गुरुवार, 21 मार्च 2013

कविता में किसान

अभिनव कदम - अंक २८

संपादक -जय प्रकाश धूमकेतु में प्रकाशित 

                                            
हिन्दी कविता में किसान-जीवन और यथार्थ की उपसिथति-अनुपसिथति के बढ़ते-घटते ग्राफ को समझने के लिए हमें साहित्य से पहले हिन्दी-क्षेत्र के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को समझना होगा । यह एक दुखद सच्चार्इ है कि औधोगिककरण,शहरीकरण,बाजारवाद और भूमण्डलीकरण की दिशा में हुए देश के विकास तथा सरकारी नीतियों नें एक पेशे के रूप में किसान जीवन को अप्रतिषिठत किया है । इस सच्चार्इ का एक दूसरा पहलू यह है कि ह रित क्रानित के बाद आर्इ खाधान्न की उपलब्धता  से उपजी सुरक्षा और निशिचंतता  नें उदासीन करते हुए मीडिया और साहित्य से किसान-चर्चा को बाहर कर दिया है । भारत में संयुक्त परिवार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण  परम्पराजीवी  आम आदमी अब भी अपने पारिवारिक सदस्यों का नैतिक रूप से आर्थिक और सामाजिक सहयोगी बना हुआ है । पशिचमी देशों से अलग बेरोजगारों कुणिठतों और पागलों तक का भरण-पोषण एवं चिकित्सा-व्यय भारत में सरकार नहीं बलिक परिवार संस्था ही कर रही है । परिवार का कमाऊ सदस्य प्राय: अपने हिस्से की जमीन इसी नैतिक दबाव के कारण ही परिवार के असफल एवं बेरोजगार सदस्यों के हवाले कर देते हैं  । सिर्फ इतने पर ही सन्तोष कर लेते हैं कि जमीन अब भी उनके नाम से सरकार के यहां दर्ज है । यह सांस्कृतिक पोषण ही किसान यथार्थ की विभीषिका को कम करके दिखाती है । यही राजनीतिज्ञों की संवेदनशून्यता के भयावह दुष्परिणामों को भी पूरी तरह फलित होने से देश को बचाए हुए है ।  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष व्यकित को मिलने वाला यह पारिवारिक संरक्षण असन्तोष और अवसाद को क्रानित की उस सीमा तक नहीं पहुंचने देता ,जिसकी प्रतीक्षा देश की वामपन्थी पार्टियां लम्बे समय से करती आ रही हैं ।

     किसान असन्तोष को कम करने वाला एक और निर्णायक प्रभाव रामकथा का भी है । औधोगिककरण और बाजारीकरण के भारी दबाव के बावजूद रामकथा अब भी एक प्रभावकारी सांस्कृतिक-सामाजिक प्रेरक शकित के रूप में पारिवारिक व्यवहार और आर्थिक सम्बन्धों का संविधान रच रह ी है । इसीलिए हिन्दी कविता में किसानों की सिथति का विश्लेषण तुलसी के राम से ही आरम्भ करना उचित होगा । तुलसी के राम किसानी तो नहीं करते लेकिन उस बीज संस्कृति का निर्माण अवश्य करते हैं ,जिसपर भारतीय किसान जीवन का पूरा अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र टिका हुआ है । रामकथा कृषिभूमि का पारिवारिक विभाजन रोकती है । परिचार में सामूहिक खेती की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तैयार करती है । कम भोगलिप्सा वाले सन्तोषी जीवन की प्रेरणा देती है । रामकथा के बल पर ही भारतीय किसान कम जीवन-स्तर पर भी बिना असन्तुष्ट हुए जीता रहता है । इस दृषिट से रामकथा भारतीय कृषि-सभ्यता के लिए अत्यन्त आवश्यक आधार-महाकाव्य है । उसी के प्रभाव से ग्रामीण किसान जन-जीवन को संरक्षण सरकार से नहीं बलिक संयुक्त परिवार के उन सामाजिक रि श्तों से मिलता रहा है ,जिसके कारण बाहर जाकर नौकरी या व्यवसाय से अधिक अर्जन करने वाला परिवार का सदस्य किसानी में लगे अपने स्वजन के हवाले अपने खेत कर ही देता है ,भले ही वह भरत को दिए गए खड़ाऊं की तरह धरोहर के रूप में ही क्यों न हो ।  रामकथा आज भी उन्हें परदेशी भार्इ के हिस्सों को हड़पने से भरत की तरह रोकती है । बाहर कमाने के लिए हुए भारी संख्या में निर्वासन या पलायन नें गांव में रहकर कृषि-कार्य में लगे हुए सदस्यों को कुछ राहत तो दिया है । अब बाहर मुम्बर्इ या गुजरात कमाने गया पूर्वी उत्तर-प्रदेश  या बिहार का कोर्इ व्यकित अपने घर से गेहूं तो नहीं ही मंगाएगा । इस भारतीय संकोच नें ही किसानों की आर्थिक और सामाजिक क्षतिपूर्ति की है ।

      अब प्रश्न यह उठता है कि वास्तविक किसान समस्या है किस रूप में तो हमें समझना होगा कि सौ कुन्तल गेहूं उपजाने वाला किसान भी,जिसे बड़ा काश्तकार कहा जाएगा ,वर्ष में एक फसल लेने की सिथति में एक लाख से  डेढ़ लाख रुपए तक की ही आय कर सकता है । यदि वर्षा ऋतु की दूसरी फसल धान आदि की आय भी जोड़ दे ंतो यह बाजार-भाव के हिसाब से दो से तीन लाख की आय ही होती है । इस आय को नौकरी से लिने वाले वेतन में बदलें तो लागत घटाने के बाद उसकी आय चपरासी या क्लर्क को मिलने वाले वेतन के बराबर ही होगी । उसकी मासिक आय पन्द्रह से लेकर तेर्इस हजार के आस-पास ही पहुंचेगी ।

     यह सिथति तब है जब उसके पास पन्द्रह-बीस एकड़ खेत की उपज हो ।  संभवत: यही कारण है कि परिवार में सिर्फ बेरोजगार और असफल सदस्य ही किसान जीवन अपनाते हैं । आज की तारीख में किसान बनना दूसरों की सहानुभूति का पात्र होना और कुणिठत होना है । ऐसी सिथति में कोर्इ कवि,भले ह ीवह गांव से ही भागकर दिल्ली आया हो,किसान-जीवन का कैसे भव्यीकरण करेगा ?

    भारतीय किसान इसलिए पल जाता है कि वह बाजार की मुद्रा के बल पर नहीं बलिक श्रम से अर्जित उपज से भोजन प्राप्त कर सकता है । विवाह आदि में दहेज जैसी कुरीतियों से निपटनें के लिए उसे या तो खेत बेचना होगा या फिर अनाज । वह अपना जीवन-स्तर घटाकर ही सुरक्षित जीवन-यापन कर सकता है । किसान-यथार्थ के प्रति इस समझ को लेकर जब हम हिन्दी कविता की पड़ताल करते हैं तो ऐतिहासिक दृषिट से यह साफ-साफ दिखार्इ देता है कि भारत के विकसित राष्æ बनने के साथ-साथ बढ़ती उपज और खाधान्न सुरक्षा नें कविता से किसानों को क्रमश: निर्वासित ही किया है । प्रगतिवाद के बाद प्रयोगवाद और फिर नर्इ कविता का आन्दोलन नएपन की खोज में शहरी मध्यवर्गीय जीवन और अनुभूति की सामूहिक अभिव्यकित के रूप में सामने आता है । इस दौर में अपवादस्वरूप ही किसान जीवन से सम्बनिधत कविताएं मिलती हैं । कविता विषय और शिल्प दोनों ही स्तरों पर मनोवैज्ञानिक और संशिलष्ट होती गयी है। धूमिल तक आते-आते तो वह बिम्बात्मक चिन्तन की भाषा में व्यक्त होने लगती है ।  यह निरीक्षण महत्वपूर्ण है कि केदारनाथ सिंह की बाघ कविता में बाघ किसान को  æैक्टर चलाते बहुत दूर से देखता है। यह एक यानित्रक दुनिया का किसान है और स्वाभाविक है कि कविता के बाघ के साथ-साथ कवियों को भी उस प्राकृतिक राग से दूर कर देता है ,जो कुछ ही समय पूर्व तक केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में पूरी उत्सवधर्मिता के साथ व्यक्त हुर्इ है । अब वह एक लुप्त होती प्रजाति और विनाश के रूपक में ही कविता में लौट सकता है और वह इसी त्रासद रूप में लौटा भी है ।  कहीं कालाहांंडी तो कहीं विदर्भ के रूप में ।

           हिन्दी कविता में किसान की उपसिथति को ऐतिहासिक सर्वेक्षण के रूप में देखें तो वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में मिलता है । कहीं पूरे जीवन और परिदृश्य के साथ तो कहीं कविता के बिम्ब और भाषा के शिल्प या माध्यम के रूप में । अप्रत्यक्ष उपसिथति वाली कविताएं किसान अनुभव और संवेदना को किसी अन्य दार्शनिक संदेश या भावबोध में रूपान्तरित करती हैं । ऐसी कविताएं सबसे अधिक संख्या में भवानीप्रसाद मिश्र के यहां मिलती हैं ।  हिन्दी कविता के इतिहास में जाने पर किसान-यथार्थ की सबसे पहली तलाश स्वाभाविक है कि भारतेन्दु जी के यहां से ही शुरू हो । भारतेन्दु जी किसान जीवन से उदासीन नहीं थे । वे किसानों की दीन दशा से परिचित भी थे ,जैसा कि निम्न पंकितयों से पता चलता है-

    ''मरी बुलाऊं देस उजाड़ूं मंहगा करके अन्न

     सबके ऊपर टिकस लगाऊं धन मुझको धन्न

     मुझे तुम सहज न जानो जी,मुझे राक्षस मानों जी ।

ल्ेकिन आम धारणा के विपरीत उत्सवधर्मी और मनमौजी प्रतिभा के धनी भारतेन्दु जी का ब्रजभाषा में रचा गया काव्य-साहित्य कृष्ण जू और राधा जू के लीला गान से ही भरा पड़ा है । कल्पना की जा सकती है कि ऐसा उन्होंनें अपने नए-नए पदों को शाम की गोष्ठी में साहितियक अभिरुचि वाले नगर श्रेषिठयों को सुनाने और उनसे वाह-वाह सुनने के लिए ही किया होगा । वे जिस व्यवसायी वर्ग से स्वयं भी आते थे ,वहां स्रोताओं की प्राथमिकता धार्मिक रचनाएं सुनने की ही रही होगी । यह भी संभव है कि कहीं अचेतन में सूर से प्रतिस्पद्र्धा भी रही हो-आखिर प्रतिभाशाली तो थे ही ।यह भी कि भारतेन्दं का युग सांस्कृतिक जीवनयापन का युग था । किसान जीवन उनके युग का इतना सर्वव्सापी स्थूल सच था कि उसे व्यापक रूप् से कविता का विषय बनाने के बारे में सोचना उनकी मनोवैज्ञानिक बनावट में ही नहीं था ।  दरअसल वे नागरिक जीवन-बोध के कवि थे । ऊपर की पंकितयों में भी संभवत: वाराणसी जैसे महानगर में रहने के कारण ही कृषि-उपज के बाजार-मुल्य तथा किसानों के प्रति सहानुभूतिशील कृतज्ञता की भावना से वे आगे नहीं जा सके हैं । इस सीमा के बावजूद किसानों की दीन-दशा का आभास देने वाली कविता की मार्मिक पंकितयां भारतेन्दु जी के साथ-साथ उस काल के अन्य कवियों में भी पूरी संवेदनशीलता के साथ मिलती है। बालमुकुन्द गुप्त नें किसान के कष्टों का विशद वर्णन किया है-''जिनके कारण सब सुख पावें,जिनका बोया सब जन खांय,हाय-हाय उनके बालक नित भूखों के मारे चिल्लांय.......अहा ! बिवारे दु:ख के मारे निसि-दिन पच-पच मरें किसान।जब अनाज उत्पन्न होय तब सब उठवा ले जांय लगान । किसानों की दीन दशा का चित्रण भारतेन्दु युग में बद्री नारायण चौधरी 'प्रेमधन जी नें भी किया है।  उनके 'जीर्ण जनपद शीर्षक प्रबन्ध-काव्य में किसानों के अभिशप्त जीवन की करुण झांकी मिलती है -''दीन कृषक जन औरहु दया योग दरसावहीं ।जिनके तन पर स्वच्छ वस्त्र कहुं लखियत नाहीं ।मिहनत करत अधिक पर अन्न बहुत कम पावत,जे निज भुजबल हल चलाय के जगत जियावत।

 द्विवेद्वी युग देखें तो इस युग के कवियों द्वारा किसान जीवन और यथार्थ को लेकर लिखी गर्इ कविताओं में सनेही द्वारा लिखित 'दुखिया किसान ( सरस्वती ,जनवरी 1912)तथा 'आत्र्त कृषक (सरस्वती,अप्रैल 1914),मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखित'कृषक कथा(सरस्वती,जनवरी 1915)और भारतीय कृषक (सरस्वतीमर्इ 1916) किसानों की दयनीय दशा का परिचय देने के लिए लिखे गए हैं । इस युग में कृषकों के प्रति शिक्षित जनता का ध्यान आकृष्ट करने के लिए दो प्रबन्ध काव्य भी लिखे गए ।कृषक क्रन्दन(1916 र्इ0)सनेही लिखित तथा गुप्त जी द्वारा लिखित 'किसान। दोनों ही प्रबन्ध-काव्यों के नायक किसान हैं । कृषक क्रन्दन के नायक का परिवार सूदखोर महाजन,अत्याचारी बाबा साहब और पुलिस के सिपाहियों के जुल्मों का शिकार बनता है । एक भरा-पुरा कृषक परिवार एक-एक करके नष्ट हो जाता है । भूख से तड़पकर दम तोड़ने वाला नायक मरते समय भगवान से यह प्रार्थना करता है किहे प्रभु ! अब इस क्रूर देश का मुंह न दिखाना....कुछ भी रचना और किन्तु मत कृषक बनाना। गुप्त जी के किसान-नायक की प्रार्थना भी कुछ इसी प्रकार की है ।

 गुप्त जी ने भारत-भारती में कृषकों की अवस्था का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि 'सौ पर पचासी जन यहां निर्वाह कृषि पर कर रहे ।पाकर करोड़ों अद्र्ध भोजन सर्द आहें भर रहे ।हा देव !क्या जीते हुए आजन्म मरना था इन्हें?भिक्षुक बनाते ,पर विधे !कर्षक न करना था इन्हें ।

