रविवार, 4 अगस्त 2019

मित्रता

अस्तित्व के धरातल पर हम सब एक ही जीवन की पुनरावृत्ति है । सैद्धांतिक दृष्टि से देखें तो लगभग क्लोन । सृष्टि के लम्बे विकास क्रम ने जैव-विविधता भी दे दी है ।  इससे अस्तित्व की हर ईकाई मे भिन्नता आई है ।  इसने हमें पूरक भूमिका में ला दिया है। यहां तक कि स्त्री-पुरुष विभाजन भी प्रजाति की रक्षा के लिए ईकाई की भूमिका मे है। पुनरावृत्ति होने के कारण हम सब  एक-दूसरे को अतिरिक्त और फालतू  भी बनाते हैं ।हमारा अतिरिक्त या फालतू होना भी प्रकृति ने प्रजाति की सुरक्षा के लिए किया है ।लेकिन हमारा निकट अतीत  जंगल की असुरक्षाओ से घिरा रहा है ।हिंसक जीवों की उपस्थिति के बीच हम समूह मे ही सुरक्षित रहे हैं । मुझे लगता है मित्रता इसी साझी सहजीविता का अवशेष हैं । आज तक का संस्थागत विकास बाजार संचित पूॅजी और वेतन के बल पर अकेले मे भी सुरक्षित जीने की सुविधा देता है लेकिन पोषण के लिए भी हम समाज निर्भर रहते ही हैं  । यद्यपि शिकार और कृषि के माध्यम से एकाकी  जीवन भी जिया जा सकता है लेकिन ऐसा जीवन अपवाद मे ही जिया जा सकता है । यह प्रजाति की मृत्यु की ओर ले जाएगी न कि प्रजाति की अमरता की ओर ।       
मित्रता रिश्तो की एक अनन्य कोटि है । मित्र-धर्म अन्य धर्मों से बढकर और वास्तविक ही है । कहतें है किशोरावस्था-युवावस्था की मित्रता चिरस्थायी होती है । पुराण और इतिहास मे कृष्ण,,ईसा मसीह ,मुहम्मद ,सिकन्दर ,चंगेज खाँ और बाबर को उसका मित्रों  ने ही विजेता बनाया था , न कि भाडे के सैनिकों ने । अन्तर्मुखी व्यक्तित्व होने के कारण मेरे वास्तविक  मित्र  कम ही  हैं  । फेसबुक वाले मित्र  समानधर्मा तो हैं लेकिन वास्तविक जीवन मे उनके मित्र-धर्म की परीक्षा अभी  नहीं  हुई है । दरअसल फेसबुक वाले मेरे सम्मान के पात्र हैं  ।इसलिए कि अधिकांश से उनकी प्रतिभा से मै प्रभावित हुआ हूँ । इनमे से बहुत से लोग वास्तविक मित्रता की ओर अग्रसर विचाराधीन मित्र है । संभव है कोई भविष्य का महत्वपूर्ण मित्र  भी इनमें मिले । ऐसे सभी मित्रों को मित्र दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ और बधाई ।
       उन मित्रों को विशेष रूप से बधाई और शुभकामनायें  जो मेरेो जीवन और परिवार के अभिन्न अंग बन चुके हैं ।
        जीवन मे अनौपचारिक और अनन्य मित्र कुछ ही हो पाते हैं  । वह भी स्वाभाविक समानधर्मा  ही । अचार बनने की तरह मित्र बनने मे भी समय लगता है । बहुल अधिक अंतर्मुखी और एकान्तप्रिय  लोगों को असुविधा भी होती है । मेरे सबसे महत्वपूर्ण मित्र वे ही हैं  जिनके  मित्र  बने रहने की चिन्ता से रिश्ते पूरी तरंह मुक्त हैं ।

गुरुवार, 20 जून 2019

प्राणायाम

प्राणायाम को कुछ लोग जरूरत से ज्यादा आध्यात्मिक रहस्यीकरण करते हैं । इससे उन वैज्ञानिक लाभों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता जिसका सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्व है ।
      अनुलोम-विलोम  द्वारा  श्वास-चक्र पर नियंत्रण के प्रयास मे हमारा ध्यान बाह्य लोक के प्रपंच से कटकर अपने शरीर क अभियान्त्रिकी से होते हुए विशुद्ध अस्तित्व-बोध तक पहुँचता है । दूसरा लाभ यह होता है कि हम श्वास रोककर जब आक्सीजन का कृत्रिम अभाव पैदा करते हैं तो शरीर कुछ-कुछ वैसी ही क्रिया- प्रतिक्रिया करता है जैसी कि तिब्बत की अधिक ऊंचाई पर रहने वाले  पर्वतीय निवासियों में कम आक्सीजन की स्थिति मे लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन शरीर बढा देता है । इससे कम आक्सीजन मे भी फेफडों का ग्राह्यता स्तर बढ जाता है । कहना न होगा कि कबड्डी के खेल और देर तक की गोताखोरी से भी कुछ ऐसा ही वैज्ञानिक लाभ मानव-शरीर को मिलता है ।

