमान स्थापित करने वाला श्रमसाध्य लेख है.इस प्रतिमानता का अतिरिक्त आधार श्री कुबेरनाथ राय और डॉ ० पी.एन.सिंह दोनों का ही अंग्रेजी साहित्य का अधिकारी विद्वान् होना भी है .इससे कुबेरनाथ राय की उन स्मृतियों और स्थापनाओं की सम्यक पड़ताल हो पाई है ,जिनका सम्बन्ध अंग्रेजी साहित्य से था .श्री कुबेरनाथ राय नें मार्क्सवादी भौतिक-दृष्टि और चिन्तन-पद्धति की भी आलोचना की है .(पृष्ठ४२ ) ऐसे में घोषित मार्क्सवादी रहे डॉ ०पी.एन.सिंह द्वारा उनके मार्क्सवाद विरोध की गंभीर अधिकारिक समीक्षा इस आलोचना को और महत्वपूर्ण बनाती है .इस पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा  कुबेरनाथ राय द्वारा की गयी मार्क्सवाद की आलोचना और उस पर मार्क्सवाद के अधिकारी विद्वान् डॉ ० पी.एन.सिंह की प्रत्यालोचना से सम्बंधित अत्यंत गम्भीर एवं ज्ञानवर्धक विमर्श प्रस्तुत करता है .पृष्ठ संख्या ४० से ५३ तक भारतीयता के सन्दर्भ में कुबेरनाथ राय के निबंधों पर आधारित मार्क्सवाद विमर्श चलता रहता है .दो समर्थ विचारकों की मार्क्सवाद-विरोधी और समर्थक मानसिकता नें पाठकों के लिए रोचक और ज्ञानवर्धक विमर्श उपस्थित कर दिया है .इससे भारत के पुनर्निर्माण के सन्दर्भ में मार्क्सवाद की उपयोगिता और अनुपयोगिता सम्बन्धी सही दृष्टि और विवेक विकसित करने में अच्छी मदद मिलती है .
                 डॉ ०पी.एन.सिंह को श्री कुबेरनाथ राय की स्थापित महत्ता और सम्मान का अहसास है .इसीलिए उन्होंने अपनी मार्क्सवादी कसौटी पर उनकी कई मान्यताओं को अस्वीकार्य पते हुए भी कुबेरनाथ राय की निष्कर्षात्मक सराहना ही की है .इन शब्दों में कि"आधुनिकता-बोध और आधुनिक लेखन के प्रति उनके घोषित अनादर के बावजूद ,उनमें बहुत कुछ है जो गम्भीर मीमांसा की अपेक्षा रखता है "(पृष्ठ९५)"श्री राय की संकल्पनाएँ तीव्र रूप से इन्द्रियों को अच्छी लगाने वाली है और उनकी शैली आकर्षक है .वे जितने प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति संग्यशील हैं ,उतने ही मानव-आत्मा के प्रति भी .उनकी गद्य-शैली औदत्य से परिपूर्ण है तथा इसमें ओज की भी पराकाष्ठा है .प्रत्येक महत्वपूर्ण लेखक की तरह वे भी नए-नए मुहावरे गढ़ते हैं ,जो गौरव -ग्रंथों तथा ग्रामीण -जीवन से जीवंत हो उठाते हैं .श्री कुबेरनाथ राय को प्रसिद्धि देने वाली दूसरी विशेषता उनका अखिल भारतीय चित्रांकन तथा इस तथ्य पर बार-बार जोर देना है कि भारतीय संस्कृति आर्य ,निषाद ,किरात ,द्रविड़ अंशों द्वारा निर्मित एक पूर्णता है .(प्रि१२,भूमिका ) वे(कुबेरनाथ राय )'रस-आखेटक' और 'बोध-आखेटक' दोनों थे .उनके रस-आखेटक स्वभाव नें एक तरफ उन्हें निषादों ,किरातों और गन्धर्वों की आनंदवादी रसमयता से संपृक्त रखा ,तो दूसरी तरफ उनकी आर्य -चित्ति और सुलभ-बोध आखेटी स्वभाव नें उन्हें 'शाश्वत प्रमुल्यों 'के संधान हेतु विचार और दर्शन की अमूर्त दुनिया में जाने के लिए विवश कर उन्हें मर्यादा-बोध का आग्रही बनाया ,जहाँ से वे आधुनिक जीवन और साहित्य पर बेबाक टिपण्णी करते रहे .दर असल इसी समन्वय में उनकी वैष्णवता निहित है .वे एक ही साथ 'कृष्णत्व' और 'रामत्व' दोनों के आराधक थे .उनकी दृष्टि में कृष्णा का रसिया रूप ही परम-सत्ता का 'रस-रूप' है और राम का 'मर्यादा रूप 'उसका बोध-रूप .(पृष्ठ९२ )
          अपने लम्बे आलेख में इन निष्कर्षात्मक -प्रशासक टिप्पणियों तक पहुँचने के पहले डॉ ० पी.एन.सिंह पाठकों को श्री कुबेरनाथ राय के विपुल निबंध-साहित्य के पाठकीय अनुभव और उद्धरण -सन्दर्भों से गुजरते हैं .श्री कुबेरनाथ राय के निबंधों की सार्थक एवं आस्वाद धर्मी चयनित प्रस्तुति इस पुस्तक की विशेषता है .मात्र डॉ आलेखों वाली इस पुस्तक में दूसरा आलेख कुबेरनाथ राय की मृत्यु के पश्चात् श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा गया 'समकालीन सोच 'में प्रकाशित समपद्कीय है.
     डॉ ० पी.एन.सिंह कुबेरनाथ राय को टी.एस.इलिएट की तरह गम्भीर साहित्येतर सरोकार वाला साहित्यकार मानते हैं .उनके अनुसार इलिएट का बोध मूल ईसाइयत की विकासशील एवं समावेशी भावना द्वारा अनुकूलित है तो श्री राय का 'नव्य आर्य ' संस्कारों की विकासशील एवं समावेशी  वैष्णवता द्वारा .(पृष्ठ १६ )वे श्री राय को मर्यादा-बोध संपन्न निबन्धकार मानते हैं .उनकी इस अभिव्यक्ति का समर्थन करते हैं कि श्री राय के निबंध 'क्रुद्ध-ललित 'स्वभाव वाले हैं  तथा उनका सम्पूर्ण साहित्य या तो क्रोध है ,नहीं तो अंतर का हाहाकार ....आक्रोश उनके निबंधों में एक स्थाई भाव है .(पृष्ठ १७ )
     डॉ ० सिंह के अनुसार श्री राय की 'भाषिक क्लिष्टता ,सन्दर्भों और उद्धरणों की बहुलता ,अनपेक्षित शब्द -व्युत्पत्तिपरकता ,संस्कृति-बोध के नाम पर उनका मुखर अतीत -मोह और आधुनिकता की सम्पूर्ण अस्वीकृति इत्यादि साधारणीकरण में बाधक बनाते हैं .उनमें वित् ,ह्यूमर ,रोचक व्यंग्य आदि का आभाव खटकता है .लेकिन वे निरंतर गाम्भीर्य ,मर्यादा और सरोकारों की विराटता का एहसास कराते हैं,जो ललित निबंधों के दायरे के बाहर अधिक उपयुक्त होता .(पृष्ठ १८) हिंदी पाठकों के मानसिक क्षितिज का विस्तार श्री राय के निबंधों का केन्द्रीय उद्देश्य है .श्री कुबेरनाथ राय की काव्य-संवेदना महाभारत ,रामायण ,श्रीमद्भागवत ,राम चरित मानस आदि से संस्कारित है .
        डॉ ० सिंह श्री राय के रसवाद भाववाद की साहित्यिक मुद्रा को बदलाव विरोधी और अव्यवहारिक मानते हैं .(पृष्ठ २१ )सिर्फ मराल(१९९० ) के निबंधों में उन्हें वे यथार्थ से सचमुच टकराते दीखते हैं .'प्रिया नीलकंठी '(१९६९) के निबंध 'मनियारा सांप '  के इस उद्धरण-"भावुकता सहस्र फण शेष है ' के आधार पर कुबेरनाथ राय को मूलतः एक रोमांटिक मिजाज वाला साहित्यकार सिद्ध करते हैं .(पृष्ठ २३ ) डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार 'रोमन मिजाज व्यक्ति अपनी सामान्य छोटी -छोटी भूमिकाओं में ही बहुत गम्भीर होता है और गौरव-बोध से पीड़ित हुआ करता है .समसामयिक विराट एवं जटिल चुनौतियों के सन्दर्भ में श्री कुबेरनाथ राय का साहित्यिक-सांस्कृतिक त्व्वर कुछ रोमैंटिक है और इस करण 'माक हीरोइक भी दिखता' है .(पृष्ठ २५ )
         अपने लम्बे आलेख में डॉ ० पी.एन. सिंह श्री कुबेरनाथ राय की काव्य -दृष्टि को समझाने समझाने के लिए की पृष्ठ देते हैं .इस क्रम में उनकी इस दृष्टि का रेखांकन करते हैं कि'इस (साठोत्तरी कविता )में नकारात्मक दृष्टि का ही सर्वांगीण प्राधान्य है और इस करण इसमें 'बहुकालीन और दूर प्रसादी तत्वों ' का आभाव है....अतः उनकी दृष्टि में समूची साठोत्तरी कविता वर्तमान 'गलित रोमन'(डिकाडेंट रोमांटिसिज्म )की संपोषक है .(पृष्ठ २७ )
            श्री कुबेरनाथ राय साठोत्तरी हिंदी साहित्य को उग्रवादी पीढ़ी का साहित्य मानते हैं ,जो करुणा-बोध विहीन है और इसी कारण 'आसुरी एकाधिकार '(सुखेच्छा ) और आसुरी भूमा (विस्तारवाद ) का शिकार होने के साथ न धर्मी भाव- त्रिभुज (हताशा,क्रोध और भय )से भी ग्रस्त है .(पृष्ठ २८ )
               रस-आखेटक के विषद-योग में वे "मूल समस्या कल्पना को कवी के कर्म के केंद्र में पुनः प्रतिष्ठित करने की मानते हैं ,जो प्रकृति और नारी दोनों से सम्मोहित होने पर ही संभव है .( पृष्ठ २९ ) डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार 'राय साहब अपने हठी रसवाद ,रहस्यमयता तथा परवास्तव में अटूट विश्वास के चलते 'श्रमिक संस्कृति 'और समाजवादी साहित्य की सार्थक भूमिका को अस्वीकार करते हैं .कुबेरनाथ राय के इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में किसमाजवाद का वह चेहरा जो व्यक्ति ,सनातनी मूल्यों एवं राष्ट्रीयता को अस्वीकार करता है ,हमारे साहित्य के परिवेश में कोई स्थाई भूमिका नहीं अभिनीत कर सकेगा .स्थाई भूमिका एवं दीर्घजीवी पृष्ठभूमि के लिए समाजवाद का नया चेहरा खोजना होगा ."(विषाद योग ,पृष्ठ १५० )
                डॉ ० पी.एन.सिंह की इस पुस्तक की महत्वपूर्ण उपलब्धि श्री कुबेरनाथ राय के भाव-बोध ,रीझ 'रूचि और स्थापनाओं को समाजवादी और आधुनिक समाजशास्त्रीय नजरिए से समझाने का प्रयास करना है .डॉ ० सिंह के अनुसार  कुबेरनाथ राय के मूल्य और अवधारणाओं का आधार कृषक संस्कृति है .इसे वे क्रिष्टोफर काडवेल का सन्दर्भ देते हुए "इन्फैंटाईल रिट्रीट 'यह एक प्रकार की नस्त्रेल्जिया,सांस्कृतिक न्युरोसिस घोषित करते हैं .(पृष्ठ३३ )डॉ ० सिंह के अनुसार 'श्री राय के  काव्य -मूल्य 'सुषमा ' और शील -नद्धता 'स्थितिशील कृषि -समाजों के काव्य -मूल्य हैं ,आधुनिक संक्रमणशील समाजों के नहीं .अतः आधुनिक  साहित्य में कल्पना की उर्वरता एवं सक्रियता ,बिम्ब एवं प्रतीक-विधान विश्वसनीय काव्य-लोक गढ़ने की क्षमता आदि का आकलन सुषमा और शीलनद्धता के दायरे के बाहर ही संभव है .'(पृष्ठ ३४ ) इस तरह डॉ ० सिंह साठोत्तरी हिंदी कविता के नामवर सिंह द्वारा रेखांकित उन नकारात्मक प्रतिमानों-'तनाव,''व्यंग्य ',विडम्बना ','बुनावट ','सपाटबयानी ' और 'अन्विति " आदि के मानवीय औचित्य को श्री राय की निरस्ति के विपरीत सही पते हैं .
                 इस पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा श्री कुबेरनाथ राय द्वारा की गयी मार्क्सवाद की आलोचना और उसपर मार्क्सवाद के अधिकारी विद्वान् डॉ ० पी.एन.सिंह  की प्रत्यालोचना से निर्मित अत्यंत गम्भीर एवं ज्ञानवर्धक विमर्श प्रस्तुत करता है . पृष्ठ सं० ४० से लेकर ५३ तक भारतीयता के सन्दर्भ में मार्क्सवाद विमर्श चलता रहता है .इसी क्रम में मार्क्सवाद के बाहर और भीतर के अनेक विचारकों के विचारों का सन्दर्भ देते हुए मार्क्सवाद के भीतर के विचारकों बर्नास्ताइन ,कात्सकी,लुकाच ,अडोर्नो ,अल्थ्युजर ,कार्लो कोव्स्की,रेमण्ड विलियम्स ,डेविट  मेक्लेलान जैसे विचारकों द्वारा मार्क्सवाद की आलोचना के परिप्रेक्ष्य में कुबेरनाथ राय की मार्क्सवाद से असहमति की समीक्षा करते हैं .डॉ० पी.एन.सिंह के अनुसार मार्क्स का व्यक्ति की निजता से वैसा विरोध नहीं है जैसा  कि कुबेरनाथ राय समझते हैं .मार्क्स की परिकल्पना का मनुष्य समाजवादी मूल्यों को जीने वाला व्यक्ति है ;अपनी सामूहिकता में ही वह निजता के अधिकारों को प्राप्त करता है ."कार्ल मार्क्स  पूंजीवादी व्यक्तिवाद (जो केवल अपने लिए जीता है )के आदर्श को नकार कर "सामाजिक व्यक्ति के विकास को ऐतिहासिक कृत्य एवं दायित्व के रूप में देख रहे थे ."(पृ० ४१)भारत के सन्दर्भ में कुबेरनाथ राय  एक विचारक के रूप में द्वंद्व और संघर्ष का निषेध चाहते हैं ,समन्वय,सहयोग और संयोग को भारतीयता के सन्दर्भ में महिमा-मंडित करते हैं .(पृ०४२ )इसी सन्दर्भ में मार्क्स के द्वंद्ववाद का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करते हैं उनके अनुसार भारतीय स्मृतियों में भी सब कुछ अच्छा ही नहीं है .उसमें भी बहुत से युद्ध और हत्याएं हैं .इसके बावजूद कुबेरनाथ राय महासमन्वय का राग सोद्देश्यता के साथ गाते हैं -"हम इसकी चर्चा नहीं करेंगे तो और लोग करेंगे और वे "और "लोग इस चर्चा को द्वान्द्वामुलक ऐंठन देकर प्रस्तुत करेंगे ,इसके पीछे महासमन्वय की सारीप्रक्रिया अस्वीकृत करेंगे और अपने ही लोगों को गुमराह करेंगे ."(पृ० ४६)आगे के पृष्ठों पर समकालीन यथार्थ की उपेक्षा कर आस्था में छलांग लगाने के कुबेरनाथ राय के आवाहन को एक नकारात्मक स्थापना के रूप में रेखांकित करते हैं .डॉ.पी.एन सिंह उनके इस सुझाव को इस लिए ख़ारिज करते हैं कि पराभूत समुदाय या संस्कृतियाँ  अपनी सामुदायिक आस्थाओं एवं परम्परापुष्ट विवेक के दायरे में सिमटकर अपनी आत्मरक्षा करती हैं ,लेकिन वे युग का प्रतिनिधि जीवन-बोध नहीं बनतीं.(पृ० ४८ )इस प्रकार डॉ ० सिंह श्री कुबेरनाथ राय की अनेक स्थापनाओं को राजनीतिक सृजनशीलता और समकालीन सरोकारों का विरोधी पते हैं .पूंजीवादी मूल्य जैसे सत्य ,अहिंसा,दया,संतोष ,विश्वास,दानशीलता ,वफ़ादारी आदि पूर्ण न्यायिक और समधानात्मक न होकर मात्र आंसू पोछने वाले हैं.(पृ० ४९ ) पी.एन.सिंह के अनुसार आज परोपकार-बोध का स्थान न्याय-बोध ले रहा है और आस्थागत विवेक का स्थान अनुभव-सिद्ध तार्किक विवेक .(पृ० ५० ) मार्क्सवादी होने के कारण  राम की हिंसा को महाकरुणा समझना और लेनिन और माओ की हिंसा में उस महाकरुणा के दर्शन न करना खटकता है .
