रविवार, 13 जनवरी 2013

संस्कृतियो का वैश्विक संघर्ष और सभ्यता का पुनः पाठ

                                                    Ramprakash Kushwaha
  विकास और इतिहास की पृष्ठभूमि सम्बन्धी भिन्नता के कारण ,भिन्न-भिन्न जीवन-पद्धति और मानव-व्यवहार को प्रस्तावित करती हुर्इ विव की हर संस्कृति जीवन जीने का एक भिन्न (सामूहिक) पाठ प्रस्तुत करती है । जीवन शैली की भिन्नता जहां एक ओर संस्कृति विशेष की विशिष्टता का आधार बनती है ; वहीं अलग भौगोलिक अंचल और सामुदायिक मूल की सांस्कृतिक आदिमताएं मानव-विश्व को अलग-अलग समुदायों में भी बांटती हैं ।  दूसरी ओर सांस्कृतिक एकता अलग-अलग नस्लों के लोगों को एक सामाजिक-सांस्कृतिक र्इकार्इ के रूप में पुनसर्ंयोजित भी करती हैं । इन दोनों प्रक्रियाओं के कारण ही एक मानव-विश्व के निर्माण की दृषिट से संस्कृतियाें को सकारात्मक और नकारात्मक दोहरी प्रकार्यात्मक भूमिका में देखा जा सकता है । अपने प्रभावितों और अनुयायियों की संख्या अथवा जनसंख्यात्मक विस्तार तथा मानव-व्यवहार के प्रतिमानीकरण की दृषिट से देखने पर हर सांस्कृतिक समुदाय एक भिन्न ऐतिहासिक संक्रमण-यात्रा है ।  इस दृषिट से सारी संस्कृतियां मानव-व्यवहार के आदर्श प्रतिमान की खोज एवं प्रभाव का परिणाम हैं । वे जीवन-पद्धति का सरलीकरण करती हैं ; एक सामान्य एवं सर्वमान्य चरित्र-सृषिट को प्रस्तावित करती हैं  और मनोवैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो वे समुदाय-विशेष के सभी सदस्यों को एक समान प्रत्यक्षीकरण हेतु ऐसे प्रभावी एवं मार्मिक व्यकितत्वों की कथात्मक पुनर्पस्तुति करती हैं , जो विभिन्न अवसरों पर उनके संवेदनात्मक व्यवहार को एक पद्धति दे सके ।
            सही अथोर्ंं में संस्कृति मनुष्य की परम्रागत व्यवहार-पद्धति ही है । एक ऐसा व्यवहार जो उसके निजी विवेक से कम लेकिन उसे उत्तराधिकार में मिले सामाजिक व्यवहार से अधिक संचालित और सम्बनिधत होता है । इसप्रकार कहीं न कहीं हर संस्कृति वर्तमान मानवीय विवेक का शैक्षणिक अतीतीकरण ही है अथवा दूसरे रूप में वह अतीत की स्मृतियों और मानवीय विवेक का वर्तमानीकरण है । इसप्रकार संस्कृति उत्तराधिकार में मिली हुर्इ सभ्यता है । यह अनुभव और अबादतों के रूप में बचा हुआ पिछली पीढ़ी का वर्तमान है । हमारी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक आदतें ही हमारी सभ्यता का अलग प्रारूप रचती हैं । हमारी सभ्यता का मूल उत्स हमारी अचेतन ऐतिहासिक-सामाजिक ग्रनिथयों में है । हम मूलत: अतीतजीवी हैं । हमारा वर्तमान भी अतीत की पद्धतिगत उपसिथति हैं । हम जब नया इतिहास बना रहे होते हैं तब भी मानव-इतिहास की पुरानी आदतों को ही दुहरा रहे होते हैं । हमारा स्वयं को बदल पाना इतना आसान नहीं होगा । कर्इ बार हम पुन: उसी दुनिया में अपने पड़ोसियों द्वारा खींच लिए जाते हैं जिसे अपनी दृषिट मेंं पूरी तरह व्यर्थ जानकर छोड़नें की तैयारी कर रहे होते हैं हम । कर्इ बार न बदल पाने के कारण तकनीकी और यानित्रक भी होते हैं । उदाहरण के लिए भाषा-सम्प्रेषण के लिए एक अलग संसार ही रचती है । यह संसार एक काल-निरपेक्ष उपसिथति का होता है । भाषा कायान्तरण और कालान्तरण दोनों का ही माध्यम है । भाषा की यह प्रकृति ही मानवीय स्मृति और साहित्य दोनो को ही अपरिवर्तनीय बना देती है । सिद्धान्तत: वह अपनी साहितियक स्मृति को तो नहीं बदल सकता ,लेकिन समझ बदल सकता है ।
       सांस्कृतिक प्रभाव के कारण ही हमारी सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा सुदूर अतीत के मनुष्यों के अनुभवों ,विचारो और कल्पनाओं पर आधारित और उससे सामूहिक अचेतन प्रभावों के रूप में सम्बधित है।  अतीत के अविस्मरणीय मनुष्य और उनकी भोली अवधारणाएं अब भी हमारे मानसिक पर्यावरण का निर्माण करती हुर्इ वर्तमान का व्यवहार रच रही हैं । अतीत आज भी हमारी सामूहिक और सांंस्कृतिक आदतों के रूप में जिन्दा है । वह हमारी व्यवस्था-परिकल्पना को प्रभावित करने वाला सामूहिक अचेतन बन गया है ।
        दरअसल ,सामूहिक मानवीय अनुभव एवं निर्णय भी संज्ञान के स्तर पर एक बार घटित हो जाने के बाद ,प्रकृति की तरह ही मानव-जीवन की नियति के निर्धारक बन जाते हैं । वे मनुष्य की सामूहिक स्मृति के माध्यम से रुचि के नियामक बन जाते हैं । उन जातीय ग्रनिथयों ,मनोवृत्तियों एवं आदतों का निर्माण करते हैं ; जिन्हें सामूहिक अचेतन ही कहा जा सकता है । इनसे प्रेरित और प्रभावित होकर मानव-जीवन के मानसिक, सामाजिक,सांस्कृतिक ,राजनीतिक और आर्थिक आयाम अन्तत जैविक पर्यावरण में भी बदल जाते हैं । एक समय के बाद सामाजिक स्वीकृतियां ,व्यवहार और कार्य मनुष्य के विचार को ही पर्यावरण में बदल देते हैं । आदिकाल की जंगलों से भरी धरती का वर्तमान में बागों और खेतों में बदल जाना ,कृषि-कार्य करने के मनुष्य के मनुष्य के विचार का ही दीर्घकालीन परिणाम है ,जिसने वानस्पतिक पर्यावरण का पूरी तरह रूपान्तरण कर दिया है ।
            मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिल से जटिलतर होते जा रहे विकास-क्रम नें मानव-जीवन के पर्यावरण में मानवीय सृषिट को भी शामिल कर दिया है । मनुष्य जाति द्वारा अर्जित ज्ञान-विज्ञान ,निर्मित भव्य भवन ,सड़कें ,विधुत-व्यवस्था, कारखानें ,बांध ,पुल ,शिक्षा-व्यवस्था, ग्रन्थ, साहित्य, संगीत, फिल्में ,टी.वी., नगर , मुद्रा और राज्य- वयवस्था आदि सभी मानव-निर्मित पर्यावरण ही हैं । आदिम मनुष्य नें जब प्राकृतिक गुफाओं की तलाश छोड़कर पहली बार घर बनाया होगा  या एसिकमों नें ध्रुवीय भालू का अनुसरण करते हुए इग्लू के पूर्व रूप का निर्माण किया होगा या फिर किसी मृत पशु के चर्म में घुसकर बर्फीली हवाओं को पछाड़ा होगा तो उसका यह कार्य पर्यावरण निर्माण की दिशा में ही बढ़ा हुआ कदम था । आज भी जब अपराध-नियन्त्रण के लिए वह कोर्इ नया कानून बनाता है तो उसके इस प्रयास में भी अपने पर्यावरण (सामाजिक) को ही बेहतर बनाने की सामूहिक इच्छा छिपी रहती है । इस दीर्घकालीन विकास-क्रम में गम्भीर अवरोध तब उत्पन्न हुए ,जब संस्कृति को अतीत के मानवीय सृजन के रूप में न देखकर उसे जातीय और धार्मिक जड़ता यानि अपरिवर्तनीय श्रेष्ठता एवं पूर्णता के रूप में देखा जाने लगा ।
          किसी सांस्कृतिक समुदाय में प्रचारित चरित्र-विशेष की कथात्मक प्रस्तुति ( चाहे वह मिथकीय हो या धार्मिक ) ही पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक उत्तरजीविता को सम्भव बनाती है । आइन्स्टीन की यह अवधारणा कि काल  भी एक आयाम है और यह दुनिया है ही नहीं बलिक निरन्तर हो भी रही है तथा असितत्ववादियों की दृषिट में जीवन का गुजरते क्षणों में निरन्तर होना की तरह संस्कृति-विशेष भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच सूचनाओं ,कथाओं और विष्वासों के हस्तान्तरण के साथ समुदाय विशेष के सदस्यों के बीच बनी रहती है । इसप्रकार सांस्कृतिक नैरन्तर्य समाज में निरन्तर चलने वाले उस प्रशिक्षण का परिणाम है ,जो संस्कृति विशेष का सदस्य अभिभावक के रूप में अपनी सन्तान को देता है । फ्रायड के दमित अचेतन से अलग यह वह अचेतन संक्रमण है जो व्यकित को उसके बचपन में ही उसके अपरिपक्व और अप्रशिक्षित मसितष्क को प्रशिक्षण के रूप में सौंप दिया गया होता है । इस तरह संस्कृति-निर्माण एक जातीय सामाजिक परियोजना की तरह निरन्तर चलते रहने वाली प्रक्रिया है । इसलिए संस्कृति का उत्तर-आधुनिक पाठ यहीं से आरम्भ होता है कि संस्कृतिकरण ,समकालीन मानव-जाति में चलने वाली अतीतीकरण की प्रक्रिया है। वह एक समान स्मृतियों वाले मनुष्य का वंशानुक्रमिक पुनरूत्पादन है । वह विशेष प्रकार का सूचनात्मक या मसितष्कीय उत्तराधिकार है ।
            मानव-जाति की वैशिवक एकता के विरुद्ध संस्कृति की वर्तमान विरोधी भूमिका को देखते हुए सांस्कृतिक अचेतन से मुक्त एक आधुनिक वैज्ञानिक मनुष्य का निर्माण ,उत्तर-आधुनिक वैशिवक संस्कृति के निर्माण की दिशा में पहता साभ्यतिक कदम होगा । वर्तमान मनुष्य के विवेक के अतीतीकरण की सामाजिक प्रक्रिया को रोकने के लिए एक वैज्ञानिक जेहाद की जरूरत है । वैज्ञानिक जेहाद से मेरा तात्पर्य वैज्ञानिक विचारों और विश्वासों की निर्णायक स्वीकार्यता से है । वैज्ञानिक सूचनाओं नें अनेक प्राचीन विश्वासों की सत्यता पर गम्भीर एवं तथ्यसम्मत प्रश्नचिहन लगाए हैं । उन प्रश्नों एवं तथ्यों से नर्इ पीढ़ी के मनुष्य को वंचित करना यानि आधुनिक सूचनाओं से अपरिचित रखकर नर्इ पीढ़ी का एकल अतीतीकरण करने वाली साम्प्रदायिक शिक्षा को सांस्कृतिक अपराध के रूप में देखे जाने की जरूरत है । दुर्भाग्य से कर्इ देशों की राजनीति सत्ता और शासन सम्बन्धी स्वाथोंं के कारण आधुनिक युग के नवजन्में शिशु का मानसिक या बौद्धिक बधियाकरण यानि उसके कृत्रिम अतीतीकरण पर मौन धारण किए हुए हैं ।    
          सांस्कृतिक अतीतीकरण जिस सामूहिक अवचेतन का निर्माण करता है ,वह सामाजिक प्रशिक्षण की इतनी जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया का परिणाम है कि है कि उसे सिर्फ किसी सम्प्रदाय या संस्कृति-विशेष के अनुयायी के विचार के रूप में ही चिहिनत नहीं किया जा सकता । सांस्कृतिक अतीत एक सर्वग्रासी अचेतन की तरह हमारी सभी संस्थाओं से सम्बनिधत मानवीय व्यवहारों को संचालित-परिचालित कर रहा है । यहा तक कि आदिम कबीलार्इ युग का सांस्कृतिक अचेतन आज भी हमारी राजनैतिक -सामाजिक शकित-परिकल्पना का प्रमुख आधार है । हमारे सभी सामाजिक-आर्थिक राजनैतिक व्यवहार इस दृषिट से अतीतीकरण के शिकार है कि उनके पीछे आदिम मानव जाति के असुरक्षा-बोध ,भय एवं वे सुरक्षात्मक आक्रामकताएं छिपी हुर्इ हैं । उनका वर्तमान में कोर्इ औचित्य नहीं होते हुए भी हम इसलिए उन्हें जिए जा रहे हैं कि हम सांस्कृतिक आदतों के कारण भिन्न तरह से जी ही नहीं सकते । हम नए विश्व को बनाने में इसलिए विफल हैं कि हम नए ढंग से जीने के अयोग्य हैं । हमारेे सत्ता-संघर्ष, पूंजी निर्माण और सामाजिक संगठनजीविता के मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि में आज भी एक असुरक्षित और आक्रामक शिकारी मनुष्य छिपा हुआ है । इसलिए सांस्कृतिक अतीतीकरण से मुकित की सजगता ही मानव-सभ्यता के विकास की भावी दिशा हो सकती है । वैज्ञानिक युग नें वर्तमान सभ्यता को समझने की जो विश्लेषण धर्मी वैचारिक  दृषिट दी है , उसका पर्याप्त बौद्धिक विनिवेश हमारी सभ्यता की विवेकपूर्ण समीक्षा और पुनर्रचना में नहीं हो रहा है । हम आज भी स्ांस्कृतियों पर विचार करते हुए, प्राय: संस्कृति-विशेष में प्रचलित मिथकों ,मानव-व्यवहार के अलग सांस्कृतिक प्रतिमानों  यानि रूढि़यों और रीति-रिवाजों आदि की अनुकरणात्मक जड़ता से आगे संस्कृति-विमर्श को नहीं ले जा पाते । हमारी साभ्यतिक समस्याओं का प्रमुख आधार सांस्कृतिक अचेतन ही है ।
          वैशिवक स्तर पर देखने पर मृत्यु-बोध की भिन्नता के कारण जीवन और जगत-बोध के भी दो भिन्न रूप सामने आते है। पशिचम के पास द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विकासपरक  इतिहास-चेतना है तो पूरब के पास हर युग के मनुष्य के विवेक को अपने युग की साभ्यतिक विकृतियों और इतिहास-चेतना से बाहर निकलने की मनोवैज्ञानिक दार्शनिक प्रविधि है । पशिचम उपलबिधपरक लौकिक स्मृतियों का संरक्षक है तो पूरब मूल्य-परक चारित्रिक स्मृतियों का । पशिचम के लिए अतीत भी एक वस्तुनिष्ठ उपसिथत यथार्थ रहा है । उसके लिए मृत्यु का मतलब सम्पूर्ण विलुपित नहीं ,बलिक एक कब्र में बदल जाना है ,जबकि पूरब के लिए अतीत एक राख से अधिक महत्वपूर्ण कभी नहीं रहा । जबकि पशिचम नें अतीत के संरक्षण के लिए ममी और पिरामिडों की रचना की , पूरब ने स्मृति संरक्षण के लिए मिथक-निर्माण की प्रकि्रया अपनार्इ । पशिचम की सजग स्मृति-संरक्षणवादी ऐतिहासिक चेतना से अलग ,विसर्जन और विस्मृतिवादी पूरब अपनी जातीय स्मृति के निर्माण के लिए चयनधर्मी ही रहा है । उसकी व्यापक उपेक्षा और विस्मरण-नीति के पीछे जन-सामान्य के प्रतिरोध का सामाजिक मनोविज्ञान भी देखा जा सकता है । उसने सर्वोत्तम और पसन्द चरित्रोंं को मिथकों में बदलकर उन्हें धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संरक्षण देकर जहां उसें जीवित मानसिक उपसिथति में बदल कर भिन्न स्मृति प्रकि्रया का परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त सामान्यत: पूरब की सारी सांस्कृतिक-धार्मिक प्रविधियां मनुष्य को अपने सभ्यतागत समय से बाहर निकालने की रही है । उसकी सबसे बड़ी विश्ेाषता निरन्तर मानव-जाति के आदिम और निर्विकार चित्त की खोज को एक सांस्कृतिक लक्ष्य का आयाम देना है । पूरब निरन्तर ही अपने समय की सभ्यता का अतिक्रमण और उससे निष्क्रमण का आवाहन करता है । वह चित्त के स्तर पर वर्तमान जीवी है ,अपने वर्तमान चित्त की खोज होने के कारण एक सीमा से अधिक पूर्व में घटित घठनाएं एवं ऐतिहासिक स्मृतियां उसके लिए एक अनावश्यक उत्पाद है ;जबकि पशिचम अपनी ऐतिहासिक स्मृति के सापेक्ष संभावित वर्तमान की तलाश करता रहा है।  इसके स्थान पर पूरब अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को मिथक में बदल देना अधिक पसन्द करता रहा है । एक दृषिट से यह ऐतिहासिक स्मृति में से चारित्रिक स्तर पर महत्वपूर्ण प्रभावशीलता का चयन कहा जा सकता है ।
         अपनी भिन्न सांस्कृतिक अवधारणाओं और सामूहिक अचेतन के कारण पशिचम और पूरब की सभ्यताएं दो भिन्न मानवीय पर्यावरण का निर्माण करती हंै । इसीलिए किसी नर्इ व्यवस्था की खोज का प्र्रश्न पूरब और पशिचम के भिन्न सांस्कृतिक रुचियों के प्रश्न से भी टकराता है । मानव-जाति के असितत्त्व और विकास की लम्बी यात्रा में पूरब और पशिचम के मानव-समूहों के अलग-अलग विशिष्ट ऐतिहासिक अवदान सामने आए हैं । इस यात्रा में एक वैज्ञानिक युग और सभ्यता की ओर   विश्व-इतिहास को ले जाने में पशिचम ने युगान्तरकारी सफलता पार्इ है । उसने मानव-जीवन को और बेहतर,सुखी,सुरक्षित और संरक्षित बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका  का निर्वाह किया है । ऐसे में  पशिचमी सभ्यता को अपना आदर्श और आधुनिकता का पर्याय मानकर पूरब का भी पशिचमीकृत होते जाना स्वाभाविक ही है । ऐसे में कुछ ही समय पूर्व के औपनिवेशिक अतीत से अपमानित पूरब की सभ्यता और संंस्कृति का भी कोर्इ आधुनिक और वैशिवक विमर्श  हो सकता  है- इसकी प्रस्तावना मात्र से ही प्रतिगाामिता के कर्इ आरोप लग जाने का भी खतरा है ।
         दरअसल, पूर्वनिर्मित विचारधाराएं भी  बनी-बनार्इ सड़कों की तरह ही होती है । तिरछी या घुमावदार होने पर भी मनुष्य उसे ही मानक दूरी के रूप में मापता रहता है । दूसरे षब्दों में अच्छी बनी सड़कों से ही यात्रा करना अधिक सुविधाजनक समझता है । पूरब अभी भी प्रामाणिक और औचित्यपूर्ण विचारधारा के रूप में कोर्इ नर्इ अच्छी सड़क नहीं बना सका है ! उसे मानव-सभ्यता के विकास में अपने भीतर के श्रेष्ठ को योगदान के लिए अभी भी विश्लेषित और प्रमाणित करना है । अपनी सतत वैज्ञानिक उपलबिधयों के कारण  वर्तमान में आधुनिक मानव-सभ्यता के वैशिवक विमर्श के केन्द्र में पशिचम ही है । यधपि पशिचम ने स्वयं को बार-बार परिभाषित और व्याख्यायित किया है ;लेकिन वह निर्णायक प्रयास के स्तर तक ऐसा करने ंमे इसलिए असमर्थ रहा है कि उसने एक तो पूरब को विचार योग्य ही नहीं समझा या पूरब को विमर्श में शामिल करना स्वयं ही अपने औपनिवेशिक विस्तार और वर्चस्व के स्वर्णिम अतीत को अपमानित करना होता ।
         वैज्ञानिक विकास से समृद्ध दो अविस्मरणीय शताबिदयों के बीत जाने के बाद भी अधिक बेहतर व्यवस्था की खोज में लगी मानव-जाति के लिए सभ्यता और संस्कृति एक संवेदनषील मुददा बना हुआ है । ऐसे में किसी नर्इ और बेहतर सभ्यता ,व्यवस्था और संस्कृति-निर्माण की सृजनात्मक संभावनाओं की वैकलिपक दिशाएं कम ही होंगी । पहला विकल्प यह हो सकता है कि पशिचम को ही और बेहतर बनाकर उसे सार्वभौम कर दिया जाय । दूसरा यह कि पूरब और पषिचम दोनों के प्राच्य और वर्तमान से उपयोगी सृजन-सूत्रों की तलाश की जाय । तीसरा विकल्प पूरब की सभ्यता को आधार बनाकर पशिचम का पूर्वी संस्करण तैयार करने का है । वर्तमान के वैशिवक और भूमंडलीकरण-दौर में अलग-अलग कारकों से प्रेरित होकर ये सारी प्रकि्रयाएं स्वत:स्फूर्त ढंग से एक साथ चल रही हैं। ऐसे में 'किया जाय से मेरा आशय सजग बौद्धिक चुनाव से ही है । इसलिए वर्तमान बौद्धिक युग में और विकसित एवं निर्दोष सभ्यता की दिषा में प्राथमिक आवष्यकता तो यही होगी कि हम अपने अचेतन स्वीकारों की पुनर्समीक्षा कर उसे जहां सचेतन औचित्य प्रदान करें ; वहीं एक संवादी और समावेशी वैशिवक सभ्यता के लिए अपने अराजक एवं विरोधी विश्वासों को वैज्ञानिक-तार्किक आधारों पर कोर्इ अधतन एवं सर्वमान्य व्यवस्था दें । इसके लिए इस सिद्धान्त को मान्यता देनी ही होगी कि मनुष्यकृत वर्तमान व्यवस्था और उसका पर्यावरण उसके अतीत की बौद्धिक सक्रियताओं एवं कार्यात्मक हस्तक्षेप का परिणाम है ।  इसलिए भविष्य की बेहतर व्यवस्था की खोज तब तक संभव नहीं है जब तक हम उसके अतीत और वर्तमान की बौद्धिक आदतों को समझ न लें । अलग-अलग साभ्यतिक चित्त एवं आदतों की खोज ही हमें उनके भिन्न सामूहिक अचेतन के उस अन्धी सुरंग में ले जाती है , जिन्हें बन्द किए बिना मानवता का भविष्य बार-बार भटक कर उसकी ओर ही मुड़ जाने के लिए अभिशप्त है ।
