बुधवार, 16 जनवरी 2013

क्रान्ति-विमर्श -१

यदि मुझसे पूछा जाये कि मानव-जाति के सतत विकास-क्रम में साहित्य और दर्शन की सही भूमिका क्या हो सकती है या क्या होनी चाहिए ? तो प्राचीन भारतीय मनीषियों की तरह मैं भी यही कहना चाहूंगा कि मुकित ! लेकिन मैं मुकित की अवधारणा को नए सिरे से परिभाषित करना चाहूंगा । मुकित का यह संघर्ष मेरे लिए साभ्यतिक अभियानित्रकीकरण से मानव-चेतना को मुक्त करनें के लिए होगा । इसीतरह साहितियक सृजनशीलता को मैं मानव-मन की संवेदनात्मक आदिमता या मूल-स्वभाव के पुनप्र्रापित की तरह देखता हूं । इस तरह देखें तो ये दोनों ही भिन्न किन्तु जरूरी मनन-प्रक्रियाएं हैं-एक-दूसरे से विपरीत किन्तु सहवर्ती एवं पूरक भी ।

        आम धारणा के विपरीत दार्शनिकीकरण अवधारणाओं के जटिल मनो-संसार को अर्थ के सामन्जस्य एवं सरल सूत्रीकरण की ओर ले जाता है । यदि कोर्इ दर्शन इसके विपरीत आचरण में है तो संभव है कि वह विद्वता-प्रदर्शन एवं ज्ञान-विलास के रूप् में हो । प्राचीनकाल से ही हम देख सकते हैं कि संकल्पनात्मक धारणाओं के केन्द्रक किस प्रकार एक बड़े ज्ञानात्मक समाज की रचना करते रहते हैं। कम्प्यूटर की भाषा में कहें तो इनकी भूमिका एक परिष्कृत साफटवेयर की तरह ही होती है ।

       सच तो यह है कि सभ्यता के जटिल विकास के साथ मनुष्य का ज्ञान ही उसे अभिशप्त करता जाता है । ऐचिछक-अनैचिछक,उचित-अनुचित संज्ञापन उसके संज्ञान को विभाजित करते जाते हैं । संज्ञान और संज्ञापन का का तिलिस्म जिस जटिल मनोसृषिट का निर्माण करते हैं ,उसके अतिक्रमण का विज्ञान ही दर्शन होना चाहिए ।

          दार्शनिकों के इतिहास में मार्क्स का अवदान कर्इ दृषिटयों से अनूठा है । मार्क्स नें दर्शन की सृजनात्मक चुनौती को सिर्फ अवधारणाओं की दुनिया को ही नहीं,बलिक वास्तविक दुनिया को बदलने की चुनौती के रूप् में भी देखा । इसतरह मार्क्स सिर्फ मानव-सभ्यता की दार्शनिक अवधारणा का ही नहीं,बलिक सभ्यता की वास्तविकताओं का भी अतिक्रमण करनें का प्रयास करते हैं ।मार्क्स नें वैयकितक संज्ञापन की पूंजीवादी,भाग्यवादी या दैवी-परम्परा को को संज्ञापन की आर्थिक वर्गीय अवधारणा से विस्थपित किया ।

यदि मार्क्सवाद के बाद का दर्शन साभ्यतिक निष्क्रमण और अतिक्रमण नहीं घटित कर पा रहा है तो यही कह सकते हैं कि अनेक विचारकों द्वारा दुनिया को समझने ंके लगातार चल रहे प्रयासों के बावजूद हम अवधारणात्मक शोर एवं दिशाहीनता के शिकार हो गए हैं ।

 वर्तमान मानव-जाति की मुख्य त्रासदी यह है कि वह वैशिवक धरातल पर जिन दो-तीन सांस्कृतिक प्रोग्रामों-साफटवेयरों से संचालित है ,वे कर्इ धरातलों पर इतनें अलग और असंवादी हैं कि वे मानव-मात्र की जातीय एकता से अधिक जातीय भिन्नता का विज्ञापन और प्रचार करती है । सावधानी से निरीक्षण करनें पर हम पाते हैं कि सांस्कृतिक अचेतन और आदतें इतनी निर्णायक है। कि उनकी परिधि में दर्शन,धर्म,राजनीतिक व्यवस्थाएं एवं सामाजिक व्यवहार सभी कुछ आ जाते हैं । यह सच है कि इन सांस्कृतिक आदतों,विश्वासों और विचारों का विकास हजारों वर्ष में हुआ है ,लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विकास के साथ न सिर्फ हम उन्हें विश्लेषित करनें की सिथति में हैं; बलिक उनको समझ सकते हैं ; व्याख्या कर सकते हैं ;बलिक उनके अनुसार संचालित होनें से अस्वीकार कर सकते हैं। उनका अतिक्रमण कर सकते हैं और उन्हें बदल भी सकते हैं । इन आदतों में एक सामाजिक आदत क्रानित ,बदलाव और उसके लिए नायक की खोज की भी  है । यधपि क्रानित रोज नहीं होती लेकिन हमारी सभ्यता और ऐतिहासिक स्मृति का एक बड़ा भाग क्रानित-चर्चा को ही समर्पित रहनें से हमें उकसाती रहती है कि हम क्रानितकारी बनें । वैसे विश्व स्तर पर क्रानित का सबसे बड़ा प्रायोजक देश अब भी अमरीका ही बना हुआ है । हिन्दी साहित्य में भी मेरे कर्इ मित्र रचनाकार क्रानित की अदभुत पैरोडी करते हुए प्रचुर क्रानितकारी साहित्य लिख चुके हैं । व्यकितगत रूप से मैं उन्हें हमेशा ही अविश्वसनीय,अवसरवादी, अभिनयकर्ता तथा नक्काल ही मानता रहा हूं,क्योंकि वे मुझे भविष्य की संभावनाओं के अन्वेषी नायक कम,अतीत की स्मृति के वाहक नायक अधिक लगते रहे हैं । इस टिपपणी के बावजूद कुछ मित्रों में क्रानित की र्इमानदार चिन्ता एं भी मैंने देखी है ।

   क्रानित मानव-सभ्यता में बदलाव और परिवद्र्धन के लिए आवश्यक होते है। वैसे तो सृजनात्मक और विकासवादी बदलाव सतत होते रहना चाहिए । इस प्रकि्रया का अवरुद्ध होना ही क्रानित को ऐतिहासिक औचित्य और पृष्ठभूमि देता है । यह मानने के पर्याप्त आधार है कि मानव-जीवन की हत्या पर आधारित कोर्इ भी क्रानित मानव जाति की आदिम हत्यारी बर्बरता लिए एक संवेदनशून्य अमानवीय समाज की रचना करेगा- इस दृषिट से व्यकितगत रूप् से मैं उसकी सैद्धानितक संस्तुति करनें से बचता रहा हूं । इसके बावजूद ऐसी किसी भी सत्ता को; जो अपना नैतिक आधार  तथा संभावनापूर्ण भविष्य की दृषिट और स्वप्न खो चुकी हो तथा सिर्फ अपनी हत्या करने की शकित के आतंक के आधार पर ही वर्तमान में बनी हुर्इ हो,फांसी की अपरिहार्य सजा की तरह  ,उसका बलपूर्वक उच्छेद भी कर्इ बार अपरिहार्य लगनें लगता है । यह एक तथ्य है कि सारे मूल्य सापेक्ष होते हैं और यदि कोर्इ समुदाय सांस्कृतिक र्इकार्इ के रूप में हो तथा दूसरे समुदाय की स्वतंत्रता और अधिसकसा का सम्मान नहीं कर रहा हो तो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने का औचित्य बनता है ।

         फिलहाल क्रानित असंतुष्टों और भविष्यजीवियों का स्वर्ग है ।  कर्इ बार वह पेशेवर रूप में भी गैरजरूरी एवं व्यकितगत क्रानितकारी बनने की महत्वाकांक्षा की सृषिट करते भी दीखती है । इसके बावजूद सतत सृजनात्मक क्रानित एवं बदलाव मानव-जाति के असितत्व के लिए आवश्यक है। बदलाव की आवश्यकता और दिशा क्या हो सकती है;जबकि मानव-जाति एक प्रवहमान जैविक असितत्व है ,अब तक के अधिकांश दार्शनिक विजन एक सिथर समस्यात्मक समाज की परिकल्पना पर आधारित है । उन्होंने उस जनसंख्यात्मक विस्फोट की परिकल्पना नहीं की थी ,जो एक बन्द सिलेण्डर में हाइडोजन के परमाणुओं की तरह घनत्व बढ़ते जानें पर तेजी से टकराते हुए सिलेण्डर को ही गर्म करते जाते हैं और एक दिन विस्फोट पर पहुंचा देते हैं ।

         मार्क्सवाद क्रान्ति रूपी इस उन्मादी यिस्फोट का आवश्यकताओं से जोड़कर देखता है ,जबकि पूंजीवादी विद्रोह महत्वाकांक्षी प्रतिस्पद्र्धा से भी संचालित होते हैं । इतिहास की अनेक क्रान्तियाँ विशेषकर सत्ता-परिवर्तन समस्याओं के वास्तविक आधारों पर कम बलिक सामूहिक असुरक्षा और  विश्वासहीनता को व्यकितगत योग्यता के झूठे आश्वासनों के साथ तनावग्रस्त समुदायों को गुमराह करते हुए या फिर आपराधिक शैली में संगठित समूहों द्वारा घटित की गर्इ है। कर्इ बार सार्वजनिक व्यवस्था के ढांचे का पिछड़ापन भी आक्रोश की वजह बना है तो कर्इ बार उनके नियम,कानून और मूल्य ।मार्क्सवाद संसाधनों के समान वितरण और विभाजन के सपने पर आधारित है तो तानाशाही एवं लोकतानित्रक व्यवस्था में नेतत्व के नाम पर व्यकित-परिवर्तन ही बड़ी हिंसक क्रानितयों की अनितम परिणति होते हैं ।

    यह एक तथ्य है कि मार्क्सवाद पूंजीवादी व्यवस्था की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ था । लेकिन देखनें की बात यह है कि कृषि-युगीन सभ्यता से यन्त्र-आधारित औधोगिक सभ्यता तक मानव-जाति की विकास- यात्रा में तकनीक और श्रम का स्वरूप बदलनें के बावजूद सम्पतित की अवधारणा में कोर्इ रूपान्तरण नहीं हुआ था ।  कृषि-सभ्यता के जमींदार और सामन्त (बूजर्ुआ) की जगह उधोग या मिल-मालिक पू।जीपति नें ले ली । कृषि में मानवीय श्रम की आवश्यकता अल्पकालिक होती है । इस वस्तु-सिथति नें अल्पकालिक कृषि-मजदूर को पूर्णकालिक औधोगिक-मजदूर में बदल दिया था । इसनें मनुष्य को आर्थिक सत्ता का गुलाम बनाना शुरू कर दिया था। एक ऐसी आर्थिक गुलामी का सृजन किया जो मानव-इतिहास में अभूतपूर्व था । उधोग में तकनीकी आविष्कारों की गोपनीयता स्वामित्व और शोषण की नर्इ परिसिथतियां सामनें लाती है । कम्पनी अपनें तकनीकी उत्पाद की गोपनीयता बनें रहनें तक अपना प्रभुत्व बनाए रख सकती थी - मांग और आपूर्ति की लोकप्रियता के अतिरिक्त । भारत में अनेक पेशेवर जातियों के निर्माण में वंशानुगत उत्तराधिकार मेंं मिली पेशेवर योग्यता और उसकी गोपनीयता का भी योगदान रहा है ।

 दरअसल माक्र्सवाद के सन्दर्भ में हुआ यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी की अवधारणाएं लेकर बीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध और इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध के पूंजीवाद पर विचार करनें वाले बुद्धिजीवी पूंजीवाद के संरचना और व्यवहार को प्राय: समझ ही नहीं पाये हैं । हुआ यह है कि स्वयं मार्क्स बि्रटिश राजनीतिक सत्ता के स्वर्णिम काल साम्राज्यवाद के युग में पैदा हुए थे । इसीलिए अपनी प्रतिक्रिया में वे सर्वहारा के अधिनायकत्व से अधिक नहीं सोच सके । अपनी साम्यवादी सैद्धानितकी के बावजूद मार्क्स पूंजीवादी राजनीतिक सत्ता के साम्यवादी सत्ता में रूपान्तरण के सपनें देखने वाले विचारक थे  ।  सत्ता की यह नयी अवधारणा एक नर्इ राजीतिक व्यवस्था और व्यवहार की मांग कर रहा था । लेकिन घ्यान से देखनें पर स्पष्ट हो जाता है कि बीसवीं शताब्दी के बाद का युग राजनीतिक सत्ता के ह्रास का युग है । यधपि राजनीतिक सत्ता एक पारम्परिक संरचना के रूप में अब भी बची हुर्इ है ,लेकिन शकित का केन्द्र औधोगिक सत्ता में स्थानान्तरित हो गया है । यह आर्थिक सेनाओं और आर्थिक सामा्रज्यवाद का युग है । देशों की जगह बहुराष्टीय औ?ोगिक कम्पनियों के सामा्रज्य नें ले ली है । इस तरह मार्क्स का सर्वहारा भी स्थानीय न रहकर वैशिवक सर्वहारा बन चुका है ।  औधोगिक सत्ता के वेतनभोगी की तरह वह एक औधोगिक सैनिक की तरह व्यवहार कर रहा है ; न कि सर्वहारा की तरह। अपनी विशेषज्ञ दक्षता एवं बुद्धिवाद से औधोगिक पूंजीवदी सभ्यता नें बहुत ही चालाकी से कृषि-मजदूर को अपना गुलाम बना लिया है ।

           आज के शोषण की मानवीय त्रासदी शोषक एवं शोषितों के परम्परागत रूप् एवं अधिरचनाओं में नहीं,बलिक दक्ष-अदक्ष,योग्य-अयोग्य के बड़े सामुदायिक विभाजन के रूप् में घट रही है ।  यह 'सरवाइवल आफ द फिटेस्ट यानि योग्यतम की विजय का सबसे क्रूरतम दौर है । जो अज्ञानी है वह मारा जाएगा ।

