बुधवार, 15 जून 2016

कविताएँ

समय में और समय में नहीं
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मैं अपने समय में हूँ
मैं इतना स्वतन्त्र हूँ कि
अपने हिस्से के समय को जी सकता हूँ !
लेकिन 'माफ़ कीजिएगा'-मैं अपने प्रति
पुरे सम्मान और सहानुभूति के साथ
आपका अपने समय में न होने का
शोक-गीत लिखना चाहता हूँ !

आपकी तरह मैं भी बीते हुए कल की संतान हूँ
लेकिन आप तो बीता हुआ कल ही हैं
मेरे
समय में और समय में नहीं
 समय के जीवित अतीत !



मित्र का होना


जब सारे शहर में जेबकतरे फैले हुए थे 
मुझे अपने मित्र की याद आ रही थी
मैं सोच रहा था 
कितना फर्क पड जाता है 
इस दुनिया में किसी अपने के मित्र होने या न होने पर 
किस तरह एक अजनबी शहर रिश्तेदार बन जाता है 
एक छोटी सी सूचना के बाद....



अच्छे आदमी


अच्छे आदमी स्व्यं में  महत्वपूर्ण घटना हैं
अच्छे आदमी जो कभी चिढ़ाते रहे हैं शैतान को
सच करते रहे हैं धरती पर होना ईश्वर का

अच्छे आदमी ईश्वर के बिना भी अच्छे रह सकते हैं
जब वे नाराज होते हैं और किसी को भी नहीं मानते
जब वे खुश रहते हैं और आमंत्रण कि मुद्रा में होते हैं
अच्छे आदमी अच्छे ही रहते है 




बिकना 



लोग अपनी  आत्मा बेचकर अहंकार खरीदते हैं
मैं नहीं बिका तो क्या आसमान टूट पड़ेगा
सिर्फ यही न कि मैं धरती में धंस जाऊँगा
या बहुत हुआ तो पाताल तक

न बिकना भी तो सुरक्षित होना है
बाजार को नापसंद करते हुए
घर बसाना भी कोई बुरा सौदा नहीं

लोग घर बेचकर बाजार खरीदते हैं

मुझे  नहीं बेचना  अपना घर ....


कंक – संवेदना


अज्ञातवास में राजा विराट के यंहा 
एक अधीनस्थ  कर्मचारी गुमनाम कंक बनाकर रहना भी 
क्या  और  कितना ही अजीब  अनुभव  रहा होगा  सर्वकालिक  ज्येष्ठ  भ्राता  युधिष्ठिर !
कैसा लगा होगा तुम्हें यह मध्यवर्गीय  अनुभव 
कितना घुटे होगे निषिद्ध  चाकरी  का अनुबंध निर्वाहते  हुए !
यह भी  संभव है  कि तुमने  कूब  मजा  लिया होगा -
हाँ  साहब !  जी साहब ! क्या  खूब साहब !  और  क्यों  नहीं  साहब  बोलते हुए 
और  जब तुम ऐसा  कर रहे होगे तो भीतर से 
यानि  कि  तुम्हारी अंतरात्मा के अनकहे होठों से 
रजा  विराट के  प्रति  क्या वैसी  ही  फूटती होगी  गाली 
जैसी  कि  आज ?
साहब  हो  गया  है तो  अपने को  पता  नहीं  क्या  समझता है ...
खडूस है 
चापलूसी  नहीं  करो तो पचता  ही नहीं खाना 
क्या  डोंट खाने  के  बाद  तुम्हारे भी  मन में उठाता  था वैसा 
आपराधिक  दुर्भाव -कि  मन करता है उसको  अपना जूठा पानी पिला दूं 
उसके शरबत में क्यों  न मिला दूं  अपनी पेश -आब ...
जी हजूरी  करते हुए  भीतर  से  आते  थे 
ऐसे -ऐसे तुममें भी  कितने  कुविचार  
मैं  जानता हूँ  कि तुम्हें  काफी  अप्रिय  और  कटु  अनुभव  करना  पड़ा होगा 
क्योकि  तुम युधिष्ठिर  होते हुए भी 
अज्ञातवास की आजीविका के  लिए 
कंक  होने  का सिर्फ  अभिनय  कर रहे थे 
यह  भी  हो सकता है कि  तुम अपनी दुर्भाग्यपूर्ण 
अल्पकालिक स्थिति का  मजा ले रहे होगे 
जीवन के विराट मंच पर 
एक अपरिहार्य -आवश्यक अभिनय मात्र मानकर 
नौकरी में  अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छिपाकर 
एक ओढ़े हुए कृत्रिम प्रायोजित व्यक्तित्व के साथ जीना 
तुम्हे कैसा लगता रहा भ्राता युधिष्ठिर  !



शेयर 


सिर्फ मैं ही नहीं हूँ 
दूसरे भी हैं मेरे साथ
मेरे समय में .....
सब मेरे लिए नहीं हो सकता
न मैं सभी के लिए हो सकता हूँ
हमें जीना जानना और अधिकार
सभी कुछ बाटना होगा ....
हम सिर्फ इतना ही जान सके हैं अब तक
कि हवा अधिक दबाव से
कम दबाव के क्षेत्र की ओर बहती है
और जल प्रवाहित होता है
ऊपरी तल से निचले तल की ओर ...
लेकिन ज्ञान !
हम अपनी अज्ञानता पर शरमाते हुए भी
चुपके-चुपके दूसरों से सीखते और
स्वयं को सुधारते जाते हैं ,,,,
समस्या कुछ इस तरह है कि
हमारे कसबे में
ज्ञान की एक साथ खुल गयी हैं कई दूकाने
सडक के दोनों ओर
ज्ञान भिक्षुओं का इंतज़ार कर रहें हैं
प्रदाता कोच और उनकी कोचिंग ...
वहां बैठा हर ज्ञानी
पूरेआश्वासन के साथ
जीवन का पूरा सत्र मांगता है ....
सुना है ज्ञानी होना आसान है
लेकिन समझदार होना कठिन
बहुत पहले मेरे गुरु नें दी थी यह चेतावनी
यदि तुम सफलता चाहते हो तो
अपनी अतिरिक्त समझदारी को छिपाए रहो
कि अपने समय के औसत दिमाग से
अधिक समझदार होना खतरनाक है
कि सुकरात मारा गया था अपनी समझदारी
न छिपा पाने के अपराध में
और युधिष्ठिर सिर्फ नैतिक और मूल्यजीवी बने रहने के प्रयास में
पत्नी द्रौपदी से हाथ धो बैठा ....
गुरु नें कुछ ऐसी भी दी थी सीख
कि सिर्फ अपने अहंकार को ही नहीं
अपने स्वाभिमान की उगी हुई सींगों को भी
यत्नपूर्वक छिपाए रहो ..
लोग उनका खुलेआम दिखना बर्दाश्त नहीं करते
कि तन कर खड़े होने से
झुककर बैठना अधिक आरामदायक होता है ''
उनकी सारी सीखों के बाद भी
बार-बार कर जाता हूँ गलतियाँ
जहाँ चुप रहना चाहिए बोल जाता हूँ वहां
जहाँ रुक जाना चाहिए उसके बाद भी लिखता जाता हूँ अलेख्य
उन्होंने यह भी कहा था कि
सुनिश्चित सफलता के लिए-
किसी भी साक्षात्कार में वैसा कुछ भी नहीं बताना
जिसे तुम सच समझते हो और वह वास्तव में सही भी हो
या जो सही होते हुए भी हो इतना मौलिको कि लोग
उसका विश्वास ही न कर सकें
बताना सिर्फ वही और उतना और वैसा ही सच
जितना कि प्रश्न पूछने वाला सच के रूप में जानता हो
जैसा कि सामने वाला जानता हो
और तुमसे भी सुनना चाहता हो ...
गोया ऐसे कि तुम्हें सच को नहीं बल्कि
सच के बारे में पूछने वाले को बूझना है
कि मौकरी पाना है तो सच के दंभ को नहीं
विद्वानों की अज्ञानता के प्रति सम्मान-भाव जीना सीखो
उन्हें प्रभावित करते हुए भी उन्हें इसका पता ही न लगने दो
कि वे तुमसे कितना कम जानते हैं....
(मानों सबसे सफल और सच्चे ज्ञानी
सिर्फ अपने ज़माने की दुर्बलुाताओं से
कदमताल करने वाले लोग हैं )
हे गुरुवर ! तुम्हारी दी हुई सारी शिक्षाएं याद हैं मुझे
लेकिन मैं उनका अतिक्रमण करने का अपराध करता रहा हूँ
अब मैं भी आपकी तरह बूढ़ा और अनुभवी हो चला हूँ
लेकिन मुझे लगने लगा है कि
हमेशा सुरक्षित और अनुशासित जीवन जीना
मानव जाति के हित में नहीं होता
कि इस दुनिया को बदलने के लिए
कुछ रोमांचक और मौलिक मूर्खताएं भी घटित होती रहनी चाहिए
कभी-कभी निकलना ही चाहिए बुद्धं की तरह
महल और सुख की सारी चिंताएं छोड़ कर ...
चुनना चाहिए अपमानों और अपराधों का शिकार होने की
संभावनाओं वाला जोखिमपूर्ण वर्जित रास्ता
नए बेहतर रास्तों की खोज के लिए ....
बाहर के सारे रस्ते भीड़ से भरे हुए हैं
बेहतर क्या होगा किसी के भी लिए -
वह यात्रा स्थगित कर दे और घर से ही न निकले
निकले और वह भी डूब जाए भीड़ को चीरते-तैरते हुए अपने गंतव्य की ओर
भीड़ के छटने का और पथ के मुक्त होने का इंतजार करे
स्वयं रुका रहे दूसरों को रास्ता देने के नाम पर
या दूसरों के साथ चले ....
सच तो यह है कि इसमे से कुछ भी सोचनीय नहीं है
कि जनसँख्या-वृद्धि ( भीड़} मानव जाति के उत्तरधिकरियो
प्रतिनिधियों का वैकल्पिक उत्पादन है
कि हर व्यक्ति वैकल्पिक और फालतू रूप से पैदा हुआ है
मानव-जाति की सुरक्षा और अस्तित्व की निरंतरता के लिए
हर व्यक्ति अपनी ओर से कुछ बोलना चाहता है और शोर उत्पन्न कर रहा है
एक समय में कुछ लोगों के चुप होने की जरुरत है कि
कुछ अच्छा बोलते लोगों को साफ-साफ सुना जा सके
इस सच्चाई की परवाह किए बिना कि
कि एक समय में अधिकांश लोग
एक जैसा ही सोचते-समझते और बोलते हैं ..
शर्त सिर्फ इतनी ही है कि जो बोल चुके हैं
उनका चुप होकर बैठ जाना जारी रहना चाहिए
कुछ बोलते लोग एक ही बात दुहराए जा रहे हैं मंच पर
यद्यपि वे थक गए हैं
फिर भी बोलते हुए दिखना चाहते हैं देर तक
मेरे पास अपने बोलने का कोई वाजिब कारण नहीं है
सिर्फ इस चिढ़ के अतिरिक्त
कि जो बोला जा रहा है उससे मेरी असहमति बढ़ गयी है
तब जबकि मैं न भी बोलूँ
सभी को सुनते रहने के लिए अभिशप्त हूँ
अस्तित्व की आवृत्ति एवं बारम्बारता वाली दुनिया में
जबकि संगठित होकर अपराध करने वाले गलत्कारियों की संख्या बढ़ गयी है
हमें इस दुनिया को शेयर करते हुए ही जीना चाहिए
छोड़ कर बार-बार हटने की इच्छाओं के बावजूद
मैं अभी फेसबुक पर बना रहना चाहूँगा
शेयर करते हुए
जो जहाँ और जितना है
वहां और उतना उसके लिए उसके हिस्से की दुनिया छोड़कर ....
( श्रद्धेय गुरुवर स्वर्गीय विजय शंकर मल्ल जी की पावन स्मृति को समर्पित )
३१.०५.२०१६


