गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

परिशंसा --महाशिवरात्रि की रात्रि में जागते हुए चिंतन

 मैं नहीं जानता कि वे स्वार्थ में हैं या प्रेम में
वे भय में हैं या विनम्रता में
उनका विनम्र एवं पवित्र समर्पण मुझे अभिभूत करता है
उनकी आस्था मुझे ईर्ष्यालु बनाती है
उनका विश्वास मुझे अविश्वास से भर देता है

हे प्रभु !क्या चमत्कार है कि
ये पीढ़ी दर पीढ़ी
सदियों से छले हुए लोग हैं
उनकी आस्था अटूट है
और उनकी जनसँख्या पर्याप्त
और वे सभी चुपचाप अपनी प्रजाति कि अमरता के लिए
समर्पित हैं
मैं जनता हूँ कि वे बार-बार मारे जाने के बावजूद
बचे रहेंगे
कि अस्तित्व की इतनी  पुनरावृत्ति है कि
इतनी  दुर्घटनाओं -आशंकाओं के बावजूद  वे  सुरक्षित हैं

हे प्रभु ! इतनी क्रूरता के बावजूद वे कितने आश्वस्त एवं आभारी हैं
उनकी अच्छाइया सारी बुराइयों पर
और सारी असुविधाओं के बावजूद
उनका जीवन उनकी मृत्यु पर  भारी है।


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

भारतीय धर्म एवं संस्कृति का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

भारतीय धर्म एवं संस्कृति की मुख्य दार्शनिक  विशेषता एक संपूर्ण आत्मीय तथा एकतापूर्ण पर्यावरण के निर्माण में थी ,यद्यपि व्यवहार में वह समाज के आवयविक सिद्धान्त की  समर्थक तथा  आनुवांशिक एवं जातीय राजतंत्र की पोषक होने के कारण सामुदायिक स्तर  पर घोर रूढ़िवादी रही  है। उसने सामाजिक स्तर पर श्रेष्ठता और हीनता के मनोवैज्ञानिक प्रतिमान गढ़े।   ऐसा प्रतीत होता है कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से वह एक बन्द कबीले के अन्तः सम्बन्धों की आतंरिक संरचना एवं प्रस्थिति का सामुदायिक विस्तार है। धीरे-धीरे एक कबीले का पुरोहित आस-पास के अन्य कबीलों का भी पुरोहित बनता गया और एक विशिष्ट जातिवादी समाज की रचना होती गयी। जैसी कि कहावत है कि ज्योतिष-विद्या  सिर्फ ज्योतिषी की ही आजीविका चला सकती है -भारतीय दर्शन और उसकी अवधारणाओं में पुरोहित-वर्ग तटस्थ भूमिका ,उदासीनता , निठल्लेपन एवं परजीविता की आत्मा समाई हुई है। उसके समर्पण का दर्शन दूसरों के वर्चस्व और अधीनता को बिना किसी विरोध या प्रतिरोध के स्वीकारने का सन्देश देता है। इसे मुख्य धारा की धार्मिकता यानि ब्राह्मण-जातीयता के पार्श्व -प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। यह जातीय मनःस्थिति ब्राह्मण को जातीय  श्रेष्ठता का दम्भ तो  देती है ,लेकिन आर्थिक रूप से दान-दक्षिणा के रूप में परजीविता का महिमा-मंडन भी करती है। संतोष-जीविता का यह महिमा-मंडन इस रूप में भारतीय संस्कृति के अनुयायियों में  सृजनात्मक असंतोष का निषेध करती है। उसका सन्तोषजीविता का सन्देश एक बड़ी जनसंख्या को भाग्य एवं प्रतीक्षा- जीवी बनाता है। सामाजिक भूमिकाओं का आवयविक विभाजन, हर व्यक्ति से उसके लिए निर्धारित जातीय चरित्र और भूमिका की मांग करने लगता है। इससे एक स्थिर किन्तु गतिहीन समाज की रचना होती है।
                इसके बावजूद भारतीय संस्कृति में जो सबसे आकर्षक बात जो मुझे दिखाई पड़ती है ,वह पवित्रता के बहाने काम-चिंतन का दमन या फिर उसका उदात्तीकरण है। काम भावना पर विजय को जीवन के पुरुषार्थ या चुनौती के रूप में लेने के कारण उसने साधु -संतों के रूप में काम -मुक्त व्यक्तिव का भी आदर्श प्रस्तुत किया था तो दूसरी ओर  कृष्ण की  श्रृंगार-गाथाएं ,आध्यात्मिकता के बहाने काम -भावना के विरेचन की मनोवैज्ञानिक व्यवस्था भी करती हैं। यदि अरस्तू का कैथार्सिस या विरेचन की अवधारणा सही है तो कृष्ण-कथा की इस सांस्कृतिक भूमिका को भी स्वीकार करना होगा। इसके विपरीत राम-कथा के समाज-वैज्ञानिक प्रभाव के अध्ययन से जो बातें सामने आती हैं ,उसमें आक्रमण के स्थान पर प्रत्याक्रमण एवं प्रतिरोध की क्षमता का महिमामण्डन प्रमुख है। यह सम्भवतः राम-कथा का ही प्रभाव है कि आज भी भारतीयों पर वैश्विक पर्यावरण बिगाड़ने का आरोप कम ही लगाया जा सकता है। किसी के विश्लेषण में मैंने पढ़ा था कि सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से राम का चरित्र अनारम्भी  है। राम का चरित्र संयम में रहने का सन्देश देता है। दूसरों के अस्तित्व का सम्मान करने एवं हिंसा की पहल न करने का सन्देश भी। राम-कथा किसान-जीवन के ताने -बाने के लिए या यह कहें कि जन-सामान्य के लिए सिर्फ एकल दांपत्य की प्रथा के आदर्श प्रतिमान की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है ,बल्कि वह कुटुम्बा-निर्माण की आधारभूत दार्शनिकी भी उपलब्ध कराती है। वह अर्थ और पूंजी के  पारिवारिक विभाजन को हतोत्साहित करती है :सामूहिक श्रम का प्रोत्साहित कराती है। इस तरह साझी खेती को बढ़ावा देती हुई मेड़ बंदी की कुप्रवृत्ति को भी कम करती है।
                       यद्यपि सामाजिक संवेदनशीलता  और दायित्वबोध के  चारित्रिक आदर्श का केंद्रीय एवं प्रारंभिक मिथकीय चरित्र  विष्णु से सम्बंधित है। परवर्ती महापुरुषों के लिए उनका पौराणिक चरित्र एक स्थायी मानक है। इन कथा-नायकों के चरित्र में ऐसे पर्याप्त तत्व हैं ,जो भारतीयों के लिए ब्राह्मण-जातीय
 परजीवी  धार्मिकता का संतुलनकारी  प्रतिपाठ प्रस्तुत करते हैं। इन सब के बावजूद यह ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि प्राचीन भारत में ज्ञान के प्रकाशक एवं संरक्षक के रूप में ब्राह्मण जाति की एक ऐतिहासिक  एवं महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज के समतावादी युग में प्रतिगामी दिखने एवं होने के बावजूद वह अपनी समय-सापेक्षता में कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण था। उसने एक मानक एवं परिष्कृत केंद्रीय भाषा विकसित की। प्राचीन भारत के बहुभाषी समाज में संस्कृत के विद्वानों नें ज्ञान के संरक्षक के साथ-साथ दुभाषिए की भी भूमिका निभाई। काश्मीर का संस्कृतज्ञ सुदूर दक्षिण के किसी भी राजा के दरबार में रहने वाले संस्कृतज्ञ से संवाद स्थापित कर सकता था। स्थानीय एवं भिन्न भाषाओँ कि बहुलता के बीच जातीय रूप से ही सही ब्राह्मणों की यह भूमिका असाधारण ही कही जाएगी। उनके पास ज्ञान और स्मृतियों के संरक्षण और विज्ञापन का आज की मीडिया की तरह ही ऐसा सशक्त  जातीय तंत्र था कि जिसको भी चाहा भगवान बना दिया।

