बुधवार, 30 अप्रैल 2025

होना,सभी के साथ और सृष्टि-बीज !

 होना,सभी के साथ होना और सृष्टि-बीज !




मैं सच ही नहीं जानता
कि मैं कौन हूँ! 
सिर्फ पिता के पिता का साक्षात्कार 
किया है मैने
मुझे बताया गया है कि
इस जीवन-जन्म यात्रा का महत्तर और वृहत्तर जनक
मेरे पिता नहीं कोई  और है-
चाहे उसे ईश्वर कहें या प्रकृति.....

वैज्ञानिक 
सृजन और विकास की एक लंबी यात्रा में
जीवन का होना  देखते हैं..  
कि यहाँ कोई भी किसी दूसरे जैसा नहीं है
वैज्ञानिक जीवन के रहस्यों की खोज करते हुए 
रसायनों के विशिष्ट संयोजन से बनें जीन तक पहुँच गए  हैं
यानी कि हर जीवन की निर्मित के आधार विशेष जीवन-सूत्र 
जो हर होने की गणितीय विशिष्टता और  अमरता की पुष्टि करते हैं

यहां अलग-अलग वर्णौ से मिलकर बने हुए 
अलग-अलग भिन्न अर्थ- बोध वाले शब्दों की तरह
हर जीवन एक अलग संयोजन और अलग जीन-शब्द है
गणित का एक निश्चित अंक है
और नियत जीन-संयोजन के बाद 
हर अस्तित्व का सैद्धांतिक पुनर्नियोजन संभव है 
लगभग चौंकाते  हुए पुनर्जन्म की तरह !

यद्यपि मेरी संस्कृति का परम्परागत विवेक
जो आत्मा की अमरता के साथ 
सृजन के अनुवर्तन में  विश्वास करता है 
उसके अनुसार तो  अनश्वर आत्मा ही
वह प्रलयकालीन जीवन-बीज हो सकता है
जिसकी संरचनात्मक स्मृति ही
अमूर्त ऊर्जा को मूर्त भौतिक जीवन में 
रूपान्तरित अभिव्यक्ति का 
एक  नयी जीवन-सृष्टि का आधार बनती है !

आत्मा यानी कि मृत्यु के बाद  भी अस्तित्वमान
जीवन-विद्युत की वह आवेश-रूप-सचेतन ऊर्जा 
जिनमें दर्ज रहते  है 
जीवन की संरचनात्मक विशेषताओं के प्रभावी गुणसूत्र 
जो किसी साफ्टवेयर की तरह जीवन-विशेष की 
ब्रह्मांडीय स्मृति को संरक्षित और सुरक्षित  करतेः है !

मैं अपने और इस दुनिया के होने को लेकर 
इतना जरूर जानता हूँ 
कि हममें से कोई सामान्य ,साधारण या उपेक्षणीय नहीं है
सभी को ब्रह्मांड की समस्त संभावनाओं  ने मिलकर रचा है 
मेरे पिता के पिता की जीवन-श्रृंखला के आदिम पूर्वज पितामह और माता की माता की जीवन-श्रृंखला की
आदिम पूर्वज नानीमही को भी 

यहां तक कि अरबों वर्षों के सृजन-विकास के उत्तराधिकारी
अपने पालित कुत्ता,अपनी गाय और अपने गुलाब को भी 
जिनका होना  मुझे उतना ही रोमांचित और चकित  करता है 
जितना कि अपना ....

मैं वास्तव में नहीं जानता
कि मैं कौन हूँ 
लेकिन जो भी हूँ 
सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधि और उत्तराधिकारी हूँ 
सिर्फ अकेले-अकेले ही नहीं
अकेले में भी सभी के साथ 
सभी की ओर से हूँ  !

22/08/2024

हारना

 हारना 


एक दुःख यह होता है 
जब  स्वयं तुम हारते हो
इस सच के बावजूद कि
किसी का भी हारना
उसका सिर्फ अकेले का ही हारना नहीं होता !

उससे भी बड़ा 
दूसरा दुःख वह होता है 
कि तुम्हारा कोई अपना हारता है 
और तुम उसे सिर्फ देखते रहने के लिए 
विवश होते हो
कुछ कर ही नहीं पाते !
अपनी सामर्थ्य के कम पड़ जाने के 
पराजित अहसास के साथ 
मलते हुए हाथ.....

वैसे तो मैं 
एक सफल और सुखी प्राणी ही कहा जाऊंगा 
लेकिन मेरी असफलता 
मेरा अभिशाप यह है कि 
मुझे अपनों की चतुर्दिक हार में विचलित 
दुःखी और बेचैन कर रखा है।

@रामप्रकाश कुशवाहा 
03/01/2025

भविष्य-दर्शन

 भविष्य-दर्शन 


फरिश्ते बुरी तरह बदहवास थे 
वे पिछड़ गए थे -विनाशकारी संदेश की 
एक ही किताब और एक ही निर्देश को 
पढ़ते-दुहराते-याद करते हुए 
बुरी तरह पक गए थे 
दौड़ते-दौड़ते, झुके-झुके थक गए थे 

लोगों को  सुधारने के लिए 
सिर्फ एक ही धमकी थी  उनके पास 
अब भी  सुधर जाओ 
अन्यथा विनाश करा दूँगा 

फरिश्ते आपस में बहस कर रहे थे 
मनुष्यों  को आपस में लड़ाने की अपनी योजना पर 
बहुत ईमानदारी से काम कर रहे थे 

एकत्रित फरिश्ते कूटनीतिक अधिक थे 
दिल के साफ कम 
सारे फरिश्ते बलि प्रथा के जमाने के थे 
आदि काल से शेरों और मगरमत्स्यों के द्वारा 
मारे गए घासाहारी जानवरों की 
जीवन-उर्जा चुरा कर पलते  रहे थे

लेकिन इंसानों ने जब मार डाले शेर 
अनियंत्रित और असुरक्षित जंगल खत्म हो गए 
दूर-दूर तक फैल गए रेगिस्तान 
तो उन सबने इंसानों को ही शिकारी बनाकर 
निर्बाध जीवन-ऊर्जा की आपूर्तिकर्ता बनाने की सोची  
एक बधिक समुदाय बनाने की योजना पर भी काम किया 

सिर्फ यहीं तक सपने में फरिश्ते नें मुझे बताया ही था 
कि कहीं युद्ध शुरू हो जाने और 
कहीं दंगे भड़क जाने की खबर आयी 
फिर फरिश्तों ने आपस में बात की 
अलग-अलग दिशाओं में 
मारे गए लोगों की जीवन-ऊर्जा लूटने भागे....

