रविवार, 19 जनवरी 2020

धर्म पर पुनर्विचार की आवश्यकता

धर्म पर पुनर्विचार की आवश्यकता

आज धर्म पर पुनर्विचार की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि पहले का मनुष्य आज की तरह तार्किक नहीं था | अच्छी और उपयोगी बातों को धर्म के नाम पर समाज में फैला दिया जाता था | यह मान लिया जाता था कि ये बाते स्वयं सिद्ध या चिन्तक-मनीषियों द्वारा कही गयी हैं और उन्हें बिना प्रश्नांकित किए मानना जरुरी है | धर्म किस प्रकार नेतृत्व वर्ग के आदेशों से जुडा है इसका पता बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट के मूसा के नेतृत्व में मश्र से यहूदियों के महा-निष्क्रमण से चलता है |मूसा जब पहाड़ी पर चढ़ कर चिंतन कर रहे थे,उस समय अपने अनुयायियों की धैर्यहीनता तथा सभी के सोने को पिघलाकर एक देवता बनाकर पूजने का प्रयास करने वाले अपनें ही बीच के दूसरे नंबर के नेतृत्व को तथा उसकी बात मानने वालों को बर्बरतापूर्वक हत्या करवाते हैं | यहूदियों के लिए मूसा के निर्देश कितने महत्वपूर्ण थे कि बहुत बाद में ईसा मसीह को भी उसी के आधार पर सूली यानि ऊँचे पर लटका दिया गया | यहूदी आज भी मूसा के उपदेशों से ही संचालित होते हैं जबकि ईसा मसीह के अनुयायियों नें बाद में यहूदियों को समझना छोड़ कर दूसरी जातियों को उपदेश देना शुरू किया | यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्र की अवधारणा का जन्म भी मूसा के द्वारा यहूदियों को संगठित करने की घटना से ही जोड़ा जाता है | मूसा नें यहूदियों को संगठित किया | उस संगठित शक्ति के नेतृत्व नें यहूदियों नें नगर के नगर लुटे और भयंकर कत्लेआम कर काला सागर के पास की वह थोड़ी सी जमीन वापस छीनी जो उनके अनुसार उनके पुरखों की थी | यहूदी धर्म की यह जनसँख्या यहूदियों के लिए खतना अनिवार्य करने वाले उनके पहले पैगम्बर ईब्राहिम के लगभग हजार वर्ष बाद जब खतना किए हुए लोगों की एक बड़ी संख्या मिश्र में हो जाती है .बहुत पहले युसूफ के साथ मिश्र में आए यहूदियों के वंशज मूसा के नेतृत्व में एक -दूसरे को पहचान कर मूसा के नेतृत्व में मिश्र से बाहर निकलने का सफल प्रयास करते हैं |एक संगठित सैन्य शक्ति के रूप में एक लड़ाकू धर्म ,जाति और राष्ट्र के संस्थापक बनते हैं जो यहूदी कहलाती है | मूसा नें यहूदियों को संगठित सैन्य शक्ति के रूप में जो नया चेहरा दिया उसका धर्म की मानवीय संवेदना से कुछ लेना-देना नहीं था | वह इस अंधी आस्था पर आधारित था कि यहोवा के नाम पर जिसका भी खतना हुआ है ,वह दूसरे मनुष्यों से विशिष्ट है | यह सीधे-सीधे दूसरों को हेय और स्वयं यानि यहूदियों को श्रेष्ठ समझने वाला धर्म था | यह विशिष्टता-बोध जीता था और दूसरों का अपमान करता था | इस्लाम के प्रवर्तक स्वयं मुहम्मद साहब के ऊपर भी नीचा देखने की भावना से कूड़ा फेकने का जिक्र मिलता है | इस प्रकार धर्म के नाम पर संगठित श्रेष्ठता और संगठित अपमान करने वाली कट्टरता का सम्बन्ध यहूदियों से है |
           मुहम्मद साहब नें इस्लाम की खतना प्रथा यहूदियों से ही ली थी |.हाँ अरबी भाषा के पहले अक्षर अल्लिफ के अनुसार उन्होंने ईश्वर को यहोवा न कहकर अल्लाह कहा जिसका आशय था सृष्टि में पहला (जैसे अल्लिफ अरबी वर्ण माल का पहला अक्षर है उसी प्रकार दुनिया के पीछे सक्रिय पहली शक्ति को उन्होंने अल्लाह कहा | मुहम्मद साहब की जीवन गाथा पढ़ाकर ऐसा लगत है कि प्र्रम्भ में उनका उद्देश्य गौतम बुद्ध और ईसा मसीह की परंपरा का ही मसीहा बनने का था लेकिन जब विरोधियों द्वारा उन पर प्राणघातक हमले बढ गए तो उन्होंने अपना रास्ता मूसा की शैली का कर लिया | खतना और कट्टरता दोनों ही इस्लाम में मूसा के यहूदियों वाली ही रही है | यही कट्टरता जब भारत में आयी तब यहाँ के लोगों को मूर्तिपूजक मानकर वही प्रयोग भारतीयों के साथ भी हुए | प्रतिक्रिया में संगठन के महत्व को देखते हुए मध्य युग में खालसा और सिक्ख पंथ का गठन गुरु गोविन्द सिंह नें किया | वे स्वयं तो मारे गए लेकिन उनकी नीव का भवन बाद में महाराणा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिक्खों नें देखा | ईसाईयों नें ईसा मसीह के नेतृत्व और प्रभाव में सेवा का संगठन बनाया लेकिन मूसा की हिंसक संगठन वाली परंपरा इस्लाम के अनुयायियों की परंपरा सिक्खों में होती हुई ब्रिटिश काल में निर्मित होने वाले हिन्दू संगठनों तक पहुंची | इसे मैं इतिहास में एंटीबाडी बनने की ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखता हूँ | वह मुसलमानों की तरह ही एक ऐतिहासिक अनुभव प्रक्रिया का परिणाम है -यह कट्टरता की पर्तिक्रियात्मक प्रक्रिया के रूप में है | हिन्दू नामकरण से लेकर उसका चरित्र गढ़ने तक इस्लाम के ऐतिहासिक अनुभव ही इसे शक्ति और उर्जा देते रहे हैं | मैं आज भी दुनिया की किसी कट्टरता के पीछे मूसा का असहिष्णु और क्रोधी चेहरा झांकते हुए पाता हूँ |
               
