ब्रह्म : शब्द से विश्व-अनुभव तक — एक समावेशी अर्थ-यात्रा
‘ब्रह्म’ भारतीय चिंतन के उन विलक्षण शब्दों में है जिनका अर्थ किसी एक परिभाषा में समाप्त नहीं होता। सहस्राब्दियों की वैचारिक यात्रा में इस शब्द के साथ विस्तार, पवित्र वाणी, परम सत्य, विश्वव्यापी सत्ता, आत्मानुभूति और अद्वैत जैसे अनेक अर्थ जुड़े हैं। इसलिए इसके किसी ‘वास्तविक अर्थ’ की खोज करते समय यह मानना अधिक उचित होगा कि किसी प्राचीन शब्द का वास्तविक अर्थ केवल उसका आरंभिक अर्थ नहीं, बल्कि उसकी पूरी अर्थ-यात्रा भी हो सकती है।
प्रचलित व्युत्पत्ति और उससे आगे का प्रश्न
संस्कृत की प्रचलित व्युत्पत्ति-परंपरा ‘ब्रह्मन्’ को सामान्यतः बृह् धातु—बढ़ना, फैलना, विस्तृत होना—से जोड़ती है। इस दृष्टि से ब्रह्म वह है जो व्यापक है, विस्तृत है अथवा विस्तार की चरम अवधारणा तक पहुँचता है।
इस व्युत्पत्ति का अपना भाषावैज्ञानिक आधार है और इसे अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है।
लेकिन प्रश्न यहाँ समाप्त भी नहीं होता।
भाषाएँ अपने व्याकरण से अधिक पुरानी मानवीय स्मृतियाँ सँजो सकती हैं। जिस समय किसी भाषा का व्यवस्थित व्याकरण लिखा जाता है, उसके बहुत पहले मनुष्य बोलता, प्रवास करता, दूसरे समुदायों से मिलता और शब्दों तथा ध्वनियों का आदान-प्रदान करता रहा होता है। इसलिए किसी अत्यन्त पुराने शब्द की खोज उसके निकटवर्ती तथा दूरवर्ती भाषा-परिवारों तक भी ले जाई जा सकती है।
यहीं से उस पद्धति की शुरुआत होती है जिसे मैं ‘पुरातात्विक भाषा-विज्ञान’ कहना चाहता हूँ।
भाषा का भी पुरातत्त्व सम्भव है
पुरातत्त्ववेत्ता मिट्टी की परतें हटाकर किसी सभ्यता के पुराने रूप खोजता है। उसी प्रकार भाषा-अध्येता शब्दों की वर्तमान संरचना के भीतर उनकी पुरानी ध्वनियों और अर्थ-स्मृतियों की खोज कर सकता है।
‘ब्र’, ‘बर’, ‘भ्र’, ‘बिर’ जैसे ध्वनि-रूप इस दृष्टि से मेरे लिए विशेष रुचि के विषय हैं। संस्कृत भ्रातृ, अंग्रेजी brother और फारसी birādar जैसे शब्द हमें तुलनात्मक अध्ययन की ओर आमंत्रित करते हैं।
इस प्रकार की ध्वनि-समानता को सीधे समान व्युत्पत्ति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान में नियमित ध्वनि-परिवर्तन, प्राचीनतम उपलब्ध रूप, अर्थ-विकास और भाषा-परिवारों के ऐतिहासिक संबंधों की पुष्टि आवश्यक है।
फिर भी समानताओं पर प्रश्न उठाना महत्त्वपूर्ण है। वैज्ञानिक सतर्कता का अर्थ जिज्ञासा का निषेध नहीं, बल्कि जिज्ञासा को प्रमाण की अनुशासित खोज में बदलना है।
‘ब्र + अहम्’ : एक वैकल्पिक अर्थ-पुरातात्विक संभावना
इसी खोज के भीतर ‘ब्रह्म’ को ‘ब्र + अहम्’ की दिशा से पढ़ने की मेरी परिकल्पना सामने आती है।
इसे संस्कृत की स्थापित ऐतिहासिक व्युत्पत्ति के विकल्प के रूप में तत्काल घोषित करने के बजाय एक अर्थ-पुरातात्विक प्रस्ताव की तरह देखना अधिक उपयोगी है।
यहाँ ‘अहम्’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
‘अहम्’ मनुष्य की सबसे प्राथमिक अनुभूतियों में से एक है—मैं हूँ।
मनुष्य संसार के बारे में कुछ जानने से पहले अपने होने को जीता है। शिशु के पास संसार का व्यवस्थित ज्ञान नहीं होता, लेकिन उसका अस्तित्व और उसकी संवेदना होती है। इस अर्थ में अस्तित्व-बोध ज्ञान से भी प्राथमिक है।
यदि ‘अहम्’ को इसी अस्तित्व-बोध की दिशा में समझें, तो ब्रह्म का दार्शनिक अर्थ एक विलक्षण संभावना खोलता है—व्यक्तिगत ‘मैं’ का उस व्यापक अस्तित्व से संबंध जिसमें संसार की समस्त सत्ताएँ उपस्थित हैं।