यह कोई काल्पनिक और मनगढ़ंत सपना नहीं है 
जिस किसी को इसके सच होने पर संदेह हो 
झूठ पकड़ने वालीं मशीन पर 
मेरे मस्तिष्क की वैज्ञानिक जांच करवा ले. 

@रामप्रकाश कुशवाहा 
13/04/2025

ईश्वर-समाज

 ईश्वर-समाज

समाज ईश्वर की तरह और
ईश्वर समाज की तरह व्यावहार करता है
कभी ईश्वर के नाम पर समाज  गल्तियां करता है
कभी समाज  की गल्तियों के लिए
ईश्वर बदनाम होता है
उसके नाम पर हिलता है जो हर पत्ता
हिला हर पत्ता उसी के नाम होता है

दुनिया की हर सत्ता, उसका शासन और संविधान
ईश्वर के होने की नकल है
निरंकुश सत्ता में  ईश्वर होने की अक्ल चाहे न हो
उसके अधिकारों की निरंंकुुश और आपराधिक मुद्राएं
सत्ता के ईश्वर होने का स्वांग और दखल है
इसलिए उसकी सम्प्रभुता कोई बीता हुआ कल नहीं
अभी-अभी गुजरता हुआ आज और
आने वाला कल है ....

इस तरह दुनिया के सारे नास्तिक झूठे हैं
क्योंकि दुनिया की सारी सरकारें
ईश्वर के राज्य का छद्म पुरावशेष हैं
वे सिर्फ कहनें के लिए देश हैं
वे स्वयं को धर्म निरपेक्ष कहें या नास्तिक
उनके सारे मुखौटे,मुद्राएं,क्रियाएं  और व्यवहार
सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही अनुकरण और वेश है

क्योंकि ईश्वर अपनी अवधारणा में किसी के प्रति भी
जवाबदेह नहीं है
इसीलिए दुनिया की सारी सत्ताएं
भ्रष्ट,गैरजिम्मेदार और अपने हत्यारेपन का लुत्फ उठाती है
जैसाकि चीन ,कोरिया,रूस,इजराइल और ईरान में है ....

26/08/2024

अकेलेपन की साधना और सामूहिकता

अकेले पन और अलगाव की साधना

अकेले होने और अलगाव की
एकाकी साधना उचित नहीं है
फिर भी भीड़ के भगदड़ में
कभी भी बदल जाने की आशंकाओं को देखते हुए
उसके दुष्प्रभावों से बचने के लिए
जागना और बचकर भागना जरूरी है
रोमांच के बावजूद
उचित दूरी बनाए रखना
सुरक्षित बचे रहने की मजबूरी है !

सबसे अच्छा यह है कि
विवेक की स्वतंत्रता के साथ
अच्छी क्रियाओं और कार्यों में जीवन बीते
पिछली पीढ़ियों से बहुत कुछ लिया और पाया है तो
अगली पीढ़ियों को भी बहुत कुछ देने और बांटने से न चूकें  !

सामूहिकता में विलय और विसर्जन
जीवन का लक्ष्य हो
लेकिन वह भेड़ियाधसान
यानी विवेक रहित भीड़ की अंधी अनुगामिता के रूप में न हो
तो ही अच्छा !