स्पष्ट है कि मार्क्स के समय का स्थानीय पूंजीवाद वैशिवक पूंजीवाद में बदल गया है । व्यवस्था का पूंजीवादी सर्प वहां नहीं है,जहां उसके होने की कल्पना मार्क्स नें अपने साम्यवाद में की थी । दरअसल मार्क्स जिस समय अपनी सैद्धानितकी दे रहे थे-उस युग की भौतिक परिसिथतियों में सर्वहारा किसे कहा जाय यह भी एक विचारणीय प्रश्न है । सामन्ती एवं कृषि-व्यवस्था में कृषि-कार्य में लगे या न लगे सभी भूमिहीनों को सर्वहारा कहा जा सकता है ; लेकिन शहरी औधोगिक व्यवस्था में  प्राय: उनका ध्यान क्रानित- कारी आवेश से औधोगिक मजदूरों को संबोधित करनें का था , न कि बेरोजगारों और भिखारियों को ।

भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में स्वाभाविक है कि औधोगिक मजदूरों को पूंजीवाद का हिस्सा मान लिया जाएगा ,क्योंकि यहां क्रानित के लिए बेरोजगार सुगमता से उपलब्ध हैं । बेरोजगारों में भी दक्ष,प्रशिक्षित या योग्य तथा अदक्ष,अप्रशिक्षित या अयोग्य दो भेद किए जा सकते हैं ।

         ऐसे में मजदूर आन्दोलन भारत में इसलिए सफल नहीं हो सके कि भारतीय पूंजीपति उनके क्रन्तिकारी असहयोग की सिथति में उनके विकल्प दक्ष बेरोजगारों को पानें में समर्थ थे । दूसरा यह की यहाँ उतना व्यापक पूंजीवाद भी नहीं था .स्वयं मार्क्स जिस ब्रिटेन में बैठे थे ,वहां इस लिए भी मार्क्सवादी क्रांति होना संभव नहीं था कि एक साम्राज्यवादी देश होने के कारण पूरा देश ही पूंजीपति की भूमिका में था .उसका मजदूर या सर्वहारा भी उच्चा जीवन -स्तर वाला एक पूंजीपति सर्वहारा था .शोषित सर्वहारा औपनिवेशिक देशों में स्थानांतरित हो गए थे . हुआ यह था कि माक्र्सकालीन योरोपीय देश औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी विस्तार के दौर से गुजर रहे थे । उनके पास अपने उपनिवेशों में प्रवास करनें के विकल्प थे । इसलिए वे असमानताबोध के लिए मजदूरों को सर्वहारा मानने एवं संबोधित करनें में समर्थ थे । साम्राज्यवादी योरोप की उन्न्त व्यवस्था में मजदूर ही व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर था ।

 एक और विडम्बना यह थी कि पूंजीपति दक्ष बेरोजगार युवा को जब अप्रशिक्षित या प्रशिक्षित अवस्था में औधाेंगिक मजदूर के रूप में चुनता है तो वह सापेक्षता में वास्तविक सर्वहारा जो कि दक्ष बेरोजगार है ,उससे विशिष्ट और सुरक्षित जीवन जीने ंके कारण एक तरह से पूंजीवादी व्यवस्था का ही अभिन्न अवयव बन जाता है ।  ऐसे में  अपने से भी हीन बेरोजगारों की बड़ाी फौज को देखते हुए, भारत में मजदूर वर्ग का अधिकांश कभी यह मानने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप् से तैयार ही नहीं हो सका कि वही वास्तविक सर्वहारा है । इस वास्तविकता की अनदेखी करने के कारण भारत में मजदूर आन्दोलन प्राय: सांगठनिक स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए । इतिहास में तीसरी चीज यह देखी गर्इ कि तकनीकी गोपनीयता या एकाधिकार की सिथति में ही किसी मिल एवं उसके मालिक को ब्लैकमेल किया जा सकता है । अन्यथा बाजार में प्रतिस्पद्र्धी कम्पनी  का असितत्व उसको दिवालिया बना सकता है ।  ऐसे में मजदूरों द्वारा बनाया गया अधिकांश दबाव प्राय: आत्मघाती ही हुआ है और साम्यवादी आन्दोलनात्मक दबाव प्राय: कम्पनियों को दिवालिया या फिर बन्द करानें में ही सफल हुए ।

       भारत में माक्र्सवादी आन्दोलन के लिए अनितम प्रतिकूलता यहां ब्राहमण जैसी लचीली जाति का पाया जाना और उसकी प्रभावकारी सांस्कृतिक उपसिथति भी रही है ।  इसकी श्रमविहीन आजीविका की सांस्कृतिक व्यवस्था विशेषकर दक्षिणा और श्राद्ध आदि नें बड़े पैमाने पर घूस जैसे आर्थिक अपराध को सुविधा -शुल्क के रूप में  अपराध-बोध विहीन सामाजिक व्यवहार एवं चलन में ला दिया । यह चौंकाने वाला लग सकता है लेकिन है सच कि भ्रष्ट नौकरशाही नें भारत में आर्थिक असन्तोष को कम किया है । अर्थ का अघोषित प्रवाह भारतीय समाज के प्रकट-अप्रकट ऐसे कोनों को सींचता रहा है ,जिसकी कल्पना भी संभव नहीं है । यह एक सच्चार्इ है कि भारतीय लोकतंत्र एक कल्याणकारी राज्य की अपनी भूमिका में बहुत सीमित व्यवहार ही कर सका है ।  सामाजिक रूप से संयुक्त परिवार की प्रथा का लोप न होनें से  अयोग्यों,बेरोजगारों,पागलों का निर्वाह संयुक्त परिवार ही करता रहा है । इस दायित्वबोध या फिर असुरक्षाग्रनिथ नें भी भारत में घूसखोरी और भ्रष्टाचार फैला दिया है । कम वेतन की नौकरी पा गये हैं,घूस लीजिए ;दहेज देना है,घूस लीजिए ,काम करवाना है ,घूस दीजिए; नौकरी पाना है ,घूस दीजिए ; किसी को पढ़ाना है या बेरोजगार को पालना है ,घूस लीजिए ।  भारत में उदारीकरण और निजीकरण के पीछे मण्डल या आरक्षणविरोधी आर्थिक-प्रशासनिक इंजीनियरिंग भी थी जिसकी चर्चा प्राय: नहीं की जाती है । आरक्षण का उपाय स्ववित्तपोषित शिक्षा-व्यवस्था तथा भुगतान पर मिलने वाली सीटों से निकाला गया ।  इससे आरक्षण का प्रभाव और दुष्प्रभाव दोनो ही केवल सरकारी क्षेत्रों वाले अवसरों तक ही दिखार्इ देता है । उधर मंहगार्इ नें अपरोक्ष प्रभाव में लोगों की आमदनी बढ़ार्इ है और दूसरे शब्दों में लोगों को धनी बनाया है-इस तरह लोग त्रस्त हैं लेकिन मस्त हैं ;दु:खी है ,फिर भी सुखी हैं! दूरदर्शन से लेकर मोबाइल तक मनोरंजन का एक बड़ा बाजार लोगों को प्रसन्न करनें के व्यवसाय में लगा हुआ है। मनोरंजन आज उधोग है,व्यापार है और बाजार भी । वैशिवक धरातल पर तो नाटो से लेकर अमरीका तक फैला हुआ क्रानित भी तो एक उधोग ही हो गया है । आज युद्ध भी अर्थनीति का ही एक हिस्सा है और सांगठनिक तथा व्यकितगत महत्वाकांक्षा के रूप में साहित्य के बाजार का भी !



भारतीय लोकतंत्र और बुद्धिजीवी

('भारतीय लोक-तन्त्र ,बुद्धिजीवी और हिंसा की मिथकीय सत्ता 'शीर्षक से
डॉo पी o एन o सिंह द्वारा सम्पादित
समकालीन सोच के अंक ५४ ,जुलाई-दिसम्बर ,२०१२ में प्रकाशित लेख )

एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र एक आधुनिक अवधारणा है । यह अपने नागरिकों में अपना उचित प्रतिनिधि चुनने की योग्यता, वैज्ञानिक विवेक तथा हर व्यकित के जीवन ,अधिकार और कर्तव्य की समानता की भावना का सम्मन करनें वाले सामूहिक चरित्र की मांग करती है ।  भारतीय लोकतंत्र की मुख्य समस्या तो यह है कि यह न सिर्फ दलों के नेतृत्व के स्तर पर वंशवादी और जातिवादी प्रवृतितयों से ग्रस्त है बलिक अनुयायियों के स्तर पर भी जनता को ऐसे ही आधारों पर विभाजित करते हैंं । इससे अनेक प्रान्तों में पेशेवर राजनीति का विकास नहीं हो पाया है । अन्ध-समर्थक मतदाता वर्ग की प्रचुर उपलब्धता रहनें से

राजनीतिक दल एवं उनके नेतृत्व बहुत कुछ गैर-जिम्म्ेदार हुए हैं । मतदाताओं में एक सही मूल्यांकन विवेक के अभाव में वे बहुत सीमा तक भ्रष्ट एवं आपराधिक होते हुए भी वे बार-बार प्रशासनिक तंत्र को पा जाते हैं ।

          जन-प्रतिनिधि बनने और बनाने का रास्ता सामाजिक सेवा और सकि्रयता के माध्यम से सार्वजनिक उपसिथति और पहचान बनने के बाद का नहीं है ,बलिक उच्च-स्तर के नेताओं की चापलूसी या धन देने की योग्यता के कारण वे प्रत्याशी के रूप में जनता के उपर थोप दिए जाते हैं । राजनीतिक दलों की इस परम्परा के कारण भारतीय मतदाता एक बन्धुआ मतदाता ही है । अपने राजनीतिक दलों के नेतृत्व के प्रति अपनी अन्धी आस्था के कारण उसे ऐसे प्रत्याशियों को मत देना पड़ता है जिन्हें वह जानता ही नहीं। इस प्रवृतित नें आजादी की लड़ार्इ से विरासत में मिली सार्वजनिक सेवा की संस्कृति का विनाश किया है । यह प्रायोजित नेतृत्व का दौर है । व्यकित्केनिद्रत राजनीतिक दल होने के कारण कुछ ऐसा परिदृश्य बन गया है कि राजनीतिक दल व्यापक जनता के प्रतिनिधि न होकर सत्ता का संचालन करने के ठीके लेने वाले व्यकित-समूह में परिवर्तित हो गए हैं । अधिकांश दल किसी व्यकित-विशेष के नियन्त्रण में हैं । उनमें आन्तरिक लोकतंत्र नहीं है । यदि वे बुद्धिमान हैं तब भी उनकी भूमिका एक मूक समर्थक की ही रहती है ।

कुछ दलों का केन्द्रीय नेतृत्व तो अपना स्वतंत्र जनाधार विकसित करने वाले अपने ही विधायकों और सांसदों को सहन ही नहीं करता । वे मतदाता और मुख्य नेता के बीच एक बिचौलिए की तरह हैं । यह सिथति भारतीय लोकतंत्र में एक आदर्श राजनीतिक संस्कृति की हीनता को सूचित करती है ।  अतिमहत्वाकांक्षी नेता उभरते हुए दूसरी पंकित के नेताओं पर न सिर्फ नजर रखती है बलिक समय -समय पर उन्हें दल से बाहर जाने का रा स्ता दिखाकर उनके जनाधार की जड़ें और अवसर काटती छांटती रहती है कि वे एक सुरक्षित बौनसार्इ बनें रहें ।

         आजादी के पहले और आजादी के बाद भारतीय बौद्धिक वर्ग की पीडा़,आकांक्षा और विफलता पर  गम्भीरता से विचार किए बिना आधुनिक भारत के निर्माण और भटकाव के इतिहास पर एक भी पंकित सही ढंग से नहीं लिखी जा सकती । यदि स्वतंत्र भारत केअब तक के अब तक के चुनावी इतिहास पर उड़ती-सी दृषिट भी डालें तो यह स्पष्ट होते देर नहीं लगती कि इस देश का प्राय: हर नेतृत्व बौद्धिक वर्ग के सही प्रतिनिधियों को निरन्तर शकित की सिथति में न आने देने के लिए कृत-संकल्प जैसा लगता है । इसके प्रारमिभक बीज कुछ लोगों को नेहरू युग में ही चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के निर्वासन में दीख सकते हैं ,किन्तु उसकी चरम परिणति आपात-सिथति के ऐतिहासिक संसर-युग के रूप में ही हुर्इ । इसके प्रतिरोध में सन 1977 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ  सम्पूर्ण क्रानित के भारी-भरकम आन्दोलनात्मक विज्ञापन के साथ शटित हुआ सत्ता परिवर्तन और जनता पार्टी का शासन -काल एक भटकाव-क्रानित के रूप में भारतीय मतदाताओं के साथ हुए फूहड़ मजाक जैसा ही था । जनता पार्टी एक सामूहिक रूप से सत्तरूढ़ विपक्ष ही था । समिम्लित दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं और स्वार्थ उन्हें मतदाताओं के विश्वास के प्रति अधिक समय तक जवाबदेह नहीं बना सके । सर्वोदयी नेता के आवाहन पर एक सम्भावना बनी थी कि देश का बौद्धिक वर्ग भारतीय राजनीति में अपनी भागीदारी के लिए शामिल हो पाता और उसे राजनीति में शामिल होने के लिए एक सतत उपलब्ध मंच मिल पाता ।  विशेषकर मध्यवर्ग और निचले वर्ग से आए जनप्रतिनिधियों के लिए भारतीय लोकतंत्र नें कोर्इ खुला राजनीतिक मंच विकसित नहीं किया है ।  यह सिथति खतरनाक है । इस दृषिट से देखें तो सन 77 की भटकाव-क्रानित के रूप में देश के मतदाताओं के साथ हुए फूहड़ मजाक के साथ  मध्यवर्ग और विशेष रूप् से उसका बौद्धिक समाज किसप्रकार अपनी सही भूमिका और सही जमीन से दीर्घकालिक निर्वासन की विचित्र परिसिथतियों में खदेड़ दिया गया ,यह भी इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय बन चुका है ।  सन 77 की उस कथित  क्रानित और जनाक्रोश के भटकाव से बौद्धिक वर्ग द्वारा सशक्त हथियार के रूप् में विचार-शकित के उपयोग तथा जनता को प्रभावित कर सकनें की उसकी सारी क्षमताएं मारी गयीं । वह न सिर्फ लम्बे समय के लिए निर्वासित हुआ बलिक ऐतिहासिक कुण्ठा का भी शिकार हुआ ।  उसका बहुत सा हिस्सा जैसे पक्षाघात का शिकार हो गया । आज आधुनिकता का वाहक भारतीय बुद्धिजीवी सिर्फ नौकरशाह बनकर रह गया है या फिर विभिन्न जातीय पार्टियों की अवसरवादी सदस्यता लेकर जाति की राजनीति कर रहा है । इस दौर में अपने घोटालों और आचरणहीन राजनीतिज्ञों के कारण विधायिका की प्रतिष्ठा धूमिल हुर्इ है और न्यायपालिका तथा पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण हुर्इ है । इस कठिन समय में कभी न्यायपालिका ,कभी पत्रकारिता तो कभी-कभी चुनाव आयोग के शेषन जैसे अवश्ेाष बुद्धिजीवियों के सार्थक प्रतिरोध से ही भारतीय लोकतंत्र संस्कारित होता रह सका है ।