               दर असल यह अकारण नहीं है कि श्री कुबेरनाथ राय का अधिकांश लेखन भारतीयता के समन्वयवादी आयाम को महिमा-मंडित करता रहता है .असम की राजनीति ,नक्सलवाद और जातीय आन्दोलनों नें उनमें समाधानात्मक प्रतिक्रिया के रूप में समंवय्बोध को केन्द्रीय स्वर बना दिया है .वे स्वयं जिस वर्ग और वर्ण से आते हैं ,उनमें वामपंथ भूमि छिनने का भय ही पैदा कर सकता है .लेकिन किसान पृष्ठभूमि से आने के करण उनका जीवन और जगत राग सैद्धांतिक और दार्शनिक ही अधिक है और वे पुरोहितवादी संरचनाओं में न होकर आदर्श एवं अस्मितापरक हैं .संभवतः इसीलिए कुबेरनाथ राय का लेखन अपील भी करता है .उन्होंने परम्परा और पुरातनता को भी अपने द्गंग से चुना और गढ़ा है .इसमें संदेह नहीं कि कुबेरनाथ राय एक सकारात्मक भारतीयता के परिकल्पक एवं प्रतिनिधि भाष्यकार हैं .यह भारतीयता आर्थिक दृष्टि से एक-दुसरे पर निर्भर पूरक जातीय समुदायों से बनी है .इसमे पूंजी वितरण और प्रवाह के धार्मिक तंत्र भी हैं वर्ण-व्यवस्था में एक भिक्षाजीवी जाति को  सर्वोपरि स्थान प्रदान करना इसके पक्ष में भी जाता है .और यह भी कि यह पश्चिमी आधुनिकता से भिन्न ,विलोम और किसी भी प्रकार की तुलना के अयोग्यआदर्शवाद का प्रकार था .संभवतः इसीलिए इतिहास में यह उतनी अमानवीय भी नहीं रही है की उस पर गर्व नहीं किया जा सके .भारतीय संस्कृति के प्रति कुएर्नाथ राय की रीझ का यह भी एक करण हो सकता है .
                स्वयं कुबेरनाथ राय का प्रत्यक्षतः पुरोहित जाति से न होना भी भारतीयता सम्बन्धी उनकी अवधारणाओं  को महत्वपूर्ण और बहुत कुछ निर्दोष बनाता है .स्वीकार्य होने का एक अन्य कर्ण यह है कि कुबेरनाथ राय की अधिकांश स्थापनाओं का आधार धर्म का संस्कृति-विमर्श नहीं ,बल्कि समाज का संस्कृति-विमर्श है .अन्य ललित निबंधकारों की तरह कुबेरनाथ राय भी मानव-राग और आत्मीयता का स्वस्थ पर्यावरण बचाना चाहते हैं .वे आधुनिकता में पुनर्व्याख्या और प्रतिरोध के सम्वेदानाकर हैं .यह आधुनिक बुद्धिवाद की कसौटी पर अपने ही (भारतीय )सांस्कृतिक चित्त का साक्षात्कार और पुनर्परीक्षण है .रूचि और स्वभावजन्य निर्नाय्शीलाता का संघर्ष कुबेरनाथ राय के साहित्य में साफ-साफ देखा जा सकता है .जैसे वे जानना चाहते हों कि कितना और क्यों बदलना है और यदि नहीं बदलना है तो क्यों ? श्री कुबेरनाथ राय इस न बदलने को भी समझना चाहते हैं .इसे संरक्षनीय अतीत की समझदारी की सृजनात्मक चिंता एवं प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है .लेकिन यह अपने अधिकांश में अस्मितापरक ही है .अपने विश्लेषण में यद्यपि डॉ ० पी.एन.सिंह यथार्थ के व्यावहारिक धरातल पर कोई स्पष्ट सार्थक भूमिका नहीं देखते ,फिर भी उनकी बहुत सी स्थापनाओं की सराहना करते हैं .
              डॉ ० पी.एन.सिंह रस आखेटक में व्यक्त श्री कुबेरनाथ राय के इस आकलन को सराहना के साथ उद्धृत करते हैं कि "ज्ञान,वैराग्य ,सत्य -अहिंसा ,खरा शुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर भले ही पुण्य हो सामूहिक स्तर पर सौ में से पचास से ज्यादा स्थितियों में हलाहल पाप है -इस ऐतिहासिक महासत्य को समझाने की शक्ति भारतीय मेधा में नहीं रही ...इसके लिए न तो प्रकृति दोषी है और न इतिहास दोषी है .दोषी है अपनी जातीय प्रज्ञा या मेधा जिसमें सतोगुणी चिन्तन रिपु की तरह बैठा है और निरंतर घात लगाए है ."(पृ० ५१ )इस सन्दर्भ में अंग्रेज चिन्तक अल्दास हक्सली के द्वारा भारतीयों की की गयी आलोचना को अधिक उपयोगी पते हैं कि'भारतीयों के लिए धर्मं विलास है और इन्हें इहलौकिक बनाने के लिएअनीश्वरता का पाठ पढ़ाना होगा .'
              अपने लम्बे आलेख में डॉ ० पी.एन.सिंह नें  श्री कुबेरनाथ राय के निबंधों में व्यक्त  साहित्य और अस्तित्ववाद सम्बन्धी  विचारों को इसी उप शीर्षक के अंतर्गत व्यक्त किया है .श्री कुबेरनाथ राय मार्क्सवाद की तरह ही नास्तिक अस्तित्ववाद भी पसंद नहीं करते .क्योंकि ऐसी अनास्था अकेलेपन की सृष्टि करती है ,इसीलिए उन्हें कीकेगार्द का आस्तिक (ईसाई ) अस्तित्ववाद पसंद है ,(पृष्ठ ५३ ) डॉ० पी.एन.सिंह सार्त्र की सामूहिकता पर बल देने वाली  अस्तित्ववादी स्थापनाओं को सकारात्मक मानते हैं जो श्री राय को पसंद नहीं हैं .आधुनिक साहित्य के प्रति कुबेरनाथ राय के नजरिए को व्यापक छानबीन के बाद पुराने संस्कार वाला घोषित करते हैं .(पृष्ठ ५७ ) डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार "श्री कुबेरनाथ राय आधुनिकता एवं आधुनिक नवलेखन,मार्क्सवादी चिन्तन-पद्धति एवं व्यव्हार,अस्तित्ववादी जीवन-दृष्टि,आधुनिक इतिहास-बोध,सामाजिक निर्माण की सेक्युलर अवधारणा इत्यादि के विरुद्ध आक्रोशयुक्त एवं इकहरी टिप्पणियां करते हैं और विकल्प में अपने 'सनातनी ' जीवनबोध और उसके 'प्रमुल्यों ' को उछलते रहते हैं .(पृष्ठ ५८ ) 'उनकी पंडिताऊ दुरुहता और जिद्दी  पारम्परिकता के बावजूद,उनका लेखन बहु आयामी ,अंतर्दृष्टि सम्पन्न एवं आकर्षक है ,और ये ही उनके लेखक व्यक्तित्व के स्थाई आधार हैं '.(वाही )उनके साहित्य का महत्वपूर्ण आयाम उनके चिन्तन की विराटता और उनका मूल्यगत आग्रह है .मानों वे हर क्षण राष्ट्र एवं विश्व की  त्रासद नियति से रूबरू हों ,उससे टकरा रहे हों .(वाही ,पृष्ठ ५८ )
                   डॉ ०सिन्घ के अनुसार मार्क्सवादी शब्दावली से बचाते हुए भी श्री राय की कुछ स्थापनाओं में विरोध नहीं है .जैसे 'उनका यह रेखांकन कियोरोपीय व्यक्तिवाद ,अतिमानव न पैदा कर अतिदानाव एवं चीटी  मानव पैदा कर रहा है ,सही है .(पृष्ठ ५९ ) डॉ सिंह श्री राय की असाधारण प्रभावशीलता का रहस्य उनके पैगम्बरी तेवर में मानते हैं .निःसंग आत्मविश्वास के बिना अति मान्यताओं का पुनर्मूल्यांकन भी संभव नहीं है .डॉ पी.एन.सिंह का यह रेखांकन भी एक महत्वपूर्ण आलोचकीय उपलब्धि ही कही जाएगी .उनके अनुसार-'अतिरिक्त भावाकुलता ,भाषिक अतिरिक्तता और वैयक्तिक चिंता को वैश्विक चिंता के रूप में देखनें-दिखानें का अंदाज आदि -साहित्य -यज्ञ की समिधाएँ हैं ,जो जो श्री राय के लेखन में प्रचुर मात्र में उपलब्ध हैं .( पृष्ठ ६१ )
डॉ कुबेरनाथ राय के मनुस्मृति विरोध को पी.एन.सिंह एक सकारात्मक और स्वस्थ पक्ष मानते हैं -'विश्व की सारी समस्याएँ तो हमारे पास हैं ही ,हमारी एक अतिरिक्त समस्या भी है और वह है मनुस्मृति द्वारा संस्कारित हमारा संकीर्ण समाज-बोध ,हमारी वर्णवादी व्यवस्था ,जिसने समाज को इस प्रकार बाँट दिया है की प्रेम असंभव हो गया है .(पृष्ठ६२ )
                       डॉ ० पी.एन.सिंह श्री कुबेरनाथ राय  के भारत सम्बन्धी चिन्तन और आधुनिकता -बोध के  समन्वयवादी दृष्टिकोण को सर्वकालिक या शाश्वत समाधान के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं मानते हैं .वे सेक्युलरिज्म को व्यवहृत मानवतावाद कहते हैं और यह भी रेखांकित करते हैं कि इस्लाम और ईसाई मत अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ताकतवर अस्मिताएँ हैं ,सनातनी संस्कृति का हिन्दू संस्करण बिना स्वयं र्पंतरित हुए अपनी शर्तों पर इसे आत्मसात नहीं कर सकता .(पृष्ठ६४ )
इन सीमाओं के बावजूद कुबेरनाथ राय का सकारात्मक पक्ष 'व्यवहृत मार्क्सवाद के प्रति अपनी गहरी असहमतियों के बावजूद श्री राय का मार्क्सवाद की मूल दृष्टि(विजन )और उसकी सात्विक चेतना का प्रशंसक होना है .श्री राय के साहित्यिक-सांस्कृतिक चिन्तन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अंतर्द्रिश्तिसम्पन्न आयाम भारतीय एवं यूरोपीय सांस्कृतिक चेतनता की अपनी-अपनी विशिष्टताओं का सही रेखांकन है .(पृष्ठ ६६ ) श्री राय वैदिक आर्यों के जीवन-बोध को इहलोक और लोकोत्तर दोनों की सामान प्रतिष्ठा के कारण स्वस्थ मानते हैं .डॉ ० सिंह उनमें सनातनी प्रतीकों की अभिरुचिवादी व्याख्या की पक्षपाती प्रवृत्ति के दर्शन करते हैं .(पृष्ठ ६७ ) इस स्वीकार के साथ कि'इससे उनकी अंतर्दृष्टि संपन्न टिप्पणियों एवं प्रेक्षणों की महिमा नहीं घटती .वे दृष्टि देते हैं,परिप्रेक्ष्य सुझाते हैं और उनका लेखन विचारों की खान है ,जिनके सहारे अनचाहे भी पाठक को बहुत कुछ सुझाने लगता है .'(पृष्ठ६८ )
                    डॉ ० पी.एन.सिंह के आलेख के अंतिम लगभग १६ पृष्ठ  कुबेरनाथ राय के 'भारतीय और यूरोपीय साहित्यिक मूल्य' उपशीर्षक से इन्ही समस्याओं से सम्बंधित कुबेरनाथ राय के विचारों पर  केन्द्रित है . यह अंश हिंदी पाठकों के ज्ञानवर्धन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है .श्री कुबेरनाथ राय की दृष्टि में 'यूरोपीय साहित्य का सनातन स्तर होमर का ही स्वर है ,जिसके चार आयाम हैं -यथार्थवाद,विडम्बना ,ट्रेजेडी और साहसिकता ; और इसमें  होमर के करीब दो हजार वर्ष बाद ,मध्य-युगों में पांचवां आयाम अर्थात् ईसाई भावाकुलता जुडी .जबकि भारतीय मनीषा का स्वभाव इसके ठीक प्रतिकूल है .(पृष्ठ ६८ ) इस अंश को डॉ ० पी,एन .सिंह नें कुबेरनाथ राय के प्रेक्षणों और उद्धरणों के सहारे तथा अपने विस्तृत अध्ययन के बल पर और समृद्ध किया है .इस अंश को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि एक ही विषय पर दो उच्च स्तरीय अधिकारी विद्वानों का युगल विमर्श पढ़ रहे हों.डॉ ०पी.एन.सिंह नें इलिएद के विस्तृत अध्ययन और स्मृतियों का पाठकों से साझा किया है .वे इलिएद केन्द्रीय रस वीर और क्रोध की चर्चा करते हैं .उसके कई प्रसंगों को दृष्टान्त में प्रस्तुत करते हैं .ट्रेजेडी को लेकर महाभारत की ट्रेजेडी की तुलना करते हैं .महाभारत में 'मानवीय सीमाओं(क्रोध,प्रतिशोध ,छल-कपट ,क्रूरता इत्यादि )और मानवीय संभावनाओं(धर्म -शासित अर्थ एवं काम और अंततः मोक्ष ) की खुली अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं .इनमें मानवीय यथार्थ की भूमिका अधिक प्रभावपूर्ण होती है .इसी तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में सीता और सावित्री जैसी सात्विक गृहस्थ नारियों की होमारीयआदिम परिवेश तथा वैराग्य प्रधान  इसाई दृष्टि में कल्पना भी  संभव न होने के साथ  कमोत्तर स्त्री-पुरुष रिश्तों वाले सीता-राम,शिव-पार्वती जैसी शील्नाद्धा सौन्दर्य की अभिव्यक्तियाँ भी शामिल हैं जो एकांगी न होकर जीवन के वृहत्तर सन्दर्भों में कल्पित एवं रूपायित हैं .(पृष्ठ७२-७३ )
                 डॉ ० सिंह के अनुसार श्री राय का साहित्यिक विवेक प्रभावशाली होने के बावजूद बहुत उपयोगी नहीं है .वह समकालीनता से असंतुष्ट है और उसकी अवहेलना करता है .वह अपने मानकों और आदर्शों की खोज में प्रायः अतीत गामी है .उनके अनुसार 'श्री राय के साहित्यिक मानक-विस्तार गहरे,उदात्तता और रोचकता आधुनिक साहित्य के मूल्य नहीं हैं .'इसी करण वे बार -बार राम-कथा और गांधी की तरफ लौटते हैं .'(पृष्ठ ७५ ) कुबेरनाथ राय पुरोहितवादी चिन्तन और 'यजमानी 'व्यवस्था को भारतीय समाज का दुर्भाग्य बताते हैं .कला और संस्कृति के सजीव अंश के खोजी हैं .(पृष्ठ ७६ ) इस तरह वे प्रगतिशील पारम्परिकता के एक विद्वान् एवं निष्ठावान पुरस्कर्ता हैनौर इसी रूप में वे एक अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं .
                श्री कुबेरनाथ राय नें अपने लेखन में भारतीय साहित्य की विशेषताओं को बहुविध चिन्हित करने का प्रयास किया है .जैसे वे तथागत के 'श्रामण्य सुख को साहित्यिक सुखके रूप में देखते हैं  और इनसे प्राप्त सुख जैसे-प्रीती सुख ,मैत्री सुखा ,अभय सुखा,प्रज्ञा सुखा और प्रशांति सुख आदि को वे मानसिक ऋद्धियाँ बतलाते हैं .कुबेरनाथ राय मानते हैं की प्रासंगिकता का एक सर्वकालिकआयाम भी होता है .डॉ ० सिंह इसको कई दृष्टान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं.(पृष्ठ ८० ) उनके अनुसार 'श्री कुबेरनाथ राय नें साहित्य को जिस गंभीरता से लिया,उस गंभीरता से शायद ही किसी नें लिया हो .वे इसे इतिहास का पहरुआ बताते हैं .पी.एन.सिंह यह स्वीकार करते हैं कि इतिहास में निहित श्रेष्ठ संभावनाओं की परख एवं अभिव्यक्ति ही साहित्य को श्रेष्ठता प्रदान करती है .इसी रूप में साहित्य इतिहास का पहरुआ है ,उसकी विवेक-भ्रष्टता के विरुद्ध चेतावनी है '.कुबेरनाथ राय विराट राष्ट्रीय चिंता के निबन्धकार है .उनके इतिहास-बोध को लेकर प्रश्न उठाते हैं ,लेकिन उनका संस्कृति बोध और साहित्य -बोध असंदिग्ध रूप से श्रेष्ठ है .'(पृष्ठ ८१-८२ )
डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार अगर लालित्य द्विवेद्वी जी के निबंधों को परिभाषित करता है तो दायित्व -बोध से कुबेरनाथ राय के निबंध परिभाषित होते हैं ,यद्यपि न द्विवेद्वी जी दायित्व-बोध से मुक्त है और न श्री राय लालित्य से ."(पृष्ठ ८३ )"आधुनिकता -बोध और आधुनिक लेखन के प्रति उनके घोषित अनादर के बावजूद ,उनमें बहुत कुछ है जो गम्भीर मीमांसा की अपेक्षा रखता है . "पृष्ठ ९५ )
             

