रविवार, 11 नवंबर 2018

कुत्ते

पूरा शहर बंट गया  है
कुत्तो की अलग-अलग टोलियों में
कुत्ते नहीं चाहते कि
उनके समूह मे कोई नया कुत्ता शामिल हो
वे हर नए आगन्तुक के विरुद्ध हैं
और टूट पड़ते हैं एक साथ
उसे अपनी सरहद से बाहर तक खदेड़ देने के लिए
सारा शहर बंटा गया है
कुत्तो की अलग-अलग टोलियों के नाम!

रामप्रकाश कुशवाहा
11/11/2018

हिन्दू

ऐसा धर्म कहाॅ मै पाऊँ
बिना शर्त  हिन्दू कहलाऊॅ
मन्दिर जाऊँ  या न जाऊँ
सुबह नहाऊॅ या न नहाऊॅ
पूजा करूँ  या ठर्रा  पीऊॅ
हॅसकर जिऊॅ  या घुटकर जीऊॅ
घूस भी लूं या घूस चढ़ाऊॅ
ऐसे धर्म पर बलि-बलि जाऊँ

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

बौनापन

हम  धरती के घूमते विस्तार के सामने बौने हैं
हम पहाड़ के चरणों  मे
महसूस करते हैं
अपने अस्तित्व का बौनापन
हम समुद्र के दैत्याकार विस्तार
और उसकी हहकारती विशाल लहरों के आगे बौने हैं
हम अपनी प्रजाति के अनतहीन जीवित  विस्तार के आगे बौने हैं
हम अन्तरिक्ष की उन्मुक्त उन्नत उड़ान के आगे बौने हैं
अपनी सापेक्ष ऊंचाई के बावजूद  !

रामप्रकाश कुशवाहा
06/11/2018

धर्म और अधर्म

धर्म और अधर्म

सारी दिशाएं अपनी हैं
सारी धरती अपनी है
सारे लोग अपने हैं
और मै मनुष्य को
इतनी तरह से जीते हुए देखकर
आश्चर्य से भर गया हूँ

कितने रीतिरिवाजों
और कितनी प्रथाओं का सर्जक है आदमी
कितने शब्दों और कितने विश्वासों का रचनाकार!
कितने अन्धविश्वासों  और कितने झूठों का जीवनहार

और मै
उनके सारे कार्यों का अनुकरण करने मे समर्थ
मना किया गया कि क्या- क्या मुझे करना चाहिए
और क्या नहीं  !

इतनी शर्तो और
इतनी परतों में जी सकता है आदमी
जानने के बाद भी
वही-वही दुहराने की इच्छा
मेरी मर गयी है
ऊब गया हूँ मै
कर्मकाण्डो की दुरूहता
और बारम्बारता से

मै क्यो कुछ नया नहीं कर सकता ?
नहीं जी सकता नया 
और क्यो कुछ नया जीने की स्वतंत्रता
मुझे विधर्मी बना सकती है !
मै क्यों नहीं  बना सकता
सारी दुनिया की अच्छाइयों  का संग्रहालय  !
नहीं जी सकता अपनी समझ से चुना हुआ अच्छा
और क्यों- कोई तो मुझे बताए !

रामप्रकाश कुशवाहा
07/11/2018

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

ईश्वर का मनोविज्ञान

भेड़ियों, कुत्तों ,बन्दरों और चींटियों की तरह मानव-प्रजाति का भी विकास  भयानक जंगलों की असुरक्षा मे हुआ है । अपने शिकारी प्रतिद्वंद्वियों के कारण समूह मे ही सुरक्षा थी । वह अपने साथियों के जागते रहने पर ही निर्भय होकर सो सकता है । इस सामूहिकता और सामाजिकता के लिए जैविक रूप से पूर्ण ईकाई होते हुए भी मानसिक  अपूर्णता- बोध जरूरी था । इसी तरह की अपूर्णता प्रजाति के लैंगिक विभाजन के कारण भी है। इस तरह कोई भी मनुष्य अकेले मे पूर्णता के लिए बना ही नहीं है । इस तरह सन्यासियों  का अहं ब्रह्मास्मि वाला अहंकार भी हमारे प्राकृतिक जी(व)न- स्वभाव के अनुरूप नहीं है । वैसे भी  तथाकथित सन्यासी सन्यासियों के समूह मे शामिल होकर पुनः छोड़ी गयी सामाजिकता को प्राप्त कर लेते हैं।  शैशवावस्था से पिता की स्मृतियाँ और अभिभावक अनुभव के अचेतन संस्कार को लेकर  हमारा ईश्वर भी प्रजाति से प्राप्त सांस्कृतिक विश्वास के रूप मे हमारे भीतर के इसी अधूरेपन को भरता है ।अधूरेपन के  इसी नेपथ्य मे सत्ता, व्यवस्था और समाज भी स्थित है । इसी अपूर्णता मे दूसरी का आवाहन, सम्मान, विनम्रता और उदारता की भावना का अस्तित्व और प्रवाह है । इस तरह ईश्वर की अवधारणा सिर्फ़ हमारी नैतिक-धार्मिक आस्था से ही नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक जरूरत से भी उपजी है । हमे अपने ईश्वर की अवधारणा को और परिष्कृत ,समझदार तथा निर्दोष बनाने की जरूरत है।
रामप्रकाश कुशवाहा
06/11/2018

