शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

पहल की पुनर्नवा पहल एवं नई व्यवस्था का विमर्श


पहल की पुनर्नवा पहल एवं नई व्यवस्था का विमर्श

                                                                                 रामप्रकाश कुशवाहा


पहल का पुनर्नवा अंक मेरे हाथों में है -अंक ९१ .अद्यतन पीढ़ी की  सृजनशीलता और सृजन की अद्यतन्शीलता को समर्पित. अपने नाम के ही अनुरूप पहल लम्बे अरसे से नए साहित्यकारों के लिए लाँचपैड रही है .उसके पिछले अंकों में भी हिन्दी-क्षेत्र की एक व्यापक मानव-जाति के आर्थिक व्यव्हार को समझने और समझाने की दृष्टि से मार्क्स का विश्लेषण आधुनिक वैचारिकी को आधारिक सूत्र और दृष्टिया उपलब्ध करता है .क्योंकि संवेदनात्मक द्रष्टि से मार्क्सवाद के उद्देश्य की नैतिक पवित्रता असंदिग्ध है ;इस लिए उसके दार्शनिक पक्षों को भी निर्विवाद और अपरिवर्तनीय मन लिया जाता है .उसमे कुछ भी निरर्थक और अनावश्यक खोजना
वर्ग-शत्रु का हमला भी हो सकता है .क्योंकि भारत में वह पश्चिम की पवित्र धरोहर है ,इसलिए भारतियों को यह अधिक स्वीकार्य होगा कि स्वयं पश्चिम ही उसमे परिवर्तन संशोधन करे .वैसे भी भारतीय मेधा संरक्षण वादी है .वह नई पहल में कम ही विश्वास करती है . मार्क्सवाद की दार्शनिकी में भी बहुत से परम्परा से अर्जित तत्व हैं -उनमें से एक हीगल से लिया गया द्वंद्ववाद भी है .यह विकास की सामाजिक प्रक्रियाओं का विचलित प्रत्ययीकरण करता है .रुढ़िवादी और विकासवादी शक्तियों के द्वंद्व को मानवीय और समाजशास्त्रीय रूप में भी समझने और समझाने की जरुरत है .वर्ग -स्वार्थ के मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण मार्क्स का मानव-जाति के इतिहास में आर्थिक प्रवृत्तियों और व्यव्हार का सूत्रीकरण प्रायः ठीक और प्रामाणिक है .लेकिन मेरा मानना है कि मनुष्य की ज्ञानात्मक प्रगतिशीलता से अधिक उसकी विकास विरोधी जड़ताओं और आदिमताओं को भी समझाने की जरुरत है .ऐसे में तो और भी जब जीनेटिक आधार वाली जड़ताएँ होने की वैज्ञानिक संभावनाएं बढ़ गई हैं .इसके बावजूद मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण सन्देश मानवीय व्यवस्था को यथास्थितिवादी स्वीकार की सामूहिक मानसिकता से बाहर निकालकर उसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की सृजनशीलता के दायरे में लाना है .प्राचीन धार्मिकों की तरह हमें ईश्वर और स्वर्ग का सृजन करने के स्थान पर वर्तमान मानवीय व्यवस्था को और मानवीय और निर्दोष बनाने पर विचार करना चाहिए .और इसके लिए मार्क्सवाद से भी अधिक महत्वपूर्ण है मार्क्स के बाद के मानवीय विकास की जटिलताओं को समझना .वर्तमान विश्व राजनीतिक नेतृत्व से आर्थिक नेतृत्व की ओर स्थानांतरित हो गया है .राजनीतिक संस्थाओं की तुलना में आर्थिक संस्थाएं मानव -सभ्यता की संरचनाओं को अधिक तीव्रता से प्रभावित कर रही हैं .विश्व प्रायः आर्थिक सक्रियताओं द्वारा अधिक रूपान्तरित हो रहा है .दूसरे शब्दों में विश्व राष्ट्रों से अधिक कंपनियों के उत्पादों से अधिक रूपान्तरित हो रहा है .क्योंकि यांत्रिक उत्पाद श्रम की प्रकृति को ही बदल दे रहे है 'इसलिए वर्ग-संरचना और उसकी मात्रात्मक उपस्थिति का स्वरूप भी बदला है .आज स्थानीय आर्थिक शोषण से अधिक प्रभावी अन्तर-राष्ट्रीय शोषण हो गया है .विषमता व्यक्ति और वर्ग स्तरीय ही नहीं बल्कि राष्ट्र स्तरीय और कंपनी स्तरीय भी है .बहुराष्ट्रीय होने के साथ-साथ कंपनियों का संगठनात्मक और जनसंख्यात्मक ढांचा विस्तृत हुआ और बढ़ा है .इस विषमता को भी मार्क्सवादी चिंतन के दायरे में लाना होगा .क्योंकि मार्क्सवाद साम्यवाद का पर्याय बन चूका है गोपाल प्रधान का लेख "इक्कीसवी सदी में मार्क्सवाद "सात उपशीर्षकों के अंतर्गत  मार्क्सवादी विचारधारा की अद्यतन प्रासंगिकता का विवरण ,स्वयं उनके ही शब्दों में कहें तो सोवियत संघ के विघटन से लेकर वर्तमान समय तक मार्क्सवाद के उत्थान-पतन का ब्यौरा दर्ज है .पहला उपशीर्षक लिओनार्ड वुल्फ की किताब "हावी रीड मार्क्स टुडे" के विचारों का पता देती है .
             इसी अंक में प्रकाशित शिवप्रसाद जोशी और सचिन गौड़ के बीच ई-मेल से हुए  अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन पर केन्द्रित संवाद -"सुविधा-दुविधा के आन्दोलन और मध्य-वर्ग " में मध्य-वर्ग के प्रति परम्परित मार्क्सवादी विचारधारा का दृष्टिकोण निवेश नकारात्मक ही है .पूंजीवादी व्यवस्था -प्रारूप के संरक्षण और परिष्कार की जिम्मेदारी प्रायः मध्यवर्ग पर ही है .सर्वहारा आधारित क्रान्ति की अवधारणा के कारण वामपन्थी क्रान्ति की दृष्टि से मध्यवर्ग की उपयोगिता एवं भूमिका नगण्य ही है .ज्ञानार्जन और बुद्धि -व्यवसाय में सबसे अधिक समय और जीवन का निवेश मध्य-वर्ग ही करता है .बौद्धिक विकास में लगे रहने के कारण वह बहुत ही कम अन्तराल के बाध्यकारी नेतृत्व का शिकार होता है .दूसरे शब्दों में कहें तो वह बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण नहीं बल्कि आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक कारणों से इतिहास में बाध्यकारी नेतृत्व को     स्वीकार करता है .सर्वाधिक प्रतिरोध और सजगता के कारण उसकी भूमिका को लेकर सबसे अधिक भर्तस्ना-पत्र लिखे गए हैं .उसके आत्म-विश्वास को तोड़ने एवं उसे विचलित करनें की कोशिशें हुई हैं .इसमें संदेह नहीं कि औसत,सन्दिग्ध एवं अस्पष्ट समझ की वह अनदेखी करता है .
                     मध्य -वर्ग की अवधारणा  का विकास पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों के विचारकों द्वारा प्रति-क्रान्ति एवं क्रांतिविरोध और अवरोध को समझाने के लिए किया गया था .मध्य-वर्ग के वर्ग-चरित्र और उसके रुझानों ,प्रवृत्तियों तथा मनोविज्ञान को समझाने की दिशा में मार्क्सवादी खेमा भी रूढ़ मुहावरों ,सरलीकरण और विचारधारात्मक सम्भाव्यवाद से आगे नहीं जा पाया है .स्वयं मार्क्सवादी विचारधारा ,सर्वहारा और पूंजीपति वर्ग ,उच्च और निम्न वर्ग की परिभाषिकी में ही विस्तार से सोचती है .सर्वहारा क्रान्ति की अवधारणा के कारण उसकी थीसिस और एजेंडे में मध्य-वर्ग की अधिक सक्रिय भूमिका नहीं थी .मार्क्स के लिए मध्यवर्ग क्रन्तिकारी असंतोष की दृष्टि से शून्य और अनुपयोगी था .वह बहुत कुछ दर्शक और तटस्थ जनसँख्या का हिस्सा था ,जो संगठित क्रन्तिकारी शक्तियों का न तो समर्थन कर सकता था और न ही सक्रिय विरोध .
               मध्यवर्ग को प्रायः उपभोक्ता वर्ग या समुदाय में देखने का नजरिया भी ठीक नहीं है .क्योंकि वह बौद्धिक विकास और सृजनशीलता के प्रति समर्पित केन्द्रीय समुदाय है .चेतन एवं प्रशिक्षित होने से उसमे सजग प्रतिरोध की क्षमता है .नेतृत्वकारी शक्तियों द्वारा उनका सहज अनुकूलन संभव नहीं है .इसी प्रतिरोध के कारण ही वे नेतृत्व के अभिलाषी महत्वकांक्षी बुद्धिजीवियों के सहज अनुगामी नहीं बन सकते .अरुंधती राय की मध्य वर्ग पर समस्त थीसिस उनकी इसी कुंठा और क्षोभ पर आधारित है .
             मध्य वर्ग की अब तक की भूमिका को देखते हुए जनवादी क्रान्ति के बाद भी नईक्रन्तिकारी व्यवस्था के संरक्षण में मध्यवर्ग  की भूमिका के महत्वपूर्ण होने की संभावना देखी जा सकती है .उसका सृजनात्मक असंतोष व्यवस्था के परिष्करण ,परिवर्धन और गतिशीलता को बनाए रख सकता है .
                  दोनों ही विमर्शकारों नें अन्ना हजारे के गाँधीवादी शैली के आंदोलनात्मक नेतृत्व या फिर कांग्रेसी राष्ट्रवादी आन्दोलनों के जनपक्ष के रूप में देखने की कोशिश नहीं की है . यहाँ  वाम पंथी  लाइन की प्रतिबद्धता से उपजी   दूसरे शब्दों में कहें तो उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था से निष्क्रमण और विद्रोह का कोई ठोस मनोवैज्ञानिक आर्थिक आधार नहीं बनता .इसलिए भी कि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रिया में आनी थी .लेनिन ने अवश्य ही सर्वहारा  सर्वहारा वर्ग के पक्ष में उसके नैतिक समर्थन और वर्गांतरण की परिकल्पना दी .
                    समाजशास्त्रीय और आर्थिक विकास की दृष्टि से देखें तो मध्यवर्ग एक यात्रा-शील स्थिति है .पूंजीवादी व्यवस्था में वैयक्तिक आर्थिक मुक्ति निम्न-वर्ग से निकलकर उच्च -वर्ग में शामिल हो जाने से ही सम्भव है .पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक निम्न वर्ग में जन्मे व्यक्ति के लिए निम्न वर्ग से बाहर निकल कर उच्च वर्ग में शामिल हो जाना ही चरम पुरुषार्थ है .उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा के साथ मध्य वर्ग का हर व्यक्ति वयक्तिक आर्थिक मुक्ति के एक सपने को जी रहा होता है .यह सपना पूंजीवादी व्यवस्था की सुरक्षा सम्बन्धी संरचनात्मक आश्वासनहीनता से पैदा होता है .पूंजीवादी व्यवस्था हर व्यक्ति को आर्थिक असुरक्षा की परिस्थितियों में डाल देती है .इस मनोविज्ञान के कारण एक अन्तहीनहोड़ का जन्म होता है .अस्तित्व की एक निर्मम प्रतिस्पर्धा पूंजीवाद को अमानवीय बनाती है .इसके विकल्प  में साम्यवाद
पूंजी के सामूहिक और साझे निर्माण और उपभोग की परिकल्पना देता है .देखा जय तो सामूहिक सृजनशीलता के आवाहन के कारण साम्यवाद को सामूहिक पूंजीवाद और पूंजीवाद को वैयक्तिक पूंजीवाद कहा जाना चाहिए .इस प्रकार साम्यवाद पूंजीवादी व्यवस्था का स्वर्ग है तो वैयक्तिक पूंजीवाद नरक .फिर प्रश्न उठता है कि भारतीय मध्यवर्ग अपने अधिकांश में साम्यवादी हिंसक क्रान्ति को अराजकता पूर्ण भयावह दुष्कल्पना के रूप में क्यों देखता है ? इसका कारण यही है  कि
         मार्क्स द्वारा प्रतिपादित साम्यवादी क्रान्ति की परिकल्पना में यहूदी धर्म की सांस्कृतिक असहिष्णुता और उनकी धार्मिक कथाओं में मिलने वाली बर्बर शुद्धता और उच्छेदवादी नरसंहारों का सांस्कृतिक अचेतन छिपा हुआ है .ऐसे में क्रांतिकारी बनना नायकत्व की मध्ययुगीन मानसिकता और परिकल्पना की भी विरासत है .अन्यथा जब सामूहिक पूंजीवादी सृजनशीलता तक ही जन-मानस को ले जाने की बात है तो ऐसे साम्यवाद को अहिंसक साम्यवाद के रूप में भी सामूहिक आर्थिक ,सामाजिक,राजनीतिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा के रूप में प्रचारित किया जा सकता है .इसके लिए सामूहिक पूंजी की सृजनशीलता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था-संरचनाएं और मानसिकता विकसित करनी होंगी .अपने हिंसक सांस्कृतिक अचेतन के कारण अठारहवी शताब्दी का परंपरागत मार्क्सवाद एक प्रतिक्रियाजीवी तनावपूर्ण असभ्य मानवीय समाज की रचना ही करेगा .  इस लिए मार्क्स के प्रति उचित श्रद्धांजलि तो यही होगी की साम्यवाद के भावी प्रारूप की खोज नए सिरे से सामूहिक पूंजीवाद की परिकल्पना के रूप में आधिक सभ्य ,शिष्ट ,स्वाभाविक और अहिंसक तरीके से किया जाय .संस्थागत या राजनीतिक क्रान्ति का एक पूंजीवादी तरीका यह भी हो सकता है कि सरकार हत्या करने की जगह क्रमशः या चरण बद्ध तरीके से मुद्रा या मुवावजा देकर सारी जमीने स्वयं खरीदती जाए  .इसके बाद वह जन-जीवन के पुनर्नियोजन के लिए स्वतन्त्र होती जाएगी .मानव जाति के सुरक्षित अस्तित्व के लिए यह कार्य बुरा नहीं है .ऐसा न होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हो रहा है कि भवन व्यक्ति की आवश्यकता और संख्या के अनुसार,जरुरत के हिसाब से नहीं बनाए जा रहे हैं ,बल्कि पूंजी-प्रदर्शन और प्रतिष्ठा के अनुसार बनाए जा रहे है .इस कारण से बढ़ती जनसँख्या के विपरीत कृषि-योग्य भूमि निरन्तर ही कम होती जा रही है .अनियन्त्रित-अनियोजित स्थापत्य में शहरों का विकास आधुनिक युग की सबसे गम्भीर समस्या है ,जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है .
         अपनी इन्हीं दृष्टियों  के कारण समकालीन प्रगतिशील विचारक प्रायः मुझे शैक्षणिक या ज्ञानात्मक अतीतीकरण के शिकार लगते हैं .यह एक परिकल्पनात्मक पिछड़ापन है ,जिसकी ओर स्वयं को प्रगतिशील होने का श्रेष्ठताबोध जीने वाले बुद्धिजीवियों का ध्यान ही नहीं जाता .उन्हें क्रन्तिकारी नायकत्व के मध्य-युगीन माडलों और उसकी महत्वकांक्षी स्वप्न्दर्शिता से बाहर निकालने में अभी वक्त लगेगा.ऐसी अभिव्यक्ति पहल ९१ के शिवप्रसाद जोशी के संवाद जो सचिन गौड़ के साथ है-'सुविधा दुविधा के आन्दोलन और मध्य-वर्ग '  शीर्षक संवाद के निम्न स्थल में देखी जा सकती है -"क्योंकि वो वक्त शायद कुछ और ही होता है .वो तो इतिहास की करवट है ,हम और आप तो बस लुढ़कते ,बढ़ते,लपकते चले जाएँगे .या वहीँ ठिठके रह जाएँगे .उस विचार को आप कैसे गिरा देंगे.और ये कोई अमूर्तता नहीं है .क्रान्ति हमसे नहीं होगी तो वो ऐसा नहीं होगा कि होगी ही नहीं.वो किसी और से होगी .पर होगी जरुर ." श्री जोशी के इस सपने में क्रान्ति का हीरोइक इज्म भी साफ-साफ देखा जा सकता है.
           