मैं जनता हूँ कि धर्म का यह भारतीय चेहरा नहीं है हाँ इसे संगठन का चेहरा अवश्य कहा जा सकता है -एक ऐसा संगठन जिसे मुस्लिम कट्टरता नें रचा है अपनी प्रतिक्रिया में | भारत के मसीहाओं का असली चेहरा बुद्ध और महात्मा गाँधी के चहरे से मिलता-जुलता हो सकता है ,ईसा मसीह से भी | मुहम्मद साहब का प्रारंभिक आचरण बताता है कि वे भी ईसा मसीह की तरह के ही पैगम्बर होना चाहते थे लेकिन परिस्थितियों नें उन्हें मूसा की शैली का पैगम्बर बना दिया | मुझे् ल गता है कि उनकी आत्मा की शांति के लिए इस्लाम के अनुयायियों को ही आगे आना होगा | वे इंसानियत के प्रति अपने कर्तव्यों को समझकर लचीले बनेंगे तभी वे अपने जैसे सनकी कबीले के बनाने के स्थान पर इंसानियत का एक बार फिर फैलाना देख पाएगे |
        ( क्योंकि सबसे पहले मूसा नें ही एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना की थी जो सिर्फ यहूदियों के लिए हो  |यहूदियों को सगा और श्रेष्ठ और दूसरों को पराया मानने वाला दुनिया का पहला सांप्रदायिक संगठन वही था | क्योंकि मुहम्मद साहब नें यहूदियोे की प्रतिस्पर्धा में अपना धार्मिक संगठन 'इस्लाम 'खड़ा किया था ,इसलिए ईसाई धर्म से कुछ कथाएँ लेने के बावजूद इस्लाम यहूदी धर्म का ही प्रति-रूप है | यही कारण है कि जैसे यहूदी दूसरे समुदायों के साथ नहीं रह सकते वैसे ही मुसलमान भी नहीं रह सकते | क्योंकि यह मूसा के शुद्धतावादी नरसंहारों का ऐतिहासिक अचेतन छिपाए है | इस लिए हर बढ़ती जनसँख्या के साथ यह भी अलग राष्ट्र मांगता रहेगाा |दूसरी कौमें नहीं देना चाहेंगी तो उन्हें लड़ना ही होगा | इसराइल ,पाकिस्तान और कश्मीर यह सब एक ही ऐतिहासिक -सांस्कृतिक अचेतन की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं | बिना मानवतावादी आधुनिकतावादी विज्ञानवादी मुस्लिम नवजागरण के मुझे भी कश्मीर समस्या का कोई हल  नहीं दिखता |)
        धर्म की पिछली यात्रा को देखकर मैं आज भी आश्चर्य से भर जाता हूँ कि मध्य युग के संगठित अपराधियों नें ईश्वर को भी नहीं छोड़ा |आज भी उनका व्यवहार नहीं बदला है | वे क्योंकि तलवार से हत्या कर सकते थे इसलिए वे इसकी घोषणा कर सकते थे कि ईश्वर उनसे सहमत है | एक मित्र नें मुझसे धर्म की परिभाषा पूछी थी -क्या मैं ऐसा कह सकता हूँ कि प्राचीन काल से ही संगठनों की दादागिरी ही धर्म है | धर्म वही है जिसे विजेता कहता है ....
              भाग्य और प्रारब्धवाद के आधार पर राजा के पक्ष में जनमत तैयार करते ब्राह्मण अपनी भूमिका में बने रहे और उनकी इस भूमिका का लाभ बाद में मुग़ल शासकों को भी मिला | आज भी यह तंत्र आनुवंशिक व्यवस्था का सम्मान करता है | आज के भारतीय लोकतंत्र में ही कई ऐतिहासिक घराने सक्रिय हैं |एक बार निष्ठां तय हो जाती है तो उसमें भगवान की खोज शरू हो जाती है | जिसे देखो और जिधर देखो उधर ही यह तंत्र भक्त पैदा करता रहता है |ये भक्त अपनी जिम्मेदारियों से निरंतर भागते रहते हैं और जिम्मेदारियों का निरवाह करने के लिए एक अदद भगवान की खोज में लगे रहते हैं | यद्यपि इतिहास में कुछ बहुत चालाक ब्राह्मणों नें ब्राहमणों के तटस्थ रहने के जातीय निर्देश को नहीं माना और स्वयं राज सत्ता हथिया ली | इनमें से पुष्यमित्र शुंग का नाम सर्वोपरि है | भारत में गुलामी का मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करने वाले आध्यात्म के नाम पर समर्पण वादी भक्ति का प्रचार किया गया  |


शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

ईश्वर-विमर्श

ईश्वर-विमर्श

आज ईश्वर-विमर्श पुनः प्रासंगिक हो गया है । साम्यवादी विचारधारा और आन्दोलन के कमजोर पड़ने के बाद धर्म आधारित गैर राजनीतिक राष्ट्रीयताओं का विश्व-स्तर पर ध्रुवीकरण विश्व-मानवता के लिए एक समस्या और चुनौती के रूप में उभरा है । यह सब भूमंडलीकरण की स्वाभाविक प्रक्रिया के अन्तर्गत होता दिख रहा है । क्षेत्रीयता की भौगोलिक बाधाएं समाप्त होते ही बिखरी हुई अस्मिताएं दैत्याकार ढंग से सहसा वैश्विक हो उठी हैं ।
एक अन्य समस्या प्राचीन सभ्यताओं के उत्तराधिकारियों के नवीनीकरण यानि आधुनिकता-बोध का है ।कम संसाधनों एवं अधिक जनसंख्या वाले एशियाई मूल के धर्म आधारित समाज लम्बे समय से कठोर धार्मिक नियमों एवं संयम द्वारा ही स्वयं को बचाए हुए थे । यद्यपि उनका भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक अवचेतन चरित्र और आचरण का भिन्न-भिन्न प्रादर्श उपलब्ध कराता है । ये जातीय साम्प्रदायिक गैर राजनीतिक राष्ट्रीयताएं आधुनिक राज्यों की राजनीतिक राष्ट्रीयताओ को अपने ढंग से बाधाएं एवं चुनौतियां देती रहती हैं ।
बौद्ध धर्म को छोड़ दिया जाय तो ईश्वर की आदिम अवधारणा विश्व के सभी धर्मों का आधार है । ईश्वर की मिथकीय परिकल्पना और चरित्रीकरण मे ही एक संस्कृति को मानने वाली बड़ी जनसंख्या की सभ्यता के अवचेतन सूत्र छिपे हैं ।
धर्मों को उनके अनुयायियों पर पडने वाले प्रभाव या यह कहें कि संस्कार-स्वभाव की दृष्टि से तीन प्रकार का देखा जा सकता है-निर्विचारवादी विचारवादी और भाववादी, । बौद्धों की विपश्यना तथा गीता का स्थिति प्रज्ञ ,जैन धर्म की का मोक्ष और कैवल्य तथा बौद्ध धर्म का परम सत्य निर्वाण आदि निर्विचारता को ही दुख-मुक्ति का उपाय या समाधान मानने वाले धर्म हैं ।ईसाई और इस्लाम जैसे सेमेटिक धर्मों को विचार जीवी धर्म कहने का तात्पर्य यह है कि इन धर्मों मे ईश्वर के साथ-साथ शैतान की भी समानान्तर अवधारणा के कारण इनका द्वंद्वात्मक सांस्कृतिक अवचेतन सफल जीवन के लिए सतत विचारक सजगता एवं सन्देहशील जीवन-पद्धति को प्रस्तावित करता है । सेमेटिक धर्मों की विचारजीविता का आधार उनका यह सांस्कृतिक विश्वास भी है कि इस सृष्टि को उसके निर्माता ईश्वर ने किसी बढ़ई या कलाकार की तरह बाहर से बनाया है । कहने का तात्पर्य यह है कि सेमेटिक विश्वास के अनुसार सृष्टि और उसके निर्माता ईश्वर अलग-अलग भिन्न अस्तित्व के रूप मे है । यद्यपि स्टीफ़न हाकिंग ने इस अवधारणा को खारिज कर दिया है लेकिन खारिज होने के बाद भी यह सांस्कृतिक अवधारणा पश्चिम के सम्पूर्ण विकास एवं आधुनिक वैज्ञानिक सभ्यता कि आधार है । प्रकृति की हर संरचना के पीछे ईश्वर का मस्तिष्क होने की परिकल्पना ने उनके पूर्वजों को प्रेरित किया कि सेमेटिक धर्म का सबसे प्रमुख उदाहरण सनातन कहा जाने वाला हिन्दू धर्म है ।
भारतीय वर्ण व्यवस्था और जाति-प्रथा ने जिस स्थाई लौह सामाजिक संरचना का निर्माण किया उससे प्रतिक्रियात्मक संतुलन के लिए मुक्ति और मोक्ष की अवधारणा का भी मिथकीय महिमामंडन किया । उसने यथास्थिति की एक दार्शनिकी रची जिसमे इस जन्म, जीवन और जगत मे कुछ भी नहीं बदलना था । बदलाव के लिए असंतुष्ट होने पर अगले जीवन के जन्म की प्रतीक्षा करनी थी । सनातन धर्म को जो आदिम कबीलाई संस्कार प्राप्त हुआ था उसमें आनुवांशिक उत्तराधिकार के कारण क़बीले के मुखिया की तरह राजा के भी नेतृत्व को प्रश्नाकित नहीं किया जा सकता था । सबसे