परजीविता का महिमामंडन
jansatta.com
http://www.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=61988%3A2014-03-15-05-41-10&catid=21%3Asamaj

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

समय-चरित

समय-चरित 


चींजें नफ़रत से भरी हुई हैं
जो होना चाहिए था वह नहीं हो रहा है और
जो नहीं होना चाहिए था हो रहा है वह

जिस दिन फूल सबसे अधिक खिले थे
बह रही थी सबसे सुन्दर सबसे सुखकर हवा
उस दिन दूरदर्शन पर बज रहा था मातमी धुन
रो रहा था रेडियो तिन दिनों के राष्ट्रीय शोक की सूचना के साथ

चीजें चुपचाप हाथ से खिसक रही थीं
बाज़ार बोलना सीख रहा था अपनी अपनी भाषा
ए .टी .एम .सिर्फ हजार रूपए की नोट उगल रहे थे
दूकानदार छोटे नोटों के अभाव को देखते हुए
बढ़ा कर बोल रहे थे वस्तुओं के दाम

बढ़ती हुई असुरक्षा के साथ लोग
लौट रहे थे जातिवाद के सबसे  विश्वसनीय प्लेटफार्म पर
आवारागर्दी से पिछड़ते हुए युवा
बढ़ती हुई कुंठा और अवसाद के साथ
और आक्रामक ,हिंस्र व बलात्कारी होते जा रहे थे

विचारक अधिकांशतः बेरोजगार थे और कुछ नौकरी में
निरुद्देश्य कार्यकर्ता घूम रहे थे सडकों पर
मंच को हथियाने के बाद डकैत
अपने हथियारों से बारूदी राख साफ कर रहे थे

गेहूँ के दाम पहली बार आसमान छू रहे थे
खुश था किसान कि धरती के सोना ने
पहली बार बाजार में उचित सम्मान पाया है
वित्तमंत्री बिगड़ रहे थे अपने सचिव पर
कि कैसे हुई चूक और अब तक पहुँची क्यों नहीं
विदेश से मगाई गई गेहूं की खेप
और किन परिस्थितियो में पिछड़ गए सरकारी जलयान ...

सब कुछ इतना आकर्षक था कि स्वप्न हो जैसे
मुख्या-धारा का घटिया नायक मुस्करा रहा था
सामूहिक मोहभंग घटित करने के बाद
किताबों से बाहर  निकलकर
जंगलों में गीत गा रहे थे वैकल्पिक नायक बनने के सपने

चीजें जटिल होती जा रही थीं
और एक नासमझ पर्यावरण
अतिउत्साह में
सब-कुछ को मटियामेट कर देना चाहता था ...

समय का सच

बेशर्म श्रेष्ठता
हिंसक बल
बहुमत की मूर्खतापूर्ण दादागिरी
और आधिकारिक विचारहीनता
इस अनैतिक समय का
सबसे बड़ा जीवन -मान है। …

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

आस्था का संकट

मैं जब दरवाजा खोलता हूँ मुझे नहीं पता कि
दरवाजे के बाहर जो खड़ा है आगंतुक
उसका चरित्र कैसा है !
मैं जब दरवाजा खोलता हूँ
किसी सज्जन के आगमन की प्रत्याशा के साथ
बाहर स्वजन के स्थान पर खड़ा मिलता  है दुर्जन

मैं दरवाजा बंद रखने पर स्वयं को सुरक्षित समझता हूँ
मैं जब दरवाजा बंद रखता हूँ
होता है स्वजन का अपमान
मेरा स्वजन बाहर भटकता है लावारिस
मैं जब दरवाजा खोलता हूँ स्वजन के लिए
स्वजन को धक्का देकर मेरे घर में घुस आता है हत्यारा

इस तरह दरवाजा खोलना एक साथ ही
स्वागत और असुरक्षा है
मुझे नहीं पता कि मैं जब खोलूंगा द्वार
उससे कौन आएगा भीतर
ईश्वर या शैतान ?
कि विश्वास के उस भावुक दुर्बल क्षण  में
विश्वासघाती दुर्घटना
सारे जीवन को नकारात्मकता से भर देती है।

हे पिता ! हे पूर्वजों !
तुम्हारी दी हुई आस्था नें
असुरक्षित कर दिया है मुझे
मेरी एक ही आस्था
ईश्वर और शैतान दोनों को ही  मुक्त आमंत्रण देती  है /

कि मुझे यह नहीं पता है कि
मैं जब-जब भी खोलूंगा  द्वार
उससे कौन आएगा मेरे भीतर
ईश्वर य़ा शैतान ?
जबकि हर आस्था परनिर्भरता विकसित करती ही है। 

बुधवार, 29 जनवरी 2014

आप की भूमिका और भविष्य

कल" समकालीन सोच" से जुड़े मेरे एक मार्क्सवादी कवि मित्र जे ०के ० सिंह (पूरा नाम जितेन्द्र  कुमार सिंह जो समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं  ) अरविन्द केजरीवाल के वर्ग को लेकर परेशान थे। वे इसे एक सुधारवादी आंदोलन मानकर असली क्रांति को भटकाने  वाला यानि दूर करने वाला आंदोलन मान रहे थे। उनकी दृष्टि में यह इतिहास की एक साजिश है। वे इस बात के लिए भी दुखी थे कि इस साजिश के कारण अब क्रांति उनके जीवन-काल  में नहीं हो पाएगी। इस आंदोलन नें एक बार फिर वास्तविक क्रांति की आतंरिक ऊर्जा को जनमन से दूर कर दिया है। उन्होंने अपने सोचने पर मेरी व्यक्तिगत राय चाही।  मैंने उन्हें बताया कि यह आपके समझने यानि अण्डर-स्टैंडिंग की व्यक्तिगत समस्या है। मैं यह भी उन्हें कहने के लिए सोचता रहा कि आपमें एक विचारधारात्मक अक्षमता विकसित हो गयी है ,जिसके कारण मार्क्सवाद के अतिरिक्त कुछ सोच ही नहीं पाते। मैंने उन्हें सुझाव दिया कि आप इस समस्या को कुछ इस तरह से सोचें -कि आपने (विचारधारा  के रूप में ) मार्क्सवाद की एक नहर बनायीं थी और सोचा था कि इतिहास का पानी सिर्फ इसी नहर से निकले लेकिन इतिहास के जीवंत प्रवाह नें पहले ही बंधे को तोड़ दिया और नाले के रूप में बह निकला। अब यह नाला ही सही पानी तो इसी नाले से हीबह रहा है। इस बहाने को मानसिक रूप से स्वीकार करने में आपको वक्त लगेगा।
             फिलहाल उनकी चिंता यह थी कि वे केजरीवाल की विचारधारा को किस परंपरा से जोड़ें !स्वाभाविक है कि टोपी के आधार पर वे इसे गांधी की परंपरा और कांग्रेस से जोड़ते तो कुमार विश्वास के मोदी प्रेम के आधार पर भाजपा से।  उन्होंने अंतिम निष्कर्ष यह निकाला कि वास्तव में यह अभी तक तो गांधी की परम्परा वाली कांग्रेस से ही जुड़ती है ,आगे भविष्य ही जाने। इसमें बहुत से मोटा वेतन पाने वाले लोग भी शामिल हैं ,इस आधार पर इसे पूंजीवाद का हरावल दस्ता भी माना जा सकता है-एक अन्य मित्र नें सुझाया । मैंने चुटकी ली कि जनमहकवि घाघ नें जो सूत्र दिया है वह तो "निषिद्ध चाकरी भीख निदान" वाला है- इस आधार पर तो सारे नौकरशाह भिखारी ही माने जाने चाहिए और इसी आधार पर सर्वहारा भी । वैसे भी उनका जीवन स्तर इतना खर्चीला तो होता ही है कि नौकरी छूटते ही भीख मांगने लगें। दूसरे कितना भी अधिक वेतन पाने वाला हो ,नौकरशाह होता है हिस्सा मध्यवर्ग का ही।
              बहस में यह भी बात सामने आई कि इस आंदोलन में बहुत से घटिया लोग भी महिमामंडित हो गए हैं। अगर केजरीवाल जन भावना के निमित्त के रूप में अपनी ऐतिहासिक  भूमिका को  नहीं पहचान पाए तो अन्य पार्टियों के नेताओं की तरह कुछ निकटवर्ती अवसरवादियों से घिर जाएंगे और उनका भी वाही हश्र होगा जो आज कांग्रेस और भाजपा का है। आप एक  इतिहास की एक स्वाभाविक उपस्थिति तभी बन पाएगा जब केजरीवाल भी आप को बहते पानी की तरह योग्य बुद्धिजीवियों के लिए एक ईमानदार  तटस्थ मंच के रूप में विकसित कर पाएंगे। कांग्रेस की स्थापना ह्यूम नें कि थी लेकिन उसकी ऐतिहासिक भूमिका ह्यूम की प्रत्याशा से काफी दूर निकला गयी। नदियों कि तरह आंदोलन भी इतिहास की अपनी जरुरत के अनुसार आतंरिक वेग से संचालित होते हैं। बहुत से लोग (अण्णा हजारे की तरह ) अपनी भूमिका निभाकर अप्रासंगिक होकर पीछे छूट सकते हैं ,लेकिन आप को एक वैकल्पिक मंच के रूप में योग्य राजनीतिज्ञों की तलाश जारी रखनी चाहिए। हो सकता है कि आप की कोई पिछली शानदार परंपरा नहीं हो। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह जीवित इतिहास में उपस्थित वर्तमान का एक हिस्सा है  वह अतीत के अनुभवों से कम संचालित होकर भी यदि वर्त्तमान के अनुभवों और आवश्यकताओं से संचालित होता है तो -यह भी एक ऐतिहासिक भूमिका बनती है।


