अद्वैत बनाम द्वैत का सभ्यता-संघर्ष
द्वैत को बहुलता और अद्वैत को एकता के व्यापक संदर्भ में रखकर मानव-सभ्यता के इतिहास को देखा जाए तो इन दोनों अवधारणाओं का एक सभ्यतागत अर्थ भी सामने आता है। द्वैत को केवल दर्शन की तत्त्वमीमांसात्मक अवधारणा मानना पर्याप्त नहीं है। संभव है कि मनुष्य की द्वैतपरक चेतना उसके लंबे ऐतिहासिक जीवन की विभाजनकारी परिस्थितियों से भी निर्मित हुई हो। इसी प्रकार अद्वैत को केवल आध्यात्मिक अनुभूति न मानकर साझे अस्तित्व की विकसित सभ्यतागत चेतना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
मानव-जाति का विकास किसी एक अखंड सामाजिक इकाई के रूप में नहीं हुआ। मनुष्य परिवारों, समूहों, कबीलों, भूभागों, भाषाओं और संस्कृतियों में विभाजित होकर विकसित हुआ। इनमें संभवतः सबसे प्राथमिक विभाजन पारिवारिक था—मेरा परिवार और दूसरा परिवार। परिवारों से वंश और समुदाय बने; समुदायों से कबीले और जातीय समूह। भौगोलिक दूरियों तथा प्राकृतिक अवरोधों ने इस विभाजन को और स्थायी बनाया। बाद में भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक अस्मिताएँ विकसित हुईं। आधुनिक युग में राष्ट्र और राष्ट्रीयता ने इसी विभाजन-प्रक्रिया को एक नया राजनीतिक रूप दिया।
इस दृष्टि से द्वैत मानव-मन पर आरोपित कोई आकस्मिक विचार नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक अनुभव की स्वाभाविक परिणति भी हो सकता है। जब जीवन की सुरक्षा अपने परिवार, अपने कबीले अथवा अपने समुदाय पर निर्भर थी, तब ‘अपने’ और ‘पराए’ के बीच भेद करना अस्तित्व-रक्षा की आवश्यकता थी। जो अपना था वह सहयोगी था; जो दूसरा था, वह संभावित प्रतियोगी अथवा शत्रु भी हो सकता था। इस प्रकार परिस्थितियों ने पहले विभाजन पैदा किया और विभाजन ने अपने अनुकूल मानसिकता तथा मूल्य निर्मित किए।
समस्या यह है कि परिस्थितियाँ बदल जाने के बाद भी उनसे निर्मित मानसिक संस्कार बहुत लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।
इसे आधुनिक तकनीकी रूपक से समझें तो आज की मानव-सभ्यता एक ही नेटवर्क से जुड़े ऐसे विश्व की तरह दिखाई देती है जिसकी अलग-अलग इकाइयाँ अलग-अलग सांस्कृतिक ‘सॉफ्टवेयर’ से संचालित हो रही हैं। मनुष्य जैविक रूप से एक ही प्रजाति है, पृथ्वी भी उसकी साझा है और आधुनिक अर्थव्यवस्था तथा संचार-व्यवस्था ने उसके जीवन को अभूतपूर्व रूप से परस्पर निर्भर बना दिया है; फिर भी उसकी मानसिक प्रोग्रामिंग अनेक ऐतिहासिक अस्मिताओं द्वारा संचालित होती है।
धर्म, भाषा, जातीयता, नस्ल, राष्ट्र, क्षेत्र और समुदाय केवल पहचान नहीं देते; वे स्मृतियाँ, गौरव, भय, अपमान, मित्र और शत्रु की धारणाएँ भी विरासत में दे सकते हैं। इस अर्थ में अतीत समाप्त नहीं होता। वह वर्तमान मनुष्य के भीतर अस्मिता बनकर जीवित रहता है। हजार वर्ष पुरानी घटना भी किसी समुदाय की वर्तमान प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
यहीं आधुनिक सभ्यता का एक बड़ा अंतर्विरोध दिखाई देता है। हमारी तकनीक वैश्विक हो चुकी है, लेकिन हमारी अनेक मानसिक संरचनाएँ अभी भी स्थानीय और विभाजनपरक हैं। इंटरनेट, विमान, उपग्रह, वैश्विक व्यापार और विज्ञान ने पृथ्वी को लगभग एक साझा परिसर में बदल दिया है; किंतु मनुष्य अनेक स्थानों पर आज भी ‘हम’ और ‘वे’ की प्राचीन मनोवैज्ञानिक संरचना से संचालित होता है।