 गुप्तजी के प्रसिद्ध महाकाव्य साकेत में  भी  किसान जीवन रामकथा के बहाने ही स ही मानव-सभ्यता के महत्वपूर्ण आयाम के  रूप में उपसिथति हुआ है । साकेत के अष्टम सर्ग में बनवासी राम और सीता का आजीविका के लिए कृषि-कार्य में रत होना किसान जीवन को भी एक गरिमा प्रदान करता है । अपने लगाए हुए पौधों को सींचते हुए सीता पूछती हैं किअच्छा ,ये पौधे कहो फलेंगे कब लौं ध राम उन्हें सही ढंग से कृषि की विधि बतलाते हैं-'' पौधे सींचो ही नहीं,उन्हें गोड़ो भी,डालों को चाहो जिधर,उधर मोड़ो भीसाकेत के नवम सर्ग में गुप्त जी का ध्यान किसान कर्म और जीवन से हटकर किसान मन की ओर भी गया है । पता नहीं साकेत की निम्नलिखित पंकितयों पर कभी किसी माक्र्सवादी आलोचक की दृषिट पड़ी कि नहीं  । किसान जीवन जो धरती से जुड़ा है और मानव-जाति के असितत्व और उसके आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का भी आधार है । साकेत के निम्न गीत को उसका रूपक भी मान सकते हैं -'' मेरी ही पृथिवी का पानीले-लेकर यह अन्तरिक्ष सखि,आज बना है दानी !मेरी ही धरती का धूम,बना आज आली,घन धूम।गरज रहा गज-सा झुक-झूम,ढाल रहा मद मानी।मेरी ही पृथिवी का पानी । सारी अर्थव्यवस्था किसान-जीवन की रीढ़ पर टिकी हुर्इ है । अहंकार में डूबी हुर्इ । उसे ही छोटा और दीन-हीन करती हुर्इ । बादलों को देखकर कवि का किसान-मन पुकार उठता है-व्यग्र उदग्र जगज्जननी के,अयि अग्रस्तन बरसो।....चिन्मय बनें हमारे मृण्मय पुलकांकुर वन,बरसो । साकेत की सीता समाचार के नाम पर अपने देवर लक्ष्मण से फसल के बारे में पूछ-ताछ करती हैं-पूछी थी सुकाल-दशा मैंने आज देवर से-कैसी हुर्इ उपज कपास,,र्इख,धान की?.....पूछा यही मैंने एक ग्राम से तो कृषकों नें,अन्न,गुड़,गोरस की वृद्धि ही बखान की,। 

      छायावादी कवियों में निराला जी की कर्इ कविताओं में किसान जीवन रूपायित हुआ है । उनकी प्रसिद्ध कविता 'बादल राग की निम्नलिखित पंकितया ंतो किसानों को समर्पित हैं ही -'जीर्ण बाहु है शीर्ण शरीरतुझे बुलाता कृषक अधीरऐ विप्लव के वीर !चूस लिया है उसका सारहाड़ मात्र ही है आधारऐ जीवन के पारावार ! इसी तरह उनकी दीन कविता के केन्द्र में भी केन्द ्रीय प्रतीति किसान जीवन की ही है -'सह जाते होउत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्नदय तुम्हारा दुर्बल होता भग्न,...कह जाते हो-यहां कभी मत आना,उत्पीड़न का राज्य दु:ख ही दु:खयहां है सदा उठाना।

उनकी विनय और उत्साह शीर्षक कविताएं किसान मन से बादलों को संबोधित हैं । वे किसान की नर्इ बहू की आंखें उसके निष्प्रभ यौवन का करुण शोक गीत ही हैं । उनकी पाचक शीर्षक कविता किसानों की दुर्दशा को समझने ंके लिए कुछ सूत्र देती है -''आदमी हमारा तभी हारा है,दूसरे के हाथ जब उतारा हैराह का लगान गैर नें दिया,यानि रास्ता हमारा बन्द कियामाल हाट में है और भाव नहीं,जैसे लड़ने को खड़ेदांव नहीं । निराला जी की अन्य कविताओं में 'लू के झोकों...'काले-काले बादल छाए.... तथा''जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ... शीर्षक कविता तो भारतीय किसान समस्या के जातीय पक्ष और स्वरूप की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है -'' आज अमीरों की हवेलीकिसानों की होगी पाठशाला,धोबी,पासी,चमार,तेलीखोलेंगे अंधेरे का ताला,एक पाठ पढ़ेंगे,टाट बिछाओ।

  हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का स्वागत करने वाले सुमित्रानन्दन पंत की युगान्त,युगवाणी और ग्राम्या संकलन की कर्इ कविताओं में किसान जीवन उपसिथत है । जैसा कि स्वयं पंत जी  ने ही माना था कि ग्राम्या की कविताएं ग्राम्य जीवन के प्रति बौद्धिक सहानुभूति की ही कविताएं हैं-''यहां धरा का मुख कुरूप हैकुतिसत गर्हित जन का जीवन...जहां दैन्य जर्जर असंख्य जनपशु जघन्य क्षण करते यापन(ग्रामकवि शीर्षक कविता)। पन्त की ग्राम्या एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी के पर्यटन-दृषिट से ही सही ग्राम्य जन-जीवन के बहुआयामी यथार्थ की पड़ताल तो करती ही है । पन्त का किसान वर्णन उनके भोगे हुए यथार्थ पर आधारित न होने की वजह से अथवा एक किसान जैसे आत्मीय रिश्ते की कमी से केदारनाथ अग्रवाल की किसान मन और संवेदना से लिखी गर्इ कविताओं जैसी प्रभावी और विश्वसनीय नहीं हो पातीं।

फिर भी इतना तो स्वीकार करना होगा कि महाकवि पन्त नें किसान जीवन और उसके यथार्थ को अत्यन्त सम्मान एवं सहानुभूति की भावना से देखा है ।

 छायावादोत्तर कवियों में किसान जीवन पर लिखी गयी एक मार्मिक रिपोर्ताज कविता भगवती चरण वर्मा की भैंसा गाड़ी है -उस ओर क्षितिज के कुछ आगे,कुछ पांच कोस की दूरी पर,भू की छाती पर फोड़ों-से,हैं उठे हुए कुछ कच्चे घर ।मैं कहता हूं खडहर उसको पर वे कहते हैं उसे ग्राम।जिसमें भर देती निज धुंघलापन,असफलता की सुबह शाम।पशुबन कर नर पिस रहे जहां,नारियां जन रही हैं गुलाम।पैदा होना फिर मर जाना,यह है लोगों का एक काम ।......'चरमर चरमर-चूं-चरर-मररजा रही चली भैंसागाड़ी ! इस कविता में भैंसा गाड़ी का बिम्ब असुविधाओं और कठिनाइयों से भरे किसान-जीवन-समय के धीरे-धीरे चलनें की जो व्यंजना भेसे के रूप् में काले समय के साक्षात्कार के साथ करता है वह प्रशंसनीय है ।

 छायावादोत्तर कवियों में यदि किसी नें सजग ,सुनियोजित और पूरी वैचारिक तैयारी के साथ ं किसान जीवन और यथार्थ पर केनिद्रत कविताएं लिखी हैं तो वे प्रसिद्ध आलोचक एवं कवि डा0रामविलास शर्मा ही हैं । स्वयं रामविलास शर्मा नें तारसप्तक के दूसरे संस्करण में पुनश्च के अन्तर्गत न सिर्फ किसान यथार्थ के प्रति अपने निजी आकर्षण को व्यक्त किया है बलिक  उन कवियों की प्रशंसात्मक चर्चा भी की है जिनकी कविताओं में उपसिथत किसान जीवन से वे प्रभावित थे । उन्होंने लिखा है कि '' मेरा बचपन अवध  के गावों में बीता । उन संस्कारों के बल पर मैंने वहां के प्राकृतिक सौन्दर्य और सामाजिक जीवन पर कुछ कविताएं लिखीं । 'निराला जी के रेखाचित्रों ,स्वर्गीय बलभद्र दीक्षित'पढ़ीस की अवधी कविताओं और (खड़ी बोली में लिखी हुर्इ)कहानियों,' सुमन, ,गिरिजाकुमार  माथुर और केदारनाथ अग्रवाल की अनेक कविताओं ,पन्त की ग्राम्या ,वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों ,इधर के आंचलिक कथा-साहित्य में यह ग्राम-जीवन-सम्बन्धी प्रवृतित पल्लवित और पुषिपत होती रही है । उस परम्परा की एक कड़ी मेरी अवध-सम्बन्धी कविताएं भी हैं ।  यधपि हिन्दी कविता में सुविचारित रूप से किसान जीवन और यथार्थ का चित्रण रामविलास शर्मा के अतिरिक्त प्रमुख प्रगतिवादी कवियों केदारनाथ अग्रवाल,नागाजर्ुन और त्रिलोचन में भी मिलता है लेकिन अपने एकमात्र काव्य-संग्रह रूपतरंग और तारसप्तक में प्रकाशित कम कविताओं में ही अधिकांश को किसान जीवन से सम्बनिधत करके तथा अपने मित्र-कवि केदारनाथ अग्रवाल को इसी प्रवृतित के लिए लगातार प्रशंसित और प्रेरित करके हिन्दी कविता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है ।

 रामविलास शर्मा नें अपनी कविताओं मे किसान जीवन को एक वैचारिक के साथ क्रानितकारी परिप्रेक्ष्य देने का प्रयास किया है -धरती के पुत्र की ,जोती है गहरी दो-चार बार,दस बार,बोना महातिक्त वहां बीज असन्तोष का,काटनी है नये साल फगुन में फसल जो क्रानित की ।(कार्य क्षेत्र कविता) रामविलास शर्मा की तारसप्तक की प्रकाशित कविताओं में ही चांदन ी,कतकी ,शारदीया ,सिलहार  आदि किसान यथार्थ को लेकर लिखी गर्इ वैचारिक सौन्दर्य की विशिष्ट कविताएं हैं । ये कविताएं अपने ढंग से एक बड़े अभाव की पूर्ति करती हैं । आम धारणा से अलग इन कविताओं को ध्यान से देखा जाय तो संवेदना और सांकेतिकता से भरपूर ये अंगेजी कविता का संस्कार लिए उच्चस्तरीय बिम्बधर्मी कविताएं हैं -खेतों पर ओस-भरा कुहरा,कुहरे पर भीगी चांदनीआंखों में बादल से आंसू,हंसती है उन पर चांदनी।('चांदनी कविता) माक्र्सवादी विचारधारा के कवि नें चांदनी को अपनी कुछ टिप्पणियों और कुछ बिम्बों के माध्यम से पूंजीवादी कविता के झूठे चकाचौंध और परजीवी शोषक वैभव का प्रतीक बना दिया है -'यह चांद चुरा कर लाया है सूरज से अपनी चांदनी । चांदनी का बिम्ब कतकी कविता में भी है लेकिन इस कविता में उसका वास्तविक या प्रकृत रूप में स्वस्थ चित्रण मिलता है ।  शारदीया कविता में पकी हुर्इ फसल का प्रत्यक्षीकरण सोने के रूप में किया गया है ।  दिवा स्वप्न  कविता किसान प्रकृति और किसान जीवन के सान्दर्य को स्वप्नलोक के समानान्तर चित्रित करती है । कहना न होगा कि रामविलास शर्मा की किसान जीवन की पृष्ठभूमि पर लिखी गर्इ ये कविताएं विचार-सौन्दर्य की दृषिट से हिन्दी की उत्कृष्ट कविताएं हैं । प्रथम द्रष्टया अभिधा में लिखी गयी प्रतीत होने वाली ये कविताएं द्विवेद्वी युग या छायावादी युग की कविताओं जैसी नहीं हैं  ,उनकी तुलना निराला या पन्त की कविताओं से भी नहीं की जा सकती । इन कविताओं का काव्यबोध आधुनिक मनाविज्ञान,माक्र्सवाद तथा अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन से विकसित दृषिट का  परिणाम हैं ।

 एक प्रतिबद्ध माक्र्सवादी कवि होने के कारण केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में उपसिथत किसान जीवन का सामाजिक यथार्थ दृषिट के स्तर पर माक्र्सवादी विचारधारा से आच्छादित है । जनकवि केदारनाथ अग्रवाल का मन मूलत: किसान जीवन की समस्याओं एवं किसान-प्रकृति के चित्रण में रमा है । अपनी प्रसिद्ध कविताओं में तो केदारनाथ अग्रवाल नें प्रकृति का साक्षात्कार ही किसान के रूप में किया है-'एक बीते के बराबरयह हरा ठिगना चनाबांधे मुरैठा शीश पर-छोटे गुलाबी फूल का,सज कर खड़ा है।केदार की कर्इ कविताओं में व्याप्त काव्य-सौन्दर्य सिर्फ मानवीकरण अलंकार से व्यक्त नहीं हो पाता,उसे किसानीकरण अलंकार का स्वतंत्र नाम दे देना चाहिए ।  केदार जी नें किसान श्रम और कर्म को जीवन्त रूप में प्रतिबि मिबत करने वाले कर्इ गीत लिखे हैं जैसे 'कटुर्इ का गीत-'काटो काटो काटो करबी मारो मारो हंसिया.....पाटो पाटो पाटो धरतीकाटो काटो काटो करबी।

  केदार जी नें किसान संवेदना से प्रकृति का जो साक्षात्कार किया हैवह कर्इ विशिष्टताओं के कारण पन्त के बाद हिन्दी कविता का दूसरा महत्वपूर्ण प्रकृति-काव्य है । यह प्रकृति किसान के श्रम से परिवर्तित-परिवद्र्धित है । यह हम केदार की आंखों से ही देख पाते हैं कि जो प्रकृति हम देख रहे है उसका वसन्त भी किसान द्वारा बोर्इ गयी सरसों के पीले फूलों के माध्यम से व्यक्त होता है । वह किसान के पसीनें से सिंचित है ।  क्ेदार के ग्रामीण जीवन के यथार्थ-बोध मेें कर्इ स्तर,आयाम और दृषिटयां है। प्रगतिशील साहित्य की अवधारणा के अनुरूप शोषित किसान के शोषण में सहायक रीति-रिवाजों और परम्पराओं की भत्र्सना है तो किसान जीवन के प्रति आत्मीयता और सम्मान भी । सच तो यह है कि केदार जी का सारा काव्य किसान और मजदूर संवेदना का प्रतिनिधि काव्य है । किसान के बेटे की विरासत को लेकर लिखी गयी उनकी प्रसिद्ध कविता की निम्न लिखित पंकितयां निराला की भिक्षुक और तोड़ती पत्थर कविता की परम्परा को आगे बढ़ाती हैं-जब बाप मरा तो यह पायाभूखे किसान के बेटे नें;घर का मलबा,टूटी खटियाकुछ हाथ भूमि-वह भी परती...।. (पैतृक सम्पतित कविता ) क्ेदार जी के काव्य का यथार्थ चित्रण उनकी संवेदनशीलता के कारण विशिष्ट बन पड़ा है । पन्त की तरह माक्र्सवाद उनके यहां सैद्धानितक समझ के साथ उपसिथति नहीं होता बलिक वह गहरी संवेदना के साथ उपसिथति होता है । इस दृषिट से उनकी कुछ कविताएं निराला जी की काव्य-परम्परा को आगे बढ़ाती हैं । केदार जी एक समझदार और प्रौढ़ सभ्यता-समीक्षा भी प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताओं में मानवीय प्रकृति का जो सूक्ष्म निरीक्षण मिलता है वह किसान जीवन में प्रकृति के प्रति मिलने वाली आत्मीयता और राग दीर्घकालिक साहचर्य का ही परिणाम है ।