विचित्र सांस्कृतिक निर्माण स्वयं ब्राह्मण वर्ण का ही देखने में आता है । इस जातीय समूह को श्रेष्ठ और सम्मानित कहकर मूर्ख बनाया गया । इसे भिखारी के रूप मे जीवनयापन के लिए अभिप्रेरित किया गया । इसे स्वयं महत्वाकांक्षा से रहित रहते हुए दूसरों के लिए महत्वाकांक्षा से रहित जीवन जीने के लिए आदर्श उपस्थित करना था । स्पष्ट है कि वह स्वयं नेतृत्व को चुनौती न देने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक संविधान का एक हिस्सा था । वह पीढ़ी दर पीढ़ी महामंत्री तक ही हो सकता था । उसका कार्य स्वयं निरीह संतोषपूर्ण जीवन जीते हुए दूसरों को भी निरीह-दयनीय महान बनाना था ।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के कारण सबके पास भूसम्पत्ति न होने के कारण सामाजिक-सांस्कृतिक कर के रूप मे दान देने को महिमामंडित किया गया । यक एक तरह से राजस्व का विकेन्द्रीकरण था । इससे राजा बदलने या अराजक समय मे भी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं का आर्थिक पोषण बाधित नहीं हुआ । लेकिन इसी दान-व्यवस्था के सांस्कृतिक अवचेतन ने आधुनिक काल मे घूस लेने और पहचाने कि नैतिक आधार तैयार किया । क्योंकि साक्षरता का पारिवारिक संस्कार होने के कारण आधुनिक काल मे ब्राह्मण-पुत्रों के लिए शिक्षित होकर नौकरियों मे आना आसान था ,इनकी अधिक संख्या ने दान लेने के स्थानापन्न के रूप मे घूस लेने को नैतिकता से मुक्त कर दिया और इसे असंवैधानिक प्रचलन मे लालबहादुर दिया । यह सब अवांतर प्रसंग धर्म और ईश्वर से सम्बन्धित लगते तो हैं लेकिन वास्तव मे हैं नहीं ।
मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से ईश्वर हमारी अभिभावक और जन्मदाता प्रकृति ,पारिवारिक धरातल पर पिता,राज्य के धरातल पर राजा ,राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आदि का मनोवैज्ञानिक प्रत्ययीकरण है । एक रहस्य यह भी है कि मकान बना लेने के पहले तक हमारे जंगली पूर्वज अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने समूह पर ही निर्भर रहे । भेड़ियों, हाथियों और चींटियों की तरह मनुष्य भी एक सामाजिक प्राणी है । जैसा कि इन सभी सामाजिक प्राणियों मे अकेले रहने की एक नैसर्गिक अनिच्छा देखने को मिलती है । हम सभी को अपना एकाकी जीवन व्यर्थ लगने लगता है । अकेलापन एक अपूर्ण का अहसास कराता है । माता-पिता और समाज की अनुपस्थिति मे ईश्वर का सर्वव्यापी प्रत्यय इसी रिक्त स्थान की पूर्ति मे अवस्थित रहा है । इन विचारों से अलग ईश्वर और धर्म के नामपर हमारे पूर्वजों द्वारा अन्वेषित समझदारी और जीवनानुभव भी एक जीवन-पद्धति और मूल्य-व्यवस्था के रूप मे हमे विरासत में प्राप्त हुए है । इनकी जांच-पड़ताल तथा ग्रहण-त्याग के विवेक ने ही मुझे अपनी आस्था और विवेक के ईश्वर को बदलने का साहस दिया है । इस कृति के नामकरण के औचित्य का एक आधार यह भी है कि लोगों के विवेक की जड़ता प्रायः उनके समुदाय और समाज के विवेक के सापेक्ष होती है । मैने अपने ज्ञान और विचार के प्रकाश मे अपनी आस्था और ईश्वर की अवधारणा को बदला है । हाॅ, इतना मै अवश्य चाहता था कि यह कृति दूसरों को अपनी आस्था को बदलने की चुनौती तो दे लेकिन संवेदनशील होने के कारण अपने समूह के विवेकसम्मत बने रहने की आजादी हिंसक ढंग से न छीने । क्योकि भावी आस्था की खोज पूरी मानवजाति को करनी है और यह प्रक्रिया मानवजाति के अस्तित्व-पर्यन्त पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहेगी ।
रामप्रकाश कुशवाहा

