शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

स्त्री-आत्मकथाएं : विमर्श के वृत्त एवं परिधि

संवेद  54  जुलार्इ 2012
सम्पादक-किशन कालजयी
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आज के समाजशास्त्रीय आलोचना के दौर में आत्मकथा की विधा आलोचकों और पाठको दोनों के लिए ही महत्वपूर्ण हो गयी है । र्इमानदारी से लिखी गर्इ आत्मकथाएं सामाजिक व्यवहार के अनेक ऐसे तथ्य और ब्यौरे उपलब्ध कराती हैं ,जिनका अध्ययन साहित्य के साथ-साथ समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिए भी किया जा सकता है । आत्मकथा लेखक या लेखिका से यधपि तटस्थ आत्मविश्लेषण की अतिरिक्त योग्यता के साथ अपने जीवन में घटी घटनाओं और आए व्यकितयों को पक्षपातरहित ढंग से व्यक्त करने की अपेक्षा की जाती है ,लेकिन जैसाकि मानवीय स्वभाव की दुर्बलता है कि वह अपने पक्ष को तो संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है ,दूसरों के पक्ष को नहीं । दूसरों का पक्ष प्राय: अनुमान के लिए छोड़ दिया जाता है । अधिकांश आत्मकथाओं में स्वाभाविक है कि यह दूसरा पक्ष पुरुष-पक्ष ही होगा । स्त्री के अविवाहित जीवन-काल में यह प्राय: भार्इ या पिता के रूप में पहरेदार की भूमिका निभाता पाया जाता है और विवाह के बाद पति के रूप में ।
      हिन्दी की अधिकांश स्त्री आत्मकथाएं कथाकारों द्वरा ही लिखी गयी हैं । इसलिए शिल्प की दृषिट से इन आत्मकथाओं में उपन्यास की विधा का कथात्मक शिल्प देखा जा सकता है । चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की 'पिंजरे की मैना,मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी , प्रभा खेतान की 'छिन्नमस्ता और मैत्रेयी पुष्पा की -कस्तूरी कुण्डल बसै और गुडि़या भीतर गुडि़या -सभी औपन्यासिक शिल्प वाली आत्मकथाएं ही हैं । संभवत: इसीलिए इन सभी आत्मकथाओं में पठनीयता की दृषिट से अदभुुत आकर्षण है । अनुभव-जगत की भिन्नता तथा सीमित जीवन-अवसरों को गहरार्इ कहें या फिर लम्बे समय तक जीने की बाध्यता या विवशता उनके लेखन में निरीक्षण की ऐसी सूक्ष्मता का निवेश करती है ,जिसकी कल्पना भारतीय पुरुष साहित्यकारों केलेखन में तो नहीं ही की जा सकती । इन आत्मकथाओं से स्त्री-मन की वह दुनिया सामनें आती है,जिसे बहिमर्ुखी और सामाजिक होने के कारण पुरुष-मन प्राय: सोच और देख ही नहीं पाता । उनके आत्मकथाओं की यह दुनिया जीवन के छोटे-छोटे संवेदनात्मक प्रसंगों ,विवरणों,वृत्तान्तों और प्राय: उपेक्षणीय समझे जाने वाले मानवीय सम्बन्धों और रिश्तों की भावपूर्ण दुनिया है । बाहरी संसार से बचता और बचाता,कर्इ-कर्इ दृश्य-अदृश्य मोचोर्ं पर एक साथ जूझता ,घरेलू वास्तविकताओं और समस्याओं का एक अलग प्रबन्धन इतिहास लिए-जो पारिवारिक और वैयकितक होते हुए भी समाज को सही समय पर सही ढंग से कुछ महत्वपूर्ण प्रदान करनें की सृजनात्मक क्षमता भी रखता है ।
       भारतीय सामाजिक यथार्थ को देखते हुए हिन्दी की आत्मकथाओं की नायिकाओं यानि लेखिकाओं को सामाजिक(परम्परागत) दाम्पत्य वाली महिलाओं और असामाजिक(स्वैचिछक या क्रानितकारी) दाम्पत्य वाली महिलाओं में बांटा जा सकता है । दोनो ही प्रकार के दाम्पत्य में पुरुष-सत्ता और प्रकृति का भिन्न रूप उभरता है । दोनों में से कौन सही है या गलत यह प्रश्न बेमतलब है । महत्वपूर्ण यह है कि दोनों में ही मानव-जीवन में लैंगिक व्यवहार के भिन्न प्रारूप और रिश्ते सामने आते हैं । अपरम्परागत ,क्रानितकारी अथवा असामाजिक दाम्पत्य में मन्नू भण्डारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी तथा प्रभा खेतान की आत्मकथा छिन्नमस्ता को रखा जा सकता है । यहां यह भी बता देना उचित होगा कि बंगाल में छिन्नमस्ता देवी का एक प्रसिद्ध मनिदर भी है । प्रभा खेतान को शीर्षक रखने की प्रेरणा इसी देवी के नाम से ही मिली होगी ,लेकिन पूरी आत्मकथा को पढ़ने के बाद मेरे पाठक मन के एकान्त में जो प्रभाव-जन्य भाष्य उभरा था वह परम्परा से अलग हटकर (यौन-)मस्ता नायिका का था । परम्परा से अलग हटकर यौन-व्यवहार का सहचर चुनने की जिद मन्नू भण्डारी और प्रभा खेतान दोनों में ही है । इस पथ के चुनाव में कहीं न कहीं जुनूनी आदर्शवाद मन्नू भण्डारी में रहा ही होगा ,ळयोंकि वे एक स्वतंत्रता सेनानी की बेटी रही हैं । सीमोन द बउआर जैसी जीवन की आकांक्षा वाली प्रभा खेतान नें अपना स्वदेशी सात्र्र एक गैर-विचारक विवाहित डाक्टर के रूप में ढूंढ़ निकाला और अपने उस महाप्रयोग की गाथा छिन्नमस्ता के रूप में हिन्दी जगत को दी । इन दोनों महिलाओं की आत्मकथा को मैं विवाह की अनिच्छुक महिलाओं की दाम्पत्य-त्रासदी के रूप में देखता हूं । इन दोनों विदुषी महिलाओं नें संभवत: रचनात्मक स्वतंत्रता की खोज में परम्परागत शतोर्ं में परम्परागत पुरुष की अधीनता स्वीकार नहीं की । दोनों ही एक सीमा तक बार्इ-पास दाम्पत्य को ही जीती रहीं । चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की आत्मकथा पिंजरे की मैना तथा मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुडि़या भीतर गुडि़या परम्परागत दाम्पत्य का स्त्री-विमर्श तथा पुरुष-पुराण प्रस्तुत करती हैं ।        हिन्दी की स्त्री-आत्मकथाओं को पढ़ते हुए एक बार फिर इस बात की पुषिट हो जाती है कि भारत में जाति व्यवस्था की सामाजिक अभियानित्रकी में मुख्य आधार प्रतिबनिधत स्त्री जीवन ही रहा है । अविवाहित जीवन-पर्यन्त तक उसका मुख्य कर्तव्य भावी पति ,परिवार और जाति के सम्मान के लिए अपने कौमार्य ,चारित्रिक शुद्धता और पवित्रता की रक्षा करना है । विवाह के बाद भी उसके संयम में पति की सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ाी है । 
         अब तक सामने आयी हिन्दी की महिला आत्मकथाओं में पुरुष-बन्धन के प्रति विद्रोह और प्रतिशोध का अचेतन परिणाम वह पर-पुरुषगामिता का आयाम नहीं जुड़ पाया है ,जो समाज में प्राय: देखने-सुनने को मिलता है । बहुत-सी कुलटा और छिनाल मानी जानी वाली सित्रयों की पृष्ठभूमि का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो कुछ रोचक सच्चाइयां सामनें आती हैं। सिर्फ यौन शुचिता ही नहीं बलिक सच्चार्इ ,र्इमानदारी, वफादारी आदि अनेक नैतिक-मूल्यों का विकास पूंजीवादी सभ्यता नें सम्पतित के उत्तराधिकार की समस्या से निपटनें के लिए ही किया है । पुरुष अपने श्रम से अर्जित सम्पतित को अपने वास्तविक जैविक उत्तराधिकारी  को ही सौंपना चाहता था । इसीलिए यौन-संयमी एवं सच्चरित्र सित्रयों का महिमामंडन बढ़ता गया और भारत में सती-प्रथा तक जा पहुंचा । यह दूसरी बात है कि एक पौराणिक चरित्र की स्मृति में विकसित सती और जौहर-प्रथा भारतीय शासक-वर्ग की सित्रयों में ही मध्ययुग में प्रचलित रही । पुरुष-प्रधान कबीलार्इ युग के सांस्कृतिक स्मृति-अवशेषों के कारण स्त्री का दर्जा पुरुष की सम्पतित का ही रहा । प्राचीन काल से ही स्त्री लूटी और कमार्इ जा सकती थी । जाति-निर्धारण में यधपि स्त्री की कोर्इ भूमिका नहीं थी ,लेकिन किसी पुरुष की निजी सम्पतित होनें के कारण उस पुरुष के मान-मर्दन के लिए परार्इ सित्रयों पर यौन-निष्ठा से विचलित करने वाले हमले जारी रहे । इस तरह सित्रयां मर्दानगी की दृषिट से जीत-हार का भी माध्यम रही हैं । नियनित्रत करने की सबसे आम प्रविधि डांट और भय ही रही है। विवाह पुरुष को अधिकार देता रहा है स्त्री पर शासन के लिए; लेकिन ऐसा तभी हुआ है जब सित्रयों को बाल्य-काल से ही शासित होनें का संस्कार भी मिला हो ।
      इस दृषिट यानि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिए मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुडि़या भीतर गुडि़या दिलचस्प तथ्य उपलब्ध कराती है । डाक्टर पति पुरुष-वर्चस्व की परम्परागत भूमिका में है ,इस बात से अनभिज्ञ कि जो विवाह उसनें किया है ,वह बचपन से ही पिता से वंचित युवती से है । पुरुष-नियन्त्रण से पूरी तरह मुक्त एक स्वाधीन स्त्री-प्रधान परिवार । मैत्रेयी को माता-पिता द्वारा पुरुष-प्रधान समाज के पति-पत्नी के रिश्ते की कोर्इ स्मृति ही नहीं है । पति अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण उसी रिश्ते को पाना और जीना चाहता है । लेखिका इस पति को समझनें के लिए मनोवैज्ञानक रूप से अयोग्य है । फलत: असुरक्षा का शिकार पति उसे नियन्त्रण में बनाए रखने के लिए हाफता और थकता रहता है । पूरी आत्मकथा में मैत्रेयी के लिए पति और दाम्पत्य एक दमनकारी कुणिठत कर देने वाली सत्ता की पराधीनता के रूप में सामने आता है । उनका अचेतन विद्रोह और प्रतिशोध की उस सीमा तक पहुंचते-पहुंचते ठिठक कर रह जाता है ,जहां सित्रयां प्रेम और मुकित के नाम पर अपने तानाशाह पति से बदला लेने के लिए दूसरे पुरुष की बाहों में समा जाती हैं । अपनी ही देह को दूसरों को सौंप कर कि मैं इसकी सम्पतित दूसरे पुरुष को सौंपकर उसे वंचित कर रही हूं । मैत्रेयी पुष्पा की प्रसिद्ध कहानी 'गोमा हंसती है के चरित्रों और कथावस्तु में तो नहीं बलिक लेखकीय दृषिट की पृष्ठभूमि में यह आक्रोश और प्रतिशोध का अचेतन झांकता हुआ देखा जा सकता है । इसतरह कुछ महिला साहित्यकारों की आत्मकथाएं असामान्य मनोविज्ञान की विश्लेषण सीमा में आने के कारण इस दृषिट-विशेष से भी महत्वपूर्ण हैं ।
          हिन्दी की स्त्री आत्मकथाओं में चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा 'पिंजरे की मैना कथावस्तु के बहुस्तरीय एवं बहुकालिक यथार्थ के कारण जीवन के विविध रंगों को अपने में समेटे हुए है । जिन विशेषताओं के कारण बेबी हालदार की 'आलो-आंधारि सराही जाती है ,उनमें सहज मासूम और र्इमानदार अभिव्यकित वाला गुण चन्द्रकिरण के यहां भी है । वह करुणा भी जो पुरुष-प्रधान समाज की ज्यादतियों को चुपचाप स्वीकार करते जाने के कारण पाठक के भीतर क्षोभ उत्पन्न करती जाती है -चन्द्रकिरण की आत्मकथा को एक अन्तहीन अनुत्तरित संभावना और संवेदनात्मक विस्तार देती है । इस सच के बावजूद कि उनके यहां बेबी हालदार वाला निम्नवर्गीय यथार्थ अवश्य नहीं है ,लेकिन एक अन्तहीन आर्थिक तंगी और उससे जूझते हुए जीतते रहना इस कृति को भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की महाकाव्यात्मक एवं औपन्यासिक स्त्री-आत्मकथा में बदल देता है । चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की आत्मकथा के वृत्त की परिधि मन्नू भंडारी और मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं की परिधि से विस्तृत है । उसमें जीवन के त्रासद परिसिथतियों की मार तो है ही ,आधुनिकता का प्रभाव ,जाति का अतिक्रमण, पारिवारिक कुलीनता की सृषिट तथा आर्थिक वर्ग बदलने के साथ-साथ नारी की प्रसिथति में अन्तर सभी कुछ एक साथ देखने को मिलता है । चन्द्रकिरण की आत्मकथा झांसी के पतन और उसमें किए गए अंग्रेजों के कत्लेआम से शुरू होती है । उनके प्रपितामह अं्रग्रज सैनिकों की लूट-मार में मार दिए जाते हैं । भयभीत महिलाएं बच्चों को लेकर पलायन कर जाती हैं । यहां तक कि अपने-अपने पति के मरनें की पुषिट भी नहीं कर पातीं । एक शरणार्थी बच्चे की जिजीविषा और संघर्ष को पूरे कथात्मक वृत्तान्त के साथ प्रस्तुत करती चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की यह आत्मकथा , अप्रत्याशित घटनाशीलता की दृषिट से सबसे रोचक और पठनीय आत्मकथा है-कम से कम इसका पूर्वाद्र्ध ।
       इसप्रकार चन्द्रकिरण सौनरेक्सा के वैयकितक जीवन को केन्द्र में रखकर लिखी गयी 'पिंजरे की मैना की परिधि समाज और इतिहास के चरम छोर को भी छूती चलती है । आत्मकथा को वंशावली के बहानें 1857 के विद्रोह में झांसी के पतन के बाद अंग्रज सेना द्वारा की गयी बर्बर लूट में मारे गए पड़बाबा के वृत्तान्त से आरम्भ करने के कारण उनकी यह आत्मकथा एक पारिवारिक एवं आत्मकथात्मक उपन्यास की रोचकता तो लिए हुए है ही ,इसमें महाकाव्यात्मक विस्तार ,संवेदनात्मक द्वन्द्व एवं गहरार्इ क अनेक अवसर एवं प्रसंग भी हैं । पात्रों का जीवन आर्थिक और सामाजिक विभीषिका में बार-बार दिशाहीन होता है,ठहरता है ,नर्इ संभावनाओं की तलाश करता है और सहानुभूति में डूबा हुआ पाठक का मन भी । मात्र सात और नौ वर्ष के दो बालक और आठ वर्ष की एक बालिका लिए जनसंहार में अपने-अपने पति के शव को लावारिस छोड़कर भागते शरणर्थी समूह के साथ अपनी जान बचाकर भागी दो विधवा सित्रयों की नियति और निर्णय के भविष्य में जन्म लेने वाली लेखिका का अतीत छिपा हुआ था । अपने मूल जन्मस्थान की दिशा (राजस्थान का नारनौल) छोड़कर आजीविका के लिए लाहौर पहुंचा परिवार आर्थिक सुरक्षा तो पा लेता है लेकिन अपने जातीय समाज की सुरक्षा खो बैठता है ।
       चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा अज्ञात नियति की ओर बढ़ रहे एक प्रवासी और शरणार्थी परिवार के र्इमानदार संघर्ष की ,मध्यवर्गीय जीवन की महागाथा है । आत्मकथा विप्लव में मारे गए बनिया के आठ वर्षीय बेटे गणेशीलाल के आर्थिक सुरक्षा के लिए र्इमानदार जीवन-संघर्ष और उनके लाहौर के प्रतिषिठत जमीदार परिवार बन जाने की विजयिनी जीवनगाथा से होती हुर्इ अनेक पारिवारिक उत्थान-पतन के सोपानों से गुजरती अंग्रेजी सेना में स्टोरकीपर पिता रामफल तक पहुंचती है । पिता रामफल की पहली विवाहिता ,जो जाति से ब्राहमणी थीं और उनकी मृत्यु के बाद दूसरी विवाहिता जो जाति से यादव-कन्या थीं और लेखिका चन्द्रकिरण की मां भी । इस आत्मकथा का भावी घटना-क्रम अपनी विशेष शरणार्थी या प्रवासी पृष्ठभूमि के कारण अन्तर्जातीय विवाहों की नियति की ओर मुड़ता जाता है । ऐसे सारे पात्र जो रूढि़वादी परम्पराओं की दृषिट से सामाजिक मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं ,ऐसे ही निर्णयों द्वारा अपने अभिशप्त जीवन से मुकित का रास्ता खोजते हैं । कोर्इ भयानक गरीबी और दहेजप्रथा से मुकित के लिए तो कोर्इ बालविधवा हो जाने के अभिशाप से मुकित के लिए ।  आर्थिक दबाव या फिर आर्थिक सुरक्षा का आकर्षण विवाह के लिए जाति-बन्धन को शिथिल करते हैं । सिर्फ कुछ बेहतर घट जाने की संभावनाओं की आस्था के भरोसे यह आत्मकथा और उसके पात्र जीवन की अगली यात्रा जारी रखते हैं तो पुरुष के आधार पर जाति का निर्धारण करनें की परम्परा उन्हें फिर अपनी जाति में समाहित भी कर लेती है । स्वयं वैश्य परिवार की लेखिका का विवाह भी कायस्थ-पति कानितचन्द्र सौनरेक्सा से हुआ । आत्मकथा का यह पक्ष 'पिंजरे की मैना आत्मकथा को समाजशास्त्रीय अध्ययन की दृषिट से भी महत्वपूर्ण बना देता है । लेखिका के कथाकार बनने के पीछे उसकी पढ़ाकू-वृतित के साथ-साथ वंश की समृद्ध एवं अप्रत्याशित स्मृतियां भी निर्णायक भूमिका में हैं ।
         अपनी गौरवपूर्ण किन्तु असामान्य विशेष पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण ही एक निष्पक्ष एवं क्रानितकारी लेखकीय विवके तथा सामाजिक अन्तदर्ृषिट चन्द्रकिरण सौनरेक्सा केलेखन की विशेषता है । जाति-निरपेक्षता की पारिवारिक स्मृतियां ,आजीविका के लिए बि्रटिश नौकरशाही का जीवन-स्तर, लड़के-लड़कियों को समान रूप से शिक्षा प्रदान करने पर बल तथा सुधारवादी आर्यसमाजी संस्कार लेखिका के चेतन-अचेतन प्रारमिभक व्यकितत्व-निर्माण की दृषिट से अत्यन्त महत्वपूर्ण है । चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की यह पृष्ठभूमि ही उनकी आत्मकथा को दूसरी अन्य स्त्री आत्मकथाओं से अलग और विशिष्ट करती है । यधपि एक आम भारतीय मध्यवर्गीय स्त्री से अलग होनें का लेखकीय दावा वे कहीं नहीं करतीं । उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि वैसे भी अगर कोर्इ मेरी जीवन-यात्रा को समेटना चाहे तो वह घर-नौकरी-घर के चक्र में ही समाप्त हो जाएगी -क्योंकि तीन-तीन लड़कियों को घ्यान के साथ-साथ बड़ी गृहस्ती ,पूरे संयुक्त परिवार की बड़ी बहू का उत्तरदायित्व निभाने का बीड़ा उठाये चलाना बच्चों का खेल नहीं था ।(पिंजरे की मैना,पृ0380) उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ''आत्मकथा को यदि प्रतिदिन का रोजनामचा बना लिया जाये तो उसके विस्तार का कोर्इ अन्त नहीं रहेगा और मैंने विस्तार को किसी साहितियक-कृति की महानता का मानदण्ड नहीं माना । हमेशा की तरह बिना किसी लाग-लपेट के ,सीधी-सच्ची ,दिल से निकली बात को दिल तक पहुंचाने की कोशिश की है । बस इतना-सा अंतर मेरी कृतियों और इस आत्मकथा में है  किवे जगबीते थीं और यह आपबीतीं हैं ।(पिंजरे की मैना,पृ0 415)'आत्मकथा का केवल एक उददेश्य होता है अपनी जीवन-यात्रा का ,निष्पक्ष दर्शक की तरह पुनरावलोकन करना । 'पिंजरे की मैना उसी का फल है ।(वही,पृ0 415)
      पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वाह और कर्तव्य भावना से भरी चन्द्रकिरण की आत्मकथा जीवन की उथल-पुथल ,राग-द्वेष और यश-अपयश से रची-बुनी है । उसमें अपने बेवफा पति के लिए भी ममत्व एवं करुणा है । उससे यह बात भी उभर कर आती है कि परिवार जीवन की एक अपरिहार्य मूलभूत संस्था है ,वह अपने सदस्यों के असितत्व के लिए प्रेम के साथ या फिर प्रेम के बिना भी समर्पण एवं निष्ठा की मांग करती है । पिंजरे की मैना की तरह ही परिवार को बचाने के पक्ष में दाम्पत्य सम्बन्धों में स्वैचिछक यातना के वरण के प्रसंग मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा 'गुडि़या भीतर गुडि़या तथा मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी को भी महत्वपूर्ण बनाते हैं ।
         मेरी सीमा यह है कि मैं यौन-आसकित की मानसिकता जीने वाले लेखन का एक अच्छा और र्इमानदार पाठक कभी नहीं रहा हूं । यधपि यौन-हारमोनों से आच्छादित मन-मसितष्क आयु-विशेष की एक अपरिहार्य सच्चार्इ है । पुरुष-मन तो अपनी देह-प्रकृति के कारण देर तक लम्पट बना रहता है लेकिन स्त्री-शरीर के समयबद्ध कार्यक्रम के कारण एक आयु के बाद दुष्चरित्र सित्रयां भी शान्त और शालीन लगनें लगती हैं । एक और तथ्य का साझाा करना उचित होगा कि पाठयक्रम में समिमलित मैत्रेयी पुष्पा की प्रसिद्ध कहानी 'गोमा हंसती है को मैं ठीक से पढ़-पढ़ा नहीं पाया । वे एक ऐसे परिवार और परिवेश से आयी हैं ,जो कि्रयाओं ,वर्जनाओं ,चर्चाओं और मानसिकता में पूरी तरह यौनिकताजीवी ही रहा है । पता नहीं यह कृष्ण का प्रभाव है या मुगल सभ्यता के केन्प्द्र आगरे के समीपवर्ती होने का या कि डकैतों के उत्पादन के लिए मशहूर बुन्देलखण्ड का कि मैत्रेयी पुष्पा के स्मृतियों वाले गावों मेंं ग्रामीण समाज में पायी जानें वाली वह धार्मिकता कम दिखती है जो कर्इ अ्रचलों में ग्रामीण परिवेश को सेक्स और अपराध से विरत रखती है । मैत्रेयी का लेखन सूक्ष्म निरीक्षण शकित, आंचलिक मौलिकता और गहरी संवेदनात्मकता के साथ साहसिक होनें के कारण निश्चय ही ध्यान आकर्षित करता है लेकिन यह भी सच है कि रुचि के स्तर पर जब तक उनका मन भर नहीं जाता या फिर उनकी यौन-स्मृतियों का खजाना खत्म नहीं हो जाता ; तब तक उनका एक-एक शब्द यौन-अतृपित और सेक्स हारमोन से लिथड़ा-लिथड़ा लगता है । यौनजीवी रुचि और मानसिकता के कारण कुछ-कुछ ऐसी ही अनुभूति मुझे काशीनाथ सिंह की भी कुछ कहानियां पढ़कर होती है । (यह लिखते हुए मैं हिन्दी आलोचना में किसी लेखक की रुचि के प्रश्न को भी मूल्यांकित करने की प्रस्तावना कर रहा हूं । यथार्थ और शोषण के चिन्तन के नाम पर यौनिकताजीवी चित्रण राहुल सांकृत्यायन से लेकर स्त्री विमर्शवादी कुछ महिला साहित्यकारों तक भी देखे जा सकते हैं । साहित्य-लेखन एक सचेतन क्रिया है । दुर्घटनात्मक,अवांछित और आपराधिक स्मृति का सच के नाम पर भारी मात्रा में निवेश यदि भावी समाज की चिन्ता से मुक्त रहकर किया जा रहा हो तो ऐसे लेखन को साहितियक अपराध मानकर उसका आलोचनात्मक प्रतिरोध करना ही होगा । ) उनकी 'महुआचरित कहानी पढ़ते समय भी कुछ-कुछ वैसा-वैसा ही महसूस करता रहा । यधपि इसमें सन्देह नहीं कि महुआचरित एक बहुत ही अच्छी कहानी है । उच्च्स्तरीय अभिव्यकित-क्षमता के बावजूद मैत्रेयी का काफी लेखन मुझे यौनजीवी मानसिकता के उत्पाद लगते हैं । उनका लेखन यौन-सरोकारों और चिन्तन से बाहर निकल ही नहीं पाता । 
       मैत्रेयी पुष्पा के स्त्री-विमर्श में घुसनें से पहले मैं अपनी समझदारी के एक अन्तरंग पक्ष को साझाा करना चाहूंगा । पहली यह कि आपराधिक जीन स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से मिलते हैं । हां ,स्त्री के अपराध करने का तरीका भिन्न हो सकता है ,लेकिन मानव-जाति में गुण्डा-गुण्डी दोनों ही समान रूप् से जन्म लेते हैं । पुरुषों की तरह कर्इ प्रेम-शिकारी वृतित वाली महिलाओं को भी देखा है । अपने दवंग व्यकितत्व के कारण ऐसी महिलाएं पहले अपने पिता या पति को हठपूर्वक जीतती और पराजित करती हैं और फिर दूसरों या पूरे समाज को जीतने या पराजित करने निकल पड़ती हैं । फिर तो वे एक व्यसन के रूप में पुरुषों को जीतने के लिए निकल पड़ती हैं ,ऐसे ही कुछ पुरुष भी दूसरों के वैवाहिक जीवन को दूषित कर चारित्रिक आक्रामकता में ही अपनी मर्दानगी का प्रमाणपत्र बटोरते रहते हैं । यह असितत्व की सार्थकता,स्वीकृति और उसके परीक्षण का मामला है । एक प्रतिस्पद्र्धी और हिंसक मन अगल-बगल तांक-झांक करता रहता है । कुछ लोगों का परिवार बिखरता है ,कुछ टूटते-फूटते हैं , कुछ शराब पीने लगते हैं और कुछ आत्महत्या कर लेते हैं । जैसे पुरुष स्त्री जीवन और मर्म को नहीं समझ पाता ,वैसे ही स्त्री पुरुष-मन के उस अन्तद्र्वन्द्व को कहां समझ पाती है । कुछ दिनों पूर्व एम्स में ही कार्यरत एक सुन्दर महिला डाक्टर केाक्टर पति नें आत्महत्या कर ली थी । स्वाभाविक है कि सुन्दर पत्नी अपनी सुन्दरता की सामाजिक -सार्वजनिक प्रतिष्ठा भी चाहेगी । सहकर्मी देवरों में उसके मन को जीतने की होड़ लग गयी होगी । समीप की ऐसी उपसिथतियां एवरेस्ट शिखर बन जाती हैं । अगर पति सामाजिक रूप् से अधिक सज्जन हुआ या अपने मित्रों से उसके रिश्ते अधिक अन्तरंग और जटिल हुए कि वह खुल कर मित्रों को मना न कर सके तो वह पत्नी से ही अपेक्षा करेगा कि यह कार्य वही कर दे । मैं देखता हूं कि मैत्रेयी से भी उसके पति नें ऐसी ही अपेक्षा की होगी । इसीलिए बच गए । अन्यथा एम्स के ही इस दूसरे केस में कम संवेदनशील डाक्टर पत्नी के कारण उसके डाक्टर पति ने ंतो आत्महत्या ही कर ली थी ।
     स्त्री-विमर्श वाले दौर में प्राय: यह देखता हूं कि सांस्कृतिक-सामाजिक या फिर कानूनी रूप् से स्थापित मान्यता-प्राप्त अधिकारों के प्रति जब विद्रोह शुरू होता है तो सारे हमले उस पति-पुरुष पर होने लगते हैं ,जो उन मूल्यों का प्रतिनिधि और प्रतीक मात्र ही होता है । मैत्रेयी की आत्मकथा पढ़ते समय मैं बार-बार ऐसा सोचता रहा कि मुकाबला बराबरी का नहीं चल रहा है । लेखिका पत्नी का पक्ष तो पाठक के सामनें है ,लेकिन जैसे वास्तविक जीवन में मैत्रेयी पत्नी के रूप में समाज से छिपी रहीं, एम्स के डाक्टर पति की गुमनाम पत्नी की तरह ही पाठकों के लिए उनके डाक्टर पति का पक्ष भी अनुपसिथत है । यहां वे भी एक गुमनाम आम पति हैं । जब मैत्रेयी अपने पति के मित्र डा0 सिद्धार्थ के साथ अन्तरंग समर्पण प्रदर्शित करने चाला नृत्य कर रही थीं तो हो सकतेा है कि यह किसी भाभी का अपने कुंवारे धर्म-देवर के प्रति करुणा ही रही हो । क्योंकि आत्मकथा यह नहीं बताती कि डा0सिद्धार्थ को पत्नी भी थी या नहीं । अपनी पत्नी को परपुरुष के साथ उत्तेजक नृत्य करते देख सामाजिक और मानसिक दृषिट से यह पाठकीय जिज्ञासा भी उठती है कि  इसी समय मैत्रेयी के पति भी सिद्धार्थ की पत्नी के साथ नृत्य कर लेते तो स्वस्थ हो जाते । जीवन और आत्मकथा में ऐसे मोड़ आने पर ही यह स्पष्ट हो पाता कि धर्म-देवर डा0 सिद्धार्थ उस सीमा तक खुलकर मित्र की पत्नी के साथ जा पाते या नहीं या फिर अपने मित्र की पत्नी के साथ अपने डाक्टर पति को भी नाचते देखकर स्वयं भावी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को कैसा लगता ? इसतर इस आत्मकथा रूपी तराजू में सिर्फ एक ही पलड़ा है जिस पर स्वयं लेखिका बैठी हुर्इ है । पति वाले पलड़े की रस्सी ही टूटी हुर्इ है और वह परिदृश्य से पूरी तरह गायब या अनुपसिथत है ।
     मैत्रेयी को भी पढ़ते समय पाठक-मन को सबसे अधिक असुविधा वहां होगी जहां एक पक्ष तो संयम और निष्ठा प्रदर्शित कर रहा है और उसके आधार पर वैसा ही संयम और निष्ठा अपने वैवाहिक साझेदार से भी मांगता है । पत्नी के प्रति अपने समर्पण और संयम के कारण ही मैत्रेयी के पति किसी स्त्री-विमर्श के काल्पनिक पुरुष-पात्र की तरह पुरुष-उत्पीड़न के आदर्श प्रतीक नहीं बन पाते , न ही उन पर कोर्इ गम्भीर आरोप ही बनते दीखता है । उनका पति एक ऐसा मासूम अपराधी डाक्टर पति है जो एम्स में व्यस्त नौकरी करता हुआ ,मरीजों की दुनिया में अपनी आजीविका के लिए खोया सिर्फ इतने से ही आश्वस्त है कि वह अपनी पत्नी और बेटियों के लिए ही नौकरी कर रहा है । संभवत: अपने इसी समर्पण के कारण ही मैत्रेयी अपनी मां जैसी जिन्दगी जीने का सपना छोड़ देती हैं । वे विद्रोह नहीं कर पातीं । लेकिन उनके पास कुछ ऐसा अतिरिक्त प्रतिभा के रूप में है , जिसे बेटियां जिनमें उनका अपना भी जीन है ,जान और पहचान लेती हैं लेकिन उनके पति नहीं जान पाते । वे उनकी प्रतिभा पर एक बड़े अभिभावक पत्थर की तरह पड़े रहते हैं । इस दृषिट से मैत्रेयी का अंकुरण बहुत मार्मिक है । उनकी आत्मकथा के माध्यम से सित्रयों के उपेक्षित मानसिक संसार का ऐसा लोक सामनें आता है ,जो उनके पति की ही भांति पुरुष-प्रधान व्यवस्था में पला-बढ़ा भारतीय पुरुष शायद ही सोच पाए । मेरा सुझाव तो यह भी है कि मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुडि़या भीतर गुडि़या को भारतीय पतियों के लिए एक अनिवार्य पायपुस्तक घोषित कर देना चाहिए और हो सके तो नव-विवाहित पतियों को उपहार स्वरूप् भेट देनी चाहिए । कहीं ऐसा न हो कि जिसे वे एक पत्नी वस्तु के रूप में जीने जा रहे हों , उसमें कोर्इ मैत्रेयी छुपी बैठी हो और जिसकी प्रतिभा से समाज वंचित रह जाए । समाज के लिए तो हम गौतम बुद्ध द्वारा यशोधरा को ,राम द्वारा सीता को, सुभाषचन्द्र बोस द्वारा अपनी पत्नी को छोड़ा जाना बर्दाश्त कर लेते हैं और उन्हें क्षमा कर देते है। महादेवी वर्मा का भी साहित्य-सृजन के लिए शिशु-सृजन से विरत रहना अलग से पाठकीय श्रद्धा की मांग करता है । फिर मैत्रेयी जैसी प्रतिभा के लिए ,यधपि उन्होंने महावीर स्वामी की तरह लम्बी प्रतीक्षा क बाद ,परिवार के दायित्वों से मुक्त होकर ही लेखन में कदम बढ़ाया ,काफी प्रशंसनीय है और उनके संघर्ष के प्रति सम्मान का भाव जगाता है ।
