मंगलवार, 11 जून 2013

अलक्षित प्रतिरोध की पुनर्रचना

        
  समयांतर ,संपादक-पंकज बिष्ट ,जून-२०१३ के अंक में प्रकाशित 
     
              अलक्षित प्रतिरोध की पुनर्रचना
                                      राम्प्राकाश कुशवाहा

              किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन :रामाज्ञा  शशिधर ;
                   अंतिका प्रकाशन ,पृo 207,  मूल्य : 225.00
                        ISBN 978-93-81923-27-6
युवा कवि एवं  आलोचक रामाज्ञा शशिधर की किताब 'किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन ' साहित्यिक निबंधों की भाषा-संरचना और शिल्प में सृजित किसान आन्दोलनों और उनके लिए लिखे गए साहित्य पर केन्द्रित औपन्यसिक पठनीयता लिए एक साथ रोचक,मौलिक और महत्वपूर्ण शोधकार्य है .किसान-पक्ष एवं संवेदना की आत्मीय सृजनशीलता इसे हिन्दी के दूसरे शोध-प्रबंधों से अलग कराती है और इसे अपने ढंग की अकेली पठनीय किताब भी बनती है .यह इस किताब की विशिष्टताओं का साहित्यिक-सृजनात्मक पक्ष है ,जो इसके महत्वपूर्ण विषय किसान आन्दोलन और उससे जुडी  साहित्यिक सामग्री के शोध-महत्त्व के अतिरिक्त है .
            हमारे साहित्य,संस्कृति और सभ्यता के केन्द्र में किसान जीवन के मूल्य ही प्रतिष्ठित हैं .मुद्रा-विनिमय आधारित अर्थ-तंत्र और बाजार सभ्यता का विकास बहुत बाद में हुआ .इससे कृषि-उत्पादन के क्षेत्रों से दूर अलग हटाकर भी मानव-बस्तियां सम्भव हुईं.मंडियां,बाजार,कस्बे और नगर विकसित  हुए और आज हमारी सभ्यता महानगरों के विकास तक पहुँच गई है .लेकिन इस बाजार सभ्यता नें न सिर्फ आर्थिक व्यव्हार की अलग भाषा विकसित की है ,बल्कि मुद्रा आधारित मानव-व्यव्हार और रिश्तों का ऐसा यांत्रिक पर्यावरण भी दिया है ,जो एक संवेदन-शून्य असभ्य मनुष्य की रचना करता है .लेन-देन के बाहर  के हर रिश्ते को नकार देता है .शेक्सपियर के प्रसिद्ध  उपन्यास 'मर्चेण्ट आफ वेनिस 'का कंजूस पात्र शाईलाक  ऐसा ही अर्थ और बाजार के मूल्यों से  निर्मित अर्थ-पिशाच मनुष्य है .कार्ल मार्क्स इसी पूंजी-ग्रस्त मानस से मानव -सभ्यता को बाहर निकालने के लिए साम्यवाद की परिकल्पना कर रहे थे .
             दरआसल बाजार-व्यवस्था के अपने नियम हैं और नैतिक क्रूरताएँ हैं .यह एक प्रतीकात्मक और आभासी दुनिया की सृष्टि करती है .किसान जीवन जहाँ वस्तु-विनिमय और प्रत्यक्ष श्रम-सहयोग पर आधारित रहा है ,वहीँ बाजार-मूल्य पर आधारित नागरिक जीवन मुद्रा आधारित अप्रत्यक्ष और जटिल मानव-संबंधों पर .क्योकि हमारा सांस्कृतिक ढांचा अधिक पुराना है तथा वह किसान-मन और आत्मीयता का ही बौद्धिक विकास है ,इसलिए अब भी और कभी भी वह वह नागरिक जीवन की आलोचना का संवेदनात्मक पाठ और संविधान रचता है .युवा आलोचक रामाज्ञा शशिधर ने नें अपनी विरल शोध-कृति 'किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन 'में ब्रिटिश औपनिवेशिक वर्चस्व और चेतना के प्रतिरोध की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सक्रियता के रूप में देखा है और साथ ही विनाश को विकास तथा बाजारीकरण आधारित पश्चिमीकरण को आधुनिकता मानने की प्रवृत्ति का निषेध और समाधान किसान-जीवन-मूल्यों और प्रतिरोध की स्मृति में ढूंढा है-उसे अत्यंत ही सार्थक और महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जाना चाहिए .
                 भारत के ब्रिटिश औपनिवेशीकरण नें अपने आरभ और अंत में दो महाविनाशकारी हस्तक्षेप किए हैं .इस देश को मुक्त करते समय विभाजन के रूप में और अपनी सत्ता की स्थापना के आरंभिक काल  में हजारों वर्षों से श्रम द्वारा निर्मित कृषि-भूमि को वास्तविक किसान-पुरखों से छीनकर किसी को भी उसका स्वामित्व दे देना .इससे कृषि-भूमि का न सिर्फ अनैतिक विभाजन हुआ बल्कि भारत की वस्तु-विनिमय आधारित तथा संस्कृति आधारित अर्थ-तन्त्र वाली सभ्यता अवसाद में चली गई .ब्रिटिश भारत में बहुत -सी ऐसी जातियां थीं ,जिनका फसल में निश्चित हिस्सा लगता था और वे स्वयं कृषि-भूमि न रखते हुए भी अप्रत्यक्ष रूपमें कृषि-उपज के सांस्कृतिक हिस्सेदार थे-नयी व्यवस्था में भूमिहीन ही रह गए .इसमें संदेह नहीं कि संस्कृति आधारित अर्थ-तन्त्र के कारण ही भारत में जाति-आधारित सर्वहाराओं की सृष्टि हुई है .इस सच्चाई पर मार्क्सवादियों नें भी बहुत ध्यान नहीं दिया है .भारत में बहुत सी परंपरागत रूप में पेशेवर व्यापारी जातियां भी हैं .ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आजीविका के लिए  सिर्फ व्यवसाय का प्रशिक्षण और उत्तराधिकार ही देती हैं .ऐसी जनसंख्या को भूमि-विभाजन के प्रश्नों  से कुछ लेना ही नहीं है इस तरह भारत आर्थिक दृष्टि से भी बहुल श्रेणीबद्ध आर्थिक वर्ग-संरचनाओं वाला समाज है ..भूमि के कुछ जातियों में ही बंटने के कारण भारत की किसान समस्या बहुत ही जटिल हो गई है और उसमें मार्क्सवादियों का हस्तक्षेप जातीय युद्ध की ओर ही ले  गया है .जातीयता की दृष्टि से भूमि के असमान वितरण के कारण तथा कृषि-कार्य के प्रति जातीय-सांस्कृतिक रूचि के आभाव के कारण भी भारत की अधिकांश  भूमिहीन जातियों में जन्मी जनसँख्या किसान-समस्या के प्रति प्रायः उदासीन है .इन तथ्यों के बावजूद हमारा सांस्कृतिक अचेतन क्योंकि किसान जीवन-मूल्यों पर आधारित है और सिर्फ किसान सभ्यता ही उदार और नि:स्वार्थ  रागात्मक सम्बन्धों ,आत्मीयता और संवेदनशीलता का पर्यावरण बचा सकती है -हिन्दी-भारतीय यथार्थ के सन्दर्भ में रामाज्ञा शशिधर की यह किताब किसान-साहित्य और संवेदना के इतिहास और  स्मृति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय प्रयास है .जहाँ तक इस कृति के शैक्षणिक और साहित्यिक शोधा-महत्त्व का सवाल है ;यह एक सच्चाई है कि  हिन्दी में सिर्फ किसान आन्दोलन के बारे में ही नहीं ,बल्कि किसी भी प्रकार के इतिहास-लेखन या उसके पुनर्चिन्तन की गंभीर सृजनात्मक  चिंता समकालीन युवा-पीढ़ी में नहीं दिखती -यद्यपि उसे व्यस्ततम वर्तमानजीविता का नया  इतिहास रचते हुए अवश्य ही देखा जा सकता है ...पुराना सब कुछ उसके लिए इतना बेमतलब हो गया है कि उत्तर-आधुनिक बनने के बाद तथा इतिहास के अंत की घोषणा के साथ उसके लिए अतीतगामी होने का न तो कोई अवशेष प्रयोजन है और न कोई अवकाश .स्पष्ट है कि यह स्मृतिहीनता के लिए अभिशप्त पीढ़ी की स्मृति और तात्कालिक  विवेक है .वह अपने जटिल होते वर्त्तमान में पूरी तरह फैला ,फंसा और निःशेष होता हुआ है .उसके पास शोषण और दुर्घटनाओं की पूर्व -स्मृति और परंपरा का कोई लेखा-जोखा नहीं है .जबकि अनुभव और स्मृति के बिना कोई भी प्रतिरोध संभव नहीं है .
        रामाज्ञा शशिधर की 'किसान आन्दोलन की साहित्यिक जमीन 'पुस्तक इस अर्थ में भी प्रतिरोध की पुनार्रचना है .आन्दोलन की मानसिकता और तेवर को आवाहन के माध्यम से पुनर्जीवित करती हुई .आलोचनात्मक नजरिया और संवेदनात्मक प्रस्तुति रामाज्ञ शशिधर की इस पुस्तक को एक विरल साहित्यिक कृति बनती है .इसे किसान आन्दोलन पर लिखे गए शोध-लेखों का संकलन मानना उचित नहीं होगा ये शोधपूर्ण अथवा शोध-समृद्ध निबन्ध हैं .विचारपूर्ण तथ्य-प्रस्तुति के साथ-साथ एक संवेदनात्मक पक्ष की प्रतिबद्धता इस पुस्तक को मिशनरी बनाती है .यह पुस्तक किसान संघर्ष को एक असमाप्त प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है .इसामें उद्धृत कविताएँ इतिहास में जिए गए शब्द हैं .इस तरह यह पुस्तक लोक-संवेदना का दस्तावेजीकरण भी है . इसमें विकास को विनाश के रूप में देखने और दिखने वाली आँख है जिसमें प्रश्नांकित करने वाला .ऐतिहासिक विवेक है .इसमें किसान-यथार्थ के ईस्ट इण्डिया कंपनी से मोर्सेटो-वालमार्ट तक की अनवरत औपनिवेशिक यात्रा की वैचारिक-सांस्कृतिक परिणति की सजग शिनाख्त भी है .
          इस पुस्तक के लेखन में हुआ दस वर्षों का लेखकीय निवेश साफ-साफ देखा जा सकता है .'खासकर १९१७ के अवध,बिजोलिया एवं चम्पारणसे १९४७ तक के लिए इतिहास की धुल से चुनकर अभूतपूर्व 'देशज साहित्यिक सामग्री 'एकत्रित की गई है .इस कार्य को धूल से चुने गए फूलों से निर्मित माला से उपमित किया जाय तो उसे अतिशयोक्ति  मानना उचित नहीं होगा .तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं और  अन्य दस्तावेजों से खोजकर किसान-यथार्थ से सम्बंधित कविताओं के लगभग तीन सौ उद्धरणों का सन्दर्भ देकर लिखी गई यह पुस्तक किसान आन्दोलन से सम्बंधित महत्वपूर्ण साहित्यिक सामग्री का प्रशासनीय दस्तावेजीकरण करती है .जब राष्ट्रीय आन्दोलन की आंधी चल रही थी -यह कार्य आंधी में हिलाते बड़े वृक्षों की सरासराहट के बीच दूबका हिलना खोजने की तरह है .रामाजज्ञा शशिधर नें अत्यन्त धैर्य के साथ यह सामग्री संकलित की है .यह पुस्तक किसान आन्दोलन से सम्बंधित साहित्यिक सामग्री के लिए लेखक के लम्बे एवं परिश्रमी शोध-पूर्ण भटकाव  से संभव हुई होगी -यह इसके पृष्ठों पर उपस्थित सामग्री देखा कर ही पता चल जाता है .प्राप्त संकलित सामग्री के लम्बे विचारशील साहचर्य से इस कृति में वे वैचारिक कौंधे और विश्लेषण-दृष्टि में सूक्ष्मता शामिल हो पाई है ,जो इस पुस्तक की अप्रत्याशित उपलब्धि है .यही कारण है की यह पुस्तक एक बहुआयामी और विरल पाठकीय अनुभव पाती है .किसान-आन्दोलन से सम्बंधित कविताओं का इतिहास-लेखन इसका एक पहलू है,जिसकी खोज और पड़ताल देश-कल में लोक और साहित्य दोनों की परस्पर आवा -जाही से की गई है .इससे यह किताब साहित्य का भी इतिहास बन पाई है और समाज का भी .आन्दोलनों से सम्बंधित तथ्य और लोक की सृजनशीलता के जीवित -स्पंदित टुकड़े परस्पर गुंथे हुए हैं .
           प्रत्येक अध्याय के अंत में दी गई विस्तृत सन्दर्भ -सूची;जिसकी संख्या दूसरे अध्याय में सर्वाधिक १७४ है,लेखकीय श्रम का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं . इसके अतिरिक्त  पुस्तक में किसान-आन्दोलन से सम्बंधित प्राप्त सूचना और साहित्य-सामग्री का विश्लेषण और वर्गीकरण -जो निश्चय ही समग्र्यों की खोज-यात्रा पूरी हो जाने के बाद ही किया गया होगा  भी. भूमिका के पश्चात् अध्याय होने की प्रतीति करने वाले शीर्षक मूलतः खंडों के शीर्षक ही हैं .इस दृष्टि से देखा जाए तो यह पुस्तक पांच खण्डों में विभाजित है -हिन्दी क्षेत्र में किसान आन्दोलन ,किसान-कविता का स्वरूप,मुक्ति का आर्थिक -राजनीतिक परिप्रेक्ष्य ,मुक्ति का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य और कला की राजनीति .
            पहला अध्याय अथवा खण्ड किसन आन्दोलन की राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है .संरचना की दृष्टि से पहला  खण्ड' हिन्दी क्षेत्र में किसान आन्दोलन 'स्वयं ही  पांच लघु अध्यायों का समुच्चय है -दमन और प्रतिरोध की यात्रा,सामन्तवाद विरोधी  चेतना ,उपनिवेशवाद विरोधी चेतना ,कांग्रेस यानि कालोनाइज्ड सिण्ड्रोम और वर्ग-संघर्ष की चेतना .इस उपखण्ड को आन्दोलन और उनकी पृष्ठभूमि का राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक इतिहास-लेखन कहा जा सकता है .अपनी प्रगतिशील समाजशास्त्रीय दृष्टि,रिपोर्ताज शिल्प और किसान जीवन तथा यथार्थ के प्रति अतिरिक्त संवेदन्शीलता के कारण रामाज्ञा शशिधर नें  १९१७ से १९१९ के बीच चलने वाले चम्पारण,बिजोलिया और अवध के किसान-आन्दोलनों की इतनी त्रिआयामिक प्रस्तुति की है कि सम्पूर्ण परिदृश्य प्रत्यक्ष हो उठता है .यह एक तरह से किसान आन्दोलनों और उनके नेतृत्वकर्ताओं का परिचयात्मक खंड भी है .तत्कालीन किसानों की आर्थिक असमर्थता और अशिक्षा का लाभ उठाकर इस देश का प्रभु-वर्ग औपनिवेशिक सत्ता के सहयोगी के रूप में कैसा निन्दनीय व्यव्हार करता रहा है ,इसका विस्तृत और प्रभावी विवरण यह पुस्तक देती है .विचारपरक होने के बावजूद पुस्तक का पहला खण्ड अनेक मार्मिक और त्रासद सूचनाओं से भरा है .किसानों से लिए जाने वाले सिर्फ बेगार करों की विस्तृत सूची को  ही देखें तो घुडअहीं ,मोटरर्हीं,हथियहीं,बंगलही ,फगुअहीं ,मुँहदेखाई ,चूल्हिआवन ,धवअहीं,नवअहीं, बपअही,पुतअहीं ,तावान,शराहबेशी ,हुंडा बंदोबस्त; मडवच ,सगौडा,सिंगरहाट,बाट,छप्पा , कोल्हुआवन, चंचरी, भाता , दंड,बराड,डोलचिये ,गठाई ,नकाई जैसे अनेक वसूलियों का पता चलता है .
            किसानों के प्रतिरोध के संगठनकर्ता नेतृत्व का परिचय देते हैं .इनमें चंपारण में अफ्रीका से लौटे महात्मा गाँधी की भूमिका ,बिजोलिया में  शचीन्द्र सान्याल और रासा बिहारी बोस के क्रन्तिकारी मित्र विजय सिंह पथिक की भूमिका तथा अवध में मराठी बाबा रामचंद्र दासकी भूमिका  तथा उनके द्वारा चलाए गए आन्दोलन कार्यक्रम पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है .उन प्रभावी नारों एवं गीतों पर भी जिनकी ऐसे आन्दोलनों में ऐतिहासिक भूमिका रही है .जैसे-राज समाज विराजत रूरे /रामचंद्र सहदेव झींगुरे (रूरे किसान सभा का नारा ).यहाँ झींगुरीसिंह एवं सहदेव सिंह बाबा रामचंद्र दास के सहयोगी थे .यद्यपि बिजोलिया किसान सत्याग्रह १९१६ से ही आरम्भ हो चुका था ,लेकिन अधिक प्रभावी चम्पारण सत्याग्रह १९१७ में महात्मा गाँधी के नेतृत्त्व  में आरम्भ हुआ था .अवध में बाबा रामचंद्र दास की रूरे सभा और शहरी वकीलों की यूपी किसान सभा द्वारा सामंती ढांचे के खिलाफ १९२० से २२ के बीच तेज संघर्ष हुआ .रामाज्ञा नें शोध में प्राप्त उन अमानवीय प्रसंगों का भी विस्तृत विवरण दिया है ,जो आज भी नई पीढ़ी को आवेशित एवं आक्रोशित कर सकते हैं .इनमें लगन के लिए ५ एवं १२ वर्ष की बेटी बेचने वाले निरीह किसानों से लेकर जमीदार के कारिंदों द्वारा पशु दुग्ध प्राप्त न होने की दश में किसानों से मानव -दुग्ध की मांग करना :किसानों के  घर आने वाली दुल्हन को पति के यहाँ पहुँचने से पहले जमींदार के यहाँ रात बिताना :ऐसे ही डोला प्रथा के विरुद्ध क्रन्तिकारी किसान नेता नक्षत्र मालाकर द्वारा अपने साथियों सहित पालकी में बैठ कर जमींदार और उसके लठैतों की जमकर पिटाई करना जैसे प्रसंग भी हैं .
           दूसरा अध्याय 'किसान कविता का स्वरूप 'वस्तुतः हिन्दी में लिखी गई किसान सम्बन्धी कविताओं का व्यापक सर्वेक्षण है .यह सर्वेक्षण लोक और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में किया गया है .इस अध्याय के उपशीर्षकों को देखें तो 'किसान-कविता की अवधारणा ',प्राकऔपनिवेशिक किसान कविता ','घाघ,डाक और भड्डरी ',किसान कविता में १८५७ ','पड़ा हिन्द में महाअकाल','प्रताप''अभ्युदय''नवशक्ति''जनता','हुँकार' ,'हल ',लोकप्रिय दस्तावेज ','जब्तशुदा साहित्य ','बिहार के किसान-गीत ','राजस्थान के किसान -गीत ',रामचरितमानस का क्रन्तिकारी प्रयोग ','युक्त-प्रान्त के किसान-गीत ','मुख्यधारा की कविता ','राष्ट्रीय काव्यधारा में किसान 'हैं.लेखक नें लोक और साहित्य दोनों क्षेत्रों के शोध - महत्त्व को आधुनिक समाजशास्त्रीय नजरिए से देखा है .इससे किसान मानविकी 'समस्या और प्रतिरोध को सम्पूर्णता में देखने में मदद मिली है .१८५७ से लेकर १९४७ के बीच हिन्दी में चले किसान आन्दोलन को हिन्दी की अलग-अलग पत्रिका और पत्रों में धैर्यपूर्वक तलाशने का कार्य   रामाज्ञा शशिधर नें किया है .
               तीसरा अध्याय 'मुक्ति का आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य ' अपने काव्यात्मक शीर्षकों और संवेदनात्मक चित्रण के साथ इस शोध को एक साहित्यिक निबन्ध-संरचना में प्रस्तुत करता है .उसके शीर्षक 'छोडो बेदखली की तलवार चलाना ','तोर जमीदरिया में ','फिरंगिया के राज में ','हल पंडित ध्वज निशान है ','गाँधी जी की छाप लगाकर ',आदि तथा इस अध्याय में सन्दर्भ रूप में दिए गए कविताओं के ७३ उद्धरण किसान आन्दोलन को उसके मूल सम्वेगधर्मिता और संवेदना  के साथ प्रस्तुत करते हैं .१९१८ में लिखी गई ऐसी पंक्तियाँ  जो अवध के किसानों की बेदखली से सम्बंधित हैं -आल्हा शैली में लिखी होने के कारण वीर रस शैली में निरीहता की व्यग्यात्मक प्रस्तुति करती हैं-'हंत!इजाफा अरु बेदाखलिन /की सहि जात न मार कुमार /कष्ट असह्य कहाँ लौं भोगाहिं/मिळत न विपति-सिन्धु को पार'(अभ्युदय साप्ताहिक ,२३ मार्च १९१८ ).ऐसे उद्धरण इस पुस्तक को अतिरिक्त महत्ता प्रदान करते हैं .लेखक के अनुसार हिन्दी की किसान कविता वर्ग संघर्ष की क्रन्तिकारी भूमिका तैयार करने में सक्षम थी,जन संस्कृति सांस्कृतिक क्रांति की आकांक्षा रखती थी और इसके लिए उसका रचनात्मक संघर्ष तीव्र था लेकिन किसान आन्दोलन को वर्ग संघर्ष के मूलगामी रूपन्तरण में ऐतिहासिक कारणों से चूक हुई .निस्संदेह यह चूक वही है ,जिसकी ओर मैंने  लेख के आरम्भ में ही संकेत किया है .   इसके बावजूद 'सामन्ती संरचना का विरोध किसान कविता का केंद्रीय कथ्य है .किसान-कविता में खेतिहर आबादी की बेदखली ,नाजायज लगान,लग-बैग ,नजराना,कर्ज जैसी जोंकों से निर्मित त्रासदी की अनगिनत छवियाँ हैं' .(पृष्ठ १४५ )    
                     चौथे अध्याय 'मुक्ति का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य 'भी काव्य-उद्धरणों और संवेदनाधर्मी  भाषा-संरचना में लिखा जाने के कारण पठनीय और प्रभावी है .उसके भी उपशीर्षक लोक-गीतों की पंक्तियों से लिए गए हैं .'साँझ जमीदारण के सेज ',पकड़ि-पकड़ि बेगार करावत',,'गाजी मियाँमुर्गा मांगे ','गावें-गावें संगठनमा' जैसे शीर्षक इस अध्याय में प्रस्तुत शोध-सामग्री को भी भाव-संवेद्य बनाते हैं .बिजोलिया किसान आन्दोलन के नायक विजय सिंह पथिक के बारे में यह कृतज्ञ भावोद्गार उस समय की लोक कविताओं की सच्ची छवि प्रस्तुत करता है -'म्हाने विजेसिंह आय जगायें माय /थारा गुण म्हें नहीं भूलां/म्हाने जूत्याँ सू पिटता बचाया ए माय /थारा गुण म्हें नहीं भूलां'.
                    पांचवां अध्याय 'कला की राजनीति ' इस शोध अनुभव को 'कला और लोकप्रियता का द्वंद्व ','रूप की धरती ',भाषा का यथार्थ ','अन्य का रूपक ','मिथक की विचारधारा 'आदि उपशीर्षकों के माध्यम से साहित्य-चिन्तन सम्बन्धी महत्वपूर्ण सूत्र विकसित करने का प्रयास करती है .रामाज्ञा के अनुसार 'किसान कविता कला की जन राजनीति से सीधी जुडी होने के कारण कलात्मकता और लोकप्रियता के संतुलन की कविता है .'किसान कविता की लोकप्रियता और कलात्मकता की एकता के निर्माण की प्रक्रिया को सामझाने के लिए किसान कविता की प्रसारशीलता ,विचारधारा,वर्गीय दृष्टिकोण ,पाठकों और श्रोताओं से उसके सम्बन्ध ,उद्देश्य और परिणाम ,प्रचार-प्रसार के माध्यम आदि मुद्दों को गहराई और व्यापकता के साथ समझाना होगा .(पृष्ठ १७५ )'किसान कविता की कलात्मकता वर्ग -संघर्ष की नईअंतर्वस्तु,नए रूप और नई भाषिक संरचना से प्राप्त हुई .उसकी लोकप्रियता के निर्माण में लोकभाषा ,लोक छंद ,लोक धुन ,लोक ले ,लोक मुहावरे आदि का योगदान है .उसकी कलात्मकता और लोकप्रियताकी रचनात्मक एकता के विकास में उद्बोधन ,संबोधन और संवाद की शैली का भी योगदान है .'(पृष्ठ १८० )रूप के स्तर पर किसान कविताएँ लिखित और मौखिक दोनों तरह की हैं .तुलना में 'किसान कविता का मौखिक लोक और जनगीत वाला हिस्सा ज्यादा रचनात्मक और लोकप्रिय है .'(वही,१८३ )भाषा भी लिखित और मौखिक दोनों रूपों में दिखाई देती है  .इसी अध्याय में 'अन्य का रूपक' शीर्षक के अन्तर्गत किसान-कविता में आए बिम्बों और प्रतीकों का विश्लेषण किया गया है लेखक नें किसान कविता के जन धर्मी बिम्बों को आन्दोलनधर्मी और मुक्तिधर्मी डॉ रूपों में चिन्हित किया है .आंदोलनधर्मी कविता में शोषण मूलक त्रासद  अनुभव वाले बिम्बों की भरमार है ,क्योकि प्रतिरोधी बिम्बों का व्यापक पैमाने पर निर्माण -कार्य किसान-कविता के लिए जरुरी रचना-प्रक्रिया था .सामन्तवाद-साम्राज्यवाद विरोधी बिम्ब ,वर्ग-संघर्ष की चेतना के निर्माण,किसान-जागरण ,राष्ट्रवादी तथा स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी बिम्ब आते हैं.  हिन्दी आलोचना की समृद्धि के लिए रामाज्ञा शशिधर की यह प्रस्तावना भी महत्वपूर्ण है कि' किसान-कविता अंग्रेजी की 'औपनिवेशिक भाषाई मानसिकता 'के विरुद्ध हिन्दी कविता की 'खड़ी बोली,को जनपदीय बोलियों की कविता से समृद्ध करती है तथा लिखित और वाचिक के तनाव से कलात्मकता एवं लोकप्रियता के बुनियादी कला-नियम का हल प्रस्तुत करती है .'         