18/12/2024

गुरुवार, 30 मई 2024

ईश्वर -1



किसी अलग वाले ईश्वर का होना  मानने में एक दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक किस्म की बाधा मुझे दिखती है । ईश्वर की (एकेश्वरवादी ) अवधारणा में सह- अस्तित्व की गुंजाइश नहीं है । जैसे ही आप ईश्वर के होने को स्वीकार करेंगे अपने होने की गौणता को भी स्वीकार करना पड़ेगा  । यही कारण है कि अस्तित्व का चरमोत्कर्ष  या तो नास्तिक तानाशाहों में दीख पड़ता है या फिर ऐसे आस्तिकों में जो स्वयं को ही ईश्वर समझते रहे । ध्यान से देखें तो राम कृष्ण और बुद्ध किसी को भी किसी दूसरे  ईश्वर की आराधना करते नहीं  दिखाया गया है । दरअसल शत-प्रतिशत जिम्मेदारी या आत्मनिर्भरता पूर्ण स्वावलंबन के बिना आ ही नहीं सकती । यह स्थिति किसी नास्तिक में हो सकती है या फिर  किसी नास्तिक सदृश आस्तिक में ।
       अब इस टिप्पणी पर सरल रूप में विचार करते हैं । भारतीय धार्मिक संस्कृति में बहुदेशीय, अद्वैतवाद, अनेकांतवाद  तथा प्रकृति पूजा  जो वेद काल से ही देखने को मिलती है - लोक परम्परा और धार्मिक पर्वों में गुंथे हुए से हैं । वर्ण -विभाजन , कार्य तथा कर्तव्य-विभाजन के कारण व्यवहार में धार्मिकता के  अलग-अलग स्वरूप  सामने आते हैं । सबसे अधिक मानने वाले  अनुयायी  मानसिकता को जीने वाले भक्ति संप्रदाय के हैं ।पुरोहितों  की पूजा-पद्धति इसी समर्पणवादी आस्था  का नेतृत्व करती है । यहां मैने सजग रूपसे पुरोहितों के लिए  ब्राह्मण  शब्द का प्रयोग नहीं किया है । ब्रह्म  और ब्राह्मण की अवधारणा का संबंध औपनिषदिक दर्शन से है ।  योग  और आध्यात्म  सहित उन्नत जीवन पद्धति को लेकर सुव्यवस्थित चिंतन भी इसके पास है । श्रमण संस्कृति से लेकर बौद्ध ,जैन और सांख्य  सभी के पास अपनी आध्यात्मिक जीवन और विचार की सैद्धांतिकी है । इसमें मध्यकाल के संत मत आन्दोलन को भी शामिल किया जा सकता है । 
      पुरोहित धर्म कर्म के स्थान पर याचना, प्रार्थना , स्तुति,प्रशंसा  ,कृपा, और  करुणा  आदि को महत्व  देते हैं ।  एक अनुशासित विनम्र नागरिक समाज  के प्रवृत्ति-निर्माण और पोषण में इस आराधना पद्धति का भी महत्व है । यह विरोध के स्थान पर  सहयोग,अनुकूलन और सामंजस्य  पर आधारित सांस्कृतिक समाज निर्मित कलता है । इस संस्कृति का नकारात्मक पक्ष यह है कि यह एक रीढविहीन समाज का निर्माण करता है । इसी संस्कृति के कारण भारत हजार वर्ष से गुलाम रहा ।  यह समाज परिस्थितियों को ईश्वर की इच्छा मानकर उसे बदलने का प्रयास नहीं करता । पुरोहित धार्मिक संस्कारों के प्रबल -प्रभाव के कारण ही भारतीय धार्मिक संस्कृति स्वाभिमान विरोधी और समर्पणवादी अनुयायी अर्थात प्रजा का निर्माण करती है । समाज और परिस्थितियां जैसी हैं उसे वैसे ही स्वीकार करने को कहती हैं । कंप्यूटर की भाषा में कहें तो यह एक नकारात्मक एवं हानिप्रद सांस्कृतिक साफ्टवेयर  से संचालित सभ्यता का निर्माण करती है ।  धर्म  और ईश्वर से रिश्ते के ऐसे ही  बदलावों की संस्तुति है -"मैने अपना ईश्वर बदल दिया है "कृति । इस विनम्र स्वीकार के साथ  कि हमारी धार्मिक अपर्याप्तता पर बहुत से प्रश्न आधुनिकता और विज्ञान नें लगाए हैं तो शिक्षा के व्यापक प्रसार के कारण  लोकतंत्र का मूल आधार समानतापूरण व्यवहार की मांग करती राजनीतिक चेतना नें भी । जब दास्य भाव की भक्ति और उसकी अपरिहार्य हीनता ग्रन्थि अनावश्यक लगने लगी है ।
           पुरोहिताई परम्परा में सिर्फ क्रोधी ॠषि परशुराम का स्वभाव  ही इसका अपवाद है -वह भी इसलिए कि वे सामंती शासकों के उत्पीड़न को न्याय की प्रतीक्षा में ईश्वर के हवाले नहीं कर सकते थे । उनमें प्रतिशोध का जो स्वावलंबन है वही उन्हें अवतार कोटि में प्रतिष्ठित कराता है ।

      वैसे दूसरी ओर देखें तो जीन के स्तर पर सबको संरचनात्मक निजता,मौलिकता और विशिष्टता प्राप्त है । ईश्वर की भूमिका वाला यानी उत्पादक-स्रष्टा ईश्वर का होना भी किसी दूसरे के होने की तरह ही होगा । यद्यपि वह भी इसी प्रकृति के पूर्व में बीत चुके भिन्न सृजन-काल में घटा है । जैसे हम अपने बचपन को इसी देह में वापस नहीं पा सकते वैसे ही प्रकृति के शैशवकाल को भी । यदि प्रयोगशाला में मनुष्य न दुहरा पाया तो । हम भी तो सृष्टि के उत्पाद ही ठहरे । वैसे सैद्धांतिक सुविधा के लिए उसे एक ऐसे अति बुद्धिमान मस्तिष्क के रूप में देखा जा सकता है  जिससे हम मिले न हों लेकिन वह कहीं हो सकता है । 
       


सोमवार, 15 अप्रैल 2024

'हे राम !' : (रामकथा का एक बचा हुआ समकालिक पाठ....)

 'हे राम !' :

(रामकथा का एक बचा हुआ समकालिक पाठ....)

मनुष्य का वास्तविक आत्म बहुत घटिया है
जो वह है और जो वह होना चाहता है
जो उसे होना चाहिए
और जो वह हो सकता है
और परिस्थितिजन्य समीकरणों के बीच
जो उसे होने दिया गया
बहुत सोच प्रस्तर-स्तर उसके होने का चक्रव्यूह रचते हैं

दर्द की एक तेज लहर है -
हे राम !
एक सार्वकालिक सांत्वना है
कि तुमसे भी बुरा जीकर
इस धरती से चला गया है कोई!

कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ घटा
वह तो कुछ भी नहीं है भाई !
कि जो सारी दुनिया को अपना मानकर चाहता हो
उसको भी न चाहने वाले
उसके घर में ही बैठे मिल सकते हैं ।

उसे दिया गया था देश-निकाला
चौदह वर्ष तक सारी बस्तियां छोड़कर
जनशून्य वन-कान्तारों में रहने और भटकने की सजा
या फिर कोई साजिश भी हो सकती थी-
कैकेय नरेश की
रावण के साथ की गयी गुपचुप दुरभिसंधि
अपने भांजे भरत को
निष्कंटक अयोध्या का सिंहासन उपलब्ध कराने के यक्ष में

कि समय के सारे चरित्र छलिया और कपटी हैं
जो हैं , जैसा दिखते हैं और जैसा दिखाया जाता है
वैसा कुछ भी सच नहीं !
जनता भोली और: निरक्षर है
बात-बात में ताली बजाने के लिए तैयार

कि सब संदिग्ध हैं
यहां तक कि सीता पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता
पंचवटी में किसी अज्ञात प्रदेश से आकर
सीता से एकांत मिलन कर रही वह युवती भी
मेरे दुर्दिन में सीता के अपहरण का
कोई अवसर तलाशने वाले
किसी मनबढ सामन्त की
कोई दूती भी तो हो सकती है !
कुछ भी नहीं कहा जा सकता
किसी के भी बेरोजगारी के दिन
बहुत ही त्रासद और निरीह हुआ करते हैं
क्यों कोई अभिशप्त रहना चाहेगा !
सिर्फ कहने के लिए शस्त्र धारी है
इतना सज्जन है तो धनुष-बाण ही क्यों धारण किया !
सिर्फ दिखाने के लिए....