मातृ-शोक


माँ की अन्तिम यात्रा के बाद
कुछ हुआ है ऐसा कि
जब मैं लौटना चाहता हूँ घर को
घर अब घर की तरह नहीं रह गया है
वह उदास और धूसर है
किसी भी जीवन-संवाद से वंचित
उनकी जड़ता की अन्तिम स्मृति की तरह ....

जैसे गुजराती हुई ट्रेन से दृश्य बदलता है
जितनी तेजी से दृश्य बदलता है
उतनी तेजी से भागता हुआ लगता है समय
बचपन में हमारा सोना-जागना –उठाना –गिरना खेलना
खाना-पीना हँसाना –बोलना चीखना
चाहे वह आँगन में ही क्यों न रहा हो
वे सारे दृश्य एक पीछे छुट गयी यात्रा की तरह लगते हैं ...

पड़ोसियों के ढेर सारे बच्चो सहित हम सारे नन्हे मित्र
आज एक बड़ी परियोजना के हिस्से की तरह याद आते हैं
उन दिनों जब ढेर सारी माएं
नयी पीढ़ी की उंगलियाँ पकड़ कर उन्हें चलना सीखा रही थीं
उस भीढ़ में माँ मेरे लिए  कुछ खास थीं
और मैं भी उनके लिए
यह एक विशिष्टता और अनन्यता का रिश्ता था .....
पिता की उनपर सारी आसक्ति और रीझ के बावजूद
तब तक मैं यह नहीं जानता था कि
मेरी माँ भी एक परी थीं
और दिखाई न देने के बावजूद
अपने भीतर छिपाए हुए हैं एक अदृश्य पंख
और एक दिन उड़ जाएंगी एक अज्ञात देश समय के साथ
सारे पुत्र मोह के बावजूद अपने वार्धक्य की अशक्तता से लाचार
अपने पुत्र को लोक और समय में छोड़कर......

इस सच के साथ कि दुनिया की सारी मृत्युएँ एक दुर्घटना ही होती हैं
चाहे वे कितनी ही प्राकृतिक क्यों न हो
इस सच के साथ कि आदमी का बच्चा
जितना लम्बा समय सयाना होने में लगता है
उससे कम समय नहीं लगता उसे बूढ़ा होकर मरने में ...
इस सच के साथ कि सारे ईश्वर ,सारे धर्मं और क़ानून
या फिर बिना ईश्वर धर्म या क़ानून के
हर मनुष्य का यह सामाजिक जीवनाधिकार है कि
उसे सेवादार  शांतिपूर्ण  सुखद और सम्मानित म्रत्यु मिले
तमाम असुविधाओं के बीच मैं अपनी माँ को धरती की तरह बचाए रखना चाहता था ...
अकेले में बुदाबुताते हुए
कि हे काल इतनी भी जल्दी क्या है
माँ से भी मैं कहता ही रहता था
कि बुढ़ापा और म्रत्यु तो जीवन का भद्दा मजाक है
वह जीवन का वांछित नहीं ,बल्कि जीवन की मजबूरी है
उसके बारे में सोचकर क्या चिंता करना
आप सिर्फ शांतिपूर्वक  जीने पर ध्यान दें
वृद्धावस्था की लाचारी के अपने सारे अपमानबोध के बावजूद
वे धीरे-धीरे बुढ़ापे को  जीने की जिदा के साथ जीतते हुए जीना सीखा रही थीं ....

जीने की भरपूर इच्छा के विरुद्ध
उनकी म्रत्यु भी एक दुर्घटना ही थी
जब उनकी देह नें उनकी एक न सुनी ...
उस पल को याद कर
मैं अभी भी कविता लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूँ ...

मैं नहीं जानता कि माँ के मरने का भूकंप से क्या रिश्ता हो सकता था
माँ का धरती से क्या रिश्ता हो सकता है
उनकी म्रत्यु के बाद क्यों विचलित हो गयी धरती !
गत १८ अप्रैल २०१५ को घर के आँगन की अनापेक्षित घास नोचते हुए
किसने उनकी साँस पर प्रतिबन्ध लगा दिया
बिना मुझसे पूछे ....वह भी तब
जबकि निश्चय ही वे
मेरे आने की आहट की प्रतीक्षा में होंगी
काल जिसकी आत्मा निश्चय ही किसी निर्मम हत्यारे मनुष्य की है
या फिर वह अन्धकार की सारी कालिमाओं से बना हुआ कोई महासर्प ही होगा
जो चिढ़ता होगा जीवन की हर मुस्कान से
या फिर एक अर्थहीन और मुर्खता पूर्ण यांत्रिक स्थगन
जिसके फलस्वरूप मेरी माँ धरती पर ही चिर निद्रा में सो गयीं
जबकि वे मुझे यानि कि अपनी जैविक कलाकृति को
आँखे  हमेशा के लिए बंद हो जाने तक जीते रहना चाहती थीं ..

काल का रावण उनके बेटे कलयुगी राम को
एक बार फिर नौकरी रूपी सोने के हिरन का पीछा कराते
उनके अन्तिम पल से बहुत दूर लेकर चला गया था
मेरे अधिकारी का कहना था कि नौकरी देश के सेवा के लिए की जाती है
और नौकरी यानि मातृभूमि यानि  कर्तव्य के लिए
माँ का शहीद हो जाना भी एक तुच्छ घटना है
कि नौकरी जनहित में की जाती है जबकि माँ हमेशा व्यक्तिगत होती है
यह एक यांत्रिक , अमानवीय और संवेदनशून्य सत्ता का तर्क था
जिसके विरुद्ध मैं पूरे दो वर्ष तक
रात्रि सेवा और संग के लिए उनके पास पहुंचता रहा ....