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

कृष्ण

यदि कृष्ण कथा को आधुनिक मनोवैज्ञानिक नजरिये से देखें तो अपनी प्रतिभा और सूझ बूझ से लोगों को चमत्कृत और उपकृत करने वाले नायक का विकास साफ देखा जा सकता है। कृष्ण अपने मित्रों को गाढ़े मे काम आते हैं और उन्हीं ग्रामीण लोगों को सेना मे बदल देते हैं  । कृष्ण मे यदि वासना होती तो जरूर ईर्ष्या भाव भी वहाँ मिलता । कृष्ण मे बाल-सुलभ खिलन्दडा पन और अकुण्ठ मैत्री भाव है । मध्यकालीन अन्धकार युग ने उनके व्यक्तित्व का बहुत पतन कराया है ।
     कृष्ण इसलिए लोक का अपार प्रेम पा सके क्योकि उनहोंने लोक को स्वयं का पालन-पोषण करने वाले अभिभावक के रूप मे देखा । वे लोक से अपने स्नेहपूर्ण रिश्ते को अन्त तक जीते रहे और लोक को सामन्त राजाओ की तरह शासित करने की कोशिश कभी नहीं की । वे लोक- कृतज्ञ जननायक है जिसने बराबरी के भाव को सम्मान देते हुए दूसरों को अपमानित करने वाला कोई भी बडप्पन और अहंकार जीने से इन्कार कर दिया था । राजसूय यज्ञ के समय वे दूसरों का जूठा पत्तल उठाने का दायित्व संभालते है । यह अत्यन्त सांकेतिक किन्तु  जनता से कटकर अलग-थलग बडा दिखने की आभिजात्य मानसिकता का पूरी तरह बहिष्कार था । द्वारिका के गणतंत्र मे भी बलराम को प्रमुख बनाकर स्वयं स्वतंत्र सहयोगी की तरह रहे ।वे व्यवस्था निर्माण  के तो नहीं लेकिन लोक की जीवन- पद्धति के निर्माण के दार्शनिक चिन्तक की भूमिका में आद्यन्त बने रहे ।
         उनके गोबर्धन पर्वत उठाने का प्रसंग मुझे अतिवृष्टि और बाढ़ के समय अपने परिश्रम द्वारा जन और जानवरों  को उॅचे पहाड़ी भूभाग पर सुरक्षित पहुचाने के लिए रास्ता बनाने की घटना से सम्बन्धित लगता है ।  जिसमे इतनी बड़ी शिलाएँ उठायी हो कि मानवीय शक्ति के  लिए अविश्वसनीय रहा हो  ।
          कृष्ण को सोलह हजार रानियां  भी  एक पहाड़ी राजा को युद्ध मे मारे जाने के बाद उसके रनिवास मे  मिली थी।  कृष्ण ने उन्हे विधवा होने के बाद राज्याश्रय दिया था । यह पुनर्वास जैसा कदम था । इन महिलाओं ने कृष्ण को पति यानि स्वामी का दर्ज़ा दिया था । कृष्ण की वास्तविक रानियां रुक्मिणी सत्यभामा  आदि कम ही थी ।
      चरित्र, संयम,उदारता,लोककल्याण,दया और करुणा भाव यानि संवेदनशीलता के अभाव मे कोई भी उस स्तर का लोकनायक नहीं बन सकता कि उसे भगवान का दर्जा  जनता देती।