क्या ही मूर्खतापूर्ण है !
किसी स्त्री के लिए
उसके यौवन के चौदह वर्ष ही महत्वपूर्ण हुआ करते हैं
और तुम्हारी तरह सभी महात्मा बनते फहराने लगें तो
कैसे चलेगी सृष्टि!
कैसे बढेगा वंश !

क्या पता विचलित ही हो गयी हो
सीता का धैर्य
अपने वैचारिक सहमति के साध ही
लक्ष्मण को बलात् दूर भेजकर
चक्रवर्ती रावण के प्रणय-निवेदन पर
सुनहरे अवसर की तलाश में निकल भागी हो
अपनी ही इच्छा से निकल भागी हो सीता
अपनें समय के चक्रवर्ती रावण के साथ !
(जैसा की राजेन्द्र यादव भी कह कर चले गए हैं )

जाने से पहले लक्ष्मण ने सीता से
अंदर से अर्गला बंद रखने को कहा था
उसके बावजूद सीता का बाहर आना
सीता के चरित्र को भी संदिग्ध तो बनाता ही हैं
अपहर्ता रावण सीता को ढाल बनाकर
रावण की आंखों के सामने ही भाग निकला होगा पंचवटी से
झाड़ियों की ओट से किंकर्तव्यविमूढ़
देखते ही रह गए होगे राम !
क्या पता !

कुछ तो अविश्वास का प्रत्यक्ष आधार रहा होगा
जिसके कारण सीता की अग्निपरीक्षा लेकर भी
विश्वास नहीं कर पाते राम !

राम एक चतुर्दिक साजिशों से घिरे
ऐसे उदात्त नायक का नाम है
अपार रहा होगा जिसका एकान्त दुःख और अपमान
किसी से भी न साझा किए जानें योग्य!
जिसके दु:सह बोझ से ही वह चरित्र
सरयू की लहरों में डूब गया होगा !?

सच-सच बतलाओ!
तुम क्या कुछ जीकर चले गए हो राम !
कुछ तो हुआ ही है तुम्हारे साथ
कुछ ऐसा अनचाहा,अभद्र अकल्पनीय और अघटनीय
जिसे सिर्फ तुम ही जानते होगे
हे रहस्यमय चुप्पी वाले दुखभोगी महानायक
जिसे कोई भी दूसरा नहीं जानता !

#मोक्ष और #मुक्ति

 यह जिज्ञासा मुझे युवावस्था से ही परेशान करती रही है कि भारतीय परम्परा में ही मोक्ष और मुक्ति का इतना घनघोर लक्ष्य क्यों है ?

जीवन का पुरुषार्थ चतुष्टय या यह कहें कि लक्ष्य-विभाजन- धर्म ,अर्थ,काम और मोक्ष में मोक्ष को अंतिम लक्ष्य घोषित करने का मनोवैज्ञानिक औचित्य तो समझ में आता है -यदि उसे मृत्यु ,विसर्जन और अंतत: सर्वस्व त्याग कर इस दुनिया से चले जाने के पूर्वाभ्यास या मानसिक तैयारी के रूप में देखें । इस रूप में मोक्ष या मुक्ति को खुशी-खुशी मरने की मानसिक तैयारी या यह कहें कि मरने से पहले मनसा सब कुछ छोड़ देने का बौद्धिक प्रयास भी कह सकते हैं । यदि मोक्ष और मुक्ति की अवधारणा इसी रूप में है तो फिर आपत्ति की कोई बात नहीं ।
लेकिन भारतीय धर्म-ग्रन्थों में मोक्ष और मुक्ति का जिस तरह महिमामंडन हुआ है और उसको जिस प्रकार गूढ़ और गंभीर दार्शनिक अवधारणा के रूप में विकसित किया गया है । उसकी ऐसी अवधारणात्मक दुरूहता और रहस्यमयता के पीछे उसका पुनर्जन्म की अवधारणा से जोड़ दिया जाना , इस दुनिया को भर्त्सना योग्य,माया के रूप में मिथ्या और त्याज्य घोषित करना यानी की नकारात्मक-निषेधात्मक जीवन-दृष्टि को आदर्श घोषित करना । नकारात्मकता को ही जीवन के काम्य लक्ष्य के रूप में महिमामंडित किया गया है-जिसकी प्राप्ति के लिए सन्यासियों की पूरी सेना ही लगी हुई है । जिसे देखो वही सन्यासी बना घूम रहा है । यह सब एक गम्भीर रूप तब ले लेता है जब बाह्य जगत के प्रति आसक्ति यानी कि माया के विरुद्ध मुक्ति का आत्म-संघर्ष इच्छाओं को ही बंधन का मूल कारण घोषित कर देता है । इच्छाएं करना ही पाप का आधार बन जाता है । इसमें सबसे गंभीर बात यह है कि हमारी इच्छाओं का संबध हमारी कर्मेन्द्रियों के लक्ष्य यानी परिचालन के उद्देश्य से है । हमारे सृजन से है । कह सकते हैं कि इच्छाएं ही हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्यों एवं होने वाले सभी प्रकार के सृजन का मूल,आधार या भ्रूण हैं । दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक प्रश्न यह है कि साधना के लिए इस इच्छाओं की भ्रूण-हत्या को इतना अधिक महिमामंडित क्यों किया गया है ! इससे किसको फायदा है ? होने की स्थिति में किसी ईश्वर को मनुष्य की इच्छाओं से क्या आपत्ति हो सकती है ! यदि जरूरी है तो इस इच्छा-हत्या से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसको लाभ होने वाला है ? यदि किसी ईश्वर को तो किस प्रकार ? यदि साधक मनुष्य को तो वह भी किस प्रकार ? या यह जरूरी ही है तो किस प्रकार भारतीय मनुष्य के लिए जरूरी है ? या यह कहीं भी जन्में हुए दुनिया के किसी भी मनुष्य के लिए भी जरूरी है ?
ऐसा मुझे नहीं लगता कि इससे मिलते-जुलते प्रश्न प्राचीन भारतीय मनीषियों के मन में नहीं आए होंगे । न आए होते तो वे प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग की कल्पना ही न कर पाते । साफ देखा जा सकता है कि तत्कालीन सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के कारण ही प्राचीन भारतीय मनीषियों ने मुक्ति के विचार को सामाजिक दबाव और व्यवस्था जनित आवश्यकताओं के रूप में पहचानने और परिभाषित करनें से रोका ।
भारतीय दार्शनिकों की मुक्ति की अवधारणा को भारतीय जीवन और समाज से जोड़कर देखते यानी मुक्ति-विचार के औचित्य की परीक्षा करते चलें तो मुक्ति के सत्य तक पहुँचने में आसानी होगी । जैसे कि यही कि प्राचीन भारतीयों के लिए मुक्ति की यह साधना क्यों और किस प्रकार जरूरी थी ! इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि मुक्ति की साधना करना हमारे भारतीय पूर्वजों की क्या मजबूरी थी ?
(1-जारी और अपूर्ण )