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

पूंजीवाद पर पुनर्विचार

मैं जब -जब भी मार्क्सवाद के बारे में सोचता हूँ और उसके नजरिए से आज के पूंजीवादी व्यव्हार के बारे में समझने का प्रयास करता हूँ ,दो बातें मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण हैं-पहला यह कि पूंजीवाद मूलतः पूंजी का स्वामित्ववाद है .और यह कि मार्क्सवाद  परंपरागत स्वामित्व की  अवधारणा से सहमत नहीं है .दूसरा यह कि पूंजी के अर्जन और मूल्य -पद्धति से भी .यह लाभ को अतिरिक्त मूल्य मानता है .उसकी दृष्टि में लागत से अधिक का अर्जन अवैध है .मार्क्सवाद अतिरिक्त मूल्य से पूंजी के अर्जन को एक अनैतिक आर्थिक व्यवहार मानता है.पूंजीवादी व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य एक असीमित आर्थिक व्यवहार तक लाभ माना  जाता है .लेकिन यदि अतिरिक्त लाभ में पूंजी अर्जन करने वाले का अपना भी पारिश्रमिक सम्मिलित हो तो एक सीमा तक अतिरिक्त मूल्य भी पारिश्रमिक के रूप में वैध ही हुआ.मैंने मार्क्सवादियों को इस सीमा रेखा पर कभी सैद्धांतिक बहस करते नहीं पाया .
             वयवहार में हम देखते हैं कि पूंजी कि असमानता का एक बड़ा हिस्सा पैतृक विरासत में मिली पूंजी का परिणाम होता है .यह परिवार संस्था के स्थायित्व का प्रमुख आधार होता है .कुलीनतावाद का भी यह प्रमुख आधार है .यहाँ यह एक व्यवहारिक समस्या दिखती है कि यदि साम्यवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत पूंजी को समाप्त करेंगे तो पारिवारिक पूंजी को भी समाप्त करना होगा -अब इसके स्थान पर सामूहिक पूंजी की अवधारणा जो लाएँगे तो देखना यह होगा कि  व्यव्हार में वह कितने बड़े मानवीय समूह को संबोधित हो सकेगा  .वर्तमान में निजी स्वामित्व के व्यापारिक या औद्योगिक संगठन और राष्ट्र दोनों ही दावेदार हैं . सार्वजनिकता के विस्तार कि सीमा क्या होगी !यदि यह वैश्विक या सार्वभौमिक होगा तो उसका व्यावहारिक और सैद्धांतिक स्वरूप क्या होगा ?उपभोग व्यक्ति द्वारा और स्वामित्व सम्पूर्ण मानव जाति का एक नई मनोवैज्ञानिक  संस्कृति का आधार  तो बन सकता है लेकिन उसके व्यावहारिक पक्ष पर सूक्ष्मता से विचार करना होगा .
          समस्या का एक मानवीय पक्ष यह भी  है कि संपत्ति भी मानवीय सृजन का ही एक स्वरूप प्रकार है ..यह उसके अस्तित्व और विकास का भी प्रमुख आधार है .इसलिए संपत्ति के स्वामित्व से अधिक सृजन के अधिकार और अवसरों कि व्यवस्था करनी होगी.दूसरा यह है कि औसत संपत्ति को शुन्य और समान मानकर बड़े पूंजीपतियों के होने को प्रतिबंधित किया जाए.लेकिन ये सभी पूंजीवाद और साम्यवाद के आन्तरिक सामाजिक पक्ष ही हैं .
             एक  अन्य समस्या यह भी है कि राजनीतिक संगठन और आर्थिक संगठन की  सदस्यता का आपसी रिश्ता क्या हो ?राजनीतिक संगठन जो सार्वजनिक व्यवस्था से सम्बंधित होते हैं ,वे आर्थिक प्रबंधन से अधिक व्यापक और मानवीय सरोकार वाले होते हैं.आर्थिक प्रबंधन और व्यव्हार अपेक्षाकृत सीमित होते हैं.आज की  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों  की  पूर्वज प्राचीन काल की वणिक जातियां थी .वे एक व्यापक ईकाई की  तरह व्यवहार कराती थीं..
           प्राचीन काल से ही देखें तो राजा सिर्फ मुद्रा और उसके मूल्य का सैद्धांतिक निर्धारण ही करता था.राजनीतिक सत्ता का अस्तित्व आर्थिक मुद्रा और मूल्य के कारखाने की तरह ही रहा  है यद्यपि पूंजी के प्रचलन और व्यव्हार को बाजार ही तय करता रहा है .इसे एक विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है .साम्यवादी व्यवस्था जिस शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना करती है ,उसका कार्यान्वयन समाज के स्वतन्त्र मुद्रा -व्यवहार के नियमन के बिना संभव ही नहीं है .क्योंकि साम्यवादी व्यवस्था में भी स्वतन्त्र मुद्रा आर्थिक विषमता की  सृष्टि करेगा .जो अंततः आर्थिक साम्यावस्था को समाप्त कर देगा .इस लिए साम्यवादी व्यवस्था में बाजार और मुद्रा कि भूमिका पर भी विचार करना होगा .
           मार्क्स के अधिकांश सिद्धांत समाज के बहुआयामी एवं बहुस्तरीय आर्थिक व्यवहार की अवहेलना करते दीखते हैं .कृषि-भूमि की समता की अपेक्षा व्यावसायिक क्षेत्र की समता की परिकल्पना अधिक जटिल होगी ही .आज के अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के युग में बहुराष्ट्रीय आर्थिक संगठन स्वतन्त्र सरकारों की  तरह व्यव्हार कर रहे हैं..इस लिए आज आर्थिक नागरिकता की भी परिकल्पना करने का समय आ गया है .एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का मजदूर एक सामान्य कम्पनी के मजदूर की तुलाना में धनी माना जा सकता है .इसतरह देखें तो सर्वहारा की परिकल्पना भी एक सापेक्षिक और तुलनात्मक परिकल्पना ही है .सामूहिक जीवन-स्तर की दृष्टि से समय शोषक राष्ट्र और शोषित राष्ट्र की परिकल्पना का भी है .स्पष्ट है कि शोषक राष्ट्र का सर्वहारा भी शोषक सर्वहारा ही होगा .परंपरागत मार्क्सवाद में यह सापेक्षिक तुलनात्मक चेतना नहीं है .आर्थिक रूप से संरक्षित और असंरक्षित नागरिक के रूप में देखें तो कर्मचारी को सर्वहारा के स्थान पर संरक्षित नागरिक मानना होगा.बेरोजगार को असंरक्षित नागरिक या सर्वहारा .जब नई पीढ़ी में सतत बेरोजगार अधिक मात्रा  में उपलब्ध हो तो क्रांति के लिए कारखानों के मजदूर तलाशना भी अव्यवहारिक परिकल्पना ही लगाती है ,
            .ऐतिहासिक दृष्टि से मार्क्स का समय साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का था .इसलिए सर्वहारा के अधिनायकत्व की परिकल्पना भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की. अभियांत्रिकी के स्तर पर देखें तो अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी की  अभियांत्रिकी दैत्याकार थी  .पहली बार मानवजाति नें यंत्रों से असंभव को संभव करना सीखा .यांत्रिक पद्धति-निर्माण की  सृजनशीलता के प्रति अतिरिक्त आस्था और उत्साह नें बड़े नियमन की  भी परिकल्पना दी थी .साम्यवाद एक अधिनायक-सत्ता का भी चिंतन है .एक सबल नियामक सत्ता की परिकल्पना के पीछे साम्राज्यवाद की  सत्ता-परिकल्पना का भी प्रभाव रहा होगा .मध्य-वर्ग के व्यापक विकास के साथ इस तरह से शासित होने की आज कोई परिकल्पना ही नहीं कर सकता .
     

