रविवार, 16 अगस्त 2026

ज्ञान, भाषा और स्वतंत्र मनुष्य की खोज

 

ज्ञान, भाषा और स्वतंत्र मनुष्य की खोज

एक सभ्यता-विमर्श

मनुष्य स्वयं को एक स्वतंत्र, विवेकशील और निर्णय लेने वाला प्राणी मानता है। आधुनिक सभ्यता ने भी मनुष्य की इसी छवि को प्रतिष्ठित किया है। लेकिन यदि हम अपने दैनिक व्यवहार को ध्यान से देखें तो एक असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है—क्या मनुष्य वास्तव में उतना स्वतंत्र है, जितना वह अपने बारे में सोचता है? या उसका अधिकांश जीवन पहले से अर्जित ज्ञान, संस्कार, भाषा, सामाजिक प्रशिक्षण और परिस्थितियों द्वारा उत्पन्न प्रतिक्रियाओं में बीतता है?

यहीं से सभ्यता के पुनर्पाठ की आवश्यकता आरम्भ होती है।

1. ज्ञान से पहले है—जानना

हम सामान्यतः ‘ज्ञान’ और ‘जानना’ को लगभग एक ही अर्थ में लेते हैं, जबकि दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर किया जा सकता है।

‘ज्ञान’ वह है जो जाना जा चुका है। वह हमारे मस्तिष्क और समाज की स्मृति में संरक्षित उपलब्धि है। इसके विपरीत ‘जानना’ एक जीवित प्रक्रिया है—वर्तमान में घटित हो रही खोज। इस अर्थ में ज्ञान अतीत की उपलब्धि है, जबकि जानना भविष्य के ज्ञान का निर्माण करता है।

यही कारण है कि हर ज्ञान अपने आप में सत्य, शुभ अथवा कल्याणकारी नहीं होता। अपराध करने की विधियाँ भी ज्ञान हैं; युद्ध की तकनीक भी ज्ञान है; छल, शोषण और विनाश की विशेषज्ञता भी ज्ञान हो सकती है। इसलिए केवल ‘ज्ञानवान’ होना मनुष्य की नैतिक श्रेष्ठता की गारंटी नहीं है।

सभ्यता को ज्ञान के साथ-साथ ज्ञान के पुनरीक्षण की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।

इसीलिए एक महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है—

ज्ञान प्राप्त करो, लेकिन ज्ञान से सतर्क भी रहो।

क्योंकि ज्ञान जैसे ही अंतिम सत्य होने का दावा करता है, ‘जानना’ रुकने लगता है।

2. ज्ञात संसार और विस्मय की मृत्यु

एक बच्चा संसार को पहली बार देखता है। उसके लिए आकाश, चन्द्रमा, पेड़, वर्षा, पक्षी और अपना शरीर तक आश्चर्य के विषय हैं। धीरे-धीरे भाषा उसे बताती है—यह पेड़ है, यह नदी है, यह बादल है, यह धर्म है, यह जाति है, यह राष्ट्र है।

नामकरण उपयोगी है। उसके बिना सामाजिक जीवन और ज्ञान-विज्ञान का विकास कठिन होता। लेकिन नामकरण की एक सीमा भी है।

जिस वस्तु को हमने नाम दे दिया, उसके बारे में हमें यह भ्रम होने लगता है कि हमने उसे जान भी लिया।

पेड़ को ‘पेड़’ कह देना पेड़ को जान लेना नहीं है। ब्रह्मांड को ‘ब्रह्मांड’ कह देना उसके अस्तित्व के रहस्य को समाप्त नहीं करता। ‘ईश्वर’, ‘प्रकृति’, ‘पदार्थ’, ‘आत्मा’, ‘मनुष्य’ जैसे शब्द भी अनुभव की अनंतता को कुछ ध्वनियों और अवधारणाओं में बाँध देते हैं।

इस प्रकार भाषा संसार को समझने का उपकरण होने के साथ-साथ संसार के ऊपर आरोपित एक दूसरा संसार भी निर्मित करती है—एक प्रतिसंसार

मनुष्य फिर वस्तुओं के बीच ही नहीं, उनके नामों और अर्थों के बीच भी रहने लगता है।

3. भाषा का जादू और भ्रम

भाषा मानव सभ्यता की महानतम उपलब्धियों में से एक है। उसी ने स्मृति को पीढ़ियों के पार पहुँचाया, ज्ञान को संचित किया और मनुष्यों को विशाल सामाजिक समुदायों में जोड़ा।

लेकिन भाषा का जादू यहीं समाप्त नहीं होता। वह केवल संसार का वर्णन नहीं करती; वह हमारे लिए संसार का अर्थ भी निर्धारित करने लगती है।

जब किसी मनुष्य को कोई सामाजिक पहचान दे दी जाती है—जाति, धर्म, राष्ट्र, समुदाय, श्रेष्ठ, निम्न, अपना, पराया—तो शब्द धीरे-धीरे वास्तविक व्यक्ति के ऊपर चढ़ जाता है।

हम सामने उपस्थित मनुष्य को देखने से पहले उसके लिए उपलब्ध सामाजिक शब्द को देखने लगते हैं।

यहीं भाषा अनुभव को विस्थापित कर सकती है।

इसलिए भारतीय चिंतन में ‘नेति-नेति’ जैसी अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। वह अंतिम शब्द देने के बजाय शब्द की सीमा का बोध कराती है। सत्य शायद वह भी है जो हमारी परिभाषाओं से लगातार बाहर निकलता रहता है।

4. ब्रह्म : अस्तित्व को बाँटने के बजाय अनुभव करने की दृष्टि

यदि मनुष्य स्वयं को संसार से बिल्कुल पृथक सत्ता मानता है तो प्रकृति उसके सामने ‘अन्य’ बन जाती है। तब पृथ्वी संसाधन है, जंगल कच्चा माल है, पशु उपयोग की वस्तु है और दूसरा मनुष्य प्रतिस्पर्धी अथवा शत्रु हो सकता है।

इसके विपरीत यदि मनुष्य स्वयं को उसी व्यापक अस्तित्व की एक अभिव्यक्ति के रूप में अनुभव करे, तो उसका संबंध संसार से बदल सकता है।

भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में ब्रह्म की अवधारणा को इसी साझे अस्तित्व की अनुभूति की दिशा में पढ़ा जा सकता है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’ अथवा ‘सोऽहं’ जैसी अभिव्यक्तियाँ मनुष्य को किसी दूरस्थ सत्ता के सामने केवल अधीन प्राणी के रूप में नहीं, बल्कि उसी व्यापक अस्तित्व से संबद्ध सत्ता के रूप में देखने का अवसर देती हैं।

यहाँ आध्यात्मिकता का आधुनिक अर्थ प्रकृति से पलायन नहीं, बल्कि अस्तित्वगत साझेदारी भी हो सकता है।

यदि पृथ्वी मेरे अस्तित्व से बाहर की वस्तु नहीं है, तो उसका विनाश अंततः मेरे अपने अस्तित्व का विनाश है।

इस अर्थ में अद्वैत केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं रहता; वह पर्यावरणीय और सभ्यतागत नैतिकता का आधार बन सकता है।

5. मनुष्य क्रियाजीवी है या प्रतिक्रियाजीवी?

मनुष्य अपने व्यवहार को प्रायः अपनी स्वतंत्र इच्छा का परिणाम समझता है। लेकिन ध्यानपूर्वक देखने पर हमारी बहुत-सी तथाकथित ‘क्रियाएँ’ वास्तव में प्रतिक्रियाएँ दिखाई देती हैं।

किसी ने अपमान किया—क्रोध उत्पन्न हुआ।

किसी ने प्रशंसा की—प्रसन्नता हुई।

प्रतिष्ठा को चुनौती मिली—प्रतिशोध जागा।

समुदाय की पहचान संकट में दिखाई दी—आक्रामकता उत्पन्न हुई।

लेकिन इन प्रतिक्रियाओं का स्वरूप केवल जैविक नहीं होता। परिवार, समाज, धर्म, जातीय परंपराएँ, राजनीतिक वातावरण और सामूहिक स्मृतियाँ हमें सिखाती हैं कि किस परिस्थिति में कैसी प्रतिक्रिया करनी है।

इस अर्थ में सभ्यता मनुष्य को केवल ज्ञान नहीं देती; वह उसकी प्रतिक्रियाओं की पटकथा भी लिखती है।

तब प्रश्न उठता है—

जिस प्रतिक्रिया का कार्यक्रम समाज ने हमारे भीतर पहले से स्थापित कर दिया है, उसे पूरा करना हमारी स्वतंत्र इच्छा कैसे हुई?

6. स्वतंत्र इच्छा : प्रतिक्रिया और क्रिया के बीच का अंतराल

स्वतंत्र इच्छा को केवल ‘जो चाहूँ वह करूँ’ के अर्थ में समझना पर्याप्त नहीं है।

मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता शायद उस क्षण आरम्भ होती है जब उत्तेजना और प्रतिक्रिया के बीच चेतना उपस्थित होती है।

अपमान हुआ—लेकिन क्या क्रोध अनिवार्य है?

भय उत्पन्न हुआ—लेकिन क्या पलायन ही एकमात्र उत्तर है?

समाज ने किसी व्यक्ति को शत्रु कहा—लेकिन क्या मैं उसे स्वयं देख सकता हूँ?

परंपरा ने कोई विश्वास दिया—लेकिन क्या मैं उसकी पुनर्परीक्षा कर सकता हूँ?