        मैत्रेयी की आत्मकथा पाठकों के सामनें भी यह प्रश्न रखती है कि उनके पति उनके भीतर के कुछ को क्यों नहीं पहचान पाए ! जो अनुमान मैं लगा पाता हूं वह यह कि वे मैत्रेयी से विवाह कर उपकृत करने के भाव और अहंकार को जीते रहे होंगे । एक पिता-विहीन ग्रामीण क्षेत्र की कन्या से विवाह ,वह भी बिना दहेज लिए ,सिर्फ उच्चशिक्षित होने के कारण ,यहां तक कि सौन्दर्य के धन से भी वंचित ,जिसकी हीनता ग्रनिथ को लेखिका भी बार-बार अनेक अवसरों पर व्यक्त करती है-एक सीमा तक उनके पति की प्रगतिशील छवि भी सामनें लाती है । उन्होंने अपने ढंग से मैत्रेयी पुष्पा को समय से पहले पहचाना ,भले ही अपनी पत्नी बनाने के लिए ही सही-इस चुनाव के लिए ही सही मैं मैत्रेयी पुष्पा से असहमत होते हुए ,मर्दवादी पक्षधरता के आरोप के खतरे के बावजूद उनके पति का प्रशंसक होना चाहूंगा । हां,मैं उनको एक तानाशाह दुनियादार तंग-दिल पति अभिभावक भी अवश्य कहना चाहूंगा । मैत्रेयी के प्र्रति एक सतर्क प्रेमी पति का रूप वहां दिखता है जहां वे दिल-दुर्बल मित्रों और पत्नी को चारित्रिक स्खलन की भावी दुर्घटना से बचानें के लिए चुपचाप हास्टल छोड़कर किराए का मकान तलाशने निकल पड़ते हैं । एक ऐसी पत्नी ,जिसकी मां सार्वजनिक सेवा में होने के कारण भांति-भांति के पुरुषों से पेशे की आवश्यकता के कारण सहज रूप से मिलती हो । मैत्रेयी की अबोधता भी समझ में आती है और यह भी कि पति के सहकर्मी सामाजिक देवर डा0 सिद्धार्थ के प्रति ही सही ,उनके विवाहेतर आकर्षण का उनके व्यकितत्व निर्माण में अत्यन्त महत्व रहा होगा । यह एक अचेतन विद्रोह के रूप में भी हुआ होगा । उनसे विवाह कर पति ने जो एहसान किया था ,उस घमण्ड को चुनौती देकर उसे सुरक्षात्मक मोड में ला देना फिर संयमित जीवन जीकर स्वयं अपने पति पर एहसान लाद देना कि 'देखो! मैं नहीं भागी न ? मैत्रेयी के इस विवाहेतर प्रभाव-प्रसंग ने उन्हें उस हीनता ग्रनिथ से भी मुकित दी होगी जो सजने-संवरने वाली सित्रयों से कम आकर्षक होने के बोध के रूप् में उनके व्यकितत्व को कुणिठत कर रही थी । यह उनके दाम्पत्य के लिए काफी सन्तुलनकारी रहा होगा । अन्तत: प्रेम किसी के असितत्व और व्यकितत्व के महत्व की अन्तरंग स्वीकृति ही तो है ।  अपने इस मनोवैज्ञानिक नजरिए के कारण मैत्रेयी पुष्पा और उनके पति से एक साथ सहमत होने के कारण संभव है कि मेरा विश्लेषण प्रचलित-प्रायोजित नारीवाद के अधिक समीप न हो , लेकिन मानवीय चरित्र की र्इमानदार विशेषज्ञता वाला अवश्य होगा ।  
           स्त्री-मुकित और विमर्श की दृषिट से मैत्रेयी की पूर्ववर्ती आत्मकथा'कस्तूरी कुण्डल बसै समाजशास्त्रीय विश्लेषण की दृषिट से भी अधिक महत्वपूर्ण है । उसमें भारतीय सामाजिक विकास की ऐतिहासिता भी सुरक्षित है । यह वह दौर है तब शिक्षित होने की कीमत अनेक सित्रयों को अविवाहित रहकर ही चुकानी पड़ी है । अपनी बेटियों को शिक्षित देखने वाले अभिभावक एक क्रानितकारी जोखिम से गुजरते थे । मैत्रेयी की मां कस्तूरी भी इसी जोखिम से जूझती रहती है । प्रतिबनिधत ,सशर्त या सीमित स्वतंत्रता ही भारतीय समाज आधुनिकता के बावजूद सित्रयों को दे पाया है । इसका बहुत कुछ श्रेय रामकथा के साथ-साथ मुसिलम समाज का भी है । पाश्र्व-प्रभाव के स्तर पर अन्य सम्प्रदायों की सित्रयां भी व्यकितत्व और अर्थ की स्वतंत्रता के बावजूद एक सीमा से अधिक छवि की स्तंत्रता को नहीं जी पातीं ।
         यह अजीब है कि आधुनिकता और माक्र्सवाद के प्रभाव से भारत में सबसे पहले जाति-विमर्श और स्त्री-विमर्श के व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही दलित-विमर्श भी आना चाहिए था । कारण कि तीनों उतनें असम्बद्ध नहीं हैं जितनें प्रतीत होते हैं । भारत में सम्पतित से अधिक जाति संस्था की सुरक्षा के लिए ही स्त्री को प्रतिबनिधत किया गया है । पुराणों में उन्मुक्त सित्रयों के अनेक चरित्र मिलते हैं । सती ,पार्वती ,रूकिमणी, गंगा और आम्रपाली आदि अनेक चरित्र प्राचीन प्रेम विवाहों की स्मृतियां संजोए हैं । लेकिन बाद में जैसे-जैसे जाति-प्रथा जड़ जमाती गयी स्त्री-बन्धन वाले शास्त्र भी बढ़ते गए । जाति की शुद्धता और स्त्री की पवित्रता दोनों ही अवधारणाएं एक-दूसरे की पूरक और पर्याय बन गर्इं । संभवत: यही कारण है कि मैत्रेयी पुष्पा और दोहरा अभिशाप की दलित आत्मकथा लेखिका कौशल्या बैसंत्री की पीड़ा में कोर्इ विशेष अन्तर दिखार्इ नहीं देता । दोनों के ही आशय और निष्कर्ष की मनोभूमि प्राय: समान है- ''पुरुष-प्रधान समाज औरतों का खुलापन बरदाश्त नहीं करता । पति तो इस ताक में रहता है कि पत्नी पर अपने पक्ष को उजागर करनें के लिए चरित्रहीनता का ठप्पा लगा दे । पुत्र,भार्इ,पति सब मुझ पर नाराज हो सकते हैं ,परन्तु मुझे भी तो स्वतंत्रता चाहिए कि मैं अपनी बात समाज के सामनें रख सकूं । मेरे जैसे अनुभव और भी महिलाओं को हुए होंगे , परन्तु वे समाज और परिवार के भय से अपने अनुभव समाज के सामनें उजागर करनें से डरती और जीवन भर घुटन में जीती हैं । समाज केी आंखें खोलनें के लिए ऐसे अनुभव सामनें आनें की जरूरत है ।(दोहरा अभिशाप ,परमेश्वरी प्रकाशन,दिल्ली,1999,पृष्ठ 7)
         परम्परागत सामाजिक यथार्थ के रूप में देखें तो आर्थिक दबाव में परिवार चलाने के लिए महिला-श्रम की आवश्यकता के कारण दलित जातियों में पुरुष-नियन्त्रण प्राय: ढीला-ढाला ही रहा है । वे खेत में साथ-साथ काम करते और दूकान चलाते देखी जा सकती थीं । आजीविका के लिए पति पर अधिक निर्भर नहीं रहनें के कारण कर्इ बार कर्इ-कर्इ पति बदल लेती थीं । कुछ-कुछ वैसा ही जैसा आज कल आधुनिका योरोपीय सित्रयां करती दिखार्इ पड़ती हैं । उच्चशिक्षित और उच्च-पदस्थ होनें पर कौशल्या बैसंत्री के पति देवेन्द्रकुमार नें प्रसिथति परिवर्तन के बाद उच्च-वर्ण में मिलनें वाले पतित्व को जीना चाहा होगा ,जबकि कौशल्या बैसंत्री के संस्कार और स्मृति इसके विपरीत थी । यहां देखा जाए तो मैत्रेयी को जो स्वतंत्रता पितृविहीन होने के कारण स्वाभाविक रूप से मिल गयी थी ,कौशल्या बैसंत्री नें उसे दलित जाति में जन्म लेने के कारण सहज रूप में ही एक स्मृति और संस्कार के रूप में प्राप्त किया था । पुरुष-प्रधान समाज के अनुभव होने ंके कारण ही भारतीय स्त्री का यह यथार्थ आम लगता है जो कि तेलगु दलित नारीवादी कवयित्री शशि निर्मला नें अपनी कविता में की है-'कहते हैं कोर्इ मुझे बना कर पीढ़ाखींच-खींचकर बैठेगेंडालकर नकेलमुझे हाकेगे-नचाएंगे(आधुनिकता के आर्इनें में दलित,सं0अभय कुमार दुबे,पृ0240 पर उदधृत)। इस तरह विमर्श के केन्द्र में जाति-सत्ता और पुरुष-सत्ता का वर्चस्व ही है। पुरुष-तंत्र की असली चिन्ता यह है कि स्त्री स्वतंत्र होगी तो सिर्फ पुरुष की अधीनता को ही अस्वीकार नहीं करेगी बलिक जाति की अधीनता को भी अस्वीकार करेगी ।
     विमर्श को उत्तेजित करने की क्षमता के आधार पर देखें तो मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी अधिक शिष्ट,संयमित और शालीनता से लिखी जाने के कारण कम उपयोगी है । फिर भी वह नर्इ कहानी युग के साहितियक परिवेश की ऐतिहासिक स्मृति को संरक्षित करने के कारण ,राजेन्द्र यादव ,मोहन ,राकेश ,कमलेश्वर और स्वयं मन्नू भंडारी के जीवन और संस्मरण को संरक्षित करने के कारण महत्वपूर्ण 
है ।  मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी नर्इ कहानी आन्दोलन के दौर के अति-महात्वाकांछी साहितियक परिवेश के साथ-सााथ मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव के समस्यात्मक दाम्पत्य के बीच मीता की त्रयी के माध्यम से सृजनात्मक महत्व के कर्इ खुलासे भी करती है । तनाव में ही सही मन्नू जी नें अपनी कर्इ खदानों के नाम-पते उजागर कर दिए हैं ,जहां की संवेदना रूपी पत्थरों से उन महान कृतियों की रचना हुर्इ है । यदि समय के साथ सारे प्रकरण खुलकर सामनें आते नही ंतो पता भी नहीं चलता कि मन्नू भंडारी अपने रचना-स्रोतों को छिपाने की कला में कितनी माहिर हैं । उनकी कहानी 'यही सच है को पढ़े और उनकी आत्मकथा को भी तो पता चलता है कि उस कहानी की नायिका तो उनकी आत्मकथा के नायक राजेन्द्र यादव ही हैं । सिर्फ लिंग और नाम का परिवर्तन किया गया है । इसी तरह उनकी बेटी को कलकत्ता भेजनें के प्रसंग से 'आपका बण्टी का सम्बन्ध देखा जा सकता है ।
    आत्मकथा में रेखांकित उनके समस्यात्मक दाम्पत्य जीवन को विश्लेषित करें तो मनोवैज्ञानिक तथा चारित्रिक दृषिट से प्रेम में माता और मीता को पानें का द्वन्द्व भी लगता है । मन्नू जी में राजेन्द्र यादव के प्रति करुणा ,वात्सल्य और मातृत्व भाव ज्यादा दिखता है । हंस में अपनी प्रसिद्धि का लक्ष्य पा लेने के पूर्व तक राजेन्द्र यादव की महत्वाकांक्षा के लिए मन्नू जी साहितियक प्रसिद्धि का सर्वोच्च लक्ष्य-शिखर रही हैं । राजेन्द्र यादव का यह प्रेम संरक्षण और सुरक्षा को तलाशने वाला प्रेम है । विवाह के पूर्व मन्नू जी राजेन्द्र यादव को बार-बार आश्चस्त भी करती रहती हैं । जाहिर है कि प्रसिद्धि के शिखर के स्तर पर मीता उनकी बराबरी नहीं कर सकती थी । मन्नू जी अपनी जीवन-कथा में इस बात के लिए सन्तोष कर सकती हैं कि राजेन्द्र यादव का पुरुष अहं कर्इ बार अपना वियर्जन करके उनके आगे-पीछे दुम हिलाता हुआ समर्पित हुआ । लेकिन अलग रहकर भी यदि क्षमा-भाव को ही जीना था तो बेहतर होता कि राजेन्द्र यादव के साथ ही रहतीं । उनकी आत्मकथा को पढंकर ऐसा प्रतीत होता है कि दुर्घटना में विकलांग हो चुके राजेन्द्र यादव के लिए मन्नू भंडारी हमेशा वैसाखी की भूमिका में ही रही हैं । इन दिनों राजेन्द्र यादव की चल रही है और वे हंस के सहारे दौड़ ही नहीं रहे हैं बलिक उड़ रहे हैं लेकिन मन्नू भंडारी की वात्सल्यमयी प्रकृति को देखें तो यदि आज राजेन्द्र जी किसी प्रकार लडखड़ानें लगें तो वे तुरन्त सारे गिले-शिकवे भूलकर राजेन्द्र यादव के पास पहुंच जाएगीं । ऐसा मुझे लग रहा है । क्यों लग रहा है ,इसका कारण यह है कि बड़ी और संवेदनशील प्रतिभाएं प्राय: अकेली होनें के लिए अभिशप्त होती हैं और सिर्फ अपने अह ंके कवच में ही स्वस्थ रह पाती है। मुझे यह भी लगता है कि अभी के अलगाव का निर्णय मन्नू भण्डारी के साहितियक स्वाभिमान के विज्ञापन की आवश्यकता से भी उपजा है । यह भी कि अपने विचित्र वात्सल्यमयी प्रेम के कारण ही वे राजेन्द्र यादव को कुण्ठाओं से मुक्त जीवन जीनें देने के लिए या यह कहें कि खुलकर चरनें देनें के लिए उनके रास्ते से हट गयी हैं । इसके बावजूद मुझमें मन्नूजी के विवेक में ही भरोसा है । राजेन्द्र यादव ,मन्नू भंडारी और रहस्यमयी मीता का त्रिक प्रेम-सम्बन्ध कुछ अधिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की मांग करता है । मुझे उनकी मीता की जाति का पता नहीं है लेकिन यदि वे भी राजेन्द्र यादव जी की जाति से नहीं हैं तो जाति से बाहर प्रेम और सेक्स-सम्बन्ध ढूढ़ने ंके लिए उनका प्रगतिशील और क्रानितकारी प्रेमियों के रूप में अभिनन्दन किया जा सकता है । मन्नू भंडारी नें जब राजेन्द्र यादव के प्रणय-निवेदन के बाद उनसे विवाह का निर्णय लिया था तो वे कं्रानितकारी पिता से प्रेरित एक क्रानितकारी विवाह के निर्णय की आत्ममुग्धता को भी जी रही थीं । उच्चशिक्षित होने के कारण वे सहारा बन सकती थीं, दे सकती थीं ,सहारा लेना उनके स्वाभिमान की प्रकृति में नहीं हैं । अपनी आत्मकथा में भी वे एक शालीन महिला की तरह ही सामनें आती हैं । यदि वे आत्मनिरीक्षण करें तो एक असामान्य ग्रनिथ की सम्भावना उनमें हो सकती है । उनके चेतन और अचेतन मन के लिए जैसे परावलमिबत राजेन्द्र ही अधिक सुविधाजनक रहा है । यदि ऐसा है तो राजेन्द्र यादव एक अप्रकट अहंकार का दंश अवश्य झेलते रहे होंगे । एक बड़प्पन का प्रभामण्डल जिेसे वे अतिक्रानन्त नहीं कर पाये । समवत: इसीलिए राजेन्द्र यादव के सम्पूर्ण आत्मविश्वास एवं व्यकितत्व की मुकित के क्षण मन्नू भंडारी से अलगाव में ही घटित होते हैं । क्योंकि वे भी मनुष्य हैं इसलिए उनमें भी र्इष्र्या की गुंजाइश के रूप में देखा जा सकता है । इस सच के बावजूद मुझे साफ-साफ दिखता है कि अपने दाम्पत्य-जीवन की अधिकांश .त्रासदियों के लिए वे लगभग नहीं जिम्मेदार हैं । उन्होंने तो पूरे जोश में एक महान निर्णय के रूप में असुविधाओं से घिरे राजेन्द्र यादव से शादी की थी । फिर इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कौन है ? राजेन्द्र यादव ? आत्मकथा बताती है कि त्रासदी मीता के विवाह से इन्कार कर देने और प्रेम पत्रों को वापस भेज देने से ही शुरू होती है । मीता की एक रहस्यमय आक्रामक प्रेम शैली । देखना यह है कि हमारा भी प्रिय साहितियक नायक फुटपाथ पर है । समय में सुन्दरता के मापदण्ड से प्रथम कोटि की पाठिकाएं-पें्रमिकाएं मोहन राकेश को गयी होंगी । क्योंकि वह समय उनकी ही प्रमुखता का था । हमारा नायक भविष्य का नायक है-कुछ-कुछ नेहरू के बाद के लालबहादुर शास्त्री जैसा । प्रेम के लिए भटकता नायक मीता तक प्रणय-निवेदन के साथ पहुंचता है। दो वरिष्ठ नायकों मोहन राकेश और कमलेश्वर की प्रतिस्पद्र्धा में मन्नू भंडारी का स्वावलम्बन से अर्जित यश और उनकी प्रापित ही हमारे साहितियक नायक को हीनता ग्रनिथ से उबार सकता था । संकोची व्यकितत्व के कारण आत्मकथा की नायिका अनारम्भी रही होगीं और प्रेम में पहल न करने वाली होने से संभवत: राजेन्द्र यादव को भी पहले विश्वास नहीं रहा होगा कि मन्नू एक दिन पूरे विश्वास के साथ उनसे विवाह का निर्णय कर लेंगी । इस असमंजस में नायक अपने प्रेम का वैकलिपक तलाश जारी रखता है । शायद मीता नें जब अपने मानवद्र्धन के लिए उनके प्रेम-पत्र लौटाए थे तो उसे लगा होगा कि मन्नू जी उसके अखाड़े में नहीं उतरेंगी । मन्नू जी की स्वीकृति की सूचना मात्र से तिरस्कृत नायक उसे अतिमहत्वपूर्ण लगने लगता है । वह पेम के अखाड.े में पुनर्वापसी का असफल प्रयास करती है । समय से जूझते नायक की लाटरी निकल चुकी है । वह एक ऐसा सहयात्री व्यकितत्व पा चुका है जिसकी उसे उम्मीद नहीं थीं । उसे छोड़नें का तो सवाल ही नहीं उठता जी ! 
           अब भी एक रहस्य बचा हुआ है कि त्रासदी कहां से शुरू होती है । मेरी दृषिट में रहस्यमयी मीता का आत्महन्ता देवदासी प्रेम ही वह प्रमुख कारक है जो हमारे साहितियक नायक को भीतर से विचलित करता रहता है । किसी के नाम पर विवाह न करना और बिना विवाह के रह जाना भी प्रतिशोध और सजा का एक आत्महन्ता तरीका है । हमारा नायक भीतरघाते खाता रहता है । सिर्फ पिता के रूप में ही उनकी आत्मकथा का नायक कुछ सामाजिक मर्यादाओं का पालन करता दीखता है । पूरी आत्मकथा अपनी पत्नी की शालीनता से आश्वस्त पति का चारित्रिक विचलन लगती है । इस तरह मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक साहितियक नायक की छवि को खलनायक के छवि में रूपान्तरित करती है ।ं
      भारतीय समाज में स्.त्री होना ही असुरक्षित होना है । सिर्फ स्त्री होने के कारण ही आपकी हत्या हो सकती है । जन्म लेने से पहले भी और जन्म लेने के बाद भी । पर्स में एक भी रुपए न हों लेकिन राह चलते स्त्री होने के कारण ही अपहरण हो सकता है । हालात ऐसे हैं कि पालतू या घरेलू ही क्यों न हो कभी भी कोइ पुरुष रूपी कुत्ता पागल हो सकता है । सिर्फ सिथतियां अपराध कारित करने के अनुकूल सृजित होनी चाहिए । हमारे समाज की यह ऐसी भयावह सच्चार्इ है कि हम सब मनोरोगी हो गए हैं । समाचार पत्रों में जिस तरह की घटनाएं प्रकाशित होती हैं और कुछ न छपते हुए भी जिस तरह अगल-बगल के परिवेश से उभर कर कानों तक पहुंचती है । वह कर्इ बार अविश्वसनीय होते हुए भी सच होता है । ऐसा नहीं है कि यथार्थ का यह परिदृश्य इधर ही दो चार वषोर्ं में उभरा है ।
        आज से पचास -पचपन वर्ष पहले भी जब आजादी के आठ-दस वर्ष हुए होंगे ,मुझे याद है मां को एक नाविक घरानें की ग्रामीण स्त्री नें एक ऐसी बात बतार्इ थी ,जो आज भी मेरे मसितष्क में अनुत्तरित प्रश्न की तरह कौंधता रहता है । उन दिनों यातायात के साधन बसें आदि कम थीं । नदियों पर पुल नहीं थे । तैरनें वाले पीपे के पुलों के लिए ठीकेदार वसूली करते थे और नदियों में पानी बढ़ने पर सहसा ही पुल ढूढ जाते थे या फिर तोड़ देने पड़ते थे । वाराणसी में उच्च शिक्षा में अध्ययनरत युवती रही होगी । बस विलम्ब से आयी या उसनें पुल पार न कर पाने की सिथति में नदी के पार ही सवारियों को उतार दिया । नदी के दूसरी ओर वाली बस नहीं मिली होगी और प्रतीक्षा में अंधेरा हो गया होगा । यह सब मैं अपनी ओर से लिख रहा हूं क्योंकि बवपन में सुनी बात इतनी ही थी कि उस स्त्री नें सुना था कि कोर्इ प्रतीक्षा रत यात्री  युवती ठीकेदार से गिड़गिड़ा रही थी कि भैया छोड़ दीजिए । अब ठीकेदार नें छोड़ा या नहीं या जो किया उसके बाद हत्या कर नदी में ही फेंक देने का निर्णय तो नहीं ले लिया ? क्योंकि यह घटना वहीं घटित हुर्इ हो्रगी जहां लाशें जलार्इ या फेंकी जाती हैं ।तब नदियों में पानी बहुत था और डूबा हुआ सैंकड़ों किलोमीटर दूर बहकर जा सकता हैं । फिर गंगा जैसी नदियों में सांप आदि के काटे शवों को वैसे ही प्रवाहित कर देने की प्रथा है । सिर्फ कफन होने ं और कफन न होने के आधार पर सामान्य और असामान्य मृत्यु का अनुमान लगाया जा सकता है ।
       एक अन्य अविस्मरणीय प्रकरण विश्वविधालयीय शिक्षा-काल का है जब एक सहपाठी नें बिना पूछे ही बताया था कि अमुक नवागन्तुक छात्रा पहले अमुक विभाग में पड़ती थी । बोल्ड और सम्भ््रान्त घरानें की है । एक बार पिकनिक मनाने सहपाठियों के साथ गयी । संभवत: अन्य छात्राओं को अपने अभिभावकों से उस सैर-सपाटे की अनुमति नहीं मिली होगी । पहुंची तो अकेली छात्रा थी । पिकनिक में सहसा या फिर सुनियोजित सामूहिक पशुता जगी और सहपाठियों नें ही उसे मिल-जुलकर अपवित्र कर दिया । उसनें वह विभाग और वह विषय छोड़ दिया और क्योंकि दुनिया छोटी है ,इसलिए उसकी कीर्ति साथ-साथ ही पहुंच गयी होगी । अन्यथा उस सहपाठी को उसका गोपनीय अतीत कैसे मालूम होता । बहुत बाद में एक सेमिनार में वह मुझे फिर दिखी अध्यापिका के रूप में । उसनें अपनी प्रतिभा बचा ली थी लेकिन सिन्दूर से फिर भी वंचित रही वह । बिरादरी और अड़ोसी-पड़ोसी इसतरह की अपकीर्ति पर अपने ढंग से प्रतिशोध लेते हैं । संभवत: व्यावसायिक बिरादरी से थी । अनुमान लगा सकते हैं कि स्वजातियों ने किसप्रकार की टिप्पणियां की होंगीं । चली थी पढ़नें या फिर चले थे पढ़ानें ,और भुगतें ! इसतरह की एक भी दुर्घटना न पढ़नें -पढ़ाने वालों को सशक्त तर्क और औचित्य प्रदान करती है । या फिर दिल्ली में राह चलते फुटपाथ से वहशियों द्वारा किसी बड़ी कार में खींच ली गयी उस विवाहिता युवती को याद कीजिए ,जिस कार नें बिना ट्रैफिक सिगनल तोड़े समाज की सारी मर्यादाएं तोड़ दीं । ऐसे ही एक बार की यात्रा की याद है । भयानक कुहरे में जब सारी सवारियां पहले ही उतर गयीं और मैं भी उतरनें लगा तो उस प्राइवेट बस में बैठी हुर्इ आखिरी सवारी की चिन्ता नें मुझे भी विचलित कर दिया । कुछ ही दिनों पहले प्राइवेट बस में बारिश के दौरान यात्रा कर रही एक अकेली महिला यात्री से उसके ड्राइवर-कन्डक्टर द्वारा ही दुराचार की घटना अखबारों में छपी थी । उस समय मुझे यही सूझा था कि उस महिला का नाम-पता और बस नम्बर उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालनें के लिए नोट कर लिया जाय । 
       विधार्थी-जीवन में ही अधिक सामाजिक और लोकप्रिय होने के चक्कर में अपने ही सहपाठियों के बलात्कार की शिकार उस महिला ने कर्इ किताबें हिन्दी-विषय की अध्यापिका के रूप में लिखी थीं ; लेकिन वह आत्मकथा नहीं लिख सकती थी । उसनें उन दुराचारी सहपाठियों पर भी प्राथमिकी दर्ज नहीं करायी होगी । उसनें नयी स्मृति और नए कार्यक्षेत्र के लिए अपना विषय बदला । अपने दुखद और अपमानजनक अतीत को भुलानें के सृजनात्मक प्रयास में भिन्न क्षेत्र में सम्मान हासिल किया लेकिन उसनें आत्मकथा आज तक नहीं लिखी होगी । क्योंकि इसतरह की हिन्दी में किसी आत्मकथा की सूचना मेरे पास नहीं है ।
           प्रभाखेतान की आत्मकथा 'छिन्नमस्ता संभवत: अपवाद है और उसमें लेखिका नें अपनी अनभिज्ञ किशोर जीवन-काल की मूर्खताओं को भी बेबाक तटस्थता के साथ वाणी दी है । सृजनात्मक मुकित के अविस्मरणीय क्षण घटित करते हुए यह कृति लेखिका की आत्मा पर पड़े हुए अवसाद के पत्थर हटाती हुर्इ निखरती जाती है। प्रभाखेतान की आत्मकथाएं विरेचन का मनोवैज्ञानिक प्रयास लगती हैं । उनके जीवन में सामाजिक कम लेकिन व्यकितगत अधिक घटा है । वह पाठकों को अपने निजी जीवन के ऐसे वर्जित कोनों में ले जाती है जहां जो कुछ घट रहा है वह नितान्त वैयकितक है । पाठक यह भी नहीं सोच पाता कि वह इन लेखकीय अनुभवों का क्या करे ? वह किसी दूसरी दुनिया की कथा लगती है । लेखिका के परवर्ती बौद्धिक स्तर को देखते हुए आत्मकथा में प्रदर्शित भोलापन और अबोधता प्रायोजित एवं अविश्वसनीय लगती है । इसीलिए मैंने इसे परम्पराबत विवाह के लिए अनिच्छुक महिलाओं की दाम्पत्य-त्रासदी या फिर पाश्र्व-दाम्पत्य के रूप् में देखा है । स्वतंत्रता भी एक  सापेक्ष अवधारणा ही है । जातीयता में उपलब्ध पुरुष का असामान्य प्रतिभाशाली महिलाओं की दृषिट में पिछड़ा होनाविकास के एक विशेष काल-खण्ड में ऐतिहासिक सच्चार्इ भी है । प्रभा-खेतान की आत्मकथा इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अप्रत्याशित न होकर सुचिनितत और अपरिहार्य निर्णय के रूप् में सामने आती है । इस तरह की अधिकांश घटनाओं में यधपि भटकाव का भी एक साहसिक रोमांच होता है । कर्इ बार तो बचपन की बाल-सुलभ यौन-जिज्ञासा ही मानक चरित्र के राज-पथ से विचलित कर देती है ;लेकिन राहुल और अज्ञेय और राजेन्द्र यादव की तरह   ही इसे वरण की स्वतंत्रता की समस्या से जोछ़कर भी देखा जाना चाहिए ।
          बहुत पहले कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथा के कुछ अंश एक पत्रिका में पढ़कर मैंने उनको पत्र भी लिखा था । उन्हे पढ़ते हुए मुझे लगा था कि बहुत से व्यवहार नितान्त वैयकितक भी होते हैं । कुछ लोगों के अनुभवों एवं संवेदनाओं का बहुत सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता । असामान्य मनोविज्ञान की सीमा में आने के कारण ही प्रभा खेतान और कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथाएं जीवन की घटनाएं कम दुर्घटनाएं अधिक लगती हैं । व्यकितगत जिद और अहं,अलग रहने का निर्णय ,दूसरों को बर्दाश्त न कर पाने वाली असहिष्णुता जो कभी-कभी पति-पत्नी की एक-दूसरे से की गयी अधिक अपेक्षाओं का परिणाम भी होती है -कथापूर्ण होने के बावजूद बहुत अधिक पाठकीय सहानुभूति अर्जित नहीं कर पातीं । यधपि उनके साथ घटी दुर्घटना भी सामाजिक विकास और परिवर्तन की ऐतिहासिक त्रासदी की ही उपज है । वे एक आदर्श ,आधुनिक और उदार पुरुष की खोज में भटकती हैं । दरअसल आदर्श दाम्पत्य एक आदर्श सामाजिक अनुशासन में ही संभव है । असामाजिक-असम्बद्ध समर्पणविहीन दाम्पत्य की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती । आश्रित एवं अनुचर पुरुष-सहचर की खोज निर्भर,आश्रित या विकलांग दाम्पत्य में ही संभव है । व्यकितत्व की स्वंतंत्रता के साथ दाम्पत्य की खोज आज भी भारतीय समाज के स्त्री की प्रमुख समस्या है । क्योंकि दाम्पत्य एक सामाजिक अवधारणा है इसालिए स्त्री-विमर्श के नाम पर असामाजिक दाम्पत्य की परिकल्पना मैं नहीं कर पाता । हमें दाम्पत्य की सामाजिकता में ही सही स्त्री-विमर्श की तलाश करनी होगी ,यह दूसरी बात है कि सही स्त्री विमर्श सही सामाजिक विमर्श से ही संभव है । 
      ंहिन्दी में ऐसी बहुत कम स्त्री-आत्मकथाएं हैं जो पाठकों में अन्याय का संवेदनात्मक बोध और क्षोभ जगा पाती हैं । इस दृषिट से चन्द्रकिरण सौनरेक्सा, मैत्रेयी पुष्पा (कस्तूरी कुण्डल बसै के लिए ) मन्नू भेडारी और मैत्रेयी पुष्पा (गुडि़या भीतर गुडि़या के लिए ) की आत्मकथाएं क्रमश: उतरते क्रम में ठीक और प्रभावी लगीं । आंचलिक भाषा का पुट ,अभिव्यकित की मनोहारी सृजनात्मकता और आवेग की तीव्रता के आधार पर मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का जवाब नहीं है । उसे विवाहित पुरुषों को अनिवार्य पाठय-पुस्तक के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि वे दूल्हन के घूंघट में छिपी किसी मैत्रेयी पुष्पा को समय रहते ही पहचान सकें और समाज की अधिक क्षति न हो । हर जीवन वृहत्तर समाज की सम्पतित भी है ,उसे विवाह का लाइसेंस मिलते ही पुरुष अपनी निजी सम्पतित में बदलने लगता है । कभी-कभी ऐसा सुरक्षा एवं प्यार के नाम पर ही होता है , लेकिन भारतीय समाज में बार-बार विवाह करने के विकल्प पुरुष के लिए भी कम ही हैं ,कभी-कभी तो एक भी-सलमान खान और राहुल गांधी इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं । इसीलिए मेरे पाठकीय मन ने मैत्रेयी के डाक्टर पति का मरीजों को देखना छोड़कर अपनी पत्नी की जासूसी के लिए आवास पर असमय आ जाना क्षम्य लगा । रिश्ते बन जानेे के बाद रिश्तेदार को बचाना भी स्वयं को बचाने के समान ही हो जाता है । पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के लिए पुरुष की एक भूमिका सुरक्षा-डाग की भी है । क्यों कि पुरुष रूपी कुत्ता कभी भी पागल होकर किसी भी महिला को कभी भी काट सकता है । इस लिए मेरा व्यावहारिक सुझाव न चाहते हुए भी यह रहेगा कि स्त्री-विमर्श एवं परिवर्तनकारी जागरूकता अभियान चलता रहे लेकिन वास्तविक जीवन में आपराधिक संभावनाओं को देखते हुए स्वतंत्रता के जोखिमपूर्ण आत्मविश्वास से बचें क्योंकि आपराधिक जीन विवेक और विचार से नहीं संचालित होते ।
        सम्पर्क -बी-1,श्री सांर्इ अपार्टमण्ट,टंडि़या,करौंदी,सुन्दरपुर,वाराणसी(उ0प्र0) पिन-221005
          मोबाइल नं0 09451342730   र्इ-मेल-तंचतानहउंपसण्बवउ

