रविवार, 3 दिसंबर 2023

रामकथा , तुलसीदास और विशिष्टाद्वैतवाद











राम चरित मानस को एक आध्यात्मिक आख्यान मानकर उसके रचनात्मक परिप्रेक्ष्य और उसमें उपस्थित रचनाकार के देश-काल को प्राय: अनावश्यक मानकर अनदेखा किया जाता है । रचनाओं की निर्मित को उसके देश और काल में रखकर देखना एक वैज्ञानिक एवं विश्वसनीय विश्लेषण पद्धति है । स्वयं मुक्तिबोध नें अपनी आलोचना पुस्तक-"कामायनी : एक पुनर्विचार '' में कामायनी को एक फैंटेसी और यूटोपिया मानकर उसे नए दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया था । उसी दृष्टिकोण से तुलसीदास कृत ''राम चरित मानस '' पर विचार करने पर कुछ भिन्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं - उनकी कविताओ के अंत:साक्ष्य भी उनका मध्ययुगीन जातीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का वाहक कवि होना प्रमाणित करते हैं । स्वयं उच्च वर्ग का होने के कारण वर्णव्यवस्था का विध्वंस या नकार उनके आदर्शवाद का हिस्सा नहीं है । ये निष्कर्ष यद्यपि उनके द्वारा प्रस्तुत रामकथा के पाठ को आज के समतामूलक लोकतांत्रिक समय और समाज के लिए पूरी तरह प्रासंगिक नहीं ठहराते फिर भी तुलसीदास के कृतित्व को सही-सही समझने के अतिरिक्त आलोचना की कसौटी के परिष्कार की दृष्टि से महत्वपूर्ण अवश्य है ।
इस विमर्श में उनकी मध्ययुगीन समाज में मिलने वाली वर्णाश्रमी मानसिकता शामिल नहीं है । पेशा और जाति की एकता के कारण कबीर दास, सूर दास ,रैदास आदि सभी के यहाँ जाति पर पेशे आधारित सामाजिक प्रस्थिति का आरोप मिलता है । राम चरित मानस में मध्य युग का बीत चुका समाज उपस्थित है । उसका पिछड़ते और अप्रासंगिक होते जाना ही भावी साहित्य और समाज के हित में है । नए साहित्य और साहित्यकारों की नयी रचनात्मक भूमिका के पक्ष में भी । निष्कर्ष यह कि इतिहास की विभूति मानकर ही उन्हें पढ़ना होगा ।
वैसे भी रामकथा कुटुंब व किसान सभ्यता का आदर्श थी । ऐसे आदर्श बहुस्तरीय आर्थिक स्रोतों वाले परिवार के सदस्यों के बीच के कलह का समाधान बाजारीकृत समाज में पहले की तरह नहीं कर सकते ।

00

भारतीय मानवीय समय का एक छोर ब्राह्मणवाद के पास है तो दूसरा दलितवाद के पास .ब्राह्मणवाद के पास तरह-तरह के अंधविश्वासों को और जातीय संकीर्णताओं को सच कि तरह प्रसारित करने में महारत हासिल है तो दलितों के पास भी बिना किसी ईश्वर और मिथक के जीवन जीने का सदियों पुराना अनुभव है .नयी सभ्यता के निर्माण में दलित-जीवन और अनुभवों की दार्शनिक संभावनाओं का हिंदी में अभी उच्च स्तरीय सृजनात्मक दोहन नहीं हुआ है .जो कुछ भी है वह संसमरणात्मक ही है ,उसमें भविष्योन्मुख प्रगतिशीलता का अभाव है .हिंदी मे ईमानदार जाति-विमर्श अब भी शुरू नहीं हुआ है .शुरू में दलित विमर्श को भी मार्क्सवादी सरोकारों से बाहर ही माना गया था ,जाति-विमर्श को प्रगतिशीलता के दायरे में न लेने के कारण वह अभी प्रारंभिक दौर में ही है .इस संकोच से भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और रूपांतरण में देर हो रही है .

000


राम का नायकत्व ,अवतारवाद और कबीर
राम के गुरू विश्वामित्र कहे जाते हैं विश्वामित्र यानी विश्व के मित्र; जिनका रचा गायत्री मन्त्र मनुष्य की आत्मा में ही ईश्वरत्व का आवाहन करता है । रामचन्द्र जी ने रावण का बध करने पर वाल्मीकि रामायण में कहा है कि मै दशरथ पुत्र राम स्वयं को मनुष्य मानता हूॅ । मैं कबीर की राम-दृष्टि को भी सही मानता हूँ क्योंकि सिर्फ पौराणिक राम की महत्ता स्वीकार करना तो एक आदर्श चरित नायक को ही स्वीकार करना हुआ । राम एक आदर्शवादी चरित्र है । राम के चरित्र में एक युग , सभ्यता और उसकी संसकृति के सामूहिक प्रतिमान छिपे हैं । रामकथा के इस आदर्श स्वरूप की पूर्णता राम के वनगमन और उससे आगे भरत को खडाऊं के साथ वापस अयोध्या भेज दिए जाने तक ही लोक के महत्व का है । उसके बाद वह परिवार और कुटुम्ब की कथा न रहकर राजन्य या शासक वर्ग के कूटनीतिक दांवपेंच, संघर्ष और युद्ध की कथा है । परवर्ती रामकथा राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए है ,साहित्य के विद्यार्थियों के लिए नहीं । स्वयं राम चरित मानस की रचना करने वाले तुलसीदास को भी इस सच का पता था कि राम का नायकत्व उनके आदर्श मानवीय चरित्र में है। जैसे वाल्मीकि रामायण के रचनाकार को पता था कि मर्यादा पुरुषोत्तम होने के कारण राम ही महाकाव्य के नायक हो सकते हैं ।
लेकिन भारत की कुटुम्ब व्यवस्था के आदर्श केन्द्रीय चरित्र राम को अन्तिम नायक घोषित कर देना मानव जाति और प्रकृति के भविष्यगामी जीवन-प्रवाह में उसके द्वारा और भी किसी श्रेष्ठ उच्चतर नायक को जन्म देने की क्षमता पर सन्देह करना होगा । इस दृष्टिकोण से सिर्फ पौराणिक राम वाली आध्यात्मिकता परवर्ती जन्म वाली आत्माओ से नायक बनने का अधिकार छीनने वाली एवं उनके भी ब्रह्म होने के विरुद्ध हीनताबोध फैलाती दीखती है । थोड़ा कबीर को भी पढकर सोचें तो यह साफ-साफ दिखता है कि कबीर अस्तित्वमान जीवन-प्रवाह की दिव्यता और ईश्वरता के पक्ष में हैं ।
साहित्य के मर्यादा पुरुषोत्तम चरित् नायक के रूप में राम के आचरण का बहुत कुछ सर्वकालिक तो रहेगा लेकिन पौराणिक राम को ही अन्तिम सत्य मानने पर वर्तमान और भविष्य में भी सतत अस्तित्वमान प्रकृति की दिव्यता यानी ईश्वरतत्व की अवहेलना होती है । इसी दृष्टि से कबीर का कहना सही है । वर्तमान और भविष्य की परिस्थितियों से जूझने के क्रम में नायक का चरित्र बदलता जाएगा । अवतारवाद भी राम को अन्तिम नहीं मानता । विष्णु के नए जन्म या अवतार के रूप में नए राम की आवश्यकता को सिद्धान्तत: स्वीकार करता है । अगर ब्रह्म सर्वत्र और सर्वकालिक है तो उसे कांशीराम में भी होना चाहिए, सिर्फ परशुराम में ही नहीं । मेरा सुझाव हे कि कुछ दोहे कवियों को पिछले रामों पर भी लिखना चाहिए ।









#रामकथा
#वाल्मीकीयरामायण
#तुलसीदास
#रामचरितमानस
रामकथा को लेकर आदरणीय चौथीराम यादव ji की रामकथा के पुरुष सत्तात्मक सामन्ती समाज का आख्यान होने वाली स्थापना से मैं अक्षरश: सहमत हूॅ । दूसरी ओर वाल्मीकीय रामायण का सीता के दृढ चरित के माध्यम से प्रस्तुत किया गया स्त्री-विमर्श का पक्ष भी सर्वकालिक है । जबकि शम्बूक-वध होने के कारण दलित विमर्श के पक्ष में उपयोग करने की उसकी संभावनाएं खत्म हो गयी है ।यह भी सच है कि तुलसीदास की रामकथा के सारे शील सामन्ती समाज की आचार व्यवस्था के शील हैं ।यही कारण है कि वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने की कामना करने वाले वर्णवादियों को मुगलकालीन तुलसीदास कृत रामकथा का अलोकतांत्रिक स्वरूप दिखाई नहीं देता । राम चरित मानस में इस्लाम में बादशाह को ईश्वर की ओर से उसके प्रतिनिधि के रूप में देखने वाली आंख भी है जो सामन्ती श्रेष्ठता और वैष्णवी अवतारवाद से घुल-मिल गयी है । लेकिन आधुनिक साहित्यिक दृष्टि से हमें यह भी देखना होगा कि रामकथा मध्ययुग की कोई यथार्थवादी कृति नहीं है कि उसमें यथावत मुगल काल का यथार्थ उपस्थित हो और वह यथार्थवादी कृति के रूप में उपयोगी हो ।तुलसीदास का 'राम चरित मानस ' वस्तुत: मुस्लिम जातीयता के सापेक्ष ब्राह्मण जातीयता की मुक्ति का स्वपनद्रष्टा काव्य है । ब्राह्मणवादियों की मानव जाति की समानता विरोधी भेदभावपूर्ण श्रेष्ठता ग्रन्थि को देखते हुए जो उसे इस लोकतांत्रिक समय के लिए खारिजकर रहे हैं उनका पक्ष सही है । लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि रामकथा का मूल आख्यान प्रागैतिहासिक भी है । उसमें परिवार संस्था की बीज-समस्याएं भी उकेरी गई हैं । उसे देखते हुए उसकी इकहरी व्याख्या उचित नहीं. । क्योंकि उसमें सामन्तयुगीन शासकों के आदर्श चरित्र को लेकर एक संतुलनधर्मी पूटोपिया भी है। मेरा मानना है कि वाल्मीकीय रामायण बौद्ध काल के बाद लिपिबद्ध हुई है और उसमें लव-कुश के माध्यम से राम का उचित प्रतिरोध भी है । बौद्ध धर्म का मध्यम मार्गीय जीवन दर्शन संस्कार रूप में राम के चरित्र से असहमति के रूप में मौजूद है । ऐसा होने के कारण ही राम के अतिरेकी आदर्शवाद का दुखान्त में उपसंहार किया गया है ।यद्यपि वाल्मीकीय रामायण शम्बूक-वध की कथा के लिए बदनाम है,; जबकि तुलसीदास की रामकथा सामन्ती +ब्राह्मणवादी अभिजन के पक्ष में होने के कारण आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का आदर्श बनने के लिए अनुकूल नहीं है ।
इस तरह देखने पर रामकथा और तुलसीदास के राम चरित मानस का पाठ-विश्लेषण एक ही निष्कर्ष तक नहीं ले जाता है । रामकथा पुरुष प्रधान किसान सभ्यता के आदर्शों का प्रतिमानीकरण करने वाला महाकाव्य है । यह परिवार केन्द्रित सामूहिकता का सन्देश देने तथा आनुवंशिक उत्तराधिकार में सम्पत्ति-विभाजन को हतोत्साहित करने के कारण मिलकर खेती या व्यवसाय करने का सन्देश देता रहा है । इस आधार पर यह कुटुंब व्यवस्था का चारित्रिक संविधान प्रदान करने वाला महाकाव्य है ।
राम के बाद रामकथा के प्रमुख चरित्र हनुमान का सकारात्मक या प्रगतिशील पक्ष यह है कि वह आदर्श आज्ञाकारी निष्ठावान सेवक या अनुचर का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करता है । रामकथा के माध्यम से फैलायी गयी यह निष्ठा मध्ययुगीन सामन्ती आर्थिक व्यवस्था की रीढ रही है । हनुमान के चरित्र की लोकप्रियता का यह भी एक रहस्य है । यह अन्य सामन्तयुगीन बुराइयों जैसे दशरथ के चरित्र के माध्यम से बहुपत्नी प्रथा के नकारात्मक पहलू भी सामने लाती है । अरस्तू के विरेचन सिद्धांत के आधार पर देखें तो पाठकों को इतना डरा देती है कि वे राम की तरह एक विवाह से अधिक करने की सोचें ही नही । राम कथा का सबसे समाज उपयोगी पक्ष परिवार के भीतर के आदर्श आचरण और व्यवहार का आदर्श उपस्थित करना है इस दृष्टिकोण से देखें तो लोक के दिल में बस जाने वाली असली रामकथा चित्रकूट के भरतमिलाप तक ही है । उसके आगे की रामकथा का सबक या सीख उसकी धार्मिक व्याख्या करने वाले बिगाड देते हैं । उदाहरण के लिए सीताहरण का प्रसंग आज भी परदेश गमन में आने वाली जोखिमों के प्रति आगाह करता है । अति आत्मविश्वास और जोखिमपूर्ण व्यवहार सुरक्षित नहीं है ,चाहे वह राम जैसा अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला ही क्यों न हो । रावण द्वारा साधु के वेश में सीता का हरण तो भारत की स्त्रियों को सीधे-सीधे कठोर चेतावनी देने वाला प्रसंग है कि साधु वेष धारी पराए पुरुषों पर कभी विश्वास मत करो अन्यथा तुम्हारा भी वैवाहिक जीवन सीता की तरह तबाह हो सकता है । यह एक ऐसी चेतावनी है जिसे मध्य काल में कबीर ही दे पाते हैं -चली कुलबोरनी गंगा नहाया जैसी पंक्तियों के माध्यम से । उत्तरार्ध की रामकथा मध्यकालीन राजाओं के लिए कूटनीतिक दांव-पेंच का दृष्टांत उपस्थित करती है । इसी में धार्मिक पाठ और रघुकुल के जिद्दी राम के कारण दशरथ के हार्ट अटैक यानी ह्रदयाघात की ओर रामकथा के पाठकों और श्रोताओ का ध्यान ही नहीं जाता। । दशरथ की असामयिक मृत्यु उसके धार्मिक पाठ के महिमामंडन में राम प्रेम और विरह का चरम प्रतिमान मान ली जाती है ।दरअसल राम की चरित्र सर्जना एक अतिमानवीय दुस्साहसिक चरित्र और व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के रूप में की गयी है । उनके क्रूर आदर्शवाद में संवेदना गौण हो जाती है । यह क्रूरता सीता के निर्वासन में भी देखी जा सकती है और जो उनके प्रिय अनुज लक्ष्मण को एक दिन सरयू नदी में डूबकर आत्म हत्या करने तक ले जाती है और स्वयं उनको भी अपनी जलसमाधि यानी आत्महत्या तक भी । अपनी असह्य और अमानवीय आदर्शवादी क्रूरता का बोध होने पर वे स्वयं भी लक्ष्मण का अनुसरण कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेते हैं । इसे चरमपंथी आदर्शवाद से राम के मोहभंग के रूप में ही देखा जाना चाहिए । इस दृष्टिकोण से देखें तो रामकथा एक दुखान्त आख्यान है । उसमें आए चरित्रों को अपरिवर्तनीय आदर्श मानकर देखना या अनुसरण करना आवश्यक या अपरिहार्य नहीं ।
इससे यह भी सन्देश मिलता है कि संवेदना का अतिक्रमण कर निष्ठुर होकर धर्म और कानून आदि आदर्शों का अनुपालन हमें अभिशप्त करने वाला तथा त्रासद स्मृतियों को जन्म देने वाला भी हो सकता है । महाभारत भी इसी कारण त्रासद अंत को प्राप्त होता है । ऐसी ही चरमपंथी हिंसा मार्क्सवाद को भी अभिशप्त कर चुकी है । यहूदियों और इस्लामियों को भी कर रही है । नही सजग हुए तो हिंदुओं को भी अभिशप्त कर जाएगी ।
इस तरह रामकथा में एक आदर्शवादी नायक राम के त्रासदीपूर्ण अंत को देखते हुए वाल्मीकीय रामायण के आख्यान का जो साहित्यिक पाठ बनना चाहिए वह अपने ही जिए और किए गए से असंतुष्ट और विमुख मनुष्य का बनता है । धार्मिक भाष्यकार रामकथा का साहित्यिक या मानवीय पाठ नहीं करते ।उसका आध्यात्मिक पाठ करने वाले क्रूर अमानवीय आदर्शवाद के नकारात्मक दुष्परिणामों की कहीं चर्चा ही नहीं करते ।
ब्राह्मणवादी पाठ की इस दृष्टिकोण से प्रशंसा की जा सकती है कि राम को मानवेतर घोषित कर वह किसी से राम जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा ही नहीं करती । सब कुछ अनुकरणीय से परे और लीला घोषित कर देती है । तुलसीदास भी यही करते है । सच्चाई यह है कि धार्मिक रामकथाकार कथा के अंत में आत्महत्या करने वाले नायक राम की एकान्त-अव्यक्त वेदना तथा मानवीय जीवन-निष्कर्षों तक तक पहुँच ही नहीं पाते ।



