शुक्रवार, 8 मार्च 2013

क्रान्ति-विमर्श-२

      व्यवस्था-चिंतन,निर्माण और रूपान्तरण एक सतत प्रक्रिया है.लोग नियमित क्रांति को तो विकास और परिवर्तन समझते हैं और अनियमित या आकस्मिक क्रांति को ही क्रांति समझते हैं.समस्याए      इसलिए व्यवस्था के परिष्कार को सतत क्रांति कि सैद्धांतिक अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए.बढ़ती जनसंख्या के साथ चीजें इतनी गतिशील हैं कि पूर्व-निर्धारित परिकल्पनाओं से काम नहीं चल सकता.अतीत की सूचनाओं और ज्ञान पर आधारित 
                                                                                                                                                              



अतीत कि सूचनाओं और ज्ञान पर आधारित परिकल्पनाएं पिछड़ जाया कराती हैं .व्यवस्था सम्बन्धी परिकल्पनाएं भी उनमें से एक है .बढ़ती जनसँख्या के सापेक्ष बढ़ रही हैं.
           इसलिए क्रांति कि प्रतीक्षा में व्यवस्था के रूपान्तरण को देर तक स्थगित नहीं रखा जा सकता.किसी तरह का स्थगन समस्या को बढ़ाएगा ही.दूसरी बात यह है कि व्यवस्था कि सृजनशीलता और परिष्कार की अपनी सीमाएं हैं.मानव-जाति कि सृजनशीलता के सारे आयामों को सिर्फ व्यवस्था कि सृजनशीलता के माध्यम से ही नहीं पाया जा सकता.बाजार-व्यवस्था बहुत कुछ स्वायत्त और अपने ही नियमों से संचालित होती है.क्रांति को सिर्फ राजनीतिक सृजनशीलता के दायरे में रखकर सोचने वाले संकीर्णता के कारण गलत भी हो सकते हैं.

शनिवार, 2 मार्च 2013

समय और कथा-साहित्य

क्या समयाभाव से ग्रस्त ,दूसरों के जीवन में डूबने का समय न रखने वालों के लिये क्था साहित्य नहीं है ! या ऐसे लोगों कें लिए कहानी भी अपना अलग स्वरूप ग्रहण करेगी ! कुछ लोग कहानियां नियमित रूप से पढ़ते है,कुछ लोगों की पढ़ने की आदत है इस लिये पढते हैं,कुछ लोग कहानियों को पढ़ाने के लिये पढ़ते हैं ,कुछ लोग तो पढ़ते ही नहीं ; लेकिन जो पढ़ते-पढ़ते बीच में ही कहानी पढ़ना छोड़ देते हैं या पढ़ने के बाद ऐसा सोचते हैं कि यह कहानी क्यों पढ़ी-दुख में डूब जाने के कारण नहीें बलिक अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ करने के दु:ख से -क्या कहानी को ऐसे भी बदले लोगों के लिये अपना स्वरूप बदलना नहीं चाहिये ! जीवन-संघर्श और जनसंख्या के सैलाबी दबाव में सकि्रय जीवनोें का समयाभाव क्या उन्हें दीर्घसूत्री  कहानियों का पाठक बनने देगा ! जबकि हम पाते हैं कि समाज में बौद्धिक और मानसिक वृतित और संरचना के विविध स्तर हैं । एक जीवन-षैली दूसरी जीवन-षैली के पाठक के लिये रुचिकर कैसे हो सकता है ? जबकि हम पाते हैं कि चुप रहने वाले व्यकित बड़बोले व्यकितयों का संग पसन्द नहीं करते !

        साहित्य में भी कुछ कहानियां बड़बोली होती हैं और कुछ बहुत चुप सी ; लेकिन दृष्य मीडिया के इस युग में प्रिंट मीडिया की कहानियों को कुछ अलग और विषिश्ट नहीं होना चाहिये ? हिन्दी कहानी में कहानीकारों की एक धारा जिसमें मोहन राकेष से लेकर निर्मल वमा्र्र तक आते हैं-परिवेष के जीवन्त आकर्शक चित्रण द्वारा दृष्य माध्यम के समानान्तर कहानी में एक भाशिक प्रतिसंसार रचते हैं । कहानी में दृष्य माध्यम के प्रति रचनात्मक प्रतिरोध विकसित करने का यह  एक अच्छा ढंग हो सकता है लेकिन क्या वह दृष्य माध्यम की कथा-प्रस्तुतियों को विस्थापित कर पायेगा ? कहानी को अन्त:संसार और मनोवैज्ञानिक आयामों में प्रस्तुत करने वाली जैनेन्द्र और अज्ञेय की कहानियों में दृष्य माध्यम से होड़ लेत हुए कहानी को चिन्तन संसार की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है । रेणु की कहानियों में भाशा का सृजनात्मक स्तर ,उनकी कहानी पर बनी तीसरी कसम जैसी फिल्म में दृष्य माध्यम में रूपान्तरित होकर भी उसके संवादों में भाशा के सृजनात्मक महत्व को प्रमाणित करती है ।

         स्पश्ट है कि भाशिक माध्यम में कहानी का असितत्व तभी तक अप्रतिस्पद्र्धी रूप में सुरक्षित रहेगा,
जब तक कि वह जीवन और भाशा के रिष्तों की ठोस नींव पर रची जाती है । भविश्य की वैज्ञानिक प्रगति में भी भाशा-विहीन मनुश्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती । वैसे तो प्यार भरे स्पर्ष और तनाव भरे मौन चेहरे भी भाशाहीन संवाद करते हैं । विज्ञान का भावी विकास मानव जीवन से भाशा-तंत्र को विस्थापित कर देगा या अनावष्यक कर देगा-ऐसा होना कभी संभव नहीं प्रतीत होता । दूसरे षब्दों में कहें तो भाशिक माध्यम में सृजित कहानी ही कथा का प्राथमिक और आदिम स्वरूप है। दृष्य माध्यम में सृजित और अभिनीत कहानियाें मानव जाति के विकास-क्रम में अधतन और नयी आदतें हैं । यह माध्यम यानित्रक सुविधायें देता है । संस्कृत के दृष्य या नाटय काव्य का आधुनिक और विकसित रूप है । अधिक मूर्त,स्पश्ट

और âदय-संवेध है । अपेक्षाकृत कम मानसिक श्रम में ही सम्प्रेशित हो जाता है । लिखित या वाचिक स्तर पर कहानी-एक समय में एक ही ज्ञानेनिद्रय आंख या कान से आस्वाध हो सकती है ; जबकि दृष्य माध्यम में सृजित या प्रस्तुत कहानी एक साथ आंख और कान दोनों ज्ञानेनिद्रयों द्वारा आस्वादित होती है । सिद्धान्त रूप में दोनों ही माध्यमों में सृजित कहानी का एक दूसरे में रूपान्तरण सम्भव है। किसी फिल्म या सीरियल को भाशाबद्ध किया जा सकता है तो किसी कहानी का फिल्मांकन भी संभव है । कम श्रम साध्य और आसान सम्प्रेशण्ीयता के कारण दृष्य माध्यम लोकप्रियता की अधिक सम्भावना रखता है लेकिन गुणवत्ता की दृशिट से भाशिक माध्यम की भी अपनी विषिश्टताएं हैं ,जैसे उसमें कल्पना को उत्तेजित करने की संभावनायें अधिक हैं । बिजली जाने पर और जंगल में भी कहानी पढ़ी जा सकती है । उस पर किसी इलाके का æान्सफार्मर जलने का कोर्इ दुश्प्रभाव नहीं पड़ेगा आदि। दूसरे षब्दों में कहें तो अधिक जटिल यानित्रक साधनों पर दृष्य माध्यमों की निर्भरता ही उनका दुर्बल पक्ष है । आर्थिक पक्ष मजबूत होने के साथ टी0वी0 के रूप में सर्वसुलभ होने से यह प्रिंट मीडिया का प्रतिस्पद्र्धी भी बन गया है लेकिन देखने की बात यह है कि षिक्षा का क्षेत्र आज भी पुस्तक आधारित है । यहां तक कि कम्प्यूटर सीखने के लिये भी पुस्तकें पढ़नी पढ़ती हैं । कम्प्यूटर स्वयं लिखित प्रतीकों में ही -भाशिक माध्यम में ही संवाद कर पाता है ।इसमें सन्देह नहीं कि हमारा मसितश्क रूपी हार्डवेयर जीन के स्तर तक भी मानव-भाशा के विकास के अनुकूल ढला है। मनोविज्ञान के अनुसार भाशा के बिना चिन्तन ही संभव नहीं है ।  विचारों की लय भाशिक  प्रतीकों के माध्यम से ही प्रवहमान होती है। स्पश्ट है कि दृष्य माध्यम संवेदना और संवेगों को तो जन्म दे सकता है लेकिन विचारषीलता के लिये भाशा के आदिम और प्राथमिक स्तर की ओर ही मनुश्य को लौटना होगा ।

        भारत और विषेशकर हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी चैनलों और हिन्दी अखबारों की तरह हिन्दी साहित्य लोकप्रिय क्यों नहीं हुआ ? यह एक गम्भीर प्रष्न है । जिसका एक उत्तर यह हो सकता है कि हम भारतीय लोग जातीय रूप से रूढि़वादी हैं । हमारी साहितियक विधाएं और कथा-चरित्र भी रूढि़वादी हैं । जीवन और समाज के हर स्तर पर दायरों को जीते-जीते हमारे साहित्य के चरित्र तक चारित्रिक आदतों में बदल गये हैं। साहित्यकार का संकट यह है कि यदि वह किसी अलग और विषिश्ट चरित्र की संभावना भी करता है तो तथ्य और तर्क सम्मत होते हुये भी समाज उसे झूठा बना देगा । सामान्य भारतीय मानस आज भी कर्इ युगों-कर्इ दुनियाओं को एक साथ जी रहा है । वह खणिडत मनस्कता का षिकार है । अधतन को पाने और अतीत को संरक्षित रखने का द्वन्द्व उसमें अब भी है । प्रेमचन्द की कहानियों के कर्इ चरित्र आज भी भारत -भूमि पर जीवित विचरण कर रहे हैं । जड़ता अमरता का पर्यायवाची हुआ करता है । प्रेमचन्द को देर तक प्रासंगिक और विष्वसनीय बनाये रखने में देष के यथासिथतिपूर्ण यथार्थ का अपना योगदान है। जब देष ही नहीं बदल रहा , उसका यथार्थ ही नहीं बदल रहा तो पात्र और चरित्र कहां से बदलेंगे ! कहानी कहां से बदलेगी ! चारित्रिक जड़ता चरित्र के प्रति पाठकीय जिज्ञासा को मार देती है । कहानी उतनी ही सफल होगी , जितनी कि वह पाठक की जिज्ञासा और कौतूहल को उददीप्त करेगी ; क्योंकि कौतूहल और जिज्ञासा किसी यात्रा के उददेष्य की तरह प्रेरक मनोवृतित है ।

         दूसरा कारण और उसका उत्तर साहितियक नहीं बलिक आर्थिक है । जब कोर्इ दृष्य माध्यम की 
सुलभता के यानित्रक साधन टी0वी0 को खरीदता है तो उसकें बाद सिर्फ बिजली का बिल , केबिल का किराया और उसे खोल कर उसके सामने बैठने का समय ही निवेष करता है , जबकि खरीदकर पुस्तक और पत्रिकायें पढ़ने के लिये उसे बार-बार निवेष करना होता है । पढ़ना यदि व्यसन के स्तर पर हो तब भी ,पढ़ने के श्रम-विनिवेष के कारण पुस्तकों का उबाऊ होना अखरता है । टी0वी0 खोलकर बैठा हुआ दर्षक बैठता ही है अपने फालतू या सस्ते समय के साथ अपना समय गवांने या लुटाने । अपेक्षित प्रापित न होने पर भी उसे बहुत नहीं खलता । पुस्तकों के असितत्व के लिये एक अन्य नकारात्मक सच्चार्इ उसका पर्यावरण (पेड़ों) के विनाष पर आधारित होना है । उस पर भी ज्यादा और घटिया लेखन , जीवनदायी पेड़ों का बध करता हुआ मानव-जाति के असितत्व और भविश्य को ही संकटग्रस्त करता है । जब तक प्लासिटक के कागज और प्लासिटक की टिकाऊ पुस्तकें नहीं आ जाती -तब तक इन्टरनेट की पुस्तकों से ही काम चलाना होगा ।