रामप्रकाश कुशवाहा
20-06-2019

बुधवार, 15 मई 2019

आत्मा का रहस्य

आत्मा या प्राण की अवधारणा जीवन की अवधारणा से भिन्न है । अलग-अलग संस्कृतियो कै विश्वासों मे भी अन्तर है । मरने के बाद भी  इसकी अवधारणा मे जैव विद्युतीय रूप मे अस्तित्वमान रहना प्रमुख है । इस्लाम आदि मे बलि प्रथा द्वारा आत्मा के पोषण एवं दीर्घजीवन का विश्वास है । भारतीय संस्कृति एवं जनजातीयो मे भी ऐसा ही विश्वास मिलता है । जीवों  मे जैव विद्युत का उत्पादन, एवं  विद्युतीय आवेश की प्रकृति का अध्ययन  होना चाहिए । जैसे जनरेटर बन्द होते ही विद्युतीय आपूर्ति बन्द हो जाती है ,वैसा है या जैसे आकाशीय बिजली तड़ित का आवेश चमक के बाद भी धरती मे समाने तक आवेश रूप मे बनी रहती है-वैसा है । तड़ित की तरंह है तो कुछ समय तक और कुछ स्थितियो मे आत्मा के आवेश रूप मे बने रहने की संभावना  को सिद्धान्ततः स्वीकार करना होगा । जो भी होगा प्रकृति के नियमों के अधीन ही होगा ।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

पांडित्य और बुद्धत्व

पांडित्य और बुद्धत्व


मै कुछ बातें अपने ब्राह्मण मित्रों से कहना चाहता हूँ  कि भारत के पुरातन बुद्धिजीवियो की सन्तानें होने का गर्व  जीने से पहले उन्हें अपने पुरखों की उन सीमाओ से भी परिचित होना चाहिए जिनके कारण उनके पुरखे पंडित  होकर भी ज्ञानी नहीं हो सके । सबसे पहली बात तो यह समझने की है कि ब्राह्मण जाति की ऐतिहासिक भूमिका ज्ञान के स्मृति संरक्षण की रही है । श्रद्धावान लभते ज्ञानं के आदर्श के अन्तर्गत उसके गुरुओं द्वारा दिए जा रहे ज्ञान पर प्रश्न करना प्रतिबन्धित था । प्रश्न न करनें के कारण उसकी शिक्षा- दीक्षा इस प्रकार की होती थी कि उसका विचारक हो पाना असंभव ही था । दूसरे शब्दों में कहें तो ज्ञान की श्रुति परम्परा के कारण ब्राह्मण की जातीय शिक्षा-व्यवस्था का उद्देश्य  उसे सिर्फ एक जीवित  पुस्तक-मनुष्य मे बदलना था । उसके श्रद्धामय ज्ञान का तात्पर्य ही यही था कि  उसे दिए जा रहे ज्ञान मे जोड़ने या घटाने का अधिकार उसे हासिल नहीं था । उससे पूरी अपेक्षा ज्ञान के अक्षरशः स्मृति में बदल जाने की थी । क्योंकि स्मृतिपरक ज्ञान तार्किक-अतार्किक,उचित- अनुचित प्रासंगिक-अप्रासंगिक कुछ भी हो सकता था-बहुत बाद मे यह समझ लगभग औपनिषदिक काल मे आयी कि पौराणिक आख्यानों एवं स्मृतियों का अतिक्रमण कर हमे मानव-मस्तिष्क  की अद्यतन प्रज्ञा को जीना सीखना चाहिए । यह स्मृतिजीवी-स्मृतिग्रस्त मस्तिष्क के आत्मसाक्षात्कार जैसा था । यह ज्ञान से बोझिल मस्तिष्क के विश्राम जैसा था । यह स्मृति-ज्ञान की निरर्थकता के साक्षात्कार और जीवन की दिव्यता के साक्षात्कार  का क्षण था । इसे ही बुद्धत्व प्राप्ति के रूप मे देखा गया । स्पष्ट है कि ज्ञान की निःसारता या निरर्थकताबोध को पहचानने मे अर्थात् अतिक्रमण में विशुद्ध स्मृति जीवी ब्राह्मण समर्थ नहीं था । समय-समय पर पण्डितों द्वारा संरक्षित ज्ञान के औचित्य की परीक्षा गैर-ब्राह्मणों ने ही की । इनमे बुद्ध, महावीर, राम,कृष्ण,गोरखनाथ,  कबीर, नानक,रैदास,गान्धी और विवेकानंद तक शामिल हैं  । दूसरे शब्दों मे स्मृतिजीवी अथवा रुढिजीवी ज्ञानी होना ही पांडित्य-ज्ञान का अभिशाप है । इन जातीय प्रकृति एवं सीमाओ के कारण ही दूसरे वर्णों मे जन्मे लोगों की तुलना मे ब्राह्मण वर्ण मे जन्में विद्वानों के लिए आत्मसजग होने की जरूरत अधिक रही है ।

