संस्कृत जैसी व्यवस्थित भाषा का विकास करने मे सक्षम भारतीय धर्म तथा संस्कृति(मूर्ति, मन्दिर एवं पूजा पद्धति आदि ) अपनी प्रकृति मे प्रतीकात्मक तथा चारित्रिक आख्यान के रूप मे होने से प्रायः साहित्यिक प्रकृति के हैं । इसीलिए मै इन्हे कबीलाई धर्मों की तरह विशुद्ध अन्धविश्वास की तरह ही नहीं देख पाता । भाषावैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधारो पर मै मिथकीय प्रतीकों के कूट अर्थ को तोडने का प्रयास करता रहता हूँ । ऐसा करने की प्रेरणा मुझे उन कबाडियो से मिलती है जो निष्प्रयोज्य के विसर्जन से पहले उनमें से धातुओं को निकाल लेते हैं । मैं यह नहीं भूलता कि बुद्ध काल तक हमारा अतीत विचारपूर्ण बहसों का था। साधना का लक्ष्य जीवन का परिष्कार था और कपिल , चार्वाक और वृहस्पति जैसे अनीश्वरवादी चिन्तक भी हुए हैं ।
जीवन का रास्ता चिन्तन का है । चिन्तन जीवन की आग है तो विचार उसका प्रकाश । चिन्तन का प्रमुख सूत्र ही यह है कि या तो सभी मूर्ख हैं या धूर्त या फिर गलत । नवीन के सृजन और ज्ञान के पुन:परीक्षण के लिए यही दृष्टि आवश्यक है और जीवन का गोपनीय रहस्य । The Way of life is the way of thinking.Thinking is the fire of life And thought is the light of the life. All are fool or cheater or all are wrong.To create new and For rechecking of knowledge...It is the view of thinking and secret of life.
सोमवार, 4 दिसंबर 2023
भारतीय संस्कृति का पक्ष
रविवार, 3 दिसंबर 2023
मूर्ति-पूजा और भारतीय धर्म की प्रकृति
धर्म और ईश्वर
धर्म और ईश्वर : मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य
रामकथा , तुलसीदास और विशिष्टाद्वैतवाद
11/11/2023
तुलसीदास की पंक्तियां उनके काव्य-ग्रन्थ 'राम चरित मानस की व्यापक स्वीकृति और प्रसिद्धि के साथ स्वतंत्र सूक्तियों के रूप में इश्तेमाल होने लगी । इसलिए ऐसी सूक्तियां बाद की पाठक पीढियों के लिए भंयकर दुष्परिणाम लाने वाली हुई । तुलसी का काव्य-साहित्य धार्मिक संविधान की तरह पढा गया है और इसमें सन्देह नहीं कि उसका संदर्भित समुदायों को अपमानित करने के लिए भी दुरुपयोग होता रहा है। उत्पीड़न की घटिया मानसिकता का पोषण और विज्ञापन करता रहा है -वह भी प्रबन्ध काव्य की मंशा के विपरीत । क्योंकि प्रताड़ना की घोषणा बिना अपराध बताए सिर्फ लिंग और वर्ण की अयाचित-अपरिहार्य सदस्यता के आधार पर विवादित पंक्तियों में हुई है - इसीलिए अपनी अशील व्याप्ति में गंभीर और चिंतनीय भी है । वह कथा-काव्य में भले दृष्टांत रूप में सहज उपस्थित हो गया हो । उससे इतना तो सत्यापित होता ही है कि हमारा मध्ययुगीन समाज किस सीमा तक असभ्य, घटिया और अनैतिक रूप से भेद-भाव करने वाला पूर्वाग्रही तथा आपराधिक था । इसमें तुलसीदास की भूमिका एक कैमरामैन जैसी होने के बावजूद। जहां महाकवि के नियंत्रण के बाहर भारतीय समाज की कलुषित मानसिकता लोकोक्ति के माध्यम से ही व्यक्त हो गयी है ।