शनिवार, 23 मार्च 2013

जातीय अर्थ-तंत्र और उपभोक्ता


भारत में बेताहाशा बढ़ती मंहगाई का एक समाज-संरचनात्मक कारण भी है .यहाँ अनेक जीवनोपयोगी वस्तुएं अलग-अलग जातीय समुदायों के नियन्त्रण में हैं .कुछ व्यवसाय तो ऐसे हैं कि जिन्हें भारत की परंपरागत जातियां ही संभाले हुए हैं -जैसे बाल काटने का काम नाई ,सोने के गहने बनाने का काम सुनार,जूते बनाने का कम मोची तथा इसी तरह दूध बेचने का काम ,गल्ला आदि खाद्यसामग्री बेचने का कार्य भी जाति -विशेष ही करते दीखता है .इस तरह  भारत के अधिकांश बाजार ,भारतीय राजनीति की तरह ही परंपरागत रूप में जातीय अर्थतन्त्र के शिकार है. वे एक गिरोह के रूप में अन्य जातियों के रूप में फैले हुए व्यापक उपभोक्ता समुदाय से  संगठित दुर्व्यवहार करता रहता है  भारतीय बाजारों का यह जातीय अर्थ-तन्त्र उसके व्यव्हार को विषम बनता है . भारत में उपभोक्ता-हितों  की अनदेखी की यह सबसे बड़ी वजह है कि अधिकांश पेशे एवं व्यवसाय जाति-विशेष के हाथों में केन्द्रित है ..दूध ,फल 'मिठाइयाँ 'काष्ठ-कला आदि सभी .कई बार मंहगाई का सम्बन्ध अन्य जातियों में बटे -बिखरे उपभोक्ता के विरुद्ध जाति-विशेष के संगठित व्यव्हार के रूप में भी होता है. मंहगाई इस अर्थ में एक जाति विशेष  का क्रूरतापूर्ण जातीय -व्यवहार भी है.
           ऐसे में यह मानना कि आधुनिकता इस समाज के आर्थिक व्व्यव्हार को पूरी तरह सभ्य और मानवीय बना देगी;पूरी तरह सही नहीं है .जातीय-व्यवहार एवं सामुदायिक एकता का अर्थ-तंत्र उपभोक्ता-समाज को अमानवीय पराएपन के साथ देखता है .किसानो के प्रति इन व्यवसायी जातियों का संगठित व्यव्हार कुछ -कुछ वैसा ही होता है ,जैसा व्यव्हार  नदी पर कर रहे वाइल्डबीस्ट एवं जेब्रा प्रजाति के जानवरों के प्रति  मगरों का होता है .नई फसल आने के पहले ही वे गेहूं और दलहन आदि का मूल्य अप्रत्याशित रूप से बहुत ही कम घोषित कर देते हैं .इसी तरह विवाह आदि की तिथियाँ घोषित करने पर जाति-विशेष का हाथ रहता है 'जिसके पुरखों ने फसल के पकने के समय में ही प्रायः शुभ मूहुर्त तलाश रखे हैं .स्वाभाविक है कि कर्ज आदि दबाव में वह अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर रहता है .इसे कहना चाहें तो उपभोक्ता प्रजाति पर शेरोंके हमले के रूप में देख सकते हैं .अब भी व्यवसाय -विशेष में जाति -विशेष की ही प्रमुखता है .
              भारत में इस जातीय शोषण-तंत्र के कारण ही कई बार लोकतान्त्रिक सरकारें भी कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में होती हैं  ऐसा  मूल्य-निर्धारण की शक्ति जाति-विशेष की सामूहिकता में केन्द्रित होने से होता रहता है पूंजी के संचय के कारण कृत्रिम अभाव की स्थिति पैदा कर पाना इस जातीय अर्थ-तंत्र के लिए आसान होता है .इस अर्थ-तंत्र से बहुत नैतिक होने की उम्मीद नहीं की जा सकती .उदहारण के लिए उत्तर भारत में जाति -विशेष के लोगों का दूध के व्यवसाय में परम्परागत रूप से वर्चस्व है .दूध का उत्पादन स्वयं अपनें यहाँ न होने की स्थिति में भी दूसरे पशुपालकों से दूध खरीद कर भी बेचने का व्यवसाय इस जाति के लोग करते हैं.खरीदते समय पूरी तरह शुद्ध और बेचते समय प्रायः जल-युक्त और अशुद्ध ही इस जाति की प्रमुख जातीय नीति है .उपभोक्ताओं के साथ वे ऐसा दुर्व्यव्हार वे जातीय सामूहिकता में करते हैं .बाजार के आर्थिक व्यव्हार पर  इस प्रभाव को हम भारतीय जातिवाद के अन्य आयाम या पार्श्व-प्रभाव के रूप में देख सकते हैं .इस सम्बन्ध में एक व्यक्तिगत संसमरण भी प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करना चाहूँगा .मुझे याद है
बचपन में मेरे जन्म-स्थान के पास वाले बाजार में एक ही जाति -विशेष के लोग सब्जी बेचने के व्यवसाय में थे .एक दिन सभी सब्जी व्यवसायियों नें जातीय पंचायत करके यह तय किया था कि भले ही सब्जी सड़ जाए या उसे फेंक देनी पड़े ,कोंई भी उसे व्यक्तिगत रूप से उसे निर्धारित मूल्य से कम में नहीं बेचेगा .
           इधर सब कुछ बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जो दुकाने प्रचालन में आने जा रही हैं ,वे व्यवसायियों के जातीय समुदाय विशेष को दुष्प्रभावित तो करेंगी लेकिन मुक्त एवं वैकल्पिक प्रतिस्पर्धा में
जातीय पूंजीवाद के संगठित व्यवहार से भारतीय बाजारों को मुक्ति भी मिलेगी.उनका निरंकुश आर्थिक व्यवहार संयमित और प्रतिस्पर्धी होने के लिए विवश होगा.अधिक अच्छा तो यह होता कि समाज सेवा के क्षेत्र की तरह आर्थिक सेवा के क्षेत्र में भी स्वयंसेवी संगठन या संस्थाएं सक्रिय होतीं .भारत में जाति-निरपेक्ष राजनीति की तरह जाति-निरपेक्ष बाजार की भी आवश्यकता है .एक ऐसे बाजार की जो अपेक्षित लाभा के साथ उपभोक्ताओं के प्रति भी सहृदय और संवादी हो.निजी क्षेत्र की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित रखने के लिए ही पिछली सरकारों नें नियंत्रित मूल्य वाली दुकानें जिन्हें जनसामान्य कोटे वाली दुकानें कहता है-खुलवायी थीं.वे दुकानें अब भी चल रही हैं ,लेकिन उनका उद्देश्य निम्न आय वर्ग के लोगों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करना है .इसे बाजार की समानांतर व्यवस्था के रूप में नई परिकल्पना के साथ
और व्यापक तंत्र के रूप में विकसित किए जाने की जरुरत है .
              गाँधी युग की बहुत सी संस्थाएं ,जो प्रायः खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अनुदानों पर पलती रही हैं -यदि समय के साथ अपनें को परिवर्तित कर आर्थिक जनसेवा केन्द्रों के रूप में विकसित की जाएँ तो बाजार के निरंकुश व्यवहार के समानांतर एक स्थिर व्यवहार वाले तन्त्र बनाए जा सकते हैं .एक बेहतर विकल्प
सरकारी मॉल का भी हो सकता है .सिद्धान्ततः बाजार की प्रतिस्पर्धा उसे कम मूल्य के साथ अधिक बेहतर बनानें की ओर होना चाहिए लेकिन परम्परा से अधिक खुदगर्ज और पेशेवर भारत का जातीय अर्थतन्त्र
सामान्य उपभोक्ता को शिकारी हिंसक पशुओं की तरह घेर कर उससे अधिक से अधिक लाभ कमानें में विश्वास करता है .

गुरुवार, 21 मार्च 2013

कविता में किसान

अभिनव कदम - अंक २८

संपादक -जय प्रकाश धूमकेतु में प्रकाशित 

                                            
हिन्दी कविता में किसान-जीवन और यथार्थ की उपसिथति-अनुपसिथति के बढ़ते-घटते ग्राफ को समझने के लिए हमें साहित्य से पहले हिन्दी-क्षेत्र के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को समझना होगा । यह एक दुखद सच्चार्इ है कि औधोगिककरण,शहरीकरण,बाजारवाद और भूमण्डलीकरण की दिशा में हुए देश के विकास तथा सरकारी नीतियों नें एक पेशे के रूप में किसान जीवन को अप्रतिषिठत किया है । इस सच्चार्इ का एक दूसरा पहलू यह है कि ह रित क्रानित के बाद आर्इ खाधान्न की उपलब्धता  से उपजी सुरक्षा और निशिचंतता  नें उदासीन करते हुए मीडिया और साहित्य से किसान-चर्चा को बाहर कर दिया है । भारत में संयुक्त परिवार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण  परम्पराजीवी  आम आदमी अब भी अपने पारिवारिक सदस्यों का नैतिक रूप से आर्थिक और सामाजिक सहयोगी बना हुआ है । पशिचमी देशों से अलग बेरोजगारों कुणिठतों और पागलों तक का भरण-पोषण एवं चिकित्सा-व्यय भारत में सरकार नहीं बलिक परिवार संस्था ही कर रही है । परिवार का कमाऊ सदस्य प्राय: अपने हिस्से की जमीन इसी नैतिक दबाव के कारण ही परिवार के असफल एवं बेरोजगार सदस्यों के हवाले कर देते हैं  । सिर्फ इतने पर ही सन्तोष कर लेते हैं कि जमीन अब भी उनके नाम से सरकार के यहां दर्ज है । यह सांस्कृतिक पोषण ही किसान यथार्थ की विभीषिका को कम करके दिखाती है । यही राजनीतिज्ञों की संवेदनशून्यता के भयावह दुष्परिणामों को भी पूरी तरह फलित होने से देश को बचाए हुए है ।  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष व्यकित को मिलने वाला यह पारिवारिक संरक्षण असन्तोष और अवसाद को क्रानित की उस सीमा तक नहीं पहुंचने देता ,जिसकी प्रतीक्षा देश की वामपन्थी पार्टियां लम्बे समय से करती आ रही हैं ।