इसी अंतराल में स्वतंत्र मनुष्य का जन्म होता है।

वह परिस्थितियों से मुक्त नहीं होता, लेकिन परिस्थितियों का स्वचालित उपकरण बने रहने से मुक्त होने लगता है।

इस दृष्टि से स्वतंत्र इच्छा कोई स्थायी संपत्ति नहीं, बल्कि अर्जित चेतन क्षमता है।

7. योगेश्वर और स्वतंत्र चेतना

भारतीय धार्मिक कल्पना में योगी और संन्यासी प्रायः संसार से दूरी बनाकर आत्मनियंत्रण की खोज करते दिखाई देते हैं। लेकिन स्वतंत्र चेतना का अधिक कठिन परीक्षण संसार से बाहर नहीं, संसार के भीतर होता है।

इसी संदर्भ में ‘योगेश्वर’ की कल्पना विचारणीय है।

योगेश्वर वह चेतना हो सकती है जो परिस्थितियों के बीच उपस्थित रहते हुए भी उनकी यांत्रिक प्रतिक्रिया नहीं बनती। वह युद्ध, राजनीति, संबंध, प्रेम, संकट और निर्णय—सभी के बीच सक्रिय है, फिर भी अपने भीतर किसी प्रकार की दृष्टा-स्थिति बनाए रखने का दावा करती है।

कृष्ण का चरित्र इस दार्शनिक संभावना का शक्तिशाली प्रतीक प्रस्तुत करता है। लेकिन आधुनिक मनुष्य के लिए कृष्ण के जीवन से कोई सीधा, ऐतिहासिक और सार्वभौमिक व्यवहार-प्रतिमान निर्मित करना कठिन है। वहाँ मिथकीय, काव्यात्मक और दार्शनिक स्तर एक-दूसरे में घुले हुए हैं।

इसलिए स्वतंत्र चेतना के व्यावहारिक परीक्षण के लिए हमें एक दूसरे ऐतिहासिक व्यक्तित्व की ओर भी देखना चाहिए—बुद्ध की ओर।

8. बुद्ध : स्वतंत्रता का प्रयोग

बुद्ध का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने कोई दर्शन दिया। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक संरचना को स्वयं अपने भीतर देखने की एक पद्धति प्रस्तुत की।

तृष्णा उत्पन्न होती है—उसे देखो।

क्रोध उत्पन्न होता है—उसे देखो।

दुःख उपस्थित है—उसे पहचानो।

अपने अनुभव पर आरोपित कथा से पहले स्वयं अनुभव को देखना बुद्ध की साधना का महत्वपूर्ण पक्ष है।

यहाँ मनुष्य प्रतिक्रिया को दबाता नहीं; पहले उसे पहचानता है।

इसी कारण बुद्ध में स्वतंत्र इच्छा का एक प्रयोगात्मक और आचरणगत रूप अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। स्वतंत्रता किसी अलौकिक वरदान की तरह नहीं आती; वह अपने मन की प्रक्रियाओं को देखने और उनके स्वचालित शासन से क्रमशः बाहर आने का अभ्यास बन जाती है।

9. सभ्यता की अगली चुनौती

मानव सभ्यता ने बाहरी संसार को नियंत्रित करने में असाधारण सफलता प्राप्त की है। हमने परमाणु को विभाजित किया, अंतरिक्ष में यान भेजे, आनुवंशिक संरचनाओं को पढ़ा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित की।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य ने अपनी प्रतिक्रियात्मक चेतना को उसी अनुपात में समझा है?

यदि अत्याधुनिक तकनीक ऐसे मनुष्य के हाथ में है जो अपमान पर आदिम प्रतिशोध, पहचान पर हिंसा, भय पर घृणा और लालच पर असीम संचय की प्रतिक्रिया करता है, तो तकनीकी आधुनिकता सभ्यतागत आधुनिकता की गारंटी नहीं है।

हमारा बाहरी संसार आधुनिक हो सकता है जबकि हमारी प्रतिक्रियाएँ हजारों वर्ष पुरानी बनी रहें।

इसलिए भविष्य की सभ्यता का प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि—

हम और क्या जान सकते हैं?

उससे पहले यह भी पूछना होगा—

हम जो जानते हैं, उसने हमें किस प्रकार का मनुष्य बनाया है?

और उससे भी आगे—

क्या हम अपने अर्जित ज्ञान, भाषा, पहचान और संस्कारों को देखते हुए भी उनसे स्वतंत्र होकर नया जान सकते हैं?

निष्कर्ष : ज्ञानी से आगे जानने वाला मनुष्य

सभ्यता को केवल अधिक ज्ञानवान मनुष्य नहीं चाहिए। उसे ऐसा मनुष्य चाहिए जो अपने ज्ञान को भी जाँच सके।

केवल बोलने वाला नहीं—अपने शब्दों की सीमाएँ पहचानने वाला।

केवल पहचान रखने वाला नहीं—अपनी पहचान के बाहर भी मनुष्य को देख सकने वाला।

केवल प्रतिक्रिया करने वाला नहीं—अपनी प्रतिक्रिया को देख सकने वाला।

और केवल संसार का उपभोग करने वाला नहीं—अपने अस्तित्व को संसार के साझे अस्तित्व में अनुभव करने वाला।

शायद यहीं ज्ञान से ‘जानने’ की ओर, प्रतिक्रिया से क्रिया की ओर और बँटे हुए अस्तित्व-बोध से साझे अस्तित्व की ओर यात्रा आरम्भ होती है।

मनुष्य की अगली सभ्यतागत उपलब्धि कोई नई मशीन भर नहीं होगी।

वह स्वयं मनुष्य भी हो सकता है—
जो पहली बार अपनी प्रतिक्रियाओं से पर्याप्त दूरी बनाकर सचमुच स्वतंत्र क्रिया कर सके।

आधुनिक सभ्यता और आध्यात्मिक प्रज्ञा की सीमाएँ

 

आधुनिक सभ्यता और आध्यात्मिक प्रज्ञा की सीमाएँ

(संन्यास, निर्वाण और कर्मयोग के बीच आधुनिक मनुष्य)

मानव सभ्यता का इतिहास केवल राजनीतिक या आर्थिक घटनाओं का इतिहास नहीं है; वह मनुष्य की चेतना की खोज का भी इतिहास है। विभिन्न सभ्यताओं ने इस खोज को अलग-अलग रूपों में व्यक्त किया है—मिथकों में, धर्मों में, दर्शन में और साधना की परंपराओं में।

भारतीय सभ्यता की एक विशेषता यह रही है कि यहाँ मनुष्य की चेतना के प्रश्न को अत्यंत गंभीरता से लिया गया। उपनिषदों के ऋषियों से लेकर गौतम बुद्ध और बाद में आदि शंकराचार्य तक, एक गहरी आध्यात्मिक परंपरा विकसित हुई जिसने मनुष्य के भीतर के रहस्य को समझने का प्रयास किया।

किन्तु इस परंपरा में एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति बार-बार दिखाई देती है—विसर्जन की प्रवृत्ति
अर्थात मनुष्य के अहं, व्यक्तित्व या सामाजिक पहचान का किसी उच्चतर सत्य में लय।

बौद्ध साधना में यह निर्वाण के रूप में दिखाई देता है, जहाँ व्यक्ति तृष्णा और अहंकार के पूर्ण क्षय की बात करता है। अद्वैत वेदांत में यह ब्रह्मानुभूति के रूप में प्रकट होता है, जहाँ व्यक्तिगत आत्मा का सार्वभौमिक ब्रह्म में एकत्व बताया जाता है।

इन दोनों परंपराओं ने मनुष्य को एक अत्यंत गहरी आध्यात्मिक दृष्टि दी, परंतु साथ ही एक प्रश्न भी छोड़ दिया—
क्या मनुष्य का अंतिम लक्ष्य संसार से विसर्जन ही है?


आधुनिक मनुष्य की नई परिस्थिति

प्राचीन साधना परंपराएँ मुख्यतः ऐसे समाजों में विकसित हुई थीं जहाँ जीवन अपेक्षाकृत सरल और स्थिर था। समाज छोटे थे, तकनीकी जटिलता सीमित थी और व्यक्ति के ऊपर वैश्विक स्तर की जिम्मेदारियाँ नहीं थीं।

लेकिन आधुनिक मनुष्य की स्थिति बिल्कुल भिन्न है।

आज का मनुष्य एक ऐसे विश्व में रहता है जो—

  • अत्यधिक जटिल है
  • अत्यधिक जनसंख्या वाला है
  • और अत्यधिक परस्पर जुड़ा हुआ है

विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र, वैश्विक अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय संकट—ये सब आधुनिक मनुष्य को लगातार सक्रिय रहने के लिए बाध्य करते हैं।

ऐसी परिस्थिति में यह संभव नहीं कि मनुष्य लंबे समय तक ध्यान, धारणा और समाधि की अवस्था में रहकर संसार से अलग हो जाए।

यदि पूरी सभ्यता ही विसर्जन की दिशा में चली जाए तो इतिहास का निर्माण कौन करेगा?


कर्मयोग की सकारात्मकता

भारतीय परंपरा में ही एक दूसरा सूत्र मौजूद है जो इस प्रश्न का उत्तर देता है—कर्मयोग

भगवद्गीता में प्रस्तुत कर्मयोग का सिद्धांत जीवन से पलायन नहीं बल्कि सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा देता है।

जब युद्धभूमि में अर्जुन मोह और दुविधा में पड़ जाते हैं, तब कृष्ण उन्हें संसार से भागने की सलाह नहीं देते। वे उन्हें कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक विशेष प्रकार की चेतना के साथ।

यह चेतना है—

  • आसक्ति से मुक्त कर्म
  • परिणाम से मुक्त कर्म
  • लेकिन जिम्मेदारी से भरा हुआ कर्म

इस दृष्टि से कर्मयोग आध्यात्मिकता को संसार से जोड़ता है।

यह कहता है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी आंतरिक संतुलन बनाए रख सकता है।


आध्यात्मिकता का मनोवैज्ञानिक महत्व

यह भी सत्य है कि ध्यान, समाधि और आत्मनिरीक्षण की परंपराओं का एक गहरा मनोवैज्ञानिक महत्व है।

ये साधनाएँ—

  • मन को शांत करती हैं
  • भावनाओं को संतुलित करती हैं
  • और व्यक्ति को अपने भीतर देखने की क्षमता देती हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस भी धीरे-धीरे यह स्वीकार कर रहे हैं कि ध्यान और जागरूकता मानव मस्तिष्क के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभ्यता का अंतिम आदर्श केवल समाधि हो।

समाधि व्यक्ति के लिए उपयोगी हो सकती है;
पर सभ्यता का निर्माण कर्म और सृजन से होता है।