बंजार


जब तक बीमार नहीं पड़ते है
दवा की दुकाने
बेमतलब की खुली दिखती हैं
जब तक जल्दी पहुंचनें की गर्ज न हो
गुस्सा ही दिलाते हैं
ट्रैफिक जाम कराने वाले
मनबढ, गतिवाधी आवारा वाहन
कौन कहता है कि वह तुम ही हो !
जिसके लिए जो कुछ भी है
जैसा भी लिखा गया होगा. ....
उसे अपने पाठकों का इंतजार है
जबकि तुम्हें कुछ और पढना है
आगे अभी बढ़ना है
इधर रुकना बेकार है
तुम्हें तो दूसरी गली के बाद बांएं मुड़ना है
तुम बाजार में हो
बाजार सिर्फ गिने-चुने से नहीं बनता
सबकी अपनी-अपनी जरूरतें है
अपनी-अपनी तलाश है
उसे मैने चिढ़-चिढ़ कर सिर धुनते
समय गिनते देखा है
जिसकी शिकायत है कि
कोई उसे नहीं चुनता !

निष्क्रमण

 

आत्मा से लेकर परमात्मा तक

सारा महिमामंडन एक तरफ
और मेरा होना दूसरी तरफ....
क्यों मैं ऐसा करूं कि
कुछ शब्द बचा कर रखूं और
कुछ शब्दों का जीवन भर विरोध करता रहूं
उनका खंडन करता रहूं
कुछ को मैं झूठ घोषित कर दूं और कुछ को
मैं सच की तरह विज्ञापित करूं
जबकि सारे महिमामंडन
सारे शब्द अस्तित्व के अनुवर्ती हैं
एक ही टकसाल से निकले हुए .....
भले ही वे अलग-अलग समय में
अलग-अलग मनुष्य द्वारा ईजाद किए गए....
हमें सच की खोज में एक दिन
भाषा तंत्र से भी बाहर निकलना
सीखना और पहचानना ही होगा -
अपना होना सही-सही जीने और जानने के लिए ....
कि हम तब भी होते हैं
जब हम कुछ भी नहीं बोलते
हम तब भी होते हैं
जब हम कुछ भी नहीं जानते
हम तब भी होते हैं
जब हम जान रहे होते हैं कि
क्या कुछ और किस तरह जान रहे हैं हम
और इस ज्ञान से बाहर निकलना क्यों जरूरी है !
कि आखिरी बंधन ज्ञान ही है
जिससे मुक्त होने तक
कोई स्वयं को
सुखी घोषित कैसे कर सकता है !
कि सारी छवियां सिर्फ एक श्रृंगार है
और व्यक्तित्व-
उपयोगी भूमिकाओं में बदले हुए संज्ञापद शब्द !
वह जो अपने होने से ही अभिभूत था
चमत्कृत था अपने होने के आश्चर्य को लेकर
अब जो चला भी गया है अपना सोचना छोड़कर
सिर्फ इतना ही पता चलता है कि
एक बूढ़ा ईश्वर भी
जो लगभग थक ही गया होगा
अपनें अस्तित्व और अपनी ईश्वरता को लेकर...
उसके समर्पण और संबोधन के केन्द्र में रहा है !
जैसे एक पुराना ईश्वर
जो हर कीमत पर आश्वस्त होना चाहता हो कि
कहीं कुछ भी बदलने नहीं जा रहा
और पूरी तरह अपनें प्रभुत्व की निरंतरता के साथ
सुरक्षित रहने के लिए आश्वस्त हो वह !
कुछ इसी तरह का संघर्ष चल रहा है
उसके पुरानें तन और नये तन के बीच !

वक्त का वक्तव्य !

 वक्त का वक्तव्य!