         तीसरा कारण सभ्यता के विकास और षिक्षा के प्रसार के कारण नये मनुश्य का अधिक जटिल , विविधतापूर्ण और बहुआयामी होना है । जीवन-संघर्श से उपजा तनाव , बेचैनी और असिथरता हर नये पल,हर नये कदम के साथ उसे बीता-पिछड़ा और व्यर्थ कर देती हैं । उसके भीतर दूसरों में नायकत्व ढूढ़ने का समय नहीं है । छोटा ही सही जीवन उसके स्वयं के नायकत्व की मांग करता है ।सवयं नायक न बन पाने की कुंठा और अतृपित उसे दूसरों में नायकत्व की तलाष के लिये उन्मुख और प्रेरित करती है।

कम से कम कर्इ मुम्बइया फिल्मों की कहानी तो यही कहती है । भावनात्मक षोशण के हिट फामर्ूले ! अपनी अतृप्त आकांक्षाओं को दूसरों में प्रक्षेपित कर दर्षक विस्मृति का सुख लेता है ।साहितियक कहानी उन फार्मूलों को चाहकर भी दुहरा नहीं सकती । एक अच्छी सुन्दर अभिनेत्री सुन्दरता  की सर्वसुलभ खिड़की की तरह होती है ,कुरूपता के गहरे अन्धकार में पड़े हुए लोगों के लिये ठण्डी रोषनी वाले चाद की तरह । अपने नायक की जीत को अपनी ही जीत मानकर थोड़ी खुषी जी लेते हैं उसके अनुयायी । अनुयायी का मनोविज्ञान उन्हें स्वयं नायक होने के अयोग्य कर देता है ।यदि अरस्तू का केथार्सिस या विरेचन सिद्धान्त सही है तो वह साहित्य की एक नकारात्मक मानवीय भूमिका की ओर ही संकेत करता है ।

कहानी को केथार्सिस प्रभाव से मुक्त रखने के लिए कहानी में , पात्रों के आक्रोष के संभावित स्थलों से आक्रोष को अनुपसिथत करना होगा -दुख के संभावित स्थलों से दुख को । संजीव और उदयप्रकाष ने बहुत सी अच्छी कहानियां लिखी है लेकिन यदि अपराध टेपचू और तिरिछ नहीं भूलती  तो उनके न भूलने के पीछे उनकी वह संरचना लगती है जो केथार्सिस की प्रकि्रया को पाठकों में घटित ही नहीं होने देती। टेपचू का टेपचू एक निरीह सर्वहारा पात्र है,लेकिन उसका कथानक निरन्तर निरीहता का उपहास उड़ाता हुआ केथार्सिस को अवरुद्ध कर देता है,इसीलिए कहानी पाठकीय संवेगों को पूर्ण संतृपित के रूप में विरेचित नहीं होने देती और पाठकीय स्मृति में जीवन्त प्रभावषीलता के रूप में बची रह जाती है ।

        अपराध कहानी में जो संवेगात्मक संषिलश्टता और कलात्मक परिपक्वता अपने चरमोत्कर्श पर मिलती है-केथार्सिस की प्रकि्रया को अवरुद्ध करने वाली उसी स्तर की कोइ्र्र दूसरी कहानी लिखने के स्थान पर संजीव की परवर्ती अच्छी कहानियां भी यथार्थ की महाकाव्यात्मक और संवेदनात्मक प्रस्तुति के बावजूद पाठकीय विरेचन को रोक नहीं पाती । यदि विरेचन को न भी माने तो भी मनोविज्ञान में व्यकितत्व विकास के सम्बन्ध में क्षतिपूर्ति का नियम है । उस नियम कें अनुसार यह माना जा सकता है कि यदि पाठक किसी कहानी के पात्र विषेश में अपने ही भीतर के चेतन-अचेतन सुख , घृणा , जीत या आवेष को खोज या पा लेता है तो वह भावनात्मक षार्ट-सर्किट का षिकार होकर षान्त हो सकता है-अपना गुस्सा या आवेष खो सकता है । अपराध कहानी के नायक सचिन की असफलता, घृणा,विवषता अपराध-तंत्र के भयावह चेहरे को पाठकों में मोहभंग के स्तर तक बेनकाब तो करती ही है ,सचिन और संघमित्रा की क्रानितधर्मी मृत्युपर्यन्त चलने वाली आत्महंता आस्था 'अपराध कहानी के रचनात्मक आवेष को विरेचित नहीं होने देती । इस कहानी के पष्चात संजीव अपनी परवर्ती कहानियों में मानवीय संवेदनाओं एवं व्यवस्था-

बोध की ऋजु किन्तु महाकाव्यात्मक प्रस्तुति की ओर बढ़ गये हैं । संजीव की दूसरी कहानियों की ताकत
उनकी परिकल्पनात्मक सम्पूर्णता और अपराध की क्रौंचबध वाली संवेदना, पीड़ा और करुणा के निर्बन्ध सृजनात्मक विस्तार में है । इसमें सन्देह नहीं कि जिस दौर में प्रायोजित यथार्थवादी कहानियों की भीड़ ने हिन्दी पाठकों से कहानियां पढ़ने की सारी उत्सुकता ही छीन ली ,संजीव ने कैसे अपने कहानियों के प्रति

पाठकीय जिज्ञासा को बचाये रखा-यह उनके कहानीकार की षकित को ही प्रमाणित करता है । फिर भी यदि मुझसे पूछा जाये तो मै कहानीकार संजीव को उनकें उस सृजनात्मक संस्कार या अतीत से मुक्त देखना चाहूंगा जिसे मैं संजीववन कहना चाहता हूं-कुछ वैसे ही जैसे अपनी 'वापसी,'पिषाच और'बाढ़ जैसी कहानियोंं में अपनी क्थात्मक आदतों का अतिक्रमण कर इन कहानियों को उनकी पूर्ण स्वाभाविक परिणति में सृजित कर सके है। संजीवपन से मुकित का यह तात्पर्य बिल्कुल नहीं कि संजीव का कहानीकार अपनी मिषनरी सृजनषीलता से हट जाये । यही वह उनकी ताकत है जिसके बल पर प्रेमचन्द अपना विपुल कथा-संसार रच सके थे । उनका भी अधिकांष कथात्मक प्रति-संसार अपने समय और यथार्थ के समानान्तर प्रेमचन्द की तरह ही साहितियक हस्तक्षेप कें रूप में सृजित है ।

      इसी तरह उदयप्रकाष के तिरिछ कहानी की ताकत इसमें है कि वह मानवीय सम्बन्ध , सहयोग और सहानुभूति के प्रति सहज सामान्य विष्वास को मानवीय आत्मकेनिद्रकता,असुरक्षाबोध तथा स्वार्थजन्य निर्मम क्रूरता के पत्थर मार-मारकर क्षत-विक्षत कर देती है ।

      हिन्दी कहानी का सामान्य वर्तमान और अतीत इन कहानियों के स्वरूप,उपलबिध और यथार्थ से बहुत अलग नहीं है । कहानी अपनी विधात्मक परिकल्पना में ही मानवजाति की दीर्घ कथात्म्क रूढि़ का परिणाम है ।बहुत दिनों तक मानव-जाति के लिये वह थियेटर,फिल्म,रेडियो-टी0वी0 सब कुछ रही है ।कुछ कहानीकार कहानी के असितत्व और सार्थकता की लड़ार्इ को प्रतिस्पद्र्धा के माध्यम से जीतने के भ्रम में हैं और सोचते हैं कि षब्दों की रील चलाकर वे फिल्मों को मात दे देंगे । यदि वे ऐसा करते हैं तो दृष्य माध्यमां की सजीवता से र्इश्र्या तो कर ही रहे हैं , बिल्कुल दूसरी विधा की मौलिक विषेशताओं को कहानी से मांगने का अनुचित प्रयास भी कर रहे है ; जबकि इसे पूरक सहअसितत्व के रूप में विकसित करना चाहिये । इस विचार और विष्लेशण के साथ कि हम ही हैं जो फिल्म और टी0वी0 सीरियल देखते हैं और हम ही हैं जो कहानी भी पढ़ते हैं । कब कहानी पढ़ें और कब फिल्म देखें-दोनों ही कथा-माध्यमों का अलग-अलग आस्वादन-तंत्र और स्वरूप होना ही चाहिये । उनके महत्व,वैषिश्टय और सार्थकता का अलग व्यकितत्व और पहचान की अलग दिषायें-जो दोनो को ही पूरक सहअसितत्व ,दीर्घजीविता और उत्तरजीविता दे ।



रविवार, 24 फ़रवरी 2013

मार्क्सवाद पर पुनर्विचार-३

(द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर एक पुनर्चिन्तन )


हर विचारधारा की अपनी आधार संकल्पनाएँ और पारिभाषिकी होती है जिसे कोई भी विचारक अपनी विचारधारात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप ही विकसित करता है या फिर प्रायः अपनी पूर्ववर्ती विचार-परंपरा से चुनता है .ये अवधारणाएँ जिनका कोई भी विचारक या दार्शनिक साक्षात्कार करता है  या फिर चुनता ही है -उसकी विचारधारा की अभिव्यक्ति और उददेश्य का माध्यम होती हैं .मार्क्सवाद में ही देखें तो मार्क्स नें विकास के इतिहास को व्याख्यायित करने  तथा अपनी विचारधारा में भविष्य के लक्ष्य साम्यवादी  क्रांति की सुनिश्चितता प्रतिपादित करने के लिए हीगेल से अपनी प्रसिद्द स्थापना द्वन्द्वात्मक भोतिक्वाद के सूत्र लिए थे -यह सूत्र वाद-प्रतिवाद और संवाद के माध्यम से  मानव-विकास की भविष्योन्मुख गतिशीलता की व्याख्या करता है .हीगेल नें यह स्थापना ज्ञानात्मक विकास के लिए दी थी जिसे मार्क्स ने सभ्यता के भौतिक विकास की व्याख्या के लिए प्रयुक्त किया .यह सूत्र योरोपीय समाजो के मानव स्वभाव की मनोवैज्ञानिक व्याख्या भी करता है .इसमें उनका परम्पराओं के प्रति संरक्षणवादी-रुढ़िवादी दृष्टिकोण तथा भविष्य निर्माण के प्रति साहसिक जोखिम के साथ भविष्य की ओर सभ्यतागत  यात्रा  की सांस्कृतिक अभिवृत्ति भी प्रत्यायित हुई है .
इसमें संदेह नहीं की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद साम्यवादी क्रान्ति की सुनिश्चितता को स्थापित करने वाला सर्वाधिक सशक्त दार्शनिक उपकरण था .
                लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान तथा ज्ञान की अन्य शाखाओं के विकास के बाद भी क्या मानव-विकास को समझाने के लिए सिर्फ इसी सूत्र पर ही निर्भर रहा जा सकता है.हमें मानव-सभ्यता के विकास को ज्ञान के सूचनात्मक विकास के रूप में भी देखना चाहिए और यथास्थितिवादी आलस्य तथा सामूहिकता की अनुकरणात्मक जड़ता और सापेक्षता में विकसित होने के कुण्ठित कर देने वाले सामाजिक दबाव की भूमिका को भी समझना चाहिए .मानव की विकास-विरोधी जड़ता के पीछे उसका वर्ग-स्वार्थ भी हो सकता है-मनुष्य-के स्वभाव को समझने की दिशा में मार्क्स का यह अवदान मनोवैज्ञानिक दृष्टि से पर्यावरण और पारिस्थितिकी के मानव स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन का ही एक हिस्सा है .मनुष्य के संसाधनों और उसके आर्थिक व्यव्हार का उसके वर्ग-चरित्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अधूरे वृत्त को पूरा करती है .
                     मानव-विकास की निरन्तरता और सोद्देश्य गतिशीलता की दृष्टि से मानव-जाति की अनुकरणात्मक जड़ता और उसके पीदियों में विभाजित अभिभावक प्रशिक्षण-तन्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका है ..यह प्रशिक्षण-तंत्र ही जातीय एवं सांस्कृतिक मानसिक एवं व्यावहारिकअधिरचानाओं को जन्म देती है .  इन्हें हम मानव-व्यव्हार के स्थायित्व के तंत्र भी कह सकते हैं .इनमें मानव-व्यव्हार के नैतिक मूल्य भी शामिल हैं .जिनका विकास कृषि-आधारित पूंजीवाद यानि सामन्तवाद नें किया है .विकास की दृष्टि से समक्न्त्वाद यद्यपि एक पिछड़ी आर्थिक व्यवस्था है ,लेकिन भूमि जैसी स्थाई पूंजी के आनुवांशिक स्वामित्व  सम्बन्धी नियमों और वर्जना-मूल्यों के विकास की दृष्टि से कृषि सभ्यता पर आधारित पूंजीवाद सांस्कृतिक स्थायित्व के रूप में महत्वपूर्ण व्यवस्थापन पद्धति देता है .पारिवारिक संवेदना और आत्मीयता का धार्मिक-साहित्यिक भाव-तंत्र इसी काल  की मूल्य-निर्मितियों पर आधारित है .
                      मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के वाद के विरुद्ध उससे अगले चरण प्रतिवाद को एक सामाजिक-संगठित प्रतिरोध की मनोवृत्ति  के रूप में देखें तो क्या द्वंद्वात्मक विकास इतनी सीधी-सपाट दार्शनिक ढंग की आसानी से समझ ली जाने वाली प्रक्रिया है ? यदि परिवर्तन की प्रक्रिया इतनी सीधी-सपाट रहती तो फिर द्वंद्व ही किस बात का रहता .सच तो यह है की मनुष्य के सभ्यता की विकास-यात्रा उसके अनुभव जगत जो कि सूचनाओं के विराट स्मृति-तंत्र के रूप में है -उसके सृजनात्मक विकास और उपयोग से जुडी है .यह स्मृति-तन्त्र संरक्षण की विविध प्रविधियों के कारण घटने के स्थान पर निरन्तर बढ़ता ही जाता है .यह समझदारी की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक अंतहीन प्रक्रिया के रूप में है .क्योंकि मामला मानव-जाति के एक हिस्से को वर्ग-स्वार्थ के कारण संगठित रूप में  उपयोग या शोषण की भूमिका में रखने का है .यह द्वन्द्ववाद हिंसक क्रान्ति और प्रतिरोध के स्तर तक भी चला जाता है .यह सामाजिक शक्तियों और सत्ता की विकासोन्मुख रस्सा-कशी है .यह एक भीड़ के बीच भीड़ में चलने और रास्ता बनाने जैसा है .मार्क्स का यह सिद्धान्त विकास की समझ का अनावश्यक सरलीकरण करता है .मार्क्स जैसे सजग विचारक नें इसका उपयोग साम्यवाद की क्रन्तिकारी सम्भाव्यता,उसके सुनिश्चित भविष्य की अपरिहार्यता प्रस्तावित करने के लिए किया था.इसमें आज भी सामाजिक गतिशीलता के कुछ सकारात्मक सन्देश अवशिष्ट हैं .वह यह कि चीजें इतनी आसान नहीं हैं.हमें निरस्त करनें और स्वीकार करने की जटिल सामाजिक मानसिक प्रक्रिया से अनवरत गुजरना होगा.वाद को नए ज्ञानात्मक सृजन  और प्रतिवाद को रुढ़िवादी प्रतिरोध तथा सम्वाद को उदार विकासवाद के राजनीतिक-सामाजिक व्यव्हार के रूप में देखा तो जा सकता है लेकिन एक दार्शनिक सूत्रीकरण होने के कारण सदैव ही सांप वहां नहीं मिलेगा जहाँ होने की घोषणा की जाएगी.समझदारी की एक सूत्रबद्ध प्रक्रिया में होने के कारण ज्ञानात्मक विकास अप्रत्याशित होने के बावजूद व्याख्या के लिए एक श्रृंखला-बद्ध पद्धति की रचना करता है .निर्माण और सृजन के भटकावों के बावजूद नीव से लेकर शिखर तक हम एक पूर्वापर प्रक्रिया के परिणाम होंगे .काल का परम्परागत भारतीय प्रतीक सर्प ही है .अज्ञात और अन्वेषण के विचलन या भटकाव की गतिकी को जोड़ दें तो सर्पिल गति ही सभ्यता के विकास की बनती है ,जैसा कि अपने आशयों में मार्क्सवाद भी है .