           दरअसल सामूहिक मानवीय निर्णय भी एक बार घटित हो जाने के बाद ,प्रकृति की तरह ही मानव-जीवन की नियति के निर्धारक बन जाते हैं । वे मनुष्य की सामूहिक स्मृति के माध्यम से रुचि के नियामक बन जाते हैं । उन जातीय ग्रनिथयों ,मनोवृत्ति एवं आदतों का निर्माण करते है। जिन्हें सामूहिक अचेतन ही कहा जा सकता है । इनसे प्रेरित और प्रभावित होकर मानव जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक आयाम अन्तत: जैविक पर्यावरण में बदल जाते हैं । एक समय के बाद सामाजिक स्वीकृतियां व्यवहार और कार्य मनुश्य के विचार को ही पर्यावरण में बदल देते हैं । आदि-काल की जंगलों से भरी धरती का वर्तमान में बागों और खेतों में बदल जाना कृषि-कार्य करने के मनुष्य के विचार का ही दीर्घकालीन परिणाम है ,जिसने वानस्पतिक पर्यावरण का पूरी तरह रूपान्तरण कर दिया है । मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिल से जटिलतर होते जा रहे विकासक्रम नें मानव-जीवन के पर्यावरण में मानवीय सृषिट को भी शामिल कर दिया है । मनुष्य जाति द्वारा अर्जित ज्ञान-विज्ञान ,निर्मित भव्य भवन,सड़के,विधुत व्यवस्था ,कारखानें ,बांध,पुल, शिक्षा-व्यवस्था ,ग्रन्थ, साहित्य ,संगीत ,फिल्में , टी.वी. नगर और राज्य-व्यवस्था आदि सभी मानव-निर्मित पर्यावरण ही हैं । आदिम मनुष्य नें जब प्राकृतिक गुफाओं की तलाश छोड़कर पहली बार घर बनाया होगा या एसिकमों नें ध्रुवीय भालू का अनुकरण करते हुए इग्लू के पूर्व रूप का निर्माण किया होगा या फिर किसी मृत पशु के चर्म में घुसकर बर्फीली हवाओं को पछाड़ा होगा तो उसका यह कार्य पर्यावरण निर्माण की दिशा में ही बढ़ा हुआ कदम था और आज भी अपराध-नियन्त्रण के लिए जब वह नया कानून बनाता है तो उसके इस प्रयास में भी अपने पर्यावरण (सामाजिक) को ही और बेहतर बनाने की सामूहिक इच्छा छिपी रहती है । इस दीर्घकालीन विकासक्रम में गम्भीर अवरोध तब उत्पन्न हुए जब संंस्कृति को मानवीय सृजन के रूप में न देखकर उसे जातीय और धार्मिक जड़ता और अपरिवर्तनीयता से जोेड़ दिया गया ।
            एक ऐसे समय में जब पशिचम नें पूरब को न सिर्फ संक्रमित ,आक्र्रान्त और परिवर्तित किया है , बलिक पूरब में पशिचम कें संक्र्रमण के प्रतिरोध में उत्पन्न रूढि़वादी प्रतिसांस्कृतिक उभार को भी प्रतिक्रि्रयात्मक ढंग से उत्तेजित किया है । विशुद्ध पूरब को दूषित और विकृत कर उसे अन्तर्जीवी या फिर आक्रामक और प्रतिहिंसात्मक बना दिया है । कुछ वैसे ही जैसे किसी वायरस से संक्र्रमित होने पर मानव-शरीर ''एण्टी-बाडी का निर्माण करने लगता है - इस विमर्श का उददेश्य पशिचम की शकित-संरचना  के उस आदिम कबीलार्इ अचेतन के प्रति पशिचम को भी सावधान करना है ,जिससे उसके द्वारा निर्मित और विकसित आज तक की सभी व्यवस्थाएं निकल नहीं पार्इ हैं । इन व्यवस्थाओं में उसके द्वारा निर्मित आधुनिकतम राष्æ अमेरिका ,साम्यवादी अवधारणा का इतिहासित प्रतीक सोवियत रूस और संयुक्त राष्æ संघ जैसी संस्थाएं भी हैं। इस विमर्श की आधारभूत स्थापना यह है कि पशिचम और पूर्व की सभ्यताओं के वर्तमान व्यवहार और प्रवृत्यात्मक  विषेशताओं के अन्तर को ,उनके भिन्न सामूहिक अचेतन को उनके पूर्वजों के द्वारा विकसित र्इश्वर की भिन्न अवधारणाओं से समझा जा सकता है । इस विमर्श की दूसरी महत्त्वपूर्ण स्थापना यह है कि पशिचम के व्यवस्था की शकित-संरचना उसके र्इश्वर की चारित्रिक परिकल्पना के अनुरूप ही न सिर्फ अधिनायकवादी है ,बलिक वह वैसी ही शकित-संरचना के अनुरूप बार-बार राजनीतिक व्यवस्था, की खोज करती है । यह विमर्श उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो पशिचम के सामूहिक अचेतन से अनभिज्ञ रहते हुए, उसे एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक आदर्श मानकर ,उसे पूरब के सामूहिक अचेतन को समझे बिना ही पूरब की धरती पर पशिचम की अवधारणाओं को अविकल रूप से किसी उपनिवेश की तरह घटित और मूर्त देखना चाहते हैं। चाहे वह पशिचम का साम्यवाद या वैशिवक नेतृत्व के दावेदार अमेरिका का तथाकथित सफल पूंजीवाद ही क्यों न हो ।
          पशिचम की सभ्यता-चाहे वह लोकतन्त्र ही क्यों न हों ,आज भी व्यवहार के धरातल पर सामान्य मनुूष्य के अधिकारों के अन्तत: निरस्तीकरण और अपहरण पर ही आधारित है । आज भी पशिचम की सभ्यता अपने द्वारा विकसित सबसे आदर्श व्यवस्था लोकतन्त्र में भी सबसे सही मनुष्य के रूप में तात्कालिक राजनीतिक र्इश्वर की खोज कर रही है । यह कि पशिचम की राजनीतिक शकित की परिकल्पना में आज भी वही आदिम कबीलार्इ र्इश्वर छिपा हुआ है ,जिसने सददाम हुसैन की तरह एडम को अपने आदेश की अवहेलना कर वर्जित फल चखने के अपराध में धरती पर अपदस्थ कर दिया था । जो आज भी उतना ही असहिष्णु है -मानव निर्मित राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से पुनर्जीवित होकर । जिसने कभी भी वैचारिक चुनौती देकर शैतान को सभ्य और नैतिक होने के लिए प्रेरित नहीं किया । जो स्वयं उस युग के मनुष्यों की खोज है जब भारत में असामान्य मनोरोगी राक्षस और पशिचम में शैतान से प्रेरित माने जाते थे । जो उन्नीसवीं शताब्दी में मनुष्य द्वारा निर्मित दैत्याकार मशीनों की तरह ही दैत्याकार यानित्रक व्यवस्था के रूप में पुन: जीवित हो उठा था । जिससे जुड़े मानव-विश्वासों को माक्र्स नें मानव-जाति के लिए अफीम के समान मानते हुए भी अपने भीतर के उसके अचेतन मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अतिक्रमण करने की वैचारिक सफलता नहीं प्राप्त की , क्योंकि पशिचम के अधिनायकवादी निरंकुश,असहिष्णु और एडम विरोधी र्इश्वर की तरह उसका पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही उसके जातीय आदिम अचेतन का ही दार्शनिक विस्तार है । पशिचम का सामूहिक अचेतन शैतान के रूप में निरन्तर अपने किसी अदृश्य शत्रु की खोज के लिए विवश करती है । शैतान के कुटिल चालों से संत्रस्त र्इश्वर और उसकी सृषिट की तरह पशिचम जिस अवधारणा की उपज है ,वह बुद्ध के अशेष करुणा के मर्म तक पहुंच ही नहीं सकता है। सच तो यही है कि शैतान की ओर से होने की आशंका  के साथ ही यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया गया था । मुहम्मद साहब के विरोध का कारण भी उनके शैतान की ओर से होने की आशंका ही थी । आश्चर्य की बात यही है कि यहूदी ,र्इसार्इ और इस्लाम तीनों धमोर्ं को मानने वाले समाज नें शैतान के रूप में शत्रु की खोज जारी रखी । यही कारण है कि पशिचम एक आशंकित सभ्यता का निर्माण करता है तथा अनैतिक कूटनीति और शकित-आधारित हत्याओं  का नैतिक समर्थन और भव्यीकरण भी। ऐसे ही विश्लेषणों के कारण अप्रिय लगते हुए भी इस लेख में इस तथ्य की ओर भी संकेत करना पड़ा है कि अपनी सारी वैचारिक स्थापनाओं के बावजूद माक्र्स प्रणीत साम्यवाद की सांस्कृतिक सीमा यह है कि वह पशिचम के एकेश्वरवादी-अधिनायकवादी आदिम-कबीलार्इ सांस्कृतिक अचेतन की न सिर्फ परम्परा में है ,बलिक उसका लाेंकतानित्रक राजनीतिक आधुनिक संस्करण है । उसके द्वारा विकसित व्यवस्थाओं के वर्तमान व्यवहार में भी कबीलार्इ आक्रामकता और असभ्यता के अचेतन प्रेरक-बिन्दु देखे जा सकते हे। भारत के एकमात्र निर्णायक और विशुद्ध क्रानितकारी आन्दोलन नक्सलवाद में भी पशिचम के कबीलार्इ अचेतन का ही पूरब में वैचारिक उपनिवेश देखा जा सकता है ।
          मेरी दृषिट में आज के पशिचम की सभी राजनीतिक व्यवस्थाएं पषिचम के अधिनायकवाादी असहिष्णु र्इश्वरीय सामूहिक अचेतन का अतिक्रमण नहीं करती ,बलिक उसके राजनीतिक व्यवहार को मानकीकृत करती हैं । इसके विपरीत पूरब का साभ्यतिक अचेतन बहुलतावादी और उदार है । पूरब की हिन्दू और बौद्ध जैसी दोनों महत्वपूर्ण गैर-राजनीतिक सभ्यताएं मानव-जीवन के स्थायित्व के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक सत्ता और व्यवस्था-प्रविधियों की खोज करती रही हैं । अपने अविश्वास के जातीय मनोविज्ञान एवं संस्कृति के कारण पशिचम जहां शकित आधारित राजनीतिक सत्ता को पसन्द करता रहा है वहीं पूरब का प्रयास राज्य-व्यवस्था को एक सांस्कृतिक-सामाजिक उपसिथति के रूप में विकसित करने का रहा है । यहीं कारण है कि पूरब के सभी महान आदर्श और प्रेरक चरित्र चाहे वह राम ,कृष्ण महावीर बुद्ध हों या गांधी सभी राजनीतिक सत्ता के परित्याग के मिथक का ही साभ्यतिक भव्यीकरण प्रमाणित करते हैं । प्राचीन समय से ही पूरब की सामाजिक और सांस्कृतिक मानव-सम्बन्धों की संरचना राजनीतिक सत्ता के निषेध और विकेन्æीकरण पर ही आधारित रही है । विशेषकर भारत की उपजाऊ भौगोलिक समृद्धि ने उसके नागरिकों को प्राचीन काल से ही अभावजन्य प्रतिक्रियावादी और आर्थिक धरातल पर अपहरणधर्मी होने से बचाए रखा । संभवत: इसीलिए अपने लम्बे इतिहास में इसनें पशिचमी अर्थों में राजनीतिक सत्ता की खोज और स्थापना कभी नहीं की । केवल उन क्षणों को छोड़कर जिसमें काबुल-कन्धार ने रामायण और महाभारत काल में कैकेयी और गान्धारी के माध्यम से भारतीय राजघरानों में अपनी प्रत्यक्ष हस्तक्षेपकारी उपसिथति नहीं दर्ज करार्इ थी। यह अकारण नहीं है कि ये दोनों भारतीय संस्कृति को दूर तक प्रभावित करने वाले महाकाव्य पूरब और पशिचम के जीवन-मूल्य और व्यवस्था दृषिट के द्वन्द्वात्मक अन्तर्संघर्ष को भी अत्यन्त तीव्रता और प्रामाणिकता से प्रस्तुत करते हैं । इसी संघर्ष के पश्चात भारतीय समाज अपने सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक आदशोर्ं का निर्णायक चयन करता है ।
      भारत अपने पशिचमी प्रभाव में जिस प्रकार शकित पर आधारित राजनीतिक समाज में बदलता जा रहा है ,वह न सिर्फ भारतीय नहीं है ,बलिक सभ्यताओं के वैषम्य के कारण भारत के सामाजिक पर्यावरण में कर्इ नर्इ उत्तर-आधुनिक यानि अभूतपूर्व विकृतियों की भी सृषिट कर रहा है । इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या है भारत में पशिचमी ढंग के पेशेवर यानि कार्य एवं मूल्यांकन आधारित राजनीतिक समर्थन-तंत्र का विकसित न होना । राजनीतिक दल और उनका नेतृत्त्व गैर-राजनीतिक प्रविधियों का प्रयोग करते हुए सत्ता में बने रहना जान गए हैं । लेकिन अभी कुछ ही समय पूर्व बिहार राज्य के चुनाव-परिणामों ने संकेत कर दिया है कि देर से सही भारत बाजार के नियमों से संचालित पेशेवर राजनीति की ओर बढ़ रहा है । यहां बाजार षब्द का प्रयोग मैंने विशेष अभिप्राय से ही किया है । लोभ जनित क्रूरताओं के बावजूद बाजार सामान्यतया एक र्इमानदार मूल्य संसूचक व्यवस्था भी है। यदि उसे बाजारेतर विशेषज्ञता द्वारा दूषित या दुष्प्रभावित न किया गया हो । धर्म, जाति ,कुल और परिवारवादी संगठनों से अपâत भारतीय राजनीति एक स्वस्थ सभ्यता की दिशा में गम्भीर चिन्ता का विषय है ।
          इस चिन्ता के बावजूद पशिचम की व्यवस्था-परिकल्पना और क्रानित सम्बन्धी अनेक वैचारिक स्थापनाएं पूरब के मानवीय सांस्कृतिक-साभ्यतिक अचेतन के अनुरूप मैं नहीं पाता। अपनी विनम्रतापूमर्ण असहमति के साथ मैं ऐसा मानता हूं कि पूरब को एक स्वाभिमानी और मौलिक सभ्यता के रूप में बने रहने के लिए ही नहीं बलिक एक शान्त,विमर्शपूर्ण और मानवीय सभ्यता की संभावनाओं की तलाश में अपनी आधुनिकता ,वैज्ञानिक औचित्य ,वैशिष्टय तथा उपयोगिता के वास्तविक आधारों की खोज करनी ही चाहिए । उससे पशिचम राज्य और राजनीति को सामाजिक सत्ता के रूप में विकसित करने की सांस्कृतिक प्रविधि एवं मानवीय चरित्र प्राप्त कर सकता है । पशिचम की तनाव,बल-प्रयोग,अविश्वास और हिंसक कार्य-संस्कृति से बाहर निकालने में पूरब की सभ्यता के अनुभवों का मनोवैज्ञानिक विनिवेश हो सकता है । पूरब को अपनी विषेशताओं से पषिचम को परिचित कराना चाहिए न कि पशिचम के समाज के राजनीतिक सत्ता में रूपान्तरण की अवधारणा को बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर लेना चाहिए ।
           अलग-अलग सभ्यताओं के र्इश्वर और उसके चरित्रीकरण-प्रतीकीकरण की भिन्न अवधारणाओं को उनके अलग और विशिष्ट सामूहिक अचेतन के प्रभावशाली प्रमाण के रूप में देखना उचित होगा । ऐसा करने के पर्याप्त साभ्यतिक साक्ष्य है। यह एक तथ्य है कि विगत सामुदायिक विश्वास एक भावी और आदर्श वैशिवक समाज की रचना में बाधक हैं । अवधारणाओं की अराजकता ने जिस बहुसांस्कृतिक और बहुराष्æीय विश्व का निर्माण किया है , एक विकसित और सभ्य मानव-सभ्यता के लिए उसका संरक्षण किया जाना चाहिए या विसर्जन । जबकि एक सीमा के बाद ये विविधताएं किसी स्वतन्त्र आविष्कार की तरह मानव-विश्व को रंगारंग और बहुवैकलिपक भी बनाती है । जबकि आस्वाद आधारित सभी उत्पाद -मिठार्इ और संगीत से लेकर सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवहार तक सभी मनुष्य की सृजनशीलता के ही विविध आयाम हैं । उन सभी के लिए जो इस धरती को छोड़कर अन्तरिक्ष की उड़ान नहीं भर सकते इसी बूढ़ी धरती में ही अपनी सृजनष्ीलता के आयामो और अवसरों की खोज करनी होगी। उदाहरण के लिए हर नया खेल एक नए आनन्दपूर्ण व्यवहार पद्धति की भी खोज करता है । चाहे वह कि्रकेट ,फुटबाल या टेनिस ही क्यों न हो अपनी व्यापक लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकृति के बाद सांस्कृतिक बन ही जाता है । कर्इ रीति-रिवाज सीमित या व्यापक रूप से उत्सवधर्मी मानवीय पर्यावरण का निर्माण करने के कारण स्थानीय और हास्यास्पद होने के बावजूद समुदाय विशेष के लिए महत्वपूर्ण आनन्द प्रदायी भूमिका में होते हैं ।  इसलिए ''सोशल और 'कल्चरल इंजीनियरिंग भी मानव-सभ्यता के विकास और आधुनिकीकरण के दो क्षेत्र हो सकते हैं । इसलिए उसे संवेदनशीलता से हटाकर सृजनशीलता के दायरे में लाना ही मानव-सभ्यता के भविष्य के लिए हितकर होगा । सभ्यता और संस्कृति पर किसी वैशिवक आधुनिक विमर्श के लिए यह भी विचार का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है।
         गांधी की आंखों से न भी देखें तो भी राजनीतिक सत्ता का भव्यीकरण एक पशिचमी नजरिया है जो मनोवैज्ञानिक दृषिट से न सिर्फ लोकतन्त्र की समानता की अवधारणा की मूल-भावना के विपरीत है ,बलिक वह अपनी प्रतिक्रिया में असामान्य मनोवैज्ञानिक चुनौतियां देने वाला और आपराधिक रूप से उकसाने वाला भी है । मैं भारत और अमेरिका में हुए आक्रमणों को ऐसी ही असामान्य मनोवैज्ञानिक उत्तेजना का परिणाम मानता हूं। गांधी की हत्या के पीछे भी उनकी नीतियों का कम, उनके महात्मार्इ विशिष्टतावाद की प्रतिक्रिया में उपजी चुनौतियों का अधिक हाथ रहा होगा । असितत्व और व्यकितत्व के भव्यीकरण और बढ़ते सार्वजनिक प्रभाव के साथ वह व्यकित अपनी प्रभावशीलता के औचित्य और अनौचित्य के प्रति जवाबदेह होता जाता है ।
         जीवन का विसंस्कृतिकरण करने वाले या संस्कृति-विशेष को एकमात्र आदर्श करने वाले जीवन के ऐसे तथाकथित शुद्धतावादी प्रयासोें के पीछे मनुष्य को यन्त्र मानने वाली वह मशीनी अवधारणा भी छिपी है ,जो अठारहवी-उन्नीसवीं शताब्दी के आविष्कारों तथा दैत्याकार यन्त्रों की अतिमानवीय शकितयों से चमत्कृत और मुग्ध होकर मनुष्य को भी एक स्वचालित जैविक यन्त्र-विशेष ही मान बैठा । मुझे तो प्रथम और द्वितीय विश्व-युद्ध तथा आज की आतंकवादी बर्बरता में भी अठारहवीं सदी की नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से चमत्कृत युगीन चेतना का यन्त्रवादी अचेतन ही छिपा दिखता है। जबकि आज के परमाणु युग का जीव-विज्ञान जीन की संरचना में विभिन्न रसायनों के बन्ध के रूप में भौतिक पदाथोर्ं के भी जीवन के उदभव और असितत्व के महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखे जाने का आग्रह कर रहा है। अठारहवीं शताब्दी के यानित्रक भौतिकवाद से प्रेरित जीवनबोध को जैविक भौतिकवाद की ओर ले जाने की जरूरत है । यह सांस्कृतिक-बोध मुझे अब भी असाहितियक नहीं लगता कि प्रकृति का जैव-यानित्रक उत्पाद ही सही फिर भी जीवन अपनी भौतिक सामान्यता में भी एक असामान्य विलक्षण चमत्कार है-जो प्रकृति और ब्रहमाण्ड के अरबों-खरबों विरल संयोगों के बाद संभव हुआ है । उसे मध्ययुगीन आध्यातिमक सम्मान यदि नहीं दे सकते तब भी उसे आतिमक सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए-इस ऐतिहासिक अनुभव और वैचारिक चेतावनी के साथ कि तथ्यपरक विश्वास रहे हों या काल्पनिक अन्ध-विश्वास दोनों ने ही हजारों वर्षो तक मनुष्य जाति की जिज्ञासा वृतित को स्थगित रखनें में प्रगति-विरोधी सफलता पार्इ है ।