चालाकियों और झूठ के इस गंदे-अंधे दौर में
उनके अविश्वास के सम्मान में
कई बार इच्छा हुई कि मैं अपनी लाचार माँ के प्रदर्शन के लिए आमंत्रित करूँ
कि बुढ़ापा किसी भी बीमारी से बढ़ कर है
कि पागलो,बूढों,विकलांगों,बेरोजगारों से लेकर अयोग्यों एवं असफलों तक
परिवार अब भी अन्तिम शरण और जीवित संस्था है
जबकि सरकारें अब भी गैरजिम्मेदार और बाजारू
कभी –कभी तो मध्ययुगीन कबीलों के वारिसों से संचालित ...

मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरी माँ नें जितने वर्षों तक मुझे
अपनी उंगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया
और अपने हांथों अपना भोजन पका लेने तक मुझे बड़ा किया
उतने वर्षों तक मेरी भुजाओं का सहारा माँगने का उन्हें अधिकार है ...

मेरे कार्यस्थल के सर्वाधिक भ्रष्ट पतित और झूठे (अ )सहयोगी
माँ के प्रति मेरी सतत चिंता को
माँ के नाम पर मांगी गयी मेरी अवकाश –प्रार्थनाओं को
मेरी दीर्घकालिक यानि कि स्थाईचालाकी का हिस्सा मानते थे ....

तो क्या मेरी माँ इस लिए दिवंगत हो गयीं कि
मेरी माँ सबको अपने अन्तिम संस्कार दिवस पर बुलाकर
यह दिखाना चाहती थीं कि देखो मेरा बीटा झूट नहीं बोल रहा है
कि मैं सचमुच ही अस्वस्थ थी अन्यथा यह दुनिया छोड़कर जाती ही क्यों !

यह समाज जो इतना झूठा और असम्वेदनशील हो गया है कि
कि वह सच बोलने वाले को मुर्ख या झूठा समझता है
उनका इतने अपमानो के बीच जीना और जाना
दोनों ही जैसे धरती को बर्दाश्त नहीं हुआ
उनकी अनैक्छिक एवं अवांछित मृत्यु को यादकर ही जैसे यह धरती क्रोध से कम्पने लगी 
शायद जंगलों के काटे जाने और शेरों के मार दिए जाने से
पूरी तरह नरभक्षी हो चुका काल भूखा था
उसे अपनी क्षुधा –शांति के लिए अभी भी और माओं की जरुरत थी
मैं अपने ही दुख और क्षोभ से बुरी तरह डर गया था
मैंने अपने मातृशोक और भूकंप में अजीब सा रिश्ता देखा
मैंने अपनी माँ कीई आत्मा की शांति के लिए
भविष्य में शान्तिचित्त बने रहने और दुख-बोध को
न जीने का संकल्प लिया     


चेहरों की यह किताब ....



आदमी का शक्ल लेकर घुमती हैं यहाँ
बेहद अक्लमंद और कम - अक्ल दोनों ही
अपने होने को प्रदर्शित कर रहे होते हैं
ऐसा लगता है कि जैसे किसी चोर-दरवाजे से
झांक कर देख रहे हों लोगों के भीतर का सच .....
कुछ चुपचाप अकेले  पड़े हैं फेसबुक पर
तो कुछ गिरोह बंद रूप में
कुछ बेहद शालीन तो कुछ खतरनाक इरादों के साथ
कुछ सुखद झोंकों की तरह तो कुछ तूफानी
कुछ इंसानियत से भरे तो कुछ शैतानी
अजब -गजब है फेसबुक यानि चेहरों की यह किताब ....
साहित्यिक इतिहास का समाजधर्मी पुनः पाठ



यह दुनिया


यह दुनिया जो एक मकड़ी के जाले की तरह है
और मैं भी हूँ उस जाले का एक तार
दूसरों से जुड़ा हुआ
जोड़ता हुआ दूसरों से
दूसरों से बंधा हुआ
बांधता हुआ दूसरों को
मेरा हिलना हिलाता है दूसरों को
मेरा टूटना तोड़ देता है -
संवेदना के कोमल तार
इसी जाले पर दौड़ती है समय की मकड़ी

मैं एक अदृश्य बुनावट का हिस्सा हूँ समाज की
मेरा होना सिर्फ अकेले का
अपनें असम्बद्ध एकांत में होना नहीं है
शायद इसीलिए जब मैं दूसरों को तोड़ता हूँ
स्वयं टूट जाता हूँ
जब मैं छोड़ता हूँ दूसरों को
स्वयं छूट जाता हूँ
मेरी यात्रा एक सामूहिक यात्रा है सम्पूर्ण मानव -जाति की

शायद इसीलिए
मेरे सौभाग्य का ईश्वर
मेरे मित्रों और मेरे चाहने वालों की
शुभकामनाओं से बना हुआ है
दूसरों कोमुझसे मिलाने वाली ख़ुशी में रचा-बसा है
मेरी आत्मा का सच्चिदानन्द !

और मेरे दुर्भाग्य का शैतान भी
मुझे नापसन्द करने वालों की घृणा में छिपा हुआ है
उनकी अरुचि से बना हुआ है
मेरे निर्णयों के प्रति असहमतियों से बना है
मेरे अस्तित्व और सार्थकता का प्रतिपक्ष …

मेरा अच्छा या बुरा होना
सिर्फ मेरे भीतर का ही
मेरे भीतर तक ही होना नहीं है।



शून्यकाल के नायक


बाजार में एक ही शिखर था
बिल्कुल एवरेस्ट की तरह
घटता-बढ़ता रहता था लेकिन
झुककर किसी ऊंट की तरह कर्इ बार
किसी अदने से व्यकित को भी बिठा लेता था अपनी पीठपर
फिर उसे बहुत दूर से दिखता और दिखाता था किसी शाहंशाह की तरह
एक ही एवरेस्ट की पीठ पर सब चढ़ना चाहते थे एक दिन
कूबड़ ही एवरेस्ट का था समय का पैमाना बना हुआ
दूल्हे और बारात के आने की प्रतीक्षा और पूर्वाभ्यास में
कुछ लोग बैठकर ऊंघ रहे थे एवरेस्ट की पीठ पर
समय के सूनेपन को भरते हुए
शून्यकाल के नायक!
बाजार में
यह एक मेले का एवरेस्ट था
जहां कुछ शराबी
अपने-अपने सिर पर अपने जीवन का बोझ उठाए
थकी हुर्इ यात्री भीड़ की पीठ पर
इतिहास की दिशा का पोस्टर चिपका रहे थे ।

समय के कैंसर


जब हम एक जगह किसी मानवीय भूमिका में उपस्थिति होते हैं तो
उसी समय किसी अन्य मानवीय भूमिका के लिए
सामाजिक रूप से अनुपस्थित भी होते हैं
जब हम बन जाते हैं व्यवस्था के एक हिस्से के पुर्जे
दूसरे हिस्सों के लिए होते जाते हैं असंगत
कोई भी सर्वव्यापी नहीं हो सकता
एक व्यक्ति के रूप में
लेकिन प्रभाव के रूप में हो सकता है
उन संगठनो के कारण
जो एक व्यक्ति के विवेक कोसभी का विवेक बना देते हैं
होते हैं जिनके पास अपने ही समय के बंधुआ मस्तिष्क
और जो महानता की ओट में शर्मनाक ढंग से
दूसरों को स्थगित और निरस्त करते हुए 
दूसरों के नाम पर सोचते हैं
और बन जाते हैं समय के कैंसर



अवसाद 

उतना सौंदर्य कहाँ जी पाउँगा 
इस दुनिया के नेपथ्य में चली गयी है वह दुनिया 
जिसे मैं दुनिया जानता था 
पहले पिता गए 
और आँगन में उतर आई चिलचिलाती धूप 
पेड़ चुपचाप अतीत में  गए 
कंकरीट का जंगल  देखकर 
हवाएं मुंह ढक कर खांसने लगीं 
फिर माँ वाष्प बनकर अदृश्य हो गईं 
समय का असहनीय सूरज तपने लगा सर पर 
मैं एक घबराई हुयी भीड़ के पैरों तले फेंक दिया गया हूँ  

दर्शकदीर्घा से 

हर सुबह अखबार में छपता है 
तीन मरे तेरह घायल 
अखबार जो काली स्याही से छपे होते है 
छिपा लेते है सडकों पर फैले हुए लाल रक्त ....