अल्पना मिश्र की कहानी "वक्त के बेसमेंट और खिलाता हुआ पीला गुलाब " का आत्मकथ्यात्मक शिल्प और कथ्य के अतिरिक्त यथार्थ के प्रति अपने विशिष्ट कथात्मक व्यवहार एवं दृष्टिकोण के कारण ध्यान आकर्षित करता है .वाराणसी का आंचलिक एवं ब्राह्मण वर्णीय जातीय यथार्थ ,परम्परावादी सोच के कारण आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा जीवन स्तर के साथ मुक्त बाजार-व्यवस्था में जीवनयापन का संघर्ष इस कहानी को समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है .नई मुक्त बाजार-व्यवस्था में सवर्ण मानसिकता वाले चरित्रों की अपनी अलग अयोग्यताएँ इस कहानी को जाति -विमर्श की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती हैं .यह कहानी दलित वर्ग से अलग जातीय-सांस्कृतिक यथार्थ का आर्थिक दृष्टि से प्रतिपक्ष प्रस्तुत करतीहै .
हिन्दी में पत्रकारिता ,सत्ता और बाजार पर वर्चस्व के कारण बहुत से महत्वपूर्ण चिंतकों के कार्यों का समकालीन पाठकीय चेतना  में सही निवेश नहीं हो पाया है .प्रतिष्ठित होने के बावजूद डॉo सुरेन्द्र चौधरी का विस्तृत लेखन अभी भी हिन्दी जगत के सामने नहीं जा पाया है .सुरेन्द्र चौधरी की रचनावली सम्पादित करने वाले उदय शंकर का आलेख 'समकालीनता का आहत नैरन्तर्य '
सुरेन्द्र चौधरी के आलोचक वैशिष्ट्य की ऐतिहासिक एवं वैचारिक पृष्ठभूमि की पड़ताल प्रस्तुत करता है .सामाजिक -सांस्कृतिक अंतर्लयन  की प्रक्रिया का अध्ययन  सिर्फ समकालीन ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक यथार्थ की प्रक्रियाओं की भी पड़ताल डॉसुरेन्द्र चौधरी के चिंतन और लेखन-कर्म को महत्वपूर्ण बनाती है .उनके साहित्य के समर्पित अध्ययन से उदय शंकर एक आधिकारिक विशेषज्ञ के रूप में उभरे हैं .उदय शंकर की सूचना के अनुसार गया और मगध का ऐतिहासिक अध्ययन 'मिथक और ब्राह्मणवाद ' ,कहानी की समकालीनता 'तथा 'भारतीय कृषक समुदाय की प्रागैतिहासिक पृष्ठभूमि 'जैसी अप्रकाशित पांडुलिपियाँ डॉo चौधरी को समाजशास्त्रीय महत्व के एक जमीनी विचारक के रूप में भी सामने लती हैं .उनके अनुसार समकालीन यथार्थ की पूरकता और अंतर्लयन की प्रक्रियाएं उनकी कथा-आलोचना को समझाने के लिए भी महत्वपूर्ण सूत्र हैं .
            समकालीन भारतीय यथार्थ के सम्बन्ध में पूरकता और अंतर्लयन सम्बन्धी डॉo चौधरी की अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए उदय शंकर उनकी निम्न लिखित पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं -
"मेरी दृष्टि में समकालीन यथार्थवाद का अर्थ दो रूपों में अपने को प्रकट करता है ;एक जनता और व्यवस्था के नये अंतर्विरोध के रूप में और दूसरा ,जनता के बीच के अंतर्विरोध के रूप में.ये दोनों ही प्रकार के नए अंतर्विरोध हमारे समाज में आजादी के बाद प्रकट होते हुए एक नया सामाजिक अस्तित्व धारण कर लेते हैं .अतः इन अंतर्विरोधों के सन्दर्भ में ही हम आजादी के बाद की सामाजिक वास्तविकता की धारणा को स्पष्ट कर सकते हैं."(पृo २५९)  उदय शंकर के अनुसार सुरेन्द्र चौधरी के यहाँ 'समकालीनताके विभिन्न स्वरों को पकड़ने पर जोर है और उन सभी स्वरों को समकालीन यथार्थ में अंतर्लायित होता हुआ देखना चाहते हैं .डॉनम्वर४ सिंह की कहानी-आलोचना इस अंतर्लयन को बाधित कराती है 'समकालीन यथार्थ को आहात कराती है .(पृo २६२ )
भारतीय यथार्थ के सन्दर्भ में उनका यह इतिहास-बोध भी महत्वपूर्ण है कि'आजादी जैसे तात्कालिक लक्ष्य के कारण स्थगित अंतर्विरोधों को आजादी नें पनपने की एक जमीन दी .इसने निरंतरता को बाधित किया .पूर्ववर्ती पीढ़ी के ऊपर जो हमला संभव हुआ ,वह भी इसी आहत नैरन्तर्य के कारण संभव हुआ .रचना और परिस्थिति की भी संगति बाधित होती है .अंतर्विरोध स्वीकार का भी था और नकार का भी .ये सारे अंतर्विरोध अगर किसी एक लेखक में मिलते हैं तो वे मुक्तिबोध हैं .(पृo २६४ )
               मौलिक और प्रासंगिक चिंतन की दृष्टि से वैभव सिंह का वैचारिक निबंध "लेखक : नैतिकता और स्वप्न" स्थाई महत्व की साहित्यिक उपलब्धि है .यह लेख सृजन की वैयक्तिक आकांक्षा और आवश्यकता तथा उसकी सामाजिक नैतिक प्रस्थिति के द्वंद्वात्मक अन्तर्सम्बन्धों की दार्शनिकी प्रस्तुत करने का प्रयास करती है . महत्वपूर्ण यह है की वैभव नें लेखक के परंपरागत कर्त्तव्य और नैतिकता से बाहर भी उसकी भूमिका और संभावना को तलाशने का प्रयास किया है .कुछ उद्धरण 'आलोचना में उनके आधुनिक हस्तक्षेप 'की पुष्टि करने में सहायक हो सकते हैं -'लिखना वह कौशल है जिसमें कल्पनाओं का विस्तार होता है .एक कल्पनाशील प्राणी ही लेखक या ज्ञान की खोज में भटकने वाला दार्शनिक -वैज्ञानिक बन सकता है .बाज वक्त कुछ लेखक केवल विद्वतापूर्ण बैटन और तर्कों के बीच रहना चाहते हैं और कल्पनाशीलता के जोखिम से खुद को अलग कर लेते हैं .वे ज्ञान की बातें करते हैं जो जरुरी होती है पर वे सृजनशीलता की यातनाओं से बचाते हैं .इसलिए भी क्योंकि कल्पनाओं की दुनिया नैतिकता और अनैतिकता के दायरों से बाहर जाकर ही संभव होती है ."(पृo २६८ )"प्रायः कम अच्छे लोग अच्छा लेखन करते हैं और अधिक अच्छे लोग ख़राब लेखन .मीरा हो या मंटो किसी के पास इसका प्रमाण नहीं था कि वे अपने समय के शरीफ और अच्छे नागरिक हैं .शराफत के बाड़ों को लांघकर ,लोकलाज त्यागकर ही उन्होंने साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी या सही निर्वाह भी किया है .कथित नागरिक समाज नें मीरा को भी त्याग दिया था और अक्सर ही मंटों को भी ."(पृo २६९-२७० )
        इसमें संदेह नहीं कि नेतृत्व कारी समर्थ मस्तिष्कों का जोखिमपूर्ण आत्मनिर्णय ही एक नए कल्पनाशील मानवीय भविष्य को सृजित करता आया है .इतिहास में अनेक बार यह निर्णय अकेले और कई बार विरोध के बावजूद लिया गया है .यद्यपि वैभव इस सवाल में निहित सामाजिकता और असामाजिकता की भूमिका को विस्तार या ठीक से समझा नहीं पाएं हैं ,न ही अप्रचलित-अविज्ञापित नए सही विवेक पर लोक-प्रिय विवेक के हिंसक बाध्यकारी  सामूहिक इतिहास के निर्माता दबाव को ही समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य और शब्दावली में व्याख्यायित कर पाए है-संभवतः लेख की सीमा या लेखकीय क्षण की साहित्यिक चित्ति के कारण ,लेकिन इस विषय के समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की केन्द्रीय और प्रामाणिक समझ उनके पास है -"आज का लेखक धर्म या सामंत के इशारों या उसके आश्रय में जीने की बाध्यता से मुक्त है और उसने फ्रेंच क्रान्ति ,औद्योगिक क्रान्ति ,रुसी क्रान्ति तथा आधुनिक भारतीय समाज-निर्माण की प्रक्रिया से उपजे परिवर्तनों की परम्परा को आत्मसात किया और अपनी बदली ही भूमिका का अनुभव भी किया है .धर्म या मनोरंजन तक लेखन को सीमित रखने की विवशता उसके आगे नहीं है पर इसी नें उसके दायित्व को बाधा भी दिया.इसीलिए नैतिकता और अपने लेखन की सामाजिक भूमिका के बारे में सचेत होना ऐतिहासिक रूप से तर्कसंगत और जरुरी भी लगता है .लेकिन इसी आधुनिकता नें उसे पहले से अधिक अंतर्द्वंद्व ,व्यक्तित्व-विभाजन और अवसाद भी दिए है .( पृo २७१ )'उसकी अवस्था उस मोमबत्ती के लौ की तरह रही है ,जिसे अंधकार से ही नहीं बल्कि अंधकार को बढ़ने वाली रोशनियों से भी अकेले ही लड़ना है .यानी लेखक अगर अपना खास विचार और नैतिकता को चुन लें तो भी उसके साथ उसका अकेलापन बढ़ जाता है .भाषा के भीतर की रहस्यमय और अपेक्षाकृत जटिल दुनिया में उसके प्रवेश ने उसे अर्थों के नए विरत विश्व के आगे खड़ा कर दिया जहाँ उसकी इन्द्रियां,बोध और भावनाएं किन्हीं तुफानो का सामना करने लगती हैं और उसकी आवेगमयता उसके स्नायविक तंत्र की परीक्षाएं लेने लगती हैं .(व्ही २७१ ) वैभव नें वर्तमान अर्थ-केन्द्रित विश्व में राजनीतिक तन्त्र की घटती भूमिका को उचित ही रेखांकित किया है -"अब हल यह है कि लेखक जिस राजनीति को अपने लिए मूल्य-स्रोत के रूप में देखता था ,वह विश्व में हाशिए पर जाने लगी और लेखक ऐसी अंतर्विरोधी दशा में पहुँच गया जहाँ लगभग सौ साल पुराने प्रश्न उसके सामने थे कि-'किधर जाएँ .'(पृ० २७३ ) वैभव पूर्ण स्वतंत्रता के सैद्धांतिक अनौचित्य को भी रेखांकित करते हैं -"वह स्वतन्त्र होकर दुनिया को देखना चाहता है ,उसकी संरचनाओं को समझना चाहता है .पूर्ण स्वतंत्रता को हासिल कर नीत्शे के सुपरमैन की तरह बन जाना भी कई लेखकों का कम्य रहा है .पर संभवतः पूर्ण स्वतंत्रता जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता है पर उसी को लेकर सबसे अधिक आकर्षण मन में मौजूद रहता है .उसकी निरन्तर खोज अपने को लेकर भी है और अपने जीवन-मूल्यों  को भी .(पृo २७४)
        चन्दन पांडे की कहानी 'लक्ष्य शतक का नारा ' भ्रष्ट -यथार्थ पर आधारित डायरी (मूलतः बही)  शैली में लिखी गयी व्यंग्य रचना है .थाने पर होने वाली अवैध वसूली सत्ता के दुरूपयोग से ऊपरी आमदनी के विविध प्रकार ,मंत्रियों के कदाचार ,नियुक्तियों में धांधली  और घूस आदि के प्रकरणों का कथांकन किया है .