          इसीप्रकार एक नर्इ मानव-सभ्यता की खोज में पूरब की सभ्यता और संस्कृति के आधुनिकतावादी विमर्श  के लिए भिन्न मानव-व्यवस्था ,परिकल्पना और वैशिष्टय के कर्इ और बिन्दु रेखंकित किए जा सकते हैं । सभ्यतागत भिन्नता और उनकी भिन्न प्रेरक अवधारणाओं के तुलनात्मक विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि अपने सजग इतिहास-बोध की परम्परा के कारण पशिचम जहां समय को रचता है ; या यह कहें कि समय को रचते हुए जीता है तो पूरब हर मनुष्य को अपने आदिम निर्विकार मन की खोज के लिए प्रेरित करता रहा है । यहीं एक और तथ्य सामने आता है कि एक सीमा के बाद हर सभ्यता अपने मनुष्यों को साभ्यतिक यन्त्र में बदलती जाती है । पूरब की सांस्कृतिक प्रकि्रया मनुष्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी साभ्यतिक यानित्रकता, लौकिक स्मृतियों के पूर्वापर प्रभाव नियति या जड़ता से बाहर निकालकर विशुद्ध विवेक की ओर मोड़ने की रही है । जीवन-बोध को निरन्तर अधतन बनाए रखने का प्रयास शवों को तुरन्त जलाकर उसका तुरन्त विलोपन कर दिए जाने में भी देखी जा सकती है । प्रकृति मृत को सड़ाकर खाद में बदल देना चाहती है ,जबकि स्मृतिजीवी होने के कारण मनुष्य अपनी सारी स्मृतियों को अनन्तकाल के लिए संरक्षित करना चाहता है । पशिचम की इतिहास चेतना इसी मानवीय स्मृतिजीविता का परिणाम है । यही स्मृतिजीविता ही उसे कब्र-निर्माण के लिए प्रेरित करती है । वह मानव शरीर को नहीं बचा सकता तो वह उसकी कब्र को ही बचा लेना चाहता है । इसप्रकार वह स्मृति की अमरता की खोज करता है जबकि पूरब की सारी सराहना लौकिक स्मृति से बाहर निकले चित्त के लिए ही रही है । इसे ही वह मोक्ष कहता रहा है ।
         इसीलिए मैंं इस विमर्श का आरम्भ यहां से करना चाहूंगा कि वैशिवक धरातल पर मानव-जाति के सांस्कृतिक इतिहास का विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आता है कि वर्तमान में आदिम विश्वासों के रूप में मानव-जाति के पास दो र्इश्वर है । एक पशिचम का विधि-निषेधों के प्रति अति-संवेदनशील नैतिक किन्तु असहिष्णु र्इश्वर ; दूसरा र्इश्वर के होने न होने की परवाह न करने वाला , मानव के विशुद्ध चित्त की खोज करने वाले धर्म का आविष्कारक मनुष्य जो अपनी पवित्रता और दिव्यता से र्इश्वर की अवधारणा को ही अप्रतिषिठत कर उसे धरती पर उतारने में विश्वास करता है । जिसके धर्म का आरम्भ ही राजनीतिक शकित के परित्याग से होता है । इसे स्पष्ट करते हुए मैं कहूं तो दुख से मुकित के लिए सिद्धार्थ के राज्य-त्याग को मैं सामाजिक और सांस्कृतिक शकित ( संघ ) की खोज के रूप में लेता हूं । राज्य-त्याग का वर्तमान भारत में दूसरा महत्त्वपूर्ण लोकप्रिय आदर्शवादी चरित्र राम का है,,जिन्हें भारत में एकल दाम्पत्य का मैं प्रवर्तक मानता हूं । जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी से लेकर उन्नीसवी शताब्दी के पूर्वाद्र्ध तक सकि्रय और जीवित मो.क.गांधी तक मानव-अपमान पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का नैतिक बहिष्कार करते दीखते हैं । इसी आधार पर मैं पूरब की संस्कृति और धर्म को मानव-असितत्त्व की दिव्यता का सम्मान करने वाली संस्कृति मानता हूं । बौद्ध और जैन धर्म के बाहर भी पूरब का र्इश्वर एक विकेन्द्रीकृत र्इश्वर है। तातिवक दृषिट से वह मनुष्य की र्इश्वरता और दिव्यता को स्वीकार कर र्इश्वर की व्यकितवादी शकित-संरचना उपसिथति और असितत्व की सभी धारणाओं को शून्य करता है । इतना शून्य कि वह एक नैतिक और शिष्ट-पवित्र मनुष्य के रूप में भी देखा जा सकता है ।
          पूरब की र्इश्वर सम्बन्धी अनेक अवधारणाएं जीवन की आश्चर्यजनक विविधता और चमत्कारिक उपसिथति को समेटने के प्रयास में र्इश्वरीय सत्ता के विकेन्द्रीकरण का बोध और संकल्पना देती हैं ;जबकि पशिचम का र्इश्वर अवधारणा के समाज-मनोवैज्ञानिक प्रभावों के धरातल पर राजनीतिक सत्ता के केन्द्रीकरण को प्रोत्साहित करता है । यही कारण है कि इस व्यवस्था का प्रतिरोध निर्मित करने के लिए कार्ल माक्र्स को सर्वहारा के अधिनायकत्व की परिकल्पना करनी पड़ती है । इसप्रकार पूरब की मुकित का अधतन यूटोपिया साम्यवाद भी शकित-संरचना के पशिचमी अचेतन से बाहर नहीं निकल पाया और निरन्तर बल-प्रयोग के द्वारा स्वयं को जीवित रखने का प्रयास करता हुआ जल्दी ही थक गया । पशिचम की व्यवस्था-संरचना और परिकल्पना का दोष और सीमा दोनों ही यही है कि वह बार-बार अपने र्इश्वर की आदिम अवधारणा की राजनीतिक पुनर्रचना करने लगता है। अमेरिकी राष्æपति इसका उदाहरण है फ्रांस भी इसका अपवाद नहीं है ,इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री भी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने निर्वाचित सहयोगियों की  इच्छा के निरस्तीकरण और उपेक्षा की वैधानिक षकित पा लेता है। कहने के लिए वह जनता के प्रति जवाबदेह होता है ,संचार-माध्यमों द्वारा निर्मित जनमत से प्रभावित हो सकता है ; लेकिन सच्चार्इ यही है कि एक बार निर्वाचित होने के बाद वह प्रभावित होने के लिए बाघ्य नहीं है । व्यवस्था के शकित-संरचना से सम्बनिधत सभी का सामूहिक अचेतन एक होने के कारण जनता भी उसके ऐसे निरंकुश व्यवहार को स्वीकार करती रहती है । दूसरे शब्दों में वह अचेतन रूप से सहमत होती चलती है । इसीलिए मुझे लगता है कि पशिचमी सभ्यता जब तक अपने सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक अचेतन का समुचित विश्लेषण नहीं करती तब तक वह नेपालियन ,हिटलर और स्टालिन ,निक्सन और बुश पैदा करती रहेगी । उसका लोकतन्त्र भी सामान्य  जन की इच्छाओं के निरस्तीकरण से प्राप्त व्यवस्था-प्रभु की खोज करता है । आज का भारत पशिचमी र्इश्वर की अवधारणा से संक्रमित शत्रु राष्æों के कूटनीतिक विद्वेष और घात करने वाले चालों से संत्रस्त है ।
           पषिचम के र्इश्वर को जिसे मैं पशिचम के सांस्कृतिक अचेतन का आदिम सामूहिक प्रतीक मानता हूं । उसमें यीषु मसीह के प्रतिरोधपूर्ण हस्तक्ष्ेाप की सही समाज-मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्या स्वयं पशिचम ने ही नहीं की है । एक ऐसा भावुक युवक जोे अपनेे जीवनकाल में ही अपनी मां के पति यूसुफ का पुत्र नहीं माना जाता है -अपने जीवन को एक ऐसे दिव्य पिता की खोज में समर्पित कर देता है ,जिसके पुत्र सारी दुनिया और सभी देश-काल के सभी मनुष्य हैं । र्इसार्इ धर्म का योग दान यह है कि जैविक पिता सम्बन्धी कबीलार्इ  अवधारणा का विरोध करता है । यहूदी धर्म की मूल परम्परा ही नस्लीय और रक्त-शुद्धता पर आधारित ,हजारों वर्ष लम्बी  वंशानुगत यात्रा में एक जातीय परिवार की रही है । उनके जन्म को देवदूतों से जोड़ने वाला प्रसंग जितना  उन्हें महिमा-मंडित करता है ,उनके जन्म से ही विशिष्ट होने के बोध का व्यकितगत और सामाजिक पोषण करता है । दूसरी ओर बार-बार उनके पिता के बारे में पूछे जाने को जिसे र्इसार्इ परम्परा प्राय: आध्यातिमक प्रश्न के रूप में ही लेती है उसकी तत्कालीन यहूदी मनोवृतित की परिचायक व्यंग्यात्मक प्रश्न के रूप में सामाजिक व्याख्या भी की जा सकती है । जिसका काव्यात्मक उत्तर देकर यीशु अपनी प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास करते रहे और अन्तत: तत्कालीन यहूदियों के शुद्धतावादी प्रतिरोध एवं षडयन्त्र के शिकार हो गए । जैविक पिता की अनिवार्यता तथा यहूदियों की कुटुम्बीय जाति की अवधारणा का अतिक्रमण करते हुए यीशु स्वयं को अपने दिव्य पिता का पुत्र घोषित कर सारी मानव-जाति के एक ही उदगम की ओर जो ध्यान आकर्षित करते हैं , उनकी उपलबिधयां प्लेटो और अरस्तू की तरह भले ही बुद्धिवादी नहीं रही होंं लेकिन पशिचमी समाज के लिए वे युगान्तरकारी संस्कृति-वैज्ञानिक अवश्य प्रमाणित हुए । उनके दिव्य पिता का पुत्र होने की अवधारणा प्रसिद्ध भारतीय अवधारणा 'वसुधैव कुटुम्बकमके समानान्तर ही प्राचीन काल का क्रानितकारी वैशिवक प्रयास है ।
         इन दृषिटयों को लेकर मैं जब पशिचम की ओर देखता हूं तो आम धारणा के विपरीत यीशु और मुहम्मद दोनों ही मुझे पषिचम में पूरब की राजनीतिक शकित विरोधी सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक शकितवादी चेतना के ही विस्तार लगते हैं । दोनों ही एडम ओर र्इव की थोड़ी भी चूक को बर्दास्त न करने वाले पषिचम के असहिश्णु अधिनायकवादी र्इश्वर को मानवीय बनाते हैं । मानव-जाति के सम्पूर्ण इतिहास में दोनों ही अभूतपूर्व यतीम (पितृविहीन,अनाथ) न सिर्फ दिव्य और सार्वभौम पिता की खोज करते हैं बलिक आदिम कबीलार्इ अवधारणा के गुस्सैल-असहिश्णु र्इश्वर का पिता और पुत्र के मानवीय सम्बन्धों में पुनर्संस्कार करते हैं । जैसे आज का भारत गांधी को गोली मारकर उनकी विचारधारा से दूर हट गया है ,मुझे बार-बार लगता है कि यीशु को क्रूस पर चढ़ाकर और मुहम्मद साहब की मृत्यु के पष्चात पशिचम भी अपने प्रर्वतकों की पीड़ा और विचारधारा को समझने में असफल रहा है । पशिचम बार-बार अपने व्यवस्था-निर्माण की सभी शैलियों में ,अपने आदिम-कबीलार्इ अधिनायकवादी र्इश्वर की ही खोज करते हुए दमन ,निरसित तथा सामान्य मनुष्य के अधिकारों का अपहरण करने वाली व्यवस्था-परिकल्पना की ओर बार-बार लौट आता है । इस लौटने को सिकन्दर,नेपोलियन,हिटलर,स्टालिन ,सददाम हुसैन,लादेन और जार्ज बुश आदि कर्इ आवर्ती रूपों में देखा जा सकता है । पशिचम इस अचेतन से बाहर निकलकर राजनीतिक शकित आधारित व्यवस्था से बाहर किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शकित आधारित मानव-विश्व और व्यवस्था की खोज कर ही नहीं सका है । विभाजित स्वामित्व (र्इश्वर और शैतान ) की अचेतन अवधारणा नें उसे क्रमश: काल्पनिक शत्रु के षडयन्त्रों के प्रति शक्की ,कूटनीतिक ,सह-असितत्व विरोधी ,कुचक्री ,असहिष्णु और हिंसक बना दिया है । अपने इस अचेतन से मुकित का संघर्ष और प्रयास स्वय पशिचम को ही करना होगा । उसे लौटना ही होगा यीशु और मुहम्मद जैसे अपने दिव्य पिता के दिव्य पुत्रों की मानव करुणा वाले पवित्र संस्कृति-पूर्वजों की ओर। इतना ही नहीं ,एक ही सामूहिक अचेतन के उत्तराधिकारी पशिचमी पूंजीवाद और साम्यवाद प्रवर्तक कार्ल माक्र्स के भी राजनीतिक साम्यवादी व्यवस्था को पूरब के सामाजिक-सांस्कृतिक-विकेन्द्रीकृत र्इश्वर वाले सामूहिक अचेतन के अनुरूप-मानव-सम्मान पर आधारित ,विकेन्द्रीकृत किन्तु आत्मानुशासित ,अहिंसक, और शान्त मानवीय व्यवस्था की खोज करनी ही होगी ।
        पूरब -विषेशकर भारत की आध्यातिमक अवधारणाओं का मूल सूत्र उसकी भाषा-वैज्ञानिक चेतना के विकास में छिपा हुआ है । उसका ब्रहम, सिथतिप्रज्ञता  और शून्य वस्तुत : सभ्यताजन्य विकृतियों से अप्रभावित मनुष्य के विशुद्ध चित्त की खोज ही है । यह चित्त जो सर्वकालिक आदिम है और अधतन भी । इस चित्त की खोज उस रेफरी की उपसिथति की तरह महत्वपूर्ण है ,जो किसी खेल के हिंसा में बदल जाने के पूर्व ही चेतावनी की सीटी बजाकर उसे रोक सकता है । पशिचम का र्इश्वर नितान्त अवधारणापरक है जबकि  पूरब का र्इश्वर अवधारणा से अधिक सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक है । पूरब के लिए ऐतिहासिक स्मृतियों को जीना जीवन-प्रकि्रया की आवृतित और अनावश्यक को जीना है । उसके लिए ऐतिहासिक स्मृतियों को जीना ही अहंकार और मोह-युक्त मन को जीना है -अफीम है । इसके विपरीत पशिचम के  र्इश्वर की व्यापित कम है । वह तात्तिवक और दार्शनिक कम लेकिन सामाजिक और मानवीय अधिक है । वह सृषिट के निर्माता तथा अच्छार्इ और बुरार्इ के प्रतीकों का सरलीकृत रूप है।  वह अपनी अवधारणा में ही सर्वशकितमान नहीं है । वह और उसकी बनार्इ दुनिया , उसके समानान्तर की र्इष्यालु रूहानी उपसिथति शैतान के कायोर्ं एवं मानव-विरोधी षडयन्त्रपूर्ण प्रयासों से संत्रस्त है । उसका एकेश्वरवाद भी दरअसल आषिंक एवं विभाजित एकेश्वरवाद है ; क्योंकि उसकी अवधारणा में सृषिट की सारी शकितयां ( शैतान के सह-असितत्त्व के कारण निरीह एवं संत्रस्त किन्तु सिर्फ मानव-विश्व का निर्माता होने की सीमा तक ही आंशिक सर्वशकितमान) एक अच्छे एवं पवित्र (जिन्न!) गाड ,खुदा या यहोवा तथा (बुरे जिन्न ) शैतान या इबलीस में विभाजित हैं। दरअसल वह प्रभावशाली शासक-सत्ता और शासक बनने क लिए निरन्तर षडयन्त्ररत शत्रु-सत्ता का ही आदिम रूपक है। मानव समाज में व्याप्त अच्छाइयों और बुराइयों का ही सृषिट की विराटता के समकक्ष निर्मित चारित्रिक प्रतिरूप । इस प्रकार अवधारणा के स्तर पर वह जन-सामान्य के लिए उपयोगी है ही नहीं । क्योंकि उसकी अवधारणा एक राजनीतिक संस्कृति का ही निर्माण कर सकती है और अपने समाज-मनोवैज्ञानिक प्रभावों में वह सिर्फ एक सैन्यीकृत समाज और संस्कृति का ही प्रेरक और निर्माता हो सकता है ।
           यह एक संयोग नही है कि पशिचम के प्राय: सभी प्रसिद्ध धर्मप्रवर्तक जैविक परिवार की आदिम कबीलार्इ अवधारणा को न सिर्फ गहरी चोट पहुंचाकर उसे ध्वस्त करते हैं और सम्पूर्ण मानव-जाति के एक परिवार होने का सन्देश देते हैं। (सिर्फ मूसा को छोड़कर , जो अपने कुल की अपमानित असिमता के प्रतिकार के प्रयास में विश्व के सबसे बड़े पारिवारिक धर्म (यहूदी) से कभी बाहर नहीं निकल पाये )। लौकिक या संकीर्ण परिवार के प्रति उनका (यीशु और मुहम्मद का ) दार्शनिक निषेेेध अकारण ही नहीं है । ऐसा करने के पीछे उनके निजी जीवन के अनुभवों का ठोस मनोवैज्ञानिक आधार भी था । मनोवैज्ञानिक दृषिट से पितृ-विहीनता की यही मानसिक आवृतित इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब में भी देखी जा सकती है तथा कुछ परिवर्तन के साथ रामायण और महाभारत के नायक राम और कृष्ण में भी। मुहम्मद साहब के पिता अब्दुल्लाह की मृत्यु तो उनके जन्म से पहले ही हो चुकी थी । कृष्ण की तरह , जिन्होने अपनी मां देवकी का दूध नहीं पिया बलिक यशोदा का पिया तथा उनका विकास ही एक सर्वप्रिय सार्वजनिक शिशु के रूप में हुआ-मुहम्मद साहब नें भी अरब की प्रथा के अनुसार अपने चाचा की दासी सुवैबा तथा किराए की दार्इ हलीमा का दूध पिया । सन्तानोत्पतित के लिए अयोग्य दसरथ के यहां राम का जन्म ही विशिष्ट एवं दिव्य शिशु होने की अवधारणा के साथ हुआ । मध्ययुगीन सन्त कवि कबीर के भी जन्म की मानवीय-मनोवैज्ञानिक परिसिथतियां इसीप्रकार की हैं । अपने वास्तविक जैविक पिता के जीवित स्नेह और मानवीय संरक्षण से वंचित इन सभी शिशुओं ने मानव-जाति की सांस्कृतिक संरचना को बहुत दूर तक प्रभावित किया। ये सभी किसी दिव्य सत्ता के प्रतिनिधि या अवतार हैं या नहीं लेकिन मेरी दृशिट में महान और महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव वाले ऐसे संस्कृति-वैज्ञानिक हैं जिन्होनें मानव-जाति के इतिहास में रागात्मक सम्बन्धों की पारिवारिक और कबीलार्इ संरचना को तोडा । उसका अतिक्रमण किया और मानव-जीवन को रागात्मक सम्बन्ध के धरातल पर सम्पूर्ण प्रकृति के साथ अन्तर्सन्दर्भित करते हुए पुनर्परिभाषित किया । यह धर्म का वह समाज- मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य है जिसका सम्बन्ध र्इश्वर की दार्शनिक अवधारणा से कम ,लेकिन मानव-जाति के सम्पूर्ण असितत्व से अधिक है । मानव-जाति के असितत्व के सम्पूर्ण इतिहास में परमाणु और हाइड्रोजन बम के आविष्कार और विस्फोट की तरह ये नैतिकता और आत्मीयता के बड़े संवेदनात्मक विस्फोट हैं । हिन्दुओं में जीवन पर्यन्त के लिए एकल दाम्पत्य-सम्बन्ध की सामाजिक प्रथा का सम्बन्ध तीन पतिनयों वाले पिता दसरथ के पुत्र राम के एकल दाम्पत्य से है ।
        स्वयं र्इसाइयत में भी बौद्ध-धर्म की वैशिवक उपसिथति के परिदृश्य में भी पूरब की सांस्कृतिक सत्ता का पशिचम मेें स्थापित होता हुआ उपनिवेश देखा जा सकता है । लेकिन पशिचम की त्रासदी यह है कि र्इसार्इ-विश्व संगठित होते ही एक बार फिर ' ओल्ड टेस्टामेंट मेें व्यक्त सृषिट के उदभव सम्बन्धी अवधारणाओं की ओर मुड गया। इससे आगे चलकर पशिचम का नवजागरण और अधिक संघर्ष और चुनौती-पूर्ण हो गया । बाद का सारा र्इसार्इ धर्म स्वयं र्इसा मसीह द्वारा नहीं बलिक उनकी शहादत को प्रचारित और भव्यीकृत करने वाले उनके भावुक अनपढ़ और अन्धविश्वासी अनुयायियोंं द्वारा रचा गया । उदाहरण के लिए आदम के पाप के फल को चखने और यीषु के बहे हुए रक्त के बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाली भावुक धार्मिक अपील के लिए स्वयं यीशु को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । सृषिट के मात्र छह दिन में रचना सम्बन्धी धारणा का भी यीशु से क्या सम्बन्ध हो सकता है ! इसीलिए मेरा मानना ह कि यीशु मसीह पूरब की संस्कृति और चेतना के ऐसे प्रतिनिधि हैं , जिनकी पशिचम नें हत्या कर दी ,दूसरी हत्या पशिचमीकृत भारत के अचेतन धार्मिक अनुयायी नें गांधी की बीसवीं शताब्दी में की जिसे मैं इस्लाम की प्रतिक्रिया में भारतीय सभ्यता के पषिचम से संक्रमण की स्वााभाविक एवं ऐतिहासिक प्रतिनिर्मित में उपजे -सांस्कृतिक दृषिट से मुसिलमीकृत हिन्दू के हाथों हुर्इ मानता हूं । इस्लाम के सांस्कृतिक प्रतिरोध में निर्मित हिन्दू जिसका जन्म ही शरीर में बनने वाले प्रतिजैव की तरह प्रति- इस्लामी है । इस संक्रमित इस्लामीकृत हिन्दू का सांस्कृतिक अचेतन भी मैं पूरब के विकेन्æीकृत शकित-संरचना तथा  र्इश्वर की अवधारणा सम्बन्धी अचेतन के अनुरूप भारतीय नहीं मानता ।
            वस्तुत: पूरब लम्बे समय तक सामुदायिक-सांस्कृतिक सत्ताओं को ही जीने का आदी रहा है.....