मूर्ति-पूजा और भारतीय धर्म

मूर्ति-पूजा और भारतीय धर्म

संस्कृत जैसी व्यवस्थित भाषा का विकास करने मे सक्षम भारतीय धर्म तथा संस्कृति(मूर्ति, मन्दिर एवं पूजा पद्धति आदि ) अपनी प्रकृति मे प्रतीकात्मक तथा चारित्रिक आख्यान के रूप मे होने से प्रायः साहित्यिक प्रकृति के हैं । इसीलिए मै इन्हे कबीलाई धर्मों की तरह विशुद्ध अन्धविश्वास की तरह ही नहीं देख पाता । भाषावैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधारो पर मै मिथकीय प्रतीकों के कूट अर्थ को तोडने का प्रयास करता रहता हूँ । ऐसा करने की प्रेरणा मुझे उन कबाडियो से मिलती है जो निष्प्रयोज्य के विसर्जन से पहले उनमें से धातुओं को निकाल लेते हैं । मैं यह नहीं भूलता कि बुद्ध काल तक हमारा अतीत विचारपूर्ण बहसों का था। साधना का लक्ष्य जीवन का परिष्कार था और कपिल , चार्वाक और वृहस्पति जैसे अनीश्वरवादी चिन्तक भी हुए हैं ।
गीता हो या पतंजलि के योग-सूत्र, महावीर हो या बुद्ध सभी की चिन्ता सभी की चिन्ता मानव-मन के नियमन की ही रही है । वै अपराध कितना कम कर पाए यह एक अलग प्रश्न है लेकिन उन्होने एक शिष्ट जीवन-पद्धति देकर जीवन एवं समाज का सामूहिक प्रबन्धन करने का प्रयत्न अवश्य किया । वे मस्तिष्क को इस सीमा तक प्रशिक्षित करने में तो सफल हुए ही कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियाॅ के क्रिया-कलाप भी मानव-मस्तिष्क के विवेक की सीमा मे आ जाएँ । अकरणीय या वर्जनाओ से सम्बन्धित कुछ सांस्कृतिक युक्तियाँ भी आधुनिक मनोविज्ञान सम्मत हैं । जातीय एवं स्थानीय होते हुए भी उनकी काव्यात्मक भावोदात्तता एवं सामाजिक सार्थकता पर रीझने को मन करता है । जैसे ब्रह्मचर्य आश्रम के नाम पर पचीस वर्ष तक यौन हारमोनो का सिर्फ सामना करने के लिए देना आज की वयस्कता आयु-सीमा से भी अधिक है । भाई और बहन के बीच रक्षाबंधन जैसे त्यौहार, छोटे भाई की पत्नी का बडे भाई से विवाह की अनुमति न देना आदि ऐसी ही रेखांकित करने योग्य वर्जनाएं हैं । हर आता हुआ नया पुरुष अपनी ही देह के भीतर एक युद्ध लड़ता और जीतता हुआ आता है । अपने ही जीवन के वेगों को जीतने के लिए किया जाने वाला युद्ध ।
                आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य का समर्थन करता है कि इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किसी संवेदना का प्रत्यक्षीकरण मस्तिष्क की धारणाओं, विश्वासों तथा व्याख्याओं के अनुरूप होता है । आध्यात्म के नाम पर अनेक सोद्देश्य किन्तु काल्पनिक और हास्यास्पद अवधारणाओं के बावजूद सांस्कृतिक नियामक झूठ बोलकर भी अनेक पशुओं, पक्षियों तथा वनस्पतियों सहित पर्यावरण को अधिकतम सीमा तक बचाने मे सफल रहे हैं । इस विधि से संरक्षित पर्यावरण में पितर घोषित कौओं से लेकर बन्दर, चूहे, सर्प,नीलकण्ठ,उल्लू,हाथी ,सिंह, और गाय-बैल ,नदियाँ सभी शामिल हैं ।
               व्यवस्थित ढंग से संघ यानि संगठन बनाकर ,आज के शब्दों मे कहें तो संस्थागत रूप से लोगों तक अपने आदर्श के अनुरूप विचार पहुँचाने का कार्य गौतम बुद्ध ने किया था । उनके पहले लोक को उनकी भाषा मे ही संबोधित करने की चिन्ता और किसी मे नही दिखती ।