होना,सभी के साथ होना और सृष्टि-बीज !
जीवन का रास्ता चिन्तन का है । चिन्तन जीवन की आग है तो विचार उसका प्रकाश । चिन्तन का प्रमुख सूत्र ही यह है कि या तो सभी मूर्ख हैं या धूर्त या फिर गलत । नवीन के सृजन और ज्ञान के पुन:परीक्षण के लिए यही दृष्टि आवश्यक है और जीवन का गोपनीय रहस्य । The Way of life is the way of thinking.Thinking is the fire of life And thought is the light of the life. All are fool or cheater or all are wrong.To create new and For rechecking of knowledge...It is the view of thinking and secret of life.
बुधवार, 30 अप्रैल 2025
होना,सभी के साथ और सृष्टि-बीज !
हारना
हारना
भविष्य-दर्शन
भविष्य-दर्शन
ईश्वर-समाज
ईश्वर-समाज
समाज ईश्वर की तरह और
ईश्वर समाज की तरह व्यावहार करता है
कभी ईश्वर के नाम पर समाज गल्तियां करता है
कभी समाज की गल्तियों के लिए
ईश्वर बदनाम होता है
उसके नाम पर हिलता है जो हर पत्ता
हिला हर पत्ता उसी के नाम होता है
दुनिया की हर सत्ता, उसका शासन और संविधान
ईश्वर के होने की नकल है
निरंकुश सत्ता में ईश्वर होने की अक्ल चाहे न हो
उसके अधिकारों की निरंंकुुश और आपराधिक मुद्राएं
सत्ता के ईश्वर होने का स्वांग और दखल है
इसलिए उसकी सम्प्रभुता कोई बीता हुआ कल नहीं
अभी-अभी गुजरता हुआ आज और
आने वाला कल है ....
इस तरह दुनिया के सारे नास्तिक झूठे हैं
क्योंकि दुनिया की सारी सरकारें
ईश्वर के राज्य का छद्म पुरावशेष हैं
वे सिर्फ कहनें के लिए देश हैं
वे स्वयं को धर्म निरपेक्ष कहें या नास्तिक
उनके सारे मुखौटे,मुद्राएं,क्रियाएं और व्यवहार
सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही अनुकरण और वेश है
क्योंकि ईश्वर अपनी अवधारणा में किसी के प्रति भी
जवाबदेह नहीं है
इसीलिए दुनिया की सारी सत्ताएं
भ्रष्ट,गैरजिम्मेदार और अपने हत्यारेपन का लुत्फ उठाती है
जैसाकि चीन ,कोरिया,रूस,इजराइल और ईरान में है ....
26/08/2024
अकेलेपन की साधना और सामूहिकता
अकेले पन और अलगाव की साधना
अकेले होने और अलगाव की
एकाकी साधना उचित नहीं है
फिर भी भीड़ के भगदड़ में
कभी भी बदल जाने की आशंकाओं को देखते हुए
उसके दुष्प्रभावों से बचने के लिए
जागना और बचकर भागना जरूरी है
रोमांच के बावजूद
उचित दूरी बनाए रखना
सुरक्षित बचे रहने की मजबूरी है !
सबसे अच्छा यह है कि
विवेक की स्वतंत्रता के साथ
अच्छी क्रियाओं और कार्यों में जीवन बीते
पिछली पीढ़ियों से बहुत कुछ लिया और पाया है तो
अगली पीढ़ियों को भी बहुत कुछ देने और बांटने से न चूकें !
सामूहिकता में विलय और विसर्जन
जीवन का लक्ष्य हो
लेकिन वह भेड़ियाधसान
यानी विवेक रहित भीड़ की अंधी अनुगामिता के रूप में न हो
तो ही अच्छा !
18/12/2024
गुरुवार, 30 मई 2024
ईश्वर -1
सोमवार, 15 अप्रैल 2024
'हे राम !' : (रामकथा का एक बचा हुआ समकालिक पाठ....)
'हे राम !' :
#मोक्ष और #मुक्ति
यह जिज्ञासा मुझे युवावस्था से ही परेशान करती रही है कि भारतीय परम्परा में ही मोक्ष और मुक्ति का इतना घनघोर लक्ष्य क्यों है ?
बंजार
निष्क्रमण
आत्मा से लेकर परमात्मा तक
वक्त का वक्तव्य !
वक्त का वक्तव्य!
कभी मैं भी
बुधवार, 28 फ़रवरी 2024
हत्यारे और आग
हत्यारे और आग
बुधवार, 6 दिसंबर 2023
ईश्वर
सोमवार, 4 दिसंबर 2023
भारतीय संस्कृति का पक्ष
संस्कृत जैसी व्यवस्थित भाषा का विकास करने मे सक्षम भारतीय धर्म तथा संस्कृति(मूर्ति, मन्दिर एवं पूजा पद्धति आदि ) अपनी प्रकृति मे प्रतीकात्मक तथा चारित्रिक आख्यान के रूप मे होने से प्रायः साहित्यिक प्रकृति के हैं । इसीलिए मै इन्हे कबीलाई धर्मों की तरह विशुद्ध अन्धविश्वास की तरह ही नहीं देख पाता । भाषावैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधारो पर मै मिथकीय प्रतीकों के कूट अर्थ को तोडने का प्रयास करता रहता हूँ । ऐसा करने की प्रेरणा मुझे उन कबाडियो से मिलती है जो निष्प्रयोज्य के विसर्जन से पहले उनमें से धातुओं को निकाल लेते हैं । मैं यह नहीं भूलता कि बुद्ध काल तक हमारा अतीत विचारपूर्ण बहसों का था। साधना का लक्ष्य जीवन का परिष्कार था और कपिल , चार्वाक और वृहस्पति जैसे अनीश्वरवादी चिन्तक भी हुए हैं ।
-
अभिनव कदम - अंक २८ संपादक -जय प्रकाश धूमकेतु में प्रकाशित हिन्दी कविता में किसान-जीवन...
-
संवेद 54 जुलार्इ 2012 सम्पादक-किशन कालजयी .issn 2231.3885 Samved आज के समाजशास्त्रीय आलोचना के दौर में आत्मकथा की विधा आलोचकों...
-
पाखी के ज्ञानरंजन अंक सितम्बर 2012 में प्रकाशित ज्ञानरंजन की अधिकांश कहानियों के पाठकीय अनुभव की तुलना शाम को बाजार या पिफर किसी मे...