कभी मैं भी

ज्ञान प्राप्त करने की खुशी को
सभी से साझा करना चाहता था
कि मैने पाया
सबके दिमाग के कैसेट-सीडी
पहले से ही भरे हुए हैं
कि सत्य हर मस्तिष्क की समझदारी के
सापेक्ष हुआ करता है
कि सत्य शैशवकाल की अबोधता से
वयस्क जीवन की बोधता के बीच
की गयी जीवन की यात्रा है
और वह हर मस्तिष्क के बोध के सापेक्ष हुआ करता है
मेरा मस्तिष्क जितना और जैसा सोच पाता है
लगभग वैसा ही और उतना ही हो सकता है
मेरे द्वारा जिया गया सत्य !
और यह भी कि
मानव जाति का तथाकथित सत्य
स्मृति और बोध के सांस्थानिक उपस्थित के रूप में ही
प्राय:होता है-मानवीय समय और विकास के सापेक्ष !
प्राय: बंद समूहों की साझी एवं प्रतिस्पर्धी
समझदारी के रूप में
मै ज्ञान की शाश्वतता में नहीं
उसकी जीवन-केन्द्रित उपयोगिता में विश्वास करता हूॅ
यद्यपि जीवन के धरातल पर
सभी का अनुभव लगभग एक जैसा ही था कि
सारे ज्ञान कन्फ्यूजियाते हैं
उनसे जितना पाते हैं
उससे अधिक गंवाते और उलझाते हैं ..
यह भी कि लोग थक और ऊब चुके हैं
लाखों टन विरासत में मिले
ज्ञान के कचरे से ...
शायद यही वे कारण भी है कि
मैं अपनें ज्ञान को ज्ञान घोषित करनें में
सतत संकोचशील रहा हूँ
इसके बावजूद कि
मैने कचरे से बाहर निकलने की
सरल युक्ति वास्तव में पा ली थी !
आज की तारीख में
मैं ज्ञान को पाने की गर्व भरी खुशी और
उसे बांटने की दिलचस्पी
लगभग पूरी तरह खो चुका हूॅ
एक ऐसे दौर से गुजरते हुए
जिसमें चुप रह जाना भी
सुखी हो जाना है -
मैं ऐसा सुखी हो गया हूँ
यद्यपि मैं सभी को
अपनें-अपनें दिमाग से बाहर निकलकर
साथ-साथ हँसते-बोलते,घूमते-फिरते
कुछ सामूहिक-सा करते देखना चाहता हूँ
कि अब सिर्फ बोलते रहने का नहीं
कुछ करने का भी वक्त आ गया है ।

बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

हत्यारे और आग

 हत्यारे और आग

हत्यारे नींद मे हैं
हत्यारों को नींद में हत्या करने की बीमारी है
हत्यारों के पास हत्या करने के सपने हैं
हत्यारों के पास हत्याओं की अभिशप्त स्मृतियाँ है
हत्यारों के पास हत्या करने की विचारधारा है
हत्यारों के पास हत्या करने को कर्तव्य बताने वाले धर्म हैं
हत्यारों के पास हत्या करने के गीत है
हत्यारों के पास हत्या करने के साहित्य और संगीत है
हत्यारों के पास हत्या करने का आवेश और उन्माद है
हत्यारों के पास हत्या करने के हथियार हैं
अधिकार हैं
हत्यारे आग की तरह होते हैं
हत्यारों पर आग के सारे नियम लागू होते हैं
जिस दिशा की ओर बह रही होती है हवा
उसी दिशा की ओर भागती हैं आग की लपटें
और हत्यारों का समूह
हत्यारों और आग की दिशा में न जाएँ
उनके विपरीत दिशा में जाएँ
जो जल चुके हैं उनसे अलग
जो अभी नहीं जले हैं लेकिन जल सकते हैं कभी भी
उन्हें बचाना सीखें
हत्यारों और आग को ईधन न दें
उन्हे भूखा रखकर
उन्हें अपनी ही आग में जल-बुझने दें
यदि फिर भी नहीं बुझती है जंगल की आग
जागते नहीं हत्यारे
किसी सुरक्षित स्थान पर शरण लेकर
बारिश के मौसम
और हत्यारों की नींद के टूटने तथा
उनके होश मे आने का इन्तजार करें ।
रामप्रकाश कुशवाहा
29/02/2020

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

 ईश्वर


मेरे लिए ईश्वर
मेरी सभ्यता का सांस्कृतिक अवचेतन है
सृष्टि और समाज की अवधारणा का
आदिम बीज है
ईश्वर की भिन्न-भिन्न परिकल्पना में
मूझे दिखती हैं भूतपूर्व मनुष्यों के जीवन-काल की
भिन्न-भिन्न परिस्थितिकी
उनके जिन्दा रहने की समझदारियो
और विफलताकारी मूढ़ताओं का भी रहस्य भी
खुलता जाता है

पश्चिम के असुरक्षित, प्रतिस्पर्धी और जोखिमपूर्ण जीवनानुभवो वाले पूर्वजों ने
ईश्वर पर पूरा विश्वास नहीं किया
सब कुछ ईश्वर और प्रकृति के भरोसे नहीं छोड़ा
हितैषी ईश्वर के साथ - साथ
सबका बुरा चाहने वाले
शैतान की भी परिकल्पना की
प्रकृति के विपरीत बुरे व्यवहार का भी साक्षात्कार किया
जबकि उपजाऊ सुरक्षित पर्यावरण पाकर
आलसी भारतीय पूर्वजों ने
असंदिग्ध चरित्र वाले अनुकूल ईश्वर की
अवधारणा विकसित की
और अपने असावधान चित्त के कारण
बार-बार चले गए ..

हर अवधारणा के विकास का इतिहास होता है
ईश्वर की अवधारणा का भी है
जिसकी मानवीय निर्मित को
साफ़ - साफ पहचाना जा सकता है
जिसका ईश्वर जैसी किसी वास्तविक सत्ता के होने
या बिल्कुल ही न होने से कोई संबंध नहीं

एक अवधारणा के रूप में भारतीय ईश्वर
एक सुरक्षित , लयात्मक और आत्मीय
पर्यावरण के निर्माण और होने की
प्रागैतिहासिक विज्ञप्ति है

नए युग की अवधारणा की दृष्टि से
पहली समस्या ईश्वर को पुनर्परिभाषित करने की है
यद्यपि ईश्वर प्रागैतिहासिक कालीन काव्यात्मक अवधारणा है लेकिन बाद में विकसित सामन्तकालीन व्यवस्था
और पेशेवर पुरोहितवाद ने
उसका आदर्श चेहरा बिगाड़ दिया है
इसीलिए नए सिरे से
उसके निर्दोष स्वरूप की अवधारणा करनी होगी।

ईश्वर वस्तुत: वृहत्तर अस्तित्व का
जीवन और चेतना धर्मी साक्षात्कार है
सहजीवन की जटिलतम पारस्परिकता का
मानवोचित साकार है

इसलिए
सिर्फ नास्तिक होने मात्र से ही
ईश्वर के होने या न होने का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता
इस दुनिया को एक सतत-सक्रिय और विवेकपूर्ण ईश्वर की अनवरत अस्तित्वपर्यंत जरूरत है
चाहे वह अलंघनीय नियमों की
माननीय सत्ता के रूप में ही क्यों न हो.....

