गुरुवार, 19 जुलाई 2012

नए रचाव का समर्थ कवि

चिन्तन-दिशा
सम्पादक-âदयेश मयंक
अंक-6-7,जनवरी-जून 2012 में प्रकाशित
(सम्पादेीय कार्यालय-
ए-701,आशीर्वाद-1,पूनम सागर काम्लेक्स,
मीरा रोड (पूर्व),मुम्बर्इ-401107
मोबाइल-09869118707)



                     

         रामाज्ञा शशिधर के काव्य संग्रह ''बुरे समय में नींद की कविताओं को पढ़ना एक विरल एवं विशिष्ट काव्य अनुभव से गुजरना है । गहन संवेदनात्मक जीवनानुभवों और स्मृतियों के सघन बिम्बधर्मी मौलिक रचाव की उनकी कविताएं समकालीन कविता और कवियों के प्रति सजग रचनात्मक असन्तोष की उपज हैं। इस असन्तोष और नकार में ही रामाज्ञा की कविताओं की अलग भाव-भूमि और अलग शिल्प के प्रस्थान-बिन्दु का रहस्य भी छिपा है । तर्ज की मर्ज की शिकार, कविताएं पढ़कर कविताएं लिखने वालों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए मेरी भी निजी धारणा समकालीन कविताओं के अधिकांश के प्रति बहुत अच्छी नहीं रही है । मुद्रण की सर्वसुलभ प्रौधोगिकी नें अच्छे-बुरे सभी को छपने की सुविधा प्रदान की है । अब छपना एक सामान्य घटना है और सत्ता के संसााधनों पर अपनी पकड़ और नजदीकियों  के कारण अथवा किसी बड़ी पूंजी के सहारे बाजार पर नियन्त्रण से अर्जित यश के अर्थशास्त्र और समीकरणों को बढ़ती जागरूकता के कारण आम पाठक भी बहुत कुछ समझने लगा है । आम जनता से कटा यह साहित्य लेखन सरकारी खरीद के माध्यम से पुस्तकालयों में अपनी जगह पा तो लेता है,लेकिन हिन्दी के आम पाठकों में साहित्य के प्रति अरुचि और अनास्था उत्पन्न कर पठनीयता को हतोत्साहित भी करता है ।
         रामाज्ञा शशिधर की कर्इ कविताएं समकालीन बुद्धिजीवियों तथा हिन्दी कविता की अविश्वसनीयता और पतनशीलता की पड़ताल करती हैं ।  इस दृषिट से ''वे बुद्धिजीवी हैं,'दिल्ली,'कला समय,'एक दिन चुक जाओगे'मुंडेर पर कौआ,'मुठभेड़,'कसौटी आदि कविताएं महत्वपूर्ण हैं । यह समय जो सत्ता,बाजार और संचार के सहारे महानता को प्रायोजित करती है ,सम्बन्धों के सहारे सफलता का इतिहास रचती है ,सिर्फ उपसिथति और प्रसिद्धि केे तथ्य और तर्क के आधार पर मूल्यांकन और महत्व का निर्धारण एक झूठे और संदिग्ध रचना-समय को विज्ञापित करती है । रामाज्ञा की इन कविताओं में प्रतिभा और योग्यता के बावजूद उपेक्षित युवा पीढ़ी की पीड़ा और आक्रोश की प्रभावी अभिव्यकित हुर्इ है ।'वे बुद्धिजीवी हैंइसलिए हर चीज का विकल्प है उनके पास......वे अपने समय सेइतनी ज्यादा नफरत करते हैंकि बीबी और बच्चे भीअपनी रचना का कच्चा माल दिखते हैं (वे बुद्धिजीवी हैं ),'हम दिल्ली के सबल सिपाहीगीत गजल पर शासन अपना....रामराज्य तक आवाजाही! (दिल्ली)'यह सिद्धों का नहींसिद्धहस्तों की कला का समय है (कला समय)'उग रही हैं पत्थरों परदूबों की नर्इ प्रजातियांप्रतीक्षा कर रहे हैं सबतुम्हारी रचना के रí हो जाने की (एक दिन चुक जाओगे),लूटते हैंरोशनी की हाट जोरच रहेवे ही समय की सुर्खियां (मुंडेर पर कौआ),तुमनें एडि़यों से रगड़ दी पगडण्डी  चुपचाप गायब हो गयीं दिशाएंउड़ेल दी स्याही पृष्ठों परमर गए सारे के सारे अक्षर (मुठभेड़ ) तथा 'महान कवि होता जा रहा हूं इन दिनोंमूल्य में भर रहा हूं आस्वाद की नकलनकल के आस्वाद को ही मूल्य बता रहा हूं (कसौटी)।