शुक्रवार, 7 जून 2013

ज्ञानेन्द्रपति : समय -संवेदन और जीवन-विमर्श के भाष्यकार

(साहित्यिक पत्रिका -"चिन्तन-दिशा" के  ,जनवरी-मार्च २०१३अंक में  ,संपादक-हृदयेश मयंक ,ए -७०१,आशीर्वाद -१,पूनम सागर काम्प्लेक्स ,मीरा रोड (पूर्व)मुम्बई-४०११०७ से प्रकाशित )

ज्ञानेन्द्रपति  :  समय -संवेदन और जीवन-विमर्श के  भाष्यकार                                               


 ज्ञानेन्द्रपति निराला  और  नागार्जुन की उदात्त संवेदना वाली कवि-परंपरा में सक्रिय समकालीन हिंदी कविता का एक बड़ा नाम है .मुक्तिबोध  के बाद हिंदी की अपनी भव्य या या शानदार कविता (क्लासिक कविता के अर्थ में ) के गंभीरतापूर्वक सक्रिय एकमात्र कवि है .यद्यपि प्रतिभा और सम्भावना के स्तर पर आलोकधन्वा उनके के साथ सहयात्री रहे है ,लेकिन फ़िलहाल तो अपनी बहुआयामिता के कारण अप्रतिस्पर्धी है .उनकी इस उदात्त काव्यप्रतिभा का निदर्शन उनके पहले ही प्रकाशित काव्यसंग्रह 'आँख हाथ बनते हुए '(1970) में संकलित  कविता 'एक गर्भवती औरत के प्रति कविताएँ ' में देखी जा सकती है .यह कविता स्त्री का उसके मातृत्व के लिए ससम्मान ब्रह्माण्ड व्यापी बिम्ब में रूपायन करती है .पहली कविता एक स्त्री -जीवन के अस्तित्वगत अर्थवत्ता को एक विराट और सर्वव्यापी प्रत्यक्षीकरण के रूप में प्रस्तुत करती है।  यह कविता अपनी विशेषताओं के लिए सिर्फ हिंदी की ही नहीं ,बल्कि विश्वकविता की भी महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है .कविता इस प्रकार है-'यह तुम्हारा उदर ब्रह्माण्ड हो गया है ./इसमे क्या है ?एक बन रहा शिशु भर ?/झिल्ली में लिपटी मांस पहनती चेतना .बस ?/कितनी फैलाती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की /तुम क्या जानो /कि अन्तरिक्ष तक चली गई है यह विरूप गोलाई और ये /पेड़-पौधे ,माकन,सड़कें ,मैं ,यह पोल ,वह कुत्ता ,उछलता वह मेढक /रंभाती गाय ,बाड़ कतरता माली ,क्षितिज पर का सूरज /सब उसके  अन्दर चले गये हैं /और तुम भी .''इस कविता में वह दार्शनिक प्रत्यायन का गुण भी  जा सकता है , जो ज्ञानेन्द्रपति  की कविताओं की मूलभूत विशेषता है . यह विशेषता उनकी कविताओं को तात्कालिक संवेदना से स्थाई प्रज्ञा की खोज की ओर ले जाती है .काल या समय को जीना और उसका अतिक्रमण यानि संवेदना और बोध दोनों की ही कविता में निष्पत्ति ज्ञानेंद्रपति की कविताओं को विशिष्ट बनती है .उनकी कविताओं में मिलने वाली यह दृष्टि या आँख इतिहास,परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक सभ्यता के सम्यक बोध से एक प्रबुद्ध सर्जक संस्कार के रूप में ज्ञानेन्द्रपति में आई है .यही कारण है कि ज्ञानेन्द्रपति का कवि अपने समय में भी है और सर्वकालिक भी .उनकी कविताएँ जीवन और कला,संवेदना और सृजन दोनों की ही साधना और दक्षता का परिणाम है। यही वह  है जो उनकी कविताओं को नक्सलबाड़ी  आन्दोलन से प्रेरित होकर अपनी काव्ययात्रा का आरम्भ करने वाले समकालीन अन्य जनकवि अरुणकमल और आलोकधन्वा से अलग करती है .अरुणकमल तात्कालिक संवेदना से ऊपर नहीं उठ पाते और आलोकधन्वा आन्दोलनकाल से अर्जित अपनी प्रसिद्ध आवेशमयी कलात्मक मुद्रा और भंगिमा से। उनकी पीदी के कवियों में यह अतिक्रमण सिर्फ ज्ञानेंद्रपति में दीखता है .वे पर्यावरण की सम्पूर्ण चिता के कवि हैं -कविताओं में उपस्थित यह पर्यावरण प्रकृति से लेकर मनुष्य तक ,सुदूरवर्ती विकास-वंचित गाँव से लेकर प्राचीन और आधुनिक सभ्यता के संरक्षक और वाहक नगरों और महानगरों तक,इतना ही नहीं संवेदनात्मक,मानसिक और सांस्कृतिक स्तर तक भी फैला है . हर कविता में कवि एक सम्पूर्ण दृष्टि स्वायत्त करना चाहता है।उसकी दृष्टि संवेदना और विमर्श दोनों पर है .संशयात्मा में संकलित उनके 'टी 0वि 0युग के कवि 'शीर्षक कविता को उदहारण स्वरूप देखा जा सकता है .अपने राजनितिक उद्देश्य के लिए भावी पीढ़ी को भी भ्रष्ट करने की कूट साजिशो  के एक आधुनिक माध्यम के रूप में टी0वी 0 और उसके  कवियों की भूमिका की पड़ताल कवि मिथकीय धरातल पर करता है .यह मिथकीय बिम्ब सत्ता के पुरातन जनविरोधी चरित्र का भी खुलासा करता है -   "सत्ता की पूतनाएँ /पहचानती राजसत्ता को चुनौती दे सकने वाले अंग-लक्षण "(संशयात्मा ,पृ 093)ज्ञानेन्द्रपति की बहुत -सी कविताए एक संवेदनशील गंभीर विचारक का समय -विमर्श हैं .वे समकालीन अव्यवस्था से एक प्रतिबद्ध कवि के मानसिक संघर्ष या मुठभेड़ की तरह हैं।इस क्रम में उनकी कविताएँ 1970 के बाद के भारतीय समाज और इतिहास का संवेदनात्मक और वैचारिक पड़ताल पर्स्तुत करती हैं।उनकी कविताएँ कवि की ओर से एक आदर्श संवेदनशील मानवीय समाज और व्यवस्था की प्रस्तावना  की तरह है। वे मुक्तिबोध और धूमिल के बाद के समय के सबसे प्रमाणिक भाष्यकार कवि हैं। उनकी कविताएँ एक लम्बे समय के विद्रूप यथार्थ की न सिर्फ साक्षी हैं ,बल्कि उनसे जूझते हुए परिदृश्य में उपस्थित हर उलझन को सुलझाती चलती हैं। उनके पास विचारधाराओं की जनपक्षधर सूक्ष्म विश्लेषक वैज्ञानिक समझ है। विवेक की पूर्वाग्रह रहित वह निर्मम तटस्थता है जो किसी महत्वपूर्ण साहित्यकार को देर तक विश्वसनीय और प्रासंगिक बनाये रखती है .वह अद्यतन समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टि है ,जो उनकी कविताओं को हिंदी के पूर्ववर्ती कविओं की कविताओं में व्यक्त समझ से अधिक परिष्कृत और निर्दोष बनती है .          वर्ष 2004 में राधाकृष्ण से प्रकाशित उनके 'संशयात्मा ' संग्रह में प्रकाशित कविताओं के शीर्षक पर ही दृष्टिपात करें तो उनकी कविताओं की बहुआयामिता और विषय -विस्तार का पता चलता है .गाँव के घर,आदिवासी गाँव से गुजरती सड़क ,झारखण्ड के पहाड़ ,धूमिल की खेवली ,,जर्सिडीह स्टेशन ,बिड़ला का तारामंडल                हिन्दी में प्रबंध -काव्य और  महाकाव्य शब्द प्रायः पर्यायवाची की तरह प्रयुक्त होता रहा है ,लेकिन प्रबन्ध -कवि होना महाकवि होना कभी नहीं रहा है .कवित्व की सामर्थ्य एवं पुरुषार्थ संभवतः उसकी संवेदनात्मक व्याप्ति एवं यात्रा में है .उसकी अन्तर्दृष्टि एवं कलात्मक जीवन्तता में है.कवि की नवान्वेषी समझ एवं उसकी दूरदर्शिता जो प्रायः घटनाशीलता की प्रवृत्यात्मक पहचान तथा काव्यात्मक अनुभव की भविष्योन्मुख सार्थकता पर आधारित होती है -किसी कवि के रचनाकर्म को महत्वपूर्ण बनाती है। कविता   पर विचार करते समय किसी कवि और उसकी कविता का सिर्फ बाह्य  रूपाकार ही महत्वपूर्ण नहीं होता ,बल्कि उसके काव्यात्मक मानस का  देने वाली अभिव्यक्ति की  काव्यात्मक संरचना भी महत्वपूर्ण है ,जो उस कवि की संवेगात्मकता के साथ-साथ उसकी मौलिक कल्पनाशीलता को भी व्यक्त  करे .ऐसा इसलिए  जरुरी है कि  यह कल्पनाशीलता ही उसे सामान्य मनुष्य की कल्पनाशीलता की   सीमा से आगे और  महत्वपूर्ण बनाती है .यह विशिष्टता ही सामान्य मनुष्य के कथन से उसके कथन को अलग और महत्वपूर्ण बनती है .आचार्य शुक्ल  ने इसे ही विशेष के माध्यम से सामान्य तक पहुँचने की प्राविधि के रूप में  देखा और उसे सामान्यीकरण कहा कहा है .,मुंबई का समुद्र -तट ,अस्पताल का लाशघर ,ढेलहवा  बाबा ,फजिर की अजान ,थायलंड और कंचनजंघा ,नन्हा-सा कीड़ा ,,मेढक ,कछुअशिशु ,गिद्ध-वृक्ष ,प्लास्टिक के सुग्गे,खेसाड़ी  दाल ,भाप-इंजन ,चन्द्रबिन्दु,मूर्धन्य ष ,कवी मन बहादुर सिंह की हत्या,,मानव-बम ,गमछे की गंध ,खर्पट्टू,सगीर मिया ,इथियोपिया ,खाड़ी -युद्ध ,सैलून ,वाहनों कपिछा करती पत्तियां और बच्चे  तथा गणतंत्र दिवस सभी कुछ है .        एक ऐसे समय में जबकि कविता लिखने वाले कवियों की संख्या हजारों में है ,कई पीढियां संचार माध्यमों से अपने -अपने रिश्ते के साथ सक्रिय हैं ,किसी कवि के सापेक्षिक महत्व की तलाश की कसौटी उसकी अछूती संवेदन्शीलता और यथार्थ की प्रथम अन्वेषी दृष्टि ही हो सकती है .इस कसौटी पर परखें तो मुझे नहीं लगता कि किसी समकालीन कवि के पास  'क्षितिज -शोक 'उत्तर -परमात्मा 'और 'फजिर की अजान ' जैसी कवितायेँ हैं .ज्ञानेन्द्रपति हिंदी के एक मात्र कवि हैं ,जिनमे मुक्तिबोध द्वारा अभीप्सित वर्ग -मुक्ति या वर्ग के अतिक्रमण का ईमानदार और निर्दोष आत्मसंघर्ष पूर्णरूपेण चरितार्थ हुआ हो .कम से कम साम्प्रदायिकता के विरुद्ध भी ज्ञानेन्द्रपति जैसा आत्मीय ,मानवीय और आह्लादक दृष्टिकोण या भावनीति किसी और के पास नहीं है .उनकी कविता " एक मंदिर की उन्नति -कथा 'अपनी निर्मम,नि:संग और स्पष्ट आलोचना के लिए निराला की उस कविता की यद् दिलाती है जिसमे वे बंदरों को चने खिलाने और मलिन भिखारी मनुष्य को 'दूर हट राक्षस 'कहने वाले अमानवीय (अ )धार्मिक की भर्तस्नाकरते हैं .यह कविता धर्मोपजीवी अर्थतंत्र की गहन पड़ताल कराती है . एक आदिवासी गाँव से गुजरती सड़क 'कविता सड़क के निर्माण के प्रयोजन से जोड़ कर उस सड़क का व्यक्तित्व -निर्माण और उसका प्रत्यक्षीकरण कराती है -                        ''चमक पड़ा मर्म /आदिवासी गाँव की छाती से गुजरती सड़क का /की हमारी शोषण की सभ्यता का /कि जिसकी बाँह राजधानी से /यहाँ तक यह आई है /लुटेरी बाँह /टटोलती इसकी छाती के कोयले आत्मा का अबरख / यह सड़क/ कि यह नहीं राजधानी से बहती आई सभ्यता की नदी / कि इससे नहीं कोई सम्बन्ध /इसके किनारे बसे हुओं का /सिवा इसके कि /पिपासु पहियों के नीचे आ जाते हैं जब -तब /इनके चूजे और बच्चे /और अड़हुल -सा खिला किसी युवती का यौवन रौदा जाता है .''(संशयात्मा ,पृ o 21)           आधुनिक नगरीय विकासात्मक विध्वंस की इतनी कटु टिप्पणी किसी और हिंदी कवि के यहाँ नहीं मिलती ,जैसी कि उनकी कविता " क्षितिज -शोक " में -    "एक दिन अचानक / शहर अपना एक और नाख़ून बढ़ा देता है  /उठ आता है आकाश में एक और कंकरीट के कुकुरमुत्ते का शीश ".(संशयात्मा,पृ 0 48)इसी तरह मुक्त अर्थव्यवस्था और भूमंडलीकरण युग के बाजार के चरित्र का सर्वश्रेष्ठ एवं अपरिहार्य रूपक उनकी कविता 'उत्तर -परमात्मा 'प्रस्तुत करती है .क्षितिज -शोक,उत्तर -परमात्मा और फजिर की अजान कवि ज्ञानेन्द्रपति की ऐसी निर्विकल्प  मौलिक कविताएँ हैं ,जैसी की किसी ने नहीं लिखी .निर्विवाद श्रेष्ठता की अद्वितीय एवं अनन्य .      फजिर की अजान को चिड़ियों की चहचहाहट की तरह जीवन के सूनेपन में अस्तित्व और उपस्थिति का रंग भरने वाली आत्मीय आवाज की तरह ज्ञानेन्द्रपति ने इसी शीर्षक कविता में चित्रित किया है .कवि  उसे संप्रदाय विशेष की नहीं,बल्कि मानवीय जीवन और संवेदना की अपरिहार्य आवाज की तरह देखना और दिखाना चाहता है।इस कविता को पढ़ कर बचपन के अबोध मन से सुनी गयी अजान की उन आवाजों की याद ताज़ा हो जाती है ,जब सिर्फ बालसुलभ जिज्ञासा ही थी,सम्प्रदाय कलुषित मन नहीं -             फजिर की अजान /लाने चली  सूरज को /आकाशालंघी आलाप की लम्बी रस्सी से खींच /खिंचा चला आता है  में पानी /करता तर खुली टोंटियो वाले /देर से सन्नाते नलको के खुश्क हलक /और जग उठती है हलक में फंसी /दमदार बूढी देहों की दमदार खांसियाँ ''भारतीय भोर की आहट की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कराती यह कविता साम्प्रदायिक सौहार्द के एक नए युग के आवाहन के संकल्प के साथ खत्म होती है।           ज्ञानेंद्रपति प्रगतिशील उदात्त  एवं भव्य कविता की परिकल्पना के कवि है। उनमे भाषिक सामर्थ्य की वह  है जो उनसे पूर्ववर्ती कवियों में सिर्फ निराला और मुक्तिबोध में ही देखने को मिलती है .लेकिन उनकी बहुआयामी जीवन-साक्षात्कार और विमर्श के कवि होने की सृजनात्मक यात्रा ऐतिहासिक रूप से मुक्तिबोध को सिर्फ क्रन्तिकामी विक्षोभ के कवि के कवि के रूप में सीमित करती है .ज्ञानेंद्रपति की कविताओं को पढ़ने के बाद मेरे मन में मुक्तिबोध और उनके कविकर्म की तुलना को लेकर जो बिम्ब उभरता है,उसमे मुक्तिबोध के बाढ़ के समय की नदी के रूप में  आते है तो ज्ञानेन्द्रपति वर्षपर्यंत की प्रवाहशील नदी के रूप में ,जो जीवन-संघर्ष के हर रूप की साक्षी है .   नक्सलबाड़ी आन्दोलन की भाव -भूमि से प्रेरित ज्ञानेन्द्रपति और  उनकी पीढ़ी के आलोकधन्वा और अरुणकमल जैसे कवियों को  मै गुणवत्ताशील किन्तु आवेशपूर्ण क्रन्तिकारी नारे लिखनेवाली सीमित विषयवस्तु वाली ख्यातिलब्ध कवियों की त्रयी मानता था .आवेशधर्मी कविताओं के लिए आलोकधन्वा और ज्ञानेन्द्रपति समान प्रतीति के प्रतिस्पर्धी लगते थे।अरुणकमल की स्थिति ठंढा-लोहा जैसी थी .इसका कारण यह रहा है कि अरुणकमल की कविताएँ एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की मुद्रा और भंगिमा के चरित्र में संरचित है . इस त्रयी में ज्ञानेन्द्रपति इस लिए विशिष्ट हैं कि वे अपने समय के सबसे प्रामाणिक और व्यापक भाष्यकार और प्रतिनिधि चितेरे कवि हैं।अपने समय की सर्वाधिक विश्वसनीय और विचारपूर्ण समझ उनके पास है .           ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित और किताबघर द्वारा प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कविताओ के संचयन 'कवि ने कहा ' में संकलित 'कुछ कविताएँ और कुछ कविताएँ 'शीर्षक कविता में अपनी रचना-प्रक्रिया पर उनकी काव्यात्मक टिप्पणी इस प्रकार है-  'कुछ कविताएँ तो मै /खेतों से शकरकंद की तरह / खोद कर लाया / कुछ कविताएँ/तितलियों की तरह /खुली खिड़की से /घुस आयीं मेरे घर /कि अपने घर कुछ कविताओं के लिए मै /कितना-कितना घूमा /गो-यूथों के पीछे-पीछे /चरवाहे बालक-सी /कि साँझ उन्हें/दुह सकूँ /धारोष्ण .../कुछ कविताएँ  /कई -कई बिट्वन की कुतिया -माता सरीखी /दुधीले थन और गीली थूथन लिए लगी चली आई सड़क से /पीछे -पीछे मेरे दुआरे .'(कवि ने कहा ,पृ0 139-140) इस काव्य -उद्धरण में ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं और कवि की रचना-प्रक्रिया के सारे संकेत उपस्थित हैं।संवेदनात्मक परकाया प्रवेश,पर्यवेक्षण ,काव्य-श्रम और चिंतन और कवि स्वभावजन्य अयाचित प्रातिभ उपलब्धि -सभी काव्य-रूप एवं संरचनाएँ .            ज्ञानेन्द्रपति की ट्राम में एक याद ' कविता जो प्रायः अपनी पहली पंक्ति 'चेतना पारीक ,कैसी हो?'की याद से अधिक जानी जाती है .प्रथम द्रष्टया जो क्रन्तिकारी प्रेम-प्रभाव की कविता लगती है। दरअसल सामान्य स्त्री -जीवन की नियति और  त्राषद संभावनाओं की पृष्ठभूमि पर बुनी गयी है .अठारह प्रश्नचिन्हों से युक्त यह कविता पूर्वार्ध में जहाँ आधुनिक स्त्री के सकारात्मक पक्षों को याद करती हुई स्वस्थ एवं आदर्श आधुनिक प्रगतिशील स्त्री -जीवन का एक प्रतिरूप प्रस्तुत करती है ,वहीँ उत्तरार्ध मेंलेती हैं . अस्तित्व की महत्ता ,सार्थकता और वैभव का अविस्मर्णीय  आख्यान बन जाती है -                   इस महावन में फिर फिर भी एक गौरैये की जगह खाली है                   एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है                   महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है                   विराट धक्-धक् में एक धड़कन कम है ,कोरस में एक कंठ कम है                   तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते है ,उतनी जगह खाली हैज्ञानेन्द्रपति को मानवीय  और दुश्चिंताओं की अदभुत पहचान है .चाहे ' शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है 'में संकलित कविता 'बनानी बनर्जी 'का दुस्वप्न  हों या फिर 'गंगा-तट 'में संकलित कविता 'वे दो दाँत -तनिक बड़े 'कविता की नायिका मंजु श्रीवास्तव का सांवला रंग और तनिक बड़े दो दाँत हों -'जो डेंटिस्ट की नहीं ,एक चिंता की रेतियो से रेते जाते हैं।'यह करुणाशील कवि की मर्मभेदी आँख है जो लगाकर लोक -विचलन की शिकार दुखी आत्माओं की मानसिक यातना को सहृदय संवेदना के साथ पढ़ लेती हैं .ज्ञानेंद्रपति की कविताओं की यह सबसे प्रिय भूमिका है .यह शायद काव्य-विधा की ही आदिम भूमिका है .जो एक करुनाकातर संवेदनशील मानव-मन की सृष्टि करना चाहती हैं . बहुत -सी कविताएँ इसी भाव -स्म्वेद्य मनोभूमि की देखि जा सकती हैं .चाहे 'एक रेल  डिब्बे में'झाड़ू लगाकर भीख की जगह  के लिए पारिश्रमिक मांगने वाला दयनीय बच्चा हो -कवि की आँखों ने कई बार सामान्य मनुष्य से अदेखी  जाने वाली निरिह्ताओं को भी काव्य -विषय बनाया है .      उनकी  एक पंखुरी  और कविता ओशो वचन के   सौन्दर्यचेता प्रभावों का अंकन एक मित्र पर पड़े  के रूप में कर ती है .' हल्की-सी उदासी तुम्हे  है ' के   कवि  अपने जीवनानुभवो का साझा करता है .अपने कवि की  भूमिका को ज्ञानेन्द्रपति नेने  अपनी 'क्यों न 'शीर्षक   कविता में इस रूप में व्यक्त  किया है -'क्यों न कुछ निराला लिखें /इक नयी  लिखें/ का राज चौतरफा चौतरफ/एक  तीली उजाला लिखें  xxx खल  पोतें दुन्या  पर एक ही  रंग /हम वैनिआहपीनाला लिखें'.इसी तरह 'कबिरा खड़ा बाजार में ' कविता कबीर की नियति को समकालीन नकारात्मक  संभावनाओ के परिप्रेक्ष्य में रखकर पुनर्मुल्यांकन करती है .कबीर साहब की छह सौवीं जयंती के उत्सव के बहाने यह कविता कबीर का उत्सव मना रहे दो वर्गों के चरित्र के माध्यम से यथार्थ का बहुआयामी चरित्र उकेरती है .यथार्थ अभिजन और सामान्यजन के अलग-अलग चेहरों को देखने -दिखाने वाली कविता यथार्थबोध का कलान्तरण भी प्रस्तुत करती है .कबीर के समय का यथार्थ और वर्त्तमान समय का यथार्थ-यह कविता यथार्थ के कलान्तरण का शोधपूर्ण साक्षात्कार है .कबीर पर आयोजित विचारगोष्ठी में शामिल राज्यपाल और प्रोफ़ेसर के ज्ञान और माया के द्वैत पर व्यंग्यात्मक वाले टिप्पणी कराती हुई यह कविता कबीर के बहाने आज की तारीख में भी लावारिस शिशुओ के आपराधिक हश्र तथा कालीन उद्योग में बाल -श्रम के शोषक इस्तेमाल की समस्या की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है .               ज्ञानेन्द्रपति ऐसे ऐसे  कवि नहीं  कि उनकी  कविताओं पर विहंगम या दूरवर्ती आलोचना लिखी जाय ,न ही उनमे प्रतिभाहीन निष्ठा से  उपजीहुई वह एकयामिता ही मिलती है कि वाद के  मंच पर बैठी हुई पूर्व-नियोजित एवं प्रत्याशित आलोचना पहले से हीही आपने  करते करते आलोचना-मान लिए स्वागत में बैठी हो . उनकी प्रतिभा ने नई सृजनशीलता के बीहड़ में भटकने का वह जोखिम भरपूर मिलता है,जिसने प्रगतिशीलता के रीतिकाल में भी प्रगतिशील कविता की प्रतिष्ठा बचाई अन्तर्दृष्टि है .अनुभूति,संवेदना या काव्यवस्तु के स्तर पर्ग्यानेंद्र्पति काव्यात्मक दुहराव या आदत के कवि नहीं है .उनकी हर कविता जीवन के साक्षात्कार की शत-प्रतिशत मौलिक सृजित परिघटना होती है ,लेकिन अभिव्यक्ति की  अपनी विशिष्ट शैली के कारण काव्यरूप के स्तर  पर उनकी कविताये जो निजी  पहचान संप्रेषित कराती हैं -वह कुछ रीझ और कुछ भाषिक व्यसन के साथ कलात्मक सम्पूर्णता का विशिष्ट  वितान अवश्य रचती है .उनकी इधर प्रकाशित" मनु को बनाती मनई " कविता -संग्रह की कविताएँ अपने शीर्षक के अनुरूप ही मानव-सभ्यता के स्त्री-पक्ष की पड़ताल कराती हैं.ज्ञानेन्द्रपतिका यह संग्रह संवेदनात्मक धरातल पर स्त्री-विमर्श के अधूरे वृत्त को पूरा करने के लिए पुरुष-मन के स्त्रियोचित रूपांतरण की प्रस्तावना करती हैं .ये कविताएँ मानव-जाति के अस्तित्व में स्त्री जाति के सकर्मक योगदान का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं .इन कविताओं में उपस्थित दुनिया मानव-जाति की आधी आबादी की छोटी-छोटी सक्रियताओं की दुनिया है ,जो पुरुष प्रधान दम्भी और बड़बोले अंधे  समाज  से प्रायः अनदेखा ही रह जाती है .स्त्री की वृहत्तर और उदात्त अन्विति इन कविताओं की विशेषता है .स्त्री जीवन के अलग-अलग  यथार्थ-भूमि से लिए गए   छोटे-छोटे चित्र  स्त्री जीवन का बहुआयामी ,सम्पूर्ण और औपन्यसिक वृत्तान्त रचाते हैं .इस दृष्टि से यह स्त्री-जीवन के विविध -पक्षों पर लिखी गयी एक शोधपरक महत्वाकांक्षी कृति है .         स्त्री-विमर्श को सभ्यता-विमर्श के व्यापक फलक से देखे जाने का रचनात्मक आग्रह करती हैं .ये कविताएँ स्त्री के पक्ष में खड़े होकर पुरुष-मन की काव्यात्मक प्रस्तावना और संवेदनात्मक अपील करती हैं .यह विमर्श के उस अधूरे वृत्त को पूरा करने का प्रयास है,जो केवल स्त्री-विमर्श के दायरे में संभव नहीं है .जैसे समाज का सम्पूर्ण रूपान्तरण बिना जाति-विमर्श के केवल दलित विमर्श से ही संभव नहीं ,जैसे शोषक विमर्श के बिना शोषित विमर्श जैसी कोई चीज नहीं हो सकती ;वैसे ही स्त्री-विमर्श के वृत्त को पूरा करने के लिए स्त्री केन्द्रित पुरुष-विमर्श भी करना ही होगा .जो लोग सिर्फ अलग पहचान के लिए इस तरह के विभाजन को बढ़ावा दे रहे हैं ,उन लोगों को स्त्रियों द्वारा प्रस्तुत स्त्री-विमर्श के साथ  इस संवेदनशील पुरुष कवि  द्वारा प्रस्तुत स्त्री-विमर्श को भी पढ़ना चाहिए .दरअसल दाम्पत्य समाज -निर्माण और सामाजिकता की प्राथमिक इकाई है .स्त्री के अस्तित्व का सिर्फ प्राकृतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और सभ्यतागत पक्ष भी है .इस लिए एक स्वस्थ विमर्श सभ्यता-विमर्श के रूप में ही हो सकता है .ज्ञानेन्द्रपति के इस संग्रह की भी अधिकांश कविताएँ  स्त्री जीवन के संवेदनशील और मार्मिक निरिक्षण की प्रक्रिया में सृजित हुई  हैं.इन कविताओं में भी ज्ञानेन्द्रपति जीवन के गहन अनुभवों और साक्षात्कार के कवि के रूप में सामने आते हैं .
               संकलन की पहली ही कविता "वह"स्त्री-नियति का सम्पूर्ण बिम्ब प्रस्तुत करती है -"उसके होंठ प्रेमिका के होंठ हैं /उसकी छातियाँ माँ की छातियाँ हैं /उसके हाथ मजदूर के हाथ हैं /इस दुनिया के भीतर गिरती-पड़ती /वह नहीं जानती /कि वह इसे लुढ़काए भी लिए जा रही है ".स्त्री के शिशु-रूप  की निष्पापता,वर्जनाओं और असुरक्षा से मुक्त उसके बल-सुलभ जिज्ञासा के मानवाधिकार को "तितली की तरह मडराती हुई "शीर्षक कविता बहुत ही संवेदनशील द्गंग से प्रस्तुत करती है .कविता स्नेह का एक आशंका मुक्त पाठ प्रस्तुत करती है .अभिभावकों का नेपथ्य विश्वास और पराए स्त्री-शिशु के प्रति सहज-आत्मीय स्नेह की दुर्लभता ही इस कविता को महत्वपूर्ण नहीं बनातीबल्कि अपनी जिज्ञासाओं के कारण अपराध का शिकार होने वाली स्त्री-शिशुओं की दुर्घटनात्मक सामाजिक स्मृति के परिप्रेक्ष्य में जिज्ञासु स्त्री-शिशु का तितली की तरह मडरा सकने का मानवाधिकार इस कविता को अतिरिक्त महत्ता प्रदान करता है .ज्ञानेन्द्रपति की ये कविताएँ एक स्वस्थ और संवेदनशील उदात्त भाव -बोध और मन  वाले प्रबुद्ध नागरिक के निर्माण का सृजनात्मक प्रयास और प्रस्तावना हैं .  काश!आकाश "कविता श्लीलता-अश्लीलता से मुक्त अपने नैसर्गिक बनावट के साथ स्त्री की सामाजिक स्वीकार्यता से है .वर्जनाओं -वासनाओं से लिपटे  बीमार पुरुष -दृष्टि वाले समाज में उनके छिनते समजकाश  की चिंता यह कविता इस टिपण्णी के साथ प्रस्तुत करती है कि'अपने अस्तित्व के प्रति कोई अपराध-बोध महसूस न करें वे.'"एक नई -नकोर लेडीज साईकिल " कविता का साहित्यिक सोंदर्य उस मनोवैज्ञानिक प्रत्याक्षीकरण में है जिसे मानवीकरण कहा जाता है .एक नए स्त्री-जीवन की उड़ान के प्रतीक के रूप में साईकिल का मानवीकरण  उदात्त जीवनबोध और बिम्बों के साथ किया गया है .माँ और बेटी का रिक्शे के पीछे नई साईकिल का लड़ कर लाना एक नए स्त्री जीवन के प्रति सम्मान का प्रतीक बना देता है . कवी उसे एक महँ दृश्य घोषित करता है .साईकिल का धरती पर न होना कल्पनाओं-संभावनाओं और आकांक्षाओं  की भविष्य-भूमि में एक नए स्त्री -जीवन का स्वागत है -" एक नई -नकोर लेडीज साईकिल/क्षितिज की और जाती हुई /अनगिन गतियों के वर्तुल बीज /उर में जुगोये मौन  ""ज्ञानेन्द्र पति की अनेक कविताओं में  बाजारवाद की अंधी दौड़ में   लुप्त होते सांस्कृतिक मनुष्य और उसके आर्थिक यथार्थ की मानवीय पड़ताल मिलती है .यह सांस्कृतिक मनुष्य धार्मिक मनुष्य नहीं ,बल्कि एक सभ्यतागत(स्त्री -) मनुष्य है .उत्सव का सांस्कृतिक पर्यावरण एक अलग अर्थ-तन्त्र  की रचना भी करता है .ज्ञानेन्द्र पति नें इन पेशों में निहित मानवीय सम्भावनाओं और संदेशों की भी आधुनिक दृष्टि  से पड़तालकी है ."दीवाली बे -दीया  कविता ऐसे ही एक उदास पेशे का शोक-गीत है-"एक कुम्हार की सधी उँगलियों नें तराश कर /उनमें जलने की उम्मीद भरी है /जलने की एक बुझी-बुझी -सी उम्मीद "कालोनी की सडकों पर दिए बेचने के लिए आवाज लगा रही माँ -बेटी के बहाने कवी नें ऐसे लोगों की का्यखबर ली है .इन कविताओं में ज्ञानेन्द्रपति जीवन-नियति की विविधता के साथ-साथ स्त्री जीवन के वर्गीय रूपों और रहस्यों का भी काफी दिलचस्प और विशेषज्ञ विश्लेषण प्रस्तुत करते है .उनकी गोलगप्पे कविता में एक सेठ घराने की स्थूल-का्य निष्क्रिय माँ -बेटी  के सुख -दुर्वह जीवन में  चिंतनीय कैलोरी अर्जन को एक नागरिक चेतावनी के रूप में "डायनासोर के बिस्तुइया रूप "कह कर औरों से साझा करता है .बाटी वाली ताई कविता बाजार में घर की संवेदनात्मक उपस्थिति वाली ताई की उर भारी बटिया तथा उसके घर गंधी ठेले का काव्यात्मक रेखा-चित्र है .एक संवेदनात्मक त्रिकालदर्शिता ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं को दूसरों के लेखन से अलग और विशिष्ट बनाती है .परम्परा और इतिहास बोध के साथ सजग भविष्य -बोध और वर्तमान यथार्थ तथा जड़ता से उपजी पर्यावरण -विनाश की आशंकाओं को सृजनात्मक हस्तक्षेप से दूर करने वाली सक्रिय अंतर्दृष्टि उनके कवि -कर्म को एक विशिष्ट सार्थक आयाम स\देती है .उनकी सभी कवितायेँ  समवेदन धर्मी बुद्धि की प्रस्तावना करती हैं .वे जीवन के प्रति सार्थक आसक्ति और स्वस्थ राग की खोज करती हैं.ज्ञानेन्द्रपति सही व्यवस्था की खोज के वामपन्थी प्रश्नों को सुरक्षित रखते हुए ,बिना किसी समझौते के संवेदनशील मनुष्य की खोज की यात्रा जारी रखते हैं . अपनी कविताओं में उनकी कविताएँ अनेक सांस्कृतिक -सामाजिक संरचनाओं में पड़े मनुष्य और मनुष्यता की खोज करती हैं .उनका कवि जितना भावुक और संवेदनशील है ,उतना ही बुद्धि-धर्मा भी .