मार्क्सवाद पर पुनर्विचार-२

       राजनीतिक तंत्र और आर्थिक तंत्र  दोनों ही मनुष्य के सामाजिक-सामूहिक -संगठित तथा बहिर्मुखी  जीवन-व्यापार  और व्यव्हार हैं क्योंकि राज्य की सम्प्रभुता उसके  भौगोलिक सीमांकन से भी प्रभावित और सीमित  होती है ,इसलिए संगठित क्षेत्र की सृजनशीलता के लिए आर्थिक क्षेत्र ही  अब भी संभावनापूर्ण है .
सामूहिक और संगठित सृजनशीलता की दृष्टि से राजनीतिक व्यवस्थाओं की संभावनाएं  कुण्ठित हुई हैं .लेकिन आर्थिक संगठनों की सृजनशीलता की संभावनाएं अब भी बची हुई हैं..वैश्वीकरण ने राज्यों को सहचर और सहगामी बनाने के लिए मजबूर किया है .सच तो यह है कि प्रसार या विस्तार की दृष्टि से राजनीतिक व्यव्हार का ऐतिहासिक दौर अब समाप्त हो चूका है .संगठित मानव-शक्ति की दृष्टि से यह समय आर्थिक सेनाओं की विश्व-विजय का है .
          सत्ता का केन्द्र आर्थिक संगठनों की ओर चला गया है .बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शक्ति और सत्ता के नए केंद्र हैं .मार्क्स के वर्ग की अवधारणा के स्थान पर आर्थिक संगठनों को रखकर ही हम इन संगठनो के बाहर की मानव-जनसँख्या में नए  विश्व के लिए सर्वहारा की खोज करा सकते हैं .कहने का तात्पर्य यह है कि स्थिर आर्थिक समाजों के सर्वहारा गिने-चुने टापुओं में ही कैद रहा गए हैं .नए  ज़माने के सर्वहाराओं की खोज इन आर्थिक संगठनो से बहिष्कृत हाशिए की जनसँख्या में ही करनी होगी .

        मेरी दृष्टि में राजनीतिक सत्ता को सदैव ही साम्यवादी होना चाहिए और आर्थिक व्यवस्था को पूंजीवादी .सिर्फ ऐसा करना ही एक संतुलित समाज को जन्म दे सकेगा .एक आदर्श चरवाहा अपनी भेड़ों को चराने की स्वतंत्रता तो देता है ,लेकिन ऐसा नहीं करता कि भेड़ों की पीठ पर चढ़ कर ही बैठ जाए या फिर  उनकी घास पर और उन्हें चरने ही न दे .सर्जना ही नदी के प्रवाह की मुख्या दिशा है ,जबकि वर्जना की भूमिका अगल-बगल के
कगारों की ही है .क्योंकि पूंजी-निर्माण भी मनुष्य का एक सृजनात्मक व्यव्हार है ,इस लिए उसे उल्लास और स्वतंत्रता कजी दिशा के रूप में ही लेना चाहिए ,उसे अविश्वास और असुरक्षा के नकारात्मक विधि-निषेधों में कास-बांधकर अवरुद्ध करना मुझे  आत्मघाती कदम लगता है .क्योंकि पूंजी का सृजन भी एक आह्लादक मानव-व्यवहार है इसलिए इसे स्वस्थ मनुष्यों के  लिए छोड़ देना चाहिए .इसलिए भी कि पूंजीवाद निरंकुश और निर्बाध स्वतंत्रता प्रदान करने वाली व्यवस्था है,वह मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण संभावनाओं को अभिव्यक्त करने का सामाजिक अवसर प्रदान करती है -इसलिए भी सिद्धान्ततः इसे बहुत गलत तो नहीं ठहराया जा सकता ,लेकिन यह भी सच है की इसका गुण ही इसका दोष है .-यह सामूहिकता के पर्यावरण का उल्लंघन सिखाती है .इसलिए सिर्फ साम्यवादी सत्ता ही पूंजीवादी समाज की दायित्वहीनता  और महात्वाकांक्षी संवेदनहीनता के दोषों को दूर कर सकती है .यह एक विरोधाभासी प्रतीति वाली बात है ,लेकिन मानसिक विकलांगों,अयोग्यों  तथा कुंठितों  की सुरक्षा के लिए शासन का साम्यवादी होना ही उचित है .इसके लिए एक आंशिक या सह - साम्यवादी व्यवस्था की परिकल्पना भी की जा सकती है .
     

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

प्रेम भारद्वाज के लिए


आँखें बाहर का देखने के लिए ही बनी हैं

जो आँखों के भीतर ही बस गया हो 

उसे कैसे देख पाएंगी वे

जीने के लिए ही दिए गए हैं

अपने अस्तित्व में लौटना और जीना चाहता हूँ मैं 
मैं किसी से क्यों लड़ रहा हूँ 
कौन है मेरा दुश्मन 
किसके विरुद्ध जी रहा हूँ मैं 
किसके लिए जी रहा हूँ 
भाग रहा हूँ किसको छोड़कर ....

अपने अस्तित्व में लौटना चाहता हूँ मैं 
जीना चाहता हूँ अपने अस्तित्व को 
जानता हूँ 
अपने अस्तित्व को जीना 
आसान नहीं है 
अपनी उपस्थिति को सबकी उपस्थिति के साथ 
अपने होने को सबके होने के साथ 
जनता हूँ की मेरा होना सिर्फ मेरा ही होना नहीं है 
मैं एक सामूहिक उपस्थिति का हिस्सा हूँ ....

अपने अस्तित्व को जीना चाहता हूँ मैं 
मैं जनता हूँ मेरा अस्तित्व सिर्फ मेरा अस्तित्व ही नहीं है 
मैं असंख्य परमाणुओं की युगलबंदी हूँ
असंख्य आवाजों का समवेत गान हूँ 

अपने अस्तित्व को जीना चाहता हूँ मैं 
मेरा अस्तित्व 
जिसमे मेरा सूरज भी है 
और मेरी धरती भी 
मेरी चिड़ियाएँ ...मेरी गाय...मेरा कुत्ता 
मेरे वन-प्रान्तर....मेरे पहाड़ 
मेरी नदियाँ और मेरे रास्ते हैं 
असंख्य पेड़ों से गुजरते हुए 
उनसे मैं करना चाहता हूँ हाथ हिला-हिला कर संवाद 
कि अपने अस्तित्व को समूचे अंतरिक्ष 
समूचे ब्रह्माण्ड के साथ जीना चाहता हूँ मैं 
लौटना चाहता हूँ 
अपने बंधुओं के पास 

