पुनर्जन्म की अवधारणा पर एक और तरह से मै सोचता हूँ । वर्णमाला के कुछ ही वर्णों के मेल से मानव-जाति ने लाखों शब्द बना डाले हैं । आर एन ए ,डी एन ए भी कुछ वर्णों के मेल से बने शब्दों की तरह कोई विशिष्ट संरचना बनाते है । यह संरचना शब्दों और संख्याओं की तरह बढ़ती जाती है । क्योंकि यह आवृत्ति चक्र संयोग आधारित है इसलिए हजारों पीढियों बाद या अरबों-खरबों की जनसंख्या मे समरूप विशेषताओ वाली जैविक सृष्टि कर सकती है । यह वही व्यक्ति तो नहीं होगा लेकिन वैसा ही हो सकता है । यह आध्यात्मिक पुनर्जन्म से अलग जैविक पुनर्जन्म की व्यवस्था है । एक और बात मै सोचता हूँ । सारी मानव जाति म्यूटेशन की शिकार किसी कपि पूर्वज की सन्तानें हैं । एक ही चेतन सृजन का जैविक बहुगुणन । प्रजाति के रूप मे हमारा वैयक्तिक पुनर्जन्म न सही लेकिन उस आदिम पुरखे का तो हो ही रहा है ।
जीवन का रास्ता चिन्तन का है । चिन्तन जीवन की आग है तो विचार उसका प्रकाश । चिन्तन का प्रमुख सूत्र ही यह है कि या तो सभी मूर्ख हैं या धूर्त या फिर गलत । नवीन के सृजन और ज्ञान के पुन:परीक्षण के लिए यही दृष्टि आवश्यक है और जीवन का गोपनीय रहस्य । The Way of life is the way of thinking.Thinking is the fire of life And thought is the light of the life. All are fool or cheater or all are wrong.To create new and For rechecking of knowledge...It is the view of thinking and secret of life.
सोमवार, 2 सितंबर 2019
ईश्वर की अवधारणा
आधुनिक मशीनी सभ्यता ने 18वी से 20वी शताब्दी के बीच जेम्सवाट के इंजन आविष्कार के बाद जीवन को देखने की यान्त्रिक भौतिकवादी दृष्टि सौप दी । जीवन को भी एक यन्त्रवत सृष्टि मान ली गयी । वैसे इसके यन्त्र होने की जानकारी अनादिकाल से शेर-बाघ जैसे पशुओं को भी थी । वे इसे बन्द करना जानते थे -शिकार मे की जाने वाली हत्याओ के रूप मे ।शिकार और मांसाहार हमारे पुरखों ने ऐसे ही शिकारी पशुओं से सीखा होगा ।
वैज्ञानिकों द्वारा आर एन ए,डी एन ए की खोज के बाद जड जगत से जीवन जगत् के बीच का रिश्ता काफी कुछ समझ लिया गया हैं । जीवविजान का तो विकास हुआ लेकिन भौतिकवाद के पूर्वाग्रह सत्रहवीं शताब्दी वाले ही बने हुए हैं । जड़ समझीं जाने वाली प्रकृति भी परमाणुओ के भीतर इलेक्ट्रॉन के रूप में गतिशील है लेकिन जड़ प्रकृति को लेकर धारणा पहले वाली ही है । दूसरी ओर ऐन्द्रिक संयम वालीं नैतिकता के स्थान पर ऐन्द्रिक उन्मुक्तता को भौतिकवाद का पर्याय मान लिया गया है ।
कहने का तात्पर्य यह कि आधुनिक भौतिकवादी दृष्टि भी भटकाव का दूसरा छोर है जैसे पहले के लोग जड़ जगत् को भी सजीव मानते थे । पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि को प्रकृति के मानवीकरण के रूप मे भी देखा जा सकता है । दिक्कत तब होती है जब कुछ लोग आर्थिक- भौतिक प्रतीक मुद्रा की काल्पनिकता और उसके मनोवैज्ञानिक अस्तित्व को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाते लेकिन सृष्टि की सजीविता पर आधारित प्रतीक ईश्वर को लेकर परेशान रहते हैं । जीवन और जगत को देखने का पुराना ढंग ही सही । मेरा मानना है कि आध्यात्मिक दृष्टि पूॅजी निर्माण युग के पूर्व की आदिम मानव जाति की विरासत है ।इसका बीच के शोषण में सहायक अनैतिक धार्मिक मूल्यों और वर्जनाओ के सामन्त युगीन विकास से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है । आप उसे जरूरी पर्यावरण की तरह ही बचाकर रख सकते है । पशुपालकों को ही लीजिए ।वे अपने-अपने पशु से रिश्ता और भाषा दोनों ही विकसित कर लेते है । हम आत्मवाद को लेकर ही द्विधाग्रस्त रहते है जबकि वे वास्तविकता के स्तर पर जीते हैं । एक वृहत्तर प्रतीक के रूप मे ईश्वर पद की अर्थ एवं प्रयोग की संभावनाओ की भी पड़ताल की जानी चाहिए । चाहे वह अर्थ परिवर्तन के माध्यम से ही क्यों न हो !