रामायण,मनुस्मृति, पुराण और पुष्यमित्र शुंग


ऐसा माना जाता है कि आदि कवि वाल्मीकि कृत रामायण का गायन लव कुश द्वारा प्रारम्भ होकर लम्बे समय तक श्रुति परम्परा में ही एक पीढ़ी से दूसरी पीडीकोर स्थानांतरित होता रहा है । वाल्मीकीय रामायण की बहुत सी विशेषताएं हैं जैसे नारद द्वारा काव्य के विषय के रूप में राम को पुरुषोत्तम यानी आदर्श नायक बताए जाने के बावजूद वाल्मीकि राम के प्रशंसक हैं भक्त नहीं । सीता के परिष्कार बाद वे एक अभिभावक के रूप में सीता और उनके बच्चों का पक्ष चुनते हैं ,राम का नहीं । स्पष्ट है कि वे आचरण की कसौटी पर राम जैसे यशस्वी अभिजन के चरित्र को भी परखते हैं ।
मैं रामायण और मनुस्मृति दोनों में ही पुष्यमित्र शुंग की भूमिका लेखक की मानता हूॅ । मनोवैज्ञानिक समानता यह है कि वह अपने राजा का हत्यारा है तो वाल्मीकि भी पहले के डकैत और हत्यारे यानी नामी पापी रह चुके हैं । स्पष्ट है कि यह प्रायश्चित स्वरूप लिखा गया होगा । स्वयं हत्यारा होने के कारण अलोकप्रिय होने की आशंका को देखते हुए उसने रामायण को वाल्मीकि ऋषि के नाम से जारी किया और मनुस्मृति को मनु के नाम से । क्योंकि वह योग्यता और विद्वता के बल पर ही मौर्य साम्राज्य का सेनापति बना था-उसमें भयंकर महत्वाकांक्षा और प्रतिभा रही होगी -इससे इन्कार नहीं किया जा सकता ।
भाषावैज्ञानिक अध्ययन और विकास के आधार पर रामायण की भाषा पाणिनि के बाद की और व्याकरण सम्मत मानी जाती है । इसी आधार पर रामायण की रचना भी शुंगकालीन मानी जाती है । बौद्धों की जातक कथाओं की तर्ज पर होने के कारण पुराणों का रचनाकाल भी यही है। बौद्ध गुफाओं की तर्ज पर शिव को समर्पित एलीफेण्टा की गुफाएं तथा पहाड खोदकर बनवाए गए शिव मंदिर भी पुनर्जागरण की इसी असंतुष्ट विद्रोही चेतना के परिणाम हो सकते हैं ।
स्मृति, आस्था और ज्ञान संरक्षण की जातीय भूमिका को पीढ़ी दर पीढ़ी जीने की पूर्वाग्रही मानसिकता के कारण किसी ब्राह्मण विद्वान का पौराणिक स्मृतियों को पूरी तरह भुलाकर देरतक एकनिष्ठ बौद्ध दर्शन जीवी बने रह पाना मुश्किल हो गया होगा । इस मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो पुष्प मित्र शुंग अपने जमाने का मंगल पाण्डेय और पेशवा ही था ।
सच तो यह है कि यूनान से सम्पर्क के कारण तथा व्यवस्थित बौद्ध शिक्षा केन्द्रों से निकले होने के कारण। मौर्य काल के भारतीय विद्वान हमारे अनुमान से अधिक बहुशिक्षित थे । यदि यह सच है कि चन्द्र गुप्त की सिल्युकस की बेटी से रिश्ता हुआ था तो पाटलिपुत्र के रनिवास में भी होमर की कृतियाँ भी रही होंगी । इसी आधार पर मुझे रामायण की रामकथा भी बहुप्रभावित और बहुसंस्कारित लगती है । जैसे कि राम द्वारा समुद्र पर पुल बनवाने का प्रसंग-जैसाकि सिकंदर नें भी किया था । इसके बावजूद मैं रामकथा को पूर्ण कल्पित या निराधार कल्पना नहीं मानता । पुष्यमित्र शुंग ने संभव है कि वृहद्रथ वध को रावण वध के समतुल्य और स्वयं अपने राज्यारोहण को राम की विजय के सदृश ठहराने या विज्ञापित करने के लिए रामकथा का विस्तृत पुनर्लेखन कराया हो । वृहद्रथ को शूद्र तुल्य वध्य घोषित करने के लिए शम्बूक-वध का प्रसंग भी डलवाया हो । हत्यारे ब्राह्मण ऋषि परशुराम के होने की विज्ञप्ति भी पुष्यमित्र के हत्या परिमाण को कम दिखाने के लिए ही की गयी हो । रामकथा आर्य-अनार्य संघर्ष के भी पुरा - अस्तित्व में होने की सूचना देती है । रामकथा को काल्पनिक मानने के बाद शूद्र ग्रंथि का कोई स्मृति-साक्ष्य ही नहीं बचेगा । जो शूद्रों के एक साम्प्रदायिक समुदाय से वर्ण समुदाय में रूपान्तरण की पुष्टि कर सके । मैं रामकथा को सामन्त युग की भारतीय मूल्य चेतना का अधिकतम सृजनात्मक निवेश का परिणाम मानता हूं ।
दरअसल भारतीय जनता भांति-भांति के चरित्र प्रधान आख्यानों को सुनने-सुनाने वाली रही है । अपने संस्थागत चरित्र के कारण आधुनिक मार्क्सवादियों की तरह ही कट्टर शुद्धतावाद के चक्कर में बौद्धों ने भी कभी इस देश की बहुप्रचारित स्मृति को केवल बुद्ध के लिए समर्पित एकल बुद्ध चरितात्मक बनाना चाहा होगा ।
अतिवादी,असहिष्णु और वर्णवादी होने के बावजूद पुष्यमित्र शुंग का भी एक अपना देशकाल बोध और पक्ष हो सकता है । मध्यकाल में तुलसीदास भी पुष्यमित्र शुंग की असहिष्णु जातीय भूमिका के बौद्धिक अवतार ही हैं । उनकी इस प्रसिद्ध वर्जना को एक बार फिर ध्यान से पढ़ें-
'कीनहें प्राकृत जन गुण गाना
सिर धुनि गिरा लागि पछताना '
यह प्राकृत जन अकबर का दरबार ही तो है । ज्ञान की प्रबुद्ध आवारागर्दी हर युग के भारतीय को प्रिय रही है । इसीलिए वह केवल बौद्ध, केवल इस्लाम और केवल मार्क्सवाद स्वीकार करने से बचता रहा है । वह दीर्घकालीन स्मृतियों की लंबी विरासत को पसन्द करने वाला देश रहा है । बहुलता उसकी आजादी और स्वभाव है । अधिक और एकल का बांधना भी उसे असंतुष्ट कर सकता है ।
25/04/2023






तुलसी को लेकर मेरी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि तुलसीदास को ब्राह्मण घराने में नहीं पैदा होना चाहिए था । सिर्फ दो पंक्तियां प्रमाणित करने के लिए काफी हैं कि तुलसीदास को भक्त शिरोमणि कवि कहा जाना धोखा है । तुलसी तो घोर विद्रोही कवि हैं । वे अपने समय को शत-प्रतिशत नापसन्द करने वाले कवि हैं । वे ' नर का मनसबदार यानी दरबारी भी होना नहीं चाहते ', प्राकृत जन का गुणगान करना नहीं चाहते क्योंकि इससे उनकी वाणी यानी कविता-कर्म अप्रतिष्ठित-कलंकित हो जाएगा । संकेत स्पषट है कि यह प्राकृत जन समकालीन सामन्त और शासक हैं । जिनमें मुगल बादशाह भी शामिल है ।
तुलसीदास रहीम के मित्र थे तो दरबारी बनने और मनसबदारी पाने का प्रस्ताव जरूर आया होगा । तुलसीदास अपने समय के सबसे बड़े नास्तिक आलोचक कवि भी हैं । सारे कृष्ण साहित्य की आलोचना योगेश्वर श्रीकृष्ण के हाथ में सिर्फ मुरली पकड़ाने के कारण कर देते हैं । सुदर्शन चक्र लापता होने की स्थिति में धनुष-बाण हाथ में लेने की सलाह देते हैं । इतने स्वाभिमानी और ईश्वर को भी फटकार लगाने वाले आदमी को पंडित बिरादरी में नहीं पैदा होना चाहिए था । किसी लड़ाकू बिरादरी में पैदा हुए होते तो शिवाजी को पीछे छोड़ दिए होते । उनकी निरीहता को समझा जाना चाहिए। तुलसीदास जैसी प्रतिभा भी जातिप्रथा का शिकार होकर-गलत जाति में पैदा होने के कारण सिर्फ भीख मांगकर और कुछ किताबें लिखकर ही चली गयी । इसतरह वे भी भारतीय जातीय सामाजिक व्यवस्था के शिकार कवि के रूप में सामने आते हैं । इसीलिए मेरी उनके प्रति सहानुभूति है ।
तुलसीदास जिस जमाने में लिख रहे थे उस जमाने में सभी वैसा ही सोचते और जीते थे-वर्णाश्रमी और जातिवादी मानसिकता के साथ । यदि तुलसीदास आज के जमाने में होते तब भी अपनी बिरादरी की तरह सबसे पहले सबसे बढ़-चढ़कर मार्क्सवादी होते और जाहिर है वैसा कुछ भी न लिखते जैसा लिखने के कारण उनकी 'जग-फंसाई' हो रही है ।
हां उन्हें लेकर मेरी यह शिकायत जरूर है कि तुलसी नें गुरुनानक देव जी से क्यों नहीं सीखा ? उनकी तरह उदात्त क्यों नहीं हो सके ? एक ही कारण समझ में आता है कि उनपर अपने आश्रयदाता बूढे होते गुरु की चरण-वन्दना और सेवा का दायित्व जरूर रहा होगा । और वे पंजाब की ओर नहीं गए होंगे । तब तक औरंगजेब और गुरु गोविंद का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था जो सिक्ख पंथ के परवर्ती संगठन के कारण और निवारण बनें ।
मेरे तुलसी के प्रति प्रारंभिक सम्मान का कारण उनका अपार शब्द-भंडार और चकित कर देने वाला काव्य-कौशल है । यह छिपाने की बात नहीं है कि चिन्हित कमियों के बावजूद मैं तुलसीदास का लोहा मानता हूँ। उनकी प्रसिद्धि से ईर्ष्या करता हूँ। कारण कि पूरे हिन्दी साहित्य में वे ही एक मात्र ऐसे कवि हैं जिनकी उपलब्धियों से मैं प्रतिस्पर्धा करना चाहता हूँ। यह प्रतिस्पर्धा हर साहित्यकार को करनी चाहिए। कालजयी कवि के रूप में तुलसीदास जी एक प्रतिमान हैं और प्रतिमान सदैव अनुकरण तथा प्रतिस्पर्धा यानी मैं भी उनके जैसा या उनके बराबर हो जाऊं-के लिए ही होते हैं । इस भावना में में बुराई नहीं है । ।यह प्रतिस्पर्धा तो सभी साहित्यकारों में होनी चाहिए कि मुझे भी कई सौ वर्षों तक पढा जाए । तुलसी का साहित्य ऐसी चुनौती और प्रेरणा दे पाता है । ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा वाले कथन का यह भाव है मेरा । यह बात मैंने ब्याज स्तुति शैली में कही है ।( संभव है कुछ लोग नहीं समझ पा रहे हों ।)
इतिहास-परिवेश के कारण कुछ गलतियां जरूर उनके प्रोत्साहन और वर्ग से भी हुई हैं । जैसे यही कि ढोल के साथ प्रताड़ित न होते तो गंवार और शूद्र धर्म परिवर्तन ही क्यों करते !
इसमें कोई सन्देह नही कि आज के लोकतांत्रिक भारत के धर्म निरपेक्ष संविधान तथा वैश्विक मानवतावादी दृष्टिकोण से मध्य कालीन महाकवि तुलसीदास एक जातीय कवि ही हैं । लेकिन तत्कालीन शासक धर्म की वैचारिक स्वतन्त्रता के प्रति निषेधात्मक दृष्टिकोण देखते हुए तुलसी के पास समानान्तर जीवन और मुक्ति की कामना का मानवाधिकार था । इसके कारण उन्हें काल-सापेक्ष प्रगतिशील पक्षधरता का कवि मानना पड़ेगा ।