 नागाजर्ुन की कर्इ कविताओं में किसान यथार्थ ,जीवन के महत्वपूर्ण अनुभव और स्मृति के परिदृश्य आकर्षण तथा जीवन-राग के रूप में सामने आते  है ं -याद आता मुझे अपना वह तरउनी ग्रामयाद आती लीचियां औ आमयाद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भागयाद आते धान....। अकाल और उसके बाद शीषर्क कविता अकाल के सन्दर्भ में ही सही किसान जीवन  का पूरा परिदृश्य ही रच देती है -कर्इ दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास कर्इ दिनों तक कानी कुतिया सोर्इ उसके पास.....दाने आए घर के अन्दर कर्इ दिनों के बाद चमक उठी घर भर की आंखें कर्इ दिनों के बाद किसान जीवन से सम्बनिधत नागाजर्ुन की कर्इ कविताएं किसान-मन की कविताएं हैं । इस दृषिट से उनकी 'बहुत दिनों बाद'मेरी भी आभा है इसमें'फसल'सिके हुए दो भुटटे और सोनिया समंदर देख्ी जा सकती है ।  'बहुत दिनो बादअब की मैंने जी भर देखीपकी -सुनहली फसलों की मुस्कान-बहुत दिनों के बाद....... बहुत दिनों के बाद अब की मैंने जी भर भोगे गन्ध-रूप-रस- शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भूपर नागाजर्ुन की इन कवितओं में प्रकृति साहचर्य और साक्षात्कार का वह आत्मीय उल्लास छिपा है जो सिर्फ किसान मन में ही संभव है । फसल कविता  फसल के आदिम जादू को समझनें और समझाने का प्रयास करती है- ''फसल क्या है और तो कुछ नहीं है वहनदियों के पानी का जादू है वह हाथों के स्पर्श की महिमा है सिके हुए दो भुटटे की किसानी यधपि जेल के भीतर  वार्ड नंबर 10 के पीछे की क्यारियों में कैदी अखिलेश् द्वारा की गर्इ है लेकिन यह कविता किसानी के सृजन-सुख को पूरी गम्भीरता से रेखांकित करती है । सोनिया समंदर कविता गेहूं की लहराती पकी फसल के सौन्दर्य को इन शब्दों में व्यक्त करती है- बिछा है मैदान मेंसोना ही सोनासोना ही सोनासोना ही सोना । नागाजर्ुन पकी फसल के दृश्य का प्रत्यक्षीकरण लहराते हुए सोनिया समंदर के रूप में करते हैंं।

    मुकितबोध की कविता में भी श्रमरत किसानों के बिम्ब मिलते हैं। किसान मुकितबोध के लिए कठिन परिश्रम ,जीवन के आधार और संघर्ष के प्रतिनिधि नायक के रूप में हैं  । सुदूर खेतों में कठिन श्रम के बाद विश्राम और खुले आसमान के नीचे अनौपचारिक ढंग से बने भोजन की सुगन्ध कवि के कविता तक आ पहुंची है -'' रास्ते में एक ओर कण्डे की लाल आग टिक्कड़ लगी सेंकनेबहुत-बहुत परेशान थके हुए हम भी हैंलेकिन सुगन्ध उस टिक्कड़ की खूब जो किआत्मा में फैलती र्इमान की भाप बनकर...।

   तारसप्तक में प्रकाशित प्रभाकर माचवे की गेहूं की सोच  कविता गेहूं की नियति के माध्यम से किसानों की दुर्दशा और आर्थिक मजबूरियों का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है -''बहुत कुछ जायेगा लगानकुछ जाएगी कर्ज-किश्तबाकी रह जाएगी-झोपडि़यों की उन भूखी अतंडि़यों के लिए सूखी एक बेर रोटी-! यधपि इस कविता में कुछ जाएगी कर्ज-किश्त का कुछ खटकता है और इसके स्थान पर अधिक शब्द होना चाहिए था-लेकिन किसानों की चिन्ता तो है ही प्रशंसनीय । माचवे की ही वसन्तागम कविता खेतों में धान पक जानें से वसन्त ऋतु के आगमन का किसान जीवन में उल्लास का गीत प्रस्तुत करती है । इस कविता में भी एक औचित्य दोष है जिसकी ओर घ्यान कवि और सम्पादक अज्ञेय दोनों का ही नहीं गया है । धान पकने के बाद शीत ऋतु आती है वसन्त नहीं ,वसन्त ऋृतु तो गेहूं पकने के बाद आती है । सहानुभूति के स्तर पर ही सही ,किसान जीवन के प्रति आकर्षण और चिन्ता 1943 के आस-पास शहरी मध्य-वर्ग के बुद्धिजीवियों में भी बची हुर्इ थी ।

       भवानीप्रसाद मिश्र के लिए तो किसान धरती पर उल्लास और आनन्द के स्वर्गिक संगीत का सर्जक ही है -'और अटपठी एक तान किसी किसान कीबचे-खुचे खालीपनधरती और आसमान के मन को भरती हुर्इदुनिया क्या हुर्इ वह तो स्वर्ग हो गया ( स्वर्गिक कविता,रचनावली,भाग-3 ) अपनी किसान का गीत शीर्षक कविता में तो वे किसान को सम्बोधित ही करते हैं-'भार्इ !कुदाली चलाते चलोमिटटी को सोना बनाते चलो ।इसी तरह गांव शीर्षक कविता भी किसान-संकल्प की कविता है-''जोतना है खेत,हल के साथ निकले।बीज बोना है,दल के साथ निकले....घूल,गोबर और कचरे में भरी सीदेवियां निकली कहां जीवित मरी सी। (रचनावली-1,पृ040) मिश्र जी की 'मधुमास,यह वर्षा,'मेघ मानव,'बरसा कर ओस,'प्रकृति प्राण,'पहिला पानी तथा'वर्षारानी आदि कविताएं जहां किसान जीवन-बोध और सरोकारों से ही सम्बनिधत कविताएं हैंवहीं 'हम जो कुछ बनते हैं,'शरीर और फसलें'कविता और फूल'बंजर हैं हम-,'पता नहीं चलता,'माटी का अनुभव'हम बोते हैं,'मंगल वर्षा,'बूंद आर्इ,'सावन,और 'सिर उठा रहे सरसों के पीले फूलशीर्षक कविताएं कहीं तो सीधे-सीधे किसान जीवन और प्रकृति का चित्रण करती हैं और कहीं किसान अनुभवों और कर्म के बिम्ब का रूपक की तरह प्रयोग करती कविताएं हैं ।

   शमशेर की कर्इ कविताओं में किसान यथार्थ का चित्रण मिलता हैयधपि उनकी अपनी ही सांकेतिक प्रस्तुति और शैली में-गाय-सानी।सन्ध्या।मुन्नी-मासी । दूध ! दूध ! चूल्हा ,आग,भूख । मांप्रेमरोटी।मृत्यु। इसी तरह कुंवर नारायण कें काव्य में किसान जीवन प्राय: स्मृति-सन्दर्भ  के रूप में बार-बार झांकता रहता है - जैसे यह धूप हरे खेतों परअनायास दो पहर जिन्दगी उड़ेलती ठण्ड से ठिठुर  रहे तलुओं को सेकतीजैसे वह नदी-नदी चली गर्इ पगडण्डी ।

    कुआनों नदी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक लम्बी और चर्चित कविता है,जिसमें नदी की स्मृतियों के साथ गांव के किसानी जीवन की स्मृतियां पूरी संवेदनशीलता के साथ कविता में उपसिथत हैं-आदमी और चौपाएखरवा से घायल पैर की उंगलियांऔर खुर लिये लंगड़ाते चलते हैंसुअर लोटते हैं....पानी में बैठी औरतें खाना पकाती हैं ।.......एक बंजर भूमि मेंबढ़े हुए नाखून लिये मैं खड़ा हूंजैसे उनसे ही नयी फसलें उगा लूंगाजैसे उन्हीं के सहारे नहरें खींचतामैं उन खेतों में ले जाऊंगाजहां कांसे की चूडि़यां खनकतीऔरतें मुंह अंधेरे में दौरियां चलाती हैं । कविता की कुआनों नदी ग्रामीण जन और किसानों के दु:ख की महानदी बन जाती है । सर्वेश्वर की सूखा कविता भी किसान जीवन की एक गम्भीर त्रासदी से सम्बनिधत है । कवि एक साक्षी के रूप् में उसका चित्रण करता है-अभ्यासवश ही मैं यहां हूंजलहीन कूपों की आंखों में झांकताजलती धरती के माथे परठंढे हाथ रखता।(शायद कोर्इ अंकुर उगे!)

 केदारनाथ सिंह की अनेक कविताओं में किसान जीवन से लिए गए अप्रतिम काव्य-बिम्ब देखे जा सकते हैं-'सिर्फ उसके उठे हुए सींगसिवानों में चमकते रहते हैंसूर्यास्त तक... अथवा सहसा बौछारों की ओट मेंदिख जाती है एक स्त्री उपले बटोरती हुर्इ..... तथा 'वह जरा सा हूंफता हैउसके कान खड़े हो जाते हैंयह भूसे की खुशबू है । केदार नाथ सिंह की बहुचर्चित लम्बी कविता बाघ के कर्इ अंश किसान जीवन से भी सन्दर्भित हैं ।

 नयी कविता के अंक 5-6 में प्रकाशित शरद देवड़ा की 'बैरिन रात:अभागिन नारी  कविता की अभागिन नारी एक किसान की स्त्री ही हैजो रसोंर्इ के घुटते घुएं में रोटियां सेकती है,चक्की पीसने से कड़ी हो आर्इ अपनी हथेलियों से अपने कानों को ढकती है । इसी अंक में प्रकाशित प्रभाकर मिश्र की अलाव की आंच में शीर्षक कविता में भी किसान जीवन की चर्या उपसिथत है तो जितेन्द्रनाथ पाठक की शरद घन शीर्षक कविता में भी किसान जीवन बिमिबत हुआ है! क्विता फसल के पक जाने पर बिना जरूरत के बरसने जा रहे बादलों को सम्बोधित है और उनसे न बरसने की प्रार्थना करती है -ओ शरद के अयाचित घन!मत मुड़ो इस गांवविलसने दो पीत सरसों की हुलसती छातियों पर धूपरंभने दोगाय,बछड़े,भैंस,बैलों भरी चरनी को निकल जाने दो नदी के वक्ष से उठती हुर्इ भाप...।

 तीसरा सप्तक में प्रकाशित विजयदेवनारायण साही  की रात में गांव कविता किसान अनुभव का ही बिम्बांकन है -सो रहा है गांव।खेतियों की अनगिनत मेड़ेंकि धरती के दुलारे वक्ष कोउंगलियों से पकड़बच्चों की सलोनी नींद में सुकुमारसो रहा है गांव! कीर्ति चौधरी की फूल झर गये तथा लता-1,2,3 शीर्षक से लिखी गयी कविताएं भी किसानी अनुभव की कविताएं हैं । किसान अनुभवों को अपनी काव्य-भाषा में पिरोने के लिए सोमदत्त की कविताएं भी याद रखी जाएंगी-'अपनी मिटटी को जगाना थापुरखों के कोठार से बीज निकालकरउम्मीद का बिरवा लगाना था । (पुरखों के कोठार से कविता )

कुछ वर्ष पहले अब्दुल बिसिमल्लाह के दोहों का संकलन 'किसके हाथ गुलेल शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

उसमें भी किसान जीवन के यथार्थ पर टिप्पणी करते अनेक दोहे थे । यह संकलन दोहा छन्द को खड़ी बोली में पुन:प्राप्त करने की दृषिठ से भी महत्वपूर्ण था -'' किसकी माटी किसकी खेती,किसका है खलिहानदाना ले जाय बनिया साराफांके घूल किसान ।

     नक्सलबाड़ी आन्दोलन से प्रेरणा लेकर हिन्दी कविता में सक्रिय और स्थापित कवियों ज्ञानेन्द्रपतिअरुण कमल और आलोक धन्वा में से ज्ञानेन्द्रपति और अरुण कमल दोनों के यहां किसान यथार्थ की कविताएं मिल जाती हैं । ज्ञानेन्द्रपति के यहां किसान अनुभवों के अप्रत्यक्ष काव्यात्मक उपयोग और प्रत्यक्ष किसान-यथार्थ के बोध वाली दोनों प्रकार की अच्छी कविताएं बड़ी संख्या में मिल जाती हैं । पहली कोटि के उदाहरणस्वरूप उनके संशयात्मा संकलन की पहली ही कविता देखी जा सकती है-'' इस बीच जिससड़क परतुम नहीं चले होसमय का बूढ़ा बैल चला हैछोड़ता खुरों के बराबर गडे......नित नर्इ जिसके हल की फालखींचती सड़कों की रेख । इसी तरह ज्ञानेन्द्रपति की एक अन्य कवितामिट गए मैदानों वाला गांवकिसान जीवन के लिए महत्वपूर्णचरागाहों के मिटनें के माध्यम से गांवों का शोक-चित्र ही प्रस्तुत करती है । इसी तरह एक आदिवासी गांव से गुजरती सड़क कविता भी सभ्यता के उस शोषण-चक्र को समनें और समझाने का प्रयास करती है ,जो गांव तक जाती भी है तो लूटने की नीयत से ही । ज्ञानेन्द्रपति की खेवली तक सड़क नहीं आती कविता भी शहर केनिद्रत सभ्यता द्वारा किसान जीवन के शोषण-चक्र का अनावरण करती है-'' सड़क हो चाहे नहींखिंचे आते हैं मुंह बन्द बोरों से भरे अनाजजैसे दुधगर बाल्टेऔर कामगार लोग.........खेवली! जिसकी माटी मेंउपजते हैंकवि और किसानकि भारत के प्राण जहां बसते हैं ! इसी तरह ज्ञानेन्द्रपति की उड़ती हैं पतितयां शीर्षक कविता भी

शहरों की ओर पलायन करने वाले किसानों के बच्चों के विस्थापन का अत्यन्त प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करती है-''पतितयां नहींराजधानी पहुंचती हैंमधुकूपक रसाल और रसगुल्लक लीचियांæकों-टोकरियों में और पहुंचते हैं कोमल कुम्हलाए बालकनौकरी की तलाश में।

 अरुण कमल की भी कर्इ कविताएं काव्य शिल्प की तलाश में किसान जीवन और यथार्थ के आस-पास जाती हैं । अनाज के बिम्ब तो उनकी प्रसिद्ध कविता धार में भी है और गरीबी की त्रासदी को विडम्बना की सीमा तक चित्रित करती उधर के चोर शीर्षक कविता में भी ।  किसान यथार्थ से सम्बनिधत प्रत्यक्ष संवेदना वाली जीवन्त कविताएं भी उनके यहां हैं-'कभी-कभी बथान में गौएं करवट बदलती हैंबैल जोर से छोड़ते हैं सांसअचानक दीवार पर मलकी टार्च की रोशनी कोर्इ निकला है शायद खेत घूमने।(जीवधारा कविता ) ऋतुराज की एक कविता अपने घायल बैल के लिए किसान के दु:ख और संवेदनशीलता को इस रूप में व्यक्त करती है-हल कुछ ज्यादा बड़ा था,मुझे तो चोट नहीं लगीलेकिन बैल के घाव हो गया है ।उदभ्रान्त की कविता हांड़ी कालाहांड़ी की किसान त्रासदी से सम्बनिधत है-

'मजे से पक रहा हैएक किनकी चावल काएक विराट हांड़ी मेंभूख के सुलगते चूल्हे परखदबदखदबद। ।