मनुष्य और ईश्वर दोनों की मुक्ति का रास्ता भी विमर्श से होकर ही गुजरता है । किसी का भी सोचना उसमे सहायक हो सकता है । मेरा चिन्तन तो विकल्प की चिन्ता से प्रेरित है । किसी को जूता दिए बिना चप्पल फेंक देने का उपदेश देना उचित नहीं । एक और बात है जो शिक्षक पेशे से सम्बन्धित है । पाठ्यक्रम में होंने के कारण जिससे असहमत रहा हूँ, उसे भी पढाता रहा हूँ । मेरे फेसबुक मित्रों मे बहुत से हिन्दी शिक्षक है । उनके लिए इस तरह का विमर्श भी उपयोगी हो सकता है ।
शनिवार, 24 अगस्त 2019
ईश्वर प्रसंग
ईश्वर प्रसंग
आदमी का दिमाग सभ्यता के प्रारम्भिक काल मे किसी शिशु की तरह सोचता था । ईश्वर की अवधारणा भी सम्पूर्ण प्रकृति को मनुष्य के समान ही सजीव मानने की अवधारणा की उपज है । यह प्रकृति का आत्मवत प्रत्यक्षीकरण है । भारतीय आध्यात्मिक विश्वास और दर्शन मे इसी चेतना और बोध का विस्तार है । दूसरी दृष्टि पश्चिम की है जो प्रकृति को आत्मवत मनाने के स्थान पर सृष्टि के निर्माण में अन्तर्निहित जटिलता पर रीझी और ऊसकी आश्चर्यजनक सृजनशीलता के लिए सर्जक अंर कर्ता के पद पर ईश्वर को प्रतिष्ठित किया । ईश्वर के साथ पश्चिम के पूर्वजों ने सृष्टि के प्रतिकूल और नकारात्मक अनुभवों के लिए भी प्रकृति का मानवीकरण किया और उसे शैतान के रूप में देखा । सृष्टि के प्रत्यक्षीकरण की इस भिन्नता ने दो प्रकार की संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया । अपने एकल ईश्वर के अनुरूप भारतीयों का ईश्वर भी जहाँ उदार, कृपालु और सज्जन रहा वहीं ईश्वर और शैतान के सांझे अस्तित्व के दोहरे मानवीकरण के कारण पश्चिम ने चतुराई की द्वन्द्वात्मक श्रेष्ठता और संघर्ष की परिकल्पना वाली राजनीतिक व्यवस्था को अपने विकास का आधार बनाया ।
आधुनिक मशीनी सभ्यता ने 18वी से 20वी शताब्दी के बीच जेम्सवाट के इंजन आविष्कार के बाद जीवन को देखने की यान्त्रिक भौतिकवादी दृष्टि सौप दी । जीवन को भी एक यन्त्रवत सृष्टि मान ली गयी । वैसे इसके यन्त्र होने की जानकारी अनादिकाल से शेर-बाघ जैसे पशुओं को भी थी । वे इसे बन्द करना जानते थे -शिकार मे की जाने वाली हत्याओ के रूप मे ।शिकार और मांसाहार हमारे पुरखों ने ऐसे ही शिकारी पशुओं से सीखा होगा ।
वैज्ञानिकों द्वारा आर एन ए,डी एन ए की खोज के बाद जड जगत से जीवन जगत् के बीच का रिश्ता काफी कुछ समझ लिया गया हैं । जीवविजान का तो विकास हुआ लेकिन भौतिकवाद के पूर्वाग्रह सत्रहवीं शताब्दी वाले ही बने हुए हैं । जड़ समझीं जाने वाली प्रकृति भी परमाणुओ के भीतर इलेक्ट्रॉन के रूप में गतिशील है लेकिन जड़ प्रकृति को लेकर धारणा पहले वाली ही है । दूसरी ओर ऐन्द्रिक संयम वालीं नैतिकता के स्थान पर ऐन्द्रिक उन्मुक्तता को भौतिकवाद का पर्याय मान लिया गया है ।
कहने का तात्पर्य यह कि आधुनिक भौतिकवादी दृष्टि भी भटकाव का दूसरा छोर है जैसे पहले के लोग जड़ जगत् को भी सजीव मानते थे । पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि को प्रकृति के मानवीकरण के रूप मे भी देखा जा सकता है । दिक्कत तब होती है जब कुछ लोग आर्थिक- भौतिक प्रतीक मुद्रा की काल्पनिकता और उसके मनोवैज्ञानिक अस्तित्व को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाते लेकिन सृष्टि की सजीविता पर आधारित प्रतीक ईश्वर को लेकर परेशान रहते हैं । जीवन और जगत को देखने का पुराना ढंग ही सही । मेरा मानना है कि आध्यात्मिक दृष्टि पूॅजी निर्माण युग के पूर्व की आदिम मानव जाति की विरासत है ।इसका बीच के शोषण में सहायक अनैतिक धार्मिक मूल्यों और वर्जनाओ के सामन्त युगीन विकास से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है । आप उसे जरूरी पर्यावरण की तरह ही बचाकर रख सकते है । पशुपालकों को ही लीजिए ।वे अपने-अपने पशु से रिश्ता और भाषा दोनों ही विकसित कर लेते है । हम आत्मवाद को लेकर ही द्विधाग्रस्त रहते है जबकि वे वास्तविकता के स्तर पर जीते हैं । एक वृहत्तर प्रतीक के रूप मे ईश्वर पद की अर्थ एवं प्रयोग की संभावनाओ की भी पड़ताल की जानी चाहिए । चाहे वह अर्थ परिवर्तन के माध्यम से ही क्यों न हो !