     किसान असन्तोष को कम करने वाला एक और निर्णायक प्रभाव रामकथा का भी है । औधोगिककरण और बाजारीकरण के भारी दबाव के बावजूद रामकथा अब भी एक प्रभावकारी सांस्कृतिक-सामाजिक प्रेरक शकित के रूप में पारिवारिक व्यवहार और आर्थिक सम्बन्धों का संविधान रच रह ी है । इसीलिए हिन्दी कविता में किसानों की सिथति का विश्लेषण तुलसी के राम से ही आरम्भ करना उचित होगा । तुलसी के राम किसानी तो नहीं करते लेकिन उस बीज संस्कृति का निर्माण अवश्य करते हैं ,जिसपर भारतीय किसान जीवन का पूरा अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र टिका हुआ है । रामकथा कृषिभूमि का पारिवारिक विभाजन रोकती है । परिचार में सामूहिक खेती की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तैयार करती है । कम भोगलिप्सा वाले सन्तोषी जीवन की प्रेरणा देती है । रामकथा के बल पर ही भारतीय किसान कम जीवन-स्तर पर भी बिना असन्तुष्ट हुए जीता रहता है । इस दृषिट से रामकथा भारतीय कृषि-सभ्यता के लिए अत्यन्त आवश्यक आधार-महाकाव्य है । उसी के प्रभाव से ग्रामीण किसान जन-जीवन को संरक्षण सरकार से नहीं बलिक संयुक्त परिवार के उन सामाजिक रि श्तों से मिलता रहा है ,जिसके कारण बाहर जाकर नौकरी या व्यवसाय से अधिक अर्जन करने वाला परिवार का सदस्य किसानी में लगे अपने स्वजन के हवाले अपने खेत कर ही देता है ,भले ही वह भरत को दिए गए खड़ाऊं की तरह धरोहर के रूप में ही क्यों न हो ।  रामकथा आज भी उन्हें परदेशी भार्इ के हिस्सों को हड़पने से भरत की तरह रोकती है । बाहर कमाने के लिए हुए भारी संख्या में निर्वासन या पलायन नें गांव में रहकर कृषि-कार्य में लगे हुए सदस्यों को कुछ राहत तो दिया है । अब बाहर मुम्बर्इ या गुजरात कमाने गया पूर्वी उत्तर-प्रदेश  या बिहार का कोर्इ व्यकित अपने घर से गेहूं तो नहीं ही मंगाएगा । इस भारतीय संकोच नें ही किसानों की आर्थिक और सामाजिक क्षतिपूर्ति की है ।

      अब प्रश्न यह उठता है कि वास्तविक किसान समस्या है किस रूप में तो हमें समझना होगा कि सौ कुन्तल गेहूं उपजाने वाला किसान भी,जिसे बड़ा काश्तकार कहा जाएगा ,वर्ष में एक फसल लेने की सिथति में एक लाख से  डेढ़ लाख रुपए तक की ही आय कर सकता है । यदि वर्षा ऋतु की दूसरी फसल धान आदि की आय भी जोड़ दे ंतो यह बाजार-भाव के हिसाब से दो से तीन लाख की आय ही होती है । इस आय को नौकरी से लिने वाले वेतन में बदलें तो लागत घटाने के बाद उसकी आय चपरासी या क्लर्क को मिलने वाले वेतन के बराबर ही होगी । उसकी मासिक आय पन्द्रह से लेकर तेर्इस हजार के आस-पास ही पहुंचेगी ।

     यह सिथति तब है जब उसके पास पन्द्रह-बीस एकड़ खेत की उपज हो ।  संभवत: यही कारण है कि परिवार में सिर्फ बेरोजगार और असफल सदस्य ही किसान जीवन अपनाते हैं । आज की तारीख में किसान बनना दूसरों की सहानुभूति का पात्र होना और कुणिठत होना है । ऐसी सिथति में कोर्इ कवि,भले ह ीवह गांव से ही भागकर दिल्ली आया हो,किसान-जीवन का कैसे भव्यीकरण करेगा ?

    भारतीय किसान इसलिए पल जाता है कि वह बाजार की मुद्रा के बल पर नहीं बलिक श्रम से अर्जित उपज से भोजन प्राप्त कर सकता है । विवाह आदि में दहेज जैसी कुरीतियों से निपटनें के लिए उसे या तो खेत बेचना होगा या फिर अनाज । वह अपना जीवन-स्तर घटाकर ही सुरक्षित जीवन-यापन कर सकता है । किसान-यथार्थ के प्रति इस समझ को लेकर जब हम हिन्दी कविता की पड़ताल करते हैं तो ऐतिहासिक दृषिट से यह साफ-साफ दिखार्इ देता है कि भारत के विकसित राष्æ बनने के साथ-साथ बढ़ती उपज और खाधान्न सुरक्षा नें कविता से किसानों को क्रमश: निर्वासित ही किया है । प्रगतिवाद के बाद प्रयोगवाद और फिर नर्इ कविता का आन्दोलन नएपन की खोज में शहरी मध्यवर्गीय जीवन और अनुभूति की सामूहिक अभिव्यकित के रूप में सामने आता है । इस दौर में अपवादस्वरूप ही किसान जीवन से सम्बनिधत कविताएं मिलती हैं । कविता विषय और शिल्प दोनों ही स्तरों पर मनोवैज्ञानिक और संशिलष्ट होती गयी है। धूमिल तक आते-आते तो वह बिम्बात्मक चिन्तन की भाषा में व्यक्त होने लगती है ।  यह निरीक्षण महत्वपूर्ण है कि केदारनाथ सिंह की बाघ कविता में बाघ किसान को  æैक्टर चलाते बहुत दूर से देखता है। यह एक यानित्रक दुनिया का किसान है और स्वाभाविक है कि कविता के बाघ के साथ-साथ कवियों को भी उस प्राकृतिक राग से दूर कर देता है ,जो कुछ ही समय पूर्व तक केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में पूरी उत्सवधर्मिता के साथ व्यक्त हुर्इ है । अब वह एक लुप्त होती प्रजाति और विनाश के रूपक में ही कविता में लौट सकता है और वह इसी त्रासद रूप में लौटा भी है ।  कहीं कालाहांंडी तो कहीं विदर्भ के रूप में ।

           हिन्दी कविता में किसान की उपसिथति को ऐतिहासिक सर्वेक्षण के रूप में देखें तो वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में मिलता है । कहीं पूरे जीवन और परिदृश्य के साथ तो कहीं कविता के बिम्ब और भाषा के शिल्प या माध्यम के रूप में । अप्रत्यक्ष उपसिथति वाली कविताएं किसान अनुभव और संवेदना को किसी अन्य दार्शनिक संदेश या भावबोध में रूपान्तरित करती हैं । ऐसी कविताएं सबसे अधिक संख्या में भवानीप्रसाद मिश्र के यहां मिलती हैं ।  हिन्दी कविता के इतिहास में जाने पर किसान-यथार्थ की सबसे पहली तलाश स्वाभाविक है कि भारतेन्दु जी के यहां से ही शुरू हो । भारतेन्दु जी किसान जीवन से उदासीन नहीं थे । वे किसानों की दीन दशा से परिचित भी थे ,जैसा कि निम्न पंकितयों से पता चलता है-

    ''मरी बुलाऊं देस उजाड़ूं मंहगा करके अन्न

     सबके ऊपर टिकस लगाऊं धन मुझको धन्न

     मुझे तुम सहज न जानो जी,मुझे राक्षस मानों जी ।

ल्ेकिन आम धारणा के विपरीत उत्सवधर्मी और मनमौजी प्रतिभा के धनी भारतेन्दु जी का ब्रजभाषा में रचा गया काव्य-साहित्य कृष्ण जू और राधा जू के लीला गान से ही भरा पड़ा है । कल्पना की जा सकती है कि ऐसा उन्होंनें अपने नए-नए पदों को शाम की गोष्ठी में साहितियक अभिरुचि वाले नगर श्रेषिठयों को सुनाने और उनसे वाह-वाह सुनने के लिए ही किया होगा । वे जिस व्यवसायी वर्ग से स्वयं भी आते थे ,वहां स्रोताओं की प्राथमिकता धार्मिक रचनाएं सुनने की ही रही होगी । यह भी संभव है कि कहीं अचेतन में सूर से प्रतिस्पद्र्धा भी रही हो-आखिर प्रतिभाशाली तो थे ही ।यह भी कि भारतेन्दं का युग सांस्कृतिक जीवनयापन का युग था । किसान जीवन उनके युग का इतना सर्वव्सापी स्थूल सच था कि उसे व्यापक रूप् से कविता का विषय बनाने के बारे में सोचना उनकी मनोवैज्ञानिक बनावट में ही नहीं था ।  दरअसल वे नागरिक जीवन-बोध के कवि थे । ऊपर की पंकितयों में भी संभवत: वाराणसी जैसे महानगर में रहने के कारण ही कृषि-उपज के बाजार-मुल्य तथा किसानों के प्रति सहानुभूतिशील कृतज्ञता की भावना से वे आगे नहीं जा सके हैं । इस सीमा के बावजूद किसानों की दीन-दशा का आभास देने वाली कविता की मार्मिक पंकितयां भारतेन्दु जी के साथ-साथ उस काल के अन्य कवियों में भी पूरी संवेदनशीलता के साथ मिलती है। बालमुकुन्द गुप्त नें किसान के कष्टों का विशद वर्णन किया है-''जिनके कारण सब सुख पावें,जिनका बोया सब जन खांय,हाय-हाय उनके बालक नित भूखों के मारे चिल्लांय.......अहा ! बिवारे दु:ख के मारे निसि-दिन पच-पच मरें किसान।जब अनाज उत्पन्न होय तब सब उठवा ले जांय लगान । किसानों की दीन दशा का चित्रण भारतेन्दु युग में बद्री नारायण चौधरी 'प्रेमधन जी नें भी किया है।  उनके 'जीर्ण जनपद शीर्षक प्रबन्ध-काव्य में किसानों के अभिशप्त जीवन की करुण झांकी मिलती है -''दीन कृषक जन औरहु दया योग दरसावहीं ।जिनके तन पर स्वच्छ वस्त्र कहुं लखियत नाहीं ।मिहनत करत अधिक पर अन्न बहुत कम पावत,जे निज भुजबल हल चलाय के जगत जियावत।

 द्विवेद्वी युग देखें तो इस युग के कवियों द्वारा किसान जीवन और यथार्थ को लेकर लिखी गर्इ कविताओं में सनेही द्वारा लिखित 'दुखिया किसान ( सरस्वती ,जनवरी 1912)तथा 'आत्र्त कृषक (सरस्वती,अप्रैल 1914),मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखित'कृषक कथा(सरस्वती,जनवरी 1915)और भारतीय कृषक (सरस्वतीमर्इ 1916) किसानों की दयनीय दशा का परिचय देने के लिए लिखे गए हैं । इस युग में कृषकों के प्रति शिक्षित जनता का ध्यान आकृष्ट करने के लिए दो प्रबन्ध काव्य भी लिखे गए ।कृषक क्रन्दन(1916 र्इ0)सनेही लिखित तथा गुप्त जी द्वारा लिखित 'किसान। दोनों ही प्रबन्ध-काव्यों के नायक किसान हैं । कृषक क्रन्दन के नायक का परिवार सूदखोर महाजन,अत्याचारी बाबा साहब और पुलिस के सिपाहियों के जुल्मों का शिकार बनता है । एक भरा-पुरा कृषक परिवार एक-एक करके नष्ट हो जाता है । भूख से तड़पकर दम तोड़ने वाला नायक मरते समय भगवान से यह प्रार्थना करता है किहे प्रभु ! अब इस क्रूर देश का मुंह न दिखाना....कुछ भी रचना और किन्तु मत कृषक बनाना। गुप्त जी के किसान-नायक की प्रार्थना भी कुछ इसी प्रकार की है ।

 गुप्त जी ने भारत-भारती में कृषकों की अवस्था का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि 'सौ पर पचासी जन यहां निर्वाह कृषि पर कर रहे ।पाकर करोड़ों अद्र्ध भोजन सर्द आहें भर रहे ।हा देव !क्या जीते हुए आजन्म मरना था इन्हें?भिक्षुक बनाते ,पर विधे !कर्षक न करना था इन्हें ।