शनिवार, 25 जनवरी 2014

श्रद्धा का समाजशास्त्र !

तुमको जीना यथास्थिति को जीना  है
तुम्हारी भक्ति स्वीकृति है
दूसरों  की सत्ता की  अधीनता की
तुमको जीना
सहमति है पूर्ण यथास्थिति से
और पूरी तरह कर देना है स्थगित स्वयं को
दूसरों की इच्छा के सम्मान के पक्ष में
समर्पित होकरव्यक्तित्वहीन हो जाना है पूरी तरह.…

हे प्रभु (वर्ग)!
मैं असहमत हूँ
असंतुष्ट हूँ तुम्हारी बनायीं दुनिया से
इसलिए तुम मेरी अश्रद्धा के लिए
मुझे नरक (जेल ) देने की  मत सोचो।

आखिर मुझे भी तो अपनी दुनिया
रचने का अधिकार मिलना ही चाहिए
विकल्प रचने का अधिकार
अपने हिस्से की सृजनशीलता से



रविवार, 19 जनवरी 2014

मध्यवर्ग की भूमिका

सर्वहारा आधारित क्रान्ति की अवधारणा के कारण वामपन्थी क्रान्ति की दृष्टि से मध्यवर्ग की उपयोगिता एवं भूमिका नगण्य ही है .ज्ञानार्जन और बुद्धि -व्यवसाय में सबसे अधिक समय और जीवन का निवेश मध्य-वर्ग ही करता है .बौद्धिक विकास में लगे रहने के कारण वह बहुत ही कम अन्तराल के बाध्यकारी नेतृत्व का शिकार होता है .दूसरे शब्दों में कहें तो वह बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण नहीं बल्कि आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक कारणों से इतिहास में बाध्यकारी नेतृत्व को     स्वीकार करता है .सर्वाधिक प्रतिरोध और सजगता के कारण उसकी भूमिका को लेकर सबसे अधिक भर्तस्ना-पत्र लिखे गए हैं .उसके आत्म-विश्वास को तोड़ने एवं उसे विचलित करनें की कोशिशें हुई हैं .इसमें संदेह नहीं कि औसत,सन्दिग्ध एवं अस्पष्ट समझ की वह अनदेखी करता है .

                वस्तुतः मध्यवर्ग की अवधारणा का विकास पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों के विचारकों द्वारा प्रतिक्रांति एवं क्रांतिविरोध और अवरोध को समझने के लिए किया गया था। मध्यवर्ग के वर्ग-चरित्र और  रुझानों'प्रवृत्तियों और उसके मनोविज्ञान को  समझने की दिशा में मार्क्सवादी खेमा भी रूढ़ मुहावरों 'सरलीकरण और और विचारधारात्मक संभाव्यतावाद से आगे नहीं जा पाया है। स्वयं मार्क्सवादी विचारधारा सर्वहारा और पूंजीपति वर्ग ,उच्च और निम्न वर्ग के बारे में ही विस्तार से सोचती है। उसके थीसिस और एजेंडे में मध्यवर्ग की अधिक भूमिका नहीं थी। क्योंकि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रया में आनी थी  ंअध्यवर्ग मार्क्स के लिए भी क्रांतिकारी असंतोष की दृष्टि से शून्य और अनुपयोगी था।  वह बहुत कुछ दर्शक और तटस्थ जनसँख्या का हिस्सा था ,जो संगठित क्रांतिकारी शक्तियों का न  समर्थन करा सकता था और न विरोध !
             मध्यवर्ग को प्रायः उपभोक्ता वर्ग या समुदाय में देखने का नजरिया नजरिया भी ठीक नहीं है। क्योंकि वह बौद्धिक विकास और सृजनशीलता के प्रति समर्पित केंद्रीय जनसमूह है। चेतन एवं प्रशिक्षित होने के कारण उसमें सजग प्रतिरोध की क्षमता है। नेतृत्वकारी शक्तियों द्वारा उनका सहज अनुकूलन या अनुयायीकरण सम्भव नहीं है। इसी प्रतिरोध के कारन ही  नेतृत्व के अभिलाषी महत्वाकांक्षी  बुद्धिजीवियों के सहज अनुगामी नहीं बना सकते। 
            मध्यवर्ग की अब तक की भूमिका को देखते हुए जनवादी क्रांति के बाद भी नयी क्रांतिकारी व्यवस्था के संरक्षण में मध्यवर्ग की भूमिका के महत्वपूर्ण होने की सम्भावना देखी जा सकती है। उसका सृजनात्मक
एवं अग्रगामी असंतोष व्यवस्था के परिष्करण -परिवर्धन और गतिशीलता को बनाए रखा सकता है। 
              मार्क्सवादी विचारधारा की दृष्टि से समझने का प्रयास करें तो सामंतवाद कृषि-सभ्यता का पूंजीवादी व्यवस्था-प्रारूप है तो सामंतवाद कृषक-व्यवस्था का राजनीतिकृत तंत्र-प्रारूप है। कृषक व्यवस्था का पूंजीवाद  अनुवांशिकता के आधार पर भूमि-स्वामित्व की।  असमानता के आधार पर भूमिहीन के रूप में एक भिन्न प्रारूप वाले शोषित -सर्वहारा जन को जन्मा देता है। लेकिन दूसरी और  नैतिक मूल्य -व्यवस्था कृषक सभ्यता से उपजे  मानवीय सम्बन्धों की ही दें है। यही वह प्राथमिक अर्थतंत्र है,जिसके अभावों एवं अपर्याप्तताओं नें उस विनिमय-तंत्र का विकास किया है ,जिसे आज हैम बाजार-व्यवस्था के रूप में जानते हैं। यदि अवधारणा की शब्दावली के रूप में देखें तो पूंजी की गतिशीलता के आधार पर कृषि-सभ्यता को अचल या स्थिर-प्रकृति का पूंजीवाद और विनिमय आधारित पूंजीवाद को गतिशील या प्रवाही पूंजीवाद कहा  है। ऐसे में मार्क्सवाद का औद्योगिक पूंजीवाद ;जिसे मार्क्सवादी विचारधारा की दृष्टि से उत्पादक पूंजीवाद कहा जा सकता है।  मार्क्स नें अपनी क्रांति की अवधारणा में सामंती और औद्योगिक दोनों ही प्रकार के पूंजीवाद को शामिल किया है।  विनिमय आधारित प्रवाही पूंजीवाद के प्रति क्रांति सम्बन्धी अवधारणा देने की जरुरत उन्हें इसलिए नही पड़ी
कि तब तक वह सगठित और दैत्याकार रूप में विकसित नहीं  हुआ था।
               