अहंकार और ‘अहम्’ में अंतर
यहाँ ‘अहम्’ को अहंकार समझना भूल होगी।
अहंकार कहता है—
मैं दूसरों से अलग और श्रेष्ठ हूँ।
अद्वैतपरक अस्तित्व-बोध कहता है—
मैं अलग दिखाई देते हुए भी उसी अस्तित्व का सहभागी हूँ जिसका सहभागी दूसरा मनुष्य, जीव और प्रकृति है।
इसलिए ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का अर्थ यदि केवल ‘मैं ईश्वर हूँ’ कर दिया जाए तो उसका अर्थ विकृत हो सकता है। उसका अधिक समावेशी पाठ होगा—मेरे भीतर अनुभव होने वाला अस्तित्व उस व्यापक अस्तित्व से निरपेक्ष नहीं है जिसमें समस्त जगत उपस्थित है।
यह व्यक्तिगत अहम् का महिमामंडन नहीं, उसकी सीमा का अतिक्रमण है।
ब्रह्म : एकता नहीं, समावेशी एकत्व
अद्वैत का अर्थ यह नहीं कि संसार की विविधता मिथ्या घोषित करके मनुष्य, पशु, वृक्ष, नदी, पर्वत और पदार्थ के भेदों को अस्वीकार कर दिया जाए।
भिन्नता वास्तविक अनुभव है।
लेकिन भिन्नता का अर्थ असंबद्धता नहीं है।
यही अंतर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
एक वन में हजारों वृक्ष अलग-अलग होते हैं, लेकिन मिट्टी, जल, वायु, सूक्ष्मजीव और पारिस्थितिक संबंध उन्हें एक जीवन-तंत्र में जोड़ते हैं। मानव शरीर में अरबों कोशिकाएँ अपनी अलग संरचना और कार्य रखते हुए भी एक शरीर की सहभागी हैं।
इसी प्रकार संसार को विविधताओं के बीच उपस्थित संबंधों की समग्रता के रूप में देखना ब्रह्म की आधुनिक समावेशी व्याख्या हो सकती है।
अद्वैत का अर्थ विविधता का अंत नहीं; विविधता के भीतर संबंध की पहचान है।
ब्रह्म और ईश्वर : विरोध नहीं, अलग अर्थ-स्तर
ब्रह्म की अवधारणा को समझने के लिए ईश्वर की सभी धार्मिक अवधारणाओं को उसका विरोधी मानना भी आवश्यक नहीं है।
विभिन्न धार्मिक परंपराओं ने परम सत्ता को अलग-अलग रूपों में अनुभव और अभिव्यक्त किया है। कहीं वह सृष्टिकर्ता है, कहीं पालनकर्ता, कहीं न्यायकारी सत्ता, कहीं प्रेम, कहीं प्रकाश और कहीं निराकार परम सत्य।
समावेशी दृष्टि यह पूछ सकती है कि इन विभिन्न प्रतीकों और अवधारणाओं के पीछे मनुष्य की कौन-सी मूल अस्तित्वगत आकांक्षा सक्रिय रही है।
ब्रह्म का अद्वैतपरक अर्थ इस संवाद में एक विशिष्ट प्रस्ताव रखता है—परम वास्तविकता को केवल संसार से बाहर मत खोजो; अस्तित्व के भीतर भी उसकी उपस्थिति अनुभव करो।
इस प्रकार ब्रह्म ईश्वर-विरोधी अवधारणा बनने के बजाय ईश्वर की अवधारणा को अधिक व्यापक अस्तित्व-दृष्टि की ओर ले जा सकता है।
भाषा वास्तविकता नहीं है
यहाँ भाषा की समस्या सामने आती है।
मनुष्य संसार को शब्दों के माध्यम से पहचानता है। शब्द हमें संवाद और ज्ञान देते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वही शब्द वास्तविकता के स्थानापन्न भी बनने लगते हैं।
हम ‘वृक्ष’ कहते हैं और मान लेते हैं कि वृक्ष को जान लिया।
हम ‘मनुष्य’ कहते हैं और करोड़ों अलग-अलग जीवन-अनुभवों को एक शब्द में समेट देते हैं।
हम ‘ईश्वर’, ‘आत्मा’, ‘प्रकृति’ और ‘ब्रह्म’ कहते हैं और कभी-कभी भूल जाते हैं कि शब्द अनुभव नहीं है—वह अनुभव की ओर संकेत मात्र है।
यहीं उपनिषदों का ‘नेति-नेति’ आधुनिक अर्थ ग्रहण करता है। इसे इस चेतावनी की तरह भी पढ़ा जा सकता है कि अंतिम वास्तविकता हमारी किसी एक अवधारणा, नाम या परिभाषा में पूरी तरह कैद नहीं हो सकती।
ज्ञान से सतर्क रहने की आवश्यकता
मनुष्य को ज्ञान चाहिए; ज्ञान के बिना सभ्यता संभव नहीं थी। लेकिन ज्ञान स्वयं अंतिम सत्य नहीं है। वह मनुष्य द्वारा निर्मित, संशोधित और पुनरीक्षित होता रहता है।