मनुष्य और ईश्वर दोनों की मुक्ति का रास्ता भी विमर्श से होकर ही गुजरता है । किसी का भी सोचना उसमे सहायक हो सकता है । मेरा चिन्तन तो विकल्प की चिन्ता से प्रेरित है । किसी को जूता दिए बिना चप्पल फेंक देने का उपदेश देना उचित नहीं । एक और बात है जो शिक्षक पेशे से सम्बन्धित है । पाठ्यक्रम में होंने के कारण जिससे असहमत रहा हूँ, उसे भी पढाता रहा हूँ । मेरे फेसबुक मित्रों मे बहुत से हिन्दी शिक्षक है । उनके लिए इस तरह का विमर्श भी उपयोगी हो सकता है ।
प्राचीन धार्मिक चिन्तन मे जीवन जीने का कई पीढ़ियो का अनुभव भी समाहित है। समय-विशेष के समाज मे प्रचलित मूर्खताओ और चेतावनियो को भी धार्मिक आख्यान का विषय बनाया गया है । रामायण मे साधुवेशधारी रावण द्वारा सीता-हरण का प्रसंग तथा उसके पहले सोने के हिरण का पीछा करते राम द्वारा अपने दाम्पत्य जीवन को गंवाने का प्रसंग ऐसा ही चेतावनीपरक है ।
इसी दृष्टिकोण से गीता का दूसरा अध्याय सभी को पढना चाहिए । इसमें महामानव बनने -बनाने की मनोवैज्ञानिक युक्तियाँ हैं । मन और मनोविज्ञान के अतिक्रमण का शास्त्र छिपा है । श्रीकृष्ण के लिए योग कर्म यानि सक्रिय जीवन जीने का विज्ञान था । दूसरे शब्दों में योग उनके लिए कुशलतापूर्वक कर्म करते हुए जीवनयापन करने के लिए अनुकूल और सहायक चित्त को पाना था । इसे मै विवेक प्रबन्धन की विद्या कहना चाहूँगा ।
यह मत पूछिएगा कि गीता यदि मैने पढ़ी है तो महामानव क्यो नहीं बना ? दरअसल महामानव समय और इतिहास की मांग और पूर्ति के नियम के अनुसार प्रसिद्धि पाते यानि समाज द्वारा बनाये जाते हैं । स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने निन्दको के मारे जाने तक शिशुपाल और दुर्योधन से गालियाँ खाते रहे । ख्यात-कुख्यात न सही गोपनीय या पारिवारिक स्तर के महामानव तो आप और हम (बिना नाम के भी) बन ही सकते है । बस अर्जुन की तरह बन्धु-बान्धवो की हत्या करने की मशीन मत बन जाएगा । हाॅ गीता के साथ वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैत को भी समझना होगा तभी आप इस रहस्य का भेदन कर पाएंगे कि सब कुछ या केवल श्रीकृष्ण ही नही आप भी कुछ कम नहीं ।
शुद्धाद्वैत के अनुसार यह सारा जगत ब्रह्म ही है । सृष्टि का उद्देश्य आनन्द की सृष्टि है न कि दुख । ब्रह्म ही एक से अनेक हो गया है । वल्लभाचार्य उपनिषदों की इस सूक्ति को अपने शुद्धाद्वैत का आधार बनाते हैं । एकाकी न रमते ,सो कामयत्,एको-अहं बहुस्याम,' अर्थात् ब्रह्म का अजर-अमर अकेला अस्तित्व ऊब या बोर हो रहा था । उसने कामना की कि मै एक हूँ, अनेक हो जाऊँ । सर्व समर्थ होने से यह इच्छा ही सृष्टि की रचना का कारण बनी । इसलिए निरन्तर आनन्दित रहना हम सभी का कर्तव्य है । श्रीकृष्ण ने मुझ अन्तर्यामी को कृश न करने की चेतावनी दी है । यानि स्वयं को कष्ट देना भी आध्यात्मिक दृष्टि से अपराध है । दूसरों के ईश्वर-रूप को न पहचान कर दुख देने वाले तो आध्यात्मिक दृष्टि से अपराधी हैं ही । इस तरह इस दुनिया का हर जीव विकेन्द्रित ईश्वर ही है । वल्लभाचार्य के दर्शन के अनुसार यह सारा जगत ही ब्रह्म की मूर्ति है । केवल मन्दिर के भीतर ही ईश्वर होने का विश्वास रखने वाले आध्यात्मिक दृष्टि से अज्ञानी और मूर्ख है । वल्लभाचार्य ने जड़ जगत को अक्षर ब्रह्म कहा है ।इस ब्रह्म मे सतोगुण तो है लेकिन चित् और आनन्द नहीं है ।
जीवन जगत को आधिभौतिक यानि भौतिक से ऊपर कहा है । जिसमें सत् और चित् तो है लेकिन आनन्द का अभाव है । उदाहरण के लिए यह जागता है तो सोने के लिए परेशान हो जाता है । खड़े रहने पर बैठने के लिए । सच्चा आनन्द आधिदैविक श्रीकृष्ण (सदृश होने और जीने मे) मे ही है ।
मध्ययुगीन दार्शनिक शब्दावली मे जीवन से विमुख या विरक्त होने का सन्देश न देने वाला दर्शन और उसपर आधारित सूर का काव्य मुझे अपने ढंग का सॅर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है । मित्र को, माता-पिता को और शिशु को भी दिव्य अस्तित्व यानि ईश्वर के रूप में दर्शन करने का सन्देश देने के कारण।
बुधवार, 21 अगस्त 2019
याचक
दरअसल वे डकैत थै ।
अलग ढंग के डकैत ।
सभी को सन्तोष,त्याग और दान का पाठ पढा रहे थे ।
क्या गजब का लूट रहे थे
कि सब लुटते हुए भी
मुस्करा रहे थे ।
इस तरह वे सभी का ध्यान
असली जरूरत मंदों से
फर्जी याचकों की ओर
भटका रहे थे
जो स्वाभिमानी भूखे थे
दम तोड़ रहे थे बन्द कमरों मे
और पेशेवर मंगते
सारे शहर मे
गुलछर्रे उड़ा रहे थे ।
देवता
उनका दोष यही था
कि वे देवता हो चुके थे
धरती से ऊपर उठ चुके थे
धरती से सम्बन्ध-विच्छेद हो चुका था उनका
अब वे स्वर्ग से बर्खास्त होने पर ही
धरती पर अपने अवतरण के लिए
सोच सकते थे !