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

राजनीतिनामा

भारत जैसे देश में एक स्वस्थ राजनीतिक तंत्र  लिए पेशेवर राजनीति का उदय होना जरुरी है। सबसे अच्छा दिन वह होगा जब मतदाता के पास एक राजनीतिक उपभोक्ता का विवेक होगा।  वह राजनेताओं को एक उपभोक्ता  तरह ही डरा सकेगा कि  सही तो मैं किसी और से सेवाएं  लूंगा। यद्यपि आज भी देश में कई राजनीतिक दल हैं। पहली दृष्टि  में भ्रम  होता है कि मतदाता स्वतन्त्र है। लेकिन समस्या यह है कि उसकी यह स्वतंत्रता सापेक्ष है। वह इस   दृष्टि से अविवेकी एवं अपरिपक्व है कि उसका विवेक सामाजिक यानि जातीय आधारों पर सामूहिक निर्णयशीलता की शिकार है। उसकी निष्ठा बहुत कुछ पूर्वनिर्धारित है। उसकी प्रतिबद्धता एवं जड़ता तय है।

                 भारतीय मतदाताओं की इस लाचारी को कुछ इस प्रकार समझना होगा। सभी दाल एवं उसके संचालक नेतागण पहले से ही जानते है कि किस क्षेत्र में किस जाति के मतदाताओं की बहुलता है। दलों की विचारधारा कुछ भी हो वे प्रत्याशियों का चयन अतिरिक्त योग्यता की तरह जातीय आधार पर ही करती हैं। सबसे पहले प्रत्याशी चयन करने वाला दल दूसरे दलों को फिर बचे  हुए जातीय समीकरणों के आधार पर प्रत्याशी चयन करने की चुनौती देता है। समीकरण कुछ इस तरह के बनाए जाते हैं कि पहले घोषित प्रत्याशी की जाति से कम जनसंख्या वाली जाति का प्रत्याशी न चुना जाय।     

शनिवार, 31 जनवरी 2015

डॉo मंजुलता लाल :एक काव्य-चित्र

प्राचार्या श्रीमती डॉo मंजुलता लाल : एक काव्य –चित्र

(सेवानिवृत्ति के अवसर पर अपनी प्राचार्या श्रीमती डॉo मंजू लता लाल को एक आत्मीय श्रद्धा -सुमन )

क्योंकि आपने अपनी यात्रा का आरम्भ
रजनी की मोह – निशा में किया था
और देखे थे दिवा के सुनहरे स्वप्न ...
संभवतः इसीलिए जब आप स्वयं सत्ता में आयी
आपने सत्ता को शासन का नहीं
अनुशासन का पर्याय समझा ---    

आपने रजनी सिंह की बंधुआ मजदूर वाली
हिंसक शैली को स्वीकार नहीं किया
बल्कि उन्हें किसी स्नेहिल अभिभावक की तरह
एक परिवार बनाकर साथ-साथ चलना और करना सिखाया
कुछ इसतरह की जैसे आपने
भांति –भांति के यात्रियों से भरे सराय रूपी महाविद्यालय को
अपनी आत्मीयता से घर में बदलना सिखाया ....

इस तरह आपने
मुसाफिरखाना ,ओबरा,चंदौली और गाजीपुर में भी
अत्यंत शानदार और वृहत्तर घर बनाए
और अब वाराणसी के नव-निर्मित
नव्यतम एवं भव्यतम घर में
जाने की लिए
हमसे विदा हो रही हैं ....

आपको कंटीले पौधों का भी
सार्थक उपयोग करना आता है
आपने उनका सुरक्षा के लिए
मजबूत बाड़ बनाने में इश्तेमाल किया ...

आप सबसे पहले अपने कर्त्तव्य –आसन पर
विराजमान होती रहीं
ताकि विलम्ब से आने वालों को शर्मिन्दगी की सजा देकर
या फिर क्षमा के अहसानों के बोध से सुधार जा सके ...

जब आप स्वयं उपस्थित नहीं रह्ती थीं
तब भी आपके महाविद्यालय में बने रहने की अनुभूति बनी रहती थी
आपके द्वारा प्रतिनियुक्त
आँख,कान और दिमाग
पूरी ईमानदारी और मुस्तैदी से गश्त लगते रहते थे
और प्राध्यापकगण भी पूर्ण मनोयोग से पढ़ाते  रहते थे। 

मुझे नहीं मालूम कि
आपने जंगली और बिगडैल घोड़ों को
पालतू बनाकर उन्हें सरपट दौड़ाने की कला कब और कहाँ से सीखी
आपके द्वारा सींचा गया उपवन
पुनः एक नए बसन्त के स्वागत की तैयारी कर रहा है

आप जैसे एक अभिशापित परिसर को
सिर्फ शाप-मुक्त करने आयीं थीं
आपकी नयी यात्रा के बाद भी यह महाविद्यालय
एक परिवार की तरह जीने के
स्वस्थ संस्कार और आदतों को जीता हुआ
आपको श्रद्धा-सुमन प्रेषित करता रहेगा ...
जो महाविद्यालय  कभी सिर्फ अपने रजनी-काल के लिए
जाना जाता था
वह अब आपका भी कीर्ति –स्थल और स्मारक है .