        समकालीन हिन्दी कविताओं के परिदृश्य में रखकर देखें तो उनकी कविताएं सबसे पहले एक अलग और बिल्कुल निजी काव्यभाषा के रचाव,लोक-सम्पृक्त कविता-मानस ,जन-सरोकारों एवं संधषोर्ं के लिए चिनितत ,प्रतिबद्ध और सक्रिय कवि व्यकितत्व के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं। समकालीन समाज में कवि-कर्म की गिरती हुर्इ साख के दौर के प्रति एक सफल प्रतिरोध रचती उनकी कविताएं जुझारू आस्था एवं सृजनात्मक आत्मविश्वास के साथ कवि-कर्म को सार्थक प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। कवि का यह रचनात्मक आत्मविश्वास 'पपड़ी के नीचे शीर्षक कविता में इसप्रकार व्यक्त हुआ है-' मैं समय की क्यारी में दबा हुआ अंखुआसुख का स्वप्न का भविष्य कामैं सभ्यता की पपड़ी में ढकी हुर्इ भाषा प्यार की उमंग की उम्मीद की........मैं ही रचूंगा हवा में खुशबूमैं ही भरूंगा भविष्य में जीवनमैं ही गाऊंगा हरेपन का गीतशब्द हूं मैंबीज के कोश से फूटता हुआ स्वप्न। यह आत्मविश्वास इस संग्रह की 'भाषा'तुम्हारे खिलाफ,'बदलो जी,'हमारी कतारों में शामिल'इनिद्रय बोध आदि कर्इ कविताओं देख जा सकता है । ये कविताएं रामाज्ञा के कविकर्म के संकल्प ,स्वभाव और सन्देश की शिनाख्त की दृषिट से महत्वपूर्ण हैं । चाहे वह भाषा कविता की'भाषा में प्रतिरोध ऐसे फैलाओजैसे वे फैलाते हैंव्यापारके रूप में हो या तम्हारे खिलाफ कविता की 'तुम्हारे खिलाफ सपने देखनें और गीत गानें की चुनौती ,'बदलो जी कविता में घिसे-पिटे राग बदलने का संकल्प तो 'हमारी कतारों में शामिल कविता में कविता को प्रतिरोध और संघर्ष के सशक्त सामूहिक हथियार के रूप में रचनें और देखने का स्वप्न ।
          रामाज्ञा जीवन के सूक्ष्म निरीक्षण के कवि हैं । लेकिन उनका यह सूक्ष्म निरीक्षण भी उनकी गहरी संवेदनशील प्रकृति से परिचालित है । इस दृषिट से उनकी एक ही कविता कुम्हार का उद्धरण ही काफी है । जिसमें उन्होंने कुम्हार जीवन के सारे अनुभवों और पेशे की घ्वनियों को बिम्बों में बदल दिया है । समय और बाजार के खिलाफ अपनें पेशे में बनें हुए कुम्हार की चिन्ता ,आर्थिक परिसिथतियां और नियति को कवि पृथ्वी और चाक दोनों के उसके न चाहते हुए भी घूमनें के सहज रूपकात्मक बिम्ब से व्यक्त कर देता है-
               उसके न चाहते हुए भी
               उसकी उंगलियों में घूम रही है
               पृथ्वी...
कविता का एक दूसरा बिम्ब दिए बनाते समय टूटते रहनें की ध्वनि को गहरे आदिम सम्बन्धो के टूटते रहनें की ध्वनि को गहरे आदिम सम्बन्धों के टूटनें से जोड़ देता है-
             ' खुच से टूटे हैं अभी-अभी
              गहरे आदिम संबध
आर्थिक मजबूरियों से हुए विस्थापन किस प्रकार प्राकृतिक रिश्तों को भी बंजर धरती में बदल देते हैं,यह संकलन की'पिता आये थे सपने में शीर्षक कविता में देखा जा सकता है । पिता का सपने में आना वास्तविक जीवन में पिता के न आ पाने की अभावात्मक व्यंजना करता है । यह व्यंजना जीवन की त्रासदी को और गम्भीर बना देती है । पिता के साथ साहचर्य ,राग और संवेदना के साथ जीवन जीने का एक अविस्मरणीय लोक ,प्राकृतिक जीवन पद्धति तथा लुप्त हुआ महत्वपूर्ण पर्यावरण है ,जिसे यह कविता सपने के रूप में ही सही बचाने का प्रयास करती है ।
       रामाज्ञा लोक के उत्सवधर्मी मन ,आस्था ,राग और संवेदना के सभी तारों काी सघन बुनावट के कवि हैं । इस दृषिट से उनकी छठ का पुआ कविता देखी जा सकती है । छठ यधपि सूर्य की आराधना से सम्बनित है लेकिन उध्सकी तिथि का निर्धारण षष्ठी के चन्द्र से ही होता है । प्रवासी कवि को मां की याद छठ के पर्व पर आती है । छठ के पर्व पर मां के गतिविधियों की परिकल्पना कवि की कल्पना को उत्तेजित कर उसे पुए छानती मां से चांद तक पहुंचा देती है। फिर कवि की कल्पना काव्य-न्याय के सहारे अनेक रागात्मक संभावनाओं से खेलने लगती है । कभी चांद के धब्बे उसे जली हुर्इ रोटी की याद दिलाते हैं तो कभी कटे हुए अधूरे चांद का दृश्य उसे चूहों द्वारा कुतरी गर्इ रोटी तक पहुचा देता है । रागात्मक अनुभवों का एक अलग संसार पूरी जीवन्तता के साथ पाठक के लिए भी खुल पड़ता है । यह संसार कविता का संसार होते हुए भी वास्तविक संसार की अनुभूतियों एवं यादों से रचा गया है । यह संसार लोक की संवेदना ,समर्पण और राग का है ,जहां का सूरज कृतज्ञता और आभार का है और हर श्रमजीवी का जीवन आधार है ,जहां उसका पूजना भी परिहास का नहीं बलिक एक श्रद्धास्पद आस्था के साथ गौरवशाली मानव-मूल्य बन जाता है -'पसीनें में आस्था है पसीने से प्यार हैपसीना सूरज से जन्मा है मैं सूरज का बेटा हूंसूरज को पूजता हूं। सूरज यहां जीवन के एक खोए हुए रिश्ते और अर्थ के रूप में सामनें आता है । इस तरह यह कविता लोकपर्व छठ के उत्सवधर्मी लोकमन का साक्षात्कार कराती है ।
        रामाज्ञा की कर्इ कविताएं सूक्ष्म निरीक्षण ,सृजनात्मक कल्पना और जीवन राग का अदभुत संयोजन प्रस्तुत करती हैं । ऐसी कविताएं सामान्य में भी असामान्य ढूंढ़ लेने वाली कवि की तीसरी आंख और लम्बे रचनात्मक श्रम और चिन्तन का परिणाम हैं । उदाहरण के लिए लड़कियों का साइकिल स्टैण्ड  शीर्षक कविता के रचनात्मक कौशल को देखा जा सकता है । साइकिलों का मानवीकरण और फिर लड़कियों के व्यकितत्व का आरोपण ,उनका लड़कियों के कभी प्रतीक तो कभी प्रतिनिधि के रूप में चित्रण और अन्त में निद्र्वन्द्व लड़कियों के किशोर मनोविज्ञन के अनुरूप उनके जीवन का अल्हड़ खिलन्दड़ापन इस कविता को इस संकलन की ही नहीं बलिक हिन्दी की भी अविस्मरणीय कविता बना देती हैं -'एक की गलबहियां किए दूसरी खड़ी हैदूसरों की टांग पर पहली नें रक्खी एड़ीतीसरी खींच रही दूसरी का रिबन........कतारबद्ध खड़ी हैं लड़कियों की आत्माएंआरजू आशिकी दीवानगी तमन्नाएंं।
        साझेदार  कविता जीवन में सहयोग और साहचर्य का दर्शन प्रस्तुत करती है -'तुम्हारे सुख में शामिल है मेरा सुखतुम्हारे दु:ख में शामिल मेरा दु:ख.......कोर्इ फलजैसे थोड़ी सी मिटटी का बना होता है थोड़े से पानी काथोड़ सी हवा काथेड़ी सी धूप का.......साझा कोख में पलता है भविष्य।इसी तरह चौकीदार कविता पूंजीवादी सभ्यता में किसी मनुष्य के श्रम का मूल्यांकन करने की प्रवृतित को मानवीय संवेदना के धरातल पर प्रश्नांकित करती है -जबकि बीत चुका है रात का तीसरा पहरदोनों को जरूरत है गाढ़ी नींद की ऐसी नींद जो ओस की तरह कोमल होकपास के फूल की तरह आरामदेहदेर सुबह मांगोगे उससेझपकियां लेनेनींद,स्वप्न औरऐसी ही कर्इदूसरी चीज में खो जानें का हिसाबइसके एवज मेंकहां से दोगे उसेउसके हिस्से का सूरज....।बजट कविता सम्बन्धों पर पड़ने वाले बाजारवादी प्रभाव का रेखांकन करती है -'संबन्धों का ऐसा हमने बजट बनायाहर सपना चीख पड़ा है।
      पुस्तक के अनितम कवर पृष्ठ पर प्रकाशित मदन कश्यप की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि 'रामाज्ञा शशिधर की कविताएंं संवेदना की नर्इ बनावट के साथ-साथ यथार्थ को देखने-परखने के अपने नजरिए के कारण भी प्रभावित करती है । यह नर्इ रचना-दृषिट आम आदमी के संघषोर्ं में उनकी सक्रिय भागीदारी की देन है। आज की कविता और कवियों को देखते हुए इसे दुर्लभ ही माना जाएगा । इसीलिए रामाज्ञा अपने समकालीनों में सबसे अलग हैं । वे किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं और इस रूप में नागाजर्ुन की परम्परा का विकास उनमें देखा जा सकता है । कपास की खेती करनें वाले किसानों के शोषण और आत्महत्याओं की त्रासदी तथा उनके यथार्थ की भयावहता को रामाज्ञा नें अपनी विदर्भ कविता में जिसप्रकार रूपाान्तरित किया है वह उनकी रचना-सामथ्र्य का तो मानक है ही ,एक नए समर्थ कवि की प्रापित के रूप में हिन्दी कविता के लिए भी महत्वपूर्ण है -
     संसार का सबसे बड़ा श्मशानधूसर सलेटी कालासंसार का सबसे बड़ा कफनमुलायम
     सफेद आरामदेहमणिकर्णिकेतुमनें विदर्भ नहीं देखा है
कविता विदर्भ के सफेद कपास की खेती को कफन की संज्ञा देकर और मणिकर्णिका से सन्दर्भित कर शोषण के कारण हो रही मौतों के बारे में सीधे-सीधे न कहते हुए भी बहुत कुछ कह देती है ।
    रामाज्ञा की कर्इ कविताएं कुतिसत राजनीति और उसकी साजिशों के प्रति आम जनता को सजग करती हैं-'मेमनें को सब बता दूंगा तुम्हारे द्वारा बांटी गर्इ हरी पतितयों के बारे में । संकलन की खेत कविता राजनीतिक शोषण और उपेक्षा के शिकार कृषिकर्म तथा उसके त्रासद यथार्थ को, जो किसानाें को आत्महत्या के लिए विवश करती हैं को एक नर्इ सांकेतिक व्यंग्यार्थी अभिव्यंजना देती है -'खेत से आते हैं फांसी के धागेखेत से आती है सल्फास की टिकियाखेत से आते हैं श्रद्धान्जलि के फूलखेत से आता है सफेद कफनखेत से सिर्फ रोटी नहीं आती ।      
       संकतन की शीर्षक कविता 'बुरे समय में नींद विकास के नाम पर बहुआयामी विनाश के वर्तमान दौर का एक प्रभावी स्वप्न-रूपक प्रस्तुत करती है । अन्य कविताओं की तरह इस कविता में भी वांछित अभिव्यकित के लिए बिल्कुल नए काव्य-शिल्प की तलाश देखी जा सकती है । यह कविता बहुत आसानी से फैण्टेसी शिल्प में लिखी जा सकती थी । लेकिन इस कविता की विश्वसनीय प्रभावशीलता इसके स्वाभाविक रूप में वास्तविक दु:स्वप्न के रूप में प्रस्तुत किए जानें में ही है -
               ' इस बुरे समय में देर-सबेर आती है नींदनींद के साथ ही शुरू होता है सपना
                सपने में पृथ्वी आती है नाचती नहींकोयल आती है कूकती नहीं
                गौरैया आती है चुग्गा नहीं चुगतीबादल आते हैं बरसते नहीं'
रामाज्ञा के कविताओं की रचना प्रकि्रया एक साथ इतनी बहुस्तरीय,सहज और विशिष्ट है कि उनमें प्रकृत संसार के साथ-साथ कविता का बौद्धिक मानसिक सूक्ष्म संवेदी प्रति-संसार भी अर्थ-सम्प्रेषण की अधिकतम संभावनाओं के साथ सक्रिय रहता है । सूरन कविता के रचाव को देखें तो वह चुपचाप दलित उपेक्षित सर्वहारा वर्ग के प्रतीक में कब बदल जाता है ,इसका पता ही नहीं चलता -मैं रह गया ओल का ओलन मिली नागरिकता न भूगोल। कविता सूरन के स्वाभाविक वर्णन से शुरू होती है और शीघ्र ही असितत्व के जुझारूपन,जददोजहद और जिजीविषा के प्रतीक में सूरन को बदलती हुर्इ पाठक को जीवन के दार्शनिक साक्षात्कार तक ले जाती है -
      ''फालतू बोझिल समय नेंफेंक दिया गाठों के गुच्छ कोबंसवाड़े,गंडोरे या भटठे के पांव तले
     फैलना पड़ा धीरे-धीरेधरती के गर्भाशय को जबरिया फैलाता हुआ
     कोख का जीवन से ऐसा ही रिश्ता है
        रामाज्ञा शशिधर उन कवियों में से हैं,जो कविता को सिर्फ रचतें ही नहीं ,बलिक उसे जीते भी हैं । जब मैं उनसे पहली बार काशी हिन्दू विश्वविधालय के हिन्दी विभाग में व्यकितगत रूप से मिला था ,तो उनके कवि रूप और उनकी कविताओं से बिल्कुल ही परिचित नहीं था । मैंने पंकज विष्ट के समयान्तर में प्रकाशित उनके कुछ रिपोर्ताज पढे थे और,जोकहरा में आयोजित एक सेमिनार में दिया हुआ उनका व्याख्यान भी सुन चुका था । दोनों ही जगह उनकी संवेदनाधर्मी बिम्बात्मक भाषा पढ़-सुनकर मुझे यह अनुमान हो गया था कि इस व्यकित में कविता है । उनसे मैंने यह कहा कि आपमें मुझे कविता दिखती है । यदि अब तक नहीं लिखा हो तो लिखिए और यदि लिख चुके हों तो पढ़ाइये । जब भी लिखेंगे अपने ढंग की होगी । मेरी बात सुनकर रामाज्ञा सिर्फ मुस्कराए थे । 'बुरे समय में नींद  की कविताएं पढ़कर मेरे उस पूर्वाभास और पूर्वकथन की पुषिट हुर्इ है । रामाज्ञा की कविताएं दुर्लभ संवेदी प्रजाति की कविताएं हैं । वे लोकधर्मी संवेदना,प्रतिरोध ,संकल्प और जिजीविषा की अभिव्यकित करने वाली कविताएं हैं । उनकी कविताओं में त्रासद यथार्थ -विनाश और प्रलय में भी जीवन की चीखों की मार्मिक शिनाख्त मिलती है ।
   रामाज्ञा की कविताएं सामूहिकता और रिश्तों का मानवीय पर्यावरण ,राग और संवेदना ,कविकर्म की सामाजिक परिवर्तन में निर्णायक भूमिका के साथ कविता के प्रति एक नयी आस्था की प्रतिष्ठा करती हैं-'कि तुम भाषा मेंआग इस तरह लाओजैसे वे लाते हैंस्ांधि-पत्रभाषा में प्रतिरोध ऐसे फैलाओजैसे वे फैलाते हैं व्यापार....... हमारा समय नायकविहीन हो गया है....रामाज्ञा की कविताएं एक नायक विहीन युग में सही नायक के तलाश की प्रस्तावना करती है ।