एक संभावित संतुलन

इसलिए आधुनिक सभ्यता के लिए शायद सबसे उचित मार्ग यह हो सकता है कि वह आध्यात्मिक परंपराओं को न तो पूरी तरह अस्वीकार करे और न ही उन्हें जीवन का अंतिम लक्ष्य बना दे।

बल्कि वह उनके बीच एक संतुलन स्थापित करे।

यह संतुलन कुछ इस प्रकार हो सकता है—

  • ध्यान मन को संतुलित करे
  • विवेक निर्णयों को स्पष्ट करे
  • करुणा समाज को मानवीय बनाए
  • और कर्म इतिहास को आगे बढ़ाए।

अर्थात मनुष्य न तो पूरी तरह संन्यासी बने और न ही पूरी तरह यांत्रिक कर्मकर्ता।


भविष्य की सभ्यता का सूत्र

संभव है कि भविष्य की सभ्यता का मूल सूत्र यही हो—

भीतर प्रज्ञा, बाहर कर्म।

या दूसरे शब्दों में—

आत्मचेतना और सामाजिक सक्रियता का संतुलन।

यदि मनुष्य केवल कर्म में डूब जाए तो वह मशीन बन सकता है।
यदि वह केवल समाधि में डूब जाए तो वह इतिहास से कट सकता है।

सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिए दोनों का संतुलन आवश्यक है।


मुझे लगता है कि आपके विचारों में जो दिशा उभर रही है, उसे एक वाक्य में इस प्रकार कहा जा सकता है—

आधुनिक सभ्यता का आदर्श “विसर्जन” नहीं, बल्कि “जागरूक कर्म” होना चाहिए।

अद्वैत बनाम द्वैत का सभ्यता-संघर्ष

 

अद्वैत बनाम द्वैत का सभ्यता-संघर्ष

द्वैत को बहुलता और अद्वैत को एकता के व्यापक संदर्भ में रखकर मानव-सभ्यता के इतिहास को देखा जाए तो इन दोनों अवधारणाओं का एक सभ्यतागत अर्थ भी सामने आता है। द्वैत को केवल दर्शन की तत्त्वमीमांसात्मक अवधारणा मानना पर्याप्त नहीं है। संभव है कि मनुष्य की द्वैतपरक चेतना उसके लंबे ऐतिहासिक जीवन की विभाजनकारी परिस्थितियों से भी निर्मित हुई हो। इसी प्रकार अद्वैत को केवल आध्यात्मिक अनुभूति न मानकर साझे अस्तित्व की विकसित सभ्यतागत चेतना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

मानव-जाति का विकास किसी एक अखंड सामाजिक इकाई के रूप में नहीं हुआ। मनुष्य परिवारों, समूहों, कबीलों, भूभागों, भाषाओं और संस्कृतियों में विभाजित होकर विकसित हुआ। इनमें संभवतः सबसे प्राथमिक विभाजन पारिवारिक था—मेरा परिवार और दूसरा परिवार। परिवारों से वंश और समुदाय बने; समुदायों से कबीले और जातीय समूह। भौगोलिक दूरियों तथा प्राकृतिक अवरोधों ने इस विभाजन को और स्थायी बनाया। बाद में भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक अस्मिताएँ विकसित हुईं। आधुनिक युग में राष्ट्र और राष्ट्रीयता ने इसी विभाजन-प्रक्रिया को एक नया राजनीतिक रूप दिया।

इस दृष्टि से द्वैत मानव-मन पर आरोपित कोई आकस्मिक विचार नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक अनुभव की स्वाभाविक परिणति भी हो सकता है। जब जीवन की सुरक्षा अपने परिवार, अपने कबीले अथवा अपने समुदाय पर निर्भर थी, तब ‘अपने’ और ‘पराए’ के बीच भेद करना अस्तित्व-रक्षा की आवश्यकता थी। जो अपना था वह सहयोगी था; जो दूसरा था, वह संभावित प्रतियोगी अथवा शत्रु भी हो सकता था। इस प्रकार परिस्थितियों ने पहले विभाजन पैदा किया और विभाजन ने अपने अनुकूल मानसिकता तथा मूल्य निर्मित किए।

समस्या यह है कि परिस्थितियाँ बदल जाने के बाद भी उनसे निर्मित मानसिक संस्कार बहुत लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।

इसे आधुनिक तकनीकी रूपक से समझें तो आज की मानव-सभ्यता एक ही नेटवर्क से जुड़े ऐसे विश्व की तरह दिखाई देती है जिसकी अलग-अलग इकाइयाँ अलग-अलग सांस्कृतिक ‘सॉफ्टवेयर’ से संचालित हो रही हैं। मनुष्य जैविक रूप से एक ही प्रजाति है, पृथ्वी भी उसकी साझा है और आधुनिक अर्थव्यवस्था तथा संचार-व्यवस्था ने उसके जीवन को अभूतपूर्व रूप से परस्पर निर्भर बना दिया है; फिर भी उसकी मानसिक प्रोग्रामिंग अनेक ऐतिहासिक अस्मिताओं द्वारा संचालित होती है।

धर्म, भाषा, जातीयता, नस्ल, राष्ट्र, क्षेत्र और समुदाय केवल पहचान नहीं देते; वे स्मृतियाँ, गौरव, भय, अपमान, मित्र और शत्रु की धारणाएँ भी विरासत में दे सकते हैं। इस अर्थ में अतीत समाप्त नहीं होता। वह वर्तमान मनुष्य के भीतर अस्मिता बनकर जीवित रहता है। हजार वर्ष पुरानी घटना भी किसी समुदाय की वर्तमान प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

यहीं आधुनिक सभ्यता का एक बड़ा अंतर्विरोध दिखाई देता है। हमारी तकनीक वैश्विक हो चुकी है, लेकिन हमारी अनेक मानसिक संरचनाएँ अभी भी स्थानीय और विभाजनपरक हैं। इंटरनेट, विमान, उपग्रह, वैश्विक व्यापार और विज्ञान ने पृथ्वी को लगभग एक साझा परिसर में बदल दिया है; किंतु मनुष्य अनेक स्थानों पर आज भी ‘हम’ और ‘वे’ की प्राचीन मनोवैज्ञानिक संरचना से संचालित होता है।

इस संदर्भ में अद्वैत का एक नया सभ्यतागत अर्थ सामने आता है।

अद्वैत का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि संसार की बहुलता समाप्त कर दी जाए। भाषाएँ, संस्कृतियाँ, समुदाय, जीवन-पद्धतियाँ और परंपराएँ मानव-सभ्यता की संपदा हैं। इसलिए बहुलता स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब भिन्नता को असंबद्धता, श्रेष्ठता अथवा शत्रुता में बदल दिया जाता है।

अद्वैत बहुलता का निषेध नहीं, उसके भीतर अंतर्निहित एकता की पहचान हो सकता है।

जैसे एक वृक्ष में हजारों पत्तियाँ अलग-अलग होकर भी एक ही जैविक व्यवस्था का हिस्सा होती हैं, वैसे ही मानव-समुदाय अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं के बावजूद एक साझा पृथ्वी, साझा जैवमंडल और परस्पर निर्भर भविष्य के अंग हैं। इस स्तर पर अद्वैत किसी धर्मविशेष की संपत्ति न रहकर एक वैश्विक सभ्यतागत मूल्य बन सकता है।

इसलिए वास्तविक संघर्ष ‘एक’ और ‘अनेक’ के बीच नहीं है। वास्तविक संघर्ष उस चेतना के बीच है जो अनेकता को विभाजन और संघर्ष में बदलती है तथा उस चेतना के बीच जो अनेकता के भीतर साझे अस्तित्व को अनुभव करती है।

मानव-विकास की पिछली अवस्थाओं में विभाजन उपयोगी भी रहा होगा। परिवार के प्रति निष्ठा, कबीले की एकजुटता, समुदाय की रक्षा और बाद में राष्ट्रीय संगठन ने मनुष्य को सुरक्षा और सहयोग प्रदान किया। अतः इन संरचनाओं को केवल नकारात्मक कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। किंतु जो व्यवस्था एक समय अस्तित्व-रक्षा का साधन थी, वही वैश्विक परस्पर-निर्भरता के युग में संघर्ष का कारण भी बन सकती है।

जलवायु परिवर्तन किसी धर्म अथवा राष्ट्र की सीमा नहीं पहचानता। महामारी जातीय अस्मिता देखकर नहीं फैलती। समुद्र, वायुमंडल और जैव-विविधता राजनीतिक सीमाओं के अनुसार व्यवहार नहीं करते। आधुनिक मानव की समस्याएँ वैश्विक हो चुकी हैं; इसलिए उनकी चेतना भी अंततः वैश्विक होनी पड़ेगी।

इसी बिंदु पर एकताजीवी मनुष्य की आवश्यकता सामने आती है।

एकताजीवी मनुष्य अपनी स्थानीय पहचानें त्यागता नहीं है। वह परिवार से प्रेम करता है, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ा रहता है, लेकिन अपनी अस्मिता को दूसरे मनुष्य के निषेध पर निर्मित नहीं करता। उसकी पहचान वृत्तों की तरह विस्तृत होती है—परिवार से समुदाय, समुदाय से देश, देश से मानवता और मानवता से समूचे जीव-जगत तक।

इस प्रकार सभ्यता की आगामी यात्रा को द्वैत से अद्वैत की यात्रा कहा जा सकता है—यदि द्वैत से हमारा आशय विभाजनजीवी चेतना और अद्वैत से साझे अस्तित्व की चेतना हो।

तब अद्वैत कोई केवल पारलौकिक आध्यात्मिक घोषणा नहीं रहेगा। वह मानव-सभ्यता के भविष्य का व्यावहारिक मूल्य बन जाएगा।

सभ्यता की अगली बड़ी छलाँग संभवतः किसी नई मशीन का आविष्कार नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा अपनी प्राचीन विभाजनकारी मानसिक प्रोग्रामिंग का अतिक्रमण होगी—विभाजनजीवी मनुष्य से एकताजीवी मनुष्य की ओर।