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

सदानन्द शाही

हर कवि में  कुछ प्राकृतिक मौलिकता और विशिष्टता होती है तथा कुछ अर्जित और परिवेशगत।  कवि सदानंद शाही जी की काव्य-भाषा  में  भी एक प्राकृतिक और जैविक  विशिष्टता है।  इसका सत्यापन और साक्षात्कार उनके पुत्र ईशान की भाषा से भी किया जा सकता है। आम बोलचाल की भाषा को अपने ही अन्दाज़ में रूपांतरित और पुनर्प्रस्तुत करती हुई ।  लेकिन उनका और उनकी पीढ़ी का नायकत्व की  दृष्टि से  हाशिए और सीमान्त पर पैदा होकर वैकल्पिक नायकत्व की खोज और उसके लिए किया गया संघर्ष उन्हें महान न भी बनाता हो लेकिन महत्वपूर्ण अवश्य बनाता है । वे अस्तित्व की  समानांतर  सार्थकता के खोज के कवि है । वे अपनी एक कविता मे स्वयं को कविता का स्थाई या सर्वकालिक नागरिक न मानकर जब
अनागरिक कवि मानते है तो अपनी पीढ़ी की इसी नायक बनने की अवसर-विहीनता की  नियति को ईमानदारी से स्वीकार करते है । अपनी इसी विशेष ऐतिहासिक अवस्थिति के कारण ही सदानन्द शाही की कविताएँ आम जन-जीवन की साधारण नियति के भीतर से समझदारी,संवेदना  और सफलता के स्थानीय सूत्र तलाशती है और अपने समय के लिए नई तरह की सूक्तियाॅ रचती हैं  । इसी दृष्टि से मैने उन्हे मध्यवर्ग और साधारण मनुष्यता का  दार्शनिक कवि कहा है ।
         उन्हे उनके साठ वर्ष पूरा करने पर बधाई  ,शतायु होने की शुभकामनाओं के साथ।

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

अधियाचन

अरे देवता !
सारी आबादी को
सिर्फ प्रार्थना और प्रतीक्षा के लिए ही
प्रशिक्षित कर रखा है
कुछ मनुष्यों के लिए भी छोड़ा होता
एक मानसिक विकलांग
और निठल्ली - निकम्मी भीड़ मे
बदल गए हैं लोग ।

रविवार, 29 जुलाई 2018

हॅसता हुआ बाजार (कुछ टिप्पणियाँ)

रामप्रकाश कुशवाहा जी की सद्यः प्रकाशित पुस्तक-
" हंसता हुआ बाज़ार " काव्य संकलन, बाज़ार के चरित्र पर 66  वैचारिक कविताओं का संग्रह एक किताब में पहली बार तब्दील, इसके तीखे गवेषणात्मक और लंबे सार्थक तान - वितान को देखते - समझते - विचारते हुए इसे 'बाज़ार महाकाव्य ' कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं ।
(सौमित्र )

"हॅसता हुआ बाजार " की कविताएँ  बाज़ार के प्रति कवि की  अधिकतम  समझदारी का निवेश है  । इन कविताओं मे अनेक सूक्तियों-सूत्रों ,दृश्यों- दृष्टान्तो  के माध्यम  से  उसने अपनी दृष्टियो- निष्कर्षों  को दूसरों के लिए  सुरक्षित रखने का प्रयास किया हे । इसकी कई कविताएँ  बाजार मे मिलने वाले धूर्तों, ठगी, अपराधियों और  हत्यारों की गम्भीर मनोवैज्ञानिक पहचान कराती है ।  स्पष्ट है कि ऐसी कविताएं सिर्फ कवि कहलाने के लिए नही  लिखी गयी हैं  ।

राम प्रकाश कुशवाहा जी की कविताएँ कलात्मक युक्तियों के सहारे विकसित नही होती बल्कि अपना रूपाकार गहरी दार्शनिक निष्पत्तियों में ग्रहण करती हैं। 'हँसता हुआ बाजार' ऐसी ही चिंतनपरक कविताओं का संग्रह है।कवि की चिंता के केन्द्र में 'बाजार' है हिन्दी का पहला दार्शनिक कवि कबीर भी ऐन बाजार के बीच खड़े होकर उसका मूल्यांकन करता है।'कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठा हाथ'।तब से बाजार हमारी जरूरतों  से आगे निकलकर हमारी चेतना को आक्रान्त करने की हद तक ताकतवर बन चुका है।वह ताकतवर ही नहीं अमानवीय, शोषणकारी है और ग्लोबल है। गद्य में इसपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है पर कविता के फार्म में यह पहला विमर्श परक संकलन है।
(अनिल अविश्रान्त)