         आजादी के पूर्व शिक्षा के अल्पप्रसार के कारण भारत में बुद्धिजीवियों का समुदाय बहुत बड़ा नहीं था लेकिन अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त एक पर्याप्त राजनतिक नेतृत्व उसके पास अवश्य था और उसके पास राष्टवादी निष्ठा की एक समृद्ध विरासत भी थी । आज की कांग्रेस जो बहुत अंशो तक गांधी-नेहरू की कांग्रेस न होकर इनिदरा कांग्रेस की उत्त्राधिकारिणी है  , अपनी विशेष प्रकृति और निष्ठा के कारण कांग्रेस का परिवारवादी संस्करण है । अब पुन: भारतीय जनता नें उसे भारतीय राष्टीय कांग्रेस का ही उत्तराधिकारी मान लिया है । आजादी के बाद के लगभग आधी शताब्दी से अधिक के भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आधुनिक शिक्षा नें एक अलग ढंग का बौद्धिक समाज अवश्य निर्मित किया है । इस शिक्षित बौद्धिक वर्ग को आदर्शवादी होना चाहिए था और एक निष्पक्ष लोकतंत्र के विकास के लिए प्रतिरोधी,असंतुष्ट और सृजनशील भी ।  इस दृषिट से देखें तो भारत का मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी राजनीतिक दृषिट से पलायनवादी रहा है । इसे एक असुरक्षित पेशे के रूप में देखा जाता है और संभवत: नेताओं के भ्रष्ट होनें का यह भी एक कारण है ।

          इतिहास पर नजर डा लें तो भारतीय लोकतंत्र के प्रारमिभक कर्इ दशक बौद्धिक वर्ग के राजनीतिक निर्वासन के ही रहे हैं । उसे कभी परिवारवाद और चापलूसी की चयन-प्रणाली नें बाहर किया है तो कभी मतदाताओं के जातिवादी ध्रुवीकरण नें । कभी धार्मिक-साम्प्रदायिक राजनीति ने ंतो कभी भ्रष्टाचार से अर्जित अपार कालेधन नें । उसपर भी विडम्बना यह है कि सामान्य मतदाता कालेधन और भ्रष्टाचार से अर्जित आर्थिक समृद्धि के प्रदर्शन को भी महानता के एक विज्ञापन के रूप् में देखता है । अब उसकी आंखें गाधीवादी सादगी और सामान्यता में नैतिक उत्कृष्टता एवं आचरण की विश्वसनीयता नहीं ढूंढ़ती बलिक बदली धारणा के अनुसार यह मानकर चलनें लगी है कि उसनें अब खूब लूट लिया और खा-पीकर तृप्त हो गया है और अब वह आम जनता के लिए भी कल्याण करनें की पात्रता पा चुका है ।

           आजादी के बाद की भारतीय नौकरशाही के चरित्र पर नजर डालें तो आजादी के बाद के कर्इ दशक औपनिवेशिक विरासत में मिली कार्य-संस्कृति तथा पद और व्यकितत्व की सज-धज तथा रूआब जीने के ही रहे हैं ।  विरासत में मिली हुर्इ साम्राज्यवादी सामाजिक प्रतिष्ठा को छोड़ते और जनतांत्रिक मूल्यों की कीमत चुकाते हुए व्यकितत्वांतरण करनें के लिए भारत का प्रशासक वर्ग बिल्कुल ही तैयार नहीं हुआ । बहुत ही सावधानी से  ''लोकसेवा को 'स्वयंसेवा में बदलते हुए सार्वजनिक सेवा और लाभ के लिए बनें राजनीतिक-प्रशासनिक पदों को  निजी लाभ के आर्थिक पदों में बदल लिया गया । इस प्रकि्रया में लोकतांत्रिक संस्कृति को हुर्इ क्षति को देखा जाय तो जनतंत्र के संवैधानिक पन्नों पर शासक वर्ग नें इतली लकींरें खींच दी हैं कि देश की जनता में जनतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों की न तो पर्याप्त स्वस्थ  और सार्थक स्मृति ही बची रह गयी है और न ही असंतुष्ट होनें की दशा में नए बदलाव और प्रयोग का कोर्इ अवसर ही । एक स्वस्थ परम्परा की स्मृति कीे बचाए रखनें के लिए सतत-सकि्रय कोर्इ मंच भी नहीं दीखता । आज पेशेवर राजनीति के अभाव यानि कार्य-प्रदर्शन के आधार पर मत न देने की प्रवृतित के कारण ही भारतीय लोकतंत्र कुछ ही परिवार-समूहों की निजी जागीर बनकर रह गया है । राजनीतिक क्षेत्र की उपेक्षा के साथ भारतीय युवा-शकित आर्थिक क्षेत्र में अपनी महत्वाकांक्षी सृजनशीलता के विकल्प ढूंढ़ रही है । इस पलायन नें राजनीति के क्षेत्र में जहां प्रतिद्वनिद्वता को कम किया है वहीं सकि्रय राजनीतिज्ञों को अकल्पनीय आर्थिक साम्राज्य के एक स्वर्ग में पहुंचा दिया है । राजनीतिज्ञों के पतन नें  भारतीय नौकरशाही को तो भ्रष्ट किया ही प्रशासन-तंत्र जैसी स्थार्इ महत्व की संस्था की छवि को भी बहुत नुकसान पहूंचाया है । आज यदि बहुतों को यह अहसास होता है कि प्रशासन नाम की कोर्इ चीज नहीं रह गयी है तो यह बात साफ हो जानी चाहिए कि उसके पहले प्रशासक वर्ग नें ही इस अहसास की शुरुआत की होगी कि जनता नाम की कोर्इ चीज नहीं है, जो हैं वह हम ही हम !

      आपातकाल के बाद जे.पी. वाले सम्पूर्ण क्रानित के आवाहन की विफलता और उसमें हुए नए पीढ़ी के व्यापक दुरुपयोग से ही यह स्पष्ट हो चुका था कि फिलहाल अभी बौद्धिक वर्ग  अपना मौलिक नेतृत्व नहीं पैदा कर सका है ।  निश्चय ही इस क्रानित की विफलता नें देश और समाज के नेतृत्व शकित के रूप में बौद्धिक वर्ग के उदय की संभावना को अनिशिचत समय के लिए स्थगित कर दिया । बीमार जयप्रकाश तथा औपनिवेशिक इतिहास से प्रशिक्षण प्राप्त कर निकले भटकी(सम्पूर्ण)क्रानित के तथाकथित सूत्रधार और शिकार के रूप में गांव-गांव और कस्बे-कस्बे में युवा-वर्ग के कन्धे पर रखकर चलार्इ गर्इ बन्दूक से एक भी बाघ मरे हों या नहीं- क्रानित का परिणामी सत्ता-सुख भोगते अपनी ही पीढ़ी के विपक्षी बूढ़े नेताओं के सत्ता-आरोहण और अतृप्त महत्वाकांक्षाओं की भगदड़ को इनिदरा गांधी नें अवश्य ही अनुकूल माना होगा । इसे एक ऐतिहासिक अनुभव के रूप में देखें तो भारतीय मतदाताओं के साथ एक बहुत बड़े राष्टीय मजाक के रूप में सामनें आनें वाले सन  '77 के भव्य जनाक्रोश नें शकित का रूप लेते जिस वर्ग के असंतोष की पीठ  पर चढ़कर जनता पार्टी के रूप में विपक्ष सत्तासीन हुआ था, वह वस्तुत: बौद्धिक वर्ग ही था । आपातकाल में इनिदरा गांधी के कुछ निहित आकांक्षाओं की पूर्ति में बाधक तत्कालीन युवा वर्ग के रूप में आन्दोलनरत इस वर्ग का अपराध यही था कि वह लोकतंत्र,विज्ञान,मानवतावाद और लम्बे संघर्ष के बाद अर्जित स्वतंत्रता,अधिकार और समानता जैसे महान मानवीय मूल्यों वाले शब्दों का अर्थ और इतिहास जानता था ।  आपातकाल में सेंसर के रूप में प्रेस की स्वतंत्रता पर हुआ विनाशकारी प्रहार अपरोक्ष रूप से वस्तुत:

इसी वर्ग की बौद्धिक चेतना और उसके नैतिक आत्मविश्वास को तोड़नें ,कुचलनें और पंगुं करनें की साजिश थी । समाज की विविध परम्पराओं और ज्ञान का स्मृति-वाहक होने से यह वर्ग प्रतिरोध की दृषिट से पर्याप्त सिथरता और दृढ़ता प्रदर्शित करता है ; थोड़े-बहुत परिवर्तनों और कायोर्ं पर रीझकर व्यकितपूजक लोहा मानते हुए खुश होकर तालियां पीटना ही स्वीकार करता है ;जल्दी किसी से न तो प्रभावित होता है और न ही न ही अपने विवेक की स्वाधीनता ही खोना चाहता है ।

          एक बार सैद्धानितक उदारता के रूप मे धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद को स्वीकार कर लेने के बाद स्वाधीन भारत में कांग्रेस की भूमिका एक संरक्षणवादी-यथासिथितिवादी पार्टी की हो जाती है । उसनें साम्प्रदायिक तुषिटकरण के अपने अनेक निर्णयों द्वारा आधुनिकतावादी सामुदायिक विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया को बाधित किया है । इस भूमिका में इनिदरा गांधी युग की कांग्रेस की नीतियां विशेष रूप् से उल्लेखनीय हैं । मानव-जाति के एक व्यापक हिस्से के रूप में भारत के भविष्य के साथ इनिदरा गा्रधी की आपराधिक परिणामों वाली सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल यही थी , जिसनें जानें-अनजानें उन्हें अकेला बनाते हुए इतिहास के सही प्रवाह से ही नहीं काटा ,बलिक अपनी अनितम दुखद परिणति के रूप में अपनें युग के वर्तमान से भी हमेशा के लिए बाहर कर दिया । विडम्बना यह कि उनकी शहादत उन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए उन्हीं समस्याओं से हुर्इ जिसका कि वे राजनीतिक स्तर पर अपनें कार्यकाल में पोषण करती रहीं । इसमें सन्देह नहीं कि भारत के विकास की दृषिट से ं आधुनिक सभ्यता के भौतिक पक्ष को उनका योगदान सराहनीय है ,लेकिन समानता के मूल्यों वाली बौद्धिक-चेतना,बौद्धिक अहं और राजनीतिक सत्ता पर सतर्क नजर रखती स्वतंत्र विचार-शकित उन्हें रास नहीं आर्इ । राजनीतिक वर्चस्व की उनकी महत्वाकांक्षा नें उन्हें एक असहिष्णु प्रशासक बना दिया । वे स्वतंत्र भारत में एक अधिनायक के रूप में उभरीं । अपनी राजनीतिक सत्ता खोने के भय से आपात काल लागू किया । एक विकासमान सभ्यता की विकासमान संस्कृति की उपेक्षा करते रहनें की भूल-कुछ मानसिक प्रकृति, कुछ विवशता ,कुछ भारत के प्रथम परिवार की कुलीन प्रतिष्ठा के दम्भ और महत्वाकांक्षा के कारण :एक केनिद्रत और चुनौतियों से मुक्त सत्ता की आवश्यकता का तर्क लेकर वे निरन्तर ही करती रहीं । इसका कारण मुझे यह लगता है कि लोकतंत्र से अधिक वे राष्टवाद की चिन्ता करनें वाली राजनीतिज्ञ थीं । उनके लिए भारत की स्वाधीनता का मतलब कांगेस का शासन था ,क्योंकि स्वाधीनता सिर्फ कांग्रस के केन्द्रीय नेतृत्व में ही सुरक्षित रह सकती थी । यह भी संभव है कि भारत को लेकर उनके मन में विकास के कुछ ऐसे स्वप्न रहें हों जिसे अपनें जीवन-काल में ही वे पूरा करना चाहती रही हों । जो कुछ भी रहा हो, अपनें राजनीतिक वर्चस्व और सत्ता की प्रापित की चिन्ता को किसी भी सीमा  तक जीनें वाली इनिदरा गांधी की इस लोकतंत्र-विरोधी भूमिका को भविष्य के इतिहासकार भी संभवत: अस्वीकार नहीं कर सकेगे ।