बुद्ध : स्वतंत्र चेतना का प्रयोग

 

बुद्ध : स्वतंत्र चेतना का प्रयोग

प्रतिक्रिया को देखने और उससे मुक्त होने की व्यावहारिक पद्धति

मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र प्राणी समझता है, लेकिन उसके दैनिक व्यवहार का बड़ा हिस्सा स्वतंत्र क्रिया न होकर परिस्थितियों से उत्पन्न प्रतिक्रिया होता है। अपमान हमें क्रोधित करता है, प्रशंसा प्रसन्न करती है, भय पलायन या आक्रमण की ओर ले जाता है और इच्छित वस्तु का दिखाई देना उसे प्राप्त करने की आकांक्षा पैदा करता है। इनमें से बहुत-सी प्रतिक्रियाएँ इतनी त्वरित होती हैं कि हमें उनके और अपने बीच कोई अंतर ही दिखाई नहीं देता।

हम कहते हैं—मैं क्रोधित हूँ।

जबकि अधिक वस्तुनिष्ठ कथन शायद यह होगा—मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न हुआ है।

इन दोनों वाक्यों के बीच का अंतर ही स्वतंत्र चेतना की संभावना का आरम्भ है।

प्रतिक्रिया ही मनुष्य नहीं है

मनुष्य की प्रतिक्रियाएँ केवल उसकी जैविक संरचना की देन नहीं हैं। परिवार, समुदाय, धर्म, संस्कृति, प्रतिष्ठा-बोध, सामाजिक स्मृति और व्यक्तिगत अनुभव भी उन्हें निर्मित करते हैं। किसी समाज में जिस घटना को अपमान समझकर हिंसक प्रतिक्रिया दी जाती है, दूसरे समाज में वही घटना लगभग महत्वहीन हो सकती है।

इसका अर्थ है कि प्रतिक्रिया के अनेक कार्यक्रम मनुष्य के भीतर संस्कृति द्वारा स्थापित किए जाते हैं।

मनुष्य फिर इन्हें अपनी इच्छा समझता है।

वह क्रोधित होता है और मानता है कि मैंने क्रोध किया; प्रतिशोध लेता है और मानता है कि मैंने निर्णय लिया। जबकि संभव है कि परिस्थिति ने केवल उस प्रतिक्रिया का बटन दबाया हो जिसका कार्यक्रम उसके भीतर बहुत पहले से मौजूद था।

यदि ऐसा है, तो स्वतंत्र इच्छा का प्रश्न केवल यह नहीं है कि मनुष्य को अपनी इच्छा पूरी करने की स्वतंत्रता है या नहीं। उससे अधिक मूल प्रश्न है—

जिसे वह अपनी इच्छा कह रहा है, वह उसकी स्वतंत्र इच्छा है भी या किसी जैविक, मनोवैज्ञानिक अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रतिक्रिया?

बुद्ध की मौलिकता

बुद्ध का महत्व इस प्रश्न के संदर्भ में असाधारण हो जाता है।

उन्होंने मनुष्य को केवल यह नहीं बताया कि क्रोध मत करो, लोभ मत करो अथवा तृष्णा छोड़ दो। ऐसे नैतिक आदेश लगभग सभी सभ्यताओं में मिल जाते हैं। उनकी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मनुष्य को अपने भीतर घट रही प्रक्रिया को देखने की दिशा दी।

तृष्णा उठ रही है—उसे देखो।

क्रोध उत्पन्न हो रहा है—उसे देखो।

दुःख है—उसे पहचानो।

शरीर में संवेदना उत्पन्न हुई है—उसके साथ तत्काल बह मत जाओ।

इस ‘देखने’ में एक गहरी मनोवैज्ञानिक क्रांति छिपी हुई है।

जो व्यक्ति अपने क्रोध को देख सकता है, वह पूरी तरह क्रोध नहीं रह जाता। देखने वाला और देखी जा रही मानसिक अवस्था—दोनों के बीच एक सूक्ष्म अंतराल पैदा हो जाता है।

और संभवतः इसी अंतराल में स्वतंत्रता जन्म लेती है।

दमन नहीं, अवलोकन

यहाँ प्रतिक्रिया से स्वतंत्र होने और प्रतिक्रिया को दबाने के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

क्रोध आया और हमने सामाजिक भय के कारण उसे व्यक्त नहीं किया—यह स्वतंत्रता नहीं भी हो सकती। भीतर क्रोध सक्रिय बना रह सकता है। इसी प्रकार इच्छा को बलपूर्वक दबा देना भी इच्छा से मुक्त होना आवश्यक नहीं है।

बुद्ध की पद्धति का आधुनिक मनोवैज्ञानिक महत्व इस बात में देखा जा सकता है कि मानसिक घटना को पहले पहचाना जाए।

यह क्रोध है।
यह भय है।
यह तृष्णा है।
यह पीड़ा है।

इस पहचान के साथ मनुष्य मानसिक घटना और अपनी संपूर्ण सत्ता को एक मानना बंद कर सकता है।

वह कह सकता है—क्रोध मेरे भीतर उपस्थित है, लेकिन क्रोध ही ‘मैं’ नहीं हूँ।

यहीं प्रतिक्रिया की यांत्रिकता कमजोर पड़ने लगती है।

स्वतंत्रता प्रतिक्रिया न करने का नाम नहीं

स्वतंत्र चेतना का अर्थ निष्क्रिय मनुष्य बन जाना भी नहीं है।

यदि अन्याय हो रहा है तो उसका प्रतिरोध आवश्यक हो सकता है। यदि जीवन संकट में है तो तत्काल कार्रवाई भी आवश्यक हो सकती है। बुद्ध की चेतना-दृष्टि का आधुनिक अर्थ प्रत्येक परिस्थिति को निष्क्रिय होकर सहना नहीं होना चाहिए।

वास्तविक प्रश्न है—

मेरी कार्रवाई परिस्थिति की सचेत समझ से निकल रही है या मेरे भीतर पहले से मौजूद भय, घृणा, अहंकार और प्रतिशोध के स्वचालित कार्यक्रम से?

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्रोध के कारण अन्याय का विरोध करना और अन्याय को समझकर उसका विरोध करना बाहर से एक जैसा दिखाई दे सकता है; लेकिन दोनों की आंतरिक संरचना अलग है।

पहले में प्रतिक्रिया मनुष्य को संचालित कर रही है।

दूसरे में मनुष्य प्रतिक्रिया को जानते हुए अपनी कार्रवाई चुनने की कोशिश कर रहा है।

बुद्ध और प्रयोगधर्मी आध्यात्म

यहीं बुद्ध भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करते हैं।

आत्मा, ब्रह्म, ईश्वर अथवा परम सत्ता के विषय में आध्यात्मिक चिंतन अत्यंत ऊँची दार्शनिक अवधारणाएँ निर्मित कर सकता है। लेकिन बुद्ध मनुष्य को उसके प्रत्यक्ष अनुभव की प्रयोगशाला में वापस लाते हैं।

शरीर यहाँ है।

संवेदना यहाँ है।

तृष्णा यहाँ है।

दुःख यहाँ है।

और इन्हें देखने वाला चित्त भी यहीं है।

इस अर्थ में बुद्ध का मार्ग किसी सिद्धांत को स्वीकार करने से पहले स्वयं अपनी चेतना पर प्रयोग करने का आमंत्रण है।

मनुष्य स्वयं देखे कि इच्छा कैसे जन्म लेती है; आसक्ति कैसे बनती है; अप्रिय अनुभव से घृणा कैसे पैदा होती है; और सुखद अनुभव को बनाए रखने की आकांक्षा किस प्रकार बेचैनी पैदा करती है।

इसलिए बुद्ध को केवल धर्म-संस्थापक के रूप में पढ़ना उनके सभ्यतागत महत्व को सीमित कर देता है। उन्हें मानवीय प्रतिक्रिया-तंत्र के एक प्राचीन अन्वेषक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

स्वतंत्र इच्छा का प्रयोगात्मक रूप

स्वतंत्र इच्छा पर दर्शन में लंबे विवाद संभव हैं। मनुष्य वास्तव में स्वतंत्र है या उसके सभी निर्णय पूर्व कारणों से निर्धारित हैं—इसका अंतिम उत्तर कठिन हो सकता है।

लेकिन बुद्ध का रास्ता इस दार्शनिक विवाद से थोड़ा अलग दिखाई देता है।

वह मानो पूछता है—

क्या तुम अपनी अगली प्रतिक्रिया को घटित होते हुए देख सकते हो?

यदि नहीं, तो स्वतंत्रता का दावा अभी संदिग्ध है।

यदि हाँ, तो कम-से-कम प्रतिक्रिया और क्रिया के बीच एक नया क्षेत्र खुल गया।

यही कारण है कि स्वतंत्र इच्छा को पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता के बजाय स्वतंत्रता की अर्जित होती हुई क्षमता के रूप में समझना अधिक उपयोगी हो सकता है।

मनुष्य पूरी तरह स्वतंत्र न भी हो, वह पहले से अधिक स्वतंत्र हो सकता है।

और चेतना का प्रशिक्षण उस ‘अधिक’ की दिशा में यात्रा है।

बुद्ध से आगे आधुनिक सभ्यता का प्रश्न

आज मनुष्य के पास बुद्ध के समय से असंख्य गुना अधिक ज्ञान और तकनीकी शक्ति है। लेकिन उसकी मूल प्रतिक्रियाएँ बहुत बदली हों, यह निश्चित नहीं है।

अपमान आज भी हिंसा उत्पन्न करता है।

भय आज भी घृणा पैदा करता है।

अस्मिता आज भी ‘हम’ और ‘वे’ बनाती है।

लोभ अब केवल व्यक्तिगत संचय नहीं, विशाल आर्थिक संरचनाओं का चालक बन सकता है।

और सामूहिक प्रतिक्रिया को आधुनिक संचार-तकनीक कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुँचा सकती है।

इसलिए आधुनिक सभ्यता के लिए बुद्ध का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

