बुधवार, 15 जून 2016

कविताएँ

समय में और समय में नहीं
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मैं अपने समय में हूँ
मैं इतना स्वतन्त्र हूँ कि
अपने हिस्से के समय को जी सकता हूँ !
लेकिन 'माफ़ कीजिएगा'-मैं अपने प्रति
पुरे सम्मान और सहानुभूति के साथ
आपका अपने समय में न होने का
शोक-गीत लिखना चाहता हूँ !

आपकी तरह मैं भी बीते हुए कल की संतान हूँ
लेकिन आप तो बीता हुआ कल ही हैं
मेरे
समय में और समय में नहीं
 समय के जीवित अतीत !



मित्र का होना


जब सारे शहर में जेबकतरे फैले हुए थे 
मुझे अपने मित्र की याद आ रही थी
मैं सोच रहा था 
कितना फर्क पड जाता है 
इस दुनिया में किसी अपने के मित्र होने या न होने पर 
किस तरह एक अजनबी शहर रिश्तेदार बन जाता है 
एक छोटी सी सूचना के बाद....



अच्छे आदमी


अच्छे आदमी स्व्यं में  महत्वपूर्ण घटना हैं
अच्छे आदमी जो कभी चिढ़ाते रहे हैं शैतान को
सच करते रहे हैं धरती पर होना ईश्वर का

अच्छे आदमी ईश्वर के बिना भी अच्छे रह सकते हैं
जब वे नाराज होते हैं और किसी को भी नहीं मानते
जब वे खुश रहते हैं और आमंत्रण कि मुद्रा में होते हैं
अच्छे आदमी अच्छे ही रहते है 




बिकना 



लोग अपनी  आत्मा बेचकर अहंकार खरीदते हैं
मैं नहीं बिका तो क्या आसमान टूट पड़ेगा
सिर्फ यही न कि मैं धरती में धंस जाऊँगा
या बहुत हुआ तो पाताल तक

न बिकना भी तो सुरक्षित होना है
बाजार को नापसंद करते हुए
घर बसाना भी कोई बुरा सौदा नहीं

लोग घर बेचकर बाजार खरीदते हैं

मुझे  नहीं बेचना  अपना घर ....


कंक – संवेदना


अज्ञातवास में राजा विराट के यंहा 
एक अधीनस्थ  कर्मचारी गुमनाम कंक बनाकर रहना भी 
क्या  और  कितना ही अजीब  अनुभव  रहा होगा  सर्वकालिक  ज्येष्ठ  भ्राता  युधिष्ठिर !
कैसा लगा होगा तुम्हें यह मध्यवर्गीय  अनुभव 
कितना घुटे होगे निषिद्ध  चाकरी  का अनुबंध निर्वाहते  हुए !
यह भी  संभव है  कि तुमने  कूब  मजा  लिया होगा -
हाँ  साहब !  जी साहब ! क्या  खूब साहब !  और  क्यों  नहीं  साहब  बोलते हुए 
और  जब तुम ऐसा  कर रहे होगे तो भीतर से 
यानि  कि  तुम्हारी अंतरात्मा के अनकहे होठों से 
रजा  विराट के  प्रति  क्या वैसी  ही  फूटती होगी  गाली 
जैसी  कि  आज ?
साहब  हो  गया  है तो  अपने को  पता  नहीं  क्या  समझता है ...
खडूस है 
चापलूसी  नहीं  करो तो पचता  ही नहीं खाना 
क्या  डोंट खाने  के  बाद  तुम्हारे भी  मन में उठाता  था वैसा 
आपराधिक  दुर्भाव -कि  मन करता है उसको  अपना जूठा पानी पिला दूं 
उसके शरबत में क्यों  न मिला दूं  अपनी पेश -आब ...
जी हजूरी  करते हुए  भीतर  से  आते  थे 
ऐसे -ऐसे तुममें भी  कितने  कुविचार  
मैं  जानता हूँ  कि तुम्हें  काफी  अप्रिय  और  कटु  अनुभव  करना  पड़ा होगा 
क्योकि  तुम युधिष्ठिर  होते हुए भी 
अज्ञातवास की आजीविका के  लिए 
कंक  होने  का सिर्फ  अभिनय  कर रहे थे 
यह  भी  हो सकता है कि  तुम अपनी दुर्भाग्यपूर्ण 
अल्पकालिक स्थिति का  मजा ले रहे होगे 
जीवन के विराट मंच पर 
एक अपरिहार्य -आवश्यक अभिनय मात्र मानकर 
नौकरी में  अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छिपाकर 
एक ओढ़े हुए कृत्रिम प्रायोजित व्यक्तित्व के साथ जीना 
तुम्हे कैसा लगता रहा भ्राता युधिष्ठिर  !



शेयर 


सिर्फ मैं ही नहीं हूँ 
दूसरे भी हैं मेरे साथ
मेरे समय में .....
सब मेरे लिए नहीं हो सकता
न मैं सभी के लिए हो सकता हूँ
हमें जीना जानना और अधिकार
सभी कुछ बाटना होगा ....
हम सिर्फ इतना ही जान सके हैं अब तक
कि हवा अधिक दबाव से
कम दबाव के क्षेत्र की ओर बहती है
और जल प्रवाहित होता है
ऊपरी तल से निचले तल की ओर ...
लेकिन ज्ञान !
हम अपनी अज्ञानता पर शरमाते हुए भी
चुपके-चुपके दूसरों से सीखते और
स्वयं को सुधारते जाते हैं ,,,,
समस्या कुछ इस तरह है कि
हमारे कसबे में
ज्ञान की एक साथ खुल गयी हैं कई दूकाने
सडक के दोनों ओर
ज्ञान भिक्षुओं का इंतज़ार कर रहें हैं
प्रदाता कोच और उनकी कोचिंग ...
वहां बैठा हर ज्ञानी
पूरेआश्वासन के साथ
जीवन का पूरा सत्र मांगता है ....
सुना है ज्ञानी होना आसान है
लेकिन समझदार होना कठिन
बहुत पहले मेरे गुरु नें दी थी यह चेतावनी
यदि तुम सफलता चाहते हो तो
अपनी अतिरिक्त समझदारी को छिपाए रहो
कि अपने समय के औसत दिमाग से
अधिक समझदार होना खतरनाक है
कि सुकरात मारा गया था अपनी समझदारी
न छिपा पाने के अपराध में
और युधिष्ठिर सिर्फ नैतिक और मूल्यजीवी बने रहने के प्रयास में
पत्नी द्रौपदी से हाथ धो बैठा ....
गुरु नें कुछ ऐसी भी दी थी सीख
कि सिर्फ अपने अहंकार को ही नहीं
अपने स्वाभिमान की उगी हुई सींगों को भी
यत्नपूर्वक छिपाए रहो ..
लोग उनका खुलेआम दिखना बर्दाश्त नहीं करते
कि तन कर खड़े होने से
झुककर बैठना अधिक आरामदायक होता है ''
उनकी सारी सीखों के बाद भी
बार-बार कर जाता हूँ गलतियाँ
जहाँ चुप रहना चाहिए बोल जाता हूँ वहां
जहाँ रुक जाना चाहिए उसके बाद भी लिखता जाता हूँ अलेख्य
उन्होंने यह भी कहा था कि
सुनिश्चित सफलता के लिए-
किसी भी साक्षात्कार में वैसा कुछ भी नहीं बताना
जिसे तुम सच समझते हो और वह वास्तव में सही भी हो
या जो सही होते हुए भी हो इतना मौलिको कि लोग
उसका विश्वास ही न कर सकें
बताना सिर्फ वही और उतना और वैसा ही सच
जितना कि प्रश्न पूछने वाला सच के रूप में जानता हो
जैसा कि सामने वाला जानता हो
और तुमसे भी सुनना चाहता हो ...
गोया ऐसे कि तुम्हें सच को नहीं बल्कि
सच के बारे में पूछने वाले को बूझना है
कि मौकरी पाना है तो सच के दंभ को नहीं
विद्वानों की अज्ञानता के प्रति सम्मान-भाव जीना सीखो
उन्हें प्रभावित करते हुए भी उन्हें इसका पता ही न लगने दो
कि वे तुमसे कितना कम जानते हैं....
(मानों सबसे सफल और सच्चे ज्ञानी
सिर्फ अपने ज़माने की दुर्बलुाताओं से
कदमताल करने वाले लोग हैं )
हे गुरुवर ! तुम्हारी दी हुई सारी शिक्षाएं याद हैं मुझे
लेकिन मैं उनका अतिक्रमण करने का अपराध करता रहा हूँ
अब मैं भी आपकी तरह बूढ़ा और अनुभवी हो चला हूँ
लेकिन मुझे लगने लगा है कि
हमेशा सुरक्षित और अनुशासित जीवन जीना
मानव जाति के हित में नहीं होता
कि इस दुनिया को बदलने के लिए
कुछ रोमांचक और मौलिक मूर्खताएं भी घटित होती रहनी चाहिए
कभी-कभी निकलना ही चाहिए बुद्धं की तरह
महल और सुख की सारी चिंताएं छोड़ कर ...
चुनना चाहिए अपमानों और अपराधों का शिकार होने की
संभावनाओं वाला जोखिमपूर्ण वर्जित रास्ता
नए बेहतर रास्तों की खोज के लिए ....
बाहर के सारे रस्ते भीड़ से भरे हुए हैं
बेहतर क्या होगा किसी के भी लिए -
वह यात्रा स्थगित कर दे और घर से ही न निकले
निकले और वह भी डूब जाए भीड़ को चीरते-तैरते हुए अपने गंतव्य की ओर
भीड़ के छटने का और पथ के मुक्त होने का इंतजार करे
स्वयं रुका रहे दूसरों को रास्ता देने के नाम पर
या दूसरों के साथ चले ....
सच तो यह है कि इसमे से कुछ भी सोचनीय नहीं है
कि जनसँख्या-वृद्धि ( भीड़} मानव जाति के उत्तरधिकरियो
प्रतिनिधियों का वैकल्पिक उत्पादन है
कि हर व्यक्ति वैकल्पिक और फालतू रूप से पैदा हुआ है
मानव-जाति की सुरक्षा और अस्तित्व की निरंतरता के लिए
हर व्यक्ति अपनी ओर से कुछ बोलना चाहता है और शोर उत्पन्न कर रहा है
एक समय में कुछ लोगों के चुप होने की जरुरत है कि
कुछ अच्छा बोलते लोगों को साफ-साफ सुना जा सके
इस सच्चाई की परवाह किए बिना कि
कि एक समय में अधिकांश लोग
एक जैसा ही सोचते-समझते और बोलते हैं ..
शर्त सिर्फ इतनी ही है कि जो बोल चुके हैं
उनका चुप होकर बैठ जाना जारी रहना चाहिए
कुछ बोलते लोग एक ही बात दुहराए जा रहे हैं मंच पर
यद्यपि वे थक गए हैं
फिर भी बोलते हुए दिखना चाहते हैं देर तक
मेरे पास अपने बोलने का कोई वाजिब कारण नहीं है
सिर्फ इस चिढ़ के अतिरिक्त
कि जो बोला जा रहा है उससे मेरी असहमति बढ़ गयी है
तब जबकि मैं न भी बोलूँ
सभी को सुनते रहने के लिए अभिशप्त हूँ
अस्तित्व की आवृत्ति एवं बारम्बारता वाली दुनिया में
जबकि संगठित होकर अपराध करने वाले गलत्कारियों की संख्या बढ़ गयी है
हमें इस दुनिया को शेयर करते हुए ही जीना चाहिए
छोड़ कर बार-बार हटने की इच्छाओं के बावजूद
मैं अभी फेसबुक पर बना रहना चाहूँगा
शेयर करते हुए
जो जहाँ और जितना है
वहां और उतना उसके लिए उसके हिस्से की दुनिया छोड़कर ....
( श्रद्धेय गुरुवर स्वर्गीय विजय शंकर मल्ल जी की पावन स्मृति को समर्पित )
३१.०५.२०१६


मातृ-शोक


माँ की अन्तिम यात्रा के बाद
कुछ हुआ है ऐसा कि
जब मैं लौटना चाहता हूँ घर को
घर अब घर की तरह नहीं रह गया है
वह उदास और धूसर है
किसी भी जीवन-संवाद से वंचित
उनकी जड़ता की अन्तिम स्मृति की तरह ....

जैसे गुजराती हुई ट्रेन से दृश्य बदलता है
जितनी तेजी से दृश्य बदलता है
उतनी तेजी से भागता हुआ लगता है समय
बचपन में हमारा सोना-जागना –उठाना –गिरना खेलना
खाना-पीना हँसाना –बोलना चीखना
चाहे वह आँगन में ही क्यों न रहा हो
वे सारे दृश्य एक पीछे छुट गयी यात्रा की तरह लगते हैं ...

पड़ोसियों के ढेर सारे बच्चो सहित हम सारे नन्हे मित्र
आज एक बड़ी परियोजना के हिस्से की तरह याद आते हैं
उन दिनों जब ढेर सारी माएं
नयी पीढ़ी की उंगलियाँ पकड़ कर उन्हें चलना सीखा रही थीं
उस भीढ़ में माँ मेरे लिए  कुछ खास थीं
और मैं भी उनके लिए
यह एक विशिष्टता और अनन्यता का रिश्ता था .....
पिता की उनपर सारी आसक्ति और रीझ के बावजूद
तब तक मैं यह नहीं जानता था कि
मेरी माँ भी एक परी थीं
और दिखाई न देने के बावजूद
अपने भीतर छिपाए हुए हैं एक अदृश्य पंख
और एक दिन उड़ जाएंगी एक अज्ञात देश समय के साथ
सारे पुत्र मोह के बावजूद अपने वार्धक्य की अशक्तता से लाचार
अपने पुत्र को लोक और समय में छोड़कर......

इस सच के साथ कि दुनिया की सारी मृत्युएँ एक दुर्घटना ही होती हैं
चाहे वे कितनी ही प्राकृतिक क्यों न हो
इस सच के साथ कि आदमी का बच्चा
जितना लम्बा समय सयाना होने में लगता है
उससे कम समय नहीं लगता उसे बूढ़ा होकर मरने में ...
इस सच के साथ कि सारे ईश्वर ,सारे धर्मं और क़ानून
या फिर बिना ईश्वर धर्म या क़ानून के
हर मनुष्य का यह सामाजिक जीवनाधिकार है कि
उसे सेवादार  शांतिपूर्ण  सुखद और सम्मानित म्रत्यु मिले
तमाम असुविधाओं के बीच मैं अपनी माँ को धरती की तरह बचाए रखना चाहता था ...
अकेले में बुदाबुताते हुए
कि हे काल इतनी भी जल्दी क्या है
माँ से भी मैं कहता ही रहता था
कि बुढ़ापा और म्रत्यु तो जीवन का भद्दा मजाक है
वह जीवन का वांछित नहीं ,बल्कि जीवन की मजबूरी है
उसके बारे में सोचकर क्या चिंता करना
आप सिर्फ शांतिपूर्वक  जीने पर ध्यान दें
वृद्धावस्था की लाचारी के अपने सारे अपमानबोध के बावजूद
वे धीरे-धीरे बुढ़ापे को  जीने की जिदा के साथ जीतते हुए जीना सीखा रही थीं ....

जीने की भरपूर इच्छा के विरुद्ध
उनकी म्रत्यु भी एक दुर्घटना ही थी
जब उनकी देह नें उनकी एक न सुनी ...
उस पल को याद कर
मैं अभी भी कविता लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूँ ...

मैं नहीं जानता कि माँ के मरने का भूकंप से क्या रिश्ता हो सकता था
माँ का धरती से क्या रिश्ता हो सकता है
उनकी म्रत्यु के बाद क्यों विचलित हो गयी धरती !
गत १८ अप्रैल २०१५ को घर के आँगन की अनापेक्षित घास नोचते हुए
किसने उनकी साँस पर प्रतिबन्ध लगा दिया
बिना मुझसे पूछे ....वह भी तब
जबकि निश्चय ही वे
मेरे आने की आहट की प्रतीक्षा में होंगी
काल जिसकी आत्मा निश्चय ही किसी निर्मम हत्यारे मनुष्य की है
या फिर वह अन्धकार की सारी कालिमाओं से बना हुआ कोई महासर्प ही होगा
जो चिढ़ता होगा जीवन की हर मुस्कान से
या फिर एक अर्थहीन और मुर्खता पूर्ण यांत्रिक स्थगन
जिसके फलस्वरूप मेरी माँ धरती पर ही चिर निद्रा में सो गयीं
जबकि वे मुझे यानि कि अपनी जैविक कलाकृति को
आँखे  हमेशा के लिए बंद हो जाने तक जीते रहना चाहती थीं ..