धरती को
और धरती वालों को बचाने के लिए
उनका स्वर्ग से बर्खास्त होना बहुत जरूरी था ।
रामप्रकाश कुशवाहा
21-08-2019
रविवार, 4 अगस्त 2019
मित्रता
अस्तित्व के धरातल पर हम सब एक ही जीवन की पुनरावृत्ति है । सैद्धांतिक दृष्टि से देखें तो लगभग क्लोन । सृष्टि के लम्बे विकास क्रम ने जैव-विविधता भी दे दी है । इससे अस्तित्व की हर ईकाई मे भिन्नता आई है । इसने हमें पूरक भूमिका में ला दिया है। यहां तक कि स्त्री-पुरुष विभाजन भी प्रजाति की रक्षा के लिए ईकाई की भूमिका मे है। पुनरावृत्ति होने के कारण हम सब एक-दूसरे को अतिरिक्त और फालतू भी बनाते हैं ।हमारा अतिरिक्त या फालतू होना भी प्रकृति ने प्रजाति की सुरक्षा के लिए किया है ।लेकिन हमारा निकट अतीत जंगल की असुरक्षाओ से घिरा रहा है ।हिंसक जीवों की उपस्थिति के बीच हम समूह मे ही सुरक्षित रहे हैं । मुझे लगता है मित्रता इसी साझी सहजीविता का अवशेष हैं । आज तक का संस्थागत विकास बाजार संचित पूॅजी और वेतन के बल पर अकेले मे भी सुरक्षित जीने की सुविधा देता है लेकिन पोषण के लिए भी हम समाज निर्भर रहते ही हैं । यद्यपि शिकार और कृषि के माध्यम से एकाकी जीवन भी जिया जा सकता है लेकिन ऐसा जीवन अपवाद मे ही जिया जा सकता है । यह प्रजाति की मृत्यु की ओर ले जाएगी न कि प्रजाति की अमरता की ओर ।
मित्रता रिश्तो की एक अनन्य कोटि है । मित्र-धर्म अन्य धर्मों से बढकर और वास्तविक ही है । कहतें है किशोरावस्था-युवावस्था की मित्रता चिरस्थायी होती है । पुराण और इतिहास मे कृष्ण,,ईसा मसीह ,मुहम्मद ,सिकन्दर ,चंगेज खाँ और बाबर को उसका मित्रों ने ही विजेता बनाया था , न कि भाडे के सैनिकों ने । अन्तर्मुखी व्यक्तित्व होने के कारण मेरे वास्तविक मित्र कम ही हैं । फेसबुक वाले मित्र समानधर्मा तो हैं लेकिन वास्तविक जीवन मे उनके मित्र-धर्म की परीक्षा अभी नहीं हुई है । दरअसल फेसबुक वाले मेरे सम्मान के पात्र हैं ।इसलिए कि अधिकांश से उनकी प्रतिभा से मै प्रभावित हुआ हूँ । इनमे से बहुत से लोग वास्तविक मित्रता की ओर अग्रसर विचाराधीन मित्र है । संभव है कोई भविष्य का महत्वपूर्ण मित्र भी इनमें मिले । ऐसे सभी मित्रों को मित्र दिवस की अग्रिम शुभकामनाएँ और बधाई ।
उन मित्रों को विशेष रूप से बधाई और शुभकामनायें जो मेरेो जीवन और परिवार के अभिन्न अंग बन चुके हैं ।
जीवन मे अनौपचारिक और अनन्य मित्र कुछ ही हो पाते हैं । वह भी स्वाभाविक समानधर्मा ही । अचार बनने की तरह मित्र बनने मे भी समय लगता है । बहुल अधिक अंतर्मुखी और एकान्तप्रिय लोगों को असुविधा भी होती है । मेरे सबसे महत्वपूर्ण मित्र वे ही हैं जिनके मित्र बने रहने की चिन्ता से रिश्ते पूरी तरंह मुक्त हैं ।
गुरुवार, 20 जून 2019
प्राणायाम
प्राणायाम को कुछ लोग जरूरत से ज्यादा आध्यात्मिक रहस्यीकरण करते हैं । इससे उन वैज्ञानिक लाभों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता जिसका सिर्फ़ मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्व है ।
अनुलोम-विलोम द्वारा श्वास-चक्र पर नियंत्रण के प्रयास मे हमारा ध्यान बाह्य लोक के प्रपंच से कटकर अपने शरीर क अभियान्त्रिकी से होते हुए विशुद्ध अस्तित्व-बोध तक पहुँचता है । दूसरा लाभ यह होता है कि हम श्वास रोककर जब आक्सीजन का कृत्रिम अभाव पैदा करते हैं तो शरीर कुछ-कुछ वैसी ही क्रिया- प्रतिक्रिया करता है जैसी कि तिब्बत की अधिक ऊंचाई पर रहने वाले पर्वतीय निवासियों में कम आक्सीजन की स्थिति मे लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन शरीर बढा देता है । इससे कम आक्सीजन मे भी फेफडों का ग्राह्यता स्तर बढ जाता है । कहना न होगा कि कबड्डी के खेल और देर तक की गोताखोरी से भी कुछ ऐसा ही वैज्ञानिक लाभ मानव-शरीर को मिलता है ।