रोती हुई स्त्रियाँ और बच्चे 
दूर कही खो जाते है 
खबरों की भीड़ के पीछे 

सुबह की गर्म चाय के साथ 
हम अपने सुरक्षित बचे रह जाने की 
खुशियाँ मानते हैं 
खुशियां मनाते हैं कि 
सुरक्षित बच गए है सारे स्वजन 

कि  अब भी बची हुई है 
हमारे निकट संबंधों की दुनिया 
हमारी जानी - पहचानी दुनिया बची हुई है 

सड़क पर पड़ी लावारिस लाश के 
अन्त्य कर्म के लिए 
क्रमशः पुलिस है कुत्ते है कीड़े हैं 

घटनाओं और बाहरी दुनिया से अलग हम जी रहे हैं 
अख़बारों में छप जाने से बचते-बचाते 
सुबह के अखबार और चाय के साथ 
गुनगुनी प्यारी धुप के साथ 
और अपनी बची हुई दुनिया के लिए 
सभी के प्रति अंतहीन आभार के साथ 
बैठे हुए दर्शक दीर्घा में 



द्रौपदी-प्रसंग'

यद्यपि तुम जानते थे कि व्यास जी का कैमरा लगा हुआ है
पूरे देश और उसके भविष्य के लिए
हो रहा है उसका आन -लाइन प्रसारण ....

क्या कहीं भीतर से जाग उठा था तुम्हारा शरारती विचारक !
या तुम मारना चाहते थे समूची भारतीय संस्कृति के गाल पर
प्रश्न का एक करारा तमाचा?
कि कन्या को भी दान में लेने-देने की वस्तु मानते हो
तो लो मैंने दिया

या फिर नकारात्मक मानसिकता के अभिशप्त क्षणों में
तुमने अर्जुन के कौशल और पुरुषार्थ से जीती हुई
और माँ की आज्ञा से मुफ्त में मिली द्रौपदी को
सिर्फ अपना अधिकार जताने के लिए यूं ही दान कर दी....

क्या दाम्पत्य के अन्तरंग क्षणों में
सिर्फ अर्जुन को वरण करने वाली द्रौपदी
तुम्हें कभी भी भीतर से अपना पति
स्वीकार नहीं कर पायी ?

क्या कुंती नें भी अपनी बहू को
सिर्फ इसी लिए पांच पतियों के बीच बाँट दिया कि
कल उनकी बहू सबकुछ जानने के बाद
अपनी सास के चरित्र पर उंगली न उठाए
कि उसकी बहू अपनी सास को नियोग के लिए
अलग-अलग पुरुषों से समागम करने वाली स्त्री न समझे...

या तुम द्रौपदी के असमान व्यवहार से
उपेक्षित आहत अपमानित और दुखी थे
भीतर ही भीतर दुर्योधन की तरह ही
उसकी प्रखर तर्क-बुद्धि से आतंकित और
उसके व्यंग्य बाण मारने की प्रवृत्ति से आहत थे...

या तुम्हें भीतर ही भीतर पूरा अंदेशा था
और सुनियोजित थे तुम कि
कौरव सत्ता का घृणास्पद चेहरा
पूरी तरह खुलकर सामने आए
और तुमने पूरी तरह कर दिया
अपने कुटुम्ब को उनके हवाले
उनके विवेक की प्रकृति और स्वभाव के
सार्वजनिक निदर्शन के लिए

सोमवार, 13 जून 2016

ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद

पुरोहितवाद और ब्राह्मणवाद : उत्थान और पतन
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भारतीय धर्म ,ईश्वर और दर्शन के अनेक रूप हैं जिसमें से शैव दर्शन और धर्म सबसे प्राचीन है .इसके प्रतीकों में आदिम मनुष्य का प्रकृति की रहस्यमय सृजन (प्रजनन} शक्ति का रहस्यमय साक्षात्कार देखा जा सकता है. आर्योंमेंअग्नि-पूजाऔर यज्ञ-हवन का जो धार्मिक संस्कार मिलता है ,उसका प्राचीन सहवर्ती संस्करण जरथ्रुस्थ केअवेस्ता और पारसियों में मिलने वाली अग्निपूजा में देखा जा सकता है. पुराणों में दक्ष के यज्ञ प्रकरण तक यह स्मृति बनी हुई है और यह आज भी भारतीय धार्मिक संस्कारों का प्रमुख हिस्सा है. यही एक ऐसा धार्मिक संस्कार है जो प्राचीन आर्य कबीलों के पूर्वज पुरोहितों से लेकर आज तक अक्षुण्ण रूप से धार्मिक परंपरा में चला आ रहा है. वेदों से स्पष्ट है कि प्रारंभ में आर्य प्रकृति-पूजक थे. उनमें ब्रह्म की अवधारणा का विकास उपनिषद् काल से थोडा ही पहले संभवतः शैव या पाशुपत धर्म केप्रभाव से हुआ होगा . जब उन्होंने कूछ प्रसिद्ध व्यक्तियों कीअसाधारण मानसिक शक्तियों का रहस्य सर्वसुलभ बनाने के प्रयास में चिंतन-मनन और गंभीर होकर किया होगा. जीवन की रहस्यमय दिव्यता का साक्षात्कार ब्रह्म के रूप में किया होगा . भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर मुझे संस्कृत के ब्रह्म में मिलने वाली 'ब्र' धातु और अंग्रेजी के' ब्राइट (चमकीला) शब्द के 'ब्र' धातु में निकट का सम्बन्ध दिखता है. सृष्टि में दिखने वाली रहस्यमय चेतन जीवनी शक्ति को ही उन्होंने सर्वव्यापी ब्रह्म तत्व के रूप में देखा होगा . उपनिषद् काल के बाद आर्यों - पुरोहितों नें इस ब्रह्मवादी दर्शन को व्यापक शास्त्रार्थों के बाद सर्वसम्मति से स्वीकार करते हुए स्वयं को ब्राह्मण कहना शुरूकर दिया . क्योंकि सामाजिक वर्ग-संरचना पुरोहित वाली ही रही .इसलिए ब्राह्मण,पुरोहित और पंडित शब्द नाम-परिवर्तन के बाद भी एक ही जातीय अस्तित्व का पता देते रहे. यही कारण है कि पुरोहितवाद को ब्राह्मणवाद कहने वाले आज भी कम नहीं है और यह शब्द भी ब्राह्मण के जातीय कर्म का ही विशेषण परक अर्थ प्रस्तुत करता है. उर्जा-सिद्धान्र की तरह एक दार्शनिक प्रत्यय होने के कारण ब्रह्म-वाद मुझे आज भी आकर्षित करता है. प्रकृति की रहस्यमय शक्तियों के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापक वेदकालीन रिचाओंमेंभीकुछ आपतिजनक नहीं दिखता बल्कि उनकी पवित्र समर्पण-भावनाअभिभूत ही करती है. जीवन को यज्ञ मानने वाली भारतीय दार्शनिकी में भी जीवन जीने के रहस्य का एक रूपक ही छिपा हुआ है.वनाच्छादित प्राचीन समय में निरंतर अग्नि प्रज्वलित रखना और अग्नि-देव का जूठन या प्रसाद जिसे आज हम पकाना भी कहते हैं सुरक्षित खाने की खोज का ही एक रूप लगता है .ऐसा प्रतीत होता है कि डायनासोर को समाप्त करने वाले उल्का-पात और उसके पश्चात के दीर्घकालीन अन्धकार-युगऔर हिम-युग का सामना मानव-जाति के पुरखों नें ज्वालामुखियों से प्राप्त अग्नि को पालतू बना कर ही किया होगा .भारतीयों में विशेष रूप से ब्राह्मणों की जातीय परंपरा एवं कर्मकांडों में में ये सारे अतीत जातीय स्मृति के रूप में सुरक्षित हैं. इनमें से अधिकांश दार्शनिक और प्रतीकात्मक अर्थवत्ता भी रखने के कारण प्रतिगामी नहीं भी माने जा सकते हैं. इनमें आदिम मनुष्य की काव्यानुभूति छिपी है. संभवतःइसीलिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने क्रांतिकारी सुधारों में इनका भी विरोध शामिल नहीं किया.
प्रश्न यह उठता है कि ब्राह्मणों नें ऐसा कौन सा अपराध किया है कि आज ब्राह्मणवाद एक गाली बन चूका है. इसके उत्तर का ऐतिहासिक आधार यही है कि वे स्वयं को जातीय रूप में तो ब्राह्मण ही समझते रहे लेकिन भारत से बौद्धों के उच्छेदन (पुष्यमित्र शुंग के बाद) के परवर्ती दौर में स्वयं शासक बन जाने के कारण दूषित स्वार्थ बद्ध ,मानवता-विरोधी और धर्म-भ्रष्ट हो गए. ब्राह्मण पुरखे जिस कलि-युग की चर्चा करते हैं वह उनमें ही आकर बैठ गया है. उन्होंने सभी प्राणियों में ब्रह्म का दर्शन करना छोड़ दिया. भारतीयीा्मूल के मानव-समाज नें जो उन्हें ईश्वर से जुड़ने के कारण सिर-आँखों पर बैठा रखा था उसे विषमता के पक्ष में प्रक्रति और ईश्वर द्वारा ब्राह्मणों को प्रदत्त विशेषाधिकार के रूप में प्रचारित किया. शुंग-काल में ही पुराणों का पुनर्लेखन हुआ. भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से महाभारत के बाद संभवतःइसी काल में वाल्मीकि रामयण की भी रचना हुई. तथा बोद्धों और शूद्रों की हत्याओं को जायज ठहराने के लिए पुष्यमित्र शुंग के दरबारी ब्राह्मणों नें अपने आदर्श के पीछे सत्ता छोड़ने वाले राम के हाथों में भी शम्बूक वध का प्रसंग प्रक्षिप्त करा दिया. ऐसा इसलिए कि अंतिम मौर्य शासक के हत्यारे महामंत्री पुष्यमित्र शुंग को राम का दर्जा दिया जा सके.जनता में यह प्रचारित करने के लिए कि पुष्यमित्र शुंग नें अपने राजा का वध करके विश्वासघात का कोई सामाजिक अपकर्म नहीं किया है बल्कि एक नास्तिक धर्म को मानने वाले शूद्र राजा का वध किया है जो धर्म-सम्मतहै.
प्रश्न फिर वही रह गया है कि ब्राह्मणों में बुरा क्या है. वह भी तब जबकि मेरे जीवन के सबसे अच्छे मित्रों में से अधिकांश वे सहपाठी रहे हैं जिनका जन्म ब्राह्मण घरों में ही हुआ है-मैं ब्राह्मण-अपराध का वास्तविक स्वरूप उसके उस अंधेपन में ही देखता हूँ जिसकी ओर कभी कबीर नें इशारा किया था. वेस भी वे ब्रह्म यानि जीवन की विलाक्षणता का दर्शन करने वाली आँखे खो चुके हैं. वे समदर्शी रूप में नहीं बल्कि विषमतादर्शी रूप को जी रहे हैं . मेरी यह समझ में नहीं आता कि वे शूद्रों में ब्रह्म की व्याप्ति से प्राचीनकाल में मनुस्मृति लिख कर इंकार कर चुके हैं तथा आज उनसे प्रभावित राजनीतिक संगठन मुसलमानों और ईसाईयों में व्याप्त अपने ही ब्रह्म को देख नहीं पाते वे संकीर्णता दर्शन. के वाहक बन चुके हैं. आध्यात्मिक प्रेम के नहीं बल्कि घृणा के प्रचारक हैं.उन्हें सामने के वर्त्तमान मनुष्य में निहित संभावनाएं और उनके अस्तित्व और जीवन की दिव्यता नहीं दिखती. वे सिर्फ अतीत पर रीझे हुए लोग हैं और उनके पक्ष में वर्तमान मनुष्यों का यथाशक्ति अपमान ही किया करते हैं.
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो ब्राह्मणवादी धर्म (जिसे वास्तव में पुरोहितवाद कहना चाहिए ) का विकास महाजनपदों में सामंतवाद के एक रूप राजतंत्र के संरक्षण के लिए किया गया था-इसमें पुरोहित (ब्राह्मण) स्वाभिमान रहित होकर जिसे आध्यात्मिक भाषा में अहंकार रहित होकर राजा और ईश्वर के सामने झुकने और अधीनता स्वीकार करने -कराने का अभ्यास कराता है.उसे आप गुलामी का पवित्र-धार्मिक प्रशिक्षक भी कह सकते हैं.अब जब पुरोहित लोग ब्रह्मवाद को मानने के कारण स्वयं को ब्राह्मण कहने लगे तो आजकल यह भर्त्सना ब्राह्मणवाद नाम से ही की जाती है.ब्राह्मणवाद को एक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में ही लेना चाहिए ,जातीय अपमान के रूप में नहीं.क्योंकि भारत में जातीयता के विकास के लिए सभी लोगों के पुरखे जिम्मेदार हैं इसलिए सभी बुराइयों के लिए सिर्फ ब्राहमणों को ही जिम्मेदार ठहराना अतिरेकपूर्ण हो सकता है.लेकिन कुछ सांस्कृतिक आदतों से बाहर निकलने के लिए ब्राहमणों और गैर ब्राहमणों सभी को जागरुक होना पड़ेगा.