गुरुवार, 28 मार्च 2019

होली

लोक पर्व होली को पौराणिक और पुरोहिती पाठ से न देखने पर ही इसका महत्व और रहस्य खुलता है।हिरण्य कश्यप का वध भी हिरण्य  यानि सोने के समान  पकी हुई फसल का काटना  है। नरसिंह के रूपक में किसान के सिंह केसमान पराक्रम का  मानवीकरण है। झस मिथकीय कथा को  रूपक के  रूप में  देखने से ही इसका काव्यात्मक निहितार्थ खुलता है।जैसे फसल को काटने के लिए होने वाले  हिंसात्मक कार्य की तुलना सिंह के  शिकार से  करते हुए  उसे नरसिंह के रूप में देखा गया है।होली समबन्धी मिथक में  आए सभी  नाम  इतने सुस्पष्ट हैं कि कथा की कालपनिकता  पर विवाद  न करते हुए उसके प्रतीकार्थ के महत्व की ओर ध्यान देना चाहिए।
         इधर कुछ ऐसे पोस्ट देखने को मिले हैं कि जिसमें होलिका के एक स्त्री -प्रह्लाद की बुआ,को जलाने के  आधार पर होली त्यौहार का ही विरोध किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में मुझे जो कहना है वह कुछ इस प्रकार है कि हिन्दी में तो इ और आ स्वर की उपस्थिति मात्र से शब्द को स्त्री मान लिया जाता है।संस्कृत में पुलिंग,स्त्रीलिंग के साथ नपुंसक लिंग भी  मिलता है। इस तथ्य को देखते हुए यह सोचना ठीक  नहीं होगा कि कोई स्त्री वाची शब्द वास्तविक स्त्री का  भी द्योतक है। हिन्दी और संस्कृत में  होलिका और होली शब्द भी अन्त में  आ और ई होने के  कारण  स्त्रीलिंग है। इसी लिए पौराणिक कथा में भी होलिका को स्त्री माना गया है। इस तथ्य को देखते हुए कि संस्कृत में हवन,स्वाहा  और  हवि शब्द भी मिलता है।अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए ईधन सामग्री  डालने के  अर्थ में। इस दृष्टि से होलिका शब्द की व्युत्पत्ति हवि पत्रिका शब्द से हवलिका होते हुई  होगी । संस्कृत के भव से ही भोजपुरी का हव और हौ तथा हिन्दी का होना आदि निकले है । भाषा-परिवर्तन के इस नियम से प्राचीन काल मे होली शब्द   भी होली तो  नही ही रहा होंगा । नियम से प्राचीन काल मे होली भी होली नही रहा होंगा ।।  इस  रोचक भारतीय लोकपर्व को  बेवजह बदनाम करना ठीक नही है। यह आदिम काल से चला आने वाला लोकपर्व है। यह साधारण किसान अनुभव है कि घास और झाड़ियों में  आग लगाने  पर हरी पत्तियाँ  बची रह जाती हैं।ये हरी पत्तियां ही प्रह्लाद हैं  और  पुरानी  पत्तियों का  जलना ही नयी पत्तियों की बुआ होलिका का जलना है।
           विगत वर्ष अपने एक चिन्तन में होली को मैंने एक ॠतु पर्व माना था।होलिका दहन  में  हो शब्द भाषा वैज्ञानिक नियमानुसार भव शब्द से अपभ्रंश काल में निकला  होगा। प्रह्लाद का शब्दार्थ  भी प्र -आह्लाद  से श्रेष्ठ आनंद या उल्लास हुआ। इस  व्युत्पत्ति के अनुसार मैंने होलिका को जो  भी  हो  चुका है यानि पतझड़ में गिरे पुराने पत्तों के जलाने एवं प्रह्लाद के बचने को वसन्त के नए पत्तों या पल्लवों के आगमन से माना था। इस ॠतुपर्व होली  की  आप सभी मित्रों को बधाई। निरर्थक अतीत को जलाकर नव्यतम और श्रेष्ठतम सुख प्राप्त करने के लिए आप सभी को शुभकामनाएँ