रामप्रकाश कुशवाहा
20-06-2019
बुधवार, 15 मई 2019
आत्मा का रहस्य
आत्मा या प्राण की अवधारणा जीवन की अवधारणा से भिन्न है । अलग-अलग संस्कृतियो कै विश्वासों मे भी अन्तर है । मरने के बाद भी इसकी अवधारणा मे जैव विद्युतीय रूप मे अस्तित्वमान रहना प्रमुख है । इस्लाम आदि मे बलि प्रथा द्वारा आत्मा के पोषण एवं दीर्घजीवन का विश्वास है । भारतीय संस्कृति एवं जनजातीयो मे भी ऐसा ही विश्वास मिलता है । जीवों मे जैव विद्युत का उत्पादन, एवं विद्युतीय आवेश की प्रकृति का अध्ययन होना चाहिए । जैसे जनरेटर बन्द होते ही विद्युतीय आपूर्ति बन्द हो जाती है ,वैसा है या जैसे आकाशीय बिजली तड़ित का आवेश चमक के बाद भी धरती मे समाने तक आवेश रूप मे बनी रहती है-वैसा है । तड़ित की तरंह है तो कुछ समय तक और कुछ स्थितियो मे आत्मा के आवेश रूप मे बने रहने की संभावना को सिद्धान्ततः स्वीकार करना होगा । जो भी होगा प्रकृति के नियमों के अधीन ही होगा ।
शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019
पांडित्य और बुद्धत्व
गुरुवार, 28 मार्च 2019
होली
लोक पर्व होली को पौराणिक और पुरोहिती पाठ से न देखने पर ही इसका महत्व और रहस्य खुलता है।हिरण्य कश्यप का वध भी हिरण्य यानि सोने के समान पकी हुई फसल का काटना है। नरसिंह के रूपक में किसान के सिंह केसमान पराक्रम का मानवीकरण है। झस मिथकीय कथा को रूपक के रूप में देखने से ही इसका काव्यात्मक निहितार्थ खुलता है।जैसे फसल को काटने के लिए होने वाले हिंसात्मक कार्य की तुलना सिंह के शिकार से करते हुए उसे नरसिंह के रूप में देखा गया है।होली समबन्धी मिथक में आए सभी नाम इतने सुस्पष्ट हैं कि कथा की कालपनिकता पर विवाद न करते हुए उसके प्रतीकार्थ के महत्व की ओर ध्यान देना चाहिए।
इधर कुछ ऐसे पोस्ट देखने को मिले हैं कि जिसमें होलिका के एक स्त्री -प्रह्लाद की बुआ,को जलाने के आधार पर होली त्यौहार का ही विरोध किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में मुझे जो कहना है वह कुछ इस प्रकार है कि हिन्दी में तो इ और आ स्वर की उपस्थिति मात्र से शब्द को स्त्री मान लिया जाता है।संस्कृत में पुलिंग,स्त्रीलिंग के साथ नपुंसक लिंग भी मिलता है। इस तथ्य को देखते हुए यह सोचना ठीक नहीं होगा कि कोई स्त्री वाची शब्द वास्तविक स्त्री का भी द्योतक है। हिन्दी और संस्कृत में होलिका और होली शब्द भी अन्त में आ और ई होने के कारण स्त्रीलिंग है। इसी लिए पौराणिक कथा में भी होलिका को स्त्री माना गया है। इस तथ्य को देखते हुए कि संस्कृत में हवन,स्वाहा और हवि शब्द भी मिलता है।अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए ईधन सामग्री डालने के अर्थ में। इस दृष्टि से होलिका शब्द की व्युत्पत्ति हवि पत्रिका शब्द से हवलिका होते हुई होगी । संस्कृत के भव से ही भोजपुरी का हव और हौ तथा हिन्दी का होना आदि निकले है । भाषा-परिवर्तन के इस नियम से प्राचीन काल मे होली शब्द भी होली तो नही ही रहा होंगा । नियम से प्राचीन काल मे होली भी होली नही रहा होंगा ।। इस रोचक भारतीय लोकपर्व को बेवजह बदनाम करना ठीक नही है। यह आदिम काल से चला आने वाला लोकपर्व है। यह साधारण किसान अनुभव है कि घास और झाड़ियों में आग लगाने पर हरी पत्तियाँ बची रह जाती हैं।ये हरी पत्तियां ही प्रह्लाद हैं और पुरानी पत्तियों का जलना ही नयी पत्तियों की बुआ होलिका का जलना है।