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

समाजिक मुकित में भाषा-बोध की युकित


प्राचीन भारत में जाति नहीं बदली जा सकती थी लेकिन जाति की निरर्थकता को समझा जा सकता था .क्योंकि वह प्राचीन कालसे ही माया-जगत का हिस्सा और किस्सा रहा है.एक पूरी जाति इस मायावाद के प्रचार में लगी रही.यह सब प्राचीन आदर्शवाद का हिस्सा था .आज जब कि भारत में बलात्कारी बढ़ गए हैं .भारत की प्राचीन सांस्कृतिक अभियांत्रिकी यद् आती है.तब स्त्री-संसर्ग से विरत रहने वाला महिमा-मंडित किया जाता था .लक्ष्य पुरुषोत्तम बनाने का था .ब्रह्मचारी रहना एक चुनौती पूर्ण लक्ष्य था .पुरुष होने के बोध से मुक्त एक जीवन .सदाचारी होना पुरुषार्थ के लिए एक चुनौती था .
       संभव है कि ऐसे लोगों ने भौतिकवादी अर्थ में स्त्री -संसर्ग से विरत रहकर अपना नुकसान किया हो .लेकिन उन्होंने समाज को एक संयमी जीवन जीने का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य दिया था .संभवतः यौन -भावना के प्रति नकारात्मक चिंतन से ही उसके हारमोनो को जीता जा सकता था .उन्होंने ऐसा ही किया .उन्होंने मानवीय अस्मिता  से सम्बंधित ज्ञान की निरर्थकता को अपने भाषा -चिन्तन  के क्रम में पाया था .शब्दों के अर्थ की प्रकिया को समझते-समझाते वे ज्ञान से परे के उस चित्त तक पंच पाए ,जहाँ से शब्दों की अर्थवान दुनिया शुरू होती है .भाषावैज्ञानिक चिंतन के क्रम में ही वे अवधारणाओं से पर के उस रहस्यमय अपरिभाषित चित्त को जान पाए थे जिसे नेति -नेति कहा और ब्रह्म भी .भारतीय लोक के ज्ञानात्मक  अतिक्रमण के लिए यह लोकोत्तर प्रवास जरुरी था -चाहे यह ज्ञान या बोध के स्तर पर ही क्यों न रहा हो
       मेरी दृष्टि में आज भी इस भाषा बोध की आवश्यकता बनी हुई है .यह चाहे रहस्यमय और सर्वव्यापी ईश्वर की उपस्थिति या साक्षात्कार के रूप में न हो ,लेकिन यह भारतीयों के विषमतापूर्ण अस्मिताकरण से मुक्ति के लिए अब भी प्रासंगिक हो सकता है अर्थकरण की प्रक्रिया को पहचानकर हम अपने चित्त के जातिकरण की प्रक्रिया को भी पहचान सकते हैं और उससे मुक्त हो सकते हैं . .
         इस परिप्रेक्ष्य में रखकर देंखें तो भारतीयों की समस्या यह है कि जन-सामान्य सिर्फ भाषा का प्रयोग ही जानता है ,उसका मर्म नहीं  ।वह अपने अधिकांश-बोध में भाषा की स्थार्इ निर्मिति या वस्तु उत्पाद की तरह है । भाषा का एक जड़ संसार उसकी अर्थजीवी चेतना को नियनित्रत करता है । प्राचीन भारतीय विद्वानों नें भाषा के पार की उस दुनिया को जीवन और संसार की सीमा से परे ब्रहम की सत्त के रूप में देखा । वे चाहते तो इस ज्ञान का उपयोग भारतीयों को जातिवादी कुण्ठा से निकालने के लिए कर सकते थे । लेकिन इससे भाषा-ग्रस्त मानव-संसाधन की सामाजिक अभियानित्रकी ध्वस्त हो जाती । उन्होंने लोक को जाति-चिन्तन के लिए छोड़कर एक सीमित वर्ग को ब्रहम-चिन्तन की ओर मोड़ दिया ।
          आज भी कर्इ लोग अपनी जाति और धर्म के लिए कुणिठत रहते है और कर्इ लोग र्इश्वर को होने न होने को लेकर । निहित स्वाथोर्ं के कारण मानव समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी नहीं चाहता कि लोग शासित होने और दूसरों को बड़ा मानने की अपनी आदत छोड़ें ।  वे लाभ की सिथति में हैं इस लिए किसी भी प्रकार से अपनी सांस्कृतिक-सामाजिक आदत या व्यसन कोे बनाए रखना चाहते हैं । यह जानते हुए भी कि शब्द के सच सामाजिक रूप से माने हुए ही होते हैं ,वे नहीं चाहते कि सामान्य जनता इस झूठ की भाषावैज्ञानिक- सृजनशीलता को जानें । शब्द-विज्ञान से देखें तो कौन कह सकता है कि र्इश्वर का नाम र्इश्वर ही है । शब्दों में निहित सारे अर्थ एक आभासी दुनिया की सृषिट करते हैं और दिमाग के भीतर चिन्तन के उपकरण के रूप में इश्तेमाल करने के लिए दिमाग के बाहर से लिए गए हैं । वे हमारे मसितष्क में बाहरी दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
         भाषा-विज्ञान के नजरिए से जब देखता हूं तो दलित-दलित चिल्लाना भी अप्रत्यक्ष रूप से नर्इ पीढ़ी को गुमराह करने के लिए एक भाषा-वैज्ञानिक झूठ को सच बनाने का कूटनीतिक उपक्रम ही लगता है । जो काम राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रभुत्वशाली वर्ग नें हजारों वषों्र तक किया उसे अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रभावित वर्ग का नेतृत्व स्वयं एवं सहर्ष कर रहा है ।
           मेरा मानना है कि प्राचीन एवं आधुनिक भाषा-विज्ञान का इश्तेमाल जातिवाद और साम्प्रदायिकता से मुकित के लिए किया जा सकता है । मैं कौन हूं का प्रश्न और तर्क सिर्फ प्राचीन भारतीयों की तरह सिर्फ ब्रहम को जानने के लिए ही नहीं किया जाना चाहिए ,इस बोध का उपयोग जाति और सम्प्रदाय-बोध से बाहर निकलने और निकालने के लिए भी किया जा सकता है । यह मुकितदायक-ज्ञानवद्र्धक प्रश्नोत्तर कुछ इसप्रकार होगा-
      प्रश्न- तुममैं कौन ?
      उत्तर- तुम  मैं एक माने गए शब्द हैं ।
      प्रश्न- कैसे शब्द ?
      उत्तर- दूसरों के द्वारा दिए गए अर्थ वाले ....
एक नए समाज की रचना पुराने शब्दों से दूरी बनाए बिना संभव नहीं है । यदि किसी को परम्परा से मिले अर्थ पसन्द नहीं हैं तो उससे अलग होने की सोचे और सामूहिक बहिष्कार जीना सीखे । सभ्यता या असभ्यता से मिले हीनता या श्रेष्ठताबोधक काल्पनिक किन्तु सच की तरह जिए जाने वाले भाषावैज्ञानिक यानित्रकबोध से बाहर निकलने के लिए भाषा एवं शब्द-विज्ञान की सहायता लेनी होगी । राजनीतिज्ञ तो झूठ को भी सचके रूप् में विज्ञापित कर दंगा करा देता है । इसप्रकार समस्या यही है कि विश्व के अधिकांश लोग आज भी भाषावैज्ञानिक दृषिट सेमूर्ख या अज्ञानी हैं । वे जिस चीज से मुक्त होने के लिए संशर्ष कर रहे होते हैं,उसे ही अपने कार्य और व्यवहार की जीवन-चर्या से सच करते जाते हैं ।


शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

ज्ञानरंजन की कहानियां : सभ्यता-समीक्षा का काव्यात्मक विमर्श

 पाखी के ज्ञानरंजन अंक सितम्बर 2012 में प्रकाशित 

ज्ञानरंजन की अधिकांश कहानियों के पाठकीय अनुभव की तुलना शाम को बाजार या पिफर किसी मेले में द्घूमने से भी की जा सकती है। बाजार द्घूमने गया व्यक्ति कब मेला या बाजार देखने लगेगा और कब कुछ खरीदने लगेगा-कहा ही नहीं जा सकता। उनकी 'पिता' कहानी को ही लें तो पिता तक पहुँचने से पहले, और अंत तक भी पाठक यह अनुमान लगाने में असमर्थ ही रहता है कि कहानी के पिता ने ऐसा क्या किया होगा जो कहानी के नायक बने। ज्ञानरंजन का कहानीकार अपने पाठकों की इस प्रत्याशा से भी सृजनात्मक चुहल या शरारत करता है। कहानी के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते कहानी के पिता पाठकों से अपना नायकत्व स्वीकार करवा ही लेते हैं।


ज्ञानरंजन की कहानियाँ : 