#विशिष्टाद्वैतवाद
#रामकथा
#राम
#विश्वामित्र

तुलसीदास विशिष्टाद्वैतवाद मत को मानने वाले थे । यह मत राजाओं के ऐश्वर्य और वैभव को सामान्य जनता से ऊपर और विशिष्ट बतलाने की जरूरत के कारण आया लगता है । दूसरे शब्दों में आत्मा और परमात्मा के बीच तात्विक समानता होते हुए भी परमात्मा के विशिष्ट होने की घोषणा कर राजा के भी दैवी रूप से सामान्य जन से विशिष्ट होने का वातावरण सृजित करता है । आदि शंकराचार्य ने सारी दुनिया और राजाओं के वैभव को भी माया घोषित कर उसे नि:सारता के खाते में डाल दिया था - ईश्वर के साथ-साथ लोक के पार्थिव ईश्वरों की महत्ता की स्वीकृति की वापसी विशिष्टाद्वैतवाद प्रकारान्तर से करता है । बुद्ध को आत्मसात कर अपना अद्वैत मत प्रस्तुत करने वाले आदि शंकराचार्य भी अपनी अधिकतम उदार करुणा से सन्यासी होने के कारण लोक को जो आध्यात्मिक समानता का उपहार दिया था, उसकी वापसी और संशोधन भी विशिष्टाद्वैतवाद के माध्यम से ही हुआ मुझे लगता है ।
इस दार्शनिक दृष्टिकोण के कारण ही तुलसी कृत रामकथा का पाठ सामान्य जन को राम की तुलना में हीन दिखाते हुए और अप्रतिष्ठित करते हुए चलता है । यह पौराणिक राम के विपरीत प्रतीत होता है । रामायण के अनुसार मानें तो राम विश्वामित्र के शिष्य थे । स्वयं को विश्व का मित्र बताने वाले ऋषि के शिष्य राम की आत्मा पौराणिक कथाओं के अनुसार मानें तो ईश्वर को मनुष्य की आत्मा में देखने की अवधारणा देने वाला विश्वामित्र के द्वारा सृजित गायत्री मंत्र से संस्कारित और परिष्कृत होनी चाहिए। विश्वामित्र यदि मार्क्स की भूमिका में हैं तो राम गायत्री मंत्र के अर्थ और संस्कार को अपने आचरण में उतारने वाले लेनिन की भूमिका में हैं । शायद राम को जन्म के पहले से ईश्वर मान ने वालों को गुरू विश्वामित्र और उनके गायत्री मंत्र के अर्थ-प्रभाव और संस्कार की याद दिलाना अच्छा न लगे ।
ध्यान देने की बात यह है कि गुरु वशिष्ठ अयोध्या के राजपुरोहित थे । राम और लक्ष्मण शिक्षा प्राप्त करने से लेकर विवाह तक विश्वामित्र के आश्रम में ही बताए गए हैं । विचारक ओर विचारों के सामाजिक व्यवहारकर्ता के रूप में उनका पारस्परिक सम्बंध मार्क्स और लेनिन जैसा था -
सिद्धांतकार और उसके प्रयोगकर्ता (प्रेरक-प्रेरित)सम्बन्ध ।
फिलहाल विचारणीय यह है कि यदि तुलसीदास पर
शंकराचार्य के अद्वैतवाद का प्रभाव रहा होता तो वे आज ब्रह्मांड के साथ-साथ परमाणु यानी लघु अस्तित्व की भी महत्ता स्थापित होने वाले लोकतांत्रिक युग में वे कुछ अधिक ही प्रासंगिक होते । यह एक तथ्य है विशिष्टाद्वैतवाद श्रेष्ठता के साथ सामान्यता की अवधारणा सैद्धांतिक सहमति देता है । इसीलिए मुझे लगता है कि विशिष्टाद्वैतवादी दर्शन की आंख नें तथा तुलसी के जीवन की दीन-हीन परिस्थितियों नें उन्हें वास्तविक राम द्वारा गायत्री मंत्र और विश्व मैत्री को अपने जीवन और आचरण में साकार करने वाले उदात्त व्यक्तित्व और अवधारणा तक न पहुँचने दिया । उल्लेखनीय है कि विश्वामित्र भी राजा का पद छोड़कर ऋषि बनते हैं तो राम भी राजा बनने का मोह छोड़कर वनवासी बनते हैं । पुराणों में ही बुद्ध की तरह भूखा होने पर बिना किसी भेदभाव के मांगकर मांसाहार करने का भी उल्लेख है ।
देखने की बात यह है कि गीताकार की तरह रामकथाकार प्रत्यक्ष रूप से राम के विचारक और उपदेशक रूप के वर्णन से बचे हैं । संभवत: इससे उनकी गम्भीरता वाली छवि न रह जाती । यह भी कारण हो सकता है कि रामायण और राम चरित मानस दोनों में राम का चरित्र अन्तर्मुखी किस्म का और बहुत कम बोलने वाला धीर-गम्भीर चरित्र है । वे गीता के श्रीकृष्ण की तरह उपदेश कहीं नहीं देते । रामचरितमानस में वे आचरण से जो सम्मान करते हैं और अयोध्या की जनता के अपार प्रेम को देखते हुए विश्वामित्र के गायत्री मंत्र के अर्थ और भाव-सौन्दर्य का ही राम के आचरण के माध्यम से लोक में उतरना-फैलना और प्रकाशित होना लगता है । राम सोलहो कला के अवतार भले ही न माने गए हों , उनमें उदात्त आचरण के सौन्दर्य की पूर्णिमा है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी नें इसे ही शील का सौन्दर्य कहा है । राम नें को भी युद्ध विस्तारवादी आकांक्षा से नहीं लड़ा । किष्किंधा और लःका को जीतकर भी नहीं जीता । उनकी लोक-व्याप्ति बताती है कि लोगों का दिल जीता ।
वाल्मीकि के राम तो रावण के वध और युद्ध की समाप्ति के बाद स्वयं को विष्णु का अवतार घोषित किए जाने से असहमति जताते हैं । ऐसा कहने वालों से यह कहते हुए मना करते हैं कि 'मैं दशरथ-पुत्र राम स्वयं को मनुष्य मानता हूं ।
विशिष्टाद्वैतवादी दृष्टिकोण से ही सभी को सम्मान देने वाले राम के जीवन-दर्शनको जिसे हर प्राणी को ईश्वर मानने 'वाले ऋषि का' विश्वामित्र दर्शन ' कहा जाए तो अधिक सही होगा । जो विभिन्न रामकथाओं के माध्यम से सही ढंग से व्यक्त नहीं हो पाया है । जबकि वह रहा जरूर होगा गायत्री मंत्र द्रष्टा ऋषि के मनोभावों,विचारों और शिक्षाओं के अनुरूप। राम के गुरू विश्वामित्र के गायत्री मंत्र का अर्थ भी प्रकारान्तर से अद्वैतवाद के आस-पास का ही है और मनुष्य की आत्मा में ब्रह्म और उसकी ईश्वरता के आवाहन के रूप में है । इसीलिए मुझे यह कहना उचित लगता है कि रामकथा की दार्शनिक निष्पत्ति अद्वैतवाद की ही है ।
रामकथा के पाठकों को राम के विचारों का उनके आचरण के आधार पर अनुमान लगाना पडता है ।'तुलसीदास कृत रामकथा भी , सभी के लिए (चारित्रिक व्यवहार के स्तर पर ) आत्मा और परमात्मा के अभेद और एकता की घोषणा या प्रचार नहीं करती । यद्यपि तुलसी के राम आम जन के रूप में ही जनता से मिल रहे होते हैं लेकिन जन सामान्य उन्हें अपने बीच का नहीं समझता । वे वल्कल वेश में भी धनुर्धर हैं । जन्म के पूर्व ही विष्णु घोषित कर दिए जाने से तिब्बतियों के शिशु दलाईलामा की भांति जन्म से ही अतिविशिष्टता उन्हें प्राप्त है । स्पष्ट है कि यदि वे विशिष्टाद्वैतवादी न होकर अद्वैतवादी रहे होते तो तुलसी की रामकथा उन प्रसंगों से बची रहती जिनके कारण प्रासंगिकता को लेकर उनका लिखा पुनविर्चार के दायरे में आ रहा है ।
यद्यपि यह भी सच है कि ज्ञानमार्गी अद्वैतवाद सिर्फ विद्वान सन्यासियों के लिए ही था ,क्योंकि जैसे भी हम स्वार्थ और हित-कामना में पडते हैं-निरीहता को जीने लगते हैं । तब कोई 'अहं ब्रहमास्मि ' कहने को सोच भी नहीं सकता ।
दार्शनिक दृष्टिकोण से विशिष्टाद्वैतवाद का महत्व इस दृष्टिकोण से स्वीकार योग्य लगता है कि उसमें अनित्यघर्मा देह में रहने वाले ब्रह्म को कम महत्व दिया गया है । संभवत: स्थायित्व या अनश्वरता की दृष्टि से ब्रह्माण्ड व्यापी परमात्मा के ही विशिष्ट होने की घोषणा है । महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों दार्शनिक दृष्टियां अलग-अलग सामाजिक मनोविज्ञान और व्यवहार की प्रवृत्ति को जन्म देती दिखती हैं।

11/11/2023



हनुमान चालीसा प्रसंग

जब उतना अच्छा लिख सकता है तो उस कवि (तुलसीदास द्वितीय) की और भी रचनाएँ होनी ही चाहिए । ऐसा तो होना नहीं चाहिये कि सम्पुर्ण रामकथा की समाहार शक्ति का प्रदर्शन कराने वाली कृति हनुमान चालीसा लिख कर अद्भूत प्रदर्शन करने वाला कवि अपनी प्रतिभा से सहसा चालीसा लिख्कर निष्क्रिय भूमिगत और अदृश्य हो गया हो । यह निश्चय ही वाराणसी के संकट मोचन मन्दिर के उद्घाटन के अवसर पर प्रयोजन मूलक ढंग से पूजा गीत के रुप मे लिखा गया होगा जिसे स्वयं तुलसी दास द्वारा ही स्थापित माना जाता है । रामलीला और हनुमान मन्दिर के साथ बने अखाड़े तुलसीदास द्वारा रामकथा के चरित्रों के प्रचार-प्रसार के लिये आने जीवनकाल में चलाए गए लोक आन्दोलन के प्रमुख हिस्से रहे हैं । यादव बिरादरी के अखाड़ों से जुडकर ही रामकथा के मिथकीय चरित्र हनुमान की पूजा का लोक में बहुआयामी प्रसार तुलसी के जीवन्काल में ही सम्भव हुआ ।' राम चरित सुनबे को रसिया' यदि अवधी का प्रयोग नहीं है तो बनारसिया प्रयोग तो है ही काशिका के करबे,जइबे कहबे आदि के तर्ज पर सुनिबे का प्रयोग काशी के हनुमान भक्तों के लिये ही किया गया लगता है। इसे देखते हुए सिर्फ चालीस पंक्तियों की एक कविता लिखने के लिये अलग से तुलसीदास द्वितीय पैदा करने की क्या जरूरत!


तुलसीदास का आदर्श आनुवांशिक सामन्तवादी व्यवस्था और कृषक सभ्यता के लिए था । वर्तमान समय औद्योगिक पूंजीवाद का है जो अलगावबोध को जन्म देकर लोगों को असामाजिक और संवेदनहीन बनाता है । पूंजी आत्मनिर्भर तो करती है लेकिन संचय के साथ -साथ दूसरों की अवहेलना करने की प्रवृत्ति भी विकसित करती है । सामाजिक व्यवहार के अवसरों को सीमित करती है । दूसरों से भी कटकर एक असंवादी और एकान्त जीवन-यापन की भी सुविधा प्रदान करती है । बढती जनसंख्या के साथ घटते संसाधनों का तनाव भी है । इन सब कारणों से समाज में क्रूरता और अपराध बढ रहे है ।
इस गुजरते समय की विखण्डनवादी प्रभाव वाली
सामूहिक मानसिकता के लिए रामकथा के भावुक कौटुम्बिक व्यवस्था वाले चरित्र असुविधा भी उत्पन्न करते हैं । उसके पास परिवार के भीतर के सदस्यों की पूंजीगत विषमता के लिए त्याग और संतोष का जो समाधान है , वह अव्यवहारिक होने के कारण लोगों को स्वीकार नहीं है । यह भी एक कारण है कि आर्थिक-मनोवैज्ञानिक कारणों से उसकी प्रासंगिकता प्रश्नांकित होने लगी है ।





रामकथा का मानवतावादी पाठ


रामकथा और तुलसीदास के राम चरित मानस का पाठ-विश्लेषण एक ही निष्कर्ष तक नहीं ले जाता है । रामकथा पुरुष प्रधान किसान सभ्यता के आदर्शों का प्रतिमानीकरण करने वाला महाकाव्य है । यह परिवार केन्द्रित सामूहिकता का सन्देश देने तथा आनुवंशिक उत्तराधिकार में सम्पत्ति-विभाजन को हतोत्साहित करने के कारण मिलकर खेती या व्यवसाय करने का सन्देश देता रहा है । इस आधार पर यह कुटुंब व्यवस्था का चारित्रिक संविधान प्रदान करने वाला महाकाव्य है ।
राम के बाद रामकथा के प्रमुख चरित्र हनुमान का सकारात्मक या प्रगतिशील पक्ष यह है कि वह आदर्श आज्ञाकारी निष्ठावान सेवक या अनुचर का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करता है । रामकथा के माध्यम से फैलायी गयी यह निष्ठा मध्ययुगीन सामन्ती आर्थिक व्यवस्था की रीढ रही है । हनुमान के चरित्र की लोकप्रियता का यह भी एक रहस्य है । यह अन्य सामन्तयुगीन बुराइयों जैसे दशरथ के चरित्र के माध्यम से बहुपत्नी प्रथा के नकारात्मक पहलू भी सामने लाती है । अरस्तू के विरेचन सिद्धांत के आधार पर देखें तो पाठकों को इतना डरा देती है कि वे राम की तरह एक विवाह से अधिक करने की सोचें ही नही । राम कथा का सबसे समाज उपयोगी पक्ष परिवार के भीतर के आदर्श आचरण और व्यवहार का आदर्श उपस्थित करना है इस दृष्टिकोण से देखें तो लोक के दिल में बस जाने वाली असली रामकथा चित्रकूट के भरतमिलाप तक ही है । उसके आगे की रामकथा का सबक या सीख उसकी धार्मिक व्याख्या करने वाले बिगाड देते हैं । उदाहरण के लिए सीताहरण का प्रसंग आज भी परदेश गमन में आने वाली जोखिमों के प्रति आगाह करता है । अति आत्मविश्वास और जोखिमपूर्ण व्यवहार सुरक्षित नहीं है ,चाहे वह राम जैसा अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला ही क्यों न हो । रावण द्वारा साधु के वेश में सीता का हरण तो भारत की स्त्रियों को सीधे-सीधे कठोर चेतावनी देने वाला प्रसंग है कि साधु वेष धारी पराए पुरुषों पर कभी विश्वास मत करो अन्यथा तुम्हारा भी वैवाहिक जीवन सीता की तरह तबाह हो सकता है । यह एक ऐसी चेतावनी है जिसे मध्य काल में कबीर ही दे पाते हैं -चली कुलबोरनी गंगा नहाया जैसी पंक्तियों के माध्यम से । उत्तरार्ध की रामकथा मध्यकालीन राजाओं के लिए कूटनीतिक दांव-पेंच का दृष्टांत उपस्थित करती है । इसी में धार्मिक पाठ और रघुकुल के जिद्दी राम के कारण दशरथ के हार्ट अटैक यानी ह्रदयाघात की ओर रामकथा के पाठकों और श्रोताओ का ध्यान ही नहीं जाता। । दशरथ की असामयिक मृत्यु उसके धार्मिक पाठ के महिमामंडन में राम प्रेम और विरह का चरम प्रतिमान मान ली जाती है ।दरअसल राम की चरित्र सर्जना एक अतिमानवीय दुस्साहसिक चरित्र और व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के रूप में की गयी है । उनके क्रूर आदर्शवाद में संवेदना गौण हो जाती है । यह क्रूरता सीता के निर्वासन में भी देखी जा सकती है और जो उनके प्रिय अनुज लक्ष्मण को एक दिन सरयू नदी में डूबकर आत्म हत्या करने तक ले जाती है और स्वयं उनको भी अपनी जलसमाधि यानी आत्महत्या तक भी । अपनी असह्य और अमानवीय आदर्शवादी क्रूरता का बोध होने पर वे स्वयं भी लक्ष्मण का अनुसरण कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेते हैं । इसे चरमपंथी आदर्शवाद से राम के मोहभंग के रूप में ही देखा जाना चाहिए । इस दृष्टिकोण से देखें तो रामकथा एक दुखान्त आख्यान है । उसमें आए चरित्रों को अपरिवर्तनीय आदर्श मानकर देखना या अनुसरण करना आवश्यक या अपरिहार्य नहीं ।
इससे यह भी सन्देश मिलता है कि संवेदना का अतिक्रमण कर निष्ठुर होकर धर्म और कानून आदि आदर्शों का अनुपालन हमें अभिशप्त करने वाला तथा त्रासद स्मृतियों को जन्म देने वाला भी हो सकता है । महाभारत भी इसी कारण त्रासद अंत को प्राप्त होता है । ऐसी ही चरमपंथी हिंसा मार्क्सवाद को भी अभिशप्त कर चुकी है । यहूदियों और इस्लामियों को भी कर रही है । नही सजग हुए तो हिंदुओं को भी अभिशप्त कर जाएगी ।
इस तरह रामकथा में एक आदर्शवादी नायक राम के त्रासदीपूर्ण अंत को देखते हुए वाल्मीकीय रामायण के आख्यान का जो साहित्यिक पाठ बनना चाहिए वह अपने ही जिए और किए गए से असंतुष्ट और विमुख मनुष्य का बनता है । धार्मिक भाष्यकार रामकथा का साहित्यिक या मानवीय पाठ नहीं करते ।उसका आध्यात्मिक पाठ करने वाले क्रूर अमानवीय आदर्शवाद के नकारात्मक दुष्परिणामों की कहीं चर्चा ही नहीं करते ।
ब्राह्मणवादी पाठ की इस दृष्टिकोण से प्रशंसा की जा सकती है कि राम को मानवेतर घोषित कर वह किसी से राम जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा ही नहीं करती । सब कुछ अनुकरणीय से परे और लीला घोषित कर देती है । तुलसीदास भी यही करते है । सच्चाई यह है कि धार्मिक रामकथाकार कथा के अंत में आत्महत्या करने वाले नायक राम की एकान्त-अव्यक्त वेदना तथा मानवीय जीवन-निष्कर्षों तक तक पहुँच ही नहीं पाते ।