  नवगीतकारों में शम्भूनाथ सिंह के यहां किसान प्रकृति के बिम्ब हैं तो गुलाब सिंह के 'धूल भरे पांवसंकलन के गीतों में किसान जीवन के विविध चित्र हैं । उन्होंने किसानों के व्यकितवाचक संज्ञाओं का प्रयोग करते हुए किसान जीवन के जीवन्त बिम्ब सृजित किए हैं । महत्वपूर्ण नवगीतकार उमाशेकर तिवारी का'खेतों में आंसू बोते हैं शीर्षक गीत भी किसान यथार्थ और संवेदना की मार्मिक प्रस्तुति करता है -वे लोग जो कांधे हल ढोतेखेतों में आंसू बोते हैं-उनका ही हक है फसलों परअब भी माने तोबेहतर है। प्राय: गांव गया था गांव से लौटा जैसी चर्चित पंकितयों के लिए जाने जाने वाले गीतकार कैलाश गौतम की रामदुलारे कविता एक किसान की आर्थिक सिथति और मनोदशा का अच्छा चित्रण करती है-'भूखे-प्यासे टूटे-हारेखेत से लौटे रामदुलारेबनिया कहता ब्याज चाहिएसौ का पत्ता आज चाहिएजहां देखिए आग लगी हैदिन भर भागम-भाग लगी है...। आधुनिक दृषिट-सम्पन्न एक नए गीतकार ओम धीरज की 'खूंटे पर बंधे हुए शीर्षक कविता  किसानों की यथासिथतिवादी नियति और जड़ता को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है ।

  समकालीन युवा कवियों में दिनेश कुशवाह की  'उस मां की कोख से जनमें बिना  कविता में भी गरीब किसान स्त्री का दर्द ही व्यक्त हुआ है-जितना सहती है गरीब की बेटीक्या सहेगी धरती ! इसी प्रकार दिनेश की एक अन्य कविता भी किसान कर्म के प्रति सम्मान और कृतज्ञता भाव ज्ञापित करती है-''मुंह में कौर डालें तो सोचेंउस खेत के बारे मेंजहां से आता है अनाज। नए कवियों में केशव शरण की एक हलवाहे का हल चलाना देखकर कविता भी उल्लेखनीय है ।

 श्रीप्रकाश शुक्ल की अनेक कविताएं भी किसान जीवन से लिए लुप्तप्राय शब्दों और स्मृतियों का बिम्बात्मक  संरक्षण करती हैं । हड़परौली उनकी ऐसी ही कविता है जिसमें वर्षा न होने की सिथति में सित्रयों द्वारा अंघेरी रात में इन्द्र को रिझाने के लिए नग्न होकर सामूहिक रूप से हल चलाने की प्रथा को आधार बनाया गया है । श्रीप्रकाश की अधिकांश ऐसी कविताएं एक भाषाविद रीझ की उपज हैं । किसी पुरातातिवक भाषाविद की तरह उनकी चिन्ता किसान जीवन से सम्बनिधत लुप्तप्राय शब्दों को बचा लेने की है । किसान जीवन के पर्याय के रूप में पिछड़ते गांव का चित्र उनकी अपना गांव कविता इसप्रकार प्रस्तुत करती है- 'बादलों की आवाजाही के बीचपगुरी करताअपनी ही पीठ के भार से द्रवित अपना यह गांवशहर के ठीक सामनेंलयनहा बरधा की तरहताकता रहता है ।

  इधर प्रकाशित रामाज्ञा शशिधर के 'बुरे समय में नींद संकलन की एक कविता विदर्भ विदर्भ के किसानों की त्रासदी को गम्भीर सांकेतिकता के साथ प्रस्तुत करती है । कपास की खेती करनें वाले किसानों के शोषण और आत्महत्याओं की त्रासदी तथा उनके यथार्थ की भयावहता को रामाज्ञा नें अपनी विदर्भ कविता में जिसप्रकार रूपाान्तरित किया है वह उनकी रचना-सामथ्र्य का तो मानक है ही ,एक नए समर्थ कवि की प्रापित के रूप में हिन्दी कविता के लिए भी महत्वपूर्ण है - संसार का सबसे बड़ा श्मशानधूसर सलेटी कालासंसार का सबसे बड़ा कफनमुलायम     सफेद आरामदेहमणिकर्णिकेतुमनें विदर्भ नहीं देखा है  कविता विदर्भ के सफेद कपास की खेती को कफन की संज्ञा देकर और मणिकर्णिका से सन्दर्भित कर शोषण के कारण हो रही मौतों के बारे में सीधे-सीधे न कहते हुए भी बहुत कुछ कह देती है ।      निलय उपाध्याय की कुछ कविताएं भूमण्डलीकरण के दौर के किसानों की सिथति को प्रामाणिक रूप् में रेखांकित करती है । जैसे लड़कियों को आवारा लम्पट पुरुषों का घूरना चुभता हैजैसे कोर्इ कसार्इ किसी स्वस्थ गाय के मांस के मूल्य को ललचयी दृषिट से आंकता है ,कुछ वैसा ही अहसास निलय  उपाध्याय  की मोटांजा कविता के नायक किसान मनबोध बाबू का भी है-मनबोधबाबूमहीनों हो गए खेत घूमते-घूमतेघर-घर पूछते और महसूस करतेउनके खेत घिर गए हैंसिक्कों और स्वार्थ से।युवतर पीढ़ी के कवि राकेश रंजन की कविता चेत भर्इ चेत किसानी से पलायन की समस्या की ओर गम्भीर चेतावनी के स्वर में घ्यान आकर्षित करती है-कल था जो हरा-भरालहराता खेतआज हुआ बंजरकल होगा वह रेतचेत भर्इ चेत ।

     इधर हिन्दी की एक लोकप्रिय और अधिक सम्प्रेषणीय विधा के रूप हिन्दी गजल नें भी सभी का ध्यान आकर्षित किया है । गजल की संवादी ,संवेदी और गेय प्रकृति उसे किसान यथार्थ की अभिव्यकित के लिए भी अधिक प्रभावी और उपयुक्त विधा बनाती है । जिन गजलकारों नें किसानों की पीड़ा को अपनी गजलों के माध्यम से व्यक्त करने के लिए अधिक ख्याति अर्जित की है ,उनमें बल्ली सिंह चीमा,अदम गोंडवी और कमल किशोर श्रमिक विशेष उल्लेखनीय हैं । कुछ अच्छे प्रयोग दुष्यन्त के यहां भी मिलते हैं - तेरे गहनों सी खनखनाती थीबाजरे की फसल रही होगी । किसान यथार्थ के लिए बल्ली सिंह चीमा की निम्न पंकितयों को देखा जा सकता है-''खेत प्यासे रह गए धान हुए बीमारटा-टा करके उड़ गयी सावन में बरसात (जमीन से उठती आवाज,पृ066) तथा '' सांड़ खेतों में चरता हो जैसे कोर्इयूं हमारे घरों में अंधेरा फिरे । (तय करो किस ओर हो) जैसी पंकितयां किसान जीवन के अनुभपों से कविता को गूंथकर ही बनार्इ गयी हैं । अदम गोंडवी की गजलें तो किसान यथार्थ को सम्प्रेषित करने के लिए कला का रंचमात्र भी झीना परदा नहीं रहने देती  । उनकी गजलों को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे वास्तविक जीवन ही गजल के रूप में उतार दिया गया हो -बूढ़ा बरगद साक्षी है,किस तरह से खो गर्इरमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल मेंखेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गएहमको पटटे की सनद मिलती भी है तो ताल में ।

    आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं किसान और उसके पर्यावरण को या तो सरकार बचा सकती है या फिर बाजार । विडम्बना यह है कि जो राजनीति उसे बचा सकती है ,वही पूंजीपतियों से मिलकर उसके विरुद्ध साजिश रचाही है ।  बाजार किसान की तभी सहायता कर सकता है जब वह किसान के उत्पादों को मंहगा करके बेचे ,जबकि सरकार उसे अपने स्वार्थ के कारण ऐसा करने नहीं देती । जनता को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के प्रयास में मारा और हार जाता है किसान ही क्योंकि सरकार विदेश से गेहूं मंगाकर दाम गिराने के लिए अपने यहां के बाजारों में बेच देती है। इस तरह किसान के हर उत्पाद बाजार में सरकार के बन्धक हैं । क्षतिपूर्ति के लिए सरकार चाहे तो ऐसा भी कर सकती है कि वह किसानों का पंजीकरण करे और उन्हें मुआवजा के रूप मे कुछ क्षतिपूर्ति राशि या वेतन नियमित रूप से दे । किसानों के लिए शीघ्र ही कुछ निर्णायक रूप् में किया जाना चाहिए । चाहे सरकार उनके यहां से मंहगा खरीद कर अनाज को सस्ते मूल्य पर ही क्यों न बेचे  । करे कोर्इ भी ,कुछ भी लेकिन शीघ्र ! किसानों को वास्तविक जीवन और कविता दोनों में ही बचाने और संरक्षण देने की जरूरत है ।

गुरुवार, 14 मार्च 2013

भ्रष्टाचार की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

प्राचीन भारतीय समाज और उसकी अर्थव्यवस्था मुद्रा और बाजार आधारित न होकर स्थानीय स्तर पर वस्तु-विनिमय आधारित थी .यह एक -दुसरे को सहयोग करते हुए जीने और जिलाने कि व्यवस्था थी .पूंजी-वितरण एवं न्यूनतम  सामाजिक सुरक्षा के लिए एक धार्मिक-सांस्कृतिक मानसिकता ओर पद्धति विकसित कि गयी थी.अतिथि को देवता घोषित करते हुए द्वार पर आए हुए को भोजन कराना अनिवार्य एवं महत्वपूर्ण कर्तव्य ठहराया गया था .इस सांस्कृतिक व्यवस्था का इतिहास में सर्वाधिक संगठित लाभ बौद्ध-भिक्षुओं ने उठाया .इसी व्यवस्था के बल पर समाज छोड़ कर भागने वाले निवृतिमार्गी साधु भी सुविधा-सम्पन्न जीवन जीते रहे .जातीय रूप से इसका लाभ पुरोहित वर्ग नें लिया .इस सामाजिक आर्थिक सुरक्षा-तंत्र नें ही उस भारतीय ईश्वरऔर आस्था का होना संभव किया जो आज के बाजारवादी युग में भी आध्यात्मिक सुरक्षा-तंत्र और स्वर्ग बचाए हुए है .ऐसा आध्यात्मिक भिक्षाटन और दान को महिमामंडित कर पाया गया .दरअसल यह एक कृषि-आधारित स्थायित्वपूर्ण समाज की सहयोगी और पूरक निर्भरता थी .इसने पूंजी के अर्जन से अधिक विसर्जन को महत्त्व दिया .यह एक आधुनिक अर्थों में राजनीतिक सत्ता आधारित तंत्र नहीं था ,लेकिन सांस्कृतिक होनें से अधिक टिकाऊ और दीर्घजीवी था .यह एक धार्मिक-सांस्कृतिक आधार वाला आर्थिक सुरक्षा-तन्त्र था ,जो आज के राजनीतिक सत्ता-तन्त्र अथवा संगठित मानव-व्यव्हार से विस्थापित हो गया है .
                 आज का बाजारवादी मूल्य-तन्त्र विनिमय और सहयोग पर आधारित न होकर मुद्रा आधारित आदान-प्रदान पर आधारित है .यह शेक्सपियर के उपन्यास मर्चेण्टऑफ़ वेनिस के प्रमुख पात्र शाइलार्क जैसी  क्रूरता और संवेदनहीनता देता है .यह मुद्रा-व्यहवार की दृष्टि से यंत्रिकीकृत समाज है .यह कमाने के लिए भावनारहित आर्थिक-व्यवहार की मांग करती है .इस व्यवस्था में उदारता बेवकूफी है .मार्क्स कि विचारधारा के अनुसार कहें तो यह एक व्यक्ति-केन्द्रित स्वार्थ जीवी  वैयक्तिक पूंजीवादी समाज है और इसकी क्रूरता और संवेदनहीनता का निराकरण सिर्फ साम्यवादी व्यवस्था को अपनाने से ही संभव है .भारत के प्राचीन सांस्कृतिक अर्थ-तंत्र को यहाँ का जातीयता आधारित पूंजीपति -व्यवसायी तंत्र अब भी बचे हुए है .यहाँ का सांस्कृतिक-धार्मिक आर्थिक व्यव्हार लोगों को अब भी जिलाने और सुखी करने में सक्षम है .यह भारत की बढ़ती आर्थिक समृद्धि के साथ और आकर्षक और वैभवपूर्ण हुआ है .
               भारतीयों का सांस्कृतिक -आर्थिक व्यव्हार जो दान देने और उदार होने के लिए उकसाता है वही भिक्षा लेने को बिना किसी सामाजिक हीनता ग्रंथि के स्वीकार करने वाला जातीय  समुदाय भी उपस्थित करता है .यह आर्थिक व्यव्हार दूसरों के धन को बेहिचक स्वीकार करने वाली मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी देता है .वह अपराध-बोध और हीनता-ग्रंथि जो दूसरों के धन को बिना किसी श्रम के लेने को बुरा समझाती है ,उसका किसानों से अलग पृष्ठभूमि से आए जातीय समुदायों में अभाव है .सिर्फ किसान-जातियों से आए लोग ही ईमानदार आर्थिक व्यव्हार की  मानसिकताऔर मनोवैज्ञानिक पात्रता रखते हैं.
              इस विशिष्ट जातीय सामाजिक संरचना और पृष्ठभूमि  के कारण आधुनिक भारतीय लोकतन्त्र,  एक जातिवादी चरित्र का लोकतन्त्र बनता  गया है.यद्यपि पढ़े -लिखे लोग विशेषतया बुद्धिजीवी इस जातीयकरण को सैद्धांतिक स्तर पर स्वीकार नहीं पाते .कुछ दिनों पहले तक भारत की किसान और श्रमजीवी जातियों में पैदा लोग क्योंकि सिर्फ नैतिकता और ईमानदारी से ही समाज में सम्मान प्राप्त कर पाते थे .उनके परिवार में परम्परा से ही श्रम की संस्कृति और संस्कार थे-इसलिए वे यदि नौकरी में भी थे तो घुस आदि के रूप में किसी से अनैतिक राशि लेना अपना अपमान समझते थे .विशेषकर पिछड़ी जातियों में जन्में लोग अपनी नैतिकता और आचरण से ही दूसरों को प्रभावित करने की स्थिति में होते थे .
          इस तरह पहले परंपरागत जातियों में सिर्फ एक ही जाति ऐसी थी ,जिसका परंपरागत मनोविज्ञान आर्थिक लेन-देन के आधुनिक मानदंडों के अनुरूप नहीं था .पुरोहित कर्म करने वाली यह जाति थी ब्राह्मण .यद्यपि शिक्षित और सुदृढ़ आर्थिक पृष्ठभूमि वाले शिक्षित ब्राह्मण तो नहीं ,लेकिन गरीब ब्राह्मणों को यह सुविधा रही है कि वे आरती ,प्रसाद ,पूजा या फिर मंदिर के निर्माण के बहाने भरण-पोषण योग्य वित्त एकत्रित कर सकते थे .इसे वे भिक्षा,श्रद्धा या फिर चंदा आदि नामों से प्राप्त कर सकते थे .
               अन्य वर्ण में जन्में लोगो को अपने लेन-देन का हिसाब रखना जरुरी था .पुनर्जन्म वाद के कारण अगले जन्म में उस लिए हुए के प्रतिदान  में देना पड़ सकता था .इस धार्मिक विश्वास के कारण भी अन्य जातियों को नैतिक बने रहना मजबूरी थी .सिर्फ ब्राह्मणों को ही यह सुविधा थी कि वे बिना किसी हिसाब के  किसी से भी निर्बाध दान लें सकते थे .उनका देना आशीर्वाद के रूप में ही था .यह पुण्य के रूप में था 'पण्य के रूप में नहीं .लेकिन आधुनिकता जनित नास्तिकता नें इस संकोच को मिटा दिया है .अब किसी भी जाति में जन्मा भारतीय हिसाब से बाहर का मांग और पाकर प्रसन्न होने लगा है .अब घूस मांगनें में पाप और पुण्य की परम्परागत मानसिक बाधा नहीं रही
          इस तरह हम भारतीय, सांस्कृतिक स्तर पर ही भ्रष्टाचार की अनैतिकता को समझने के अयोग्य हैं .