        इस तरह  मध्यवर्ग के लिए पूंजीवादी व्यवस्था से निष्क्रमण और विद्रोह का कोई ठोस मनोवैज्ञानिक आर्थिक आधार नहीं बनता .इसलिए भी कि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रिया में आनी थी .लेनिन ने अवश्य ही सर्वहारा  सर्वहारा वर्ग के पक्ष में उसके नैतिक समर्थन और वर्गांतरण की परिकल्पना दी .
                    समाजशास्त्रीय और आर्थिक विकास की दृष्टि से देखें तो मध्यवर्ग एक यात्रा-शील स्थिति है .पूंजीवादी व्यवस्था में वैयक्तिक आर्थिक मुक्ति निम्न-वर्ग से निकलकर उच्च -वर्ग में शामिल हो जाने से ही सम्भव है .पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक निम्न वर्ग में जन्मे व्यक्ति के लिए निम्न वर्ग से बाहर निकल कर उच्च वर्ग में शामिल हो जाना ही चरम पुरुषार्थ है .उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा के साथ मध्य वर्ग का हर व्यक्ति वयक्तिक आर्थिक मुक्ति के एक सपने को जी रहा होता है .यह सपना पूंजीवादी व्यवस्था की सुरक्षा सम्बन्धी संरचनात्मक आश्वासनहीनता से पैदा होता है .पूंजीवादी व्यवस्था हर व्यक्ति को आर्थिक असुरक्षा की परिस्थितियों में डाल देती है .इस मनोविज्ञान के कारण एक अन्तहीनहोड़ का जन्म होता है .अस्तित्व की एक निर्मम प्रतिस्पर्धा पूंजीवाद को अमानवीय बनाती है .इसके विकल्प  में साम्यवाद
पूंजी के सामूहिक और साझे निर्माण और उपभोग की परिकल्पना देता है .देखा जय तो सामूहिक सृजनशीलता के आवाहन के कारण साम्यवाद को सामूहिक पूंजीवाद और पूंजीवाद को वैयक्तिक पूंजीवाद कहा जाना चाहिए .इस प्रकार साम्यवाद पूंजीवादी व्यवस्था का स्वर्ग है तो वैयक्तिक पूंजीवाद नरक .फिर प्रश्न उठता है कि भारतीय मध्यवर्ग अपने अधिकांश में साम्यवादी हिंसक क्रान्ति को अराजकता पूर्ण भयावह दुष्कल्पना के रूप में क्यों देखता है ? इसका कारण यही है  कि मार्क्स द्वारा प्रतिपादित साम्यवादी क्रान्ति की परिकल्पना में यहूदी धर्म की सांस्कृतिक असहिष्णुता और उनकी धार्मिक कथाओं में मिलने वाली बर्बर शुद्धता और उच्छेदवादी नरसंहारों का सांस्कृतिक अचेतन छिपा हुआ है .ऐसे में क्रांतिकारी बनना नायकत्व की मध्ययुगीन मानसिकता और परिकल्पना की भी विरासत है .अन्यथा जब सामूहिक पूंजीवादी सृजनशीलता तक ही जन-मानस को ले जाने की बात है तो ऐसे साम्यवाद को अहिंसक साम्यवाद के रूप में भी सामूहिक आर्थिक ,सामाजिक,राजनीतिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा के रूप में प्रचारित किया जा सकता है .इसके लिए सामूहिक पूंजी की सृजनशीलता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था-संरचनाएं और मानसिकता विकसित करनी होंगी .अपने हिंसक सांस्कृतिक अचेतन के कारण अठारहवी शताब्दी का परंपरागत मार्क्सवाद एक प्रतिक्रियाजीवी तनावपूर्ण असभ्य मानवीय समाज की रचना ही करेगा .  इस लिए मार्क्स के प्रति उचित श्रद्धांजलि तो यही होगी की साम्यवाद के भावी प्रारूप की खोज नए सिरे से सामूहिक पूंजीवाद की परिकल्पना के रूप में आधिक सभ्य ,शिष्ट ,स्वाभाविक और अहिंसक तरीके से किया जाय .संस्थागत या राजनीतिक क्रान्ति का एक पूंजीवादी तरीका यह भी हो सकता है कि सरकार हत्या करने की जगह मुद्रा या मुवावजा देकर सारी जमीने स्वयं खरीद ले .इसके बाद वह जन-जीवन के पुनर्नियोजन के लिए स्वतन्त्र हो जाएगी .मानव जाति के सुरक्षित अस्तित्व के लिए यह कार्य जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है .ऐसा न होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हो रहा है कि भवन व्यक्ति की आवश्यकता और संख्या के अनुसार,जरुरत के हिसाब से नहीं बनाए जा रहे हैं ,बल्कि पूंजी-प्रदर्शन और प्रतिष्ठा के अनुसार बनाए जा रहे है .इस कारण से बढ़ती जनसँख्या के विपरीत कृषि-योग्य भूमि निरन्तर ही कम होती जा रही है .अनियन्त्रित-अनियोजित स्थापत्य में शहरों का विकास आधुनिक युग की सबसे गम्भीर समस्या है ,जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है .
         अपनी इस दृष्टि के कारण समकालीन प्रगतिशील विचारक मुझे शैक्षणिक या ज्ञानात्मक अतीतीकरण के शिकार लगते हैं .यह एक परिकल्पनात्मक पिछड़ापन है ,जिसकी ओर स्वयं को प्रगतिशील होने का श्रेष्ठताबोध जीने वाले बुद्धिजीवियों का ध्यान ही नहीं जाता .उन्हें क्रन्तिकारी नायकत्व के मध्य-युगीन माडलों और उसकी महत्वकांक्षी स्वप्न्दर्शिता से बाहर निकालने में अभी वक्त लगेगा.