रविवार, 19 मई 2013

एक अधूरी कविता

सारी उडाने असमर्थता से शुरू हुई थीं
पिता के आदेशों और अनुशासनों से बंधे हुए मन के भीतर
उड़ता रहा मन पिता के प्रतिबंधों के दायरे में
अपनी जीवित देह छोड़कर

सामने से सायरन बजाते हुए गुजर रही थीं पुलिस की गाड़ियाँ
मैं जितना ही डरता गया
पुलिस से बचने के लिए पुलिस में भारती होने की सोचने लगा
पुलिस वाले नेताओं की ड्यूटी में  थे
फिर मैं भी देखने लगा स्वप्न
की मैं भी घिरा रहूँ ऐसे ही पुलिस से
सबसे चमकदार वस्त्र और सबसे असरदार मुस्कान में 

शनिवार, 18 मई 2013

समय का जीना

लोग बीमार हो रहे हैं
लोग निकलते जा रहे हैं एक-दुसरे को जीने की आदत से
ऊंघने लगे हैं संवेग उदास मन की देहरी पर
सभी गिर गए हैं जैसे अपने-अपने अंधे कुओं में एक साथ
एक दू :स्वप्न को जीने की तरह
अपनी-अपनी उनीदी चीखों से घबराए ...

रविवार, 5 मई 2013

संस्कृति-चिन्तन


मेरा आशय सिर्फ इतना था कि पहले का महत्वपूर्ण चिन्तन भी धार्मिक मान्यताओं में छिपा पड़ा है जिसे पहचानने की जरुरत है .सीधे-सीधे पक्ष या विपक्ष में मान्यताएं या पूर्वाग्रह विकसित करना उचित नहीं है .इसमें मार्क्स का द्वंद्वात्मक और वस्तुवादी दृष्टिकोण ही उचित है .शूद्रों के पूर्वजों जसे शिव के पौराणिक चरित्र को ही लें तो उसे पुरोहित वर्ग नें अधिग्रहीत कर लिया .इसी तरह बुद्ध को भी अवतार घोषित कर उनके वंशजों को वर्ण-क्रम में वहां पहुंचा दिया किआज उनके ही वंशज स्वयं को पहचान नहीं पाएँगे किउनके ही पूर्वजों को भगवन घोषित कर वर्ण-व्यवस्था में ऊँची कही जाने वाली जातियां भी पुंजती हैं .ब्राह्मणवाद का हौवा खड़ा कर क्या-क्या छोड़ते जाएँगे !अपनी संस्कृति और सभ्यता में भी जो कुछ भी अच्छा है उसे भी पहचानना और चुनना होगा .इसके लिए पूर्वाग्रह रहित ईमानदार विमर्श की जरुरत है .रिक्शे पर बैठे व्यक्ति में रिक्शा खींचरहे व्यक्ति की तुलना में श्रेष्ठता-बोध तो होगा ही .ईश्वर के नाम पर ही सही जिन लोगों ने सुखी होने का तंत्र विकसित कर लिया था ,उन्हें थकने वाला श्रम करते हुए जीवन-यापन यदि दंडात्मक प्रतीत हो रहा था तो इसमें आश्चर्य क्या ! सिर्फ महिमा-मंडान से ब्रेनवाश कर भिक्षा मांगने जैसे अपमानजनक कार्य को आध्यात्मिक बना दिया गया था . स्वाभिमान की दृष्टि से तो शूद्र और वैश्य के घर में जन्म लेना बेहतर है .विषमता तो आज भी है और सामाजिक आर्थिक वर्ग भी हैं ,सिर्फ उनका जातीय -जन्मना आधार हट गया है .ईश्वर केन्द्रित किसान सभ्यता का अपना श्रेष्ठता बोध था .निषिध चाकरी भीख -निदान कह कर किसानी को महिमा-मंडित कर दान-पुण्य से घेर कर बाजार-व्यवस्था से बाहर कर दिया गया था .उस पक्ष पर भी ध्यान दीजिए .




नयी पीढ़ी के मार्क्सवादियों को और सतर्क और समझदार होना होगा .मैंने एक जगह लिखा था किभारतीय चिन्तन के इस लिए अयोग्यहोते हैं किउनके लिए सही होना अपनी जाति के अनुरूप सोचना है .यहाँ सही-गलत इस तरह तय होता है किया तो आप बिरादरी के साथ हो सकते हैं या बिरादरी के बाहर.यह जातीय शुद्धतावाद जैसी मानसिकता है .अब मार्क्सवादी होना विवेक का नहीं अस्मिता का प्रश्न हो गया है .अगर ऐसे ही चलता रहा तो इस्लाम के बाद बंद बुद्धिजीवियों का दूसरा बड़ा सम्प्रदायबन जाएगा .लेकिन हमें स्वाभिमानी साहित्यकारों का सम्मान करना सिखाना चाहिए .हो सकता है कि अज्ञेय स्वाभिमानी रहे हों और महत्वकांक्षी भी या अधिक दूरदर्शी रहे हों कि दस-पांच वर्षों के वैचारिक दबदबे को स्वीकार नहीं कर पाएं हों .गलत तो सुकरात को भी समझा गया था .अज्ञेय सुकरात नहीं थे .लेकिन उनमे असहमत और उपेक्षित होने का सहस था .मैं ऐसे बहुत से मूर्खों और अति-चालाक अवसरवादियों को जानता हूँ जो बाजार-भाव देखकर और कामरेड कहने -कहलाने का गौरव-बोध जीने के लिए स्वयं को मार्क्सवादी घोषित किए फिरते रहे -बहुतेरे सामाजिक भाव्यीकरण के कारण -उनके लिए सब कुछ तय हो गया है जबकि मैं जितना ही मार्क्सवाद की अवधारानाओं को लेकर सोचता हूँ उतनी ही विचारधारात्मक समस्याए मुझे चिंतित कर रही हैं .

अंध-विश्वास : कारण और निवारण

मेरे फेसबुक मित्र श्री अनिल सिंह के अन्धविश्वास पर लिखे इन विचारों को पढ़े .अन्धविश्वास भी परिवेश से मिले सामाजिक ज्ञान का एक हिस्सा है .सामाजिक और सांस्कृतिक प्रशिक्षण-तंत्र इसे भी अन्य ज्ञानों की तरह ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहता है .इस तरह अन्धविश्वास भी समाज द्वारा व्यक्ति को दिए जा रहे ज्ञान का एक हिस्सा है .पूंजीवादी व्यवस्था का असुरक्षित तंत्र इसको और अपरिहार्य बना देता है .दुर्व्यवहार की स्थिति में पुरुषों से स्त्रियों का कमजोर होना भी उन्हें भाग्यवादी-नियतिवादी बनाने के लिए मजबूर करा सकता है .इस लिए मेरा मानना है की आप व्यवस्था को और अधिक सुरक्षित  और निरापद बनाए बिना लोगों को अन्धविश्वासी न बनाने का ठोस आवाहन नहीं करा सकते यद्यपि मित्र अनिल सिंह से मैं असहमत नहीं हूँ .उनके ये विचार महत्वपूर्ण है -

".सांइस पढ़ भर लेने से जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित हो. अपने आस -पास कई विग्यान -विषयों में दीछित पीएच .डी.उपाधि धारियों को जीवन और समाज के सामान्य संदर्भो में घोर अवैग्यानिक और अंधविश्वासपूर्ण आचरण करते देखकरनिराशा होती है. वास्तव में भारत ही नहीं समूचे एशियाई समाज में पुनर्जागरण और प्रबोधन जैसा कोई मुकम्मल आंदोलन चला ही नहीं. भारतीय संदर्भ में 19वीं सदी में पुनर्जागरण की जो एक लहर दिखती है वह भी अपनी प्रकृति में सुधारवादी अधिक है. रेडिकल बदलाव की भावना उसमें नहीं दिखती. आजादी के बाद भारतीय समाज में कोई ऐसा आंदोलन नहीं दिखता जिसका उद्देश्य समाज को ग्यान, बुद्धि, विवेक और तर्क संपन्न बनाना हो. इसलिये प्रो. यशपाल की बातों से अधिक गली में बैठे ज्योतिशी की बातें ज्यादा असर करती है और कोई मूर्ति दूध पीने लगती है, कहीं खारा समुद्री जल मीठा हो जाता है, चाँद पर दिखने लगती है किसी बाबा की आकृति, चड़ावा के बदले बरसती कृपा में लोग भीगने को आतुर हो जाते है उगलियों पर चढने लगती हैं अँगूठियाँ और किस्म किस्म के छल्ले. यहीं विग्यान पिछड़ने लगता है और समाज भी."हमारे अधिकतर अन्धविश्वास अविकसित सभ्यता के दौर की उपज हैं.यह तो सभी जानते हैं .लेकिन वे बार-बार बदले और विकसित समय में भी लौट क्यों आते हैं -इन प्रश्नों के कारणों की भी पड़ताल करनी चाहिए .रवीन्द्रनाथटैगोर नें लिखा है कि जो पीछे छूटगया है वह पीछे खींचेगा और जो नीचे गिर गया है वह झुकाएगा.बौद्धिक असमर्थता और अज्ञान के कारण बहुत से लोग स्थितियों-परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाते-बाजार और व्यवस्था द्वारा प्रदत्त बहुत से अवसर जिनपर कोई अकेला मनुष्य नियंत्रण नहीं प् सकता -व्यक्ति को भाग्यवादी बनाने वाली निरीहता को जन्म देते हैं .व्यक्ति अतार्किक कारणों को भी तलाशने लगता है .कई बार असंतुलित विकास के कारण वैज्ञानिक सुविधाओं का आभाव भी व्यक्ति को अंध-विश्वासी बनता है .उदहारण के लिए कुछ बीमारियाँ जींन  सम्बन्धी खराबियों के कारण होती हैं और दवाएं करने से भी ठीक नहीं होतीं -उचित जाँच के आभाव में अंध-विश्वास की और व्यक्ति को ले जा सकती हैं .बहुत से अन्धविश्वास सभ्यता के विकास के साथ खत्म हो जाएँगे .वैसे ही जैसे आधुनिक असरकारक दवाओं के अविष्कार के पहले तेज ज्वर होने पर लोग मनौतियाँ माननेलगते थे और चढ़ावे चढ़ने लगते थे .इस लिए यदि लोगों से अन्धविश्वास ख़त्म करना होगा तो उसका रास्ता अन्धविश्वास के लिए विवश करने वाली परिस्थितियों से बाहर निकलना होगा .देखा जाए तो चीजें उतनी आसान नहीं हैं .लोगों को सोचना आना चाहिए .बीते ज़माने का मनुष्य बहुत सी असमर्थताओं और ज्ञान की सीमाओं की उपज था .कई बार एक असमर्थ विश्वास से समर्थ अंध-विश्वास अधिक प्रभावी होता है .असल चीज संगठित अपराध और विश्वास से अकेले मनुष्य के लड़ने की प्रतिरोध की क्षमता की भी है .मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक असमर्थ और कुंठित मनुष्य ही अन्धविश्वास को चुनौती नहीं दे पाता.मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है .बहुत से अन्धविश्वास वह बचपन से ही प्राप्त सामाजिकता की विरासत से ही अर्जित कर लेता है . .बहुत से अंधविश्वास व्यवस्था पर आम आदमी की पकड़ न होने और उसे प्रभावित कर सकने की उसकी असमर्थता से भी जन्म लेते हैं.कल्पना कीजिए कि इस समय भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो रहा होता और हम सब सिर्फ फेसबुक पर अपनी भड़ास निकल रहे होते .अभी चीन वाले प्रकरण पर भी  बहुत  से मतदाताओं का ख्याल होगा कि अब तक स्थानीय सैनिक झड़प तो प्रतिरोध के लिए हो ही जानी चाहिए थी -जो कि नहीं होगी .सिर्फ दर्शक और श्रोता बनाने वाली इस तरह की असमर्थताओं की ,कुंठाओं की भी अन्धविश्वासी बनने-बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है .हमारा अतीत का सक्रिय पेशेवर - जातीय तंत्र तो जिम्मेदार है ही .गाँधी की आध्यात्मिक राजनीति प्रगतिशील होते हुए भी विज्ञानं की तुलना में धर्मं के अधिक नजदीक थी .मुझे लगता है किविज्ञानं के विकास के बावजूद धर्म और आध्यात्म का वैग्यनिककरण अभी बाकि है .यहाँ धर्म से आशय मेरा जीवन जीने की एक सामान्य समझदारी या पद्धति विक्सित करने से है .

