सोमवार, 20 जुलाई 2015

सृजनशीलता का जादू और नियतिवाद



http://epaper.jansatta.com/c/5025082मानव - जाति नें राजनीति का जो तंत्र विकसित किया है उस पर भी न्यूटन के गति जड़त्व के नियम लागू होते हैं .जैसेकि हर चलती हुई चीज अनंत काल तक चलते रहना चाहती है .वैसे ही हर सत्ताधारी सत्ता में बने रहना चाहता है .लोकतंत्र में भी एक बार जड़ जमा लेने के बाद सत्ताधारियो को हटा पाना आसान नहीं होता .लोकतंत्र में भी एक बार यह मान लेने के बाद कि सबके लिए प्रधानमंत्री होना संभव नहीं है -प्रारब्धवाद या नियतिवाद प्रकारांतर से वापस लौट आता है .संसाधनों एवं समीकरणों का ध्रुवीकरण सबके लिए प्रधानमंत्री हो पाना संभव नहीं रहने देता .भारत में आजकल ऐसी ही स्थिति बन गयी है और सबके प्रधानमंत्री बन सकने की सैद्धांतिक ही सही लोकतन्त्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक अवधारणा निम्न और मध्यवर्ग के लिए तो दूर की कौड़ी ही हो गयी है .यहाँ प्रधानमंत्री होने को एक प्रतीकात्मक दृष्टान्त के रूप में ही मैं ले रहा हूँ .यह कत्तई जरुरी नहीं है कि सभी लोग सिर्फ प्रधानमंत्री बनने  के बारे में ही सोचें.आशय सिर्फ इतना ही है कि सोचें तो भी  शक्तियों और समीकरणों की वैसी बाधा न हो जो उनके होने को असम्भव कर दे .
          इस दृष्टान्त का विलोम यह है कि लोग इतने हताश हो जाएँ कि छोटा आदमी बड़ा होने के बारे में सोचना ही छोड़ दे या ऐसे ही एक दुखी आदमी सुखी होने के बारे में ..इस दृष्टि से देखें तो दुनिया के सारे धर्म मानवीय सृजनशीलता को हतोत्साहित करते हैं .हालत तो यहाँ तक पहुँच जाती है कि लोग टीका भी लगवाने से कतराने लगते हैं कि इससे ईश्वर का अपमान होगा .बहुत पहले मुझे परीक्षा देने के लिए एक ऐसे ग्रामीण परिवार में ठहरना पडा था जिसके घर में चेचक निकली थी और उसी के दीवार के बाहर लिखा था कि चेचक की सूचना देने वाले को पांच हजार रुपये का ईनाम दिया जाएगा .यह सब कुछ एक मनोवैज्ञानिक हत्या की तरह होता है कि छोटा आदमी हमेशा के लिए अपने छोटेपन को स्वीकार कर ले अथवा कि एक निर्धन व्यक्ति अपनी निर्धनता को ..यह व्यवस्था के प्रति समर्पण-आत्मसमर्पण का एक दूसरा पक्ष है ,जो मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति कि दृष्टि से न सिर्फ नकारात्मक है ,बल्कि समाज के लिए भी अस्वस्थकर है .यह व्यवस्था के परिवर्धन और परिष्करण की आशा और आस्था की मनोभावना को ही ध्वस्त क देता है .एक निष्क्रिय-निठल्ला निराशावादी कुंठाग्रस्त  समाज यदि अपनी सृजनशीलता और विवेकपूर्ण प्रतिरोध  से  यदि अपने पर्यावरण को बदल सकने का जादू भूल जाता है तो इससे दुर्भाग्य कि बात और क्या हो सकती है ! यहाँ सृजनशीलता से आशय मेरा सिर्फ व्यक्तिगत या पारिवारिक सृजनशीलता से नहीं है बल्कि उस सामूहिक सृजन शीलता से है जो राजनीतिक व्यव्हार के क्षेत्र में आन्दोलन और क्रांतियों के रूप में भी प्रकट होते रहे हैं .इससे यह रहस्य भी अनावृत होता है कि आध्यात्मवाद का मानवीय सृजनशीलता और उसके हस्तक्षेप से विरोध क्यों है .
            नियतिवाद अपने वैज्ञानिक अर्थों में तो कार्य -कारण की एक सुसंगत और अपरिहार्य श्रृंखला को व्यक्त करता है ,लेकिन अपने समर्पण वादी आध्यात्मिक अर्थ में यथास्थिति वाद को बढावा देता है . कई बार जब आग लगी हो और उस समय यदि कोई आँखें बंद किए लेटा कुछ सोच रहा  हो तो उसकी आँखें तब तक नहीं खुल सकतीं जब तक कि वह व्यक्ति स्वयं जलने न लगे .इसप्रकार देखें तो हमारे भाव और विचार हमरी नियति के अंतिम निर्णायक नहीं हैं .कई बार जब हम जीने की सोचते हैं हमारा रुग्ण-जर्जर शरीर बिना हमसे पूछे ही हमारे मरने की घोषणा कर देता है ..बचपन में गावों में कई लोग काल्पनिक रूप से चोर के कभी भी किसी भी रात आ जाने की आशंका के साथ बगल में लाठी रख या छिपाकर  सोते थे  .अक्सर उनकी जिन्दगीमें वह चोर कभी आता ही नहीं था .कभी-कभी ऐसा भी होता था कि वह चोर अप्रत्याशित रूप में आ जाता था और वे सोते-सोते ही चोर की  चालाकी के शिकार हो जाते थे .कई लोग जो जीनेटिक रूप से अच्छे होते हैं , न ही कभी बीमारी के बारे में सोचते हैं और न ही कभी बीमार ही होते हैं ,कुछ जिन्दगी भर बीमारी के बारे में सोचते रहते हैं और कभी बीमार होते ही नहीं ,जबकि कुछ ऐसे भी अभागे होते हैं जो बिना सोचे ही बीमारी की चपेट में पड़ जाते हैं .यह कहा जा सकता है कि हमारा जिन्दगी भर बीमार होना या स्वस्थ होना एक संयोग भी हो सकता है .संभवतः इसीलिए गीता में पाचवां हिस्सा यानि बीस प्रतिशत ही दैव यानि नियति को दिया गया है .इसी बीस प्रतिशत के अप्रत्याशित में ही ईश्वर का भय भी छिपा है .लेकिन यह तो नियति वाले ईश्वर के बारे में है .
       