 गुप्तजी के प्रसिद्ध महाकाव्य साकेत में  भी  किसान जीवन रामकथा के बहाने ही स ही मानव-सभ्यता के महत्वपूर्ण आयाम के  रूप में उपसिथति हुआ है । साकेत के अष्टम सर्ग में बनवासी राम और सीता का आजीविका के लिए कृषि-कार्य में रत होना किसान जीवन को भी एक गरिमा प्रदान करता है । अपने लगाए हुए पौधों को सींचते हुए सीता पूछती हैं किअच्छा ,ये पौधे कहो फलेंगे कब लौं ध राम उन्हें सही ढंग से कृषि की विधि बतलाते हैं-'' पौधे सींचो ही नहीं,उन्हें गोड़ो भी,डालों को चाहो जिधर,उधर मोड़ो भीसाकेत के नवम सर्ग में गुप्त जी का ध्यान किसान कर्म और जीवन से हटकर किसान मन की ओर भी गया है । पता नहीं साकेत की निम्नलिखित पंकितयों पर कभी किसी माक्र्सवादी आलोचक की दृषिट पड़ी कि नहीं  । किसान जीवन जो धरती से जुड़ा है और मानव-जाति के असितत्व और उसके आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का भी आधार है । साकेत के निम्न गीत को उसका रूपक भी मान सकते हैं -'' मेरी ही पृथिवी का पानीले-लेकर यह अन्तरिक्ष सखि,आज बना है दानी !मेरी ही धरती का धूम,बना आज आली,घन धूम।गरज रहा गज-सा झुक-झूम,ढाल रहा मद मानी।मेरी ही पृथिवी का पानी । सारी अर्थव्यवस्था किसान-जीवन की रीढ़ पर टिकी हुर्इ है । अहंकार में डूबी हुर्इ । उसे ही छोटा और दीन-हीन करती हुर्इ । बादलों को देखकर कवि का किसान-मन पुकार उठता है-व्यग्र उदग्र जगज्जननी के,अयि अग्रस्तन बरसो।....चिन्मय बनें हमारे मृण्मय पुलकांकुर वन,बरसो । साकेत की सीता समाचार के नाम पर अपने देवर लक्ष्मण से फसल के बारे में पूछ-ताछ करती हैं-पूछी थी सुकाल-दशा मैंने आज देवर से-कैसी हुर्इ उपज कपास,,र्इख,धान की?.....पूछा यही मैंने एक ग्राम से तो कृषकों नें,अन्न,गुड़,गोरस की वृद्धि ही बखान की,। 

      छायावादी कवियों में निराला जी की कर्इ कविताओं में किसान जीवन रूपायित हुआ है । उनकी प्रसिद्ध कविता 'बादल राग की निम्नलिखित पंकितया ंतो किसानों को समर्पित हैं ही -'जीर्ण बाहु है शीर्ण शरीरतुझे बुलाता कृषक अधीरऐ विप्लव के वीर !चूस लिया है उसका सारहाड़ मात्र ही है आधारऐ जीवन के पारावार ! इसी तरह उनकी दीन कविता के केन्द्र में भी केन्द ्रीय प्रतीति किसान जीवन की ही है -'सह जाते होउत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्नदय तुम्हारा दुर्बल होता भग्न,...कह जाते हो-यहां कभी मत आना,उत्पीड़न का राज्य दु:ख ही दु:खयहां है सदा उठाना।

उनकी विनय और उत्साह शीर्षक कविताएं किसान मन से बादलों को संबोधित हैं । वे किसान की नर्इ बहू की आंखें उसके निष्प्रभ यौवन का करुण शोक गीत ही हैं । उनकी पाचक शीर्षक कविता किसानों की दुर्दशा को समझने ंके लिए कुछ सूत्र देती है -''आदमी हमारा तभी हारा है,दूसरे के हाथ जब उतारा हैराह का लगान गैर नें दिया,यानि रास्ता हमारा बन्द कियामाल हाट में है और भाव नहीं,जैसे लड़ने को खड़ेदांव नहीं । निराला जी की अन्य कविताओं में 'लू के झोकों...'काले-काले बादल छाए.... तथा''जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ... शीर्षक कविता तो भारतीय किसान समस्या के जातीय पक्ष और स्वरूप की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है -'' आज अमीरों की हवेलीकिसानों की होगी पाठशाला,धोबी,पासी,चमार,तेलीखोलेंगे अंधेरे का ताला,एक पाठ पढ़ेंगे,टाट बिछाओ।

  हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का स्वागत करने वाले सुमित्रानन्दन पंत की युगान्त,युगवाणी और ग्राम्या संकलन की कर्इ कविताओं में किसान जीवन उपसिथत है । जैसा कि स्वयं पंत जी  ने ही माना था कि ग्राम्या की कविताएं ग्राम्य जीवन के प्रति बौद्धिक सहानुभूति की ही कविताएं हैं-''यहां धरा का मुख कुरूप हैकुतिसत गर्हित जन का जीवन...जहां दैन्य जर्जर असंख्य जनपशु जघन्य क्षण करते यापन(ग्रामकवि शीर्षक कविता)। पन्त की ग्राम्या एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी के पर्यटन-दृषिट से ही सही ग्राम्य जन-जीवन के बहुआयामी यथार्थ की पड़ताल तो करती ही है । पन्त का किसान वर्णन उनके भोगे हुए यथार्थ पर आधारित न होने की वजह से अथवा एक किसान जैसे आत्मीय रिश्ते की कमी से केदारनाथ अग्रवाल की किसान मन और संवेदना से लिखी गर्इ कविताओं जैसी प्रभावी और विश्वसनीय नहीं हो पातीं।

फिर भी इतना तो स्वीकार करना होगा कि महाकवि पन्त नें किसान जीवन और उसके यथार्थ को अत्यन्त सम्मान एवं सहानुभूति की भावना से देखा है ।

 छायावादोत्तर कवियों में किसान जीवन पर लिखी गयी एक मार्मिक रिपोर्ताज कविता भगवती चरण वर्मा की भैंसा गाड़ी है -उस ओर क्षितिज के कुछ आगे,कुछ पांच कोस की दूरी पर,भू की छाती पर फोड़ों-से,हैं उठे हुए कुछ कच्चे घर ।मैं कहता हूं खडहर उसको पर वे कहते हैं उसे ग्राम।जिसमें भर देती निज धुंघलापन,असफलता की सुबह शाम।पशुबन कर नर पिस रहे जहां,नारियां जन रही हैं गुलाम।पैदा होना फिर मर जाना,यह है लोगों का एक काम ।......'चरमर चरमर-चूं-चरर-मररजा रही चली भैंसागाड़ी ! इस कविता में भैंसा गाड़ी का बिम्ब असुविधाओं और कठिनाइयों से भरे किसान-जीवन-समय के धीरे-धीरे चलनें की जो व्यंजना भेसे के रूप् में काले समय के साक्षात्कार के साथ करता है वह प्रशंसनीय है ।

 छायावादोत्तर कवियों में यदि किसी नें सजग ,सुनियोजित और पूरी वैचारिक तैयारी के साथ ं किसान जीवन और यथार्थ पर केनिद्रत कविताएं लिखी हैं तो वे प्रसिद्ध आलोचक एवं कवि डा0रामविलास शर्मा ही हैं । स्वयं रामविलास शर्मा नें तारसप्तक के दूसरे संस्करण में पुनश्च के अन्तर्गत न सिर्फ किसान यथार्थ के प्रति अपने निजी आकर्षण को व्यक्त किया है बलिक  उन कवियों की प्रशंसात्मक चर्चा भी की है जिनकी कविताओं में उपसिथत किसान जीवन से वे प्रभावित थे । उन्होंने लिखा है कि '' मेरा बचपन अवध  के गावों में बीता । उन संस्कारों के बल पर मैंने वहां के प्राकृतिक सौन्दर्य और सामाजिक जीवन पर कुछ कविताएं लिखीं । 'निराला जी के रेखाचित्रों ,स्वर्गीय बलभद्र दीक्षित'पढ़ीस की अवधी कविताओं और (खड़ी बोली में लिखी हुर्इ)कहानियों,' सुमन, ,गिरिजाकुमार  माथुर और केदारनाथ अग्रवाल की अनेक कविताओं ,पन्त की ग्राम्या ,वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों ,इधर के आंचलिक कथा-साहित्य में यह ग्राम-जीवन-सम्बन्धी प्रवृतित पल्लवित और पुषिपत होती रही है । उस परम्परा की एक कड़ी मेरी अवध-सम्बन्धी कविताएं भी हैं ।  यधपि हिन्दी कविता में सुविचारित रूप से किसान जीवन और यथार्थ का चित्रण रामविलास शर्मा के अतिरिक्त प्रमुख प्रगतिवादी कवियों केदारनाथ अग्रवाल,नागाजर्ुन और त्रिलोचन में भी मिलता है लेकिन अपने एकमात्र काव्य-संग्रह रूपतरंग और तारसप्तक में प्रकाशित कम कविताओं में ही अधिकांश को किसान जीवन से सम्बनिधत करके तथा अपने मित्र-कवि केदारनाथ अग्रवाल को इसी प्रवृतित के लिए लगातार प्रशंसित और प्रेरित करके हिन्दी कविता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है ।

 रामविलास शर्मा नें अपनी कविताओं मे किसान जीवन को एक वैचारिक के साथ क्रानितकारी परिप्रेक्ष्य देने का प्रयास किया है -धरती के पुत्र की ,जोती है गहरी दो-चार बार,दस बार,बोना महातिक्त वहां बीज असन्तोष का,काटनी है नये साल फगुन में फसल जो क्रानित की ।(कार्य क्षेत्र कविता) रामविलास शर्मा की तारसप्तक की प्रकाशित कविताओं में ही चांदन ी,कतकी ,शारदीया ,सिलहार  आदि किसान यथार्थ को लेकर लिखी गर्इ वैचारिक सौन्दर्य की विशिष्ट कविताएं हैं । ये कविताएं अपने ढंग से एक बड़े अभाव की पूर्ति करती हैं । आम धारणा से अलग इन कविताओं को ध्यान से देखा जाय तो संवेदना और सांकेतिकता से भरपूर ये अंगेजी कविता का संस्कार लिए उच्चस्तरीय बिम्बधर्मी कविताएं हैं -खेतों पर ओस-भरा कुहरा,कुहरे पर भीगी चांदनीआंखों में बादल से आंसू,हंसती है उन पर चांदनी।('चांदनी कविता) माक्र्सवादी विचारधारा के कवि नें चांदनी को अपनी कुछ टिप्पणियों और कुछ बिम्बों के माध्यम से पूंजीवादी कविता के झूठे चकाचौंध और परजीवी शोषक वैभव का प्रतीक बना दिया है -'यह चांद चुरा कर लाया है सूरज से अपनी चांदनी । चांदनी का बिम्ब कतकी कविता में भी है लेकिन इस कविता में उसका वास्तविक या प्रकृत रूप में स्वस्थ चित्रण मिलता है ।  शारदीया कविता में पकी हुर्इ फसल का प्रत्यक्षीकरण सोने के रूप में किया गया है ।  दिवा स्वप्न  कविता किसान प्रकृति और किसान जीवन के सान्दर्य को स्वप्नलोक के समानान्तर चित्रित करती है । कहना न होगा कि रामविलास शर्मा की किसान जीवन की पृष्ठभूमि पर लिखी गर्इ ये कविताएं विचार-सौन्दर्य की दृषिट से हिन्दी की उत्कृष्ट कविताएं हैं । प्रथम द्रष्टया अभिधा में लिखी गयी प्रतीत होने वाली ये कविताएं द्विवेद्वी युग या छायावादी युग की कविताओं जैसी नहीं हैं  ,उनकी तुलना निराला या पन्त की कविताओं से भी नहीं की जा सकती । इन कविताओं का काव्यबोध आधुनिक मनाविज्ञान,माक्र्सवाद तथा अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन से विकसित दृषिट का  परिणाम हैं ।

 एक प्रतिबद्ध माक्र्सवादी कवि होने के कारण केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में उपसिथत किसान जीवन का सामाजिक यथार्थ दृषिट के स्तर पर माक्र्सवादी विचारधारा से आच्छादित है । जनकवि केदारनाथ अग्रवाल का मन मूलत: किसान जीवन की समस्याओं एवं किसान-प्रकृति के चित्रण में रमा है । अपनी प्रसिद्ध कविताओं में तो केदारनाथ अग्रवाल नें प्रकृति का साक्षात्कार ही किसान के रूप में किया है-'एक बीते के बराबरयह हरा ठिगना चनाबांधे मुरैठा शीश पर-छोटे गुलाबी फूल का,सज कर खड़ा है।केदार की कर्इ कविताओं में व्याप्त काव्य-सौन्दर्य सिर्फ मानवीकरण अलंकार से व्यक्त नहीं हो पाता,उसे किसानीकरण अलंकार का स्वतंत्र नाम दे देना चाहिए ।  केदार जी नें किसान श्रम और कर्म को जीवन्त रूप में प्रतिबि मिबत करने वाले कर्इ गीत लिखे हैं जैसे 'कटुर्इ का गीत-'काटो काटो काटो करबी मारो मारो हंसिया.....पाटो पाटो पाटो धरतीकाटो काटो काटो करबी।