उनके पूर्व के जननायकों के यश का आधार अभिजन या विशिष्ट वर्गीय स्वीकृति रही है । बुद्ध को लम्बा जीवन मिला था । लोक के लिए बोधगम्य दृष्टान्त कथाएं जिन्हे जातक कथाएं कहा गया खूब रची गयीं । भव्य व्यक्तित्व के कारण बुद्ध को ही प्रतिमान के रूप मे विज्ञापित किया गया । संगठन और संसथाओ की अपनी सामूहिकता होती है । पूरा जीवन समर्पित कर चुके बुद्ध के अनुयायियों के पास इतना जीवन-समय था कि वे 'अप्प दीपो भव 'की चिन्ता छोड़ कर बुद्ध की मूर्तियों की रचना मे लग गए । ऐसा लगता है कि विदेशों मे बहुत से ऐसे भी धर्म प्रचारक पहुँचे जो बुद्ध का दर्शन फैलाने के स्थान पर आजीविका के लिए मूर्ति स्थापित कर पूजा करवाने मे लग गए । अरब वगैरह तक पहुँचते-पहुँचते यही बुद्ध मात्र मूर्ति स्वरूप बुत हो गये । ऐसा लगता है कि मुहम्मद साहब ने इस्लाम प्रवर्तन के समय जिन बुतो को तुड़वाया होगा -व्हाॅ बौद्ध धर्म के दार्शनिक पक्ष से पूरी तरह अनभिज्ञ बुद्ध की मूर्तियों की सिर्फ पूजा करने वाले पुरोहित रहे होंगे । यह भी कि असली दार्शनिक बौद्ध धर्म विश्व के बहुत से हिस्सों में नहीं पहुँचा । या फिर पूर्व प्रचलित शिवलिंगो की पूजा की तर्ज पर बुद्ध यानि बुत पूजा भी सुदूरवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित रही ।
               साफ है कि भारत मे भी बौद्ध धर्म को पहले मूर्तिपूजा मे बदला गया और फिर उनको देखते हुए बुद्ध की तर्ज पर दूसरे पौराणिक नायकों की भी मूर्तियाँ बनने लगीं । मूर्तिपूजा से दिमाग को आराम मिला और चढावे की संस्कृति विकसित हुई । जैसा कि प्रायः देखने मे आता है कि पेशे विचार और दर्शन को भी बाजार की एक उपस्थिति मे बदल देते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्ध काल से पहले का प्राचीन भारत मूर्तियों और मन्दिरों का देश नहीं रहा है । उनके पास ग्रामीण एवं नागरिक समाज थे जिनमें वैचारिक बहसे चलती रहती थीं । ऐसा नहीं है कि उनके पास आस्धा की पथराई हुई शिलाएँ बिल्कुल नहीं थी । भोले माने जाने वाले सबसे सरल अनगढ़ पाषाण- देवता आदि शिव तब भी थे । स्त्री-पुरुष के सृजनांगो तथा ब्रह्माण्ड के अनगढ़ प्रतीक के रूप में । बुद्ध के पहले की आस्था का स्वरूप साहित्यिक आख्यानों और विमर्शो के रूप में रहा है । इसीलिए ऐतिहासिक यथार्थ को देखते हुए मुझे मूर्तियों और मन्दिरों वाला भारतीय धर्म कम बुद्धि के लोगों एवं बच्चों के लिए लगता है । इन मूर्तियों का वास्तविक रहस्य इनके साहित्यिक पाठ मे है । पौराणिक नायकों के प्रतीकार्थ और चारित्रिक आख्यानों मे है । सिर्फ उन अंशो को छोड़कर जिसे अपनी आजीविका और पेशेवर स्वार्थ के कारण पुरोहित वर्ग ने लोगों का भयादोहन कर अर्थार्जन के लिए रची हैं ।
           इस दृष्टि से राम भी हमारी सभ्यता के बीज-पुरुष ही लगते है । वे एकल दाम्पत्य के आदि प्रतिमान हैं और किसान-सभ्यता की कौटुम्बिक संरचना का भी । इस दृष्टि से हर वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन पर्यन्त किसी एक ही महिला से विवाह का संकल्प ले रखा हो -मुझे राम का प्रतिरूप ही लगता है । संभवतः तुलसीदास जी ने भी इसी दृष्टिकोण से ही 'सिया राम मय सब जग जानी ' कहा था । यह अकारण नही है कि आराम मे भी राम है और हराम मे 'हे राम' यानि शिकायत के रूप में है
इससे पता चलता है कि अरबी और फारसियो के पुरखे भी राम से प्रभावित देश रहे ही होंगे । एक विवाह करने वाले ईसाइयों और मुसलमानों को भी राम का अनुगामी तो माना ही जा सकता है । यद्यपि जो लोग होमर की कृतियों और ट्राय युद्ध से परिचित होंगे या सिकन्दर की लड़ाइयों से भी परिचित होगे , उन्हे रामकथा के अनेक अंश समानधर्मा लग सकते हैं । लेकिन इतने लम्बे काल तक चले कुलीनतंत्र मे सन्तानहीन होने के कारण किसी राजवंश का खतरे मे पडना और नियोगप्रथा द्वारा वंश चलाने का प्रयास असंभव नही लगता । मैने कुछ भिन्न आधारों पर भारतीय अतीत की पडताल की है । जिससे सम्बन्धित आलेख मेरी प्रकाशनाधीन पुस्तक-"सभ्यता का पुनःपाठ " मे है ।
रामप्रकाश कुशवाहा
93/01/2020