जो मुझे जीने के लिए ही दिए गए हैं

रविवार, 17 फ़रवरी 2013

सभ्यता का प्रवाह : मुद्रा और ईश्वर

विचारधाराओं की जड़ता से अलग यदि मानव-सभ्यता के प्रवाह और उसकी दशा-दिशा को समझाने की कोशिश करें.तो मानवीय व्यवस्था और व्यव्हार की दो बड़ी संरचनाएं सामने आती है .एक है मानवीय व्यव्हार के मूल्य दूसरा है आर्थिक व्यव्हार के मूल्य .व्यव्हार की ये दोनों ही पद्धतियाँ ज्ञानात्मक और मनोवैज्ञानिक अमूर्त नियमों,प्रतीकों और अवधारणाओं  से संचालित होती हैं .मुद्रा अर्थ जगत का केन्द्रीय प्रतीक है तो ईश्वर धर्म-जगत का .एक समानांतर मनोलोक का तन्त्र उसके वास्तविक और मानसिक जगत को एक सूत्र में पिरोता है .इसमें एक संपत्ति -जगत का प्रतीक है तो दूसरा मानवीय अस्तित्व की अर्थवत्ता का .अपने व्यव्हार के अनुसार ही मुद्रा एक मूर्त प्रतीक है और ईश्वर एक अमूर्त प्रतीक.दोनों ही उसकी सभ्यता के महत्वपूर्ण नियामक सत्ताएँ हैं  .इसलिए मुझे लगता है की ईश्वर उसके ज्ञान-लोक की महत्वपूर्ण उपस्थिति रहा  है .चाहे वह अपने से इतर के मानवीय ससार की छाया या प्रतिनिधि उपस्थिति के रूप में ही क्यों न हो.समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो ईश्वर के प्रति सम्मान और शेष समाज के प्रति सम्मान में कोई विशेष अन्तर नहीं रहा है.दोनों ही सामूहिक मानव- व्यव्हार की एक ही परिणामी एकता तक पहुंचतेऔर पहुंचाते रहे हैं.दूसरी ओर अर्थ-जगत की आर्थिक सुरक्षा संपत्ति के ऐश्वर्य और प्रभुता को रचती रही है..संपत्ति के विकास के सुरक्षा-तन्त्र नें धरती पर के ईश्वरों को रचा है तो ईश्वर के प्रतीकों के इर्द-गिर्द रहने वाले ईश्वरत्व के दावेदार जातीय प्रतीकों को भी .इन सभी को कृषक सभ्यता नें अपने स्थाई उत्पादन तंत्र के बल पर आनुवांशिक निरंतरता की आधार-भूमि पर रचा था .
                आधुनिक सभ्यता नें व्यापक शिक्षा-व्यवस्था के बल पर आनुवांशिक विशेषाधिकार वाली जातीय प्रशिक्षण-तन्त्र को अतिक्रमित किया है .उसके नियतिवादी स्थायित्व में व्यतिक्रम पैदा किया है .यह एक सृजनशील प्रतिस्पर्धा वाला अस्थिर एवं तनावपूर्ण समाज है .उत्तर-आधुनिक विखंडन वादियों को मूल्यात्मक उच्छेद की इस पारिस्थितकी पर भी विचार करना चाहिए .सभ्यतागत स्थायित्व का यह तन्त्र
जो कृषि-सभ्यता की लगभग अपरिवर्तनीय और टिकाऊ उत्पादन-व्यवस्था और उस प्रक्रिया में उपजे मानवीय संबंधों  पर आधारित था ,उसके परम्परागत लगभग सभी मूल्य-व्यवस्था की रचना करते है ..लेकिन यहीं उसके व्यवस्थागत व्यव्हार का दूसरा-पक्ष भी है -स्थाई उतपादन संबंधों से दूरवर्ती अप्रत्यक्ष  तथा गतिशील अर्थ-तन्त्र नें  धन-संग्रह के रूप में जिस बाजार और महाबाजार(नगर) व्यवस्था का निर्माण किया है -वह उसी मूल्य-व्यवस्था का समानांतर प्रति-रूप है .ज्ञान-तन्त्र के रूप में  ये दोनों एक ही प्रभुत्व-तन्त्र के दो रूपों की रचना करते है .
                  पूंजी धरती पर एक सुरक्षित स्वर्ग का निर्माण कराती है .मुद्रा का एक रहस्यमय संसार  उसकी आस्था और विश्वास के उस पर्यावरण को निर्मित करता है,जिसे स्वर्गिक और ईश्वरीय कहा जा सकता है ..इस दृष्टि से देखें तो मुद्रा का अर्थ-ससार और मूल्यों का अर्थ-ससार दोनों ही एक -दुसरे के पूरक और समानांतर ही हैं .इसी लिए दोनों ही समाज में एक -साथ देखे जाते हैं .एक अर्थ-ग्रस्त मानव के लिए दोनों ही रहस्यमय और अविश्वसनीय है .उसे अपना ही भाग्य स्वप्न-सदृश लगता है .वह कृतज्ञ मन से इस रहस्य मय ससार को देखता है .वह श्रद्धा निवेदित करता है .उस ईश्वर के पर्यावरण को जीता है ,जो सब कहीं है .

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

भारतीय आध्यात्मिकता ,ईश्वर और लोकतन्त्र

               ( सत्ता का संस्कृति विमर्श )         


अधिकांश लोग ईश्वर की अवधारणा को सर्वकालिक और सर्वशक्तिमान सत्ता की उपस्थिति के रूप में स्वीकार करते हुए उसके सामाजिक स्रोत,सामाजिक भूमिका और मानवीय परिणामों को अनदेखा करते हैं .वे यह भूल जाते हैं कि भारतियों की अधिकांश सांस्कृतिक अवधारणाओं का विकास एक जाति विशेष ने किया है .अपने पेशेगत कारणों से इस जाति विशेष नें जो अपने लिए भी चरित्र ,नीति और मर्यादाएं निर्धारित की ,वे राजतंत्र व्यवस्था की निष्ठां के कारण ,इस सीमा तक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से हीन विकसित किया गया है कि वह पूरी भारतीय संस्कृति को एक आज्ञाकारी शासित संस्कृति में बदल देता है .
               सबसे पहले तो पुनर्जन्म ,भाग्यवाद और कर्मवाद की अवधारणा के कारण यह राजा को ईश्वर की इच्छा ,प्रारब्ध एवं नियति के अनुसार राजप्रप्ति के रूप में पहले से ही विशिष्ट मानव घोषित करती है .इसमें संदेह नहीं कि इन विश्वासों नें अंतर्समुदायिक विश्वासघात ,नेतृत्व की अराजकता और महत्वकांक्षी प्रतिस्पर्धा को रोका है .दरअसल यह पूरी संस्कृति और धार्मिक आचार-संहिता वंशानुगत उत्तराधिकार को केंद्र में रखकर रची गई थी .इसमें निःसंतान होनें तक कोई भी राजतंत्र कई पीढ़ियों तक चलता रह सकता था .
                यद्यपि कई बार तो मंत्री और सेनापति का पद भी आनुवांशिक था लेकिन राजा को यह अधिकार था की वह जाती-विशेष से ही किसी अन्य योग्य ब्राह्मण को भी मंत्री के रूप में चुन सकता था .यद्यपि साचा तो यही है कि हर परिवार के अपने वंशानुगत पुरोहित परिवार होते थे .उसी तरह मंत्री के परिवार से ही कोई मंत्री बन सकता था .इस व्यावस्था नें मंत्री बनाने की कूटनीतिक साज़िशों और प्रतिस्पर्धा को रोका .
                   दरअसल यह एक स्थाई कृषि-आधारित समाज की सांस्कृतिक व्यवस्था थी ,जिसमें किसान का कृषि -क्षेत्र और उपज सामर्थ्य तक सुनिश्चितथी .कृषि-आधारित स्थाई संस्कृति ने ये सारे सामाजिक-सांस्कृतिक चरित्र और भूमिकाएँ निर्धारित की थीं .इसी के अनुरूप जातीय चरित्र और उसका संस्कारगत प्रशिक्षण -तंत्र भी विकसित किया था .
                      ब्राह्मण-वर्ण का जातीय चरित्र उसके राजनीतिक उसके राजनीतिक व्यवस्था से महत्वाकांक्षा -शुन्य रहने की मांग करता था .समाज में राजा के बाद की पद व्यवस्था के कारण यह जाती जिस धर्मं-व्यवस्था और संस्कृति की अचेतन प्रस्तावना कराती है वह किसी और के नेतृत्व का समर्थनकारी व्यक्तित्व रचता है .वह शासक को सम्मान से देखने की संस्कृति का प्रस्तावक है .आपनी इस मानसिक व्यवस्था के कारण ब्राह्मण-जाति और उसके द्वारा प्रस्तावित संस्कृति किसी भी शासक के लिए अनुकूल और समर्थन की भूमिका में रही है .
                      क्योंकि भारतीयों की अधिकांश धार्मिकता और संस्कृति के केंद्र में ब्राह्मण-दृष्टि और मानसिकता की ही केन्द्रीय भूमिका है ,इस लिए इनकी मानसिकता के अनुरूप भारतीयों का धर्मं और ईश्वर भी शासक-समर्थक मानसिकता को पोषित करता है .वह दरअसल राजतन्त्र और वंशानुगत उत्तराधिकार की संरक्षक अवधारणा और विश्वास के तन्त्र के रूप में है .
                      इसका नियतिवाद क्योंकि कृषि -सभ्यता का स्थायित्व वाद ही है ,इसी लिए इसकी ईश्वर और धर्मं सम्बन्धी सभी सांस्कृतिक अवधारणायें यथास्थितिवाद की पोषक तथा बेहतर नेतृत्व की दृष्टि से प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा की निषेधी हैं .यह संस्कृति भारतीयों में व्यापक लोकतांत्रिक उदासीनता को जन्मा देती है .इसका दूसरा दुष्परिणाम भारतीय राजनीति में परिवारवाद की स्वीकृति और व्यापक जनसमर्थन है .इससे भारत में लोकतान्त्रिक सत्ता कुछ ही परिवारों में सिमट कर रह गई है .अच्छा या बुरा जो कुछ भी हो रहा है ,उन्ही के माध्यम से हो रहा है .क्योंकि भारतीयों की दार्शनिक,धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणाएं बहुत कुछ चारण जाती की भूमिका वाली पुरोहित जाति नें रची है,इसलिए यह शासक -वर्ग को चुनौतियों से परे  का  सत्ता का स्वर्ग -लोक प्रदान करता है .

सोमवार, 28 जनवरी 2013

दो कविताएं

एक ही पूंजी समय 

एक

सब एक ही तरह से सोच रहे हैं
सभी सहमत हैं एक ही पसंद के  साथ
एक ही रूचि और मानसिकता के साथ
समय की एक ही बस में बैठे -घूरते
एक ही समूह के बलात्कारियों की तरह .....

सब एक ही तरह से सोच रहे हैं
नापसंद कर रहे हैं-
निरस्त और व्यर्थ घोषित कर रहे हैं
वे  पूरे आवेश के साथ मंच को ही
पूरी दुनिया घोषित कर रहे हैं

वे आश्वस्त हैं कि
एक बर्बर महत्वकांक्षी यात्रा के
शानदार अन्त के साथ
उन्होंने हथिया लिया है समय ....

वे एक पूर्वनिर्मित
और निर्धारित समूह के आतंक के साथ
गुजरते समय का सच घोषित करना चाहते हैं
विवेक की परीक्षा से बचने की
अपनी साजिशी कोशिश  में
रचना चाहते हैं
एक बन्धक विवेक का इतिहास

वे नहीं चाहते कि
कोई अकेला विवेक
कभी स्वतः स्फूर्त और अहिंसक विवेक में बदले


एक ही पूंजी
एक ही पूंजी-समूह
रच रहा है एक ही रचना-समय .....


वे समय के अपने बिवेक से
डरते हुए रचना चाहते हैं
एक सुरक्षित और सामूहिक
प्रायोजित रचना समय

दो

सृजन -नीति 


इसी प्रतिरोध में मैं हूँ
हूँ मैं अपने अस्वीकार में और घृणा में
और अनुपस्थितियों में
मैं रच रहा हूँ
अपना विस्थपित समय
तथाकथित स्थापितों के
नापसन्द वर्चस्व के विरुद्ध ...

वे जो  बाजार में है
और बाजार है

मैं जानता हूँ कि
मैं उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता
और यह कि उनके सामने
आत्म-समर्पण न करना
आत्महत्या करना है
या फिर मार दिए जाने की सुनिश्चितता
फिर भी पुरे होशोहवास के साथ
मैं उनको चिढाना चाहता हूँ एक सृजनात्मक मजाक की
उपस्थिति के साथ

सिर्फ इतना चाहता हूँ मैं कि
वे  मुझे देखकर चौंक जाएँ
भक सफ़ेद हो जाएँ उनका चेहरा
अपने होने के अनैतिकताबोध से
हे मुर्ख ,डकैत और कायर
सामूहिक जीवन-समय

मैं सिर्फ इतना भी कर सकूँ तो
गर्व से चला जाऊंगा
यह दुनिया छोड़कर....

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

स्वयं के पक्ष में ...

जब सब निष्ठाएं संदिग्ध हो गई हैं 
मैं किसी को भी अपना विश्वास कैसे सौंप सकता हूँ !

मुझे मेरे पास रहने दो 
मैं अभी किसी पर भी 
विश्वास नहीं कर पाता-
न ही ईश्वर 
न समय 
न समाज 

मैं स्वयं को 
अपने मूल स्वभाव में 
बचा लेना चाहता हूँ

आप यदि कहना चाहेंतो कह सकते हैं कि
यही मेरी आध्यात्मिकता है 

मैं डरता हूँ कि
हर विश्वास 
मुझे बेवकूफ बना सकता है 
और हर अविश्वास असामाजिक ...