जाति-विमर्श-1

पारम्परिक वर्ण व्यवस्था के खाते मे भूमिहार फिट नहीं बैठते ।  यादवों की तरह वे भी नस्ल से सवर्ण होते हुए भी सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टि से अछूत बनाकर रखे गए है । मुझे तो उनका भी विद्रोह और क्रान्तिकारिता मनोवैज्ञानिक दृष्टि से साधार और विश्वसनीय लगता  है ।
       इस पोस्ट को पढ़कर मेंरे एक मित्र ने  बातचीत मे कहा कि भूमिहारों के वर्ण को लेकर ब्राह्मण या क्षत्रिय होने को लेकर द्वैत का जो संकट है-उसका आधार वैवाहिक भी हो सकता है ।  वे यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि बन्द वैवाहिक सम्बन्ध वाली  कोई जाति यदि जातीय समूह के रूप मे नही हैं तो उन्हे  वर्ण नहीं माना जा सकता  । वर्ण माने जाने के लिए समानधर्मी जातीय समूह  होना जरूरी है । ब्राह्मण और क्षत्रिय इसलिए जाति के साथ-साथ वर्ण भी माने गए कि इनमे परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध मे बंधे विभिन्न जातीय अस्मिता वाले समूह हैं ।
          लेकिन मुझे उन मित्र से बात करते हुए यह भी लगा कि वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत ही रखकर  पूरे भारतीय मूल की जनसंख्या को हिन्दू मानने वाले  लोग  इस्लाम पूर्व के बड़े जाति- प्रवासो की अवहेलना करते हैं । दृढ कबीलाई संस्कारों वाली  कई जातियाँ  अपनी स्पष्ट  नस्लीय विशेषताओ के कारण  सवर्ण जातियों के लिए निर्धारित जैविक विशेषताओ को चुनौती देती रही है । यह भी एक तथ्य है कि प्राचीन भारतीय गणराज्यो से सम्बन्धित अधिकांश जातियाँ  स्पष्ट एवं दृढ कबीलाई एकता, नियमों एवं वर्जनाओ को जीने वाली रही हैं  ।  हिन्दू जातियों  मे भूमिहार,जाट,गूजर,अहीर,कुर्मी और कोइरी आदि ऐसी किसान जातियाँ हैं जिनका वर्ण व्यवस्था के अनुसार पेशेवर  आधार नहीं  मिलता । इन बडी जनसंखयात्मक जातियों  मे चाहे वे सवर्ण मानी जाती हो या अवर्ण- उनमें अत्यन्त दृढ़ अनतर्वैवाहिकता मिलती है । इनमें से अधिकांश के पास अत्यन्त समृद्ध रीति-रिवाज और जातीय परम्पराएं है । ये अपने संख्या बल से प्रतिरोधी और आक्रामक हैं  । इनमे अपने मुखिया या चौधरी को भी बराबरी की शर्तों और व्यवहार के साथ अपने मे से एक मानने की प्रवृत्ति पाई जाती है  न कि व्यक्ति विशेष को अत्यन्त श्रेष्ठ एवं व्यक्ति पूजा के योग्य मानने की प्रवृत्ति । मेरा मानना है कि अपनी जाति के लोगों को अपने से बड़ा न मानने की प्रवृत्ति ही प्राचीन गणराज्यो वाले अतीत से सम्बन्धित वर्तमान जातियों की विशेषता है । ये जातियाँ व्यक्ति के नेतृत्व को महत्व देने वाले कुलीन राजतंत्रो  की अधीनता और संस्कारों की प्रतिरोधी रही हैं  । एक स्थापना यह भी है मेरी कि वर्ण व्यवस्था वाली ऊंच-नीच की भावना का विकास दीर्घकालिक रूप से स्थापित महाजनपदो मे हुआ । ये स्थायित्व के कारण कुलीनता और आनुवांशिकता  पर आधारित वर्ण-व्यवस्था वादी  सत्ता का विकास कर सके ।
        आर्यों के जो समूह बाद मे आए उन्हे वर्ण व्यवस्था बन चुकने के कारण क्षत्रिय स्वीकार नहीं किया गया ।  भारत मे शक हूणों के वंशज तथा अन्य बहुत सी ऐसी जातियाँ है , वे जहाँ से आए थे  वहाँ इस्लाम फैल जाने के कारण भारत मे ही हिन्दू जातियों मे शामिल होकर रह गयीं । यद्यपि वर्ण व्यवस्था मे सही स्थान नहीं पा सकीं  । अधिक सम्भावना यही है कि जाट और भूमिहार प्राचीन गणराज्य वाली जातियों के वंशज है । यादवों का तो गणराज्य था ही । इनकी स्वतंत्र रहने की आकांक्षा को महाजनपदो के राजतंत्र  से शासित ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने मिलकर स्वीकार और सम्मान नहीं किया ।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य : भूमिका एवं चुनौतियां