शनिवार, 12 फ़रवरी 2022
धर्म
अलग-अलग धर्मों की अलग-अलग विशेषताएँ हैं । मनुष्य सभी धर्मो से कुछ न कुछ अच्छाई सीख सकता है लेकिन जो सिर्फ एक ही धर्म विशेष को ही सबसे अच्छा मानकर उसे अपनाता है ।उसके ज्ञान-चक्षु बन्द हो जाते हैं । वह अच्छाई के साथ-साथ बुराई को भी सही मानकर जीने लगता है। आने वाला समय सभी धर्मो को ठीक-ठीक समझने वालों का होंगा । सभी धर्म मनुष्य जाति ने ही अच्छे उद्देश्य से ही पैदा किए होंगे लेकिन आज के मनुष्य के लिए पुराने पड़ने के कारण सभी अपनी परिकल्पना मे पिछड़ भी गए हैं ।
शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021
शनिवार, 6 नवंबर 2021
रविवार, 28 फ़रवरी 2021
ईश्वर और धर्म
ईश्वर-चिंतन की अवधारणा के आधार का विमर्श
मैं जो कहना चाहता हूँ उसे मैं उसी तरह आपको समझाना चाहूंगा ,जिसप्रकार से मैंने समझा है। भौतिक उपस्थिति की दृष्टि से पुरुष या स्त्री की देह एक अलग संरचनात्मक ईकाई के रूप में निर्मित है लेकिन एक प्रजाति के निर्माण के रूप में प्रकृति में उनके पूरक निर्माण की समझदारी दिखती है। इसीप्रकार वनस्पति और जंतु जगत्सृष्टि भी आक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड के उत्पादन की दृष्टि से स्त्री और पुरुष की तरह ही परस्पर पूरक उपस्थितियाँ हैं। जंतुओं के अस्तित्व के लिए आवश्यक प्राणवायु आक्सीजन भी वनस्पति जगत का व्यर्थ उत्पाद है। इसी तरह हमारा व्यर्थ उत्पाद कार्बन डाई आक्साइड भी वनस्पति जगत के लिए अत्यंत उपयोगी है। माना कि यह दुनिया गुणधर्म और संयोग आधारित है लेकिन विकसित हुए हर जीवन में सृजनात्मक विवेक के दर्शन क्यों होते हैं ? आँखों से वंचित सारे अंधे फूल इतने सुंदर और सुगन्धित क्यों हैं ? फूल के आकर्षक,रंगीन एवं सुगन्धिपूर्ण होने का आतंरिक विवेक दार्शनिक या धार्मिक न सही ,लेकिन एक सैद्धांतिक ईश्वर की तो मांग करता ही है। ऐसा ही जिह्वा से रहित विविध स्वाद वाले पेड़ों के लिए भी कहा जा सकता है। वे किसी मूर्ख की तरह मीठे और खट्टे नहीं हुए हैं -इन सभी के मीठे-खट्टे ,सुन्दर और सुगन्धित होने के विशेष प्रयोजन साफ-साफ देखे जा सकते हैं और वे सभी अपनी सोद्देश्य निर्मित में सफल हैं। लेकिन प्रकृति में मिलाने वाला यह आतंरिक विवेक एक सैद्धांतिक ईश्वर की अवधारणा को ही जन्म दे सकता है। भारतीय दर्शन का ब्रह्म एक ऐसी ही सैद्धांतिक अवधारणा वाला ईश्वर है। वह हजार आँखों और कानो वाला सर्वव्यापी तो है लेकिन वह इस अर्थ में असंभव कल्पना है कि वह जीवन की प्रकृति और निर्मिति के अनुरूप नहीं है। हम सभी जानते हैं कि बिना चेतना के ईश्वर की कल्पना भी नहीं की जा सकती और चेतना के लिए एक बड़े और समर्थ,सक्षम मस्तिष्क की भी जरुरत होगी और वह भी समय-सीमाओं और बंधनों से मुक्त यानी सर्वकालिक मस्तिष्क की। सर्वकालिक होने के लिए इसे सूक्ष्म भी होना होगा। क्या वायरसों के भी पार यानी सूक्ष्मतम विशुद्ध जैविक विद्युत् रूप में यानी पूर्णतः अदृश्य कोई जीवन-प्रकार वास्तव में संभव है ? यदि भौतिक स्नायुतंत्र न भी हो तो भी जीवनों में मिलने वाली मस्तिष्कीय चेतना की तरह बिना भौतिक आधार के कोई मस्तिष्कीय सचेतन अस्तित्व संभव है ? जैसाकि बहुत से धर्मों और संस्कृतियों में भूत-प्रेत एवं सूक्ष्म आत्माओं के रूप में ,रूहानी अस्तित्व या ताकत के रूप में ईश्वर या अल्लाह की परिकल्पना की जाती है।