दुनिया-घर


मैं पूरी दुनिया को अपने घर में बदल देना चाहता हूँ
आत्मीयता के एक सुखद पर्यावरण के रूप में
दुनिया में अपनी साझी उपस्थिति के साझे संविधान के साथ
प्रक्रिया और परिणति की असहमति के बावजूद
अतीत के संवेदना-पुरुषों की तरह
एक वृहत्तर स्व की खोज में

अपनी अस्मिता  की खोज की यात्रा के साथ
अपने आखिरी गंतव्य के पल में
समां जाना चाहता हूँ मैं
अफ्रीका के उस आदि-मानव के कुल में
चूमते हुए दुनिया की सारी बन्दर-प्रजाति को
आगे और आगे सभी स्तन-पाइयों और
बहु-कोशकीय दुनिया को पर करता हुआ
समां जन चाहता हूँ उस आदिम अकेली बीज कोशिका में
जिसके हम सब ही वंश-विस्तार हैं

मैं जानता हूँ कि परमाणुओं के गुण-धर्म ,पसन्द-नापसन्द
रूचि-अरुचि और स्वभाव से ही हुई है
अचेतन भौतिक पदार्थों से सचेतन जीवन-जगत की रचना और यह कि
सक्रिय व्यवहार ही
इस सृष्टि का रचनात्मक मूल है

मैं मानव-जाति के सबसे प्यारे बच्चों के
उन सुन्दर सपनों को फिर से साकार देखना चाहता हूँ
जैसा कि भारत में दो माओं के पुत्र पौराणिक कृष्ण नें
वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में तो
अरब में अनाथ बच्चे मुहम्मद नें
सारी  दुनिया को एक ही कबीले के रूप में बदल देने के लिए देखा था
जैसा देखा था ईसा मसीह नें
सारी दुनिया के पवित्रतम शिशु के रूप में
मैं सारी  मानव-जाति को अपने ही अस्तित्व के विस्तार के रूप में
अपने ही अभिन्न परिवार के रूप में पुनः पाना और जीना चाहता हूँ

मुझे संकीर्णताएँ अश्लील लगती है
और खण्डित अस्मिताएँ पागलपन
मेरी दृष्टि में दुनिया के सारे क्षुद्रताजीवी मुर्ख हैं
मैं जानता हूँ
पाना और जीना भी चाहता हूँ-दुनिया मेरा घर !

दुनिया-घर


मैं पूरी दुनिया को अपने घर में बदल देना चाहता हूँ
आत्मीयता के एक सुखद पर्यावरण के रूप में
दुनिया में अपनी साझी उपस्थिति के साझे संविधान के साथ
प्रक्रिया और परिणति की असहमति के बावजूद
अतीत के संवेदना-पुरुषों की तरह
एक वृहत्तर स्व की खोज में

अपनी अस्मिता  की खोज की यात्रा के साथ
अपने आखिरी गंतव्य के पल में
समां जाना चाहता हूँ मैं
अफ्रीका के उस आदि-मानव के कुल में
चूमते हुए दुनिया की सारी बन्दर-प्रजाति को
आगे और आगे सभी स्तन-पाइयों और
बहु-कोशकीय दुनिया को पर करता हुआ
समां जन चाहता हूँ उस आदिम अकेली बीज कोशिका में
जिसके हम सब ही वंश-विस्तार हैं

मैं जानता हूँ कि परमाणुओं के गुण-धर्म ,पसन्द-नापसन्द
रूचि-अरुचि और स्वभाव से ही हुई है
अचेतन भौतिक पदार्थों से सचेतन जीवन-जगत की रचना और यह कि
सक्रिय व्यवहार ही
इस सृष्टि का रचनात्मक मूल है

मैं मानव-जाति के सबसे प्यारे बच्चों के
उन सुन्दर सपनों को फिर से साकार देखना चाहता हूँ
जैसा कि भारत में दो माओं के पुत्र पौराणिक कृष्ण नें
वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में तो
अरब में अनाथ बच्चे मुहम्मद नें
सारी  दुनिया को एक ही कबीले के रूप में बदल देने के लिए देखा था
जैसा देखा था ईसा मसीह नें
सारी दुनिया के पवित्रतम शिशु के रूप में
मैं सारी  मानव-जाति को अपने ही अस्तित्व के विस्तार के रूप में
अपने ही अभिन्न परिवार के रूप में पुनः पाना और जीना चाहता हूँ

मुझे संकीर्णताएँ अश्लील लगती है
और खण्डित अस्मिताएँ पागलपन
मेरी दृष्टि में दुनिया के सारे क्षुद्रताजीवी मुर्ख हैं
मैं जानता हूँ
पाना और जीना भी चाहता हूँ-दुनिया मेरा घर !

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

सामयिक वार्ता ,जनवरी २०१३ के अंक में प्रकाशित दो कविताएं -

थोड़ी-सी जगह


थोड़ी सी जगह जरुरी है
किसी और के लिए
चाहे वह ईश्वर हो या फिर कोंई और
थोडा सा भोजन उसके लिए
जो अभी नहीं आया है
लेकिन जो आ सकता है कभी भी

थोडा सा धैर्य -जो दुःख में हैं
उनकी नाराजगी और क्रोध के लिए
थोडा सा बोझ दूसरो की विपत्ति को 
बाँट लेने और बचा लेने के लिए

थोड़ी सी सम्भावनाये बची रहनी चाहिए
नए आविष्कारो के लिए भी
और थोड़ी सी ऊब नए प्रश्नो के लिए
थोडा सा मन नैराश्य के अंतिम क्षणों के विरुद्ध
थोड़ी सी चुप्पी और थोडा सा संवाद
एक संवेदनशील मन और सुरक्षित जीवन के लिए---


सुख का आधार

सारा सुख आदमी के ऊपर ही टिका हुआ है
हर सुखी आदमी किसी दुखते कंधे वाले
आदमी के सर पर चढ़ा हुआ है
कोई जानबूझकर तो कोई अनजाने ही
किसी  के पैरो तले पड़ा हुआ है

जेब काटने से लेकर जीने तक आदमी के लिए
आदमी ही है कच्चा माल
मानसिक विकलांगो और पराश्रितों की एक बड़ी भीड़
जो कुछ भी नया रचना और स्वयं कमाना नहीं जानती
उनकी दुनिया का एकमात्र सच यही है कि
आदमी से छीन कर ही आदमी का भाग्योदय और भला हुआ है !



रागात्मक विद्रोह


जनसत्ता 20 जनवरी, 2013: युवा कवि-कथाकार गौरव सोलंकी के कविता संग्रह सौ साल फिदा की कविताओं की दुनिया भविष्यकामी युवा जीवन का अपने सपनों के पीछे खुद को निश्शेष कर देने की आकांक्षाओं और भावनाओं की दुनिया है। 
उनकी कविताएं दरअसल, गुजरते जीवन और समय के गोपन रहस्यों को सहसा अनावृत्त कर देने की युवा कवि की विद्रोही मानसिकता से उपजी हैं।
गौरव की कविताएं विवरण की अस्पष्टता का इस्तेमाल कविता की तकनीक की तरह बहुअर्थी संभावनाओं के लिए करती हैं। दरअसल, वे जीवन की सृजनात्मक संभावनाओं के कवि हैं। उनकी दुनिया में कुछ भी निश्चित नहीं है। चीजें जीवन की तरह ही कभी भी कोई दिशा और रूप ले सकती हैं और उनकी कविताओं में व्यक्त अनुभव भी। उनकी ‘कि घर है’ कविता की ये पंक्तियां: ‘या कि तुम्हारे लगातार बेघर होने की प्रक्रिया में/ मैं घर हूं।’
गौरव की रचना-प्रक्रिया वास्तविक जीवनानुभवों के जाल को बोतलबंद पानी की तरह एक जटिल सृजनात्मक प्रक्रिया में ले जाने की है; जहां जल भी केवल जल न रह कर बिसलेरी बन जाता है। उनकी कविताओं में दृष्टांतों की एक पर्यटक मस्ती है, जो कभी भी चौंका सकती है- यह न सही तो यह सही की शैली में अर्थों और संकेतों का एक झूमता हुआ गतिशील और बेफिक्र कविता-संसार है। जहां सब कुछ कविता के एकांत में घटित होता है, सामाजिक वर्जनाओं की चिंता छू तक नहीं पाती। गौरव की कविताएं संप्रेषण की क्रीड़ा और कौतुक के शिल्प में रमती हैं। उनकी कविता में अर्थों और संकेतों की आंख-मिचौली है।
गौरव सोलंकी अप्रत्याशित सृजनशीलता के कवि हैं। अभिव्यक्ति के उपकरणों से छेड़छाड़ उनकी विशेषता है। ‘मैं ईश्वर’ कविता में ईश्वर होने की घोषणा एक ऐसी ही शरारती घोषणा है। पूरी कविता हालांकि दुख को सृजनात्मक स्वतंत्रता के साथ जीने की एक निषेधात्मक प्रस्तुति है: ‘मैं अपनी सघन कुंठाओं से/ तुम्हें बनाना और तोड़ देना चाहता हूं/ रात के तीसरे पहर में/ मैं ईश्वर हूं।’
‘डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है/ कृपया कुछ देर बाद डायल करें/ यह मेरे संसार का ब्रह्मवाक्य है, सुनो।’ यह कविता प्रेमजनित ईर्ष्या की दुनिया में ले जाती है। प्रकारांतर से यह भी युवा-जीवन की आशंकाओं और दुस्वप्नों की दुनिया है। गौरव अद्यतन जीवन-समय के व्याख्याता कवि हैं। जिसके कारण सामान्य दैनिक अनुभव से भी कविता फूट पड़ी है: ‘मैं नहीं हूं/ तो कोई और है वहां/ कुछ और कहता हुआ/ जिसके शब्दों के अर्थ भी आधी रात की तुम्हारी हंसी में/ खुशी से उलझ कर खुदकुशी करते हैं।’
‘हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था’ शीर्षक कविता मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले में मारे गए आम लोगों की स्मृति, घटित मानवीय त्रासदियों और एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी की शहादत के साथ-साथ बढ़ती संवेदनहीनता और मीडिया की कमजोर स्मृति का भी रेखांकन करती है। यह कविता आतंकवादियों की बर्बर स्मृति और आम आदमी की दिनचर्या के जीवंत बिंबों से गुजरती हुई इस महत्त्वपूर्ण टिप्पणी के साथ समाप्त होती है कि ‘कमजोर याददाश्त और महेंद्र सिंह धोनी के इस समय में/ यह हर सुबह गला फाड़ कर उठती हुई हूक/ और बहुत साधारण लोगों को बचा कर रख लेने की/ एक नितांत स्वार्थी कोशिश है/ इसे कविता न कहा जाए।’
‘रात में फ्रिज’ कविता यांत्रिक सुविधाओं की निर्भरता को समकालीन जीवन के रागात्मक विस्तार 
के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पालतू पशुओं के प्रति रागात्मक संबंध वाली पीढ़ी से आगे की दुनिया है, जो इन यंत्रों की भी उपस्थिति और विस्तार को एक मानवीय अर्थवत्ता देती है: ‘फिर भी रात में फ्रिज खोलो तो/ सूरज दिखता है/ मरते-मरते भी लगेगा/ कि जन्मा हूं अभी/ और मां है सुबह-सुबह।’ गौरव खिलंदड़े और शरारती अहसासों के कवि हैं। वे जीवन के लिए अपरिहार्य यांत्रिक वातावरण से भी पुराने मानवीय रिश्ते ढूंढ़ निकालते हैं। फ्रिज के भीतर लाल सूरज का दिखना और सुबह-सुबह ताजा रोटियों के लिए मां की याद और अहसास उनकी ऐसी ही पंक्तियां हैं।
गौरव सोलंकी नें कामुकता के खुले बाजार के विरुद्ध एक मानसिक प्रतिरोध रचने की कोशिश की है। उनकी ‘छलती हुई स्त्रियों के खिलाफ’ ऐसी ही कविता है। उनकी दृष्टि में प्रेम में या फिर प्रेम के लिए पुरुष का बचना भी एक प्रकृति-प्रदत्त मानवीय पर्यावरण का बचना है। उनकी कविताएं कला पर थोपी गई नैतिकता के विरुद्ध हैं। गौरव साहस के साथ अपने काव्य-संसार में समाज की दृष्टि से वर्जित और घृणास्पद समझे जाने वाले विषयों का भी निर्बाध प्रवेश कराते हैं।
उनके यहां युवा जीवन की मन:स्थिति और यौन-यातना के अनेक प्रसंग हैं: ‘उसकी लड़कियां/ कि उनसे नफरत करना चाहूं/ तो मर जाने का मन करता है/ प्यार करता रहूं तो पागल हो जाऊं।’ गौरव प्राय: चौंकाने वाले विषयांतर की तरह ही कविता के प्रमुख कथ्य की ओर लौटते हैं। इस कविता में एक सहेली की बेटी की विदाई के अवसर पर मां की मानसिक पीड़ा, रुलाई और पिता के माध्यम से एक सम्मानजनक पेशे में आजीविका के लिए कार्यरत स्वाभिमानी बुद्धिजीवी के अपमानजनक जीवनानुभवों का वर्णन है। व्यवस्था के घृणास्पद और अपमानजनक होने की स्थायी स्थिति इस कविता को महत्त्वपूर्ण बनाती है। कविता अपमानों के संस्मरणों को इन शब्दों में व्यक्त करती है: ‘पिताओं को नहीं रहना चाहिए इतना अमर/ बेइज्जती को इतना ताजा।’
ये कविताएं जीवन, दुख, अंधेरे और दुस्वप्नों के बीच अपनी बेबाक टिप्पणियों और अलग अंदाज के साथ बिल्कुल नया पाठकीय अनुभव प्रदान करती हैं। इनके निर्माण में   देखे, भोगे और जिए गए यथार्थ और कवि के निजी संस्मरणों और एकांत टिप्पणियों की बड़ी सृजनात्मक भूमिका है। इनका वैशिष्ट्य उनके वैश्विक बाजार युग की युवा मानसिकता और दृष्टि से लोक और समय का साक्षात्कार करने वाली कविताएं होने में है। ‘जब तुम पिक्चर देख रही थी’, ‘और उन लड़कियों से किया इश्क हमने’, ‘चार लड़कियां भी हैं अकेली लड़कियां’, ‘रेडियो, आइसक्रीम और लाल गुब्बारे’, ‘छूटी हुई लिपस्टिक’, ‘और चंद्रकला, ब्रेक के बीच तुम्हारा कत्ल’, ‘आसमान फाड़ डालेंगे किसी दिन’, ‘सौ साल फिदा’ और ‘कहीं और करेंगे हम अपने बच्चे पैदा’ आदि कविताएं न सिर्फ शीर्षक, विषय और संरचना में गौरव की अलग पहचान बनाती हैं, बल्कि जीवन के साक्षात्कार और परिकल्पना में भी। ‘तुम्हारी आंखों में तमंचे हैं’, ‘इतना निहत्था कि डर नहीं’ और ‘वैसे भी कब तक मारेंगे मेरी जान/ एक बार से ज्यादा नहीं मारा जा सकता एक आदमी को।’ जैसी अनेक अभिव्यक्तियां गौरव को अभूतपूर्व, साहसिक, समर्थ और अविस्मरणीय कवि बनाती हैं। शर्त बस यही होगी कि इन कविताओं को कवि से सहमत होते हुए नैतिकता संबंधी बिना किसी पूर्वग्रह के, जीवन के सच के रूप में पढ़ा जाए।
रामप्रकाश कुशवाहा
सौ साल फिदा: गौरव सोलंकी; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 140 रुपए।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