यह स्वीकार करते हुए कि हर विचारधारा की तरह ब्राह्मण-मूल्यों का भी एक स्वर्णिम प्रगतिशील अवदान काल रहा है. प्राचीन भारत में चाणक्य और आधुनिक भारत में महामना मदन मोहन मालवीय के रूप में मुझे प्रगतिशील ब्राहमण धर्म का भी सच्चा (अवतारी!) स्वरूप दिखता है.एक अलग आयाम में आदि शंकराचार्य में भी.

मंगलवार, 31 मई 2016

शेयर और गुरु-मंत्र

सिर्फ मैं ही नहीं हूँ 
दूसरे भी हैं मेरे साथ
मेरे समय में .....
सब मेरे लिए नहीं हो सकता
न मैं सभी के लिए हो सकता हूँ
हमें जीना जानना और अधिकार
सभी कुछ बाटना होगा ....
हम सिर्फ इतना ही जान सके हैं अब तक
कि हवा अधिक दबाव से
कम दबाव के क्षेत्र की ओर बहती है
और जल प्रवाहित होता है
ऊपरी तल से निचले तल की ओर ...
लेकिन ज्ञान !
हम अपनी अज्ञानता पर शरमाते हुए भी
चुपके-चुपके दूसरों से सीखते और
स्वयं को सुधारते जाते हैं ,,,,
समस्या कुछ इस तरह है कि
हमारे कसबे में
ज्ञान की एक साथ खुल गयी हैं कई दूकाने
सडक के दोनों ओर
ज्ञान भिक्षुओं का इंतज़ार कर रहें हैं
प्रदाता कोच और उनकी कोचिंग ...
वहां बैठा हर ज्ञानी
पूरेआश्वासन के साथ
जीवन का पूरा सत्र मांगता है ....
सुना है ज्ञानी होना आसान है
लेकिन समझदार होना कठिन
बहुत पहले मेरे गुरु नें दी थी यह चेतावनी
यदि तुम सफलता चाहते हो तो
अपनी अतिरिक्त समझदारी को छिपाए रहो
कि अपने समय के औसत दिमाग से
अधिक समझदार होना खतरनाक है
कि सुकरात मारा गया था अपनी समझदारी
न छिपा पाने के अपराध में
और युधिष्ठिर सिर्फ नैतिक और मूल्यजीवी बने रहने के प्रयास में
पत्नी द्रौपदी से हाथ धो बैठा ....
गुरु नें कुछ ऐसी भी दी थी सीख
कि सिर्फ अपने अहंकार को ही नहीं
अपने स्वाभिमान की उगी हुई सींगों को भी
यत्नपूर्वक छिपाए रहो ..
लोग उनका खुलेआम दिखना बर्दाश्त नहीं करते
कि तन कर खड़े होने से
झुककर बैठना अधिक आरामदायक होता है ''
उनकी सारी सीखों के बाद भी
बार-बार कर जाता हूँ गलतियाँ
जहाँ चुप रहना चाहिए बोल जाता हूँ वहां
जहाँ रुक जाना चाहिए उसके बाद भी लिखता जाता हूँ अलेख्य
उन्होंने यह भी कहा था कि
सुनिश्चित सफलता के लिए-
किसी भी साक्षात्कार में वैसा कुछ भी नहीं बताना
जिसे तुम सच समझते हो और वह वास्तव में सही भी हो
या जो सही होते हुए भी हो इतना मौलिको कि लोग
उसका विश्वास ही न कर सकें
बताना सिर्फ वही और उतना और वैसा ही सच
जितना कि प्रश्न पूछने वाला सच के रूप में जानता हो
जैसा कि सामने वाला जानता हो
और तुमसे भी सुनना चाहता हो ...
गोया ऐसे कि तुम्हें सच को नहीं बल्कि
सच के बारे में पूछने वाले को बूझना है
कि मौकरी पाना है तो सच के दंभ को नहीं
विद्वानों की अज्ञानता के प्रति सम्मान-भाव जीना सीखो
उन्हें प्रभावित करते हुए भी उन्हें इसका पता ही न लगने दो
कि वे तुमसे कितना कम जानते हैं....
(मानों सबसे सफल और सच्चे ज्ञानी
सिर्फ अपने ज़माने की दुर्बलुाताओं से
कदमताल करने वाले लोग हैं )
हे गुरुवर ! तुम्हारी दी हुई सारी शिक्षाएं याद हैं मुझे
लेकिन मैं उनका अतिक्रमण करने का अपराध करता रहा हूँ
अब मैं भी आपकी तरह बूढ़ा और अनुभवी हो चला हूँ
लेकिन मुझे लगने लगा है कि
हमेशा सुरक्षित और अनुशासित जीवन जीना
मानव जाति के हित में नहीं होता
कि इस दुनिया को बदलने के लिए
कुछ रोमांचक और मौलिक मूर्खताएं भी घटित होती रहनी चाहिए
कभी-कभी निकलना ही चाहिए बुद्धं की तरह
महल और सुख की सारी चिंताएं छोड़ कर ...
चुनना चाहिए अपमानों और अपराधों का शिकार होने की
संभावनाओं वाला जोखिमपूर्ण वर्जित रास्ता
नए बेहतर रास्तों की खोज के लिए ....
बाहर के सारे रस्ते भीड़ से भरे हुए हैं
बेहतर क्या होगा किसी के भी लिए -
वह यात्रा स्थगित कर दे और घर से ही न निकले
निकले और वह भी डूब जाए भीड़ को चीरते-तैरते हुए अपने गंतव्य की ओर
भीड़ के छटने का और पथ के मुक्त होने का इंतजार करे
स्वयं रुका रहे दूसरों को रास्ता देने के नाम पर
या दूसरों के साथ चले ....
सच तो यह है कि इसमे से कुछ भी सोचनीय नहीं है
कि जनसँख्या-वृद्धि ( भीड़} मानव जाति के उत्तरधिकरियो
प्रतिनिधियों का वैकल्पिक उत्पादन है
कि हर व्यक्ति वैकल्पिक और फालतू रूप से पैदा हुआ है
मानव-जाति की सुरक्षा और अस्तित्व की निरंतरता के लिए
हर व्यक्ति अपनी ओर से कुछ बोलना चाहता है और शोर उत्पन्न कर रहा है
एक समय में कुछ लोगों के चुप होने की जरुरत है कि
कुछ अच्छा बोलते लोगों को साफ-साफ सुना जा सके
इस सच्चाई की परवाह किए बिना कि
कि एक समय में अधिकांश लोग
एक जैसा ही सोचते-समझते और बोलते हैं ..
शर्त सिर्फ इतनी ही है कि जो बोल चुके हैं
उनका चुप होकर बैठ जाना जारी रहना चाहिए
कुछ बोलते लोग एक ही बात दुहराए जा रहे हैं मंच पर
यद्यपि वे थक गए हैं
फिर भी बोलते हुए दिखना चाहते हैं देर तक
मेरे पास अपने बोलने का कोई वाजिब कारण नहीं है
सिर्फ इस चिढ़ के अतिरिक्त
कि जो बोला जा रहा है उससे मेरी असहमति बढ़ गयी है
तब जबकि मैं न भी बोलूँ
सभी को सुनते रहने के लिए अभिशप्त हूँ
अस्तित्व की आवृत्ति एवं बारम्बारता वाली दुनिया में
जबकि संगठित होकर अपराध करने वाले गलत्कारियों की संख्या बढ़ गयी है
हमें इस दुनिया को शेयर करते हुए ही जीना चाहिए
छोड़ कर बार-बार हटने की इच्छाओं के बावजूद
मैं अभी फेसबुक पर बना रहना चाहूँगा
शेयर करते हुए
जो जहाँ और जितना है
वहां और उतना उसके लिए उसके हिस्से की दुनिया छोड़कर ....
( श्रद्धेय गुरुवर स्वर्गीय विजय शंकर मल्ल जी की पावन स्मृति को समर्पित )