           विचारधाराओं को लेकर  अन्य महत्वपूर्ण समस्या यह है कि विचारधाराओं के प्रति स्मृति-संरक्षणवादी नजरिए के कारण अकादमिक एवं शैक्षणिक चिंतन प्रायः शुद्धतावादी ही होता है .प्रत्ययों से अति-परिचय के कारण कई बार शब्दावली या अभिव्यक्ति के स्तरपर वह मानवीय अप्रासंगिकता एवं निरर्थकता को पहचान नहीं पाता.उनका पुनरावर्ती प्रयोग करता रहता है .अवधारणात्मक संकल्पनाओं को कि बार सच न होते हुए भी सच के रूप में प्रस्तुत करता रहता है .इसे हम पिछली समझ के आधार-पृष्ठभूमि या पर्यावरण के रूप में भी देख सकते हैं .
     नए विचारों से अधिक महत्वपूर्ण सार्थक और निरापद विचारों का चयन एवं सृजनात्मक संयोजन कर एक परिस्कृत और अधिक गतिशील संभावनाओं वाली व्यवस्था कि खोज करना है .विचारधाराओं कि पूर्वाग्रह रहित पड़ताल जरुरी है .अलग-अलग सफल वैचारिक प्रारूपों एवं अनुभवों को व्यवस्था की आधारभूत संरचनाओं के निर्माण और विकास में इश्तेमाल करना होगा .दरअसल मानव समाज की जरूरतों के अनुसार वैचारिकी विकसित करने कि जरुरत है ,न कि वैचारिकी की पड़ताल एवं जरुरत के अनुसार मानव-समाज को अनुचित-अस्वाभाविक-अवैज्ञानिक रूप में दुष्प्रभावित करने की.उदहारण के लिए सब जानते हैं कि द्वंद्ववाद को मार्क्स नें हिगेल से लिया था और उसे साम्यवाद कि परिकल्पना के अनुसार पुनार्काल्पित किया .इस संसर्ग से सभ्यता कि वर्तमान सृजनशीलता
         एक व्यापक मानव-जाति के आर्थिक व्यव्हार को समझने और समझाने की दृष्टि से मार्क्स का विश्लेषण आधुनिक वैचारिकी को आधारिक सूत्र और दृष्टिया उपलब्ध करता है .क्योंकि संवेदनात्मक द्रष्टि से मार्क्सवाद के उद्देश्य की नैतिक पवित्रता असंदिग्ध है ;इस लिए उसके दार्शनिक पक्षों को भी निर्विवाद और अपरिवर्तनीय मन लिया जाता है .उसमे कुछ भी निरर्थक और अनावश्यक खोजना वर्ग-शत्रु का हमला भी हो सकता है .क्योंकि भारत में वह पश्चिम की पवित्र धरोहर है ,इसलिए भारतियों को यह अधिक स्वीकार्य होगा कि स्वयं पश्चिम ही उसमे परिवर्तन संशोधन करे .वैसे भी भारतीय मेधा संरक्षण वादी है .वह नई पहल में कम ही विश्वास करती है . मार्क्सवाद की दार्शनिकी में भी बहुत से परम्परा से अर्जित तत्व हैं -उनमें से एक हीगल से लिया गया द्वंद्ववाद भी है .यह विकास की सामाजिक प्रक्रियाओं का विचलित प्रत्ययीकरण करता है .रुढ़िवादी और विकासवादी शक्तियों के द्वंद्व को मानवीय और समाजशास्त्रीय रूप में भी समझने और समझाने की जरुरत है .वर्ग -स्वार्थ के मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण मार्क्स का मानव-जाति के इतिहास में आर्थिक प्रवृत्तियों और व्यव्हार का सूत्रीकरण प्रायः ठीक और प्रामाणिक है .लेकिन मेरा मानना है कि मनुष्य की ज्ञानात्मक प्रगतिशीलता से अधिक उसकी विकास विरोधी जड़ताओं और आदिमताओं को भी समझाने की जरुरत है .ऐसे में तो और भी जब जीनेटिक आधार वाली जड़ताएँ होने की वैज्ञानिक संभावनाएं बढ़ गई हैं .इसके बावजूद मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण सन्देश मानवीय व्यवस्था को यथास्थितिवादी स्वीकार की सामूहिक मानसिकता से बाहर निकालकर उसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की सृजनशीलता के दायरे में लाना है .प्राचीन धार्मिकों की तरह हमें ईश्वर और स्वर्ग का सृजन करने के स्थान पर वर्तमान मानवीय व्यवस्था को और मानवीय और निर्दोष बनाने पर विचार करना चाहिए .और इसके लिए मार्क्सवाद से भी अधिक महत्वपूर्ण है मार्क्स के बाद के मानवीय विकास की जटिलताओं को समझना .वर्तमान विश्व राजनीतिक नेतृत्व से आर्थिक नेतृत्व की ओर स्थानांतरित हो गया है .राजनीतिक संस्थाओं की तुलना में आर्थिक संस्थाएं मानव -सभ्यता की संरचनाओं को अधिक तीव्रता से प्रभावित कर रही हैं .विश्व प्रायः आर्थिक सक्रियताओं द्वारा अधिक रूपान्तरित हो रहा है .दूसरे शब्दों में विश्व राष्ट्रों से अधिक कंपनियों के उत्पादों से अधिक रूपान्तरित हो रहा है .क्योंकि यांत्रिक उत्पाद श्रम की प्रकृति को ही बदल दे रहे है 'इसलिए वर्ग-संरचना और उसकी मात्रात्मक उपस्थिति का स्वरूप भी बदला है .आज स्थानीय आर्थिक शोषण से अधिक प्रभावी अन्तर-राष्ट्रीय शोषण हो गया है .विषमता व्यक्ति और वर्ग स्तरीय ही नहीं बल्कि राष्ट्र स्तरीय और कंपनी स्तरीय भी है .बहुराष्ट्रीय होने के साथ-साथ कंपनियों का संगठनात्मक और जनसंख्यात्मक ढांचा विस्तृत हुआ और बढ़ा है .इस विषमता को भी मार्क्सवादी चिंतन के दायरे में लाना होगा .क्योंकि मार्क्सवाद साम्यवाद का पर्याय बन चूका है.

शनिवार, 18 जनवरी 2014

सभ्यता और शैतान

मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि
मैं  शैतान  होने पर पूरा विश्वास करता हूँ
मैं मानता हूँ कि ईश्वर भले ही मानवजाति   की
एक आदर्शवादी कल्पना हो
लेकिन शैतान तो वास्तव में है !

मैं चाहता हूँ कि जब सामने आकर कोई  बस रुके
निर्भया यह बिलकुल न सोचे कि
उसे   लेकर मेरे लिए लाया लाया है कोई देवदूत
वह यह भी सोचे कि
उसे मृत्यु और दुष्कर्म के देवता
शैतान नें भेजा होगा। ।
कि जनता अपने नेताओं  में छिपे
शैतानी मन्सूबों को  भी पढ़ना सीखे
द्वार खोलने से पहले सोच ले उसकी आहट

शैतान जो चिरंतन शत्रु है मानवजाति का
उसकी चूकों और चुनौतियों के पीछे है
उसके हिंसक काले बर्बर अतीत में है
उसकी सभ्यता और संस्कृति का
सर्वकालिक अचेतन है।

इसतरह मुझे शैतान के होने पर
उतना ही विश्वास है
जितना कि इस बात पर कि
ईश्वर का होना
मानव जाति  की आदर्शवादी कल्पना है
बात सिर्फ इतनी ही है कि मनुष्य चाहता है कि
वास्तव में   ईश्वर हो !

मैं नास्तिक नहीं हूँ
क्योंकि वैसे भी यह समय
पूंजीवादी व्यवस्था में  अराजक असुरक्षा का है
जहा सभी को उसकी अपनी समझ और सामर्थ्य पर
लड़ने ,जीतने और जीने के लिए छोड़ दिया गया है
इसतरह यह समय कहीं से भी मानवतावादी नहीं
सिर्फ सिरफिरे शैतान का है

जब तक चूक  और चुनौतियां है
म्रत्यु और जीवन की निरीहाताएं  हैं
शैतान बना रहेगा सिद्धान्त रूप में
जबतक मनुष्य का अप्रत्याशित आदमखोर व्यवहार है
उसके भीतर अपराधी प्रवृत्तयों के करक अनसुलझे जीन  हैं
शैतान की सैद्धांतिक सत्ता बनी रहेगी। …


बुधवार, 15 जनवरी 2014

द्वंद्व-युद्ध

जहाँ तक सम्भव हुआ है
मैंने उस बुराइयों की आत्मा का भी सम्मान किया है
इस  विश्वास के साथ कि
एक दिन वह अपनी ही घृणा और अहंकार के बोझ से थक जाएगा
समझ जाएगा एक दिन
युद्ध और जीतने की इच्छा की निरर्थकता
जिसमें  मेरी कभी भी दिलचस्पी नही रही है। .......