शनिवार, 4 मई 2013

आमंत्रण : - सभ्यता-विमर्श के नए सामूहिक ब्लॉग के लिए


http://sabhyata-wimarsh.blogspot.in

आमंत्रण-स्वयं को जनने के लिए

हम जिस दौर में हैं -सिर्फ यही सोचना जरुरी नहीं है की हम क्या सोच रहे हैं ,बल्कि यह भी कि हम ऐसा क्यों सोच रहे हैं .हमारा अधिकांश सोचना हमारे सामुदायिक आदत का हिस्सा होता है .हम उस आदत को भी बिलकुल अपना बनाकर पेश करते-रहते हैं .ऐसा करते हुए हम स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं .क्योंकि हमें एक समुदाय की सुरक्षा मिली होती है .हम अपने समुदाय-विशेष से आत्मीयता के साथ जुड़े रहते हैं .यह आत्मीयता हमें आश्वस्त करता रहता है .लेकिन इस सुरक्षा का एक विलोम भी है .हम जितना ही किसी समुदाय-विशेष से अभिन्न होते हैं उतना ही किसी समुदाय-विशेष से भिन्न भी होते हैं .यह भिन्नता हमें दूर तो कराती ही है 'दूसरों को डरती भी है .हम दूसरों को अपनी भिन्नता से असहज और दूर करते रहते हैं .ऐसे में हमें अपनी-अपनी आदिमताओं को छोड़कर एक वैश्विक मनुष्य होने के लिए उदारता की खोज करनी होगी .
       दूसरी बात यह है कि हमें जो दुनिया मिली है ,हम अपनी सृजनशीलता से उसे बना सकते है 'उसमें कुछ जोड़ सकते हैं और अपनी विध्वंसात्मक मूर्खताओं से उसे बिगाड़ भी सकते हैं .हमारी सामूहिकता और संगठन बहुत से अविश्वसनीय कामों को कराती -करती रहती है .सामूहिक शक्ति नें अविश्वसनीय निर्माण किए और करे हैं .हमें इस शक्ति को पहचान कर उससे अपने पर्यावरण को बचाना होगा .
     यह ब्लॉग इन्ही चिंताओं को लेकर सृजित किया जा रहा है .अपनी सभ्यता,संस्कृति और पर्यावरण को लेकर यदि आप भी कुछ दूसरों से साझा करने योग्य सोचते हों तो कृपया निम्न ई-मेल पते पर प्रकाशनार्थ प्रेषित करें-
                                 sabhyatawimarsh@gmail.com

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

आध्यात्म और ईश्वर का प्रश्न ..

कल मेरे मित्र श्री कान्त पाण्डेय  ने ईश्वर के बारे में मेरे एकांत व्यक्तिगत विचार जनने की जिज्ञासा व्यक्त की .एक विचारक के रूप में ऐसे प्रश्नों का संक्षिप्त-सीधा उत्तर देने में मुझे कठिनाई का अनुभव होता है .समस्या ईश्वर के होने न होने को लेकर नहीं है .समस्या किसी अवधारणा की जटिल साभ्यातिक -सांस्कृतिक निर्मित को लेकर है .एक मानवीय पर्यावरण के रूप में ये चीजें एक-दुसरे से इतनी सम्बद्ध और अंतर्ग्रथित हैं कि जन्म से ही सम्बद्ध किसी जुड़वे बच्चे के आपरेशन का मामला लगता है .भारत में आध्यात्मिकता प्रायः एक जीवन-पद्धति और परंपरागत मनोविज्ञान के रूप में भी है .,आदर्श मानक व्यवहार,शिष्टाचार ,मानव-अस्तित्व की पारिभाषिकी,अस्मितापरक आस्था और आत्म विश्वास ,एक आदर्श सामाजिक व्यव्हार सभी कुछ आध्यात्म और धार्मिकता में सम्मिलित है .ऐसे में ईश्वर सम्बन्धी प्रश्न मुझे नए ढंग से सोचने के लिए विवश करता है .रायः मुझे आध्यात्म-विज्ञानं और ईश्वर में विश्वास दोनों भिन्न बातें लगाती हैं .आध्यात्म विज्ञानं को यदि जीवन जीने के विज्ञानं के रूप में देखें तो इसमें ईश्वर के होनें या न होने से कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता .सम्पूर्ण प्रकृति के प्रति हमारा अस्तित्वगत रिश्ता भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है ईश्वर के होने और न होनें में .जीवन के अस्तित्व को लेकर वह प्राथमिक अज्ञानता और आश्चर्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है किसी आध्यात्मिक चिन्तन के लिए .तब जब कि सम्पूर्ण प्रकृति के प्रति हमारा अपना भी रिश्ता है .ईश्वर के अधिकार की मानसिकता जिसे प्रायः सीमित ही करती है .
         एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि तात्विक ईश्वर अस्मितापरक चिन्तन का एक हिस्सा है ,जबकि ईश्वर की रूहानी उपस्थिति में विश्वास  एक बिलकुल भिन्न मामला है ..किसी अदृश्य चेतना और विवेक  की उपस्थिति में विश्वास बहुत कुछ किसी प्रेत में विश्वास करने जैसा है .वह अपने से बा हर के किसी प्रभावी सत्ता में विश्वास के सामान है .सामाजिक मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो अपने से बहार की किसी परायी सत्ता पर विश्वास शेष समाज के प्रति व्यक्ति के अच्छे रिश्ते का भी अचेतन या मानसिक विश्वास का तंत्र रचता है .यह दूसरों से अत्यधिक प्रभावित व्यक्तित्वों की मनोरचना के लिए अधिक अनुकूल होता है .स्वावलम्बी धर्म और परावलम्बी धर्म की दो धाराएं हमेशा से ही रही हैं आध्यात्म यदि स्वावलम्बी दर्शन के रूप में है तो वह किसी बाहरी सत्ता के प्रति परावलम्बी दर्शन से भिन्न होगा..

           यह स्थापना अजीब सी लग सकती है कि भारतीय आध्यात्म का एक बड़ा हिस्सा  ईश्वर या ब्रह्म-चिन्तन के बहाने ही ज्ञान के धरातल पर  ईश्वर की अवधारणा का ही प्रतिरोध रचता जाता है .यह ईश्वर के सर्वव्यापी आतंक के आगे मानवीय ज्ञान की छोटी सी सेंध के रूप में है .उपनिषदों में भारतीय चिन्तक आत्मा की खोज करते हुए भाषा और शब्दों की दुनिया से बाहर निकल जाते हैं .वे इस बोध तक जा पहुंचाते हैं कि भाषिक ज्ञान एक माध्यम है और यह अद्तित्व की शुन्यवत आधार-जड़ता का विकल्प नहीं  बन सकता .काल  की परिवर्तन शीलता के सापेक्ष अस्तित्व की एक काल -निरापेक्ष  उपस्थिति भी है .
            गीता और बौद्ध-साहित्य दोनों में ही मिलाने वाली स्थिति-प्रज्ञ की अवधारणा आध्यात्म-चिन्तन को मानवीय जीवन का शास्त्र बना देती है .योग को कर्म का कौशल बताने का भी आशय  धर्म को आचरण और व्यव्हार के सौन्दर्य के रूप में व्याख्यायित करना था .इस अर्थ में तो योग जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला है .यह भारतीय दृष्टिकोण इस्लाम आदि पश्चिमी धर्मों में मिलाने वाली ईश्वर की प्रेत जैसी (रूहानी ताकत ) की अवधारणा से बिलकुल भिन्न चीज है .यह अपने दैहिक -मानसिक अस्तित्व में डूबकर जीने जैसा है  और शेष ब्रह्माण्ड से अपने अस्तित्व के रिश्तों को याद करने जैसा भी .यह उदात्त कविता जैसी किसी संवेदनात्मक-संवेगात्मक बोध का जीना है .इस विद्या के बाद ही सृजन के केंद्र में स्वयं को भी रखकर कोई मनुष्य अपने लिए ईश्वर जैसी दिव्यता की मांग कर सकता था .ईश्वर का अवतार मने जाने वाले भारतीय महापुरुष ज्ञान की इसी तात्विक प्रक्रिया और आत्म-विश्वास के आधार पर ही उदात्त जीवन जी पाए .यह दूसरी बात है कि स्थितिप्रज्ञ की यह अवधारणाशांति के लिए जितनी उपयोगी रही है क्रांति के लिए उतनी ही विरोधी और प्रतिरोधी भी .यह इसका नकारात्मक पक्ष रहा है .जिसने भारत को गुलामों का स्वर्ग भी बनाया .
              धर्म का दूसरा पक्ष जो मनुष्य को एक अनुयायी यन्त्र-मानव (रोबोट ) में बदलता है -मध्ययुगीन सामंती व्यवस्था में बड़े संगठित साम्राज्य -निर्माण की प्रगतिशील आकांक्षाओं से पैदा हुआ था  .समर्पण की मानसिकता और अनुयायिओं का मनोविज्ञान  इस धार्मिकता को एक बड़े संगठन के निर्माण के उपकरण के रूप में विकसित करता है .ईसाईयत में ईसामसीह के जीवन और व्यक्तित्व के माध्यम से मानवीय प्रतिरोध उपस्थित हुआ है .बौद्ध धर्म में यह प्रतिरोध मनुष्य को केंद्र में रखकर विवेक-स्वातंत्र्य की खोज के रूप में हैं  तो इस्लाम में जो कुछ भी सकारात्मक है ,वह मुहन्माद साहब के के आदर्श आचरण की स्मृति के रूप में ही है .इस दृष्टि से देखा जाए तो मध्य-युग में महकवि तुलसीदास बाल्मीकिकी राम कथा का इस्लामीकरण ही करते हैं .वे भारतीय परम्परा के आध्यात्म के स्थान पर वे राम की सर्वकालिक ईश्वरीय प्रेत के रूप में उपस्थिति की भी मान्यता देते प्रतीत होते हैं .

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

झाँसी की रानी

एक कविता जिसे बचपन से गुनगुनाते हुए बड़ा हुआ हूँ .एक रानी जो इस बात के लिए बचपन से ही दुखी करती रही है कि हम उसके समय और उसकी सेना में क्यों नहीं थे ? हम रहते तो संभव है हम भी मार दिए जाते -लेकिन इससे क्या !बचपन में हम सोचते ऐसा ही कुछ थे .कई दुर्घटनाओं.युद्धों आदि में अपना न होना खटकता है.इहमारे ही सम्मान के लिए लड़ कर वीर गति को प्राप्त होने वाली- इस दुखी करने वाली रानी और उनपर जोश से भर देने वाली कविता रचनेवाली कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की स्मृति को प्रणाम -
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी...झाँसी की रानी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

By: सुभद्रा कुमारी चौहान
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झाँसी की रानी



खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

By: सुभद्रा कुमारी चौहान


गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

आस्तिकता , नास्तिकता और ईश्वर का मानवीय परिप्रेक्ष्य

राहुल संकृत्यायन के जन्म-दिन पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिला .राहुल के सन्दर्भ में गौतम बुद्ध के अनीश्वरवाद की चर्चा हुई और मार्क्स की नास्तिकता की भी .इस अवसर पर मुझे भी वैचारिक शरारत सूझी इस अवसर पर मैंने कहा कि जो भी व्यवस्था के पक्ष में होगा और उससे संतुष्ट होगा वह आस्तिक होगा और जो भी व्यवस्था से नाराज या असंतुष्ट होगा उसे न चाहते हुए भी नास्तिक होना पड़ सकता है .इसलिए कि सुक्ष्म दार्शनिक स्तर पर करुणा और ईश्वर की सर्व्शाक्तिमंवादी आस्था में अंतर्विरोध है . बहुत से लोग इस तार्किक अंतर्विरोध को देख नहीं पाते.
         आध्यात्मिकता के इस मूल विश्वास को ही देंखें कि यह दुनिया ईश्वर नें बनायीं है और उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता तक नहीं हिलता-इस अवधारणा के आधार पर किसी दुर्घटना के अवसर पर मानवीय कर्तव्य का निर्धारण नहीं हो सकता .जैसे यदि किसी की टाग(पैर ) टूट जाए तो हरि-इच्छा वादियों की तरह यह मान लें कि अमुक व्यक्ति की टांग(पैर ) ईश्वर की इच्छा  से ही टूटी है या ईश्वर की ही इच्छा थी कि उसकी टांग(पैर )  टूटे तो किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाने का प्रयास भी ईश्वर की इच्छा के खिलाफ और विद्रोह ही मान जाएगा .ऐसा इस लिए है कि ईश्वर की इच्छा का सम्मान अंतत यथास्थिति का सम्मान ही प्रमाणित होता है .जब आप मानवीय कर्तव्य के रूप में करुणा करते हैं तो दुःख के विरोध में और कान्तिकारी भूमिका में होते हैं .इसी तरह किसी पूर्व-स्थापित सत्ता या वर्चस्व का विरोध करना भी ईश्वर से असहमत होकर ही संभव है .इसी दार्शनिक जरुरत के कारण बुद्ध को अनीश्वरवादी होना पड़ता है .स्पष्ट है की ईश्वर उनके लिए खलनायक है .यहाँ ईश्वर प्रकृति का पर्याय बन जाता है .यदि ईश्वर नें ही यह दुःख-पूर्ण दुनिया बनायीं है तो उससे सहमत होना दुख में बने रहना होगा ;दुख के कारणों का समर्थन करना होगा .ऐसे में दुख हटाना है या दुःख से लड़ना है तो ईश्वर यानि व्यवस्थ यानि यथास्थिति से असहमत हुए बिना संभव ही नहीं है
               इस मनोग्रंथि का ही एक रूप इस्लाम के अनुयायियों में देखा जाता है ,उनके यहाँ सही-गलत का विवेक न होकर सिर्फ सफल-असफल का विवेक है .इसी मनोविज्ञान के करण वे लादेन और सददाम की सफलता को ईश्वर की इच्छा से समर्थित मानकर चुप्पी लगा जाते हैं .इसलिए कि तबाही में सफल हुआ तो ईश्वर की सहमति रही होगी ही .लेकिन जैसे ही ऐसे लोग मार दिए जाते हैं वे उसी मानसिकता से चुप्पी लगा लेते हैं कि ईश्वर की इच्छा नहीं रही होगी तभी ऐसे लोग मारे गए हैं .इसी मनोविज्ञान के करण इस्लाम के अनुयायियों में सही-गलत का विवेक बहुत काम है.
                  यदि वाल्मीकि रामायण पढ़ें तो पाएँगे कि रावण के मारे जाने के बाद जब ऋषियों-चारणों द्वारा उन्हें ईश्वर का अवतार घोषित किया जा रहा है तो वे स्पष्ट कहते हैं कि मैं दशरथ-पुत्र राम स्वयं को मनुष्य मनाता हूँ..प्रश्न साफ है कि यदि राम स्वयं ईश्वर थे तो फिर वे लड़ किससे रहे थे .राम के सामने यह प्रश्न रहा होगा कि उनके बारे में बुरा सोचने वाला कौन है .इस तरह राम व्यवस्था,यथास्थिति से असहमत होकर उससे प्रतिरोध के करण ही ईश्वर माने गए  अन्यथा अपनी इच्छा से पत्ता तक हिलाने वाले ईश्वर नें तो उनका पत्ता साफ ही कर दिया था .बुद्ध भी अपनी संवेदना और दुःख से असहमत होने के कारण ईश्वर से असहमत थे .पश्चिमी संस्कृति नें इस समस्या का दूसरा समाधान निकाला है . वे अच्छे परिणाम वाली घटनाओं को ईश्वर की और से और बुरे परिणाम वाली घटनाओं को शैतान की और से मान लेते हैं .
               इस तरह हमें मान लेना चाहिए कि वर्तमान से यथार्थ से असहमत होने वालों का नास्तिक होना बुरा नहीं है .यह एक नए सर्जन के साहस से जन्म लेता है .वैसे भी यदि प्रकृति का एक नाम सृष्टि है तो सृजन ही मनुष्य का धर्म और कर्त्तव्य हुआ .भारत में इस आध्यात्मिक समस्या का समाधान विष्णु की परिकल्पना से निकल लिया गया है .वे नियति के प्रति मानवीय प्रतिरोध के प्रतीक हैं .वे गलत सफल के प्रति सही के सफल के लिए संघर्ष करते रहते हैं .इस तरह वे ऐसे ईश्वर हैं जो ईश्वर से ही जूझते और संघर्ष करते रहते हैं .गीता में कृष्ण भी गलत लोगों का सफल होना समाज के लिए हितकर नहीं मानते.यद्यपि शब्दावली कुछ इसप्रकार हैं कि सफल मनुष्य जिस तरह का आचरण करते हैं लोक उसी प्रकार का अनुसरण करता है .प्रकारान्तरसिसमें यह सन्देश छिपा है कि सही मनुष्य को सफल होना ही चाहिए .
        इतना कुछ कहने के बाद यह भी कह देना उचित समझता हूँ कि प्राचीन ब्राह्मण जाति की भूमिका एक प्रकाशक की ही रही है.इसने आदर्श चरित्रों आध्यात्मिकीकरण करके उसका पेशेवर उपयोग भर किया है .ऐसा उसनें सभी चरित्रों के साथ किया है ;लेकिन एक सीमा से अधिक वह पेशेवर होने के करण ही चरित्रों के वर्ग और वर्ण चरित्र नहीं बदल सकी है .अच्छी बात यही है कि राम और कृष्ण जैसे उसके आदर्श नायक सकर्मक सौन्दर्य और आचरण वाले सक्रिय वर्णों से आए चरित्र हैं .इसीलिए पुरोहिती संस्करण से अलग भी उनके द्वारा चयनित ,प्रचारित एवं प्रसारित आदर्श चरित्रों की सार्थक सक्रिय भूमिका  बनी रहती है .इसलिए भारत का सब कुछ ही ब्राह्मणवादी कह कर त्याग देने योग्य नहीं है .उनके नायकों की साहित्यिक संभावनाओं का तटस्थ मूल्याङ्कन कर ही  उनके सार्थक या निरर्थक होने का निष्कर्ष निकलना उचित होगा .
            इन तथ्यों को देखते हुए आशा है अगली बार आप भी स्वयं को आस्तिक या नास्तिक घोषित करने के पहले यह सोच लें कि आप यथास्थिति वादी तो नहीं हैं !