रामप्रकाश कुशवाहा
३१.०५.२०१६

सोमवार, 23 मई 2016

बिकना

लोग अपनी  आत्मा बेचकर अहंकार खरीदते हैं
मैं नहीं बिका तो क्या आसमान टूट पड़ेगा
सिर्फ यही न कि मैं धरती में धंस जाऊँगा
या बहुत हुआ तो पाताल तक

न बिकना भी तो सुरक्षित होना है
बाजार को नापसंद करते हुए
घर बसाना भी कोई बुरा सौदा नहीं

लोग घर बेचकर बाजार खरीदते हैं
मुझे  नहीं बेचना  अपना घर ....

गुरुवार, 19 मई 2016

कांग्रेस की प्रासंगिकता

कांग्रेस अब भी एक सुरक्षित विकल्प है देश का लेकिन देश बचानाऔर पार्टी बचाना -भिन्न मुद्दे हैं.कांग्रेस को नेहरू परिवार से बाहर जब तक पुरे देश वासियों के लिए खोला नहीं जाएगा तब तक यह भारतीय जनता के लिए अप्रासंगिक बनी रहेगी . कोई कांग्रेसी क्यों बने जब उसका राजनीतिक कैरियर सिर्फ सांसदी और विधायकी तक ही सिमट कर रह जाएगा .कांग्रेस के पतन नें ही जनता को भाजपा की ओर जाने के लिए मजबूर किया है.एक ऐतिहासिक संस्था का  नेतृत्व के स्तर पर सिर्फ परिवारवाद तक ऐसा सिमटना   देश के लिए भी दुर्भाग्य पूर्ण है

राणाप्रताप का नायकत्व

इतिहास में बहुत सी घटनाएँ ऐसी घटी हैं जैसी नहीं घटनी चाहिए थीं.युद्ध और हत्याएं तो आज भी नहीं होनी चाहिए. मानव जाति की एक विशेषता है कि वह जीवित लोगों के पक्ष में मृत लोगों को विस्मृत कर देती है. कुछ ऐसे कि जैसे जीवित रहना अपने आप में सही होने का एक पक्ष हो.हारे हुआ के वंशज भी पराजय बोध की हीनता से बचने के लिए चुप होने लगते हैं. कभी-कभी तो हराने वालों के वंशज भी हराने वालों की ओर से हराने का जश्न मनाने लगते हैं. ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि ऐसी घटनाओं को दो इंसानों या मानव-समूहों के बीच युद्ध केरूप में देखें .कुछ लोग कुछ इस तरह रागात्मक जुडाव अनुभव करने लगते हैं कि लगता है कि लड़ने,हारने और जीतने वाले कोई और नहीं स्वयम वे ही हैं.हम जबतक अतीत की घटनाओं को उचित दूरी से नहीं देखेगे स्वयं ही एक पक्ष बन जाया करेंगे. इतिहास की पुरानी गलतियाँ दुहरायी जाति रहेंगी.इसलिए सब से अधिक जरुरी है इन्सान को इन्सान के रूप में देखना.ताकि हम स्वस्थ मानवीय संबंधों वाला नया इतिहास बना सकें.इतिहास में बहुत सी घटनाएँ ऐसी घटी हैं जैसी नहीं घटनी चाहिए थीं.युद्ध और हत्याएं तो आज भी नहीं होनी चाहिए. मानव जाति की एक विशेषता है कि वह जीवित लोगों के पक्ष में मृत लोगों को विस्मृत कर देती है. कुछ ऐसे कि जैसे जीवित रहना अपने आप में सही होने का एक पक्ष हो.हारे हुआ के वंशज भी पराजय बोध की हीनता से बचने के लिए चुप होने लगते हैं. कभी-कभी तो हराने वालों के वंशज भी हराने वालों की ओर से हराने का जश्न मनाने लगते हैं. ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि ऐसी घटनाओं को दो इंसानों या मानव-समूहों के बीच युद्ध केरूप में देखें .कुछ लोग कुछ इस तरह रागात्मक जुडाव अनुभव करने लगते हैं कि लगता है कि लड़ने,हारने और जीतने वाले कोई और नहीं स्वयम वे ही हैं.हम जबतक अतीत की घटनाओं को उचित दूरी से नहीं देखेगे स्वयं ही एक पक्ष बन जाया करेंगे. इतिहास की पुरानी गलतियाँ दुहरायी जाति रहेंगी.इसलिए सब से अधिक जरुरी है इन्सान को इन्सान के रूप में देखना.ताकि हम स्वस्थ मानवीय संबंधों वाला नया इतिहास बना सकें.
                 एक और बात यह है कि मध्यकालीन राज्य-व्यवस्था वंशानुगत होते हुए भी उनके पीछे कोई न कोई समूह रहता था.कहीं न कहीं वे समूह और उनके वंशज आज भी हैं .इसीलिए चीजें संवेदनशील हो जाती हैं. राणाप्रताप और अकबर का युद्ध भी ऐसी घटनाओं में से एक है.कभी-कभी लगता हैकि राणाप्रताप अगर नहीं लड़ते तो मानसिंह वाला रिश्ता हिन्दू-मुसलमानों को और समीप लाता.लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि ऐसा करना अकबर और मानसिंह के हाथ में भी नहीं था.सबसे पहले तो मृत्यु-संस्कार की बिलकुल भिन्न रूढ़ियाँ हिन्दू और मुसलामानों को दो अलग समुदायों में बांटती हैं.फिर हिन्दू धर्म जातीय होने से जब तक ब्राह्मण जाति अकबर को क्षत्रिय मानकर उससे अपने ढंग का पूजा करवा कर भरपूर दान-दक्षिणा नहीं लेती तब तक अकबर को क्षत्रिय राजा नहीं मान सकती थी,इस जाति के पास असहमत लोगों को सिर्फ शूद्र मान लेने का ही जातीय बोध है.यदि उनका बस चलता तो अकबर को भी शूद्र राजा मानकर हिन्दू धर्म में शामिल कर लेते.या फिर आग-पानी पत्थर आदि किसी के भी कुल का घोषित कर देते..राणाप्रताप नें भी अकबर को संभवतःसांस्कृतिक रूप से स्वीकार नहीं किया था.इस दृष्टि से वे पूर्वज (मध्यकालीन)भाजपाई कहे जा सकते हैं.इसके बावजूद उन्हें अपनी प्रजा के शासक के रूप में स्वतन्त्र रहने का अधिकार था.वे दूसरे व्यक्ति और समूह की अधीनता क्यों स्वीकार करते. वे अपनी स्वतंत्रता की भावना के लिए सम्माननीय हैं .इतिहास का अनुभव हमें बताता हैकि कभी-कभी सारी दुनिया गलत हो सकती है और सिर्फ एक व्यक्ति सही.मैं किसी के पक्ष के सही-गलत का निर्णय बहुमत के आधार पर नहीं करना चाहता.
            यह ठीक है कि राणा प्रताप आज के राष्ट्रवाद के लिए आदर्श नायक न रह कर सिर्फ जातीय नायक होने तक सिमट कर रह गए हैं.लेकिन आप जैसे विद्वान् को इतिहास के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना चाहिए..उन्होंने अकबर के विस्तारवादी आक्रमण का विरोध किया था.अकबर पर आक्रमण तो नहीं किया था.अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था.जब लडे थे तब मुसलमान सत्ता भारत के लिए विदेशी ही थी.इस बात को मुसलमान भी अस्वीकार नहीं करेंगे.यद्यपि आज की सांप्रदायिक एकता की दृष्टि से वे एक प्रासंगिक और उपयोगी नायक नहीं रह गए हैं . फिर भी एक शानदार व्यक्ति के रूप में उनका सम्मान तो अकबर भी करता रहा होगा . आप क्यों नहीं करना चाहते ! मार्क्सवादी दृष्टिकोण से भी मूल्यों का विकास सामन्त-युग में ही हुआ. कुछ नहीं तो जिन्दा रहने के लिए घास की रोटी खाने के वैकल्पिक अविष्कार का श्रेय तो राणाप्रताप को दे ही सकते हैं.इतनी घास और पेड़ों के होते हुए भुखमरी से जो मौते होती हैं वह तो नहीं होती.आखिर बन्दर तो जी ही लेते हैं.इसे हीआज के राजनीतिज्ञों के लिए उनका अवदान समझिए . 
अकबर को राणाप्रताप से विस्थापित किया ही नहीं जा सकता ऐसा करना ठीक नहीं है. अकबर नें भी  राणाप्रताप के सह-अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था और उनका पुत्र भी राजा बना था. 