यदि मनुष्य अपनी प्रतिक्रियाओं से स्वतंत्र नहीं हुआ, तो उसकी तकनीकी शक्ति उन्हीं आदिम प्रतिक्रियाओं को अधिक विनाशकारी बना सकती है।

परमाणु हथियार आधुनिक है; प्रतिशोध की मानसिकता प्राचीन हो सकती है।

डिजिटल माध्यम आधुनिक है; भीड़ का उन्माद प्राचीन हो सकता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधुनिक है; उसे उपयोग करने वाला लोभ और वर्चस्व-बोध अत्यंत पुराना हो सकता है।

सभ्यता की समस्या तब केवल बुद्धिमत्ता बढ़ाने की नहीं रह जाती—चेतना को अपनी ही यांत्रिकताओं से परिचित कराने की भी हो जाती है।

निष्कर्ष : प्रतिक्रिया और क्रिया के बीच मनुष्य

बुद्ध की आधुनिक उपयोगिता निर्वाण की किसी पारलौकिक व्याख्या में खोजने की अनिवार्यता नहीं है। उसका एक अत्यंत मानवीय अर्थ हमारे सामने ही उपलब्ध है।

संवेदना और प्रतिक्रिया के बीच चेतना को उपस्थित करना।

मनुष्य को क्रोध न आए—यह शायद अव्यावहारिक अपेक्षा है।

मनुष्य भय से पूरी तरह मुक्त हो जाए—यह भी कठिन है।

इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ—आधुनिक सक्रिय जीवन के लिए इसे सार्वभौमिक आदर्श बनाना आवश्यक नहीं।

लेकिन मनुष्य अपने क्रोध को क्रोध के रूप में, भय को भय के रूप में और इच्छा को इच्छा के रूप में पहचान सके—यह संभवतः अधिक व्यावहारिक सभ्यतागत लक्ष्य है।

तब वह अपनी हर मानसिक घटना का आज्ञाकारी सेवक नहीं रहेगा।

बुद्ध की सबसे आधुनिक सम्भावना शायद यही है—
मनुष्य को प्रतिक्रिया-विहीन बनाना नहीं,
प्रतिक्रिया का दास बने रहने से मुक्त करना।

और स्वतंत्र चेतना का पहला प्रयोग शायद वहीं आरम्भ होता है, जहाँ मनुष्य पहली बार अपनी प्रतिक्रिया को घटित होते हुए देखता है—और तत्काल उसका अनुसरण नहीं करता।

अद्वैत बनाम द्वैत का सभ्यता-संघर्ष

 

अद्वैत बनाम द्वैत का सभ्यता-संघर्ष

द्वैत को बहुलता और अद्वैत को एकता के व्यापक संदर्भ में रखकर मानव-सभ्यता के इतिहास को देखा जाए तो इन दोनों अवधारणाओं का एक सभ्यतागत अर्थ भी सामने आता है। द्वैत को केवल दर्शन की तत्त्वमीमांसात्मक अवधारणा मानना पर्याप्त नहीं है। संभव है कि मनुष्य की द्वैतपरक चेतना उसके लंबे ऐतिहासिक जीवन की विभाजनकारी परिस्थितियों से भी निर्मित हुई हो। इसी प्रकार अद्वैत को केवल आध्यात्मिक अनुभूति न मानकर साझे अस्तित्व की विकसित सभ्यतागत चेतना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

मानव-जाति का विकास किसी एक अखंड सामाजिक इकाई के रूप में नहीं हुआ। मनुष्य परिवारों, समूहों, कबीलों, भूभागों, भाषाओं और संस्कृतियों में विभाजित होकर विकसित हुआ। इनमें संभवतः सबसे प्राथमिक विभाजन पारिवारिक था—मेरा परिवार और दूसरा परिवार। परिवारों से वंश और समुदाय बने; समुदायों से कबीले और जातीय समूह। भौगोलिक दूरियों तथा प्राकृतिक अवरोधों ने इस विभाजन को और स्थायी बनाया। बाद में भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक अस्मिताएँ विकसित हुईं। आधुनिक युग में राष्ट्र और राष्ट्रीयता ने इसी विभाजन-प्रक्रिया को एक नया राजनीतिक रूप दिया।

इस दृष्टि से द्वैत मानव-मन पर आरोपित कोई आकस्मिक विचार नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक अनुभव की स्वाभाविक परिणति भी हो सकता है। जब जीवन की सुरक्षा अपने परिवार, अपने कबीले अथवा अपने समुदाय पर निर्भर थी, तब ‘अपने’ और ‘पराए’ के बीच भेद करना अस्तित्व-रक्षा की आवश्यकता थी। जो अपना था वह सहयोगी था; जो दूसरा था, वह संभावित प्रतियोगी अथवा शत्रु भी हो सकता था। इस प्रकार परिस्थितियों ने पहले विभाजन पैदा किया और विभाजन ने अपने अनुकूल मानसिकता तथा मूल्य निर्मित किए।

समस्या यह है कि परिस्थितियाँ बदल जाने के बाद भी उनसे निर्मित मानसिक संस्कार बहुत लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।

इसे आधुनिक तकनीकी रूपक से समझें तो आज की मानव-सभ्यता एक ही नेटवर्क से जुड़े ऐसे विश्व की तरह दिखाई देती है जिसकी अलग-अलग इकाइयाँ अलग-अलग सांस्कृतिक ‘सॉफ्टवेयर’ से संचालित हो रही हैं। मनुष्य जैविक रूप से एक ही प्रजाति है, पृथ्वी भी उसकी साझा है और आधुनिक अर्थव्यवस्था तथा संचार-व्यवस्था ने उसके जीवन को अभूतपूर्व रूप से परस्पर निर्भर बना दिया है; फिर भी उसकी मानसिक प्रोग्रामिंग अनेक ऐतिहासिक अस्मिताओं द्वारा संचालित होती है।

धर्म, भाषा, जातीयता, नस्ल, राष्ट्र, क्षेत्र और समुदाय केवल पहचान नहीं देते; वे स्मृतियाँ, गौरव, भय, अपमान, मित्र और शत्रु की धारणाएँ भी विरासत में दे सकते हैं। इस अर्थ में अतीत समाप्त नहीं होता। वह वर्तमान मनुष्य के भीतर अस्मिता बनकर जीवित रहता है। हजार वर्ष पुरानी घटना भी किसी समुदाय की वर्तमान प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

यहीं आधुनिक सभ्यता का एक बड़ा अंतर्विरोध दिखाई देता है। हमारी तकनीक वैश्विक हो चुकी है, लेकिन हमारी अनेक मानसिक संरचनाएँ अभी भी स्थानीय और विभाजनपरक हैं। इंटरनेट, विमान, उपग्रह, वैश्विक व्यापार और विज्ञान ने पृथ्वी को लगभग एक साझा परिसर में बदल दिया है; किंतु मनुष्य अनेक स्थानों पर आज भी ‘हम’ और ‘वे’ की प्राचीन मनोवैज्ञानिक संरचना से संचालित होता है।

इस संदर्भ में अद्वैत का एक नया सभ्यतागत अर्थ सामने आता है।

अद्वैत का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि संसार की बहुलता समाप्त कर दी जाए। भाषाएँ, संस्कृतियाँ, समुदाय, जीवन-पद्धतियाँ और परंपराएँ मानव-सभ्यता की संपदा हैं। इसलिए बहुलता स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब भिन्नता को असंबद्धता, श्रेष्ठता अथवा शत्रुता में बदल दिया जाता है।

अद्वैत बहुलता का निषेध नहीं, उसके भीतर अंतर्निहित एकता की पहचान हो सकता है।

जैसे एक वृक्ष में हजारों पत्तियाँ अलग-अलग होकर भी एक ही जैविक व्यवस्था का हिस्सा होती हैं, वैसे ही मानव-समुदाय अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं के बावजूद एक साझा पृथ्वी, साझा जैवमंडल और परस्पर निर्भर भविष्य के अंग हैं। इस स्तर पर अद्वैत किसी धर्मविशेष की संपत्ति न रहकर एक वैश्विक सभ्यतागत मूल्य बन सकता है।

इसलिए वास्तविक संघर्ष ‘एक’ और ‘अनेक’ के बीच नहीं है। वास्तविक संघर्ष उस चेतना के बीच है जो अनेकता को विभाजन और संघर्ष में बदलती है तथा उस चेतना के बीच जो अनेकता के भीतर साझे अस्तित्व को अनुभव करती है।

मानव-विकास की पिछली अवस्थाओं में विभाजन उपयोगी भी रहा होगा। परिवार के प्रति निष्ठा, कबीले की एकजुटता, समुदाय की रक्षा और बाद में राष्ट्रीय संगठन ने मनुष्य को सुरक्षा और सहयोग प्रदान किया। अतः इन संरचनाओं को केवल नकारात्मक कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। किंतु जो व्यवस्था एक समय अस्तित्व-रक्षा का साधन थी, वही वैश्विक परस्पर-निर्भरता के युग में संघर्ष का कारण भी बन सकती है।

जलवायु परिवर्तन किसी धर्म अथवा राष्ट्र की सीमा नहीं पहचानता। महामारी जातीय अस्मिता देखकर नहीं फैलती। समुद्र, वायुमंडल और जैव-विविधता राजनीतिक सीमाओं के अनुसार व्यवहार नहीं करते। आधुनिक मानव की समस्याएँ वैश्विक हो चुकी हैं; इसलिए उनकी चेतना भी अंततः वैश्विक होनी पड़ेगी।

इसी बिंदु पर एकताजीवी मनुष्य की आवश्यकता सामने आती है।

एकताजीवी मनुष्य अपनी स्थानीय पहचानें त्यागता नहीं है। वह परिवार से प्रेम करता है, अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ा रहता है, लेकिन अपनी अस्मिता को दूसरे मनुष्य के निषेध पर निर्मित नहीं करता। उसकी पहचान वृत्तों की तरह विस्तृत होती है—परिवार से समुदाय, समुदाय से देश, देश से मानवता और मानवता से समूचे जीव-जगत तक।