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

जाति-प्रथा

जाति-प्रथा


जब तक किसी समूह के सदस्य एक-दूसरे के अधिकतम समरूप बने रहने के प्रयास में दूसरे समूह से भिन्न बने रहेंगे भारत में जाति -प्रथा नाम-रूप बदलकर किसी न किसी रूप में बनी रहेगी | जातिविहीनता का आदर्शवाद तभी संभव है जब सभी असामाजिक हो जाएँ और समूह के आदर्शों को जीना बंद कर दें | जाति भी मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने के कारण ही अस्तित्व में बने हुए हैं | भारत में जातिवाद किसी ब्राह्मण या ब्राह्मण समुदाय द्वारा बनाया गया नहीं है ,बल्कि उसकी ऐतिहासिक पारिस्थितकी की उपज है |उपजाऊ देश होने के कारण प्राचीन काल से ही अलग-अलग समूह भारत में बसने के लिए आते गए और जातियाँ बढ़ती गयीं | यदि दूसरे की सामूहिक भिन्नता को स्वीकार करना ही जातिवाद है तो ऐसे जातिवाद को भारतीय इतिहास के लिए प्रगतिशील भी माना जा सकता है | हम सभी जानते हैं कि मध्यकाल में जब पुलिस व्यवस्था हमेशा ही ठीक नहीं रही होगी तो जातियों नें ही अपने सदस्यों का चारित्रिक नियमन किया होगा | जाति प्रथा भी मनोवैज्ञानिक दंड और पुरष्कार-प्रथा के आधार पर ही हजारों वर्षों तक ऐसा करती रहीं | जाति प्रथा की यह प्रगतिशील भूमिका थी | सबको समान रूप में जीने के लिए दबाव बनाना भी हिंसा है | जाति -प्रथा नें अलग-अलग समूहों को अलग -अलग रीति-रिवाजों को जीने की स्वायत्तता दी | भारत में जातिप्रथा इसलिए बुरी है कि धार्मिक आधार पर श्रेणीकरण करने के कारण कुछ लोगों को निचले दर्जे पर कर दिया गया | इससे चर्म-उद्योग से जुडी जातियां अधिक घाटे में रहीं और अछूत तक करार दी गयीं । ब्राह्मणों ने इनके (बौद्ध एवं जैन धर्म की) अहिंसावाद की प्रतिस्पर्धी मे अधिकांशतः मांसाहार छोड़ कर शाकाहार अपनाया । तभी इन दोनो धर्मों का प्रभाव कम कर अपने वर्चस्व की पुनर्स्थापना कर पाए । भारतीय इतिहास मे वर्णवादी और जातिवादी नर्क की सृष्टि करने वाले शासकों मे पुष्यमित्र शुंग और पेशवाओ का नाम सबसे पहले लिया जाता है । मनुस्मृति का प्रवर्तन काल भी यही है । क्योंकि इसने बौद्धों का विस्तृत मौर्य साम्राज्य सेनापति के रूप मे अपने शासक की हत्या कर प्राप्त किया था- इस लिए बहुत कम समय मे बौद्धधर्म मतावलम्बियों का भारत भूमि से उच्छेदन किया । जैसा कि सभी जानते हैं कि सत्ता कूटरचना और अहंकार की सृष्टि करती है । ब्राह्मणों के पास दो बार सत्ता आयी । दोनो बार ही इसने अपनी श्रेष्ठता, दिव्यता और पवित्रता के पाखण्डपूर्ण विज्ञापन कै लिए समानतावाली मानवता के विरुद्ध विषमता का इतिहास रचा । शूद्रों को अस्पृश्य घोषित कर जिस विभाजनकारी जातीय हिन्दू धर्म की नीव रखी उसने एक बडी जनसंख्या को समायोजन की दृष्टि से अक्षम तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बीमार बनाया । कहते हैं हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप द्वारा