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

चेहरों की यह किताब ....

इस मंच पर जो बोल रहा होता है
वह भी वास्तव में चुप रहता  है
भीतर-भीतर कुढ़ता,चिढ़ता,पढ़ता है
फिर भी करता जाता है पसंद  ...

आदमी का शक्ल लेकर घूमती हैं यहाँ
सनकी मानसिकताएं और तृप्त -अतृप्त इच्छाएँ
बेहद अक्लमंद और कम - अक्ल दोनों ही
अपने होने को प्रदर्शित कर रहे होते हैं
ऐसा लगता है कि जैसे किसी चोर-दरवाजे से
झांक कर देख रहे हों लोगों के भीतर का सच .....

कुछ चुपचाप अकेले  पड़े होते  हैं फेसबुक पर ...
तो कुछ गिरोह बंद रूप में
कुछ घुले कुछ मिले तो कुछ हिले से
तो कुछ सिर्फ जीते दिखते हैं द्वंद्व -फंद
कुछ डरे -डरे दबे -सहमे से
तो कुछ हैं अनगढ़ -मनबढ़ निर्बंध
कुछ बेहद शालीन तो कुछ खतरनाक इरादों के साथ
कुछ सुखद झोंकों की तरह तो कुछ तूफानी
कुछ इंसानियत से भरे तो कुछ शैतानी
कुछ आदान - प्रदान योजना के अंतर्गत
प्रथम द्रष्टया साधू सज्जन भगत
अजब -गजब है फेसबुक यानि चेहरों की यह किताब ...

गुरुवार, 25 जून 2015

समय और बाजार

समय और बाजार 

वे बाजार में हैं
उनके लिए बाजार में होना ही
जीत लेना है मानवीय समय को
वे समय की स्मृति को भर रहे हैं
अपनी उपस्थिति के संगठित शोर से
लाभ-हानि की गुणा-गणित के साथ
वे बाजार में बिकाऊ स्मृति के विक्रेता हैं शानदार....

जो वे दिखाना चाहते हैं
देख रहे हैं समय और बाजार के दर्शक
समय बंट गया है बाजार और
बाजार के बाहर वालों के बीच ...

दर्शक बाजार और समय में होकर भी
अनुपस्थित और विजातीय हैं
बाजार और समय के लिए

कि एक दर्शक होना
समय और इतिहास में होना नहीं है



बाजार,स्वर्ग और ईश्वर


वे स्वर्ग में हैं
यह धरती ही उनके लिए है स्वर्ग
वे नहीं चाहते कि वे बदलें
और बदले उनका ईश्वर ....