राम प्रकाश कुशवाहा

३१.०१.२०१५ 

सोमवार, 26 जनवरी 2015

लिंग -भेद कि अभियांत्रिकी

मानव-जाति इस आधार पर  दुनिया का सबसे कामुक प्राणी है .,कि मनुष्य को छोड़ कर  दूसरा कोई भी प्राणी काम-चिंतन  नहीं करत्त .पशु-जगत के काम-व्यव्हार से मानव-जगत के काम-व्यव्हार की तुलना करने पर जो अन्तर सामने आता है उसमें मनुष्य द्वारा ज्ञान,बुद्धि और स्मृति के स्तर पर किया जाने वाला कामुक व्यव्हार ही प्रमुख है .मनुष्य ने कामुकता को सभ्यतागत और संस्थागत विस्तार दिया है .विवाह-संस्था से लेकर उसके सामाजिक व्यव्हार में लिंग-भेद की चेतना की बहुआयामी अभिव्यक्तियाँ  उसके काम-व्यव्हार को विशेष बनती हैं .क्योंकि मनुष्य में ज्ञान की सारीअभियांत्रिकी उसके भाषा-तंत्र पर ही आधारित है ,इसलिए स्वाभाविक है कि उसके कामुक बुद्धि का भी प्रमुख आधार भाषा-आधारित ज्ञान-तंत्र ही है .हर भाषा में कामोत्तेजक श्लील-अश्लील शब्द मिलते हैं .संवेदनात्मक साहचर्य के कारण ये शब्द पुरुष और स्त्री में विपरीत लिंग के साथी की प्रत्यक्ष दैहिक उपस्थिति के बिना भी उसकी कल्पना द्वारा उसके मन-मस्तिष्क को संवेदित करने में समर्थ है .संवेदनात्मक साह्चर्य के कारण ये शब्द उसकी अन्तःस्रावी ग्रंथियों को भी उत्तेजित करने में समर्थ है. क्योंकि अन्तःस्रावी ग्रंथियों का स्विच मनोरासायनों में है और यह कोई छिपी बात नहीं कि मस्तिष्क अपने सबसे निरीह अवस्था में काम-चिंतन के क्षणों में ही होता है .मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र का एक बड़ा हिस्सा कामजनित तनावों और उत्तेजनात्मक जैविक व्यस्तताओं को ही समझाने और संभालने में लग जाता है .वस्त्र,व्यक्तित्व  से लेकर भाषा,मुहावरों और गालियों तक मनुष्य के काम-तन्त्र का ज्ञानात्मक विस्तार है .पुरुष और स्त्री व्यक्तित्व कि अलग अभियांत्रिकी रूचि,वेशभूषा से लेकर खेल तक देखी जा सकती है .इस लिए स्त्री-पुरुष के समानतावादी व्यव्हार पर आधारित समाज की  रचना के लिए इस सारे पर्यावरण को बदलना होगा .
               मनुष्य के लैंगिक अपराधों को देखते हुए आश्चर्य होता है कि पशु-जगत अपने विपरीत लिंगी साथी के प्रति काम-व्यव्हार में कितना शिष्ट और सभ्य है .वह कभी लैंगिक दुर्व्यवहार या बलात्कार नहीं करता है .अपने समागम में भी वह जैविक उपकारक कि भूमिका में होता है .ऐसा वह प्रकृति प्रदत्त सहज -वृत्ति के द्वारा करता है .वह तलाश करता है .जो कुछ भी करता है सहमति के साथ .मनुष्य का लैंगिक व्यव्हार उसकी जैविक प्रेरणा से अधिक उसके बोद्धिक-मानसिक पर्यावरण से अधिक प्रभावित होता है .उसका सांस्कृतिक पर्यावरण भी उसके काम-व्यवहार को प्रभावित करता है .पहले भारतीय गांवों में अपने गाँव की युवतियों को बहन मानने की सांस्कृतिक व्यवस्था थी .युवतियां बहन-भाई के रिश्ते के विस्तार के कारण सुरक्षित रहती थीं .कुछ धार्मिक अवधारणाए भी स्त्री शरीर को देवी की  प्रतिनिधि के रूप में देखने कि दृष्टि देती थीं..यह प्रभाव फ़िल्मी नायक-नायिकाओं के अश्लील प्रभाव से अलग एक पवित्र भाव-लोक रचता था .मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे प्रत्यक्षीकरण की सांस्कृतिक अभियांत्रिकी कहा जा सकता है .यह पद्धति स्त्री शरीर को देखने की दृष्टि और मानसिक व्याख्या बदलती है .आधुनिक भौतिकवाद और बाजारवाद नें उससे यह दृष्टि छीनी है .वर्जनाओं की पूरी  सांस्कृतिक अभियांत्रिकी निरस्त कर दी गयी है .यह जरुरी नहीं है कि संस्कृति को केवल धार्मिकता के अंतर्गत ही देखा जाय .पारिवारिक रिश्तों को विस्तार देते हुए भीं समाज की बेहतर संस्कृति रची जा सकती है .
            इस सम्बन्ध में यह भी देखना होगा कि अधिकांश यौन-नैतिकता का निर्माण सामन्ती युग में ही हुआ है .उस युग की मान्यताओं में यौन-शुचिता और शुद्धता कि मान्यताएं भी हैं .एक समय था जब भोजन के बर्तन छू जाने मात्र से धर्म बदल जाते थे .यौन शुचिता कि अवधारणा भी उसी दौर की और उनमें से एक है .स्त्री को सिर्फ देह के रूप में देखने से उसके व्यक्तित्व का सही मूल्याङ्कन नहीं हो सकता .समाज को यह मानना सीखना होगा कि अपने साथ हुए यौन -अपराध कि शिकार होने के बावजूद भी कोई स्त्री अपनी इच्छाओं,मन और भावनाओं से उसमे शामिल नहीं है .एक लुटी हुई स्त्री योन-अपराधी के प्रति अपनी घृणा में भी बची हुई हो सकती है .शिकार होने के बाद भी ,यदि वह किसी एड्स रोगी द्वारा नहीं किया गया है -कोई स्त्री अपने मानसिक सोंदर्य और व्यक्तित्व के साथ बची हुई हो सकती है .संतान-उत्पत्ति में सक्षम उसके वे सारे डिम्ब जो उसकी जैविक-जीनेटिक विशेषता के अनुरूप एक नए मनुष्य को जन्म दे सकते हैं,बलात्कार कि शिकार स्त्री के पास भी एक संभावनापूर्ण भविष्य के रूप में बचे रह सकते हैं .इस तरह हर स्त्री एक विशिष्ट जैविक गुणवत्ता का बीज भी है .इस तरह यों-अपराधों कि शिकार स्त्री के शरीर का परंपरागत अवमूल्यन और शुचितावाद एक अंधविश्वासपूर्ण पूर्वाग्रह के अतिरिक्त और कुछ नहीं है .इस मध्ययुगीन सोच से समाज को बाहर निकालने कि जरुरत है .http://www.jansatta.com/columns/jansatta-editorial-stri/24367/http://www.jansatta.com/columns/jansatta-editorial-stri/24367/

रविवार, 18 जनवरी 2015

कविता का चरित्र

वर्त्तमान में कविता के स्वरूप और चरित्र को लेकर इतनी विविधता है कि उसका कोई निश्चित स्वरूप भी हो सकता है -यह नहीं कहा जा सकता .लेकिन यह भी एक सच है कि कविता एक सांस्कृतिक अविष्कार है ,इसी कारण से सभी देशों की कवितायेँ एक ही भूमिका में नहीं रही हैं .पश्चिम में ओल्ड टेस्टामेंट हो या भारत का वादिक साहित्य -प्रारंभिक साहित्य अपने प्रयोजन में प्रायः धार्मिक ही रहा है ..बाद में यद्यपि यह कहना अधिक सही होगा कि भाषिक सामर्थ्य के विकास के साथ समर्थ कवियों नें वृहत्तर कथा -काव्यों की रचना की होगी ,जिन्हें आज हम महाकाव्य कहते हैं . कथा -काव्य यानि कि गाथाएँ कविता सांसारिक आकांक्षाओं को सम्पूर्णता में व्यक्त करती है.
           यूरोपीय और भारतीय काव्य परम्पराओं का तुलनात्मक अध्ययन करें तो एक अंतर यह सामने आता है कि पश्चिमी साहित्य विस्मय और रोमांच मूलक है .उसके कवियों का चित्त नवीन जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के प्रति अधिक आकर्षित होता है .प्रत्याशा और रोमांच उसके साहित्य के स्थायी स्वाभाविक वृत्तियाँ हैं .वे वैसा ही जीवन जीते हैं और वैसा ही पसंद करते हैं तो स्वाभाविक है कि उनका साहित्य भी उन्ही भावनाओं से भरा हुआ है .इसका कारण यह प्रतीत होता है कि उनका जीवन और परिवेश अधिक चुनौतीपूर्ण  रहा है .इसके विपरीत भारतीय साहित्य स्तायित्वपूर्ण कृषि -व्यवस्था के कारण परिवार एवं रिश्ते जीनेवाला रहा है ..इसलिए उसके साहित्य में रिश्तों से जुडी भावनाएं ही अधिकांशतः व्यक्त हुई हैं .सामाजिक जीवनराग एवं चरित गायन उसके साहित्य का केन्द्रीय स्वर रहा  है .प्राचीन भारतीय साहित्य यदि केवल धार्मिक भावनाओं को ही प्रश्रय देता दिखाई देता है तो इसका सामाजिक कारण यह भी हो सकता है कि भारत में लिखित  साहित्य  के संरक्षण की जातीय जिम्मेदारी प्रायः ब्राह्मणों के ऊपर ही रही है ..इस जाति की दिलचस्पी प्रायः नैतिक और धार्मिक साहित्य को ही संरक्षित करने की रही है .  लौकिक साहित्य तो प्रायः लोकागाथाओं या फिर रजा द्वारा संरक्षित किये जाने पर ही बचा है . 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

हिंदी का वैश्विक भविष्य

विश्व हिन्दी दिवस 10 जनवरी पर विशेष -

 10 जनवरी 1975 को नागपुर मे आयोजित प्रथम विश्व  हिंदी सम्मलेन के चालीस वर्ष बीतने और  भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा  10 जनवरी 2006  को प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस माने जाने की घोषणा के दसवें वर्ष में हिंदी कंप्यूटर  एवं इंटरनेट युग की वैश्विक भाषा तो बन ही गयी है . आज यूनिकोड में टंकित  हिंदी को गूगल के अनुवाद(ट्रांसलेशन ) एवं लिप्यान्तरण(ट्रांसलिटरेशन) सॉफ्टवेयर के माध्यम से विश्व की किसी भी भाषा में पढ़ा जा सकता है .यह एक बड़ी तकनीकी विजय है ,जिसने पूर्ववर्ती पीढ़ी के हिंदी -विरोध को बेमानी कर दिया है . वैश्वीकरण और उन्मुक्त बाजार व्यवस्था नें हिंदी भाषियों के संख्या-बल के आधार पर विवश होकर यह महत्वपूर्ण कार्य किया है .
                यद्यपि इससे  10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस को औपचारिक रूप से माने जाने का महत्त्व कम नहीं हो जाता .इसका महत्त्व एक संकल्प दिवस के रूप में है कि विश्व में हिंदी के प्रचार -प्रसार के लिए हम क्या -कुछ कर सकते हैं .ऐसे में तो और भी जबकि हम हिंदी भाषी  भाषा-चेतना की दृष्टि से भारत के ही अन्य भाषाभाषियों की तुलना में उदासीन और पिछड़े ही कहे जाएँगे .औपिनिवेशिक मानसिकता के कारण  ही  बाजार में दुकानों तक के नाम भी अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं .अभी तक तो विश्व हिंदी दिवस एक सरकारी पर्व ही बन कर रह गया है .विदेशों में स्थित भारत के दूतावास इस दिवस को विशेष रूप से मानते हैं .इसका उद्देश्य हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए तथा विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता पैदा करना है .हिंदी को सरकारी स्टार पर नहीं ,बल्कि सामाजिक स्टार पर विश्व में प्रतिष्ठित होने के लिए अभी भी एक लम्बी यात्रा करनी है .
                              इतिहास में देखा जाए तो पहले भी भारत के व्यापक भूभाग में हिंदी को फैलाने में भक्ति आन्दोलन के साथ -साथ बाजार एवं शहरीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका थी . व्यापार की आवश्यकताओं नें अतीत में हिंदी के प्रचार प्रसार और उसके मानकीकरण में महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई है .व्यप्परियों को दूर -दूर तक यात्राएं करनी पड़ती हैं ,ऐसे में आंचलिक और स्थानीय भाषा और उसके शब्दों से उनका काम  नहीं  चलता .ऐसे में दूर तक समझे और बोले जाने वाले शब्दों को बढ़ावा मिलता है . आज भी बाजारीकरण की प्रक्रिया वैश्विक आदान-प्रदान के रूप में जारी है .अभी भारत नें मारीशस को स्वदेशी युद्ध पोत बेचा है .हिंदी में नामकरण वाले ऐसे भारतीय उत्पाद भी अपनी प्रतिष्ठा और यश के साथ हिंदी शब्दों को फैला सकते हैं .प्रधानमंत्री महोदय की 'मेक इन इण्डिया  नीति सफल होने पर अप्रत्यक्ष रूप में ही सही ' हिंदी शब्दों के प्रचार -प्रसार में महत्त्व पूर्ण भूमिका अदा कर सकती है .
               अभी हिंदी को वैश्विक ख्याति वाली गीतांजलि जैसी किसी महत्वपूर्ण  साहित्यिक कृति के रचे जाने का भी इंतजार है .एक ऐसी कृति जिसके लिए लोग विवश होकर हिंदी सीखें या फिर उसके माध्यम से हिंदी के बहुत सारे शब्द सारे विश्व में फ़ैल जाएं . आज भी अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के विकास की जो चुनौतियां हैं ,वह राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों की हैं .पहला तो यह की हम सभी भारतीय ही बिना किसी राजनीतिक विद्वेष के हिंदी का सम्मान करें  और उसका  बिना किसी हीनता ग्रंथि के व्यव्हार में उपयोग करें .भारत के दक्षिणी राज्यों में हिंदी थोपे जाने का प्रबल प्रतिरोध  अंततः उनको ही क्षति पहुंचता है .इस मानसिकता से मुक्त होंने के कारण  केरल के लोग सर्वाधिक संख्या में उत्तर भारत में नौकरी करते पाए जाते हैं .
              अब तक के इतिहास का अनुभव यह बताता है कि राजनीति एवं राजनीतिज्ञ हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रतिष्ठापरक एवं संरक्षण देने जैसे सहयोग ही कर सकते हैं .पहले भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल जी नें और अब वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी इस भूमिका के प्रति सजग हैं .दर असल राष्ट्रवादी भावना के बिना हिंदी को उसका वांक्षित सम्मान नहीं मिल सकता .इसी भावना के कारण स्वाधीनता के नायकों नें हिदी को ही भारत की राष्ट्रभाषा की सही अधिकारिणी समझा था .इसके अतिरिक्त हिंदी सांप्रदायिक एकता की भी भाषा है   . सभी भाषा-वैज्ञानिक इस रहस्य को जानते हैं कि अपनी संरचना में हिंदी और उर्दू दोनों ही खडी बोली  पर ही आधारित दो शैलियाँ हैं .उनमें  इतनी समानता है कि पाकिस्तान का उर्दू प्रसारण  भी हिंदी ही लगता है .मुझे एक पुस्तक मिली थी पाकिस्तान के उर्दू शायरों की उसमें भारत में लिखने वालों से बहुत अधिक हिंदीपन था .इतना कि वे हिंदी की गजलें ही लग रही थीं .इस दृष्टि से देखें तो बिना लिप्यान्तरण के उर्दू के रूप में हिंदी पाकिस्तान में भी बोली जाती है .सिर्फ लिपि-भेद और शैलीभेद के साथ राजनीतिक संकीर्णता के कारण कोई भी किसी सार्वजनिक मंच से इस सत्य को स्वीकार करना नहीं चाहता . 
                      इसके बावजूद यह एक तथ्य है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की मानसिकता के कारण विश्व में फैले प्रवासी भारतीय विश्व में हिंदी फैला रहे हैं .ठीक वैसे ही जैसे मारीशस में कभी भोजपुरी गयी थी .पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की ओर विदेशियों का भी आकर्षण बढ़ा है .हम ऐसा दिवा स्वप्न देखा सकते हैं की हिंदी अंग्रेजी की तरह भूमंडली कृत भाषा भले ही ण बन पे लेकिन वह एक सामानांतर महत्त्व की वैश्विक भाषा तो बन ही सकती है .