more......


         एक नयी व्यवस्था को पानें की दिशा में भविष्य-चिंतन परिकल्पना,योजना और यूटोपिया के रूप में हो सकता है । खतरा यह है कि अधिकांश यूटोपिया अपनें निर्माण के समय की वास्तविकताओं की प्रतिकि्रया में ही जन्म लेते हैं । लेकिन उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें सार्वभौम मान लेते हैं । इस समझ के अभाव में किसी यूटोपिया या विचारधारा के पाश्र्व-दुष्प्रभाव का चिन्तन नहीं हो पाता । इस तरह हर परिकल्पनात्मक विचारधारा एवं यूटोपिया में
मनवीय प्र्यावरण के विनाश के कुछ खतरे हो सकते हैं ।

विचारधारा और मानवीय समाज

अधिकांश विचारधाराएँ वर्तमान व्यवस्था की अपर्याप्तता का अतिक्रमण करने और मनुष्य की भविष्योन्मुख सृजनशीलता तथा उसकी प्रत्याशी कल्पनाशीलता का परिणाम हैं..विचारधाराओं के निर्माण की तात्कालिक परिस्थिति और उनके लोकप्रिय होने की समकालीन मानवीय आवश्यकताओं को देखें तो किसी भी यूटोपिया के ऐतिहासिक आधार को समझा जा सकता है .क्योंकि हर विचारधारा का अपना देशकाल और अपेक्षाओं-इच्छाओं का अपना मानवीय पर्यावरण होता है ,इस लिए जब दूसरी पारिस्थितिकी और समय में उसे पूरी तरह सही मानकर जीने का प्रयास करते हैं तो जीवन या तो पिछड़ता है या फिर विकृत होता है.ऐसी विचारधाराएँ असुविधा,गतिरोध और तनाव पैदा कराती हैं . क्योंकि अधिकांश विचारधाराएँ और यूटोपिया अपने निर्माण के समय की वास्तविकताओं की प्रतिक्रिया में ही जन्म लेते हैं ,लेकिन उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें सार्वभौम और सर्वकालिक मन लेते हैं.इस समझ के अभाव में किसी यूटोपिया या विचारधारा के साइड -इफेक्ट का चिंतन नहीं हो पाता.इस तरह हर यूटोपिया में मानवीय पर्यावरण के विनाश के कुछ खतरे हो सकते हैं..
             वस्तुतः सभ्यता के बहुत से आयाम हैं और हो सकते हैं .इसी तरह व्यवस्था -चिंतन के भी  बहुत से आयाम हो सकते हैं.शासन-सत्ता का स्वरूप ,उसकी प्राथमिकताएं और नियम,नागरिकों या शासितों के अधिकार या नियम आदि व्यवस्था-चिंतन करने वाली विचार-धाराओं के मुख्या-विषय रहें हैं . इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोई भी विचारधारा तकनीक और विज्ञानं की व्यावहारिक प्राथमिकताओं को ही प्रभावित कर सकती है ,उसकी ज्ञानात्मक सैद्धांतिकी को नहीं .
    व्यापक लोकप्रियता और संस्कारगत मानवीय उपस्थिति के कारण विचारधाराए प्रायःअतीतजीविताको बढावा ही देती हैं.सामजिक अनुकरणशीलता में पुनरुत्पादित होने के कारण वे अतीतोंमुखी समाज की रचना भी करती हैं इसी लिए आधुनिक होना सदैव नया होना ही नहीं होता ,न ही आधुनिक सभ्यता से आशय पूरी तरह वर्तमान की अद्यतन सभ्यता ही है .दरअसल हम जाने -अनजाने यथार्थ का कालान्तरणकर रहे हैं -प्राचीन को आधुनिक बना रहे हैं .अतीत और वर्तमान दोनों ही एक साथ उपस्थित हैं .वस्तुतः आधुनिक और वर्तमान में फर्क है .विडम्बना याह है की जो वर्तमान है वह आधुनिक नहीं है और जो आधुनिक है वह वर्तमान नहीं है .आज का वर्तमान इतिहासग्रस्त है .अतीत का पुनरुत्पादन किया जा रहा है .इसी तरह हमारी सामूहिक जीवन अथवा सभ्यता की यात्रा वांछित-अवांछित,सुनियोजित-अनियोजित भविष्य के साथ,भविष्य की ओर हो रही है .
             इस  दृष्टि से जब वर्तमान को देखता हूँ तो पता हूँ कि अलग मानसिकता और संस्कृति के कारण समाज में ऐच्छिक विक्षोभ का भी अलग-अलग स्तर दिखता है .कम इच्छाएँ विकास की इच्छा और आवश्यकताओं के बोध को सीमित कराती हैं .इस लिए जब  कोई विचारधारा मानव-इच्छाओं को प्रेरित-प्रभावित कराती है तो वह मानवीय पर्यावरण और आविष्कारों को भी प्रभावित करने की स्थिति में होती है -चाहे वह गांधीवाद ही क्यों न हो .उदहारण के लिए देंखे तो गांधीवाद  पूंजीवाद को नैतिक और मानवीय बनता है .बनाने की अपील करता है .वह कुछ अधिक विश्वासी है .जबकि मार्क्सवाद एक नकारात्मक नियामक है और वह मनुष्य को असभ्य ,अनैतिक और अमानवीय बनाने का अवसर ही नहीं देता .मानव -मनोविज्ञान की दृष्टि से दोनों की ही आलोचना की जा सकती है .गांधीवाद का तरीका मानव-इच्छाओं की निगरानी करने का है .व्यक्ति की इच्छाओं को अनुशासित और परिसीमित करने के कारण गांधीवाद जिस मनुष्य को निर्मित करेगा वह नैतिक दृष्टि से सज्जन और भद्र पुरुष तो होगा लेकिन उसमे सृजनशीलता की कल्पनाशक्ति कुण्ठित हो सकती है .बहुत प्रभावी होने पर वह बहुत सी तकनीकों और आविष्कारों को हतोत्साहित कर सकता है .
               इसके विपरीत मार्क्सवादी विचारधारा के आधार पर निर्मित व्यवस्था की अयोग्यता भिन्न प्रकार की होगी .वह पूंजी की उन्मुक्त और निर्बाध सृजनशीलता के अधिकार को सीमित करना चाहता है इस तरह वह अभिप्रेरणा के स्तर पर सृजनशीलता के आनंद को कुण्ठित करता है . इस दृष्टि से मार्क्सवाद नकारात्मक है .
सामूहिकता में चलने -चलाने की उसकी इच्छा की तुलना परेड में चलने से की जा सकती है .वह कदमताल को अधिक महत्व देता है .
                 मार्क्सवाद में से दमन ,अविश्वास और तानाशाही को निकालकर उसमे पूंजी -निर्माण की सामूहिक और सकारात्मक सृजनशीलता को बल देने वाली व्यवस्था लाईजा सकती है .मार्क्सवाद को लेकर एक और समस्या यह है कि नियामक विचारधारा होने के कारण मार्क्सवाद संवादी नहीं है .उसकी सैद्धांतिकी बाजार और मुद्रा दोनों को ही व्यर्थ और ध्वस्त कराती है .बाजार के पास मांग और पूर्ति का सटीक सूचनातंत्र तो होता है ,किन्तु मानवीय संवेदना और नैतिक चेतना विभाजित और वर्ग-आधारित होता है.नए मार्क्सवाद को मार्क्सवाद की नैतिक चेतना और संवेदना के साथ बाजार से संवादी होना भी सीखना होगा .क्योंकि बाजार मानवजाति की सृजनशीलता का सर्वोत्तम संग्रहालय भी है .

सामाजिक मुक्ति में भाषा-बोध की युक्ति


प्राचीन भारत में जाति नहीं बदली जा सकती थी लेकिन जाति की निरर्थकता को समझा जा सकता था .क्योंकि वह प्राचीन कालसे ही माया-जगत का हिस्सा और किस्सा रहा है.एक पूरी जाति इस मायावाद के प्रचार में लगी रही.यह सब प्राचीन आदर्शवाद का हिस्सा था .आज जब कि भारत में बलात्कारी बढ़ गए हैं .भारत की प्राचीन सांस्कृतिक अभियांत्रिकी यद् आती है.तब स्त्री-संसर्ग से विरत रहने वाला महिमा-मंडित किया जाता था .लक्ष्य पुरुषोत्तम बनाने का था .ब्रह्मचारी रहना एक चुनौती पूर्ण लक्ष्य था .पुरुष होने के बोध से मुक्त एक जीवन .सदाचारी होना पुरुषार्थ के लिए एक चुनौती था .
       संभव है कि ऐसे लोगों ने भौतिकवादी अर्थ में स्त्री -संसर्ग से विरत रहकर अपना नुकसान किया हो .लेकिन उन्होंने समाज को एक संयमी जीवन जीने का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य दिया था .संभवतः यौन -भावना के प्रति नकारात्मक चिंतन से ही उसके हारमोनो को जीता जा सकता था .उन्होंने ऐसा ही किया .उन्होंने मानवीय अस्मिता  से सम्बंधित ज्ञान की निरर्थकता को अपने भाषा -चिन्तन  के क्रम में पाया था .शब्दों के अर्थ की प्रकिया को समझते-समझाते वे ज्ञान से परे के उस चित्त तक पंच पाए ,जहाँ से शब्दों की अर्थवान दुनिया शुरू होती है .भाषावैज्ञानिक चिंतन के क्रम में ही वे अवधारणाओं से पर के उस रहस्यमय अपरिभाषित चित्त को जान पाए थे जिसे नेति -नेति कहा और ब्रह्म भी .भारतीय लोक के ज्ञानात्मक  अतिक्रमण के लिए यह लोकोत्तर प्रवास जरुरी था -चाहे यह ज्ञान या बोध के स्तर पर ही क्यों न रहा हो
       मेरी दृष्टि में आज भी इस भाषा बोध की आवश्यकता बनी हुई है .यह चाहे रहस्यमय और सर्वव्यापी ईश्वर की उपस्थिति या साक्षात्कार के रूप में न हो ,लेकिन यह भारतीयों के विषमतापूर्ण अस्मिताकरण से मुक्ति के लिए अब भी प्रासंगिक हो सकता है अर्थकरण की प्रक्रिया को पहचानकर हम अपने चित्त के जातिकरण की प्रक्रिया को भी पहचान सकते हैं और उससे मुक्त हो सकते हैं . .
         इस परिप्रेक्ष्य में रखकर देंखें तो भारतीयों की समस्या यह है कि जन-सामान्य सिर्फ भाषा का प्रयोग ही जानता है ,उसका मर्म नहीं  ।वह अपने अधिकांश-बोध में भाषा की स्थार्इ निर्मिति या वस्तु उत्पाद की तरह है । भाषा का एक जड़ संसार उसकी अर्थजीवी चेतना को नियनित्रत करता है । प्राचीन भारतीय विद्वानों नें भाषा के पार की उस दुनिया को जीवन और संसार की सीमा से परे ब्रहम की सत्त के रूप में देखा । वे चाहते तो इस ज्ञान का उपयोग भारतीयों को जातिवादी कुण्ठा से निकालने के लिए कर सकते थे । लेकिन इससे भाषा-ग्रस्त मानव-संसाधन की सामाजिक अभियानित्रकी ध्वस्त हो जाती । उन्होंने लोक को जाति-चिन्तन के लिए छोड़कर एक सीमित वर्ग को ब्रहम-चिन्तन की ओर मोड़ दिया ।
          आज भी कर्इ लोग अपनी जाति और धर्म के लिए कुणिठत रहते है और कर्इ लोग र्इश्वर को होने न होने को लेकर । निहित स्वाथोर्ं के कारण मानव समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी नहीं चाहता कि लोग शासित होने और दूसरों को बड़ा मानने की अपनी आदत छोड़ें ।  वे लाभ की सिथति में हैं इस लिए किसी भी प्रकार से अपनी सांस्कृतिक-सामाजिक आदत या व्यसन कोे बनाए रखना चाहते हैं । यह जानते हुए भी कि शब्द के सच सामाजिक रूप से माने हुए ही होते हैं ,वे नहीं चाहते कि सामान्य जनता इस झूठ की भाषावैज्ञानिक- सृजनशीलता को जानें । शब्द-विज्ञान से देखें तो कौन कह सकता है कि र्इश्वर का नाम र्इश्वर ही है । शब्दों में निहित सारे अर्थ एक आभासी दुनिया की सृषिट करते हैं और दिमाग के भीतर चिन्तन के उपकरण के रूप में इश्तेमाल करने के लिए दिमाग के बाहर से लिए गए हैं । वे हमारे मसितष्क में बाहरी दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
         भाषा-विज्ञान के नजरिए से जब देखता हूं तो दलित-दलित चिल्लाना भी अप्रत्यक्ष रूप से नर्इ पीढ़ी को गुमराह करने के लिए एक भाषा-वैज्ञानिक झूठ को सच बनाने का कूटनीतिक उपक्रम ही लगता है । जो काम राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रभुत्वशाली वर्ग नें हजारों वषों्र तक किया उसे अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रभावित वर्ग का नेतृत्व स्वयं एवं सहर्ष कर रहा है ।
           मेरा मानना है कि प्राचीन एवं आधुनिक भाषा-विज्ञान का इश्तेमाल जातिवाद और साम्प्रदायिकता से मुकित के लिए किया जा सकता है । मैं कौन हूं का प्रश्न और तर्क सिर्फ प्राचीन भारतीयों की तरह सिर्फ ब्रहम को जानने के लिए ही नहीं किया जाना चाहिए ,इस बोध का उपयोग जाति और सम्प्रदाय-बोध से बाहर निकलने और निकालने के लिए भी किया जा सकता है । यह मुकितदायक-ज्ञानवद्र्धक प्रश्नोत्तर कुछ इसप्रकार होगा-
      प्रश्न- तुममैं कौन ?
      उत्तर- तुम  मैं एक माने गए शब्द हैं ।
      प्रश्न- कैसे शब्द ?
      उत्तर- दूसरों के द्वारा दिए गए अर्थ वाले ....
एक नए समाज की रचना पुराने शब्दों से दूरी बनाए बिना संभव नहीं है । यदि किसी को परम्परा से मिले अर्थ पसन्द नहीं हैं तो उससे अलग होने की सोचे और सामूहिक बहिष्कार जीना सीखे । सभ्यता या असभ्यता से मिले हीनता या श्रेष्ठताबोधक काल्पनिक किन्तु सच की तरह जिए जाने वाले भाषावैज्ञानिक यानित्रकबोध से बाहर निकलने के लिए भाषा एवं शब्द-विज्ञान की सहायता लेनी होगी । राजनीतिज्ञ तो झूठ को भी सचके रूप् में विज्ञापित कर दंगा करा देता है । इसप्रकार समस्या यही है कि विश्व के अधिकांश लोग आज भी भाषावैज्ञानिक दृषिट सेमूर्ख या अज्ञानी हैं । वे जिस चीज से मुक्त होने के लिए संशर्ष कर रहे होते हैं,उसे ही अपने कार्य और व्यवहार की जीवन-चर्या से सच करते जाते हैं ।