वे यह सोच भी नहीं सकते कि
उनके पालतू ,सुरक्षित और पक्षपाती ईश्वर से अलग
होना चाहिए कोई दूसरा भी स्वतंत्र ईश्वर
भटकते हुए जंगली,असमर्थ और अस्वस्थ लोगों के लिए
एक निरीह ईश्वर जो कभी चाहता ही नहीं
या फिर चाह कर भी नहीं पूरी कर सकता
किसी की भी कोई प्रार्थना !

वे उस ईश्वर की ओर से हैं
जो अभावों के कारागार में
बंदकर सभी की आत्मा
रख कर कहीं भूल गया है
प्रारब्ध की एक जिद्दी सड़ी किताब ....

वे जो सुख के सुरक्षित स्वर्ग में हैं
 एक सुखी और सुरक्षित ईश्वर के पक्षधर !

चीजें और समय का ईश्वर ...


चीजें आ रही हैं
चीजें दिमाग से आयें या आसमान से
चीजें आयें तो सही !
चीजें मिलजुलकर होती हैं एक ....
और रहस्यमय तथा दुरूह होती जाती हैं

चीजें देखने और दिखने से बंट जाती हैं
चीजें बंट जाती हैं जीने और जानने में
यद्यपि हम प्रतीक्षा करना नहीं चाहते
लेकिन प्रतीक्षा करनी पड़ती है हमें ....

चीजें बंट जाति हैंकिसी के रुक जाने और
चलते ही चले जाने से किसी के
चीजें स्थितियों के साथ बदलती हैं
और बदलती हैं
किसी को छोड़ने और जोड़ने से .....


श्रीमानजी जब सभ्यता एक बस के समान
सामने से छुट रही हो
पीछे धुल उड़ाती ...
पीछे छुट गई वंचित आँखों से
प्रतिपल बदल रही दुनिया के करतब को
सिर्फ ईश्वर की इच्छा की तरह ही देखा जा सकता है


फ़िलहाल तो
चुनाव अभी दूर है
और अपना मत देकर
हाथ कटा बैठे हैं
दिमाग गंवा बैठे हैं हम ....

इसे यथास्थितिवाद कहें
या फिर हमारी संवैधानिक असमर्थता
फ़िलहाल तो सब कुछ ईश्वर के अधीन है

समय का ईश्वर
जो एक असहिष्णु और आपराधिक राजनीतिज्ञ की तरह है
और वह इतना समर्थ है कि
कभी भी किसी दुसरे उपलब्ध मुर्ख को प्रेरित कर
बैठे-बैठे किसी का भी एक्सीडेंट करा सकता है

सिर्फ मैं उसकी भर्तस्ना ही कर सकता हूँ
जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है

समय का ईश्वर
जिसकी ताकत इस बात में भी है कि
वह मानव जाति को सामूहिक मुर्ख बनाने के लिए
फिर कौन सी विचारधारा ईजाद करेगा
और किसे चुनेगाअपने द्वारा बनाए गए मूर्खों का चरवाहा  !



चाहना 

हम जिसे चाहते हैं
वह किसी और को चाहे
यह हम बर्दाश्त नहीं करते


चीजें खींचती हैं अपनी ओर और लोग
अस्तित्व का होता है अपना ही आकर्षण
अपनी तात्कालिकता और निर्विकल्पता भी  ...


हम समय में उपस्थित है
और समय में ढूंढते रहते है सहचर
भटकते रहते हैं विकल्प के बाजार में
एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्याग्रस्त
और प्रतिस्पर्धी ....

हम जितना कम जानते हैं
उतने ही बड़े हो जाते हैं
हमारी आत्मा में पड़े-खड़े लोग

एक घायल आत्मा
सभी को घायल करती जाती है

हम जो चाहते हैं आक्रामक ढंग से
उपजाते हैं शोर कि हम हैं -सुनो !मुझको !!
होते हैं आश्चर्यचकित अपने ही होने पर
कहते हैं की हम हुए .....
मचाते हैं होड़ अपने होने की

हम एक आवाज
सुनते जाते हैं लगातार
सुनने से अधिक ......