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

ईश्वर की भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा

ईश्वर की भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा में जो अंतर है ,वह दोनों सभ्यताओं की मानसिकता और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के अनुरूप ही है .पश्चिमी सभ्यता के ईश्वर की अवधारणा जहाँ प्रकृतिपरक होने के कारण एक भौतिकवादी सभ्यता का आधार बनती है ,वहीँ भारतीय  ईश्वर की अवधारणा भावपरक होने के कारण एक आध्यात्मिक सभ्यता का ।
   "एकाकी न रमते ,सो कामयत एकोअहम बहुस्यामि" का प्रसिद्ध औपनिषदिक कथन आत्मा और परमात्मा की इसी एकता का उद्घोष करता है . यह तात्विक समानता के साथ-साथ आवयविक एकता की भी अवधारणा है .यहाँ ईश्वर स्वयं ही सभी जीवों में रूपांतरित हुआ है .वैसे ही जैसे पिता अपने पुत्र में जैविक रूप से रूपांतरित होता है .इसीलिए आध्यात्म से आशय संपूर्ण प्रकृति में व्याप्त आत्मा की एकता को अनुभूत करना है .आत्मा व्यष्टि की आत्मा है तो परमात्मा समष्टि की वृहत्तर आत्मा .इसीलिए भारतीय आध्यात्मिकता अपने से परे की संपूर्ण सृष्टि  के प्रति उदात्त आत्मीयता के रूप में है। इस अर्थ में कि जो आत्म से अधिक है वही आध्यात्म है और जो आत्मिक से अधिक है वही आध्यात्मिक । यहाँ "अधि" अपने आशय में अधिक , विस्तृत,अतिरिक्त ,ऊपर एवं परे आदि बहुत से शब्दों के अर्थों को अपने में समेटे हुए हैं. 
                ऐसा इस लिए कि भारतीय  ईश्वर परमात्मा यानि परम आत्मा तो है ही  वह परम पिता भी है। यद्यपि यह एक तथ्य है कि ईसा मसीह स्वयं को ईश्वर का पुत्र घोषित करते हैं इस तरह प्रकारांतर से  ईश्वर का साक्षात्कार परम पिता के रुप  में ही करते हैं -लेकिन सिर्फ उनके स्वीकार से ही पश्चिमी सभ्यता का सांस्कृतिक अचेतन बदल नहीं जाता। इस न बदलने का कारण ईश्वर का इस सृष्टि या जगत से वह रिश्ता है,जो सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर को एक बाहरी शक्ति बना देती है।
                पश्चिमी ईश्वर इस सृष्टि से बिलकुल् अलग एक विशुद्ध निर्माता शक्ति है। वह स्वयं इस सृष्टि का अभिन्न हिस्सा नहीं है।  उसने किसी कुम्हार के घड़े की तरह इस दुनिया को बाहर से बनाया है ,उसने छः दिन में इस दुनिया कि बनाकर सातवें दिन विश्राम भी किया है.वह इस दुनिया का कृतिकार है और यह दुनिया उसकी कलाकृति की तरह है .इस तरह वह अलग है और उसकी बनायीं हुई यह दुनिया अलग। .इस तरह पश्चिमी अचेतन के व्यक्तित्व की मुख्य विशेषता उसकी सृजनशीलता है। इसीलिए उसने ईश्वर और उसकी बनायीं प्रकृति के रहस्यों के उदघाटन के लिए उसकी सृजनशीलता के रहस्यों को ही उद्घाटित करना सही समझा।  तरह पश्चिम का भौतिकवाद और उसकी वैज्ञानिक जिज्ञासा उसकी विशिष्ट  धार्मिकता का ही प्रतिफल है।
                  इसके विपरीत भारतीय ईश्वर किसी कुम्हार की तरह नहीं है। पश्चिमी अवधारणा के विपरीत  वह एक जैविक  पिता की तरह मनुष्य की आत्मा से अभिन्न शक्ति है। जैसे माता और  पिता अपने शरीर से ही  अपनी संतान को जन्म देते हैं ,जैसे कि विकसित होने के बाद पुत्र भी पिता की जगह ले सकता है- वैसे ही मनुष्य भी विकास के पश्चात ईश्वरता को प्राप्त हो सकता है। क्योकि पिता और पुत्र में तात्विक अंतर नहीं होता इसलिए मनुष्य की आत्मा और परमात्मा भी तात्विक दृष्टि से अभिन्न हैं ,भारतीय अवतारवाद का आधार यही अवधारणा है। उसका सांस्कृतिक अचेतन ईश्वर और प्रकृति के रहस्यों को जानने में नहीं बल्कि उसे किसी आत्मीय की तरह जीने में विश्वास करता है। उसकी भक्ति की प्रकृति भी भावुक है। जबकि पश्चिम में मनुष्य ईश्वर का सृजन या उत्पाद है। इसलिए पश्चिमी मनीषा मनुष्य के स्वयं ईश्वर होने की बात सोच भी नहीं सकती। इसके विपरीत भारतीय मनीषा ईश्वर होने का दंभ तो जीती रही है ,लेकिन उसने सृष्टि एवं सृजनशीलता की यात्रा को समझाने का बिलकुल ही प्रयास नहीं किया .वह सिर्फ दिव्य सृजनशीलता पर मुग्ध ही होती रही है . उसकी जाति और वर्ण वादी जातीय संरचना नें उसके विवेक को भी बाँट दिया था . हाथ और  मस्तिष्क की जातीय दूरी नें वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से एक संभावना शुन्य समाज और सभ्यता को जन्म दिया .उसके सिद्धांतकार अलग जातियों में पैदा होते रहे और प्रयोग्कार अलग जातियों में -इससे वह बेहतर यंत्रों के विकास से भी वंचित रही . [

रविवार, 14 दिसंबर 2014

कविताएँ

जीवन के पक्ष में ....



ड्राइवर रोक दो अपनी गाड़ी 
निकल आओ अपने गति के नशे से 
रुक जाने दो यह समय
जो हिंसक गति से 
किसी के जीवन को रौंदता हुआ 
अपनी मंजिल तक पहुँच जाने का 
महत्वाकांक्षी स्वप्न देख रहा है .....

देखते नहीं -जीवन गुजर रहा है सामने से 
घूमती धरती के साथ-साथ 
समय से होड़ लेने के लिए 
 प्रजाति के रूप में दौड़ लगाता  हुआ जीवन-समय

ड्राइवर ब्रेक पर अपने पंजे कसो और 
अब रोक दो अपनी गाड़ी 
देखते नहीं सद्यः प्रसूता  कुतिया माँ के 
दूध भरे गदराए -शरमाए ललछौहें स्तन 
उसे उसके बच्चों के पास सकुशल पहुँचने दो 
हो  जाने दो ट्रैफिक जाम 
जीवन की चिरंतन यात्रा के पक्ष में .....



स्वयं के पक्ष में .





वाह भाई साहब !

यह भी खूब रही कि 
मैं स्वयं को पुरी तरह निरस्त कर दूं 
आपके पक्ष में ?

आप समय की बिना किसी परीक्षा के 
स्वयं को पुरी तरह 
उत्तीर्ण देखना चाहते हैं 
आप चाहते हैं कि आपको छोड़कर 
शेष सारे लोग नेपथ्य में 
यानि कैमरे के पीछे चले जाएं 
कि बाकी सारे लोग डिलीट हो जाएँ आपको छोड़कर 

क्या आपको पता है कि यह समय
आपकी एकल आवाज से उब सकता है 
कि जिस समय स्वयं रच रहे हैं 
उसी समय दूसरों को रचने से मना करते हुए 
वाचित हो रहे हैं दूसरों के सृजन से 
कि एक दिन आप थक जाएंगे रचते रचते....

चलो माना  कि आप अतीत की दुनिया के विश्व-विजेता हैं 
लेकिन भविष्य का कोई नया सृजन 
आपके सारे प्रायोजित एकाधिकार के 
तिलस्म को तोड़ सकता है 

आप किस-किस को 
अपने पक्ष में 
निरस्त हो जाने के लिए प्रार्थना करेंगे भाई साहब !


गुरुवार, 27 नवंबर 2014

कविता /सत्यमेव जयते/रामप्रकाश कुशवाहा

सत्य ही जीतता है
सत्य जब हार रहा होता है
तब भी वह
हार नहीं रहा होता


क्योकि सत्य का होना ही महत्वपूर्ण है
हारता या जीतता

सत्य जब हार रहा होता है
उसके पहले ही
वह जीत चुकता है
सत्य होता हुआ ....


रविवार, 23 नवंबर 2014

शून्य-काल का नायक और अँधेरा


कभी सृष्टि के उद्भव -काल में
अंतरिक्ष व्यापी अँधेरे की मिट्टी में ही
बीज की तरह अंकुराई होंगी जीवन की आँखें
अँधेरे की जड़ता के विरुद्ध
अग्निधर्मी-प्रकाशजीवी
आज भी खेल रहीं हैं वे
अँधेरे से आँख-मिचौनी ,नोक-झोंक ,मुठभेङ
अँधेरे में आज भी डूब जाती है आँखों की नाव
अदृश्यता के घोर -अथाह समुद्र में
अँधेरे में सब कुछ होते हुए भी
कुछ भी दिखाई नहीं देता
इस तरह अँधेरा चीजों को गायब नहीं करता
सिर्फ अँधेरे की अनन्त तानाशाही
अनुशासन के नाम पर
सारे अस्तित्वों को छिपाकर रखना चाहती है
कभी कानून -व्यवस्था तो
कभी पवित्र संयम के नाम पर.....