अतीतजीविता से मुक्ति

मानव-सभ्यता की अस्तित्व -यात्रा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनरूत्पादन एवं पुनर्प्रशिक्षण  की प्रक्रिया से होकर गुजरती है । सिर्फ अस्तित्व  की दृष्टि से ही नहीं बलिक मन,बुद्धि और विचार के धरातल पर भी आज का मनुष्य बीते हुए कल के मनुष्य  का प्रतिफल है । इसीलिए आज के मनुष्य की अनेक समस्याओं का उदगम भी प्राचीन मनुष्य द्वारा जिए गए जीवन की घटनाओं ,आदतों और स्मृतियों में है । ये स्मृतियां ही उस साभ्यतिक अचेतन का निर्माण करती हैं ,जो आज के मनुष्य को सोचने,जीने और करने की एक सांस्कृतिक पद्धति देती है। विकास की इस श्रृंखलित निरन्तरता के कारण आज के मनुष्य को बदलने की प्रथम-द्रष्टया प्रविधि उसकी स्मृति को ही बदल देने या फिर नयी पीढ़ी के मनुष्य को उसकी स्मृति-श्रृंखला से ही बाहर निकाल देने के रूप में संभव हो सकती है । सैद्धांतिक और नैतिक दृष्टि से भी क्योंकि  गुजरे हुए समय को बदलना संभव नहीं है , न ही अतीत से जुड़ी हुर्इ स्मृतियों को ही बदलना संभव है-सुनियोजित और सुनिश्चित बदलाव के लिए की गयी इतिहास की हर कृत्रिम पुनर्व्याख्या उसें संदिग्ध और अविश्वसनीय ही अधिक करेगी -इतिहास और स्मृति से बाहर निकलकर मूल्यपरक जीवनयापन के लिए एक परिष्कृत विवेक अर्जित करना ही वर्तमान और भावी मानव-जाति के लिए मुक्ति  का एकमात्र रास्ता है ।
         अतीतबद्ध,स्मृति-जीवी इतिहासित मनुष्य पुराने सामाजिक आदतों का पुनर्वाहक बनकर पुनरावर्ती घटना-चक्र को जन्म देता है । अपनी अतीतजीवी दृष्टि के अनुरूप ही समकालीन परिवेश  का भी अतीतीकरण करता जाता है । दृष्टि के अतीतीकरण के साथ ही प्रतिकूल मान्यताओं से जुड़ा समकालीन मनुष्य भी उसके लिए समस्यात्म्क परिसिथति का अवयवी हिस्सा बन जाता है । यह इतिहासित मनुष्य ही अपने प्रतिक्रियात्मक विवेक और व्यवहार के कारण अनेक सामाजिक अपराधों और दुर्घटनाओं की श्रृंखला को जन्म देने और जीने के लिएअभिशप्त है । आज का प्रबुद्ध मनुष्य भी इसी अर्थ में पराधीन या गुलाम है कि वह एक पूर्वनिर्धारित मस्तिष्क बनकर रह गया है । प्रतिक्रियात्मक जीवन और प्रतिबनिधत विवेक के कारण वह अतीतजीवी सभ्यता के यानित्रक उत्पाद की तरह सामने आता है । एक ही जीवन के अलग-अलग साभ्यतिक संज्ञान एवं व्याख्याओं नें उसे अनेक मानवीय विश्वों में बांट दिया है । वह अनेक परस्पर विरोधी अस्मिताओं में बंट गया है । तमाम बौद्धिक विकास के बावजूद वह अपने ही भीतर के शैतानी हत्यारे जीन की तलाश  नहीं कर पाया है । इस इतिहासित मनुष्य को उसके प्रतिक्रियात्मक विवेक से निकालकर विशुद्ध ,उचित ,मौलिक ,अधतन और मूल्यपरक विवेक की ओर ले जाना  सामूहिक रचनाशीलता की प्रमुख चिन्ता होनी चाहिए ।
          इस समय भारतीय बुद्धिजीवियों में परिकल्पनात्मक अतीतीकरण की शिकार तीन प्रजातियाँ दिख रहीं हैं -भारतीय मूल के सांस्कृतिक पुरातनताजीवी ,जिसके केंद्र में ब्राह्मण जाती की पेशेवर सामाजिकता भी है .दूसरी प्रजाति इस्लामी जिहाद की परिकल्पनाएं जीती हैं ,तीसरी प्रजाति बिना किसी आवश्यक समझदारी के बिना सोचे-समझे (सिर्फ पढ़े-जिए के आधार पर  )अपने  क्रन्तिकारी होने के मुगालाताजीवी महत्वाकांक्षी बुद्धिजीवियों की है (जिसमें से एक मैं स्वयं भी हूँ).
ये तीनों अपने पिछड़ेपन की नकारात्मकता के साथ प्रगति और विकास की प्रक्रिया को अपने-अपने ढंग से अवरुद्ध कर रहे हैं .ये तीनो ही धड़े अत्यन्त ही मूर्खतापूर्ण ढंग से विद्वता के घमंड को जी रहे हैं .स्वीकृति की सामाजिकता और सामूहिकता के कारण इनका सामुदायिक विवेक सापेक्षिक प्रभाव के कारण अपनी वैचारिक अयोग्यताओं को समझने के अयोग्य है .

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

साहित्य की संस्कृति,सत्ता और समाज


मनुष्य के जीने को समाजशास्त्रीय नजरिए से देखना बिल्कुल नया नजरिया है । यह दृषिट संस्कृति को भी नए दृषिटकोण से देखे जाने की वकालत करती है । संस्कृति साहित्य को भी कर्इ रूपों में प्रभावित और नियनित्रत करती है । इसके विपरीत यह भी सच है कि साहित्य भी संस्कृति को प्राय: सिथर और स्थार्इ प्रभावशीलता देती है । कर्इ बार साहितियक स्मृति सांस्कृतिक स्मृति के रूप में समाज को प्रभावित करती है तो कर्इ बार सांस्कृतिक स्मृति ही साहितियक स्मृति के रूप में पुनरूत्पादित होती रहती है । इसीतरह साहितियक स्मृति की सार्थकता, ऐतिहासिक स्मृति को संशाधित या विस्थापित करनें की सामथ्र्य में है । ऐतिहासिक स्मृति दुर्घटनात्मक  या आपराधिक स्मृति भी हो सकती है । ऐसी स्मृति को सतत समीक्षा और प्रतिरोध की स्मृति और संस्कृति का निर्माण साहितियक सृजनशीलता का उपलबिध कहा जा सकता है ।

       ऐतिहासिक स्मृति प्राय: अपने युग के असंगठित आम जन के सामूहिक भटकाव या आलस्य का परिणाम हुआ करती है । कर्इ बार वह मनुष्य के तात्कालिक सामूहिक विवेक एवं निर्णयों की अभिव्यकित हुआ करती है । ऐसे में साहितियक सृजनशीलता के माध्यम से व्यक्त मानवीय विवेक का महत्व बढ़ जाता है । क्योंकि साहित्य अधिक सजग ,गम्भीर और अपेक्षित विचारशीलता की अभिव्यकित हुआ करता है ।  साहित्यकारों को साहितियक सृजनशीलता के इस सांस्कृतिक महत्व और समाजोपयोगी भूमिका को समझना चाहिए ।  नासमझ एवं मनोरंजनजीवी साहितियक सृजन प्राय: आस्वादपरक या फिर उत्सवधर्मी होता है । सामाजिक स्वास्थ्य की दृषिट से एक साहित्यकार की भी अपनी सांस्कृतिक भूमिका होती है ।

      वस्तुत: साहित्य की संस्कृति विवेक की संस्कृति है । किसी ऐतिहासिक घटना का विश्लेषण करता हुआ इतिहासकार  किसी घटना से सम्बनिधत मानव-व्यवहार के उचित-अनुचित होनें का विश्लेषण तो करता है, लेकिन वह गलत और अनुचित होते हुए भी तथ्यों से कोर्इ छेड़छाड़ नहीं कर सकता । वह किसी सामुदायिक दु:ख य क्षोभ का निवारण भी नहीं कर सकता । संवेदनशील मसलों पर उसकी बौद्धिक समझदारी प्राय: नि ष्प्रभावी ही रही है । इसीलिए ऐतिहासिक स्मृति के स्थान पर साहितियक स्मृति अधिक मूल्यवान और प्रभावी हो सकती है । वह न सिर्फ संशोधन उपसिथत करती है ,बलिक नर्इ समानान्तर एवं सार्थक स्मृति की प्रस्तावना भी कर सकती है ।   उदाहरणस्वरूप देखा जाय तो मध्ययुग में औरंगजेब सत्ता के लिए अपनें सगे भाइयों की हत्या कर ऐतिहासिक स्मृति का निर्माण क्रता है । मध्य-युग में हर सृजित तुलसी के राम की साहितियक स्मृति और उपसिथति उसे इसतरह अपवाद के हाशिए पर धकेलकर उसका अवमूल्यन कर देती है कि भारत में सिर्फ हिन्दू ही नहीं बलिक मुसलमान भी प्राय: उस ऐतिहासिक स्मृति की चर्चा नहीं करता । इस प्रकार तुलसी के राम-काव्य की एक सृजनात्मक सार्थकता यह भी है कि वह औरंगजेब और उसके कुकृत्यों को भारतीय जनता की सामाजिक -सांस्कृतिक स्मृति से विस्थापित और खारिज करती है ।

         इसमें सन्देह नहीं कि साहित्य का संस्कृति,समाज और सत्ता से रिश्ता बहुआयामी और जटिल है । साहित्य समाज से प्रभावित होता है और उसे प्रभावित करता भी है । एक अच्छा और आदर्शवादी साहित्य समाज को भी एक आदर्श साहित्य बनानें की प्रेरणा देता है । यथार्थवादी साहित्य समाज की कटु वास्तविकताओं को सामनें लाकर उससे बचनें एवं उससे सजग रहनें के सन्देश देता है । प्राचीन काल से ही साहित्य सामाजिक परिवर्तन का माध्यम रहा है । आधुनिक काल में भी विभिन्न विचारधाराओं के लोग अपने मत के अनुसार साहित्य रचकर साहित्य को परिवर्तित करनें का प्रयास करते रहते हैं ।