            समीक्षित पुस्तक-
                        'बुरे समय में नींद
                        कवि- रामाज्ञा शशिधर
                        प्रकाशक-अनितका प्रकाशन, सी-56यूजीएफ-4
                        शालीमार गार्डन,एक्सटेशन-।। गजियाबाद-201005 (उ0प्र0)

मंगलवार, 26 जून 2012

प्रेम-त्रासदी

उन दिनों प्रेमी का असितत्व और चेहरा
कहीं खोया हुआ था दुनिया की भीड़ के बीच
जिसकी अनथक तलाश करनी थी हमें
मित्रगण पिट रहे थे
और रात-रात भर जाग कर काट रहे थे अपना समय
प्रेम की असफल तलाश में...

उन दिनों सड़क पर प्रेम खोजने से अच्छा था
बन्द कमरे में बिस्तर पर लेटकर
की गयी प्रेम की कल्पनाएं ....
इस तरह हमारा काफी लम्बा समय 
प्रेम की प्रतीक्षा और उसकी तैयारियों में निकल गया

लम्बे समय तक हम यही तय नहीं कर पाये कि
हमें प्रेम करने की पहल करनी है
या करनी है किसी और द्वारा प्रेम में पहल की प्रतीक्षा.....
सड़कों पर लड़कियां कम थीं
और उनसे टकराने के अवसर और भी कम
या फिर ऐसी थीं जिन्हें कोर्इ भी
पसन्द करने से बचना चाहता था

निर्दोष चेहरे बहुत कम थे
और सच्चे और सही प्रेम की तलाश में
अपनी हार स्वीकार चुके मेरे मित्र
फिल्मी नायिकाओं के पोस्टरों से काम चला रहे थे
या फिर चुपके-वुपके यात्रा काते हुए भी टकरा जा रहे थे
एक ही पसन्द के चौराहे पर

कर्इ बार बाल-बाल बचे हम
हो सकने वाली भीषण टक्कर से
कर्इ बार मित्रों को सहलाते-समझााते और स्वस्थ करते रहे
प्रेम के भीषण टक्कर से हुर्इ नुकसान से......

