रविवार, 16 अगस्त 2026

ब्रह्म : शब्द, अनुभव और अर्थ की पुरातात्विक खोज

 

ब्रह्म : शब्द, अनुभव और अर्थ की पुरातात्विक खोज

भारतीय दर्शन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और साथ ही सर्वाधिक अमूर्त शब्दों में ‘ब्रह्म’ प्रमुख है। सामान्यतः इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘बृह्’ धातु से की जाती है, जिसका अर्थ बढ़ना, फैलना, विस्तृत होना या महान होना बताया जाता है। इस व्युत्पत्ति के आधार पर ब्रह्म को वह परम सत्ता माना गया जो अनन्त, सर्वव्यापी और समस्त अस्तित्व को अपने भीतर समेटने वाली है।

किन्तु किसी अत्यन्त प्राचीन शब्द का इतिहास केवल उस भाषा की उपलब्ध व्याकरणिक व्यवस्था से ही निश्चित कर देना पर्याप्त नहीं है जिसमें उसका परवर्ती दार्शनिक रूप सुरक्षित मिला है। शब्द व्याकरण से भी पुराने हो सकते हैं। वे मनुष्य के प्रवास, समुदायों के सम्पर्क, ध्वनि-परिवर्तन और हजारों वर्षों के सांस्कृतिक अनुभवों से गुजरते हुए अपना रूप और अर्थ बदलते रहते हैं। इसलिए ‘ब्रह्म’ को समझने के लिए केवल संस्कृत के भीतर नहीं, बल्कि तुलनात्मक और जिसे मैं ‘पुरातात्विक भाषा-विज्ञान’ कहना चाहता हूँ, उस दृष्टि से भी उसकी खोज आवश्यक है।

‘ब्र’ : क्या यह किसी प्राचीन अर्थ-बीज का अवशेष है?

मेरी जिज्ञासा विशेष रूप से ‘ब्र/बर’ ध्वनि-समूह को लेकर है। विभिन्न भाषाओं के प्राचीन शब्दों में इसके निकट ध्वनि-रूप दिखाई देते हैं। Brother, birādar तथा संस्कृत भ्रातृ जैसे संबंध-सूचक शब्दों की ध्वन्यात्मक समानताएँ कम-से-कम यह प्रश्न उठाने का अवसर देती हैं कि क्या इन शब्दों के पीछे किसी अत्यन्त प्राचीन भाषिक संसार के ध्वनि-अवशेष मौजूद हैं।

इसी प्रकार प्रकाश, अग्नि, चमक, विस्तार, महानता अथवा संबंध से जुड़े विभिन्न शब्द-समूहों में ‘ब्र’, ‘बर’, ‘भ्र’ जैसे रूपों की उपस्थिति मेरे लिए अनुसंधान का विषय है। इन समानताओं को बिना ऐतिहासिक ध्वनि-नियमों और पर्याप्त प्रमाणों के सीधे समान मूल से उत्पन्न घोषित करना उचित नहीं होगा; लेकिन इन्हें संयोग कहकर छोड़ देना भी शब्दों के प्रागैतिहासिक जीवन की सम्भावनाओं को बंद कर देना होगा।

यहीं पुरातात्विक भाषा-विज्ञान की आवश्यकता सामने आती है। पुरातत्त्व जैसे मिट्टी की परतों से सभ्यता के पुराने रूप खोजता है, वैसे ही भाषा की वर्तमान संरचनाओं और शब्दों की ध्वनि-परतों के भीतर मानव-अनुभव के पुराने संकेत खोजे जा सकते हैं।

‘ब्रह्म’ : ‘ब्र’ और ‘अहम्’ की सम्भावित अर्थ-संरचना

मेरी वैकल्पिक अर्थ-परिकल्पना में ‘ब्रह्म’ को केवल ‘बृह्’ अर्थात् विस्तार से समझने के बजाय ‘ब्र + अहम्’ की अर्थ-दिशा में भी पढ़ा जा सकता है। यहाँ ‘अहम्’ का अर्थ है—‘मैं’, अर्थात् अपने अस्तित्व की प्रत्यक्ष अनुभूति।

इस दृष्टि से ब्रह्म किसी मनुष्याकार बाहरी ईश्वर का नाम नहीं रह जाता। वह अस्तित्व के भीतर उपस्थित उस व्यापक ‘मैं हूँ’ की अनुभूति की ओर संकेत करने लगता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को संसार से पूर्णतः पृथक सत्ता के रूप में अनुभव नहीं करता।

यहाँ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंतर है। सामान्य अहंकार कहता है—

‘मैं दूसरों से अलग और श्रेष्ठ हूँ।’

ब्रह्मानुभूति का ‘अहम्’ कहता है—

‘जिस अस्तित्व में मैं हूँ, उसी अस्तित्व में यह समस्त जगत भी है।’