  केदार जी नें किसान संवेदना से प्रकृति का जो साक्षात्कार किया हैवह कर्इ विशिष्टताओं के कारण पन्त के बाद हिन्दी कविता का दूसरा महत्वपूर्ण प्रकृति-काव्य है । यह प्रकृति किसान के श्रम से परिवर्तित-परिवद्र्धित है । यह हम केदार की आंखों से ही देख पाते हैं कि जो प्रकृति हम देख रहे है उसका वसन्त भी किसान द्वारा बोर्इ गयी सरसों के पीले फूलों के माध्यम से व्यक्त होता है । वह किसान के पसीनें से सिंचित है ।  क्ेदार के ग्रामीण जीवन के यथार्थ-बोध मेें कर्इ स्तर,आयाम और दृषिटयां है। प्रगतिशील साहित्य की अवधारणा के अनुरूप शोषित किसान के शोषण में सहायक रीति-रिवाजों और परम्पराओं की भत्र्सना है तो किसान जीवन के प्रति आत्मीयता और सम्मान भी । सच तो यह है कि केदार जी का सारा काव्य किसान और मजदूर संवेदना का प्रतिनिधि काव्य है । किसान के बेटे की विरासत को लेकर लिखी गयी उनकी प्रसिद्ध कविता की निम्न लिखित पंकितयां निराला की भिक्षुक और तोड़ती पत्थर कविता की परम्परा को आगे बढ़ाती हैं-जब बाप मरा तो यह पायाभूखे किसान के बेटे नें;घर का मलबा,टूटी खटियाकुछ हाथ भूमि-वह भी परती...।. (पैतृक सम्पतित कविता ) क्ेदार जी के काव्य का यथार्थ चित्रण उनकी संवेदनशीलता के कारण विशिष्ट बन पड़ा है । पन्त की तरह माक्र्सवाद उनके यहां सैद्धानितक समझ के साथ उपसिथति नहीं होता बलिक वह गहरी संवेदना के साथ उपसिथति होता है । इस दृषिट से उनकी कुछ कविताएं निराला जी की काव्य-परम्परा को आगे बढ़ाती हैं । केदार जी एक समझदार और प्रौढ़ सभ्यता-समीक्षा भी प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताओं में मानवीय प्रकृति का जो सूक्ष्म निरीक्षण मिलता है वह किसान जीवन में प्रकृति के प्रति मिलने वाली आत्मीयता और राग दीर्घकालिक साहचर्य का ही परिणाम है ।

 नागाजर्ुन की कर्इ कविताओं में किसान यथार्थ ,जीवन के महत्वपूर्ण अनुभव और स्मृति के परिदृश्य आकर्षण तथा जीवन-राग के रूप में सामने आते  है ं -याद आता मुझे अपना वह तरउनी ग्रामयाद आती लीचियां औ आमयाद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भागयाद आते धान....। अकाल और उसके बाद शीषर्क कविता अकाल के सन्दर्भ में ही सही किसान जीवन  का पूरा परिदृश्य ही रच देती है -कर्इ दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास कर्इ दिनों तक कानी कुतिया सोर्इ उसके पास.....दाने आए घर के अन्दर कर्इ दिनों के बाद चमक उठी घर भर की आंखें कर्इ दिनों के बाद किसान जीवन से सम्बनिधत नागाजर्ुन की कर्इ कविताएं किसान-मन की कविताएं हैं । इस दृषिट से उनकी 'बहुत दिनों बाद'मेरी भी आभा है इसमें'फसल'सिके हुए दो भुटटे और सोनिया समंदर देख्ी जा सकती है ।  'बहुत दिनो बादअब की मैंने जी भर देखीपकी -सुनहली फसलों की मुस्कान-बहुत दिनों के बाद....... बहुत दिनों के बाद अब की मैंने जी भर भोगे गन्ध-रूप-रस- शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भूपर नागाजर्ुन की इन कवितओं में प्रकृति साहचर्य और साक्षात्कार का वह आत्मीय उल्लास छिपा है जो सिर्फ किसान मन में ही संभव है । फसल कविता  फसल के आदिम जादू को समझनें और समझाने का प्रयास करती है- ''फसल क्या है और तो कुछ नहीं है वहनदियों के पानी का जादू है वह हाथों के स्पर्श की महिमा है सिके हुए दो भुटटे की किसानी यधपि जेल के भीतर  वार्ड नंबर 10 के पीछे की क्यारियों में कैदी अखिलेश् द्वारा की गर्इ है लेकिन यह कविता किसानी के सृजन-सुख को पूरी गम्भीरता से रेखांकित करती है । सोनिया समंदर कविता गेहूं की लहराती पकी फसल के सौन्दर्य को इन शब्दों में व्यक्त करती है- बिछा है मैदान मेंसोना ही सोनासोना ही सोनासोना ही सोना । नागाजर्ुन पकी फसल के दृश्य का प्रत्यक्षीकरण लहराते हुए सोनिया समंदर के रूप में करते हैंं।

    मुकितबोध की कविता में भी श्रमरत किसानों के बिम्ब मिलते हैं। किसान मुकितबोध के लिए कठिन परिश्रम ,जीवन के आधार और संघर्ष के प्रतिनिधि नायक के रूप में हैं  । सुदूर खेतों में कठिन श्रम के बाद विश्राम और खुले आसमान के नीचे अनौपचारिक ढंग से बने भोजन की सुगन्ध कवि के कविता तक आ पहुंची है -'' रास्ते में एक ओर कण्डे की लाल आग टिक्कड़ लगी सेंकनेबहुत-बहुत परेशान थके हुए हम भी हैंलेकिन सुगन्ध उस टिक्कड़ की खूब जो किआत्मा में फैलती र्इमान की भाप बनकर...।

   तारसप्तक में प्रकाशित प्रभाकर माचवे की गेहूं की सोच  कविता गेहूं की नियति के माध्यम से किसानों की दुर्दशा और आर्थिक मजबूरियों का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है -''बहुत कुछ जायेगा लगानकुछ जाएगी कर्ज-किश्तबाकी रह जाएगी-झोपडि़यों की उन भूखी अतंडि़यों के लिए सूखी एक बेर रोटी-! यधपि इस कविता में कुछ जाएगी कर्ज-किश्त का कुछ खटकता है और इसके स्थान पर अधिक शब्द होना चाहिए था-लेकिन किसानों की चिन्ता तो है ही प्रशंसनीय । माचवे की ही वसन्तागम कविता खेतों में धान पक जानें से वसन्त ऋतु के आगमन का किसान जीवन में उल्लास का गीत प्रस्तुत करती है । इस कविता में भी एक औचित्य दोष है जिसकी ओर घ्यान कवि और सम्पादक अज्ञेय दोनों का ही नहीं गया है । धान पकने के बाद शीत ऋतु आती है वसन्त नहीं ,वसन्त ऋृतु तो गेहूं पकने के बाद आती है । सहानुभूति के स्तर पर ही सही ,किसान जीवन के प्रति आकर्षण और चिन्ता 1943 के आस-पास शहरी मध्य-वर्ग के बुद्धिजीवियों में भी बची हुर्इ थी ।

       भवानीप्रसाद मिश्र के लिए तो किसान धरती पर उल्लास और आनन्द के स्वर्गिक संगीत का सर्जक ही है -'और अटपठी एक तान किसी किसान कीबचे-खुचे खालीपनधरती और आसमान के मन को भरती हुर्इदुनिया क्या हुर्इ वह तो स्वर्ग हो गया ( स्वर्गिक कविता,रचनावली,भाग-3 ) अपनी किसान का गीत शीर्षक कविता में तो वे किसान को सम्बोधित ही करते हैं-'भार्इ !कुदाली चलाते चलोमिटटी को सोना बनाते चलो ।इसी तरह गांव शीर्षक कविता भी किसान-संकल्प की कविता है-''जोतना है खेत,हल के साथ निकले।बीज बोना है,दल के साथ निकले....घूल,गोबर और कचरे में भरी सीदेवियां निकली कहां जीवित मरी सी। (रचनावली-1,पृ040) मिश्र जी की 'मधुमास,यह वर्षा,'मेघ मानव,'बरसा कर ओस,'प्रकृति प्राण,'पहिला पानी तथा'वर्षारानी आदि कविताएं जहां किसान जीवन-बोध और सरोकारों से ही सम्बनिधत कविताएं हैंवहीं 'हम जो कुछ बनते हैं,'शरीर और फसलें'कविता और फूल'बंजर हैं हम-,'पता नहीं चलता,'माटी का अनुभव'हम बोते हैं,'मंगल वर्षा,'बूंद आर्इ,'सावन,और 'सिर उठा रहे सरसों के पीले फूलशीर्षक कविताएं कहीं तो सीधे-सीधे किसान जीवन और प्रकृति का चित्रण करती हैं और कहीं किसान अनुभवों और कर्म के बिम्ब का रूपक की तरह प्रयोग करती कविताएं हैं ।

   शमशेर की कर्इ कविताओं में किसान यथार्थ का चित्रण मिलता हैयधपि उनकी अपनी ही सांकेतिक प्रस्तुति और शैली में-गाय-सानी।सन्ध्या।मुन्नी-मासी । दूध ! दूध ! चूल्हा ,आग,भूख । मांप्रेमरोटी।मृत्यु। इसी तरह कुंवर नारायण कें काव्य में किसान जीवन प्राय: स्मृति-सन्दर्भ  के रूप में बार-बार झांकता रहता है - जैसे यह धूप हरे खेतों परअनायास दो पहर जिन्दगी उड़ेलती ठण्ड से ठिठुर  रहे तलुओं को सेकतीजैसे वह नदी-नदी चली गर्इ पगडण्डी ।

    कुआनों नदी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक लम्बी और चर्चित कविता है,जिसमें नदी की स्मृतियों के साथ गांव के किसानी जीवन की स्मृतियां पूरी संवेदनशीलता के साथ कविता में उपसिथत हैं-आदमी और चौपाएखरवा से घायल पैर की उंगलियांऔर खुर लिये लंगड़ाते चलते हैंसुअर लोटते हैं....पानी में बैठी औरतें खाना पकाती हैं ।.......एक बंजर भूमि मेंबढ़े हुए नाखून लिये मैं खड़ा हूंजैसे उनसे ही नयी फसलें उगा लूंगाजैसे उन्हीं के सहारे नहरें खींचतामैं उन खेतों में ले जाऊंगाजहां कांसे की चूडि़यां खनकतीऔरतें मुंह अंधेरे में दौरियां चलाती हैं । कविता की कुआनों नदी ग्रामीण जन और किसानों के दु:ख की महानदी बन जाती है । सर्वेश्वर की सूखा कविता भी किसान जीवन की एक गम्भीर त्रासदी से सम्बनिधत है । कवि एक साक्षी के रूप् में उसका चित्रण करता है-अभ्यासवश ही मैं यहां हूंजलहीन कूपों की आंखों में झांकताजलती धरती के माथे परठंढे हाथ रखता।(शायद कोर्इ अंकुर उगे!)

 केदारनाथ सिंह की अनेक कविताओं में किसान जीवन से लिए गए अप्रतिम काव्य-बिम्ब देखे जा सकते हैं-'सिर्फ उसके उठे हुए सींगसिवानों में चमकते रहते हैंसूर्यास्त तक... अथवा सहसा बौछारों की ओट मेंदिख जाती है एक स्त्री उपले बटोरती हुर्इ..... तथा 'वह जरा सा हूंफता हैउसके कान खड़े हो जाते हैंयह भूसे की खुशबू है । केदार नाथ सिंह की बहुचर्चित लम्बी कविता बाघ के कर्इ अंश किसान जीवन से भी सन्दर्भित हैं ।

 नयी कविता के अंक 5-6 में प्रकाशित शरद देवड़ा की 'बैरिन रात:अभागिन नारी  कविता की अभागिन नारी एक किसान की स्त्री ही हैजो रसोंर्इ के घुटते घुएं में रोटियां सेकती है,चक्की पीसने से कड़ी हो आर्इ अपनी हथेलियों से अपने कानों को ढकती है । इसी अंक में प्रकाशित प्रभाकर मिश्र की अलाव की आंच में शीर्षक कविता में भी किसान जीवन की चर्या उपसिथत है तो जितेन्द्रनाथ पाठक की शरद घन शीर्षक कविता में भी किसान जीवन बिमिबत हुआ है! क्विता फसल के पक जाने पर बिना जरूरत के बरसने जा रहे बादलों को सम्बोधित है और उनसे न बरसने की प्रार्थना करती है -ओ शरद के अयाचित घन!मत मुड़ो इस गांवविलसने दो पीत सरसों की हुलसती छातियों पर धूपरंभने दोगाय,बछड़े,भैंस,बैलों भरी चरनी को निकल जाने दो नदी के वक्ष से उठती हुर्इ भाप...।

 तीसरा सप्तक में प्रकाशित विजयदेवनारायण साही  की रात में गांव कविता किसान अनुभव का ही बिम्बांकन है -सो रहा है गांव।खेतियों की अनगिनत मेड़ेंकि धरती के दुलारे वक्ष कोउंगलियों से पकड़बच्चों की सलोनी नींद में सुकुमारसो रहा है गांव! कीर्ति चौधरी की फूल झर गये तथा लता-1,2,3 शीर्षक से लिखी गयी कविताएं भी किसानी अनुभव की कविताएं हैं । किसान अनुभवों को अपनी काव्य-भाषा में पिरोने के लिए सोमदत्त की कविताएं भी याद रखी जाएंगी-'अपनी मिटटी को जगाना थापुरखों के कोठार से बीज निकालकरउम्मीद का बिरवा लगाना था । (पुरखों के कोठार से कविता )

कुछ वर्ष पहले अब्दुल बिसिमल्लाह के दोहों का संकलन 'किसके हाथ गुलेल शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