सभ्यता-समीक्षा का काव्यात्मक विमर्श

                                                           रामप्रकाश कुशवाहा 

हिंदी में ज्ञानरंजन जीवन-विमर्श की कहानियाँ लिखने वाले अनूठे एवं संभवतः अकेले कथाकार हैं। उनकी कहानियाँ बाहरी दुनिया की द्घटनाओं के वर्णन से नहीं, बल्कि एक आम व्यक्ति के एकान्त और मौन मानसिक साक्षात्कार की मुद्रा में, मानवीय अनुभूतियों और संवेदनशील अनुभवों के लयात्मक प्रतिसंसार के साथ, आत्मसंवाद और आत्मसाक्षात्कार के शिल्प में बुनी गयी हैं। ज्ञानरंजन अपने पहले के, अपनी पीढ़ी के और परवर्ती पीढ़ी के प्रसि( कहानीकारों के बीच सबसे अधिक समाज मनोवैज्ञानिक विश्लेषक अन्तर्दृष्टि से संपन्न कहानीकार हैं। उनकी कहानियों के शीर्षक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा मनोविकारों पर लिखे गए निबंधों की याद दिलाते हैं, यह याद उनकी सूक्ष्म और विश्वसनीय मौलिक समझ के लिए भी आती है। हास्य रस, अनुभव और संबंध आदि कुछ ऐसे ही शीर्षक हैं। ज्ञानरंजन आधुनिक युग के मनुष्य के लिए नई जीवन-दृष्टि और मौलिक सूक्तियों के सर्जक कहानीकार हैं। वे अपनी कहानियों में जिस तरह बहुस्तरीय समाज के परस्पर विरोधी यथार्थ और जीवन-दृष्टियों से खेलते और उन्हें खोलते हैं, वह संवेदना और समझदारी दोनों ही स्तरों पर मानसिक मुक्ति का रोचक वृत्तान्त द्घटित करती हैं। उनकी सभी कहानियाँ अपने पाठकों को मोहभंग की चेतना और चेतावनी की समझदारी से गुजारती हैं। कुछ ऐसे कि जैसे वे अपने पाठकों को दुनियादारी के प्रति अधिक समझदार बनाने के मिशन का एक हिस्सा हैं। वे किसी भी तरह से बेवकूपफ बनाए जाने के विरु( रचनात्मक नपफरत से भरी हैं। उनकी कहानियाँ जहाँ एक ओर आधुनिकता की दृष्टि से जड़ता की मानवीय वृत्तियों एवं दुर्बलताओं का अनुसन्धानपरक लेखा प्रस्तुत करती हैं, तो दूसरी ओर आधुनिकता में निहित मानवीय पर्यावरण के विनाश और विस्थापन के संभावित खतरों के प्रति भी निर्मम चेतावनी जारी करती हैं। समझदार एवं दार्शनिक व्यंग्य ज्ञानरंजन की सभी कहानियों की अनिवार्य विशेषता हैं। वे प्रगीतात्मक आत्माभिव्यक्ति की शैली के कहानीकार हैं। प्रथम पुरुष की कथात्मक मुद्रा का शिल्प उनकी कहानियों को विश्वसनीय तो बनाता ही है,वह उनकी उस विचारशीलता के निवेश के लिए भी स्वाभाविक रूप से अधिक अवसर उपलब्ध कराता है जो उनकी कहानियों का मुख्य गुण है। ज्ञानरंजन की कहानियाँ परम्परागत अर्थों में कहानियाँ हैं भी नहीं। कथानक की दृष्टि से देखें तो कई कहानियाँ किसी बड़ी कहानी की भूमिका लगती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अभी पात्रा-परिचय चल रहा है और कहानी आगे अभी द्घटेगी कि सहसा कहानी खत्म हो जाने की सूचना देने वाला पृष्ठ आ जाता है। पाठक पिफर पलटकर कहानी के बारे में सोचने लगता है और पाता है कि इस मुद्दे पर तो कुछ बचा ही नहीं और संतुष्ट होकर उनकी कहानियों से मिलने वाले पाठकीय अनुभव को जीवन भर नहीं भूल पाता। उनकी कोई भी कहानी द्घटनाओं में याद नहीं रहती, बल्कि प्रभावों में याद रहती है। इस तरह ज्ञानरंजन की कहानियाँ जीवन को जानने-समझने के उपक्रम में ही संपन्न होती हैं। वे जीवन से साक्षात्कार की मानसिक यात्राा हैं। वे कथानक के पात्राों में द्घटित नहीं होतीें बल्कि पूरी ईमानदारी के साथ लेखक के भीतर द्घटित होती हैं। उदाहरण के लिए अन्य कहानीकार जहाँ चरित्राों का चित्राण करते हैं, वहाँ ज्ञानरंजन की कहानियाँ पात्राों-चरित्राों के बारे में लेखक की समझदारी या अभिमत का चित्राण करती हैं। इस तरह ज्ञानरंजन की कहानियाँ जीवन के साक्षात्कार की कहानियाँ हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य कहानीकार ने कहानी के इस रूप में भी होने की परिकल्पना की है। कमलेश्वर अपने बनाए नई कहानी के सूत्राों पर ही रीझे और खोए रहे। यद्यपि उन्होंने और उनकी पीढ़ी के अन्य कहानीकारों ने कहानी को चौंकाने वाले अन्त के शिल्प से मुक्त किया। यद्यपि चौंकाने की आदत गई नहीं और वह पूरे कथानक की परिकल्पना में ही पफैल गयी या समाहित हो गयी। चौंकाने वाला शिल्प तो 'कितने पाकिस्तान' जैसे उपन्यास तक चलता रहा। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और चित्राण अज्ञेय की कहानियों में भी था। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो ज्ञानरंजन की कहानियाँ जीवन के प्रत्यक्षीकरण की कहानियाँ हैं। वे साक्षात्कार, विश्लेषण और समझदारी की प्रक्रिया में द्घटित होती हैं। उनकी कहानियों का आस्वाद जीवन के नए अन्वेषण और उद्द्घाटन का आस्वाद है। इन्ही विशेषताओं के कारण मुझे हिन्दी में ज्ञानरंजन जैसा कोई दूसरा कहानीकार नहीं दिखता। अपनी पूर्ववर्ती नई कहानियों से अलग उनकी कहानियाँ कहानी की बिल्कुल नई परिकल्पना की कहानियाँ हैं। ज्ञानरंजन की कहानियों को पढ़ते समय दो-तीन बातें मन में उभरती हैं। वे हिन्दी के गिने-चुने कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने प्रतिमान कहानियाँ लिखी हैं। अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह लगती है कि वे लेखकीय अनुभव के ही कथाकार नहीं हैं बल्कि लेखकीय मूड या मनःस्थिति के भी चितेरे कथाकार है। यह विशेषता हिन्दी के दो-तीन लेखकों में ही मुझे दिखाई देती है। उनके पहले मोहन राकेश, शिवप्रसाद सिंह और उनके बाद उदयप्रकाश की कहानियों में यह विशेषता मुझे दीखती है। उनकी हर कहानी एक अलग संवेदनात्मक मनःस्थिति की उपज है। यद्यपि शिवमूर्ति की कहानी 'कसाईबाड़ा', संजीव की 'अपराध' और अखिलेश की 'चिट्ठी' में भी एक विशेष संवेदनात्मक मनःस्थिति कहानी की अन्तःप्रेरणा और कथा-वस्तु के परिचालन में देखी जा सकती है, लेकिन उनकी अन्य कहानियों के कथात्मक आयाम भिन्न-भिन्न भी हैं। यह कुछ-कुछ वैसा ही अनुभव है जैसे धूप का रंग बदलने से देखे जाने वाले दृश्य का आस्वाद बदलता है। उन्हें पढ़ते हुए पाठक सिपर्फ कथ्य में ही नहीं बल्कि मूड में भी यात्राा करता है। राजकमल से प्रकाशित अपनी पुस्तक प्रतिनिधि कहानियाँ की भूमिका में इसी बात को उन्होंने कई तरह से संकेतित किया है। 'अपनी कहानियों पर चर्चा करना, उनको छाँटना और एक प्रकार से उनमें लौटना मुझे बहुत उत्साहवर्(क नहीं लगता है। वास्तव में कुछ समय के लिए भी वापस जाने की इच्छा नहीं होती। ऐसा नहीं हुआ है कि मैंने छपकर आई अपनी किसी कहानी को पढ़ा हो। छपी कहानी दिल को एकाएक रद्द कहानी लगने लगती थी। केवल एक कहानी 'संबंध' को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अब भी पढ़ सकता हूँ। ...संबंध को मैंने एक सपाटे में लिखा है। 'द्घण्टा' और 'बहिर्गमन' कहानियों ने कापफी परिश्रम करवाया, लेकिन उनको लिखते वक्त मैं अपूर्व 'कॉमिकल' मनःस्थिति में था। दूसरी कहानियों में आगे या पीछे या साथ-साथ यातना थी या ठसपन या क्षोभ।' स्पष्ट है कि ज्ञानरंजन की कहानियों एवं कहानीकला की कुन्जी रचना-क्षण के उनके सृजनशील चित्त या मूड में छिपी हुई है। इसीलिए अपनी ही कहानियों को पढ़ना उनके लिए रचना-क्षण के मूड से बाहर निकल जाने के कारण कभी आसान नहीं रहा। उनकी बहुचर्चित प्रतिनिधि कहानियों को देखें तो दूसरी चीज यह सामने आती है कि उनकी हर कहानी जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर उनके वैचारिक साक्षात्कार और विशेषज्ञ समझदारी की भी उपज है। अपनी प्रायः सभी कहानियों में कहानी के अन्तरंग तक पहुँचने से पहले ज्ञानरंजन मानो उसकी भूमिका के रूप में कथानायक की मनःस्थिति,विचारों, सूचनाओं और जीवन के लम्बे-लम्बे वर्णन के गलियारों से अपने पाठकों को गुजारते हैं। जरूरी नहीं कि ये वर्णन कहानी के आरंभ में ही आएँ, वे कभी भी, कहीं भी शुरू हो सकते हैं और कभी भी खत्म। ज्ञानरंजन के ये वर्णन नाटक शुरू होने के पहले सूत्राधार के परिचयात्मक भाषण की तरह भी हो सकते हैं और मुख्य कार्यक्रम को प्रस्तुत करने में हो रहे विलम्ब से ध्यान हटाने के लिए किए जाने वाले गंभीर प्रहसनों की तरह भी, लेकिन अधिकांश में ये पृष्ठभूमि के रंग और परिवेश को ही सूक्ष्मता से उभारते हैं। कई बार तो उनके अवान्तर वर्णन और चर्चाओं में ही पाठक इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे याद ही नहीं रहता कि वह कोई कहानी पढ़ने बैठा है और अब तक उसके सामने कहानी का कोई टुकड़ा आ जाना चाहिए था या उसके आने में अनावश्यक विलम्ब हो रहा है। ज्ञानरंजन की अधिकांश कहानियों के पाठकीय अनुभव की तुलना शाम को बाजार या पिफर किसी मेले में द्घूमने से भी की जा सकती है। बाजार द्घूमने गया व्यक्ति कब मेला या बाजार देखने लगेगा और कब कुछ खरीदने लगेगा-कहा ही नहीं जा सकता। उनकी 'पिता' कहानी को ही लें तो पिता तक पहुँचने से पहले, और अंत तक भी पाठक यह अनुमान लगाने में असमर्थ ही रहता है कि कहानी के पिता ने ऐसा क्या किया होगा जो कहानी के नायक बने। ज्ञानरंजन का कहानीकार अपने पाठकों की इस प्रत्याशा से भी सृजनात्मक चुहल या शरारत करता है। कहानी के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते कहानी के पिता पाठकों से अपना नायकत्व स्वीकार करवा ही लेते हैं। पाठक एक कभी भी न भुलाए जाने वाले पिता के कथात्मक साक्षात्कार से संतुष्ट होकर कहानी समाप्त करता है। एक कहानीकार के रूप में ज्ञानरंजन की सपफलता इसमें है कि कहानी जिन्दगी के एक भोगे और जिए जा रहे क्षण की अनुभूतियों और पात्राों की सारी मानसिक प्रक्रियाओं तथा यथार्थ के साथ पाठक में भी संचरित-संक्रमित-संप्रेषित हो जाती है। ज्ञानरंजन की इस रचना-प्रक्रिया का रहस्य प्रायः उनकी सभी कहानियों के कविता होने में छिपा है। एक तरह से उनकी कहानियाँ समकालीन मनुष्य के अंतर्जगत की सेंधमारी से उत्पन्न हुई हैं, जिसे परंपरागत आध्यात्मिक शब्दावली में परकाया प्रवेश कहते हैं। यद्यपि भूमिका में उन्होंने सिपर्फ 'संबंध' कहानी का ही कविता होना स्वीकार किया है और लिखा भी है कि केवल एक कहानी 'संबंध' को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अभी भी पढ़ सकता हूँ। किसी वास्तविक कहानी की रचना के पीछे कभी-कभी यह भी हुआ है कि एक कविता ने उसका निर्माण कर दिया। ज्ञानरंजन की कहानियों को जो चीज महत्वपूर्ण बनाती है, वह है जीवन और यथार्थ को देखने-समझने की उनकी बहुआयामी समझदारी, अभिव्यक्ति और विश्लेषण की सजग-स्वतंत्राता-यहाँ तक कि परस्पर विरोधी मानवीय सच्चाइयों को भी एक साथ देखने-समझने की क्षमता भी। वे समाज मनोवैज्ञानिक नजरिए से दृष्टिसंपन्न कथाकार हैं। उन्होंने अपनी कम ही कहानियों में अपनी निजी और मौलिक सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति और जीवनानुभवों को पूरी ताकत से झोंक दिया है। उनके पात्रा और कथानक इसी निवेश के बहाने बन गए हैं। उनकी इस विशेषता को समझने के लिए उनकी 'रचना-प्रक्रिया 'शीर्षक कहानी को देखा जा सकता है। यह कहानी युवक-युवती के प्रेम पर और उसके प्रति आम सामाजिक व्यवहार और दृष्टिकोण पर व्यापक समाज मनोवैज्ञानिक ब्यौरे और तथ्य सामने लाती है। कहानी सबसे पहले शहर की जनसंख्या और प्रेम के चरित्रा के बदलते स्वरूप और आनुपातिक रिश्ते बतलाती है। 'जनसंख्या न सिपर्फ प्रेम का विकल्प देती है, बल्कि अव्यवस्था और उपलब्धता के बीच वर्जनाओं के अनुशासन से आजादी भी। प्रेमी भी एक बड़ी भीड़ के बीच किसी पागल की तरह एक सामान्य उपस्थिति के रूप में द्घटित हो सकता है।' 'पहले प्रेम के पीछे कुरबानी भी बहुत होती थी, पर अब ऐसा नहीं के बराबर है, क्योंकि एक प्रेम चला जाता है तो दूसरा तुरन्त उपस्थित हो जाता है। और 'ऐसी जगहों में अगर कोई लड़की किसी को अपना सतीत्व सौंपना चाहे या सौंप दे तो दूसरे अलसेट नहीं देंगे क्योंकि जनसंख्या ज्यादा होती है।' ;वही, पृ. ४१द्ध 'छोटे शहर में यह नहीं हो सकता। इसके लिए भीड़ और जनसंख्या जरूरी है।' ;वही, पृ. ५०द्ध यद्यपि यह आजादी सामन्ती मूल्यों वाले भारतीय समाज की सीमा समाप्त हो जाने के कारण ही शहरों में मिलती है, लेकिन लेखक पाता है कि छोटे शहरों में सामन्ती ग्रामीण समाज का शहरी जीवन में भी नियन्त्राण और हस्तक्षेप बना रहता है। इसीलिए बड़ी जनसंख्या वाले शहर का जीवन प्रेम का सामन्ती वर्जनाओं से मुक्त उत्सव बना पाता है। ज्ञानरंजन की यह कहानी इसी उत्सव का रेखांकन प्रस्तुत करती है। ज्ञानरंजन की 'रचना-प्रक्रिया' कहानी बहुत चुपके से एक स्त्राी होने के ग्लैमर के पीछे सामान्य प्राकृतिक जैविक वजूद का मोहभंग होने के स्तर तक रेखांकन करती चलती है-'मैंने कभी उसे उंगली डालकर नाक सापफ करते नहीं देखा और न जंद्घों के बीच साड़ी खोंसते। मैं समझता हूँ उसे कब्ज भी नहीं रहता था।' ;वही, पृ.४७द्ध यह कहानी प्रेम-भावना के बौ(कि, मानसिक और शारीरिक सभी आयामों, भंगिमाओं और हश्र को पाठकों के सामने जिंदगी की समझदारी के रूप में रख देती है-'बड़े शहर की लड़की चिंतन-मनन करने वाली होती है और देह में सौंदर्य दिमाग की मापर्फत आता है।' ;वही, पृ.४८द्ध ज्ञानरंजन की नजर वहाँ तक जाती है, जहाँ प्रेम के प्रति वर्जनाएँ और प्रतिरोध उसे ;कथानायक के 'मैं' के रूप में युवा पीढ़ी कोद्ध उकसाने वाले क्रान्तिकारी लक्ष्य में बदल देते हैं। जहाँ प्रेम एक विशु( परिद्घटना न रहकर चिढ़े हुए युवा जीवन का एक रोमांचक लक्ष्य बन जाता है। गौण होते हुए भी मुख्य एवं निर्णायक जीवन-लक्ष्य का रूप लेते हुए। यह प्रेम के मनोविज्ञान का एक रिवर्स है, जिस पर ज्ञानरंजन की यह कहानी ध्यान दिलाती है। ज्ञानरंजन की 'संबंध' सिपर्फ उनकी ही नहीं बल्कि हिन्दी और विश्व-साहित्य की भी ऐसी कहानी है जिसे एक बार पढ़ने के बाद शायद ही कोई भूल पाए। यह कहानी रात के अंधेरे से सुबह के उजाले तक एककालिक यात्राा के शिल्प में सृजित हुई है। ज्ञानरंजन की यह कहानी अपने बहुस्तरीय कलात्मक शिल्प, मनोवैज्ञानिक वातावरण और रचनात्मक चुनौती की दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण कहानी है। इसके सभी पात्रा अपनी सामान्य एवं प्रत्यक्ष कथात्मक उपस्थिति के साथ-साथ अलग काव्यात्मक प्रयोजन तथा प्रतीकात्मक दार्शनिक निष्पत्ति भी रखते हैं। कहानी के मुख्य या कथावाचक पात्रा जो अपने समय का असंतुष्ट और निर्मम भाष्यकार है और सारी कहानी उसकी ही मानसिकता और टिप्पणियों के माध्यम से समय का विमर्श और साक्षात्कार प्रस्तुत करती चलती है, लेकिन एक बड़े कहानीकार के रूप में ज्ञानरंजन की सजगता और सपफलता यह है कि माँ के रूप मे स्वस्थ और आदर्श मानवीय संबंधों का संवेदनात्मक नेपथ्य बनाए रखते हैं। माँ सभ्यता के एक सुरक्षित पाठ की तरह है, जो अस्तित्व के विरु( सारी नकारात्मकताओं और साजिशों का निषेध है। वह जिंदगी के पक्ष में निर्णायक, अन्तहीन और अपराजेय संद्घर्ष की प्रतीक है। जीवन की नकारात्मकताओं और निषेध से आक्रान्त कथावाचक मुख्य पात्रा 'मैं' समय के अंधेरे के व्यंग्यात्मक अधिवक्ता के रूप में इस कहानी का भाषित होना संभव करता है। बेरोजगार भाई जो व्यवस्था की क्रूरता का मुख्य शिकार तथा जीवन के प्रति तमाम दुःस्वप्नों और आशंकाओं का मुख्य सूत्राधार है, कहानी के अन्त में स्वस्थ जिजीविषा और सक्रियता के प्रकाशमान प्रतीक के रूप में लौटता है। सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर इस कहानी का विश्लेषण करें तो यह कहानी आर्थिक तंगी में गुजरते मध्यवर्ग के करोड़ों परिवारों की जीवन-त्राासदी और सच्चाई छिपाए हुए है। यह अमानवीय होती व्यवस्था से कुचलते हुए मृत्यु के कगार पर जा पहुँचे परिवारों पर लिखी गई एक संवेदनाधर्मी महाकाव्यात्मक कहानी है। हिन्दी में भी ऐसी कहानी लिखी गई है, इसे पढ़कर आश्चर्य ही होता है। प्रेमचन्द की प्रसि( कहानी 'कपफन' की तरह यह भी व्यवस्था के संपूर्ण अमानवीकरण और संपूर्ण मोहभंग की कहानी है। त्राासद यथार्थ का आरेखन इस कहानी में क्रूर, आपराधिक और हत्यारी विचारशीलता के सहारे किया गया है। यह कहानी करुणा या दया-मृत्यु के लिए लिखी गई याचिका की तरह है-'दरअसल मैं तपाक से, अपने भाई के बारे में यह सोचने पर मजबूर हो गया कि उस बेचारे को मर ही जाना चाहिए। मैं नहीं जानता कि इस खयाल की मैंने चुपचाप खोज की हो। हो सकता है इसमें कुछ दया-भाव हो लेकिन हकीकत यह है कि मैं कापफी देर बाद भी यही चाहता रहा कि वह आत्महत्या कर ले और एक बहुत ही द्घिसटती हुई निर्मम समस्या का समाधान हो जाए।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.७५द्ध यह कहानी एक विस्पफोटक और झिंझोड़ देने वाले संवेदनात्मक साक्षात्कार और जीवन-पीड़ा का साक्षात्कार कराती है। कथा-भाषा की सृजनशीलता अपने चरम पर है। यह एक चिढ़ी हुई, प्रतिक्रियात्मक और निर्णायक भाषा है। गहरी द्घृणा की संवेदना और विद्रोही मानसिकता से निकली हुई भाषा। इसी रूप में यह एक क्रान्तिकारी कहानी है-'इतना मैं अवश्य जानता हूँ कि भाई की मृत्यु अगर हो गई तो निश्चितरुपेण मेरा गणित ठीक उतरेगा और यह समझा जा सकेगा कि वाकई मृत्यु से सबको पफायदा हुआ है।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.७७द्ध जीवन एक अवांछित उत्पाद की तरह है और पूंजीवादी व्यवस्था की निरंकुश संवेदनहीनता उसके साथ पूरी तरह अवैध होने जैसा व्यवहार करती है। दुःस्वप्न और आशंकाओं की संवेदनात्मक मनोभूमि पर सृजित इस कहानी का सुखद अंत जीवन के स्वीकार का प्रतीक है। रात को आत्महत्या कर लेने की समस्त आशंकाओं को झुठलाते हुए भाई का सुबह व्यायाम करते पाया जाना ज्ञानरंजन के कहानीकार को पूर्ववर्ती नई कहानी के भाष्यकारों-कहानीकारों की चरमोत्कर्ष तथा निष्कर्षविहीन कहानी लिखने की परंपरा को न सिपर्फ झुठलाने की सूचना देता है, बल्कि साठोत्तरी पीढ़ी को कुंठा काल का रचनाकार होने की आमधारणा को भी खारिज करता है। अपने समय में ज्ञानरंजन की कहानियाँ प्रतिरोध और अतिक्रमण का विमर्श रचती है। जाहिर है यह प्रतिरोध अपने अमानवीय समय के अस्वीकार और अतिक्रमण से ही निर्मित हुआ है। आत्महत्या जैसे शास्त्रा-निन्दित पापकर्म को मानव-अस्तित्व के स्वाभिमान और मुक्ति के सम्मानजनक प्रतीक के रूप में चित्रिात करना इस कहानी को व्यवस्था के विरु( द्घृणा की भीषण और चरमान्तक व्यंग्य-अभिव्यक्ति में बदल देता है । 'पिता' कहानी मुझे मध्यवर्गीय परिवार में दो अलग-अलग पीढ़ियों की जीवन-दृष्टि और मानसिकता में हो रही रोमांचक मुठभेड़ लगती है। यहाँ सिपर्फ मध्य-वर्ग ही नहीं है बल्कि मध्य-युग भी है-'अपनी परंपराओं और मूल्यों के साथ एक संस्कृति के वाहक अभिभावक के रूप में। आधुनिकता में पले-बढ़े बेटे उसे समझ नहीं पाते क्योंकि पिता अपने पिता की स्मृतियों से परिचालित बोध और कर्तव्य बोध को जी रहा है। वह एक युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का संविधान जीने वाला पिता है। कहानीकार उसके कष्टों का इस प्रकार वर्णन करता है जैसे बाइबिल में यीशु मसीह का पकड़े जाने और क्रूस पर चढ़ने वाले दिन के पूर्व रात्रिा का किया गया है। पिता का स्वाभिमान और यातना दोनों ही परंपराओं की भव्य विरासत को जीवन-मूल्य के रूप में जीने के प्रयास में शहीद हो रहे एक पिता की यातना है। यह कहानी वृ(ों एवं अभिभावकों के प्रति एक करुणामय प्रेम और श्र(ा उपजाती है। अगली पीढ़ी को स्वयं कष्ट सहकर भी सुख सौंपने की वह अमूल्य विरासत भी सौंपती है जो प्रतिदान और उआँण होने को असंभव करती है। जहाँ पिता का किया हुआ पिता को लौटाया नहीं जा सकता, बल्कि उसे अगली पीढ़ी को ही देकर न दे पाने की अतृप्ति एवं मनोग्रन्थि से मुक्ति पाई जा सकती है। अपनी 'यात्राा' कहानी के बारे में स्वयं ज्ञानरंजन नें कहा है कि ''यात्राा में वह व्यक्ति, जो मृत्यु को आमने-सामने खड़ा होकर देखता है, एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में प्रकाशित हुआ है। मेरी यह कहानी उतना ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई, जितना होता तो अच्छा था।' इस वक्तव्य में 'संपूर्ण व्यक्तित्व' के स्थान पर 'संपूर्ण व्यवहार' शब्द का प्रयोग होता तो बात अधिक स्पष्ट हो सकती थी। हुआ यह है कि ज्ञानरंजन ने सृजनात्मक श्रम के साथ मृत्यु के बाद होने वाले हर तरह के मानव-व्यवहार को एक ही चरित्रा में डाल दिया है। इसका एक ही चरित्रा अनेक प्रकार की मानसिकता को जीता और उससे गुजरता है, जबकि वास्तविक दुनिया में अनेक और प्रायः अलग-अलग व्यक्ति इस कहानी में व्यक्त किसी एक मानसिकता से गुजरते हैं। जीवन में हम देखते हैं कि बहुत रागात्मक जुड़ाव एवं दुख पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी करा सकते हैं। मृतक के प्रति अतिशय लगाव की स्थिति में ऐसा हो सकता है। दूसरी स्थिति यह होती है कि मृतक के प्रति द्घृणा या लगाव का अभाव उसे मानसिक स्तर पर भीतर से दुखी होने से रोके। यदि दुख में या शोक में होने के अवसर पर कोई सामान्य या स्वस्थ बना रहता है तो समाज की पारंपरिक अपेक्षाएँ उससे शोक में बने रहने का अभिनय मांगती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि मृत्यु से दुखी व्यक्ति वास्तव में दुख जीता हुआ भी धीरे-धीरे थकता हुआ निजी जीवन जीने की ओर लौट आए। ज्ञानरंजन ने इन तीनों प्रकार की मानवीय स्थितियों को एक ही कथानायक में 'मैं' के माध्यम से व्यक्त किया है। एक ही चरित्रा की तिहरी भूमिका इस कहानी को वैश्विक स्तर पर भी एक दुर्लभतम कहानी बनाती है तो कहानी में व्यक्त कई असंब( चरित्राों का मृत्यु-चिंतन एवं तिहरी भूमिका इस कहानी के मुख्य पात्रा के कई व्यवहार एवं संवादों को अपनी अतिशयता के कारण न समझ पाने वाले पाठक की दृष्टि में अविश्वसनीय या अस्वाभाविक बनाता है। पाठक या आलोचक संभवतः एक ही पात्रा के अलग-अलग मानव-व्यवहार और मानसिकता के रचनात्मक औचित्य को ठीक से समझ नहीं पाये होंगे। प्रगतिशील आलोचकों के द्वारा इस कहानी को अस्तित्ववादी कहानी मान लिए जाने का खतरा भी था। क्योंकि ज्ञानरंजन को प्रगतिशील कहानीकार के रूप में देखने की अपरिहार्यता भी थी, इसलिए न समझ पाने के कारण चुप रहना ही उन्हें बेहतर लगा होगा, जिस उपेक्षा की ओर ज्ञानरंजन इशारा करते हैं। इस तरह ज्ञानरंजन की 'यात्राा' कहानी मृत्यु जैसे महत्वपूर्ण जीवनानुभव पर स्वस्थ जीवन के लिए गंभीर विमर्श और प्रस्तावना प्रस्तुत करती है। कहानी में दिए गए कुछ सूत्राात्मक निष्कर्ष इस कहानी की उपलब्धि और महत्व के मूल्यांकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन सूत्राात्मक निष्कर्षों में-'भले ही कुछ लोगों के लिए उनकी मृत्यु गंभीर बात हो लेकिन आने वाले भविष्य से इसका कोई संबंध नहीं बचा।' ;पृ. ९५द्ध 'कोई भी आनन्द के क्षणों में दुखद समाचार पसंद नहीं करता।' ;पृ. ९६द्ध तथा 'अस्तित्व की रक्षा की मानवीय क्रियाओं को कमीनगी समझना उचित नहीं है।' ;पृ. १०१द्ध आदि प्रमुख हैं। सै(ान्तिक और दार्शनिक प्रकृति की होते हुए भी ज्ञानरंजन की यह कहानी मृत्यु-प्रसंग को लेकर जीवन की सभी संभावनाओं की सृजनात्मक और वैचारिक यात्राा करती है। मानवीय शोक अंतर्मन से लेकर अभिनय तक अनेक रूप बदलता है। थका हुआ जीवन अन्ततः चुपके से अपने पास वापस लौट आता है-'थक जाना मैंने गौर किया है, हमेशा मुझे सच्चाई के निकट कर देता है।' ;पृ. ९५द्ध दुखी होना एक सामाजिक जरूरत के रूप में व्यक्ति पर कुछ प्रदर्शनात्मक व्यवहार करने की अपेक्षाएँ लादता है। यही अपेक्षाएँ ही जीवितों के लिए मृत्यु को विसंगति और विडंबना से पूर्ण बना देती हैं। मृत्यु-शोक का वर्णन करते हुए ज्ञानरंजन की यह कहानी दिलचस्प पारसी औरत, देशी गुलाब, मृतक की गर्भवती पत्नी कौमुदी, सभ्य देशों में शोक-प्रदर्शन के लिए विकसित रिवाज तथा आकाश में द्घुमड़ते बादलों की चर्चा से गुजरती हुई, जीवन की उन छोटी-छोटी वास्तविकताओं की ओर इशारा करती है, जो चाहे और या दूसरे दुःखों के विचलन के या व्यस्तता के रूप में ही क्यों न हो, जिन्दगी को सिपर्फ दुख में ही जीने की इजाजत नहीं देती-'यह खुदा की इनायत है कि चारों तरपफ की जिंदगी से कुछ न कुछ हमेशा निकल आता है। यह कुछ इतना साधारण मगर जबरदस्त होता है कि दबोचते हुए दुख को चुपचाप लतियाकर बाहर के बाहर कर देता है। संकट में मेरी सहायता दूसरी चीजें ही किया करती हैं।' ;पृ. १००द्ध समोसे, संतरे और सुन्दर स्त्रिायाँ मृत्यु-शोक में भी जीवन के नेपथ्य, आहटों और दस्तकों की सृष्टि करते हैं। यह कहानी अपने अंत में मृत्यु-चिंतन को छोड़कर जीवन जीने के पक्ष में वक्तव्य जारी करती है। मृत्यु-चिंतन और शोकाकुलता का मानवीय व्यवहार एक संवेदनशील सभ्यता के लिए आवश्यक है-'इसमें तारीपफ की बात नहीं हैं, लेकिन तुम छोटे से अज्ञात महात्मा हो। केवल भावुक होकर अवकाश, शहर और पत्नी के लिए तुम सैकड़ों मील से चले आ रहे हो।' ;पृ. १०२द्ध तथा 'यहाँ पहुँचकर मेरे रोने और खुश होने के बीच पफर्क समाप्त हो गया।' ;पृ. १०३द्ध ज्ञानरंजन की अनुभव कहानी शहर के यथार्थ और परिकल्पना के बीच उसके द्वारा अपने नागरिकों को दिए जा रहे जीवनानुभवों की पड़ताल करती है। कहानी के अंत में कहानी का नायक अपने जीवनानुभवों के लिए न सिपर्फ हीनता-ग्रन्थि और धिक्कार भावना का शिकार होता है, बल्कि एकांत में अपने ही गाल पर तमाचे जड़ता हुआ आत्मभर्त्सना के बहाने शहर भर्त्सना की सपफल लेखकीय अभिव्यक्ति करता है। इस दृष्टि से यह सकारात्मक और निष्कर्षात्मक अंत और हस्तक्षेप वाली कहानी है। ज्ञानरंजन की प्रायः सभी कहानियाँ सकारात्मक और सक्रिय अंत की प्रस्तावना करती हैं। साठोत्तरी पीढ़ी के मोहभंग काल के अन्य कथाकारों के बीच ज्ञानरंजन की यह निजी विशेषता है। वे सभ्यता-विमर्श के कहानीकार हैं। उनकी कहानियों का यथार्थ अब भी कालान्तरण करते हुए देखा जा सकता है। उनकी कहानियों में व्यक्त टिप्पणियाँ अब भी अद्यतन हैं। कलात्मक तकनीकों की दृष्टि से 'अनुभव' ज्ञानरंजन की समृ( कहानियों में से एक है। यह कहानी आधुनिक नागरिक जीवन के दर्शन को निम्न शब्दों में प्रस्तुत करती है-'एक बार तो अनुभव हर चीज का होना चाहिए, यह आज की जिंदगी का ब्रह्म सूत्रा है।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. ६७द्ध 'आदमी सबसे भिन्न है। इसको कभी मत भूलो। उसका लोक आश्चर्यों से भरा है। मन को अनुभवों के विराट में दौड़ने दो, भटकने दो।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. ६७द्ध मोइत्राा द्वारा किसी को जीप से कुचलकर हत्या करने का प्रसंग स्पष्ट रूप से पफैण्टेसी शिल्प के इस्तेमाल का उदाहरण है-'मैंने कहा, कुत्ते, तुम क्या मर्डर करोगे।' ...गाड़ी स्टार्ट करते हुए उसने कहा, 'तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है, शु( द्घी ;वह मुझे हमेशा शु( द्घी कहता था।द्ध इधर आओ। उसने इसके बाद लंबा हाथ बढ़ाकर जीप के पिछले हिस्से से एक कुचला हुआ मूंड़ उठाया और वापस गिरा दिया।' ;वहीं, पृ. ६२द्ध यह कहानी शहर के अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए दृश्यों एवं दृष्टान्तों के अनेक चित्रा प्रस्तुत करती है। अनुभव कहानी का कथानायक 'मैं', मित्रा गणेश के बहाने शहरी जीवन में अपनी मानसिक चर्या के अनुभवों एवं उन अनुभवों से निष्पादित सूत्राों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता चलता है। अलग-अलग पदबंधों में लिखी कविता की तरह यह कहानी अलग प्रसंगों, अलग दृष्टान्तों-दृष्टिपातों के माध्यम से जीवन और सभ्यता का विमर्श उपस्थित करती जाती है-'मैं समझता था कि यह मनुष्य का विस्तार है कि वह जहाँ पैदा हो, वहीं न मर जाए।' ;पृ. ५८द्ध 'मैंने सोचा, अगर मैं दर्शक हूँ तो मुझे जल में कमल-जैसा होना है। ...जुड़ोगे तो भोगोगे। लोगों को पहचानने में व्यर्थ वक्त जाया न करो। केवल अपना काम करो। ;पृ. ६३द्ध 'आलोचकों को भाड़ में जाने दो। उनकी खोपड़ी लजीज आलोचनाओं से लबालब भरी है। वे उसी में डूबे-उतराएँ, व्यस्त रहे। अजीब जाति है इनकी। ये समय को चाल रहे हैं, लोगों को चाल रहे हैं, इतिहास को चाल रहे हैं, विद्वान हैं, चलनी बन गए हैं।' ;पृ. ६३द्ध 'यह मार थी और इस मार को खाकर मैंने कहा, अब जैसा भी द्घटे लेकिन बागडोर का प्रयोग खत्म।'' ;पृ. ६४द्ध 'यह शु( दलदल है। अपने को बरबाद मत करो।' ;पृ. ६५द्ध इस कहानी में ज्ञानरंजन की रचना-प्रक्रिया की मुख्य विशेषता कथा-भाषा को काव्य-भाषा में रूपान्तरित और उससे विस्थापित करने की है-'शान्ति की चपेट बढ़ती जा रही थी। मैं अन्दर से बहुत शान्त था। मैं अपनी अशान्ति को किसी दार्शनिक भाले से ही भेदना चाहता था। शान्ति किसी दुरभिसंधि के एक माकूल इस्तेमाल की तरह बहुत आराम के साथ चल रही थी।' ;पृ. ५६द्ध 'शहर अपनी कब्र में विदा ले रहा है? बगीचे, सड़कें और इमारतें अब एक भूत की तरह हिल रही हैं।' ;पृ. ६४द्ध तथा 'क्या तुम्हें उनमें परिपक्वता की सड़ांध नहीं आ रही है। वे अपना हाथ उठा चुके हैं और अब दिन भर में सिपर्फ कई हजार धड़धड़ाती सांसें लेते हैं।' ;पृ. ६५द्ध पाठकीय सार्थकता के लिए यह कहानी क्षेपक की शैली में एक अप्रत्याशित जीवन-अनुभव प्रस्तुत करती चलती है। अंधेरे में अपनी गिरी चवन्नी खोजते एक अनजान व्यक्ति की अपनी माचिस जलाकर सहायता करना और चवन्नी पाकर उसका अपनी झेंप मिटाने के लिए तुरन्त खिसक जाना। इस परिस्थिति को ज्ञानरंजन ने असामान्य तर्क की अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया है। व्यवहार के कारण के रूप में वह एक भिन्न परिकल्पना देता है-'चवन्नी लेकर जब वह खड़ा हुआ तब उसे लगा कि सन्नाटा और अकेलापन है और उसकी चवन्नी खतरे से बाहर नहीं है। कृतज्ञता और भय के बीच पफंसा वह तेजी से खिसक गया।' ;पृ. ५७, ज्ञानरंजन, प्रतिनिधि कहानियाँद्ध आर्थिक विपन्नता में पड़े मनुष्य के लिए चवन्नी का महत्व और उसको खोजते हुए किसी मनुष्य द्वारा पकड़ लिए जाने के कारण खिसक लेना एक प्रत्याशित सामाजिक अनुभव है लेकिन कहानीकार और कथानायक 'मैं' उसका कारण दूसरा ही प्रस्तुत करते हैं, जिसकी असहजता को पाठक महसूस कर सकता है और उसके अन्तराल में सोचने के लिए विवश भी हो सकता है। इस तरह यह कहानी सोचने के लिए भी पाठकों को उकसाती चलती है। प्रेम-भावना की सामाजिकता की पड़ताल की दृष्टि से ज्ञानरंजन की 'हास्यरस' कहानी महत्वपूर्ण है। यह कहानी कचहरी में प्रेम-विवाह करके अभी-अभी बाहर निकले एक नवविवाहित दम्पति के प्रेम व्यापार और मानसिकता का चित्राण पुरुष-मन और चिन्तन के माध्यम से करती है। यह कहानी आज प्रकाशित होती तो संभवतः स्त्राी-विमर्शवादी महिला-कथाकार शोर मचा देतीं, लेकिन इसमें कुछ ऐसा सामान्यीकरण है कि पुरुष के स्थान पर स्त्राी पात्रा रख दिया जाए तो भी उसकी मनोवैज्ञानिकता सुरक्षित रहेगी। हास्यरस कहानी का आरंभ कथा-नायक की इस स्वीकारोक्ति के साथ होता है कि 'बाहर निकलते ही मैंने अपने को दूसरा और पराजित अनुभव किया मेरी पत्नी संतुष्ट और निश्चिंत है और उसके खिले हुए चेहरे से मुझे प्रसन्नता नहीं हो रही है। यह खिला हुआ चेहरा और कुछ नहीं, विजय का गर्व है। यह स्पष्ट हो चुका है कि मैं द्घाटा खा चुका हूँ और मुझे पराजित करने वाला मेरा साथी तत्काल हर चीज की मांग करने का अधिकारी हो गया है।' ;पृ. २९द्ध इस कहानी में ज्ञानरंजन ने प्रेम विवाह के प्रेमेतर कारणों का भी सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जो प्रेम विवाहों को प्रायः द्घटित करते हैं। चयनित साथी के व्यक्तित्व की पसंद-नापसंद, प्रेम के पूर्व-दृष्टान्तों का प्रभाव कुछ अधिक उत्तेजक और जोखिमपूर्ण ढंग से क्रान्तिकारी ;अंतर्जातीयद्ध विवाह करने की लालसा, जो ऐसे विवाहों के कर्ताओं को विशु( प्रेम से इतर भी नायकत्व और वैशिष्ट्‌य प्रदान करते हैं। यदि प्रेम वास्तव में प्रेमियों के परस्पर व्यक्तित्व के गहरे प्रभाव से उत्पन्न नहीं है तो विवाह के पश्चात जोखिम की उत्तेजना समाप्त होते ही मोहभंग का शिकार होकर प्रेम, गले पड़े प्रेमी की हत्या तक भी जाते देखा गया है। मोहभंग की इन्हीं वैचाारिक संभावनाओं की तलाश करने वाली यह कहानी प्रेम विवाह पर एक बहुआयामी विमर्श प्रस्तुत करती है। ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों की तरह इस कहानी में भी प्रेम और विवाह जैसी सामाजिक और सांस्कृतिक आदत पर अनेक रोचक और मौलिक टिप्पणियाँ की गई हैं। जैसे-'वह बड़ी उत्सुकता, ताजगी और सिपफारिश के साथ गवाही देने आया था। असलियत यह थी कि वह अनुभव प्राप्त करना चाहता था।' ;पृ. ३१द्ध 'ऐसी स्त्रिायों के चरित्रा का क्या भरोसा किया जाए? कब किसी दूसरे पर पिफसल पड़ें। ;पृ. ३२द्ध 'मुझे भी दुनिया को पटाना चाहिए।' ;पृ. ३६द्ध 'इस समय मुझे सिलसिलेवार वे सभी परिचित और गृहस्थ दोस्त याद आ रहे हैं, जो पिकनिक, भोजन और द्घरेलू समारोहों में मुझ अकेले अविवाहित को निमंत्रिात करके दया दिखाते और अपनी उदारता का परिचय देते हैं। मैं ऐसे सब लोगों के द्घर जाऊँगा और अपनी स्त्राी दिखाऊँगा।' ;पृ.३७द्ध तथा 'कुंवारे लोग दूसरे की बीवी देखकर लालची और ईर्ष्यालु भी सकते हैं।' ;पृ. ३८द्ध 'पफेंस के इधर और उधर' कहानी वस्तुतः शहरी नागरिक जीवन की सामाजिकता का अपने पड़ोसी से उसकी संबंधहीनता और संवेदनहीनता का रोचक वृत्तांत प्रस्तुत करती है। मनुष्य स्वभावतः ही एक सामाजिक प्राणी है और उसके लिए निरपेक्ष-तटस्थ जीवन जीना प्रायः संभव ही नहीं। कहानी में पफेंस के उधर रहने वाले पड़ोसी में दूरवर्ती सामाजिकता मिलती तो है, लेकिन वह आधुनिक समय के विस्थापन की मानव-नियति से संस्कारित और संयमित रूप में है, जबकि इस पार की सामाजिकता अपनी जड़ों को जीने वाली स्थानीय सामाजिकता है। कहानीकार ने इस कहानी में आधुनिकताजीवी और परंपराजीवी पड़ोसियों की भिन्न मनोरचना और वैचारिकी का द्वंद्व भी सम्मिलित कर दिया है। कहानीकार ने दोनों ही पड़ोसियों को एक समकालीन और समकक्ष सामाजिक वास्तविकता की तरह उपस्थित कर बिना किसी अतिरिक्त टिप्पणी के उसे पाठकों के सामने रख दिया है। ज्ञानरंजन की बहुआयामी और बहुपक्षीय जीवन-दृष्टि उनकी अन्य कहानियों की तरह इस कहानी को भी सर्वकालिक और विशिष्ट बनाती है । ज्ञानरंजन की 'छलांग' वयःसंधि में अन्तर्मन की सच्चाइयों और सार्वजनिक अभिनय के बीच द्वंद्व को रेखांकित करने वाली एक अच्छी कहानी है। यौन भावनाओं को लेकर चेतन व्यवहार और अचेतन मन की कशमकश को चित्रिात करती यह कहानी ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों की तरह ही मानव-मन के भीतरी रहस्यों को उजागर करती है। इसे किसी व्यक्ति द्वारा दिखाए जा रहे चरित्रा और जिए जा रहे चरित्रा के पफर्क के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है। बाहर से सब कुछ शांत और सभ्य दिखने के बावजूद जिंदगी को अशांत और यातनादायी रिश्तों में बदल देती है। उनकी 'अमरूद का पेड़' कहानी पुरानी पीढ़ी द्वारा यथार्थ के सही साक्षात्कार न कर पाने की समस्या से संबंधित है। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में इसे अंधविश्वासपूर्ण प्रत्यक्षीकरण की समस्या के रूप में भी देखा जा सकता है। कहानी में कन्हैयालाल की बूढ़ी पत्नी के इस कथन के साथ कि 'पश्चिम की तरपफ यदि मकान का मुखड़ा हो और सामने ही अमरूद का पेड़ तो राम-राम बड़ा अशुभ होता है।' संस्मरण के शिल्प में लिखी गयी इस कहानी में अमरूद का पेड़ अपनी अविस्मरणीय पफलदार उपस्थिति के बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण जीवन की तमाम आशंकाओं और अभिशाप का प्रतीक भी बन जाता है। नयी पीढ़ी के आशावादी और अंधविश्वास रहित जीवन-बोध की सराहना करने वाली यह कहानी इस स्वस्थ दृष्टि की प्रस्तावना करती है कि 'हममें दृष्टिकोण की उदारता परिलक्षित होती और किसी भी द्घटना या आकस्मिकता या एक सम्पूर्ण परिस्थिति को हमलोग अनहोनी नहीं मानते थे। जीवन में सब सहज है, सब संभव।' ;पृ. ११द्ध इस कहानी की माँ अपने संपूर्ण प्रतिरोध के बावजूद जीवन की नकारात्मकताओं को अपशगुनी अमरूद के पेड़ से जोड़ने के लिए विवश होती है। 'द्घण्टा' ज्ञानरंजन की उन बहुचर्चित कहानियों में से एक है, जिनके निहिताथों का पफलक बड़ा है। ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों की तरह इस कहानी में भी सभ्यता-समीक्षा का गंभीर विमर्श उभरता है। वैसे तो उनकी हर कहानी सभ्यता-समीक्षा के अलग-अलग विशेष आयाम अपने वैचारिक एवं काव्यात्मक गद्य के माध्यम से उठाती है। 'द्घण्टा' कहानी में असुविधाजीवी निम्न मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि से आए बु(जिीवी के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था में तथाकथित उच्च-अभिजातवर्गीय उपनिवेश की समीक्षा की गई है। कलात्मक दृष्टि से भी 'द्घण्टा' कहानी का शिल्प महत्वपूर्ण है। इसका कथानक कहानी के मुख्य पात्रा के चिन्तन से ही नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार और सक्रियता से भी उभारा गया है। प्रथम दृष्ट्‌या पेट्रोला मध्यवर्गीय असुविधाजीवियों का आशियाना लगती है । कुन्दन सरकार का द्घण्टा होना आर्थिक अपंगता या परावलंबिता का ही प्रतीक है। कहानी की सारी सृजनात्मक संभावनाएँ रेस्त्राां को पूंजीवादी-बाजारवादी सभ्यता के रूपक के रूप में प्रस्तुत करने में ही छिपी हुई हैं। रेस्त्राां के डॉयस पर नृत्य करती युवती के अधोवस्त्रा का नाड़ा खुलकर लटकने पर, उसके चमकदार परिधान के पीछे से उसके मलिन अन्तःवस्त्राों का झांकना उसके निम्नवर्गीय होने की ही प्रतीकात्मक द्घोषणा है। द्घण्टा की अनुगूंज संपूर्ण निम्न-मध्यवर्ग के प्रतिनिधि के रूप में भी सुनी जा सकती है । इस तरह कहानी में रेस्त्राां का संपूर्ण परिवेश मनोवैज्ञानिक सांकेतिकता लिए हुए और सोद्देश्य है । उसका उत्सवधर्मी, नाटकीय, कृत्रिाम, प्रायोजित जीवन बाजार केन्द्रित शहरी सभ्यता का प्रतिनिधि प्रतिरूप ही है। इस कहानी में भी सूत्राात्मक निष्कर्ष एवं काव्यात्मक अभिव्यक्ति वाले अनेक अद्वितीय रोचक स्थल हैं-'वह ;पेट्रोलाद्ध कापफी अज्ञात जगह थी। उसे केवल पुलिस अच्छी तरह जानती थी।' ;पृ. १०४द्ध, 'चीजों को चखते हुए वे दूसरों की औरतों का शील सभ्यतापूर्वक चाट रहे थे। वे अपने अलावा दूसरों को वहाँ अनुपस्थित समझ रहे थे। कहीं वे इस दुर्गन्ध के भी शिकार थे कि रेस्त्राां का यह हॉल उनके लिए वातावरण बनाता है और यह दुनिया उनकी शोभा के लिए बनी है।' ;पृ. १०९द्ध, 'उनकी आँखों में बेडरूम सीन चमक रहा था। 'बहिर्गमन' कहानी आधुनिक मीडिया-युग के नायकों के जीवन, यथार्थ और प्रसि(ि की प(ति पर केन्द्रित सर्वाधिक प्रभावी, प्रामाणिक और विशेषज्ञ कहानी है। यह कहानी एक मामूली आदमी की आँख से समय के ख्यातिलब्ध बड़े विशिष्ट आदमी मनोहर और सोमदत्त के संवेदनातीत बड़प्पन की शवपरीक्षा है। अपने आम ;निम्नमध्यवर्गीयद्ध परिवेश से असंतुष्ट अतिसंवेदनशील कस्बाई युवक मनोहर अपनी महत्वाकांक्षी ऊंची उड़ान के साथ ही किसी राकेट की तरह ही अपनी संवेदनशीलता का ईंधन खोता जाता है। आम समाज की जड़ता से क्षुब्ध, उसके यथार्थ को द्घृणा और नापसंदगी के ज्वलनशील ईंधन से पीछे छोड़ता हुआ ग्रामीण कस्बे से दिल्ली पहुँचता है पिफर दिल्ली से भी दूसरे बूस्टर इंजन प्रवासी सोमदत्त का प्रयोग कर विदेश यात्राा पर रवाना हो जाता है। यह कहानी मूलतः अवसरवादी उपलब्धियों एवं विशिष्टताबोध को खारिज करती है। कहानी के प्रारंभ में ही कथावाचक 'मैं' ने अपनी पृष्ठभूमि स्पष्ट कर दी है-'मैं विद्रोही नहीं था। मेरा मार्ग नितान्त सड़ियल, भाग्यशून्य और आम था। मैंने अपने मामूली जीवन को केवल चौकन्नी पहरेदारी के अन्दर जिलाए रखने की ही तमन्ना की थी।' ;पृ. ११७द्ध इस तरह इस कहानी का कथावाचक मैं एक आम आदमी की दृष्टि से असमान्यता के आकांक्षी कथानायक मनोहर के रूप में आज के आम सपफल बु(जिीवी की महत्वाकांक्षी उड़ान का कथांकन करती है। ज्ञानरंजन की प्रगीतात्मक आत्माभिव्यक्ति वाली आरंभ की छोटी कहानियों से अलग 'बहिर्गमन' कथावस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर महाकाव्यात्मक संपूर्णता और विस्तार वाली अद्वितीय कहानी है। पहली दृष्टि में इसके कथानक को प्रतिभा-पलायन, करियर-निर्माण की महत्वाकांक्षी यात्राा, विदेशगमन की अभिलाषा आदि से भी जोड़कर देखा जा सकता है, लेकिन आगे चलकर यह कहानी यौन-सुख की कामना वाली आधुनिकता से असहमति का आख्यान बन जाती है। इस दृष्टि से सोमदत्त के जीवन का वह प्रसंग कापफी संकेतपूर्ण है, जब अनिच्छुक रहने की स्थिति में देर रात में पत्नी के पास पहुँचे सोमदत्त को उसकी पत्नी ही एक अन्य स्त्राी के पास यौन-सुख के लिए भेज देती है। ऐसी पत्नी इस उदारता और स्वतंत्राता का इस्तेमाल अपने पक्ष में भी कर सकती है, इस संभावना को कहानीकार ने पाठक की कल्पना के लिए छोड़ दिया है। वस्तुतः बहिर्गमन कहानी की अविस्मरणीयता एक संवेदनशील विद्रोही क्रांतिधर्मी कस्बाई युवक के कुण्ठा, संद्घर्ष और निष्क्रमण की जीवन-यात्राा में उसकी संवेदनात्मक मृत्यु या उसके संवेदनातीत होते जाने के व्यक्तित्वांतरण और विस्थापन के त्राासद आख्यान होने में छिपी हुई है। आधुनिक सभ्यता में पूंजी और बाजार पर आधारित प्रसि(ि के खोखलेपन, उसकी कला, पेशेवर मनोविज्ञान और मिथ्या छवि-निर्माण की प्रक्रिया पर भी यह कहानी अच्छा प्रकाश डालती है।
ये...
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सोमवार, 17 सितंबर 2012