इस प्रकार सभ्यता की आगामी यात्रा को द्वैत से अद्वैत की यात्रा कहा जा सकता है—यदि द्वैत से हमारा आशय विभाजनजीवी चेतना और अद्वैत से साझे अस्तित्व की चेतना हो।

तब अद्वैत कोई केवल पारलौकिक आध्यात्मिक घोषणा नहीं रहेगा। वह मानव-सभ्यता के भविष्य का व्यावहारिक मूल्य बन जाएगा।

सभ्यता की अगली बड़ी छलाँग संभवतः किसी नई मशीन का आविष्कार नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा अपनी प्राचीन विभाजनकारी मानसिक प्रोग्रामिंग का अतिक्रमण होगी—विभाजनजीवी मनुष्य से एकताजीवी मनुष्य की ओर।

ब्रह्म : शब्द, अनुभव और अर्थ की पुरातात्विक खोज

 

ब्रह्म : शब्द, अनुभव और अर्थ की पुरातात्विक खोज

भारतीय दर्शन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और साथ ही सर्वाधिक अमूर्त शब्दों में ‘ब्रह्म’ प्रमुख है। सामान्यतः इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘बृह्’ धातु से की जाती है, जिसका अर्थ बढ़ना, फैलना, विस्तृत होना या महान होना बताया जाता है। इस व्युत्पत्ति के आधार पर ब्रह्म को वह परम सत्ता माना गया जो अनन्त, सर्वव्यापी और समस्त अस्तित्व को अपने भीतर समेटने वाली है।

किन्तु किसी अत्यन्त प्राचीन शब्द का इतिहास केवल उस भाषा की उपलब्ध व्याकरणिक व्यवस्था से ही निश्चित कर देना पर्याप्त नहीं है जिसमें उसका परवर्ती दार्शनिक रूप सुरक्षित मिला है। शब्द व्याकरण से भी पुराने हो सकते हैं। वे मनुष्य के प्रवास, समुदायों के सम्पर्क, ध्वनि-परिवर्तन और हजारों वर्षों के सांस्कृतिक अनुभवों से गुजरते हुए अपना रूप और अर्थ बदलते रहते हैं। इसलिए ‘ब्रह्म’ को समझने के लिए केवल संस्कृत के भीतर नहीं, बल्कि तुलनात्मक और जिसे मैं ‘पुरातात्विक भाषा-विज्ञान’ कहना चाहता हूँ, उस दृष्टि से भी उसकी खोज आवश्यक है।

‘ब्र’ : क्या यह किसी प्राचीन अर्थ-बीज का अवशेष है?

मेरी जिज्ञासा विशेष रूप से ‘ब्र/बर’ ध्वनि-समूह को लेकर है। विभिन्न भाषाओं के प्राचीन शब्दों में इसके निकट ध्वनि-रूप दिखाई देते हैं। Brother, birādar तथा संस्कृत भ्रातृ जैसे संबंध-सूचक शब्दों की ध्वन्यात्मक समानताएँ कम-से-कम यह प्रश्न उठाने का अवसर देती हैं कि क्या इन शब्दों के पीछे किसी अत्यन्त प्राचीन भाषिक संसार के ध्वनि-अवशेष मौजूद हैं।

इसी प्रकार प्रकाश, अग्नि, चमक, विस्तार, महानता अथवा संबंध से जुड़े विभिन्न शब्द-समूहों में ‘ब्र’, ‘बर’, ‘भ्र’ जैसे रूपों की उपस्थिति मेरे लिए अनुसंधान का विषय है। इन समानताओं को बिना ऐतिहासिक ध्वनि-नियमों और पर्याप्त प्रमाणों के सीधे समान मूल से उत्पन्न घोषित करना उचित नहीं होगा; लेकिन इन्हें संयोग कहकर छोड़ देना भी शब्दों के प्रागैतिहासिक जीवन की सम्भावनाओं को बंद कर देना होगा।

यहीं पुरातात्विक भाषा-विज्ञान की आवश्यकता सामने आती है। पुरातत्त्व जैसे मिट्टी की परतों से सभ्यता के पुराने रूप खोजता है, वैसे ही भाषा की वर्तमान संरचनाओं और शब्दों की ध्वनि-परतों के भीतर मानव-अनुभव के पुराने संकेत खोजे जा सकते हैं।

‘ब्रह्म’ : ‘ब्र’ और ‘अहम्’ की सम्भावित अर्थ-संरचना

मेरी वैकल्पिक अर्थ-परिकल्पना में ‘ब्रह्म’ को केवल ‘बृह्’ अर्थात् विस्तार से समझने के बजाय ‘ब्र + अहम्’ की अर्थ-दिशा में भी पढ़ा जा सकता है। यहाँ ‘अहम्’ का अर्थ है—‘मैं’, अर्थात् अपने अस्तित्व की प्रत्यक्ष अनुभूति।

इस दृष्टि से ब्रह्म किसी मनुष्याकार बाहरी ईश्वर का नाम नहीं रह जाता। वह अस्तित्व के भीतर उपस्थित उस व्यापक ‘मैं हूँ’ की अनुभूति की ओर संकेत करने लगता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को संसार से पूर्णतः पृथक सत्ता के रूप में अनुभव नहीं करता।

यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंतर है। सामान्य अहंकार कहता है—

‘मैं दूसरों से अलग और श्रेष्ठ हूँ।’

ब्रह्मानुभूति का ‘अहम्’ कहता है—

‘जिस अस्तित्व में मैं हूँ, उसी अस्तित्व में यह समस्त जगत भी है।’

इसलिए ‘अहं ब्रह्मास्मि’ को यदि केवल ‘मैं ईश्वर हूँ’ के अर्थ में पढ़ा जाए तो उसका अर्थ अहंकारवादी भी बनाया जा सकता है। किंतु अद्वैत के धरातल पर इसका आशय ठीक उलटा है। यहाँ सीमित व्यक्तिगत ‘मैं’ का विस्तार उस साझा अस्तित्व-बोध में होता है जहाँ अपने और पराये की कठोर सीमा कमजोर पड़ने लगती है।

ब्रह्म : वस्तु नहीं, अस्तित्व की अनुभूति

ब्रह्म की समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य उसे किसी वस्तु की तरह जानना चाहता है। मनुष्य का मस्तिष्क संसार को पहचानने के लिए नाम देता है, वर्ग बनाता है और अनुभव को अवधारणाओं में बदलता है। यह प्रक्रिया व्यवहार के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी एक सीमा भी है।

जिस क्षण हम किसी अनुभव को नाम दे देते हैं, वह हमारे लिए पहले से जानी हुई वस्तु बनने लगता है। फूल अब विस्मयकारी अस्तित्व नहीं रहता—वह ‘फूल’ हो जाता है; आकाश ‘आकाश’ और नदी ‘नदी’। शब्द उपयोगी हैं, लेकिन वे वास्तविकता के स्थान पर वास्तविकता का मानसिक प्रतिनिधित्व उपस्थित करते हैं।

इस अर्थ में ज्ञान कभी-कभी विस्मय का अंत भी बन सकता है। जानी-पहचानी दुनिया धीरे-धीरे ‘जान ली गई दुनिया’ में बदल जाती है।

ब्रह्म की अवधारणा इस संज्ञानात्मक सीमा को पहचानती हुई दिखाई देती है। इसीलिए उपनिषद का ‘नेति-नेति’ महत्त्वपूर्ण है—यह नहीं, वह नहीं। इसका आशय वास्तविकता का निषेध नहीं बल्कि यह चेतावनी भी माना जा सकता है कि वास्तविकता को हमारी कोई एक भाषिक परिभाषा समाप्त नहीं कर सकती।

ब्रह्म को जानने का अर्थ तब किसी अंतिम परिभाषा को याद कर लेना नहीं, बल्कि अस्तित्व के प्रति अपनी संवेदना को खुला रखना है।

ज्ञान से पहले का संसार

एक बच्चा जिस संसार को पहली बार देखता है, वह उसके लिए आश्चर्य से भरा होता है। उसका आकाश अभी केवल खगोल-विज्ञान की परिभाषा नहीं है; उसका वृक्ष वनस्पति-विज्ञान की वर्गीकृत इकाई नहीं है। ज्ञान बढ़ने के साथ संसार अधिक उपयोगी और समझने योग्य अवश्य होता है, लेकिन उसका अनुभव कभी-कभी कम रोमांचकारी हो जाता है।

सभ्यता की विडम्बना यह है कि उसने मनुष्य को संसार के विषय में अत्यधिक ज्ञान दिया, लेकिन उसी अनुपात में संसार के साथ उसके प्रत्यक्ष संबंध को कमजोर भी किया।

हम वृक्ष को लकड़ी, जंगल को संसाधन, नदी को जल-संसाधन, पशु को उत्पादन और पृथ्वी को कच्चे माल के भंडार के रूप में देखने लगते हैं। ज्ञान यहाँ सत्ता और उपयोग की भाषा बन जाता है।

ब्रह्म की अनुभूति इस दृष्टि को उलटती है। वह मनुष्य से कहती है—जिस प्रकृति का तुम उपयोग कर रहे हो, तुम स्वयं भी उसी अस्तित्व-व्यवस्था का अंश हो।

मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहजीवी है।

ब्रह्म और अद्वैत का सभ्यतागत अर्थ

यहीं ब्रह्म की अवधारणा दर्शन से आगे बढ़कर सभ्यता-विमर्श का विषय बन जाती है।

यदि मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानेगा तो प्रकृति उसके लिए बाहरी वस्तु होगी। यदि एक समुदाय स्वयं को दूसरे समुदाय से मूलतः पृथक और श्रेष्ठ मानेगा तो दूसरा मनुष्य उसके लिए प्रतिद्वंद्वी होगा। इसी तरह धर्म, जाति, नस्ल, राष्ट्र और भाषा की अस्मिताएँ जब अस्तित्व से बड़ी हो जाती हैं तो मनुष्य निर्मित विभाजन वास्तविकता से अधिक शक्तिशाली दिखाई देने लगते हैं।