जहरीला धुंआ उगल रही हैं अंधेरे की फैक्ट्रियां
कारखानों में लगातार बढ़ रहा है अँधेरे का उत्पादन
बाजार में लोग आँखें बेच रहे हैं और आँखें खरीद रहे हैं
फिर भी लोगों के बीच
महामारी की तरह फैलता और बढ़ता ही जा रहा है अंधापन 
समय का माफिया 
रंग-बिरंगी बोतलों और आकर्षक पैक में 
बहुत ही कम कीमत पर बेच रहा है 
अँधेरे का नशीला पेय 

अँधेरे नें भक्षण कर लिया है सूरज का 
तीनों लोकों में फैलता ही जा रहा है अंधियारा 
अँधेरा सडकों पर है 
नदियों में है और हवा में भी …  

शहर में धडाधड खुल रही हैं अँधेरे की दुकानें 
अँधेरे के व्यापारी आकर्षक एवं पेशेवर ढंग से 
समय का महत्व बता रहे हैं 
अँधेरे की सबसे विशालतम रेंज उतारी है 
अँधेरे का एकाधिकार उत्पादन करने वाली कम्पनी नें -
अँधेरे की टाफी 
अँधेरे की काजल 
अँधेरे की लिपस्टिक 
अँधेरे की साडी 
अँधेरे की गाडी
अँधेरे की  टोपी 
अँधेरे की मिठाई    
अँधेरे का पेय -जिसे पीते ही आँखें 
बंद कर देती हैं कुछ भी देखना 
यद्यपि आँखे खुली-खुली सी रहती हैं 
कान सुन रहे होते हैं 
लेकिन दिमाग बंद कर देता है 
अँधेरे के बारे में सोचना ....
अब दिन हो या रात 
कोई फर्क नहीं पड़ता 
अँधेरे की सबसे अच्छी रात 
और सबसे अच्छे दिन हाँ ये 
अँधेरे की सबसे मीठी -मोहक नींद 
ले रहे समय में 
लोगों के मस्तिष्कों नें बिल्कुल
 बंद कर दिया है
अँधेरे और उसके दुष्परिणामों के बारे में सोचना 
आशंकाओं से मुक्त 
बिल्कुल निर्द्वन्द्व और भयहीन 
शांत अँधेरे समय में 
सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं 
अँधेरे के अखबार 
अँधेरे के किताबों की 
रिकार्ड तोड़ बिक्री जारी है .... 

कृष्णा पक्ष के इस पक्षघतिक अँधेरे में 
शुन्य काल के नायक के शयन -कक्ष में 
समय का विकलांग सर हिल रहा है
सिर्फ हाँ -हाँ करता हुआ 
किसी गलत समय बताने वाली घडी के 
जिद्दी -बेशर्म पेंडुलम की तरह..... 

शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

साम्यवाद की अचिंतित समस्याएँ

१   आर्थिक भाषाहीनता-

यदि हमें साम्यवादी व्यवस्था को आदर्श रूप में घटित या मूर्त देखना होगा तो सबसे पहले बाजार से बाहर  आना होगा। पूंजी के सामूहिक स्वामित्व की अवधारणा लिए हुए यह परिवारवाद में वापसी जैसा ही होगा -क्योंकि सिर्फ परिवार में ही पूंजी के मुद्रा रूप का परिचालन रोका  जा सकता है।  बाजार की आवश्यकता को स्थगित या शून्य किया जा सकता है।  पूंजी के अनियंत्रित व्यवहार तथा भावी विषमता और शोषण की समाप्ति के लिए साम्यवाद की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है कि वह पूंजी और मुद्रा के परिचालन और व्यव्हार की निगरानी रखे  और उसे नयी विषमता की दिशा में न बढ़ने देने के लिए। एक सीमा तक अवरुद्ध रखे।
          अपनी इसी मुद्रा विरोधी निरुद्धात्मक आवश्यकता के कारण एक आदर्श साम्यवादी व्यवस्था एक नयी समस्या को जन्म देगी  जो मुद्रा के संसूचक भूमिका के निरस्त किए जाने से सम्बंधित होगी। इस तरह एक आदर्श साम्यवादी अवस्था आर्थिक मूल्यपरक संवादहीनता की स्थिति को भी जन्म देगी।  क्योंकि मुद्रा पूंजी व्यवहार की एक प्रतीकात्मक भाषा -व्यवस्था ही है। इस भाषा हीनता की प्रति पूर्ति के लिए एक समानतर सूचना -तंत्र निर्मित करना होगा। मुख्य समस्या होगी मानवीय आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं की उपलब्धता और आपूर्ति की।  यह नियमन कि  कोई  क्या  मांगे ,इसकी पात्रता एवं अर्हता का मुद्रा अधर भी समाप्त होने पर अलग कानून बनाकर या प्रशासनिक आदेश जारी कर नियमन करना होगा।
          इस तरह किसी भी साम्यवादी व्यवस्था की प्रमुख चुनौती यह भी होगी कि  वह अपनी व्यवस्था के भीतर पूंजी के स्वतन्त्र निर्बाध  विनिमय के प्रमुख स्थल बाजार को ,जिसे निश्चय   ही पूंजीवादी  नें पैदा और अपनी  आवश्यकता के अनुरूप विकसित किया  है ,उसे अपने भीतर  देगा  नहीं ?  

२. पूंजीवादी पर्यावरण की उपज महानगरों(महाबजारों )जैसी बड़ी संरचनाओं का साम्यवाद की परिकल्पना के अनुसार पुनर्विन्यास हेतु विसर्जन  ताकि आर्थिक  समानता का अधिक से अधिक पर्यावरण निर्मित किया जा सके। पूंजीवादी व्यवस्था में उपलब्ध  विविध उत्पादों में जो गुणात्मक विविधता है वे एक जटिल विषमता बोध का निर्माण करते हैं ,इसलिए समानता की अवधारण से उनपर पुनर्विचार करना होगा। 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