 यह एक तथ्य है कि भारतीय बौद्धिक चेतना और उसके लोकतंत्र के विकास को सबसे अधिक चुनौती जन-जीवन में व्याप्त व्यापक अशिक्षा और अज्ञान की उपज नकारात्मक प्रवृतितयों के बार-बार इतिहास और वर्तमान बन जानें क्षमता में ही मिलती रही है । इस संघर्ष का सबसे स्पष्ट ऐतिहासक स्वरूप महात्मा गांधी के जीवन में मिलता है । व्यापक हितों की चिन्ता के साथ अपनें सन्तुलनकारी प्रयासों में उन्होंने कर्इ बार बाध्यता के साथ समझौतावादी-संशोधनवादी परिसिथतियों का दबाव वैचारिक स्तर पर झेला । उनके एक ओर भारतीय समाज और भारतीय शासकों से बिल्कुल भि न्न प्रकार की मान्यताओं वाली,रूढि़परक वर्जनाओं से लगभग मुक्त अंग्रेजी सत्ता थी तो दूसरी ओर हजारों वर्ष पहले की सिथर मान्यताओं से चिपका,मध्ययुगीन सामन्ती मूल्यों और विचारधारा वाला भारतीय समाज-विचित्र प्रकार के द्वन्द्व एवं अन्तर्विरोध से गुजर रही थी भारतीय चेतना-जो संकोच और स्वीकार,विरोध और सहमति के संक्रमण के दौर में विकसित होती हुर्इ । ऐसे समय में महात्मा गांधी का इतिहास-प्रसिद्ध आध्यातिमक मानवतावाद बहुत कुछ समझौतावाद और युग की अपरिवर्तनशील जड़ सामाजिक समय की मुख्य धारा से जोड़ सकनें योग्य नीतियों की समझ विकसित करते हुए ही प्राप्त किया गया था ।  अन्यथा, उस युग के भाववाद और आदर्शवाद की दुहार्इ देनें वाले बहुत कम लोग ,इस सच्चार्इ पर ध्यान दे पाते हैं कि आजादी के पहले का विश्व दो विश्व-युद्धों के द्वारा विज्ञान को व्यापक स्वीकृति दे चुका था । उस समय तक परम्परागत र्इश्वर और आध्यात्म को माक्र्स जैसे विचारकों से कड़ी चुनौतियां भी मिल चुकी थीं । गांधी जी के लिए पहले व्यकित की भूमिका निभानें वाले नेहरू का ,महात्मा गांधी से आशीर्वाद  प्राप्त करनें के साथ-साथ नयी दुनिया का स्वागत करनें वाली पंकित में समिमलित हो जाना  परम्परागत  भारतीय सोच से अलग किसी नयी बौद्धिक चेतना की तलाश का ही परिणाम था और यह दुनिया थी माक्र्स ,समाजवाद,प्रगतिशीलता ,विज्ञान और भौतिकवाद की दुनिया !

        आजादी के बाद गांधी जी नें अपना उत्तराधिकार नेहरू को ही सौंपा तो इसके पीछे विकास और परिवर्तन के बाद  मिलनें वाले भविष्य के भारत का स्वप्न और तर्क अवश्य रहा होगा; जो कि गांधी की अपनी परम्परा से अलग हटकर ,कोर्इ दूसरी नयी चीज भी हो सकती थी । यह पूरे विश्व के भविष्य के साथ भारत के भविष्य को जोड़ देनें की सुविधा भी हो सकती थी -युग के व्यापक विचारों के परिप्रेक्ष्य में विकसित होने का एक अवसर भी । यधपिगांधी जी नें विकल्प रूप् में ''बहुजन हिताय की अपनी मौलिक आकांक्षा भी पूरी तरह स्पष्ट कर दी थी लेकिन वैज्ञानिक विकास के बाद आनें वाली दुनिया का स्वप्न उनसे अनदेखा नहीं था । यही  वह बिन्दु है जहां अपने रचे प्रभामण्डल से बाहर गांधी जी भी आनें वाली दुनिया की प्रतीक्षा में विश्वास करते एक बौद्धिक व्यकित के रूप में भी सामनें आते हैं । यहां पर आकर महात्मा गांधी के व्यकितत्व का पुनमर्ूल्यांकन आवष्यक हो जाता है -विशेषत: मनोवैज्ञानिक दृषिट से ; क्योंकि 'मोहनदास कर्मचन्द से अलग 'महात्मा गांधी बहुत कुछ अपने युग की जनता की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की भी उपज थे ।

       वस्तुत: गांधी अपनी पारगामी संवेदनशीलता के बल पर अपने युग की मानसिकता का चुनौती  भरा प्रामाणिक प्रतिनिधित्व करते हैं । वे एक साथ जहां बौद्धिक वर्ग के एक सदस्य के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर सकते थे तो उसके दोषों और भटकावों की प्रतिक्रिया बनकर उसे चुनौती भी दे सकते थे । इसके अतिरिक्त वे बार-बार वहां तक पीछे मुड़ते हैं, जितनी और जहां तक पिछड़ी उनके अपने सुग की आम जनता होती है । गांधी जी के युग के बुद्धिजीवियों की अगली पंकित मोतीलाल नेहरू ,सुभाषचन्द बोस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे अपने समय की अंग्रेजी बौद्धिकता से बराबरी का दावा कर सकनें वाली हसितयों के रूप् में देखी जा सकती है । गांधी से पूर्व की कांग्रेस भी ऐसे ही लोगों की विशिष्ट संस्था थी । 

 यधपि मिथकीय सत्ता के प्रति भारतीय जनता के आकर्षण का विचारपूर्ण और सफल उपयोग आधुनिक युग में महात्मा गांधी ने किया था,लेकिन उसके दुरुपयोग के अनेक दावेदार प्रयोक्ता सामनें आये हैं । एक बि्रटिश शिक्षित एडवोकेट के रूप में प्रतिभा और सामथ्र्य के स्तर पर गांधी जी भी यधपि बौद्धिक वर्ग के सशक्त दावेदार हैं ; लेकिन स्वेच्छया उस पंकित से उठकर समाज की पिछली पंकित से जुड़ने ंके प्रयास में कृष्ण , बुद्ध और चाणक्य जैसी युग-प्रवर्तक भूमिकाओं से जोड़नें वाला उनका विशिष्ट रूप ही महात्मा की उपाधि लेकर सामनें आता है । वस्तुत: इतिहास-निर्माण के अनितम हिस्सेदार, अपनें युग  क्ी पिछली पंकित के मनोविज्ञान के अनुरूप-आध्यात्म की भाषा बोलने वाले मानवतावाद के रूप में ,जीवन्त मिथकों से रचा-बसा गांधी की 'महात्मा भूमिका वाला जन-संस्करण ही एक जागृत जन-शकित के रूप में उस संगठन का निर्माण कर सकता था ,जिससे किसी युग ,समाज और व्यवस्था को बदला जा सके । गांधी के इस गुण को यदि युग की नकारात्मक प्रवृतितयों को पहचानकर सकारात्मक बनाने वाले  बौद्धिक समझौतावाद के रूप में देखें तो अधिक सही होगा ।  इस दृषिट से हम जहां भारतीय जनता में मिथकों की तरह बसे हुए गांधी की सही व्याख्या तक पहुंच सकते हैं,वहीं इनिदरा गांधी की अपार सफलता और लोकप्रियता के इतिहास के साथ-साथ उन भयंकर भटकावों और विफलताओं को भी-जो ऐतिहासिक घटनाओं को बौद्धिक चश्में से देखने वाली जनता की बजाय मिथकीय रंग के चश्में से देखनें वाली जनता की आकांक्षाओं का परिणाम थ ी ; जो देखते ही देखते एक अनचाहा इतिहास बलपूर्वक नयी पीढ़ी को सौंप कर चली गर्इ हंै। इस रूप में कि इनिदरा गांधी के विरुद्ध अपनें सम्प्रदाय के पक्ष में प्रतिशोध की मानसिक उत्त्ेजना से गुजर रहे उनके ही दो सिख अंग-रक्षकों सतवन्त-बेअन्त नें हत्यारे द्वन्द्व के क्षणों में सिर्फ बाज पक्षी दिख जानें की प्रेरणा लेकर उनकी मृत्यु को निश्चयात्मक रूप में कारित कर दिया था । कुछ सम्प्रदायों के धर्मग्रन्थों में हिंसा की मिथकीय सांस्कृतिक स्मृति  उन्हें मानवताविरोधी ढंग से हिंसक एवं हत्यारा बना रही है ।

 वैसे तो आज सिर्फ भारत ही नहीं ,बलिक पूरा विश्व ही विरासत में मिली समस्याओं से जूझ रहा है ; लेकिन इस समय वर्तमान पर'मिथकीय स्मृति(भूत)जीवी मनुष्यों के व्यापक हमले को देखते हुए,समस्याएं तब और अधिक गम्भीर लगनें लगती हैं,जब हम यही फर्क करनें में कठिनता का अनुभव करने लगते हैं कि हम आज जो कुछ भी जी रहे हैं,उसे जीवन्त और उपयोगी परम्परा के रूप में देखेंद्वइतिहास का हिस्सा मानें या भूत का -आधुनिकता और अधतनताजीवी समाज के साथ भूतजीवी समाज की व्यापक उपसिथति का हम क्या करें ! इस समय की अधिकांश राष्æीय समस्याएं ऐसी ही अनिश्चय,भ्रम और द्वन्द्व की मन:सिथति का परिणम हैं । कुछ धार्मिक और जातीय स्मृतियों की पुनरावृतित, अपने संकीर्ण हितों की सुरक्षा और पहचान के संकट के नाम परकरते हुए किसप्रकार समकालीन चेतना को व्यापक हितों के विरोध में खड़ा कर दिया जाता है-आज के राजनीतिज्ञों द्वारा  जनमानस का ऐसा सुनियोजित दुरुपयोग भी एक आम बात हो गयी है। फिर भी ,मानव-इतिहास की लम्बी यात्रा की उपज जातीय स्मृतियों और मिथकीय चेतना की मनोवैज्ञानिक समस्याओं को देखते हुए कुछ समस्यात्मक सिथतियां अवश्य ऐसी सामनें आती हैं,जो राजनीतिज्ञों के नियन्त्रण से पूरी तरह बाहर हैं, किन्तु जिनके लिए सिर्फ उन्हें ही दोषी ठहराना शीघ्रता होगी । ये समस्याएं वर्तमान के ऊपर जातीय और धार्मिक मिथकों के हमले की ही हैं । इधर जितनी तेजी से असुरक्षा की मनोग्रनिथ से प्रेरित हिंसक धार्मिक संगठनों के निर्माण और उनसे प्रेरित साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं ,उनके पीछे कोर्इ न कोर्इ जातीय स्मृति या अवसर के अनुकूल नकारात्मक मिथकों को जनमानस में वापस लानें की कोशिश ही जिम्मेदार है । यह प्रवृतित अनेक समाज और मानवताविरोधी संगटनों के निर्माण के रूप में सामनें आती रही है ।  अनेक सम्प्रदायों द्वारा निर्मित राष्æव्यापी संकट और हिंसक वतावरण के पीछे मिथकों से प्रेरित जातीय स्मृतियों का हाथ है । मिथकों की ऐसी आतंककारी भूमिका किसी जाति या धर्म -विशेष के सदस्यों के अन्तर्गत पहली दृषिट में तो किसी अन्धे और विचारहीन उन्माद का परिणाम लगता है और एक ऐसी समस्या के रूप में सामनें आता है ,जिसका समाधान किसी बन्द दरवाजे की चाबी की तरह खोे गया हो ; किन्तु गहरार्इ से विचार करने पर इन हिंसक जातीय मनोवृतितयों के पीछे सशक्त कारक तत्वों के रूप में मिथको ं की अचेतन भूमिका बुरी तरह चौंका जाती है । यहां मिथकों की जातीय स्मृति से आशय यह है कि कुछ ऐतिहासिक व्यकितयों और घटनाओं के इर्द-गिर्द तत्कालीन अफवाहों,अन्धविश्वासों और अनुयायियों में व्याप्त श्रद्धा-विगलित भ्रामक कल्पनाएं इस वास्तविक दुनिया के समानान्तर एक और काल्पनिक दुनिया रच देती है । शायद आज बौद्धिक होने की सबसे बड़ी अधतन चुनौती मिथकीय चेतनता से बाहर आकर वास्तविक अथवा विशुद्ध वर्तमान की चेतनता को सामूहिक स्तर पर पुन: प्राप्त कर लेने की ही है ।  आज आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्र के बौद्धिक स्वरूप और

उसकी लोकतानित्रक संस्कृति को बनाए रखने के लिए जनता को नए सिरे से प्रशिक्षित किया जाय । उसे अपने भीतर की अपार सृजनशीलता के प्रति जागरूक किया जाय । उसेअब तक उपेक्षित की गयी स्थानीय लोकतानित्रक संस्थाओं कीे ओर उन्मुख किया जाय और भटकाव की शिकार लोकतानित्रक परम्पराओं की वापसी के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास करने के लिए विचारपूर्ण और ठोस कार्यक्रम बनाए जांयें ।