कर्इ बार हम ऐसे अनुभव से गुजरे
जब कल्पना छिन गयी
और पूरी तरह जमीन पर आ गये हम
लेकिन बिना नाम-पता पूछे खो गयी चिटिठयों की तरह ही
खत्म हो गए प्रेम के ऐसे संभावित पड़ाव
तो कर्इ बार र्इष्र्या से बीमार मित्रों को बचाने के लिए
प्रेम के अवसरों का बहिष्कार कर आगे बढ़ गए हम

सच तो यह है कि प्रेम की तलाश में निकलना
मेरे लिए एक श्रमसाध्य और त्रासद अनुभव की तरह रहा
मैं एक युद्ध में फंसा था सामाजिक अपमान के
और मेरा अधिकांश समय उसके प्रतिकार की तैयारियों में नष्ट हो रहा था
मेरे लिए प्रेम में भटकने से अधिक महत्त्वपूर्ण था
मेरा उर्वर और सृजनात्मक मानसिक समय
मैं किसी भी प्रिय-अप्रिय अनुभव-क्षण के कालिक-विस्तार में फंसना नहीं चाहता था.....

अनितम निष्कर्ष यह कि
घर के भीतर रहने और उसे बाहर से देखने के अनुभव की तरह
जनसंख्या की आवृतित के साथ
प्रेम के वैकलिपक तलाश की दुविधा कर्इ बार बनी रहती है
सबके लिए संभव नहीं है मिल पाना वांछित और निर्विकल्प प्रेम

अनुभव के ऐसे ही एक विशेष क्षण में
मैंने उसे देखा
उसका होना एक अपरिहार्य विचार की तरह
छा रहा था मेरे मन-मसितष्क पर
मैंने उसके बारे में सोचा....और-और सोचा तथा
उसके विकल्पों के द्वन्द्व से बाहर निकलने की प्रतीक्षा की......
मैं उसे विचारों से बाहर निकालकर
जीवन में भी जीना चाहता था
मैंने सोचा और सोचा-उसके बारे में और सोचना
मेरे लिए एक पीड़ादायक विचार की तरह था
मैंने उसे अपने विचारों की दुनिया से निकाल बाहर किया
और वापस अपने पास लौट आया....
औसत प्रेम बाजार के किसी सामान को अपना बनाकर
उसे घर में बदल देने वाले अनुभव में पूरा होता है ।

कवियों के बारे में

यह कविता
कर्इ कवियों के व्यकितगत जीवन
के सर्वेक्षण पर आधारित
एक तथ्यात्मक विचार मात्र है !

सर्वेक्षण में अधिकांश कवि दूसरों के प्रति
सामान्य से अधिक शिकायतों से भरे थे
वे दूसरों के प्रति बहुत अधिक अपेक्षाओं से भरे थे
वैसे तो थे वे दुनिया के सबसे संवेदनशील प्राणी
दु:ख के तापमापी यन्त्र की तरह
डूबते-उतराते हुए अपने ही भीतर व्याप्त दु:ख में.....

अधिकांश कवि इतने आत्मकेनिद्रत थे कि
दूसरों के दु:ख के प्रति संवेदनशील और र्इमानदार रह पाना
उनके लिए संभव ही नहीं था.......
उनके असन्तोष का स्तर इतना अधिक था कि
उनके आस-पास के लोग
वंचित होते हुए भी सन्तुष्ट और सुखी होने की सीमा तक
चुपचाप जीना सीख गए थे....

अधिकांश कवि बहुत भीतर से
चालाक और सतर्क थे
लेकिन बाहर से वे बेवकूफ और बेकार 
प्रचारित हो गए थे
दूसरे शब्दों में वे मजाक के स्तर पर
कवि होने के लिए याद किए जाते थे......

अधिकांश कवि दूसरों के बारे में
सोचने के प्राय: अयोग्य होते हैं
लेकिन वे अपने बारे में इतनी गहरार्इ से सोचते हैें कि
उनका सोचना सबका सोचना बन जाता है 

सवेक्षण से यह भी पता वला कि
यधपि सारे कवि आत्मकेनिद्रत होते हैं
लेकिन उनका रोना इतनी दूर तक
दूसरों को सम्बोधित होता है कि
प्राय: उनके आत्मकेनिद्रत होने की ओर
हमारा ध्यान ही नहीं जाता....

दूसरे शब्दों में 
बचपन में सबसे ज्यादा रोने वाले बच्चों के
कवि होने की संभावना ज्यादा होती है....

अच्छे कवि इतना अच्छा रोते हैं कि
उनका रोना हमारे समय का
प्रामाणिक रोना बन जाता है....
इसतरह रोते हैं कि उनका रोना
सारी दुनिया का रोना बन जाता है ।

रविवार, 24 जून 2012

समय में कौए

(यह कविता आपातकाल के दिनों में ही स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से किए जा रहे माननीय प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन के साथ एक कौए का पाश्र्व स्वर गूंजने पर लिखी गयी थी । अधतन प्रासंगिकता के कारण डायरी के पन्नों से बाहर प्रकाशित देखना जरूरी लगा)


1.

टी0वी0 पर गूंज रही है उस कौए की कर्कश आवाज
(माननीय) प्रधानमंत्री जी के भाषण के साथ
हम सिर्फ उसे सुन सकते हैं उड़ा नहीं सकते
इस वक्त आवाज निकालकर या लगभग डांटते हुए
उसे उड़ा देना या चुप करा देना संवैधानिक शिष्टाचार के खिलाफ है...
प्रधानमंत्री भी उसे उड़ा नहीं सकते या फिर
किसी को उसे उड़ाने के लिए कह नहीं सकते....
वे अपना पूर्वलिखित भाषण पड़ रहे हैं
उसमें उस कौए के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है

कविता की भाषा से बाहर वास्तविकता में संभवत:
वह इतने अधिक मनुष्यों की चुप और शान्त उपसिथति को समझ नहीं पा रहा है
या फिर वह माननीय प्रधानमंत्री जी की एकल आवाज सेले रहा है होड़़
या फिर आतंकवादियों की किसी विध्वंसक साजिश की ओर
वह अपनी ही भाषा में कोर्इ जरूरी रहस्यमय संकेत करना चाहता हो

अंगरक्षक उस पर गोली भी नहीं चला सकते क्योंकि तब
कोए के साथ गोली की आवाज भी पूरे राष्ट्र में गूंज जाएगी
उसकी आवाज निर्णायक अनितम और अपरिहार्य है
वह अब हमारी पसन्द और नापसन्द से परे है
जाने क्या कुछ बोलता हुआ
उसे अब किसी का भी भय नहीं
उसे अभयदान मिल चुका है और अब वह निर्भय कौआ है
अब उसे ही यह तय करना है कि वह क्या कुछ
और कब तक बोलता रहे और कब उड़ जाए
चुने गए राजनीतिज्ञो के समानान्तर
अब वह एक संवैधानिक रूप से संरक्षित प्रतीकात्मक कौआ बनता जा रहा है

सीधे प्रसारण में राजनीतिज्ञों की तरह गूंज रही है उसकी आवाज
प्रिय या अप्रिय होने की चिन्ता से मुक्त
सत्ता द्वारा संरक्षित एक प्रतीकात्मक उपसिथति की तरहं....
जैसे वह आश्वस्त हो कि इस वक्त उसकी उपसिथति का
अब कोर्इ विकल्प नहीं है-वह बोल सकता है
 जो और जैसा चाहे......उसके सही या गलत होने के बावजूद
 लोगों को उसे सुनना ही पड़ेगा....


2.


व्यकितगत रूप से मुझे चुने गए राजनीतिज्ञ भी पसन्द नहीं थे
मैंने उन्हें अपना अमूल्य मत भी नहीं दिया था
वे जिन दलों के प्रत्याशी थे
उनके स्थानीय सदस्य और कार्यकर्ता भी उन्हें बिल्कुल नहीं जानते थे
कि वेे कौन हैं और क्या करना चाहते हैं
इसतरह वे एक अप्रत्याशित प्रत्याशी थे नेतृत्व के
व्यकितगत रूप से वे एक गूंगे प्रत्याशी की तरह थे जिनके साथ
लिखित आवाज के रूप में पार्टी का घोषणापत्र था...