सभ्यता अभियांत्रिकी


हम सब सभ्यता रूपी अभियांत्रिकी के पुर्जे हैं .हम अपने समय और समाज से इतने प्रभावित रहते हैं की हम उससे बाहर निकल कर कुछ सोच हीं नहीं पाते हैं . सबसे बड़ी समस्या उस भावुकता की है जो सच्चे जुडाव
से पैदा  होती है . यह एक तरह से बचपन के प्रति हमारी वफादारी ही है . इस तरह हमारी  अच्छाई ही हमारी बुराई  बन जाती है.साम्प्रदायिकता की सबसे बड़ी समस्या यही है.हमारा ज्ञान ही हमें एक सभ्यतिक यंत्र बना देता है .हम सभी किसी न किसी संस्कृति से संस्कारित हैं .हमारा मस्तिष्क  बचपन से प्राप्त  सूचनाओं और आदतों का अतिक्रमण नहीं कर पता. हम सभी अभी  अभी इसी धरती पर लिखे गये पृष्ठों की तरह है..हम यह सोच ही नहीं पते की प्रभाव के रूप में ही सही हमारी इच्छाएं  और मानसिकता तक दूसरो ने ही लिखी है.. हम जीवन भर क्रियाएँ नहीं प्रतिक्रियाएं करते है .क्योकि हम जो कुछ करते या जीते है उसके निर्धारक प्रायः दूसरे ही होते है 
         इस साभ्यतिक अभियांत्रिकी का एक दूसरा पक्ष भी है.किसी भी काल के मनुष्य का मस्तिष्क सिर्फ आनुवांशिक ही नहीं ,बल्कि ज्ञान के दीर्घकालीन विकास और उत्तराधिकार का भी परिणाम है .हर पीढ़ी का मनुष्य अनुभव एवं सृजन की लम्बी परम्परा का परिणाम है .मानव विकास की यात्रा में उसे समय और संस्करण के विशेष पाठ के रूप में पहचाना जा सकता है .पाठ की यह भिन्नता अलग समूहों और समुदायों के अलग विकास के रूप में भी है .इसके अतिरिक्त मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी रहा है .अनुकरण वृत्ति और समर्थन उसकी सामाजिकता के प्रमुख स्वभाव हैं उसकी सामाजिकता के प्रमुख निर्धारक हैं .इस लिए एक सीमा के बाद मौलिकता की विशेष दावेदारी नहीं की जा सकती .हमारे व्यक्तित्व का अधिकांश प्रशिक्षणात्मक पुनरावृत्ति या आदत के रूप में होता है .समाज का यह प्रशिक्षण-तन्त्र हमें किसी समुदाय -विशेष की सभ्यता के अवयवी यन्त्र -विशेष के रूप में ढालता है .हमारा व्यवहार एक आदत की जड़ता के रूप में पुनार्घटित  होता रहता है .

शनिवार, 5 जनवरी 2013

मस्तिष्क -पाठ

मेरे लिए हर मस्तिष्क एक पाठ है
किसी आदिम गुफा में बन्द
सीलन भरी ठहरी हवा की तरह
मैं उसे नापसंद कर सकता हूँ ....

मेरे लिए हर इतिहास एक कल्पना है
और उसको अलग-अलग समूहों में
जाति की तरह जी रहे सारे लोग कल्पनाजीवी

मैं उसे तथाकथित सम्भ्रान्त व्यक्ति की शातिर मुस्कान और
पार्क के दूसरी छोर पर बने कूड़ा -घर के पास
हंसते हुए बैठे
उस पागल की हंसी की तरह पढ़ सकता हूँ

मैं पढ़ सकता हूँ
सड़क के दूसरी ओर जा रही उस स्त्री को
घूरते हुए उस आदमी का दिमाग
जिसकी चुभन से बचने के लिए
उसने अपनी चाल तेज कर दी है
और लगभग भागती हुई -सी
किसी शिकार की तरह निकल जाना चाहती है
शिकारी परिदृश्य के बाहर.....

वह लुच्चा जो अपनी आँखों से
खोद देना चाहता है उस युवती की देह .....

तीन विचार कविताएं


सृष्टि के अन्त की वैज्ञानिक भविष्यवाणियों पर 


मैं मरूँगा और धरती के साथ मरूँगा
या फिर मरूँगा अपने ब्रह्माण्ड अपनें अंतरिक्ष  के साथ
उस दिन जब धरती कांपने लगेगी प्यासी
थकने लगेगा बूढ़ा ब्रह्माण्ड
सारा समुद्र वाष्प बनाकर उड़ जाएगा अंतरिक्ष में
और मेरे बूढ़े मरणासन्न पिता की तरह
धौंकती सांसों के साथ हांफने लगेगा सूरज
हाँ उस दिन जब धरती पर सिरफिरे अपराधियों की तरह
नृत्य करने लगेंगी पागल सौर हवाएं ....

हाँ उस दिन जब मैं डूबते पोत के कप्तान की तरह
अपनी धरती के साथ बूढ़े सौर समुद्र में
डूब मरने के लिए अपनी आँखें बंद कर लूँगा
हाँ उस दिन जब बिना किसी किताब को पढ़े
जीवन के पर्यावरण को रौद रहा होगा समय का यमदूत
हाँ उस दिन जब ईश्वर अपनी आँखें बंद कर रहा होगा
चिर-निद्रा में सो जाने को तैयार
हाँ उस दिन जब बूढ़ा सूर्य डूब रहा होगा
अपनी ही सृष्टि में ...

हाँ उस दिन जब मेरी मौत
धर्म-ग्रंथों के आश्वासनों के बाहर
ब्रह्माण्ड के नियमों के अधीन होगी
उस दिन हाँ उस दिन के लिए छोड़ दो तुम
ताकि मैं एक बहादुर की मौत मर सकूँ
अपनी प्यारी धरती के साथ !

हाँ उस दिन....उस दिन आखिरी बार बूढ़ा होकर
मर जाऊंगा मैं
एक प्रवाहमान जीवनधारा के अंत की तरह
उस दिन बूढी मानव-जाति की बूढी देह
लड़खड़ाती हुई गिर पड़ेगी धरती पर हमेशा-हमेशा के लिए
जीवन उड़ जाएगा वाष्प होकर
वाष्प अणुओं-परमाणुओं में टूटकर ऊर्जा में बदल जाएगा
मेरे अधरों के निर्माता परमाणु भी
अग्नि के एक विराट अट्टहास में बदलकर  चल पड़ेंगे
हजारों प्रकाश वर्ष दूर
जहाँ से देख रहा होगा नया-नया जन्मा हुआ
एक नन्हा -सा ईश्वर
अपनी नई मुस्कान के साथ.....


"डब-मैंन"


दो बड़े कबीले रहते हैं मेरे शहर में
सामूहिक संक्रमण के शिकार
दो अलग -अलग प्रजाति के वायरस के शिकार दो बड़े समूह
हजारों वर्ष पुरानी घटनाओं पर आंसू बहाते हुए
अपने-अपने कथा-नायकों के दुःख से दुखी
और सुख से सुखी होते हुए
अत्यन्त सामूहिक क्रूरता के साथ डरते हुए कि
दूसरे के दुःख से दुखी होते ही
 ख़त्म हो जाएगा उनका वजूद ...

वे सभी ऐसे अपराध-बोध से ग्रस्त हैं
जो उन्होंने किया ही नहीं है
वे दुखी हैं दुख के उस पल की अपनी अजन्मी अनुपस्थिति के लिए
अपनें कुछ भी न कर पाने की असमर्थता के शोक में डूबे
वे रोना चाहते हैं अनन्त काल तक
कुछ ऐसे की उनका कोई निजी दुःख ही नहीं रहा हो कभी .....

वे ग्रस्त हैं सिर्फ अपने ही नायकों के दुःख से
वे अत्यन्त क्रूरता के साथ दूसरों के नायक के दुःख से
दुखी होने से बचाना चाहते हैं
वे ईमानदार हैं अपनी-अपनी स्मृतियों के
अति शुद्ध पाठ के प्रति
अलग-अलग फिल्मों की अलग-अलग सीता की तरह
गुजरे हुए जय -ग्रंथों की
अपनी प्रिय धुन को बजा रहे हाँ वे
पूरी शक्ति के साथ .....

समय में और समय में नहीं ....


मैं अपने समय में हूँ
मैं इतना स्वतन्त्र हूँ कि
अपने हिस्से के समय को जी सकता हूँ !
लेकिन 'माफ़ कीजिएगा'-मैं अपने प्रति
पुरे सम्मान और सहानुभूति के साथ
आपका अपने समय में न होने का
शोक-गीत लिखना चाहता हूँ !

आपकी तरह मैं भी बीते हुए कल की संतान हूँ
लेकिन आप तो बीता हुआ कल ही हैं
मेरे समय के जीवित अतीत !

जो अपने समय में नहीं हैं
उनकी रुलाइयाँ छूट रही हैं सडकों पर
जो अपने समय में नहीं हैं
बिता हुआ कल उनके भीतर
गंदे जल-सा सड़ रहा है

वे मुस्करा रहें है
बीते हुए ज़माने की अच्छाइयों पर
युगों पहले के नायक पर रीझते हुए
वे स्वयं को नायक बनाना भूल गए हैं
वे अपने मस्तिष्क में बंद हैं और
तूफानी समुद्र में लावारिस भटकते किसी
भग्न पोत की तरह डूब रहे हैं अपनी स्मृति में ....

वे इस तरह हैं कि
जैसे कहीं हो ही नहीं
वे साथ-साथ न होते हुए होने में ही खुश हैं
वे डरते हैं कि स्वयं को होने और जीने के क्षणों में
वे घोषित कर दिए जाएँगे विधर्मी
हो जाएँगे प्रतिबंधित स्वार्थों की लेन-देन में ....

वे एक जीवित इतिहास हैं
और इतिहास को जीवित रखने के प्रयास में
मारे जा चुके हैं वे

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

व्यवस्था की सर्जना ,वर्जना और संवेदन्शीलता

विधि-व्यवस्था से सम्बंधित जब भी कोई नया संकट और आपराधिक घटनाएँ सामने आती हैं ;उसके तल्कालिक प्रतिरोध में और कड़ा कानून बनानें की मांग तेज हो जाती है.जबकि सच्चाई यह रहती है कि पहले से बने कानून के पालन की देश में न कोई प्रशासनिक कार्य-संस्कृति है और न ही कोई प्रचारतंत्र .कई बार प्रशासनिक अक्षमता को भी कानून के अभाव या असमर्थता के रूप में देखा जाने लगता है .जबकि कई बार समस्या नागरिक बोध के अभाव की भी होती है .
          लेकिन शासन करना केवल पुलिस के सहारे ही शासन करना नहीं है .सबसे अच्छा शासक एक जीवन्त समाज के शीर्ष नेतृत्व के रूप में उपस्थित होता है .जब-जब ऐसा नहीं होता संस्थागत नेतृत्व एक व्यक्तित्वहीन उपस्थिति बनकर रह जाता है .हम एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं ,जबकि शीर्ष नेतृत्व सिर्फ औपचरिक होकर रह गया है .सत्तासीन दल के परिवारवादी पृष्ठभूमि के कारण सब जानते हैं कि सत्ता का मूल केन्द्र कहीं और है.औपचरिक नेतृत्व का चरित्र किसी राजनेता के स्थान पर नौकरशाह का लगता है .
यह एक कार्यकारी नेतृत्व है जो व्यवस्था के अभियांत्रिक सहजता के साथ एक संवादहीन मौन के साथ सक्रिय है .
           मूलत: यह राजनीतिक व्यक्तित्वहीनता का समय है किसी के पास कहने-सुनने के लिए कुछ भी नहीं है ,यहाँ तक कि राजनीतिक रूप से सोचने के लिए भी .यह राष्ट्रवादी ध्रुवीकरण का समय नहीं है .अठारहवीं शताब्दी की दैत्याकार अभियांत्रिकी और विचारधाराओं के स्थान पर यह माइक्रो-अभियांत्रिकी का युग है .सुख की निरन्तर विकसित होती अभियान्त्रिक सुविधाओं वाली भौतिक सभ्यता नें एक निष्क्रिय और अंतर्मुख मौन समाज पैदा किया है .अब सत्ता भी एक ऐसा चैनल है ,जिसे देखना अपरिहार्य या अनिवार्य नहीं है .सच तो यह है कि मनोरंजन के लिए नित - नए खुल रहे चैनलों नें सरकारी चैनलों को अलोकप्रिय और अनुपस्थित कर दिया है .अब राष्ट्र का छवि-निर्माण भी बाजार के हवाले कर दिया गया है .
प्रथम-द्रष्टाया यह स्थिति उदार और लोकतान्त्रिक स्वतंत्रता की सूचक है तो दूसरी ओर शासकीय प्रसारण के अदृश्य एवं अनुपस्थित होते जाने की भी .इसे इस तरह भी लिया जा सकता है कि सरकार की कोई खबर नहीं है यानि सब ठीक है . केन्द्रीय सत्ता का इस तरह चुप होते जाना कि दिल्ली में लम्बे समय से अवैध ढंग से बस चला रहे चलकों-परिचालकों को लगे कि कहीं कोई सरकार ही नहीं है .वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं कुछ भी कर देने के लिए .यह चुप्पी पसंद देश के शीर्ष नेतृत्व का साइड -इफेक्ट है.इस दिशा में देश के शीर्ष नेतृत्व को कुछ बोलते रहना भी चाहिए.ताकि कम बुद्धि वाले जनसामान्य और आपराधिक प्रकृति वालों को लगे कि कोई है .
           दूसरी बात नई -नई घटनाएँ और दुर्घटनाएँ ज्यों-ज्यों सामने आती हैं ,सार्वजानिक व्यवस्था का परिष्करण और परिकल्पन होते रहना चाहिए .यह सच है कि कई बार मानवीय घटनाएँ और दुर्घटनाएँ सामान्य अनुमान से आगे निकल जाती हैं ,लेकिन उनकी संभावनाओं की परिकल्पना करना एक सृजनशील
सत्ता के लिए जरुरी है.एक बेहतर सत्ता अधिक सृजनशील होकर अनेक समस्याओं का निवारण कर सकती है .
            क्योकि जनसँख्या वृद्धि के साथ भीड़ बढ़ रही है ,भारत में अधिकांश शहरों में सार्वजानिक जीवन जीना अत्यन्त ही श्रम-साध्य होता जा रहा है .ट्रैफिक जाम की स्थिति को देखते हुए भारत के अधिकांश महानगरों में हेलीकाप्टर जैसे साधनों से युक्त निःशुल्क हवाई एम्बुलेंस सेवा की जरूरत है .यह सेवा पर्यटक स्थलों पर तो भारत में उपलब्ध है लेकिन जनता के लिए नहीं.
             भारत में आपराधिक जीन और विदेशी साज़िशों की निगरानी की सतत -सजग मशीनरी होना भी आवश्यक है .यह सच है की अधिकांश जनता को सतत भयभीत करते रहना आवश्यक नहीं है ,लेकिन मंद-बुद्धि एवं अल्प-शिक्षित नागरिकों के लिए भय आवश्यक है .पूरी तरह भय-मुक्त होने पर उनमें आपराधिक प्रवृत्तियां उभर सकती हैं .उन्हें सत्ता की मशीनरी द्वारा उपस्थिति-सूचक भय द्वारा ही नियंत्रित और अनुशासित रखा जा सकता है .
            अंतिम बात यह है कि प्रशासनिक उपेक्षा शासन की क्रूरता और नकारेपन का प्रदर्शन करती है
सडकों पर पड़े बेसहारा लोग,पागल और भिखमंगे एक सम्वेदंशुन्य सत्ता के होने का पता देते हैं .अधिकांश सरकारें मुझे इस ओर से उदासीन दिखाती हैं .जबकि यह एक क्रूर और संवेदन शून्य सत्ता का विज्ञापन ही है .

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

मृत्यु -शोक और ...