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

विमर्शात्मक आलोचना का प्रतिमान


पुस्तक-"कुबेरनाथ राय :सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि
लेखक -डॉ ० पी .एन.सिंह
प्रकाशक-प्रतिश्रुति प्रकाशन ,7 a बेंटिक स्ट्रीट ,कोल्कता-700001
     दूरभाष -      22622499
MAIL-prakashan@gmail.com





आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी के बाद अपनी मौलिक शैली के साथ ललित निबंधकार के रूप में स्थापित श्री कुबेरनाथ राय की साहित्यिक विशेषताओं का आलोचनात्मक विवेचन डॉ ०पी.एन.सिंह की पुस्तक "कुबेरनाथ राय :सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि " से पूर्व इतनी सूक्षमता ,गंभीरता और प्रामाणिक विशेषज्ञता के साथ नहीं मिलता.चाक्षुष सौन्दर्य -प्रतिमान के रूप में 'लालित्य 'शब्द का प्रचालन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी नें कालिदास के साहित्य से लेकर किया था .उनके पूर्व ऐसे निबंधों के लिए वैयक्तिक या स्वच्छंद शैली के निबंध जैसे विशेषण प्रचलित थे .चाक्षुष सौन्दर्य -प्रतिमान होने के करण ललित-निबंधों में मनोरम कल्पनाशीलता ,स्मृति -परकता ,सजीव एवं रागपूर्ण दृश्यात्मकता के साथ उपस्थित होती है .आचार्य द्विवेदी की भांति ही कुबेरनाथ राय के ललित निबंधों में मौलिकता एवं जिज्ञासा से भरपूर ,दृश्य-बिम्बों -ऐन्द्रिक छवियों से समृद्ध बौद्धिक यायावरी मिलाती है .
                   पुस्तक में ६८ पृष्ठ तथा ६ पृष्ठ लम्बी सन्दर्भ -सूची वाला महाकाव्यात्मक मुख्य लेख "कुबेरनाथ राय :सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि " हिंदी आलोचना में न्य प्रतिमान स्थापित करने वाला श्रमसाध्य लेख है.इस प्रतिमानता का अतिरिक्त आधार श्री कुबेरनाथ राय और डॉ ० पी.एन.सिंह दोनों का ही अंग्रेजी साहित्य का अधिकारी विद्वान् होना भी है .इससे कुबेरनाथ राय की उन स्मृतियों और स्थापनाओं की सम्यक पड़ताल हो पाई है ,जिनका सम्बन्ध अंग्रेजी साहित्य से था .श्री कुबेरनाथ राय नें मार्क्सवादी भौतिक-दृष्टि और चिन्तन-पद्धति की भी आलोचना की है .(पृष्ठ४२ ) ऐसे में घोषित मार्क्सवादी रहे डॉ ०पी.एन.सिंह द्वारा उनके मार्क्सवाद विरोध की गंभीर अधिकारिक समीक्षा इस आलोचना को और महत्वपूर्ण बनाती है .इस पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा  कुबेरनाथ राय द्वारा की गयी मार्क्सवाद की आलोचना और उस पर मार्क्सवाद के अधिकारी विद्वान् डॉ ० पी.एन.सिंह की प्रत्यालोचना से सम्बंधित अत्यंत गम्भीर एवं ज्ञानवर्धक विमर्श प्रस्तुत करता है .पृष्ठ संख्या ४० से ५३ तक भारतीयता के सन्दर्भ में कुबेरनाथ राय के निबंधों पर आधारित मार्क्सवाद विमर्श चलता रहता है .दो समर्थ विचारकों की मार्क्सवाद-विरोधी और समर्थक मानसिकता नें पाठकों के लिए रोचक और ज्ञानवर्धक विमर्श उपस्थित कर दिया है .इससे भारत के पुनर्निर्माण के सन्दर्भ में मार्क्सवाद की उपयोगिता और अनुपयोगिता सम्बन्धी सही दृष्टि और विवेक विकसित करने में अच्छी मदद मिलती है .
                 डॉ ०पी.एन.सिंह को श्री कुबेरनाथ राय की स्थापित महत्ता और सम्मान का अहसास है .इसीलिए उन्होंने अपनी मार्क्सवादी कसौटी पर उनकी कई मान्यताओं को अस्वीकार्य पते हुए भी कुबेरनाथ राय की निष्कर्षात्मक सराहना ही की है .इन शब्दों में कि"आधुनिकता-बोध और आधुनिक लेखन के प्रति उनके घोषित अनादर के बावजूद ,उनमें बहुत कुछ है जो गम्भीर मीमांसा की अपेक्षा रखता है "(पृष्ठ९५)"श्री राय की संकल्पनाएँ तीव्र रूप से इन्द्रियों को अच्छी लगाने वाली है और उनकी शैली आकर्षक है .वे जितने प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रति संग्यशील हैं ,उतने ही मानव-आत्मा के प्रति भी .उनकी गद्य-शैली औदत्य से परिपूर्ण है तथा इसमें ओज की भी पराकाष्ठा है .प्रत्येक महत्वपूर्ण लेखक की तरह वे भी नए-नए मुहावरे गढ़ते हैं ,जो गौरव -ग्रंथों तथा ग्रामीण -जीवन से जीवंत हो उठाते हैं .श्री कुबेरनाथ राय को प्रसिद्धि देने वाली दूसरी विशेषता उनका अखिल भारतीय चित्रांकन तथा इस तथ्य पर बार-बार जोर देना है कि भारतीय संस्कृति आर्य ,निषाद ,किरात ,द्रविड़ अंशों द्वारा निर्मित एक पूर्णता है .(प्रि१२,भूमिका ) वे(कुबेरनाथ राय )'रस-आखेटक' और 'बोध-आखेटक' दोनों थे .उनके रस-आखेटक स्वभाव नें एक तरफ उन्हें निषादों ,किरातों और गन्धर्वों की आनंदवादी रसमयता से संपृक्त रखा ,तो दूसरी तरफ उनकी आर्य -चित्ति और सुलभ-बोध आखेटी स्वभाव नें उन्हें 'शाश्वत प्रमुल्यों 'के संधान हेतु विचार और दर्शन की अमूर्त दुनिया में जाने के लिए विवश कर उन्हें मर्यादा-बोध का आग्रही बनाया ,जहाँ से वे आधुनिक जीवन और साहित्य पर बेबाक टिपण्णी करते रहे .दर असल इसी समन्वय में उनकी वैष्णवता निहित है .वे एक ही साथ 'कृष्णत्व' और 'रामत्व' दोनों के आराधक थे .उनकी दृष्टि में कृष्णा का रसिया रूप ही परम-सत्ता का 'रस-रूप' है और राम का 'मर्यादा रूप 'उसका बोध-रूप .(पृष्ठ९२ )
          अपने लम्बे आलेख में इन निष्कर्षात्मक -प्रशासक टिप्पणियों तक पहुँचने के पहले डॉ ० पी.एन.सिंह पाठकों को श्री कुबेरनाथ राय के विपुल निबंध-साहित्य के पाठकीय अनुभव और उद्धरण -सन्दर्भों से गुजरते हैं .श्री कुबेरनाथ राय के निबंधों की सार्थक एवं आस्वाद धर्मी चयनित प्रस्तुति इस पुस्तक की विशेषता है .मात्र डॉ आलेखों वाली इस पुस्तक में दूसरा आलेख कुबेरनाथ राय की मृत्यु के पश्चात् श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा गया 'समकालीन सोच 'में प्रकाशित समपद्कीय है.
     डॉ ० पी.एन.सिंह कुबेरनाथ राय को टी.एस.इलिएट की तरह गम्भीर साहित्येतर सरोकार वाला साहित्यकार मानते हैं .उनके अनुसार इलिएट का बोध मूल ईसाइयत की विकासशील एवं समावेशी भावना द्वारा अनुकूलित है तो श्री राय का 'नव्य आर्य ' संस्कारों की विकासशील एवं समावेशी  वैष्णवता द्वारा .(पृष्ठ १६ )वे श्री राय को मर्यादा-बोध संपन्न निबन्धकार मानते हैं .उनकी इस अभिव्यक्ति का समर्थन करते हैं कि श्री राय के निबंध 'क्रुद्ध-ललित 'स्वभाव वाले हैं  तथा उनका सम्पूर्ण साहित्य या तो क्रोध है ,नहीं तो अंतर का हाहाकार ....आक्रोश उनके निबंधों में एक स्थाई भाव है .(पृष्ठ १७ )
     डॉ ० सिंह के अनुसार श्री राय की 'भाषिक क्लिष्टता ,सन्दर्भों और उद्धरणों की बहुलता ,अनपेक्षित शब्द -व्युत्पत्तिपरकता ,संस्कृति-बोध के नाम पर उनका मुखर अतीत -मोह और आधुनिकता की सम्पूर्ण अस्वीकृति इत्यादि साधारणीकरण में बाधक बनाते हैं .उनमें वित् ,ह्यूमर ,रोचक व्यंग्य आदि का आभाव खटकता है .लेकिन वे निरंतर गाम्भीर्य ,मर्यादा और सरोकारों की विराटता का एहसास कराते हैं,जो ललित निबंधों के दायरे के बाहर अधिक उपयुक्त होता .(पृष्ठ १८) हिंदी पाठकों के मानसिक क्षितिज का विस्तार श्री राय के निबंधों का केन्द्रीय उद्देश्य है .श्री कुबेरनाथ राय की काव्य-संवेदना महाभारत ,रामायण ,श्रीमद्भागवत ,राम चरित मानस आदि से संस्कारित है .
        डॉ ० सिंह श्री राय के रसवाद भाववाद की साहित्यिक मुद्रा को बदलाव विरोधी और अव्यवहारिक मानते हैं .(पृष्ठ २१ )सिर्फ मराल(१९९० ) के निबंधों में उन्हें वे यथार्थ से सचमुच टकराते दीखते हैं .'प्रिया नीलकंठी '(१९६९) के निबंध 'मनियारा सांप '  के इस उद्धरण-"भावुकता सहस्र फण शेष है ' के आधार पर कुबेरनाथ राय को मूलतः एक रोमांटिक मिजाज वाला साहित्यकार सिद्ध करते हैं .(पृष्ठ २३ ) डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार 'रोमन मिजाज व्यक्ति अपनी सामान्य छोटी -छोटी भूमिकाओं में ही बहुत गम्भीर होता है और गौरव-बोध से पीड़ित हुआ करता है .समसामयिक विराट एवं जटिल चुनौतियों के सन्दर्भ में श्री कुबेरनाथ राय का साहित्यिक-सांस्कृतिक त्व्वर कुछ रोमैंटिक है और इस करण 'माक हीरोइक भी दिखता' है .(पृष्ठ २५ )
         अपने लम्बे आलेख में डॉ ० पी.एन. सिंह श्री कुबेरनाथ राय की काव्य -दृष्टि को समझाने समझाने के लिए की पृष्ठ देते हैं .इस क्रम में उनकी इस दृष्टि का रेखांकन करते हैं कि'इस (साठोत्तरी कविता )में नकारात्मक दृष्टि का ही सर्वांगीण प्राधान्य है और इस करण इसमें 'बहुकालीन और दूर प्रसादी तत्वों ' का आभाव है....अतः उनकी दृष्टि में समूची साठोत्तरी कविता वर्तमान 'गलित रोमन'(डिकाडेंट रोमांटिसिज्म )की संपोषक है .(पृष्ठ २७ )
            श्री कुबेरनाथ राय साठोत्तरी हिंदी साहित्य को उग्रवादी पीढ़ी का साहित्य मानते हैं ,जो करुणा-बोध विहीन है और इसी कारण 'आसुरी एकाधिकार '(सुखेच्छा ) और आसुरी भूमा (विस्तारवाद ) का शिकार होने के साथ न धर्मी भाव- त्रिभुज (हताशा,क्रोध और भय )से भी ग्रस्त है .(पृष्ठ २८ )
               रस-आखेटक के विषद-योग में वे "मूल समस्या कल्पना को कवी के कर्म के केंद्र में पुनः प्रतिष्ठित करने की मानते हैं ,जो प्रकृति और नारी दोनों से सम्मोहित होने पर ही संभव है .( पृष्ठ २९ ) डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार 'राय साहब अपने हठी रसवाद ,रहस्यमयता तथा परवास्तव में अटूट विश्वास के चलते 'श्रमिक संस्कृति 'और समाजवादी साहित्य की सार्थक भूमिका को अस्वीकार करते हैं .कुबेरनाथ राय के इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में किसमाजवाद का वह चेहरा जो व्यक्ति ,सनातनी मूल्यों एवं राष्ट्रीयता को अस्वीकार करता है ,हमारे साहित्य के परिवेश में कोई स्थाई भूमिका नहीं अभिनीत कर सकेगा .स्थाई भूमिका एवं दीर्घजीवी पृष्ठभूमि के लिए समाजवाद का नया चेहरा खोजना होगा ."(विषाद योग ,पृष्ठ १५० )
                डॉ ० पी.एन.सिंह की इस पुस्तक की महत्वपूर्ण उपलब्धि श्री कुबेरनाथ राय के भाव-बोध ,रीझ 'रूचि और स्थापनाओं को समाजवादी और आधुनिक समाजशास्त्रीय नजरिए से समझाने का प्रयास करना है .डॉ ० सिंह के अनुसार  कुबेरनाथ राय के मूल्य और अवधारणाओं का आधार कृषक संस्कृति है .इसे वे क्रिष्टोफर काडवेल का सन्दर्भ देते हुए "इन्फैंटाईल रिट्रीट 'यह एक प्रकार की नस्त्रेल्जिया,सांस्कृतिक न्युरोसिस घोषित करते हैं .(पृष्ठ३३ )डॉ ० सिंह के अनुसार 'श्री राय के  काव्य -मूल्य 'सुषमा ' और शील -नद्धता 'स्थितिशील कृषि -समाजों के काव्य -मूल्य हैं ,आधुनिक संक्रमणशील समाजों के नहीं .अतः आधुनिक  साहित्य में कल्पना की उर्वरता एवं सक्रियता ,बिम्ब एवं प्रतीक-विधान विश्वसनीय काव्य-लोक गढ़ने की क्षमता आदि का आकलन सुषमा और शीलनद्धता के दायरे के बाहर ही संभव है .'(पृष्ठ ३४ ) इस तरह डॉ ० सिंह साठोत्तरी हिंदी कविता के नामवर सिंह द्वारा रेखांकित उन नकारात्मक प्रतिमानों-'तनाव,''व्यंग्य ',विडम्बना ','बुनावट ','सपाटबयानी ' और 'अन्विति " आदि के मानवीय औचित्य को श्री राय की निरस्ति के विपरीत सही पते हैं .
                 इस पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा श्री कुबेरनाथ राय द्वारा की गयी मार्क्सवाद की आलोचना और उसपर मार्क्सवाद के अधिकारी विद्वान् डॉ ० पी.एन.सिंह  की प्रत्यालोचना से निर्मित अत्यंत गम्भीर एवं ज्ञानवर्धक विमर्श प्रस्तुत करता है . पृष्ठ सं० ४० से लेकर ५३ तक भारतीयता के सन्दर्भ में मार्क्सवाद विमर्श चलता रहता है .इसी क्रम में मार्क्सवाद के बाहर और भीतर के अनेक विचारकों के विचारों का सन्दर्भ देते हुए मार्क्सवाद के भीतर के विचारकों बर्नास्ताइन ,कात्सकी,लुकाच ,अडोर्नो ,अल्थ्युजर ,कार्लो कोव्स्की,रेमण्ड विलियम्स ,डेविट  मेक्लेलान जैसे विचारकों द्वारा मार्क्सवाद की आलोचना के परिप्रेक्ष्य में कुबेरनाथ राय की मार्क्सवाद से असहमति की समीक्षा करते हैं .डॉ० पी.एन.सिंह के अनुसार मार्क्स का व्यक्ति की निजता से वैसा विरोध नहीं है जैसा  कि कुबेरनाथ राय समझते हैं .मार्क्स की परिकल्पना का मनुष्य समाजवादी मूल्यों को जीने वाला व्यक्ति है ;अपनी सामूहिकता में ही वह निजता के अधिकारों को प्राप्त करता है ."कार्ल मार्क्स  पूंजीवादी व्यक्तिवाद (जो केवल अपने लिए जीता है )के आदर्श को नकार कर "सामाजिक व्यक्ति के विकास को ऐतिहासिक कृत्य एवं दायित्व के रूप में देख रहे थे ."(पृ० ४१)भारत के सन्दर्भ में कुबेरनाथ राय  एक विचारक के रूप में द्वंद्व और संघर्ष का निषेध चाहते हैं ,समन्वय,सहयोग और संयोग को भारतीयता के सन्दर्भ में महिमा-मंडित करते हैं .(पृ०४२ )इसी सन्दर्भ में मार्क्स के द्वंद्ववाद का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करते हैं उनके अनुसार भारतीय स्मृतियों में भी सब कुछ अच्छा ही नहीं है .उसमें भी बहुत से युद्ध और हत्याएं हैं .इसके बावजूद कुबेरनाथ राय महासमन्वय का राग सोद्देश्यता के साथ गाते हैं -"हम इसकी चर्चा नहीं करेंगे तो और लोग करेंगे और वे "और "लोग इस चर्चा को द्वान्द्वामुलक ऐंठन देकर प्रस्तुत करेंगे ,इसके पीछे महासमन्वय की सारीप्रक्रिया अस्वीकृत करेंगे और अपने ही लोगों को गुमराह करेंगे ."(पृ० ४६)आगे के पृष्ठों पर समकालीन यथार्थ की उपेक्षा कर आस्था में छलांग लगाने के कुबेरनाथ राय के आवाहन को एक नकारात्मक स्थापना के रूप में रेखांकित करते हैं .डॉ.पी.एन सिंह उनके इस सुझाव को इस लिए ख़ारिज करते हैं कि पराभूत समुदाय या संस्कृतियाँ  अपनी सामुदायिक आस्थाओं एवं परम्परापुष्ट विवेक के दायरे में सिमटकर अपनी आत्मरक्षा करती हैं ,लेकिन वे युग का प्रतिनिधि जीवन-बोध नहीं बनतीं.(पृ० ४८ )इस प्रकार डॉ ० सिंह श्री कुबेरनाथ राय की अनेक स्थापनाओं को राजनीतिक सृजनशीलता और समकालीन सरोकारों का विरोधी पते हैं .पूंजीवादी मूल्य जैसे सत्य ,अहिंसा,दया,संतोष ,विश्वास,दानशीलता ,वफ़ादारी आदि पूर्ण न्यायिक और समधानात्मक न होकर मात्र आंसू पोछने वाले हैं.(पृ० ४९ ) पी.एन.सिंह के अनुसार आज परोपकार-बोध का स्थान न्याय-बोध ले रहा है और आस्थागत विवेक का स्थान अनुभव-सिद्ध तार्किक विवेक .(पृ० ५० ) मार्क्सवादी होने के कारण  राम की हिंसा को महाकरुणा समझना और लेनिन और माओ की हिंसा में उस महाकरुणा के दर्शन न करना खटकता है .