इसलिए ईश्वर कहीं नहीं है
यह कहना ही काफी नहीं
यदि ईश्वर एक रिक्ति है
तब तो और भी जरूरी हो जाता है कि
जिनके भी पास ईश्वर होने की सामर्थ्य है
वे आगे आएं
जिनके भी ईश्वर होने की संभावना है
वे आगे आएं

मेरे लिए ईश्वर
स्वत: स्फूर्त परिष्करण की क्षमता वाली
आदर्श एवं पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति के लक्ष्य वाली
व्यवस्था की खोज है

सबसे अंत में मेरे लिए
किसी वास्तविक ईश्वर का होना
प्रकृति में व्याप्त चेतना और समझदारी के अतिरिक्त
भौतिक जगत में जीवन के अस्तित्व की
बीज रूप में प्रकृति की स्मृति में बने रहने की
किसी सृजनात्मक व्यवस्था के
होने की पुष्टिकारी आस्था है

सोमवार, 4 दिसंबर 2023

भारतीय संस्कृति का पक्ष

संस्कृत जैसी व्यवस्थित भाषा का विकास करने मे सक्षम भारतीय धर्म तथा संस्कृति(मूर्ति, मन्दिर एवं पूजा पद्धति आदि ) अपनी प्रकृति मे प्रतीकात्मक तथा चारित्रिक आख्यान के रूप मे होने से प्रायः साहित्यिक प्रकृति के हैं । इसीलिए मै इन्हे कबीलाई धर्मों की तरह विशुद्ध अन्धविश्वास की तरह ही नहीं देख पाता । भाषावैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधारो पर मै मिथकीय प्रतीकों के कूट अर्थ को तोडने का प्रयास करता रहता हूँ । ऐसा करने की प्रेरणा मुझे उन कबाडियो से मिलती है जो निष्प्रयोज्य के विसर्जन से पहले उनमें से धातुओं को निकाल लेते हैं । मैं यह नहीं भूलता कि बुद्ध काल तक हमारा अतीत विचारपूर्ण बहसों का था। साधना का लक्ष्य जीवन का परिष्कार था और कपिल , चार्वाक और वृहस्पति जैसे अनीश्वरवादी चिन्तक भी हुए हैं ।