हँसता हुआ बाजार
राम प्रकाश कुशवाहा
प्रतिश्रुति प्रकाशन,कोलकाता

जिन्दगी और कल्पना

पहले मै कल्पनाओं को ही
जीवन समझ कर जीता रहा
सोचता था कल्पनाओ को बचा लूँगा
तो सुरक्षित बच जाएगा जीवन
कि एक दिन देख लिया मैने
कल्पना के बादल के पीछे
सूरज की तरह छिपा हुआ
खुली हुई धूप सा वास्तविक जीवन
धूसर मटमैली खुरदुरी धरती
जीवन का हरा सागरीय विस्तार

कि जीवन बचा रहेगा
तो चलती रहेंगी कल्पनाएँ
अब मै कल्पनाओं पर नहीं
कल्पनाओ को जीते हुए जीवन पर
रीझता रहता हूँ
          रामप्रकाश कुशवाहा

बुधवार, 11 जुलाई 2018

हंसता हुआ बाजार

अभी-अभी मिली पुस्तक  "हॅसता हुआ बाजार " की कविताएँ  बाज़ार के प्रति मेरी अब तक की अधिकतम  समझदारी का निवेश है  । इन कविताओं मे अनेक सूक्तियों-सूत्रों ,दृश्यों- दृष्टान्तो  के माध्यम  से  मैने अपनी दृष्टियो- निष्कर्षों  को दूसरों के लिए  सुरक्षित रखने का प्रयास किया हे । इसकी कई कविताएँ  बाजार मे मिलने वाले धूर्तों, ठगी, अपराधियों और  हत्यारों की गम्भीर मनोवैज्ञानिक पहचान कराती है ।  स्पष्ट है कि ऐसी कविताएं सिर्फ कवि कहलाने के लिए न्ही लिखी गयी हैं  ।इन कविताओं के पाठक  यदि इन्हें पढने के बाद कुछ अपराधों और दुर्घटनाओं का शिकार होंने  से बच गए तो मै अपना श्रम सार्थक समझूँगा।
        इस पुस्तक का अतिरिक्त और विशेष आकर्षण युवा आलोचक नलिन रंजन सिंह की"बाजरा से गुजरा हूँ खरीददार नही हूँ "शीर्षक विमरर्शात्मक प्रस्तावना और आवरण पृष्ठ पर प्रिय कवि प्रिंयंकर पालीवाल की अर्थ- समृद्ध टिप्पणी है ।

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

मोक्ष

जितना होना है
उससे अधिक न होना है
इस दुनिया में होते हुए भी 
न होने की तरह जीना है
जो जाति बोधक कर्म है
सिर्फ वही - वही जीना है
नियत से अलग और अधिक
जो भी जिएगा वह कमीना है
इसलिए कहे गए से
अलग होने और जीने की
कभी सोचना ही मत
क्योकि तुम्हारी सारी ऐसी
दुःसाहसपूर्ण इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं
पाप और अवैध होगी
अनवरत् शुद्धि के लिए
समय के देवताओं और इन्द्र के पक्ष मे
तुम्हे जीवनभर निरन्तर
सिर्फ खारिज करते रहना होगा
स्वयं को दूसरों के पक्ष मे !
मोक्ष-रहस्य
जितना होना है
उससे अधिक न होना है
इस दुनिया में होते हुए भी 
न होने की तरह जीना है
जो जाति बोधक कर्म है
सिर्फ वही - वही जीना है
नियत से अलग और अधिक
जो भी जिएगा वह कमीना है
इसलिए कहे गए से
अलग होने और जीने की
कभी सोचना ही मत
क्योकि तुम्हारी सारी ऐसी
दुःसाहसपूर्ण इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं
पाप और अवैध होगी
अनवरत् शुद्धि के लिए
समय के देवताओं और इन्द्र के पक्ष मे
तुम्हे जीवनभर निरन्तर
सिर्फ खारिज करते रहना होगा
स्वयं को दूसरों के पक्ष मे !