अद्वैत इन विभाजनों को व्यवहारिक स्तर पर मिटाने की घोषणा नहीं करता; मनुष्य और वृक्ष एक ही वस्तु नहीं हैं, दो मनुष्य भी एक ही व्यक्ति नहीं हैं। किंतु दोनों का अस्तित्व परस्पर सम्बद्ध है।

इसलिए अद्वैत का आधुनिक अर्थ एकरूपता नहीं, सह-अस्तित्व की एकता होना चाहिए।

यही ब्रह्म की अवधारणा का पर्यावरणीय और वैश्विक महत्त्व भी है। पृथ्वी पर जीवन अलग-अलग स्वतंत्र द्वीपों का संग्रह नहीं है। वायु, जल, वनस्पति, जीव-जंतु और मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर जीवन-तंत्र के अंग हैं। आधुनिक पारिस्थितिकी जिस पारस्परिक निर्भरता को वैज्ञानिक भाषा में समझाती है, ब्रह्म की अनुभूति उसे सांस्कृतिक मूल्य और अस्तित्व-बोध में बदल सकती है।

ईश्वर से अलग ब्रह्म को समझने की आवश्यकता

‘ब्रह्म’ को ‘ईश्वर’ का पर्याय मान लेना भी उसके अर्थ को सीमित कर सकता है। ईश्वर की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच दूरी होती है—एक बनाने वाला है और दूसरी बनाई हुई दुनिया।

लेकिन ब्रह्म को यदि अस्तित्व की अखंडता के रूप में समझा जाए तो प्रकृति किसी बाहरी निर्माता द्वारा बनाई गई परायी वस्तु नहीं रहती। जीव, पदार्थ, चेतना और विश्व उसी साझा अस्तित्व के विभिन्न रूप हैं।

इसी कारण भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘तत्त्वमसि’, ‘सोऽहम्’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ जैसे कथन सम्भव हुए। इनमें मनुष्य को किसी बाहरी परम सत्ता के सामने केवल अधीन प्राणी के रूप में नहीं, बल्कि उसी व्यापक अस्तित्व की अभिव्यक्ति के रूप में देखने की संभावना उपस्थित होती है।

शब्द से पुनः अनुभव की ओर

यहाँ एक रोचक विरोधाभास है—जिस ‘ब्रह्म’ को शब्दों से परे समझना है, उसके विषय में हम शब्दों से ही विचार कर रहे हैं।

लेकिन भाषा की सार्थकता इसी में है कि वह अंततः अपनी सीमा भी बताए।

मानचित्र यात्रा में सहायक है, लेकिन मानचित्र स्वयं भूभाग नहीं होता। उसी प्रकार ‘ब्रह्म’ शब्द भी ब्रह्म नहीं है। वह केवल उस दिशा की ओर संकेत करने वाला भाषिक चिह्न है जहाँ व्यक्ति अपने पृथक अस्तित्व के भ्रम से बाहर निकलकर जीवन और जगत की साझी उपस्थिति का अनुभव कर सके।

इसलिए ब्रह्म की खोज अंततः किसी शब्दकोश में समाप्त नहीं होती।

शब्दकोश हमें बताएगा कि ‘ब्रह्म’ शब्द का प्रामाणिक भाषिक इतिहास क्या है; तुलनात्मक भाषा-विज्ञान बताएगा कि उसकी ध्वनियाँ किन पुराने शब्द-परिवारों से जुड़ सकती हैं; पुरातात्विक भाषा-विज्ञान यह प्रश्न उठा सकता है कि इन ध्वनियों के पीछे कौन-से आदिम अनुभव छिपे हैं; लेकिन ब्रह्म का दार्शनिक अर्थ तब पूर्ण होगा जब मनुष्य उस साझा अस्तित्व को अपने जीवन-मूल्य में अनुभव करे।

निष्कर्ष

‘ब्रह्म’ की मेरी खोज इसलिए केवल किसी प्राचीन संस्कृत शब्द की नई व्युत्पत्ति खोजने का प्रयास नहीं है। यह उस मानवीय अनुभव की खोज है जिसने संभवतः इस शब्द को अर्थवान बनाया।

‘ब्र + अहम्’ को मैं अभी अंतिम ऐतिहासिक व्युत्पत्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक अर्थ-पुरातात्विक परिकल्पना के रूप में देखता हूँ। इसकी भाषावैज्ञानिक पुष्टि के लिए संस्कृत, प्राकृत, ईरानी, सेमिटिक तथा यूरोपीय भाषा-परिवारों के संबंधित शब्दों और उनके प्राचीनतम रूपों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होगा।

लेकिन इसका दार्शनिक संकेत अत्यन्त मूल्यवान है।

यदि ‘अहम्’ केवल मेरा व्यक्तिगत अहम् न रहकर व्यापक अस्तित्व में अपनी सहभागिता की अनुभूति बन जाए, तो ब्रह्म कोई दूरस्थ अलौकिक सत्ता नहीं रह जाता। वह मनुष्य, प्रकृति और समस्त जीवन के बीच उपस्थित साझे अस्तित्व का बोध बन जाता है।

तब ब्रह्म को जानना संसार से बाहर किसी ईश्वर को खोजना नहीं है।

वह संसार के भीतर अपने होने को और अपने भीतर संसार की उपस्थिति को अनुभव करना है।

और संभवतः ब्रह्म की सबसे आधुनिक सभ्यतागत व्याख्या यही हो सकती है—

अस्तित्व किसी एक का नहीं है; अस्तित्व साझी उपस्थिति है।

ब्रह्म : शब्द से विश्व-अनुभव तक

 

ब्रह्म : शब्द से विश्व-अनुभव तक — एक समावेशी अर्थ-यात्रा

‘ब्रह्म’ भारतीय चिंतन के उन विलक्षण शब्दों में है जिनका अर्थ किसी एक परिभाषा में समाप्त नहीं होता। सहस्राब्दियों की वैचारिक यात्रा में इस शब्द के साथ विस्तार, पवित्र वाणी, परम सत्य, विश्वव्यापी सत्ता, आत्मानुभूति और अद्वैत जैसे अनेक अर्थ जुड़े हैं। इसलिए इसके किसी ‘वास्तविक अर्थ’ की खोज करते समय यह मानना अधिक उचित होगा कि किसी प्राचीन शब्द का वास्तविक अर्थ केवल उसका आरंभिक अर्थ नहीं, बल्कि उसकी पूरी अर्थ-यात्रा भी हो सकती है।

प्रचलित व्युत्पत्ति और उससे आगे का प्रश्न

संस्कृत की प्रचलित व्युत्पत्ति-परंपरा ‘ब्रह्मन्’ को सामान्यतः बृह् धातु—बढ़ना, फैलना, विस्तृत होना—से जोड़ती है। इस दृष्टि से ब्रह्म वह है जो व्यापक है, विस्तृत है अथवा विस्तार की चरम अवधारणा तक पहुँचता है।

इस व्युत्पत्ति का अपना भाषावैज्ञानिक आधार है और इसे अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन प्रश्न यहाँ समाप्त भी नहीं होता।

भाषाएँ अपने व्याकरण से अधिक पुरानी मानवीय स्मृतियाँ सँजो सकती हैं। जिस समय किसी भाषा का व्यवस्थित व्याकरण लिखा जाता है, उसके बहुत पहले मनुष्य बोलता, प्रवास करता, दूसरे समुदायों से मिलता और शब्दों तथा ध्वनियों का आदान-प्रदान करता रहा होता है। इसलिए किसी अत्यन्त पुराने शब्द की खोज उसके निकटवर्ती तथा दूरवर्ती भाषा-परिवारों तक भी ले जाई जा सकती है।

यहीं से उस पद्धति की शुरुआत होती है जिसे मैं ‘पुरातात्विक भाषा-विज्ञान’ कहना चाहता हूँ।

भाषा का भी पुरातत्त्व सम्भव है

पुरातत्त्ववेत्ता मिट्टी की परतें हटाकर किसी सभ्यता के पुराने रूप खोजता है। उसी प्रकार भाषा-अध्येता शब्दों की वर्तमान संरचना के भीतर उनकी पुरानी ध्वनियों और अर्थ-स्मृतियों की खोज कर सकता है।

‘ब्र’, ‘बर’, ‘भ्र’, ‘बिर’ जैसे ध्वनि-रूप इस दृष्टि से मेरे लिए विशेष रुचि के विषय हैं। संस्कृत भ्रातृ, अंग्रेजी brother और फारसी birādar जैसे शब्द हमें तुलनात्मक अध्ययन की ओर आमंत्रित करते हैं।

इस प्रकार की ध्वनि-समानता को सीधे समान व्युत्पत्ति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान में नियमित ध्वनि-परिवर्तन, प्राचीनतम उपलब्ध रूप, अर्थ-विकास और भाषा-परिवारों के ऐतिहासिक संबंधों की पुष्टि आवश्यक है।

फिर भी समानताओं पर प्रश्न उठाना महत्त्वपूर्ण है। वैज्ञानिक सतर्कता का अर्थ जिज्ञासा का निषेध नहीं, बल्कि जिज्ञासा को प्रमाण की अनुशासित खोज में बदलना है।

‘ब्र + अहम्’ : एक वैकल्पिक अर्थ-पुरातात्विक संभावना

इसी खोज के भीतर ‘ब्रह्म’ को ‘ब्र + अहम्’ की दिशा से पढ़ने की मेरी परिकल्पना सामने आती है।

इसे संस्कृत की स्थापित ऐतिहासिक व्युत्पत्ति के विकल्प के रूप में तत्काल घोषित करने के बजाय एक अर्थ-पुरातात्विक प्रस्ताव की तरह देखना अधिक उपयोगी है।

यहाँ ‘अहम्’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

‘अहम्’ मनुष्य की सबसे प्राथमिक अनुभूतियों में से एक है—मैं हूँ।

मनुष्य संसार के बारे में कुछ जानने से पहले अपने होने को जीता है। शिशु के पास संसार का व्यवस्थित ज्ञान नहीं होता, लेकिन उसका अस्तित्व और उसकी संवेदना होती है। इस अर्थ में अस्तित्व-बोध ज्ञान से भी प्राथमिक है।