भारत की मुख्य समस्या यह है किउसमें पेशेवर राजनीति का अभाव है और उसके नेताओं में सृजनात्मक इच्छा शक्ति और कल्पना का भी .यह एक बड़ा देश है.इस लिए सामूहिक असंतोष और संगठित विद्रोह से पर्याप्त सुरक्षित है .यहाँ के परंपरागत वोट बैंक वाले लोकतंत्र नें राजनीतिक घरानों को विकसित किया है .ये राजनीति के व्यवसायी परिवार हैं .इनका अपना आर्थिक तन्त्र है ,जो एक सीमा तक राजनीति के बाजार को प्रभावित करने में सक्षम है .कुछ के पास जातिगत वोट है तो कुछ के पास परम्परागत या आनुवांशिक समर्थक .ये निष्ठाजिवी होने के कारण किसी भी निंदा -आलोचना के अयोग्य हैं .वे एक दुसरे की सीमाओं को जानते हैं और बहुत कम प्रतिस्पर्धी हैं .इसीलिए वे प्रायः मिल -जुल कर अस्तित्व में बने रहते हैं .क्योंकि उन्हें किसी क्रांति द्वारा सत्ता च्युत होने का तात्कालिक भय भी नहीं है,इसलिए वे बिना कोई रन बनाए पिच पर बने रहने की दृष्टि से पारंगत हो गए हैं .
       जातिवाद,सम्प्रदायवाद की जो अवरोधक मशीनरी ब्रिटिश सत्ता ने अपनी सुरक्षा के लिए विकसित की थी आज वह आजाद भारत के नेताओं के लिए भी सुरक्षा के कम आ रही है .राष्ट्रवाद की भावना का लोप हो रहा है और बाजारवाद हावी हो रहा है  लेकिन भारतीय राजनीति आज भी परिवारवाद से आगे नहीं बढ़ पाई है .उसे पेशेवर होने और अपनी सेवा पर आधारित होने में समय लगेगा .एक सभ्य समाज की स्थापना करने के रचनात्मक प्रयास हम भारतीयों में नहीं दीखते .इसका नेतृत्त्व अपने नाकारेपन के बावजूद भी स्वयं को सुरक्षित और अप्रभावित समझता है .
         उस पीड़ित लड़की की म्रत्यु भारतीय समाज और सत्ता के लिए शर्मनाक है .हम भारतीय दुर्घटनाओं और अपराधों के घटित होने की प्रतीक्षा करते रहते हैं उन अपराधियों की वहशी उत्तेजना के पीछे कोई अश्लील सी.दी. या फिर इंटरनेट भी हो सकता है सम्भव है कि विडियो कोच में यह सुविधा रही हो .फ़िलहाल उस अपराध को भी भारतीय नागरिकों  के बड़े समुदाय के घटिया स्तर की अभिव्यक्ति के रूप में देखना होगा .यह भी अध्ययन का विषय हो सकता है कि क्या वे सभी इतने आवारा थे कि भारी अवसाद में थे की उनकी कभी शादी ही इस सामाजिक व्यवस्था में नहीं होनी थी .यह अपराध उनके लिए एक प्रतिक्रियात्मक आत्महत्या की तरह है .ऐसे निरस्त और उजड़े असामान्य व्यक्तित्व समाज में अकेले ही तो नहीं हैं .विदेशी बाजार जो अश्लील फ़िल्में उपलब्ध करा रहा है ,वः भी इस तरह की आपराधिक प्रेरणाएँ दे सकता है .स्त्री को एक व्यक्तित्व के रूप में न देख कर देह के रूप में देखने दिखाने का बाजार एक अदृश्य खलनायक हो सकता है .इसके बाद इस तरह के पागलों से बचने के लिए अलग से व्यवस्था विकसित करनी होगी.
           मेरी दृष्टि में तत्काल जो किया जा सकता है ,कि भारत सरकार दिल्ली में महिला चालकों और परिचालकों से संचालित बसें और 
महिला चालकों द्वारा संचालित टैक्सियाँ चलवाए . निश्चित जगहों पर ही जहाँ बसें और टैक्सियाँ रुकें वहां पर कैमरों से रिकार्डिंग की व्यवस्था हो .बसों-टैक्सियों पर बगल में नम्बर लिखने की अधिसूचना तत्काल जरी हो.इससे रिकार्डिंग में बसों-तक्सियों के नंबर भी रिकार्ड हो सकेंगे .एम्बुलेंस की तरह ही आपात महिला-सेवा वाहन भी पुलिस थानों में हों और उनके नंबर जगह-जगह प्रदर्शित हों.
    

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

विचारधारा और मानवीय समाज

अधिकांश विचारधाराएँ वर्तमान व्यवस्था की अपर्याप्तता का अतिक्रमण करने और मनुष्य की भविष्योन्मुख सृजनशीलता तथा उसकी प्रत्याशी कल्पनाशीलता का परिणाम हैं..विचारधाराओं के निर्माण की तात्कालिक परिस्थिति और उनके लोकप्रिय होने की समकालीन मानवीय आवश्यकताओं को देखें तो किसी भी यूटोपिया के ऐतिहासिक आधार को समझा जा सकता है .क्योंकि हर विचारधारा का अपना देशकाल और अपेक्षाओं-इच्छाओं का अपना मानवीय पर्यावरण होता है ,इस लिए जब दूसरी पारिस्थितिकी और समय में उसे पूरी तरह सही मानकर जीने का प्रयास करते हैं तो जीवन या तो पिछड़ता है या फिर विकृत होता है.ऐसी विचारधाराएँ असुविधा,गतिरोध और तनाव पैदा कराती हैं . क्योंकि अधिकांश विचारधाराएँ और यूटोपिया अपने निर्माण के समय की वास्तविकताओं की प्रतिक्रिया में ही जन्म लेते हैं ,लेकिन उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें सार्वभौम और सर्वकालिक मन लेते हैं.इस समझ के अभाव में किसी यूटोपिया या विचारधारा के साइड -इफेक्ट का चिंतन नहीं हो पाता.इस तरह हर यूटोपिया में मानवीय पर्यावरण के विनाश के कुछ खतरे हो सकते हैं..
             वस्तुतः सभ्यता के बहुत से आयाम हैं और हो सकते हैं .इसी तरह व्यवस्था -चिंतन के भी  बहुत से आयाम हो सकते हैं.शासन-सत्ता का स्वरूप ,उसकी प्राथमिकताएं और नियम,नागरिकों या शासितों के अधिकार या नियम आदि व्यवस्था-चिंतन करने वाली विचार-धाराओं के मुख्या-विषय रहें हैं . इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोई भी विचारधारा तकनीक और विज्ञानं की व्यावहारिक प्राथमिकताओं को ही प्रभावित कर सकती है ,उसकी ज्ञानात्मक सैद्धांतिकी को नहीं .
    व्यापक लोकप्रियता और संस्कारगत मानवीय उपस्थिति के कारण विचारधाराए प्रायःअतीतजीविताको बढावा ही देती हैं.सामजिक अनुकरणशीलता में पुनरुत्पादित होने के कारण वे अतीतोंमुखी समाज की रचना भी करती हैं इसी लिए आधुनिक होना सदैव नया होना ही नहीं होता ,न ही आधुनिक सभ्यता से आशय पूरी तरह वर्तमान की अद्यतन सभ्यता ही है .दरअसल हम जाने -अनजाने यथार्थ का कालान्तरणकर रहे हैं -प्राचीन को आधुनिक बना रहे हैं .अतीत और वर्तमान दोनों ही एक साथ उपस्थित हैं .वस्तुतः आधुनिक और वर्तमान में फर्क है .विडम्बना याह है की जो वर्तमान है वह आधुनिक नहीं है और जो आधुनिक है वह वर्तमान नहीं है .आज का वर्तमान इतिहासग्रस्त है .अतीत का पुनरुत्पादन किया जा रहा है .इसी तरह हमारी सामूहिक जीवन अथवा सभ्यता की यात्रा वांछित-अवांछित,सुनियोजित-अनियोजित भविष्य के साथ,भविष्य की ओर हो रही है .
             इस  दृष्टि से जब वर्तमान को देखता हूँ तो पता हूँ कि अलग मानसिकता और संस्कृति के कारण समाज में ऐच्छिक विक्षोभ का भी अलग-अलग स्तर दिखता है .कम इच्छाएँ विकास की इच्छा और आवश्यकताओं के बोध को सीमित कराती हैं .इस लिए जब  कोई विचारधारा मानव-इच्छाओं को प्रेरित-प्रभावित कराती है तो वह मानवीय पर्यावरण और आविष्कारों को भी प्रभावित करने की स्थिति में होती है -चाहे वह गांधीवाद ही क्यों न हो .उदहारण के लिए देंखे तो गांधीवाद  पूंजीवाद को नैतिक और मानवीय बनता है .बनाने की अपील करता है .वह कुछ अधिक विश्वासी है .जबकि मार्क्सवाद एक नकारात्मक नियामक है और वह मनुष्य को असभ्य ,अनैतिक और अमानवीय बनाने का अवसर ही नहीं देता .मानव -मनोविज्ञान की दृष्टि से दोनों की ही आलोचना की जा सकती है .गांधीवाद का तरीका मानव-इच्छाओं की निगरानी करने का है .व्यक्ति की इच्छाओं को अनुशासित और परिसीमित करने के कारण गांधीवाद जिस मनुष्य को निर्मित करेगा वह नैतिक दृष्टि से सज्जन और भद्र पुरुष तो होगा लेकिन उसमे सृजनशीलता की कल्पनाशक्ति कुण्ठित हो सकती है .बहुत प्रभावी होने पर वह बहुत सी तकनीकों और आविष्कारों को हतोत्साहित कर सकता है .
               इसके विपरीत मार्क्सवादी विचारधारा के आधार पर निर्मित व्यवस्था की अयोग्यता भिन्न प्रकार की होगी .वह पूंजी की उन्मुक्त और निर्बाध सृजनशीलता के अधिकार को सीमित करना चाहता है इस तरह वह अभिप्रेरणा के स्तर पर सृजनशीलता के आनंद को कुण्ठित करता है . इस दृष्टि से मार्क्सवाद नकारात्मक है .
सामूहिकता में चलने -चलाने की उसकी इच्छा की तुलना परेड में चलने से की जा सकती है .वह कदमताल को अधिक महत्व देता है .
                 मार्क्सवाद में से दमन ,अविश्वास और तानाशाही को निकालकर उसमे पूंजी -निर्माण की सामूहिक और सकारात्मक सृजनशीलता को बल देने वाली व्यवस्था लाईजा सकती है .मार्क्सवाद को लेकर एक और समस्या यह है कि नियामक विचारधारा होने के कारण मार्क्सवाद संवादी नहीं है .उसकी सैद्धांतिकी बाजार और मुद्रा दोनों को ही व्यर्थ और ध्वस्त कराती है .बाजार के पास मांग और पूर्ति का सटीक सूचनातंत्र तो होता है ,किन्तु मानवीय संवेदना और नैतिक चेतना विभाजित और वर्ग-आधारित होता है.नए मार्क्सवाद को मार्क्सवाद की नैतिक चेतना और संवेदना के साथ बाजार से संवादी होना भी सीखना होगा .क्योंकि बाजार मानवजाति की सृजनशीलता का सर्वोत्तम संग्रहालय भी है .

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

प्रतिरोध में ब्राह्मणवाद! और समय के कैंसर



प्रतिरोध में ब्राह्मणवाद ! 


अभी मैं आगरा-मथुरा के पर्यटन से लौटा हूँ
और हतप्रभ रह गया
ब्राह्मणवाद की ताकत प्रतिरोध और आजीविका की शैली देखकर
क्या अदा है ब्राह्मणवाद के चुपचाप दुनिया जीतने की
इनसे तो सीखना चाहिए मार्क्सवादियों को भी .....

वे एक पुराने राजा की प्रशंसात्मक स्मृति से
समय के राजा  को अप्रतिष्ठित कर देते हैं
अपने गगनचुम्बी किले में बैठा हुआ झींकता रहता है राजा
करता रहता है ईर्ष्या अतीत के सम्मानित राजा से
बीते ज़माने का राजा जो समय में न होते हुए भी
हर पल के मानवीय समय में है
उसे देता हुआ मानक श्रेष्ठता की चुनौतियां

गया राजा जिसने एक जातिके पुरखों को खुश कर दिया था
और जिसकी कृतज्ञता में
आज भी उसके गुणगान में लगे हैं जाति-विशेष के वंशज

समय के राजा का किला
अपने समय के आसमान को जीतने के बाद
अपने अभूतपूर्व होने के घमण्ड की मांग के बावजूद उपेक्षित खड़ा है
समय के दरबार के समानान्तर
जनस्वीकृति की शक्ति से खड़ा है एक और दरबार
स्मृतिलोक के अप्रतिम शासक के सम्मान में स्तुतिगान करता हुआ

एक सामूहिक जीवन-समय
अपनी रूचि पसंद और स्वीकार की कसौटी पर
समय की वास्तविक विजेता शक्तियों को
मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता के साथ अस्वीकार कर रहा है

यह एक अहँकार रहित होकर
भिक्षाटन से आजीविका अर्जित करने वाली
अपनी जातीय श्रेष्ठता की अभिमानी जाति का प्रतिरोध है
 जिसकी विजयों और युद्ध-नीति के बारे में
कितना कम जानते हैं हम और आप !

जो अपने समुदाय के अधिकृत योद्धाओं के पराजित होने के बाद भी
बिना हारे लड़ती और जीतती आई है
अहंकार रहित हारी हुई सी  दिखने के बावजूद
एक बड़े समुदाय के मानस-लोक पर
चुपचाप राज करती हुई

समय के नापसंद राजा के समानान्तर
अतीत से खोज कर लाती हुई
मनोलोक के राजा का चरित और सौन्दर्य .....

व्यभिचार की स्वतंत्रता के अराजक सामंती समय में
अपनी एक ही पत्नी के लिए कुण्ठित क्यों होते हो जन-भाई
समय के राजा के पास तो मात्र तीन-चार ही रानियाँ हैं
अनुकरण मत करो
क्योंकि अनुकरण किया ही नहीं जा सकता
मनोलोक के अतुलनीय एवं कालातीत लीलापुरुष का
उसके पास सोलह हजार रानियाँ हैं जो समय के राजा के बस की बात नहीं ....

एक पूरी जाति का गप्पी सृजन-तंत्र
समय की वास्तविकताओं के बहिष्कार और अस्वीकार में लगा हुआ है
लोक के स्मृतितंत्र पर सुनियोजित और संगठित वर्चस्व के साथ
गाते हुए समय को भजती और भाजती हुई  -राधे-राधे -राधे ....


समय के कैंसर 

जब हम एक जगह किसी मानवीय भूमिका में उपस्थिति होते हैं तो
उसी समय किसी अन्य मानवीय भूमिका के लिए
सामाजिक रूप से अनुपस्थित भी होते हैं
जब हम बन जाते हैं व्यवस्था के एक हिस्से के पुर्जे
दूसरे हिस्सों के लिए होते जाते हैं असंगत

कोई भी सर्वव्यापी नहीं हो सकता
एक व्यक्ति के रूप में
लेकिन प्रभाव के रूप में हो सकता है
उन संगठनो के कारण
जो एक व्यक्ति के विवेक कोसभी का विवेक बना देते हैं

होते हैं जिनके पास अपने ही समय के बंधुआ मस्तिष्क
और जो महानता की ओट में शर्मनाक ढंग से
दूसरों के लिए सोचते हैं
और बन जाते हैं समय के कैंसर


ज्ञान भी एक सम्पदा है 

सब कुछ बाँट देने के बाद भी
बचा रह जाएगा जिसे देकर भी दिया नहीं जा सकेगा
रह जाएगा अपने भीतर
अपनी निजी समझदारी के रूप में
जो एक भिन्न यात्रा से आई होगी और ले जाएगी अलग राह
जो एक अलग अनुभव की पृष्ठभूमि पर
पुष्पित और पल्लवित करेगी जीवन को...
यह ठीक है  किहम अपनी रुचियाँ और स्वभाव के लिए होते हैं जिम्मेदार स्वयं ही
और उसे किसी से भी साझा नहीं कर सकते

सब कुछ बराबर कर देने के बावजूद
रह जाएगा कुछ विषम -विसंगत
और यह सोचना कि
जो कुछ है अपने पास उसे दिया भी जाय या नही
ज्ञान जो परमाणु बम बनाने की प्राविधि के रूप में भी हो सकता है
और दुरुपर्योग किएजा सकने वाले अधिकार के रूप में भी

ज्ञान एक शक्ति है
इसी लिए सुरक्षा के लिए
स्वभाव और चरित्र मागती है

रविवार, 25 नवंबर 2012

हिन्दी का समकालीन साहित्यिक परिदृश्य : विश्लेषण एवं पुनर्विचार

 सृजन -संवाद 
संपादक -ब्रजेश
 में प्रकाशित लेख

हिन्दी के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य का र्इमानदार विश्लेषण उसकी सृजनशीलता को दुष्प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को सही ढंग से समझे बिना संभव ही नहीं है । हिन्दी जाति के अपने यथार्थ के अनुसार उसकी सृजनात्मक समस्याएं और चुनौतियां क्या हैं किन सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों से हिन्दी का लेखक वैशिवक धरातल पर कोर्इ बड़ी साहितियक कृति देने में अब तक असफल रहा है वे कौन से सामूहिक एवं सापेक्षिक भटकाव हैं ,जिनके कारण विकास के अपेक्षाकृत अपने छोटे से काल में अनेक प्रायोजित वाद और विवाद पैदा करके भी वैशिवक धरातल पर कोर्इ भी महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक चुनौती देने में हिन्दी जगत प्राय: असमर्थ रहा है आत्ममूल्यांकन की प्रक्रिया में ऐसे बहुत से प्रश्न सामने आ सकते हैं । कुछ ऐसे भी कि 'क्या यह सच नहीं है कि पूर्व में भी आधुनिक हिन्दी कविता का स्वर्ण युग कहे जाने वाले छायावाद के कवियों की भरपूर प्रशंसा भी हम उनके प्रभावकों जैसे रवीन्द्रनाथ टैगोर,शेली,कीटस आदि का नाम छिपाकर ही कर पाते हैं ! क्या यह सच नहीं है कि जोखिम से बचने एवं जातीय सुरक्षा पाने की अभ्यस्त हिन्दी जाति और उसके सम्पादक ,अपने लेखकों से प्राय: बिरादराना प्रभाव एवं अनुशासन में लिखी गयी रचनाओं की ही मांग करते हंै ?

     क्या यह एक र्इमानदार तथ्य नहीं है कि पशिचम की तरह हिन्दी में सृजन की सामाजिकता को मात्र स्कूल बनाने की प्रवृत्ति के रूप में ही नहीं देखा जा सकता ! पशिचम की मौलिक सृजनशीलता से अलग हिन्दी का साहितियक समाज 'जातीय(समूह-अनुमोदित) रचनाधर्मिता को ही अचेतन रूप से बढ़ावा देता रहा है । स्पष्ट रूप से यहां मेरा आशय डा0 रामविलास शर्मा की हिन्दी जाति से नहीं है ,बलिक मौलिक एवं विशिष्ट सृजन की विरोधी सर्वमान्य-सामान्य को सृजित करने के उस अघोषित मनोवैज्ञानिक दबाव से हैजिसके कारण हर नए लेखक को अपनी ही तरह का नहीं लिखना पड़ता है बलिक वैसा कुछ लिखना पड़ता हैजैसा लिखना दूसरों को बदलने की अधिक चुनौती न देता हो और जैसा लिखने पर लिखे हुए की स्वीकृति की संभावनाएं बढ़ जाती है।  इस प्रवृत्ति की व्याख्या बाजार के मांग एवं पूर्ति के नियम से भी नहीं की जा सकती है ,क्योंकि यह सृजन की सामाजिक अनुकूलता यानि दूसरों जैसा होने की होड़ को प्रोत्साहित करती प्रतीत होती है । हजारों वषोर्ं से प्राप्त जाति-जीवी होने का संस्कार हिन्दी सृजनशीलता कोे पूर्ण मौलिक विकल्प की खोज करने ही नहीं देता। इसे और स्पष्ट करते हुए कहें तो प्रकाशित होने और समर्थन पाने के अचेतन मानसिक दबाव में हम वैसा कुछ भी नहीं लिख और रच सकते जो हिन्दी बिरादरी के संस्कार,सोच और मुहावरे से बाहर की उपसिथति हो ।

        इस तरह अपनी रूढि़वादी पृष्ठभूमि और पारम्परिक संस्कार के कारण ;जाति में जीवित और सुखी रह पाने के अपने अचेतन असुरक्षा बोध के कारण हिन्दी मनीषा बहुत जल्दी ही जाति बनाने लग जाती है । उसका अधिकांश लेखन तर्ज की मर्ज का शिकार है । हिन्दी में ऐसी कर्इ पत्रिकाएं हैं ,जिनके स्वनामधन्य सम्पादकों की कृति-आस्वाद की आदतें एवं उनके मानक तीस वर्षों से भी नहीं बदले । ऐसी पत्रिकाओं ने अपने प्रभाव-क्षेत्र के लेखकों और उनके लेखन से प्रभावित होकर पढ़ती-लिखती आ रही परवर्ती पीढ़ी को कुछ इस प्रकार अपनी रुचि,सोचपसन्द-नापसन्दस्वीकार-अस्वीकार की निजी बौद्धिक सीमा में नियनित्रत और निर्देशित किया है कि हर पत्रिका और उसके द्वारा प्रकाशित साहित्य अपने अनुप्रभावित लेखक-समूह के साथ एक अलग जातीय स्कूल में बदल गए हैं ।