भारत मे पत्रकारिता का विकास ब्रिटिश भारत में हुआ था  । इसीलिए उसका स्वरूप प्रारम्भ से ही राष्ट्रवादी रहा है ।  उसके पास एक उद्देश्य था । आधुनिक सभ्यता की चुनौतियों का सामना करने की चिन्ता थी ।
     आजादी के बाद पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की मान्यता देकर पत्रकारिता से सजग पहरेदारी की अपेक्षा की गयी थी ।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

ईश्वर विमर्श

ईश्वर-विमर्श  : यह एक असाहित्यिक कृति इस अर्थ मे है कि इस कृति के सृजन के पीछे  साहित्यकार बनने की आकांक्षा नहीं है । मुझे तो विद्यार्थी जीवन मे ही धर्मयुग हंंस  वर्तमान साहित्य और  जनसत्ता आदि मे प्रकाशित होने का अवसर प्राप्त हुआ था। दरअसल मै अपने लिए भी धर्म, सम्प्रदाय, नास्तिकता- आस्तिकता ,प्रकृति और ईश्वर जैसे प्रत्ययो के अर्थ ,औचित्य और भूमिका के  प्रति जिज्ञासु रहा हूँ  । लम्बे चिन्तन ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचाया है कि भारत की हजार वर्ष लम्बी गुलामी और वर्तमान लोकतंत्र को भी सहयोगपूर्ण सांस्कृतिक पर्यावरण न मिलने की वजह उसकी जीवन,जन्म और स्त्री मात्र को ही हिकारत से देखने वाली  दार्शनिकी है ।का रहस इधर बीच दलित चेतना के उभार और असन्तोष  ने भी उसकी संकीर्णता को गम्भीरता से प्रश्नांकित किया है ।  बौद्ध धर्म चित्त-सौन्दर्य पर बल देता है लेकिन अंधविश्वासों के बावजूद जो जीवन-पद्धति के क्रमिक विकास की साभ्यतिक समझदारी है वह सनातन धर्म  की   अव्याख्यायित परम्पराओं और ऊल-जलूल रीतिरिवाजों में छिपी है । आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा के आलोक मे इनकी समाजशास्त्रीय भूमिका तथा  स्वीकार- अस्वीकार किए जाने का योग्यता- परीक्षण भी अभी नहीं हुआ है । भाषा और साहित्य के विकास के कारण कर्मकाण्ड से लेकर मूर्तिपूजा तक हिन्दू धर्म प्रतीकात्मक। होता चला गया ।
       कुछ अपर्याप्तंताएं तो स्पष्ट है जैसे कि हिन्दू धर्म के पास जो जातीय पाठ है,उसका चरित्र लोकतांत्रिक समानता का विरोधी है और विषमता तथा दुर्भाग्य को भाग्यवाद- नियतिवाद से जोड़ने के कारण गीता के कर्मवाद  को भी नेपथ्य मे डालने और उपेक्षित करने का प्रयास करता है । धार्मिक कथाओं की मानवीय व्याख्या का विरोधी तथा एक सीमा तक अक्षम भी है ।यह श्रद्धा कै नाम पर अतार्किकता को प्रोत्साहित करती है । मनुष्य को दीन-हीन बताने की मनोवैज्ञानिक साजिश करता है । सबसे खराब बात यह है कि इसके सांस्कृतिक साफ्टवेयर मे सुरक्षात्मक आशंका और प्रतिरोध का विधान ही नही किया गया है । दूसरे शब्दों मे भारत मे प्रश्न करने की संसकृति ही नही है । इससे नयी पीढी मे मौलिक चिन्तक और वैज्ञानिक उत्पन्न करने की संभावनाएं अत्यन्त कम हो गयी हैं। 