एक पौराणिक जिज्ञासा

 ( कवि दिनेश कुशवाह उवाच)


बालि का क्या हुआ?
क्या हुआ बालि का !
उसका सब कुछ लूटने के बाद
उसके हाथ- पैर बांधकर
किसी कुएं मे फेंक आए उसे ?
उसकी उस भोली प्रजा का क्या हुआ
कहा गया जिससे
तुम्हारा राजा
धरती के स्थान पर
पाताल का राजा बना दिया गया है
(कुँए में फेककर )
उसकी हत्या करने के बाद ?

बुधवार, 28 मार्च 2018

हँसता हुआ बाज़ार

                          हँसता हुआ बाज़ार 


        बाज़ार पर केन्द्रित विशेष कविताओं का कविता-संग्रह 





                                    रामप्रकाश कुशवाहा 




        


                                      प्रतिश्रुति प्रकाशन 
                    (Pratishruti Prakashan  7A Bentinck Street Kolkata 700001)

ईश्वर

बना प्रकृति के भौतिक- रासायनिक नियम से सम्भव है
तो बनाया ईश्वर के होने या उपस्थिति का बोधक यानि मानवीकरण। इन्ही दोनो छोरों के बीच इस दुनिया की सारी सम्भावनाएं खत्म हो जाती है । लेकिन कभी कभी मै ऐसा सोचे बिना नहीं रह पाता कि निर्जीव प्रकृति से मनुष्य जीवन तक की यात्रा के बाद प्रकृति को एक ईश्वर बनाने के लिए विकास क्रम मे क्या करना होगा ! सम्भवतः एक ऐसी सचेतन सत्ता जिसकी सूक्ष्म मानसिक तरंगों पर प्रकृति के सूक्ष्म अणु भी नृत्य कर सकें । दूसरे शब्दों में ईश्वर उस बिन्दु पर ही स्थिति होगा, जिस बिन्दु पर जड और चेतन की सीमा रेखा समाप्त या प्रारम्भ होती है । जीवन की उस सम्भावनात्मक अमरता मे भी जो इस सृष्टि के विनाश के बाद भी गुणधर्म के आधार पर एक बार फिर इस सृष्टि के जैविक पुनर्जन्म का आश्वासन देती है । क्षमा करना स्टीफन हॉकिंग! मुझे तो इसी सम्भावना मे ही जीवन के अमरत्व के दर्शन होते हैं ।


रामप्रकाश कुशवाहा

कवितांजलि

मुर्गे 


मुर्गे सोचते हैं
वे नहीं बोलेंगे तो सुबह नहीं होगी
मुर्गे बोलें तो सुबह हो
मुझे तो मुर्गे वाली सुब्ह ही पसन्द है
आई एस आई और आई एस ओ मार्का सुबह
तो मुर्गो वाली ही होती है
मुझे बताया गया है
सकारी मुर्गे जब भी जहाँ भी जैसा भी बोलें
सिर्फ़ वही और वहीं
सुबह होती है


धीरे- धीरे कराहती हुई सी
रेग रही है समय की ट्रेन
धीरे-धीरे बीतती हुई सी
रीतती हुई सी जिन्दगी
रीत नहीं रही है
बल्कि भरती जा रही है
सपनों से
अपनों से


18/03/2018


परिशासा-महाशिवरात्रि की रात्रि में जागते हुए चिंतन
मैं नहीं जानता कि वे स्वार्थ में हैं या प्रेम में
वे भय में हैं या विनम्रता में
उनका विनम्र एवं पवित्र समर्पण मुझे अभिभूत करता है
उनकी आस्था मुझे ईर्ष्यालु बनाती है
उनका विश्वास मुझे अविश्वास से भर देता है
हे प्रभु !क्या चमत्कार है कि
ये पीढ़ी दर पीढ़ी
सदियों से छले हुए लोग हैं
उनकी आस्था अटूट है
और उनकी जनसँख्या पर्याप्त
और वे सभी चुपचाप अपनी प्रजाति कि अमरता के लिए
समर्पित हैं
मैं जनता हूँ कि वे बार-बार मारे जाने के बावजूद
बचे रहेंगे
कि अस्तित्व की इतनी पुनरावृत्ति है कि
इतनी दुर्घटनाओं -आशंकाओं के बावजूद वे सुरक्षित हैं
हे प्रभु ! इतनी क्रूरता के बावजूद वे कितने आश्वस्त एवं आभारी हैं
उनकी अच्छाइया सारी बुराइयों पर भारी है।