        भारतीय साहित्य और सत्ता का एक हजार वषोर्ं का साहितियक इतिहास सम्पूर्ण समर्पण का तथा राजनीतिक इतिहास सम्पूर्ण पराधीनता का रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो इस दौर का साहित्य परार्इ सता के मानसिक समर्थन के लिए एक अचेतन सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रच रहा था । यधपि यह भी सच है कि उस दौर के भकित-साहित्य के प्रति यह दृषिटकोण या नजरिया  उस दौर के साहित्य को पढ़ते हुए हम नहीं हासिल करते । यह दृषिट उस दौर की इतिहासजीविता को अतिक्रमित करके ही पार्इ जा सकती है ।

         वस्तुत: हर युग की सत्ता का हर युग के साहित्य पर पर्याप्त प्रभाव रहा है । कभी तो यह कहना मुशिकल हो जाता है कि सत्ता,समाज और साहित्य को प्रभावित कर रही है या साहित्य ही समाज और उसकी सत्ता के चरित्र को । इस बिन्दु पर विचार करते हुए मेरा घ्यान बार-बार रामकथा के नायक राम के चरित्र और युग के बादशाह बाबर तथा उसके पुत्र हुमायूं के आपसी रिश्ते और चारित्रिक साम्य की ओर जाता है । कहते हैं बाबर नें अपनें बीमार बेटे हुमांयूं की यह कहते हुए परिक्रमा की थी कि उसका मरणासन्न बेटा बच जाए,भले ही उसके स्थान पर स्वयं उसकी ही मृत्यु क्यों न हो जाए । कहते हैं ऐसा ही हुआ था और उस दिन के बाद बाबर बीमार होनें लगा था और हुमायूं स्वस्थ । इतना ही नहीं बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूं नें अपना राज्य अपनें भाइयों में बांट दिया था । बाबर के चरित्र की तुलना रामकथा के पात्रों से करें तो उसमें भी दशरथ की तरह का मरणान्तक पुत्र-प्रेम देखा जा सकता है । बाबर निशिचत रूप से हुमायूं से बहुत प्रेम करता होगा । अपनी भावना में वह भी दशरथ से कम नहीं रहा होगा । इसी तरह हुमायूं का अपने भाइयों के प्रति प्रेम और व्यवहार में भी राम के व्यवहार की झलक देखी जा सकती है । क्या यह एक संयोग मात्र ही है या फिर हुमायूं के चरित्र पर भारतीय जनमानस में व्याप्त राम के आदर्श चरित्र का परिचय और प्रभाव ! यह प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों में देखा जा सकता है । 

      हाल के दलित-चिन्तन द्वारा प्रहार के मुख्य केन्द्र के रूप में पुरोहित-वर्ग के वर्चस्व की चर्चा और उसपर प्रहार कोर्इ छिपी बात नहीं रह गर्इ है । भारत में एक जाति की आजीविका का साध नही पूजा-अर्चना व्यवसाय का रहा है । इस जाति नें उपनिषद काल की दार्शनिकता और बुद्ध-काल की विचारशीलता को खो देनें के बाद बौद्धों की मूर्ति और भितित-चित्रकला को पौराणिक भारतीय मिथकों के नायकोंं की पुनर्पस्तुति की ओर मोड़ दिया । ऐसे में इतिहास की जिस एक घटना नें संत मत एवं भकित आन्दोलन के भकित-स्वरूप् को दिशा दी होगी वह निश्चय ही महमूद गजनवी के हाथों सोमनाथ मनिदर का टूटना और लूटा जाना है । इस घटना नें मूर्ति एवं तीर्थ आदि से भारतीय जनजीवन का ध्यान हटाकर दिव्यता के खोज की दिशा को जीवन की ओर मोड़ दिया ।गोरखनाथ की ''जोर्इ पिण्डे सोर्इ ब्रहमाण्डे की अवधारणा में अन्तमर्ुख दार्शनिकता का यह मोड़ देखा जा सकता है । इसके पश्चात मानव-जीवन को केन्द्र में रखकर आध्यात्मवादी चिन्तन की जो धारा बहती है ,वह गोरखनाथ के हठयोग को कबीर के सहजयोग तक ले जाती है ।  कबीर के यहां र्इश्वर जीवन की दिव्य असिमता का चरम मानक है । वह एक ऐसा पारस है , जो जीवन के हर पत्थर को  सोना बनाता जात है । कबीर अवतारी राम को तो नहीं मानते लेकिन बहुत चुपके से हर मनुष्य को र्इश्वर के अवतार में बदल देते हैं । यहां देखने की बात यह है कि पुरोहितवाद सदैव ही वर्तमान जीवन की अवहेलना और अतीत की स्मृतिजीविता एवं उसके महिमामण्डन में लगा रहता है । ऐसा वह प्राय: पेशेवर कारणों से ही करता है । कबीर निश्चय ही इस रहस्य को जान गए थे-उनके ''राम-नाम का मरम है आना,दशरथ-सुत तिंहुं लोक बखाना का मर्म यही है । कबीर के यहां दशरथ-सुत स्मृतिपोषित राम हैं; जिसे एक जाति नें  आजीविका के लिए अपनें शास्त्रों में बन्धक बना लिया है । कबीर इसी बन्धुआ राम से जीवन को मुक्त करना चाहते हैं और प्रकारान्तर से हर मनुष्य में रमें हुए राम का सन्देश भी देते हैं।

            आदिकाल में भारतीय संस्कृति के प्रमुख केन्द्रों (तीथोर्ं) पर आक्रमण हो रहे थे । नाथ और सिद्ध साहित्य नें आस्था के बाहरी केन्द्रोें की नि:सारता को समझनें और समझानें का ही प्रयास किया है । पुरोहिती र्इश्वर एवं आस्था के केन्द्रों के ध्वस्त होते ही सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना बहिमर्ुख से अन्तमर्ुख होती है । जो भी ब्रहमाण्ड  यानि भौतिक पदाथोर्ं एवं संसार में है ,,वही पिण्ड यानि देह में भी दिखार्इ देने लगता है । इन सब में यही बात मुझे महत्वपूर्ण लगती है कि मनुष्य की स्वतंत्रता और उसके असितत्व की अर्थवत्ता बची रहनी चाहिए । वह ब्रहमाण्डीय जड़ता में जीवन का सर्वोत्तम प्रतिनिधि वर्तमान है । यदि चेतन इयत्ता की सत्ता बाहरी दुनिया में नहीं बचती तो सूक्ष्म मनोजगत में ही बचे,लेकिन उसका बचना जरूरी है । कबीर की मानवीय स्वतंत्रता उनके आत्माराम में बचती है तो तुलसी की राम के चारित्रिक सौन्दर्य के प्रति प्रेम,समर्पण और सम्मान में । सामाजिक विरेचन की दृषिट से मुझे राम ,कृष्ण और कबीर ही सवाधिक उपयोगी जान पड़ते है। ये तीनों ही चरित्र अपमानित जीवन की समस्त संभावनाओं को उसके चरमोत्कर्ष या अतिमानवीय परिणति तक पहुंचा देत हैं । ये तीनों ही चरित्र अपनें समय की समस्त मानवीय-सामाजिक सुरक्षाओं से वंचित हैं । ये अपनी अर्थवत्ता को शून्य से अर्जित करते है। अपनें समय से छीनते हुए जीते हैं। मैंने पढ़ा था कि बि्रटिश जेलों में भूमि पर बनें चबूतरों पर सोने वाले स्वतंत्रता सेनानी अपनें कैदी जीवन के अनुभवों को राम से बेहतर मानकर स्वस्थ-चित्त बनें रहते थे ।

          मध्यकाल के साहित्य में सत्ता और समाज का सबसे रोचक प्रभाव मुझे सूर के यहां दिखता है । मुझे सूर के कृष्ण एक ऐसे बड़े रंगीन परदे की तरह दिखते हैं-जिसकी ओट में मध्ययुगीन शासकों की सारी रंगीनियां और सारी अश्लीलता ढक देनें या फिर छोटा करनें की कोशिश की गर्इ है । सूर के कृष्ण जमानें द्वारा खींची जा रही सभी रेखाओं को छोटा करनें के लिए खींची गर्इ  बड़ी रेखा की तरह हैं ; जो युग के चार रानियों वाले शासकों का मजाक अपनें सोलह हजार रानियों वाले कृष्ण से उड़वाती है । ऊपर से सीधे-सीधे न दिखनें के बावजूद सूर की सांस्कृतिक चेतना वस्तुत: प्रतिरोध की चेतना है । विश्वास न हो तो उनके भ्रमरगीत की गोपियों को देखिए । उनका भ्रमरगीत समकालीन सत्ता का सुविचारित एवं सशक्त प्रत्याख्यान है । मध्ययुग में समाज,संस्कृति और साहित्य के पारस्परिक सम्बन्ध का उदाहरण कृष्ण के चरित्र की अपार लोकप्रियता और उसकी उपयोगिता में देखा जा सकता है । सामन्ती युग में बहु-पत्नी प्रथा थी और अनेक विवाह करना मर्दानगी और शान की बात समझाी जाती थी । सामन्त और नवाब सभी इस मानसिकता से ग्रस्त थे । समकालीन जनता में उनकी कामुकता को लेकर अनेक झूठे-सच्चे प्रसंग तैरते रहते थे । व्यापक जनसंख्या में स्त्री-पुरुष अनुपात को देखते हुए सामान्य मनुष्य एकल वैवाहिक जीवन जीता था । ऐसे में कृष्ण का बहुनायकत्व अपने शासकों के प्रति र्इष्र्या और घृणा को निष्चय ही प्रति-सन्तुलन देता होगा। सूर की गोपिकाओं में अपनें आराध्य कृष्ण के प्रति भकित-भावना के साथ-साथ र्इष्र्या,घृणा,व्यंग्य और उलाहना की प्रवृतित को सूर के समकालीन यथार्थ-बोध से जोड़कर देखे बिना संभव नहीं है । गोपियों के परम आत्मीय कृष्ण जब तक ब्रज में रहते हैं ,परम हितैषी सखा के रूप में चित्रित हुए हैं;लेकिन जैसे ही वे मथुरा जाते हैं,मध्य युग के शासकों के प्रति तत्कालीन जनमानस में संचित सम्पूर्ण घृणा, किसी ज्वालामुखी विस्फोट की तरह फूट पड़ती है । कृष्ण जब तक ब्रज में रहते हैं,तब तक गोपियों के प्रति उनका प्रेम वैध एवं किसी भी आपतित से परे है ; लेकिन जैसे ही वे शासकों की पंकित में शामिल होते है-उनका होना-जीना सब अक्षम्य हो जाता है । यदि मैं कहूं कि सूर का भ्रमरगीत ,मध्ययुगीन शासकों के चरित्र के प्रति तत्कालीन जनभावना को प्रतिनिधित्व करनें वाला रूपक है  तो अत्युकित न होगी । कृष्ण सहसा ही सत्ता की कालिमा एवं कलंक के प्रतीक में बदल जाते हैं । बल्लभाचार्य के दर्शन के आधार पर पूरे दार्शनिक विवेचन के बावजूद मैं सूर के कृष्ण को इसी रूप् में देख और समझ पाता हूं कि वह लोकनायक कृष्ण और सत्ता-नायक कृष्ण के द्वैत में रची गर्इ है लेकिन अपने रचनात्मक द्वन्द्व एवं संघर्ष में वह चयन करती है लोकनायक कृष्ण का ही ।

          मध्य-युग के कवियों में तुलसी का यूटोपियन प्रतिरोध सबसे आकर्षक एवं लोकप्रिय है । राम कृषि-सभ्यता को केन्द्र में रखकर रची गर्इ जीवन और समाज की आचार-संहिता एवं नैतिक मूल्यों के महानायक हैं । मुझे रामकथा पूंजीवादी सत्ता के निषेध का आख्यान लगती है । राम की कथा न सिर्फ एकल दाम्पत्य की आदिम प्रचारक है ,बलिक वह कर्इ सन्तानों की दशा में सामूहिक दायित्व और अधिकार के रूप में भूमि एवं सम्पतित का बंटवारा भी रोकती है ।  यधपि उसकी मूल्य -दृषिट औधोगिक सभ्यता के जटिल श्रम-मूल्यों का न्यायपूर्ण विभाजन नहीं कर पाती । इसीलिए रामकथा समान श्रम-मूल्यों वाले क्षेत्रों से अलग के क्षेत्रों में अपने पारिवारिक एकता के सन्देश को सुरक्षित नहीं रख पाती ; न ही वह औधोगिक सभ्यता के भिन्न क्षेत्रों वाले श्रम-मूल्यों का न्यायपूर्ण वितरण ही सुझा पाती है । औधोगिक सभ्यता की नर्इ पीढ़ी उसके आदशोर्ं से आंखें चुराने लगी है ;इसीलिए अलग-अलग आय वाले एक ही संयुक्त परिवार के सदस्य एक साथ रहनें के स्थन पर चुपचाप अलग रहनें को ही प्राथमिकता देनें लगे हैं । इन तथ्यों के बावजूद रामराज्य का यूटोपियन प्रतिरोध किसी भी काल की व्यकितकेनिद्रत  सत्ता का निषेध एवं अस्वीकार है ।