         राणाप्रताप पर सोचते हुए जब मैं अकबर की पत्नी जोधाबाई के भाई,आमेर  के  राजा मान सिंह के बारे में सोचता हूँ जिसके साथ भोजन करने से इनकार कर राणाप्रताप नें हल्दीघाटी का युद्ध मोल ले लिया था -इस दृष्टि से हल्दीघाटी का युद्ध वस्तुतः दो राजपूत घरानों के बीच विचारधारा आधारित युद्ध था.राणाप्रताप का पक्ष आम रूढ़िवादी हिन्दू जनता का पक्ष था तो मानसिंह का पक्ष प्रगतिशील हिन्दू जनता का.राजा मानसिंह को एक विचारक के रूप में देखने पर उसका व्यक्तित्व मुझे अबोध एवं मानवतावादी विचारधारा तथा वसुधैव कुटुम्बकम में विशवास रखने वाला भारतीय मन लगता है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उस परिवार ने अकबर को संप्रदाय निरपेक्ष एक मनुष्य के रूप में देखा. उसे एक राजा मानकर जोधाबाई को ब्याहा . अकबर महान की छवि रचाने में सहयोगी वही प्रगतिशील भारतीय परिवार था ..इससे हिन्दू-मुस्लिम एकता के एक नए युग का सूत्रपात हुआ. बाद के  औरंगजेब और अंग्रेजों की विभेदकारी भूमिका को छोड़ दिया जाय तो आज भी उस परिवार का ही गुप-चुप निवेश ध्यान आकर्षित करता है.. लेकिन मुझे लगता है कि मध्यकाल की उस हिन्दू पहल और प्रयास के बावजूद मुस्लिम समाज की अंतर्मुखी किस्म की कबीलाई मूल की  सामुदायिकता इस धर्मं के अनुयाय्यियों को सम्पूर्ण मानव-जाति का हिस्सा नहीं बनने देतीं .इस्लाम की रूढ़िवादी जड़ता औरअसम्वादी प्रकृति को देखते हुए दुनिया को इस्लाम के साथ उसी तरह जीना सीखना होगा,जैसे लोग किसी बड़ी चट्टान या पहाड़ के साथ बिना किसी अपेक्षा और शिकायत के जीते रहते हैं