शनिवार, 9 मार्च 2013

भारतीय लोकतन्त्र और परिवारवाद की संस्कृति


आधुनिक लोकतंत्र की अवधारणा और भारत की बहुसंख्यक नेतृत्वकारी सांस्कृतिक मानसिकता में व्यापक अंतर्विरोध है .इसका मुख्य कारण प्राचीन भारतीय संस्कृति का राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से मुक्त आनुवांशिक उत्तराधिकार वाले राजतन्त्र के लिए विकसित होना है .समाजशास्त्रीय दृष्टि से एक अन्य महत्वपूर्ण कारण भारतीय वर्णव्यवस्था में राजन्य वर्ण का वरीयता में दूसरे स्थान पर होना भी है .वास्तव में परंपरागत भारतीय सामाजिक व्यवस्था संस्कृति मूलक है .इस संस्कृति के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका ब्राह्मण जाति की रही है .राजनीति में अवश्यम्भावी हिंसा और हत्या से जातीय रूप से बचने के लिए इसने क्षत्रिय वर्ण को आगे किया .अपने लिए जातीय श्रेष्ठता तो ली लेकिन राजनीतिक वैभव से दूर अपनी सामाजिक प्रस्थिति में उसका जातीय चरित्र प्रत्यक्ष राजनीतिक महत्वाकांक्षा और हस्तक्षेप का विरोधी ही रहा है .स्व-निर्णीतइस जातीय राजनीतिक निर्वासन के साथ उसकी दोहरी सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका रही है -पहली तो राजा की जातीय श्रेष्ठता और उसकी दैवी विशिष्टता का प्रजा में प्रचार करना ,अपनी स्वीकृति द्वारा आवश्यक जनमत तैयार करना दूसरा स्वयं प्रतिस्पर्धी न होते हुए दूसरों को भी प्रतिस्पर्धा और विरोध-प्रतिरोध से विरत रखना .उसके द्वारा जनता में फैलाया गया आध्यात्मवाद ,ईश्वर और भक्ति की अवधारणा भी सामाजिक व्यवहार की इसी भूमिका को सृजित कराती है .      
                  क्योंकि भारत में ब्राह्मण मानसिकता ही अन्य जातिओं का नेतृत्व करती है ,उनका आदर्श और मानक बनती है स्वयं राजनीतिक निषेध और उदासीनता जीने के कारण वह औरों के लिए भी राजनीतिक इच्छा के निषेध और उदासीनता की प्रचारक है .क्योंकि परंपरागत ढंग से और जातियों को राजा बनने का स्वप्न ही नहीं देखना था "इसी कारण से उसके लिए "दिल्लीश्वरो वा,जगादीश्वरो वा "कहना आसान रहा है .वह जिस संस्कृति का वाहक है ,वह निःशेष और सम्पूर्ण श्रद्धा एवं सम्मान जीवी है .उसके भाग्यवाद का दर्शन और राजा को ईश्वर की इच्छा का परिणाम तथा उसके प्रतिनिधि के रूप में देखने की प्रवृत्ति भक्त के रूप में अनुयायी के जिस मनोविज्ञान को सृजित कराती है ,दर-असल वह एक स्वामिभक्त और आदर्श प्रजा बनाने की संस्कृति है .ब्राह्मण केन्द्रित भारतीय संस्कृति वास्तव में प्रजानीति की सवाहक जातीय संस्कृति है.ऐसे में यदि समाजशास्त्रीय दृष्टि से देंखें तो भारतीय ईश्वर की परंपरागत अवधारणा और समाज के राजनीतिक नेतृत्व की परिकल्पना का विकास आनुवांशिक उत्तराधिकार वाले राजतन्त्र के लिए हुआ था .यही कारण है कि भारतीय समाज का परंपरागत सांस्कृतिक मनोविज्ञान अचेतन स्तर पर कुलीनतंत्र या परिवार-तंत्र के अधिक अनुकूल है . 
                   इस दृष्टि से देखा जाय तो गुजराती संतों के आध्यात्मिक प्रचार और मोदी के निर्विरोध निर्वाचन में सीधा सम्बन्ध है .दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं .दोनों ही एक-दुसरे के पूरक सहयोगी हैं.एक-दुसरे के समर्थन में ,एक-दुसरे की शक्ति के रूप में कामकर रहें हैं .यह मानसिकता और उसका मनोविज्ञान ईश्वर की तरह ही एक अप्रतिस्पर्धी राजनीतिक नेतृत्व का पोषण और प्रोत्साहन करता है.यह राजनीतिक स्थिरता की दृष्टि से उपयोगी है,किन्तु दूसरी ओर यही मानसिकता एक बहुलवादी लोकतान्त्रिक राजनीतिक संस्कृति और वैकल्पिक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को हतोत्साहित भी करती है.. यह मजबूत विपक्ष के अस्तित्व और पोषण की दृष्टि से अनुकूल नहीं है .    
                   यह एक सच्चाई है कि यदि गणतंत्र न होता तो बुद्ध के करुणावादी,निरीश्वरवादी प्रज्ञात्मक दर्शन का जन्म भी नहीं होता,जिसे आज हम बुद्ध का धर्मं कहते हैं. समीकरण साफ है की एक सर्वव्यापी ईश्वर या फिर राजनीतिक सत्ता के लिए भी हमें अपने व्यक्तित्व को समेटना होगा . उसे आकाशीय विस्तार और अवकाश देने के लिए अपने अहम् को कम करना होगा .परंपरागत शब्दावली में इसे दास्य भाव की भक्ति कहते हैं.सामाजिक व्यवहार में यह एक हीन और विनम्र मनुष्य की मांग करता है.स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था की असमानता की पराकाष्ठा की स्थिति को ही सूचित करती है. इस तरह स्पष्ट है कि लोकतन्त्र बिना मानवतावादी -बुद्धिवादी आध्यात्म के विकास के संभव ही नहीं है .या तो हमें ईश्वर की चिंता को छोड़कर मनुष्य की चिंता करनी होगी या फिर नास्तिक या निरीश्वरवादी बनना पड़ेगा .इसमे कबीर और नानक की शैली का मनुष्यव्यापी ईश्वर और आध्यात्म अधिक प्रासंगिक और युक्तियुक्त होगा .वैष्णवी विचारधारा तो प्रकारान्तर से आदर्श एवं संवेदनशील राजतन्त्र का ही विस्तार है . 
                    समाजशास्त्रीय विश्लेषण के इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अधिकांश लोग ईश्वर की अवधारणा को किसी सर्वकालिक और सर्वशक्तिमान सत्ता की उपस्थिति के रूप में स्वीकार करते हुए उसके सामाजिक स्रोत,सामाजिक भूमिका और मानवीय परिणामों को अनदेखा करते हैं . वे यह भूल जाते हैं कि भारतीयों की अधिकांश सांस्कृतिक अवधारणाओं का विकास एक जाति-विशेष ब्राह्मण नें ही किया है .अपने पेशेगत कारणों से इस विशेष जाति नें जो अपने लिए भी विशिष्ट चरित्र-नीति और मर्यादाएं निर्धारित कीं;वह राजतन्त्र व्यवस्था के कारण 'इस सीमा तक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से हीन विकसित किया गया है कि वह पूरी भारतीय संसकृति को एक आज्ञाकारी शासित संस्कृति में बदल देता है .  
                सबसे पहले तो पुनर्जन्म ,भाग्यवाद और कर्मवाद की अवधारणा के कारण यह राजा को ईश्वर की इच्छा ,प्रारब्ध एवं नियति के अनुसार राजप्रप्ति करने वाले के रूप में जन्म के पहले से ही विशिष्ट मानव
घोषित करती है . इसमें संदेह नहीं है कि इन विश्वासों नें अंतर्सामुदायिक विश्वासघात ,नेतृत्व की अराजकता और महात्वाकांक्षी प्रतिस्पर्धा को रोका है .दरअसल यह पूरी संस्कृति और धार्मिक आचारसंहिता वंशानुगत उत्तराधिकार को केंद्र में रखकर रची गई थी .इससे निःसंतान होने तक कोई भी राजतन्त्र कई पीढ़ियों तक चलता रह सकता था .   
                यद्यपि कई बार तो मंत्री और सेनापति का पद भी आनुवांशिक था ,लेकिन राजा को यह अधिकार था कि वह जाति-विशेष से ही किसी अन्य ब्राह्मण को मंत्री के रूप में चुने ठीक उसी तरह जैसे जनसामान्य में भी हर परिवार के अपनें वंशानुगत पुरोहित परिवार होते थे .उसी तरह मंत्री के परिवार से ही कोई मंत्री बन सकता था .प्राचीन भारत में इस जातीय व्यवस्था नें राजा और मंत्री बनने की कूटनीतिक साज़िशों और प्रतिस्पर्धा को रोका .वास्तव में यह एक कृषि -आधारित स्थायित्वपूर्ण समाज की स्थाई व्यवस्था थी .जिस व्यवस्था में किसान का कृषि -क्षेत्र और उपज -सामर्थ्य तक सुनिश्चित थी .कृषि -आधारित स्थाई संसकृति नें ये सारे सामाजिक -सांस्कृतिक चरित्र और भूमिकाएँ निर्धारित की थी .इसी के अनुरूप जातीय चरित्र और उसका संस्कारगत प्रशिक्षण -तंत्र भी विकसित किया था .  
                ब्राह्मण वर्ण का जातीय चरित्र उसको राजनीतिक व्यवस्था में महत्वाकांक्षा से रहित रहने की मांग करता था .समाज में राजा के बाद की पद -व्यवस्था के कारण यह संस्कृति-जीवी जाति जिस धर्म -व्यवस्था और सामाजिक व्यव्हार -तंत्र की अचेतन प्रस्तावना कराती है :वह किसी और के नेतृत्व का
समर्थनकारी व्यक्तित्व रचता है .वह शासक को सम्मान से देखने की संस्कृति का प्रस्तावक है .अपनी इस मानसिक व्यवस्था के कारण ब्राह्मण जाति और उसके द्वारा प्रस्तावित संस्कृति किसी भी शासक के लिए अनुकूल और समर्थन की भूमिका में रही है .क्योंकि भारतीयों की अधिकांश धार्मिकता और संस्कृति के केंद्र में ब्राह्मण-दृष्टि और मानसिकता की ही केन्द्रीय भूमिका है .इसलिए इस वर्ण की मानसिकता के अनुरूप
भारतियों का ईश्वर भी शासक -समर्थक मानसिकता को पोषित करता है .उसका जातीय तंत दरअसल राजतन्त्र और वंशानुगत उत्तराधिकार की संरक्षक अवधारणा और विश्वास -तंत्र के रूप में है .    
                  भारतीय संस्कृति का नियतिवाद क्योंकि कृषि -सभ्यता के स्थिर अर्थ-तंत्र से प्रेरित स्थायित्व्वाद ही है ,इस लिए इसकी ईश्वर और धर्म सम्बन्धी सभी सांस्कृतिक अवधारणाएं यथास्थितिवाद की पोषक तथा बेहतर नेतृत्व की दृष्टि से किसी भी लोकतंत्रोचित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा एवं प्रतियोगिता का निषेधी है .यह संस्कृति भारतीयों में व्यापक लोकतान्त्रिक उदासीनता को जन्म देती है .इसका दूसरा दुस्परिणाम भारतीय राजनीति में परिवारवाद की सहज और व्यापक स्वीकृति तथा जन-समर्थन है .इससे भारत में लोकतान्त्रिक सत्ता कुछ ही परिवारों में सिमटकर रह गयी है .अच्छा या बुरा जो कुछ भी हो रहा है ,उन्ही के माध्यम से हो रहा है .क्योंकि भारतियों की दार्शनिक ,धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणाएँ बहुत कुछ चारण जाति की भूमिका वाली पुरोहित जाति ने रची है ,इस लिए यह शासक वर्ग को प्रजा की चुनौतिओं से परे का एक प्रतिरोध रहित राजनीतिक स्वर्ग देती है .

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

क्रान्ति-विमर्श-२

      व्यवस्था-चिंतन,निर्माण और रूपान्तरण एक सतत प्रक्रिया है.लोग नियमित क्रांति को तो विकास और परिवर्तन समझते हैं और अनियमित या आकस्मिक क्रांति को ही क्रांति समझते हैं.समस्याए      इसलिए व्यवस्था के परिष्कार को सतत क्रांति कि सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए.बढ़ती जनसंख्या के साथ चीजें इतनी गतिशील हैं कि पूर्व-निर्धारित परिकल्पनाओं से काम नहीं चल सकता.अतीत की सूचनाओं और ज्ञान पर आधारित 
                                                                                                                                                              



अतीत कि सूचनाओं और ज्ञान पर आधारित परिकल्पनाएं पिछड़ जाया कराती हैं .व्यवस्था सम्बन्धी परिकल्पनाएं भी उनमें से एक है .बढ़ती जनसँख्या के सापेक्ष बढ़ रही हैं.
           इसलिए क्रांति कि प्रतीक्षा में व्यवस्था के रूपान्तरण को देर तक स्थगित नहीं रखा जा सकता.किसी तरह का स्थगन समस्या को बढ़ाएगा ही.दूसरी बात यह है कि व्यवस्था कि सृजनशीलता और परिष्कार की अपनी सीमाएं हैं.मानव-जाति कि सृजनशीलता के सारे आयामों को सिर्फ व्यवस्था कि सृजनशीलता के माध्यम से ही नहीं पाया जा सकता.बाजार-व्यवस्था बहुत कुछ स्वायत्त और अपने ही नियमों से संचालित होती है.क्रांति को सिर्फ राजनीतिक सृजनशीलता के दायरे में रखकर सोचने वाले संकीर्णता के कारण गलत भी हो सकते हैं.