उसमें भी किसान जीवन के यथार्थ पर टिप्पणी करते अनेक दोहे थे । यह संकलन दोहा छन्द को खड़ी बोली में पुन:प्राप्त करने की दृषिठ से भी महत्वपूर्ण था -'' किसकी माटी किसकी खेती,किसका है खलिहानदाना ले जाय बनिया साराफांके घूल किसान ।

     नक्सलबाड़ी आन्दोलन से प्रेरणा लेकर हिन्दी कविता में सक्रिय और स्थापित कवियों ज्ञानेन्द्रपतिअरुण कमल और आलोक धन्वा में से ज्ञानेन्द्रपति और अरुण कमल दोनों के यहां किसान यथार्थ की कविताएं मिल जाती हैं । ज्ञानेन्द्रपति के यहां किसान अनुभवों के अप्रत्यक्ष काव्यात्मक उपयोग और प्रत्यक्ष किसान-यथार्थ के बोध वाली दोनों प्रकार की अच्छी कविताएं बड़ी संख्या में मिल जाती हैं । पहली कोटि के उदाहरणस्वरूप उनके संशयात्मा संकलन की पहली ही कविता देखी जा सकती है-'' इस बीच जिससड़क परतुम नहीं चले होसमय का बूढ़ा बैल चला हैछोड़ता खुरों के बराबर गडे......नित नर्इ जिसके हल की फालखींचती सड़कों की रेख । इसी तरह ज्ञानेन्द्रपति की एक अन्य कवितामिट गए मैदानों वाला गांवकिसान जीवन के लिए महत्वपूर्णचरागाहों के मिटनें के माध्यम से गांवों का शोक-चित्र ही प्रस्तुत करती है । इसी तरह एक आदिवासी गांव से गुजरती सड़क कविता भी सभ्यता के उस शोषण-चक्र को समनें और समझाने का प्रयास करती है ,जो गांव तक जाती भी है तो लूटने की नीयत से ही । ज्ञानेन्द्रपति की खेवली तक सड़क नहीं आती कविता भी शहर केनिद्रत सभ्यता द्वारा किसान जीवन के शोषण-चक्र का अनावरण करती है-'' सड़क हो चाहे नहींखिंचे आते हैं मुंह बन्द बोरों से भरे अनाजजैसे दुधगर बाल्टेऔर कामगार लोग.........खेवली! जिसकी माटी मेंउपजते हैंकवि और किसानकि भारत के प्राण जहां बसते हैं ! इसी तरह ज्ञानेन्द्रपति की उड़ती हैं पतितयां शीर्षक कविता भी

शहरों की ओर पलायन करने वाले किसानों के बच्चों के विस्थापन का अत्यन्त प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करती है-''पतितयां नहींराजधानी पहुंचती हैंमधुकूपक रसाल और रसगुल्लक लीचियांæकों-टोकरियों में और पहुंचते हैं कोमल कुम्हलाए बालकनौकरी की तलाश में।

 अरुण कमल की भी कर्इ कविताएं काव्य शिल्प की तलाश में किसान जीवन और यथार्थ के आस-पास जाती हैं । अनाज के बिम्ब तो उनकी प्रसिद्ध कविता धार में भी है और गरीबी की त्रासदी को विडम्बना की सीमा तक चित्रित करती उधर के चोर शीर्षक कविता में भी ।  किसान यथार्थ से सम्बनिधत प्रत्यक्ष संवेदना वाली जीवन्त कविताएं भी उनके यहां हैं-'कभी-कभी बथान में गौएं करवट बदलती हैंबैल जोर से छोड़ते हैं सांसअचानक दीवार पर मलकी टार्च की रोशनी कोर्इ निकला है शायद खेत घूमने।(जीवधारा कविता ) ऋतुराज की एक कविता अपने घायल बैल के लिए किसान के दु:ख और संवेदनशीलता को इस रूप में व्यक्त करती है-हल कुछ ज्यादा बड़ा था,मुझे तो चोट नहीं लगीलेकिन बैल के घाव हो गया है ।उदभ्रान्त की कविता हांड़ी कालाहांड़ी की किसान त्रासदी से सम्बनिधत है-

'मजे से पक रहा हैएक किनकी चावल काएक विराट हांड़ी मेंभूख के सुलगते चूल्हे परखदबदखदबद। ।

  नवगीतकारों में शम्भूनाथ सिंह के यहां किसान प्रकृति के बिम्ब हैं तो गुलाब सिंह के 'धूल भरे पांवसंकलन के गीतों में किसान जीवन के विविध चित्र हैं । उन्होंने किसानों के व्यकितवाचक संज्ञाओं का प्रयोग करते हुए किसान जीवन के जीवन्त बिम्ब सृजित किए हैं । महत्वपूर्ण नवगीतकार उमाशेकर तिवारी का'खेतों में आंसू बोते हैं शीर्षक गीत भी किसान यथार्थ और संवेदना की मार्मिक प्रस्तुति करता है -वे लोग जो कांधे हल ढोतेखेतों में आंसू बोते हैं-उनका ही हक है फसलों परअब भी माने तोबेहतर है। प्राय: गांव गया था गांव से लौटा जैसी चर्चित पंकितयों के लिए जाने जाने वाले गीतकार कैलाश गौतम की रामदुलारे कविता एक किसान की आर्थिक सिथति और मनोदशा का अच्छा चित्रण करती है-'भूखे-प्यासे टूटे-हारेखेत से लौटे रामदुलारेबनिया कहता ब्याज चाहिएसौ का पत्ता आज चाहिएजहां देखिए आग लगी हैदिन भर भागम-भाग लगी है...। आधुनिक दृषिट-सम्पन्न एक नए गीतकार ओम धीरज की 'खूंटे पर बंधे हुए शीर्षक कविता  किसानों की यथासिथतिवादी नियति और जड़ता को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है ।

  समकालीन युवा कवियों में दिनेश कुशवाह की  'उस मां की कोख से जनमें बिना  कविता में भी गरीब किसान स्त्री का दर्द ही व्यक्त हुआ है-जितना सहती है गरीब की बेटीक्या सहेगी धरती ! इसी प्रकार दिनेश की एक अन्य कविता भी किसान कर्म के प्रति सम्मान और कृतज्ञता भाव ज्ञापित करती है-''मुंह में कौर डालें तो सोचेंउस खेत के बारे मेंजहां से आता है अनाज। नए कवियों में केशव शरण की एक हलवाहे का हल चलाना देखकर कविता भी उल्लेखनीय है ।

 श्रीप्रकाश शुक्ल की अनेक कविताएं भी किसान जीवन से लिए लुप्तप्राय शब्दों और स्मृतियों का बिम्बात्मक  संरक्षण करती हैं । हड़परौली उनकी ऐसी ही कविता है जिसमें वर्षा न होने की सिथति में सित्रयों द्वारा अंघेरी रात में इन्द्र को रिझाने के लिए नग्न होकर सामूहिक रूप से हल चलाने की प्रथा को आधार बनाया गया है । श्रीप्रकाश की अधिकांश ऐसी कविताएं एक भाषाविद रीझ की उपज हैं । किसी पुरातातिवक भाषाविद की तरह उनकी चिन्ता किसान जीवन से सम्बनिधत लुप्तप्राय शब्दों को बचा लेने की है । किसान जीवन के पर्याय के रूप में पिछड़ते गांव का चित्र उनकी अपना गांव कविता इसप्रकार प्रस्तुत करती है- 'बादलों की आवाजाही के बीचपगुरी करताअपनी ही पीठ के भार से द्रवित अपना यह गांवशहर के ठीक सामनेंलयनहा बरधा की तरहताकता रहता है ।

  इधर प्रकाशित रामाज्ञा शशिधर के 'बुरे समय में नींद संकलन की एक कविता विदर्भ विदर्भ के किसानों की त्रासदी को गम्भीर सांकेतिकता के साथ प्रस्तुत करती है । कपास की खेती करनें वाले किसानों के शोषण और आत्महत्याओं की त्रासदी तथा उनके यथार्थ की भयावहता को रामाज्ञा नें अपनी विदर्भ कविता में जिसप्रकार रूपाान्तरित किया है वह उनकी रचना-सामथ्र्य का तो मानक है ही ,एक नए समर्थ कवि की प्रापित के रूप में हिन्दी कविता के लिए भी महत्वपूर्ण है - संसार का सबसे बड़ा श्मशानधूसर सलेटी कालासंसार का सबसे बड़ा कफनमुलायम     सफेद आरामदेहमणिकर्णिकेतुमनें विदर्भ नहीं देखा है  कविता विदर्भ के सफेद कपास की खेती को कफन की संज्ञा देकर और मणिकर्णिका से सन्दर्भित कर शोषण के कारण हो रही मौतों के बारे में सीधे-सीधे न कहते हुए भी बहुत कुछ कह देती है ।      निलय उपाध्याय की कुछ कविताएं भूमण्डलीकरण के दौर के किसानों की सिथति को प्रामाणिक रूप् में रेखांकित करती है । जैसे लड़कियों को आवारा लम्पट पुरुषों का घूरना चुभता हैजैसे कोर्इ कसार्इ किसी स्वस्थ गाय के मांस के मूल्य को ललचयी दृषिट से आंकता है ,कुछ वैसा ही अहसास निलय  उपाध्याय  की मोटांजा कविता के नायक किसान मनबोध बाबू का भी है-मनबोधबाबूमहीनों हो गए खेत घूमते-घूमतेघर-घर पूछते और महसूस करतेउनके खेत घिर गए हैंसिक्कों और स्वार्थ से।युवतर पीढ़ी के कवि राकेश रंजन की कविता चेत भर्इ चेत किसानी से पलायन की समस्या की ओर गम्भीर चेतावनी के स्वर में घ्यान आकर्षित करती है-कल था जो हरा-भरालहराता खेतआज हुआ बंजरकल होगा वह रेतचेत भर्इ चेत ।

     इधर हिन्दी की एक लोकप्रिय और अधिक सम्प्रेषणीय विधा के रूप हिन्दी गजल नें भी सभी का ध्यान आकर्षित किया है । गजल की संवादी ,संवेदी और गेय प्रकृति उसे किसान यथार्थ की अभिव्यकित के लिए भी अधिक प्रभावी और उपयुक्त विधा बनाती है । जिन गजलकारों नें किसानों की पीड़ा को अपनी गजलों के माध्यम से व्यक्त करने के लिए अधिक ख्याति अर्जित की है ,उनमें बल्ली सिंह चीमा,अदम गोंडवी और कमल किशोर श्रमिक विशेष उल्लेखनीय हैं । कुछ अच्छे प्रयोग दुष्यन्त के यहां भी मिलते हैं - तेरे गहनों सी खनखनाती थीबाजरे की फसल रही होगी । किसान यथार्थ के लिए बल्ली सिंह चीमा की निम्न पंकितयों को देखा जा सकता है-''खेत प्यासे रह गए धान हुए बीमारटा-टा करके उड़ गयी सावन में बरसात (जमीन से उठती आवाज,पृ066) तथा '' सांड़ खेतों में चरता हो जैसे कोर्इयूं हमारे घरों में अंधेरा फिरे । (तय करो किस ओर हो) जैसी पंकितयां किसान जीवन के अनुभपों से कविता को गूंथकर ही बनार्इ गयी हैं । अदम गोंडवी की गजलें तो किसान यथार्थ को सम्प्रेषित करने के लिए कला का रंचमात्र भी झीना परदा नहीं रहने देती  । उनकी गजलों को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे वास्तविक जीवन ही गजल के रूप में उतार दिया गया हो -बूढ़ा बरगद साक्षी है,किस तरह से खो गर्इरमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल मेंखेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गएहमको पटटे की सनद मिलती भी है तो ताल में ।

    आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं किसान और उसके पर्यावरण को या तो सरकार बचा सकती है या फिर बाजार । विडम्बना यह है कि जो राजनीति उसे बचा सकती है ,वही पूंजीपतियों से मिलकर उसके विरुद्ध साजिश रचाही है ।  बाजार किसान की तभी सहायता कर सकता है जब वह किसान के उत्पादों को मंहगा करके बेचे ,जबकि सरकार उसे अपने स्वार्थ के कारण ऐसा करने नहीं देती । जनता को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के प्रयास में मारा और हार जाता है किसान ही क्योंकि सरकार विदेश से गेहूं मंगाकर दाम गिराने के लिए अपने यहां के बाजारों में बेच देती है। इस तरह किसान के हर उत्पाद बाजार में सरकार के बन्धक हैं । क्षतिपूर्ति के लिए सरकार चाहे तो ऐसा भी कर सकती है कि वह किसानों का पंजीकरण करे और उन्हें मुआवजा के रूप मे कुछ क्षतिपूर्ति राशि या वेतन नियमित रूप से दे । किसानों के लिए शीघ्र ही कुछ निर्णायक रूप् में किया जाना चाहिए । चाहे सरकार उनके यहां से मंहगा खरीद कर अनाज को सस्ते मूल्य पर ही क्यों न बेचे  । करे कोर्इ भी ,कुछ भी लेकिन शीघ्र ! किसानों को वास्तविक जीवन और कविता दोनों में ही बचाने और संरक्षण देने की जरूरत है ।