16/10/2023




रामकथा का मानवतावादी पाठ
रामकथा और तुलसीदास के राम चरित मानस का पाठ-विश्लेषण एक ही निष्कर्ष तक नहीं ले जाता है । रामकथा पुरुष प्रधान किसान सभ्यता के आदर्शों का प्रतिमानीकरण करने वाला महाकाव्य है । यह परिवार केन्द्रित सामूहिकता का सन्देश देने तथा आनुवंशिक उत्तराधिकार में सम्पत्ति-विभाजन को हतोत्साहित करने के कारण मिलकर खेती या व्यवसाय करने का सन्देश देता रहा है । इस आधार पर यह कुटुंब व्यवस्था का चारित्रिक संविधान प्रदान करने वाला महाकाव्य है ।
राम के बाद रामकथा के प्रमुख चरित्र हनुमान का सकारात्मक या प्रगतिशील पक्ष यह है कि वह आदर्श आज्ञाकारी निष्ठावान सेवक या अनुचर का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करता है । रामकथा के माध्यम से फैलायी गयी यह निष्ठा मध्ययुगीन सामन्ती आर्थिक व्यवस्था की रीढ रही है । हनुमान के चरित्र की लोकप्रियता का यह भी एक रहस्य है । यह अन्य सामन्तयुगीन बुराइयों जैसे दशरथ के चरित्र के माध्यम से बहुपत्नी प्रथा के नकारात्मक पहलू भी सामने लाती है । अरस्तू के विरेचन सिद्धांत के आधार पर देखें तो पाठकों को इतना डरा देती है कि वे राम की तरह एक विवाह से अधिक करने की सोचें ही नही । राम कथा का सबसे समाज उपयोगी पक्ष परिवार के भीतर के आदर्श आचरण और व्यवहार का आदर्श उपस्थित करना है इस दृष्टिकोण से देखें तो लोक के दिल में बस जाने वाली असली रामकथा चित्रकूट के भरतमिलाप तक ही है । उसके आगे की रामकथा का सबक या सीख उसकी धार्मिक व्याख्या करने वाले बिगाड देते हैं । उदाहरण के लिए सीताहरण का प्रसंग आज भी परदेश गमन में आने वाली जोखिमों के प्रति आगाह करता है । अति आत्मविश्वास और जोखिमपूर्ण व्यवहार सुरक्षित नहीं है ,चाहे वह राम जैसा अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला ही क्यों न हो । रावण द्वारा साधु के वेश में सीता का हरण तो भारत की स्त्रियों को सीधे-सीधे कठोर चेतावनी देने वाला प्रसंग है कि साधु वेष धारी पराए पुरुषों पर कभी विश्वास मत करो अन्यथा तुम्हारा भी वैवाहिक जीवन सीता की तरह तबाह हो सकता है । यह एक ऐसी चेतावनी है जिसे मध्य काल में कबीर ही दे पाते हैं -चली कुलबोरनी गंगा नहाया जैसी पंक्तियों के माध्यम से । उत्तरार्ध की रामकथा मध्यकालीन राजाओं के लिए कूटनीतिक दांव-पेंच का दृष्टांत उपस्थित करती है । इसी में धार्मिक पाठ और रघुकुल के जिद्दी राम के कारण दशरथ के हार्ट अटैक यानी ह्रदयाघात की ओर रामकथा के पाठकों और श्रोताओ का ध्यान ही नहीं जाता। । दशरथ की असामयिक मृत्यु उसके धार्मिक पाठ के महिमामंडन में राम प्रेम और विरह का चरम प्रतिमान मान ली जाती है ।दरअसल राम की चरित्र सर्जना एक अतिमानवीय दुस्साहसिक चरित्र और व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के रूप में की गयी है । उनके क्रूर आदर्शवाद में संवेदना गौण हो जाती है । यह क्रूरता सीता के निर्वासन में भी देखी जा सकती है और जो उनके प्रिय अनुज लक्ष्मण को एक दिन सरयू नदी में डूबकर आत्म हत्या करने तक ले जाती है और स्वयं उनको भी अपनी जलसमाधि यानी आत्महत्या तक भी । अपनी असह्य और अमानवीय आदर्शवादी क्रूरता का बोध होने पर वे स्वयं भी लक्ष्मण का अनुसरण कर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेते हैं । इसे चरमपंथी आदर्शवाद से राम के मोहभंग के रूप में ही देखा जाना चाहिए । इस दृष्टिकोण से देखें तो रामकथा एक दुखान्त आख्यान है । उसमें आए चरित्रों को अपरिवर्तनीय आदर्श मानकर देखना या अनुसरण करना आवश्यक या अपरिहार्य नहीं ।
इससे यह भी सन्देश मिलता है कि संवेदना का अतिक्रमण कर निष्ठुर होकर धर्म और कानून आदि आदर्शों का अनुपालन हमें अभिशप्त करने वाला तथा त्रासद स्मृतियों को जन्म देने वाला भी हो सकता है । महाभारत भी इसी कारण त्रासद अंत को प्राप्त होता है । ऐसी ही चरमपंथी हिंसा मार्क्सवाद को भी अभिशप्त कर चुकी है । यहूदियों और इस्लामियों को भी कर रही है । नही सजग हुए तो हिंदुओं को भी अभिशप्त कर जाएगी ।
इस तरह रामकथा में एक आदर्शवादी नायक राम के त्रासदीपूर्ण अंत को देखते हुए वाल्मीकीय रामायण के आख्यान का जो साहित्यिक पाठ बनना चाहिए वह अपने ही जिए और किए गए से असंतुष्ट और विमुख मनुष्य का बनता है । धार्मिक भाष्यकार रामकथा का साहित्यिक या मानवीय पाठ नहीं करते ।उसका आध्यात्मिक पाठ करने वाले क्रूर अमानवीय आदर्शवाद के नकारात्मक दुष्परिणामों की कहीं चर्चा ही नहीं करते ।
ब्राह्मणवादी पाठ की इस दृष्टिकोण से प्रशंसा की जा सकती है कि राम को मानवेतर घोषित कर वह किसी से राम जैसा व्यवहार करने की अपेक्षा ही नहीं करती । सब कुछ अनुकरणीय से परे और लीला घोषित कर देती है । तुलसीदास भी यही करते है । सच्चाई यह है कि धार्मिक रामकथाकार कथा के अंत में आत्महत्या करने वाले नायक राम की एकान्त-अव्यक्त वेदना तथा मानवीय जीवन-निष्कर्षों तक तक पहुँच ही नहीं पाते ।





 तुलसीदास की पंक्तियां उनके काव्य-ग्रन्थ 'राम चरित मानस की व्यापक स्वीकृति और प्रसिद्धि के साथ स्वतंत्र सूक्तियों के रूप में इश्तेमाल होने लगी । इसलिए ऐसी सूक्तियां बाद की पाठक पीढियों के लिए भंयकर दुष्परिणाम लाने वाली हुई । तुलसी का काव्य-साहित्य धार्मिक संविधान की तरह पढा गया है और इसमें सन्देह नहीं कि उसका संदर्भित समुदायों को अपमानित करने के लिए भी दुरुपयोग होता रहा है। उत्पीड़न की घटिया मानसिकता का पोषण और विज्ञापन करता रहा है -वह भी प्रबन्ध काव्य की मंशा के विपरीत । क्योंकि प्रताड़ना की घोषणा बिना अपराध बताए सिर्फ लिंग और वर्ण की अयाचित-अपरिहार्य सदस्यता के आधार पर विवादित पंक्तियों में हुई है - इसीलिए अपनी अशील व्याप्ति में गंभीर और चिंतनीय भी है । वह कथा-काव्य में भले दृष्टांत रूप में सहज उपस्थित हो गया हो । उससे इतना तो सत्यापित होता ही है कि हमारा मध्ययुगीन समाज किस सीमा तक असभ्य, घटिया और अनैतिक रूप से भेद-भाव करने वाला पूर्वाग्रही तथा आपराधिक था । इसमें तुलसीदास की भूमिका एक कैमरामैन जैसी होने के बावजूद। जहां महाकवि के नियंत्रण के बाहर भारतीय समाज की कलुषित मानसिकता लोकोक्ति के माध्यम से ही व्यक्त हो गयी है ।


#तुलसीविमर्श

(रामकथा भारतीय जीवन-मूल्यों की जन्म स्थली है । वचन या कथन की सत्यनिष्ठा का उद्गम तो रघुकुल से ही जोड़ा जाता है । रामकथा कौटुम्बिक परम्परा वाले भारतीय समाज का सांस्कृतिक आधार ग्रन्थ है । यदि यह कहा जाए कि वह हमारे आचरण और व्यवहार का सांस्कृतिक संविधान रचती है तो अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा । रामकथा हमारी सांस्कृतिक-साहित्यिक धरोहर है । इसके विभिन्न पाठों को लेकर लगातार विवाद सामनें आ रहे हैं । सही पक्ष तक पहुँचने के लिए राम-कथा के अच्छे और बुरे दोनों प्रभावों के गम्भीरतापूर्वक विश्लेषण की जरूरत है ।)
.....
प्रताड़ित प्रताड़ना आदि जीवित शब्द 'ताड़न' ' के सही अर्थ-ग्रहण और बदलाव में बाधक हैं । भोजपुरी में 'ताड़ लेना' 'देख लेने' ,'बूझ लेने ' का मिला जुला अर्थ देता है और ऐसा ही अवधी में भी है । लेकिन शब्द-साहचर्य अथवा कुसंग-प्रभाव के कारण 'ताड़न ' शब्द की सारी पोल ढोल ही खोल दे रहा है कि ताड़ना का अर्थ श्लेष में निगरानी और प्रसंगानुसार गवार,शूद्र, पशु और नारी को पीटने सहित पीड़ा या दण्ड देने का भय बनाए रखना आदि भी है । यद्यपि पाठ-विश्लेषण में प्रसंग के अनुसार समुद्र एक असहयोग करने वाले खल का चरित्र और व्यवहार उपस्थित कर रहा है , इसे देखते हुए तुलसी सम्मत आशय पाने के लिए दुष्ट या खल चरित्र वाले गंवार, शूद्र,पशु और नारी के दण्डनीय होने का भाव निकालना ही प्रामाणिक होगा । इसे अकारण एवं निर्दोष सभी ग्रामीणों(अशिंक्षित-असभ्य के अर्थ में ),शूद्रों और स्त्रियों को पीटने का अर्थ ग्रहण करना कवि तुलसी के प्रति ज्रयादती होगी । कारण कि मध्य युग में आज की तरह की कानून व्यवस्था और पुलिस तो थी नहीं । सुधारने के लिए आस-पास घर-गाॅव.बिरादरी वाले ही मिलकर पीटते थे । इसमें शोषण के लिए पीटना भी निश्चय ही शामिल रहा होगा । इस तरह देखा जाए तो तुलसीदास वही लिख रहे थे जो उनके समय का सच और आम व्यवहार था । यह जरूर पूरा मध्यकालीन समाज प्रश्नों के कठघरे में आ गया है ,सिर्फ तुलसीदास का कवि ही नहीं ।। अपने राम को भगवान बनाने वाले राम और तुलसी अपनी मध्यकालीन पुरुषवादी,वर्ण भेदवादी सामंती सोच ,मानसिकता और पूर्वाग्रह के कारण ही मनुष्य के रूप में युग की कमियों के साथ पहचान लिए जा रहे हैं । पहचान लेने वाली जनता अधिक समझदार हो गयी है -यह भी इस विवाद नें सत्यापित किया । फिर भी अपने मध्यकालीन परिवेश के आधार पर उन्हें सन्देह का लाभ मिलना ही चाहिए ।इस सतर्कता के साथ कि गुणहीन विप्र पुजवाने की अपनी अपील के कारण समग्रता में तुलसीदास पक्षपातपूर्ण एवं वर्णाग्रही होने से जातीय एवं आज के लिए असंवैधानिक होने के अनुपात में अप्रासंगिक ठहरते हैं ।
क्योंकि राम.कथा कुटुंब व्यवस्था का आदर्श और प्रतिमान उपस्थित करने वाला आख्यान है इसलिए परिवार के भीतर का पूर्वार्द्ध वाला कथा-प्रसंग देर तक प्रासंगिक बना रहेगा । परिवार के भीतर त्याग और एकता का संदेश देने वाला आख्यान होने के कारण भी । परिवार से समाज में जाते ही आख्यान का कुछ ढांचा सामंती हो जाता है । लेकिन राम के वनवास काल में रामकथा श्रमण संस्कृति का भी आदर्श उपस्थित करती है । वनवासी राम शिकार वृत्ति पर जीवन यापन करते समय जनजातीय आजीविका पद्धति अपनाते हैं । राम का श्रमणों के बीच भ्रमण आधुनिक बुद्धिजीवियों के जीवन और व्यवहार के बहुत कुछ समान है । शम्बूक-वध का प्रसंग जो तुलसीदास के राम चरित मानस के भीतर नहीं है अन्य रामकथा को ब्राह्मणों के पक्ष में भीतर से गम्भीर क्षति पहुॅचाता है । कुछ ऐसा ही राम को सामंत की तरह चित्रित करने के कारण विप्रकुलीन तुलसीदास भी ।
इस स्थिति या यथार्थ को आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो यह भी दिखाई दे सकता है कि सारी पूंजी सामन्तों के यहाँ ही संचित और एकत्रित थी ।जनसामान्य उनके ऐश्वर्य पर रीझकर भी उनपर सम्मान का भाव रखता था ।जनसामान्य में श्रेष्ठ माना जाने वाले विप्र वर्ग का भक्ति-भाव जाने-अनजाने प्रारब्ध, नियति एवं ईश्वर की इच्छा जैसी अवधारणाओं के माध्यम से सामूहिक समर्पण और गुलामी के मनोभाव की सामूहिक सृष्टि करता रहा । इसे ही दास्य भाव की भक्ति कही गयी । इतिहास में विप्र वर्ग की भूमिका याचकों के नेतृत्वकर्ता की रही । वह स्वयं तो याचना या प्रार्थना द्वारा कुछ सुविधाएं प्राप्त कर सकता था लेकिन। अन्य वर्ण से आए लोग शास्त्रोक्त ढंग से भिक्षाटन के अधिकारी भी नहीं थे । उन्हें अपनी आजीविका श्रम एवं कर्म से ही चलानी थी ।
यहाँ से मैं रामकथा की समाजशास्त्रीय समीक्षा करना चाहूँगा। रामकथा के भीतर ही दो राम उपस्थित हैं । एक अपनें गुरु विश्वामित्र के आदर्शों के अनुरूप आचरण करने वाले राम और दूसरा अपने राजपुरोहित वशिष्ठ के परामर्श से कार्य करने वाले राम। यह मानना कठिन होगा कि शम्बूक-वध की तरह सीता के त्याग में ब्राह्मणों के ऊपर सही परामर्श देने की जिम्मेदारी नहीं रही होगी । यदि इन प्रसंगों को प्रक्षिप्त न माने तो !
राम चरित मानस की रामकथा के सन्दर्भ में दो तथ्य और महत्वपूर्ण हैं । मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह नायक के रूप में क्षत्रिय वर्ण और कथाकार कवि की ओर से ब्राह्मण या विप्र समुदाय की मानसिकता और आदर्श उपस्थित करता है । इसीलिए मानस की रामकथा एक तरह से रामकथा का विप्र संस्करण है । दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो यह आदि शंकराचार्य के आत्मा और परमात्मा को अभेद और समान भाव से देखने-दिखाने वाले अद्वैतवाद के दर्शन से असहमत है । तुलसीदास का विशिष्टाद्वैतवादी दार्शनिक आधार आत्मा और परमात्मा की तात्विक समानता पर विश्वास नहीं करता । वह मान लेता है कि जो विशिष्ट है हमेशा ही विशिष्ट रहेगा और जो सामान्य है हमेशा ही सामान्य । यही उनके पूज्य भाव का आधार भी है । यद्यपि विकासवादी दृष्टिकोण भी स्तरभेद की विविधता से सहमत है । दरअसल विशिष्टाद्वैतवाद मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर प्रकारांतर से राजाओं की विशेष हैसियत और उनके दूसरों को अधीन करने वाले राजतंत्र का आध्यात्मिक तर्क द्वारा नैतिक समर्थन करता है । यह गणतंत्र के समानता जीने वाले समुदायों से निकले बौद्ध मत के जीवन-दर्शन के बिल्कुल विपरीत है जिसे उनसे शास्त्रार्थ कर आदि शंकराचार्य नें अत्यंत सोच-समझकर स्थिर किया था । निष्कर्ष यह है कि अद्वैतवाद और विशिष्टाद्वैत के भीतर गणतंत्र और राजतंत्र की बिल्कुल विरोधी आत्मा समाई हुई है । तुलसीदास और उनका विशिष्टाद्वैत मध्ययुग के सामन्ती राजतंत्र और कुलीनतंत्र को स्वीकार करते हुए उसके भीतर ही उसके आदर्श स्वरूप की खोज का परिणाम है ।


शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

धर्म

 अलग-अलग धर्मों की अलग-अलग विशेषताएँ हैं । मनुष्य सभी धर्मो से कुछ न कुछ अच्छाई सीख सकता है लेकिन जो सिर्फ एक ही धर्म विशेष को ही सबसे अच्छा मानकर उसे अपनाता है ।उसके ज्ञान-चक्षु बन्द हो जाते हैं । वह अच्छाई के साथ-साथ बुराई को भी सही मानकर जीने लगता है। आने वाला समय सभी धर्मो को ठीक-ठीक समझने वालों का होंगा । सभी धर्म मनुष्य जाति ने ही अच्छे उद्देश्य से ही पैदा किए होंगे लेकिन आज के मनुष्य के लिए पुराने पड़ने के कारण सभी अपनी परिकल्पना मे पिछड़ भी गए हैं ।