मैं तो बिना लड़े ही
उसे विजयी घोषित कर देने की योजना पर अमल करता रहा हूँ
इसलिए कि लड़ना कभी भी
मेरे जीवन की प्राथमिकता में नहीं था
वह सिर्फ इतनी सी बात से मुझसे चिढ़ता रहा है कि
उसकी इच्छा और योजना के अनुरूप
उसकी चुनौतियों और पुकार को अनसुना करते हुए
मैं उससे लड़ने उसकी ही शर्तों पर बहर क्यों नहीं  आया। ....

यह उसकी नाराजगी हो सकती है कि
मैं उसके खेल में शामिल क्यों नहीं हुआ !
कि मेरे हटाने के बाद उसे जीतने के लिए कुछ विशेष नहीं था
वह सिर्फ इतना नहीं जानता कि
सभी को अपने से बाहर देखने की आदत में निहित है
उसके शैतान होने का रहस्य
उसे नहीं मालूम है तो सिर्फ आत्मीयता की परिभाषा !

वह परायेपन की मुद्रा के साथ जीतना चाहता है
सारी दुनिया के साथ मुझे भी
जबकि मैं आत्मीयता से
उसे पता ही नहीं है शयद बाजारू होना
सारी चालाकियों के बावजूद सिर्फ धूर्त और आवारा होना है
और होना है घर से बेघर। ……

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

स्व-रुप

यह दुनिया जो एक मकड़ी के जाले की तरह है
और मैं भी हूँ उस जाले का एक तार
दूसरों से जुड़ा हुआ
जोड़ता हुआ दूसरों से
दूसरों से बंधा हुआ
बांधता  हुआ दूसरों को
मेरा हिलना हिलाता है दूसरों को
मेरा टूटना तोड़ देता है -
संवेदना के कोमल तार
इसी जले पर दौड़ती है समय की मकड़ी

मैं एक अदृश्य बुनावट का हिस्सा हूँ समाज की
मेरा होना सिर्फ अकेले का
अपनें असम्बद्ध एकांत में होना नहीं है
शायद इसीलिए जब मैं दूसरों को तोड़ता हूँ
स्वयं टूट जाता हूँ
जब मैं छोड़ता हूँ दूसरों को
स्वयं  छूट जाता हूँ
मेरी यात्रा एक सामूहिक यात्रा है सम्पूर्ण मानव -जाति की

शायद इसीलिए
मेरे सौभाग्य का  ईश्वर
मेरे मित्रों और मेरे चाहने वालों की
शुभकामनाओं से बना हुआ है
दूसरों को मुझसे मिलाने वाली ख़ुशी में रचा-बसा है
मेरी आत्मा का सच्चिदानन्द !

और मेरे दुर्भाग्य का शैतान भी
मुझे नापसन्द करने वालों की घृणा में छिपा हुआ है
उनकी अरुचि से बना हुआ है
मेरे निर्णयों के प्रति असहमतियों से बना है
मेरे अस्तित्व और सार्थकता का प्रतिपक्ष  …

मेरा अच्छा या बुरा होना
सिर्फ मेरे भीतर का ही
मेरे भीतर तक ही होना नहीं है।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

सच में ...

सच -मच ही वह एक  बड़ा आदमी नहीं था। लेकिन उसकी जिंदगी एक बड़े सपने के नाम समर्पित अवश्य थी। जीते-जी और अपनी मृत्यु के बाद भी वह स्वयं को एक बड़े सपने के स्मारक में बदल देना चाहता था।
        एक पुरानी सड़क ,जिसे सार्वजनिक निर्माण -विभाग नें पुराने समय की घुमावदार सदका को सीधी करते समय छोड़ दिया था -वहीं उसने मिटटी से थपथपाकर रची थी एक आदमकद कब्र।  नया हरा वस्त्र खरीद बाजार से और उसे  पुरे सम्मान -प्रदर्शन के साथ ढँक  दिया। सांध्यकालीन भ्रमण में मैंने उसे ऐसा करते देखा तो पूछा -"बाबा ! इसमें लाश तो किसी की  है नहीं फिर कब्र किसकी बना रहे हैं ?"
           उसने कहा -"सैय्यद  की।  सैय्यद  नें सपना दिया है कि उनके  लिए एक कब्र बनाकर उसमें बसा दो। "
मेरी तरह आस-पास के और लोगों नें भी देखा। किसी कि निजी जमीन पर कब्र नहीं बन रही थी। वह जो कह रहा था वह पूरी तरह उसी के अपने ईमान  पर ही टिका था  और उसकी सच्चाई के लिए भी वही जिम्मेदार था। दूसरे उसके सच के प्रति पूरी तरह उदासीन थे। आस-पास के ग्रामीणो नें अवश्य ही उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया और उसे पेशेवर माना।  शायद इसीलिए नए सैय्यद  के प्रति इलाके में आस्था का आभाव था।  कुछ इसलिए भी कि स्थानीय जनता के पास अपने सैय्यद  पहले से ही थे।  पुराने सैय्यद यद्यपि सड़क से दूर थे लेकिन स्थानीय जनता में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी।  राजमार्ग पर होने के कारण नए  सैय्यद  का प्रभाव-क्षेत्र
बाहर से आने वाले चालकों और सवारियों पर विशेष था। दुर्घटना और अश्रद्धा करने पर अनिष्ट के भय नें नए  सैय्यद को भी अपने ढंग से स्थापित करा दिया और उनकी मजार को अधिक भव्य करा दिया।
             वैसे भी डौडियाखेड़ा के खजाने कि तरह उसके दिमाग और दावे का ऐसा एक्स रे सम्भव नहीं था कि उसके सपनों की असलियत का पता लगाया जा सकता। मुख्य सड़क से हटकर उपेक्षित जगह पर बने होने के कारण सार्वजानिक निर्माण विभाग के कर्मचारियों और अधिकारीयों को उसकी अनधिकृत कब्र पर कोई आपत्ति नहीं थी।
                सड़क के किनारे दृष्टि सीमा में लोग सहसा एक जीती -जगती  कब्र देखकर डरने लगे। किसी भी पल हो सकने वाली दुर्घटना  से मृत्यु का नजदीकी रिश्ता तथा कब्र के स्वामी  की काल्पनिक अवमानना उनकी जेबों को ढीली  करने लगी थी। बहुत दिनों बाद लौटा तो देखा मैंने कि उस मजार की ऊंची दीवारें और भव्य छत जीवन को अब भी अपना हिस्सा देने के लिए डरा रहीं थीं। मजार का संस्थापक निर्माता सम्भवतः इस दुनिया में नहीं था। मजार का निर्माता बूढ़ा होकर स्वयं एक कब्र में बदल चूका था। जा लेटा था उसी स्वनिर्मित कब्र कि बगल में। अब उस मिटटी में सचमुच एक लाश थी। अब वह बिलकुल ही झूठा नहीं था। सड़क पर भीड़ बढ़ रही थी और उसी अनुपात में दुर्घटनाएं भी। अब लोग बहुत बड़ी संख्या में उसकी मजार पर सिजदा कर  रहे थे। उसका बड़ा होने का सपना पूरा हो चूका था। (सत्य घटना पर आधारित यह संस्मरण गुमनाम,उपेक्षित और अचर्चित कब्रों के नाम समर्पित हैं )
             

रविवार, 12 जनवरी 2014

एक गोपनीय विभागीय आख्या

कुछ -छोटी -छोटी अड़चनें हैं
एक मंदिर
एक मजार
जिनके कारण अक्सर ही
ट्रैफिक जाम हो जाया  करता है। … 