इसीलिए ज्ञान का सम्मान करते हुए भी ज्ञान से सतर्क रहना आवश्यक है।
जानना एक जीवित प्रक्रिया है; ज्ञान उस प्रक्रिया का पहले से अर्जित परिणाम।
जब ज्ञान स्वयं को अंतिम मान लेता है, तो जिज्ञासा समाप्त होने लगती है। संसार परिचित वस्तुओं का संग्रह बन जाता है और विस्मय मरने लगता है।
ब्रह्म की खोज इसीलिए ‘जान लेने’ की परियोजना नहीं हो सकती। वह जानने की प्रक्रिया को खुला रखने वाली चेतना भी है।
ब्रह्म और आधुनिक पारिस्थितिकी
आज मनुष्य ऐसे सभ्यतागत संकट में है जहाँ ब्रह्म की यह व्याख्या केवल दार्शनिक रुचि की वस्तु नहीं रह जाती।
आधुनिक औद्योगिक सभ्यता ने प्रकृति को मुख्यतः संसाधन के रूप में देखा। जंगल लकड़ी बन गया, नदी जल-संसाधन, भूमि संपत्ति और जीव उपयोगिता की इकाइयाँ।
लेकिन पारिस्थितिकी हमें बताती है कि जीवन परस्पर निर्भर संबंधों का जाल है।
मनुष्य प्रकृति के बाहर खड़ा उसका स्वामी नहीं हो सकता क्योंकि उसका शरीर, भोजन, श्वास और जीवन उसी व्यवस्था के भीतर संभव हैं।
इसलिए ब्रह्म का आधुनिक सभ्यतागत सूत्र हो सकता है—
मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहजीवी है।
अस्मिताओं से आगे समावेशी मनुष्य
यही विचार सामाजिक संसार पर भी लागू होता है।
जाति, धर्म, भाषा, राष्ट्र, नस्ल और संस्कृति मनुष्य को पहचान देते हैं। पहचान आवश्यक भी हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब पहचान मनुष्य से बड़ी हो जाती है।
तब ‘मैं’ के सामने ‘तुम’ प्रतिद्वंद्वी बन जाता है और ‘हम’ के सामने ‘वे’।
ब्रह्म की समावेशी चेतना पहचान मिटाने का आग्रह नहीं करती। वह कहती है कि कोई भी पहचान हमारे साझा अस्तित्व से बड़ी नहीं हो सकती।
मनुष्य भारतीय, चीनी, यूरोपीय या अफ्रीकी हो सकता है; हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई या नास्तिक हो सकता है; लेकिन इन सभी पहचानों से पहले वह पृथ्वी के साझे जैविक और मानवीय अस्तित्व का सहभागी है।
यही अद्वैत का आधुनिक सभ्यतागत पाठ हो सकता है।
निष्कर्ष : ब्रह्म एक बंद परिभाषा नहीं, खुला आमंत्रण है
ब्रह्म की खोज में प्रचलित संस्कृत व्युत्पत्ति, वैदिक अर्थ, उपनिषदों का दर्शन, तुलनात्मक भाषा-विज्ञान और मेरी प्रस्तावित ‘ब्र + अहम्’ अर्थ-परिकल्पना को अनिवार्यतः एक-दूसरे का निषेध मानने की आवश्यकता नहीं है।
इनमें कुछ बातें ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के प्रमाणित क्षेत्र में आती हैं, कुछ दार्शनिक व्याख्या के और कुछ अभी अनुसंधान की परिकल्पनाएँ हैं। इन स्तरों का अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
मेरे लिए ‘पुरातात्विक भाषा-विज्ञान’ का उद्देश्य स्थापित ज्ञान को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके नीचे दबे प्रश्नों को पुनः जीवित करना है।
हो सकता है भविष्य का भाषावैज्ञानिक अनुसंधान मेरी किसी परिकल्पना की पुष्टि करे; हो सकता है उसे संशोधित या अस्वीकार करे। दोनों स्थितियाँ ज्ञान की प्रगति का हिस्सा होंगी।
क्योंकि महत्त्वपूर्ण केवल यह नहीं कि हमने क्या जान लिया है।
महत्त्वपूर्ण यह भी है कि हम अभी क्या जानना चाहते हैं।
और शायद ‘ब्रह्म’ शब्द की सबसे समावेशी आधुनिक अर्थ-छाया इसी बोध में दिखाई देती है—
मैं हूँ, तुम हो, प्रकृति है, विश्व है—हम एक-दूसरे के समान नहीं हैं, फिर भी हमारा अस्तित्व परस्पर निरपेक्ष नहीं है।
भिन्नता हमारी अभिव्यक्ति है; साझापन हमारे अस्तित्व का आधार।
इसी साझे अस्तित्व की अनुभूति को यदि एक शब्द में संकेतित करना हो, तो वह शब्द है—ब्रह्म।