काल का रावण उनके बेटे कलयुगी राम को
एक बार फिर नौकरी रूपी सोने के हिरन का पीछा कराते
उनके अन्तिम पल से बहुत दूर लेकर चला गया था
मेरे अधिकारी का कहना था कि नौकरी देश के सेवा के लिए की जाती है
और नौकरी यानि मातृभूमि यानि  कर्तव्य के लिए
माँ का शहीद हो जाना भी एक तुच्छ घटना है
कि नौकरी जनहित में की जाती है जबकि माँ हमेशा व्यक्तिगत होती है
यह एक यांत्रिक , अमानवीय और संवेदनशून्य सत्ता का तर्क था
जिसके विरुद्ध मैं पूरे दो वर्ष तक
रात्रि सेवा और संग के लिए उनके पास पहुंचता रहा ....

चालाकियों और झूठ के इस गंदे-अंधे दौर में
उनके अविश्वास के सम्मान में
कई बार इच्छा हुई कि मैं अपनी लाचार माँ के प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करूँ
कि बुढ़ापा किसी भी बीमारी से बढ़ कर है
कि पागलो,बूढों,विकलांगों,बेरोजगारों से लेकर अयोग्यों एवं असफलों तक
परिवार अब भी अन्तिम शरण और जीवित संस्था है
जबकि सरकारें अब भी गैरजिम्मेदार और बाजारू
कभी –कभी तो मध्ययुगीन कबीलों के वारिसों से संचालित ...

मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरी माँ नें जितने वर्षों तक मुझे
अपनी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया
और अपने हांथों अपना भोजन पका लेने तक मुझे बड़ा किया
उतने वर्षों तक मेरी भुजाओं का सहारा माँगने का उन्हें अधिकार है ...

मेरे कार्यस्थल के सर्वाधिक भ्रष्ट पतित और झूठे (अ )सहयोगी
माँ के प्रति मेरी सतत चिंता को
माँ के नाम पर मांगी गयी मेरी अवकाश –प्रार्थनाओं को
मेरी दीर्घकालिक यानि कि स्थाईचालाकी का हिस्सा मानते थे ....

तो क्या मेरी माँ इस लिए दिवंगत हो गयीं कि
मेरी माँ सबको अपने अन्तिम संस्कार दिवस पर बुलाकर
यह दिखाना चाहती थीं कि देखो मेरा बीटा झूट नहीं बोल रहा है
कि मैं सचमुच ही अस्वस्थ थी अन्यथा यह दुनिया छोड़कर जाती ही क्यों !

यह समाज जो इतना झूठा और असम्वेदनशील हो गया है कि
कि वह सच बोलने वाले को मुर्ख या झूठा समझता है
उनका इतने अपमानो के बीच जीना और जाना
दोनों ही जैसे धरती को बर्दाश्त नहीं हुआ
उनकी अनैक्छिक एवं अवांछित मृत्यु को यादकर ही जैसे यह धरती क्रोध से कम्पने लगी 
शायद जंगलों के काटे जाने और शेरों के मार दिए जाने से
पूरी तरह नरभक्षी हो चुका काल भूखा था
उसे अपनी क्षुधा –शांति के लिए अभी भी और माओं की जरुरत थी
मैं अपने ही दुख और क्षोभ से बुरी तरह डर गया था
मैंने अपने मातृशोक और भूकंप में अजीब सा रिश्ता देखा
मैंने अपनी माँ कीई आत्मा की शांति के लिए
भविष्य में शान्तिचित्त बने रहने और दुख-बोध को
न जीने का संकल्प लिया     


चेहरों की यह किताब ....



आदमी का शक्ल लेकर घुमती हैं यहाँ
बेहद अक्लमंद और कम - अक्ल दोनों ही
अपने होने को प्रदर्शित कर रहे होते हैं
ऐसा लगता है कि जैसे किसी चोर-दरवाजे से
झांक कर देख रहे हों लोगों के भीतर का सच .....
कुछ चुपचाप अकेले  पड़े हैं फेसबुक पर
तो कुछ गिरोह बंद रूप में
कुछ बेहद शालीन तो कुछ खतरनाक इरादों के साथ
कुछ सुखद झोंकों की तरह तो कुछ तूफानी
कुछ इंसानियत से भरे तो कुछ शैतानी
अजब -गजब है फेसबुक यानि चेहरों की यह किताब ....
साहित्यिक इतिहास का समाजधर्मी पुनः पाठ



यह दुनिया


यह दुनिया जो एक मकड़ी के जाले की तरह है
और मैं भी हूँ उस जाले का एक तार
दूसरों से जुड़ा हुआ
जोड़ता हुआ दूसरों से
दूसरों से बंधा हुआ
बांधता हुआ दूसरों को
मेरा हिलना हिलाता है दूसरों को
मेरा टूटना तोड़ देता है -
संवेदना के कोमल तार
इसी जाले पर दौड़ती है समय की मकड़ी

मैं एक अदृश्य बुनावट का हिस्सा हूँ समाज की
मेरा होना सिर्फ अकेले का
अपनें असम्बद्ध एकांत में होना नहीं है
शायद इसीलिए जब मैं दूसरों को तोड़ता हूँ
स्वयं टूट जाता हूँ
जब मैं छोड़ता हूँ दूसरों को
स्वयं छूट जाता हूँ
मेरी यात्रा एक सामूहिक यात्रा है सम्पूर्ण मानव -जाति की

शायद इसीलिए
मेरे सौभाग्य का ईश्वर
मेरे मित्रों और मेरे चाहने वालों की
शुभकामनाओं से बना हुआ है
दूसरों कोमुझसे मिलाने वाली ख़ुशी में रचा-बसा है
मेरी आत्मा का सच्चिदानन्द !

और मेरे दुर्भाग्य का शैतान भी
मुझे नापसन्द करने वालों की घृणा में छिपा हुआ है
उनकी अरुचि से बना हुआ है
मेरे निर्णयों के प्रति असहमतियों से बना है
मेरे अस्तित्व और सार्थकता का प्रतिपक्ष

मेरा अच्छा या बुरा होना
सिर्फ मेरे भीतर का ही
मेरे भीतर तक ही होना नहीं है।



शून्यकाल के नायक


बाजार में एक ही शिखर था
बिल्कुल एवरेस्ट की तरह
घटता-बढ़ता रहता था लेकिन
झुककर किसी ऊंट की तरह कर्इ बार
किसी अदने से व्यकित को भी बिठा लेता था अपनी पीठपर
फिर उसे बहुत दूर से दिखता और दिखाता था किसी शाहंशाह की तरह
एक ही एवरेस्ट की पीठ पर सब चढ़ना चाहते थे एक दिन
कूबड़ ही एवरेस्ट का था समय का पैमाना बना हुआ
दूल्हे और बारात के आने की प्रतीक्षा और पूर्वाभ्यास में
कुछ लोग बैठकर ऊंघ रहे थे एवरेस्ट की पीठ पर
समय के सूनेपन को भरते हुए
शून्यकाल के नायक!
बाजार में
यह एक मेले का एवरेस्ट था
जहां कुछ शराबी
अपने-अपने सिर पर अपने जीवन का बोझ उठाए
थकी हुर्इ यात्री भीड़ की पीठ पर
इतिहास की दिशा का पोस्टर चिपका रहे थे ।

समय के कैंसर


जब हम एक जगह किसी मानवीय भूमिका में उपस्थिति होते हैं तो
उसी समय किसी अन्य मानवीय भूमिका के लिए
सामाजिक रूप से अनुपस्थित भी होते हैं
जब हम बन जाते हैं व्यवस्था के एक हिस्से के पुर्जे
दूसरे हिस्सों के लिए होते जाते हैं असंगत
कोई भी सर्वव्यापी नहीं हो सकता
एक व्यक्ति के रूप में
लेकिन प्रभाव के रूप में हो सकता है
उन संगठनो के कारण
जो एक व्यक्ति के विवेक कोसभी का विवेक बना देते हैं
होते हैं जिनके पास अपने ही समय के बंधुआ मस्तिष्क
और जो महानता की ओट में शर्मनाक ढंग से
दूसरों को स्थगित और निरस्त करते हुए 
दूसरों के नाम पर सोचते हैं
और बन जाते हैं समय के कैंसर



अवसाद 

उतना सौंदर्य कहाँ जी पाउँगा 
इस दुनिया के नेपथ्य में चली गयी है वह दुनिया 
जिसे मैं दुनिया जानता था 
पहले पिता गए 
और आँगन में उतर आई चिलचिलाती धूप 
पेड़ चुपचाप अतीत में  गए 
कंकरीट का जंगल  देखकर 
हवाएं मुंह ढक कर खांसने लगीं 
फिर माँ वाष्प बनकर अदृश्य हो गईं 
समय का असहनीय सूरज तपने लगा सर पर 
मैं एक घबराई हुयी भीड़ के पैरों तले फेंक दिया गया हूँ  

दर्शकदीर्घा से 

हर सुबह अखबार में छपता है 
तीन मरे तेरह घायल 
अखबार जो काली स्याही से छपे होते है 
छिपा लेते है सडकों पर फैले हुए लाल रक्त ....

रोती हुई स्त्रियाँ और बच्चे 
दूर कही खो जाते है 
खबरों की भीड़ के पीछे 

सुबह की गर्म चाय के साथ 
हम अपने सुरक्षित बचे रह जाने की 
खुशियाँ मानते हैं 
खुशियां मनाते हैं कि 
सुरक्षित बच गए है सारे स्वजन 

कि  अब भी बची हुई है 
हमारे निकट संबंधों की दुनिया 
हमारी जानी - पहचानी दुनिया बची हुई है 

सड़क पर पड़ी लावारिस लाश के 
अन्त्य कर्म के लिए 
क्रमशः पुलिस है कुत्ते है कीड़े हैं 

घटनाओं और बाहरी दुनिया से अलग हम जी रहे हैं 
अख़बारों में छप जाने से बचते-बचाते 
सुबह के अखबार और चाय के साथ 
गुनगुनी प्यारी धुप के साथ 
और अपनी बची हुई दुनिया के लिए 
सभी के प्रति अंतहीन आभार के साथ 
बैठे हुए दर्शक दीर्घा में 



द्रौपदी-प्रसंग'

यद्यपि तुम जानते थे कि व्यास जी का कैमरा लगा हुआ है
पूरे देश और उसके भविष्य के लिए
हो रहा है उसका आन -लाइन प्रसारण ....

क्या कहीं भीतर से जाग उठा था तुम्हारा शरारती विचारक !
या तुम मारना चाहते थे समूची भारतीय संस्कृति के गाल पर
प्रश्न का एक करारा तमाचा?
कि कन्या को भी दान में लेने-देने की वस्तु मानते हो
तो लो मैंने दिया

या फिर नकारात्मक मानसिकता के अभिशप्त क्षणों में
तुमने अर्जुन के कौशल और पुरुषार्थ से जीती हुई
और माँ की आज्ञा से मुफ्त में मिली द्रौपदी को
सिर्फ अपना अधिकार जताने के लिए यूं ही दान कर दी....

क्या दाम्पत्य के अन्तरंग क्षणों में
सिर्फ अर्जुन को वरण करने वाली द्रौपदी
तुम्हें कभी भी भीतर से अपना पति
स्वीकार नहीं कर पायी ?

क्या कुंती नें भी अपनी बहू को
सिर्फ इसी लिए पांच पतियों के बीच बाँट दिया कि
कल उनकी बहू सबकुछ जानने के बाद
अपनी सास के चरित्र पर उंगली न उठाए
कि उसकी बहू अपनी सास को नियोग के लिए
अलग-अलग पुरुषों से समागम करने वाली स्त्री न समझे...

या तुम द्रौपदी के असमान व्यवहार से
उपेक्षित आहत अपमानित और दुखी थे
भीतर ही भीतर दुर्योधन की तरह ही
उसकी प्रखर तर्क-बुद्धि से आतंकित और
उसके व्यंग्य बाण मारने की प्रवृत्ति से आहत थे...

या तुम्हें भीतर ही भीतर पूरा अंदेशा था
और सुनियोजित थे तुम कि
कौरव सत्ता का घृणास्पद चेहरा
पूरी तरह खुलकर सामने आए
और तुमने पूरी तरह कर दिया
अपने कुटुम्ब को उनके हवाले
उनके विवेक की प्रकृति और स्वभाव के
सार्वजनिक निदर्शन के लिए