इस संदर्भ में अद्वैत का एक नया सभ्यतागत अर्थ सामने आता है।
अद्वैत का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि संसार की बहुलता समाप्त कर दी जाए। भाषाएँ, संस्कृतियाँ, समुदाय, जीवन-पद्धतियाँ और परंपराएँ मानव-सभ्यता की संपदा हैं। इसलिए बहुलता स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब भिन्नता को असंबद्धता, श्रेष्ठता अथवा शत्रुता में बदल दिया जाता है।
अद्वैत बहुलता का निषेध नहीं, उसके भीतर अंतर्निहित एकता की पहचान हो सकता है।
जैसे एक वृक्ष में हजारों पत्तियाँ अलग-अलग होकर भी एक ही जैविक व्यवस्था का हिस्सा होती हैं, वैसे ही मानव-समुदाय अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं के बावजूद एक साझा पृथ्वी, साझा जैवमंडल और परस्पर निर्भर भविष्य के अंग हैं। इस स्तर पर अद्वैत किसी धर्मविशेष की संपत्ति न रहकर एक वैश्विक सभ्यतागत मूल्य बन सकता है।
इसलिए वास्तविक संघर्ष ‘एक’ और ‘अनेक’ के बीच नहीं है। वास्तविक संघर्ष उस चेतना के बीच है जो अनेकता को विभाजन और संघर्ष में बदलती है तथा उस चेतना के बीच जो अनेकता के भीतर साझे अस्तित्व को अनुभव करती है।
मानव-विकास की पिछली अवस्थाओं में विभाजन उपयोगी भी रहा होगा। परिवार के प्रति निष्ठा, कबीले की एकजुटता, समुदाय की रक्षा और बाद में राष्ट्रीय संगठन ने मनुष्य को सुरक्षा और सहयोग प्रदान किया। अतः इन संरचनाओं को केवल नकारात्मक कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। किंतु जो व्यवस्था एक समय अस्तित्व-रक्षा का साधन थी, वही वैश्विक परस्पर-निर्भरता के युग में संघर्ष का कारण भी बन सकती है।
जलवायु परिवर्तन किसी धर्म अथवा राष्ट्र की सीमा नहीं पहचानता। महामारी जातीय अस्मिता देखकर नहीं फैलती। समुद्र, वायुमंडल और जैव-विविधता राजनीतिक सीमाओं के अनुसार व्यवहार नहीं करते। आधुनिक मानव की समस्याएँ वैश्विक हो चुकी हैं; इसलिए उनकी चेतना भी अंततः वैश्विक होनी पड़ेगी।
इसी बिंदु पर एकताजीवी मनुष्य की आवश्यकता सामने आती है।
एकताजीवी मनुष्य अपनी स्थानीय पहचानें त्यागता नहीं है। वह परिवार से प्रेम करता है, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ा रहता है, लेकिन अपनी अस्मिता को दूसरे मनुष्य के निषेध पर निर्मित नहीं करता। उसकी पहचान वृत्तों की तरह विस्तृत होती है—परिवार से समुदाय, समुदाय से देश, देश से मानवता और मानवता से समूचे जीव-जगत तक।
इस प्रकार सभ्यता की आगामी यात्रा को द्वैत से अद्वैत की यात्रा कहा जा सकता है—यदि द्वैत से हमारा आशय विभाजनजीवी चेतना और अद्वैत से साझे अस्तित्व की चेतना हो।
तब अद्वैत कोई केवल पारलौकिक आध्यात्मिक घोषणा नहीं रहेगा। वह मानव-सभ्यता के भविष्य का व्यावहारिक मूल्य बन जाएगा।
सभ्यता की अगली बड़ी छलाँग संभवतः किसी नई मशीन का आविष्कार नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा अपनी प्राचीन विभाजनकारी मानसिक प्रोग्रामिंग का अतिक्रमण होगी—विभाजनजीवी मनुष्य से एकताजीवी मनुष्य की ओर।