मुझे कौए भी पसन्द नहीं हैं और नही उनकी कर्कश-कटु आवाज
मैंने उन्हें गौरैया के अंडों को बिना बच्चे बने ही फोड़कर
किसी आतंकवादी की तरह पी जाते देखा है
अपनी हिंसक प्रवृतित और संगठित व्यवहार के कारण
वे प्राय: गलत इतिहास पुरुषों जैसे ही होते हैं
जिन्हें समय की विडम्बनाओं के साथ सिर्फ सहा जाता है और सहना पड़ता है
मुझे तो समय के राजनीतिज्ञ भी कौओं जैसे ही लगे
जो शिशु हाथों की रोटियों की तरह
आम जन की भावनाएं एवं विचार छीनकर
व्यवहार और शब्दों तक पहुचने के पहले ही उड़ और उड़ा ले जाते हैं
इस तरह कौआ मेरे लिए मेरे जीवन और पर्यावरण की
बलात,हिंसक और अप्रिय उपसिथति एवं अवांछित समय है......



3.



समय और पर्यावरण में कौए
हर दिन-हर सुबह...हर शाम मेरे छत की मुंडेर पर
अपनी खुफिया आंखे लिए आ बैटता है
और फिर ध्वनि एवं विचार-प्रदूषण की तरह
घण्टों करता रहता है अपनी अपरिहार्यता की मुनादी
कुठ ऐसे कि खबरदार ! अपनी औकात से बाहर
जो कुछ भी सोचा तो.....

दूसरे दिन वह फिर आ जाता है
हलो ! कहकर व्यंग्य से मुस्कराता है
कुचर-कुचर करता हुआ डरावनी आवाज में फिर शुरू हो जाता है
लड़ाता और धमकाता है बहसें
एक ही बात को कर्इ-कर्इ माध्यमों से कर्इ-कर्इ बार
प्र्रसारित करवाता है-ऐसा है मेरा समय...वैसा है मेरा समय
कुछ ऐसा ही बार-बार दुहराता है

अपनी भददी आवाज की कर्कश धार से
चोंचों की मार से मेरे विचारों को लहूलुहान करता
छीन लेता है मेरे अन्तर में
अंकुरित होने के लिए छटपटाते
बीज जैसे हर नन्हें नए कोमल चूजे विचार....
वह मुझे पूर्ण सहमत देखना चाहता है
वही नहीं चाहता कि मेरे भीतर पल रहा हो कोर्इ
वैचारिक संभावना का वैकलिपक प्रतरोध
मेरे भीतर का विचार उसके सिद्धान्तत:
उसके सही ही होने के दावे को स्वीकार नहीं करता
जबकि वह पूरी ताकत के साथ मेरे मसितष्क में भी
अपने ही विचरों का उपनिवेश देखना चाहता है
वह मेरे प्रतिरोध पर क्षुब्ध आक्रोशित और आक्रामक है....

कहां मैं हूं गलत-मैं हाथ जोड़कर पूछना चाहता हूं उससे
और मेरे हर पूछनें के साथ उसकी खुली खोंच
किसी खूंखार सैनिक की निशाने पर तनी गन की तरह
विस्फोटक धमाकों में गूंजती रहती है खांव-खांव-खांव-खांव....
अब वह मुझसे शानित और व्यवस्था के अनुशासन के रूप में
पूर्ण स्थगन मांगने लगा है.....

शायद वह मुझे भी समझने लगा है आतंकवादी
ऊपर के किसी खुफिया निर्देश पर
जैसे कि उनके लोकतंत्र के असितत्व को भी हो खतरा
मेरे भूमिगत सृजनात्मक सपनों और मेरे आदर्श मानवतावाद से
बहुत ही खतरनाक क्रानितकारी है यह
करता है सम्पूर्ण मनुष्यता की बातें
किसी भी देश की सरकार को संकीर्ण वर्ग और आतंक समझता
अपने-आप को प्रतिबद्ध समुदायवादी समझता है मनुष्यता का
हर देश की पुलिस को रखनी चाहिए इस पर खुफिया नज़र
यह भयानक बुद्धि-अपराधी किसी भी देश के देश-भकित प्रचार को
एक मध्ययुगीन आदर्शवादी निष्ठा और
सारी मानवता के खिलाफ षडयन्त्र समझता है-घेर लो इसे !
कौओं का कमाण्डर कांव-काव चीखता हुआ
अपने सैनिकों को देता है निर्देश
जबकि मैं अभी भी नहीं डर रहा
उसकी भावनाओं की तात्कालिक वैधता का करता हुआ सम्मान
उसकी भी दृषिट पर सहानुभूति से विचार करता
भीतर अपनी असहमति छिपाए संवैधानिक लाचारी में ही सही
उसे पूरे सम्मान के साथ कांव-कांव नांव-नांव करने की देता हुआ सहमति ।ं
समय के कौए तो चीख रहे और तेज
सिर के बहुत पास तक लड़ाकू हेलिकाप्टरों-सा उतर आए
अपने ऊपर उनके भ्रमों से बुरी तरह परेशान
उनके आरोपों का प्रतिवाद करता
दोनों हाथ उठाए आत्मसमर्पण की मुद्रा में
मैं निकल आता बाहर...खुले मैदान में मुझे देखकर
और सतर्क हो जाता है कौओं का कमाण्डर
देता वह कौओं को जल्दी-जल्दी आदेश-निर्देश....

मैं कौंओं का एकतरफा बहरापन और
सिर्फ उन्हें बोलते सुनते रहनें की अपनी निरीह नियति पर क्षुब्ध
अपनी असहाय सिथति का आकलन कर
हाथ उठाकर चीखता-सा और असमय बोलने के अपने अपराध को
स्वीकार करता-सा निरपराध
अब भी कहता कि- हां ! मैंने फेंके थे विचारों के ढेले
इन्कार नहीं कर रहा....पर तुमनें भी चलार्इ कम बो(गो)लियां
मारे कम जन ? शानित और व्यवस्था का ले-लेकर नाम.....
हां ! मैं स्वीकारता कि फेंके थे ढेले विचरों के
अपने भीतर असहमति का करता दु:साहस
पर सब कुछ सिर्फ नागरिक होने के लिए....
झूठा नहीं नागरिक-देखता-सुनता-समझता-सोचता-चुनता हुआ
गुस्साता पर ढेलों से बार-बार खींचता हाथ
हां ! स्वीकारता कि लगे जो तुमको विचारों के ढेले.....
सबने तुमको गौरैया के अंडों को
फोड़-फोड़कर खा जाते देखा......

कौए तो शायद और गुस्सा हो उठे तबसे
लड़ाकू विमान की तरह आवाजों की बमबारी करते
मेरे सिर के ऊपर...नीचे तक मंडराते
और लो...यह उसनें अपनी दंभी हिंसक चोच भी मार दी
लोकतंत्र है तो क्या सत्ता के मद में...संगठन में...
बहुमत में है कौआ-कुछ ऐसे कि जैसे भरी सड़क पर
बरस रही लाठियां पुलिस की.....

और मैंने भी फिर उठा लिया है ढेला
गुस्साते कौओं पर....और चीखना कौओं का भी तेज हो गया
ढेले ऐसे विचारों के कि देश अभी आजाद नहीं हुआ
देह अगर आजाद हुआ तो और नहीं कुछ-
मन,बुद्धि ,विचार,भाव और कल्पना.......
पहचान रहा कि कहता तो स्वयं को दिल्ली का ही कौआ
पर लन्दन का....यदि होता कौआ दिल्ली का
पहचानता अपने लोगों को और विरुद्ध अपने ही हित के
नागरिकों को लोकतंत्र की उलट दिखाते
औरों का हिस्सा कुछ जन मिलकर खाते
अपनों का ही खाते—और उड़ाते ...और बीटते कौए
ये कौए तो दिल्ली में पर दिल्ली के भी नहीं
न्याय की भाषा में रचते अन्याय का विषाक्त इतिहास
कहने को ही अनुशासन और व्यवस्था के कर्ता
पर सच में तो भोग-रोग,शराब-साकी की डूब मचाते खूब अपहर्ता....