मंगलवार, 15 जनवरी 2013

भारतीय धर्म,दर्शन और संस्कृति की जातीयता

भारतीय संस्कृति की एक विशेषता पर पता नहीं दूसरों का भी ध्यान जाता है की नहीं  कि यहाँ जाति-निरपेक्ष रूप में विशुद्ध बौद्धिक तार्किकता के साथ दर्शन का विकास नहीं हुआ है .जिस जाति-विशेष नें उसका विकास किया है ,उस पर पेशे या आजीविका का दबाव रहा है .कम से कम तीर्थों के विकास में झूठे सृजन और सामूहिक महिमा-मंडन की उल्लेखनीय भुमिका  रही है .इससे हिन्दू तीर्थों में कभी-कभी अश्लील पेशेवर प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है .इससे हिन्दुओं के सिर्फ वाही मंदिर मुक्त हैं ,जिनकी स्थापना किसी ज़माने के राजतन्त्र नें की है .ऐसे मन्दिर प्रतिष्ठित और भव्य हैं ,उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति भी है .दक्षिण भारत के कई प्रतिष्ठित मंदिर ऐसे ही हैं .ऐसे मंदिरों में परम्परागत अनुशासन और व्यवस्था भी है .एक प्रभावित करने वाला सांस्कृतिक वातावरण भी मिल जाता है .लेकिन  ऐसे प्रतिष्ठित मंदिरों की स्थापना क्योंकि राजतन्त्र या सामन्ती युग की हुई है तथा उन पर उत्तराधिकार में जाति-विशेष के एक ही परिवार का अधिकार है ,इसलिए उसमें मानवतावादी वातावरण नहीं मिलाता.कई बार आधुनिक शिक्षा और मूल्य-बोध से वंचित होनें के कारण जातीय दम्भ एवं जातीय दुर्व्यवहार के दर्शन भी होते हैं .इसका एक दूसरा पक्ष भी मिलाता है .प्राचीन मंदिर निजी आवास में बदल जाते हैं.या फिर सार्वजानिक भूमि का अतिक्रमण कर जन-सुविधाओं को अवरुद्ध कर दिया जाता है .यद्यपि हिन्दू धर्म में धर्मशालाओं की परंपरा है ,लेकिन अधिकांश मंदिरों में शरण लेने या सेवा की संस्कृति का प्रावधान नहीं है .यद्यपि दक्षिण भारत के मंदिरों में बड़े परिसर,पाठशालाओं तथा सेवा की संस्कृति की शानदार परंपरा भी रही है ,लेकिन अधिकांश में ऐसा नहीं है.
दूसरी बात यह है कि कई स्थलों पर पेशेवर जातीय सुविधाओं की परंपरा तो है लेकिन प्रायः भिक्षा और दक्षिणा के अर्थ -तन्त्र पर आधारित होनें के कारण उसकी सांसकृतिक परम्पराओं में सेवा संस्कृति का अभाव मिलाता है .
               यद्यपि सन्त परम्परा के कुछ केन्द्रों में जाति-निरपेक्ष आध्यात्मिकता का सांस्कृतिक वातावरण भी दिखता है लेकिन वे भी आध्यात्मिकता के बहानें मनोवैज्ञानिक उपचार केन्द्र से अधिक महत्व नहीं रखते ,
क्योंकि भारतीय मूल की अनेक आध्यात्मिक अवधारणाओं का विकास जाति-विशेष नें किया है ,इस लिए उसके कई उत्तराधिकार में मिले आनुवांशिक रहस्य जाति-विशेष के पास ही सुरक्षित हैं.वह कपोल-कल्पनाओं और मनगढ़न्तों का पिटारा बन कर रह गई है .क्योंकि परंपरागत आचरण पद्धति का सामन्ती पृष्ठभूमि से सम्बंधित होने  के कारण आधुनिक लोकतान्त्रिक संसकृति से पर्याप्त विरोध है ,मुझे कई बार लगता है कि भारत में जाति-निरपेक्ष आध्यात्मिक अवधारणाओं का विकास हुए बिना उसकी संस्कृति और सांस्कृतिक आदतों का आधुनिकीकरण नहीं किया जा सकता .ऐसा करना आवश्यक है ,क्योंकि सांस्कृतिक तन्त्र अपने स्थाई प्रशिक्षण -तन्त्र के कारण राजनीतिक दण्ड-विधान से अधिक उपयोगी और सार्थक हो सकता है .वर्तमान में यह लोकतन्त्र की राजनीतिक संस्कृति के विरोध में है .इसे पूरक और सहयोगी रूप में ,नई अव्धार्नाओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए .

रविवार, 13 जनवरी 2013

मार्क्स वाद : एक पुनर्चिन्तन



मनुष्य की हर व्यवस्था अन्तत: एक विचार है -अवधारणाओं ,विष्वासों और बौद्धिक निष्कर्षों का एक विषिश्ट संयोजन है । उत्तर-आधुनिक चिन्तक इसे ही पाठ के रूप में देखते हैं । हर विचार भी कार्य-कारण श्रृंखला से सम्बनिधत समझदारी ,क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं और अनुभवों पर आधारित निष्कर्ष हुआ करते हैं । इसीलिए मनुश्य के परिवेश  और परिप्रेक्ष्य के बदलते ही उसके विचार बदलने लगते हैं ।मनुष्य और उसकी सभ्यता के स्वास्थ्य की दृष्टि से स्वाभविक यही है कि ऐसा हो । एक स्वस्थ प्रगतिशील समाज और उसके सदस्य नए आते हुए तथ्यों और सूचनाओं के आधार पर अपने विश्वासों और विचारों को अधतन करते रहते हैं । रूढि़वादी समाज और उसके सदस्य मानसिकता को स्थिर और अपरिवर्तनशील बनाए रखने के प्रयास में अतीत के तथ्यों और विचारों पर आधारित अवधारणाओं का पुनर्सृजन करने लगते है।  परिवेष और परिप्रेक्ष्य से जुडे़ तथ्यों के बदलाव के साथ अतीत की मासिकता को पुनरूत्पादित करने वाला समाज सामंजस्य के अनिवार्य तनाव से गुजरता है और सामूहिक रूप से मनोरोगी हो जाता है । वर्तमान के विरुद्ध अतीतजीविता के लिए उसका संघर्श अन्तत: सामूहिक मनोविक्षिपित में बदल जाता है । वह नकारात्मक और प्रतिहिंसक हो उठता है । जिस समुदाय के लोगों पर अतीत के पुनरूत्पादन का दबाव और वर्तमान के परिप्रेक्ष्य के अस्वीकार का दबाव अधिक होगा वह समुदाय उतनी ही मनोविक्षिपित का षिकार होगा । इस अवसाद की प्रतिक्रिया ही कुछ समुदायों में आतंकवादी पैदा कर रही है । इसका समाधान सिर्फ एक ही है कि दुनिया के सभी मनुश्य सभ्यताकरण की प्रक्रिया को समझें और अपनी चेतना और मसितश्क को साभ्यतिक अभियानित्रकी का एक उत्पाद एवं उपकरण बनने की सिथति से मुक्त करें ।

           क्योंकि सभ्यताकरण की प्रक्रिया में हर असावधान मनुश्य एक साभ्यतिक-सांस्कृतिक उत्पाद बन जाता है ,इसलिए मानव-जाति की तब तक मुकित सम्भव नहीं है ,जब तक उसका मसितश्क सामूहिक रूप से सभ्यताकरण के अभियानित्रक प्रभाव से मुक्त नहीं हो जाता । सभ्यताकरण के इस अभियानित्रक प्रभाव से मुक्त होना ही हमारी चेतना का इतिहास से मुक्त होना है - मानवीय विवेक को एक नर्इ सृजनषीलता के लिए मुक्त करना है । हमारी सभ्यता के पुनर्सृजन का रास्ता भी हमारी इसी मुकित में खुलता है । इसीलिए मानव-सभ्यता के पुनमर्ूल्यांकन और उसकी व्यवस्था के पुनर्निमाण के चिन्तन की प्राथमिक षर्त ही उसके व्यकितगत और सामूहिक विवेक की मुकित है। सभ्यताकरण की इस प्रक्रिया और उसकी अभियानित्रकी की जड़ता को भौतिक परिसिथतियों और जीवन पर परिप्रेक्ष्य के पडने वाले निर्णायक प्रभाव को कार्ल माक्र्स भी स्वीकार करते है लेकिन अपने युग के अविकसित मनोविज्ञान के कारण उनके द्वारा की गयी इतिहास की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी व्याख्या उनकी विचारधारा को दार्षनिक नियतिवाद की ओर मोड़ देती है।

           मनोवैज्ञानिक दृशिट से माक्र्सवादी विचारधारा पूंजीवादी मानव-सम्बन्धों और व्यवस्था के प्रति उपजे असन्तोश एवं उसकी अपर्याप्तताओं का दार्षनिकीकरण है । उसका अन्त साम्यवादी क्रानित की दार्षनिक यूटोपिया में होता है । पूूजीवादी व्यवस्था की खामियों के कारण तथा उसकी प्रतिक्रियात्मक सापेक्षता में ही माक्र्सवादी विचारधारा का नैतिक औचित्य और प्रासंगिकता सुरक्षित है । माक्र्सवाद के द्वन्द्वात्मक नियतिवाद को जिसे इस विचारधारा के अन्तर्गत प्राय: द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है उसके क्रानितधर्मी नियतिवाद और आषावाद को सृजनात्मक विकासवाद या संभाव्यवाद के वैज्ञानिक दृशिटकोण से विस्थापित किए जाने की जरूरत है ।

             यह सच है कि किसी भी युग के मनुश्य का जीवन-स्तर ,उसकी इच्छाएं और प्राथमिकताएं उस युग के सृजित संसाधनों तथा उस समय तक विकसित एवं निर्मित परिवेष के सापेक्ष ही घटित होगा । नयी सृजनषीलता के द्वार (और संभावनाएं ) भी उस समय तक विकसित ज्ञान,प्राप्त सूचनाओं और ज्ञात तथ्यों के सापेक्ष एवं पृश्ठभूमि में ही खुलेंगे। यह मैं वही कह रहा हूं जो माक्र्स कह चुके हैं । इसके बावजूद राजनीतिक यानि वर्तमान सामूहिक जीवन-व्यवहार की व्यवस्था निर्मित करने के लिए उसके सृजनात्मक विवेक को मुक्त रखने की मनोवैज्ञानिक प्रविधि पाने का महत्त्व कम नहीं हो जाता । अवधारणाएं एक बार निर्मित और सर्वस्वीकृत हो जाने के बाद अनुजीवी समाज का पुनरूत्पादन करने लगती हैं । यह अनुजीविता समाज को तनावरहित ढंग से जीने की सुविधा तो प्रदान करती है ,लेकिन सूचनाओं और प्रषिक्षण की आवर्ती एकरसता के कारण वह नर्इ सृजनषीलता और संसाधनों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव भी डालती है । यथासिथतिपरक यथार्थ का एक प्रमुख कारण अवधारणात्मक परिवर्तनहीनता एवं उसका पीढ़ी दर पीढ़ी प्रषिक्षणात्मक पुनसर्ृजन भी है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि एक रूढि़वादी समाज अपने कुछ सांस्कृतिक-सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण अपने पिछड़ेपन का भी एक सीमा तक पुनरूत्पादन ही करता है । उदाहरण के लिए धार्मिक-जातीय कारणों से टीकाकरण का विरोध करने वाले रूढि़वादी चरित्र सम्बनिधत चरित्र और उसके वायरस को न सिर्फ संरक्षण प्रदान करते है बलिक एक समस्या को सामाजिक यथार्थ के रूप में पुनरूज्जीवित भी करते रहते हैं । इसलिए जड़ता के प्रषिक्षणात्मक पुनरूत्पादन की प्रक्रिया पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए ।

     मानव-जाति की नकारात्मक अवरूद्धता के कारणों की पड़ताल करते समय उसकी अवधारणात्मक और वैचारिक जड़ता को नकारा नहीं जा सकता । यह ध्यान रखना चाहिए कि अवधारणात्मक सृजन भी यदि वास्तविकताओं के सापेक्ष संगतिपूर्ण और औचित्यपरक  है तो वह अपनी विष्वसनीयता के कारण वैचारिक यथार्थ से सामाजिक यथार्थ में रूपान्तरित होता रहता है । किसी वस्तु या पर्यावरण के समान उसे बदला जा सकता है । हर नर्इ पीढ़ी उसकी संरचना में परिवर्तनात्मक हस्तक्षेप कर सकती है । यह वैचारिक दुनिया की वास्तविक दुनिया में पुनप्र्राति की तरह है ।  इस दृशिट से दार्षनिक या विचारधारात्मक विचलन भी एक यात्रा है । यदि यह यात्रा अपनी व्यर्थता को प्रमाणित कर देती है तो उसे स्मृति के बोझ के रूप में ही लिया जाना चाहिए । इसके बावजूद भी वह एक पुन:संस्कारित हो सकने वाली वस्तु के संरक्षण-मूल्य के साथ प्रासंगिक बनी रहेगी ।  विचारों का हर बीहड़ मानव-मसितश्क की सक्षमता के लिए भटकाव का रोमांचक क्षेत्र देता है ;  लेकिन स्मृति में बने रहने के बावजूद व्यवहार में जीवित एवं प्रासंगिक बने रहने वाले विचार ही जीवित विचार के रूप में देखे जाते हैं । असावधान ,अप्रषिक्षित एवं अविकसित पाठक समुदाय किसी भी अवधारणा को देष-काल की चेतना से मुक्त होकर अपनी अनुकरणात्मक वृत्ति द्वारा पुनसर्ृजन या पुनरूत्पादन करने लगता है । विचारधारा के एक पाठ को जीने पर वह क्रमष: सांस्कृतिक ,सामाजिक और साभ्यतिक पाठ में बदल जाता है । इस पुनरूत्पादन की अनितम परिणति उसके पिछड़ने और किसी  दूसरे मानव-समूह के विकसित होते जाने की सापेक्षता में आगे चलकर वर्तमानित अतीत के रूप में होती है।