          अन्तिम बात यह है कि नयी सभ्यता विज्ञान पर आधारित है । क़ायदे से हमे जहाँ विज्ञान ले जाए वहाँ जाना चाहिए। कुछ लोग विज्ञान और ईश्वर दोनो को एक साथ जीना चाहते हैं।  कुछ लोग विज्ञान को पूरी तरह छोड़ कर अब भी ईश्वर के पास रहना चाहते हैं।  इस कृति के सर्जक का यह प्रयास रहा है कि ईश्वर को केन्द्र मे रखकर मनुष्य के वैयक्तिक- सामाजिक व्यवहार और लाभ- हानि का भी सम्यक् अध्ययन होना चाहिए । जिससे यदि धर्म और ईश्वर पर अपनी निर्भरता कम भी करना चाहें तो एक समानान्तर आदर्शों का कोई लोक हो हमारे पास । निष्कर्षात्मक सूत्र यह है कि एक समर्थ विचारशील,  बुद्धिमान और महान व्यक्ति ही ईश्वर की जरूरत को न्यूनतर कर सकता है  । क्योंकि समाज ईश्वर की तरह व्यवहार करता है ।बिना एक सुरक्षित समाज और व्यवस्था की रचना किए हम ईश्वर को सेवानिवृत्त या अप्रासंगिक  होने  की घोषणा भी नहीं कर सकते ।
          हमारी बूढ़ी सभ्यता ने हमें एक अभियान्त्रिक उत्पाद मे बदल डाला है।अपनी अभियान्त्रिक निर्मिति को समझना और उससे मुक्त होना ही मोक्ष है । भीरु आस्तिको  की तरह अन्धविश्वास जीने और साहसिक  नास्तिको की तरह आँख मूँदकर  धर्म और ईश्वर को रिटायर करने के पहले मैने उसकी मनोवैज्ञानिक-सामाजिक भूमिकाओं  और पर्यावरण का गहरा अध्ययन किया । फिर अपने लिए उसका निजी संस्करण या पाठ निर्मित किया ।  विज्ञान- युग की आधुनिक पृष्ठभूमि के कारण इस पुनर्रचना और पुनःपाठ का  परम्परागत रूढियों और विश्वासों से सीधा सम्बन्ध नहीं है। मै अपनी इस कृति को कबीर की माॅ की तरह धूल और जमीन पर फेंक देना चाहता हूँ कि उसमे यदि दम हो तो पाठकों की तमाम परीक्षाओं से गुजरते हुए अपनी जगह बनाए । सिद्धान्ततः इस कृति को वाराणसी से ही प्रकाशित होना था ।  मेरे टाइपिस्ट मित्र श्री दिनकर यादव ने लेखक को मिलने वाला आई एस बी एन नम्बर इसके लिये प्राप्त कर लिया है। अन्तिम प्रूफ रीडिंग के साथ यह पुस्तक शीघ्र ही उपस्थित होगी । इस कृति का उद्देश्य एक जिम्मेदार बौद्धिक विमर्श का आवाहन करना है ,न कि मानवता को पुनविभाजित  करने वाला कोई नया सम्प्रदाय खडा करना ,इसलिए इसमें सभी धर्मों से सम्बन्धित विचार कविताएं हैं। क्योंकि यह मुक्त और आत्मसम्बोधित  प्रकार की कृति हैं ,इसीलिए इसका नाम मैने " मैंने अपना ईश्वर बदल दिया है " रखा है । यह कृति और उसका कृतिकार दूसरों पर अपनी विचारधारा थोपने पर विश्वास नहीं करता । हाॅ असहमति थी इसलिए अपना ईश्वर बदला,असंतुष्ट था इसलिए अपना नया और मौलिक ईश्वर चुन लिया। सिर्फ इतनी सी बात है । इन कविताओं का रचना काल पैतीस चालीस वर्ष तक फैला हुआ है ।कुछ महत्वपूर्ण और नयी जीवन-दृष्टिया इसके विमर्श को महत्वपूर्ण बनाती है ।
               लेकिन  बहुत से लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर वास्तव  मे भ्रमो  और आदतों को ही जी रहे होते हैं  और उस विज्ञान  तक कभी नहीं पहुँच पाते जो उनके जीवन और इस दुनिया को सुखद और सुन्दर बना सकता है। अन्त मे यह कि यह शैक्षणिक निष्ठा औरृ दृष्टिकोण से की गयी वैचारिक प्रस्तुति है ।इसमें  गुण- दोष पक्ष- विपक्ष दोनों का सम्यक् विवेचन है । मेरे अधिकांश पूर्व स्थापित मित्र इस कृति की सूचना को लेकर अनावश्यक रूप से आशंकित और विचलित हैं।  विगत तीस- चालीस वर्षों से जिन भावों को अपने जीवन के एकान्त में जीता रहा हूँ। उसको सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने का प्रयास मात्र है।