धरती पर जब से बना है जीवन
तब से धरती पर दौड रहा है कुत्ता
एक जीवन के रुप में यह कुत्ता
इस वक्त के विश्व का विशुद्ध वर्तमान है
इस कुत्ते ने बचा रखा है अपने भीतर
सृष्टि की आदिम कोशिका से मिला हुआ जीव - द्रव्य
उसके स्पन्दन और धडकन
चुप-चाप गुडी- मुडी बैठने के बावजूद
वह एक जैविक मशीन की सक्रिय उपस्थिति है
धरती पर करोडों वर्षों से दौडती हुई एक अद्भूत मशीन
यह उतनी ही उम्र का नहीं है
ज़ितनी उम्र का इसे जन्म से अब तक की उपस्थिति के आधार पर देख रहा हूँ मैं
कुत्ता जानता है कि इस दुनिया को
अपने आने से पहले से जान रहा है वह
घूमती हुई धरती पर
पृथ्वी की गतिशीलता से होड़ लेता हुआ
तेजी से दौड रहा है कुत्ता
काल चक्र के समानांतर




आॅख- मिचौनी
( गुज़रते समय मे कवि और कविता)
मैं उनके समय में था और नहीं भी था
और भी बहुत सारे लोग थे उन्के समय मे
जो कविता नहीं कर रहे थे और
चुपचाप जी रहे थे अपनी ज़िन्दगी
वे अपने- अपने घर मे थे
घर के लोगों से घर की भाषा बोलते हुए
एक ऐसे समय मे जब कविता
सिर्फ बाजार की भाषा बोल रही थी
बाजार में कविता
सिर्फ एक आदत थी
जहाँ कुछ लोग बोलतें- बडबडाते हुए
अपने सम्वादी कलरव से भर रहे थे सुने समय को
जैसा कि हम सभी जानते हैं
हर चुप उदास थका हुआ
बोलने को अनिच्छुक आदमी
जनता कहा जाता है
और बोलने वाला कवि
कविता से बाहर का आदमीं
एक अलिखित इतिहास की तरह जीता रहता है
समय मे हुए किसी अदृश्य निवेश की तरह
कई बार बहुत बोलने वाले लोग
चुप्पी पसंद लोगो में सिर्फ चिढ़ और खीज पैञदा करते है
ऐसे लोग प्रायः हिकारत और मजाक से देखते रहते है
कवियों और उनकी कविताओ को
चुपचाप करते रहते हुए दुनिया के सारे काम
बिल्कुल मेरे पिताजी की तरह !



रोना कोई दृश्य नहीं
दृश्य का डूब जाना है
एक पहाड़ी झरने के पीछे
जलते हुए जीवन का
अपने सारे वस्त्र उतार कर 
कूद पड़ना है
अथाह खारे समुद्र में .....




जब तय हो चुका था
क्रान्ति का सारा मज़मून
सिर्फ़ मेरी दस्तखत बाकी थी
और उसके बाद कर दी जानी थी क्रान्ति शुरू हो जाने की घोषणा
मै सहसा उठा और अपनी असहमति को
यत्नपूर्वक बचाए हुए
भविष्य के संकरे दरवाजे की तरफ भागा
तब से मै बाहर हूँ
बीतते- गुजरते परिदृश्य से
चुपचाप दर्शकों मे शामिल
सिर्फ़ देखते हुए गुजरते जुलूसों के दृश्य को
हर जुलूस एक नया पर्यावरण रचने के नारे के साथ
अपने पीछे कुचलती हुई घास
और ढेर सारी गन्दगी छोड़ जाता है
और अपने हिंसक आवेश की हत्यारी स्मृतियों का
कभी भी न भुलाया जा सकने वाला निर्मम इतिहास
वे मेरी आंखों मे झांकते हैं
और मेरी आंखों में
जोश की जगह होश देखकर डर जाते हैं
चीखता है एक असहिष्णु स्वर-
अपने बीच से नहीं है यह विधर्मी -
भगाओ इसे
मै भी स्वयं को वहाँ से भाग जाने के प्रति
सहमत पाता हूँ
ठगे जाने के मानव- इतिहास के
पिछले अनुभवों से डरा हुआ मै
निर्णायक जोश से बार- बार भागता हूँ
अकेले पड़ते होश की तरफ
मै जानना चाहता हूँ कि
मेरे जैसे लोग कितने हैं
क्या इतने है कि एक दिन निकाला जा सके
सिर्फ होश वालों का जुलूस ?




रामप्रकाश कुशवाहा