र्इश्वर के बिना... (र्इश्वर का समाजशास्त्र )

र्इश्वर के बिना...

(र्इश्वर का समाजशास्त्र ) 



मैंने सारी सफलताएं
र्इश्वर के बिना ही प्राप्त की हैं-मित्र नें कहा

दुखती पिण्डलियों के साथ चढ़ा हूं समय का पहाड़
जैसे किसान र्इश्वर से अधिक अपने
बहते पसीनें को जानता है
खेत जोतते और मिटटी तोड़ते हुए
आजीविका के लिए सारी-सारी रात जागकर
ट्रेन और ट्रक चलाते ड्राइवरों की तरह
जो लड़ते रहते हैं अपनी नींद और मृत्यु से

हर शिकारी के लिए
र्इश्वर से अधिक अनुभव ही सफल बनाता है
जैसे खाना बनाने का हुनर सीखे बिना
नहीं बजवायी जा सकतीं सफलता की तालियां

शेरनी अपने अनुभव से पहचानती है कि
कि कौन-सा उपयुक्त शिकार बच्चा,बूढ़ा है या लाचार
और किसे बनाया जा सकता है
घायल होने के जोखिम के बिना
आसानी से अपना शिकार
या फिर कितनें सहयोगियों के साथ मिलकर
मर गिराया जा सकता है कोर्इ बड़ा शिकार...

परिदृश्य में र्इश्वर कहीं नहीं था
और आसानी से जिया जा सकता था र्इश्वर के बिना
समझते हुए समय और बाजार को
नेताओं को जीत के लिए र्इश्वर को नहीं
जनता के मन को समझना और पटाना था
डकैत और हत्यारे अपने अनुभव यानि हुनर से ही जानते थे कि
किस हत्या के लिए कितनें साथियों की जरूरत होगी
और कहां छिपकर लगाना होगा उन पर घात !

इधर एक मित्र की कविता पढ़ी
र्इश्वर का होना हास्यास्पद बताते हुए
और मुझे पूरी तरह लगा कि वे सच बोल रहे हैं
मित्र जो बार-बार कहते है कि
मैंने सारी सफलताएं (आत्मा पर पत्थर रखकर)
सिर्फ राजनीति से हासिल की हैं
जैसे कि अनेक मूर्खों को विद्वान कहा है
(जो वास्तव में हेड का साला होने के कारण
एक दिन प्राफेसर पद तक जा पहुंचे )
और भ्रष्टों को महान.....

ऐसे बिकाऊ दौर में जब खरीदनें की शकित न हो तो
सफलता के लिए मुझे र्इश्वर से अधिक
अपनी विनम्र वाणी और
चापलूसी में झुकी अपनी दुखती कमर पर अधिक भरोसा है

फिर भी जब जंगल में शिकार कम हो जाते हैं
या फिर बढ़ जाते हैं शहर में अपराध
बढ़ जाती है जीने की प्रतिस्पद्र्धा और असुरक्षा
बढ़ती प्रतीक्षा और घटते धैर्य के साथ-साथ
हर उच्छवास और हर बात में
एक मुहावरे के रूप में
लौट आता है र्इश्वर....