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यद्यपि  नश्वरताबोध  हमारे सांस्कृतिक चिन्तन की मूल  प्रेरणा है ।  प्रलय,कयामत,शून्य और अंधेरा आदि इस सृष्टि के पृष्ठभूमि स्तर के सच हैं इसके बावजूद सृष्टि सूर्य जीवन प्रकाश आदि उपस्थितियो का अपना महत्व है । विज्ञान भी प्रकृति के गुणधर्म और संभावनाओ का ही अध्ययन करता है । आविष्कार भी वही हो सकेंगे जिनकी प्रकृति अनुमति देगी ।रसायनों के यौगिक क्रिया-अभिक्रिया के रूप मे हमारी एक वैज्ञानिक इयत्ता भी है ।हम सभी का जीनकोड वैज्ञानिक दृष्टि से भी सुरक्षित और संरक्षित है ।हमारा होना उतना मिथ्या और काल्पनिक भी नहीं। है जितना धर्म और मायावादी बतलाते हैं  । ऐसा      सोचना ताजे  खिले फूल को इसलिए कोसने जैसा है कि वह एक दिन मुरझा जाएगा । हमे जीवन का सम्मान करना चाहिए ।

बुधवार, 23 जनवरी 2019

स्त्री मुक्ति का प्रश्न

भारतीय सभ्यता  ने जिस वैवाहिक तन्त्र को मान्यता दी थी  वह ठीक ठीक पुरुष प्रधान भी नहीं था ।  युवकों से ब्रह्मचर्य की अपेक्षा करने वाली इस सभ्यता ने युवको को प्रेम निवेदन और विवाह प्रस्ताव देने का अधिकार ही नहीं दिया । न ही युवकों के पिता को ही । लड़की पक्ष से प्रस्ताव आने पर  लड़के पक्ष द्वारा उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार उसे अवश्य प्राप्त है । मिथको से लेकर आज तक की फिल्मों में भी ऐसे प्रेमियों को मन दुर्बल मानकर नारद और रावण जैसी खलनायक की भूमिका ही अधिक दी गयी है ।
        वादाखिलाफी के खतरों को देखते हुए मे आदर्श मुक्ति के लिए भी एक सभ्य समाज बनाना होग।   असामाजिक और अराजक मुक्ति मुझे अधिक ख़तरनाक लगती है । जंगल मे जैसे शिकारी शेर किसी भैंस का शिकार करने के पहले उसे झुंड से दूर ले जाता और अकेला करता है ( रामकथा मे सीता का हरण भी रावण इसी विधि से करता है ) देहबाजार के  शातिर देहदस्यु भी पहले झांसा देकर सामाजिक बन्धनो से दूर करते हैं,  त्रासदी यह घटती है कि उसका थका और अपमानित परम्परागत सामाजिक- पारिवारिक तन्त्र सज़ा देने की भावना से सहायता के क्षणों में दुर्दशा का दण्ड प्राप्त करने के लिए अकेला छोड़ देता है ।
       जब तक जन्म लेते ही  सभी की जीन मैपिग करा लेने की सामर्थ्य  सरकारों मे न आ जाए अवैध या धोखेबाज पुरुषो का आपराधिक भ्रूण क्योंकि स्त्री लैंगिकता मे ही पलना है सुरक्षात्मक निषेध  या सावधानियाँ मुझे स्त्री विरोधी नहीं लगती । यह संदिग्ध इसलिए भी लगता है कि लंपट चरित्र वाले स्त्री और पुरुष ही उपभोक्तावादी नजरिये से ही स्त्री की मुक्ति का प्रश्न अधिक उठाते हैं ।