विगत वर्ष अपने एक चिन्तन में होली को मैंने एक ॠतु पर्व माना था।होलिका दहन में हो शब्द भाषा वैज्ञानिक नियमानुसार भव शब्द से अपभ्रंश काल में निकला होगा। प्रह्लाद का शब्दार्थ भी प्र -आह्लाद से श्रेष्ठ आनंद या उल्लास हुआ। इस व्युत्पत्ति के अनुसार मैंने होलिका को जो भी हो चुका है यानि पतझड़ में गिरे पुराने पत्तों के जलाने एवं प्रह्लाद के बचने को वसन्त के नए पत्तों या पल्लवों के आगमन से माना था। इस ॠतुपर्व होली की आप सभी मित्रों को बधाई। निरर्थक अतीत को जलाकर नव्यतम और श्रेष्ठतम सुख प्राप्त करने के लिए आप सभी को शुभकामनाएँ
जाति-विमर्श-1
पारम्परिक वर्ण व्यवस्था के खाते मे भूमिहार फिट नहीं बैठते । यादवों की तरह वे भी नस्ल से सवर्ण होते हुए भी सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टि से अछूत बनाकर रखे गए है । मुझे तो उनका भी विद्रोह और क्रान्तिकारिता मनोवैज्ञानिक दृष्टि से साधार और विश्वसनीय लगता है ।
इस पोस्ट को पढ़कर मेंरे एक मित्र ने बातचीत मे कहा कि भूमिहारों के वर्ण को लेकर ब्राह्मण या क्षत्रिय होने को लेकर द्वैत का जो संकट है-उसका आधार वैवाहिक भी हो सकता है । वे यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि बन्द वैवाहिक सम्बन्ध वाली कोई जाति यदि जातीय समूह के रूप मे नही हैं तो उन्हे वर्ण नहीं माना जा सकता । वर्ण माने जाने के लिए समानधर्मी जातीय समूह होना जरूरी है । ब्राह्मण और क्षत्रिय इसलिए जाति के साथ-साथ वर्ण भी माने गए कि इनमे परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध मे बंधे विभिन्न जातीय अस्मिता वाले समूह हैं ।
लेकिन मुझे उन मित्र से बात करते हुए यह भी लगा कि वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत ही रखकर पूरे भारतीय मूल की जनसंख्या को हिन्दू मानने वाले लोग इस्लाम पूर्व के बड़े जाति- प्रवासो की अवहेलना करते हैं । दृढ कबीलाई संस्कारों वाली कई जातियाँ अपनी स्पष्ट नस्लीय विशेषताओ के कारण सवर्ण जातियों के लिए निर्धारित जैविक विशेषताओ को चुनौती देती रही है । यह भी एक तथ्य है कि प्राचीन भारतीय गणराज्यो से सम्बन्धित अधिकांश जातियाँ स्पष्ट एवं दृढ कबीलाई एकता, नियमों एवं वर्जनाओ को जीने वाली रही हैं । हिन्दू जातियों मे भूमिहार,जाट,गूजर,अहीर,कुर्मी और कोइरी आदि ऐसी किसान जातियाँ हैं जिनका वर्ण व्यवस्था के अनुसार पेशेवर आधार नहीं मिलता । इन बडी जनसंखयात्मक जातियों मे चाहे वे सवर्ण मानी जाती हो या अवर्ण- उनमें अत्यन्त दृढ़ अनतर्वैवाहिकता मिलती है । इनमें से अधिकांश के पास अत्यन्त समृद्ध रीति-रिवाज और जातीय परम्पराएं है । ये अपने संख्या बल से प्रतिरोधी और आक्रामक हैं । इनमे अपने मुखिया या चौधरी को भी बराबरी की शर्तों और व्यवहार के साथ अपने मे से एक मानने की प्रवृत्ति पाई जाती है न कि व्यक्ति विशेष को अत्यन्त श्रेष्ठ एवं व्यक्ति पूजा के योग्य मानने की प्रवृत्ति । मेरा मानना है कि अपनी जाति के लोगों को अपने से बड़ा न मानने की प्रवृत्ति ही प्राचीन गणराज्यो वाले अतीत से सम्बन्धित वर्तमान जातियों की विशेषता है । ये जातियाँ व्यक्ति के नेतृत्व को महत्व देने वाले कुलीन राजतंत्रो की अधीनता और संस्कारों की प्रतिरोधी रही हैं । एक स्थापना यह भी है मेरी कि वर्ण व्यवस्था वाली ऊंच-नीच की भावना का विकास दीर्घकालिक रूप से स्थापित महाजनपदो मे हुआ । ये स्थायित्व के कारण कुलीनता और आनुवांशिकता पर आधारित वर्ण-व्यवस्था वादी सत्ता का विकास कर सके ।
आर्यों के जो समूह बाद मे आए उन्हे वर्ण व्यवस्था बन चुकने के कारण क्षत्रिय स्वीकार नहीं किया गया । भारत मे शक हूणों के वंशज तथा अन्य बहुत सी ऐसी जातियाँ है , वे जहाँ से आए थे वहाँ इस्लाम फैल जाने के कारण भारत मे ही हिन्दू जातियों मे शामिल होकर रह गयीं । यद्यपि वर्ण व्यवस्था मे सही स्थान नहीं पा सकीं । अधिक सम्भावना यही है कि जाट और भूमिहार प्राचीन गणराज्य वाली जातियों के वंशज है । यादवों का तो गणराज्य था ही । इनकी स्वतंत्र रहने की आकांक्षा को महाजनपदो के राजतंत्र से शासित ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने मिलकर स्वीकार और सम्मान नहीं किया ।