भारतीय संस्कृति में एक और मिथकीय पौराणिक कल्पना मिलती है-यह दुनिया शेषनाग ;के फ़न पर टिकी हुई है। यह तुलना अत्यंत रोचक होगी कि भारतीय पौराणिक नायक शेषनाग भी उसी प्रजाति के हैं , जिस प्रजाति के पश्चिमी धर्मों के मिथकीय खलनायक इबलीस या शैतान ! सांप रहस्यमय तो हैं ,ठंढे रक्त वाले होने के कारण भोजन भी कम एवं लम्बे समय के बाद करते हैं , साँपों में जैवविविधता भी बहुत पायी जाती है। कुछ वर्षों पहले बोल्विया केकी खदानों में एक पचास मीटर लम्बे डायनासोर युग के महासर्प का फॉसिल मिलाने की खबर अख़बारों में पढ़ी थी। क्या प्रारम्भिक पूर्वजों को भी किसी ऐसे फॉसिल के दर्शन हुए थे ? जैसे किसी डायनासोर के फॉसिल ही चीनी ड्रैगन के अस्तित्व में होने के आधार बने होंगे। अगर कोई ऐसा अस्तित्व होगा तो भोजन-श्रंखला में भी होगा ताकि वह अधिक समय तक मृत्यु-क्षरण से मुक्त रहे। ऐसी मिलती-जुलती कल्पनाएं बलि-प्रथा वाले सभी कबीलाई धर्म करते देखे जाते हैं। इसलिए हमें निश्चिन्त होकर मार्क्सवाद,विज्ञान और लोककल्याणकारी राज्य की और आगे के चिंतन के लिए लौटना चाहिए। क्योंकि उपलब्ध विज्ञान में यह सामर्थ्य है कि आधुनिक लोककल्याणकारी सत्ता यदि संवेदनशील हो तो वह अपने नागरिकों का पुराने समय के ईश्वर से बेहतर देखभाल कर सकती है। यदि मानव-सभ्यता और व्यवस्थित तथा परिष्कृत हो जाती है तो
ईश्वर की सैद्धांतिक जरुरत जब पड़ सकती है वह निहारिकाओं के लड़-भिड़ जाने या फिर प्रलय के बाद फिर नए सिरे से नयी जीवन-सृष्टि बनाते समय होगी। वह भी तब जब ब्रह्माण्ड में विगत जीवन-सृष्टि की कोई भी स्मृति नहीं बची होगी किसी बीज की तरह। अदि कोई जैविक-विद्युतीय बीज जैसी स्मृति होगी तो शायद परमाणुओं के नवसंलयन काल में एक बार फिर नए जीवन की सृष्टि शायद आसान हो जाए अन्यथा उस आगामी सृष्टि को एक बार जीवन की खोज में दिशाहीन संयोगों की और भटकना होगा।
सोमवार, 21 दिसंबर 2020
केदार नाथ सिंह की काव्य-यात्रा
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अभिनव कदम - अंक २८ संपादक -जय प्रकाश धूमकेतु में प्रकाशित हिन्दी कविता में किसान-जीवन...
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संवेद 54 जुलार्इ 2012 सम्पादक-किशन कालजयी .issn 2231.3885 Samved आज के समाजशास्त्रीय आलोचना के दौर में आत्मकथा की विधा आलोचकों...
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पाखी के ज्ञानरंजन अंक सितम्बर 2012 में प्रकाशित ज्ञानरंजन की अधिकांश कहानियों के पाठकीय अनुभव की तुलना शाम को बाजार या पिफर किसी मे...