इसलिए ‘अहं ब्रह्मास्मि’ को यदि केवल ‘मैं ईश्वर हूँ’ के अर्थ में पढ़ा जाए तो उसका अर्थ अहंकारवादी भी बनाया जा सकता है। किंतु अद्वैत के धरातल पर इसका आशय ठीक उलटा है। यहाँ सीमित व्यक्तिगत ‘मैं’ का विस्तार उस साझा अस्तित्व-बोध में होता है जहाँ अपने और पराये की कठोर सीमा कमजोर पड़ने लगती है।

ब्रह्म : वस्तु नहीं, अस्तित्व की अनुभूति

ब्रह्म की समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य उसे किसी वस्तु की तरह जानना चाहता है। मनुष्य का मस्तिष्क संसार को पहचानने के लिए नाम देता है, वर्ग बनाता है और अनुभव को अवधारणाओं में बदलता है। यह प्रक्रिया व्यवहार के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी एक सीमा भी है।

जिस क्षण हम किसी अनुभव को नाम दे देते हैं, वह हमारे लिए पहले से जानी हुई वस्तु बनने लगता है। फूल अब विस्मयकारी अस्तित्व नहीं रहता—वह ‘फूल’ हो जाता है; आकाश ‘आकाश’ और नदी ‘नदी’। शब्द उपयोगी हैं, लेकिन वे वास्तविकता के स्थान पर वास्तविकता का मानसिक प्रतिनिधित्व उपस्थित करते हैं।

इस अर्थ में ज्ञान कभी-कभी विस्मय का अंत भी बन सकता है। जानी-पहचानी दुनिया धीरे-धीरे ‘जान ली गई दुनिया’ में बदल जाती है।

ब्रह्म की अवधारणा इस संज्ञानात्मक सीमा को पहचानती हुई दिखाई देती है। इसीलिए उपनिषद का ‘नेति-नेति’ महत्त्वपूर्ण है—यह नहीं, वह नहीं। इसका आशय वास्तविकता का निषेध नहीं बल्कि यह चेतावनी भी माना जा सकता है कि वास्तविकता को हमारी कोई एक भाषिक परिभाषा समाप्त नहीं कर सकती।

ब्रह्म को जानने का अर्थ तब किसी अंतिम परिभाषा को याद कर लेना नहीं, बल्कि अस्तित्व के प्रति अपनी संवेदना को खुला रखना है।

ज्ञान से पहले का संसार

एक बच्चा जिस संसार को पहली बार देखता है, वह उसके लिए आश्चर्य से भरा होता है। उसका आकाश अभी केवल खगोल-विज्ञान की परिभाषा नहीं है; उसका वृक्ष वनस्पति-विज्ञान की वर्गीकृत इकाई नहीं है। ज्ञान बढ़ने के साथ संसार अधिक उपयोगी और समझने योग्य अवश्य होता है, लेकिन उसका अनुभव कभी-कभी कम रोमांचकारी हो जाता है।

सभ्यता की विडम्बना यह है कि उसने मनुष्य को संसार के विषय में अत्यधिक ज्ञान दिया, लेकिन उसी अनुपात में संसार के साथ उसके प्रत्यक्ष संबंध को कमजोर भी किया।

हम वृक्ष को लकड़ी, जंगल को संसाधन, नदी को जल-संसाधन, पशु को उत्पादन और पृथ्वी को कच्चे माल के भंडार के रूप में देखने लगते हैं। ज्ञान यहाँ सत्ता और उपयोग की भाषा बन जाता है।

ब्रह्म की अनुभूति इस दृष्टि को उलटती है। वह मनुष्य से कहती है—जिस प्रकृति का तुम उपयोग कर रहे हो, तुम स्वयं भी उसी अस्तित्व-व्यवस्था का अंश हो।

मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहजीवी है।

ब्रह्म और अद्वैत का सभ्यतागत अर्थ

यहीं ब्रह्म की अवधारणा दर्शन से आगे बढ़कर सभ्यता-विमर्श का विषय बन जाती है।

यदि मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानेगा तो प्रकृति उसके लिए बाहरी वस्तु होगी। यदि एक समुदाय स्वयं को दूसरे समुदाय से मूलतः पृथक और श्रेष्ठ मानेगा तो दूसरा मनुष्य उसके लिए प्रतिद्वंद्वी होगा। इसी तरह धर्म, जाति, नस्ल, राष्ट्र और भाषा की अस्मिताएँ जब अस्तित्व से बड़ी हो जाती हैं तो मनुष्य निर्मित विभाजन वास्तविकता से अधिक शक्तिशाली दिखाई देने लगते हैं।

अद्वैत इन विभाजनों को व्यवहारिक स्तर पर मिटाने की घोषणा नहीं करता; मनुष्य और वृक्ष एक ही वस्तु नहीं हैं, दो मनुष्य भी एक ही व्यक्ति नहीं हैं। किंतु दोनों का अस्तित्व परस्पर सम्बद्ध है।