लगता ह ैअब और क्षुब्ध हैं कौए
मेरा अपने ही खिलाफ यह बड़-बड़ सुनकर
और तेज संगीनों जैसी हिलती उनकी चोंच....
उनकी बढ़ती कर्कश चीख के साथ
मेरा भी बढता जा रहा विचारक गुस्सा
देख रहे हाथें में क्या है मेरे
यह ढेले जो बंधे हुए से शब्द तीखे विचारधार किनारों वाले
खींचकर मारूंगा मैं भी यदि चुप नहीं हुए तो
तू तो केवल चयनित घोषित वुद्धिमान मात्र है समझदार नहीं है
अर्थ की अनर्थकारी इतिहास की विडम्बना से चयनित
चयनक को तू मूर्ख समझता और बनाता.....

वैसे ही तो मैं भी नागरिक जैसे तुम
मैं अब भी वापस न लेता कहता यह
हौए हो तुम कौए-जो भटके इतिहास-समय में
रोटियां खोदते श्रमजीवी जन की न फुरसत का लाभ उठाकर
सिर,कन्धे और पीठ नोचते
कांव-कांव से भरते आसमान
क्षितिज तक धौंस जमाते...तनिक नहीं शरमाते
सेवा के अवसर में सत्ता-मदमाते...

शुक्रवार, 22 जून 2012

जीवनोत्तर विमर्श.....


जीवनोत्तर विमर्श.....

मैं एक देह हूं जिन्दा फिर भी
मेरी चिन्ता यह कि मेरी मृत्यु के पश्चात
विचारपूर्ण ढंग से मेरी देह के साथ
होना कैसा चाहिए अच्छा कि्रया-कर्म.....

पहला विचार तो यह कि
क्या ही अच्छा होता यदि मैं ऐसे ही
खुली हवा में छोड़ दिया जाता मरनें पर
दूर-दूर तक धरती होती...आसमान भी ऊपर
और कोर्इ मनुष्य न होता(अ)शानित के लिए......

तब भी मरा सड़ जाना तो तय है-जानते हैं जीववैज्ञानिक
कि भोजन हूं तो मैं भी-कि बच्चे ! गिद्ध और कौओं से
यदि तुम बच भी जाते हो तो
हमारे जाने-पहचाने कीटाणुओं से बच भी पाओगे कैसे !
तो न बचूं-मेरा जाता ही क्या जो
छोड़ चला जाने पर कोर्इ ले-ले !
जीवन भर मैं खाता रहा जीव-सम्पदा
मरनें पर वे खा जायं तो ही है अच्छा !

यह तो अच्छा ही रहेगा
सहमत भी होता-सा पाता हूं
किसी भी भूखे का भोजन बन जाना सबसे अच्छा
लेकिन मैंने सुना कि नहीं कहीं ऐसा है निर्जन
जहां नहीं मनुष्य दूसरा दूर-दूर तक
यह भी कि ये कीटाणु बहुत होते हैं गन्दे
खाते समय सड़ा-सड़ाकर फलाते हैं दुर्गन्धों को
ते यह जिन्दा मनुष्य की घ्राणेनिद्रयों के
होगा विरुद्ध तो निश्चय ही विद्रोह जो होगा नहीं बचूंगा
डाक्टरगण भी सहमत होंगे निश्चय
नहीं सह सकेगे तो नष्ट के लिए
हिन्दू हाथ जला ही देंगे
और मुसलमान जो मुझे ढक देंगे कब्र में और र्इसार्इ
तो ऐसे ही बच पाएंगे सड़ने वाले संकट से वे......

लेकिन मजा तो ऐसे में ही आएगा कि
जैसे भी इस समय सोचकर आ रहा मजा अब से ही
कि सोचूं कि यह धरती भी मौत से
होगी हिन्दू या मुसलमान-र्इसार्इ.....

जलते हुए आग के गोलों से ठंडी हो निकली धरती
जन्म से तो हिन्दू ही है विश्वासों में
दशरथ को फल दाता राम-पिता भी अगिन महोदय ही थे
जीवन का जो कुछ भी सब निकला है आग से-
वैज्ञानिकों का समर्थन दिलाते हिन्दू होंगे खुश.......

पर मेरी तो चिन्ता ही दूसरी
यदि धरती की मौत भी होगी
तो वह मरेगी मौत कौन-सी !
हिन्दू की या मुसलमान सरीखी ?
क्या वह किसी जलते सूरज में जाकर जल जाएगी !
या वह ठंडी होते-होते जीवन का ही बन जाए्रगी कब्र ?
जे भी हो निकली तो वह है आग से ही
फिर तो मैं अत्यन्त हो रहा हुलसित
मुसलमान और र्इसार्इ के पूर्वज जीवन-अणु भी आग-पुत्र हैं
मरें मौत चाहे जो.....

फिर तो यह भी सोच लिया कि
हर हिन्दू या सिक्ख-र्इसार्इ
मुसलमान,पारसी,बौद्ध-जन
और सभी माक्र्सीय नासित-जन
सिद्धान्तत: सब ही हैं जन्म से हिन्दू
और प्रश्न मौत धरती की तो
यह धरती यदि
फिर आग के गोलों में ही लय न हुर्इ
ठंडी हो गयी कब्र सरीखी
त्ब तो सारे हिन्दू भी मौत मरेंगेे
मुसलमान और र्इसार्इ ही की
पर यदि मैं हिन्दू होता तो
सोच-सोचकर ख्ुश यह होता
क्योंकि यह दुनिया तो मरनी है एटम बम से ही
फिर तो कोर्इ धर्म-जाति हो
सब मनुष्य-जन मरेंगे निश्चय
एक हिन्दू की ही मौत !
   

पिता-अपराध सो-च-ते हुए....

तुम डर रहे हो
क्योंकि तुम्हें डरते रहने के लिए कहा गया था
इसके पहले कि तुम स्वयं कुछ सोचो और रचो
तुम्हें भी सौंपी गयी थी एक दुनिया
पहले से भी रची और सोची गयी ।

तुम सुविधाओं में और सुरक्षाओं में पले हो
तुम्हें जहरीले पौधों और जन्तुओं की पहचान करायी गयी है
तुम्हें सौंपी गयी हैं अनेक अव्याख्यायित वर्जनाएं
ताकि तुम उन्हें समझ पाने तक बचे रह सको....
इसतरह तुम एक उत्पाद हो पिछली पिता-पीढ़ी की समझदारी के......
तुमने जीने की आदतें सीखी हैं और कला
तुमनें डर सीखें हैं और दूसरों द्वारा विरासत में मिले हुए विश्वास.....

तुम कल तक बच्चे थे और आज बनने जा रहे हो पिता
तुम एक अवसर हो डरनें और न डरने के नए चयन के लिए
तुम एक जैविक पिता ही नहीं हो
तुम एक सांस्कृतिक और साभ्यतिक पिता भी हो
एक दुर्लभ अवसर हो नए आरम्भ के लिए.......

उठो ! यह तुम्हारे सोने का वक्त नहीं है ,सोचने का है
बहुत हो लिया अब अपने छत के ऊपर
खुली हवा में निकल आओ
यदि छत न हो ता मैदान में......

सबसे पहले अपने नाम के बारे में सोचना है तुम्हें
और यह किसी भी भाषा का हो सकता है शब्द
इसे संज्ञा भी कहते हैं.....

संज्ञा हर भाषा के वे शब्द होते हैं
जो दूसरी भाषाओं में भी जाकर बनें रहते हैं अपरिवर्तनीय
जिनका नहीं किया जा सकता कोर्इ अनुवाद
ये शब्द आते-जाते हैं बस उधार यूं ही...ऐसे ही
देश और भाषा से पक्षिओं सरीखे
जन-जन से ज्यों पेड़-पेड़ से उड़ते रहते और बैठते.....