ज्ञानेन्द्रपति : स्त्री के पक्ष में पुरुष - विमर्श प्रस्तुत करती कविताएँ

राजनीति के वर्तमान सर्वग्रासी दौर में कवि और उसकी कविता से संवेदनात्मक-भावात्मक नेतत्त्व की प्रत्याशा करना आज असंभव-सा लगने लगा हो; लेकिन जिन कवियाें में अब भी कविकर्म की नेतृत्त्वकारी भूमिका के लिए समर्पित सृजनशीलता बची हुर्इ है,उनमें ज्ञानेन्द्रपति का नाम महत्त्वपूर्ण है । बदलते समय के अनुरूप वांछित संवेदनात्मक परिष्करण अथवा भावात्मक नेतृत्व की चैतन्यता का सृजनात्मक प्रयास ही कविकर्म को सार्थक ,प्रबुद्ध एवं अधतन बना सकते हें । निरन्तर विकसित होती सभ्यता के साथ कदमताल करते हुए और उससे कर्इ कदम आगे भी चलकर संवेदनात्मक नेतृत्व प्रदान करने वाली कविताएं ; जो कविता की सामाजिक जरूरत ,औचित्य ,आस्था और विश्वसनीयता को पुनर्जीवन देती हैं । हिन्दी में बहुत कम कवि ऐसे हैं जिनकी कविताएं तेजी से बदल रहे मानवीय समय में जीवन-राग,संवेदना और उसके निरन्तर जटिल होते पर्यावरण की दशा और दिशा की सही समझ प्रदर्षित करती हैं । वैश्वीकरण और बाजारवाद के वर्तमान दौर में कवि,कविता और कविकर्म के असितत्व के लिए सजग ज्ञानेन्द्रपति की कविताएं हिन्दी कविता की परम्परा में प्रबुद्ध एवं संवेदनशील कविता की एक विशिष्ट संरचना प्रस्तुत करने के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं । इसलिए भी कि उनकी कविताएं प्रगतिशीलता को केवल शोषित जन की पक्षधरता तक ही सीमित न करते हुए सभ्यता-विकास की वृहत्तर चुनौतियों और दायरे को भी अपने कविकर्म का लक्ष्य बनाती रही हैं ।
      ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के उन विरल कवियों मेें से एक हैं जिन्होंने समकालीन हिन्दी कविता को न सिर्फ विशिष्ट संरचना और कलात्मक पहचान दी है बलिक उत्तर-आधुनिक समय की मानवीय चुनौतियों का सामना करने तथा एक सभ्य और संवेदनशील मानवीय समाज की रचना के लिए कविता की सृजनशीलता को लोक की सृजनशीलता तक विस्तार दिया है । ज्ञानेन्द्रपति की कविताएं विकसित होती मानव-सभ्यता के साथ बदलती मानवीय संवेदना, आत्मीय रिश्तों के स्वरूप,सरोकारों ,जरूरतों एवं उसके पर्यावरण की सुरक्षा-संरक्षा की सही समझ रखती हैं । इस दृषिट से वे माक्र्सवादी पृष्ठभूमि से आए माक्र्सवादोत्तर उत्तर-आधुनिक समय के सबसे जरूरी एवं प्रासंगिक कवि हैं । उनकी कविताओं में यथार्थबोध के साथ-साथ काल-बोध भी एक आवश्यक आयाम है; संभवत: इसीलिए वे सिर्फ जीवनबोध के ही नहीं ,भविष्यबोध के भी कवि हैं । उनकी 'संशयात्मा जैसी पूर्ववर्ती संग्रह की कविताएं सोवियत संघ के पतन के बाद माक्र्सवादी एवं क्रानितकामी कवियों में फैली आम कुण्ठा एवं हताशा के विपरीत बेहतर समय-निर्माण की चुनौतियों को नेतत्वकारी विचारक चिन्ता के साथ गम्भीर विमर्श के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं । इसी क्रम में उनके नवीनतम कविता संग्रह 'मनु को बनाती  मनर्इ  की कविताएं भी सभ्यता-समीक्षा का स्त्री-केनिद्रत विमर्श प्रस्तुत करती हैं । इस संकलन की कविताएं जीवन के व्यापक निरीक्षण तथा विरल एवं विशिष्ट अनुभवों से बुनी गयी हैं । जीवन के सूक्ष्म निरीक्षण से उपजे कल्पना-वलयित आकर्षक शब्द-बिम्बों की छटा वाली ज्ञानेन्द्रपति की प्रिय अभिव्यकित पद्धति इस संकलन की कविताओं का भी विशिष्ट काव्यभाषा और अलग संरचना देती है । इन कविताओं में भारतीय स्त्री के जीवन-व्यापार और यथार्थ के विविध रूपों का सूक्ष्म एवं प्रामाणिक अंकन है । स्त्री जीवन के मर्म का समाजशास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक आयामों में किया गया विशेषज्ञ अन्वेषणत्मक अन्वीक्षण इन कविताओं को विशिष्ट बनाता है । कवि नें मिथकीय वृत्तान्तों ( जरत्कारू)से लेकर लोक और उसके पवोर्ं तक स्त्री-जीवन,यथार्थ और नियति की पड़ताल की है । यह पड़ताल पुनरावृत्ति के रूप में नहीं बलिक अदेखे-अचर्चित रह गए स्त्री-यथार्थ की शोधपूर्ण एवं विवार-संवेध समग्र प्रस्तुति के लिए महत्त्वपूर्ण है।
     स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्री और पुरुष दोनों ही रचनाकारों के कर्इ कविता संग्रह इधर प्रकाशित हुए और चर्र्चा में आए हैं । इस प्रतिस्पद्र्धा में ज्ञानेन्द्रपति की स्त्री केनिद्रत कविताओं का महाकाव्यात्मक समग्रता के दावे के साथ 'मनु को बनाती मनर्इ संग्रह का प्रकाशित होना स्त्री-विमर्श के पुरुष-पक्ष को समझनें की दृषिट से तो महत्वपूर्ण है ही,उसके कर्इ अछूते पहलुओं को भी पहली बार कविता और विमर्श के दायरे में लाता है । स्त्री पर विचार करते हुए ज्ञानेन्द्रपति का नजरिया त्रिकाल-आयामी है । अतीत की सामंतों और कवियों की खिदमत में खड़ी सित्रयों,आर्यासप्तशती और गाथा सप्तशती की साहितियक स्मृतियों से बाहर आकर वह अपनें युग की स्त्री का नया साक्षात्कार करना चाहता है । 
       ज्ञानेन्द्रपति की इस संग्रह की कविताओं में उपसिथत स्त्री-विमर्श न सिर्फ सिर्फ स्पस्थ,पूरक और संवादी पाठ की प्रस्तावना करता है ,बलिक हिन्दी में उच्च-अभिजातवर्गीय स्त्री-विमर्श की असामाजिकता एवं स्वैराचारी आत्मजीविता को श्रमजीवी वर्ग की सृजनशील समाजधर्मी स्त्री के यथार्थ से विस्थापित एवं प्रश्नांकित भी करता है । यह एक तथ्य हें कि मर्दवादी पुरुष-प्रधनता की मानसिकता वाला समाज अतीत की सामन्तकालीन परम्पराओं का ही अवशेष है । स्त्री की असुरक्षा का अधतन भयावह रूप सामन्ती अतीत वाले समाज के पूंजीवादी समाज में संक्रमण एवं विस्थापन से पैदा हुआ है । इस क्रम में प्राचीन श्रमजीवी  सृजनशील समुदाय की सित्रयां अधिक स्वतंत्रता एवं समानताजीवी रही हैं । ज्ञानेन्द्रपति का यह संग्रह अपनी बहुआयामी पड़ताल से भारतीय स्त्री -यथार्थ के कर्इ अछूते-अलक्षित पक्षों पर प्रकाश डालता है । यधपि प्रथम द्रष्टया ये कविताएं स्त्री-विमर्श के पुरुष-पक्ष को स्वस्थ सामाजिकता के दायरे में प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं । इस प्रस्तुति में स्त्री-विमर्श के प्रचलित पाठ से विचारक कवि ज्ञानेन्द्रपति की असहमति एवं आलोचना दोनों ही है । स्त्री-मुकित के विमर्श का पूंजीवादी पाठ स्त्री के निरंकुश विलास के अधिकार का अराजकता की सीमा तक वकालत करता है जबकि श्रमशील समाज की स्त्री में अब भी यथोचित सम्मान ,समानता एवं स्वाभिमान के साथ उपसिथत है ।       
         ज्ञानेन्द्रपति की ये कविताएं साहित्य की स्मृति और लोक की स्मृति दोानें के ही गहन परिचय,अन्तरंग आत्मीय साक्षात्कार का परिणाम हैं । सृजनशीलता का सम्यक इतिहास-बोध उनकी कविताओं को विशिष्ट परिप्रेक्ष्य और पृष्ष्ठभूमि देती हैं । वे असम्बद्ध,व्यकितपरक,अराजक या एकाकी नवता के कवि नहीं हैं । वे सम्पूर्ण वा³गमय की सापेक्षता में नवता,मौलिकता एवं विकास के कवि है । उन्होंनें स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की सहचर जीवनानुभूतियों एवं स्मृतियों का अत्यन्त विस्तृत एवं प्रामाणिक संग्रह इन कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है । इस संकलन की अधिकांश कविताएं सध:प्रसूत,क्षणिक या तरत्कालिक प्रतिकि्रयाओं के रूप में रचित नहीं हैं ;बलिक वे दीर्घकालिक चिन्तन एवं रचना-प्रक्रिया का परिणाम हैं। उनकी ये कविताएं प्रणय-संवेदनाओं एवं अनुभूतियों का उदाŸाीकरण करती हैं-'वे पर्वत वहां अभी भी हैं-'पृथ्वी के उठे हुए मंजु उरोज तथा 'वे प्रशान्त झीलें तुम्हारी और बड़ी हो आर्इ आंखों के भीतरप्रेम की चमक बन गयी हैं । ('पहाड़ से लौटकरकविता) इन कविताओं की परिकल्पना के पीछे कविता के कलात्मक सृजन-विकास की लम्बी परम्परा देखी जा सकती है-'फिर यह कोर्इ कविता हैमेरे रक्त का सरसिजदल खुल रहे हैं जिसके तुम्हारी ओरओ मेरे प्रभात !'पुरुषप्रिया जैसी कविताएं जीवन के उन अथोर्ं को भी पकड़नें का प्रयास करती हैं,जो जीवन क उच्चस्तरीय दार्शनिक प्रत्यक्षीकरण से ही संभव हो सकती है-'तुम्हीं हो आदिम प्रकृति-पुरुष-प्रियातुम्हारे उदर पर सर रखकर जब-जब मैंने मरना चाहा हैमेरी धमनियों में जीवन की गति तेज हो गयी है ।
        संंवेदित कल्पना की उन्मुक्त -उन्नत उड़ानें, मानवीय सरोकारों की प्रदुद्ध चेतस पड़ताल,कलात्मक अभिव्यकित एवं लयात्मक चिन्तन ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं को एक विरल पठनीयता देती है ।    ज्ञानेन्द्रपति एकल इकहरी संवेदना और लीवनानुभवों के कवि नहीं हैं ं। बया के घोंसले की तरह अपनी हर कविता को जीवन के विविधि अनुभव-सन्दभोर्ं से बुनते हैं । इस दृषिट से उनकी 'समय और तुम कविता की पंकितयां देखी जा सकती हैं ,जिसमें एक युवती के वय-वार्धक्य और अध-कपारी के दर्द के साथ कवि खनिज-समृद्ध दक्षिणी गोलाद्र्ध की उपमित चिन्ता से पाठकीय बोध को जोड़ देता है-'समय तुम्हारे सिर में भरता है समुद्र-सा उफन उठने वाला अधकपारी कादर्दकि तुम्हारा अधशीशदक्षिण गोलाद्र्ध हो धरती काखनिज-समृद्ध होते भी दरिद्र और संताप-ग्रस्त।
     इस संकलन की कर्इ कवितओं में विविध वर्गीय और बहुवर्णीय स्त्री-जीवन के चित्र अंकित है । दीवाली बे-दीया,एक गंगामुखी जीवन,'ग्वालम्मा से दूध मांगने गर्इ है, 'अंजोरिया, 'मालती , 'पडोस की धोबिन,'बाटी वाली तार्इ'दशाश्वमेध पर की रुकमिनिया,'टेर,'मस्तीपुर की दुखिया,'मीनू जी आदि । 'ओ मेरी धरती जैसी कविताएं स्त्री-जीवन की अर्थवत्ता का उदात्त बिम्बांकन प्रस्तुत करती हैं । यह कविता जीवन और धरती के बीच के भ्रवनात्मक रिश्ते को मां और शिशु के वत्सल सम्बन्ध के रूप में परिभाषित करती है । 'हर पल किसी की प्रतीक्षा थी कविता उस सहचर के स्मरण को समर्पित है ,जिसके बिना जीवन को थका देने और घबरा देने वाली यात्रा पूरी नहीं की जा सकती । 'तुम्हारी आवाज की खनक में कविता रसोंर्इ को सिर्फ भूख के पोषण के केन्द्र में ही नहीं ,बलिक प्रेम के पोषण के केन्द्र के रूप में प्रत्यक्षीकरण करती है । 'चूडि़यां कविता में कवि चूडि़यों का जीवन-रंगी साक्षात्कार करता है । उसके अनुसार' चूडि़यों में रंगकेवल चूड़ी के कारखाने से ही नहीं आता है ।
            'मेरे तट जैसी कविताएं स्त्री के प्रति पुरुष-मन के समर्पण और राग का नया वृत्त-चित्र प्रस्तुत करती हैं । यधपि यह दौर स्त्री के प्रति अत्यन्त ही क्रूर एवं बर्बर रूप में हिंसक है । जिस तरह धरती से उसका पर्यावरण छीना जा रहा है ,उसी तरह स्त्री से उसका घर छीना जा रहा है । कवि ज्ञानेन्द्रपति नें कविता में ही सही उस मानवीय पर्यावरण को बचानें और उसे वापस लौटानें की कोशिश की है । ये कविताएं एक स्त्री-विरोधी समय में हिंसक होते पुरुष मन को एक मर्मस्पर्शी संवेदनात्मक स्मृति देना चाहती हैं । ये न भूलने योग्य स्त्री-जीवन के प्रसंगों तक पाठकों को ले जाना चाहती हैं । पुरुष-सभ्यता की सारी चकाचौंध को अपनी दुहरी पीठ पर उठाए सकून और असीस बांटती सित्रयां हैं । उनका कृतज्ञ पुरुष-मन स्त्री असितत्व का साक्षात्कार अपनी आत्मा के नंगे तलवों के लिए सुकोमल जूते सिलने वाली मोचिन एवं रफूगर जादूगर ( पुरुष को रचने वाले ) रचनाकार के रूप में करता है ।