मंगलवार, 22 जनवरी 2019

धर्म और अधर्म

धर्म और अधर्म
सारी दिशाएं अपनी हैं
सारी धरती अपनी है
सारे लोग अपने हैं
और मै मनुष्य को
इतनी तरह से जीते हुए देखकर
आश्चर्य से भर गया हूँ
कितने रीतिरिवाजों
और कितनी प्रथाओं का सर्जक है आदमी
कितने शब्दों और कितने विश्वासों का रचनाकार!
कितने अन्धविश्वासों  और कितने झूठों का जीवनहार
और मै
उनके सारे कार्यों का अनुकरण करने मे समर्थ
मना किया गया कि क्या- क्या मुझे करना चाहिए
और क्या नहीं  !
इतनी शर्तो और
इतनी परतों में जी सकता है आदमी
जानने के बाद भी
वही-वही दुहराने की इच्छा
मेरी मर गयी है
ऊब गया हूँ मै
कर्मकाण्डो की दुरूहता
और बारम्बारता से
मै क्यो कुछ नया नहीं कर सकता ?
नहीं जी सकता नया 
और क्यो कुछ नया जीने की स्वतंत्रता
मुझे विधर्मी बना सकती है !
मै क्यों नहीं  बना सकता
सारी दुनिया की अच्छाइयों  का संग्रहालय  !
नहीं जी सकता अपनी समझ से चुना हुआ अच्छा
और क्यों- कोई तो मुझे बताए !
रामप्रकाश कुशवाहा
07/11/2018
"Maine  apana Ishwar  badal diya hai" is a  collection of philosophical  poems with modern  scientific and psychological aproch . These poems are  also create civilisationl descorse  on Indian God and religion

बुधवार, 9 जनवरी 2019

धार्मिक पाठ का सच


धार्मिक पाठ का सच

धर्माचार्यों और विचारधारावादियों का जीवन- बोध स्वस्थ नहीं होता । वे सच को छिपाकर एक काल्पनिक पाठ प्रस्तुत कर देते हैं  । राम-कथा को ही लें  तो उनका निरंकुश आदर्शवाद अमानवीय त्रसदियाॅ घटित करता जाता है ।
      राम मोहग्रस्त यानि आज के शब्दों मे अतिसंवेदनशील  पिता के स्पष्ट आदेश के वगैर वन को चल देते है और दशरथ की ह्रृदयगति बन्द होने से मृत्यु हो जाती है । आदर्शवाद की शुद्धता मे ही  पत्नी सीता का परित्याग करते हैं  । अन्त मे आदर्श के सैनिक अनुशासन मे ही भ्राता लक्ष्मण का परित्याग करते हैं  ।  लक्ष्मण आदर्श पर खरा न उतरने की आत्मग्लानि  लेकर सरयू में डूबकर आत्महत्या कर लेते है । स्वयं राम भी  पीड़ा न सह पाकर आत्महत्या  कर लेते है । रामकथा का साहित्यिक पाठ आदर्शवाद  के अतिरेक को क्रूर और अमानवीय बताता है जबकि धार्मिक पाठ बिना कोई सबक लिए स्वर्ग मे जाना घोषित करता है । इसी तरह सीताहरण  प्रसंग का साहित्यिक पाठ साधुओं पर विश्वास न करने का चेतावनीपूर्ण सन्देश देता है जबकि स्त्रियाँ इसे धार्मिक भक्ति भाव से पूरी श्रद्धा और विश्वास से सुनती हैं  ।

रविवार, 6 जनवरी 2019

साहित्य मे रुचि- दोष और चरित्र- वैविध्य

आचार्यों ने हर संचारी भाव को काव्य  मे रस-सृष्टि के लिए महत्वपूर्ण माना है ।अरस्तू ने भी विरेचन के उद्देश्य से हर भाव को महिमामंडित किया है ।  विवाह के अवसर पर स्त्रियाँ दोष निवारण और प्रेम बढ़ाने के लिए गाली गाती हैं  । इसीलिए साहित्य मे रुचि-दोष और स्वभाव दोष कभी  प्रश्नांकित नहीं किया जाता ।साहित्य का तो उद्देश्य ही मनुष्य जाति  के चरित्र वैविध्य को सामने लाना है । यदि वह खलत्व से परिचित कराता है तो टीकाकरण जैसा पूर्व सुचेतित करने की भूमिका में होता है ।जब आदर्श और उदात्त को जीता है तो वैसा ही मानसिक परिवेश सम्प्रेषित और निर्मित करता है । बहुत पहलें मैने रुचिदोष का प्रश्न उठाया था ,अब लगता है अनावश्यक था ।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

जिन्दगी की नाव

जनाकांक्षाओं की भीड़
अलग-अलग दिमागों मे कैद है
जिन्दगी की नाव
समय की नदी में
कर्म के पतवार से ही
गति और दिशा  हासिल करती है
सारा जादू
अंगूठे और उंगलियों मे छिपा हुआ है
कर्म हाथों का गुणधर्म है
और कर्मरहित मनुष्य
अपनी सारी बौद्धिक क्षमताओं के बावजूद
संभावनाहीनता और अक्षमता मे कैद
डॉल्फिन बनकर रह जाता है ।

रामप्रकाश कुशवाहा
31-12-2018