अब सोचो - तुम क्यों हो राम !
यधपि यह है ही सहज पर बात कठिन
हालांकि है भाषा की ही समस्या
कि तुम्हें राम ही क्यों कहा गया ?
जबकि पीटर ,डैनी ,रहीम,करीम-करीमन कुछ भी
कहा जा सकता था.....

अब सोचो कितने वर्ष उम्र है तुम्हारी
पांच वर्ष ! दस वर्ष ? बीस ? पच्चीस ? पचास ?
अच्छा तो तुम चालीस वषोर्ं से हो हिन्दू
और तुम पचास साल से मुसलमान
पर इतना ही नहीं
दस वर्ष पहले जन्में बच्चे को
बिना पूछे ही उससे तुमनें उसे बना रखा है हिन्दू ?
उसनें मुसलमान आठ वषोर्ं से
पांच वर्ष से उसनें सिक्ख 
ऐसे ही और-और.....

आखिर तुम हो कौन
होते कौन हो
किसी के होने के ऊपर
अपना होना थोप रहे जो !

श्रीमान मियां और पंडित जी !
पूछा तो नहीं था आप-आपने अपने-अपने बच्चों से
कि तुम जन्म लेना चाहते हो या नहीं !
तुम हिन्दू बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम गोरा या काला,अफ्रीकन या बि्रटिश बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम अमुक भाषा-भाषी या देश होना चाहते हो या नहीं -
वैसे ही जैसे तुमसे नहीं पूछा था तुम्हारे पिताओं नें
हिन्दू या मुसलमान,हिन्दी-उदर्ू या तमिल बनाते हुए.......

यधपि आप हैं और होते हुए भी पिता
बिना पूछे स्वयं को उसका अपना पिता बताकर
उसकी नन्ही पीठ पर लद जाने वाले
उसके मन-मसितष्क पर संकीर्ण असिमताओं की इबारत लिख देने वाले....
जबकि हर पिता अपनी सन्तान के साथ
उसके जन्म के साथ ही कर देता है
एक प्राकृतिक अपराध
बिना पूछे एक नए मनुष्य जीवन को धरती पर लाकर
अपनी वासना और कामना की आड़ में
किसी निरीह शिकार की तरह घायल प्शु-सा पटक देना
रोग-शोक,दु:ख और मृत्यु की युद्धभूमि में
एक असमाप्त और अन्तहीन लड़ार्इ लड़ने के लिए.....

हां-हां महोदय ! पितृ-ऋण नहीं
पिता-एक प्राकृतिक अपराधी सन्तान का
भुगते जो उसके पालन-पोषण की सजा
सजा पूरी हो क्षमा मिल जाने तक.....

हां-हां महोदय । यह होगा आपका अपराध
एक पुत्र को जन्म देना या पुत्री को
उतना ही जितना एक रूत्री की बिना सहमति के
किए सम्पर्क पर होने वाली सार्वजनिक भत्र्सना बलात्कार की !

कि एक मानव-शिशु हमेशा ही होता है-
एक प्राकृतिक बलात्कार का शिकार और परिणाम
चहे वह विवाहित दम्पति से जन्मा हो या फिर अवैध सम्बन्ध से....
दूसरा बलात्कार कि उसको दे दिया एक नाम
तीसरा कि बिना पूछे ही उससे दे दिया एक धर्म
और उसका पिता होने का करते हुए दुरुपयोग
लगे पीटनेढालने उसे आतंकवादी अनुशासन में
अपनी सनकों की शिक्षा का पाठ पढ़ाते हुए
अपने र्इश्वर और खुदा को भी बुला लिया
अपने बलात्कार के परिणाम से अपने होने का 
अनधिकृत हिस्सा मांगने....
जाओ पिता ! अब भी समय है कि
उसके उगनें में हस्तक्षेप न करते हुए
संकीर्णताओं से परे की उदारता के साथ
उसे फूलने-फलने और विकसने दो
होने दो मनुष्य-उसे छोटा मत समझो
मत बनाओं उसे अपने अहंकार का चौकीदार
बौनसार्इ या फिर निजी जागीर उसे
क्योंकि वह ह ैअब तक के सम्पूर्ण मानव-जाति के वैशिवक
उत्तराधिकार में मिले अनुभवों और सूचनाओं से समृद्ध
तुम तक बूढ़ी हुर्इ मानव-जाति का सहज उत्तराधिकारी !
तुम्हारा शिशु होते हुए भी अब तक की सभ्यता का
तुमसे भी बूढ़ा सदस्य मनुष्य होगा वह
वह ज्ञान-वृद्ध शिशु !

जाओ पिता ! और मांगो उस नवजात मनुष्य से
घुटने टेककर,उसके मस्मत को चूमते हुए मांगो क्षमा
यदि तुम मां भी हो चाहे
यदि तुम पिता भी हो चाहे
यदि तुम र्इश्वर,खुदा या गाड भी हो चाहे......

उसे चूमो ! उसे पुकारो ! और उससे मांगों क्षमा
उसके साथ खेलते और उसे प्रसन्न करते हुए
उसके लिए दूध और रोटियों की खोज में
भटको सारी धरती !

और यह मत भूलो कि
एक जिन्दा मनुष्य की हत्या कर देने से
अधिक भयानक पाप है
एक नए मनुष्य के जीवन को
उसकी इच्छा के विरुद्ध बिना पूछे इस धरती पर
भूख ,रोग और संकटों से लड़ने के लिए बुला लेना.....

उसके सामने टेककर घुटनें
उससे मांगते हुए क्षमा
उसे धीरे से अपनी बाहों में उठाओ !
शायद वह हंस दे और तुम्हारी सजा
पूरी तरह माफ कर दी जाय......






कि आयेगी सरकार.....

   
लोकतंत्र की मौज मनाती हस्ती जड़,
और तंत्र का शोक मनाती बस्ती जड़
इतने जड़ कि जैसे नदी किनारे बिखरे पत्थर
इतने जड़ कि जितना मौन पहाड़......
अन्तहीन प्रतीक्षा में सोयी अलसायी.......

पहले जैसे कि वे देख रहे होते थे
सूना आसमान कि
आयेगी बरसात और बादल.......

कुछ वैसे ही
हां कुछ वैसे ही
जैसे आने वाली होती है बारात
नहीं गयी आदत जो
वह अलाव संस्कृति
घोर प्रतीक्षा की सूनी पत्तलें बिछाए
धैर्य-धीर से
कि आयेगी सरकार
कि कर देगी सब काम
कि डाक्टर और मजदूर बनकर
हाथ पर हाथ धरे बैठे
हो जायेगा काया पलट
बन जायेंगे रास्ते -मकान
खुल जायेंगे बन्द दरवाजे और
बन्द खिड़कियां सुख की
कि आयेगी सरकार
जैसे नहर में पानी
जैसे बिजली,जैसे सड़क
जैसे गर्मी और बरसात......





शुक्रवार, 15 जून 2012

नीत्शे को पढ़ते हुए


जीवन और मृत्यु-चिन्तन.....

      (नीत्शे को पढ़ते हुए )




1.


स्वयं को जीनें की स्वतंत्रता
अपनें असितत्व में उपसिथत  जीवन-विवेक
क्षत-विक्षत हो जाता है संवेदना की सुनामी से....
फर्क है नि:संग मै और सम्बद्ध मै में
कि केवल आत्मस्थ होना स्वस्थ होना नहीं है
न ही अकेली इयत्ता
सहजीवन की सम्पूर्ण इयत्ता ही हो सकती है

संभव है कि हमारा पर्यावरण समय
जो कि बना हुआ है दूसरों की इच्छाओं से
हमेशा ही हमारे अनुकूल न हो
कि नियति
दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करनें की भी हो सकती है
हो सकता है दूसरों की साजिशों के रूप में भी......