शनिवार, 2 फ़रवरी 2019
पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य : भूमिका एवं चुनौतियां
भारत मे पत्रकारिता का विकास ब्रिटिश भारत में हुआ था । इसीलिए उसका स्वरूप प्रारम्भ से ही राष्ट्रवादी रहा है । उसके पास एक उद्देश्य था । आधुनिक सभ्यता की चुनौतियों का सामना करने की चिन्ता थी ।
आजादी के बाद पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की मान्यता देकर पत्रकारिता से सजग पहरेदारी की अपेक्षा की गयी थी ।
बुधवार, 30 जनवरी 2019
ईश्वर विमर्श
ईश्वर-विमर्श : यह एक असाहित्यिक कृति इस अर्थ मे है कि इस कृति के सृजन के पीछे साहित्यकार बनने की आकांक्षा नहीं है । मुझे तो विद्यार्थी जीवन मे ही धर्मयुग हंंस वर्तमान साहित्य और जनसत्ता आदि मे प्रकाशित होने का अवसर प्राप्त हुआ था। दरअसल मै अपने लिए भी धर्म, सम्प्रदाय, नास्तिकता- आस्तिकता ,प्रकृति और ईश्वर जैसे प्रत्ययो के अर्थ ,औचित्य और भूमिका के प्रति जिज्ञासु रहा हूँ । लम्बे चिन्तन ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचाया है कि भारत की हजार वर्ष लम्बी गुलामी और वर्तमान लोकतंत्र को भी सहयोगपूर्ण सांस्कृतिक पर्यावरण न मिलने की वजह उसकी जीवन,जन्म और स्त्री मात्र को ही हिकारत से देखने वाली दार्शनिकी है ।का रहस इधर बीच दलित चेतना के उभार और असन्तोष ने भी उसकी संकीर्णता को गम्भीरता से प्रश्नांकित किया है । बौद्ध धर्म चित्त-सौन्दर्य पर बल देता है लेकिन अंधविश्वासों के बावजूद जो जीवन-पद्धति के क्रमिक विकास की साभ्यतिक समझदारी है वह सनातन धर्म की अव्याख्यायित परम्पराओं और ऊल-जलूल रीतिरिवाजों में छिपी है । आधुनिक वैज्ञानिक विचारधारा के आलोक मे इनकी समाजशास्त्रीय भूमिका तथा स्वीकार- अस्वीकार किए जाने का योग्यता- परीक्षण भी अभी नहीं हुआ है । भाषा और साहित्य के विकास के कारण कर्मकाण्ड से लेकर मूर्तिपूजा तक हिन्दू धर्म प्रतीकात्मक। होता चला गया ।
कुछ अपर्याप्तंताएं तो स्पष्ट है जैसे कि हिन्दू धर्म के पास जो जातीय पाठ है,उसका चरित्र लोकतांत्रिक समानता का विरोधी है और विषमता तथा दुर्भाग्य को भाग्यवाद- नियतिवाद से जोड़ने के कारण गीता के कर्मवाद को भी नेपथ्य मे डालने और उपेक्षित करने का प्रयास करता है । धार्मिक कथाओं की मानवीय व्याख्या का विरोधी तथा एक सीमा तक अक्षम भी है ।यह श्रद्धा कै नाम पर अतार्किकता को प्रोत्साहित करती है । मनुष्य को दीन-हीन बताने की मनोवैज्ञानिक साजिश करता है । सबसे खराब बात यह है कि इसके सांस्कृतिक साफ्टवेयर मे सुरक्षात्मक आशंका और प्रतिरोध का विधान ही नही किया गया है । दूसरे शब्दों मे भारत मे प्रश्न करने की संसकृति ही नही है । इससे नयी पीढी मे मौलिक चिन्तक और वैज्ञानिक उत्पन्न करने की संभावनाएं अत्यन्त कम हो गयी हैं।
अन्तिम बात यह है कि नयी सभ्यता विज्ञान पर आधारित है । क़ायदे से हमे जहाँ विज्ञान ले जाए वहाँ जाना चाहिए। कुछ लोग विज्ञान और ईश्वर दोनो को एक साथ जीना चाहते हैं। कुछ लोग विज्ञान को पूरी तरह छोड़ कर अब भी ईश्वर के पास रहना चाहते हैं। इस कृति के सर्जक का यह प्रयास रहा है कि ईश्वर को केन्द्र मे रखकर मनुष्य के वैयक्तिक- सामाजिक व्यवहार और लाभ- हानि का भी सम्यक् अध्ययन होना चाहिए । जिससे यदि धर्म और ईश्वर पर अपनी निर्भरता कम भी करना चाहें तो एक समानान्तर आदर्शों का कोई लोक हो हमारे पास । निष्कर्षात्मक सूत्र यह है कि एक समर्थ विचारशील, बुद्धिमान और महान व्यक्ति ही ईश्वर की जरूरत को न्यूनतर कर सकता है । क्योंकि समाज ईश्वर की तरह व्यवहार करता है ।बिना एक सुरक्षित समाज और व्यवस्था की रचना किए हम ईश्वर को सेवानिवृत्त या अप्रासंगिक होने की घोषणा भी नहीं कर सकते ।