शनिवार, 2 मार्च 2013

समय और कथा-साहित्य

क्या समयाभाव से ग्रस्त ,दूसरों के जीवन में डूबने का समय न रखने वालों के लिये क्था साहित्य नहीं है ! या ऐसे लोगों कें लिए कहानी भी अपना अलग स्वरूप ग्रहण करेगी ! कुछ लोग कहानियां नियमित रूप से पढ़ते है,कुछ लोगों की पढ़ने की आदत है इस लिये पढते हैं,कुछ लोग कहानियों को पढ़ाने के लिये पढ़ते हैं ,कुछ लोग तो पढ़ते ही नहीं ; लेकिन जो पढ़ते-पढ़ते बीच में ही कहानी पढ़ना छोड़ देते हैं या पढ़ने के बाद ऐसा सोचते हैं कि यह कहानी क्यों पढ़ी-दुख में डूब जाने के कारण नहीें बलिक अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ करने के दु:ख से -क्या कहानी को ऐसे भी बदले लोगों के लिये अपना स्वरूप बदलना नहीं चाहिये ! जीवन-संघर्श और जनसंख्या के सैलाबी दबाव में सकि्रय जीवनोें का समयाभाव क्या उन्हें दीर्घसूत्री  कहानियों का पाठक बनने देगा ! जबकि हम पाते हैं कि समाज में बौद्धिक और मानसिक वृतित और संरचना के विविध स्तर हैं । एक जीवन-षैली दूसरी जीवन-षैली के पाठक के लिये रुचिकर कैसे हो सकता है ? जबकि हम पाते हैं कि चुप रहने वाले व्यकित बड़बोले व्यकितयों का संग पसन्द नहीं करते !

        साहित्य में भी कुछ कहानियां बड़बोली होती हैं और कुछ बहुत चुप सी ; लेकिन दृष्य मीडिया के इस युग में प्रिंट मीडिया की कहानियों को कुछ अलग और विषिश्ट नहीं होना चाहिये ? हिन्दी कहानी में कहानीकारों की एक धारा जिसमें मोहन राकेष से लेकर निर्मल वमा्र्र तक आते हैं-परिवेष के जीवन्त आकर्शक चित्रण द्वारा दृष्य माध्यम के समानान्तर कहानी में एक भाशिक प्रतिसंसार रचते हैं । कहानी में दृष्य माध्यम के प्रति रचनात्मक प्रतिरोध विकसित करने का यह  एक अच्छा ढंग हो सकता है लेकिन क्या वह दृष्य माध्यम की कथा-प्रस्तुतियों को विस्थापित कर पायेगा ? कहानी को अन्त:संसार और मनोवैज्ञानिक आयामों में प्रस्तुत करने वाली जैनेन्द्र और अज्ञेय की कहानियों में दृष्य माध्यम से होड़ लेत हुए कहानी को चिन्तन संसार की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है । रेणु की कहानियों में भाशा का सृजनात्मक स्तर ,उनकी कहानी पर बनी तीसरी कसम जैसी फिल्म में दृष्य माध्यम में रूपान्तरित होकर भी उसके संवादों में भाशा के सृजनात्मक महत्व को प्रमाणित करती है ।

         स्पश्ट है कि भाशिक माध्यम में कहानी का असितत्व तभी तक अप्रतिस्पद्र्धी रूप में सुरक्षित रहेगा,
जब तक कि वह जीवन और भाशा के रिष्तों की ठोस नींव पर रची जाती है । भविश्य की वैज्ञानिक प्रगति में भी भाशा-विहीन मनुश्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती । वैसे तो प्यार भरे स्पर्ष और तनाव भरे मौन चेहरे भी भाशाहीन संवाद करते हैं । विज्ञान का भावी विकास मानव जीवन से भाशा-तंत्र को विस्थापित कर देगा या अनावष्यक कर देगा-ऐसा होना कभी संभव नहीं प्रतीत होता । दूसरे षब्दों में कहें तो भाशिक माध्यम में सृजित कहानी ही कथा का प्राथमिक और आदिम स्वरूप है। दृष्य माध्यम में सृजित और अभिनीत कहानियाें मानव जाति के विकास-क्रम में अधतन और नयी आदतें हैं । यह माध्यम यानित्रक सुविधायें देता है । संस्कृत के दृष्य या नाटय काव्य का आधुनिक और विकसित रूप है । अधिक मूर्त,स्पश्ट

और âदय-संवेध है । अपेक्षाकृत कम मानसिक श्रम में ही सम्प्रेशित हो जाता है । लिखित या वाचिक स्तर पर कहानी-एक समय में एक ही ज्ञानेनिद्रय आंख या कान से आस्वाध हो सकती है ; जबकि दृष्य माध्यम में सृजित या प्रस्तुत कहानी एक साथ आंख और कान दोनों ज्ञानेनिद्रयों द्वारा आस्वादित होती है । सिद्धान्त रूप में दोनों ही माध्यमों में सृजित कहानी का एक दूसरे में रूपान्तरण सम्भव है। किसी फिल्म या सीरियल को भाशाबद्ध किया जा सकता है तो किसी कहानी का फिल्मांकन भी संभव है । कम श्रम साध्य और आसान सम्प्रेशण्ीयता के कारण दृष्य माध्यम लोकप्रियता की अधिक सम्भावना रखता है लेकिन गुणवत्ता की दृशिट से भाशिक माध्यम की भी अपनी विषिश्टताएं हैं ,जैसे उसमें कल्पना को उत्तेजित करने की संभावनायें अधिक हैं । बिजली जाने पर और जंगल में भी कहानी पढ़ी जा सकती है । उस पर किसी इलाके का æान्सफार्मर जलने का कोर्इ दुश्प्रभाव नहीं पड़ेगा आदि। दूसरे षब्दों में कहें तो अधिक जटिल यानित्रक साधनों पर दृष्य माध्यमों की निर्भरता ही उनका दुर्बल पक्ष है । आर्थिक पक्ष मजबूत होने के साथ टी0वी0 के रूप में सर्वसुलभ होने से यह प्रिंट मीडिया का प्रतिस्पद्र्धी भी बन गया है लेकिन देखने की बात यह है कि षिक्षा का क्षेत्र आज भी पुस्तक आधारित है । यहां तक कि कम्प्यूटर सीखने के लिये भी पुस्तकें पढ़नी पढ़ती हैं । कम्प्यूटर स्वयं लिखित प्रतीकों में ही -भाशिक माध्यम में ही संवाद कर पाता है ।इसमें सन्देह नहीं कि हमारा मसितश्क रूपी हार्डवेयर जीन के स्तर तक भी मानव-भाशा के विकास के अनुकूल ढला है। मनोविज्ञान के अनुसार भाशा के बिना चिन्तन ही संभव नहीं है ।  विचारों की लय भाशिक  प्रतीकों के माध्यम से ही प्रवहमान होती है। स्पश्ट है कि दृष्य माध्यम संवेदना और संवेगों को तो जन्म दे सकता है लेकिन विचारषीलता के लिये भाशा के आदिम और प्राथमिक स्तर की ओर ही मनुश्य को लौटना होगा ।

        भारत और विषेशकर हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी चैनलों और हिन्दी अखबारों की तरह हिन्दी साहित्य लोकप्रिय क्यों नहीं हुआ ? यह एक गम्भीर प्रष्न है । जिसका एक उत्तर यह हो सकता है कि हम भारतीय लोग जातीय रूप से रूढि़वादी हैं । हमारी साहितियक विधाएं और कथा-चरित्र भी रूढि़वादी हैं । जीवन और समाज के हर स्तर पर दायरों को जीते-जीते हमारे साहित्य के चरित्र तक चारित्रिक आदतों में बदल गये हैं। साहित्यकार का संकट यह है कि यदि वह किसी अलग और विषिश्ट चरित्र की संभावना भी करता है तो तथ्य और तर्क सम्मत होते हुये भी समाज उसे झूठा बना देगा । सामान्य भारतीय मानस आज भी कर्इ युगों-कर्इ दुनियाओं को एक साथ जी रहा है । वह खणिडत मनस्कता का षिकार है । अधतन को पाने और अतीत को संरक्षित रखने का द्वन्द्व उसमें अब भी है । प्रेमचन्द की कहानियों के कर्इ चरित्र आज भी भारत -भूमि पर जीवित विचरण कर रहे हैं । जड़ता अमरता का पर्यायवाची हुआ करता है । प्रेमचन्द को देर तक प्रासंगिक और विष्वसनीय बनाये रखने में देष के यथासिथतिपूर्ण यथार्थ का अपना योगदान है। जब देष ही नहीं बदल रहा , उसका यथार्थ ही नहीं बदल रहा तो पात्र और चरित्र कहां से बदलेंगे ! कहानी कहां से बदलेगी ! चारित्रिक जड़ता चरित्र के प्रति पाठकीय जिज्ञासा को मार देती है । कहानी उतनी ही सफल होगी , जितनी कि वह पाठक की जिज्ञासा और कौतूहल को उददीप्त करेगी ; क्योंकि कौतूहल और जिज्ञासा किसी यात्रा के उददेष्य की तरह प्रेरक मनोवृतित है ।

         दूसरा कारण और उसका उत्तर साहितियक नहीं बलिक आर्थिक है । जब कोर्इ दृष्य माध्यम की 
सुलभता के यानित्रक साधन टी0वी0 को खरीदता है तो उसकें बाद सिर्फ बिजली का बिल , केबिल का किराया और उसे खोल कर उसके सामने बैठने का समय ही निवेष करता है , जबकि खरीदकर पुस्तक और पत्रिकायें पढ़ने के लिये उसे बार-बार निवेष करना होता है । पढ़ना यदि व्यसन के स्तर पर हो तब भी ,पढ़ने के श्रम-विनिवेष के कारण पुस्तकों का उबाऊ होना अखरता है । टी0वी0 खोलकर बैठा हुआ दर्षक बैठता ही है अपने फालतू या सस्ते समय के साथ अपना समय गवांने या लुटाने । अपेक्षित प्रापित न होने पर भी उसे बहुत नहीं खलता । पुस्तकों के असितत्व के लिये एक अन्य नकारात्मक सच्चार्इ उसका पर्यावरण (पेड़ों) के विनाष पर आधारित होना है । उस पर भी ज्यादा और घटिया लेखन , जीवनदायी पेड़ों का बध करता हुआ मानव-जाति के असितत्व और भविश्य को ही संकटग्रस्त करता है । जब तक प्लासिटक के कागज और प्लासिटक की टिकाऊ पुस्तकें नहीं आ जाती -तब तक इन्टरनेट की पुस्तकों से ही काम चलाना होगा ।

         तीसरा कारण सभ्यता के विकास और षिक्षा के प्रसार के कारण नये मनुश्य का अधिक जटिल , विविधतापूर्ण और बहुआयामी होना है । जीवन-संघर्श से उपजा तनाव , बेचैनी और असिथरता हर नये पल,हर नये कदम के साथ उसे बीता-पिछड़ा और व्यर्थ कर देती हैं । उसके भीतर दूसरों में नायकत्व ढूढ़ने का समय नहीं है । छोटा ही सही जीवन उसके स्वयं के नायकत्व की मांग करता है ।सवयं नायक न बन पाने की कुंठा और अतृपित उसे दूसरों में नायकत्व की तलाष के लिये उन्मुख और प्रेरित करती है।

कम से कम कर्इ मुम्बइया फिल्मों की कहानी तो यही कहती है । भावनात्मक षोशण के हिट फामर्ूले ! अपनी अतृप्त आकांक्षाओं को दूसरों में प्रक्षेपित कर दर्षक विस्मृति का सुख लेता है ।साहितियक कहानी उन फार्मूलों को चाहकर भी दुहरा नहीं सकती । एक अच्छी सुन्दर अभिनेत्री सुन्दरता  की सर्वसुलभ खिड़की की तरह होती है ,कुरूपता के गहरे अन्धकार में पड़े हुए लोगों के लिये ठण्डी रोषनी वाले चाद की तरह । अपने नायक की जीत को अपनी ही जीत मानकर थोड़ी खुषी जी लेते हैं उसके अनुयायी । अनुयायी का मनोविज्ञान उन्हें स्वयं नायक होने के अयोग्य कर देता है ।यदि अरस्तू का केथार्सिस या विरेचन सिद्धान्त सही है तो वह साहित्य की एक नकारात्मक मानवीय भूमिका की ओर ही संकेत करता है ।

कहानी को केथार्सिस प्रभाव से मुक्त रखने के लिए कहानी में , पात्रों के आक्रोष के संभावित स्थलों से आक्रोष को अनुपसिथत करना होगा -दुख के संभावित स्थलों से दुख को । संजीव और उदयप्रकाष ने बहुत सी अच्छी कहानियां लिखी है लेकिन यदि अपराध टेपचू और तिरिछ नहीं भूलती  तो उनके न भूलने के पीछे उनकी वह संरचना लगती है जो केथार्सिस की प्रकि्रया को पाठकों में घटित ही नहीं होने देती। टेपचू का टेपचू एक निरीह सर्वहारा पात्र है,लेकिन उसका कथानक निरन्तर निरीहता का उपहास उड़ाता हुआ केथार्सिस को अवरुद्ध कर देता है,इसीलिए कहानी पाठकीय संवेगों को पूर्ण संतृपित के रूप में विरेचित नहीं होने देती और पाठकीय स्मृति में जीवन्त प्रभावषीलता के रूप में बची रह जाती है ।

        अपराध कहानी में जो संवेगात्मक संषिलश्टता और कलात्मक परिपक्वता अपने चरमोत्कर्श पर मिलती है-केथार्सिस की प्रकि्रया को अवरुद्ध करने वाली उसी स्तर की कोइ्र्र दूसरी कहानी लिखने के स्थान पर संजीव की परवर्ती अच्छी कहानियां भी यथार्थ की महाकाव्यात्मक और संवेदनात्मक प्रस्तुति के बावजूद पाठकीय विरेचन को रोक नहीं पाती । यदि विरेचन को न भी माने तो भी मनोविज्ञान में व्यकितत्व विकास के सम्बन्ध में क्षतिपूर्ति का नियम है । उस नियम कें अनुसार यह माना जा सकता है कि यदि पाठक किसी कहानी के पात्र विषेश में अपने ही भीतर के चेतन-अचेतन सुख , घृणा , जीत या आवेष को खोज या पा लेता है तो वह भावनात्मक षार्ट-सर्किट का षिकार होकर षान्त हो सकता है-अपना गुस्सा या आवेष खो सकता है । अपराध कहानी के नायक सचिन की असफलता, घृणा,विवषता अपराध-तंत्र के भयावह चेहरे को पाठकों में मोहभंग के स्तर तक बेनकाब तो करती ही है ,सचिन और संघमित्रा की क्रानितधर्मी मृत्युपर्यन्त चलने वाली आत्महंता आस्था 'अपराध कहानी के रचनात्मक आवेष को विरेचित नहीं होने देती । इस कहानी के पष्चात संजीव अपनी परवर्ती कहानियों में मानवीय संवेदनाओं एवं व्यवस्था-

बोध की ऋजु किन्तु महाकाव्यात्मक प्रस्तुति की ओर बढ़ गये हैं । संजीव की दूसरी कहानियों की ताकत
उनकी परिकल्पनात्मक सम्पूर्णता और अपराध की क्रौंचबध वाली संवेदना, पीड़ा और करुणा के निर्बन्ध सृजनात्मक विस्तार में है । इसमें सन्देह नहीं कि जिस दौर में प्रायोजित यथार्थवादी कहानियों की भीड़ ने हिन्दी पाठकों से कहानियां पढ़ने की सारी उत्सुकता ही छीन ली ,संजीव ने कैसे अपने कहानियों के प्रति