हिन्दू धर्म प्रतीकात्मक प्रकृति का है । उदाहरण के लिए गणेश की परिकल्पना तब की गयी होगी जब मनुष्य ने हाथियों को पालने और प्रशिक्षित करने की क्षमता का पता लगा लिया होगा । वह हाथियों की समझदारी पर रीझा होगा । एक प्रशिक्षित हाथी मे ही उसे किसी मनुष्य का दिमाग रखने वाले प्राणी के दर्शन हुए होंगे । हाथियों को गणेश के प्रतिनिधि के रूप मे देखना एक सकारात्मक विश्वास है और यह पर्यावरण के पक्ष मे भी है । अन्धविश्वास की शैली मे होने के बावजूद यह हाथी प्रजाति की जीवन-रक्षा में सहायक है । इसी तरह का तर्क बन्दर प्रजाति के देवता हनुमान के लिए भी कहा जा सकता है । वे बन्दरो को महिमामंडित करते हैं । उसके कारण बन्दर भी मानव समाज में बेरोकटोक आवा-जाही कर पाते हैं ।
कीट खाने वाले उललुओ को किसानों का सहायक होने के कारण लक्ष्मी का वाहक कहा गया है । चूहों का प्राकृतिक शिकारी होने के कारण नागों को अबध्य माना जाता है और उन्हे देवता होने की प्रतिष्ठा भी प्राप्त है । क्योकि हम इन मिथकों के जन्म के पीछे के सही तर्को तक नहीं पहुंच पाते इसलिये वे हमें हास्यास्पद लगते हैं । इस्लाम इस प्रकृति,कुदरत या कायनात को ही एक चमत्कार की तरह देखने वाली आंख देता है । लगभग तीस वर्ष पहले कुरान और बाइबिल दोनों को ही पढा था और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इसलाम की बहुत सी बुराइयों के लिए मुहम्मद साहब सीधे-सीधे जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि उनके अनुयायियों और परवर्ती संगठन तथा सत्ता का नेेतृत्व जिम्मेदार है । नेहरू की तरह उनको भी पुत्र नहीं था । बेटी से ही वंश चलना था जिन्हें (कर्बला के युद्ध में) स्वयं मुसलमानों ने ही मार डाला । दरअसल इस्लाम की नकारत्मकता इतिहास और अनुयायियों की देन है । इस्लाम का जन्म मक्का और मदीना में बिलकुल स्थानीय स्तर पर हुआ था । उनका कहना था कि दुनिया की सारी भाषाओं में पवित्र धर्म ग्रन्थ है । कुरान सिर्फ अरबी बोलने वालों के लिए नाजिल हुई है । अरब की कठिन जीवन-परिस्थितियों को देखते हुए -मुँह में रेत जाने से बचने के लिए मूॅछ न रखना , लगभग सभी पशुओं का मांस खाने की अनुमति देना आदि सही लगेगा । जैसे कृषि प्रधान भारत के लिए गोवध पर प्रतिबन्ध साधार है ।
मुहममद साहब को यह भी कहाँ पता रहा होगा कि उनकी मृत्यु के बाद इस्लाम लूट मार और युद्ध की प्रेरणा के कारण सारी दुनिया मे फैल जाएगा या कुरान पढने और पढवाने के लिए ही अरबी सीखी और सिखाई जाएगी । कुरान के आकर्षण का रहस्य अन्य धर्म ग्रन्थों की तरह उसका काव्यात्मक होना भी है । वह भी एक मध्य एशिया में जन्मा भक्ति पन्थ ही है । मार्क्सवादियो की तरह के कट्टर आदर्शवाद ने उनके अनुयायियों को भी असहिष्णु और हिंसक बना दिया । भटकाव का कारण लडाकू कौमों का उनकी मृत्यु के बाद इस्लाम में शामिल होना था ।
ऐसे ही ईसाई धर्म भी मनुष्य के ईश्वर यानी प्रकृति की दिव्य सत्ता की प्रेमपूर्ण सन्तान होंने की महत्वपूर्ण घोषणा ही है । इस तरह सभी धर्मो से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है । चेतावनी यह है कि उन्हें पूरी तरह सच मानकर जीना मूर्खतापूर्ण भी हो सकता है । इसीलिए प्राय सिर्फ अपने ही धर्म को पूरी तरह सच मानने वाले दंगाई और मूर्ख ही देखने में आते हैं ।

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

ईश्वर और धर्म

ईश्वर और धर्म सिर्फ आस्था और विश्वास का ही विषय न होकर  लंबे समय तक एक सम्पूर्ण जीवन-पद्धति के रूप में भी रहा है । एक सम्पूर्ण जीवन-पद्धति का विकल्प देने के कारण ही बौद्ध धर्म ईश्वर के सम्बंध में मौन धारण करते हुए भी एक धर्म माना गया । इसे सर्फ नास्तिक या आस्तिक कह जर निपटाया जाना संभव  नही है । ईश्वर और धर्म पर्यावरण निर्माता कार्यशील अवधारणा के रुप में रहे हैं । आज की कम्प्यूटर शब्दावली में  इन्हें सांस्कृतिक साफ्टवेयर की भुमिका में भी देखा जा सकता है । ऐसा सांस्कृतिक साफ्टवेयर जिसका विज्ञान युग की आधुनिक चेतना के  अनुरूप नवीनीकरण किया जन जरुरी है ।

तो निष्कर्ष यह रहा कि व्यक्तिपरक आध्यात्म,असामाजिक  तथा जातिवादी ईश्वर एवं धर्म का तंत्र  वर्तमान भारतीय समाज की प्रमुख सांस्कृतिक समस्या है ।

ईश्वर-चिंतन की अवधारणा के आधार का विमर्श

ईश्वर-चिंतन की अवधारणा के आधार का विमर्श       

   सामान्य रूप से नास्तिक और आस्तिक  या मुसलमान या काफिर जैसे दो विरोधी शब्दों तक सीमित समझे  जाने वाले   ईश्वर  पर चिंतन भी उतना आसान नहीं है; जितना की प्राय: समझा जाता है।   क्योंकि प्रकृति भी विज्ञान के नियमों के अधीन है ,इसलिए ईश्वर का होना और उसका विकास भी विज्ञान के नियमों के अधीन ही संभव है।  स्टीफन हाकिंग  की माने तो यह ब्रह्माण्ड ईश्वर की बिना किसी भूमिका और हस्तक्षेप के भी अस्तित्वमान है।  लेकिन असली समस्या विज्ञान के नियमों के अधीन ब्रह्माण्ड के अस्तित्वमान होने की नहीं बल्कि भौतिक-रासायनिक परमाणुओं की सत्ता वाले यानी  भौतिक जगत से  जीवन  के  अस्तित्वमान होने की है। यदि जड़ जगत से ही यह अंतहीन ब्रह्माण्ड बना होता और ऐसे ही गृह-नक्षत्र ा-तारे चमक रहे होते,सक्रिय ब्लैकहोल भी होते ता-गैस-गुबार चट्टानें ,अग्नि और तड़ित -भौतिक एवं रासायनिक नियमों के अधीन तो बहुत आश्चर्य की बात न होती।  क्योंकि जीवन की उत्पत्ति स्टीफ़न हाकिंग के विश्लेषण में शामिल नहीं था ,इसलिए  मेरा मानना है कि ईश्वर का होना और न होना भी हाकिंग के सत्य में शामिल नहीं था।  महत्वपूर्ण बात यह है कि जीवन को अपने विवेक और सामर्थ्य के अनुसार प्रकृति में आंशिक या फिर वैज्ञानिक संभावनानुसार सृजनात्मक हस्तक्षेप की जो शक्ति और स्वतंत्रता प्राप्त है -इस सृष्टि में भौतिक-रासायनिक सृजनात्मक हस्तक्षेपकारी चेतन-विवेकपूर्ण शक्ति कोई है भी कि नहीं ? यद्यपि विवेक का आरंभिक रूप तो जीवाणुओं और वायरसों से लेकर अलग-अलग इलेक्ट्रानो,प्रोटानों एवं न्युट्रानों की संख्या पर आधारित गुणधर्म के रूप में विभिन्न तत्वों के परमाणुओं तक में है  लेकिन संयोग पर आधारित होते हुए भी जीवन के सृजन और विकास में जो आतंरिक विवेकसम्मतता के दर्शन होते हैं वे जीवन के ईश्वरत्व के सैद्धांतिक आधार पैदा करते हैं।
         मैं जो कहना चाहता हूँ उसे मैं उसी तरह आपको समझाना चाहूंगा ,जिसप्रकार से मैंने समझा है।  भौतिक उपस्थिति की दृष्टि से पुरुष या स्त्री की देह एक अलग संरचनात्मक ईकाई के रूप में निर्मित है लेकिन एक प्रजाति के निर्माण के रूप में प्रकृति में उनके पूरक निर्माण की समझदारी दिखती है।  इसीप्रकार वनस्पति और जंतु जगत्सृष्टि भी आक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड  के उत्पादन की दृष्टि से स्त्री और पुरुष की तरह ही परस्पर पूरक उपस्थितियाँ हैं।   जंतुओं के अस्तित्व के लिए आवश्यक प्राणवायु आक्सीजन भी वनस्पति जगत का व्यर्थ उत्पाद है।  इसी तरह हमारा व्यर्थ उत्पाद कार्बन डाई आक्साइड  भी वनस्पति जगत के लिए अत्यंत उपयोगी है। माना कि यह दुनिया गुणधर्म और संयोग आधारित है लेकिन विकसित हुए हर जीवन में सृजनात्मक विवेक के दर्शन क्यों होते हैं ? आँखों से वंचित सारे अंधे फूल इतने सुंदर और सुगन्धित क्यों हैं ?  फूल के आकर्षक,रंगीन एवं  सुगन्धिपूर्ण  होने का आतंरिक विवेक दार्शनिक या धार्मिक न सही ,लेकिन एक सैद्धांतिक ईश्वर की तो मांग करता ही है।  ऐसा ही जिह्वा से रहित विविध स्वाद वाले पेड़ों के लिए भी कहा जा सकता है। वे किसी मूर्ख की तरह मीठे और खट्टे नहीं हुए हैं -इन सभी के मीठे-खट्टे ,सुन्दर और सुगन्धित होने के विशेष प्रयोजन साफ-साफ देखे जा सकते हैं और वे  सभी अपनी सोद्देश्य निर्मित में सफल हैं।  लेकिन प्रकृति में मिलाने वाला यह आतंरिक विवेक एक सैद्धांतिक ईश्वर की अवधारणा को ही जन्म दे सकता है।  भारतीय दर्शन का ब्रह्म एक  ऐसी ही सैद्धांतिक अवधारणा वाला ईश्वर है। वह हजार आँखों और कानो वाला सर्वव्यापी तो है लेकिन वह इस अर्थ में असंभव कल्पना है कि वह जीवन की प्रकृति और निर्मिति के अनुरूप नहीं है।  हम सभी जानते हैं कि बिना चेतना के ईश्वर की कल्पना भी नहीं की जा सकती और चेतना के लिए एक बड़े और समर्थ,सक्षम मस्तिष्क की भी जरुरत होगी  और वह भी समय-सीमाओं और बंधनों से मुक्त  यानी सर्वकालिक मस्तिष्क की।  सर्वकालिक होने के लिए इसे सूक्ष्म भी  होना होगा।  क्या वायरसों के भी पार यानी सूक्ष्मतम विशुद्ध जैविक विद्युत् रूप में यानी पूर्णतः अदृश्य कोई जीवन-प्रकार वास्तव में संभव है ?  यदि भौतिक स्नायुतंत्र न भी हो तो भी जीवनों में मिलने वाली मस्तिष्कीय चेतना की तरह  बिना भौतिक आधार के कोई मस्तिष्कीय सचेतन अस्तित्व संभव है ?  जैसाकि बहुत से धर्मों और संस्कृतियों में भूत-प्रेत एवं सूक्ष्म आत्माओं के रूप में ,रूहानी अस्तित्व या ताकत के रूप में ईश्वर या अल्लाह की परिकल्पना की जाती है।
        भारतीय संस्कृति में एक और मिथकीय पौराणिक कल्पना मिलती है-यह दुनिया शेषनाग ;के फ़न पर टिकी हुई है। यह तुलना अत्यंत रोचक होगी कि भारतीय पौराणिक नायक शेषनाग भी उसी प्रजाति के हैं , जिस प्रजाति के पश्चिमी धर्मों के मिथकीय खलनायक इबलीस या शैतान  ! सांप रहस्यमय तो हैं ,ठंढे रक्त वाले होने के कारण भोजन भी कम एवं लम्बे समय के बाद करते हैं , साँपों में जैवविविधता भी बहुत पायी जाती है।  कुछ वर्षों पहले बोल्विया केकी खदानों में एक पचास मीटर लम्बे डायनासोर युग के महासर्प का फॉसिल मिलाने की खबर अख़बारों में पढ़ी थी।  क्या प्रारम्भिक पूर्वजों को भी किसी ऐसे फॉसिल के दर्शन हुए थे ? जैसे किसी डायनासोर के फॉसिल ही चीनी ड्रैगन के अस्तित्व में होने के आधार बने होंगे। अगर कोई ऐसा  अस्तित्व होगा तो भोजन-श्रंखला में  भी होगा ताकि वह अधिक समय तक मृत्यु-क्षरण से मुक्त रहे।  ऐसी मिलती-जुलती कल्पनाएं बलि-प्रथा वाले सभी कबीलाई धर्म करते  देखे जाते हैं।  इसलिए हमें निश्चिन्त होकर मार्क्सवाद,विज्ञान और लोककल्याणकारी राज्य की और आगे के चिंतन के लिए लौटना चाहिए।  क्योंकि उपलब्ध विज्ञान में यह सामर्थ्य है कि आधुनिक लोककल्याणकारी सत्ता यदि संवेदनशील हो तो वह अपने नागरिकों का पुराने समय के ईश्वर से बेहतर देखभाल कर सकती है।  यदि मानव-सभ्यता और व्यवस्थित तथा परिष्कृत हो जाती है तो
ईश्वर की सैद्धांतिक जरुरत जब पड़ सकती है वह निहारिकाओं के लड़-भिड़ जाने या फिर प्रलय के बाद फिर नए सिरे से नयी जीवन-सृष्टि बनाते समय होगी।  वह भी तब जब ब्रह्माण्ड में विगत जीवन-सृष्टि की कोई भी स्मृति नहीं बची होगी किसी बीज की तरह।  अदि कोई जैविक-विद्युतीय बीज जैसी स्मृति होगी तो शायद परमाणुओं के नवसंलयन काल में   एक बार फिर नए जीवन की सृष्टि शायद आसान हो जाए अन्यथा उस आगामी सृष्टि को एक बार जीवन की खोज में दिशाहीन संयोगों की और भटकना होगा। 