हमारी बूढ़ी सभ्यता ने हमें एक अभियान्त्रिक उत्पाद मे बदल डाला है।अपनी अभियान्त्रिक निर्मिति को समझना और उससे मुक्त होना ही मोक्ष है । भीरु आस्तिको की तरह अन्धविश्वास जीने और साहसिक नास्तिको की तरह आँख मूँदकर धर्म और ईश्वर को रिटायर करने के पहले मैने उसकी मनोवैज्ञानिक-सामाजिक भूमिकाओं और पर्यावरण का गहरा अध्ययन किया । फिर अपने लिए उसका निजी संस्करण या पाठ निर्मित किया । विज्ञान- युग की आधुनिक पृष्ठभूमि के कारण इस पुनर्रचना और पुनःपाठ का परम्परागत रूढियों और विश्वासों से सीधा सम्बन्ध नहीं है। मै अपनी इस कृति को कबीर की माॅ की तरह धूल और जमीन पर फेंक देना चाहता हूँ कि उसमे यदि दम हो तो पाठकों की तमाम परीक्षाओं से गुजरते हुए अपनी जगह बनाए । सिद्धान्ततः इस कृति को वाराणसी से ही प्रकाशित होना था । मेरे टाइपिस्ट मित्र श्री दिनकर यादव ने लेखक को मिलने वाला आई एस बी एन नम्बर इसके लिये प्राप्त कर लिया है। अन्तिम प्रूफ रीडिंग के साथ यह पुस्तक शीघ्र ही उपस्थित होगी । इस कृति का उद्देश्य एक जिम्मेदार बौद्धिक विमर्श का आवाहन करना है ,न कि मानवता को पुनविभाजित करने वाला कोई नया सम्प्रदाय खडा करना ,इसलिए इसमें सभी धर्मों से सम्बन्धित विचार कविताएं हैं। क्योंकि यह मुक्त और आत्मसम्बोधित प्रकार की कृति हैं ,इसीलिए इसका नाम मैने " मैंने अपना ईश्वर बदल दिया है " रखा है । यह कृति और उसका कृतिकार दूसरों पर अपनी विचारधारा थोपने पर विश्वास नहीं करता । हाॅ असहमति थी इसलिए अपना ईश्वर बदला,असंतुष्ट था इसलिए अपना नया और मौलिक ईश्वर चुन लिया। सिर्फ इतनी सी बात है । इन कविताओं का रचना काल पैतीस चालीस वर्ष तक फैला हुआ है ।कुछ महत्वपूर्ण और नयी जीवन-दृष्टिया इसके विमर्श को महत्वपूर्ण बनाती है ।
लेकिन बहुत से लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर वास्तव मे भ्रमो और आदतों को ही जी रहे होते हैं और उस विज्ञान तक कभी नहीं पहुँच पाते जो उनके जीवन और इस दुनिया को सुखद और सुन्दर बना सकता है। अन्त मे यह कि यह शैक्षणिक निष्ठा औरृ दृष्टिकोण से की गयी वैचारिक प्रस्तुति है ।इसमें गुण- दोष पक्ष- विपक्ष दोनों का सम्यक् विवेचन है । मेरे अधिकांश पूर्व स्थापित मित्र इस कृति की सूचना को लेकर अनावश्यक रूप से आशंकित और विचलित हैं। विगत तीस- चालीस वर्षों से जिन भावों को अपने जीवन के एकान्त में जीता रहा हूँ। उसको सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने का प्रयास मात्र है।
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यद्यपि नश्वरताबोध हमारे सांस्कृतिक चिन्तन की मूल प्रेरणा है । प्रलय,कयामत,शून्य और अंधेरा आदि इस सृष्टि के पृष्ठभूमि स्तर के सच हैं इसके बावजूद सृष्टि सूर्य जीवन प्रकाश आदि उपस्थितियो का अपना महत्व है । विज्ञान भी प्रकृति के गुणधर्म और संभावनाओ का ही अध्ययन करता है । आविष्कार भी वही हो सकेंगे जिनकी प्रकृति अनुमति देगी ।रसायनों के यौगिक क्रिया-अभिक्रिया के रूप मे हमारी एक वैज्ञानिक इयत्ता भी है ।हम सभी का जीनकोड वैज्ञानिक दृष्टि से भी सुरक्षित और संरक्षित है ।हमारा होना उतना मिथ्या और काल्पनिक भी नहीं। है जितना धर्म और मायावादी बतलाते हैं । ऐसा सोचना ताजे खिले फूल को इसलिए कोसने जैसा है कि वह एक दिन मुरझा जाएगा । हमे जीवन का सम्मान करना चाहिए ।
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