पाठकीय जिज्ञासा को बचाये रखा-यह उनके कहानीकार की षकित को ही प्रमाणित करता है । फिर भी यदि मुझसे पूछा जाये तो मै कहानीकार संजीव को उनकें उस सृजनात्मक संस्कार या अतीत से मुक्त देखना चाहूंगा जिसे मैं संजीववन कहना चाहता हूं-कुछ वैसे ही जैसे अपनी 'वापसी,'पिषाच और'बाढ़ जैसी कहानियोंं में अपनी क्थात्मक आदतों का अतिक्रमण कर इन कहानियों को उनकी पूर्ण स्वाभाविक परिणति में सृजित कर सके है। संजीवपन से मुकित का यह तात्पर्य बिल्कुल नहीं कि संजीव का कहानीकार अपनी मिषनरी सृजनषीलता से हट जाये । यही वह उनकी ताकत है जिसके बल पर प्रेमचन्द अपना विपुल कथा-संसार रच सके थे । उनका भी अधिकांष कथात्मक प्रति-संसार अपने समय और यथार्थ के समानान्तर प्रेमचन्द की तरह ही साहितियक हस्तक्षेप कें रूप में सृजित है ।

      इसी तरह उदयप्रकाष के तिरिछ कहानी की ताकत इसमें है कि वह मानवीय सम्बन्ध , सहयोग और सहानुभूति के प्रति सहज सामान्य विष्वास को मानवीय आत्मकेनिद्रकता,असुरक्षाबोध तथा स्वार्थजन्य निर्मम क्रूरता के पत्थर मार-मारकर क्षत-विक्षत कर देती है ।

      हिन्दी कहानी का सामान्य वर्तमान और अतीत इन कहानियों के स्वरूप,उपलबिध और यथार्थ से बहुत अलग नहीं है । कहानी अपनी विधात्मक परिकल्पना में ही मानवजाति की दीर्घ कथात्म्क रूढि़ का परिणाम है ।बहुत दिनों तक मानव-जाति के लिये वह थियेटर,फिल्म,रेडियो-टी0वी0 सब कुछ रही है ।कुछ कहानीकार कहानी के असितत्व और सार्थकता की लड़ार्इ को प्रतिस्पद्र्धा के माध्यम से जीतने के भ्रम में हैं और सोचते हैं कि षब्दों की रील चलाकर वे फिल्मों को मात दे देंगे । यदि वे ऐसा करते हैं तो दृष्य माध्यमां की सजीवता से र्इश्र्या तो कर ही रहे हैं , बिल्कुल दूसरी विधा की मौलिक विषेशताओं को कहानी से मांगने का अनुचित प्रयास भी कर रहे है ; जबकि इसे पूरक सहअसितत्व के रूप में विकसित करना चाहिये । इस विचार और विष्लेशण के साथ कि हम ही हैं जो फिल्म और टी0वी0 सीरियल देखते हैं और हम ही हैं जो कहानी भी पढ़ते हैं । कब कहानी पढ़ें और कब फिल्म देखें-दोनों ही कथा-माध्यमों का अलग-अलग आस्वादन-तंत्र और स्वरूप होना ही चाहिये । उनके महत्व,वैषिश्टय और सार्थकता का अलग व्यकितत्व और पहचान की अलग दिषायें-जो दोनो को ही पूरक सहअसितत्व ,दीर्घजीविता और उत्तरजीविता दे ।



रविवार, 24 फ़रवरी 2013

मार्क्सवाद पर पुनर्विचार-३

(द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर एक पुनर्चिन्तन )


हर विचारधारा की अपनी आधार संकल्पनाएँ और पारिभाषिकी होती है जिसे कोई भी विचारक अपनी विचारधारात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप ही विकसित करता है या फिर प्रायः अपनी पूर्ववर्ती विचार-परंपरा से चुनता है .ये अवधारणाएँ जिनका कोई भी विचारक या दार्शनिक साक्षात्कार करता है  या फिर चुनता ही है -उसकी विचारधारा की अभिव्यक्ति और उददेश्य का माध्यम होती हैं .मार्क्सवाद में ही देखें तो मार्क्स नें विकास के इतिहास को व्याख्यायित करने  तथा अपनी विचारधारा में भविष्य के लक्ष्य साम्यवादी  क्रांति की सुनिश्चितता प्रतिपादित करने के लिए हीगेल से अपनी प्रसिद्द स्थापना द्वन्द्वात्मक भोतिक्वाद के सूत्र लिए थे -यह सूत्र वाद-प्रतिवाद और संवाद के माध्यम से  मानव-विकास की भविष्योन्मुख गतिशीलता की व्याख्या करता है .हीगेल नें यह स्थापना ज्ञानात्मक विकास के लिए दी थी जिसे मार्क्स ने सभ्यता के भौतिक विकास की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया .यह सूत्र योरोपीय समाजो के मानव स्वभाव की मनोवैज्ञानिक व्याख्या भी करता है .इसमें उनका परम्पराओं के प्रति संरक्षणवादी-रुढ़िवादी दृष्टिकोण तथा भविष्य निर्माण के प्रति साहसिक जोखिम के साथ भविष्य की ओर सभ्यतागत  यात्रा  की सांस्कृतिक अभिवृत्ति भी प्रत्यायित हुई है .
इसमें संदेह नहीं की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद साम्यवादी क्रान्ति की सुनिश्चितता को स्थापित करने वाला सर्वाधिक सशक्त दार्शनिक उपकरण था .
                लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान तथा ज्ञान की अन्य शाखाओं के विकास के बाद भी क्या मानव-विकास को समझाने के लिए सिर्फ इसी सूत्र पर ही निर्भर रहा जा सकता है.हमें मानव-सभ्यता के विकास को ज्ञान के सूचनात्मक विकास के रूप में भी देखना चाहिए और यथास्थितिवादी आलस्य तथा सामूहिकता की अनुकरणात्मक जड़ता और सापेक्षता में विकसित होने के कुण्ठित कर देने वाले सामाजिक दबाव की भूमिका को भी समझना चाहिए .मानव की विकास-विरोधी जड़ता के पीछे उसका वर्ग-स्वार्थ भी हो सकता है-मनुष्य-के स्वभाव को समझने की दिशा में मार्क्स का यह अवदान मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पर्यावरण और पारिस्थितिकी के मानव स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन का ही एक हिस्सा है .मनुष्य के संसाधनों और उसके आर्थिक व्यव्हार का उसके वर्ग-चरित्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अधूरे वृत्त को पूरा करती है .
                     मानव-विकास की निरन्तरता और सोद्देश्य गतिशीलता की दृष्टि से मानव-जाति की अनुकरणात्मक जड़ता और उसके पीदियों में विभाजित अभिभावक प्रशिक्षण-तन्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है ..यह प्रशिक्षण-तंत्र ही जातीय एवं सांस्कृतिक मानसिक एवं व्यावहारिकअधिरचानाओं को जन्म देती है .  इन्हें हम मानव-व्यव्हार के स्थायित्व के तंत्र भी कह सकते हैं .इनमें मानव-व्यव्हार के नैतिक मूल्य भी शामिल हैं .जिनका विकास कृषि-आधारित पूंजीवाद यानि सामन्तवाद नें किया है .विकास की दृष्टि से समक्न्त्वाद यद्यपि एक पिछड़ी आर्थिक व्यवस्था है ,लेकिन भूमि जैसी स्थाई पूंजी के आनुवांशिक स्वामित्व  सम्बन्धी नियमों और वर्जना-मूल्यों के विकास की दृष्टि से कृषि सभ्यता पर आधारित पूंजीवाद सांस्कृतिक स्थायित्व के रूप में महत्वपूर्ण व्यवस्थापन पद्धति देता है .पारिवारिक संवेदना और आत्मीयता का धार्मिक-साहित्यिक भाव-तंत्र इसी काल  की मूल्य-निर्मितियों पर आधारित है .
                      मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के वाद के विरुद्ध उससे अगले चरण प्रतिवाद को एक सामाजिक-संगठित प्रतिरोध की मनोवृत्ति  के रूप में देखें तो क्या द्वंद्वात्मक विकास इतनी सीधी-सपाट दार्शनिक ढंग की आसानी से समझ ली जाने वाली प्रक्रिया है ? यदि परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी सीधी-सपाट रहती तो फिर द्वंद्व ही किस बात का रहता .सच तो यह है की मनुष्य के सभ्यता की विकास-यात्रा उसके अनुभव जगत जो कि सूचनाओं के विराट स्मृति-तंत्र के रूप में है -उसके सृजनात्मक विकास और उपयोग से जुडी है .यह स्मृति-तन्त्र संरक्षण की विविध प्रविधियों के कारण घटने के स्थान पर निरन्तर बढ़ता ही जाता है .यह समझदारी की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक अंतहीन प्रक्रिया के रूप में है .क्योंकि मामला मानव-जाति के एक हिस्से को वर्ग-स्वार्थ के कारण संगठित रूप में  उपयोग या शोषण की भूमिका में रखने का है .यह द्वन्द्ववाद हिंसक क्रान्ति और प्रतिरोध के स्तर तक भी चला जाता है .यह सामाजिक शक्तियों और सत्ता की विकासोन्मुख रस्सा-कशी है .यह एक भीड़ के बीच भीड़ में चलने और रास्ता बनाने जैसा है .मार्क्स का यह सिद्धान्त विकास की समझ का अनावश्यक सरलीकरण करता है .मार्क्स जैसे सजग विचारक नें इसका उपयोग साम्यवाद की क्रन्तिकारी सम्भाव्यता,उसके सुनिश्चित भविष्य की अपरिहार्यता प्रस्तावित करने के लिए किया था.इसमें आज भी सामाजिक गतिशीलता के कुछ सकारात्मक सन्देश अवशिष्ट हैं .वह यह कि चीजें इतनी आसान नहीं हैं.हमें निरस्त करनें और स्वीकार करने की जटिल सामाजिक मानसिक प्रक्रिया से अनवरत गुजरना होगा.वाद को नए ज्ञानात्मक सृजन  और प्रतिवाद को रुढ़िवादी प्रतिरोध तथा सम्वाद को उदार विकासवाद के राजनीतिक-सामाजिक व्यव्हार के रूप में देखा तो जा सकता है लेकिन एक दार्शनिक सूत्रीकरण होने के कारण सदैव ही सांप वहां नहीं मिलेगा जहाँ होने की घोषणा की जाएगी.समझदारी की एक सूत्रबद्ध प्रक्रिया में होने के कारण ज्ञानात्मक विकास अप्रत्याशित होने के बावजूद व्याख्या के लिए एक श्रृंखला-बद्ध पद्धति की रचना करता है .निर्माण और सृजन के भटकावों के बावजूद नीव से लेकर शिखर तक हम एक पूर्वापर प्रक्रिया के परिणाम होंगे .काल का परम्परागत भारतीय प्रतीक सर्प ही है .अज्ञात और अन्वेषण के विचलन या भटकाव की गतिकी को जोड़ दें तो सर्पिल गति ही सभ्यता के विकास की बनती है ,जैसा कि अपने आशयों में मार्क्सवाद भी है .

मार्क्सवाद पर पुनर्विचार-२

       राजनीतिक तंत्र और आर्थिक तंत्र  दोनों ही मनुष्य के सामाजिक-सामूहिक -संगठित तथा बहिर्मुखी  जीवन-व्यापार  और व्यव्हार हैं क्योंकि राज्य की सम्प्रभुता उसके  भौगोलिक सीमांकन से भी प्रभावित और सीमित  होती है ,इसलिए संगठित क्षेत्र की सृजनशीलता के लिए आर्थिक क्षेत्र ही  अब भी संभावनापूर्ण है .
सामूहिक और संगठित सृजनशीलता की दृष्टि से राजनीतिक व्यवस्थाओं की संभावनाएं  कुण्ठित हुई हैं .लेकिन आर्थिक संगठनों की सृजनशीलता की संभावनाएं अब भी बची हुई हैं..वैश्वीकरण ने राज्यों को सहचर और सहगामी बनाने के लिए मजबूर किया है .सच तो यह है कि प्रसार या विस्तार की दृष्टि से राजनीतिक व्यव्हार का ऐतिहासिक दौर अब समाप्त हो चूका है .संगठित मानव-शक्ति की दृष्टि से यह समय आर्थिक सेनाओं की विश्व-विजय का है .
          सत्ता का केन्द्र आर्थिक संगठनों की ओर चला गया है .बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शक्ति और सत्ता के नए केंद्र हैं .मार्क्स के वर्ग की अवधारणा के स्थान पर आर्थिक संगठनों को रखकर ही हम इन संगठनो के बाहर की मानव-जनसँख्या में नए  विश्व के लिए सर्वहारा की खोज करा सकते हैं .कहने का तात्पर्य यह है कि स्थिर आर्थिक समाजों के सर्वहारा गिने-चुने टापुओं में ही कैद रहा गए हैं .नए  ज़माने के सर्वहाराओं की खोज इन आर्थिक संगठनो से बहिष्कृत हाशिए की जनसँख्या में ही करनी होगी .

        मेरी दृष्टि में राजनीतिक सत्ता को सदैव ही साम्यवादी होना चाहिए और आर्थिक व्यवस्था को पूंजीवादी .सिर्फ ऐसा करना ही एक संतुलित समाज को जन्म दे सकेगा .एक आदर्श चरवाहा अपनी भेड़ों को चराने की स्वतंत्रता तो देता है ,लेकिन ऐसा नहीं करता कि भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर ही बैठ जाए या फिर  उनकी घास पर और उन्हें चरने ही न दे .सर्जना ही नदी के प्रवाह की मुख्या दिशा है ,जबकि वर्जना की भूमिका अगल-बगल के
कगारों की ही है .क्योंकि पूंजी-निर्माण भी मनुष्य का एक सृजनात्मक व्यव्हार है ,इस लिए उसे उल्लास और स्वतंत्रता कजी दिशा के रूप में ही लेना चाहिए ,उसे अविश्वास और असुरक्षा के नकारात्मक विधि-निषेधों में कास-बांधकर अवरुद्ध करना मुझे  आत्मघाती कदम लगता है .क्योंकि पूंजी का सृजन भी एक आह्लादक मानव-व्यवहार है इसलिए इसे स्वस्थ मनुष्यों के  लिए छोड़ देना चाहिए .इसलिए भी कि पूंजीवाद निरंकुश और निर्बाध स्वतंत्रता प्रदान करने वाली व्यवस्था है,वह मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण संभावनाओं को अभिव्यक्त करने का सामाजिक अवसर प्रदान करती है -इसलिए भी सिद्धान्ततः इसे बहुत गलत तो नहीं ठहराया जा सकता ,लेकिन यह भी सच है की इसका गुण ही इसका दोष है .-यह सामूहिकता के पर्यावरण का उल्लंघन सिखाती है .इसलिए सिर्फ साम्यवादी सत्ता ही पूंजीवादी समाज की दायित्वहीनता  और महात्वाकांक्षी संवेदनहीनता के दोषों को दूर कर सकती है .यह एक विरोधाभासी प्रतीति वाली बात है ,लेकिन मानसिक विकलांगों,अयोग्यों  तथा कुंठितों  की सुरक्षा के लिए शासन का साम्यवादी होना ही उचित है .इसके लिए एक आंशिक या सह - साम्यवादी व्यवस्था की परिकल्पना भी की जा सकती है .
     