         ऐसा कोर्इ भी वर्तमानित अतीतीकृत समुदाय अपने स्थगित और सन्तुश्ठ होने के साथ-साथ किसी दूसरे समुदाय के लिए सदैव प्रतिक्रियात्मक चुनौतियां ही दे यह आवष्यक नहीं । किसी नए परिवर्तन के प्रति बुद्ध और कन्फयूसियस के अनुयायी अवरोधी प्रतिक्रियात्मकता की दृशिट से आवेगषून्य रहे हैं और उन्होंने बहुत ही सन्तुलित और स्वस्थ प्रतिक्रियाएं प्रदर्षित की हैं । बामियान बुद्ध के घ्वंस के अवसर पर विष्व नें देखा कि बुद्ध के षैक्षणिक मूल्य अधिक प्रभावी हुए तथा उसके घ्वंस पर भी बौद्धों की प्रतिक्रिया संयत एवं षालीन मौन के रूप में ही रही । निष्चय ही ऐसा अवधारणात्मक मनोग्रस्तताओं से बाहर निकल कर जीने की उनकी मनोविज्ञान सम्मत प्राचीन दार्षनिक प्रविधि के कारण ही हुआ होगा । इसीलिए मुझे लगता है कि दलार्इलामा के साथ तिब्बतियों ने भी चीन को षालीनतापूर्वक तिब्बत देकर चीनी सभ्यता को नैतिक दृशिट से कमजोर किया है । अपनी सारी आधुनिकता और वैज्ञानिक विकास के बावजूद गांधी की तरह दलार्इलामा ने भी चीनी सत्ता को अद्र्धसभ्य ,आदिम ,बर्बर और अनैतिक प्रमाणित किया है । लेकिन विडम्बना यह है कि हर आक्रामक सभ्यता अपनी अनैतिकता और अपराधबोध को लगातार बनाए रखने वाले विजेता उन्माद में भुलाए रहती है । यह उचित ही है कि चीनियों की नर्इ पीढ़ी ऐतिहासिक विरासत में मिली अनैतिक होने के हीनता ग्रनिथ को तिब्बत के तीव्र विकास के माध्यम से दूर करना चाहती है । इसे दलार्इलामा के संघर्श और निर्वासित उपसिथति के सार्थक परिणाम के रूप में भी देखा जा सकता है। इसप्रकार मनुश्य की कोर्इ भी अवधारणा मनुश्य निरपेक्ष नहीं हो सकती । यह सृजनषीलता यदि समकालीन मनुश्य की आवष्यकताओं से असम्बद्ध हो जाती है तो निरपेक्षता की बढ़ती हुर्इ प्रवृत्ति के साथ वायवीय अमूर्तन ,अप्रासंगिकता एवं कृत्रिमता का षिकार होने लगती है। ऐसी सिथति में वह बुद्धिजीवियों के व्यसन का परिणाम और बया का घोसला बन जाती है जिसको वह रहने के लिए बुनता है और बुनते हुए रहता है ।

           आधुनिकता को प्राय: अतीत से मुकित और वैज्ञानिक ज्ञानोदय से जोड़कर देखा जाता है । इस प्रकार आधुनिकता एक अतीत सापेक्ष अवधारणा है । उत्तर-आधुनिक युग यदि आधुनिक युग से आगे का चरण है तो उसे या तो आधुनिकता को अतिक्रमित करने वाली अवस्था और व्यवस्था के रूप में होना चाहिए या फिर अतीत के प्रति मुकितपरक प्रतिक्रियावादी व्यवहार से अलग सम्यक व्यवहार के रूप में । क्योंकि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता मानव जाति के साभ्यतिक विकास से सम्बनिधत अवधारणाएं हैं इसलिए उत्तर-आधुनिकता काी अवधारणा केवल इतिहास सापेक्ष न होकर विकास के इतिहास के सापेक्ष है। इसलिए इसे इतिहास की प्रक्रिया के रूप में नहीं बलिक विकास की प्रक्रिया के रूप में ही सही-सही समझा जा सकता है । इस दृशिट से देखने पर आधुनिक भारत ही नहीं बतिक आधुनिक विष्व भी बहु-कालधर्मी समाज है क्योंकि विकास की अलग-अलग अवस्थाओं पर आधारित मानव समुदाय आज के विष्व में एक साथ उपसिथत हैं । डिस्कवरी चैनल में अस्æेलिया के पास के किसी समुद्री द्वीप में पूरी तरह निर्वस्त्र रहने वाली जनजाति के बारे में एक वृत्त-चित्र दिया था । उन्हें वस्त्र आधारित सभ्यता की कोर्इ आवष्यकता ही नहीं थी । समुद्र के समतापीय वातावरण और उस प्रजाति में यौन बालों के अभाव नें उस प्रजाति के लिए वस्त्र-सभ्यता के विकास को अनावष्यक कर दिया था ।

         मेरी दृशिट में आधुनिकता ने जिस उत्तर-आधुनिक समाज की रचना की है उसमें वैषिवक या भूमण्डलीकरण के औधोगिक यथार्थ नें  नागरिकता को संषिलश्ट बहुनैशिठक और बहुआयामी बना दिया है । सुनीतानारायण और पेप्सी तथा कोला के भारतीय मूल के मैनेजरों में दिखने वाला मूल्य और प्रतिबद्धता का अन्तर्विरोध उत्तर-आधुनिक विष्व कोे राजनीतिक राश्æ से औधोगिक राश्æ की ओर जाने की सूचना देता है । उत्तर-आधुनिक विष्व आधुनिकता के प्रमुख लक्षण स्वचेतनता से सह-चेतनता की ओर बढ़ेगा । बढ़ते प्रतिरोध और घटते अन्तर के साथ वह बीसवीं षताब्दी की आक्रामक चेतनता से मुक्त होगा । व्यवसिथत विष्व-नागरिक समाज की दिषा ही उत्तर-आधुनिक विकास की दिषा हो सकती है । लेकिन इस अवधारणा का वैकासिक प्रतिपक्ष उत्तर-आधुनिक राश्æवाद ,रूढि़वाद और जातिवाद में है । उत्तर-आधुनिक विष्व की मुख्य समस्या ,मुख्य संकट और प्रमुख चुनौती मानव मसितश्क के पुनर्प्रषिक्षण एवं पुनरूत्पादन के सामुदायिक प्रयासों से ही है । अलग-अलग संस्कृतियों से सम्बद्ध जनसंख्या का सामुदायिक अतीतीकरण मानव-सभ्यता के विकास और उसके संसाधनों पर प्रतिस्पद्र्धी आधिपत्य को प्रोत्साहित और उसके उपयोग तथा विकास को पुनर्विभाजित कर रहा है । इस प्रकार -आधुनिकता की मुख्य चुनौती संगठनात्मक अतीतीकरण तथा सामुदायिक प्रतिस्पद्र्धा से ही है ,जिसके कारण अतीत की असिमताएं लादेन ,इसराइल और फिलिस्तीन के रूप में विज्ञानीकृत हो रही हैं । भारत में जातीय राजनीति नें नवजातीयकरण को बढ़ावा दिया है तो पषिचम वैषिवक कबीले के रूप में रूपान्तरित हो रहा है ।

         मैं जब-जब उत्तर-आधुनिक यथार्थ को देषज मुहावरों के माध्यम से समझना चाहता हू दृश्टान्त के कर्इ बिम्ब मेरे मन में कौंधते हैं । जैसे नारी-मुकित को केष-सज्जा से जोड़कर कहें तो मेरी दृशिट में पुरुशों के सदृष बाब कट बाल कटवाना आधुनिक कहा जाएगा ,लेकिन कोर्इ स्त्री तभी उत्तर-आधुनिक कही जाएगी जब उसे लगे कि बहुत हो चुका-अब मैं भी बाल मुड़ाने का मजा लूंगी । वाराणसी में मैंने एक विदेषी महिला को बौद्धों की तरह मुण्डन कराए देखा था और वह मुझे उत्तर-आधुनिक लगी थी । गाजीपुर में मैंने दो नागाओं को षहर की मुख्य सड़़क से नग्नावस्था में गुजरते देखा था तो मैं यह निर्णय ही नहीं कर पाया कि इस दृष्य को मैं उत्तर-आदिम कहूं ;उत्तर-सभ्यता कहूं या उत्तर-आधुनिक ! इस दृष्य को अतीत के जैन धर्म से जोड़कर न देखा जाये तो प्रसंग-निरपेक्ष रूप में वह उत्तर-आधुनिक भी है और अनुत्तर-आधुनिक भी । काषी हिन्दू विष्वविधालय में पढ़ते समय जब एक बार अंग्रेजी सीखने की लालच में एक अंग्रेजी फिल्म देखने पहुंचा तो उसके एक दृष्य में एक स्त्री के कलात्मक अद्र्धनग्नता के दर्षन हुए थे। उन दिनों मैं इतना अधिक षर्माता था कि मुझे तत्कालीन परिवेष और मानसिकता के अनुसार उस फिल्म की नायिका के अद्र्धनग्न होने के साहस पर ही श्रद्धा हो गयी थी। तब तक मैंने भारतीय नागाओं के बारे में सुन रखा था । वह मुझे विदेषी नागा लगी और मुझे वह सिद्ध भी लगी ;क्योंकि उसनें सार्वजनिक रूप से नग्न होने की सिद्धि तो प्राप्त कर ही ली थी । तब तक मेरी सिथति यह थी कि यदि पीछे बहुत अधिक लोग लाइन लगा देते थे तो सार्वजनिक स्थल पर मैं ठीक से लघुषंका भी नहीं कर पाता था ।

          दरअसल किसी भी व्यवस्था के पुननिर्माण का चिन्तन एक समाज-सापेक्ष अवधारणा के रूप में ही विकसित होता है । ऐसा इसलिए कि अलग भौगोलिक,सांस्कृतिक ,ऐतिहासिक और सामाजिक पृश्ठभूमि  में हर मानव-समुदाय या देष में व्यवस्था के षोशणपरक संरचनाओं की प्रकृति और उनके अवषेश भिन्न प्रकार के होते हैं । इसलिए उनके समाधान की विचार-यात्रा भी भिन्न प्रकार से ही तय करनी होगी । यदि अलग संरचनाओं वाले मानव-समुदायों को अन्तत: एक ही मानक व्यवस्था-संरचना की ओर ले जाना हो तब भी  उनके पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न ही होगी । इसप्रकार किसी भी अवधारणा पर पुनर्विचार करते समय माक्र्स द्वारा दिखाए गए पथ का अनुसरण करते हुए उसके विकास के देष,काल और परिसिथतियों पर भी विचार करना चाहिए। माक्र्सवाद की युगीन सीमाओं पर भी विचार करते हुए ये सीमाएं और षतेर्ं समान रूप से लागू होती हैं ।

           मानव-विकास के एक विषेश चरण में विकसित माक्र्सवाद भी अन्तत: एक विषेश देष-काल में विकसित अवधारणात्मक विचारधरा ही है । अपनी युगीन वैचारिक सीमाओं के कारण ही ऐतिहासिक दृशिट से मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिलतर होते जा रहे विकास के क्रम में माक्र्सवाद को भी मैं एक मूलतागामी दर्षन ही मानता हूं । मूलतागामी से मेरा तात्पर्य यह है कि वर्तमान सभ्यता की समस्याओं के समाधानव्यवस्था के परिश्कार तथा अतिक्रमण के लिए वह जो वैचाारिक विकल्प देती है उसकी प्रेरणा तथा नैतिक-मनोवैज्ञानिक पृश्ठभूमि मानव-जाति की आदिम स्वतंत्रताएं हैं । भारत में भी कुछ दषकों पूर्व तक निजी उपयोग में न आ रही उपजाऊ भूमि भी सार्वजनिक उपयोग जैसे क्रीड़ा या चरागाह आदि के लिए उपेक्षित सी पड़ी रहती थी । æैक्टर आदि आधुनिक कृशि-साधनों के विकास के पूर्व प्रत्यक्ष श्रम पर आधारित अठारहवीं-उन्नीसवीं षताब्दी का निकटवर्ती भारतीय आधुनिक समाज भी सम्पत्ति को उपभोग की आवष्यकताओं से जोड़कर ही देखता था । दूसरे षब्दों में उपयोग न की जा रही पर्याप्त जमीन के उपलब्ध रहने से भारतीय समाज की आर्थिक संरचना षोशण-व्यवस्था से बहुत कुछ दूर थी भारत के वन प्रदेष में रहने वाली अनेक षिकारी जातिया निजी भूमि आधारित विधि ओर व्यवस्था का सामना नहीं कर पायीं ।ं

           भारतीय मानव-समुदाय के लिए व्यवस्था के पुनर्निर्माण का मौलिक चिन्तन इस दृशिट से तो आवष्यक है ही-इस प्रष्न का उत्तर तलाषने के लिए भी आवष्यक है कि षोशण की समापित के लिए माक्र्सवादी परिकल्पनाओं पर आधारित आन्दोलन और उनके संगठन एक समानान्तर व्यवस्था की प्रापित की दिषा में कितने स्पश्ट और विचारपूर्ण हैं । इसमें सन्देह नहीं कि यानित्रकी के क्षेत्र में तकनीकी त्रुटियों की तरह,व्यवस्था के क्षेत्र में उसके तंत्रीय विचलन भी अवांछित नकारात्मक परिणाम घटित कर सकते हैं । इस परिप्रेक्ष्य से विचार करने पर माक्र्सवादी व्यवस्था-परिकल्पना के सुधारवादी संभावनाओं एवं आषंकाओं की उचित और स्पश्ट व्याख्या की जा सकती है । माक्र्सवादी सैद्धानितकी का मूल्यांकन करने पर वह अपने लक्ष्य की परिकल्पना की दृशिट से आकर्शक एवं पूर्ण किन्तु प्रक्रियात्मक वास्तविकता के धरातल पर अद्र्धसपश्ट दर्षन के रूप में सामने आता है । दूसरे षब्दों में हर भविश्यवक्ता की तरह वह मानव-विकास के अतीत का वैज्ञानिक व्याख्याता तो हैलेकिन वह मनुश्य की भावी सृजनषीलता का सही अनुमान नहीं लगा पाता ।