मानसिंह के साथ भोजन न करने के कारण हुआ था । उस अन्धविश्वासों वाले युग मे बहुत बड़ी जनसंख्या उनके कुओं मे गाय की हड्डी डालकर सिर्फ़ ढिंढोरा पीटकर अवगत करा देने मात्र से धर्म परिवर्तन के लिए विवश हुई । मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भारत मे आया इस्लाम उच्चवर्ण की शूद्र ग्रन्थि और अवधारणा का शिकार हुआ । इस मनोग्रन्थि ने भी हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की समस्या को और बढाया है ।
आज वैश्विक अनुरूपता की धारा बह रही है | नस्लीय या अनुवांशिक भिन्नता को छोड़ दे तो समान शिक्षा-दीक्षा और रहन-सहन के कारण आज समूह की भिन्नता भी कम हो रही है | आज जाति-प्रथा किसी बौद्धिक या वैचारिक आधार पर नहीं बल्कि वैवाहिक सुविधा , आलस्य और सामाजिक तंत्र के आधार पर बची हुई है | इसकी शक्ति भी सामाजिकता की ही शक्ति है | क्योकि कुछ जातियों का राजनीतिकरण हो चुका है इसलिए उनका संगठनात्मक हित जाति प्रथा को बनाए रखने में हो गया है | इस कारण ही जाति से बाहर निकलने के वैयक्तिक प्रयास भी प्रभावी नहीं हो रहे हैं | आजादी के पूर्व साम्प्रदायिकता की समस्या के उभार के कारण मुख्यधारा की राजनीति ने भारतीय मूल की जनसंख्या के घृणित जातीय विभाजन के मुद्दे को बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के हस्तक्षेपपूर्ण प्र्रयास के बावजूद दबायें रखा । आजादी के बाद ही जातिवाद का सबसे निकृष्टतम रूप देखने को मिला । चाहे नेहरू रहे हो या इंदिरा गांधी - कान्ग्रेस कुलीनतंत्र की पोषक होती गयी और उसके सिपहसालार तथा उसके शासनकाल की नौकरशाही उच्च वर्गीय जातिवादी । इस भ्रष्टाचार से जिन लोगों ने भी नौकरियां पायीं-चाहे वे नौकरशाह रहे हो या प्रोफेसर-जातीय सम्बन्ध के आधार पर नियुक्तियां पाने से बनेे तंत्र के अधिकारियों कर्मचारियों और शिक्षकों की दूसरी पीढ़ी ने बडी निर्लज्जता से जातिवाद फैलाया । राजनीति से लेकर नौकरशाही तक फैले इस भ्रष्टाचार को सबसे पहले जाट नेता चौधरी चरण सिंह ने सार्वजनिक मुद्दा बनाया । मंडल कमीशन, विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं कांशीराम की राजनीति उसके बाद की है । वर्तमान सरकार के भीतर घुसा उच्च वर्गीय नेतृत्व वर्ग भी राष्ट्रवादी आदर्श के भीतर अपने वर्ग की जातिवादी दमित आकांक्षाओं की पूर्ति करने मे लगा है । इतिहास-चक्र का मध्यवर्गीय यथार्थ इंदिरागांधी के जमाने वाली धोखाधड़ी और जातीय कुचक्रों का भीतर-भीतर फिर लौट रहा है । अपराधियों के प्रति जातिवादी पक्षपात की खबरें अब भी आती हैं । अभी कुछ दिनो पहले " आर्टिकल 14"नाम की एक विचारोत्तेजक फिल्म भी उच्च वर्णीय जातिवादी भ्रष्टाचार पर आयी थी ।नियामकों ने ध्यान नहीं दिया तो समय के न्याय-चक्र का पहिया घूमने से कोई रोक नहीं सकता । इस देश को सही अर्थों मे लोकतांत्रिक और मानवतावादी होने मे देखें अभी कितना वक्त लगता है ?


रामप्रकाश कुशवाहा
02/01/2020