निष्कर्ष रूप में र्इश्वर
सिर्फ शाकाहारियों और सदाचारियों के लिए है
या फिर अपने पुरखों के प्रति सुरक्षित उत्तराधिकार के लिए कृतज्ञ
उन प्रतीक्षा (नियति) वादियों के लिए
जो स्वयं सही रहते हुए दूसरों के भी सही बने रहने के प्रति
सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं....



तकनीकी दरिद्रता में....


एक दुर्घटना की तरह आती है तकनीकी दरिद्रता
बहुत कुछ अप्रत्याशित और अविश्वसनीय....
शहर के ए0टी0एम0 मशीनों के एक साथ लिंक फेल होने की तरह....
या फिर ऐसी छुटिटयां जब बैंक वाले निकल पड़ते हैं एक साथ
जेल की टूटी दीवारों के पार निकल भागे कैदियों की तरह....

तकनीकी दरिद्रता में जब हम किसी से कहते हैं कि
रुपए नहीं रहे मेरे पास....तो मित्र
मनने के लिए तैयार ही नहीं होते
कि रुपए भला कैसे नहीं होंगे हमारे पास !
पत्नी और बच्चे भी नहीं करते विश्वास
कि सुबह से बनाने के लिए नहीं मिला कोर्इ और....

तकनीकी दरिद्रता में
भीतर से घबराहट होने लगती है
और ट्रेजरी के बाबू पर भी आता है गुस्सा
दूकानदार यधपि अपमानित नहीं करते
लगते हैं गर्व भरे सहयोगी-सâदय
फिर भी अपमानमय रहता है अन्त:करण....

तकनीकी दरिद्रता में दुखते समय को लावारिस छोड़कर
आगे बढ़ जाते हैं-बहुत कुछ हम नहीं कर पाते
कर्इ बार तो स्वयं भीख मांगने की परिसिथतियों में
होते हुए भी नहीं मांग पाते भीख......

तकनीकी दरिद्रता चुभती है मजाक -सी
रोते हुए भी हंसना पड़ता है खुद पर
भविष्य के लिए बचत की मिलती जो सीख !

समयांकन


चूहे बिलिलयों से बचने के लिए
सांपों के लिए बिल खोद रहे थे
घबराहट में और अधिक संख्या में
बेमौत मारे जा रहे थे कायर......
भागकर चूहों की तरह ही
सापों के मुख में जा फंसे थे !

और मैं चारों ओर से घिरे हुए बाढ़ में डूबे
अकेले खडे़ ऊंचे पेड़ पर चढ़ बैठे बन्दर की तरह
अकेला बचा हुआ था
मानक आदशोर्ं के शिखर ऊंचाइयों की
थकी हुर्इ टहनियां पकड़े
ज्बकि सभी बदल गए थे-चुपके-चुपके-चुपके...
एक-दूसरे से अपने अपमानजनक समझौतों की खबरें छिपाए
किसी सुरक्षित शरणस्थल पर पहुंचकर
डूबते हुओं के प्रति
अफसोस प्रकट करने के लिए.....

                       

सोमवार, 6 अगस्त 2012

भिन्न भावलोक में


जनसत्ता 5 अगस्त, 2012: सुपरिचित कवि उद्भ्रांत के संकलन अस्ति की कविताएं अद्यतन विचारशीलता, वस्तु वैविध्य, आत्मीय संवादधर्मिता और संवेदनात्मक रिपोर्ताज शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं।
ये एक आधुनिक बुद्धिजीवी के नागरिक मन, चिंता और बोध का विमर्श रचती हैं। समकालीन परिवेश और समाज को समझते और समझाते हुए, उसमें अपने अस्तित्व और स्व की तलाश करने वाली कविताएं आधुनिक मनुष्य के लिए अस्मिता की तलाश की चिंता से उपजी हैं। आत्माभिव्यक्तिमें सामाजिकता और सामाजिकता में आत्मान्वेषण ने उद्भ्रांत की अधिकतर कविताओं को आत्मीय, संवेदनशील, ईमानदार और अनौपचारिक रूप में विशिष्ट बनाया है।
अपने शिल्प और संरचना में ये कविताएं आत्मकथा, संस्मरण, समाचार, संस्कृति, समाज और विज्ञान संबंधी विचारों के विविध आयामों का संसार समेटे हुए हैं। इनमें ‘नई सृष्टि’, ‘दादाजी’ और ‘नवलगढ़’ शीर्षक से चार और ‘अयोध्या’ शीर्षक से सात आत्मकथात्मक कविताएं हैं तो सारा आबिदी, कालू जल्लाद, भटकती आत्माएं जैसी समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरों को पढ़ कर लिखी गई मार्मिक कविताएं भी। हांडी, जंगलतंत्र और बकरामंडी जैसी काव्यात्मक रिपोर्ताज शैली में लिखी गई कविताएं भी हैं जो कालाहांडी, सरिस्का के जंगल और जामा मस्जिद की बकरामंडी पर लिखी गई हैं।
कवि ने समकालीन जीवन के यथार्थ को इतने कोणों और आयामों से देखा है कि शायद ही कोई पहलू छूटा हो। इन कविताओं की सबसे अच्छी बात है कि ये एक सार्थक संवेदनात्मक पक्ष चुनती हैं। सही जीवन के पक्ष में प्रश्न उठाती और उनका उत्तर देने का भी प्रयास करती हैं। कवि ने समय और परिवर्तन की हर नन्ही आहट को सुना और दर्ज किया है। पेंटिंग, लाइट होल, ब्लैकहोल, उड़नतश्तरी, पेपरवेट, काक्रोच, टार्च, फ्लैट, पोस्टकार्ड, गांधी आश्रम और गिरगिट से लेकर इत्ता-सा ब्रह्मांड तक ‘अस्ति’ का काव्य-संसार बनाते हैं। इन कविताओं के माध्यम से उद्भ्रांत आधुनिक नागरिक जीवन-बोध और सांस्कृतिक पुनर्विचार के कवि रूप में भी सामने आते हैं। उनकी रचनात्मक चिंता परंपरा और सभ्यता के पुनर्विचार और पुनर्संस्कार की भी है।
उद्भ्रांत के यहां आधुनिक सभ्यता द्वारा निरस्त कर दिए गए परंपरागत जीवन-मूल्यों, रीतियों और विश्वासों का बड़ा संसार है। उनकी कविताएं बार-बार इस निरस्ति को समझना और समझाना चाहती हैं। उनकी कविताएं पारंपरिक विश्वासों में फंसे हुए मनुष्य के आधुनिकतावादी रूपांतरण को व्यापक और बहुआयामी विमर्श देती हैं। ‘क्या शैतान के भी सींग होते हैं’ और ‘मैंने ईश्वर को देखा प्रत्यक्ष’ ऐसी ही कविताएं हैं। उनकी ‘सारा आबिदी’ कविता सीबीएसइ की दसवीं कक्षा की परीक्षा में देश में प्रथम स्थान पाने वाली छात्रा की मार्ग दुर्घटना में हुई असामयिक मृत्यु पर लिखी गई है। संवेदनाजनित पीड़ा के निवारण के क्रम में ही कवि नियति और ईश्वर जैसी सभी सांस्कृतिक अवधारणाओं की पड़ताल करता हुआ एक प्रतिरोध रचता जाता है। ‘आत्महत्या’ कविता भी इसी तरह संवेदनात्मक रिपोर्ताज है। संकलन की अनेक कविताएं संस्मरणात्मक और संवादी हैं। कई कविताएं आधुनिकता का सांस्कृतिक विमर्श रचती हैं। ‘जैसे सपना एक चकमक पत्थर है’ कविता सृजन की दार्शनिकी प्रस्तुत करती है तो ‘नवग्रह’ में सही मूल्यांकन न होने की पीड़ा है।
‘अस्ति’ की दुनिया एक संवेदनशील सक्रिय मस्तिष्क की बेचैनियों की दुनिया है। एक समर्थ कवि की काव्यांकित दैनंदिनी, आत्मकथात्मक काव्य-रूप है। संवेदना, अनुभूति और विचार की त्रई उनकी अधिकतर कविताओं को काव्यात्मक निबंध या फिर संवेदनात्मक आख्यान बना देती है। ऐसे में अनौपचारिक अकृत्रिम भावावेग और गीतलेखन की साधना और संस्कार उनकी लंबी कविताओं को भी काव्यत्व-निर्वाह की दृष्टि से सफल बनाते हैं। 
समकालीन कविता के संपूर्ण परिदृश्य को सामने रख कर उद्भ्रांत की कविताओं के वैशिष्ट्य पर अलग से विचार करें तो कुछ इस तरह का आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य उभरता है। समकालीन लोकप्रिय हिंदी कविता ने बहुत चालाकी से एक बाजारोन्मुख पेशेवर शिल्प विकसित किया है। अमूर्तन, अस्पष्टता, खुसरो की पहेलियों जैसी ज्ञानरंजकता इस कविता के शिल्प की विशेषता है। पारदर्शी और स्पष्ट संवेदनात्मक आत्माभिव्यक्ति इस कविता के लिए एक घटिया कलावस्तु बन जाती है। अबूझ शिल्प की ये कविताएं प्राय: विशेषज्ञों के लिए लिखी जाती हैं और आम जनमानस की समझदारी की सीमा से दूर रहती हैं। बाजार पर नियंत्रण और बराबरी के सैद्धांतिक आधार वाले बहुसंख्यक लोकतांत्रिक समाज में नेतृत्व का अलग पेशेवर मनोविज्ञान हुआ करता है। चाहे साहित्य-लेखन ही क्यों न हो, सत्ता के प्रभावी केंद्र के रूप में विकसित होने के लिए उचित दूरी का मनोविज्ञान छिपाव की कला का एक अलग शिल्प रचता है। संभव है कि विज्ञापित होने के लिए पाठक से भी दूरी बनाए रखना और संप्रेषणीयता की दृष्टि से अबूझ बने रहना ही उंचाई के छवि-निर्माण की दृष्टि से युक्तियुक्त हो।
उद्भ्रांत की कविताएं बौद्धिकता के साथ-साथ संवेदनशीलता और भावुकता का मानसिक पर्यावरण बचाने के रचनात्मक प्रयास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। समकालीन भावबोध वाली उनकी कविताओं में कविता के समकालीन बाजार की प्रचलित कलात्मक-बौद्धिक मुद्रा से अलग सहज संवेदनात्मक साक्षात्कार का शिल्प मिलता है। ये कविताएं एक और बिंदु पर महत्त्वपूर्ण हैं। विचारधारात्मक वर्जना के कारण एक अघोषित सेंसरशिप के रूप में मुख्यधारा की प्रगतिशील कविता ने आम भारतीय जनमानस के बहुत-से सांस्कृतिक प्रश्नों और   मनोग्रंथियों को अछूता छोड़ दिया था। उदाहरण के लिए, जाति और धर्म की बहुत-सी सामाजिक निर्मितियां, जो हमारे समाज में तो हैं, भले बुद्धिजीवियों ने उचित भाषा में या वैचारिक प्रतिरोध के स्तर पर उनका संज्ञान न लिया हो। ये कविताएं प्रगतिशीलता को आधुनिकता से जोड़ कर उसकी समझदारी को एक वृहत्तर आयाम दे देती हैं।
उनकी कविताओं में पाठक से अधिक से अधिक संवाद करने की आकांक्षा दिखती है, और वे एक अलग तरह का तरल-सरल शिल्प सामने लाती हैं। गीत लेखन से गद्य कविताओं की ओर आने के कारण उनकी काव्यभाषा में एक विशिष्ट सांगीतिक संस्कार दिखता है। परंपरागत शब्दावली में कहा जाए तो उनकी कविताएं गीतात्मक संस्कार लिए अभिधा की कविताएं हैं। सर्जना का सौंदर्य उनकी काव्यभाषा की सहज बुनावट और संप्रेषणीयता में है।
उनकी कविताएं अनौपचारिक शिल्प की कविताएं हैं। उनके काव्य में माध्यम का रचाव गौण है और सच कहा जाए तो वह कवि की प्राथमिकता में ही नहीं है। माध्यम के अकृत्रिम रचाव के कारण ही ये कविताएं सीधे संवेदना तक ले जाती हैं। वे प्रतीकबहुल बौद्धिक दुरूहता के स्थान पर बिंबों का भावपूर्ण संसार रचती हैं। यह संवेदनाधर्मिता ही उनकी कविताओं को सार्थक और विशिष्ट बनाती है। उनकी कविताएं कलात्मक रचाव की नहीं, बल्कि संवेदनात्मक उपस्थिति की कविताएं हैं। हर भावुक विक्षोभ उनके यहां कविता बन गया है।
रामप्रकाश कुशवाहा
अस्ति: उद्भ्रांत; नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 750 रुपए।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