इसलिए अद्वैत का आधुनिक अर्थ एकरूपता नहीं, सह-अस्तित्व की एकता होना चाहिए।

यही ब्रह्म की अवधारणा का पर्यावरणीय और वैश्विक महत्त्व भी है। पृथ्वी पर जीवन अलग-अलग स्वतंत्र द्वीपों का संग्रह नहीं है। वायु, जल, वनस्पति, जीव-जंतु और मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर जीवन-तंत्र के अंग हैं। आधुनिक पारिस्थितिकी जिस पारस्परिक निर्भरता को वैज्ञानिक भाषा में समझाती है, ब्रह्म की अनुभूति उसे सांस्कृतिक मूल्य और अस्तित्व-बोध में बदल सकती है।

ईश्वर से अलग ब्रह्म को समझने की आवश्यकता

‘ब्रह्म’ को ‘ईश्वर’ का पर्याय मान लेना भी उसके अर्थ को सीमित कर सकता है। ईश्वर की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच दूरी होती है—एक बनाने वाला है और दूसरी बनाई हुई दुनिया।

लेकिन ब्रह्म को यदि अस्तित्व की अखंडता के रूप में समझा जाए तो प्रकृति किसी बाहरी निर्माता द्वारा बनाई गई परायी वस्तु नहीं रहती। जीव, पदार्थ, चेतना और विश्व उसी साझा अस्तित्व के विभिन्न रूप हैं।

इसी कारण भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘तत्त्वमसि’, ‘सोऽहम्’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ जैसे कथन सम्भव हुए। इनमें मनुष्य को किसी बाहरी परम सत्ता के सामने केवल अधीन प्राणी के रूप में नहीं, बल्कि उसी व्यापक अस्तित्व की अभिव्यक्ति के रूप में देखने की संभावना उपस्थित होती है।

शब्द से पुनः अनुभव की ओर

यहाँ एक रोचक विरोधाभास है—जिस ‘ब्रह्म’ को शब्दों से परे समझना है, उसके विषय में हम शब्दों से ही विचार कर रहे हैं।

लेकिन भाषा की सार्थकता इसी में है कि वह अंततः अपनी सीमा भी बताए।

मानचित्र यात्रा में सहायक है, लेकिन मानचित्र स्वयं भूभाग नहीं होता। उसी प्रकार ‘ब्रह्म’ शब्द भी ब्रह्म नहीं है। वह केवल उस दिशा की ओर संकेत करने वाला भाषिक चिह्न है जहाँ व्यक्ति अपने पृथक अस्तित्व के भ्रम से बाहर निकलकर जीवन और जगत की साझी उपस्थिति का अनुभव कर सके।

इसलिए ब्रह्म की खोज अंततः किसी शब्दकोश में समाप्त नहीं होती।

शब्दकोश हमें बताएगा कि ‘ब्रह्म’ शब्द का प्रामाणिक भाषिक इतिहास क्या है; तुलनात्मक भाषा-विज्ञान बताएगा कि उसकी ध्वनियाँ किन पुराने शब्द-परिवारों से जुड़ सकती हैं; पुरातात्विक भाषा-विज्ञान यह प्रश्न उठा सकता है कि इन ध्वनियों के पीछे कौन-से आदिम अनुभव छिपे हैं; लेकिन ब्रह्म का दार्शनिक अर्थ तब पूर्ण होगा जब मनुष्य उस साझा अस्तित्व को अपने जीवन-मूल्य में अनुभव करे।

निष्कर्ष

‘ब्रह्म’ की मेरी खोज इसलिए केवल किसी प्राचीन संस्कृत शब्द की नई व्युत्पत्ति खोजने का प्रयास नहीं है। यह उस मानवीय अनुभव की खोज है जिसने संभवतः इस शब्द को अर्थवान बनाया।

‘ब्र + अहम्’ को मैं अभी अंतिम ऐतिहासिक व्युत्पत्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक अर्थ-पुरातात्विक परिकल्पना के रूप में देखता हूँ। इसकी भाषावैज्ञानिक पुष्टि के लिए संस्कृत, प्राकृत, ईरानी, सेमिटिक तथा यूरोपीय भाषा-परिवारों के संबंधित शब्दों और उनके प्राचीनतम रूपों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होगा।

लेकिन इसका दार्शनिक संकेत अत्यन्त मूल्यवान है।

यदि ‘अहम्’ केवल मेरा व्यक्तिगत अहम् न रहकर व्यापक अस्तित्व में अपनी सहभागिता की अनुभूति बन जाए, तो ब्रह्म कोई दूरस्थ अलौकिक सत्ता नहीं रह जाता। वह मनुष्य, प्रकृति और समस्त जीवन के बीच उपस्थित साझे अस्तित्व का बोध बन जाता है।

तब ब्रह्म को जानना संसार से बाहर किसी ईश्वर को खोजना नहीं है।

वह संसार के भीतर अपने होने को और अपने भीतर संसार की उपस्थिति को अनुभव करना है।

और संभवतः ब्रह्म की सबसे आधुनिक सभ्यतागत व्याख्या यही हो सकती है—

अस्तित्व किसी एक का नहीं है; अस्तित्व साझी उपस्थिति है।