सोमवार, 13 जून 2016

ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद

पुरोहितवाद और ब्राह्मणवाद : उत्थान और पतन
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भारतीय धर्म ,ईश्वर और दर्शन के अनेक रूप हैं जिसमें से शैव दर्शन और धर्म सबसे प्राचीन है .इसके प्रतीकों में आदिम मनुष्य का प्रकृति की रहस्यमय सृजन (प्रजनन} शक्ति का रहस्यमय साक्षात्कार देखा जा सकता है. आर्योंमेंअग्नि-पूजाऔर यज्ञ-हवन का जो धार्मिक संस्कार मिलता है ,उसका प्राचीन सहवर्ती संस्करण जरथ्रुस्थ केअवेस्ता और पारसियों में मिलने वाली अग्निपूजा में देखा जा सकता है. पुराणों में दक्ष के यज्ञ प्रकरण तक यह स्मृति बनी हुई है और यह आज भी भारतीय धार्मिक संस्कारों का प्रमुख हिस्सा है. यही एक ऐसा धार्मिक संस्कार है जो प्राचीन आर्य कबीलों के पूर्वज पुरोहितों से लेकर आज तक अक्षुण्ण रूप से धार्मिक परंपरा में चला आ रहा है. वेदों से स्पष्ट है कि प्रारंभ में आर्य प्रकृति-पूजक थे. उनमें ब्रह्म की अवधारणा का विकास उपनिषद् काल से थोडा ही पहले संभवतः शैव या पाशुपत धर्म केप्रभाव से हुआ होगा . जब उन्होंने कूछ प्रसिद्ध व्यक्तियों कीअसाधारण मानसिक शक्तियों का रहस्य सर्वसुलभ बनाने के प्रयास में चिंतन-मनन और गंभीर होकर किया होगा. जीवन की रहस्यमय दिव्यता का साक्षात्कार ब्रह्म के रूप में किया होगा . भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर मुझे संस्कृत के ब्रह्म में मिलने वाली 'ब्र' धातु और अंग्रेजी के' ब्राइट (चमकीला) शब्द के 'ब्र' धातु में निकट का सम्बन्ध दिखता है. सृष्टि में दिखने वाली रहस्यमय चेतन जीवनी शक्ति को ही उन्होंने सर्वव्यापी ब्रह्म तत्व के रूप में देखा होगा . उपनिषद् काल के बाद आर्यों - पुरोहितों नें इस ब्रह्मवादी दर्शन को व्यापक शास्त्रार्थों के बाद सर्वसम्मति से स्वीकार करते हुए स्वयं को ब्राह्मण कहना शुरूकर दिया . क्योंकि सामाजिक वर्ग-संरचना पुरोहित वाली ही रही .इसलिए ब्राह्मण,पुरोहित और पंडित शब्द नाम-परिवर्तन के बाद भी एक ही जातीय अस्तित्व का पता देते रहे. यही कारण है कि पुरोहितवाद को ब्राह्मणवाद कहने वाले आज भी कम नहीं है और यह शब्द भी ब्राह्मण के जातीय कर्म का ही विशेषण परक अर्थ प्रस्तुत करता है. उर्जा-सिद्धान्र की तरह एक दार्शनिक प्रत्यय होने के कारण ब्रह्म-वाद मुझे आज भी आकर्षित करता है. प्रकृति की रहस्यमय शक्तियों के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापक वेदकालीन रिचाओंमेंभीकुछ आपतिजनक नहीं दिखता बल्कि उनकी पवित्र समर्पण-भावनाअभिभूत ही करती है. जीवन को यज्ञ मानने वाली भारतीय दार्शनिकी में भी जीवन जीने के रहस्य का एक रूपक ही छिपा हुआ है.वनाच्छादित प्राचीन समय में निरंतर अग्नि प्रज्वलित रखना और अग्नि-देव का जूठन या प्रसाद जिसे आज हम पकाना भी कहते हैं सुरक्षित खाने की खोज का ही एक रूप लगता है .ऐसा प्रतीत होता है कि डायनासोर को समाप्त करने वाले उल्का-पात और उसके पश्चात के दीर्घकालीन अन्धकार-युगऔर हिम-युग का सामना मानव-जाति के पुरखों नें ज्वालामुखियों से प्राप्त अग्नि को पालतू बना कर ही किया होगा .भारतीयों में विशेष रूप से ब्राह्मणों की जातीय परंपरा एवं कर्मकांडों में में ये सारे अतीत जातीय स्मृति के रूप में सुरक्षित हैं. इनमें से अधिकांश दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थवत्ता भी रखने के कारण प्रतिगामी नहीं भी माने जा सकते हैं. इनमें आदिम मनुष्य की काव्यानुभूति छिपी है. संभवतःइसीलिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने क्रांतिकारी सुधारों में इनका भी विरोध शामिल नहीं किया.
प्रश्न यह उठता है कि ब्राह्मणों नें ऐसा कौन सा अपराध किया है कि आज ब्राह्मणवाद एक गाली बन चूका है. इसके उत्तर का ऐतिहासिक आधार यही है कि वे स्वयं को जातीय रूप में तो ब्राह्मण ही समझते रहे लेकिन भारत से बौद्धों के उच्छेदन (पुष्यमित्र शुंग के बाद) के परवर्ती दौर में स्वयं शासक बन जाने के कारण दूषित स्वार्थ बद्ध ,मानवता-विरोधी और धर्म-भ्रष्ट हो गए. ब्राह्मण पुरखे जिस कलि-युग की चर्चा करते हैं वह उनमें ही आकर बैठ गया है. उन्होंने सभी प्राणियों में ब्रह्म का दर्शन करना छोड़ दिया. भारतीयीा्मूल के मानव-समाज नें जो उन्हें ईश्वर से जुड़ने के कारण सिर-आँखों पर बैठा रखा था उसे विषमता के पक्ष में प्रक्रति और ईश्वर द्वारा ब्राह्मणों को प्रदत्त विशेषाधिकार के रूप में प्रचारित किया. शुंग-काल में ही पुराणों का पुनर्लेखन हुआ. भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से महाभारत के बाद संभवतःइसी काल में वाल्मीकि रामयण की भी रचना हुई. तथा बोद्धों और शूद्रों की हत्याओं को जायज ठहराने के लिए पुष्यमित्र शुंग के दरबारी ब्राह्मणों नें अपने आदर्श के पीछे सत्ता छोड़ने वाले राम के हाथों में भी शम्बूक वध का प्रसंग प्रक्षिप्त करा दिया. ऐसा इसलिए कि अंतिम मौर्य शासक के हत्यारे महामंत्री पुष्यमित्र शुंग को राम का दर्जा दिया जा सके.जनता में यह प्रचारित करने के लिए कि पुष्यमित्र शुंग नें अपने राजा का वध करके विश्वासघात का कोई सामाजिक अपकर्म नहीं किया है बल्कि एक नास्तिक धर्म को मानने वाले शूद्र राजा का वध किया है जो धर्म-सम्मतहै.
प्रश्न फिर वही रह गया है कि ब्राह्मणों में बुरा क्या है. वह भी तब जबकि मेरे जीवन के सबसे अच्छे मित्रों में से अधिकांश वे सहपाठी रहे हैं जिनका जन्म ब्राह्मण घरों में ही हुआ है-मैं ब्राह्मण-अपराध का वास्तविक स्वरूप उसके उस अंधेपन में ही देखता हूँ जिसकी ओर कभी कबीर नें इशारा किया था. वेस भी वे ब्रह्म यानि जीवन की विलाक्षणता का दर्शन करने वाली आँखे खो चुके हैं. वे समदर्शी रूप में नहीं बल्कि विषमतादर्शी रूप को जी रहे हैं . मेरी यह समझ में नहीं आता कि वे शूद्रों में ब्रह्म की व्याप्ति से प्राचीनकाल में मनुस्मृति लिख कर इंकार कर चुके हैं तथा आज उनसे प्रभावित राजनीतिक संगठन मुसलमानों और ईसाईयों में व्याप्त अपने ही ब्रह्म को देख नहीं पाते वे संकीर्णता दर्शन. के वाहक बन चुके हैं. आध्यात्मिक प्रेम के नहीं बल्कि घृणा के प्रचारक हैं.उन्हें सामने के वर्त्तमान मनुष्य में निहित संभावनाएं और उनके अस्तित्व और जीवन की दिव्यता नहीं दिखती. वे सिर्फ अतीत पर रीझे हुए लोग हैं और उनके पक्ष में वर्तमान मनुष्यों का यथाशक्ति अपमान ही किया करते हैं.
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो ब्राह्मणवादी धर्म (जिसे वास्तव में पुरोहितवाद कहना चाहिए ) का विकास महाजनपदों में सामंतवाद के एक रूप राजतंत्र के संरक्षण के लिए किया गया था-इसमें पुरोहित (ब्राह्मण) स्वाभिमान रहित होकर जिसे आध्यात्मिक भाषा में अहंकार रहित होकर राजा और ईश्वर के सामने झुकने और अधीनता स्वीकार करने -कराने का अभ्यास कराता है.उसे आप गुलामी का पवित्र-धार्मिक प्रशिक्षक भी कह सकते हैं.अब जब पुरोहित लोग ब्रह्मवाद को मानने के कारण स्वयं को ब्राह्मण कहने लगे तो आजकल यह भर्त्सना ब्राह्मणवाद नाम से ही की जाती है.ब्राह्मणवाद को एक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में ही लेना चाहिए ,जातीय अपमान के रूप में नहीं.क्योंकि भारत में जातीयता के विकास के लिए सभी लोगों के पुरखे जिम्मेदार हैं इसलिए सभी बुराइयों के लिए सिर्फ ब्राहमणों को ही जिम्मेदार ठहराना अतिरेकपूर्ण हो सकता है.लेकिन कुछ सांस्कृतिक आदतों से बाहर निकलने के लिए ब्राहमणों और गैर ब्राहमणों सभी को जागरुक होना पड़ेगा.

यह स्वीकार करते हुए कि हर विचारधारा की तरह ब्राह्मण-मूल्यों का भी एक स्वर्णिम प्रगतिशील अवदान काल रहा है. प्राचीन भारत में चाणक्य और आधुनिक भारत में महामना मदन मोहन मालवीय के रूप में मुझे प्रगतिशील ब्राहमण धर्म का भी सच्चा (अवतारी!) स्वरूप दिखता है.एक अलग आयाम में आदि शंकराचार्य में भी.

मंगलवार, 31 मई 2016

शेयर और गुरु-मंत्र

सिर्फ मैं ही नहीं हूँ 
दूसरे भी हैं मेरे साथ
मेरे समय में .....
सब मेरे लिए नहीं हो सकता
न मैं सभी के लिए हो सकता हूँ
हमें जीना जानना और अधिकार
सभी कुछ बाटना होगा ....
हम सिर्फ इतना ही जान सके हैं अब तक
कि हवा अधिक दबाव से
कम दबाव के क्षेत्र की ओर बहती है
और जल प्रवाहित होता है
ऊपरी तल से निचले तल की ओर ...
लेकिन ज्ञान !
हम अपनी अज्ञानता पर शरमाते हुए भी
चुपके-चुपके दूसरों से सीखते और
स्वयं को सुधारते जाते हैं ,,,,
समस्या कुछ इस तरह है कि
हमारे कसबे में
ज्ञान की एक साथ खुल गयी हैं कई दूकाने
सडक के दोनों ओर
ज्ञान भिक्षुओं का इंतज़ार कर रहें हैं
प्रदाता कोच और उनकी कोचिंग ...
वहां बैठा हर ज्ञानी
पूरेआश्वासन के साथ
जीवन का पूरा सत्र मांगता है ....
सुना है ज्ञानी होना आसान है
लेकिन समझदार होना कठिन
बहुत पहले मेरे गुरु नें दी थी यह चेतावनी
यदि तुम सफलता चाहते हो तो
अपनी अतिरिक्त समझदारी को छिपाए रहो
कि अपने समय के औसत दिमाग से
अधिक समझदार होना खतरनाक है
कि सुकरात मारा गया था अपनी समझदारी
न छिपा पाने के अपराध में
और युधिष्ठिर सिर्फ नैतिक और मूल्यजीवी बने रहने के प्रयास में
पत्नी द्रौपदी से हाथ धो बैठा ....
गुरु नें कुछ ऐसी भी दी थी सीख
कि सिर्फ अपने अहंकार को ही नहीं
अपने स्वाभिमान की उगी हुई सींगों को भी
यत्नपूर्वक छिपाए रहो ..
लोग उनका खुलेआम दिखना बर्दाश्त नहीं करते
कि तन कर खड़े होने से
झुककर बैठना अधिक आरामदायक होता है ''
उनकी सारी सीखों के बाद भी
बार-बार कर जाता हूँ गलतियाँ
जहाँ चुप रहना चाहिए बोल जाता हूँ वहां
जहाँ रुक जाना चाहिए उसके बाद भी लिखता जाता हूँ अलेख्य
उन्होंने यह भी कहा था कि
सुनिश्चित सफलता के लिए-
किसी भी साक्षात्कार में वैसा कुछ भी नहीं बताना
जिसे तुम सच समझते हो और वह वास्तव में सही भी हो
या जो सही होते हुए भी हो इतना मौलिको कि लोग
उसका विश्वास ही न कर सकें
बताना सिर्फ वही और उतना और वैसा ही सच
जितना कि प्रश्न पूछने वाला सच के रूप में जानता हो
जैसा कि सामने वाला जानता हो
और तुमसे भी सुनना चाहता हो ...
गोया ऐसे कि तुम्हें सच को नहीं बल्कि
सच के बारे में पूछने वाले को बूझना है
कि मौकरी पाना है तो सच के दंभ को नहीं
विद्वानों की अज्ञानता के प्रति सम्मान-भाव जीना सीखो
उन्हें प्रभावित करते हुए भी उन्हें इसका पता ही न लगने दो
कि वे तुमसे कितना कम जानते हैं....
(मानों सबसे सफल और सच्चे ज्ञानी
सिर्फ अपने ज़माने की दुर्बलुाताओं से
कदमताल करने वाले लोग हैं )
हे गुरुवर ! तुम्हारी दी हुई सारी शिक्षाएं याद हैं मुझे
लेकिन मैं उनका अतिक्रमण करने का अपराध करता रहा हूँ
अब मैं भी आपकी तरह बूढ़ा और अनुभवी हो चला हूँ
लेकिन मुझे लगने लगा है कि
हमेशा सुरक्षित और अनुशासित जीवन जीना
मानव जाति के हित में नहीं होता
कि इस दुनिया को बदलने के लिए
कुछ रोमांचक और मौलिक मूर्खताएं भी घटित होती रहनी चाहिए
कभी-कभी निकलना ही चाहिए बुद्धं की तरह
महल और सुख की सारी चिंताएं छोड़ कर ...
चुनना चाहिए अपमानों और अपराधों का शिकार होने की
संभावनाओं वाला जोखिमपूर्ण वर्जित रास्ता
नए बेहतर रास्तों की खोज के लिए ....
बाहर के सारे रस्ते भीड़ से भरे हुए हैं
बेहतर क्या होगा किसी के भी लिए -
वह यात्रा स्थगित कर दे और घर से ही न निकले
निकले और वह भी डूब जाए भीड़ को चीरते-तैरते हुए अपने गंतव्य की ओर
भीड़ के छटने का और पथ के मुक्त होने का इंतजार करे
स्वयं रुका रहे दूसरों को रास्ता देने के नाम पर
या दूसरों के साथ चले ....
सच तो यह है कि इसमे से कुछ भी सोचनीय नहीं है
कि जनसँख्या-वृद्धि ( भीड़} मानव जाति के उत्तरधिकरियो
प्रतिनिधियों का वैकल्पिक उत्पादन है
कि हर व्यक्ति वैकल्पिक और फालतू रूप से पैदा हुआ है
मानव-जाति की सुरक्षा और अस्तित्व की निरंतरता के लिए
हर व्यक्ति अपनी ओर से कुछ बोलना चाहता है और शोर उत्पन्न कर रहा है
एक समय में कुछ लोगों के चुप होने की जरुरत है कि
कुछ अच्छा बोलते लोगों को साफ-साफ सुना जा सके
इस सच्चाई की परवाह किए बिना कि
कि एक समय में अधिकांश लोग
एक जैसा ही सोचते-समझते और बोलते हैं ..
शर्त सिर्फ इतनी ही है कि जो बोल चुके हैं
उनका चुप होकर बैठ जाना जारी रहना चाहिए
कुछ बोलते लोग एक ही बात दुहराए जा रहे हैं मंच पर
यद्यपि वे थक गए हैं
फिर भी बोलते हुए दिखना चाहते हैं देर तक
मेरे पास अपने बोलने का कोई वाजिब कारण नहीं है
सिर्फ इस चिढ़ के अतिरिक्त
कि जो बोला जा रहा है उससे मेरी असहमति बढ़ गयी है
तब जबकि मैं न भी बोलूँ
सभी को सुनते रहने के लिए अभिशप्त हूँ
अस्तित्व की आवृत्ति एवं बारम्बारता वाली दुनिया में
जबकि संगठित होकर अपराध करने वाले गलत्कारियों की संख्या बढ़ गयी है
हमें इस दुनिया को शेयर करते हुए ही जीना चाहिए
छोड़ कर बार-बार हटने की इच्छाओं के बावजूद
मैं अभी फेसबुक पर बना रहना चाहूँगा
शेयर करते हुए
जो जहाँ और जितना है
वहां और उतना उसके लिए उसके हिस्से की दुनिया छोड़कर ....
( श्रद्धेय गुरुवर स्वर्गीय विजय शंकर मल्ल जी की पावन स्मृति को समर्पित )

रामप्रकाश कुशवाहा
३१.०५.२०१६

सोमवार, 23 मई 2016

बिकना

लोग अपनी  आत्मा बेचकर अहंकार खरीदते हैं
मैं नहीं बिका तो क्या आसमान टूट पड़ेगा
सिर्फ यही न कि मैं धरती में धंस जाऊँगा
या बहुत हुआ तो पाताल तक

न बिकना भी तो सुरक्षित होना है
बाजार को नापसंद करते हुए
घर बसाना भी कोई बुरा सौदा नहीं

लोग घर बेचकर बाजार खरीदते हैं
मुझे  नहीं बेचना  अपना घर ....

गुरुवार, 19 मई 2016

कांग्रेस की प्रासंगिकता

कांग्रेस अब भी एक सुरक्षित विकल्प है देश का लेकिन देश बचानाऔर पार्टी बचाना -भिन्न मुद्दे हैं.कांग्रेस को नेहरू परिवार से बाहर जब तक पुरे देश वासियों के लिए खोला नहीं जाएगा तब तक यह भारतीय जनता के लिए अप्रासंगिक बनी रहेगी . कोई कांग्रेसी क्यों बने जब उसका राजनीतिक कैरियर सिर्फ सांसदी और विधायकी तक ही सिमट कर रह जाएगा .कांग्रेस के पतन नें ही जनता को भाजपा की ओर जाने के लिए मजबूर किया है.एक ऐतिहासिक संस्था का  नेतृत्व के स्तर पर सिर्फ परिवारवाद तक ऐसा सिमटना   देश के लिए भी दुर्भाग्य पूर्ण है