        हिन्दी पाठकों और लेखकों को सृजन की पृष्ठभूमि के रूप में प्राप्त सामाजिक यथार्थ को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो उन्नीसवीं शताब्दी के औधाोगिक क्रानित से लेकरबीसवीं शताब्दी के कम्प्यूटर क्रानित तकउसके अर्थ-तन्त्र एवं समाज नें स्वरूप बदला है । व्यापक उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचने के लिए विकसित विपणन तन्त्र ने मजदूरों को कारखानों से निकालकर सर्विस सेन्टरों एवं शो रूमों के प्रशिक्षित कर्मचारियों एवं कुलियों में बदल दिया है । आधुनिक आटोमेटिक मशीनों ने कारखानों से मजदूरों की भीड़ को बाहर कर दिया है । अब उनके लिए सेल्स मैन की भूमिका ही बची है । पूंजीपतियों की गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा और उपभोक्ताओं को आकर्षित करने अर्थ-युद्ध के बीच अतिरिक्त मूल्य एक काल्पनिक अवधारणा बन गयी है और उसके स्थान पर मध्यवर्गीय जीवन को पालने में सहायक विनिमय मूल्य एवं दलाल संस्कृति निर्णायक प्रमाणित हुर्इ है । इस सैद्धानितक अन्तर्विरोध से आंखे चुराते हुए भारतीय वामपन्थ पहले भारतीय किसानों की ओर बढ़ा फिर बढ़ती हुर्इ जनसंख्या और बंटती जमीनों के यथार्थ से पलायन कर वन-विभाग सम्बन्धी कानूनों से भूमि के सरकारी अधिग्रहण के विरुद्ध उपजे असन्तोष को हवा देने के लिए जंगलों की ओर निकल गया । एक समग्र एवं आदर्श साम्यवादी व्यवस्था और समाज के निर्माण में आने वाली चुनौतियों से मुंह चुराते हुए ,वैशिवक एवं औधोगिक पूंजीवाद से बचते-बचाते भारत में सर्वहारा की खोज आदिवासियों को वामपन्थ में दीक्षित करने के रूप में पूरी हुर्इ है या बनते हुए बाधों से हुए विस्थापितों के पुनर्वास की चिन्ता और संघर्ष के रूप में । भारतीय सामाजिक यथार्थ और उसके बुद्धिजीवियों के ऐसे ही कुछ वैचारिक सीमान्त है।

        सच तो यह है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में हिन्दी का साहित्यकारगांधीवाद और माक्र्सवाद की आदर्शवादिता से प्रभावित रहने के कारण वस्तुनिष्ठ हो ही नहीं पाता है । वह किसी नए प्रस्थान के लिए असमर्थ ,पराश्रित और मोहाच्छन्न है । उस समय तक जाति और सम्प्रदाय जैसी समस्याओं काें विमर्श का विषय बनानें में  वह अपनी हेठी समझता है । कुटुम्बीय परिवार की पृष्ठभूमि तथा जातीय समाज की मनोरचना के कारणस्त्री-स्वातन्«य एवं विमर्श का पाश्चात्य स्वरूप यहां आ ही नहीं सका क्योंकि आर्थिक वर्गान्तरण से जातीय वर्गान्तरणमनोवैज्ञानिक दृषिट से अधिक जटिल और संघर्षपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया है । पशिचम में जाति से अधिक कुलीनता-अकुलीनता की अवधारणा नें वर्गान्तर किया है । इसलिए वर्ग-विभाजन का आर्थिक आधार ही उनके लिए पर्याप्त था । इसके अतिरिक्त अपनी पिरामिडीय संरचना के कारण पूंजीवादी व्यवस्था का अधिकार-तन्त्र निम्नस्तरीय एवं अकुशल व्यकितयों को भी शोषण के बावजूद उनका इस्तेमाल करते हुए उन्हें संरक्षित भी करता था । संभवत: जटिल विकास के इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से बचने के लिए भारतीय वामपन्थ नें वन-विभाग से शोषितों के रूप में आदिवासियों एवं जनजातियों की खोज की । हिन्दी के अधिकांश प्रगतिशील साहित्यकार ,भारतीय वामपन्थ के विकास ,शोषण एवं संघर्ष की मुख्य भूमि को छोड़कर ,सशस्त्र संघर्ष के बावजूद नक्सलवाद की वैचारिक पलायनवादिता को सृजन एवं विचार की चुनौती के रूप में देखते ही नहीं ।

        अपनी भोली-र्इमानदार प्रतिबद्धता एवं संवेदनशीलता के साथ हिन्दी में माक्र्सवादी सिद्धान्तों और वामपन्थी क्रानित के सपनों पर आधारित प्रगतिशील साहित्य एक ऐतिहासिक सच्चार्इ है लेकिन इस सच्चार्इ ने जिस प्रतिगामी साहितियक सच्चार्इ को जन्म दिया है ,वह है सामाजिक यथार्थ का साहितियक यथार्थ में रूपान्तरण न कर पाने की विफलता । एक अवरुद्ध समाज अपने यथार्थ को देर तक परिवर्तित नहीं कर पाता । ऐसे में बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध के कथाकार प्रेमचन्द का इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध तक प्रासंगिक बने रहना उनकी प्रतिभा की महानता को जितना प्रमाणित करता है ,उससे अधिक भारतीय समाज के अवरूद्ध यथार्थ की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है । हिन्दी क्षेत्र के अपरिवर्तित यथार्थ नें उसके बहुआयामी साहितियक उपयोग की सम्भावना को सीमित किया है । यदि कथा-साहित्य को लें तो यथार्थ की अपरिवर्तनीयता नें लम्बे समय से हिन्दी की कथात्मक सृजनशीलता को औसत और आवृत्तिपरक बनाए रखा है । लम्बे समय तक कुणिठत यथार्थ के चित्रण से हिन्दी के पाठकों एवं लेखकों का  बौद्धिक अन्तराल घट रहा है । लेखक ऐसा नहीं लिख पा रहा है कि उसका लिखा पाठक को पढ़ने की चुनौती दे । वास्तविक घटनाएं जो लिखित रूप में ही समाचार-पत्रों और दृश्य मीडिया के माध्यम से पहुंचती हैं ,वह तेजी से बढ़ते विकास के साथ अधिक लाेंमहर्षक और अविश्वसनीय होती जाती हैं । आखिर समकालीन यथार्थ भी समकालीन समाज के मनुष्यों की सामूहिक सृजनशीलता का परिणाम अर्थात मानवीय उत्पाद ही है चाहे वह अपराध या भ्रष्टाचार ही क्यों न हो !

       सैद्धानितक दृषिट से साहितियक सृजनशीलता भी अनुपसिथत को उपसिथत करने की कला है और इस प्रकार कोर्इ भी सृजन सदैव ही पृष्ठभूमि का अतिक्रमण है । वह वर्तमान के यथार्थ का उपयोग करते हुए भी उपलब्ध वर्तमान का अतिक्रमण है । वह चाहे आदर्शपरक हो या यथार्थपरक सृजित यथार्थ सदैव ही मनुष्य की चेतना द्वारा पूर्व यथार्थ के अतिक्रमण के रूप में घटित होता है।  यह अतिक्रमण न घटित कर पाने के कारण ही हिन्दी में  प्रकाशित यथार्थवादी कहानियों की एक बड़ी संख्या अपने समकालीन यथार्थ की भाषिक अभिव्यकित मात्र हैं । वे सामाजिक यथार्थ का साहितियक यथार्थ में सफल रूपान्तरण नहीं कर पातीं ,क्योंकि साहितियक यथार्थ एक सृजित यथार्थ होता है ।

       अपने समकालीन यथार्थ का साहितियक सृजनशीलता में भी अतिक्रमण न कर पाने की अपनी ऐतिहासिक एवं प्रवृत्तिगत सीमाओं तथा विशुद्ध भारतीय शैली के बिरादराना चयन के बावजूद व्यावसायिक दबाव न होने से लघु पत्रिकाओं नें कर्इ मौलिक एवं प्रयोगधर्मी रचनाएं भी प्रकाशित कीं । उनमें सच को और निर्भयता से प्रस्तुत करने का गैर-व्यावसायिक साहस भी दिखालेकिनयह भी सच है कि हर दौर में लघु पत्रिकाओं के सम्पादको में एक बड़ी संख्या साहित्यकार बनने के अभिलाषी नवोदित साहित्यकारों की ही रही है । स्वयं साहित्यकार न होते हुए भी ऐसे सम्पादक साहितियक रचनाओं के लिए मेजबान की भूमिका में थे ।  एक देश द्वारा दूसरे देश को मान्यता देने की शैली में-दूसरी साहितियक लघु-पत्रिकाओं को अपने साथ  नाम-पते विज्ञपित करने की अच्छी प्रथा नें हिन्दी में लघु-पत्रिकाओं के आन्दोलन को एक लोकतानित्रक साहितियक संस्कृति का निर्माता बना दिया । लघु-पत्रिकाओं ने नवोदित साहित्यकारों के लिए न सिर्फ आरम्भी मंच उपलब्ध कराया बलिक उनके प्रशिक्षण-केन्द्र के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है । इसी साहितियक परिदृश्य का एक दूसरा पहलू यह है कि सम्पादकीय दृषिटहीनता के कारण हिन्दी का साहितियक परिदृश्य सामान्य रचनाओं से पट गया है।  स्थगित सामाजिक यथार्थ से टकराते-टकराते हिन्दी का प्रगतिशील साहित्य और साहित्यकार भी स्थगित साहितियक यथार्थ का निर्माता और चितेरा बन गया है । उसके द्वारा सृजित कथा-वस्तुउठार्इ गर्इ समस्याएं और विचार सभी कुछ पुनरावर्ती हो गए हैं ।

      व्यावसायिक पूंजी के दबाव से मुक्त होने के कारण हिन्दी की लघु-पत्रिकाओं नें समानान्तर सिनेमा की तरह ही एक समानान्तर साहितियक पाठक-वर्ग भी पैदा किया है । अलग-अलग ग्रहों को केन्द्र में रखकर जैसे अन्तरिक्षीय पदार्थ एकत्रित होकर अनेक सूर्य बना देते हैं हिन्दी के अनेक प्रतिभाशाली साहित्यकारों के नाम से जुडी साहितियक पत्रिकाएं अपना नियमित पाठकवर्ग एवं आर्थिक संसाधन विकसित कर चुकी हैं । उनसे जुड़े साहित्यकार एवं प्रशंसक भी उनकी ताकत हैें। कुछ साहितियक पत्रिकाएं तो लेखकों का अलग स्कूल ही बना रही हैं । इसे स्थानीयता का प्रभाव कहें या आंचलिकता का - हिन्दी की कर्इ पत्रिकाओं नें निजी लेखक टीम विकसित कर ली है । ऐसी पत्रिकाओं ने अपने पाठकों को भी विशेषीकृत किया है । मनोविज्ञान का एक निष्कर्ष है कि जुड़वा बालकों का सही विकास नहीं होता क्योंकि वे एक-दूसरे का ही अनुकरण करते रह जाते हैं । किसी तीसरे के प्रति बिल्कुल उदासीन रहने के कारण कुछ नया नहीं सीख पाते । हिन्दी की अनेक साहितियक पत्रिकाओं ने भी प्रायोजित लेखन का शिकार होकर अपने अलग वैचारिक साहितियक पूर्वाग्रह विकसित कर लिए हैं । साहित्य के इतिहास पर चढ़ार्इ करने वाले अलग साहितियक गिरोह के रूप में सम्पादकीय आत्मश्लाधा एवं महत्त्वपूर्ण होने के भ्रम के साथ सिर्फ वाद्र्धक्य ही नहींबलिक मौलिक एवं नर्इ सृजनशीलता की दृषिट से मृत्यु की ओर भी बढ़ रही हंै। इसे हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उसकी शीर्ष साहितियक पत्रिकाएं भी किसी दल या व्यकित-विशेष का साहितियक 'फ्रण्ट नजर आने लगी हैं । निजी जीवन में चरित्रहीनता के आरोपों का सामना कर रहे कुछ सम्पादकों नें तो किसी अन्धे-बहरे की तरह व्यापक सहितियक समाज और सरोकारों से स्वयं को काट लिया है । वे अपने ऊपर लगे आरोपों के मानसिक प्रतिरोध में निर्लज्ज ,असंवादी ,सीमित ,संकीर्ण एवं असामान्य हो गए हैं । यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीति की सभी बुराइयों के प्रतिनिधि व्यवहारहिन्दी-साहित्य की रचनाधर्मिता और विकास के परिदृश्य को भी विद्रूपित कर रहे हैं ।

         एक सीमा तक हिन्दी-साहित्य के वर्तमान परिदृश्य को उसके राजनीतिक यथार्थ का ही साहितियक रूपक कहा जा सकता हैं । यथार्थ की अनुकूल या प्रतिकूल सृजनात्मक सम्भावनाओं पर विचार करने के स्थान पर उसका साहित्यकार प्राय: अपने समकालीन इतिहास और यथार्थ का साहितियक रूपान्तरण प्रस्तुत करता है । इससे उसके लेखन में मानवीय सृजनशीलता के अन्य आयाम नहीं उभर पाते । उसका अधिकांश साहित्य सम्पूर्ण मानव-जाति के नाम सृजित ,सम्बोधित और सम्प्रेषित भी नहीं है । वह कुछ प्रतिषिठत व्यकितयों के नाम सम्बोधित निजी पत्र बनकर रह गया है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हिन्दी का साहित्यकार जिन मूल्यांकन-मानों की कल्पना कर साहित्य सृजित करता है उसकी हैसियत मात्र एक स्कूल की ही है । एक आंचलिक या क्षेत्रीय सच्चार्इ की तरह उसके साहितियक समाज नें सराहना और समीक्षा के नाम पर मूल्यांकन-मान के रूप में जो फतवे जारी किए है-वे काफी बचकाने अथवा नीरस है।

        हिन्दी-साहित्य में भी वर्चस्व और प्रभुत्त्व के कांग्रेसनुमा सत्ता-केन्द्रों के साथ अनेक क्षेत्रीय शकितयां और क्षत्रप काबिज हो गए हैं या काबिज होने का प्रयास कर रहें हैं । कुछ पुराने उजड़े हुए साहितियक-केन्द पुन:: संगठित हो रहे है। कर्इ प्रतिषिठत साहित्यकारों ने अपनी उपेक्षा से आहत मन की प्रतिक्रिया में साहितियक पत्रिकाएं निकाल ली हैं । हिन्दी का साहितियक चरित्र भारतीय राजनीति के चरित्र का ही अनुकरण करता प्रतीत होता है । जिस प्रकार नेहरू और शास्त्री के बाद आपात काल के कांग्रेस नें सत्ता और इतिहास को बन्धक बनाने के प्रायोजित प्रयास में काल-पात्र गड़वाने से लेकर प्रतिभा-नियोजन के लिए पार्टी से योग्यों का निष्कासन किया -व्यकितत्व और चरित्र से हीन चाटुकारों को मुख्यमंत्री बनाकर जनता के ऊपर थोपने का असफल एवं आत्मघाती प्रयास किया और जिसका ही प्रतिक्रियात्म्क परिणाम यह हुआ कि तिरस्कृत-निष्कासित प्रतिभाओं ने अलग पार्टी ही बना ली और आगे चलकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक बने । इतिहास और सत्ता का मुख्य राजमार्ग साजिशन बन्द कर दिए जाने से समर्थ प्रतिभाओं ने स्वतंत्रता,प्रतिरोध और विकल्प के लिए क्षेत्रीय पार्टियां बनायीं । कुछ-कुछ वैसा ही -व्यकितगत महत्वाकांक्षा,राग-द्वेष,उपेक्षा तथा स्थापन-विस्थापन के भितरघातों के प्रतिक्रियात्मक सन्तुलन नें हिन्दी के साहितियक परिदृश्य को बहुवैकलिपक एवं विविधतापूर्ण बना दिया है ।

         इस रूढि़वादी देश में जैसे आजादी के पूर्व कुछ ही नेताओं ने मिलकर भारत-पाकिस्तान के रूप में कर्इ करोड़ भारतीयों का भविष्य और वर्तमान बिगाड़ दिया ,वैसे ही हिन्दी के साहितियक इतिहास को कुछ गिने-चुने वर्चस्वशाली मसितष्क ही बना-बिगाड़ और बांट रहे है। सम्बन्धों एवं रुचियों पर आधारित उनकी स्मृतियां एवं उनका प्रायोजित चयन ही हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में विज्ञापित हो रहा है । इधर इस आरोप का प्रतिपक्ष भी देखने में आ रहा है -स्कूलों और विश्वविधालयों तक के पाठयक्रमों में गैर-मानक साहित्य और साहित्यकारों की अराजक प्रविषिट के रूप में । लघु पत्रिकाओं की बढ़ती हुर्इ संख्या के पीछे साहित्य में सक्रिय प्रायोजित सृजनशीलता तथा वर्चस्व के यथार्थ से असहमत साहितियक विपक्ष और प्रतिरोध की समानान्तर साहितियक संस्कृति के निर्माण का संघर्ष भी है।

          'समकालीन सोच के प्रवेशांक (जून 1989) में व्यक्त डा0 पी0एन0सिंह की इस विचारपूर्ण समझ का विस्तार करना भी हिन्दी समाज और साहित्य के विश्लेषण में सहायक होगा कि अभी हमारी सामाजिक चित्ति मुख्यत: मध्ययुगीन है,जिसमें आदिम अवशेषों की भी कमी नहीं है । हमारा वैज्ञानिक और ऐतिहासिक ज्ञान हमारी सामाजिक चेतना एवं आचरण की वस्तु नहीं है अभी यह मात्र सूचना की चीज है । हमारे वैज्ञानिक एवं विद्वान सामाजिक संवेदना के स्तर पर अपढ़ हैं । हमारे यहां शास्त्रज्ञों का नहीं ,बलिक बुद्धिधर्मियों का हमेशा अभाव रहा है । इस अभाव की पूर्ति हिन्दी समाज अन्तर्निभरता और अन्तर्सहमति से करता है । उसके जातीय या प्रवृत्तिपरक सृजनधर्मिता का राज भी यही है । इसके कारण ही वह प्राय: प्रतिभा-स्वातं«य को एक विजातीय एवं विपक्षी तत्त्व के रूप में देखता है । नए लेखकों को एक पूर्वनिर्धारित æैक पर चलकर आने का अगि्रम प्रस्ताव भेजता है । लेखन में नव-रीतिवादी आवृत्ति की परिसिथतियां पैदा करता है ।

        इस जड़ता को तोड़ने के लिए सभ्यता के विकास-क्रम में सामने आयीं अधतन सूचनाओं को हिन्दी के आम लेखकों-पाठकों तक उपलब्ध कराने की जरूरत है । अधिक से अधिक विदेशी साहित्य को हिन्दी भाषा में उपलब्ध कराने की भी जरूरत है । हिन्दी के ऐसे साहितियक परिदृश्य पर यह सुझावपरक टिप्पणी की जा सकती है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की उच्चस्तरीय पाठय-सामग्री सर्वसुलभ न होने के कारण हिन्दी मनीषा के सृजनात्मक उत्पाद भी किसी अपढ़ एवं अप्रशिक्षित मसितष्क की उपज की तरह सामनें आते हैं । क्योंकि सामाजिक यथार्थ के साहितियक यथार्थ एवं कृति में रूपान्तरण की प्रक्रिया रचनाकार के बौद्धिक श्रम ,सोच दृषिट एवं ज्ञान के समन्वय के पश्चात ही किसी विशिष्ट कृति के सृजन के रूप में पूरी हो पाती है ।