संस्कृतियों का वैश्विक संघर्ष और सभ्यता का पुन:पाठ

सृजन-संवाद
संपादक-ब्रजेश
इ -६४ ,साऊथ सिटी ,लखनऊ



          विकास और इतिहास की पृष्ठभूमि सम्बन्धी भिन्नता के कारण ,भिन्न-भिन्न जीवन-पद्धति और मानव-व्यवहार को प्रस्तावित करती हुर्इ विश्व की हर संस्कृति जीवन जीने का एक भिन्न (सामूहिक) पाठ प्रस्तुत करती है । जीवन शैली की भिन्नता जहां एक ओर संस्कृति विशेष की विशिष्टता का आधार बनती है ; वहीं अलग भौगोलिक अंचल और सामुदायिक मूल की सांस्कृतिक आदिमताएं मानव-विश्व को अलग-अलग समुदायों में भी बांटती हैं ।  दूसरी ओर सांस्कृतिक एकता अलग-अलग नस्लों के लोगों को एक सामाजिक-सांस्कृतिक र्इकार्इ के रूप में पुनसर्ंयोजित भी करती हैं । इन दोनों प्रक्रियाओं के कारण ही एक मानव-विश्व के निर्माण की दृष्टि से संस्कृतियों को सकारात्मक और नकारात्मक दोहरी प्रकार्यात्मक भूमिका में देखा जा सकता है । अपने प्रभावितों और अनुयायियों की संख्या अथवा जनसंख्यात्मक विस्तार तथा मानव-व्यवहार के प्रतिमानीकरण की दृषिट से देखने पर हर सांस्कृतिक समुदाय एक भिन्न ऐतिहासिक संक्रमण-यात्रा है ।  इस दृषिट से सारी संस्कृतियां मानव-व्यवहार के आदर्श प्रतिमान की खोज एवं प्रभाव का परिणाम हैं । वे जीवन-पद्धति का सरलीकरण करती हैं ; एक सामान्य एवं सर्वमान्य चरित्र-सृषिट को प्रस्तावित करती हैं  और मनोवैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो वे समुदाय-विशेष के सभी सदस्यों को एक समान प्रत्यक्षीकरण हेतु ऐसे प्रभावी एवं मार्मिक व्यकितत्वों की कथात्मक पुनर्पस्तुति करती हैं , जो विभिन्न अवसरों पर उनके संवेदनात्मक व्यवहार को एक पद्धति दे सके ।
            सही अथोर्ंं में संस्कृति मनुष्य की परम्रागत व्यवहार-पद्धति ही है । एक ऐसा व्यवहार जो उसके निजी विवेक से कम लेकिन उसे उत्तराधिकार में मिले सामाजिक व्यवहार से अधिक संचालित और सम्बनिधत होता है । इसप्रकार कहीं न कहीं हर संस्कृति वर्तमान मानवीय विवेक का शैक्षणिक अतीतीकरण ही है अथवा दूसरे रूप में वह अतीत की स्मृतियों और मानवीय विवेक का वर्तमानीकरण है । इसप्रकार संस्कृति उत्तराधिकार में मिली हुर्इ सभ्यता है । यह अनुभव और अबादतों के रूप में बचा हुआ पिछली पीढ़ी का वर्तमान है । हमारी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक आदतें ही हमारी सभ्यता का अलग प्रारूप रचती हैं । हमारी सभ्यता का मूल उत्स हमारी अचेतन ऐतिहासिक-सामाजिक ग्रनिथयों में है । हम मूलत: अतीतजीवी हैं । हमारा वर्तमान भी अतीत की पद्धतिगत उपसिथति हैं । हम जब नया इतिहास बना रहे होते हैं तब भी मानव-इतिहास की पुरानी आदतों को ही दुहरा रहे होते हैं । हमारा स्वयं को बदल पाना इतना आसान नहीं होगा । कर्इ बार हम पुन: उसी दुनिया में अपने पड़ोसियों द्वारा खींच लिए जाते हैं जिसे अपनी दृषिट मेंं पूरी तरह व्यर्थ जानकर छोड़नें की तैयारी कर रहे होते हैं हम । कर्इ बार न बदल पाने के कारण तकनीकी और यानित्रक भी होते हैं । उदाहरण के लिए भाषा-सम्प्रेषण के लिए एक अलग संसार ही रचती है । यह संसार एक काल-निरपेक्ष उपसिथति का होता है । भाषा कायान्तरण और कालान्तरण दोनों का ही माध्यम है । भाषा की यह प्रकृति ही मानवीय स्मृति और साहित्य दोनो को ही अपरिवर्तनीय बना देती है । सिद्धान्तत: वह अपनी साहितियक स्मृति को तो नहीं बदल सकता ,लेकिन समझ बदल सकता है ।
       सांस्कृतिक प्रभाव के कारण ही हमारी सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा सुदूर अतीत के मनुष्यों के अनुभवों ,विचारो और कल्पनाओं पर आधारित और उससे सामूहिक अचेतन प्रभावों के रूप में सम्बधित है।  अतीत के अविस्मरणीय मनुष्य और उनकी भोली अवधारणाएं अब भी हमारे मानसिक पर्यावरण का निर्माण करती हुर्इ वर्तमान का व्यवहार रच रही हैं । अतीत आज भी हमारी सामूहिक और सांंस्कृतिक आदतों के रूप में जिन्दा है । वह हमारी व्यवस्था-परिकल्पना को प्रभावित करने वाला सामूहिक अचेतन बन गया है ।
        दरअसल ,सामूहिक मानवीय अनुभव एवं निर्णय भी संज्ञान के स्तर पर एक बार घटित हो जाने के बाद ,प्रकृति की तरह ही मानव-जीवन की नियति के निर्धारक बन जाते हैं । वे मनुष्य की सामूहिक स्मृति के माध्यम से रुचि के नियामक बन जाते हैं । उन जातीय ग्रनिथयों ,मनोवृत्तियों एवं आदतों का निर्माण करते हैं ; जिन्हें सामूहिक अचेतन ही कहा जा सकता है । इनसे प्रेरित और प्रभावित होकर मानव-जीवन के मानसिक, सामाजिक,सांस्कृतिक ,राजनीतिक और आर्थिक आयाम अन्तत जैविक पर्यावरण में भी बदल जाते हैं । एक समय के बाद सामाजिक स्वीकृतियां ,व्यवहार और कार्य मनुष्य के विचार को ही पर्यावरण में बदल देते हैं । आदिकाल की जंगलों से भरी धरती का वर्तमान में बागों और खेतों में बदल जाना ,कृषि-कार्य करने के मनुष्य के मनुष्य के विचार का ही दीर्घकालीन परिणाम है ,जिसने वानस्पतिक पर्यावरण का पूरी तरह रूपान्तरण कर दिया है ।
            मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिल से जटिलतर होते जा रहे विकास-क्रम नें मानव-जीवन के पर्यावरण में मानवीय सृषिट को भी शामिल कर दिया है । मनुष्य जाति द्वारा अर्जित ज्ञान-विज्ञान ,निर्मित भव्य भवन ,सड़कें ,विधुत-व्यवस्था, कारखानें ,बांध ,पुल ,शिक्षा-व्यवस्था, ग्रन्थ, साहित्य, संगीत, फिल्में ,टी.वी., नगर , मुद्रा और राज्य- वयवस्था आदि सभी मानव-निर्मित पर्यावरण ही हैं । आदिम मनुष्य नें जब प्राकृतिक गुफाओं की तलाश छोड़कर पहली बार घर बनाया होगा  या एसिकमों नें ध्रुवीय भालू का अनुसरण करते हुए इग्लू के पूर्व रूप का निर्माण किया होगा या फिर किसी मृत पशु के चर्म में घुसकर बर्फीली हवाओं को पछाड़ा होगा तो उसका यह कार्य पर्यावरण निर्माण की दिशा में ही बढ़ा हुआ कदम था । आज भी जब अपराध-नियन्त्रण के लिए वह कोर्इ नया कानून बनाता है तो उसके इस प्रयास में भी अपने पर्यावरण (सामाजिक) को ही बेहतर बनाने की सामूहिक इच्छा छिपी रहती है । इस दीर्घकालीन विकास-क्रम में गम्भीर अवरोध तब उत्पन्न हुए ,जब संस्कृति को अतीत के मानवीय सृजन के रूप में न देखकर उसे जातीय और धार्मिक जड़ता यानि अपरिवर्तनीय श्रेष्ठता एवं पूर्णता के रूप में देखा जाने लगा ।
          किसी सांस्कृतिक समुदाय में प्रचारित चरित्र-विशेष की कथात्मक प्रस्तुति ( चाहे वह मिथकीय हो या धार्मिक ) ही पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक उत्तरजीविता को सम्भव बनाती है । आइन्स्टीन की यह अवधारणा कि काल  भी एक आयाम है और यह दुनिया है ही नहीं बलिक निरन्तर हो भी रही है तथा असितत्ववादियों की दृषिट में जीवन का गुजरते क्षणों में निरन्तर होना की तरह संस्कृति-विशेष भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच सूचनाओं ,कथाओं और विष्वासों के हस्तान्तरण के साथ समुदाय विशेष के सदस्यों के बीच बनी रहती है । इसप्रकार सांस्कृतिक नैरन्तर्य समाज में निरन्तर चलने वाले उस प्रशिक्षण का परिणाम है ,जो संस्कृति विशेष का सदस्य अभिभावक के रूप में अपनी सन्तान को देता है । फ्रायड के दमित अचेतन से अलग यह वह अचेतन संक्रमण है जो व्यकित को उसके बचपन में ही उसके अपरिपक्व और अप्रशिक्षित मसितष्क को प्रशिक्षण के रूप में सौंप दिया गया होता है । इस तरह संस्कृति-निर्माण एक जातीय सामाजिक परियोजना की तरह निरन्तर चलते रहने वाली प्रक्रिया है । इसलिए संस्कृति का उत्तर-आधुनिक पाठ यहीं से आरम्भ होता है कि संस्कृतिकरण ,समकालीन मानव-जाति में चलने वाली अतीतीकरण की प्रक्रिया है। वह एक समान स्मृतियों वाले मनुष्य का वंशानुक्रमिक पुनरूत्पादन है । वह विशेष प्रकार का सूचनात्मक या मसितष्कीय उत्तराधिकार है ।
            मानव-जाति की वैशिवक एकता के विरुद्ध संस्कृति की वर्तमान विरोधी भूमिका को देखते हुए सांस्कृतिक अचेतन से मुक्त एक आधुनिक वैज्ञानिक मनुष्य का निर्माण ,उत्तर-आधुनिक वैशिवक संस्कृति के निर्माण की दिशा में पहता साभ्यतिक कदम होगा । वर्तमान मनुष्य के विवेक के अतीतीकरण की सामाजिक प्रक्रिया को रोकने के लिए एक वैज्ञानिक जेहाद की जरूरत है । वैज्ञानिक जेहाद से मेरा तात्पर्य वैज्ञानिक विचारों और विश्वासों की निर्णायक स्वीकार्यता से है । वैज्ञानिक सूचनाओं नें अनेक प्राचीन विश्वासों की सत्यता पर गम्भीर एवं तथ्यसम्मत प्रश्नचिहन लगाए हैं । उन प्रश्नों एवं तथ्यों से नर्इ पीढ़ी के मनुष्य को वंचित करना यानि आधुनिक सूचनाओं से अपरिचित रखकर नर्इ पीढ़ी का एकल अतीतीकरण करने वाली साम्प्रदायिक शिक्षा को सांस्कृतिक अपराध के रूप में देखे जाने की जरूरत है । दुर्भाग्य से कर्इ देशों की राजनीति सत्ता और शासन सम्बन्धी स्वाथोंं के कारण आधुनिक युग के नवजन्में शिशु का मानसिक या बौद्धिक बधियाकरण यानि उसके कृत्रिम अतीतीकरण पर मौन धारण किए हुए हैं ।      
          सांस्कृतिक अतीतीकरण जिस सामूहिक अवचेतन का निर्माण करता है ,वह सामाजिक प्रशिक्षण की इतनी जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया का परिणाम है कि है कि उसे सिर्फ किसी सम्प्रदाय या संस्कृति-विशेष के अनुयायी के विचार के रूप में ही चिहिनत नहीं किया जा सकता । सांस्कृतिक अतीत एक सर्वग्रासी अचेतन की तरह हमारी सभी संस्थाओं से सम्बनिधत मानवीय व्यवहारों को संचालित-परिचालित कर रहा है । यहा तक कि आदिम कबीलार्इ युग का सांस्कृतिक अचेतन आज भी हमारी राजनैतिक -सामाजिक शकित-परिकल्पना का प्रमुख आधार है । हमारे सभी सामाजिक-आर्थिक राजनैतिक व्यवहार इस दृषिट से अतीतीकरण के शिकार है कि उनके पीछे आदिम मानव जाति के असुरक्षा-बोध ,भय एवं वे सुरक्षात्मक आक्रामकताएं छिपी हुर्इ हैं । उनका वर्तमान में कोर्इ औचित्य नहीं होते हुए भी हम इसलिए उन्हें जिए जा रहे हैं कि हम सांस्कृतिक आदतों के कारण भिन्न तरह से जी ही नहीं सकते । हम नए विश्व को बनाने में इसलिए विफल हैं कि हम नए ढंग से जीने के अयोग्य हैं । हमारेे सत्ता-संघर्ष, पूंजी निर्माण और सामाजिक संगठनजीविता के मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि में आज भी एक असुरक्षित और आक्रामक शिकारी मनुष्य छिपा हुआ है । इसलिए सांस्कृतिक अतीतीकरण से मुकित की सजगता ही मानव-सभ्यता के विकास की भावी दिशा हो सकती है । वैज्ञानिक युग नें वर्तमान सभ्यता को समझने की जो विश्लेषण धर्मी वैचारिक  दृषिट दी है , उसका पर्याप्त बौद्धिक विनिवेश हमारी सभ्यता की विवेकपूर्ण समीक्षा और पुनर्रचना में नहीं हो रहा है । हम आज भी स्ांस्कृतियों पर विचार करते हुए, प्राय: संस्कृति-विशेष में प्रचलित मिथकों ,मानव-व्यवहार के अलग सांस्कृतिक प्रतिमानों  यानि रूढि़यों और रीति-रिवाजों आदि की अनुकरणात्मक जड़ता से आगे संस्कृति-विमर्श को नहीं ले जा पाते । हमारी साभ्यतिक समस्याओं का प्रमुख आधार सांस्कृतिक अचेतन ही है ।
          वैशिवक स्तर पर देखने पर मृत्यु-बोध की भिन्नता के कारण जीवन और जगत-बोध के भी दो भिन्न रूप सामने आते है। पशिचम के पास द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विकासपरक  इतिहास-चेतना है तो पूरब के पास हर युग के मनुष्य के विवेक को अपने युग की साभ्यतिक विकृतियों और इतिहास-चेतना से बाहर निकलने की मनोवैज्ञानिक दार्शनिक प्रविधि है । पशिचम उपलबिधपरक लौकिक स्मृतियों का संरक्षक है तो पूरब मूल्य-परक चारित्रिक स्मृतियों का । पशिचम के लिए अतीत भी एक वस्तुनिष्ठ उपसिथत यथार्थ रहा है । उसके लिए मृत्यु का मतलब सम्पूर्ण विलुपित नहीं ,बलिक एक कब्र में बदल जाना है ,जबकि पूरब के लिए अतीत एक राख से अधिक महत्वपूर्ण कभी नहीं रहा । जबकि पशिचम नें अतीत के संरक्षण के लिए ममी और पिरामिडों की रचना की , पूरब ने स्मृति संरक्षण के लिए मिथक-निर्माण की प्रकि्रया अपनार्इ । पशिचम की सजग स्मृति-संरक्षणवादी ऐतिहासिक चेतना से अलग ,विसर्जन और विस्मृतिवादी पूरब अपनी जातीय स्मृति के निर्माण के लिए चयनधर्मी ही रहा है । उसकी व्यापक उपेक्षा और विस्मरण-नीति के पीछे जन-सामान्य के प्रतिरोध का सामाजिक मनोविज्ञान भी देखा जा सकता है । उसने सर्वोत्तम और पसन्द चरित्रोंं को मिथकों में बदलकर उन्हें धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संरक्षण देकर जहां उसें जीवित मानसिक उपसिथति में बदल कर भिन्न स्मृति प्रकि्रया का परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त सामान्यत: पूरब की सारी सांस्कृतिक-धार्मिक प्रविधियां मनुष्य को अपने सभ्यतागत समय से बाहर निकालने की रही है । उसकी सबसे बड़ी विश्ेाषता निरन्तर मानव-जाति के आदिम और निर्विकार चित्त की खोज को एक सांस्कृतिक लक्ष्य का आयाम देना है । पूरब निरन्तर ही अपने समय की सभ्यता का अतिक्रमण और उससे निष्क्रमण का आवाहन करता है । वह चित्त के स्तर पर वर्तमान जीवी है ,अपने वर्तमान चित्त की खोज होने के कारण एक सीमा से अधिक पूर्व में घटित घठनाएं एवं ऐतिहासिक स्मृतियां उसके लिए एक अनावश्यक उत्पाद है ;जबकि पशिचम अपनी ऐतिहासिक स्मृति के सापेक्ष संभावित वर्तमान की तलाश करता रहा है।  इसके स्थान पर पूरब अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को मिथक में बदल देना अधिक पसन्द करता रहा है । एक दृषिट से यह ऐतिहासिक स्मृति में से चारित्रिक स्तर पर महत्वपूर्ण प्रभावशीलता का चयन कहा जा सकता है ।
         अपनी भिन्न सांस्कृतिक अवधारणाओं और सामूहिक अचेतन के कारण पशिचम और पूरब की सभ्यताएं दो भिन्न मानवीय पर्यावरण का निर्माण करती हंै । इसीलिए किसी नर्इ व्यवस्था की खोज का प्र्रश्न पूरब और पशिचम के भिन्न सांस्कृतिक रुचियों के प्रश्न से भी टकराता है । मानव-जाति के असितत्त्व और विकास की लम्बी यात्रा में पूरब और पशिचम के मानव-समूहों के अलग-अलग विशिष्ट ऐतिहासिक अवदान सामने आए हैं । इस यात्रा में एक वैज्ञानिक युग और सभ्यता की ओर   विश्व-इतिहास को ले जाने में पशिचम ने युगान्तरकारी सफलता पार्इ है । उसने मानव-जीवन को और बेहतर,सुखी,सुरक्षित और संरक्षित बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका  का निर्वाह किया है । ऐसे में  पशिचमी सभ्यता को अपना आदर्श और आधुनिकता का पर्याय मानकर पूरब का भी पशिचमीकृत होते जाना स्वाभाविक ही है । ऐसे में कुछ ही समय पूर्व के औपनिवेशिक अतीत से अपमानित पूरब की सभ्यता और संंस्कृति का भी कोर्इ आधुनिक और वैशिवक विमर्श  हो सकता  है- इसकी प्रस्तावना मात्र से ही प्रतिगाामिता के कर्इ आरोप लग जाने का भी खतरा है ।
         दरअसल, पूर्वनिर्मित विचारधाराएं भी  बनी-बनार्इ सड़कों की तरह ही होती है । तिरछी या घुमावदार होने पर भी मनुष्य उसे ही मानक दूरी के रूप में मापता रहता है । दूसरे षब्दों में अच्छी बनी सड़कों से ही यात्रा करना अधिक सुविधाजनक समझता है । पूरब अभी भी प्रामाणिक और औचित्यपूर्ण विचारधारा के रूप में कोर्इ नर्इ अच्छी सड़क नहीं बना सका है ! उसे मानव-सभ्यता के विकास में अपने भीतर के श्रेष्ठ को योगदान के लिए अभी भी विश्लेषित और प्रमाणित करना है । अपनी सतत वैज्ञानिक उपलबिधयों के कारण  वर्तमान में आधुनिक मानव-सभ्यता के वैशिवक विमर्श के केन्द्र में पशिचम ही है । यधपि पशिचम ने स्वयं को बार-बार परिभाषित और व्याख्यायित किया है ;लेकिन वह निर्णायक प्रयास के स्तर तक ऐसा करने ंमे इसलिए असमर्थ रहा है कि उसने एक तो पूरब को विचार योग्य ही नहीं समझा या पूरब को विमर्श में शामिल करना स्वयं ही अपने औपनिवेशिक विस्तार और वर्चस्व के स्वर्णिम अतीत को अपमानित करना होता ।
         वैज्ञानिक विकास से समृद्ध दो अविस्मरणीय शताबिदयों के बीत जाने के बाद भी अधिक बेहतर व्यवस्था की खोज में लगी मानव-जाति के लिए सभ्यता और संस्कृति एक संवेदनषील मुददा बना हुआ है । ऐसे में किसी नर्इ और बेहतर सभ्यता ,व्यवस्था और संस्कृति-निर्माण की सृजनात्मक संभावनाओं की वैकलिपक दिशाएं कम ही होंगी । पहला विकल्प यह हो सकता है कि पशिचम को ही और बेहतर बनाकर उसे सार्वभौम कर दिया जाय । दूसरा यह कि पूरब और पषिचम दोनों के प्राच्य और वर्तमान से उपयोगी सृजन-सूत्रों की तलाश की जाय । तीसरा विकल्प पूरब की सभ्यता को आधार बनाकर पशिचम का पूर्वी संस्करण तैयार करने का है । वर्तमान के वैशिवक और भूमंडलीकरण-दौर में अलग-अलग कारकों से प्रेरित होकर ये सारी प्रकि्रयाएं स्वत:स्फूर्त ढंग से एक साथ चल रही हैं। ऐसे में 'किया जाय से मेरा आशय सजग बौद्धिक चुनाव से ही है । इसलिए वर्तमान बौद्धिक युग में और विकसित एवं निर्दोष सभ्यता की दिषा में प्राथमिक आवष्यकता तो यही होगी कि हम अपने अचेतन स्वीकारों की पुनर्समीक्षा कर उसे जहां सचेतन औचित्य प्रदान करें ; वहीं एक संवादी और समावेशी वैशिवक सभ्यता के लिए अपने अराजक एवं विरोधी विश्वासों को वैज्ञानिक-तार्किक आधारों पर कोर्इ अधतन एवं सर्वमान्य व्यवस्था दें । इसके लिए इस सिद्धान्त को मान्यता देनी ही होगी कि मनुष्यकृत वर्तमान व्यवस्था और उसका पर्यावरण उसके अतीत की बौद्धिक सक्रियताओं एवं कार्यात्मक हस्तक्षेप का परिणाम है ।  इसलिए भविष्य की बेहतर व्यवस्था की खोज तब तक संभव नहीं है जब तक हम उसके अतीत और वर्तमान की बौद्धिक आदतों को समझ न लें । अलग-अलग साभ्यतिक चित्त एवं आदतों की खोज ही हमें उनके भिन्न सामूहिक अचेतन के उस अन्धी सुरंग में ले जाती है , जिन्हें बन्द किए बिना मानवता का भविष्य बार-बार भटक कर उसकी ओर ही मुड़ जाने के लिए अभिशप्त है ।
           दरअसल सामूहिक मानवीय निर्णय भी एक बार घटित हो जाने के बाद ,प्रकृति की तरह ही मानव-जीवन की नियति के निर्धारक बन जाते हैं । वे मनुष्य की सामूहिक स्मृति के माध्यम से रुचि के नियामक बन जाते हैं । उन जातीय ग्रनिथयों ,मनोवृत्ति एवं आदतों का निर्माण करते है। जिन्हें सामूहिक अचेतन ही कहा जा सकता है । इनसे प्रेरित और प्रभावित होकर मानव जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक आयाम अन्तत: जैविक पर्यावरण में बदल जाते हैं । एक समय के बाद सामाजिक स्वीकृतियां व्यवहार और कार्य मनुश्य के विचार को ही पर्यावरण में बदल देते हैं । आदि-काल की जंगलों से भरी धरती का वर्तमान में बागों और खेतों में बदल जाना कृषि-कार्य करने के मनुष्य के विचार का ही दीर्घकालीन परिणाम है ,जिसने वानस्पतिक पर्यावरण का पूरी तरह रूपान्तरण कर दिया है । मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिल से जटिलतर होते जा रहे विकासक्रम नें मानव-जीवन के पर्यावरण में मानवीय सृषिट को भी शामिल कर दिया है । मनुष्य जाति द्वारा अर्जित ज्ञान-विज्ञान ,निर्मित भव्य भवन,सड़के,विधुत व्यवस्था ,कारखानें ,बांध,पुल, शिक्षा-व्यवस्था ,ग्रन्थ, साहित्य ,संगीत ,फिल्में , टी.वी. नगर और राज्य-व्यवस्था आदि सभी मानव-निर्मित पर्यावरण ही हैं । आदिम मनुष्य नें जब प्राकृतिक गुफाओं की तलाश छोड़कर पहली बार घर बनाया होगा या एसिकमों नें ध्रुवीय भालू का अनुकरण करते हुए इग्लू के पूर्व रूप का निर्माण किया होगा या फिर किसी मृत पशु के चर्म में घुसकर बर्फीली हवाओं को पछाड़ा होगा तो उसका यह कार्य पर्यावरण निर्माण की दिशा में ही बढ़ा हुआ कदम था और आज भी अपराध-नियन्त्रण के लिए जब वह नया कानून बनाता है तो उसके इस प्रयास में भी अपने पर्यावरण (सामाजिक) को ही और बेहतर बनाने की सामूहिक इच्छा छिपी रहती है । इस दीर्घकालीन विकासक्रम में गम्भीर अवरोध तब उत्पन्न हुए जब संंस्कृति को मानवीय सृजन के रूप में न देखकर उसे जातीय और धार्मिक जड़ता और अपरिवर्तनीयता से जोेड़ दिया गया ।
            एक ऐसे समय में जब पशिचम नें पूरब को न सिर्फ संक्रमित ,आक्र्रान्त और परिवर्तित किया है , बलिक पूरब में पशिचम कें संक्र्रमण के प्रतिरोध में उत्पन्न रूढि़वादी प्रतिसांस्कृतिक उभार को भी प्रतिक्रि्रयात्मक ढंग से उत्तेजित किया है । विशुद्ध पूरब को दूषित और विकृत कर उसे अन्तर्जीवी या फिर आक्रामक और प्रतिहिंसात्मक बना दिया है । कुछ वैसे ही जैसे किसी वायरस से संक्र्रमित होने पर मानव-शरीर ''एण्टी-बाडी का निर्माण करने लगता है - इस विमर्श का उददेश्य पशिचम की शकित-संरचना  के उस आदिम कबीलार्इ अचेतन के प्रति पशिचम को भी सावधान करना है ,जिससे उसके द्वारा निर्मित और विकसित आज तक की सभी व्यवस्थाएं निकल नहीं पार्इ हैं । इन व्यवस्थाओं में उसके द्वारा निर्मित आधुनिकतम राष्æ अमेरिका ,साम्यवादी अवधारणा का इतिहासित प्रतीक सोवियत रूस और संयुक्त राष्æ संघ जैसी संस्थाएं भी हैं। इस विमर्श की आधारभूत स्थापना यह है कि पशिचम और पूर्व की सभ्यताओं के वर्तमान व्यवहार और प्रवृत्यात्मक  विषेशताओं के अन्तर को ,उनके भिन्न सामूहिक अचेतन को उनके पूर्वजों के द्वारा विकसित र्इश्वर की भिन्न अवधारणाओं से समझा जा सकता है । इस विमर्श की दूसरी महत्त्वपूर्ण स्थापना यह है कि पशिचम के व्यवस्था की शकित-संरचना उसके र्इश्वर की चारित्रिक परिकल्पना के अनुरूप ही न सिर्फ अधिनायकवादी है ,बलिक वह वैसी ही शकित-संरचना के अनुरूप बार-बार राजनीतिक व्यवस्था, की खोज करती है । यह विमर्श उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो पशिचम के सामूहिक अचेतन से अनभिज्ञ रहते हुए, उसे एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक आदर्श मानकर ,उसे पूरब के सामूहिक अचेतन को समझे बिना ही पूरब की धरती पर पशिचम की अवधारणाओं को अविकल रूप से किसी उपनिवेश की तरह घटित और मूर्त देखना चाहते हैं। चाहे वह पशिचम का साम्यवाद या वैशिवक नेतृत्व के दावेदार अमेरिका का तथाकथित सफल पूंजीवाद ही क्यों न हो ।
          पशिचम की सभ्यता-चाहे वह लोकतन्त्र ही क्यों न हों ,आज भी व्यवहार के धरातल पर सामान्य मनुूष्य के अधिकारों के अन्तत: निरस्तीकरण और अपहरण पर ही आधारित है । आज भी पशिचम की सभ्यता अपने द्वारा विकसित सबसे आदर्श व्यवस्था लोकतन्त्र में भी सबसे सही मनुष्य के रूप में तात्कालिक राजनीतिक र्इश्वर की खोज कर रही है । यह कि पशिचम की राजनीतिक शकित की परिकल्पना में आज भी वही आदिम कबीलार्इ र्इश्वर छिपा हुआ है ,जिसने सददाम हुसैन की तरह एडम को अपने आदेश की अवहेलना कर वर्जित फल चखने के अपराध में धरती पर अपदस्थ कर दिया था । जो आज भी उतना ही असहिष्णु है -मानव निर्मित राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से पुनर्जीवित होकर । जिसने कभी भी वैचारिक चुनौती देकर शैतान को सभ्य और नैतिक होने के लिए प्रेरित नहीं किया । जो स्वयं उस युग के मनुष्यों की खोज है जब भारत में असामान्य मनोरोगी राक्षस और पशिचम में शैतान से प्रेरित माने जाते थे । जो उन्नीसवीं शताब्दी में मनुष्य द्वारा निर्मित दैत्याकार मशीनों की तरह ही दैत्याकार यानित्रक व्यवस्था के रूप में पुन: जीवित हो उठा था । जिससे जुड़े मानव-विश्वासों को माक्र्स नें मानव-जाति के लिए अफीम के समान मानते हुए भी अपने भीतर के उसके अचेतन मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अतिक्रमण करने की वैचारिक सफलता नहीं प्राप्त की , क्योंकि पशिचम के अधिनायकवादी निरंकुश,असहिष्णु और एडम विरोधी र्इश्वर की तरह उसका पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही उसके जातीय आदिम अचेतन का ही दार्शनिक विस्तार है । पशिचम का सामूहिक अचेतन शैतान के रूप में निरन्तर अपने किसी अदृश्य शत्रु की खोज के लिए विवश करती है । शैतान के कुटिल चालों से संत्रस्त र्इश्वर और उसकी सृषिट की तरह पशिचम जिस अवधारणा की उपज है ,वह बुद्ध के अशेष करुणा के मर्म तक पहुंच ही नहीं सकता है। सच तो यही है कि शैतान की ओर से होने की आशंका  के साथ ही यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया गया था । मुहम्मद साहब के विरोध का कारण भी उनके शैतान की ओर से होने की आशंका ही थी । आश्चर्य की बात यही है कि यहूदी ,र्इसार्इ और इस्लाम तीनों धमोर्ं को मानने वाले समाज नें शैतान के रूप में शत्रु की खोज जारी रखी । यही कारण है कि पशिचम एक आशंकित सभ्यता का निर्माण करता है तथा अनैतिक कूटनीति और शकित-आधारित हत्याओं  का नैतिक समर्थन और भव्यीकरण भी। ऐसे ही विश्लेषणों के कारण अप्रिय लगते हुए भी इस लेख में इस तथ्य की ओर भी संकेत करना पड़ा है कि अपनी सारी वैचारिक स्थापनाओं के बावजूद माक्र्स प्रणीत साम्यवाद की सांस्कृतिक सीमा यह है कि वह पशिचम के एकेश्वरवादी-अधिनायकवादी आदिम-कबीलार्इ सांस्कृतिक अचेतन की न सिर्फ परम्परा में है ,बलिक उसका लाेंकतानित्रक राजनीतिक आधुनिक संस्करण है । उसके द्वारा विकसित व्यवस्थाओं के वर्तमान व्यवहार में भी कबीलार्इ आक्रामकता और असभ्यता के अचेतन प्रेरक-बिन्दु देखे जा सकते हे। भारत के एकमात्र निर्णायक और विशुद्ध क्रानितकारी आन्दोलन नक्सलवाद में भी पशिचम के कबीलार्इ अचेतन का ही पूरब में वैचारिक उपनिवेश देखा जा सकता है ।
          मेरी दृषिट में आज के पशिचम की सभी राजनीतिक व्यवस्थाएं पषिचम के अधिनायकवाादी असहिष्णु र्इश्वरीय सामूहिक अचेतन का अतिक्रमण नहीं करती ,बलिक उसके राजनीतिक व्यवहार को मानकीकृत करती हैं । इसके विपरीत पूरब का साभ्यतिक अचेतन बहुलतावादी और उदार है । पूरब की हिन्दू और बौद्ध जैसी दोनों महत्वपूर्ण गैर-राजनीतिक सभ्यताएं मानव-जीवन के स्थायित्व के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक सत्ता और व्यवस्था-प्रविधियों की खोज करती रही हैं । अपने अविश्वास के जातीय मनोविज्ञान एवं संस्कृति के कारण पशिचम जहां शकित आधारित राजनीतिक सत्ता को पसन्द करता रहा है वहीं पूरब का प्रयास राज्य-व्यवस्था को एक सांस्कृतिक-सामाजिक उपसिथति के रूप में विकसित करने का रहा है । यहीं कारण है कि पूरब के सभी महान आदर्श और प्रेरक चरित्र चाहे वह राम ,कृष्ण महावीर बुद्ध हों या गांधी सभी राजनीतिक सत्ता के परित्याग के मिथक का ही साभ्यतिक भव्यीकरण प्रमाणित करते हैं । प्राचीन समय से ही पूरब की सामाजिक और सांस्कृतिक मानव-सम्बन्धों की संरचना राजनीतिक सत्ता के निषेध और विकेन्æीकरण पर ही आधारित रही है । विशेषकर भारत की उपजाऊ भौगोलिक समृद्धि ने उसके नागरिकों को प्राचीन काल से ही अभावजन्य प्रतिक्रियावादी और आर्थिक धरातल पर अपहरणधर्मी होने से बचाए रखा । संभवत: इसीलिए अपने लम्बे इतिहास में इसनें पशिचमी अर्थों में राजनीतिक सत्ता की खोज और स्थापना कभी नहीं की । केवल उन क्षणों को छोड़कर जिसमें काबुल-कन्धार ने रामायण और महाभारत काल में कैकेयी और गान्धारी के माध्यम से भारतीय राजघरानों में अपनी प्रत्यक्ष हस्तक्षेपकारी उपसिथति नहीं दर्ज करार्इ थी। यह अकारण नहीं है कि ये दोनों भारतीय संस्कृति को दूर तक प्रभावित करने वाले महाकाव्य पूरब और पशिचम के जीवन-मूल्य और व्यवस्था दृषिट के द्वन्द्वात्मक अन्तर्संघर्ष को भी अत्यन्त तीव्रता और प्रामाणिकता से प्रस्तुत करते हैं । इसी संघर्ष के पश्चात भारतीय समाज अपने सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक आदशोर्ं का निर्णायक चयन करता है ।