          यही कारण है कि माक्र्सवादी परिकल्पना किसान और मजदूर क्षेत्र में तो षोशण-निरसित के साम्यवादी विकल्प के प्रति पूरी तरह आष्वस्त और स्पश्ट है ,किन्तु जब बौद्धिक सृजनषीलता और षहरी व्यवस्था की आर्थिक संरचनाओं को भी व्यवस्था पुनर्निर्माण की साम्यवादी परिधि में लिया जाता है तो वह इसलिए अमूर्त और अस्पश्अ होने लगता है कि वह किसान और मजदूर की तरह उत्पादक श्रम पर आधारित नहीं ,बलिक वितरक श्रम और मूल्य पर आधारित होती है । निस्सन्देह षहरी समाज और उसका अर्थ-तंत्र ,व्यवस्था की दृशिट से मनुश्यकृत एक जटिलतम व्यवस्था-प्रारूप का विकास है । उसके अधिकांष सदस्य न तो किसानों की तरह अन्न-उत्पादक निकाय का हिस्सा होते हैं ,न ही मजदूरों की तरह वस्तु-उत्पादक निकाय का ही । इसीलिए षहरों का वितरण-आधारित अर्थ-तंत्र एक अलग वर्ग के रूप में षोशणमुक्त समाज के निर्माण की दृशिट से एक भिन्न समतावादीव्यवस्था-संरचना की मांग करता है ।

            यह एक तथ्य है कि अलग-अलग भौगोलिक परिवेष में अलग-अलग प्रकार की कृशि उपज ,विषेश खनिज के लिए विषेश खनिज पर निर्भरता तथा नमक के लिए समुद्री क्षेत्र पर निर्भरता नें विनिमय और आपूर्ति केन्द्र के रूप में बाजार का विकास किया था । मुद्रा नें बाजार को जन्म नहीं दिया बलिक विनिमय की भाशा के रूप में बाजार नें ही मुद्रा को मूल्य दिया है । आज भी मांग और पूर्ति के आधार पर बाजार में मुद्रा एक असिथर संसूचक व्यवस्था ही बनी हुर्इ है । दूसरे षब्दों में अपने-आप में मुद्रा का कोर्इ मूल्य नहीं है । उसका मूल्यांकन वस्तु-विनिमय की मानवीय आवष्यकताओं के सापेक्ष ही है । बीसवीं षताब्दी के अधिकांष साम्यवादी देषों ने अपने नियनित्रत अर्थ-तंत्र के माध्यम से बाजार की संसूचक व्यवस्था को ही ध्वस्त और निरस्त करने का कार्य किया था । उन्होंने मुद्रा की अर्थ-सम्प्रेशण की षकित को कृत्रिम रूप से समाप्त करने का प्रयास किया । उसकी सम्पूर्ण सृजनषीलता पूंजी की समता के नाम पर पूंजी के स्वामित्व की समापित और भिन्न-भिन्न प्रकार की पूंजी की अन्त:संवादी मूल्य-व्यवस्था को समाप्त करने का रहा । देखा जाय तो एक तरह से वे बाजार की मूल्यांकन व्यवस्था के बाहर वस्तुओं और पूंजी को आवष्यकता के अनुरूप उत्पादित करने एवं वितरित करने का प्रयास ही कर रहे थे । अपने साम्यवादी समाज में बाजार के समानान्तर कोर्इ मूल्य-संवादी व्यवस्था या अर्थ-संसूचक तन्त्र विकसित न करने के कारण बीसवीं षताब्दी के साम्यवादी देषों ने अपनी मुषिकलें बढ़ा ली थीं । वे कृत्रिम एवं प्रायोजित आर्थिक भाशाहीनता के षिकार हो गए थे ।ं

            माक्र्सवादी दार्षनिक यूटोपिया के वास्तवीकरण में दूसरी गम्भीर बाधा पूंजीवादी अर्थतंत्र और बाजार की स्वाभाविक परिणति षहरों को साम्यवादी उत्पादक पूंजी की अवधारणा के अनुरूप पुनर्विसर्जित या विघटित न करने से भी हुर्इ । यह एक तथ्य है कि षहरों का विकास पूरक एवं वैकलिपक पूंजी के आपूर्तिया प्रवाह केन्द्र के रूप में हुआ था । बाजारों का विकास की पूंजी-वैविध्य को एक समान मूल्यांकन व्यवस्था में लाने के लिए हुआ था । माक्र्सवाद जैसी केवल उत्पादक पूंजीवाद की व्याख्याता एवं विनिमय श्रम और पूंजी को अतिरिक्त मूल्य के रूप में व्याख्यायित करने वाली विचारधारा नें षहरों और बाजार के पर्यावरण को भलीभांति समझे बिना मुद्रा एवं बाजार तंत्र को प्रषासनिक तंत्र में बदलने का कार्य ही किया । इससे राज्य का काम बढ़ा । नागरिक अभाव की सिथिति में प्रषासनिक दमन एवं अविष्वास की संस्कृति के षिकार हुए । अपने निशेधों के द्वारा बाजार और मुद्रा-तंत्र को निरस्त कर देने के कारण खेतों और कारखानों से दूर बसी षहरी जनसख्या जो बाजार-व्यवस्था के ध्वस्त होते ही कृत्रिम रूप से  बेरोजगार और अवैध हो गयी-उसके आर्थिक पुनर्नियोजन का अतिरिक्त दायित्व साम्यवादी राज्यों के ऊपर आ गया । कहने का मतलब यह है कि पुराने षहर हजारों वशोर्ं से पूंजीवादी अर्थ-प्रवाह के स्वाभाविक परिणाम हैं । क्योंकि माक्र्स नें व्यावहारिक साम्यवाद पर बहुत अधिक विचार नहीं किया था ,इसलिए माक्र्स के परवर्ती माक्र्सवादियों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे साम्यवादी यूटोपिया को विसंगतिपूर्ण बनाने वाली इस समस्या पर सोचें । वे यदि बाजार-व्यवस्था के बाहर निकलकर एक साम्यवादी व्यवस्था का सपना देखते हैं तो उनको पूंजी के मूल्यांकन तंत्र और सम्प्रेशण की एक समाानान्तर मौलिक भाशा निर्मित करनी होगी -उतनी ही अर्थ संसूचक ,जितनी कि बाजार है जो बढ़़ती हुर्इ कीमत के साथ ही किसी वस्तु को संभलकर उपभोग करने का या अनावष्यक उपभोग न करने का र्इमानदार सन्देष दे देती है ।

           मानव-जाति द्वारा अब तक विकसित की गयी व्यवस्था के पुनर्निर्माण के चिन्तन सम्बन्धी इन्हीं दुर्बलताओं के कारण तथा वैचारिक अस्पश्टता से बचने के लिए ही देष और विदेष के अनेक वामपंथी संगठन किसानों और मजदूरों के इर्द-गिर्द मंडराने के लिए ही बाघ्य रहे हैं । अविकसित क्षेत्रों में उन्होने सर्वषून्य को सर्वहारा मानकर पूंजी सृजन और पूंजी-विनिमय की प्रक्रिया को ही बाधित कर दिया है । पंूजी-सृजन जो कि एक बौद्धिक प्रक्रिया है- और जैसा कि माक्र्स नें भी सामन्त युग और औधोगिक पूंजीवाद के चरण के बाद ही एक विकसित सभ्यता के रूप में साम्यवादी क्रानित और व्यवस्था की परिकल्पना की थी ।  अन्तत: माक्र्सवाद भी उन्नीसवीं षताब्दी के औधोगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रियात्मक आलोचना ही है । क्या निरन्तर विकसित होती मानव-जाति की पूंजी और उसके अर्थ-तंत्र की सम्पूर्ण सृजनषीलता और विकसनषीलता एक सिथर बिन्दु पर पहुंच गयी है । इती कि उसके विष्लेशण और उसे समझने का प्रयास लगभग पूरा समझा जाय ! क्या निरंकुष पूंजी-सृजन की मानवीय नकारात्मकताओं को पहचान कर उनका कोर्इ राजनीतिक और गैरराजनीतिक मानवीय समाधान विकसित नहीं किया जा सकता क्या आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी की दैत्याकार अभियानित्रकी के स्थान पर कोर्इ सािनीय और लघु(माइक्रो) अभियानित्रकी नहीं विकसित की जा सकती -जो तानाषाही की प्रकृति की न होकर अधिक लोकतानित्रक और मानवीय तथा सहज हो ! ये कुछ ऐसे प्रष्न हैं जिनपर पुनर्विचार किए बिना अतीत के बुद्धिजीवियों द्वारा प्रवर्तित क्रानितकारिता का कभी पुनमर्ूल्यांकन और उनपर पुनर्विचार नहीं किया जा सकता।

            भारत में लोकतानित्रक व्यवस्था से सहमत और असहमत सभी वामपन्थी संगठन--तात्कालिक जन-समस्याओं को मुददा बनाकर संघर्श करने की उनकी नीति और उनका इतिहास दोनों ही साम्यवादी परिकल्पना में निहित वैचारिक अमूर्तनों और चिन्तन सम्बन्धी अस्पश्टताओं को छिपा नहीं पाते । रूस ,चीन ,हंगरी,पोलैण्ड,पूर्वी जर्मनी और क्यूबा तक अतीत और वर्तमान में फैले साम्यवादी व्यवस्था के विभिन्न ऐतिहासिक पाठ साम्यवादी विचारधारा में निहित इसी वैचारिक इन्तराल और अवकाष को अपने ढंग से भरने का प्रयास करते हैं । कर्इ देषों नें स्थानीय और सामाजिक स्तर पर रूस की तरह परम्परागत बाजार-तंत्र से अधिक छेड़-छाड़ नहीं की और रूस की तरह परम्परागत मुद्रा-व्यवहार के सम्पूर्ण पर्यावरण का विनाष करने से बच गए और रूस जैसे हश्र से भी । रूस माडल की साम्यवादी व्यवस्था के अधिकांष देषों नें बाजार को विस्थापित कर प्रषासनिक वितरण प्रणाली स्थापित करने की अतिरेकपूर्ण कोषिष की और ऐतिहासिक रूप से विफल हुए । इसका एकमात्र कारण यही समझ में आता है कि जो काम बाजार व्यवस्था किसी वस्तु की प्रचुर उपलब्धता की दषा में मूल्य घटाकर और अभाव की दषा में उसे सिर्फ मंहगाकर करती है उस कार्य को साम्यवादी देषों नें प्रषासनिक सूचनावर्जना और आतंक से करने की कोषिष की और अप्रिय हुए । माक्र्स की विचारधारा का अन्तर्राश्æीय भव्यीकरण नहीं रहा होता और कम्युनिस्ट तानाषाही नहीं रही होती तो इतने वर्शो  तक इन अस्पश्टताओं के साथ इतनी बड़ी जनसंख्या का जीना संभव नहीं हो पाता । यह लिखते हुए मेरा उददेष्य पूंजीवादी व्यवस्था की माक्र्स द्वारा की गर्इ सम्पूर्ण आलोचनाओं और विष्लेशणों को खारिज करना नहीं बलिक पुनर्चिन्तन के उन समस्यात्मक बिन्दुओं को चिनिहत करना है जिनका समाधान पाकर ही भविश्य के पूंजीवाद के सापेक्ष भविश्य की साम्यवादी व्यवस्था को विकसित किया जा सकता है ।

            यधपि ऐसा नहीं है कि साम्यवादी देषों ने विनिमय मूल्य पर पलने वाले मध्यस्थ पूंजी-तंत्र और वितरक वर्ग के समानान्तर वितरण-व्यवस्था को निर्मित करने का प्रयास नहीं किया । उन्होंने प्रयास किया किन्तु वे असफल इस लिए हुए कि उन्होंने मुद्रा का सम्पूर्ण बहिश्कार नहीं किया । सच तो यह है कि आप या तो बाजार को समझकर  और उसके साथ रहकर जिन्दा रह सकते हैं या फिर उसके सम्पूर्ण बहिश्कार की आत्मनिर्भरता प्राप्त कर । इन दोनों को एक साथ रखने का दुश्परिणाम भी रूस जैसी साम्यवादी व्यवस्था को भोगना पड़ा । माक्र्स के योरोप में नर्इ तक्नालाजी के विकास के साथ युवा औधाोगिक पूंजीवाद इतना चकाचौंध भरा था कि नए-नए आविश्कारों के साथ उनका कोर्इ ऐसा प्रतिद्वन्द्वी नहीं था कि उन्हें बाजार में कोर्इ चुनौती दे । विष्व में कुछ ही कम्पनियां वायुयान बना पाती थीं और कुछ ही कार । कुछ ही मषीनें बनाती थीं और अधिकांष उत्पादित माल । उपभोक्ता और पूंजीपति के बीच

यदि बाजार और छोटा व्यवसायी था भी तो वह दिखार्इ नहीं देता था । संभवत: इसीलिए एक सिद्धान्तकार के रूप में कार्ल माक्र्स नें विनिमय मूल्य पर पलने वाले वितरण वर्ग की उस विषाल जनसंख्या को अपने विष्लेशण का आधार नहीं बनाया था ,जो आगे चलकर क्रानित-विरोधी भूमिका में पूंजीवाद की अनितम कड़ी मध्य वर्ग के रूप में सामने आया । माक्र्स का सर्वहारा स्वयं पूंजीपति बनने के सपने को छोड़कर मध्यवर्गीय सुखों को ही हसरत से देखने लगा ,जो जीवन-यापन की न्यूनतम आवष्यकताओं की दृशिट से समृद्धसुखी और सुरक्षित दिखता है ।

           माक्र्स के औधोगिक पूंजीवाद के विकास की दृशिट से प्रारमिभक दौर में जबकि पूंजी-उत्पादक मजदूर वर्ग से विनिमय पूंजी पर पलने वाले मजदूरों की संख्या कम नहीं थी-जमींदार-सामन्त और औधाोगिक पूंजीपति वर्ग से अलग व्यापारिक पूंजीपति वर्ग अलग आर्थिक समीकरणों ,संरचनाओं और सिद्धान्तों से परिचालित होता है अत: इस वर्ग के श्रमिकों की षोशण-समस्याओं पर आधारित समाधानकर्ता साम्यवाद ,वितरण वर्गीय साम्यवाद के रूप में एक भिन्न सैद्धानितक अवधारणा की मांग करता है । पूंजी के उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सामन्जस्यपरक होने के कारण तथा आवष्यकता आधारित अर्थतंत्र के कारण इस वर्ग की व्यवस्था-संरचना में भागीदारी अधिक असिथर और गतिषील पूंजी पर आधारित होती है । इस वर्ग का अर्थ-विभाजन छोटी होते हुए भी इतनी जटिल और सूक्ष्म आर्थिक संक्रियाओं से निर्धारित होता है कि एक ओर वह जहां पूंजी-प्रवाह यानि वितरण और विनिमय केन्द्रों के रूप में एक वर्ग या संघ की तरह बाजार का निर्माता होता है वहीं उसकी उपसिथति के कारण ,उसके क्रानित-विरोधी समस्यात्मक परिप्रेक्ष्य में उपलब्ध साम्यवादी अवधारणाएं अपर्याप्त,अविकसित और अस्पश्ट प्रतीत होने लगती है ।