               दर असल यह अकारण नहीं है कि श्री कुबेरनाथ राय का अधिकांश लेखन भारतीयता के समन्वयवादी आयाम को महिमा-मंडित करता रहता है .असम की राजनीति ,नक्सलवाद और जातीय आन्दोलनों नें उनमें समाधानात्मक प्रतिक्रिया के रूप में समंवय्बोध को केन्द्रीय स्वर बना दिया है .वे स्वयं जिस वर्ग और वर्ण से आते हैं ,उनमें वामपंथ भूमि छिनने का भय ही पैदा कर सकता है .लेकिन किसान पृष्ठभूमि से आने के करण उनका जीवन और जगत राग सैद्धांतिक और दार्शनिक ही अधिक है और वे पुरोहितवादी संरचनाओं में न होकर आदर्श एवं अस्मितापरक हैं .संभवतः इसीलिए कुबेरनाथ राय का लेखन अपील भी करता है .उन्होंने परम्परा और पुरातनता को भी अपने द्गंग से चुना और गढ़ा है .इसमें संदेह नहीं कि कुबेरनाथ राय एक सकारात्मक भारतीयता के परिकल्पक एवं प्रतिनिधि भाष्यकार हैं .यह भारतीयता आर्थिक दृष्टि से एक-दुसरे पर निर्भर पूरक जातीय समुदायों से बनी है .इसमे पूंजी वितरण और प्रवाह के धार्मिक तंत्र भी हैं वर्ण-व्यवस्था में एक भिक्षाजीवी जाति को  सर्वोपरि स्थान प्रदान करना इसके पक्ष में भी जाता है .और यह भी कि यह पश्चिमी आधुनिकता से भिन्न ,विलोम और किसी भी प्रकार की तुलना के अयोग्यआदर्शवाद का प्रकार था .संभवतः इसीलिए इतिहास में यह उतनी अमानवीय भी नहीं रही है की उस पर गर्व नहीं किया जा सके .भारतीय संस्कृति के प्रति कुएर्नाथ राय की रीझ का यह भी एक करण हो सकता है .
                स्वयं कुबेरनाथ राय का प्रत्यक्षतः पुरोहित जाति से न होना भी भारतीयता सम्बन्धी उनकी अवधारणाओं  को महत्वपूर्ण और बहुत कुछ निर्दोष बनाता है .स्वीकार्य होने का एक अन्य कर्ण यह है कि कुबेरनाथ राय की अधिकांश स्थापनाओं का आधार धर्म का संस्कृति-विमर्श नहीं ,बल्कि समाज का संस्कृति-विमर्श है .अन्य ललित निबंधकारों की तरह कुबेरनाथ राय भी मानव-राग और आत्मीयता का स्वस्थ पर्यावरण बचाना चाहते हैं .वे आधुनिकता में पुनर्व्याख्या और प्रतिरोध के सम्वेदानाकर हैं .यह आधुनिक बुद्धिवाद की कसौटी पर अपने ही (भारतीय )सांस्कृतिक चित्त का साक्षात्कार और पुनर्परीक्षण है .रूचि और स्वभावजन्य निर्नाय्शीलाता का संघर्ष कुबेरनाथ राय के साहित्य में साफ-साफ देखा जा सकता है .जैसे वे जानना चाहते हों कि कितना और क्यों बदलना है और यदि नहीं बदलना है तो क्यों ? श्री कुबेरनाथ राय इस न बदलने को भी समझना चाहते हैं .इसे संरक्षनीय अतीत की समझदारी की सृजनात्मक चिंता एवं प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है .लेकिन यह अपने अधिकांश में अस्मितापरक ही है .अपने विश्लेषण में यद्यपि डॉ ० पी.एन.सिंह यथार्थ के व्यावहारिक धरातल पर कोई स्पष्ट सार्थक भूमिका नहीं देखते ,फिर भी उनकी बहुत सी स्थापनाओं की सराहना करते हैं .
              डॉ ० पी.एन.सिंह रस आखेटक में व्यक्त श्री कुबेरनाथ राय के इस आकलन को सराहना के साथ उद्धृत करते हैं कि "ज्ञान,वैराग्य ,सत्य -अहिंसा ,खरा शुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर भले ही पुण्य हो सामूहिक स्तर पर सौ में से पचास से ज्यादा स्थितियों में हलाहल पाप है -इस ऐतिहासिक महासत्य को समझाने की शक्ति भारतीय मेधा में नहीं रही ...इसके लिए न तो प्रकृति दोषी है और न इतिहास दोषी है .दोषी है अपनी जातीय प्रज्ञा या मेधा जिसमें सतोगुणी चिन्तन रिपु की तरह बैठा है और निरंतर घात लगाए है ."(पृ० ५१ )इस सन्दर्भ में अंग्रेज चिन्तक अल्दास हक्सली के द्वारा भारतीयों की की गयी आलोचना को अधिक उपयोगी पते हैं कि'भारतीयों के लिए धर्मं विलास है और इन्हें इहलौकिक बनाने के लिएअनीश्वरता का पाठ पढ़ाना होगा .'
              अपने लम्बे आलेख में डॉ ० पी.एन.सिंह नें  श्री कुबेरनाथ राय के निबंधों में व्यक्त  साहित्य और अस्तित्ववाद सम्बन्धी  विचारों को इसी उप शीर्षक के अंतर्गत व्यक्त किया है .श्री कुबेरनाथ राय मार्क्सवाद की तरह ही नास्तिक अस्तित्ववाद भी पसंद नहीं करते .क्योंकि ऐसी अनास्था अकेलेपन की सृष्टि करती है ,इसीलिए उन्हें कीकेगार्द का आस्तिक (ईसाई ) अस्तित्ववाद पसंद है ,(पृष्ठ ५३ ) डॉ० पी.एन.सिंह सार्त्र की सामूहिकता पर बल देने वाली  अस्तित्ववादी स्थापनाओं को सकारात्मक मानते हैं जो श्री राय को पसंद नहीं हैं .आधुनिक साहित्य के प्रति कुबेरनाथ राय के नजरिए को व्यापक छानबीन के बाद पुराने संस्कार वाला घोषित करते हैं .(पृष्ठ ५७ ) डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार "श्री कुबेरनाथ राय आधुनिकता एवं आधुनिक नवलेखन,मार्क्सवादी चिन्तन-पद्धति एवं व्यव्हार,अस्तित्ववादी जीवन-दृष्टि,आधुनिक इतिहास-बोध,सामाजिक निर्माण की सेक्युलर अवधारणा इत्यादि के विरुद्ध आक्रोशयुक्त एवं इकहरी टिप्पणियां करते हैं और विकल्प में अपने 'सनातनी ' जीवनबोध और उसके 'प्रमुल्यों ' को उछलते रहते हैं .(पृष्ठ ५८ ) 'उनकी पंडिताऊ दुरुहता और जिद्दी  पारम्परिकता के बावजूद,उनका लेखन बहु आयामी ,अंतर्दृष्टि सम्पन्न एवं आकर्षक है ,और ये ही उनके लेखक व्यक्तित्व के स्थाई आधार हैं '.(वाही )उनके साहित्य का महत्वपूर्ण आयाम उनके चिन्तन की विराटता और उनका मूल्यगत आग्रह है .मानों वे हर क्षण राष्ट्र एवं विश्व की  त्रासद नियति से रूबरू हों ,उससे टकरा रहे हों .(वाही ,पृष्ठ ५८ )
                   डॉ ०सिन्घ के अनुसार मार्क्सवादी शब्दावली से बचाते हुए भी श्री राय की कुछ स्थापनाओं में विरोध नहीं है .जैसे 'उनका यह रेखांकन कियोरोपीय व्यक्तिवाद ,अतिमानव न पैदा कर अतिदानाव एवं चीटी  मानव पैदा कर रहा है ,सही है .(पृष्ठ ५९ ) डॉ सिंह श्री राय की असाधारण प्रभावशीलता का रहस्य उनके पैगम्बरी तेवर में मानते हैं .निःसंग आत्मविश्वास के बिना अति मान्यताओं का पुनर्मूल्यांकन भी संभव नहीं है .डॉ पी.एन.सिंह का यह रेखांकन भी एक महत्वपूर्ण आलोचकीय उपलब्धि ही कही जाएगी .उनके अनुसार-'अतिरिक्त भावाकुलता ,भाषिक अतिरिक्तता और वैयक्तिक चिंता को वैश्विक चिंता के रूप में देखनें-दिखानें का अंदाज आदि -साहित्य -यज्ञ की समिधाएँ हैं ,जो जो श्री राय के लेखन में प्रचुर मात्र में उपलब्ध हैं .( पृष्ठ ६१ )
डॉ कुबेरनाथ राय के मनुस्मृति विरोध को पी.एन.सिंह एक सकारात्मक और स्वस्थ पक्ष मानते हैं -'विश्व की सारी समस्याएँ तो हमारे पास हैं ही ,हमारी एक अतिरिक्त समस्या भी है और वह है मनुस्मृति द्वारा संस्कारित हमारा संकीर्ण समाज-बोध ,हमारी वर्णवादी व्यवस्था ,जिसने समाज को इस प्रकार बाँट दिया है की प्रेम असंभव हो गया है .(पृष्ठ६२ )
                       डॉ ० पी.एन.सिंह श्री कुबेरनाथ राय  के भारत सम्बन्धी चिन्तन और आधुनिकता -बोध के  समन्वयवादी दृष्टिकोण को सर्वकालिक या शाश्वत समाधान के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं मानते हैं .वे सेक्युलरिज्म को व्यवहृत मानवतावाद कहते हैं और यह भी रेखांकित करते हैं कि इस्लाम और ईसाई मत अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ताकतवर अस्मिताएँ हैं ,सनातनी संस्कृति का हिन्दू संस्करण बिना स्वयं र्पंतरित हुए अपनी शर्तों पर इसे आत्मसात नहीं कर सकता .(पृष्ठ६४ )
इन सीमाओं के बावजूद कुबेरनाथ राय का सकारात्मक पक्ष 'व्यवहृत मार्क्सवाद के प्रति अपनी गहरी असहमतियों के बावजूद श्री राय का मार्क्सवाद की मूल दृष्टि(विजन )और उसकी सात्विक चेतना का प्रशंसक होना है .श्री राय के साहित्यिक-सांस्कृतिक चिन्तन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं अंतर्द्रिश्तिसम्पन्न आयाम भारतीय एवं यूरोपीय सांस्कृतिक चेतनता की अपनी-अपनी विशिष्टताओं का सही रेखांकन है .(पृष्ठ ६६ ) श्री राय वैदिक आर्यों के जीवन-बोध को इहलोक और लोकोत्तर दोनों की सामान प्रतिष्ठा के कारण स्वस्थ मानते हैं .डॉ ० सिंह उनमें सनातनी प्रतीकों की अभिरुचिवादी व्याख्या की पक्षपाती प्रवृत्ति के दर्शन करते हैं .(पृष्ठ ६७ ) इस स्वीकार के साथ कि'इससे उनकी अंतर्दृष्टि संपन्न टिप्पणियों एवं प्रेक्षणों की महिमा नहीं घटती .वे दृष्टि देते हैं,परिप्रेक्ष्य सुझाते हैं और उनका लेखन विचारों की खान है ,जिनके सहारे अनचाहे भी पाठक को बहुत कुछ सुझाने लगता है .'(पृष्ठ६८ )
                    डॉ ० पी.एन.सिंह के आलेख के अंतिम लगभग १६ पृष्ठ  कुबेरनाथ राय के 'भारतीय और यूरोपीय साहित्यिक मूल्य' उपशीर्षक से इन्ही समस्याओं से सम्बंधित कुबेरनाथ राय के विचारों पर  केन्द्रित है . यह अंश हिंदी पाठकों के ज्ञानवर्धन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है .श्री कुबेरनाथ राय की दृष्टि में 'यूरोपीय साहित्य का सनातन स्तर होमर का ही स्वर है ,जिसके चार आयाम हैं -यथार्थवाद,विडम्बना ,ट्रेजेडी और साहसिकता ; और इसमें  होमर के करीब दो हजार वर्ष बाद ,मध्य-युगों में पांचवां आयाम अर्थात् ईसाई भावाकुलता जुडी .जबकि भारतीय मनीषा का स्वभाव इसके ठीक प्रतिकूल है .(पृष्ठ ६८ ) इस अंश को डॉ ० पी,एन .सिंह नें कुबेरनाथ राय के प्रेक्षणों और उद्धरणों के सहारे तथा अपने विस्तृत अध्ययन के बल पर और समृद्ध किया है .इस अंश को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि एक ही विषय पर दो उच्च स्तरीय अधिकारी विद्वानों का युगल विमर्श पढ़ रहे हों.डॉ ०पी.एन.सिंह नें इलिएद के विस्तृत अध्ययन और स्मृतियों का पाठकों से साझा किया है .वे इलिएद केन्द्रीय रस वीर और क्रोध की चर्चा करते हैं .उसके कई प्रसंगों को दृष्टान्त में प्रस्तुत करते हैं .ट्रेजेडी को लेकर महाभारत की ट्रेजेडी की तुलना करते हैं .महाभारत में 'मानवीय सीमाओं(क्रोध,प्रतिशोध ,छल-कपट ,क्रूरता इत्यादि )और मानवीय संभावनाओं(धर्म -शासित अर्थ एवं काम और अंततः मोक्ष ) की खुली अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं .इनमें मानवीय यथार्थ की भूमिका अधिक प्रभावपूर्ण होती है .इसी तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में सीता और सावित्री जैसी सात्विक गृहस्थ नारियों की होमारीयआदिम परिवेश तथा वैराग्य प्रधान  इसाई दृष्टि में कल्पना भी  संभव न होने के साथ  कमोत्तर स्त्री-पुरुष रिश्तों वाले सीता-राम,शिव-पार्वती जैसी शील्नाद्धा सौन्दर्य की अभिव्यक्तियाँ भी शामिल हैं जो एकांगी न होकर जीवन के वृहत्तर सन्दर्भों में कल्पित एवं रूपायित हैं .(पृष्ठ७२-७३ )
                 डॉ ० सिंह के अनुसार श्री राय का साहित्यिक विवेक प्रभावशाली होने के बावजूद बहुत उपयोगी नहीं है .वह समकालीनता से असंतुष्ट है और उसकी अवहेलना करता है .वह अपने मानकों और आदर्शों की खोज में प्रायः अतीत गामी है .उनके अनुसार 'श्री राय के साहित्यिक मानक-विस्तार गहरे,उदात्तता और रोचकता आधुनिक साहित्य के मूल्य नहीं हैं .'इसी करण वे बार -बार राम-कथा और गांधी की तरफ लौटते हैं .'(पृष्ठ ७५ ) कुबेरनाथ राय पुरोहितवादी चिन्तन और 'यजमानी 'व्यवस्था को भारतीय समाज का दुर्भाग्य बताते हैं .कला और संस्कृति के सजीव अंश के खोजी हैं .(पृष्ठ ७६ ) इस तरह वे प्रगतिशील पारम्परिकता के एक विद्वान् एवं निष्ठावान पुरस्कर्ता हैनौर इसी रूप में वे एक अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं .
                श्री कुबेरनाथ राय नें अपने लेखन में भारतीय साहित्य की विशेषताओं को बहुविध चिन्हित करने का प्रयास किया है .जैसे वे तथागत के 'श्रामण्य सुख को साहित्यिक सुखके रूप में देखते हैं  और इनसे प्राप्त सुख जैसे-प्रीती सुख ,मैत्री सुखा ,अभय सुखा,प्रज्ञा सुखा और प्रशांति सुख आदि को वे मानसिक ऋद्धियाँ बतलाते हैं .कुबेरनाथ राय मानते हैं की प्रासंगिकता का एक सर्वकालिकआयाम भी होता है .डॉ ० सिंह इसको कई दृष्टान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं.(पृष्ठ ८० ) उनके अनुसार 'श्री कुबेरनाथ राय नें साहित्य को जिस गंभीरता से लिया,उस गंभीरता से शायद ही किसी नें लिया हो .वे इसे इतिहास का पहरुआ बताते हैं .पी.एन.सिंह यह स्वीकार करते हैं कि इतिहास में निहित श्रेष्ठ संभावनाओं की परख एवं अभिव्यक्ति ही साहित्य को श्रेष्ठता प्रदान करती है .इसी रूप में साहित्य इतिहास का पहरुआ है ,उसकी विवेक-भ्रष्टता के विरुद्ध चेतावनी है '.कुबेरनाथ राय विराट राष्ट्रीय चिंता के निबन्धकार है .उनके इतिहास-बोध को लेकर प्रश्न उठाते हैं ,लेकिन उनका संस्कृति बोध और साहित्य -बोध असंदिग्ध रूप से श्रेष्ठ है .'(पृष्ठ ८१-८२ )
डॉ ० पी.एन.सिंह के अनुसार अगर लालित्य द्विवेद्वी जी के निबंधों को परिभाषित करता है तो दायित्व -बोध से कुबेरनाथ राय के निबंध परिभाषित होते हैं ,यद्यपि न द्विवेद्वी जी दायित्व-बोध से मुक्त है और न श्री राय लालित्य से ."(पृष्ठ ८३ )"आधुनिकता -बोध और आधुनिक लेखन के प्रति उनके घोषित अनादर के बावजूद ,उनमें बहुत कुछ है जो गम्भीर मीमांसा की अपेक्षा रखता है . "पृष्ठ ९५ )
             