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

केदार नाथ सिंह की काव्य-यात्रा

                            रामप्रकाश कुशवाहा 
केदारनाथ नाथ सिंह विशुद्ध रूप से नेहरु युगीन हिन्दी कविता के उल्लास, उत्थान,गुणवत्ता  एवं बहुआयामी समृद्धि के कवि हैं । वे सार्थक एवं समानान्तर उपस्थिति के कवि हैं । नकारात्मक मनोवेगों और असामाजिक यथार्थ के प्रति एक संकल्पित किस्म की प्रतिरोधी चुप्पी भी उनके काव्यलोक की प्रकृति और स्वभाव रचती है । 'उत्तर-कबीर और अन्य कविताएं 'संग्रह मे संकलित 'लेखकों की समस्या पर सरकारी प्रतिनिधि का बयान ' कविता का सन्दर्भ दें तो  वे भलीभांति जानते थे कि हिन्दी कविता का पाठक वर्षों से फरार है । इस गुमशुदा पाठक की वापसी के लिए वे रचनात्मक चुनौती स्वीकार करने वाले कवि हैं  । उन्होने मुक्तिबोध और धूमिल की तरह आन्दोलनधर्मी और आवेशधर्मी कविताओं का रास्ता नहीं चुना   संगठनों और उनकी शर्तों को भी स्वीकार नहीं किया  । अधिक संभव यही है कि वे आश्वस्त रहे होंगे । प्रथम द्रष्टया मनोरम प्रतीत होने पर भी उनकी कविताओं का जल्दबाजी भरा पूर्ण सम्प्रेषणीय या अवगाहन वाला पाठ सम्भव नहीं  है   कुछ कविताओं को छोडकर वे लक्षणा और व्यंजना से नीचे आते ही नहीं  । यद्यपि उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय पंक्तियाँ अभिधा मे लिखी कविताओं की ही हैं  उदाहरण के लिए उनके 'जमीन पक रही है ' संकलन की 'फ़र्क नहीं पड़ता ' और 'हाथ' कविता को याद किया जा सकता हो -'पर सच तो यह है कि यहाँ/या कहीं  भी फ़र्क नहीं पड़ता/तुमने जहाँ लिखा है 'प्यार '/वहाॅ लिख दो 'सड़क '/ फ़र्क नहीं पड़ता/मेरे युग का मुहावरा है/फ़र्क नहीं पड़ता '(पृष्ठ 48) तथा 'उसका हाथ/अपने हाथ मे लेते हुए मैने सोचा/दुनिया को/हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए ।'(पृष्ठ 79) इसके साथ उनकी 'जाना कविता को भी याद किया जा सकता है-"मै जा रही हूँ-उसने कहा/जाओ-मैने उत्तर दिया/यह जानते हुए कि जाना/हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है ।"(पृष्ठ 80) केदारनाथ सिंह ऐसी अनेक सूक्तियो के कवि हैं ।
      अपनी कलात्मक सौन्दर्यप्रियता के बावजूद केदारनाथ सिंह की कविताएं अपने कवि के बहुआयामी सरोकारों का पता देती हैं ।वे अनुभूति एवं विषय-वैविध्य के कवि हैं । उन्होने ने शैली के स्तर पर तो नहीं लेकिन विषय के स्तर पर हिन्दी कविता की एकरसता को तोड़ा है । उनकी कविताओं में व्यापक एवं बहुस्तरीय विमर्श सांकेतिक पूर्वदृष्टियों के रूप मे दर्ज हैं ।
           वस्तुतः केदारनाथ सिंह अचेतन और त्वरित (आशु)अभिव्यक्ति के कवि नहीं हैं, बल्कि दीर्घकालिक सचेतन चिन्तन के बाद की गई कलात्मक अभिव्यक्ति के कवि हैं  । उनकी अधिकांश कविताएं जीवन के किसी प्रसंगवृत्त मे जन्म लेती हैं  अपने पूरे परिवेश, आस्था और जिज्ञासा के साथ रचनाये होता है उनका कवि । प्रायः प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के साथ उनके कवि को ठिठके हुआ देखा जा सकता है  । अपने अतीत के सार्थक और अविस्मरणीय को भी अपनी कविताओं में वे प्रायः विरल उपस्थितियों एवं संश्लिष्ट बोध के साथ दर्ज करते चलते हैं  ।
         केदारनाथ सिंह तीसरा सप्तक के कवि हैं । अज्ञेय द्वारा 1966 मे प्रकाशित तीसरा सप्तक के कवियों मे सम्मिलित किए जाने से पहले केदारनाथ सिंह का पहला काव्य-संग्रह ' अभी, बिल्कुल अभी' (1960) प्रकाशित हो चुका था । इसलिए उनके कवि की निर्मित  को समझने के लिए यह संकलन महत्वपूर्ण है ।
तीसरा सप्तक की अनागत, नए पर्व के प्रति, कमरे का दानव,दीपदान,दिग्विजय का अश्व, बादल ओ ! तथा 'निराकार की पुकार ' आदि कविताएं उनके पहले काव्य-संग्रह 'अभी बिल्कुल अभी ' में भी है । इन कविताओं के अध्ययन से पता चलता है कि आम धारणा से अलग केदारनाथ सिंह मात्र बिम्बों के कवि नहीं हैं । यदि यह कहा जाय कि अपनी प्रारम्भिक यात्रा मे उनका महत्वाकांक्षी और युवा कवि अपनी कविताओं के शिल्प और स्वरूप को लेकर उनका किया गया आत्मसंघर्ष अपने समय तक हिन्दी-कविता के समस्त प्रयोगों और ध्रुवान्तों को लेकर किया गया है । उनका काव्य सौष्ठव और कविताओं में मिलने वाली मितभाषिता अज्ञेय को आदर्श बनाने की सूचना देती है तो उनकी कविताओं की आत्मा मे लोक के प्रति प्रेम, सम्मान तथा उसके जिए गए क्षणों की स्मृतियाँ और आख्यान छिपे हैं ।
       केदारनाथ नाथ सिंह की कई कविताएं अज्ञेय की काव्य-भाषा की याद दिलाती हैं ।फ़र्क बस इतना ही है कि अज्ञेय की कविताओं का पारगमन ।'आंगन के पार द्वारा और ' देहरी को बाहर से घर के भीतर देखने की है तो केदारनाथ सिंह आंगन के भीतर से आंगन के पार द्वारे स्थित लोक के द्रष्टा हैं  ।
       कहने का तात्पर्य यह है कि कवि केदारनाथ सिंह की लोकोन्मुखता ही उन्हें दूसरा अज्ञेय बन जाने से रोकती है । संवेदना और कथ्य के धरातल पर केदारनाथ सिंह लोक के यायावर कवि हैं । वे लोकजीवी आस्वाद धर्मिता के कवि हैं । अज्ञेय के सागर-मुद्रा शब्द से उधार लेते हुए कहें तो कवि केदारनाथ सिंह लोकमुद्रा के कवि हैं  लेकिन अज्ञेय से अचेतन प्रतिस्पर्धा और होड़ उन्हे आभिजात्यवर्गीय काव्यभाषा से जोड़े भी रहता है ।
        'जो रोज दिखते हैं सड़क पर ' कविता जीवन के सामान्य अनुभव और दिनचर्या को भी एक  महत्वपूर्ण घटना के रूप मे देखे जाने का विनम्र आग्रह करती है- 
' कौन हैं ये लोग/जिनसे दूर-दूर तक/मेरा कोई रिश्ता नहीं/पर जिनके बिना/पृथ्वी पर हो जाऊंगाॅधी सबसे दरिद्र (उत्तर कबीर पृष्ठ 95)
आन्तरिक विस्थापन की स्मृतियाँ, संवेदनात्मक रिश्तों की पडताल एवं उनका विमर्शात्मक प्रत्यक्षीकरण केदारनाथ सिंह की अधिकांश रचनाओं का केन्द्रीय रचना-सूत्र है ।
    उनकी लोरी कविता के पाठ मे उनके कवि की रचना-प्रक्रिया का रहस्य खुलता है ।वे एक मूड,एक प्रसंग, एक संवेदनात्मक काव्य-वस्तु उठाते हैं और यथार्थ के ऊपर प्रत्याशित संभावनाओ के कल्पना-सृजित चकाचौंध से या धुन्ध मे छिपा देते हैं । प्रायः वे अनुभवों और विचार की श्रंखला प्रस्तुत करते हुए अपने पाठकों को काव्यात्मक साक्षात्कार के एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं जिसे पर्यटन या भ्रमण न कहकर टहलना  कहना अधिक उचित होगा ।
         कवि केदारनाथ नाथ सिंह के यहाँ यथार्थ उनकी विशिष्ट रचना-प्रक्रिया और प्रविधि से रूपान्तरित होकर कविता मे उपस्थित होता है । उदाहरण के लिए ' लेखकों की समस्या पर सरकारी प्रतिनिधि का बयान शीर्षक कविता  को ही लें ध्यानाकर्षण और व्यंग्य होते हुए  भी यह कविता कवि की विशिष्ट कथन-भंगिमा यानि अन्दाज़ का पूरी तरह निर्वाह करती है ।
       उनकी 'बॅटवारा' और 'हस्ताक्षर ' जैसी कविताएं उनके स्वयं के कवि को समझने का प्रयास करती हैं । ' हस्ताक्षर ' मे कवि कहता है कि 'बालू पर हवा के/असंख्य हस्ताक्षर थे/और उन्हें  देखकर हैरान था मै/कि मेरा हस्ताक्षर/ हवा के हस्ताक्षर से/कितना मिलता है !' बंटवारा कविता मे  वे अपने भीतर के सामान्य मनुष्य और संवेदनशील आत्म वाले स्रष्टा कवि को सहोदर घोषित करते हैं ।
        कि गूँजहीन शब्दों के इस घने अन्धकार में /मैं-/ अर्थ-परिवर्तन की /एक अबूझ प्रक्रिया हूँ "........जड़ें रोशनी में हैं /रोशनी गंध में ,/गंध विचारों में /विचार स्मृतियों में /स्मृतियाँ रंगों में "- अभी,बिलकुल अभी "संकलन की पहली ही कविता के पीछे एक सुचिंतित और गंभीर भाषा-विमर्श और ज्ञान उपस्थित है . दरअसल वास्तविकता यह है कि केदारनाथ सिंह की कविताएँ अनेक विषयों और अनुभूतियों पर संवेदनात्मक विमर्श से बनी हैं . वे घटित-संवेदित होने के क्षण-विशेष के गतिशील चित्र हैं .मनोविज्ञान की शब्दावली में इन्हें प्रत्यक्षीकरण का प्रयास और काव्यालोचना में काव्य-बिम्ब की सर्जना का प्रयास कहा जा सकता है .बाल-सुलभ एवं रहस्यात्मक उत्प्रेक्षण कवि केदारनाथ सिंह की सर्वाधिक प्रिय रचना-पद्धति है . वे घटनाविहीन समय में घटनाओं की आशंका और संभावना के चितेरे कवि हैं . 
           केदारनाथ सिंह कि कविताओं के प्रकाशंन क्रम को देखें तो १९६० में प्रकाशित "अभी,बिल्कुल अभी और अज्ञेय द्वारा सम्पादित "तीसरा सप्तक" के बाद ,"जमीन पक रही है "(१९८०)"अकाल में सारस (१९८८),"उत्तर-कबीर और अन्य कविताएँ "(१९९५),"बाघ"(१९९६),तालस्ताय और साईकिल "(२००५)'"सृष्टि पर पहरा "२०१४)और "मतदान केंद्र पर झपकी "(२०१८) का क्रम बनता है। इन कविताओं में बहुत-सी कविताएँ ऐसी हैं जो सिर्फ कवि-कर्म से सम्बंधित हैं  या यह कह सकते हैं कि उनकी काव्य-दृष्टि का आख्यान हैं। इसके अतिरिक्त "मेरे समय के शब्द (१९९३ ) और कब्रिस्तान में पंचायत "(२००३)  उनकी उच्चस्तरीय आलोचकीय क्षमता की परिचायक गद्य यानि विचार कृतियाँ हैं।  आधुनिक हिंदी कविता में बिम्ब-विधान " जो उनके  शोध-प्रबंध के रूप में लिखा गया था तथा "कल्पना और छायावाद "भी इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि ये उनकी काव्य-दृष्टि को आधारभूत संस्कार देते हैं। 
           केदारनाथ सिंह का आरंभिक कवि अभिव्यक्ति की नवीनता और मौलिकता का अन्वेषी है। तीसरा सप्तक की  " वसंत गीत "कविता में कवि अपने सृजन की संभावनाओं की  घोषणा करता है -
          " यह कैसा उल्लास ,/ यह कैसी हाथों में सिर्जन की बेचैनी ,/टूटन-टूटन में रचने कि नयी-नयी-सी प्यास ,"( पृष्ठ १३२ ) "शारद प्रात " और "कुहरा उठा " कविता में वह नई बिम्ब-सर्जना करने वाली प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। "दूर-दूर से-/हलके-हलके धनों के रुमाल हिलाये /बांसों में सीटियाँ बजाए /गलियारों में हाँक लगाए "(पृष्ठ १३६ ). "कुहरा उठा " कविता की निम्न पंक्तियाँ  अभिव्यक्ति कि नवीनता का प्रतिमान प्रस्तुत कराती हैं -"उठे पेड़,घर-दरवाजे,कुआं /खुलती भूलों का रंग गहरा उठा /शाखों पर जमे धुप के फाहे,/गिरते पत्तों से पल ऊब गए  हाँक दी खुलेपन ने फिर मुझको /दहरों के डाक कहीं डूब गए "(तीसरा सप्तक ,पृष्ठ १३७)तीसरा सप्तक में ही प्रकाशित अपनी 'नयी ईंट ' कविता में  कवि में  भावी  सर्जना की श्रेष्ठता का आत्मविश्वास देखा जा सकता है-"नयी ईंट रक्खूँगा /नए चाँद जोडूंगा ,/नया घर उठाऊंगा ,/नयी किरण रंग दूंगा ," लेकिन इसके साथ ही कवि परंपरा की पुनरावृत्ति के खतरे को लेकर भी चिंतित है -"पर इससे क्या होगा !जबकि साँझ उतारेगी,/कुहरा छितराएगा /उसी गड़ेरे की वंशी में फिर गाऊंगा !"(तीसरा सप्तक १४१)    "दीपदान" . कविता में  रवीन्द्रनाथ और छायावादी कवियों की भावभूमि को लोकदृष्टि का दार्शनिक आयाम तथ अज्ञेय कि सुगठित काव्यभाषा को लोकजीवन का संस्पर्श सौंपता है- "
             "एक दिया वहां जहाँ नयी-नयी दूबों नें कल्ले फोड़े हैं /एक दिया वहां जहाँ उस नन्हें गेंदे नें /अभी-अभी पहली ही पंखुड़ी बस खोली है ,एक दिया उस लौकी के नीचे /जिसकी हर लतर तुम्हें छूने को आकुल है। " दिग्विजयी का अश्व" और "निराकार की पुकार " दोनों ही कविताओं में काव्य-सिद्ध कवि का भावी प्रसिद्धि का आत्मविश्वास देखा जा सकता है -"एक नन्हा बीज मैं अज्ञात नवयुग का ,/आह कितना कुछ -सभी कुछ-न जाने क्या-क्या -समूचा विश्व होना चाहता हूँ !/भोर से पहले तुम्हारे द्वार -/तुम मुझे देखो न देखो -/कल उगूंगा मै !"(निराकार कि पुकार ,ती.स। १४९) इसके पहले दिग्विजय का अश्व में भी कवि कह चुकता है कि "तुम बराबर कहीं अगले मोड़ पर हो ,/और मैं चिल्ला रहा हूँ /आ रहा हूँ !आ रहा हूँ !/तुम जहाँ तक हो ,वहां तक /हाथ ये फैला रहा हूँ /आह ठहरो दिग्विजय के अश्व !"(पृष्ठ १४६)

जारी 

रामप्रकाश कुशवाहा

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

विचारशीलता और विचारधारा

विचारशीलता और  विचारधारा 


 मेरी दृष्टि में समय,सूचना और सभ्यता के विकास के सापेक्ष होने के कारण कोई भी विचार या विचारधारा पूर्णता को प्राप्त रुप में स्थिर हो ही नहीं सकती । इसी कारण मेरे लिए विचारशीलता, विचार करने की शक्ति और उसका कौशल मानव सभ्यता के विकास की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है । यह विचारधाराओं के पिछले इतिहास और अनुभव से प्राप्त सीख है और यदि वादी होना बहुत जरुरी हो तो मैं संभावना और विचारवादी ही होना चाहूँगा । वैसे भी मैं दर्शन की पृष्ठभूमि से नहीं बल्कि मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि से आया हूँ । मेरे लिये तथ्यों की प्रतीक्षा और उचित सम्मान के बावजूद निष्कर्ष (अन्तिम) अधिक मायने नहीं रखते बल्कि सोचना ही अधिक महत्वपूर्ण है । मुझे बहुवैकल्पिक सृजनधर्मी होने से अनेकांतवाद प्रिय है । मैं सिर्फ समझदार बनने- बनाने के लिये ही लिखना और सोचना पसंद करता हूं । शिक्षक एव्ं विज्ञान की पृष्ठभूमि से आने के कारण हानि और लाभ तथा गुण और दोष दोनो पर समान ध्यान देता हुँ। क्योंकि हर नयी सूचना ही हमारे-आपके निष्कर्ष बदल सकती है-इसके लिये मैं तैयार रहता हुँ । अधिकांश लोग उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर ही जल्दी से जल्दी इसलिये निष्कर्ष पाना चाहते हैं क्योंकि वे विचार की थकाने वाली मानसिक प्रक्रिया से जल्दी से जल्दी बाहर निकलकर आराम पाना या सुखी होना चाहते हैं । इसे मैं आलस्य,आराम पाने की जड़ता के रुप में देखता हूँ । यही जड़ता यथास्थिति और रुढ़िवाद को जन्म देती है ।

क्योंकि अधिकांश संगठन और उनके नेतृत्व की पद्धति और तंंत्र आदिम हैं और वे समावेशी वैचारिकता का सम्मान करते नहीं दिखते इसीलिए मैं अभी तक उपलब्ध राजनीतिक दलों की शक की नजर से देखने के लिये विवश हुँ । मैं अभी भी किसी आदर्श-आगामी की तलाश और प्रतीक्षा में हुँ और आपको मेरी प्रतिबद्धता को लेकर अनावश्यक शिकयतपूर्ण नहीं होना चाहिए ।
यद्यपि विचारधाराओं की प्रगतिशील और स्वस्थ परम्परा का पुनर्शोधंन करते रहने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन संशय एव्ं द्वंद्व की स्थिति में वैज्ञानिक आधुनिकता को ही निर्णायक होना चाहिए । उसमें भटकाव का जोखिम हो तब भी क्योंकि भविष्य के लिये भी सही होने की परीक्षा उसकी ही की जानी है ।
जहाँ तक साहित्य का प्रश्न है कला होने के साथ वह भी लोकशिक्षा का एक सशक्त माध्यम भी है । उसका उद्देश्य सिर्फ पूर्वनिर्धारित ज्ञान देने तक ही सीमित कभी नहीं हो सकता । यदि वह ज्ञान की खोज के लिये उचित-अनुचित की परख, आवश्यक प्रशिक्षण और सामर्थ्य भी नही देता ।

शनिवार, 11 जुलाई 2020

अंतरिक्ष की सीमा

मुझे लगता है कि ठोस धरती के प्राथमिक अनुभव के कारण हम शून्य की कल्पना करने में अक्षम हैं । सिर्फ़ उपग्रह,ग्रह,नक्षत्र,आकाश गंगा और ब्लैक होल आदि तक ही यूनिवर्स की परिकल्पना नहीं करनी चाहिए । उस रिक्तता को भी एक सच मानना चाहिए जिसमे से होकर प्रकाश की किरनें,गुरुत्वाकर्षण एव्ं विद्युत चुंबकीय तरंगे गुजरती हैं । प्रकाश की तरंगें तो वास्तव में यात्रा करती हैं क़1 वे ध्वनि तरंगों की तरह समय न लेतीं । विद्युत चुंबकीय तरंगे जिस प्रकार आवेश रुप में गति करती हैं वह अपनी प्रकृति में प्रकाश के सूक्ष्म कण फोटान के समान नहीं होती बल्कि एक माध्यम (ईथर)में आवेश के प्रभाव के समान होती है । इससे पता चलता है कि ब्रह्माण्ड में कोई सर्वव्यापी ऊर्जा तत्व सूक्ष्म रूप में होना चाहिए । अभी तक की जो युनिवर्स की परिकल्पना है उसमें असंख्य आकाशगंगाओं के समूह को परस्पर आकर्षण से बन्धे गोलाकार रुप में प्रदर्शित किया जाता है । यह समूह भी यदि अंतरिक्ष में बना हूआ है तो उसकी स्थिरता,संतुलन और व्यवस्था का भी कोई प्रतिबल या आधार चाहिए । सम्भव तो यह भी है कि एक ब्रह्माण्ड के समानान्तर दूसरा ब्रह्माण्ड भी हो । ऐसा मुझे इस लिये सम्भव लगता है कि सीमांत की खोज हमारे ऐंद्रिक अनुभवों सीमाओं के अनुभवों की उपज है । जबकि समस्या मनोवैज्ञानिक ही हो सकती है कि ठोस धरती के अनुभवों के कारण हम शून्य और रिक्ति के विस्तार की सही-सही कल्पना कर पाने में अक्षम हैं ।