      भारत अपने पशिचमी प्रभाव में जिस प्रकार शकित पर आधारित राजनीतिक समाज में बदलता जा रहा है ,वह न सिर्फ भारतीय नहीं है ,बलिक सभ्यताओं के वैषम्य के कारण भारत के सामाजिक पर्यावरण में कर्इ नर्इ उत्तर-आधुनिक यानि अभूतपूर्व विकृतियों की भी सृषिट कर रहा है । इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या है भारत में पशिचमी ढंग के पेशेवर यानि कार्य एवं मूल्यांकन आधारित राजनीतिक समर्थन-तंत्र का विकसित न होना । राजनीतिक दल और उनका नेतृत्त्व गैर-राजनीतिक प्रविधियों का प्रयोग करते हुए सत्ता में बने रहना जान गए हैं । लेकिन अभी कुछ ही समय पूर्व बिहार राज्य के चुनाव-परिणामों ने संकेत कर दिया है कि देर से सही भारत बाजार के नियमों से संचालित पेशेवर राजनीति की ओर बढ़ रहा है । यहां बाजार षब्द का प्रयोग मैंने विशेष अभिप्राय से ही किया है । लोभ जनित क्रूरताओं के बावजूद बाजार सामान्यतया एक र्इमानदार मूल्य संसूचक व्यवस्था भी है। यदि उसे बाजारेतर विशेषज्ञता द्वारा दूषित या दुष्प्रभावित न किया गया हो । धर्म, जाति ,कुल और परिवारवादी संगठनों से अपâत भारतीय राजनीति एक स्वस्थ सभ्यता की दिशा में गम्भीर चिन्ता का विषय है ।
          इस चिन्ता के बावजूद पशिचम की व्यवस्था-परिकल्पना और क्रानित सम्बन्धी अनेक वैचारिक स्थापनाएं पूरब के मानवीय सांस्कृतिक-साभ्यतिक अचेतन के अनुरूप मैं नहीं पाता। अपनी विनम्रतापूमर्ण असहमति के साथ मैं ऐसा मानता हूं कि पूरब को एक स्वाभिमानी और मौलिक सभ्यता के रूप में बने रहने के लिए ही नहीं बलिक एक शान्त,विमर्शपूर्ण और मानवीय सभ्यता की संभावनाओं की तलाश में अपनी आधुनिकता ,वैज्ञानिक औचित्य ,वैशिष्टय तथा उपयोगिता के वास्तविक आधारों की खोज करनी ही चाहिए । उससे पशिचम राज्य और राजनीति को सामाजिक सत्ता के रूप में विकसित करने की सांस्कृतिक प्रविधि एवं मानवीय चरित्र प्राप्त कर सकता है । पशिचम की तनाव,बल-प्रयोग,अविश्वास और हिंसक कार्य-संस्कृति से बाहर निकालने में पूरब की सभ्यता के अनुभवों का मनोवैज्ञानिक विनिवेश हो सकता है । पूरब को अपनी विषेशताओं से पषिचम को परिचित कराना चाहिए न कि पशिचम के समाज के राजनीतिक सत्ता में रूपान्तरण की अवधारणा को बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर लेना चाहिए ।
           अलग-अलग सभ्यताओं के र्इश्वर और उसके चरित्रीकरण-प्रतीकीकरण की भिन्न अवधारणाओं को उनके अलग और विशिष्ट सामूहिक अचेतन के प्रभावशाली प्रमाण के रूप में देखना उचित होगा । ऐसा करने के पर्याप्त साभ्यतिक साक्ष्य है। यह एक तथ्य है कि विगत सामुदायिक विश्वास एक भावी और आदर्श वैशिवक समाज की रचना में बाधक हैं । अवधारणाओं की अराजकता ने जिस बहुसांस्कृतिक और बहुराष्æीय विश्व का निर्माण किया है , एक विकसित और सभ्य मानव-सभ्यता के लिए उसका संरक्षण किया जाना चाहिए या विसर्जन । जबकि एक सीमा के बाद ये विविधताएं किसी स्वतन्त्र आविष्कार की तरह मानव-विश्व को रंगारंग और बहुवैकलिपक भी बनाती है । जबकि आस्वाद आधारित सभी उत्पाद -मिठार्इ और संगीत से लेकर सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवहार तक सभी मनुष्य की सृजनशीलता के ही विविध आयाम हैं । उन सभी के लिए जो इस धरती को छोड़कर अन्तरिक्ष की उड़ान नहीं भर सकते इसी बूढ़ी धरती में ही अपनी सृजनष्ीलता के आयामो और अवसरों की खोज करनी होगी। उदाहरण के लिए हर नया खेल एक नए आनन्दपूर्ण व्यवहार पद्धति की भी खोज करता है । चाहे वह कि्रकेट ,फुटबाल या टेनिस ही क्यों न हो अपनी व्यापक लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकृति के बाद सांस्कृतिक बन ही जाता है । कर्इ रीति-रिवाज सीमित या व्यापक रूप से उत्सवधर्मी मानवीय पर्यावरण का निर्माण करने के कारण स्थानीय और हास्यास्पद होने के बावजूद समुदाय विशेष के लिए महत्वपूर्ण आनन्द प्रदायी भूमिका में होते हैं ।  इसलिए ''सोशल और 'कल्चरल इंजीनियरिंग भी मानव-सभ्यता के विकास और आधुनिकीकरण के दो क्षेत्र हो सकते हैं । इसलिए उसे संवेदनशीलता से हटाकर सृजनशीलता के दायरे में लाना ही मानव-सभ्यता के भविष्य के लिए हितकर होगा । सभ्यता और संस्कृति पर किसी वैशिवक आधुनिक विमर्श के लिए यह भी विचार का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है।
         गांधी की आंखों से न भी देखें तो भी राजनीतिक सत्ता का भव्यीकरण एक पशिचमी नजरिया है जो मनोवैज्ञानिक दृषिट से न सिर्फ लोकतन्त्र की समानता की अवधारणा की मूल-भावना के विपरीत है ,बलिक वह अपनी प्रतिक्रिया में असामान्य मनोवैज्ञानिक चुनौतियां देने वाला और आपराधिक रूप से उकसाने वाला भी है । मैं भारत और अमेरिका में हुए आक्रमणों को ऐसी ही असामान्य मनोवैज्ञानिक उत्तेजना का परिणाम मानता हूं। गांधी की हत्या के पीछे भी उनकी नीतियों का कम, उनके महात्मार्इ विशिष्टतावाद की प्रतिक्रिया में उपजी चुनौतियों का अधिक हाथ रहा होगा । असितत्व और व्यकितत्व के भव्यीकरण और बढ़ते सार्वजनिक प्रभाव के साथ वह व्यकित अपनी प्रभावशीलता के औचित्य और अनौचित्य के प्रति जवाबदेह होता जाता है ।  
         जीवन का विसंस्कृतिकरण करने वाले या संस्कृति-विशेष को एकमात्र आदर्श करने वाले जीवन के ऐसे तथाकथित शुद्धतावादी प्रयासोें के पीछे मनुष्य को यन्त्र मानने वाली वह मशीनी अवधारणा भी छिपी है ,जो अठारहवी-उन्नीसवीं शताब्दी के आविष्कारों तथा दैत्याकार यन्त्रों की अतिमानवीय शकितयों से चमत्कृत और मुग्ध होकर मनुष्य को भी एक स्वचालित जैविक यन्त्र-विशेष ही मान बैठा । मुझे तो प्रथम और द्वितीय विश्व-युद्ध तथा आज की आतंकवादी बर्बरता में भी अठारहवीं सदी की नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से चमत्कृत युगीन चेतना का यन्त्रवादी अचेतन ही छिपा दिखता है। जबकि आज के परमाणु युग का जीव-विज्ञान जीन की संरचना में विभिन्न रसायनों के बन्ध के रूप में भौतिक पदाथोर्ं के भी जीवन के उदभव और असितत्व के महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखे जाने का आग्रह कर रहा है। अठारहवीं शताब्दी के यानित्रक भौतिकवाद से प्रेरित जीवनबोध को जैविक भौतिकवाद की ओर ले जाने की जरूरत है । यह सांस्कृतिक-बोध मुझे अब भी असाहितियक नहीं लगता कि प्रकृति का जैव-यानित्रक उत्पाद ही सही फिर भी जीवन अपनी भौतिक सामान्यता में भी एक असामान्य विलक्षण चमत्कार है-जो प्रकृति और ब्रहमाण्ड के अरबों-खरबों विरल संयोगों के बाद संभव हुआ है । उसे मध्ययुगीन आध्यातिमक सम्मान यदि नहीं दे सकते तब भी उसे आतिमक सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए-इस ऐतिहासिक अनुभव और वैचारिक चेतावनी के साथ कि तथ्यपरक विश्वास रहे हों या काल्पनिक अन्ध-विश्वास दोनों ने ही हजारों वर्षो तक मनुष्य जाति की जिज्ञासा वृतित को स्थगित रखनें में प्रगति-विरोधी सफलता पार्इ है ।
          इसीप्रकार एक नर्इ मानव-सभ्यता की खोज में पूरब की सभ्यता और संस्कृति के आधुनिकतावादी विमर्श  के लिए भिन्न मानव-व्यवस्था ,परिकल्पना और वैशिष्टय के कर्इ और बिन्दु रेखंकित किए जा सकते हैं । सभ्यतागत भिन्नता और उनकी भिन्न प्रेरक अवधारणाओं के तुलनात्मक विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि अपने सजग इतिहास-बोध की परम्परा के कारण पशिचम जहां समय को रचता है ; या यह कहें कि समय को रचते हुए जीता है तो पूरब हर मनुष्य को अपने आदिम निर्विकार मन की खोज के लिए प्रेरित करता रहा है । यहीं एक और तथ्य सामने आता है कि एक सीमा के बाद हर सभ्यता अपने मनुष्यों को साभ्यतिक यन्त्र में बदलती जाती है । पूरब की सांस्कृतिक प्रकि्रया मनुष्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी साभ्यतिक यानित्रकता, लौकिक स्मृतियों के पूर्वापर प्रभाव नियति या जड़ता से बाहर निकालकर विशुद्ध विवेक की ओर मोड़ने की रही है । जीवन-बोध को निरन्तर अधतन बनाए रखने का प्रयास शवों को तुरन्त जलाकर उसका तुरन्त विलोपन कर दिए जाने में भी देखी जा सकती है । प्रकृति मृत को सड़ाकर खाद में बदल देना चाहती है ,जबकि स्मृतिजीवी होने के कारण मनुष्य अपनी सारी स्मृतियों को अनन्तकाल के लिए संरक्षित करना चाहता है । पशिचम की इतिहास चेतना इसी मानवीय स्मृतिजीविता का परिणाम है । यही स्मृतिजीविता ही उसे कब्र-निर्माण के लिए प्रेरित करती है । वह मानव शरीर को नहीं बचा सकता तो वह उसकी कब्र को ही बचा लेना चाहता है । इसप्रकार वह स्मृति की अमरता की खोज करता है जबकि पूरब की सारी सराहना लौकिक स्मृति से बाहर निकले चित्त के लिए ही रही है । इसे ही वह मोक्ष कहता रहा है ।
         इसीलिए मैंं इस विमर्श का आरम्भ यहां से करना चाहूंगा कि वैशिवक धरातल पर मानव-जाति के सांस्कृतिक इतिहास का विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आता है कि वर्तमान में आदिम विश्वासों के रूप में मानव-जाति के पास दो र्इश्वर है । एक पशिचम का विधि-निषेधों के प्रति अति-संवेदनशील नैतिक किन्तु असहिष्णु र्इश्वर ; दूसरा र्इश्वर के होने न होने की परवाह न करने वाला , मानव के विशुद्ध चित्त की खोज करने वाले धर्म का आविष्कारक मनुष्य जो अपनी पवित्रता और दिव्यता से र्इश्वर की अवधारणा को ही अप्रतिषिठत कर उसे धरती पर उतारने में विश्वास करता है । जिसके धर्म का आरम्भ ही राजनीतिक शकित के परित्याग से होता है । इसे स्पष्ट करते हुए मैं कहूं तो दुख से मुकित के लिए सिद्धार्थ के राज्य-त्याग को मैं सामाजिक और सांस्कृतिक शकित ( संघ ) की खोज के रूप में लेता हूं । राज्य-त्याग का वर्तमान भारत में दूसरा महत्त्वपूर्ण लोकप्रिय आदर्शवादी चरित्र राम का है,,जिन्हें भारत में एकल दाम्पत्य का मैं प्रवर्तक मानता हूं । जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी से लेकर उन्नीसवी शताब्दी के पूर्वाद्र्ध तक सकि्रय और जीवित मो.क.गांधी तक मानव-अपमान पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का नैतिक बहिष्कार करते दीखते हैं । इसी आधार पर मैं पूरब की संस्कृति और धर्म को मानव-असितत्त्व की दिव्यता का सम्मान करने वाली संस्कृति मानता हूं । बौद्ध और जैन धर्म के बाहर भी पूरब का र्इश्वर एक विकेन्द्रीकृत र्इश्वर है। तातिवक दृषिट से वह मनुष्य की र्इश्वरता और दिव्यता को स्वीकार कर र्इश्वर की व्यकितवादी शकित-संरचना उपसिथति और असितत्व की सभी धारणाओं को शून्य करता है । इतना शून्य कि वह एक नैतिक और शिष्ट-पवित्र मनुष्य के रूप में भी देखा जा सकता है ।
          पूरब की र्इश्वर सम्बन्धी अनेक अवधारणाएं जीवन की आश्चर्यजनक विविधता और चमत्कारिक उपसिथति को समेटने के प्रयास में र्इश्वरीय सत्ता के विकेन्द्रीकरण का बोध और संकल्पना देती हैं ;जबकि पशिचम का र्इश्वर अवधारणा के समाज-मनोवैज्ञानिक प्रभावों के धरातल पर राजनीतिक सत्ता के केन्द्रीकरण को प्रोत्साहित करता है । यही कारण है कि इस व्यवस्था का प्रतिरोध निर्मित करने के लिए कार्ल माक्र्स को सर्वहारा के अधिनायकत्व की परिकल्पना करनी पड़ती है । इसप्रकार पूरब की मुकित का अधतन यूटोपिया साम्यवाद भी शकित-संरचना के पशिचमी अचेतन से बाहर नहीं निकल पाया और निरन्तर बल-प्रयोग के द्वारा स्वयं को जीवित रखने का प्रयास करता हुआ जल्दी ही थक गया । पशिचम की व्यवस्था-संरचना और परिकल्पना का दोष और सीमा दोनों ही यही है कि वह बार-बार अपने र्इश्वर की आदिम अवधारणा की राजनीतिक पुनर्रचना करने लगता है। अमेरिकी राष्æपति इसका उदाहरण है फ्रांस भी इसका अपवाद नहीं है ,इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री भी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने निर्वाचित सहयोगियों की  इच्छा के निरस्तीकरण और उपेक्षा की वैधानिक षकित पा लेता है। कहने के लिए वह जनता के प्रति जवाबदेह होता है ,संचार-माध्यमों द्वारा निर्मित जनमत से प्रभावित हो सकता है ; लेकिन सच्चार्इ यही है कि एक बार निर्वाचित होने के बाद वह प्रभावित होने के लिए बाघ्य नहीं है । व्यवस्था के शकित-संरचना से सम्बनिधत सभी का सामूहिक अचेतन एक होने के कारण जनता भी उसके ऐसे निरंकुश व्यवहार को स्वीकार करती रहती है । दूसरे शब्दों में वह अचेतन रूप से सहमत होती चलती है । इसीलिए मुझे लगता है कि पशिचमी सभ्यता जब तक अपने सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक अचेतन का समुचित विश्लेषण नहीं करती तब तक वह नेपालियन ,हिटलर और स्टालिन ,निक्सन और बुश पैदा करती रहेगी । उसका लोकतन्त्र भी सामान्य  जन की इच्छाओं के निरस्तीकरण से प्राप्त व्यवस्था-प्रभु की खोज करता है । आज का भारत पशिचमी र्इश्वर की अवधारणा से संक्रमित शत्रु राष्æों के कूटनीतिक विद्वेष और घात करने वाले चालों से संत्रस्त है ।
           पषिचम के र्इश्वर को जिसे मैं पशिचम के सांस्कृतिक अचेतन का आदिम सामूहिक प्रतीक मानता हूं । उसमें यीषु मसीह के प्रतिरोधपूर्ण हस्तक्ष्ेाप की सही समाज-मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्या स्वयं पशिचम ने ही नहीं की है । एक ऐसा भावुक युवक जोे अपनेे जीवनकाल में ही अपनी मां के पति यूसुफ का पुत्र नहीं माना जाता है -अपने जीवन को एक ऐसे दिव्य पिता की खोज में समर्पित कर देता है ,जिसके पुत्र सारी दुनिया और सभी देश-काल के सभी मनुष्य हैं । र्इसार्इ धर्म का योग दान यह है कि जैविक पिता सम्बन्धी कबीलार्इ  अवधारणा का विरोध करता है । यहूदी धर्म की मूल परम्परा ही नस्लीय और रक्त-शुद्धता पर आधारित ,हजारों वर्ष लम्बी  वंशानुगत यात्रा में एक जातीय परिवार की रही है । उनके जन्म को देवदूतों से जोड़ने वाला प्रसंग जितना  उन्हें महिमा-मंडित करता है ,उनके जन्म से ही विशिष्ट होने के बोध का व्यकितगत और सामाजिक पोषण करता है । दूसरी ओर बार-बार उनके पिता के बारे में पूछे जाने को जिसे र्इसार्इ परम्परा प्राय: आध्यातिमक प्रश्न के रूप में ही लेती है उसकी तत्कालीन यहूदी मनोवृतित की परिचायक व्यंग्यात्मक प्रश्न के रूप में सामाजिक व्याख्या भी की जा सकती है । जिसका काव्यात्मक उत्तर देकर यीशु अपनी प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास करते रहे और अन्तत: तत्कालीन यहूदियों के शुद्धतावादी प्रतिरोध एवं षडयन्त्र के शिकार हो गए । जैविक पिता की अनिवार्यता तथा यहूदियों की कुटुम्बीय जाति की अवधारणा का अतिक्रमण करते हुए यीशु स्वयं को अपने दिव्य पिता का पुत्र घोषित कर सारी मानव-जाति के एक ही उदगम की ओर जो ध्यान आकर्षित करते हैं , उनकी उपलबिधयां प्लेटो और अरस्तू की तरह भले ही बुद्धिवादी नहीं रही होंं लेकिन पशिचमी समाज के लिए वे युगान्तरकारी संस्कृति-वैज्ञानिक अवश्य प्रमाणित हुए । उनके दिव्य पिता का पुत्र होने की अवधारणा प्रसिद्ध भारतीय अवधारणा 'वसुधैव कुटुम्बकमके समानान्तर ही प्राचीन काल का क्रानितकारी वैशिवक प्रयास है ।
         इन दृषिटयों को लेकर मैं जब पशिचम की ओर देखता हूं तो आम धारणा के विपरीत यीशु और मुहम्मद दोनों ही मुझे पषिचम में पूरब की राजनीतिक शकित विरोधी सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक शकितवादी चेतना के ही विस्तार लगते हैं । दोनों ही एडम ओर र्इव की थोड़ी भी चूक को बर्दास्त न करने वाले पषिचम के असहिश्णु अधिनायकवादी र्इश्वर को मानवीय बनाते हैं । मानव-जाति के सम्पूर्ण इतिहास में दोनों ही अभूतपूर्व यतीम (पितृविहीन,अनाथ) न सिर्फ दिव्य और सार्वभौम पिता की खोज करते हैं बलिक आदिम कबीलार्इ अवधारणा के गुस्सैल-असहिश्णु र्इश्वर का पिता और पुत्र के मानवीय सम्बन्धों में पुनर्संस्कार करते हैं । जैसे आज का भारत गांधी को गोली मारकर उनकी विचारधारा से दूर हट गया है ,मुझे बार-बार लगता है कि यीशु को क्रूस पर चढ़ाकर और मुहम्मद साहब की मृत्यु के पष्चात पशिचम भी अपने प्रर्वतकों की पीड़ा और विचारधारा को समझने में असफल रहा है । पशिचम बार-बार अपने व्यवस्था-निर्माण की सभी शैलियों में ,अपने आदिम-कबीलार्इ अधिनायकवादी र्इश्वर की ही खोज करते हुए दमन ,निरसित तथा सामान्य मनुष्य के अधिकारों का अपहरण करने वाली व्यवस्था-परिकल्पना की ओर बार-बार लौट आता है । इस लौटने को सिकन्दर,नेपोलियन,हिटलर,स्टालिन ,सददाम हुसैन,लादेन और जार्ज बुश आदि कर्इ आवर्ती रूपों में देखा जा सकता है । पशिचम इस अचेतन से बाहर निकलकर राजनीतिक शकित आधारित व्यवस्था से बाहर किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शकित आधारित मानव-विश्व और व्यवस्था की खोज कर ही नहीं सका है । विभाजित स्वामित्व (र्इश्वर और शैतान ) की अचेतन अवधारणा नें उसे क्रमश: काल्पनिक शत्रु के षडयन्त्रों के प्रति शक्की ,कूटनीतिक ,सह-असितत्व विरोधी ,कुचक्री ,असहिष्णु और हिंसक बना दिया है । अपने इस अचेतन से मुकित का संघर्ष और प्रयास स्वय पशिचम को ही करना होगा । उसे लौटना ही होगा यीशु और मुहम्मद जैसे अपने दिव्य पिता के दिव्य पुत्रों की मानव करुणा वाले पवित्र संस्कृति-पूर्वजों की ओर। इतना ही नहीं ,एक ही सामूहिक अचेतन के उत्तराधिकारी पशिचमी पूंजीवाद और साम्यवाद प्रवर्तक कार्ल माक्र्स के भी राजनीतिक साम्यवादी व्यवस्था को पूरब के सामाजिक-सांस्कृतिक-विकेन्द्रीकृत र्इश्वर वाले सामूहिक अचेतन के अनुरूप-मानव-सम्मान पर आधारित ,विकेन्द्रीकृत किन्तु आत्मानुशासित ,अहिंसक, और शान्त मानवीय व्यवस्था की खोज करनी ही होगी ।  
        पूरब -विषेशकर भारत की आध्यातिमक अवधारणाओं का मूल सूत्र उसकी भाषा-वैज्ञानिक चेतना के विकास में छिपा हुआ है । उसका ब्रहम, सिथतिप्रज्ञता  और शून्य वस्तुत : सभ्यताजन्य विकृतियों से अप्रभावित मनुष्य के विशुद्ध चित्त की खोज ही है । यह चित्त जो सर्वकालिक आदिम है और अधतन भी । इस चित्त की खोज उस रेफरी की उपसिथति की तरह महत्वपूर्ण है ,जो किसी खेल के हिंसा में बदल जाने के पूर्व ही चेतावनी की सीटी बजाकर उसे रोक सकता है । पशिचम का र्इश्वर नितान्त अवधारणापरक है जबकि  पूरब का र्इश्वर अवधारणा से अधिक सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक है । पूरब के लिए ऐतिहासिक स्मृतियों को जीना जीवन-प्रकि्रया की आवृतित और अनावश्यक को जीना है । उसके लिए ऐतिहासिक स्मृतियों को जीना ही अहंकार और मोह-युक्त मन को जीना है -अफीम है । इसके विपरीत पशिचम के  र्इश्वर की व्यापित कम है । वह तात्तिवक और दार्शनिक कम लेकिन सामाजिक और मानवीय अधिक है । वह सृषिट के निर्माता तथा अच्छार्इ और बुरार्इ के प्रतीकों का सरलीकृत रूप है।  वह अपनी अवधारणा में ही सर्वशकितमान नहीं है । वह और उसकी बनार्इ दुनिया , उसके समानान्तर की र्इष्यालु रूहानी उपसिथति शैतान के कायोर्ं एवं मानव-विरोधी षडयन्त्रपूर्ण प्रयासों से संत्रस्त है । उसका एकेश्वरवाद भी दरअसल आषिंक एवं विभाजित एकेश्वरवाद है ; क्योंकि उसकी अवधारणा में सृषिट की सारी शकितयां ( शैतान के सह-असितत्त्व के कारण निरीह एवं संत्रस्त किन्तु सिर्फ मानव-विश्व का निर्माता होने की सीमा तक ही आंशिक सर्वशकितमान) एक अच्छे एवं पवित्र (जिन्न!) गाड ,खुदा या यहोवा तथा (बुरे जिन्न ) शैतान या इबलीस में विभाजित हैं। दरअसल वह प्रभावशाली शासक-सत्ता और शासक बनने क लिए निरन्तर षडयन्त्ररत शत्रु-सत्ता का ही आदिम रूपक है। मानव समाज में व्याप्त अच्छाइयों और बुराइयों का ही सृषिट की विराटता के समकक्ष निर्मित चारित्रिक प्रतिरूप । इस प्रकार अवधारणा के स्तर पर वह जन-सामान्य के लिए उपयोगी है ही नहीं । क्योंकि उसकी अवधारणा एक राजनीतिक संस्कृति का ही निर्माण कर सकती है और अपने समाज-मनोवैज्ञानिक प्रभावों में वह सिर्फ एक सैन्यीकृत समाज और संस्कृति का ही प्रेरक और निर्माता हो सकता है ।
           यह एक संयोग नही है कि पशिचम के प्राय: सभी प्रसिद्ध धर्मप्रवर्तक जैविक परिवार की आदिम कबीलार्इ अवधारणा को न सिर्फ गहरी चोट पहुंचाकर उसे ध्वस्त करते हैं और सम्पूर्ण मानव-जाति के एक परिवार होने का सन्देश देते हैं। (सिर्फ मूसा को छोड़कर , जो अपने कुल की अपमानित असिमता के प्रतिकार के प्रयास में विश्व के सबसे बड़े पारिवारिक धर्म (यहूदी) से कभी बाहर नहीं निकल पाये )। लौकिक या संकीर्ण परिवार के प्रति उनका (यीशु और मुहम्मद का ) दार्शनिक निषेेेध अकारण ही नहीं है । ऐसा करने के पीछे उनके निजी जीवन के अनुभवों का ठोस मनोवैज्ञानिक आधार भी था । मनोवैज्ञानिक दृषिट से पितृ-विहीनता की यही मानसिक आवृतित इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब में भी देखी जा सकती है तथा कुछ परिवर्तन के साथ रामायण और महाभारत के नायक राम और कृष्ण में भी। मुहम्मद साहब के पिता अब्दुल्लाह की मृत्यु तो उनके जन्म से पहले ही हो चुकी थी । कृष्ण की तरह , जिन्होने अपनी मां देवकी का दूध नहीं पिया बलिक यशोदा का पिया तथा उनका विकास ही एक सर्वप्रिय सार्वजनिक शिशु के रूप में हुआ-मुहम्मद साहब नें भी अरब की प्रथा के अनुसार अपने चाचा की दासी सुवैबा तथा किराए की दार्इ हलीमा का दूध पिया । सन्तानोत्पतित के लिए अयोग्य दसरथ के यहां राम का जन्म ही विशिष्ट एवं दिव्य शिशु होने की अवधारणा के साथ हुआ । मध्ययुगीन सन्त कवि कबीर के भी जन्म की मानवीय-मनोवैज्ञानिक परिसिथतियां इसीप्रकार की हैं । अपने वास्तविक जैविक पिता के जीवित स्नेह और मानवीय संरक्षण से वंचित इन सभी शिशुओं ने मानव-जाति की सांस्कृतिक संरचना को बहुत दूर तक प्रभावित किया। ये सभी किसी दिव्य सत्ता के प्रतिनिधि या अवतार हैं या नहीं लेकिन मेरी दृशिट में महान और महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव वाले ऐसे संस्कृति-वैज्ञानिक हैं जिन्होनें मानव-जाति के इतिहास में रागात्मक सम्बन्धों की पारिवारिक और कबीलार्इ संरचना को तोडा । उसका अतिक्रमण किया और मानव-जीवन को रागात्मक सम्बन्ध के धरातल पर सम्पूर्ण प्रकृति के साथ अन्तर्सन्दर्भित करते हुए पुनर्परिभाषित किया । यह धर्म का वह समाज- मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य है जिसका सम्बन्ध र्इश्वर की दार्शनिक अवधारणा से कम ,लेकिन मानव-जाति के सम्पूर्ण असितत्व से अधिक है । मानव-जाति के असितत्व के सम्पूर्ण इतिहास में परमाणु और हाइड्रोजन बम के आविष्कार और विस्फोट की तरह ये नैतिकता और आत्मीयता के बड़े संवेदनात्मक विस्फोट हैं । हिन्दुओं में जीवन पर्यन्त के लिए एकल दाम्पत्य-सम्बन्ध की सामाजिक प्रथा का सम्बन्ध तीन पतिनयों वाले पिता दसरथ के पुत्र राम के एकल दाम्पत्य से है ।
        स्वयं र्इसाइयत में भी बौद्ध-धर्म की वैशिवक उपसिथति के परिदृश्य में भी पूरब की सांस्कृतिक सत्ता का पशिचम मेें स्थापित होता हुआ उपनिवेश देखा जा सकता है । लेकिन पशिचम की त्रासदी यह है कि र्इसार्इ-विश्व संगठित होते ही एक बार फिर ' ओल्ड टेस्टामेंट मेें व्यक्त सृषिट के उदभव सम्बन्धी अवधारणाओं की ओर मुड गया। इससे आगे चलकर पशिचम का नवजागरण और अधिक संघर्ष और चुनौती-पूर्ण हो गया । बाद का सारा र्इसार्इ धर्म स्वयं र्इसा मसीह द्वारा नहीं बलिक उनकी शहादत को प्रचारित और भव्यीकृत करने वाले उनके भावुक अनपढ़ और अन्धविश्वासी अनुयायियोंं द्वारा रचा गया । उदाहरण के लिए आदम के पाप के फल को चखने और यीषु के बहे हुए रक्त के बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाली भावुक धार्मिक अपील के लिए स्वयं यीशु को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । सृषिट के मात्र छह दिन में रचना सम्बन्धी धारणा का भी यीशु से क्या सम्बन्ध हो सकता है ! इसीलिए मेरा मानना ह कि यीशु मसीह पूरब की संस्कृति और चेतना के ऐसे प्रतिनिधि हैं , जिनकी पशिचम नें हत्या कर दी ,दूसरी हत्या पशिचमीकृत भारत के अचेतन धार्मिक अनुयायी नें गांधी की बीसवीं शताब्दी में की जिसे मैं इस्लाम की प्रतिक्रिया में भारतीय सभ्यता के पषिचम से संक्रमण की स्वााभाविक एवं ऐतिहासिक प्रतिनिर्मित में उपजे -सांस्कृतिक दृषिट से मुसिलमीकृत हिन्दू के हाथों हुर्इ मानता हूं । इस्लाम के सांस्कृतिक प्रतिरोध में निर्मित हिन्दू जिसका जन्म ही शरीर में बनने वाले प्रतिजैव की तरह प्रति- इस्लामी है । इस संक्रमित इस्लामीकृत हिन्दू का सांस्कृतिक अचेतन भी मैं पूरब के विकेन्æीकृत शकित-संरचना तथा  र्इश्वर की अवधारणा सम्बन्धी अचेतन के अनुरूप भारतीय नहीं मानता ।
            वस्तुत: पूरब लम्बे समय तक सामुदायिक-सांस्कृतिक सत्ताओं को ही जीने का आदी रहा है.....


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         एक नयी व्यवस्था को पानें की दिशा में भविष्य-चिंतन परिकल्पना,योजना और यूटोपिया के रूप में हो सकता है । खतरा यह है कि अधिकांश यूटोपिया अपनें निर्माण के समय की वास्तविकताओं की प्रतिकि्रया में ही जन्म लेते हैं । लेकिन उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें सार्वभौम मान लेते हैं । इस समझ के अभाव में किसी यूटोपिया या विचारधारा के पाश्र्व-दुष्प्रभाव का चिन्तन नहीं हो पाता । इस तरह हर परिकल्पनात्मक विचारधारा एवं यूटोपिया में
मनवीय प्र्यावरण के विनाश के कुछ खतरे हो सकते हैं ।