दो चेहरे वाला आदमी

मैं उस आदमी से परेशान हुँ
जिसे मैं अपना मित्र समझता था
और जिसने आज तक मेरे साथ कुछ भी बुरा नहीं किया है
न ही सोचा है
लेकिन मैंने दूसरों के साथ उसे पाया है बुरा सोचते

लेकिन जब मैं उसे
दूसरों के बारे में कुछ बुरा सोचते देखता हूँ
उससे घृणा  करने लगता हूँ
बनता है जब वह दूसरों का दुश्मन
मुझे वह अपना भी दुश्मन लगने लगता है

वह कई बार मुझसे पूछता है -
मैंने तो आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा  !
अपने इस मासूम अर्धसत्य के साथ
वह मुझे दुनिया का सबसे बुरा आदमी लगाने लगता है

इसे मैं ऐसे भी सोचना चाहता हूँ
कि किसी बुरे आदमी की बुराई का गवाह होना कितना बुरा है
जबकि वह दूसरों के लिए हमेशा नियम की बातें किया करता है
सिर्फ स्वयं को पूरी चालाकी के साथ
सारे नियम क़ानून से स्वयं को मुक्त और ऊपर समझता है

अपने आदर्शवादी चेहरे के बावजूद मेरी दृष्टि में
वह एक चतुर और सजग बेईमान है
ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आधा बेईमान हो और आधा ईमानदार
या किसी के लिए ईमानदार और किसी के लिए बेईमान

मेरी दृष्टि में बेईमानी सिर्फ किसी एक व्यव्हार में न होकर
पुरे स्वभाव और मानसिकता में होती है
कि दूसरों के बारे में बुरा सोचना भी एक हिंसा है
एक क्रूरता जो कि संवेदनशून्यता से जन्म लेती है

कि सिर्फ अपने ही बारे में सोचता हुआ
दूसरों के बारे में पूरी तरह उदासीन आदमी
एक बुरा आदमी हो सकता है
कि जो दूसरों के बारे में बुरा सोचे
उसे सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए एक अच्छा आदमी मानना
मुझे ही अपनी दृष्टि में एक बुरा आदमी बना देगा

जब वह दूसरों यानि समाज के लिए बुरा है
मेरे भी लिए एक बुरा आदमी है
सौहार्द के मानवीय पर्यावरण को दूषित करने वाला
व्यवहार की क्रूरता का प्रचारक
एक आत्मकेंद्रित और संवेदनशून्य बुरा आदमी !

मुझे अपनी मित्रता पर संदेह है
उस दो चेहरे वाले आदमी के साथ !

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

प्रेम-पारिभाषिकी

उजड़े हुए लोग कभी प्रेम नहीं कर पाते
उजड़े हुए लोग प्रायः अभिशप्त  होते  हैं दुनिया में कहीं भी न बस पाने के लिए
उजड़े हुए लोगों की कहीं भी कोई दुनिया नहीं होती
उजड़े हुए लोग कभी भी नहीं कर पाते किसी से प्रेम
उजड़े हुए लोग कभी भी उजड़ जेन की आशंकाओं को जीते रहते हैं ....

जबकि प्रेम करना सिर्फ आकांक्षा ही नहीं
एक आदत भी  है
हर पल के जीवन की आवृत्ति में
खोज है सुख और विश्वास के पर्यावरण की
बसने की बस्ती में

अनुभूति के एक पर्यावरण से
अनुभूति के दूसरे पर्यावरण में
जीवन के  स्थानांतरण के बाद
खोए हुए जीवन की तलाश है
जैसे कि माँ से पत्नी तक एक पुरुष की
या पिता से पति तक एक स्त्री की
प्रिय संबंधों का पुनरावर्तन है

प्रेम किसी अन्य अस्तित्व की
अपने  अस्तित्व में स्वीकृति है
आत्मीयता का उन्मुक्त आमंत्रण है
अपने होने का सहचर विस्तार है
केवल इसी अर्थ में प्रेमी होना एक स्वभाव भी है

कुछ लोग शिकारियों कि तरह
दूसरों के भीतर अपने हिस्से का प्रेम तलाशते हैं
और प्रेम के हत्यारे यानि बलात्कारी बन जाते है


  

रविवार, 22 दिसंबर 2013

बुद्धिधर्मी-संशयवान लभते ज्ञानं !

मेरे प्रिय विचारक पी.एन.सिंह ने एक जीवन-मूल्य के रूप में बुद्धिधर्मी की अवधारणा दी है .वे आस्तिक होने के स्थान पर बुद्धिधार्मी होनाऔर कहलाना  अधिक क्रन्तिकारी महत्त्व का और साहसपूर्ण  समझते हैं .आस्तिकों के लिए नास्तिक होना एक अपराध है .धर्मभीरु प्रायः नास्तिक होने से डरते हैं.इस डर का कारण जीवन की असुरक्षा ग्रंथि तो है  ही,वह अपूर्णता भी है जो एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हमें अकेले में अपनी पूर्णता का अहसास नहीं जीने देती .एक तरह से यह ठीक ही है कि अकेले में हम अपनी पूर्णता की घोषणा करने से डरते हैं .कई अन्य प्राणियों की तरह सामाजिक होना हमारा जीनेटिक गुण भी हो सकता है ..ऐसे में अकेले अपनी अपूर्णता का अहसास जीना स्वाभाविक ही है .
                आस्तिकता और नास्तिकता का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि बुरे और कटु अनुभव हमें प्रायः नास्तिक बनाते हैं और प्रेममय अनुभव हमें आस्तिक ..एक बहुत सुखी समाज में ही अतिरिक्त कृतज्ञताएँ संभव  हैं .जहाँ तक मेरा प्रश्न है बचपन से ही ईश्वर के होने के  पारंपरिक विश्वास और समाज तथा व्यवस्था के गलत होने के मेरे निजी असंतोष नें मुझको मुझको विषम स्थिति में डाल रखा था आस्तिक मनुष्य के साथ समस्या कुछ इस तरह होती है कि जब वह एक बार यह मान लेता है कि अदृश्य हवाओं के पार कोई ऐसी छिपी शक्ति है जो उसके साथ घट रही अच्छी -बुरी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है तो एक अजीब किस्म के मानसिक युद्ध में फंस जाता है .उसकी हालत उस बन्दर की तरह हो जाती है जो अपना ही प्रतिबिम्ब दर्पण में देखकर उसपर खीसें निपोरता है .-प्रतिद्वंदी  समझकर उसपर झुझलाता है .जबकि सच्चाई यह है कि किसी अमूर्त को स्वीकारना या बिलकुल नकारना दोनों ही एक मानसिक द्वंद्व में फंस जाना है .बुद्ध  नें इसीलिए जो रास्ता निकालाथा वह शून्यवाद का था .उनका ईश्वर के होने के प्रश्न पर चुप लगा जाना मेरी समझ में अपनी अबोधता को ईमानदारी से स्वीकार करना था .हममें से अधिकांश में बुद्धजैसी निर्मम और निस्संग ईमानदारी नहीं है .हमारी आस्था दरअसल परंपरा से अर्जित आस्था होती है .दूसरे ऐसा मानते हैं इस लिए हमने भी उसे मान लिया . ऐसा हो सकता है कि दुसरे जो मन रहे हों वह सच ही हो लेकिन वह हमारे अपुष्ट और अप्रत्यक्ष ज्ञान का हिस्सा है ,प्रत्यक्ष एवं पुष्ट ज्ञान का नहीं .ऐसे ज्ञान को जिसके सच होने को हम कभी चुनौती नहीं देते ,वह गलत भी तो हो सकता है .
                    इसतरह हम देखें तो एक सच्चा बुद्धि धर्मी होना पूर्वाग्रही ,अप्रत्यक्ष एवं अप्रमाणिक अवधारणाओं से मुक्त होना भी है .अपने मस्तिष्क की उस प्रारम्भिक अबोधता को प्राप्त कर लेना है ,जो हमें प्रकृति नें हमारे जन्म लेने के समय सौपी थी .इस दृष्टि से हम देखें तो एक ईमानदार नास्तिक होना भी सच्चा बुद्धिधर्मी होना हो सकता है .बुद्धिधार्मी होना आधुनिक वज्ञानिक युग को बचाए रखने के लिए भी जरुरी है .क्योंकि प्रकृति ने जितना मानव जाति को अपनी नैसर्गिक सृजनशीलता से देना था उतना तो वह दे ही चुकी है .अब वह विकास की प्रौढ़ता को प्राप्त कर बूढ़ी हो चली है .मानवजाति के लिए आगे के अस्तित्व का रास्ता एक कठिन रास्ता ही होगा .उसे अपने रास्ते अपनी सृजनशीलता और बुद्धि से ही तलाशने होंगे .संभव है आगे की मानवजाति को सूर्य के चुकाने का भी विकल्प ढूढ़ना पड़े और आकाश गंगाओं के टकराने पर अपने बाख निकालने का भी .
                      एक बुद्धिधर्मी होने के लिए दरअसल प्रश्नधर्मी होना जरुरी है ."श्रद्धावान लभते ज्ञानं " और संशयात्मा विनश्यति जैसे सूक्ति- वाक्य प्राचीन काल में मुर्ख और अबोध अनुयायी बनाने के लिए भले ही आवश्यक रहे हों लेकिन वैज्ञानिक युग की सच्चाई तो यही है कि "शंकावान लभते ज्ञानं .