        हिन्दी के सहितियक परिदृश्य के समाज-वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए हिन्दी सिनेमा से उधार लिए गए व्यावसायिक और समानान्तर जैसे शब्दों से बेहतर विशेषण मुझे दूसरे नहीं दीखते।  व्यवसायिक के स्थान पर लोकप्रिय शब्द का भी प्रयोग किया जा सकता है ;लेकिनहिन्दी में भारतेन्दु ,देवकीनन्दन खत्री ,प्रेमचन्द,दुष्यन्त और हरिवंशराय बच्चन जैसे गिने-चुने लेखकों को छोड़कर किसी को लोकप्रिय साहित्यकार कहना भी इस शब्द का अपमान करना ही होगा । व्यावसायिकता से मेरा प्रयोजन पेशेवर रूप से प्रायोजित साहित्य से है । लोकप्रिय में प्रभावी नेतृत्त्व उपभोक्ता या पाठक वर्ग का रहता है जबकि व्यावसायिक में व्यवसायी का-यधपि वह अपनी सारी रीति एवं नीति उपभोक्ता या पाठक को केन्द्र में रखकर ही बनाता हैलेकिन बाजार पर निर्भर रहने के कारण प्राय: पाठक वर्ग उसकी सृजनशीलता एवं श्रम पर आश्रित तथा प्रतीक्षा में ही रहता है । एक बार बिकाऊ माल की सही पहचान हो जाने के बाद साहितियक प्रवृत्तियां आवृत्ति या व्यसन के रूप मेंरूप बदल-बदलकर थोड़े हेर-फेर के साथ पाठकों तक पहुंचने लगती है । यही कारण है कि व्यावसायिक पत्रिकाएं प्राय: यथा-सिथतिवादी होती हैं ;रूप ,सौन्दर्य एवं आस्वादधर्मी होती हैं।

 सामान्यत: लघु पत्रिकाओं के आन्दोलन को बाजारवाद और उपभोक्ता-संस्कृति के समानान्तर रचनात्मक प्रतिरोध की संस्कृति के रूप में देखा जाता है । इस देखने का ठोस आधार भी है । उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव से विकृत रचनाशीलता का सबसे प्रामाणिक उदाहरण हिन्दी फिल्मों की वर्तमान दशा-दिशा है । लोकप्रियता के अर्थशास्त्र नें उसे नुस्खों के अजायबघर में बदल दिया है । हिट-पिट के उसके लम्बे इतिहास नें उसकी व्यावसायिकता को एक कला-संस्कृति में बदल दिया है । हिन्दी की व्यावसायिक पत्रिकाओं  ने भी साहितियक सृजनशीलता को एक अलग कलात्मक रूढि़ दी है । इस रूढि़ की एक कलात्मक उपलबिध है- हिन्दी में गीत और नवगीत लेखन की निरन्तरता तथा पारिवारिक कहानियों की आवृतितपूर्ण उपसिथति आदि लेकिन हिन्दी के साहितियक परिदृश्य में विचारहीन विचारशीलता अथवा अवरुद्ध विचारशीलता के यथार्थ का भी ठोस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य है ।

         इस परिदृश्य को देखते हुए आश्चर्य नहीं कि हिन्दी की मुक्त विचारशीलता का अधिकांश हिस्सा लघु-पत्रिकाओं में छपकर ही सामने आता है । हिन्दी का प्रबुद्ध पाठक वर्ग लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्य को समानान्तर साहित्य के रूप में स्वीकार करता है । साहितियक सृजनशीलता के अधिक र्इमानदार और बहुआयामी स्वरूप लघु-पत्रिकाओं के माध्यम से ही हिन्दी में सामने आ रहा है । व्यावसायिकता के दबावों से मुक्त गम्भीर विचारशीलता एवं प्रतिरोध की साहितियक संस्कृति को जन्म देने के कारण हिन्दी का समानान्तर साहित्य बौद्धिक स्वातंय का असंगठित क्षेत्र बनकर भी उभरा है । असंगटित इसलिए कि एक-दूसरे को महत्त्व एवं स्वीकृति देने के बावजूद हिन्दी का यह साहितियक परिदृश्य अन्तरिक्ष में फैले तारों अथवा भारतीय राजनीति में सक्रिय क्षेत्रीय दलों की तरह इतना बिखरा हुआ है कि यदि वैयकितक ग्राहक न हो तो हिन्दी क्षेत्र के अधिकांश शहरों और कस्बों में इन पत्रिकाओं की सार्वजनिक उपसिथति देखने को नहीं मिलती । बुक स्टालों पर इनकी अनुपसिथतिं एक सामान्य पाठक के लिए समकालीन सृजनशीलता के इतिहास से भी अनुपसिथत करती है । व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच स्थानीय लघु-पत्रिकाएं ही अपनी उपसिथति दर्ज करा पाती हैं फिर भी ये लघु-पत्रिकाएं हिन्दी-क्षेत्र एवं हिन्दी क्षेत्र से बाहर भी साहितियक सृजनशीलता का सार्थक परिवेश एवं उपनिवेश निर्मित करती हैं ।

      गम्भीरता से देखा जाय तो सम्पादक साहितियक इतिहास के निर्माण का प्रथम द्वार ही है ।

वह रचना का प्रथम किन्तु मौन समीक्षक होता है । वह रचना का प्रस्तावक होता है । इधर हिन्दी की साहितियक पत्रिकाओं में यह भूमिका किसी व्यकित-विशेष की नहीं बलिक व्यकित-समूह की होने लगी है । यह चेहरा-विहीन सम्पादन का दौर है । अब यदि कोर्इ रचना अस्वीकृत होती है तो  सम्पादकीय टीम में शामिल पता नहीं किसने किया । अब इतिहास में वैसा आरोप नहीं लगाया जा सकता जैसा कि निराला की 'जुही की कली कविता न छापने पर महावीर प्रसाद द्विवेद्वी के सठियाने की बात ध्यान में आती है । इधर कर्इ साहितियक पत्रिकाएं एक साझे मंच में बदल गर्इ हैं और 'खण्डे-खण्डे सम्पादक भिन्ना  जैसी सिथति हो गर्इ है । अतिथि सम्पादक चयन सम्पादक ,कार्यकारी सम्पादक और वैधानिक सम्पादक जैसी अनेक कोटियां बन गर्इ है । सम्पादन में 'अन्य-पुरुष के प्रचलन नें आहत लेखक द्वारा सम्पादक को गाली दिए जाने की सम्भावना ही समाप्त कर दी है । पत्रिकाओं और लेखकों की भीड़ में रचना की सिथति कन्या जैसी हो गयी है ।

एक जगह से खेद सहित वाला जवाब मिल गया तो प्रकाशन रूपी विवाह के लिए दूसरी पत्रिका का दरवाजा देखिए। अधिक चिन्ता की कोर्इ बात नहीं -क्योंकि जो पढ़ रहा है वही पढ़ रहा है और वह कहीं भी पढ़ लेगा । हिन्दी का नए दौर का जो साहितियक परिदृश्य है उसमें लेखक ही पाठक है और पाठक ही लेखक । व्यसनी है तो छपने की लालच में खरीदेगा ही और पढेगा ही । छपेगा तो लेखक कहलाएगा नहीं तो पत्र लिखेगा कि अगली बार जब वह छपे तो उसके छपने पर भी पत्र लिखने वाले रहें । अन्यथा नाराज होने पर सभी मौन साध लेंगे ।

            सच तो यह है कि भारत के लिए प्रगतिशीलता का एक ही सही तात्पर्य हो सकता है-अपनी सृजनशीलता के माध्यम से अतीत के यथार्थ में परिवर्तनकारी हस्तक्षेप । इस दृषिट से मैं उन्हीं सम्पादकों का सम्पादन-कर्म सार्थक मानता हूं जो किसी न किसी रूप में अतीत से मुक्त होने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं । यह प्रक्रिया बेहतर भविष्य के सपने के साथ बेहतर विकल्प की तलाश के बिना सम्भव ही नहीं है । एक सार्थक साहितियक सृजन इसी यात्रा में ही घटित हो सकता है ।




सोमवार, 19 नवंबर 2012

पत्नी के सम्मान में

रामप्रकाश कुशवाहा की कविताएँ 


पत्नी के सम्मान में


( राग - बंध -अंध )


पत्नी के सम्मान में    
वापस लौट आये दुनिया के सारे अन्धविश्वास
वे भी जिन्हें  कभी मैंने  नापसन्द किया था 
जिनसे मै असहमत हुआ और जिन्हें अपने विवाहपूर्व काल में 
निर्णायक और घोषित रूप में कभी ख़ारिज भी  !

पत्नी को मेरी सारी निरीह्ताओं का पता है 
जैसे कि मै अपना ईश्वर बदल सकता हूँ लेकिन बोंस नहीं 
कि मध्यवर्ग का हर पुरुष अपनी दृश्य -अदृश्य मूँछ के साथ 
यथा -अवसर हिलाने के लिए एक अह्लाद्वर्धक पूँछ भी रखता है 
बेंत के विकल्प में सहलाना-क्रिया जैसे !

उन्हें चाहिए सुरक्षा का जोखिम-मुक्त आश्वासन 
जो मेरे हाथ में बिलकुल ही नहीं है 
क्या मै सुबह का घर से निकला शाम को सही-सलामत 
परिवार में वापस आ सकता हूँ !

क्या दूसरो के झूठ और शरारतों को पकड़ने वाला 
एंटीवायरस साफ्टवेयर है मेरे पास
क्या मुझमे बजट की बारीकियों और मंहगाई के आपसी रिश्तों  की 
थोड़ी भी समझ है !
और एक समझदार पूर्वानुमान के साथ बचत की सतर्कता भी 

पत्नी  ही हैं जो इस दुनिया में  सिर्फ एकमात्र मुझे ही सुधार सकती हैं 
और सबसे अधिक दुनिया की सुधार वाले मेरे असमभव सपनों से ही 
डरती है 
उन्हें मेरी निरपेक्ष और अकेली बहादुरी से डर लगता है 

सुनो जी ! तुम सारे बूद्धि-जीवी ही कटे -कटे रहते हो 
बिना जुड़े और जोड़े न  डकैत बना  जा सकता है न नेता 
जेबकतरे भी सामूहिक अभिनय से लोगो को लूट लेते हैं 
अकेली समझदारी तो मूर्खों के गैंग द्वारा भी रौंद कर मारी जा सकती है

मुझे कोई भ्रम नहीं है 
मै जानता हूँ इस दुनिया में जीवित लोगों की तुलना में 
मरे हुओ से सहमत होना अधिक आसान होता है 
असहमति अकेला बनाती है और असामाजिक भी 

मेरी पत्नी जो सामाजिक धोखा-धड़ी अपराध और दुर्घटना की शिकार
एक डरे हुए परिवार से है 
मुझे पूरी सावधानी और समझदारी के साथ उन्ही को जीना है 
उनके अविश्वासो और आशंकाओं के साथ अनुत्तरित 

घूस और पैरवी दोनो ही न देने -करने के स्वाभिमानी पागलपन में
योग्य होते हुए भी मैंने और इस समाज ने मिलकर उन्हें रखा है बेरोजगार
इसे तिकड़म की अभियांत्रिकी की अयोग्यता कहें या ईश्वर की इच्छा !

यह जरुरी तो नहीं कि मै जिस तरह सोच और समझ रहा हूँ 
उसी तरह सोचें और समझें आप
अभी जो भक्तिसंगीत का रिंगटोन बज रहा है
उसे बिना किसी अन्यथा और टिप्पणी के फ़िलहाल धैर्यपूर्वक  सुने !  


वैसे भी मै अभी नौकरी कर रहा हूँ समझे  आप !
कोई भी पार्टी न बनाने के  संवैधानिक अनुबंध के साथ

प्रेम के बादशाह शाहजहाँ  के लिए



उसकी प्रेम की सत्ता है या एक  सत्ताधारी  का प्रेम 
प्रदर्शन संकोच और अभिजात्य की पूरी गरिमा से ढंका हुआ 
सुरक्षा और प्रतीक्षा की चाहरदीवारी में बंद मनों की 
दिन -दिन तड़पती मुक्ति-उडान 

सत्ता की वर्जनाओं ने उन्हें एक अभिशाप की तरह छिपाकर रखा है 
उसका प्रेम और उसके परिवार की स्त्रियाँ 
सभी एक प्रतिष्ठित समूह की सुंदरियाँ थीं 

कम सुन्दर होते हुए भी कुलीनता की गरिमा से युक्त  और असाधारण 
विशिष्टता का अभिशाप लिए 
जहाँआरा कुँवारियाँ जिन्हें सत्ता की मर्यादा की रक्षा के लिए 
अदृश्य यानि पर्दानशीं कर रखा गया था 

प्रेम का बादशाह अपनी बेगम के साथ अब भी सोया है शान से 
पूरी अदब और सुरक्षा के साथ 
वह समयातीत और सत्ता से बेदखल होने के बावजूद 
एक जीवंत और शानदार उपस्थिति है 
औरन्गजेब की कैद के बावजूद उसकी आत्मा मुक्त रही लोकोत्तर प्रेम के लिए 
वह  उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सका 

प्रेम का बादशाह आज भी भर रहा है आगरे की जनता का पेट 
उसने अपनी सत्ता को कितना सुन्दर बना दिया था 
तबले की संगत पर 
आज भी उसके लिए मुँह से निकलता है-आह ताज!वाह ताज !


बादशाह-दो 

(बादशाह अकबर के लिए)


सब विश्वास में हैं 
और बादशाह भी 
विश्वास करने  के बादशाह को
विश्वास करने वाली प्रजा ही चाहिए 

हर तलवार चलाने वाला बादशाह चाहता है कि
उसके तलवार चलाने के दिनों को भुला दिया जाय 

बादशाह-तीन 

(बाबर के लिए )


उनके लिए जीतना बहुत ही जरुरी था 
वे आपने घर से उजड़े हुए लोग थे 
उन्हें कहीं बसने के लिए 
जीतना बहुत ही जरुरी था 
क्योंकि वे लड रहे थे 
आपनी मुक्ति और पुनर्जीवन के लिए


अग्र-शेष  



थोड़ी सी जगह जरुरी है 
किसी और के लिए 
चाहे वह ईश्वर हो या फिर कोंई और 
थोडा सा भोजन उसके लिए 
जो अभी नहीं आया है 
लेकिन जो आ सकता है कभी भी 

थोडा सा धैर्य -जो दुःख में हैं 
उनकी नाराजगी और क्रोध के लिए 
थोडा सा बोझ दूसरो की विपत्ति को  
बाँट लेने और बचा लेने के लिए 

थोड़ी सी सम्भावनाये बची रहनी चाहिए 
नए आविष्कारो के लिए भी 
और थोड़ी सी ऊब नए प्रश्नो के लिए
थोडा सा मन नैराश्य के अंतिम क्षणों के विरुद्ध 
थोड़ी सी चुप्पी और थोडा सा संवाद 
एक संवेदनशील मन और सुरक्षित जीवन के लिए---





दृश्य-अपराध 


घर से बाहर निकलते ही 
चीजें बदल जाया करतीं हैं
यात्रा के पाथेय के लिए 
पत्नी द्वारा प्रेम से पकाए गए पुए 
बदल जाते  हैं अश्लील दृश्य में 
पकवानों की सुगंध भूख का शोर मचा देती है 

पहाड़ की लम्बी यात्रा के बाद 
सोंदर्य के स्वर्ग से भूख की धरती पर उतरे थे हम
घर के साथ यात्रा करते हुए प्लेटफार्म के मंच पर 
सपरिवार अवतरित ही हुए थे कि 
टिफिन के खुलने ने बन्दर,कुत्ते ,एक भिखारी और सांड को 
एक साथ ही अयाचित आमंत्रण दे दिया 

हमने स्वयं को एक हिंसक उपस्थिति के साथ 
भोजन करते पाया भीड़ भरे प्लेटफोर्म पर 
भोजन ने हलचल ही नहीं भगदड़ सी ही मचा दी थी प्लेटफोर्म पर 
यह एक संवेदनात्मक आक्रमण जैसा अनुभव था 
जैसे आक्रमणकारी टूट पड़े हों निरीह शिकार पर 
पत्नी थी स्तब्ध और ठगे से ठिठक कर रह गए थे उनके हाथ
किसी अपमानित अपराधिनी-सी कोस रही थीं जैसे 
अपने-आप को 

आधुनिक साहसिकता को अतिक्रमण करती 
संभवतः उन्हें याद आ रहीं थीं 
पुरखों से मिली सीख और वर्जनाएं 
कि सार्वजानिक स्थल पर भोजन करना भी एक दृश्य-अपराध है

पहाड़ की कितनी लम्बी और थका देने वाली भूखी-यात्रा के बाद 
दीर्घ प्रतीक्षित भूख के अंत का उत्सव मनाना चाहते थे हम 
पत्नी दुखी थीं कि इन अयाचित अतिथियों के लिए 
कितनी कम पूड़ियाँ तल कर लाई थीं वे 

खिन्न मन और क्षोभ के साथ उस दिन 
हम सभी ने सामूहिक उपवास करना ही उचित समझा 
स्वयं भूखी और संवेदन-शून्य हो चुकी 
एक लगभग अदृश्य और अनुपस्थित हो चुकी  ममेतर व्यवस्था के नाम!


सुख का आधार 


सारा सुख आदमी के ऊपर ही टिका हुआ है 
हर सुखी आदमी किसी दुखते कंधे वाले 
आदमी के सर पर चढ़ा हुआ है 
कोई जानबूझकर तो कोई अनजाने ही 
किसी  के पैरो तले पड़ा हुआ है 

जेब काटने से लेकर जीने तक आदमी के लिए 
आदमी ही है कच्चा माल 
मानसिक विकलांगो और पराश्रितों की एक बड़ी भीड़ 
जो कुछ भी नया रचना और स्वयं कमाना नहीं जानती 
उनकी दुनिया का एकमात्र सच यही है कि 
आदमी से छीन कर ही आदमी का भाग्योदय और भला हुआ है !


     शून्यकाल के नायक


बाजार में एक ही शिखर था
बिल्कुल एवरेस्ट की तरह
घटता-बढ़ता रहता था लेकिन
झुककर किसी ऊंट की तरह कर्इ बार
किसी अदने से व्यकित को भी बिठा लेता था अपनी पीठपर
फिर उसे बहुत दूर से दिखता और दिखाता था किसी शाहंशाह की तरह

एक ही एवरेस्ट की पीठ पर सब चढ़ना चाहते थे एक दिन
कूबड़ ही एवरेस्ट का था समय का पैमाना बना हुआ
दूल्हे और बारात के आने की प्रतीक्षा और पूर्वाभ्यास में
कुछ लोग बैठकर ऊंघ रहे थे एवरेस्ट की पीठ पर
समय के सूनेपन को भरते हुए
शून्यकाल के नायक!

फेरीवाला लाल किले की दीवार पर खड़ा होकर
वहीं से झांक रहा था
जहां से सिर्फ पन्द्रह अगस्त को
राष्ट्र के नाम अपना आधिकारिक सम्बोधन करते हैं प्रधानमंत्री

बाजार में
यह एक मेले का एवरेस्ट था
जहां कुछ शराबी
अपने-अपने सिर पर अपने जीवन का बोझ उठाए
थकी हुर्इ यात्री भीड़ की पीठ पर
इतिहास की दिशा का पोस्टर चिपका रहे थे ।

बाजार में रेत


बाजार में होना था
और अपनी तरह
अपनी ही शर्तो पर होना था
साथ-साथ.....

मुर्दो के लिए कफन और ताबूत बेचने वाला भी
बाजार के एक छोर पर बैठा मुस्करा रहा था
पहाड़ के पत्थर और नदी के रेत बेचने वाला भी वहां बैठा मुस्करा रहा था
अपनी यादगार बिक्री और शानदार आमदनी पर
उड़ती हुर्इ रेत को बच-बचाकर चल रहे थे राहगीर
जिन्हें नहीं खरीदनी थी रेत
रेत को उड़ते हुए झेल रहे थे
झुझला रहे थे रेत पर....

रेत से अन्धी हुर्इ हवा चल रही थी कर्इ देखने वालो के विपक्ष में
रेत तो उड़ती ही है
एक बूढ़े राजगीर नें कहा-
बाजार में रेत का होना भी जरूरी है
रेत से गर्वान्वित या अपमानित होने जैसा कुछ भी नहीं है.....





संपर्क-

बी-1,श्री साईं अपार्टमेंट ,टडिया ,
करौंदी ,सुन्दरपुर,वाराणसी ,उ 0प्र 0 पिन -221005

मो 0-09451342730