गीता हो या पतंजलि के योग-सूत्र, महावीर हो या बुद्ध सभी की चिन्ता मानव-मन के नियमन की ही रही है । वे अपराध कितना कम कर पाए यह एक अलग प्रश्न है लेकिन उन्होने एक शिष्ट जीवन-पद्धति देकर जीवन एवं समाज का सामूहिक प्रबन्धन करने का प्रयत्न अवश्य किया । वे मस्तिष्क को इस सीमा तक प्रशिक्षित करने में तो सफल हुए ही कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियाॅ के क्रिया-कलाप भी मानव-मस्तिष्क के विवेक की सीमा मे आ जाएँ । अकरणीय या वर्जनाओ से सम्बन्धित कुछ सांस्कृतिक युक्तियाँ भी आधुनिक मनोविज्ञान सम्मत हैं । जातीय एवं स्थानीय होते हुए भी उनकी काव्यात्मक भावोदात्तता एवं सामाजिक सार्थकता पर रीझने को मन करता है । जैसे ब्रह्मचर्य आश्रम के नाम पर पचीस वर्ष तक यौन हारमोनो का सिर्फ सामना करने के लिए देना आज की वयस्कता आयु-सीमा से भी अधिक है । भाई और बहन के बीच रक्षाबंधन जैसे त्यौहार, छोटे भाई की पत्नी का बडे भाई से विवाह की अनुमति न देना आदि ऐसी ही रेखांकित करने योग्य वर्जनाएं हैं । हर आता हुआ नया पुरुष अपनी ही देह के भीतर एक युद्ध लड़ता और जीतता हुआ आता है । अपने ही जीवन के वेगों को जीतने के लिए किया जाने वाला युद्ध ।
आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य का समर्थन करता है कि इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किसी संवेदना का प्रत्यक्षीकरण मस्तिष्क की धारणाओं, विश्वासों तथा व्याख्याओं के अनुरूप होता है । आध्यात्म के नाम पर अनेक सोद्देश्य किन्तु काल्पनिक और हास्यास्पद अवधारणाओं के बावजूद सांस्कृतिक नियामक झूठ बोलकर भी अनेक पशुओं, पक्षियों तथा वनस्पतियों सहित पर्यावरण को अधिकतम सीमा तक बचाने मे सफल रहे हैं । इस विधि से संरक्षित पर्यावरण में पितर घोषित कौओं से लेकर बन्दर, चूहे, सर्प,नीलकण्ठ,उल्लू,हाथी ,सिंह, और गाय-बैल ,नदियाँ सभी शामिल हैं ।
व्यवस्थित ढंग से संघ यानि संगठन बनाकर ,आज के शब्दों मे कहें तो संस्थागत रूप से लोगों तक अपने आदर्श के अनुरूप विचार पहुँचाने का कार्य गौतम बुद्ध ने किया था । उनके पहले लोक को उनकी भाषा मे ही संबोधित करने की चिन्ता और किसी मे नही दिखती ।उनके पूर्व के जननायकों के यश का आधार अभिजन या विशिष्ट वर्गीय स्वीकृति रही है । बुद्ध को लम्बा जीवन मिला था । लोक के लिए बोधगम्य दृष्टान्त कथाएं जिन्हे जातक कथाएं कहा गया खूब रची गयीं । भव्य व्यक्तित्व के कारण बुद्ध को ही प्रतिमान के रूप मे विज्ञापित किया गया । संगठन और संसथाओ की अपनी सामूहिकता होती है । पूरा जीवन समर्पित कर चुके बुद्ध के अनुयायियों के पास इतना जीवन-समय था कि वे 'अप्प दीपो भव 'की चिन्ता छोड़ कर बुद्ध की मूर्तियों की रचना मे लग गए । ऐसा लगता है कि विदेशों मे बहुत से ऐसे भी धर्म प्रचारक पहुँचे जो बुद्ध का दर्शन फैलाने के स्थान पर आजीविका के लिए मूर्ति स्थापित कर पूजा करवाने मे लग गए । अरब वगैरह तक पहुँचते-पहुँचते यही बुद्ध मात्र मूर्ति स्वरूप बुत हो गये । ऐसा लगता है कि मुहम्मद साहब ने इस्लाम प्रवर्तन के समय जिन बुतो को तुड़वाया होगा -व्हाॅ बौद्ध धर्म के दार्शनिक पक्ष से पूरी तरह अनभिज्ञ बुद्ध की मूर्तियों की सिर्फ पूजा करने वाले पुरोहित रहे होंगे । यह भी कि असली दार्शनिक बौद्ध धर्म विश्व के बहुत से हिस्सों में नहीं पहुँचा । या फिर पूर्व प्रचलित शिवलिंगो की पूजा की तर्ज पर बुद्ध यानि बुत पूजा भी सुदूरवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित रही ।
साफ है कि भारत मे भी बौद्ध धर्म को पहले मूर्तिपूजा मे बदला गया और फिर उनको देखते हुए बुद्ध की तर्ज पर दूसरे पौराणिक नायकों की भी मूर्तियाँ बनने लगीं । मूर्तिपूजा से दिमाग को आराम मिला और चढावे की संस्कृति विकसित हुई । जैसा कि प्रायः देखने मे आता है कि पेशे विचार और दर्शन को भी बाजार की एक उपस्थिति मे बदल देते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्ध काल से पहले का प्राचीन भारत मूर्तियों और मन्दिरों का देश नहीं रहा है । उनके पास ग्रामीण एवं नागरिक समाज थे जिनमें वैचारिक बहसे चलती रहती थीं । ऐसा नहीं है कि उनके पास आस्धा की पथराई हुई शिलाएँ बिल्कुल नहीं थी । भोले माने जाने वाले सबसे सरल अनगढ़ पाषाण- देवता आदि शिव तब भी थे । स्त्री-पुरुष के सृजनांगो तथा ब्रह्माण्ड के अनगढ़ प्रतीक के रूप में । बुद्ध के पहले की आस्था का स्वरूप साहित्यिक आख्यानों और विमर्शो के रूप में रहा है । इसीलिए ऐतिहासिक यथार्थ को देखते हुए मुझे मूर्तियों और मन्दिरों वाला भारतीय धर्म कम बुद्धि के लोगों एवं बच्चों के लिए लगता है । इन मूर्तियों का वास्तविक रहस्य इनके साहित्यिक पाठ मे है । पौराणिक नायकों के प्रतीकार्थ और चारित्रिक आख्यानों मे है । सिर्फ उन अंशो को छोड़कर जिसे अपनी आजीविका और पेशेवर स्वार्थ के कारण पुरोहित वर्ग ने लोगों का भयादोहन कर अर्थार्जन के लिए रची हैं ।
इस दृष्टि से राम भी हमारी सभ्यता के बीज-पुरुष ही लगते है । वे एकल दाम्पत्य के आदि प्रतिमान हैं और किसान-सभ्यता की कौटुम्बिक संरचना का भी । इस दृष्टि से हर वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन पर्यन्त किसी एक ही महिला से विवाह का संकल्प ले रखा हो -मुझे राम का प्रतिरूप ही लगता है । संभवतः तुलसीदास जी ने भी इसी दृष्टिकोण से ही 'सिया राम मय सब जग जानी ' कहा था । यह अकारण नही है कि आराम मे भी राम है और हराम मे 'हे राम' यानि शिकायत के रूप में है
इससे पता चलता है कि अरबी और फारसियो के पुरखे भी राम से प्रभावित देश रहे ही होंगे । एक विवाह करने वाले ईसाइयों और मुसलमानों को भी राम का अनुगामी तो माना ही जा सकता है । यद्यपि जो लोग होमर की कृतियों और ट्राय युद्ध से परिचित होंगे या सिकन्दर की लड़ाइयों से भी परिचित होगे , उन्हे रामकथा के अनेक अंश समानधर्मा लग सकते हैं । लेकिन इतने लम्बे काल तक चले कुलीनतंत्र मे सन्तानहीन होने के कारण किसी राजवंश का खतरे मे पडना और नियोगप्रथा द्वारा वंश चलाने का प्रयास असंभव नही लगता ।या फिर संभावित या सैद्धांतिक सच तो माना ही जा सकता है हमारी सभ्यता और संस्कृति का ।
यद्यपि आनुवांशिक सामन्तवादी व्यवस्था का वाहक होने के कारण उसने एक विषमतापूर्ण पक्षपाती समाज निर्मित किया लेकिन एक बहुलतावादी बहुजातीय -बहुभाषीय समाज मे जातीय रूप से ही सही दुभाषिये की भूमिका मे तो रहे ही संस्कृत के विद्वान । आज सनातन धर्म के कर्मकाण्ड का बहुत कुछ अन्धविश्वासपूर्ण और अतार्किक लगता है लेकिन उसकी पूजाविधियो मे प्राचीन शैशवकाल की रुढ़ियों के अभिनय छिपे हुए है । उसके कर्मकाण्ड मे संभव है कि कुछ काव्यात्मक अनुभव एवं व्यवहार भी हो-एक धार्मिक सांस्कृतिक मनोरंजन के पुरातात्विक व्यवहार के रूप में ।