राणाप्रताप का नायकत्व

इतिहास में बहुत सी घटनाएँ ऐसी घटी हैं जैसी नहीं घटनी चाहिए थीं.युद्ध और हत्याएं तो आज भी नहीं होनी चाहिए. मानव जाति की एक विशेषता है कि वह जीवित लोगों के पक्ष में मृत लोगों को विस्मृत कर देती है. कुछ ऐसे कि जैसे जीवित रहना अपने आप में सही होने का एक पक्ष हो.हारे हुआ के वंशज भी पराजय बोध की हीनता से बचने के लिए चुप होने लगते हैं. कभी-कभी तो हराने वालों के वंशज भी हराने वालों की ओर से हराने का जश्न मनाने लगते हैं. ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि ऐसी घटनाओं को दो इंसानों या मानव-समूहों के बीच युद्ध केरूप में देखें .कुछ लोग कुछ इस तरह रागात्मक जुडाव अनुभव करने लगते हैं कि लगता है कि लड़ने,हारने और जीतने वाले कोई और नहीं स्वयम वे ही हैं.हम जबतक अतीत की घटनाओं को उचित दूरी से नहीं देखेगे स्वयं ही एक पक्ष बन जाया करेंगे. इतिहास की पुरानी गलतियाँ दुहरायी जाति रहेंगी.इसलिए सब से अधिक जरुरी है इन्सान को इन्सान के रूप में देखना.ताकि हम स्वस्थ मानवीय संबंधों वाला नया इतिहास बना सकें.इतिहास में बहुत सी घटनाएँ ऐसी घटी हैं जैसी नहीं घटनी चाहिए थीं.युद्ध और हत्याएं तो आज भी नहीं होनी चाहिए. मानव जाति की एक विशेषता है कि वह जीवित लोगों के पक्ष में मृत लोगों को विस्मृत कर देती है. कुछ ऐसे कि जैसे जीवित रहना अपने आप में सही होने का एक पक्ष हो.हारे हुआ के वंशज भी पराजय बोध की हीनता से बचने के लिए चुप होने लगते हैं. कभी-कभी तो हराने वालों के वंशज भी हराने वालों की ओर से हराने का जश्न मनाने लगते हैं. ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि ऐसी घटनाओं को दो इंसानों या मानव-समूहों के बीच युद्ध केरूप में देखें .कुछ लोग कुछ इस तरह रागात्मक जुडाव अनुभव करने लगते हैं कि लगता है कि लड़ने,हारने और जीतने वाले कोई और नहीं स्वयम वे ही हैं.हम जबतक अतीत की घटनाओं को उचित दूरी से नहीं देखेगे स्वयं ही एक पक्ष बन जाया करेंगे. इतिहास की पुरानी गलतियाँ दुहरायी जाति रहेंगी.इसलिए सब से अधिक जरुरी है इन्सान को इन्सान के रूप में देखना.ताकि हम स्वस्थ मानवीय संबंधों वाला नया इतिहास बना सकें.
                 एक और बात यह है कि मध्यकालीन राज्य-व्यवस्था वंशानुगत होते हुए भी उनके पीछे कोई न कोई समूह रहता था.कहीं न कहीं वे समूह और उनके वंशज आज भी हैं .इसीलिए चीजें संवेदनशील हो जाती हैं. राणाप्रताप और अकबर का युद्ध भी ऐसी घटनाओं में से एक है.कभी-कभी लगता हैकि राणाप्रताप अगर नहीं लड़ते तो मानसिंह वाला रिश्ता हिन्दू-मुसलमानों को और समीप लाता.लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि ऐसा करना अकबर और मानसिंह के हाथ में भी नहीं था.सबसे पहले तो मृत्यु-संस्कार की बिलकुल भिन्न रूढ़ियाँ हिन्दू और मुसलामानों को दो अलग समुदायों में बांटती हैं.फिर हिन्दू धर्म जातीय होने से जब तक ब्राह्मण जाति अकबर को क्षत्रिय मानकर उससे अपने ढंग का पूजा करवा कर भरपूर दान-दक्षिणा नहीं लेती तब तक अकबर को क्षत्रिय राजा नहीं मान सकती थी,इस जाति के पास असहमत लोगों को सिर्फ शूद्र मान लेने का ही जातीय बोध है.यदि उनका बस चलता तो अकबर को भी शूद्र राजा मानकर हिन्दू धर्म में शामिल कर लेते.या फिर आग-पानी पत्थर आदि किसी के भी कुल का घोषित कर देते..राणाप्रताप नें भी अकबर को संभवतःसांस्कृतिक रूप से स्वीकार नहीं किया था.इस दृष्टि से वे पूर्वज (मध्यकालीन)भाजपाई कहे जा सकते हैं.इसके बावजूद उन्हें अपनी प्रजा के शासक के रूप में स्वतन्त्र रहने का अधिकार था.वे दूसरे व्यक्ति और समूह की अधीनता क्यों स्वीकार करते. वे अपनी स्वतंत्रता की भावना के लिए सम्माननीय हैं .इतिहास का अनुभव हमें बताता हैकि कभी-कभी सारी दुनिया गलत हो सकती है और सिर्फ एक व्यक्ति सही.मैं किसी के पक्ष के सही-गलत का निर्णय बहुमत के आधार पर नहीं करना चाहता.
            यह ठीक है कि राणा प्रताप आज के राष्ट्रवाद के लिए आदर्श नायक न रह कर सिर्फ जातीय नायक होने तक सिमट कर रह गए हैं.लेकिन आप जैसे विद्वान् को इतिहास के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए..उन्होंने अकबर के विस्तारवादी आक्रमण का विरोध किया था.अकबर पर आक्रमण तो नहीं किया था.अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था.जब लडे थे तब मुसलमान सत्ता भारत के लिए विदेशी ही थी.इस बात को मुसलमान भी अस्वीकार नहीं करेंगे.यद्यपि आज की सांप्रदायिक एकता की दृष्टि से वे एक प्रासंगिक और उपयोगी नायक नहीं रह गए हैं . फिर भी एक शानदार व्यक्ति के रूप में उनका सम्मान तो अकबर भी करता रहा होगा . आप क्यों नहीं करना चाहते ! मार्क्सवादी दृष्टिकोण से भी मूल्यों का विकास सामन्त-युग में ही हुआ. कुछ नहीं तो जिन्दा रहने के लिए घास की रोटी खाने के वैकल्पिक अविष्कार का श्रेय तो राणाप्रताप को दे ही सकते हैं.इतनी घास और पेड़ों के होते हुए भुखमरी से जो मौते होती हैं वह तो नहीं होती.आखिर बन्दर तो जी ही लेते हैं.इसे हीआज के राजनीतिज्ञों के लिए उनका अवदान समझिए . 
अकबर को राणाप्रताप से विस्थापित किया ही नहीं जा सकता ऐसा करना ठीक नहीं है. अकबर नें भी  राणाप्रताप के सह-अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था और उनका पुत्र भी राजा बना था. 

         राणाप्रताप पर सोचते हुए जब मैं अकबर की पत्नी जोधाबाई के भाई,आमेर  के  राजा मान सिंह के बारे में सोचता हूँ जिसके साथ भोजन करने से इनकार कर राणाप्रताप नें हल्दीघाटी का युद्ध मोल ले लिया था -इस दृष्टि से हल्दीघाटी का युद्ध वस्तुतः दो राजपूत घरानों के बीच विचारधारा आधारित युद्ध था.राणाप्रताप का पक्ष आम रूढ़िवादी हिन्दू जनता का पक्ष था तो मानसिंह का पक्ष प्रगतिशील हिन्दू जनता का.राजा मानसिंह को एक विचारक के रूप में देखने पर उसका व्यक्तित्व मुझे अबोध एवं मानवतावादी विचारधारा तथा वसुधैव कुटुम्बकम में विशवास रखने वाला भारतीय मन लगता है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उस परिवार ने अकबर को संप्रदाय निरपेक्ष एक मनुष्य के रूप में देखा. उसे एक राजा मानकर जोधाबाई को ब्याहा . अकबर महान की छवि रचाने में सहयोगी वही प्रगतिशील भारतीय परिवार था ..इससे हिन्दू-मुस्लिम एकता के एक नए युग का सूत्रपात हुआ. बाद के  औरंगजेब और अंग्रेजों की विभेदकारी भूमिका को छोड़ दिया जाय तो आज भी उस परिवार का ही गुप-चुप निवेश ध्यान आकर्षित करता है.. लेकिन मुझे लगता है कि मध्यकाल की उस हिन्दू पहल और प्रयास के बावजूद मुस्लिम समाज की अंतर्मुखी किस्म की कबीलाई मूल की  सामुदायिकता इस धर्मं के अनुयाय्यियों को सम्पूर्ण मानव-जाति का हिस्सा नहीं बनने देतीं .इस्लाम की रूढ़िवादी जड़ता औरअसम्वादी प्रकृति को देखते हुए दुनिया को इस्लाम के साथ उसी तरह जीना सीखना होगा,जैसे लोग किसी बड़ी चट्टान या पहाड़ के साथ बिना किसी अपेक्षा और शिकायत के जीते रहते हैं

मंगलवार, 17 मई 2016

परशुराम

सामान्यतः परशुराम को सामंती अभिजन के विरुद्ध सामान्य आदमी के प्रतिरोध के रूप में देखा जाता है .कथा के अनुसार सहस्रार्जुन नामक राजा जमदग्नि ऋषि के आश्रम में भव्य आतिथ्य पाने के बाद उनकी गाय कामधेनु पर रीझ जाता है और उसे ऋषि से अपने लिए मांगता है .ऋषि द्वारा मना करने पर उनकी गाय को बलपूर्वक ले कर चल देता है .ऐसे ही प्रतिरोध के क्षण में परशुराम के आदर्श नायक रूप का उदय होता है .वे पीछे से जाते हैं और प्रत्याक्रमण कर राजा सहस्रार्जुन का उसके सैनिकों संग संहार करते हैं और अपनी गाय कामधेनु को वापस लाते हैं . वे जनसामान्य के विरुद्ध सामंती निरंकुशता के प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में ही पुरानों में विष्णु के आवेशावतार के रूप में समादृत हैं .विष्णु का चरित्र भारतीय संस्कृति में लोक-कल्याण के प्रति समर्पित जीवन और कार्यों का प्रतीक रहा है .कथा में वे दमित-शोषित वर्ग के सात्विक क्रोध के प्रतीक हैं .उनके क्रोध में एक स्पष्ट सन्देश निहित है . लेकिन तब आप क्या करेंगे जब वही परशुराम आपको एक नए अत्याचारी और हिंसक अभिजन का नया पाठ रचते दिखें .
            पौराणिक नायक होने से परशुराम जी को सांस्कृतिक नायक होने का गौरव प्राप्त है..रामकथा में राम से नहीं उलझकर और चुपचाप यानि क्रोध से चीखने-चिल्लाने के बाद उनका चले जाना राम को आशर्वाद देने वाला और उनकी महिमा बढ़ाने वाला ही माना जाता है,
जब मैं यह जानने का प्रयास करता हूँ कि वास्तव में वहां क्या हुआ होगा तो सबसे पहले यही लगता कि ऐसी कोई घटना घटी भी होगी तब आर्य कबीलों नें ऐसे स्थान पर प्रवास किया होगा जहाँ के राजा ब्राह्मणों को भी अबध्य नहीं मानते होंगे-यदि मानते भी होंगे तो सहस्रार्जुन द्वारा गाय छीनने के बाद परशुराम द्वारा राजा की हत्या कर देने पर उसके पुत्रों नें प्रतिशोध वश उनके पिता जमदग्नि की हत्या कर दी होगी.इस द्वंद्व में सांस्कृतिक संयम यावर्जनाएं टूट गयी होागी. दूसरा उनके आपराधिक स्तर के क्रोधी होने की बात भीसामने आती है. यह भी कि परशुराम वास्तव में अंधविश्वास युग के नायक हैं.उन दिनों ब्राह्मण अबध्य माना जाता था. स्पष्ट है कि वे सभी क्षत्रिय जो उनके हाथों मारे गए उनके परिजनों में से अधिकांश नें ब्रह्म-हत्या के डर से किसी नें भी बाण आदि से उन पर हमला नहीं किया.किसी का पुत्र यदि बदला भी लेता तो उस परिवार को ब्रह्म-हत्या का दोषी मान लिया जाता.. इस आधार पर मुझे उनकी वीरता संदिग्ध लगती है. मेरे पिताजी कहा करते थे कि मुझे कोई नहीं मारे तो मैं सारी दुनिया को मार सकता हूँ.. परशुराम नें कोई पुस्तक नहीं लिखी है शायद-लिखी हो तो मुझे इसकी जानकारी नहीं. हाँ वे प्रतिष्ठित ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे. पिता नें मा के चरित्र पर संदेह कर परशराम से उनकी हत्या करवा दी थी. क्योंकि हत्या नाबालिग अवस्था में की थी -इसलिए आज के क़ानून के अनुसार भी उन्हें फांसी की सजा नहीं हो पाती. फरसा एक ऐसा हथियार है जिससे हत्या बहुत ही समीप जाकर ही की जा सकती है . यह भी संभव है कि परशुराम जी नें अधिकांश क्षत्रिय राजाओं की हत्या पैर छूकर प्रणाम करते समय ही धोखे में की हो.आखिर वे ऋषि वेश धारी हत्यारे थे यदि उन्होंने. ऐसा किया होगा तो इसमें वीरता जैसी कोई बात नहीं दिखती
.गीता प्रेस ,गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के अवतार कथांक ,जनवरी २००७ ,वर्ष ८१ ,संख्या १ के पृष्ठ २२६ पर दिए गए विवरण को पढ़ा तो उनके नर-बलि में लिप्त होने के प्रबल संकेत भी मिले .कुछ अंश की अविकल प्रस्तुति इस प्रकार है – “भगवान् परशुराम नें पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से हीं कर दिया .वे क्षत्रियों को ढूँढ-ढूंढ कर एकत्र करते और कुरुक्षेत्र में ले जाकर उनका बध कर डालते .इस प्रकार परशराम जी नें क्षत्रियों के रक्त से पांच सरोवर भर दिए .वह स्थान ‘समन्तपंचक’ नाम से प्रसिद्ध है “ इस विवरण को जरा ध्यानपूर्वक पढ़ें .परशुराम जी नें यह नरसंहार कोई सेना बनाकर नहीं किया था .यह तो लिखा है कि वे जाति-विशेष के लोगों को एकत्र करते थे .अप्रत्यक्ष सूचना यह भी है कि तीर्थ के लिए ले जाते थे .कोई सामान्य बुद्धि वाला भी यह समझा सकता है कि लोगों को मारने के लिए डरा कर या बलपूर्वक हांक कर मरने के लिए नहीं ले जाया गया था .उन्हें अपना उद्देश्य छिपाकर तीर्थ-यात्रा के बहाने ले जाते थे और फिर उनकी हत्या कर देते थे .उनकी कार्य-शैली ब्रिटिशकालीन ठग-हत्यारों पिंडारियों जैसी ही थी . 
इसके बावजूद परशुराम की मूल पौराणिक कथा का केंद्रीय संवेदनात्मक पक्ष सामंत राजाओं के मनमानेपन का विरोध ही माना जाएगा .इस अर्थ में यह एक सार्थक कथा कही जा सकती है कि समाज नें किसी वर्ग को यदि कुछ विशेषाधिकार सौंपे हैं तो उस विशेषाधिकार का दुरुपयोग करने पर समाज को यह अधिकार है कि वह प्रदत्त विशेषाधिकार वापस ले ले या समाज भी उस वर्ग या समूह से वैसा ही व्यवहार करे जैसा कि वह वर्ग या समूह बाकी समाज के साथ कर रहा है .
परशुराम की कथा में सामंत शासक सहस्रार्जुन जमदग्नि की कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीनने का प्रयास करता है.परशुराम अपने जातीय मर्यादाओं और अनुशासन को तोड़ डालते हैं क्यों कि दूसरा वर्ग इसे पहले ही तोड़ चूका है .उससे उसी के स्तर पर निपटा जा सकता है ..इसके बाद की कथा जैसे प्राचीन कालीन दो माफियाओं के खूनी युद्ध में बदल जाती है.ऐसा लगता है कि प्रतिशोध की आग में जल रहे परशुराम ने अपना शेष जीवन असामान्य मनोविज्ञान के एक केस की तरह क्रूर मनो-विक्षिप्त हत्यारे के रूप में बिताया था .वे शासक जाति के लोगों को तीर्थयात्रा के नाम पर ले जाते रहे और बीच में लोगों की हत्या कर देते रहे .पहले ज़माने के लोग क्योकि हर चरित्र ईश्वर की इच्छा से प्रेरित मानते थे इसलिए उनके हत्यारे रूप को भी ईश्वर की लीला के रूप में स्वीकार कर लिया गया . 
यद्यपि मूल चरित्र और वास्तविक घटना पर काफी लीपापोती की गयी है .ऐसे स्थलों को थोडा सा ही विचार कर पहचाना जा सकता है .बहुत पहले बचपन में पढ़ने के कारण स्मृति के आधार पर मैंने फेसबुक पर की गयी अपनी पोस्ट में उन्हें मात्र माँ का ही हत्यारा समझा था लेकिन गीता प्रेस ,गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के अवतार कथांक ,जनवरी २००७ ,वर्ष ८१ ,संख्या १ के पृष्ठ २२६ पृष्ठ २२४ पर दिए गए विवरण के अनुसार उन्होंने माता सहित चार सगे भाईयों की भी हत्या कर दी थी .सामान्यतः इसे पितृ-–भक्ति का उदहारण माना जाता है. कथा में यह चमत्कारिक प्रसंग भी डाला गया है कि बाद में प्रसन्न होकर जमदग्नि ऋषि नें अपनी दिव्य शक्ति से परशुराम की माता और उनके मृत चरों भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया था .लेकिन बाद के घटनाक्रम में जिस प्रकार भाई सदैव ही अनुपस्थित रहते हैं –उससे यह तथ्य स्वतः प्रमाणित होता है कि परशुराम सदैव के लिए अपने भाइयों को खो चुके थे .क्योंकि सहस्रार्जुन के पुत्रों द्वारा उनके पिता का सिर काटते समय पौराणिक कथाकार के अनुसार उनके भाई भी उनके साथ वन में दूर चले गए थे .
पौराणिक कथाओं में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि मारे गए क्षत्रिय राजा उनसे लड़ने की इच्छा रखते थे. या उन्हें लूटने आए थे. हमला करने की सोच रहे थे. बस एक ही कारण समझ में आता है कि माता का हत्यारे जानकर उससमय के राजा भी उनका यथोचित सम्मान करने में कतराते होंगे. .अपमानित महसूस कर विद्वेष वश परशुराम नें उनकी हत्याएं कर दी होंगी.वे राम की हत्या क्षत्रिय होने के कारण इसलिए नहीं कर पाए क्योंकि विष्णु का अवतार उन्हें ब्राह्मण जाति जन्म से पहले ही मान चुकी थी. विष्णु के रूप में राम को भी परशुराम की तरह किसी की भी हत्या करने का धार्मिक-सांस्कृतिक लाईसेन्स प्राप्त था. राम परशराम की भी हत्या कर सकते थे-स्वर्ग भेजने के नाम पर.परशराम स्वर्ग जानेसे बचने के लिए चुपचाप वहांसे खिसक लिए.सन्देश यह कि हमारे बहुत से पुरखे गलत भी हो सकते हैं..उन्हें बिना सोचे-समझे अपना गौरव बढ़ाने वाला जातीय नायक घोषित करने से बचें.आज के लोक तांत्रिक समय में ऐसे जातीय नायकों को अपना आदर्श मानना उचित नहीं है. 
यद्यपि मैं आज तक यह नहीं समझ पाता हूँ कि यदि पुराणकार यदि अतिचारी सामंत शासकों के विरुद्ध यदि एक प्रतिरोधी नायक गढ़ना चाहते थे तो उसमें माँ और भाइयों की हत्या करने का प्रसंग क्यों डाला ? यदि इस लिए डाला कि वास्तविक परशुराम नें किशोरावस्था के पूर्व पारिवारिक हत्याएं भी की थीं और पूरणकारों नें ईमानदारी से उसका अविकल वर्णन किया है तो यह पुराणकारों के पक्ष में तो प्रशासनीय ही कहा जाएगा . यहीं आधुनिक समाजशास्त्रीय विश्लेषण में यह स्त्री-स्वतंत्र्त्य विरोधी पुरुष-प्रधान समाज का निर्माता और प्रेरक चरित्र और पाठ लगता है .इस रूप में इसे स्त्रियों के लिए एक चेतावनी के रूप में भी देखा जा सकता है .
इन सबके बावजूद भारत के प्राचीन जातीय सामंतकाल के युग में, प्राचीन काल के उस कानून विहीन समय में एक दृष्टान्त के रूप में परशु राम की कथा नें तत्कालीन शासकों को निरंकुश न होने की चेतावनी दी होगी .यह भी कि सामान्य मनुष्य के अधिकारों का भी सम्मान करना चाहिए . उसके मानवीय रूप को और स्पष्टता के लिए विमर्श के दायरे में लाया जाय. आखिर यह भी तो परशुराम नें ही सिखाया है कि समाज-विरोधी होने पर किसी भी सत्ता और पाठ को ख़ारिज कर देना चाहिए