        हिन्दी का रीतिकालीन साहित्य भूषण और गुरुगोविन्द सिंह जैसे एक-दो कवियों की रचनाओं को छोड़कर सत्ता-सन्दभोर्ं से निर्धारित साहित्य है । अपनें अधिकांश में यह साहित्य पारिवारिक चिन्ताओं का भी साहित्य नहीं है । रीतिकालीन कवि विशुद्ध रूप् से व्यकितवादी सरोकारों के रचनाकार हैं । घनानन्द,बोधा आलम आदि को अपवादस्वरूप छोड़ दे ंतो निर्विकल्प प्रेम-संवेदना का उसमें अभाव नहीं है । प्रेम यहां केन्द्र से बाहर एक उपभोक्तावादी बाहरी निर्विकल्प दृषिट के साथ उपसिथत है । वह संवेदना के स्तर पर नहीं बलिक ज्ञान और सामान्य-बोध के स्तर पर है । अधिकाशंत: मजाक और मनोरंजन के विषय के रूप में ।

        भारतेन्दु-युग से ही आधुनिक हिन्दी-साहित्य की यात्रा याचना से स्वावलम्बन के भव-बोध की यात्रा है । हीनता की मनोग्रनिथ के प्रति प्रतिरोध और निजता की खोज भारतेन्दुयुगीन हिन्दी-साहित्य की विशेषता है । निज सत्ता के अभाव का बोध,सामाजिक एवं सांस्कृतिक कुण्ठा इस दौर के साहित्य को आत्म-मुल्यांकन का साहित्य बना देती है । यह युग प्रतिस्पद्र्धा एवं आत्मपरिष्कार का भी है । द्विवेद्वी युग में ये प्रवृतितयां ही अधिक निर्णायक रूप् ले लेती हैं । परम्परा एवं अतीतजीवी प्रवृतित के कारण भारत में नवजागरण एवं पुनर्जागरण की दोनों ही धाराएं साथ-साथ प्रवाहित हुर्इ हैं । आमतौर पर पुनर्जागरण और नवजागरण को एक ही समझ लिया जाता है ; जबकि पुनर्जागरण से अभिप्राय स्वर्णिम अतीत की असिमता को पुन: प्राप्त करने की दिशा में हुआ जागरण है,जबकि नवजागरण का सम्बन्ध आधुनिकता से है ।

          अन्य एशियार्इ समाजोंं की तरह एक परम्पराजीवी समाज होनें के कारण भारत में नवजागरण की चेतना सम्पूर्णता में देखनें को नहीं मिलती । इसका एक कारण यह रहा है कि कठोर जातीय बन्धन के कारण उसकी आधुनिकता भी स्वत:स्फूर्त न होकर आयातित ही रही है । इसीलिए हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के साहितियक बोध में परम्परा एवं आधुनिकता का द्वन्द्व बना रहा है । उसकी आधुनिकता में भी परम्पराजीविता के लिए गुंजाइश एवं छदम पलायन मिलता है । ऐसा चेतन एवं अचेतन सजगता एवं चालाकी के रूप में रहा है । जातीय यथार्थ से पलायन की प्रवृतित के कारण ही हिन्दी का अधिकांश लेखन प्रामाणिक और विश्वसनीय लगता ही नहीं । काफी दूर तक वह एक भगोड़ा साहितियक लेखन है । वह रचते हुए भी बचता है और बचते हुए रचता है । उसनें साहित्य के ध्रातल पर एक काल्पनिक यथार्थलोक विकसित किया है । इसीलिए उसका अधिकांश आदर्शवादी ढंग की कृत्रिम प्रगतिशीलता की शिकार है । वह बिना किसी सटीक माप के रचे गए फैन्सी वस्त्र की तरह है । इसे आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता के दाेंहरे प्रयोग से प्रामाणिक,संस्थानिक एवं व्यापारिक इतिहास के रूप में प्रायोजित एवं विज्ञापित किया गया है। यह एक तथ्य है कि हिन्दी के दलित साहितियक लेखन नें इस साहितियक वर्जना,संकोच एवं साजिश को तोड़ा है । इस समकालीन परिदृश्य में कि  आज भी अशिक्षा,पूर्वाग्रह और रीतिरिवाजों से अनुशासित सामाजिक जीवन जीनें की बाध्यता के कारण भारतीय जनमानस अपनी पिछड़ी चेतना का अतिक्रमण नहीं कर पा रहा है । यही सिथति अधिकांश एशियार्इ देशों और उनके यहां उपसिथत विविध समुदायों के सांस्कृतिक जीवन की है । सशक्त सांस्कृतिक पृष्ठभूमि,प्रबल सामुदायिक भावना तथा जन्म आधारित जातीय नस्लीय संरचनाओं की उपसिथति के कारण उसकी अधिकांश जनसंख्या भौतिक समृद्धि के बावजूद आधुनिकता की दार्शनिकी को भी स्वायत्त करनें में असमर्थ है ।

        हिन्दी में साहित्य-सृजन का कार्य जितना आज चुनौतीपूर्ण ,संशय और संकटग्रस्त है ;उतना इतिहास में पहले कभी नहीं था । इसका सबसे प्रमुख कारण तो यह है कि हम एक सांस्कृतिक शून्य-काल से होकर गुजर रहे हैं । पिछले युग के मनुष्य की अधिकांश धारणाएं वर्तमान युग में निमर्ूल सिद्ध हुर्इ हैं । इस तरह सभ्यता और संस्कृति का  पिछला पाठ बड़े पैमानें पर अप्रासंगिक हुआ है । आजादी के बाद सार्वभौमिक मानवतावाद को गांधीवादियों और राजनीतिक स्तर पर  कांग्रेस पार्टी द्वारा इतिहास की मुख्य धारा को अधिग्रहण कर लेने के बाद, उसकी नियति और प्रासंगिकता भारतीय सन्दर्भ में कांग्रेस के पार्टी-चरित्र और विश्वसनीयता से जुड़ गयी है । आज के भारत में गांधी का ब्रान्डनेम नेहरू परिवार और प्रकारान्तर से कांग्रेस  (इनिदरा) की गिरफत में है । गांधी की राजनीतिक विरासत स्वयं कांग्रेस की गिरफत में है लेकिन विडम्बना यह है कि गांधीवाद का स्थायी चरित्र सत्ता के विपक्ष और विरोध की संस्कृति रचने की है । इसलिए वह अन्ना हजारे के आन्दोलन में  स्वयं को पाने का प्रयास कर रही  है  ।

       विडम्बना यह है कि गांधीवाद भी हिन्दी जाति और उसके समाज में व्याप्त असिमता के संकट का स्थार्इ समाधान प्रस्तुत नहीं करता । उसमें एक अम्बेडकर की असहमति या दलितबोध की लाइलाज पीड़ा की हमेशा गुंजाइश है ।  अपनी जातीय मनोग्रस्तताओं एवं स्थानीय बीमारियों के कारण ही हिन्दी का यथार्थबोध कभी भी सार्वभौमिक नहीं बन सकता - वह अभी अपनी वैयकितक नकारात्मकताओं से मुकित एवं क्रानित की प्रतीक्षा में ही है । अपनी नग्न वास्तविकताओं के साथ वह देशज सामूहिक मनोविकृतियों का साहित्य है । वह अपने राजनीतिक और साहितियक परिदृश्य की तरह साहित्य में भी सिर्फ जातीय सेनाओं की सृषिट कर सकता है । यह आश्चर्य नहीं कि किसी मथे गए गन्दे तालाब की तरह उसका पानी किसी जातिवादी लोकतंत्र के कीचड़ पर सिथर हो ।

         परम्परागत भारतीय समाज यथासिथति को नियति और नियति को र्इश्वर के साथ जोड़कर एक व्यापक और संशयमुक्त शासित समाज और संस्कृति की रचना करता था । इसमें सन्देह नहीं कि ऐसा सामाजिक और सांस्कृतिक भारत देशी और विदेशी शासकों के लिए स्वर्ग था । राजनीतिक संघर्ष से बचने और बचानें के लिए नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को या तो जाति-विशेष तक सीमित कर दिया गया था या फिर विदेशियों तक । आखिर उसकी भकित-चेतना का राज उसके सम्पूर्ण एवं नि:शेष समर्पण में ही निहित था । इस तरह अधिकांश एशियार्इ समाजों की तरह  भारतीय समाज भी तथा उसकी संस्कृति और साहित्य अपनें मूल रूप् में सम्पूर्ण जनसंख्या की स्वतंत्रता का विरोधी था । उसका निस्पृहतावादी दर्शन प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि तथा कृषि आधारित न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा से पैदा हुआ था । वह एक ऐसे समाज की व्युत्पतित था जिसका जैविक असितत्व अपनी अमूर्त कल्पनाजीविता के बाद भी सुरक्षित रह सकता था ।

         एक लम्बे समय तक भारत के कम्युनिस्ट समूह नें भारतीय समाज के दलित अन्त्यज को सर्वहारा की वर्गीय अवधारणा से विस्थापित करने की असफल कोशिश की है । लेकिन गांधीवाद की तरह वह भी आदिम मूलतागामी दर्शन होने के कारण विकास और आधुनिकता में असिमता के इस संकट का समाधान नहीं देख पाया ।  यह मान लेने कें पर्याप्त कारण हैं कि दलित और सर्वहारा दोनों की निर्माण प्रविधियां एवं शोषक परिणतियां एक नहीं हैं । सर्वहारा की अवधारणा आर्थिक मुकित के सपने से जुड़ी हुर्इ है ,जबकि दलित की सामाजिक और सांस्कृतिक मुकित से । प्राचीनकाल से भारतीय परम्परागत सामाजिक व्यवस्था जन्मना दलित को बलात सर्वहारावर्गीय बनाती रही है  । समकालीन दलितवाद सामूहिक असिमता के इसी मुकित-संघर्ष की लड़ार्इ लड़ रहा है । उन्हें लम्बे समय से अलग रखा गया है ,इसलिए आत्मनिर्णय के मानवाधिकार के अन्तर्गत उनके मुकित-संघर्ष के नैतिक औचित्य का समर्थन किया जाना ,माक्र्सवाद की तर्ज पर दलित राजनीतिक वर्चस्व की सहायक और अनुगामी साहित्य की केन्द्रीय उपसिथति भारतीय इतिहास की विकास-यात्रा के लिए जरूरी लगती है । लेकिनप्रतिकि्रयावादी निषेध या अस्वीकारवादी चरित्र के कारण यह आधुनिकता की विकास-यात्रा में सहयोगी और संवादी होनें के स्थान पर पूर्वाग्रहग्रस्त एवं असंवादी लगने लगता है । समानान्तर वृत्तान्त की रचना करने के प्रयास में आधुनिकताविरोधी वृत्तान्त रचनें की दिशा में भटकाव से इस आन्दोलन को बचाना चाहिए ।  हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दलितवाद जातिवाद के सैद्धानितक औचित्य की आधारभूमि पर ही प्रासंगिक बना हुआ है । यह जातिवाद की स्वीकृति के भीतर ही सामाजिक बराबरी की मांग करने वाला आन्दोलन है । एक प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन के मुददे के रूप् में यह प्रकारान्तर से नारी-मुकित और जातिवाद से मुकित का विरोधी और अपने प्रतिकि्रयात्मक यथासिथतिवादी जातीय पूर्वाग्रह के चलते बहुत हद तक प्रतिगामी और पोषक भूमिका में है ।

        यह एक तथ्य है कि आजादी के बाद की भारतीय राजनीति नें अलग-अलग राजनीतिक दलों के चरित्र एवं उनके नेतृत्व की मानसिकता के माध्यम से मध्ययुगीन सामाजिक -सांस्कृतिक अधिरचनाओं की सुनियोजित वापसी की है । यह वापसी वंशवाद ,परिवारवाद,जातिवाद,सम्प्रदायवाद सभी स्तरों पर की गर्इ है । इसनें भारतीय लोकतंत्र को समुदायवादी लोकतंत्र में परिणित कर दिया है ।