यदि ‘अहम्’ को इसी अस्तित्व-बोध की दिशा में समझें, तो ब्रह्म का दार्शनिक अर्थ एक विलक्षण संभावना खोलता है—व्यक्तिगत ‘मैं’ का उस व्यापक अस्तित्व से संबंध जिसमें संसार की समस्त सत्ताएँ उपस्थित हैं।

अहंकार और ‘अहम्’ में अंतर

यहाँ ‘अहम्’ को अहंकार समझना भूल होगी।

अहंकार कहता है—

मैं दूसरों से अलग और श्रेष्ठ हूँ।

अद्वैतपरक अस्तित्व-बोध कहता है—

मैं अलग दिखाई देते हुए भी उसी अस्तित्व का सहभागी हूँ जिसका सहभागी दूसरा मनुष्य, जीव और प्रकृति है।

इसलिए ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का अर्थ यदि केवल ‘मैं ईश्वर हूँ’ कर दिया जाए तो उसका अर्थ विकृत हो सकता है। उसका अधिक समावेशी पाठ होगा—मेरे भीतर अनुभव होने वाला अस्तित्व उस व्यापक अस्तित्व से निरपेक्ष नहीं है जिसमें समस्त जगत उपस्थित है।

यह व्यक्तिगत अहम् का महिमामंडन नहीं, उसकी सीमा का अतिक्रमण है।

ब्रह्म : एकता नहीं, समावेशी एकत्व

अद्वैत का अर्थ यह नहीं कि संसार की विविधता मिथ्या घोषित करके मनुष्य, पशु, वृक्ष, नदी, पर्वत और पदार्थ के भेदों को अस्वीकार कर दिया जाए।

भिन्नता वास्तविक अनुभव है।

लेकिन भिन्नता का अर्थ असंबद्धता नहीं है।

यही अंतर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

एक वन में हजारों वृक्ष अलग-अलग होते हैं, लेकिन मिट्टी, जल, वायु, सूक्ष्मजीव और पारिस्थितिक संबंध उन्हें एक जीवन-तंत्र में जोड़ते हैं। मानव शरीर में अरबों कोशिकाएँ अपनी अलग संरचना और कार्य रखते हुए भी एक शरीर की सहभागी हैं।

इसी प्रकार संसार को विविधताओं के बीच उपस्थित संबंधों की समग्रता के रूप में देखना ब्रह्म की आधुनिक समावेशी व्याख्या हो सकती है।

अद्वैत का अर्थ विविधता का अंत नहीं; विविधता के भीतर संबंध की पहचान है।

ब्रह्म और ईश्वर : विरोध नहीं, अलग अर्थ-स्तर

ब्रह्म की अवधारणा को समझने के लिए ईश्वर की सभी धार्मिक अवधारणाओं को उसका विरोधी मानना भी आवश्यक नहीं है।

विभिन्न धार्मिक परंपराओं ने परम सत्ता को अलग-अलग रूपों में अनुभव और अभिव्यक्त किया है। कहीं वह सृष्टिकर्ता है, कहीं पालनकर्ता, कहीं न्यायकारी सत्ता, कहीं प्रेम, कहीं प्रकाश और कहीं निराकार परम सत्य।

समावेशी दृष्टि यह पूछ सकती है कि इन विभिन्न प्रतीकों और अवधारणाओं के पीछे मनुष्य की कौन-सी मूल अस्तित्वगत आकांक्षा सक्रिय रही है।

ब्रह्म का अद्वैतपरक अर्थ इस संवाद में एक विशिष्ट प्रस्ताव रखता है—परम वास्तविकता को केवल संसार से बाहर मत खोजो; अस्तित्व के भीतर भी उसकी उपस्थिति अनुभव करो।

इस प्रकार ब्रह्म ईश्वर-विरोधी अवधारणा बनने के बजाय ईश्वर की अवधारणा को अधिक व्यापक अस्तित्व-दृष्टि की ओर ले जा सकता है।

भाषा वास्तविकता नहीं है

यहाँ भाषा की समस्या सामने आती है।

मनुष्य संसार को शब्दों के माध्यम से पहचानता है। शब्द हमें संवाद और ज्ञान देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वही शब्द वास्तविकता के स्थानापन्न भी बनने लगते हैं।

हम ‘वृक्ष’ कहते हैं और मान लेते हैं कि वृक्ष को जान लिया।

हम ‘मनुष्य’ कहते हैं और करोड़ों अलग-अलग जीवन-अनुभवों को एक शब्द में समेट देते हैं।

हम ‘ईश्वर’, ‘आत्मा’, ‘प्रकृति’ और ‘ब्रह्म’ कहते हैं और कभी-कभी भूल जाते हैं कि शब्द अनुभव नहीं है—वह अनुभव की ओर संकेत मात्र है।

यहीं उपनिषदों का ‘नेति-नेति’ आधुनिक अर्थ ग्रहण करता है। इसे इस चेतावनी की तरह भी पढ़ा जा सकता है कि अंतिम वास्तविकता हमारी किसी एक अवधारणा, नाम या परिभाषा में पूरी तरह कैद नहीं हो सकती।

ज्ञान से सतर्क रहने की आवश्यकता

मनुष्य को ज्ञान चाहिए; ज्ञान के बिना सभ्यता संभव नहीं थी। लेकिन ज्ञान स्वयं अंतिम सत्य नहीं है। वह मनुष्य द्वारा निर्मित, संशोधित और पुनरीक्षित होता रहता है।

इसीलिए ज्ञान का सम्मान करते हुए भी ज्ञान से सतर्क रहना आवश्यक है।

जानना एक जीवित प्रक्रिया है; ज्ञान उस प्रक्रिया का पहले से अर्जित परिणाम।

जब ज्ञान स्वयं को अंतिम मान लेता है, तो जिज्ञासा समाप्त होने लगती है। संसार परिचित वस्तुओं का संग्रह बन जाता है और विस्मय मरने लगता है।

ब्रह्म की खोज इसीलिए ‘जान लेने’ की परियोजना नहीं हो सकती। वह जानने की प्रक्रिया को खुला रखने वाली चेतना भी है।

ब्रह्म और आधुनिक पारिस्थितिकी

आज मनुष्य ऐसे सभ्यतागत संकट में है जहाँ ब्रह्म की यह व्याख्या केवल दार्शनिक रुचि की वस्तु नहीं रह जाती।

आधुनिक औद्योगिक सभ्यता ने प्रकृति को मुख्यतः संसाधन के रूप में देखा। जंगल लकड़ी बन गया, नदी जल-संसाधन, भूमि संपत्ति और जीव उपयोगिता की इकाइयाँ।

लेकिन पारिस्थितिकी हमें बताती है कि जीवन परस्पर निर्भर संबंधों का जाल है।

मनुष्य प्रकृति के बाहर खड़ा उसका स्वामी नहीं हो सकता क्योंकि उसका शरीर, भोजन, श्वास और जीवन उसी व्यवस्था के भीतर संभव हैं।

इसलिए ब्रह्म का आधुनिक सभ्यतागत सूत्र हो सकता है—

मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहजीवी है।

अस्मिताओं से आगे समावेशी मनुष्य

यही विचार सामाजिक संसार पर भी लागू होता है।

जाति, धर्म, भाषा, राष्ट्र, नस्ल और संस्कृति मनुष्य को पहचान देते हैं। पहचान आवश्यक भी हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब पहचान मनुष्य से बड़ी हो जाती है।

तब ‘मैं’ के सामने ‘तुम’ प्रतिद्वंद्वी बन जाता है और ‘हम’ के सामने ‘वे’।

ब्रह्म की समावेशी चेतना पहचान मिटाने का आग्रह नहीं करती। वह कहती है कि कोई भी पहचान हमारे साझा अस्तित्व से बड़ी नहीं हो सकती।

मनुष्य भारतीय, चीनी, यूरोपीय या अफ्रीकी हो सकता है; हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई या नास्तिक हो सकता है; लेकिन इन सभी पहचानों से पहले वह पृथ्वी के साझे जैविक और मानवीय अस्तित्व का सहभागी है।

यही अद्वैत का आधुनिक सभ्यतागत पाठ हो सकता है।

निष्कर्ष : ब्रह्म एक बंद परिभाषा नहीं, खुला आमंत्रण है

ब्रह्म की खोज में प्रचलित संस्कृत व्युत्पत्ति, वैदिक अर्थ, उपनिषदों का दर्शन, तुलनात्मक भाषा-विज्ञान और मेरी प्रस्तावित ‘ब्र + अहम्’ अर्थ-परिकल्पना को अनिवार्यतः एक-दूसरे का निषेध मानने की आवश्यकता नहीं है।

इनमें कुछ बातें ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के प्रमाणित क्षेत्र में आती हैं, कुछ दार्शनिक व्याख्या के और कुछ अभी अनुसंधान की परिकल्पनाएँ हैं। इन स्तरों का अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

मेरे लिए ‘पुरातात्विक भाषा-विज्ञान’ का उद्देश्य स्थापित ज्ञान को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके नीचे दबे प्रश्नों को पुनः जीवित करना है।

हो सकता है भविष्य का भाषावैज्ञानिक अनुसंधान मेरी किसी परिकल्पना की पुष्टि करे; हो सकता है उसे संशोधित या अस्वीकार करे। दोनों स्थितियाँ ज्ञान की प्रगति का हिस्सा होंगी।

क्योंकि महत्त्वपूर्ण केवल यह नहीं कि हमने क्या जान लिया है।

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि हम अभी क्या जानना चाहते हैं।

और शायद ‘ब्रह्म’ शब्द की सबसे समावेशी आधुनिक अर्थ-छाया इसी बोध में दिखाई देती है—

मैं हूँ, तुम हो, प्रकृति है, विश्व है—हम एक-दूसरे के समान नहीं हैं, फिर भी हमारा अस्तित्व परस्पर निरपेक्ष नहीं है।

भिन्नता हमारी अभिव्यक्ति है; साझापन हमारे अस्तित्व का आधार।

इसी साझे अस्तित्व की अनुभूति को यदि एक शब्द में संकेतित करना हो, तो वह शब्द है—ब्रह्म।