गुरुवार, 5 मई 2016

उड़ान

मैं उड़ना चाहता था
चाहता था कुछ वैसी हवा लगे
जैसी वर्षों से नहीं चली
चाहता था अभी बरस पड़े पानी झमाझम
नदियाँ मुझसे बात करने मेरे घर तक आ जाएँ
भले ही डूब जाए मेरा घर
वह घर जिसकी सरहदे
काट देती हैं सारी दुनिया से
बाँट देती हैं आकाश.....
मैंने जब सोचा था सड़क चौड़ी हो जाये
मैंने नहीं सोचा था कितना हिस्सा ढह जाएगा मेरा अपना घर
मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि एक सीमा के बाद
दुनिया को जीतने के लिए सारे सपने
एक दिन थके-हारे लौट आते हैंअपने घर
सिर्फ वे ही नहीं लौटते
जोअपने परिवार के संग जाते हैं
और दुनिया के किसी भी छोर पर बसा लेते हैं अपना घर
मैं नींद में था शायद
अपने सपनों को बसाने के लिए
उजाड़ते हुए सारी धरती ....






मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

साहित्यिक इतिहास का समाजधर्मी पुनःपाठ : चौथीराम यादव

मार्क्सवादी दृष्टि से आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी ,नामवर सिंह और चौथीराम यादव तक हिंदी- साहित्य की ऐतिहासिक आलोचना की यात्रा भारतीय समाज के उस सांस्कृतिक और वर्गीय विभाजन  के विश्लेषण का परिणाम है ,आर्थिक विकास और उत्पादन को आधार बनाकर भारतीय विकास की सराहना करने वाले डॉ० राम विलास शर्मा भी भारतीय समाज के जातीय-आर्थिक विभाजन को अपने विमर्श का विषय नहीं बनाते .यह बौद्धिक कुशलता ही उनकी प्रगतिशीलता को भी सनातनी परंपरा के सशक्त उत्तराधिकारी के रूप में चिन्हित और रेखांकित करा देती है . उनके प्रशंसकों के लिए इसी तथ्य को इस तरह भी कहा जा सकता है कि डॉ० शर्मा जहाँ सनातनी परंपरा का वामपंथी और प्रगतिशील पाठ प्रस्तुत करते हैं.उनकी इस पहली सनातनी (चौथीराम यादव जी के शब्दों में वर्णाश्रमी ) परंपरा के समानांतर  नामवर सिंह असहमति एवं विकल्प की एक दूसरी परम्परा को रेखांकित करते हैं .यह दूसरी परम्परा कल्पना नहीं है .इसकी यात्रा के भी पद-चिन्ह भारत के अतीत में जगह-जगह देखे जा सकते हैं .सनातनी परम्पारा  में राजा और पुरोहित का गठबंधन है ,सत्ता की सीकरी है तो दूसरी परम्परा में पराधीनता सा मुक्ति की खोज –इसी लिए यदि मध्यकाल में यह आध्यात्मिक है तब भी मानवीय है .पहली परम्परा में अभिजात्य वर्ग की सुरक्षा-चिंता वाली  व्यवस्था है तो दूसरी परम्परा में मुक्ति और अस्वीकार का जोखिम .पहली परंपरा के पास सबसे महत्वपूर्ण चीज उसका परलोक यानि स्वर्ग है ,जबकि दूसरी परंपरा के पास जीता-जागता वास्तविक लोक जो कबीर को अपनी आँखों से दिखाई देता है ,लेकिन पहली परंपरा के वाहक अपनी वर्गीय अरुचि के कारण उसे अनदेखा करना चाहते हैं .चार्वाकों ,ब्रह्मर्षियों ,बुद्ध,सिद्ध और संतों तक यह दूसरी परंपरा फैली हुई है .आधुनिक काल में अम्बेडकर के बाद साहित्यिक स्तर पर हजारी प्रसाद द्विवेद्वी ,प्रेमचन्द /मुक्तिबोध ,नामवर सिंह और चौथीराम यादव जैसे चिंतकों के माध्यम से जारी रहनी है भविष्य में भी इस परम्परा की यात्रा को कोई रोक नहीं सकता ,क्योकि यह एक बड़ी जनसँख्या के प्रतिरोध एवं मुक्ति के जीवनाधिकार से जुडी परम्परा है .इसे ही चौथीराम यादव जी नें लोकधर्म कहा है .
     .फिलहाल तो ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद में अभेद दृष्टि के कारण परम्परावादियों को सही नहीं सूझता ..ब्रह्म शून्य जैसी ही एक दार्शनिक अवधारणा थी .उपनिषद् काल तक उस पर पुरोहितों का एकाधिकार नहीं था .उसके बाद वह जातीय वर्ग-स्वार्थ से आच्छादित हो गया .उसका अमूर्तन करते हुए अबूझ और दुरूह बनाया गया .स्वत्वाधिकारी ज्ञानी के रूप में प्रतिष्ठित कर शासक और शासित में लोक को विभाजित कर दिया गया . इस तरह देखें तो पहली परंपरा सत्ता के संस्कृति की है तो दूसारी परम्परा शासितों यानि लोक की संस्कृति की .गणराज्य की नैतिकता और राजतंत्र की नैतिकता और मनोविज्ञान में अंतर्विरोध था .आज भी अगर लोकतंत्र को कायम रखना है .सारी जनता को गुलाम बनाकर मुट्ठी भर देवताओं के लिए स्वर्ग नहीं रचना है तो ईश्वर की अवधारणा से प्राथना करनी ही होगी कि हे प्रभु ! हम अकर्मण्य भाग्यजीवी होने के स्थान पर अपने श्रम पर आधारित आत्म-निर्भरता जीना चाहते हैं –इस लिए बेहतर होगा की आप तटस्थ ,निरपेक्ष और नेपथ्य में ही रहें .
     यद्यपि आचार्य द्विवेद्वी नें ब्राह्मणों का क्षत्रिय और शूद्र के रूप में परिहासत्मक विभाजन किया है –लेकिन शुक्ल-पक्ष के यथास्थितिवादी ब्राह्मणत्व  को देखते हुए –कृष्ण पक्ष के ब्राह्मणों को जिसे आचार्य जी शूद्र ब्राह्मण कहते थे –उन्हें प्रगतिशील ब्राह्मणत्व के रूप में देखा जा सकता है .नव्ज्जगारण के प्रमुख केंद्र बंगाल के शान्ति -निकेतन में जाने के कारण आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी के  मूल्यधर्मी ब्राह्मणवाद के लिए हिदी पट्टी के कूपमंडूक जातीय श्रेष्ठातावादियों की तरह (अपनी सत्यनिष्ठा और आधुनिक मानवतावाद के कारण भी ) उस कबीर की अनदेखी करना संभव नहीं था जिसने कभी नानक को प्रभावित कर संत आन्दोलन एवं सिक्ख पंथ की नीव रखी थी और जिनके पदों से आधुनिक युग में प्रभावित साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर के पुनर्सृजन नें गीतांजलि जैसी विश्व-प्रसिद्ध रचना विश्व को दी थी .इसे हम कहना चाहें तो हजारीप्रसाद द्विवेद्वी का प्रगतिशील और समावेशी ब्राह्मणत्व कह सकते है ,जिसकी सफलता का रहस्य उसके समन्यवाद और वसुधैव कुटुम्बकम वाली उदारता में है .इस दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य शुक्ल तुलसीदास को भी ठीक से कहाँ समझ पाए .पहचाना भी तो द्विवेद्वी जी नें ही जिनकी आंख खुल चुकी थी .तभी वे लिख पाए कि भारत का लोकनायक वही हो सकता है जिसमें समन्वय की क्षमता हो और उन्होंने तुलसी के प्रगतिशील लोकनायकत्व को भी पहचाना .आचार्य शुकल तो सिर्फ तुलसी का शील ही देखते रहे .इस वाद-प्रतिवाद की कड़ी में राम विलास शर्मा के अवदान को उचित स्थान देने के लिए सिर्फ इतना ही किया जा सकता है कि यह तथ्यात्मक स्तर पर स्वीकार कर लिया जय कि सनातनी ब्राह्मणवाद का भी एक प्रगतिशील पाठ बनता है लेकिन उसकी सीमाओं की पहचान हिंदी की लोकधर्मी परम्परा के महत्त्व को समझते और समझते हुए ही हो सकती है .मध्यकाल में रैदास का सहज संवेदना वाला कवित्व देश-काल ;जाति-धर्म की सीमाओं को तोड्कर  मीरा में प्रतिध्वनित हो उठा था .यदि यह गुरुत्व रैदास के पास न होता तो संभव है कि उनको भी दबा दिया गया होता .राजनीति में नेहरू की तरह ही हिंदी साहित्य में हजारी प्रसाद द्विवेद्वी इतिहास की त्रिकालिक गति के विशेषज्ञ थे .दोनों नें अतीत की प्रवृत्तियों और भविष्य की दिशा को पहचाना था .वे नव के सड़ने और यथाशीघ्र डूब जाने के भविष्य को पहचान गए थे .यह अतिक्रमण आचार्य शुक्ल नहीं कर पाए .वे अपने समय में हैं .अपने समय में उपस्थित रह कर ही अपनी ऐतिहासिक भूमिका में कालान्तरण कर सकते हैं .उनका इतिहास जब साहित्यकारों का जाति और कुल पूछता और बताता है तो अपने समाजिक समय की मानसिकता को जी रहे होने की सूचना ही देते हैं .अपने समय की सामान्य समझ की सीमा में पकडे तो उनके आराध्य तुलसी दास भी जाते हैं –ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ,सकल ताडना के अधिकारी ‘कह देने के कारण .पानी उतर आने से रेत में फंसी मछली की तरह .
        इस तरह  चौथी राम यादव जी आलोचना में आचार्य द्विवेद्वी स्कूल के समर्थ उत्तराधिकारी हैं  .वे स्वयं सामाजिक मुक्ति के सरोकारों की अनदेखी न कर पाने वाले वर्ग से आते हैं .काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के दीर्घकालिक अध्यापन एवं अनुभव नें जो विशेषज्ञता दी है –वह उन्हें औचित्य दोष रहित एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अपरिहार्य साहित्य का इतिहासविद आलोचक बनाता है .वे बिलकुल सही समय पर बिलकुल सही बात बोल रहे हैं .उस समय बोल रहे हैं जब छिपे और दबाए जाने का समय बीत चूका है . जिसे हजारीप्रसाद इंगित तथा नामवर जी “दूसरी परंपरा की खोज में “पंगति” में बोल चुके हैं उसे चोथी राम यादव जी का विमर्शकार पूर्णाहुति यानि अन्तिम गति में बोलता दिखाई देता है ,तात्पर्य यह कि वे मुखर .साहसिक एवं निर्णायक हैं .लेकिन यह उनके आलोचक अस्तित्व का देशा-काल ही हुआ .उनके आलोचक व्यक्तित्व का वैशिष्ट्य और निजत्व उस समाजवैज्ञानिक विश्लेषण पद्धति में छिपा हुआ है जो साहित्य को सिर्फ कल्पना जनित मनोरंजक कलावस्तु माने जाने का निषेध करता है .उनकी दृष्टि में यदि साहित्य कल्पना भी है तो उसे एक वास्तविक मानव-जगत को सृजित करते हुए दिखाना चाहिए क्योंकि एक सर्जक के रूप में मनोजगत वस्तुजगत का पूर्वज या अग्रज ही होता है ,भले ही अनुभव जगत के रूप में मनोजगत पश्चज हो .
       अपनी तीनों पुस्तकों के माध्यम से चोथी राम यादव का आलोचक एक महत्वपूर्ण एवं अपरिहार्य ऐतिहासिक भूमिका में सामने आता है .दरअसल छवि-निर्माण और व्यक्तित्व –निर्माण दोनों अलग –अलग चीजें हैं जिस तरह कबीर कवि व्यक्तित्व पूर्ण निर्मित हो जाने के बाद ही आचार्य रामानंद के यहाँ शिष्यत्व की पहचान के लिए पहुंचे थे ,जिस तरह सूरदास भी बललभाचार्य के सामने गऊघाट पर “प्रभु होऊं सब पतितन को टीकों “ गाने से पूर्व भी एक अच्छे कवि बन चुके थे- चौथी राम यादव जी  की पुस्तक “हजारी प्रसाद द्विवेद्वी : समग्र पुनरवलोकन “(लोक भारती ) की भूमिका में व्यक्त नामवर सिंह से प्रभावित होने और कृतज्ञता ज्ञापन को अतिशयोक्तिपूर्ण न मानते हुए भी इतना संशोधन कारी वक्तव्य जरूरी लगता है कि नामवर जी की पुस्तक “दूसरी परम्परा की खोज “ के प्रकाशन के समय  तक चौथीराम जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित विद्वान् प्राध्यापकों में से थे .. उनका मध्यकालीन भक्ति काव्य पर एक अतिविशालकाय शोध प्रबंध मैंने विश्वविद्यालय के केन्द्रीय ग्रंथागार के शोध –प्रबंध वाले कक्ष में  देखा था .उनके व्याख्यान इतने सजीव और त्रिआयामिक होते थे कि सुर को पदते समय देश-काल का बोध समाप्त हो जाता था .सूर ही क्यों हम कृष्ण-काल को भी अपने प्रत्यक्षकाल की तरह जीने लगते थे .तात्पर्य यह कि उनकी भूमिका का वह हिस्सा भी उनके शिष्ट-विनम्र व्यक्तित्व के अनुरूप ही सौजन्यपरक ही होगा अन्यथा यह मानना कि रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा को पदते समय उनके पूर्वाग्रह संप्रेषित नहीं होते –यह कहना उचित नहीं होगा .उस समय भी राम –तुलसी के स्थान पर मार्क्स से प्रभावित यहाँ तक कि मुक्तिबोध से सम्बंधित प्रश्न हल करने पर भी गुरुओं द्वारा अंक काट लिए जाते थे ,ऐसे में नामवर सिंह की उस बोद्धिक एवं साहसिक इमानदारी ने चौथी राम जी को यदि नामवर जी का भक्त बना दिया हो तो कोई आश्चर्य नहीं .यहाँ द्विवेद्वी जी के साथ-साथ लोकधर्मी साहित्य के सम्यक इतिहासबोध के विकास में मुक्तिबोध की उस जब्त पुस्तक का योगदान कम नहीं होगा –जिसकी खुलकर चर्चा विउवादास्पद होने से बचने के लिए स्वयम नामवर सिंह जी भी न कर पाएं होंगे .
       इसतरह लोकधर्मी साहित्य के इतिहासबोध के विकासकर्ताओं की कड़ी हजारी प्रसाद द्विवेद्वी .मुक्तिबोध .नामवर सिंह और उसके पूर्ण और मुखर परिपाक के रूप में चौथी राम यादव तक जाती है.चोथी राम यादव की तीनों प्रकाशित आलोचना पुस्तके –“हजारीप्रसाद द्विवेद्वी :समग्र पुनारावलोकन(१९१२ ,लोक भारती प्रकाशन )  “लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा”(२०१३ में अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.)लिमिटेड ,नयी दिल्ली ) तथा “उत्तर शती के विमर्श और हाशिए का समाज (२०१४,अनामिका )  दरअसल हिंदी साहित्य के प्रचलित इतिहासबोध का पुनःपाठ प्रस्तुत करती हैं .