रविवार, 8 दिसंबर 2013

जीना,जानना और जाना

तेजी से बदलते समय नें बहुत से पर्यावरण लुप्त कर दिए हैं .तेजी से बदता हुआ शहरीकरण सिर्फ किसान पेशे पर ही चोट नहीं कर रहा है बल्कि  किसान संवेदना और मूल्यों को भी तेजी से उजाड़ रहा है .प्रकृति से मानव-जीवन के रिश्ते आज लगभग काल्पनिक होने के कगार पर पहुँच गए हैं .उत्पादन के स्थायी संसाधनों नें कभी मानवीय रिश्तों को जो स्थायित्व दिया था ,वह प्रतिपल परिवर्तित आर्थिक समय में असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है ,सच तो यह है कि लोग धीरे-धीरे जीना भूला रहे हैं ..लोगों के पास एक-दुसरे को जीने के लिए समय नहीं है .
               आज हर किसी को कहीं न कहीं जाना है ,यह जाना इतना भयंकर है कि हममें से अधिकांश व्यक्ति अपने भविष्य-निर्माण एव,भावी की  यात्रा में है . हममे  से अधिकांश व्यक्ति विस्थापन के लिए अभिशप्त है .वह निरंतर उजाड़ रहा है .निरंतर उजड़ते हुए विस्थापन की  गतिकी उसके सरे रिश्तों को औपचारिक बना रही है .आज हर व्यक्ति तेजी से भाग रहा है और हर व्यक्ति को कहीं न कहीं जाना है .इस तरह उसका जाना ही उसका जीना बन गया हैं .वह एक गतिशील अनुभव में है और स्थायी रिश्तों के निर्वाह के लिए उसके पास मानसिक समय नहीं है .स्थायी रिश्ते उसकी गति में अवरोध उत्पन्न करते हैं .असुविधाएं उत्पन्न करते हैं .उसका यह जाना प्रकृति से कृत्रिमता की और जाना है .वह स्वाभाविक से अस्वाभाविक हो रहा है .नैसर्गिक से कृत्रिम हो रहा है .वह एक छाया सृष्टि में जी रहा है .वह एक आभासी बनावटी दुनिया का नागरिक है .वह एक मानसिक व्यवस्था की उपज शहर में रहता है .
          शहरी जीवन की कृत्रिमता और यांत्रिकता उसे अर्थतंत्र के एक अमानवीय लोक में ले जाती है .यह दुनिया बौद्धिक क्रूरताओं और वर्जनाओं कि दुनिया है .यह दुनिया उसे असहज और विक्षिप्त कराती है ..जिस दुनिया को वह सिर्फ जानता है और जिसे सिर्फ जानना है .क्योंकि जानना ही उसका लक्ष्य है और वह सिर्फ जानंने की और ही जाता है -सिर्फ जानना ही उसका जाना और उसका जीना बन गया है .

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

बकरी का रूपक

सब तो ठीक है
बकरियों का क्या होगा
जहाँ तक जाती है दृष्टि
बकरियां ही बकरियां हैं

बकरिया संतुष्ट हैं
बकरियां आश्वसत  हैं
बकारियों  को देख-देख
बकरियां खिलमस्त हैं
बकरियों की गिनती कर गड़ेरिये  भी मस्त है
गिन -गिन कर पस्त है
थोडा-थोडा त्रस्त है

बकरियों में सींग की उलझन है
ताने हैं तिरकट है
जीने का संकट है
अलग-अलग बाड़े हैं
गड़ेरियों के पालतू कुत्ते भी ठाडे हैं
मेमने से मौत तक वक्त के सिंघाड़े हैं
हाडे हैं जाड़े हैं
जीने का मकसद भी भोडे और भांडे है

वैसे तो लगता है
बकरी है बकरी के लिए
दुनिया के वृत्त में
बकरियों का हिस्सा है
बकरियों का किस्सा है
बकरियों की  रीति है
लेकिन जन्म भी बकरियों का
दावत गड़ेरिये की
बकरे कि प्रीति भी
गड़ेरिये की जीत है

दृष्टिपथ जहाँ तक है
सींगें ही सींगें हैं
डरी-डरी सींगें है
सींगों में डर है गड़ेरिये कि लाठी का
भयानक असर है ...

बकरी तो बकरी है
बार-बार रीझ रहीं
मिमियाती भीग रहीं
गड़ेरिये का लाठी धुन जैसे संगीत है
बकरी का जीवन ही
जन -मन का गीत है


शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

सामूहिकता की जड़ता और नियतिवाद

मनुष्य एक सामुदायिक प्राणी है .वह अपनें अधिकांश में इस बात के लिए सजग रहता है कि वह विचारधारा के स्तर  पर भी दूसरों से बहुत दूर न जाए .अनुरूपता और अनुकूलता कि यह कोशिश ही बड़े समुदायों की उस सामुदायिक तानाशाही को जन्म देती है जो छोटे और स्वायत्त समुदायों के लिए हिंसक और आपराधिक भी हो सकती है .ऐसी दैत्याकार समुहिकताए अकेली और असहमत बुद्धिजीवियों को निरीह बनती हैं .जनसामान्य दैत्याकार  समूहों से उपजी तानाशाही को अपनी असमर्थता  के कारण ईश्वर की इच्छा का परिणाम समझाने लगता है .अधिकांश राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक संस्थाए निर्णय एवं प्रभाव कि क्रूरताएँ रचती हैं .ऐसे बघ्याकारी प्रभावों का भी अध्ययन होना चाहिए .
         जो नहीं है उसका होना संभव करने के लिए सृजनशील प्रतिरोध मनुष्य करता रहता है .अभावों को संभव करने का सृजनात्मक तनाव  एक जरूरी एवं उपयोगी मानसिक तनाव है .इसे दुख के रूप  में नहीं देखा जाना चाहिए .इसकी सार्थकता इसे गोरव्शाली बनाती हैं..इसलिए अपना नजरिया बदलने कि जरुरत है क्योंकि हर परेशांन आदमी दुखी नहीं होता .हमें सृजनशील दुखी और कुंठित दुखी में अंतर करना आना चाहिए .सृजनशील दुखी प्रतिरोधी होता है जबकि कुंठित दुखी असफल .