रविवार, 7 जून 2020

यान्त्रिक भौतिकवाद


मार्क्स के जमाने का भौतिकवाद यान्त्रिक भौतिकवाद किस्म का था । यह यन्त्रों के आविष्कार से इतना अधिक अभिभूत था कि उसके लिए मनुष्य भी एक यन्त्र हो गया । तब आर एन ए और डी एन ए की खोज नहीं हुई थी कि जड़ और जीवन के अणुओं की रिश्तेदारी सामने आ पाती । जड़ परमाणु को ऊर्जा के रूप मे देखने और दिखाने वाली आइन्सटीन की आंख भी तब नहीं थी । इससे हत्यारे किस्म के भौतिकवादी और क्रान्तिकारी भी पैदा हुए,जिनके लिए मनुष्य को मारना एक अवांछित यन्त्र को बन्द करने जैसा था । विवेकानंद ,अरविन्दो घोष ,और टैगोर आदि का प्रकृति को जीवित मानने वाली भारतीय दृष्टि तत्कालीन विज्ञान के पिछड़ने के कारण आधुनिक और वैज्ञानिक नहीं समझी गयीं । यह एक दार्शनिक पूर्वाग्रह जैसी समस्या रही है ।

फुकुयामा

किसी देश काल परिस्थिति और परम्परा यानि मानवीय चिन्तन सरणि जिसे प्रायः स्कूल कहा जाता है -की उपज विचारधाराएं और उनके विचारक किसी मानव निर्मित चक्रव्यूह की तरह होते हैं । उनके वास्तविक स्वरूप को उचित दूरी से ही समझा जा सकता है । किसी विचारक को समझने के लिए उसकी नाभि यानी निर्मित के कारकों एवं कारणों की खोज करनी होगी । फुकुयामा की वैचारिक निर्मिति को समझने के लिए पहले अमेरिका को समझना होगा । इतिहास का अन्त तो तभी हो जाता है जब रेड इंडियनो को मारकर और अपनी-अपनी राष्ट्रीयताओं को पीछे छोड़ने वाले पूर्वजों के प्रवास से निर्मित जिसके प्रवास मे पूरा योरोप और अफ्रीका महाद्वीप समाहित है । जार्ज वाशिंगटन से लेकर अब्राहम लिंकन के पहले तक पागलपन की हद तक अपनी श्रेष्ठता एवं अतीत को जीने का संघर्ष । यहाँ अमेरिका के सामने एक रास्ता भारत बनने यानि जाति एवं नस्ल को बनाए रखने का था । यदि भारतीय अधिक मात्रा मे बस गए होते तो अमेरिका दूसरा भारत ही बन जाता लेकिन आधुनिकता ने उसे भारतीय जाति प्रथा की ओर जाने नहीं दिया । उसने जातियों नस्लों के महासंलयन और अतीत की विस्मृति का रास्ता चुना । फुकुयामा का इतिहास का अन्त इसी ऐतिहासिक अचेतन का दार्शनिकीकरण मात्र है । फुकुयामा जिस अमेरिकी उदार पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को आदर्श मानकर उस पर रीझते है, उस अमेरिका के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि यही थी ।
एक सीमा तक इसी स्मृति और विस्मृति का द्वन्द्व आप मॉरीशस मे भी देख सकते हैं । ऐसे ही प्रवृत्यात्मक अतीत ने नायपॉल को भी रूढिबद्ध एशियाई सभ्यताओं को समझने की सही-सही दृष्टि दी । जैसा मैने बताया कि योरोपीय एकल राष्ट्रवादी इतिहास या विरासत बहुराष्ट्रीयताओं के सम्मिलन से निर्मित अमेरिका के नए राष्ट्र और नयी राष्ट्रीयता के लिए पूरी तरह अर्थहीन और अप्रासंगिक हो चुके थे । अमेरिकी इतिहास के अपने इस पर्यवेक्षण को ही मै फुकुयामा को समझने की कुंजी मानता हूँ ।
अमेरिका जब-जब भी योरोपीय नस्लीय राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेगा उसे आधुनिकतावादी समाधान की अपनी ही ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि से संघर्ष करना पडेगा और अपनी निर्मिति के स्वभाव को भूलकर प्रतिगामी बनेगा ।



माता सीता का भूमि-प्रवेश प्रसंग

माता सीता का भूमि-प्रवेश प्रसंग
-----------------------------------------
जब वाल्मीकि रामायण मे सीता जी के भूमि मे समाने और राम जी के विलाप का मार्मिक प्रसंग मैने पढ़ा था तो एक तो बहुत दुखी हुआ था । दूसरा यह कि तब मै विज्ञान का विद्यार्थी था और जैसे-जैसे मै इस दुनिया को समझता गया सीता का जन्म और उनकी मृत्यु दोनों ही मुझे प्राकृतिक नियमों के विरूद्ध, अवास्तविक कवि-कल्पना अथवा भरत के नाट्यशास्त्र से प्रेरित कोई नाटकीय प्रस्तुति लगने लगी। एक कारण यह भी था कि प्रजा को संतुष्ट करने एवं बहुत सी मानवीय बातें जो शासक वर्ग के महिमामंडन के विरुद्ध जाती थीं उसे नाट्यशास्त्र द्वारा आच्छादित कर छिपाने की भी प्रथा थी ।। जैसे नियोग प्रथा का कूटआच्छादन यज्ञ के अन्त में दिव्य फल देने वाले देवता के रूप मे किया गया । भारत मे तो प्राचीन काल से ही नट जाति रही है । ये नट आज के बहुरुपियों और जासूसों की मिली -जुली भूमिका में अपने राजा के प्रति वफादार होते थे । बताते हैं कि लगभग एक हजार वर्षों पहले राज कर चुके दक्षिण भारत के रामराजा के दरबारी नटों के वंशज आज भी हैं ।देवताओं द्वारा पुष्प वर्षा के प्रसंग को परम्परागत श्रद्धालु सच जबकि आधुनिक सोच वाले कवि-कल्पना मान लेंगे । जबकि सच दोनो मे ही नहीं था । राजाओं को दैवी आशीर्वाद के माध्यम से वैधता दिलाने के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी से राजकुल के प्रति वफादार नट ही भांति-भांति के रूप-स्वांग धारण कर राजा की आदेशित-सुनियोजित छवि जनता में गढते थे । बाद के कवियों द्वारा उन्ही लोक-स्मृतियों का आख्यान मे उपयोग करने के कारण चर्चित ऋषियों और देवताओं का देश-काल से परे बार-बार उपस्थित होना वर्णित है । कुछ ऋषियों के स्थायी आश्रम एवं पीठ भी थे जैसाकि अब भी देखा जा सकता है कि आदि शंकराचार्य दारा स्थापित पीठ का मुख्य उत्तराधिकारी भी शंकराचार्य ही कहा जाता है । उदाहरण के लिए परशुराम राम कथा में भी हैं और कृष्ण कथा यानी महाभारत में भी कर्ण को धनुर्विद्या सिखाने वाले गुरू के रूप में हैं ।अशिक्षित प्रजा को सिर्फ यही बताया जाता था कि ऋषि हिमालय से आए थे और आशीर्वाद देकर वापस वहीं चले गए ।
सच तो यह है कि भारत मे हमेशा से दो सच रहा है । प्रजा का सच अलग रहा है और राजा का सच अलग । राजघरानों की अपनी पेशेवर वंशानुगत युक्तियाँ और चाालाकियाॅ थीं । सीता का भी भूमि मे समाने का प्रसंग भी सिर्फ इतना ही संकेत करता है कि या तो किसी सुरंग के रास्ते नाटकीय ढंग से भगाकर सीता को राजा जनक के यहाँ गोपनीय ढंग से पहुँचा दिया गया होगा या इससे मिलता-जुलता ही कुछ हुआ होगा । आख़िर भूमि से नाटकीय ढंग से सीता को प्राप्त करने वाला मिथिला का राजघराना अपनी सीता का कितना अपमान बर्दाश्त करता ? और कब तक ?
मैने इस प्रसंग को सावधानी से पढा था तो एक बात मुझे खटकी थी । सीता के भूमि मे समाने के बाद भी वहाँ सोने का वह सिंहासन रह गया था जिस पर आरूढ़ होकर सीता को ले जाने के लिए आयी धरती माॅ प्रकट हुई थीं । आप जानते हैं कि सोने का सिंहासन मानव निर्मित हुआ करता है । सोना ही मनुष्य की खोज है और सिंहासन भी प्राकृतिक अवस्था में नहीं मिलता । स्पष्ट है कि यदि घटना वास्तव मे घटित हुई थी तो वह कूटरचित ही हो सकती है । सिंहासन इस लिए धरती माता बनी नटी द्वारा छोड दिया होगा कि अभिभूत लोगों के सच जानने से पहले सुरंग के रास्ते उसे वहां पहुँचाना तो संभव था लेकिन सीता सहित पात्रों को तेजी से वहां से गायब होने की आवश्यकता को देखते हुए सिंहासन को लेकर भागना संभव नहीं था । जैसे ही सीता जी भूमि मे समाई-ऐसा वर्णन है कि उनके नाम पर जयकारा लगाती हुई भीड ने फूलों से उस सिंहासन को ही ढक दिया ।
सीता के भूमि फटने पर उसमेँ समाने वाला अंश काल्पनिक होता तो सिंहासन सहित सीथा धरती में समा जातीं लेकिन वाल्मिकी जी ने उसके अकल्पनीय रूप से वास्तविक होने के दो प्रमाण छोडे हैं-पहला तो वही सिंहासन जिसपर सवार होकर धरती माता स्त्री रूप में प्रकट हुईं उसका वास्तविक पदार्थ से बना होने के कारण अदृश्य या लुप्त न होना । दूसरा प्रमाण उनकी यह विशेष टिप्पणी है कि सीता नाग लोक को चली गयीं । ऐसा निश्चय ही सुरंग का होना देखते हुए ही उन्होने लिखा होगा । उसके बाद प्रतिशोध एवं राम को तडपाने के लिए सीता का राम और लोक से छिपकर जीना भी सर्पवत व्यवहार उन्हे लगा होगा ।
लगता है राम को अपने साथ हुई इस मानव रचित कूटघटना का पता चल गया होगा । जिस तरह राम ने सरयू नदी में अपने अंतिम प्रवेश के समय हनुमान को वापस लौट जाने को कहा जिसके आधार पर उन्हे आज तक जीवित माना जाता है-उससे पता चलता है कि राम को ऐसी कूटघटना के संयोजन मे हनुमान का भी हाथ होने कि सन्देह अवश्य रहा होगा ।ऐसी योजना इसलिए भी संभव है कि हनुमान दक्षिण भारत के थे और उधर पर्वत को खोखला कर गुफा महल बनाने वाले कारीगर भी उपलब्ध थे । वैसी सूझ को उत्तर भारत मे भी प्रयोग करना उनके लिए सामान्य बात ही थी । विश्वसनीय सेवक के रूप में सिर्फ उन्हीं को हर जगह बेरोकटोक जाने का अधिकार भी प्राप्त था । राम आदर्शवादी प्रकृति के थे , वचन के पक्के और विश्वासी थे । उनके साथ कुछ तो गलत हुआ होंगा । शक की सूई हनुमान जी की संलिप्तता पर इसलिए भी जाती है कि वे जादूगर घराने से थे -वायुपुत्र उनको इसीलिए कहा जाता है ।
मेरे पास घटनाओं के सूक्ष्म निरीक्षण से उपजे और भी श्रृंखलाबद्ध तर्क हैं । जिन्हे कभी विस्तार से लिखूँगा । मेरा ऐसा लिखने का बुरा मानने वाले संभावित श्रद्धालु जरा विचार करके देखेंगे कि पूरे विश्व मे सर्वाधिक मिथ्या -कथन का रिकार्ड हमारे इसी प्रिय नायक के नाम क्यों है ? बचपन मे ही सूर्य को निगल जाना । जिस समय गंगा मे केवट की नावें चल रही थीं ,उसकी पूरी बिरादरी थी -उस समय लंका मे छलांग मारकर आसमान से होकर पहुँचना ,वह भी तब जबकि उनसे बहुत पहले समुद्र मंथन कर हमारे विष्णु लक्ष्मी को प्राप्त कर चुके थे । यानी विष्णु के समय से भारतीय समुद्र यात्रा करने लगे थे । हनुमान वेश बदलने में भी माहिर थे - पूॅछ रहित विप्र रूप से पूॅछ युक्त स्वरूप तक ।
कुछ तो है जो कि रामकथा के अन्त मे ,यदि वह वास्तव मे मनुष्यो के बीच घटित हुई है तो अविश्वसनीय और अवास्तविक है । जैसा दिखा या दिखाया गया है वैसा नहीँ है । असहज करने वाला है । उस स्तर की पीड़ा पहुँचाने वाला कोई कारण होना चाहिए जिसको सुनने के बाद राम को लगा होगा कि अब बस बहुत हो चुका -इस धरती पर जीने का कोई कारण नहीं बचा ।वह भी ऐसे राम जो अपने को मनुष्य मानते रहे हों। वाल्मीकि रामायण में जैसा वर्णन है उसके अनुसार सीता जी को धरती मे जाने के बाद वहाँ एकत्रित तमाशाई अयोध्यावासियों की भीड ने उस सिंहासन को ही पुष्प-मालाओ से ढक दिया ।
मै इस बिन्दु पर युवावस्था से आज तक ठहरा हुआ हूँ कि यदि दैवी था तो वह स्वर्ण-सिंहासन क्यों गायब नहीं हुआ । प्रकट हुई धरती माता और सीता जी के भूमि मे समा कर गायब होने के बाद ?
आप भी सोचकर देखिए । यही कथा जो हजारों वर्षों तक लोगों को अभिभूत रख सकती है । वही बुद्धिमान भी बना सकती है आपको गर्व होगा कि इतने हैरत-अंगेज कारनामें करने वाले चतुर और बुद्धिमान चरित्र विश्व के किसी धर्म और जाति के पुरा आख्यानों में नहीं देखे जाते ।
यद्यपि धरती की छाती फटने वाला बिम्ब तो उसके पुराने पाठ में ही है लेकिन वैसी किसी घटना का एक मानवीय और वैज्ञानिक पाठ भी होना चाहिए-नयी पीढी के लिए । जो होगा तो संभवतः ऐसा ही कुछ होगा ।