         यद्यपि उन्होंने नामवर जी द्वारा प्रोत्साहित होने को खुलकर साभार स्वीकार किया है .यह प्रभाव निश्चयात्मक एवं संकल्पात्मक है .उसके पश्चात् वे हिंदी के साहित्यिक इतिहास के पुनर्लेखन की एक दीर्घकालीन एकांत परियोजना को दायित्वपूर्ण गंभीरता से अंगीकार करते हैं .दूसरी परंपरा की खोज ‘ का प्रतिमान जिसमें हजारीप्रसाद के साहित्य और आलोचना को युगपत रूप में समझने की कोशिश की गयी है –चोथी राम जी के हजारीप्रसाद सम्बन्धी विश्लेषण को एक पद्धातिपरक स्तरीयता एवं प्रमाणिकता देती है .यह पुस्तक उनके लिए सूत्र-निर्माण की भी पीठिका प्रस्तुत करती है ..अध्यायों के शीर्षक भी इस सूत्र –शोधा का साक्ष्य प्रस्तुत क्जराते हैं .-व्यक्तित्व की केन्द्रीय धुरी ,अंतर्विरोधों का गत्यात्मक पक्ष , उपन्यास : रचना-प्रक्रिया और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भा ; निबंध और आलोचना : मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है ,संस्कृति-चिंता ,सौन्दर्यबोध ,साहित्य का गतिशील चिंतन :इतिहास –दृष्टि : उत्थान्मुलक नैरन्तर्य –आचार्य शुक्ल ऑयर आचार्य द्विवेद्वी का दृष्टि-भेद ;पांडित्य की लोकोंमुखता :लोक और शास्त्र का द्वंद्व ,कल-निर्धारण : मध्य कालीन बोधा की आधुनिकता ; चिंतन का लोक-पक्ष और स्त्री –अस्मिता की खोज  आदि शीर्षक और उप-शीर्षक आचार्य द्विवेद्वी के साहित्य-बोधा और इतिहासबोध को गंभीर और प्रमाणिक विश्लेषण के साथ प्रस्तुत करते हैं .इन अंतर्दृष्टियों का सम्यक विनिवेश ही उनकी दूसरी पुस्तक “लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा “ में विशेषज्ञ विस्तार पाता है .
          यह आलोचनात्मक विमर्श प्रस्तुत करने वाली पुस्तक तीन उपशीर्षकों में विभाजित है –लोक और वेड आमने-सामने ,हाशिए का समाज और समकालीन विमर्श तथा आधुनिकता का लोकपक्ष .प्रथम खंड में ‘भक्ति-आन्दोलन की पृष्ठभूमिऔर संत-साहित्य ,दलित-चिंतन की प्रति –परंपरा और कबीर ,अवतारवाद का समाजशास्त्र और लोकधर्म , सूर की भाषा और भाषा की आधुनिकता ,सही इतिहासबोध को रेखांकित करती दूसरी परंपरा की खोज  शीर्षक आलेख शामिल हैं ,     दूसरे खंड में “मध्यकालीन समाज और हिंदी-साहित्य में नारी-मुक्ति-चेतना ,हिंदी नव-जागरण और उत्तरशती के विमर्श ,स्त्री –विमर्श की चुनौतियां और छायावाद का मुक्ति-स्वर ,सती –विमर्श का भारतीय सन्दर्भ और पुनर्नवा के स्त्री –प्रश्न ,रोटी हुई संवेदनाओं की आत्म-कथा (मुर्दहिया ) शामिल हैं . तीसरे खानदा में ‘नागार्जुन की कविता में प्रतिरोध का स्वर ,इक्कीसवी सदी का गल्प और काशी का अस्सी ,रेहान पर रग्घू या इक्कीसवीं सदी का गाव –घर “प्रति-संस्कृति के हिंदी-साहित्य पर एक नजर (संतों घर में झगरा भारी ‘ के बहाने ) तथा साम्प्रदायिकता और सामाजिक उत्पीडन बनाम “कबिरा खड़ा बजार में “ आलेख शामिल हैं
       तीसरी पुस्तक ‘उत्तरशती के विमर्श और हाशिये का समाज “ अपने नाम के अनुरूप ही दलित ,आदिवासी और स्त्री-विमर्ष से सम्बंधित है .ये आलेख अपनी प्रकृति में सैद्धांतिक और ऐतिहासिक दोनों हैं .हजारीप्रसाद द्विवेद्वी का इतिहास का नैरंतर्यवादी दृष्टिकोण उनकी भी आलोचना को वह तीसरी आँख देता है ,जो उनके विमर्श को सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों का विरोधी बना देता है .भारतीय राष्ट्र की  पुनर्व्याख्या और हाशिए का समाज ‘दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र तथा “हिंदी नवजागरण और उत्तरशती के विमर्श “जहाँ अपनी प्रकृति में सैद्धांतिक है तो ‘दलित –आदिवासी साहित्य और उनके ऐतिहासिक श्रोत ‘,.दलित-चिंतन की प्रति-परंपरा और कबीर ,’ रैदास के सपनों का समाज ‘ तथा रोती हुई संवेदनाओं की आत्मकथा ‘जैसे निबंध साहित्यिक सन्दर्भों सहित दलित-विमर्श को आगे बढ़ाते हैं .अन्तिम तीन निबंध –‘मध्यकालीन लोक-जागरण और नारी-मुक्ति-चेतना ‘,स्त्री-विमर्श की चुनौतियां और छायावाद का मुक्ति-स्वर’ तथा ‘स्त्री-विमर्ष का भारतीय सन्दर्भ और पुनर्नवा के स्त्री-प्रश्न ‘स्त्री-विमर्श पर केंद्रित हैं .
        भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और पुनर्निमाण के लिए बौद्धिक स्तर पर उन वर्ग-स्वार्थों की पडताल अत्यन्त जरूरी है जो उसके नियति के प्रवाह को सही-सही न समझने की नीयत को जन्म देती रही हैं । भारत में परम्परागत नेतत्व ब्राहमण बुद्धिजीवियों का रहा है । ब्रहमण जाति की ऐतिहासिक भूमिका सत्ताधारियों के पक्ष में सामाजिक-सांस्कृतिक जनमत तैयार करनें की रही है । यधपि यह प्रत्यक्ष रूप से सत्ता के केन्द्र में कम ही  रही है लेकिन कम समय में ही उसनें भारतीय समाज पर निर्णयक प्रभाव छोड़ा है । मौर्य काल के बाद पुष्यमित्र शुंग के रूप में तो मुगल काल के बाद पेशवार्इ के रूप मेे भारतीय समाज को छुआछूत और अस्पृश्यता की सौगात दी । भारत में ब्राहमण-श्रेष्ठता का आधार धार्मिक ही रहा हे । यही धामि्रक श्रेेष्ठता ही उसकी सांमंजिक-सांसकृतिक श्रेष्ठता का आधार रही है ।आजादी की लड़ार्इ में नवजागरण तो बि्रटिश शिक्षा और सत्ता के प्रभाव में ही होना था जबकि पुनर्जागरण का सामुदायिक आधार हिन्दू और मुसिलम जातीयता थी । इसमें भी हिन्दू जातीयता का सही इतिहास-बोध के पुनर्रचनाकारआधार ब्राहमण और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियां ही थीं । इसीलिए जब भारत-भारतीकार मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य में भी हिन्दू जातीयता के दर्शन होने लगते हैं तो आश्चर्य नहीं होता । यह जातीयता संस्कृत-निष्ठ तत्सम हिन्दी के विकास तक जाती है और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास के मूल्य-निर्णय तक भी । इसी चेतना के कारण ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य का इतिहास पुनर्जागरण के इतिहासबोध का ही पाठ प्रस्तुत करता है । बंगाल के प्रवास और नवजागरण के वास्तविक प्रवाह से परिचित होने के कारण हिन्दी में यह श्रेय प्रेमचन्द को छोड़कर सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी जैसे बंगाल-प्रवासी कुछेक साहित्यकारों को ही हे जो पुनर्जागरण की जातीय मनोग्रस्तता से बाहर निकलकर नवजागरण के आधुनिक स्वरूप का साक्षात्कार कर पाए । सम्यक इतिहासबोध के कारण सिर्फ आचार्य द्विवेद्वी ही ब्राहमण जातीयता की मध्ययुगीन सीमाओं को सही-सही जान और पहचान पाए । उन्हें आसन्न युगान्त और आधुनिक भावी की सही-सही पहचान थी । यह सजगता उन्हें राहुल सांकृत्यायन की परम्परा से जोड़ती है । इन इतिहासजनित पूर्वाग्रहों का अतिक्रमण न कर पाने के कारण ही आचार्य शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास ब्राहमण जातीयता पर आधारित आधुनिकता.बोध का ही पाठ प्रस्तुत करता है । विचारशील प्रतिभा की भव्य प्रस्तुति और ऐतिहासिक समझदारी के बावजूद वे दलित-विमर्श युग के मानवतावाद के प्रतिपक्ष में जा पड़ते हैं । आचार्य श्ुक्ल के ये विचलन उनकी ऐतिहासिक अवसिथति की उपज हैं । वे बि्रटिश भेदनीति द्वारा प्रोत्साहित हिन्दू जातीयता के उभार से बच नहीं सके हैं । यह वह समय था जब कबीर पिछड़ रहे थे और हिन्दू जातीयता ब्राहमण-श्रेष्ठता के पम्परागत बोध के साथ एक दूरगामी ऐतिहासिक विभाजन की ओर बढ़ गयी थी । हिन्दी के साहित्य-शिक्षकों की कर्इ पीढि़यां अपने पितामह साहितियक इतिहासकार की ऐतिहासिक सीमाओं का वाचन-पाठन करती रहीं । यह श्रेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेद्वी को ही है कि उन्होंनें व्यापक असहमतियों के साथ हिन्दी साहित्य के इतिहास का पुन:पाठ प्रस्तुत किया । उनमें इतिहास की विकासवादी र्इमानदार समझ मिलती है । वर्चस्व की संस्कृति के साथ ही प्रतिरोध की संस्कृति की वह शिनाख्त भी जिसे चौथीराम यादव नें 'लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा कहा है । वर्चस्व की संस्कृति को भारत के जातीय सामन्तवाद नें अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप पैदा किया था । वर्ण भ्ेद ,आनुवांिशक प्रारब्धवाद ,क्र्रानितकारी असन्तोषविरोधी नियतिवाद ,मनोवैज्ञानिक दृषिट से अनुयायी बनाने वाला आध्यातिमक दर्शन जिसे पुरोहित वर्ग की जातीय श्रेष्ठता की सामजिक स्वीकृति के माध्यम से भकित साहित्य और संस्कृति के रूप में प्रचारित किया गया था-इस वर्चस्व की संस्कृति की सामान्य विशेषताएं थी । जाहिर है कि यह सामन्तवाद और पुरोहितवाद के गठजोड़ से पैदा हुर्इ सांस्कृतिक-सामाजिक अभियानित्रकी आधुनिक मानवतावादी प्रगतिशील नजरिए से और लोकतानित्रक नजरिए से भी आधुनिक मानवतावाद के प्रतिकूल पड़ती है ।
       दरअसल मांक्र्सवाद की सैद्धानितकी हर युग के अपनें सत्ता-संरक्षक साहित्य के असितत्व को स्वीकार करती है । भारतीय सामन्तवाद नें आनुवांशिक तथा जातीय उत्तराधिकार वाली संस्कृति आधारित व्यवस्था का विकास किया था ।इसकी सत्ता और उसके सहायकों का अलग चरित्र था । यह चरित्र जनसामान्य के विशिष्टता-बोध को नकारता है । इसके प्रतिरोध में लोक नें अपनी अलग दार्शनिकी विकसित की है । लोकधर्म की यह परम्परा प्रभु-वर्ग के अलग विशिष्टता और श्रेष्ठता-बोध को अस्वीकार करती है । आधुनिक लोकतानित्रक युग में जन-सामान्य की इस प्रतिरोधी धारा का महत्व बढ़ा है । चौथ्ीराम यादव के आलोचक की भूमिका इसी प्रतिरोधी धारा के स्पष्ट एवं युगधर्मी पहचान की है ।  चौथीराम यादव के आलोचक के निर्माण में हजारीप्रसाद द्विवेद्वी इतिहासबोध और पर्यवेक्षणों की महत्वपूर्ण भूमिका है । लोकभारती से प्रकाशित अपनी पहली पुस्तक हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन  को लिखते समय वे इतिहास के संघर्ष के उन जरूरी प्रश्नों का भी साक्षत्कार करते और कराते हैं,जिसका स्वतंत्र और बहुआयामी प्रस्फुटन उनकी अनामिका प्रकाशन से प्रकाशित उनकी दूसरी पुस्तक लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा  में हुआ है । चौथीराम का यह लेखन युग की अपनी अपरिहार्यताओं से पैदा हुआ अनौपचारिक लेखन है । यह प्राध्यापकीय प्रोन्नति के दबावों से पूरी तरह मुक्त ज्ञान के विकास के लिए आवश्यक एक जरूरी लेखन के रूप में है । हिन्दी की आलोचकीय विसंगतियों पर ऐसा साक्ष्यधर्मी चिन्तन है,जिसकी अवहेलना कर सही इतिहासबोध नहीं निर्मित किया जा सकता । अपनी इसी भूमिका में चौथीराम यादव एक बड़े बदलाव-बिन्दु की प्रस्तावना करने वाली महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक के रूप में सामनें आते हैं । एक विनम्र,उदार और साहसिक पक्षधरता उनके आलोचकीय विमर्श को महत्वपूर्ण बनाती है । बिना किसी पूर्वघोेषणा और संगठित प्रचार के अपनें अनौपचारिक चिन्तन, समाजशास्त्रीय दृषिट और स्पष्टवादी तेवर के साथ उनकी आलोचना एक निर्णायक विमर्श उपसिथत करती है । वर्चस्व की संस्कृृति के समानान्तर लोकधर्मी प्रतिरोध की संस्कृति और साहित्यधारा की पहचान चौथीराम यादव की आलोचना की केन्द्रीय चिन्ता है । यह संस्कृति वर्ण-धर्म की विरोधी और मानवतावादी है ।
       अपनी इस पुस्तक में चौथीराम यादव नें जनपदीयता और लोकधर्मिता  को अभिजात्य एवं शोषक सृजनशीलता के प्रगतिशील विकल्प के रूप में देखा है । इसी आधार पर प्रगतिशीलता की परम्परा को वे मध्य युग में कबीर से लेकर आधुनिक युग में प्रेमचन्द,निराला ,नागाजर्ुन,फणीश्वरनाथ रेणु , शिवपूजन सहाय,हरिशंकर परसार्इ,काशीनाथ सिंह,मैत्रेयी पुश्पा और अनामिका आदि तक में देखा है। उनके अनुसार कबीर का सांस्कृतिक जनपद प्रगतिशील हिन्दी कविता की कीमती रिसत है ।(भूमिका,लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा ) अपनें आलोचकीय विश्लेषण में चौथीराम यादव की यह स्थापना महत्वपूर्ण है कि  कबीर नें भाषा-विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया को ठीक पहचाना था ,क्योंकि भाषा-विकास की स्वाभाविक प्रकि्रया तदभवीकरण की थी,न कि तत्समीकरण की । इसी सन्दर्भ में वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की इसलिए आलोचना करते हैं कि उन्होंने संस्कृत काव्यशासित्रयों का अनुसरण करते हुए  रचनाकारों पर संस्कृत बुद्धि,संस्कृत âदय,संस्कृत वाणी  का अपना आलोचकीय निर्णय लाद दिया । इसे वे हिन्दी-आलोचना के अलोकतानित्रक होने का उदाहरण समझते हैं । वर्ण भेद के समर्थन और विरोध के आधार पर कबीर की निन्दा और तुलसी की प्रशंसा वर्णवाद ग्रस्त मानसिकता का एक प्रतिगामी उदाहरण मात्र है ।  इस पुस्तक में संकलित आचार्य द्विवेद्वाी का कबीर-प्रेम 'भकित-आन्दोलन की पृष्ठभूमि और सन्त-साहित्य शीर्षक आलेख भकित-आन्दोलन की ऐतिहासिक सामाजिक भूमिका की पड़ताल वर्ण-विरोधी और समर्थक दोनों ही दृषिटयों से करता है ।