        ज्ञानेन्द्रपति की रचनात्मक प्रतिभा जीवन के अनुभवों को कविता की भाषा में किस प्रकार रूपान्तरित करती है ,इसे देखना है तो उनकी 'पड़ोस की धोबिन शीर्षक कविता को देखा जा सकता है। धोबिन का निजी जीवन और पेशेगत सामाजिक कर्म से जुड़ी प्रत्यक्ष असितत्वगत संवेदनाओं को कवि नें पूरी प्रभावशीलता के साथ चित्रित करते हुए उसके जीवन के प्रसंगों को ही नर्इ उदभावनाओं वाले काव्य-उपकरणें में बदल दिया है । कपड़े की सिलवटें और भाग्य की सिलवटें दोनों को ही सृजन के लौह-ताप से हल किया जा सकता है । अन्त तक पहुचते-पहुंचते कवि नें अपनें संकेत को अस्पष्ट ही रहनें दिया है कि शिशु और मां के स्तन में से कौन इश्तरी की भूमिका में है ! कि दोनों में से कौन किसकी सिलवटें मिटा रहा है । वात्सल्य एवं मातत्व की दुहरी-तिहरी परतें कभी शिशु-कपोल का डिठौना बनते तो कभी 'भैंहों के बीच बिन्दी भर का चुम्बन बनकर उसे अभवों में भी जीवन जीने का रस और अर्थ प्रदान करती रहती है ।
         संकलन की 'जाने कहां  कविता का काव्यात्मक सौन्दर्य पेड़ पर रहने वाली गिलहरी और फलैट में रहने वाली लड़की की भावपूर्ण विडम्बनात्मक तुलना में है । 'स्वाद  कविता श्रम की सामाजिकता को सुख का आधार घोषित करती है । 'आवाज कविता स्त्री-असन्तोष और विद्रोह की चेतना को धुंएं के रूपक के माध्यम से व्यक्त करती है । 'विलाप कविता विलाप को 'सोग के राग के रूप में दार्शनिक प्रत्यक्षीकरण करती है । 'मस्तीपुर की दुखिया कविता पुत्र-शोक के बावजूद आजीविका के लिएदारु बेचने को विवश एक निम्नवर्गीय युवती का मार्मिक काव्य-चित्र है । 'गूंजता रहता है कविता यौन सेविकाओं की आन्तरिक रिक्तता और प्रेमहीन काम-व्यापार का अत्यन्त ही शिष्ट एवं शालीन काव्यांकन है । संवासिनी काण्ड कविता अखवारों में सुर्खियां बटोर चुकी ,राजकीय संरक्षण गृह में यौन शोषण का कुकृत्य करते सामाजिक अपराधियों पर लिखी गयी एक प्रतिरोध कविता है -'वह संरक्षण-गृह जो वस्तुत: स्त्रीत्व की वधशाला थी ....सब कुछ हमारी गूंगी आंखें के सामनें सम्पन्न हुआ था होता रहा थाहम देखते रहे थे चील-झपटटे स्लोमोशन में  ।'एक उन्मुक्त हंसी  कविता स्त्री के उन्मुक्त हंसी हंसने के अधिकार को नैतिक समर्थन समाज की विरोधी मानसिकता की पृष्ठभूमि में करती है । स्वकीया या एकान्त समर्पित प्रेम-व्यवहार की अत्यन्त आकर्षक झांकी 'पीठ की हंसी  कविता में है । 'थनैली परम्परागत ज्ञान से विचिछन्न एक आधुनिका के बहानें थनैली नाम की एक जड़ी के गुणधर्म का काव्यात्मक संरक्षण है । 'एक धुंधली तस्वीर कपिता तस्वीरों में संरक्षित समय और वास्तविक जीवन-समय के अन्तर के त्रासदी-बोध का अंकन है । प्रबुद्ध युवतियों की आत्महंता मौत का प्रश्न 'मरक्युरिक क्लोराइड से दिल्ली वि.वि. में तीसरी आत्महत्या के बाद शीर्षक कविता उठाती है ।
     'प्रगम,'तीरेनीमकश,आम मंजरियों  की गन्ध,अमृत कुम्भ, अधरामृत  वृत्त, मैं तुम्हारी कविता हूं,खिले आ रहे हैं,अंगूरी पेठे -सी ,जैसी कविताएं प्रणय की मन:सिथतियों के चित्र प्रस्तुत करती हैं ।सारे पुरुष-अहंकार के बावजूद स्त्री के प्रति समर्पित यौनिकता पुरुष-मन को निरीह,विनमं एवं आग्रहशील बनाती है । ज्ञानेन्द्रपति की कर्इ कविताएं स्वस्थ प्रेम के सामाजिक पक्ष को काव्यांकित करती है । स्त्री के प्रति समर्पित पुरुष-प्रेम का यह चरित्र उस स्त्री पर बल-प्रयोग करने वाले उस आपराधिक पुरुष-चरित्र की विरोधी है । 'टेर कविता काशीवास कर रही बूढ़ी विधवाओं के ऊपर लिखा गया एक सम्पूर्ण काव्य-पिेर्ताज है । आर्थिक हितों को जीनें वाली संवेदन और आस्थाविहीन आधुनिकता किसप्रकार विधवाश्रम जैसी सांस्कृतिक आर्थिक संस्थाओं का व्यावसायिक रूपान्तरण कर रहा है,इसका प्रामाणिक वृत्तान्त यह कविता प्रस्तुत करती है । विधवाओं के नाम पर बनी अतीत की शानदार संस्था के कर्ता-धर्ता होटल-संचालन कर रहे हैं । यह लम्बी कविता एक अप्रत्याषित एवं गम्भीर मोड़ लेती है अपने समय के एक वर्ग की प्रतिगामी मानसिकता और अतीतमोह का सामाजिक-राजनीतिक पुन:पाठ प्रस्तुत करती हुर्इ । बीते हुए समय के न बीतने देने के व्यापक सामुदायिक स्वार्थ एवं निहितार्थ हैं-वे बीते हुए समय की चौकीदारी करते हैंउसका पूजन-अर्चन वंदन-अभिनंदंनवह सत्ता का चौरा है उनको ।  यह कविता वाराणसी में बाल-विधवाओं पर बन रही दीपा मेहता के फिल्मी सेट का विद्रूपण के आरोप के साथ ध्वंस करने वाले वर्ग-विशेष का साहितियक प्रतिरोध रचती है ।
      इस संग्रह में असावधन एवं नासमझ स्त्री -जीवन के लिए चेतावनी का बोध सम्प्रेषित करने वाली कविताएं भी हैं । 'सुखदेवी का दुखान्त शीर्षक कविता प्रणय-प्रवंचकों के विरुद्ध लिखी एंसी ही एक चेतावनी कविता है । कविता एक युवा पड़ोसी के साथ भागी हुर्इ इक्कीस वर्षीया युवती की हत्या और बर्बर लूट का प्रभावी काव्यांकन करती है । 'अर्ज किया है  जैसी कविता असितत्व की प्रभावशीलता का अंकन करती है तो 'प्रगम जैसी कविता का व्ैशिष्टय लैंगिक सम्मान और आत्मीयताबोधक भाषा के सूक्ष्म व्यवहार में है । इसी तरह 'कार्इ के समान लग जाओ (तुम मेरी छाती से) जैसी कविता और 'तुम्हारे बिन दिन पहाड़ हुआ तुम्हारे बिना घर तिहाड़ हुआ जैसी पंकितयों में कवि के नए उपमानों की प्रयोगशीलता देखी जा सकती है । 'तुम भविष्य की तरह कविता में प्रणय का भावांकन दार्शनिक प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से किया गया है-'तुम भविष्य की तरह मेरे आगे फैली होऔर मैं वर्तमान की तरह तुम्हें खोल रहा हूं-तुम मेरा दिवास्वप्न हो! इसी तरह 'अमृत-कुम्भ और 'अधरामृत जैसी कविताओं का वैशिष्टय स्त्री और वुरुष के बीच के नैसर्गिक आकर्षण के श्लील और शिष्ट साक्षात्कार की प्रस्तावना में है । थनैली कविता परम्परागत ज्ञान से विचिछन्न एक आधुनिका के बहानें थनैली नाम की एक जड़ी के गुण-धर्म का काव्यात्मक संरक्षण है ।'एक धुंधली तस्वीर कविता तस्वीरों में संरक्षित समय और वास्तविक जीवन-समय के अन्तर के त्रासदी-बोध का अंकन है । स्त्री और पुरुष का जीवन एक-दूसरे से प्रभावित होता और करता हुआ ,सिर्फ एक -दूसरे सेजुड़ता और एक-दूसरे को जीता ही नहीं,बलिक उसे बदलता भी है -'मैं तुम्हारी कविता हूं....मेरे शब्द बदल दोअपनें जीवनानुभव जोड़ो ।
    ' वह दिन कविता प्रेम की अविस्मरण्ीयता का अंकन उस क्षण के सम्पूर्ण परिदृश्य के स्मृति-अंकन द्वारा करती है । कवि के लिए प्रेम सृजन की प्रस्तावना है -'एक उत्कणिठत कोपल मेंजिस तरह पारदर्शी हो जाता है हरीतिमा का रहस्यउस दिन मेंझलक उठा था जीवन का रहस्य। 'तुम्हारे मौन में कविता वर्जना-मुक्त गगन में उड़ान की स्त्री की आकांक्षा को चिडि़या का रूपक एवं प्रतीकांकन देती है -'मैंने कहा : तुम्हें येचिडि़याएं देता हूं। नारी-मन की मुकित आकांक्षओं की ऐसी ही अभिव्याकित 'चिडि़यों के बीच कविता में भी की गर्इ है । यह कविता इस निष्कर्ष के साथ समाप्त होती है कि स्त्री को पीछे छोड़ने पर पुरुष का जीवन रात बन जाता है । स्त्रीविहीन पुरुष का न तो स्वस्थ वर्तमान है और न ही भविष्य ।
       स्ंकलन का उत्तराद्र्ध समानधर्मी मूल्यों वाले सहजीवी स्त्री और पुरुष जीवन का आदर्शात्मक दृष्टान्त प्रस्तुत करती हैं । ये दृष्टान्त वास्तविक जीवन के दीर्घकालिक सूक्ष्म-निरीक्षण के परिणाम होने के कारण कल्पना-लोक का नहीं बलिक जीवन-लोक का ही प्रतिमान प्रस्तुत करते हैं । संकलन की 'पाणि-ग्रहण,संकल्प-पत्र,'टेढ़े चिबुक वालानन्हा आम,'वह तुम हो,'दृश्य वह अनुपम,'गेहूं'लता एक निफूली,'एक भंगेड़ी कवि की संगिनी का आत्मवक्तव्य आदि ऐसी ही गृहस्थ एवं सहचर जीवन-छवियों से निर्मित कविताएं हैं । ये कविताएं स्त्री और पुरुष के पूरक सह-असितत्व की दार्शनिक प्रस्तावना करती हैं । कवि का संकेत स्पष्ट है । वह प्रतिक्रियावादी और नकारात्मक स्वातं़य वाले अस्वस्थ स्त्री-विमर्श के पक्ष में नहीं है । कवि की परिकल्पना का आधार शोषणरहित सामाजिकता में उपसिथत आवयविक स्त्री जीवन है । ये कविताएं त्रासद पुरुष-सत्ता के निषेध का तो समर्थन तो करती ही हैं ,उसे स्त्री-जीवन के उल्लास और विस्तार के अवसर के रूप में होनें की प्रस्तावना भी करती हैं । इस दृषिट से ' मैं एक पेड़ हूं  कविता देखी जा सकती है। इस कविता के माध्यम से कवि पुरुष-सत्ता के ऐसे रूपान्तरण की कामना करता है जिसमें स्त्री किसी गिलहरी के समान जड़ों से शुरू होकर फुनगी के करीब तक उल्लास-रोमांचित दौड़ती जाए ।
           दरअसल आदिम कृषि और शिकार-आधारित सभ्यता में और आज की स्त्री सम्बन्धी हमारी मानसिकता का आधार सामन्ती युग के जीवन-मूल्य हैं,जब बाहुबल और युद्ध ही जीवन केसुख और सुरक्षा निर्धारित करते थे;जबकि वर्तमान सभ्यता बौद्धिक शकित और सम्पदा आधारित यानि आर्थिक सभ्यता की है।  इसमें स्त्री को भी शकित-केन्द्र के रूप में स्थापित होनें की गुंजाइश बनी है । समझदारी के इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के अभाव में स्त्री-विमर्श का युगानुरूप् स्वस्थ और सही पाठ निर्धारित नहीं किया जा सकता । युगबोध के अभाव में अधिकांश स्त्री-विमर्श असामाजिक विमर्श बनकर रह गए हैं । साहित्य में ता स्त्री-पक्ष की यौन-उत्तेजनाओं एवं व्यवहार की वर्जनारहित उन्मुक्त अभिव्यकित को विमर्श की साहसिक एवं क्रानितकारीअभिव्यकित मान लिया गया है । जबकि सच्चार्इ यह है कि प्रेम की अपनी जड़ता होती है और वह स्त्री या पुरुष को सामान्य से विशेष की ओर ले जाता है । व्यकित-विशेष का चयन और विशिष्टता बोध ही प्रेम को भी विशिष्ट सामाजिक व्यवहार बनाता है । इसके विपरीत बाजारवादी शकितयां परिवार और समाज विद्रोही निरंकुश-अराजक व्यकितवाद की दिशा में स्त्री-स्वातंत्रय को हवा दे रही हैं । जिसका उददेश्य बाजार में बिकाऊ माल के रूप में स्त्री की अधिक से अधिक उपलब्धता सुनिशिचत कराना है । ज्ञानेन्द्रपति की कविताएं स्पष्ट रूप में इस असामाजिक स्त्रीवादी सोच का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती हैं । उत्तराद्र्ध की अनेक कविताओं में स्त्री-जीवन को उसके सामाजिक आर्थिक ताने-बाने के बिम्बों-छवियों के साथ वे प्रस्तुत करते हैं । उनकी कतिएं इस तथ्य की अनदेखी नहीं करती कि परिवार सामाजिकता के निर्माण की प्राथमिक र्इकार्इ हैं । इसीलिए परिवार बसाना और प्रेम में पड़ना अकेले जीने की स्वतंत्रता का निषेध और परस्पर का समर्पण मांगती है । अविवाहित ब्रहमचारी हो या अपराधी दोनों की ही स्त्री-विरोधी स्वतंत्रता जैसे असामाजिक होती है ,कुछ वैसी ही व्यकितवादी स्वतंत्रता की जीवी स्त्री की भी होगी । इस दृषिटकोण से देखें तो प्रतिक्रियाादी स्त्री-विमर्श भी अपनी असामाजिक परिवार-विरोधी स्वतंत्रता के कारण मानवता-विरोधी होगा । संग्रह की कर्इ कविताएं पुरुष के जीवन में स्त्री की भूमिका और प्रभाव को परिभाषित करती हैं। स्त्री को अधिक जगह देने के आकांक्षी कवि ज्ञानेन्द्रपति की इन कविताओं को स्त्री के पक्ष में आधुनिक पुरुष-मन के रूपान्तरण की काव्यात्मक प्रस्तावना के रूप में देखा जा सकता है । आधी आबादी के यथार्थ ,जीवन और नियति को ही काव्य-विषय बनाने के बावजूद कथ्य के स्तर पर इनकविताओं में दुहराव नहीं है । यधपि अपनी रचना-प्रक्रिया में ये कविताएं जीवन की स्मृति और साहित्य की स्मृति दोनों की ओर ही बार-बार वापस लौटती हैं । इस मानसिक यात्रा में ही ज्ञानेन्द्रपति युगानुरूप् संवेदना की पुनर्रचना और पुन:पाठ रचते हैं । स्त्री के प्रति वांछित पुरुष-व्यवहार और मानसिकता के प्रतिमान की प्रस्तावना करते हैं । स्त्री केनिद्रत महाकाव्यात्मक आवयविकता तथा पूरक आयाम वाली इन कविताओं को कवि सृजित आदर्श साहितियक स्मृति तथा स्त्री विषयक स्वस्थ विमर्श की प्रस्तावना के रूप में देखा जा सकता है ।ं 
           समीक्षित पुस्तक-     'मनु को बनाती मनर्इ(कविता-संगह)
                    कवि-    ज्ञानेन्द्रपति
           प्रकाशक-  किताबघर प्रकाशन, 48555624,अंसारी रोड,दरिया गंज, नर्इ दिल्ली -110002
                प्रथम संस्करण-2013 मूल्य-250