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

प्रेम भारद्वाज के लिए


आँखें बाहर का देखने के लिए ही बनी हैं

जो आँखों के भीतर ही बस गया हो 

उसे कैसे देख पाएंगी वे

जीने के लिए ही दिए गए हैं

अपने अस्तित्व में लौटना और जीना चाहता हूँ मैं 
मैं किसी से क्यों लड़ रहा हूँ 
कौन है मेरा दुश्मन 
किसके विरुद्ध जी रहा हूँ मैं 
किसके लिए जी रहा हूँ 
भाग रहा हूँ किसको छोड़कर ....

अपने अस्तित्व में लौटना चाहता हूँ मैं 
जीना चाहता हूँ अपने अस्तित्व को 
जानता हूँ 
अपने अस्तित्व को जीना 
आसान नहीं है 
अपनी उपस्थिति को सबकी उपस्थिति के साथ 
अपने होने को सबके होने के साथ 
जनता हूँ की मेरा होना सिर्फ मेरा ही होना नहीं है 
मैं एक सामूहिक उपस्थिति का हिस्सा हूँ ....

अपने अस्तित्व को जीना चाहता हूँ मैं 
मैं जनता हूँ मेरा अस्तित्व सिर्फ मेरा अस्तित्व ही नहीं है 
मैं असंख्य परमाणुओं की युगलबंदी हूँ
असंख्य आवाजों का समवेत गान हूँ 

अपने अस्तित्व को जीना चाहता हूँ मैं 
मेरा अस्तित्व 
जिसमे मेरा सूरज भी है 
और मेरी धरती भी 
मेरी चिड़ियाएँ ...मेरी गाय...मेरा कुत्ता 
मेरे वन-प्रान्तर....मेरे पहाड़ 
मेरी नदियाँ और मेरे रास्ते हैं 
असंख्य पेड़ों से गुजरते हुए 
उनसे मैं करना चाहता हूँ हाथ हिला-हिला कर संवाद 
कि अपने अस्तित्व को समूचे अंतरिक्ष 
समूचे ब्रह्माण्ड के साथ जीना चाहता हूँ मैं 
लौटना चाहता हूँ 
अपने बंधुओं के पास 

जो मुझे जीने के लिए ही दिए गए हैं

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

सभ्यता का प्रवाह : मुद्रा और ईश्वर

विचारधाराओं की जड़ता से अलग यदि मानव-सभ्यता के प्रवाह और उसकी दशा-दिशा को समझाने की कोशिश करें.तो मानवीय व्यवस्था और व्यव्हार की दो बड़ी संरचनाएं सामने आती है .एक है मानवीय व्यव्हार के मूल्य दूसरा है आर्थिक व्यव्हार के मूल्य .व्यव्हार की ये दोनों ही पद्धतियाँ ज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक अमूर्त नियमों,प्रतीकों और अवधारणाओं  से संचालित होती हैं .मुद्रा अर्थ जगत का केन्द्रीय प्रतीक है तो ईश्वर धर्म-जगत का .एक समानांतर मनोलोक का तन्त्र उसके वास्तविक और मानसिक जगत को एक सूत्र में पिरोता है .इसमें एक संपत्ति -जगत का प्रतीक है तो दूसरा मानवीय अस्तित्व की अर्थवत्ता का .अपने व्यव्हार के अनुसार ही मुद्रा एक मूर्त प्रतीक है और ईश्वर एक अमूर्त प्रतीक.दोनों ही उसकी सभ्यता के महत्वपूर्ण नियामक सत्ताएँ हैं  .इसलिए मुझे लगता है की ईश्वर उसके ज्ञान-लोक की महत्वपूर्ण उपस्थिति रहा  है .चाहे वह अपने से इतर के मानवीय ससार की छाया या प्रतिनिधि उपस्थिति के रूप में ही क्यों न हो.समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो ईश्वर के प्रति सम्मान और शेष समाज के प्रति सम्मान में कोई विशेष अन्तर नहीं रहा है.दोनों ही सामूहिक मानव- व्यव्हार की एक ही परिणामी एकता तक पहुंचतेऔर पहुंचाते रहे हैं.दूसरी ओर अर्थ-जगत की आर्थिक सुरक्षा संपत्ति के ऐश्वर्य और प्रभुता को रचती रही है..संपत्ति के विकास के सुरक्षा-तन्त्र नें धरती पर के ईश्वरों को रचा है तो ईश्वर के प्रतीकों के इर्द-गिर्द रहने वाले ईश्वरत्व के दावेदार जातीय प्रतीकों को भी .इन सभी को कृषक सभ्यता नें अपने स्थाई उत्पादन तंत्र के बल पर आनुवांशिक निरंतरता की आधार-भूमि पर रचा था .
                आधुनिक सभ्यता नें व्यापक शिक्षा-व्यवस्था के बल पर आनुवांशिक विशेषाधिकार वाली जातीय प्रशिक्षण-तन्त्र को अतिक्रमित किया है .उसके नियतिवादी स्थायित्व में व्यतिक्रम पैदा किया है .यह एक सृजनशील प्रतिस्पर्धा वाला अस्थिर एवं तनावपूर्ण समाज है .उत्तर-आधुनिक विखंडन वादियों को मूल्यात्मक उच्छेद की इस पारिस्थितकी पर भी विचार करना चाहिए .सभ्यतागत स्थायित्व का यह तन्त्र
जो कृषि-सभ्यता की लगभग अपरिवर्तनीय और टिकाऊ उत्पादन-व्यवस्था और उस प्रक्रिया में उपजे मानवीय संबंधों  पर आधारित था ,उसके परम्परागत लगभग सभी मूल्य-व्यवस्था की रचना करते है ..लेकिन यहीं उसके व्यवस्थागत व्यव्हार का दूसरा-पक्ष भी है -स्थाई उतपादन संबंधों से दूरवर्ती अप्रत्यक्ष  तथा गतिशील अर्थ-तन्त्र नें  धन-संग्रह के रूप में जिस बाजार और महाबाजार(नगर) व्यवस्था का निर्माण किया है -वह उसी मूल्य-व्यवस्था का समानांतर प्रति-रूप है .ज्ञान-तन्त्र के रूप में  ये दोनों एक ही प्रभुत्व-तन्त्र के दो रूपों की रचना करते है .
                  पूंजी धरती पर एक सुरक्षित स्वर्ग का निर्माण कराती है .मुद्रा का एक रहस्यमय संसार  उसकी आस्था और विश्वास के उस पर्यावरण को निर्मित करता है,जिसे स्वर्गिक और ईश्वरीय कहा जा सकता है ..इस दृष्टि से देखें तो मुद्रा का अर्थ-ससार और मूल्यों का अर्थ-ससार दोनों ही एक -दुसरे के पूरक और समानांतर ही हैं .इसी लिए दोनों ही समाज में एक -साथ देखे जाते हैं .एक अर्थ-ग्रस्त मानव के लिए दोनों ही रहस्यमय और अविश्वसनीय है .उसे अपना ही भाग्य स्वप्न-सदृश लगता है .वह कृतज्ञ मन से इस रहस्य मय ससार को देखता है .वह श्रद्धा निवेदित करता है .उस ईश्वर के पर्यावरण को जीता है ,जो सब कहीं है .

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

भारतीय आध्यात्मिकता ,ईश्वर और लोकतन्त्र

               ( सत्ता का संस्कृति विमर्श )         


अधिकांश लोग ईश्वर की अवधारणा को सर्वकालिक और सर्वशक्तिमान सत्ता की उपस्थिति के रूप में स्वीकार करते हुए उसके सामाजिक स्रोत,सामाजिक भूमिका और मानवीय परिणामों को अनदेखा करते हैं .वे यह भूल जाते हैं कि भारतियों की अधिकांश सांस्कृतिक अवधारणाओं का विकास एक जाति विशेष ने किया है .अपने पेशेगत कारणों से इस जाति विशेष नें जो अपने लिए भी चरित्र ,नीति और मर्यादाएं निर्धारित की ,वे राजतंत्र व्यवस्था की निष्ठां के कारण ,इस सीमा तक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से हीन विकसित किया गया है कि वह पूरी भारतीय संस्कृति को एक आज्ञाकारी शासित संस्कृति में बदल देता है .
               सबसे पहले तो पुनर्जन्म ,भाग्यवाद और कर्मवाद की अवधारणा के कारण यह राजा को ईश्वर की इच्छा ,प्रारब्ध एवं नियति के अनुसार राजप्रप्ति के रूप में पहले से ही विशिष्ट मानव घोषित करती है .इसमें संदेह नहीं कि इन विश्वासों नें अंतर्समुदायिक विश्वासघात ,नेतृत्व की अराजकता और महत्वकांक्षी प्रतिस्पर्धा को रोका है .दरअसल यह पूरी संस्कृति और धार्मिक आचार-संहिता वंशानुगत उत्तराधिकार को केंद्र में रखकर रची गई थी .इसमें निःसंतान होनें तक कोई भी राजतंत्र कई पीढ़ियों तक चलता रह सकता था .
                यद्यपि कई बार तो मंत्री और सेनापति का पद भी आनुवांशिक था लेकिन राजा को यह अधिकार था की वह जाती-विशेष से ही किसी अन्य योग्य ब्राह्मण को भी मंत्री के रूप में चुन सकता था .यद्यपि साचा तो यही है कि हर परिवार के अपने वंशानुगत पुरोहित परिवार होते थे .उसी तरह मंत्री के परिवार से ही कोई मंत्री बन सकता था .इस व्यावस्था नें मंत्री बनाने की कूटनीतिक साज़िशों और प्रतिस्पर्धा को रोका .
                   दरअसल यह एक स्थाई कृषि-आधारित समाज की सांस्कृतिक व्यवस्था थी ,जिसमें किसान का कृषि -क्षेत्र और उपज सामर्थ्य तक सुनिश्चितथी .कृषि-आधारित स्थाई संस्कृति ने ये सारे सामाजिक-सांस्कृतिक चरित्र और भूमिकाएँ निर्धारित की थीं .इसी के अनुरूप जातीय चरित्र और उसका संस्कारगत प्रशिक्षण -तंत्र भी विकसित किया था .
                      ब्राह्मण-वर्ण का जातीय चरित्र उसके राजनीतिक उसके राजनीतिक व्यवस्था से महत्वाकांक्षा -शुन्य रहने की मांग करता था .समाज में राजा के बाद की पद व्यवस्था के कारण यह जाती जिस धर्मं-व्यवस्था और संस्कृति की अचेतन प्रस्तावना कराती है वह किसी और के नेतृत्व का समर्थनकारी व्यक्तित्व रचता है .वह शासक को सम्मान से देखने की संस्कृति का प्रस्तावक है .आपनी इस मानसिक व्यवस्था के कारण ब्राह्मण-जाति और उसके द्वारा प्रस्तावित संस्कृति किसी भी शासक के लिए अनुकूल और समर्थन की भूमिका में रही है .
                      क्योंकि भारतीयों की अधिकांश धार्मिकता और संस्कृति के केंद्र में ब्राह्मण-दृष्टि और मानसिकता की ही केन्द्रीय भूमिका है ,इस लिए इनकी मानसिकता के अनुरूप भारतीयों का धर्मं और ईश्वर भी शासक-समर्थक मानसिकता को पोषित करता है .वह दरअसल राजतन्त्र और वंशानुगत उत्तराधिकार की संरक्षक अवधारणा और विश्वास के तन्त्र के रूप में है .
                      इसका नियतिवाद क्योंकि कृषि -सभ्यता का स्थायित्व वाद ही है ,इसी लिए इसकी ईश्वर और धर्मं सम्बन्धी सभी सांस्कृतिक अवधारणायें यथास्थितिवाद की पोषक तथा बेहतर नेतृत्व की दृष्टि से प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की निषेधी हैं .यह संस्कृति भारतीयों में व्यापक लोकतांत्रिक उदासीनता को जन्मा देती है .इसका दूसरा दुष्परिणाम भारतीय राजनीति में परिवारवाद की स्वीकृति और व्यापक जनसमर्थन है .इससे भारत में लोकतान्त्रिक सत्ता कुछ ही परिवारों में सिमट कर रह गई है .अच्छा या बुरा जो कुछ भी हो रहा है ,उन्ही के माध्यम से हो रहा है .क्योंकि भारतीयों की दार्शनिक,धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणाएं बहुत कुछ चारण जाती की भूमिका वाली पुरोहित जाति नें रची है,इसलिए यह शासक -वर्ग को चुनौतियों से परे  का  सत्ता का स्वर्ग -लोक प्रदान करता है .

सोमवार, 28 जनवरी 2013

दो कविताएं

एक ही पूंजी समय 

एक

सब एक ही तरह से सोच रहे हैं
सभी सहमत हैं एक ही पसंद के  साथ
एक ही रूचि और मानसिकता के साथ
समय की एक ही बस में बैठे -घूरते
एक ही समूह के बलात्कारियों की तरह .....

सब एक ही तरह से सोच रहे हैं
नापसंद कर रहे हैं-
निरस्त और व्यर्थ घोषित कर रहे हैं
वे  पूरे आवेश के साथ मंच को ही
पूरी दुनिया घोषित कर रहे हैं

वे आश्वस्त हैं कि
एक बर्बर महत्वकांक्षी यात्रा के
शानदार अन्त के साथ
उन्होंने हथिया लिया है समय ....

वे एक पूर्वनिर्मित
और निर्धारित समूह के आतंक के साथ
गुजरते समय का सच घोषित करना चाहते हैं
विवेक की परीक्षा से बचने की
अपनी साजिशी कोशिश  में
रचना चाहते हैं
एक बन्धक विवेक का इतिहास

वे नहीं चाहते कि
कोई अकेला विवेक
कभी स्वतः स्फूर्त और अहिंसक विवेक में बदले


एक ही पूंजी
एक ही पूंजी-समूह
रच रहा है एक ही रचना-समय .....


वे समय के अपने बिवेक से
डरते हुए रचना चाहते हैं
एक सुरक्षित और सामूहिक
प्रायोजित रचना समय

दो

सृजन -नीति 


इसी प्रतिरोध में मैं हूँ
हूँ मैं अपने अस्वीकार में और घृणा में
और अनुपस्थितियों में
मैं रच रहा हूँ
अपना विस्थपित समय
तथाकथित स्थापितों के
नापसन्द वर्चस्व के विरुद्ध ...

वे जो  बाजार में है
और बाजार है

मैं जानता हूँ कि
मैं उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता
और यह कि उनके सामने
आत्म-समर्पण न करना
आत्महत्या करना है
या फिर मार दिए जाने की सुनिश्चितता
फिर भी पुरे होशोहवास के साथ
मैं उनको चिढाना चाहता हूँ एक सृजनात्मक मजाक की
उपस्थिति के साथ

सिर्फ इतना चाहता हूँ मैं कि
वे  मुझे देखकर चौंक जाएँ
भक सफ़ेद हो जाएँ उनका चेहरा
अपने होने के अनैतिकताबोध से
हे मुर्ख ,डकैत और कायर
सामूहिक जीवन-समय

मैं सिर्फ इतना भी कर सकूँ तो
गर्व से चला जाऊंगा
यह दुनिया छोड़कर....