           भकित आन्दोलन की पृष्ठभूमि और सन्त साहित्य शीर्षक आलेख भकित-आन्दोलन की ऐतिहासिक-सामाजिक भूमिका की पड़ताल वर्ण-विरोधी और समर्थक दोनों ही दृषिटयों से करती है । ऐसा करते हुए वे ब्राहमणवाद की हजारों वर्ष पुरानी मानवतावाद विरोधी भूमिका की शिनाख्त भी प्रस्तुत करते हैं ।यह एक ऐसा कैंसर है ,जिसे छिपाना आधुनिक प्रगतिशील दौर में असंभव ही है । ऐसा करना इतिहास-बोध की निर्णायक पुनर्रचना के लिए जरूरी है । यह लेख शंकराचार्य और तुलसीदास से लेकर आचार्य शुक्ल तक की ब्राहमणी पाठ का रेखांकन और प्रश्नांकन प्रस्तुत करता है । पूरे लेख में में चौथीराम यादव की स्थापना इस केन्द्रीय दृषिट के चतुर्दिक निर्मित हुइ्र है कि  यदि निर्गण भकित आन्दोलन को भारतीय चिन्तन परम्परा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो बुद्ध बनाम शंकराचार्य तथा कबीर,रैदास बनाम तुलसीदास के बीच एक वैचारिक संघर्ष की सिथति बहुत साफ दिखार्इ देती है । वर्ण-व्यवस्था के समर्थन और विरोध के इस संघर्ष में तुलसीदास,शंकराचार्य के साथ खडे़ दिखार्इ देते हैं तो कबीर और रैदास बुद्ध के साथ । (पृ0 25 ) चौथीराम यादव निगर्ुण भकित आन्दोलन को लोकभाषा के आन्दोलन के रूप में देखें जानें की प्रस्तावना करते हुए कबीर की प्रशंसा और आचार्य शुक्ल की भत्र्सना उनकी भाषानीति के लिए भी करते हैं । उनके अनुसार सामन्ती-पुराहिती रूढि़यों को अभिव्यक्त करनें वाली भाषाओं के स्थान पर क्षेत्रीय भाषाओं का विकास,उस युग की ऐतिहासिक आवश्यकता भी ,जिसके चलते निगर्ुण आन्दोलन के प्रवर्तक कबीर नें अपनी भाषानीति को स्पष्ट करते हुए संस्कृत को कूप-जल और भाषा को बहता नीर  घोषित किया । भाषा-विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया को पहचानने में कबीर नें कोर्इ गलती नहीं की और तत्समीकरण के स्थान पर तदभवीकरण की स्वाभाविकता को रेखांकित किया ।  यहां संस्कृत बुद्धि, ,संस्कृत âदय और संस्कृत वाणी के समर्थक आचार्य शुक्ल की भाषा-दृषिट से कबीर की भाषादृषिट का सर्जनात्मक अन्तर भी स्पष्ट हो जाता है ।(वही 24 ) यह लेख सामाजिक परिवर्तन के लिए  प्रगतिशील इतिहास-बोध की समझदारी निर्मित करनें के साथ-साथ अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए हिन्दी आलोचना में याद किया जाएगा । यह हिन्दी आलोचना का सामाजिक क्रानितधर्मी पाठ है ,जो  न सिर्फ कबीर की ऐतिहासिक स्मृति को समर्पित है ,बलिक उनकी खरा सच बोलने वाली उस विचारक परम्परा को भी जो निन्दा को आपरेशन के औजार की तरह इश्तेमाल करती है । यह आलोचना का समाजशास्त्रीय पाठ है-लेकिन उत्पादन श्रम को हेय बताकर उपभोक्ता संस्कृति की अकर्मण्यता विकसित करने वाले धर्मशास्त्रों के समर्थक इन बुद्धिजीवियों नें ऐसी कोर्इ आचार-संहिता नहीं बनार्इ कि उच्च वर्ण के लोग शूद्रों द्वारा उत्पादित खाधाान्नों का सेवन न करें । चौथीराम यादव कबीर आदि संत कवियों द्वारा वर्णश्रम के प्रति अश्रद्धा पैदा करना लोक विरोधी आचरण नहीं बलिक मध्यकालीन लोकजागरण का प्रगतिशील कदम मानते हैं ।(पृ0 44) उनकी दृषिट में कबीर मध्ययुगीन देशज आधुनिकता को आधुनिक कवियों और लेखकों के आधुनिकता-बोध से जोड़ने वाला सम्बन्ध-सेतु है । (पृ0 45 )
       'अवतारवाद का समाजशास्त्र और लोकधर्म चौथीराम यादव ज ी का महत्वपूर्ण आलेख है । यह एक ऐतिहासकि सच्चार्इ है कि समाजशास्त्रीय आलोचना का प्रगतिशील विवेक वर्णश्रम वादी और माक्र्सवादी आलोचना की शुद्धतावादी पूर्वाग्रही जड़ता की तुलना में अधिक सार्थक है । चौथीराम जी का यह आलेख अनेक दृषिटयों से महत्वपूर्ण है। रामकथा को पुरुष-सत्तात्मक यूटोपिया और कृष्णकथा को मातृसत्तात्मक यूटोपिया के रूप् में विश्लेषित कर भारतीय समाज के लिए कर्इ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले गए हैं । चौथीराम यादव के अनुसार तुलसीदास का रामचरित मानस पुरुषसत्तात्मक समाज के लिए अवतारवाद का वर्णाश्रमी पाठ है ; जबकि सूरदास के सूरसागर की कृष्णकथा मातृसत्तात्मक समाज का लोकधर्मी रूपान्तरण है तथा यह पौराणिक अवतारवाद के पाठ से बिल्कुल अलग है । इसका कारण यह है कि सूरदास नें कृष्ण का चित्रण मानवीय अन्तरंगता के साथ किया है और वे भूल गए हैं कि उनके कृष्ण र्इश्वर भी हैं । जबकि तुलसीदास राम का र्इश्वरताबोध बनाए रखनें के प्रयास में राम के सहज मानवीय रूप् को उभरने ही नहीं देते । रामकथा में तुलसी की अभिव्यकित राम की सामन्ती गरिमा  और शिष्टाचार को बनाए रखती है ।इसीलिए चौथीराम यादव मातृसत्तात्मक समाज की पौराणिक स्मृति,साहितियक रूपक और यूूटोपिया की प्रस्तुति की दृषिट से कृष्ण-काव्य को महत्वपूर्ण मानते हैं । इस लेख में ऐसे बहुत से स्थल हैं जो भारतीय संस्कृति की ब्राहमणवादी संरचना का समाजशास्त्रीय पुन्:पाठ प्रस्तुत करते हैं । निर्णयक और निर्मम न्यायिक टिप्पणियां चौथीराम यादव की आलोचना की विशेषता है । इस लेख में ब्राहमणवादी और ब्राहमण-विरोधी दोनों ही धाराओं की सम्यक पड़ताल की गर्इ है । यह एक तथ्य है कि राम-काव्य की तुलना में कृष्ण-काव्य और संरचना का समाजशास्त्रीय पुन्:पाठ प्रस्तुत करते हैं । निर्णयक और निर्मम न्यायिक टिप्पणियां चौथीराम यादव की आलोचना की विशेषता है । इस लेख में ब्राहमणवादी और ब्राहमण-विरोधी दोनों ही धाराओं की सम्यक पड़ताल की गर्इ है । यह एक तथ्य है कि राम-काव्य की तुलना में कृष्ण-काव्य औराल की गर्इ है । यह एक तथ्य है कि राम-काव्य की तुलना में कृष्ण-काव्य और चरित्र के प्रगतिशील पक्ष पर हिन्दी में मौलिक कम ही लिखा गया है । चौथीराम यादव ज ी की यह पुस्तक पहली बार आधुनिक समाजशास्त्रीय दृषिट से कृष्ण7चरित्र की सम्यक समीक्षा करती है ।
     रामकथा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हुए चौथीराम यादव की यह स्थापना महत्वपूर्ण है कि वर्चस्ववादी संस्कृति की रक्षा और प्रतिरोध की संस्कृति का नकार ही रामकथा का पौराणिक लक्ष्य है ।(पृ0 74) उनके अनुसार राम-रावण के प्रतीकात्मक संघर्ष का निहितार्थ वर्चस्व की संस्कृति बनाम प्रतिरोध की संस्कृति का संघर्ष है ; जिसमें तमाम जातीय-विजातीय परम्पराओं की जय-पराजय और स्मृतियां समाहित हैं ।( वही,पृ0 74 )चौथीराम जी नें रामकथा के अधिक ब्राहमणवाद-सम्मत होनें का जो संकेत किया है एवं तुलना में कृष्ण-चरित्र को जो अधिक चुनौतीपूर्ण और उन्मुक्त पाया है ,उसमें पर्याप्त बल है । दलार्इलामा संस्था की तरह राम का तो जन्म ही ब्राहमण ऋषियों द्वारा बहुप्रचारित सांस्कृतिक परियोजना के अन्तर्गत होता है । राम का सारा संघर्ष ब्राहमण ऋषियों के उस संघर्ष पर खरा उतरनें का ही है । बात सिर्फ इतनी सी ही लगती है कि ब्राहमणें से असहमत होने के कारण रावण राम के विष्णुत्व पर विश्वास नहीं कर पाता । राम और पाण्डव भी यदि प्राचीन नियोग प्रथा की उपज रहे हों तब भी उनकी आनुवांशिक श्रेष्ठता के वैज्ञानिक आधार से इन्कार नहीं किया जा सकता । निश्चय ही राजा दशरथ नें नियोगी जनक के रूप् में सर्वश्रेष्ठ पिता का ही चयन किया होगा । चारों बालकों में सिर्फ राम और लक्ष्मण को ही अपना शिष्य बनानें के लिए मांगनें के कारण अधिक संभावना यह भी है कि विश्वामित्र ही उनके नियोगी पिता रहे होंगे । श्रृंगी ऋषि तो उस यज्ञ के पुरोहित मात्र थे ।राम के ब्रहमत्व को ब्राहमणें नें अगि्रम मान्यता दे दी थी । मनोवैज्ञानिक दृषिट से भी देखें तो राम पर उस जाति की अपेक्षाओं पर खरा उतरनें का भारी दबाव रहा होगा । रावण नें उन्हें चुनौती देकर ब्राहमणी विभ्रम से बाहर निकालकर मनुष्य की तरह निरीह बनानें और बतानें की असफल कोशिश की और दशरथ द्वारा चयनित जीन से घटिया साबित हुआ और मारा भी गया । यह भी एक सच्चार्इ ही है कि इतिहास के नेतृत्वकर्ता प्रतिपक्षियों से अधिक विकसित रहे हैं । प्रचीन आयोर्ं की जातीय एकता और आनुवांशिक योग्यता के आधार पर वर्ण विभाजन के विकसित जातीय चरित्र को शायद आज की समझ से समझाा नहीं जा सकता । यदि ध्यान से देखा जाय तो रामकथा राजतन्त्र में विकसित नागरिक समाज के मूल्यों की महागाथा प्रस्तुत करती है । इसके समाज के सभी वगोर्ं में एक आवयविक निर्भरता है ,जो सहयोग की संस्कृति का प्रचार करती है,जबकि कृष्ण-काव्य के नायक कृष्ण का नायकत्व गणतन्त्र के नायक का नायकत्व है । इस भेद के कारण दोनों के मूल्य-निर्धरण में अन्तर है । चौथीराम यादव के अनुसार सूरदास के सूरसागर में चित्रित समाज ,रामचरित मानस के पौराणिक समाज से बिल्कुल भिन्न समाज है । सूरसागर में चित्रित समाज चाहे वैदिक समाज की स्मृति (नास्ट्रेलिजयाद्ध हो अथवा भावी समाज का स्वप्न (यूटोपिया) दोानों ही सिथतियों में वह मानस के बन्द समाज से कहीं ज्यादा खुला हुआ आधुनिक समाज है और कभी-कभी तो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की सामाजिक उन्मुक्तता के कारण उत्त्रआधुनिक जैसा भी प्रतीत होता है । (पृ067)
      वस्तुत: राम का चरित्र प्राचीन आयोर्ं के जातीय आदर्शवाद को पूर्ण चरमोत्कर्ष में सामनें लाता है ,जबकि कृष्ण का चरित्र उस जातीय आदर्शवाद से पूरी तरह बाहर और स्वच्छन्द है । कृष्ण को बहुत प्रतिरोध और संघर्ष के बाद ब्राहमणें द्वारा मान्यता मिली । कृष्ण के पालक नागरिक जीवन को नापसन्द करने वाले प्रकृतिजीवी प्रजाति और संस्कृति के लोग थे । राम की तरह प्रारम्भ से ही आरोपित गरिमा-बोध से मुक्त रहने के कारण कृष्ण का चरित्र अधिक सामाजिक तथा जन-सामान्य के लिए तादात्म्यपूर्ण है । वह ब्रहमणी अपेक्षाओं के अनुशासन में निबद्ध नहीं है । अपनें प्रारमिभक संघर्ष में वह इन्द्र-पूजा का विरोध करनें के कारण ब्रीहमणवादी वर्चस्व की अवहेलना की सूचना भी देता है । इस अर्थ में चौथीराम जी नें उसे ठीक ही रामकथा से अधिक प्रगतिशील पाया है ।'उनके अनुसार वैदिक काल से लेकर मध्यकालीन सूरदास के गोचारी काव्य तक कृष्ण की ऐतिहासक यात्रा वस्तुत: जननायक से लोकनायक बनने की ही अन्तर्यात्रा है ,भले ही समय-समय पर उसे र्इश्वर का मुकुट भी पहनाया जाता रहा हो । लेकिन सूरदास के लिए यह मुकुट किसान-संस्कृति के किसी प्रभावशाली मुखिया की पगड़ी से ज्यादा अहमियत नहीं रखता। वैदिक काल का सीमान्त और उत्तर वैदिक काल का आरम्भ भारतीय इतिहास का वह समय है जब आयोर्ं का प्शुचारी जीवन कृषि-जीवन में रूपान्तरित हो रहा था । कृषि-केनिद्रत इस नर्इ जीवन-पद्धति मेें इन्द्र के वर्चस्व वाली यज्ञ प्रणली और निरन्तर होने वाले युद्ध बहुत मंहगे और घातक सिद्ध हो रहे थे,उस सिथति में तो और भी जब यज्ञों के लिए मवेशी और अन्य प्शु बिना मूल्य चुकार ही हथिया लिए जाते थे  । जाहिर है कि ऐसे यज्ञ प्शुपालक किसानों के आर्थिक शोषण  के जटिल कर्मकाण्ड बन गए थे । सामाजिक जीवन के इस परिवर्तित मोड़ पर  किसानों के हित में यज्ञ और इन्द्र का विरोध एक एंतिहासकि अनिवार्यता बन गया था । ऐसे ही समय यज्ञ और इन्द्र का विरोध करने के कारण गोरक्षक कृष्ण नें किसानों का प्रवक्ता बन ,जननायक का गौरव अर्जित कर लिया और लगातार बढ़ती लोकप्रियता नें उसे पूज्य बना दिया ।  कृष्ण का यह चाित्र प्राय: धर्मभाीरु रहनें वाली सामान्य जनता को कर्म एवं वास्तविकताजीवी बनने का सन्देश देता है ।यह स्पष्ट रूप से पौराणिक स्मृति में मिलने वाला पुरोहितवाद का प्रत्यक्ष क्रानितकारी विरोध है । चौथीराम जी नें उचित ही यह रेखांकित किया है कि 'सूरदास के सूरसागर में चित्रित समाज,रामचरित मानस के पौराणिक समाज से बिल्कुल भिन्न समाज है । उनका यह आरोप कि जननायक कृष्ण को अपनें ही लोक के विरूद्ध पुराण्कारों नें खड़ाकर दिया महत्वपूर्ण है । विरोधी नायकों को अपना बनाने की कोशिश ब्राहमण जाति नें अपनें तरीके से की थी और अब भी कर ही रही है । दक्ष का यज्ञ विध्वंस करनें वाले शिव को महादेव घोषित कर देना और कालपनिक देवताओं की पूजा का बहिष्कार कराने वाले कृष्ण को ही विष्णु का अवतार घोषित कर देना एक ही जैसी ब्रहमणी नीति का हिस्सा है । यह एक-दूसरे को मान्यता देनें और असितत्व-समर्थन जैसी बात लगती है । यह सच है कि कृष्ण-चरित्र अधिक नैसर्गिक और मानवीय है ।उसे ब्राहमणवाद नें नहीं गढ़ा बलिक उसनें ही ब्राहमणवाद को अपनें तरीके से गढ़ लिया है । कृष्ण-चरित्र की लोकधर्मिता और लौकिकता अपनें आध्यातिमक संस्करण के बावजूद साफ-साफ दिखती है ।