मंगलवार, 17 मई 2016

परशुराम

सामान्यतः परशुराम को सामंती अभिजन के विरुद्ध सामान्य आदमी के प्रतिरोध के रूप में देखा जाता है .कथा के अनुसार सहस्रार्जुन नामक राजा जमदग्नि ऋषि के आश्रम में भव्य आतिथ्य पाने के बाद उनकी गाय कामधेनु पर रीझ जाता है और उसे ऋषि से अपने लिए मांगता है .ऋषि द्वारा मना करने पर उनकी गाय को बलपूर्वक ले कर चल देता है .ऐसे ही प्रतिरोध के क्षण में परशुराम के आदर्श नायक रूप का उदय होता है .वे पीछे से जाते हैं और प्रत्याक्रमण कर राजा सहस्रार्जुन का उसके सैनिकों संग संहार करते हैं और अपनी गाय कामधेनु को वापस लाते हैं . वे जनसामान्य के विरुद्ध सामंती निरंकुशता के प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में ही पुरानों में विष्णु के आवेशावतार के रूप में समादृत हैं .विष्णु का चरित्र भारतीय संस्कृति में लोक-कल्याण के प्रति समर्पित जीवन और कार्यों का प्रतीक रहा है .कथा में वे दमित-शोषित वर्ग के सात्विक क्रोध के प्रतीक हैं .उनके क्रोध में एक स्पष्ट सन्देश निहित है . लेकिन तब आप क्या करेंगे जब वही परशुराम आपको एक नए अत्याचारी और हिंसक अभिजन का नया पाठ रचते दिखें .
            पौराणिक नायक होने से परशुराम जी को सांस्कृतिक नायक होने का गौरव प्राप्त है..रामकथा में राम से नहीं उलझकर और चुपचाप यानि क्रोध से चीखने-चिल्लाने के बाद उनका चले जाना राम को आशर्वाद देने वाला और उनकी महिमा बढ़ाने वाला ही माना जाता है,
जब मैं यह जानने का प्रयास करता हूँ कि वास्तव में वहां क्या हुआ होगा तो सबसे पहले यही लगता कि ऐसी कोई घटना घटी भी होगी तब आर्य कबीलों नें ऐसे स्थान पर प्रवास किया होगा जहाँ के राजा ब्राह्मणों को भी अबध्य नहीं मानते होंगे-यदि मानते भी होंगे तो सहस्रार्जुन द्वारा गाय छीनने के बाद परशुराम द्वारा राजा की हत्या कर देने पर उसके पुत्रों नें प्रतिशोध वश उनके पिता जमदग्नि की हत्या कर दी होगी.इस द्वंद्व में सांस्कृतिक संयम यावर्जनाएं टूट गयी होागी. दूसरा उनके आपराधिक स्तर के क्रोधी होने की बात भीसामने आती है. यह भी कि परशुराम वास्तव में अंधविश्वास युग के नायक हैं.उन दिनों ब्राह्मण अबध्य माना जाता था. स्पष्ट है कि वे सभी क्षत्रिय जो उनके हाथों मारे गए उनके परिजनों में से अधिकांश नें ब्रह्म-हत्या के डर से किसी नें भी बाण आदि से उन पर हमला नहीं किया.किसी का पुत्र यदि बदला भी लेता तो उस परिवार को ब्रह्म-हत्या का दोषी मान लिया जाता.. इस आधार पर मुझे उनकी वीरता संदिग्ध लगती है. मेरे पिताजी कहा करते थे कि मुझे कोई नहीं मारे तो मैं सारी दुनिया को मार सकता हूँ.. परशुराम नें कोई पुस्तक नहीं लिखी है शायद-लिखी हो तो मुझे इसकी जानकारी नहीं. हाँ वे प्रतिष्ठित ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे. पिता नें मा के चरित्र पर संदेह कर परशराम से उनकी हत्या करवा दी थी. क्योंकि हत्या नाबालिग अवस्था में की थी -इसलिए आज के क़ानून के अनुसार भी उन्हें फांसी की सजा नहीं हो पाती. फरसा एक ऐसा हथियार है जिससे हत्या बहुत ही समीप जाकर ही की जा सकती है . यह भी संभव है कि परशुराम जी नें अधिकांश क्षत्रिय राजाओं की हत्या पैर छूकर प्रणाम करते समय ही धोखे में की हो.आखिर वे ऋषि वेश धारी हत्यारे थे यदि उन्होंने. ऐसा किया होगा तो इसमें वीरता जैसी कोई बात नहीं दिखती
.गीता प्रेस ,गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के अवतार कथांक ,जनवरी २००७ ,वर्ष ८१ ,संख्या १ के पृष्ठ २२६ पर दिए गए विवरण को पढ़ा तो उनके नर-बलि में लिप्त होने के प्रबल संकेत भी मिले .कुछ अंश की अविकल प्रस्तुति इस प्रकार है – “भगवान् परशुराम नें पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से हीं कर दिया .वे क्षत्रियों को ढूँढ-ढूंढ कर एकत्र करते और कुरुक्षेत्र में ले जाकर उनका बध कर डालते .इस प्रकार परशराम जी नें क्षत्रियों के रक्त से पांच सरोवर भर दिए .वह स्थान ‘समन्तपंचक’ नाम से प्रसिद्ध है “ इस विवरण को जरा ध्यानपूर्वक पढ़ें .परशुराम जी नें यह नरसंहार कोई सेना बनाकर नहीं किया था .यह तो लिखा है कि वे जाति-विशेष के लोगों को एकत्र करते थे .अप्रत्यक्ष सूचना यह भी है कि तीर्थ के लिए ले जाते थे .कोई सामान्य बुद्धि वाला भी यह समझा सकता है कि लोगों को मारने के लिए डरा कर या बलपूर्वक हांक कर मरने के लिए नहीं ले जाया गया था .उन्हें अपना उद्देश्य छिपाकर तीर्थ-यात्रा के बहाने ले जाते थे और फिर उनकी हत्या कर देते थे .उनकी कार्य-शैली ब्रिटिशकालीन ठग-हत्यारों पिंडारियों जैसी ही थी . 
इसके बावजूद परशुराम की मूल पौराणिक कथा का केंद्रीय संवेदनात्मक पक्ष सामंत राजाओं के मनमानेपन का विरोध ही माना जाएगा .इस अर्थ में यह एक सार्थक कथा कही जा सकती है कि समाज नें किसी वर्ग को यदि कुछ विशेषाधिकार सौंपे हैं तो उस विशेषाधिकार का दुरुपयोग करने पर समाज को यह अधिकार है कि वह प्रदत्त विशेषाधिकार वापस ले ले या समाज भी उस वर्ग या समूह से वैसा ही व्यवहार करे जैसा कि वह वर्ग या समूह बाकी समाज के साथ कर रहा है .
परशुराम की कथा में सामंत शासक सहस्रार्जुन जमदग्नि की कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीनने का प्रयास करता है.परशुराम अपने जातीय मर्यादाओं और अनुशासन को तोड़ डालते हैं क्यों कि दूसरा वर्ग इसे पहले ही तोड़ चूका है .उससे उसी के स्तर पर निपटा जा सकता है ..इसके बाद की कथा जैसे प्राचीन कालीन दो माफियाओं के खूनी युद्ध में बदल जाती है.ऐसा लगता है कि प्रतिशोध की आग में जल रहे परशुराम ने अपना शेष जीवन असामान्य मनोविज्ञान के एक केस की तरह क्रूर मनो-विक्षिप्त हत्यारे के रूप में बिताया था .वे शासक जाति के लोगों को तीर्थयात्रा के नाम पर ले जाते रहे और बीच में लोगों की हत्या कर देते रहे .पहले ज़माने के लोग क्योकि हर चरित्र ईश्वर की इच्छा से प्रेरित मानते थे इसलिए उनके हत्यारे रूप को भी ईश्वर की लीला के रूप में स्वीकार कर लिया गया . 
यद्यपि मूल चरित्र और वास्तविक घटना पर काफी लीपापोती की गयी है .ऐसे स्थलों को थोडा सा ही विचार कर पहचाना जा सकता है .बहुत पहले बचपन में पढ़ने के कारण स्मृति के आधार पर मैंने फेसबुक पर की गयी अपनी पोस्ट में उन्हें मात्र माँ का ही हत्यारा समझा था लेकिन गीता प्रेस ,गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के अवतार कथांक ,जनवरी २००७ ,वर्ष ८१ ,संख्या १ के पृष्ठ २२६ पृष्ठ २२४ पर दिए गए विवरण के अनुसार उन्होंने माता सहित चार सगे भाईयों की भी हत्या कर दी थी .सामान्यतः इसे पितृ-–भक्ति का उदहारण माना जाता है. कथा में यह चमत्कारिक प्रसंग भी डाला गया है कि बाद में प्रसन्न होकर जमदग्नि ऋषि नें अपनी दिव्य शक्ति से परशुराम की माता और उनके मृत चरों भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया था .लेकिन बाद के घटनाक्रम में जिस प्रकार भाई सदैव ही अनुपस्थित रहते हैं –उससे यह तथ्य स्वतः प्रमाणित होता है कि परशुराम सदैव के लिए अपने भाइयों को खो चुके थे .क्योंकि सहस्रार्जुन के पुत्रों द्वारा उनके पिता का सिर काटते समय पौराणिक कथाकार के अनुसार उनके भाई भी उनके साथ वन में दूर चले गए थे .
पौराणिक कथाओं में ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि मारे गए क्षत्रिय राजा उनसे लड़ने की इच्छा रखते थे. या उन्हें लूटने आए थे. हमला करने की सोच रहे थे. बस एक ही कारण समझ में आता है कि माता का हत्यारे जानकर उससमय के राजा भी उनका यथोचित सम्मान करने में कतराते होंगे. .अपमानित महसूस कर विद्वेष वश परशुराम नें उनकी हत्याएं कर दी होंगी.वे राम की हत्या क्षत्रिय होने के कारण इसलिए नहीं कर पाए क्योंकि विष्णु का अवतार उन्हें ब्राह्मण जाति जन्म से पहले ही मान चुकी थी. विष्णु के रूप में राम को भी परशुराम की तरह किसी की भी हत्या करने का धार्मिक-सांस्कृतिक लाईसेन्स प्राप्त था. राम परशराम की भी हत्या कर सकते थे-स्वर्ग भेजने के नाम पर.परशराम स्वर्ग जानेसे बचने के लिए चुपचाप वहांसे खिसक लिए.सन्देश यह कि हमारे बहुत से पुरखे गलत भी हो सकते हैं..उन्हें बिना सोचे-समझे अपना गौरव बढ़ाने वाला जातीय नायक घोषित करने से बचें.आज के लोक तांत्रिक समय में ऐसे जातीय नायकों को अपना आदर्श मानना उचित नहीं है. 
यद्यपि मैं आज तक यह नहीं समझ पाता हूँ कि यदि पुराणकार यदि अतिचारी सामंत शासकों के विरुद्ध यदि एक प्रतिरोधी नायक गढ़ना चाहते थे तो उसमें माँ और भाइयों की हत्या करने का प्रसंग क्यों डाला ? यदि इस लिए डाला कि वास्तविक परशुराम नें किशोरावस्था के पूर्व पारिवारिक हत्याएं भी की थीं और पूरणकारों नें ईमानदारी से उसका अविकल वर्णन किया है तो यह पुराणकारों के पक्ष में तो प्रशासनीय ही कहा जाएगा . यहीं आधुनिक समाजशास्त्रीय विश्लेषण में यह स्त्री-स्वतंत्र्त्य विरोधी पुरुष-प्रधान समाज का निर्माता और प्रेरक चरित्र और पाठ लगता है .इस रूप में इसे स्त्रियों के लिए एक चेतावनी के रूप में भी देखा जा सकता है .
इन सबके बावजूद भारत के प्राचीन जातीय सामंतकाल के युग में, प्राचीन काल के उस कानून विहीन समय में एक दृष्टान्त के रूप में परशु राम की कथा नें तत्कालीन शासकों को निरंकुश न होने की चेतावनी दी होगी .यह भी कि सामान्य मनुष्य के अधिकारों का भी सम्मान करना चाहिए . उसके मानवीय रूप को और स्पष्टता के लिए विमर्श के दायरे में लाया जाय. आखिर यह भी तो परशुराम नें ही सिखाया है कि समाज-विरोधी होने पर किसी भी सत्ता और पाठ को ख़ारिज कर देना चाहिए