कि कभी-कभी नियतिवादी होना
दूसरों की अनुचित इच्छाओं और
अपराधी समय का सम्मान करना भी हो सकता हैं
तो कभी प्रेम में सहते जाना किसी की बेहूदगी
कि नियतिवादी होना
किसी शिकार की प्रतीक्षा में बैठे शिकारी की
रोमांचित प्रतीक्षा में भी घटित हो सकता है
या फिर किसी आलसी की अन्तहीन प्रतीक्षा में....

स्वयं को जीना जरूरी है
और जरूरी है स्वयं को जानना भीै
कि असितत्व में जीना
अभी-अभी के प्रवहमान वर्तमान में जीना
नहीं जीना है भूत और भविष्य की कल्पनाओं को
जरूरी है ऐसा जीना इतिहास से बाहर रहने के लिए
और रचनें के लिए एक नया इतिहास भी....
कि ऐसा जीना समयातीत आदतों के प्रति
समय में जीते मनुष्य की सजगता है

क्या नीत्शे कभी भी नहीं जान पाया होगा
किसी मेले के सुखकर रहस्य !


2.


दौड़.....कैसी दौड
कहां तक की दौड़
किसकी दौड़
इस अनजाने धावकों की भीड़ में
एक-दूसरे को पीछे छोड़ते हुए
आगे जानें वालों का सच ही कोर्इ लक्ष्य भी है क्या !
शायद नहीं ! कौन कहता है कि
ये सारे नक्षत्र
सूरज-चांद-सितारे
हमारी धरती के इर्द-गिर्द नहीं घूमते !
कहां घूमती है धरती
सूरज के चारों ओर
सूरज ही तो घूमता है !
आज चाहे मानव-जाति की युगों से आ रही धारणा
भ्रम सिद्ध हो चुकी हो
किन्तु उसकी प्रवृतितयां
इस संसार के प्रति अब भी वही हैं

संसार में अपनी अनिर्वचनीय महत्ता का
प्रतिपादन करता हुआ
हर व्यकित
यही तो सोचता है
स्ांसार मात्र उसी के लिए है
उसकी अनुपसिथति में अधूरे-अपूर्ण
सारहीन-निरर्थक-गतिहीन
और एक दिन समय उसे धीरे से
अंधेरे कोनें में छोड़कर चल देता है ।


मौत नहीं असितत्वहीनता कहो
इस अनन्त शून्यवत यात्रा में
कौन-सा बिन्दु उसके प्रारम्भ का है
और कौन-सा अन्त का
कौन कह सकता है जीवन की यह यात्राा
अनसितत्व से असितत्वहीनता तक ही तो है?
किन्तु -फिर भी कितना धूर्त हूं मैं
तब जबकि मैं इस अनन्त सृषिट के
शाश्वत मैं का वाहक बना
रातोंरात कितना स्वार्थी बन बैटा मैं
वह मैं  जो मेरी इच्छा का नहीं
जिसकी इच्छा का मैं परिणाम था
उसे मैंने बांध लेने का हास्यास्पद प्रयास किया
हमेशा के लिए अपनें-आप से
और जिन प्रयत्नों में लगा हुआ
मैंने गुजार दी अपनी दुर्लभ यात्रा
कुछ भी कहां देखा-
मेरी दुष्कृत्यों में डूबी हुर्इ आंखों के सामने
चाहे हिम आये या हरीतिमा
मनोरम स्वर छलके या सौन्दर्य
कुछ भी नहीं देखा मैंने
तब स्वाथोर्ं में लिप्त मैंने सोचा था कि
ये दृश्य अनन्त काल तक यूं ही भटकते रहेंगे मेरे लिए
ल्ेकिन तब
मुझे क्या पता था कि
एक दिन समय मुझसे दृश्यों को नहीं
आंखें ही छीन लेगा
और जिस मैं से आत्मसात अभिन्न हुआ मैं
विराट मैं का वहन करता हुआ
एक दिन कुचल दिया गया
छल दिया गया
वह मैं जो कुछ ही क्षण के लिए
मुझे भिगोकर ओत-प्रोतकर देनें के लिए था
जानें कब छोड़कर मुझे जानें कहां
और मूंद ली मैंने भयभीत होकर अपनी आंखें
चीख पड़ा-
मौत छीन रहा है मेरा जीवन
और मुस्कराता हुआ वह
मुझे बुझाकर आगे बढ़ गया
मौत नहीं असितत्वहीनता कहो
जो जीवन के पहले भी सत्य था और बाद में भी.....


3.


असितत्व महत्वपूर्ण है
फिर भी मैं अपनें होनें को
दूसरों की हिकारत भरी आंखों से देखना चाहता हूं
समझना चाहता हूं दूसरों की श्रेष्ठता
घृणा और र्इष्र्या का मतलब
मैं समझना चाहता हूं स्वयं को
हंसना चाहता हूं स्वयं पर
पूरे उपहास के साथ
कि वह क्या है जो मुझसे
मेरे नीच और घटिया होने का अभिनय मांगती है
मैं समझना चाहता हूं
अपने विरुद्ध दूसरों के सुख का मतलब....
दूसरों से जुड़ते ही क्यों लगता है कि
वे अपनी मानसिकता लादना चाहते हैं मेरे वजूद पर
कभी-कभी तो पागलपन भी !
कभी-कभी तो लगता है कि
उनकी गोल से छूटकर निकल भागते ही
उनका खेल खत्म हो जाएगा....
दूसरों पर लदे हुए लोग
गिरकर ही जान सकेगे अपना भार....

एक दूसरे पर बिना लदे हुए
जीवन जीनें की सहचर स्वतंत्रता के साथ
फैल नहीं सकता क्या संक्रमण मुस्कान का !

मैं शुभ नहीं अशुभ
सौन्दर्य नहीं विद्रूपता मांगता हूं
सुख नहीं दु:ख की मांग करता हूं मैं
जितना दे सकता हो तू मुझे दे-
वह सब जो तेरा पाप हो
वह सारा जितना तेरा नरक होे
कि तू खुश रहे और बदल जाये एक दिन
कि तू जान सके कि संवेदनशीलता के तार
असंम्बद्ध आंखों को भी रुला देती हैं
कि आत्मीयता और संवेदनशीलता के हर क्षण में
दूसरों का दु:ख भी अपना दु:ख बन जाता है
कि दूसरों को कष्ट से बचानें और
सुखी बनाने के लिए जिया गया दु:ख भी
सुख और सन्तोष का एक अर्थ पा जाता है.....

यधपि दु:खों के अनुभव और वयस्कता नें मुझे पथरा दिया है
फिर भी मैं एक बार फिर रोना चाहता हूंं
दे दो मुझे मेरा आंसू
जो जाने-अनजाने में
तुझ तक फेंक दिया था मैंने
कल का अस्वीकार हुआ दर्द
आज मैं पुन: मांगता हूं तुमसे
इस संसार-समुद्र की भीषण जन-कोलाहल से
थोड़ा भी नहीं बवना चाहता मैं !
किसी भी लहर के थपेड़े से
नहीं बचाना चाहता अपनें जीवन की नाव........
कल तक रोता हुआ मैं
आज सच ही कितना गरीब हो गया हंू
आज न मेरे पास
डरने के लिए कोर्इ भय है
न चीखने के लिए कोर्इ दर्द ही
फिर वेगों-संवेगों से परे
ऐसा स्तब्ध जीवन लेकर
मैं करूंगा भी क्या ?

मैं जानता हूं कि कइयों की तरह
मुझे भी जीवन में
अपमान के इतनें सारे अनुभवों के बाद
एक दिन सम्मानित होना भी
किसी के प्रायशिचत के बोध की तरह
अपमान से भर जाएगा.....

इसे कोर्इ भी जानना चाहे जान सकता है
मैं सौन्दर्य में नहीं कीचड़ों में पला हूं
पुण्य नहीं पाप में पला हूं
स्वर्ग नहीं नरक में जन्मा
सुख नहीं दु:ख में जीता हुआ प्राणी हूं मैं
फिर तुम्हारा सुख,सौन्दर्य और स्वर्ग
मेरे किस काम का !