            इसका कारण यह है कि प्राय: किसान-मजदूर को केन्द्र में रखने के कारण माक्र्सवादी विचारधारा अपनी एकांगिता के साथ 'उत्पादक साम्यवाद में परिणत हो गयी है।  इसका परिणाम यह हुआ कि बीसवीं  षताब्दी में अधिकांष साम्यवादी देषों ने पूंजी-वितरण की परम्परागत समाजार्थिक व्यवस्था बाजार-तंत्र को विभिन्न प्रतिबन्धों और अंकुषों से विस्थापित कर प्रषासनिक हस्तक्ष्ेाप के माध्यम से वितरक पूंजीपति के स्थान पर 'वितरक पूंजीवाद की सैद्धानितक अवधारणा के रूप में साम्यवादी प्रषासन-तंत्र या नौकरषाही को स्थापित किया । एक संवेदनषील साम्यवादी विनिमय एवं वितरण-तंत्र के अभाव में साम्यवादी देषों ने परम्परागत मध्यवर्ग को साम्यवादी नौकरषाही में बदल दिया । अधिकांष साम्यवादी देषों ने बाजार की निरसित आौर अनुपसिथति को एक व्यावहारिक और तात्कालिक षासन की समस्या के रूप में देखा तथा इस वर्ग के प्रतिक्रियात्मक नकार और असहयोग के कारण ही पषिचमी योरोप के अधिकांष साम्यवादी देषों में ऐतिहासिक रूप से ध्वस्त हुआ । कारण स्पश्ट है कि पूंजी और वर्ग-विभाजन का उत्पादक और वितरक स्वरूप स्पश्ट न होने के कारण साम्यवादी षासन नें उत्पादन और वितरण दोनों ही कार्य  स्वयं ही दायित्वबोध के साथ संभाला ।

          हजारों वर्शों के पूंजीवादी पर्यावरण की उपज षहरी असन्तोश नें ही साम्यवादी देषों से साम्यवादी षासन को उखाड़ फेंका । क्या ऐतिहासिक तथ्य मात्र इतना ही कहते हैं ! जो नहीं कह पाते वह यह कि साम्यवादी देषों को साम्यवादी पर्यावरण के निर्माण के लिए पूंजीवादी पर्यावरण की उपज षहरों को उखाड़ फेंकना चाहिए था । विस्थापित जनसंख्या को खेतों के किनारे और कारखानों के पास पुन: बसाना चाहिए था । इसके विपरीत साम्यवादी देषों नें पूरी की पूरी षहरी जनसंख्या को प्रषासन-तंत्र में बदलने तथा प्रषासन तंत्र से ही नियनित्रत करने का प्रयास किया । आवष्यकता और उत्पादन के बीच कोर्इ मूल्यपरक सम्प्रेशण व्यवस्था न होने के कारण आर्थिक संवादहीनता के कारण साम्यवादी सरकारें वितरण की प्रषासनिक विफलता के करण क्रमष: निरंकुष होती गर्इं और एक दिन सम्पूर्ण राज्य को ही एक बड़े यातना-गृह में बदल दिया । पूंजीवादी व्यवस्था की वर्तमान और भावी आलोचना को विकसित करते समय उसकी इन कमियों के प्रति सजग रहना होगा ताकि भविश्य का साम्यवादभविश्य के पूंजीवाद की और अधिक पूरक और निर्दोश प्रतिक्रिया बन सके ।

             इसलिए एक समग्र समानान्तर व्यवस्था के निर्माण और अन्वेशण के लिए आवष्यक है कि पूंजीवाद की परम्परागत वितरण प्रणाली बाजार के समानान्तर यदि साम्यवादी यूटोपिया के दावेदार हैं तो किसी अधिक संवेदनषील समतामूलक वितरण प्रणाली की खोज करनी चाहिए । यदि सम्पूर्णता में नहीं कर सके तो पूंजीवादी व्यवस्था की क्रूरता को नियनित्रत और कम करने के लिए उसके अन्तर्गत या समानान्तर एक न्यूनतम सर्वहारा सुरक्षा-तंत्र विकसित करना चाहिए क्योंकि निरंकुष वैयकितक या संगठित पूंजीवाद की अमानवीय महत्वाकांक्षाओं की सतत समीक्षा होती रहनी ही चाहिए । एक कम उत्तेजक,कम आवेषधर्मी किन्तु अधिक जिम्मेदार अधिक प्रबुद्ध,अधिक निर्दोश समतामूलक समाज और व्यवस्था को विकसित किए जाने की जरूरत है । जरूरत इस बात की है कि षोशण-मुक्त व्यवस्था के अधिक परिश्कृत और स्पश्ट संरचनात्मक वैकलिपक सिद्धान्तों -निश्कशोर्ं को विकसित-विचारित और उपलब्ध किया जाय । अन्यथा स्पश्ट अवधारणाओं के अभाव में चरमपंथी भारतीय साम्यवादी आदर्षवादियों का भी उसी प्रकार व्यवहारवादी स्वप्नभंग होगा ,जैसाकि पषिचमी योरोप और सोवियत रूस के कम्युनिस्टों  का हुआ । किसानों में समान भूमि-वितरण तथा मजदूरों की उधाोगों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी के समान ही वितरक-पूंजी वाले मध्य-वर्ग के कामगारोंं के लिए भी किसी स्पश्ट ,मूर्त और चरम लक्ष्य,आदर्ष या अवधारणा की खाोज करनी होगी तथा भविश्य की षोशणमुक्त व्यवस्था के लिए ऐसी आर्थिक संरचनाओं की तलाष करनी होगी कि जनसंख्या के उत्पादक और वितरक समूह दो विरोधी आर्थिक संरचनाओं  के रूप में साम्यवादी व्यवस्था को वर्ग-विभाजित न कर दें । क्योंकि विशम आर्थिक समीकरणों से संचालित होने पर वे अपनी वैचारिक अपूर्णताओं के कारण बड़े-बड़े दावों और लुभावने सपनों को उत्तेजित करने के बावजूद साम्यवाद की तानाषाही के लिए अधिग्रहीत जनसंख्या को  आन्तरिक रूप से विभाजित,विशमतापूर्ण और असंतुश्ट ही करेंगे ।

       एक नर्इ सभ्यता के निर्माण के लिए पूर्वाग्रहमुक्त विचारशीलता इस लिए भी आवश्यक है कि आज की अनुभवी एवं सृजनशील मानव-जाति को अतीत की दीर्घकालिक रूढि़वादिता एवं उसके दुष्परिणामों का लम्बा अनुभव है । आज हम जानते है। कि अधिकांश वैचारिक निर्मितियां भी अपनें देश-काल का अतिक्रमण नहीं कर पातीं । विचारधाराएं जो एक दौर में बिल्कुल सही मानी जाती थीं ,लाखों विरोधयों की हत्या के बाद भी एक दिन स्वयं को गलत माने जानें से भावी मानव-जाति को रोक नहीं पातीं । यह भी कि अधिकांश विचारधाराएं एक काल्पनिक दुनिया या यूटोपिया का निर्माण कर सत्याभास रच देनें में इसलिए सफल होती हैं कि मनुष्य अपनी उच्च्स्तरीय सृजनशीलता के कारण एक नए अतीत की तरह अतीत के विश्वासों के अनुरूप भी एक पुरानी दुनिया को वर्तमान के रूप में रच सकता है । विचारधाराएं किस प्रकार मानव-जाति को छल सकती हैं,इसका रोचक दृष्टान्त गांधीवाद और माक्र्सवाद की चरितार्थता में भी देखा जा सकता है । मानव-मनोविज्ञान की दृषिट से इन दोानों ही विचारधाराओं की आलोचना की जा सकती है । एक बार पूर्ण सत्य मान लिए जानें के बाद ये मानव-जाति की सृजनशीलता को दूर तक प्रभावित करनें लगती हैं और उनकी समय और इतिहास के वर्तमान की जरूरतों से अलग भी एक कृत्रिम पर्यावरण की पुनर्रचना करनें लगती हैं । इस दृषिट से जब मैं वर्तमान को देखता हूं तो पाता हूं कि अलग सांस्कृतिक मानसिकता और विचारधारा के कारण एक ही समाज के भिन्न-भिन्न व्यकितयों में रुचि और ऐचिछक विच्छोभ का भी अलग-अलग स्तर दीखता है । कम इच्छाएं या उदासीनता सृजन और विकास की इच्छा और आवश्यकताओं के बोध को सीमित करती हैं ।

 उदाहरण के लिए गांधीवाद पूंजीवाद की अनैतिक महत्वाकांक्षाओं की आलोचना करता हुआ उसे सभ्य ,नैतिक और मानवीय बनानें का निस्संदेह प्रयास करता है । मानव-जाति के अंिहंसक àदय-परिवर्तन पर वह कुछ अधिक ही विश्वासी है । गांधीवाद का तरीका मानव-इच्छाओं की निगरानी करनें का है । व्यकित् की इच्छाओं को अनुशासित और परिसीमित करनें के कारण ,एक यूटोपियन विचारधारा के रूप में गांधीवाद जिस मनुष्य को निर्मित करेगा ,वह नैतिक दृषिट से सज्जन और भद्र पुरुष तो होगा ,लेकिन उस विचारधारा को पूरी तरह चरितार्थ करनें वाले समाज के सदस्यों की सादगी और संतोष जैसे मूल्यों के कारण सृजनशीलता की कल्पना-शकित कुंठित हो सकती है । बहुत प्रभावी होनें पर वह बहुत सी तकनीकों और आविष्कारों को हतोत्साहित कर सकता है ।

      इसीप्रकार यूटोपियन दुष्प्रभाव की दृषिट से माक्र्सवादी विचारधारा भी एक नकारात्मक नियामक के रूप में सामनें आती है क्योंकि वह इतना अधिक अविश्वासी है कि वह मनुष्य को असभ्य,अनैतिक और अमानवीय बनने का अवसर ही नहीं देना चाहता । इस तरह माक्र्सवादी विचारधारा के आधार पर निर्मित व्यवस्था की अयोग्यता भिन्न प्रकार की हो जाती है । वह पूंजी की उन्मुक्त सृजनशीलता के अधिकार को सीमित करना चाहता है । इस तरह वह अभिप्रेरणा के स्तर पर सृजनशीलता के आनप्द को कृणिठत करता है । व्यकित के स्तर पर वह नकारात्मक है लेकिन सृजनशीलता को सामूहिकता की भावना से जोड़नें की अपेक्षा के कारण एक सीमा तक सार्थक भी । पूंजी उत्पादन में भी सामूहिकता में चलनें-चलानें की उसकी इच्छा की तुलना परेड में चलनें से की जा सकती है । वह कदमताल को अधिक महत्व देता है । कुछ अलग चलनें के प्रयास को घातक मानता है । एक अविश्वासी नियामक विचारधारा होने के कारण माक्र्सवाद संवादी भी नहीं है । उसकी सैद्धानितकी बाजार और मुद्रा दोनों को ही ध्वस्त,व्यर्थ और निरस्त करती है । यधपि बाजार के पास मांग और पूर्ति का सटीक सूचना-तंत्र तो होता है ,किन्तु मानवीय संवेदना और नैतिक चेतना नहीं होती । ऐसे में माक्र्सवाद में से दमन ,अविश्वास और तानाशाही को निकालकर उसमें पूंजी-निर्माण की सामूहिकता वाली सकारात्मक को बल देनें वाली अभिप्रेरणा शामिल करनें की जरूरत है । यदि किसी नवमाक्र्सवाद की परिकल्पना की जाय तो  उसमें माक्र्सवाद की नैतिक चेतना और संवेदना के साथ बाजार से संवादी होना भी सीखना होगा ,क्योंकि बाजार मानव-जाति की सृजनशीलता का सवोर्ंत्तम संग्रहालय भी है ।

          जैसाकि टी.एस.इलियट का भी मानना था । हम सभ्यता के धरातल पर अतीत से कटकर कभी भी पूरी तरह आधुनिक नहीं हो सकते । हम समझनें की योग्यता के लिए प्राय: परम्परा पर ही निर्भर करते हैं । दरअसल आधुनिक होना बिल्कुल नया होना नहीं है और न ही आधुनिक सभ्यता से आशय वर्तमान सभ्यता ही है । वास्तव में हम यथार्थ के साथ-साथ जीनें की आदतों का भी कालान्तरण कर रहे हैं ।प्राचीन को आधुनिक बना रहे हैं । हमारे जीवन-समय में अतीत और वर्तमान एक साथ उपसिथत हैं । आधुनिक वर्तमान नहीं है और वर्तमान आधुनिक नहीं है। आधुनिक और वर्तमान में फर्क है । विडम्बना यह है कि जो वर्तमान है वह आधुनिक नहीं है और जो आधुनिक है वह वर्तमान नहीं है । आज का वर्तमान इतिहासग्रस्त है । अतीत का पुनरूत्पादन किया जा रहा है ।

         एक नयी व्यवस्था को पानें की दिशा में भविष्य-चिंतन परिकल्पना,योजना और यूटोपिया के रूप में हो सकता है । खतरा यह है कि अधिकांश यूटोपिया अपनें निर्माण के समय की वास्तविकताओं की प्रतिकि्रया में ही जन्म लेते हैं । लेकिन उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें सार्वभौम मान लेते हैं ।