बुधवार, 6 मई 2020

हिन्दू धर्म

हिन्दू धर्म
पूरा हिन्दू समुदाय पुरोहित से यज्ञ या हवन कराने के पात्र और अपात्र जातियों में विभाजित है । शूद्र समझी जाने वाली अधिकांश जातियाँ न तो हवन कराने की पात्र समझी जाती हैं और न ही उनके यहाँ ब्राह्मण पुरोहित ही जाते हैं । अत्यंत लम्बा इतिहास होने और इस विभाजन को न समझ पाने के कारण ही ब्राह्मण संहिता कारों ने हवन या यज्ञ-संस्कृति मे शामिल न होने वाली जातियों को निचला वर्ण मानकर उनके लिये अपमानजनक व्यवस्था दी ।
दरअसल शूद्रों के निर्माण पर ब्राह्मणों के जातीय धर्म ग्रन्थ सीधे-सीधे तो चुप्पी लगाए हुए हैं लेकिन रामायण और शिवपुराण आदि में संभावित कारण छिपे हुए हैं । मेरा स्पष्ट मानना है कि यह अतीत के धार्मिक और साम्प्रदायिक विभाजन और संघर्ष का परिणाम है । रामकथा ऐसे बडे समुदाय के भारत में होने का पता देती है जो ब्राह्मण ऋषियों को यज्ञ नहीं करने देते थे । रामकथा इन्हें राक्षस कहती है और इन्हीं का नेता रावण को बताती है ।
रामकथा यह नहीं बताती हैं कि राक्षस यज्ञों का होने देना क्यों नहीं पसन्द करते थे ? उनके यज्ञ विरोध का कारण क्या था मैं इसके कारण को शिवपुराण में वर्णित उस घटना से जोड़ता हूँ जो यज्ञ-कुण्ड मे कूदकर सती के आत्मदाह से सम्बन्धित है । जिनकी जली हुई लाश को लेकर विक्षिप्त शिव के देश भ्रमण करने का भी वर्णन है । निश्चय ही इस घूमने ने शिव के अनुयायियों में यज्ञ के प्रति नकारात्मक भाव उत्पन्न किया होंगा । सती की मृत्यु पर जो शिव के गणों द्वारा आक्रमण हुआ उसमें भी भयानक दंगे और यज्ञ-विध्वंस की सूचना है । गुस्से मे दक्ष प्रजापति का वध होना भी वर्णित है । मेरे विचार से यहीं से भारतीय समाज यज्ञ और हवन आदि करने वाले और न करने वाले समाज में विभाजित होता है ।
आज भी किसी पर्व या प्रथा के किसी अशुभ घटना से जुड़ जाने पर उस पर्व को न मनाने का रिवाज मिलता है । यज्ञ कराने वाले सती के पिता दक्ष प्रजापति की हत्या के बाद शिव के अनुयायियों ने आस-पास के राजाओं को भी कुछ समय तक यज्ञ न करने दिया होंगा । यह सोच भी रही होगी कि मेरी रानी के कूदकर जल मरने से यज्ञ अभिशप्त हो चुका है । इसलिए आगे से यज्ञ बन्द हो जाना चाहिए ।
एक बात और ध्यान देने की है कि यज के लिए अग्नि चाहिए । पहली बार बिना किसी संसाधन के घर्षण द्वारा अग्नि उत्पन्न करना अत्यंत श्रमसाध्य होता है । जंगल या ज्वालामुखी क्षेत्र से ही पूर्वजों को अग्नि प्राकृतिक अवस्था मे मिली होगी । ग्रीष्म ऋतु में सूखी घास पर ऊंचे पहाड़ों से पत्थर आदि गिरने से उत्पन्न चिंगारियों से भी जंगलों में आग लगा करती थी । ऐसी प्राप्त अग्नि को नियन्त्रित विधि से थोड़ी-थोड़ी सूखी लकड़ियाॅ देकर जिलाए रखने की समझदारी जिन कबीलों मे आयी होगी वे फिर भून कर खाने का महत्व भी जान गए होंगे । अग्नि का जलना रात में प्रकाश और जंगली निशाचर पशुओं को दूर भगाने का भी माध्यम था । अपनी तरह ही अग्नि को भी जीवित सत्ता और उसे देवता का दर्जा देने की अवधारणा का भी विकास हुआ होगा । यह बहुत कुछ कुत्ते और गायों आदि पालतू पशुओं की तरह अग्नि को भी पालतू बनाने जैसी घटना रही होगी । यह भी कि बहुत सी शिकारी खानाबदोश घुमन्तू जातियों के पास अग्नि को पालतू बनाने का धैर्य नहीं भी रहा होगा । जिस तरह भारत आज भी एक जीवित ज्वालामुखीय क्षेत्र नहीं है,उसे देखते हुए लगता है कि अग्नि पालक एवं पूजक कबीलों के भारत में आगमन के साथ ही अग्नि पूजा वाली यज्ञ संस्कृति का प्रचार-प्रसार भारत मे हुआ ओल्ड टेस्टामेंट में लूत से सम्बन्धित प्रसंग में ज्वालामुखी विस्फोट का वर्णन है । कयामत की घटना का सम्बन्ध भी ऐसी ही किसी स्मृति से है । यह भी सच है कि आज की तुलना में प्राचीन काल में अधिक ज्वालामुखी सक्रिय रहे होंगे । वैज्ञानिकों द्वारा पाए गए हिमयुग में भी मनुष्य ऐसे ही किसी ज्वालामुखीय क्षेत्र में रहकर बचा होगा । वहीँ से किसी जलती हुई लकड़ी को उठाकर आग को मशाल की तरह दूर तक ले जाना भी सीखा होगा । अधिक संभावना है कि भारत मे आग जलाए रखने की व्यवस्थित प्रथा आर्यों के आगमन के साथ ही आयी ।
राम-रावण युद्ध मे रावण की पराजय और मृत्यु के पश्चात् यज्ञ संस्कृति का संगठित विरोध तो थम जाता है लेकिन उन कबीलों और जातियों मे जिनके पुरखे कभी शिव और रावण के पक्ष से रहे यज्ञ और हवन आदि न कराने की सांस्कृतिक आदतें बनी रही । यज और हवन कराने वाले पुरोहितों की सन्तानों को भी सिर्फ इतना ही पता रहा कि अमुक-अमुक जातियों के यहाँ हवन कराने नहीं जाना है । लम्बा समय बीत जाने के बाद इसी ने सांस्कृतिक अचेतन के रूप मे शूद्र घृणा और शूद्र ग्रन्थि का रूप ले लिया । बाद मे बौद्ध मत के अनुयायी मौौर्य वंश की समाप्ति के बाद शुंग वंश के शासनकाल मे बौद्धों को भी यज्ञ न कराने वाले शूद्रों मे शामिल करते हुए उन्हें चतुर्वर्ण संकल्पना मे सबसे निकले क्रम पर रखा गया । देखने की बात यह है कि यदि यह संकल्पना अधिक पुरानी रही होती तो नन्द वंश जो शूद्र था वह शासन ही कैसे कर पाता । उस समय तक कहीं न कही शूद्र सम्मानित ही रहे होंगे ।
इस तरह शूद्र जातियों के हवन संस्कृति मे शामिल न होने का खामियाजा ही उठाना पडा । ब्राह्मण शासकों ने उन्हे अपात्र घोषित कर दिया जबकि सच यह था कि पहले पुरोहितों ने नही बल्कि शूद्रों के पूर्वजों ने ही यज्ञ संस्कृति का बहिष्कार किया था ।
रामायण का सबसे बड़ा संरचनात्मक दोष यह है कि वाल्मीकि आश्रम मे सीता से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर लिखी गयी है । उसका पूरा विमर्श सीता के हरण और रावण के मृत्यु और सीता की मुक्ति तक सीमित हो जाता है ।। वाल्मीकि व्यास जी की तुलना में भावुक रचनाकार हैं । उनमें अपने समय के सामाजिक अन्तर्विरोधों को सही ढंग से समझने की व्यास वाली प्रतिभा नहीं है । रामकथा का विन्यास अपने समय की कूटनीतिक गतिविधियों को नेपथ्य मे छोड़ता जाता है । उसमे कथानायक राम के चरित्र की तथा अन्य चरित्रों की आन्तरिक समझदारी भी शामिल नहीं की गयी है । वह यह नहीं बताती कि राम को सीता के चरित्र पर क्यों संदेह है या जनक ने ही रावण को स्वयंवर से विरत रखने के लिए शिव का धनुष ही क्यों चुना । स्वयंवर के समय तक रावण राम के पिता दशरथ और जनक से भी बडा राजा था । कहीँ जनक को यह भय तो नहीं था कि शिव का धनुष न रखने पर सीता अपनी वरमाला कहीं रावण को ही नही पहना दे ! यह भी तो हो सकता है कि खर-दंषण के वध के कारण रावण राम से बदला लेना चाहता हो और उसने कैकयी के पिता या भाई से उनके भांजे भरत को अयोध्या का राज सिहासन सौपने के नाम पर कोई परस्पर दुरभिसन्धि और कूटरचना रची हो । इस योजना मे राम को मारने के लिए कैकेयी के द्वारा राम को वन-निर्वासन कराया गया हो । यह भी तो हो सकता है कि स्वयंवर मे अप्रत्यक्ष ढंग से अपमानित किए जाने के कारण प्रतिशोध स्वरूप तथा पद्मावत के अलाउद्दीन खिलजी की तरह सीता के सौन्दर्य से अभिभूत रावण विवाह के बाद भी सीता को अपना बनाने का पागलपन न छोड़ पाया हो । यह भी तो हो सकता है कि शूपर्णखा अपना प्रणय निवेदन लेकर नहीं बल्कि प्रेम मे घायल रावण का विरह निवेदन लेकर पंचवटी सीता के पास आयी हो । सीता का रावण के साथ जाना एक पूर्व नियोजित षडयंत्र का हिस्सा रहा हो । राम ने एक पति के रूप मे सीता के द्वन्द्व और विचलन को महसूस किया हो । रावण के साथ जाने मे सीता की भी आन्तरिक सहमति और संलिप्तता महसूस की हो । राम के बाद लक्ष्मण राम के संकटग्रस्त होने की आशंका के साथ ही भेजे जाते हैं । रावण के साधुवेश मे आने पर सीता उसकी आतिथ्य मे लगी चित्रित की गयी हैं । वे कहीं भी आशंकित और दुश्चितां ग्रस्त नहीं नितांत हुई हैं । लंका मे रावण की मृत्यु के बाद सीता को पाकर राम का यह कहना कि मुझे तुम्हारे चरित्र पर सन्देह है -एक स्त्री के पक्ष मे राम को खलनायक बना देता है । इस एकमात्र अभिव्यक्ति के बावजूद वाल्मीकि का रामायण सीता केन्द्रित पाठ ही प्रस्तुत करता है । उसमें अपने समय के सारे अन्तर्विरोध और राम के अन्तर्मन के सारे अन्तर्द्वन्द्व अनुपस्थित हैं ।
एक महाकाव्य के रूप में वाल्मीकि रामायण का रचना और अन्तिम परिमार्जित भाषाकाल राम के वास्तविक इतिहास काल यानी उपनिषद काल से निश्चय ही बहुत बाद का है । अन्यथा सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ का इतना स्मृति लोप न मिलता । परवर्ती होने के कारण इसका साहित्यिक पाठ उसके ऐतिहासिक पाठ के अनुरूप संगतिपूर्ण नहीं है । वर्तमान रामायण लम्बे समय तक आल्हा की तरंह गायी जाती रही । रामायण मे ही ऐसा प्रसंग है कि वाल्मीकि द्वारा लिखे जाने के बाद इसे लव और कुश द्वारा अयोध्या में गाकर सुनाया गया था । वाल्मीकि ने बहुत सी घटनाओं को सीता जी से पूछकर लिखा होंगा । क्योंकि उनके आश्रम मे हनुमान भी यदि जाते रहे होंगे तो उनसे भी सुनकर लिखा गया होगा । ऐसा मुझे इसलिए लगता है कि सबसे काल्पनिक और मनगढ़ंत मिश्रण हनुमान प्रसंग मे ही मिलता है । जैसाकि फादर क़ामिल बुल्के ने भी लिखा है कि वायुपुत्र हनुमान जादूगरी एवं बहुरुपियागिरी करने वाले परिवार से थे । हम सभी जानते हैं कि जादू कार्य-कारण सम्बन्ध को छिपाने के कारण ही दर्शकों को चमत्कृत करता है । इसे तथ्य छिपाने और झूठ बोलने की चतुराई के रूप में भी देखा जा सकता है । हनुमान जब पहली बार राम से मिलते हैं तो विप्र रूप मे मिलते हैं और अच्छी प्रशंसनीय परिष्कृत भाषा भी बोलते हैं । जाहिर है कि पूॅछ उस समय तक नहीं लगा रखी थी वे कपि का रूप धारण कर लंका मे प्रवेश करते है इसलिए कि जैव विविधता बन्दरो मे ही सबसे अधिक होती है और एक नए ढंग का बन्दर होने का भ्रम उत्पन्न किया जा सकता था । वायु पुत्र यानी जादूगर परिवार से आने के कारण चमत्कारिक मनगढ़ंत हनुमान के चरित्र के साथ ही मिलता है । प्रयाग से चित्रकूट तक पहुंचने के पहले उत्तर भारत के राम गंगा पार करने के लिए केवट बिरादरी और नाव का सहारा लेते हैं लेकिन दक्षिण मे जाते ही वे किसी नाव जैसी वैज्ञानिक युक्ति का सहारा नहीं लेते बल्कि बन्दरो और पक्षियों की मिली जुली सामर्थ्य के साथ मिथकीय छलांग मारते हैं । वास्तव मे अधिक संभावना समुद्री नाव से ही जाने की है । जबकि समुद्र मंथन से सम्बन्धित एक अन्य पौराणिक गल्प विष्णु के समुद्र पार जाने एवं एक योरोपीय प्रजाति की महिला लक्ष्मी के समुद्र से लाने-पाने के सन्दर्भ मे मंथन विधि यानी चप्पू या पतवार चलाने का संकेत कर चुका होता है । प्रश्न यह है कि जब विष्णु के जमाने में समुद्र मंथन यानी यात्रा के लिए बडी नौका उपलब्ध थी तो फिर बाद की पीढ़ी मे आए राम ई हनुमान किसी तैरती नौका या लट्ठे पर बैठकर लंका क्यों नहीं गए ? इससे सिर्फ इतना ही पता चलता है कि प्राचीन काल का नेतृत्व वर्ग भी जनसामान्य से तथ्यों को छिपा कर सत्ता के प्रति सिर्फ़ आस्थावान बनाए रखना चाहता था । सिर्फ बालि का गुफा भवन दक्षिण भारत मे पहाड़ो को खोखला कर बनाए जाने वाले महलों की निर्माण कला के अनुरूप है ।
अंत मे आपके प्रश्न पर इतना ही कहना उपयुक्त होगा कि भविष्य की अनिश्चितता से उबरने के लिए मनोवैज्ञानिक अवलम्बन के लिए समूची मानवजाति अपने ढंग से पूजा और प्रार्थना तो करती ही आयी है लेकिन राक्षसपति रावण और उसके पुत्र मेघनाथ ने आर्यों की तरह ही यज्ञ और हवन आदि कराया यह भी कहाँ प्रमाणित होता है । प्रमाणित तब मानता जब शृंगी और वशिष्ठ की तरह लंका के किसी पुरोहित का नाम लोग मुझे बताते ।
स्पष्ट है कि दलित भी आज की अवधारणा है । नन्द वंश तक तो शूद्र भी दलित नहीं रहे हैं, शासक रहे हैं । अभी वाला भारतीय समाज शुंग काल के बाद का है । शुंग यानी ब्राह्मण काल में ही बौद्धों की जातक कथाओं की तर्ज पर अठारह पुराणों सहित वाल्मीकि रामायण और मनुस्मृति आदि सभी लिपिबद्ध किये गये ।
आज स्वयं को वाल्मीकि से जोडने वाली एक जाति जो सफ़ाई से जुडी है उसका कहना है कि इस्लाम स्वीकार न करनें के दण्ड स्वरूप उसके पुरखों को सफ़ाई का गन्दा काम दिया गया ।
पहले स्वतंत्र कबीले हुआ करते थे । महाभारत काल में मातृसत्तात्मक कबीले भी थे । गंगा और सत्यवती आदि ऐसे ही मातृसत्तात्मक कबीलों की उन्मुक्त स्त्रियाँ हो सकती हैं ।
अत मे प्रमाणों और आधारों को लेकर एक टिपण्णी- नए बने मन्दिरों की तरह नए लिखे ग्रन्थों को भी अति प्राचीन बताने की एक विशेष प्रवृत्ति ब्राह्मण धर्म ग्रन्थों मे मिलती है । अपौरुषेय, अनादि और लोकोत्तर बताना उनके पेशे की दृष्टि से भी जरूरी था । बौद्ध धर्म के स्वर्णिम युग मौर्य काल के बाद सनातन धर्म के पुनरुत्थान हेतु समर्पित शासक पुष्यमित्र शुंग मे एक बात तो यह प्रशंसनीय दिखती है कि उसने जातक कथाओं की तर्ज पर अठारह पुराणों की रचना करवायी ।पाणिनी के द्वारा संस्कारित भाषा संस्कृत मे वाल्मीकि रामायण को प्रस्तुत कराया लेकिन अपने प्रशस्ति गान से सम्बन्धित कुछ भी नहीं लिखवाया । सम्भवतः उसे मनोवैज्ञानिक बाधा रही हो कि राजवंश का हत्यारा होने के कारण लोग उसके प्रशस्ति गान को स्वीकार नही करेंगे ।
हमें जानना चाहिए कि ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ प्राय एकमात्र स्रोत होते हुए भी सत्य तक पहुंचने के विश्वसनीय आधार नहीँ हो सकते । उनकी समझ देशकाल,रूढ़ियों और जातीय परम्पराओं से आच्छादित है ।यद्यपि जातीय तंत्र होते हुए भी विशेष मूल्य परक दृष्टिकोण के कारण सैकड़ो राजवंशों की सैकड़ो पीढियाँ को एक तरह से खारिज करते हुए उपेक्षित छोड़ दिया गया है । इसी कारण ऐसे हजारों राजा हुए है जिनका कोई सांस्कृतिक योगदान नहीं दीखता । संस्कृत साहित्य मे तो अकबर का भी उल्लेख संभवतः न मिले । मैं जो कहना चाहता हूँ उसे बहुत कम लोगों ने समझने का प्रयास किया है । हमारी संस्कृति के प्रवाह को निर्णायक मोड़ देने वाले चरित्र और घटनाएं कम ही हैं ।