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

पूंजीवाद पर पुनर्विचार

मैं जब -जब भी मार्क्सवाद के बारे में सोचता हूँ और उसके नजरिए से आज के पूंजीवादी व्यव्हार के बारे में समझने का प्रयास करता हूँ ,दो बातें मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण हैं-पहला यह कि पूंजीवाद मूलतः पूंजी का स्वामित्ववाद है .और यह कि मार्क्सवाद  परंपरागत स्वामित्व की  अवधारणा से सहमत नहीं है .दूसरा यह कि पूंजी के अर्जन और मूल्य -पद्धति से भी .यह लाभ को अतिरिक्त मूल्य मानता है .उसकी दृष्टि में लागत से अधिक का अर्जन अवैध है .मार्क्सवाद अतिरिक्त मूल्य से पूंजी के अर्जन को एक अनैतिक आर्थिक व्यवहार मानता है.पूंजीवादी व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य एक असीमित आर्थिक व्यवहार तक लाभ माना  जाता है .लेकिन यदि अतिरिक्त लाभ में पूंजी अर्जन करने वाले का अपना भी पारिश्रमिक सम्मिलित हो तो एक सीमा तक अतिरिक्त मूल्य भी पारिश्रमिक के रूप में वैध ही हुआ.मैंने मार्क्सवादियों को इस सीमा रेखा पर कभी सैद्धांतिक बहस करते नहीं पाया .
             वयवहार में हम देखते हैं कि पूंजी कि असमानता का एक बड़ा हिस्सा पैतृक विरासत में मिली पूंजी का परिणाम होता है .यह परिवार संस्था के स्थायित्व का प्रमुख आधार होता है .कुलीनतावाद का भी यह प्रमुख आधार है .यहाँ यह एक व्यवहारिक समस्या दिखती है कि यदि साम्यवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत पूंजी को समाप्त करेंगे तो पारिवारिक पूंजी को भी समाप्त करना होगा -अब इसके स्थान पर सामूहिक पूंजी की अवधारणा जो लाएँगे तो देखना यह होगा कि  व्यव्हार में वह कितने बड़े मानवीय समूह को संबोधित हो सकेगा  .वर्तमान में निजी स्वामित्व के व्यापारिक या औद्योगिक संगठन और राष्ट्र दोनों ही दावेदार हैं . सार्वजनिकता के विस्तार कि सीमा क्या होगी !यदि यह वैश्विक या सार्वभौमिक होगा तो उसका व्यावहारिक और सैद्धांतिक स्वरूप क्या होगा ?उपभोग व्यक्ति द्वारा और स्वामित्व सम्पूर्ण मानव जाति का एक नई मनोवैज्ञानिक  संस्कृति का आधार  तो बन सकता है लेकिन उसके व्यावहारिक पक्ष पर सूक्ष्मता से विचार करना होगा .
          समस्या का एक मानवीय पक्ष यह भी  है कि संपत्ति भी मानवीय सृजन का ही एक स्वरूप प्रकार है ..यह उसके अस्तित्व और विकास का भी प्रमुख आधार है .इसलिए संपत्ति के स्वामित्व से अधिक सृजन के अधिकार और अवसरों कि व्यवस्था करनी होगी.दूसरा यह है कि औसत संपत्ति को शुन्य और समान मानकर बड़े पूंजीपतियों के होने को प्रतिबंधित किया जाए.लेकिन ये सभी पूंजीवाद और साम्यवाद के आन्तरिक सामाजिक पक्ष ही हैं .
             एक  अन्य समस्या यह भी है कि राजनीतिक संगठन और आर्थिक संगठन की  सदस्यता का आपसी रिश्ता क्या हो ?राजनीतिक संगठन जो सार्वजनिक व्यवस्था से सम्बंधित होते हैं ,वे आर्थिक प्रबंधन से अधिक व्यापक और मानवीय सरोकार वाले होते हैं.आर्थिक प्रबंधन और व्यव्हार अपेक्षाकृत सीमित होते हैं.आज की  बहुराष्ट्रीय कम्पनियों  की  पूर्वज प्राचीन काल की वणिक जातियां थी .वे एक व्यापक ईकाई की  तरह व्यवहार कराती थीं..
           प्राचीन काल से ही देखें तो राजा सिर्फ मुद्रा और उसके मूल्य का सैद्धांतिक निर्धारण ही करता था.राजनीतिक सत्ता का अस्तित्व आर्थिक मुद्रा और मूल्य के कारखाने की तरह ही रहा  है यद्यपि पूंजी के प्रचलन और व्यव्हार को बाजार ही तय करता रहा है .इसे एक विकेन्द्रीकृत व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है .साम्यवादी व्यवस्था जिस शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना करती है ,उसका कार्यान्वयन समाज के स्वतन्त्र मुद्रा -व्यवहार के नियमन के बिना संभव ही नहीं है .क्योंकि साम्यवादी व्यवस्था में भी स्वतन्त्र मुद्रा आर्थिक विषमता की  सृष्टि करेगा .जो अंततः आर्थिक साम्यावस्था को समाप्त कर देगा .इस लिए साम्यवादी व्यवस्था में बाजार और मुद्रा कि भूमिका पर भी विचार करना होगा .
           मार्क्स के अधिकांश सिद्धांत समाज के बहुआयामी एवं बहुस्तरीय आर्थिक व्यवहार की अवहेलना करते दीखते हैं .कृषि-भूमि की समता की अपेक्षा व्यावसायिक क्षेत्र की समता की परिकल्पना अधिक जटिल होगी ही .आज के अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के युग में बहुराष्ट्रीय आर्थिक संगठन स्वतन्त्र सरकारों की  तरह व्यव्हार कर रहे हैं..इस लिए आज आर्थिक नागरिकता की भी परिकल्पना करने का समय आ गया है .एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का मजदूर एक सामान्य कम्पनी के मजदूर की तुलाना में धनी माना जा सकता है .इसतरह देखें तो सर्वहारा की परिकल्पना भी एक सापेक्षिक और तुलनात्मक परिकल्पना ही है .सामूहिक जीवन-स्तर की दृष्टि से समय शोषक राष्ट्र और शोषित राष्ट्र की परिकल्पना का भी है .स्पष्ट है कि शोषक राष्ट्र का सर्वहारा भी शोषक सर्वहारा ही होगा .परंपरागत मार्क्सवाद में यह सापेक्षिक तुलनात्मक चेतना नहीं है .आर्थिक रूप से संरक्षित और असंरक्षित नागरिक के रूप में देखें तो कर्मचारी को सर्वहारा के स्थान पर संरक्षित नागरिक मानना होगा.बेरोजगार को असंरक्षित नागरिक या सर्वहारा .जब नई पीढ़ी में सतत बेरोजगार अधिक मात्रा  में उपलब्ध हो तो क्रांति के लिए कारखानों के मजदूर तलाशना भी अव्यवहारिक परिकल्पना ही लगाती है ,
            .ऐतिहासिक दृष्टि से मार्क्स का समय साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का था .इसलिए सर्वहारा के अधिनायकत्व की परिकल्पना भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की. अभियांत्रिकी के स्तर पर देखें तो अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी की  अभियांत्रिकी दैत्याकार थी  .पहली बार मानवजाति नें यंत्रों से असंभव को संभव करना सीखा .यांत्रिक पद्धति-निर्माण की  सृजनशीलता के प्रति अतिरिक्त आस्था और उत्साह नें बड़े नियमन की  भी परिकल्पना दी थी .साम्यवाद एक अधिनायक-सत्ता का भी चिंतन है .एक सबल नियामक सत्ता की परिकल्पना के पीछे साम्राज्यवाद की  सत्ता-परिकल्पना का भी प्रभाव रहा होगा .मध्य-वर्ग के व्यापक विकास के साथ इस तरह से शासित होने की आज कोई परिकल्पना ही नहीं कर सकता .
     

शनिवार, 23 मार्च 2013

जातीय अर्थ-तंत्र और उपभोक्ता


भारत में बेताहाशा बढ़ती मंहगाई का एक समाज-संरचनात्मक कारण भी है .यहाँ अनेक जीवनोपयोगी वस्तुएं अलग-अलग जातीय समुदायों के नियन्त्रण में हैं .कुछ व्यवसाय तो ऐसे हैं कि जिन्हें भारत की परंपरागत जातियां ही संभाले हुए हैं -जैसे बाल काटने का काम नाई ,सोने के गहने बनाने का काम सुनार,जूते बनाने का कम मोची तथा इसी तरह दूध बेचने का काम ,गल्ला आदि खाद्यसामग्री बेचने का कार्य भी जाति -विशेष ही करते दीखता है .इस तरह  भारत के अधिकांश बाजार ,भारतीय राजनीति की तरह ही परंपरागत रूप में जातीय अर्थतन्त्र के शिकार है. वे एक गिरोह के रूप में अन्य जातियों के रूप में फैले हुए व्यापक उपभोक्ता समुदाय से  संगठित दुर्व्यवहार करता रहता है  भारतीय बाजारों का यह जातीय अर्थ-तन्त्र उसके व्यव्हार को विषम बनता है . भारत में उपभोक्ता-हितों  की अनदेखी की यह सबसे बड़ी वजह है कि अधिकांश पेशे एवं व्यवसाय जाति-विशेष के हाथों में केन्द्रित है ..दूध ,फल 'मिठाइयाँ 'काष्ठ-कला आदि सभी .कई बार मंहगाई का सम्बन्ध अन्य जातियों में बटे -बिखरे उपभोक्ता के विरुद्ध जाति-विशेष के संगठित व्यव्हार के रूप में भी होता है. मंहगाई इस अर्थ में एक जाति विशेष  का क्रूरतापूर्ण जातीय -व्यवहार भी है.
           ऐसे में यह मानना कि आधुनिकता इस समाज के आर्थिक व्व्यव्हार को पूरी तरह सभ्य और मानवीय बना देगी;पूरी तरह सही नहीं है .जातीय-व्यवहार एवं सामुदायिक एकता का अर्थ-तंत्र उपभोक्ता-समाज को अमानवीय पराएपन के साथ देखता है .किसानो के प्रति इन व्यवसायी जातियों का संगठित व्यव्हार कुछ -कुछ वैसा ही होता है ,जैसा व्यव्हार  नदी पर कर रहे वाइल्डबीस्ट एवं जेब्रा प्रजाति के जानवरों के प्रति  मगरों का होता है .नई फसल आने के पहले ही वे गेहूं और दलहन आदि का मूल्य अप्रत्याशित रूप से बहुत ही कम घोषित कर देते हैं .इसी तरह विवाह आदि की तिथियाँ घोषित करने पर जाति-विशेष का हाथ रहता है 'जिसके पुरखों ने फसल के पकने के समय में ही प्रायः शुभ मूहुर्त तलाश रखे हैं .स्वाभाविक है कि कर्ज आदि दबाव में वह अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर रहता है .इसे कहना चाहें तो उपभोक्ता प्रजाति पर शेरोंके हमले के रूप में देख सकते हैं .अब भी व्यवसाय -विशेष में जाति -विशेष की ही प्रमुखता है .
              भारत में इस जातीय शोषण-तंत्र के कारण ही कई बार लोकतान्त्रिक सरकारें भी कुछ नहीं कर पाने की स्थिति में होती हैं  ऐसा  मूल्य-निर्धारण की शक्ति जाति-विशेष की सामूहिकता में केन्द्रित होने से होता रहता है पूंजी के संचय के कारण कृत्रिम अभाव की स्थिति पैदा कर पाना इस जातीय अर्थ-तंत्र के लिए आसान होता है .इस अर्थ-तंत्र से बहुत नैतिक होने की उम्मीद नहीं की जा सकती .उदहारण के लिए उत्तर भारत में जाति -विशेष के लोगों का दूध के व्यवसाय में परम्परागत रूप से वर्चस्व है .दूध का उत्पादन स्वयं अपनें यहाँ न होने की स्थिति में भी दूसरे पशुपालकों से दूध खरीद कर भी बेचने का व्यवसाय इस जाति के लोग करते हैं.खरीदते समय पूरी तरह शुद्ध और बेचते समय प्रायः जल-युक्त और अशुद्ध ही इस जाति की प्रमुख जातीय नीति है .उपभोक्ताओं के साथ वे ऐसा दुर्व्यव्हार वे जातीय सामूहिकता में करते हैं .बाजार के आर्थिक व्यव्हार पर  इस प्रभाव को हम भारतीय जातिवाद के अन्य आयाम या पार्श्व-प्रभाव के रूप में देख सकते हैं .इस सम्बन्ध में एक व्यक्तिगत संसमरण भी प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत करना चाहूँगा .मुझे याद है
बचपन में मेरे जन्म-स्थान के पास वाले बाजार में एक ही जाति -विशेष के लोग सब्जी बेचने के व्यवसाय में थे .एक दिन सभी सब्जी व्यवसायियों नें जातीय पंचायत करके यह तय किया था कि भले ही सब्जी सड़ जाए या उसे फेंक देनी पड़े ,कोंई भी उसे व्यक्तिगत रूप से उसे निर्धारित मूल्य से कम में नहीं बेचेगा .
           इधर सब कुछ बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जो दुकाने प्रचालन में आने जा रही हैं ,वे व्यवसायियों के जातीय समुदाय विशेष को दुष्प्रभावित तो करेंगी लेकिन मुक्त एवं वैकल्पिक प्रतिस्पर्धा में
जातीय पूंजीवाद के संगठित व्यवहार से भारतीय बाजारों को मुक्ति भी मिलेगी.उनका निरंकुश आर्थिक व्यवहार संयमित और प्रतिस्पर्धी होने के लिए विवश होगा.अधिक अच्छा तो यह होता कि समाज सेवा के क्षेत्र की तरह आर्थिक सेवा के क्षेत्र में भी स्वयंसेवी संगठन या संस्थाएं सक्रिय होतीं .भारत में जाति-निरपेक्ष राजनीति की तरह जाति-निरपेक्ष बाजार की भी आवश्यकता है .एक ऐसे बाजार की जो अपेक्षित लाभा के साथ उपभोक्ताओं के प्रति भी सहृदय और संवादी हो.निजी क्षेत्र की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित रखने के लिए ही पिछली सरकारों नें नियंत्रित मूल्य वाली दुकानें जिन्हें जनसामान्य कोटे वाली दुकानें कहता है-खुलवायी थीं.वे दुकानें अब भी चल रही हैं ,लेकिन उनका उद्देश्य निम्न आय वर्ग के लोगों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करना है .इसे बाजार की समानांतर व्यवस्था के रूप में नई परिकल्पना के साथ
और व्यापक तंत्र के रूप में विकसित किए जाने की जरुरत है .
              गाँधी युग की बहुत सी संस्थाएं ,जो प्रायः खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अनुदानों पर पलती रही हैं -यदि समय के साथ अपनें को परिवर्तित कर आर्थिक जनसेवा केन्द्रों के रूप में विकसित की जाएँ तो बाजार के निरंकुश व्यवहार के समानांतर एक स्थिर व्यवहार वाले तन्त्र बनाए जा सकते हैं .एक बेहतर विकल्प
सरकारी मॉल का भी हो सकता है .सिद्धान्ततः बाजार की प्रतिस्पर्धा उसे कम मूल्य के साथ अधिक बेहतर बनानें की ओर होना चाहिए लेकिन परम्परा से अधिक खुदगर्ज और पेशेवर भारत का जातीय अर्थतन्त्र
सामान्य उपभोक्ता को शिकारी हिंसक पशुओं की तरह घेर कर उससे अधिक से अधिक लाभ कमानें में विश्वास करता है .