सूूर की भाषा और भाषा की आधुनिकता शीर्षक लेख भाषा की मनोवैज्ञानिक प्रकृति का सम्बन्ध उसके प्रयोक्ता साहित्यकार के वर्गीय चरित्र से जोड़ते हुए मध्ययुगीन साहित्यकारों के समाजशास्त्रीय अर्थवत्ता पर प्रकाश डालती है । इसमें सन्देह नंहीं कि भाषा की वर्गीय और जातीय भूमिका की पड़ताल आधुनिक समाजशासत्रीय अवधारणा है । जातीय दंभ और बड़प्पन की भाषा-संरचना  वर्ग-विशेष में श्रेष्ठता के दंभ के साथ प्रति-वर्ग में हीनता की ग्रनिथ का भी प्रचार करती है । चौथीराम यादवइ स मनोवैज्ञानिक भाषा-संरचाना के कारण ही केशव और तुलसी  की काव्यभाषा को सूर की सहज भाषा क सापेक्ष खारिज करते हैं । चौथीराम यादव के अनुसार सूरदास कस शैली-सौन्दर्य बहुत कुछ उनकी भाषा पर आधारित है ।उन्होंनें भाषा को अपनें आन्तरिक अनुभव में इस प्रकार ढाल लिया था कि भाव-सम्प्रेषण के संकट से वे प्राय: मुक्त रहे हैं ।(पृ081)भषा यदि कविता और गध को निकट ला सके तो यह उसकी बहुत बड़ी उपलबिध होगी । सूर की भाषा के गधात्मक स्वरूप में सांगीतिक लय कहीं विशेष बाधक नहीं है ।(वही पृ0 84)सूर की भाषा के गधाात्मक स्वरूप् का एक मूल कारण यह है कि वह मूलत: आाम जिन्दगी की भाषा है  सामान्य जन-जीवन के मुहावरे,लहजे,सांस्कृतिक आचार-विचार,सामाजिक रीति-रिवाज,तीज-त्यौहार एवं उत्सव आदि की जीवन्तता को रूपायित करनें वाली समाज-प्रचलित भाषा ही सूर की भाषा हैजो जिन्दगी के मुहावरों और अनुभवों से टकराकर कहीं-कहीं आक्रामक और धारदार हो उठी है । स्वभावत: सूर की भाषा में मुहावरों-लोकोकितयों और कहावतों की प्रधानता है ।(पृ085) सूर कीउकितयां भाषा की रूढ़ता का माध्यम न होकर सशक्त अभिव्यंजना की आवश्यक उपादान हैं । इन्हें सूर के व्यापक सामाजिक अनुभव का प्रामाणिक दस्तावेज भी कहा जा सकता है ।सूर की भाषिक संरचना में तत्सम की अपेक्षा तदभव शब्दों को ज्यादा तरजीह देना,भाषा की जीवन्तता का परिचायक है ।तत्सम शब्दों का रूप-परिवर्तन करके भी भाषापन की रक्षा की गयी है ।इसतरह  खड़ीबोली को काव्यभाषा बनाने में जो योगदान सुमित्राननदन पंत का है ,ब्रजभाषा के बनानें और सजानें में सूर का योगदान उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है ।(पृ0 87)
     हिन्दी नवजागरण और उत्तरशती के विमर्श शीर्षक आलेख दलित नवजागरण से सम्बनिधत समकालीन बहसों पर केनिद्रत है । इस आलेख में प्रेमचन्द और दलित-विवाद ,धर्मवीर की विवादास्पद स्त्री-विरोधी और पुरूषवादी दलित-दृषिट ,डा0अम्बेडकर का ऐतिहासिक सामाजिक-राजनीतिक चिन्तन, समकालीन दलित हिन्दी कविता तथा दलित आन्दोलन को नर्इ दिशा देने के लिए दलित चिन्तकों की भूमिका आदि कर्इ विमशोर्ं पर दृषिटपात किया गया है । नवां आलेख स्त्री-विमर्श की चुनौतियां और छायावाद का मुकित स्वर
        रोती संवेदनाओं की आत्मकथा शीर्षक आलेख तुलसीराम की बहुचर्चित आत्मकथा मुर्दहिया की समाजशास्त्रीय साहितियक समालोचना है । चौथीराम यादव के अनुसार मुर्दहिया व्यकितकेनिद्रत आत्मकथा होनें के साथ ही धरमपुर की दलित बस्ती का लोकाख्यान भी है ।(पृ0174)  वह समूचे उत्तर प्रदेश के ग्राम्यांचल का सामाजिक-आर्थिक एवं राजनैतिक रिपोर्ताज है .वे घटना-प्रसंगों के चित्रण में लेखक की सूक्ष्म निरीक्षण-दृषिट और अदभुत वर्णनात्मक क्षमता की प्रशंसा करते हैं । उनके अनुसार ‘ लोकजीवन का जितना व्यापक परिवेश और उसके जितने विविध लोकरंग –लोकगीत ,लोकसंगीत ,लोक-नृत्य आदि मुर्दहिया में देखने को मिलते है मिलते हैं, उतने तो ग्रामीण जीवन के महान आख्याता प्रेमचंद के कथा-साहित्य में भी नहीं मिलते .( ९४) मुर्दहिया के मार्मिक स्थलों का उद्धरण तथा उन पर  की गयी विवेचनात्मक टिप्पणिया इस आलेख को महत्वपूर्ण बनाती है . उसमें वे शिष्ट साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र से भिन्न दलित-साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र पाते हैं जो सवणेर्ं और दलितों के कन्ट्रास्ट में रचा गया है ।(पृ0180) मुर्दहिया में मृतप्राय और उपेक्षित शब्दों को पुनर्जीवन देने की सामथ्र्य है ,जो ग्रामीण जीवन के एक समानान्तर शब्दकोश बनानें की प्रस्तावना करती है ।(वही,पृ0 180) इसमें संदेह नहीं कि मुर्दहिया में तुलसीराम का आत्म –संघर्ष एक ऐसी सभ्यता से मुक्ति का संघर्ष है ,जो मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद होते हुए भी अपराध-बोध से रहित ,निर्मम एवं अमानवीय है .
         नागाजर्ुन की कविता में प्रतिरोध का स्वर  शीर्षक आलेख वर्गान्तरण की विद्रोही परम्परा में रखकर नागाजर्ुन का मूल्यांकन करने की कोशिश है । चौथीराम यादव के अनुसार भारातीय चिन्तन में प्रतिरोध की परम्परा उतनी ही पुरानी है जितनी अलगाववाद पर आधारित वर्चस्ववादी विचार-परम्परा । प्रतिरोध का स्वर मूलत: भौतिकवादी,लोकवादी और मानवतावादी स्वर है  जो शुद्धतावादी विचार-सत्ता और भाषा के आभिजात्य के विरुद्ध तनकर खड़ा है । प्रतिरोध हिन्दी का मूल चरित्र है । व्यंग्यगर्भित आक्रोश-भरा प्रतिरोध का स्वर और खतरे से खेलने का अदम्य साहस या तो कबीर में दिखार्इ देता है या नागार्जुन में ।(पृ0 185) इस आलेख में नागाजर्ुन की प्रगतिशील जन-संवेदना की पड़ताल की गयी है । इसमें उनकी हरिजन गाथा जैसी दलित प्रसंग वाली कविताओं का भी विश्लेषण है । जिसे वे आन्दोलन धर्मी कविताओं की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी जनवादी परम्परा की क्रानितकारी कविता मानते हैं ।
         इक्कीसवी सदी का गल्प और काशी का अस्सी शीर्षक आलेख की विशेषता उसके समाजशास्त्रीय विमर्श के रूप में लिखे जानें में है । विमर्श के रूप् में लिखे जाने के कारण ही यह आलेख उन मुददों और बहसों को आगे बढ़ाता है जिसे काशीनाथ सिंह की कृति काशी का अस्सी अपनी सृजनशीलता में उठाती है । चौथीराम यादव के अनुसार भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के इस अन्धे दौर में काशी का अस्सी  विषय-वस्तु ही नहीं,भाषा और शिल्पगत प्रयोगों की दृषिट से भी उत्तर-आधुनिक काल की नर्इ रचनाशीलता का सवोर्ंत्तम उदाहरण है । उन्होने काशीनाथ सिंह को उनकी भदेसपन की हद तक फैली फक्कड़मिजाजी की अद्वितीय औघड़ भाषा के लिए सराहा है । उनके अनुसार गध विधाओं के पक्के ढांचे का टूटना,उनकी शुद्धता और स्वायत्तता का विखंणिडत होना ,उत्तर-आधुनिक रचनाओं की खास पहचान है ।इसलिए काशी का अस्सी गधा-विधाओं का अन्तर्पाठ प्रस्तुत करता है और इसीलिए उसका रूपबन्ध उत्तर-आधुनिक है ।(पृ0 200) काशी का अस्सी  अपनी नर्इ अन्तर्वस्तु और शिल्पगत प्रयोगों के साथ भूमण्डलीकरण,बहुराष्ट्रीयकरण,निजीकरण और बाजारवाद के सांस्कृतिक हमले के विरुद्ध प्रतिरोध का महाआख्यान है । ( पृ0 214)'प्रतिसंस्कृति  के हिन्दी-साहित्य पर एक नजर शीर्षक आलेख काशीनाथ सिंह के कथा-रिपोर्ताज 'संतो घर में झगरा भारी  के बहानें समाज और साहित्य में न्रतिसंस्कृति का विमर्श प्रस्तुत करती है । छायावादी कवयों की सामाजिक पीड़ा और चेतना को कम ही देखा गया है  अपने स्त्री विमर्ष की चुनौतियां और छायावाद का मुीक्त-स्वर  शीर्षक आलेख में  चौथीराम जी नें उसे पहलीबार गम्भीरता से उनके साहित्य में उपसिथत जीवन-वस्तुओं की समाजशास्त्रीय पड़ताल की है ।
      “ उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज “ में भारत के जातीय एवं सांस्कृतिक अतीत के सापेक्ष उसके आधुनिकीकरण एवं मानवीकरण की समस्या और चुनौतियों की विस्तृत पड़ताल चौथीराम यादव जी नें की है .आज के बदले हुए परिवेश में स्त्री-विमर्श ,दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श को वे हजारों साल से गुमशुदा अस्मिताओं का आन्दोलन कहते हैं .(भूमिका ,पृष्ठ 9 ) भारत के सन्दर्भ में गांधी और मार्क्स को बीसवीं शताब्दी का तो अम्बेडकर को इक्कीसवीं शताब्दी का सबसे बड़ा चिन्तक ,लेखक ,समाजशास्त्री और अर्थ शास्त्री मानते हैं .इसी सन्दर्भ में यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाते हैं कि गाँधी और नेहरू युग की तरह हमें उनके दौर को अम्बेडकर युग के रूप में भी यद् करना चाहिए ,क्योंकि वे सिर्फ राजनैतिक मुक्ति की लडाई ही नहीं लड़ रहे थे बल्कि सामान्य जनता की सामाजिक –आर्थिक मुक्ति यानि आजादी की दूसरी लड़ाई भी लड़ रहे थे (वही ,पृष्ठ 9 )उनकी दृष्टि में श्रम विहीन पराश्रित भद्र-लोक मानव-जीवन का स्वाभाविक-वास्तविक सौंदर्यशास्त्र नहीं रच सकता  दलित साहित्य और उसका सौन्दर्य-शास्त्र कलावाद विरोधी ,मनुष्य-केंद्रित और जीवनवादी साहित्य है.जिसके समुचित मूल्याङ्कन के लिए दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र लिखा जा रहा है .( १० ).
         चौथ्य्रम यादव नें भारतीय नवजागरण के समानांतर सामाजिक मुक्ति को ध्यान में रखकर लोकजागरण की भी प्रस्तावना की है .वे इस तथ्य की और ध्यान दिलाते हैं कि ब्रिटिश शिक्षा कजे प्रभाव के कारण उच्चा शिक्षित और सम्पन्न लोग ही नवजागरण के सवाहक बनें , जबकि एक बड़ा दलित-पिछड़ा वर्ग यथास्थिति में पड़ा रहा .लोक-जागरण की इस प्रक्रिया को वे एक लम्बी इतिहास-परम्परा में देखते हैं ..उनके अनुसार यदि ‘मध्यकालीन लोक-जागरण आधुनिक नवजागरण का पहला चारण है तो उत्तरशती में दलित विमर्श उसको पूर्णता प्रदान करने वाला अगला विकास (१०३)  इस तरह लोक-जागरण को कबीर ,दादू-रैदास से लेकर अम्बेडकर और उनसे प्रभावित दलित साहित्यकारों तक लोकजागरण की एक सुदीर्घ परंपरा है .ईसीई क्रम में वे प्रेमचंद को मानवीय संवेदना के सबसे बड़े लेखक के रूप में महत्वपूर्ण मानते हैं .प्रेमचंद के साहित्यिक विकास को प्रायः गांधीवाद और मार्क्सवाद कजे प्रभाव में रखकर ही मूल्यांकित किया जाता है .चौथीराम जी नें कँवल भारती और गोदान के सिलिया-मातादीन कथा-प्रसंग के माध्यम से उनपर पड़े  अम्बेडकरवादी प्रभावों को भी रेखांकित किया है .इस क्रम में क्षत्रिय होने के कारण धर्मवीर के  अँध बुद्ध-विरोध का व्यंग्यात्मक प्रत्याख्यान भी प्रस्तुत करते हैं .यद्यपि इसका तार्किक प्रत्याख्यान गणतंत्र और राजतंत्र के अंतर्विरोध को दयां दिए बिना संभव ही नहीं है .यह एक तथ्य है कि गणतंत्र में अपने बड़प्पन या विशेष होने की दावेदारी संभव नहीं ,न ही शासित होने की अपरिहार्यता ही थी कि सर्व शक्तिमान ईश्वर की परिकल्पना करना आवश्यक हो .पराधीनता और सर्व्शाक्तिमानता की परिकल्पना और संस्कार राजतंत्र व्यवस्था के अंतर्गत ही पुरोहितों द्वारा विकसित किए गए
        सस्मारानात्मक होते हुए भी यह कहना उनके व्यक्तित्व को समझाने-समझाने के लिए संभवतः उपयोगी हो कि जिस समय .नामवर सिंह की चर्चित पुस्तक “दूसरी परंपरा की खोज  “प्रकाशित हुई थी .उन दिनों मैं भी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोध–छात्र था .उन दिनों चौथी राम यादव जी नामवर सिंह के देशव्यापी आलोचक –ख्याति से प्रभावित रहने के साथ-साथ उनके कनिष्ठ भ्राता काशीनाथ सिंह के लगभग पारिवारिक मित्र के रूप में स्थापित थे .अभिन्न सहचर –ऐसे में समझा जा सकता है कि नामवर जी के प्रति अविकल श्रद्धा-भाव को जीते चौथीराम जी के आलोचक व्यक्तित्व के स्वतन्त्र विकास की संभावनाएं मनोवैज्ञानिक स्तर पर कम ही थीं .वे लम्बे समय तक अंतर्मुखी द्वंद्वात्मक भाव ही जीते रहे जैसा कि हजारीप्रसाद द्विवेद्वी वाली पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि “राम चन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेद्वी के इतिहास लेखन और आलोचना कर्म से गुजरते हुए मेरे में में तरह-तरह के सवाल उठाने लगे .यदि तुलसीदास लोकधर्मी कवि हैं तो कबीर लोकधर्म विरोधी क्यों ? क्या लोकधर्म को वर्णधर्म का पर्याय माने बिना कबीर को लोकधर्म विरोधी खा जा सकता है  ?रामभक्ति की एक ही शाखा से जुड़े होने के बावजूद इनके सामाजिक चिंतन में इतना अंतर क्यों है ? “ इत्यादि .स्पष्ट है कि रामचंद्र शुक्ल ,हजारी प्रसाद द्विवेद्वी एवं नामवर सिंह की तरह चौथीराम यादव जी भी साहित्यिक इतिहास के तार्किक एवं मानवीय शैक्षणिक व्यवस्थापन की महत्वपूर्ण समस्या से अपने ढंग से जूझा रहे थे .सत्यनिष्ठा की एक ईमानदार परंपरा के  उत्तराधिकार  ने उन्हें प्रोत्साहित किया .देखा जाय तो रामानंद और बल्लभाचार्य की समावेशी प्रगतिशील परंपरा ही हजारीप्रसाद जी तक आती है ,जिसका युगापेक्षी विस्तार नामवर सिंह के पश्चात् चौथीराम यादव जी भी कर रहे है .अपनी इन महत्वपूर्ण पुस्तकों के माध्यम से चौथीराम जी समाजशास्त्रीय दृष्टि से सम्पन्न ऐतिहासिक आलोचना के विमर्शकार के रूप में सामने आते हैं .