शनिवार, 20 जून 2015

योग : एक पुनर्चिन्तन

महर्षि पतंजलि का उद्देश्य तो मनुष्य के क्षुद्र जैविक अस्तित्व को  परमात्मा अथवा प्रकृति के विराट   या संपूर्ण  अस्तित्व से जोड़ना  था.जिन्होंने भी उनका योग-सूत्र पढ़ा होगा -वे जानते होंगे कि उनका आत्म-निरीक्षण और विश्लेषण अद्भुत है  .वह एक संपूर्ण जीवन-दर्शन के रूप में है .-क्योंकि उसमें सिर्फ आसन ही नहीं बल्कि ध्यान,धारणा और समाधि सभी सम्मिलित है .वैसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय  तो योग का वास्तविक उद्देश्य  सिर्फ स्वस्थ शरीर ही  नहीं बल्कि एक आवेशरहित ,शांत एवं सक्रिय मस्तिष्क का विकास  भी है .आत्मा के साक्षात्कार की दशा वस्तुतः मन की चंचलता से मुक्त चित्त को पाना है .देखा जाय  तो मन भी मस्तिष्क की ही एक दशा है .कहना चाहें तो  कह सकते हैं कि इन्द्रियों  में आसक्त ,अभिलाषाओं-इच्छाओं से युक्त मस्तिष्क ही मन की दशा है  तथा आवेगों से मुक्त विशुद्ध विवेक की प्राप्ति अथवा स्थिर मस्तिष्क का अनुभव ही आत्म-साक्षात्कार की स्थिति है .दरअसल हममें  से अधिकांश  का मस्तिष्क एक अनियंत्रित  मानसिक शोर का शिकार  होता है .सोचने की आदत के कारण जब और  जो हमें नहीं सोचना चाहिए वह भी हम सोचते जाते हैं .हमारे अनुभवों ,इच्छाओं ,वासनाओं का एक बड़ा हिस्सा भाषिक स्मृतियों के रूप में भी दर्ज होता रहता है .इसमें संदेह नहीं कि योग और प्राथनाएँ बाहरी दुनिया के अनुचित प्रभावों के प्रति उचित प्रतिरोध विकसित  करने में मदद करती है, 
       यहीं पर एक भाषा-वैज्ञानिक रहस्य भी छिपा था . वस्तुतः हमारा मस्तिष्क एक भाषा-ग्रस्त मस्तिष्क है .हम उन  शब्द-प्रतीकों के माध्यम से सोचते हैं -जिनको मानव-जाति ने एक सामूहिक अर्थ दिया है .भाषा  में सारे शब्द वस्तुतः पद हैं . पद यानि उपाधि  और हर पद का एक वास्तविक अर्थ होता है जिसे पदार्थ कहते हैं.पदार्थ यानि वास्तविक जगत की वस्तुएं .हमारा नाम स्वयं एक पद है और हमारा शरीर और अस्तित्व ही उस पद का अर्थ यानि पदार्थ है .हम इसी पद को ही ज्ञान समझने लगते हैं .वस्तुतः ज्ञान तो सूचनाओं और प्रतीकों से बना एक आभासी प्रतिसंसार है .यह प्रतिसंसार ही हमें इतना वास्तविक लगने लगता है कि कई बार हम अपने को सर्वज्ञ एवं अन्तिम रूप से समझदार समझने लगते हैं .जबकि सच तो यह है कि हम जिन शब्दों के लिए लड़ रहे होते हैं .भाषावैज्ञानिक नजरिए से वे सारे शब्द-प्रतीक  के रूप में माने  हुए ही हैं .ज्ञानी होने के अतिविश्वास में हम अपनी जिज्ञासा ,कौतूहल और जिज्ञासा खो देते हैं .इस तरह देखा जय तो दुनिया  के सारे विद्वान  अपने ज्ञान के लिए भाषा पर आधारित होने के कारण  एक सीमा तक काल्पनिक हैं .अपने मस्तिष्क की इसी अबोधता का साक्षात्कार ही दरअसल आत्मा के साक्षात्कार की वह दशा है जिसे प्राचीन ऋषि नेति -नेति कहते थे .कहने का तात्पर्य यह कि ज्ञान से परे का विशुद्ध प्राकृतिक अस्तित्व आज भी सिर्फ आश्चर्य का ही विषय है .हम भले ही नास्तिक ही क्यों न हों ,प्रकृति या कुदरत के इस करिश्में पर आश्चर्य चकित और मुग्ध रह जाते हैं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसी तथ्य को इस शब्दावली में भी समझ सकते हैं कि हम अपने समय सापेक्ष ज्ञान के कारण ही प्रकृति और अपने अस्तित्व को विशुद्ध संवेदना के स्तर पर नहीं जी पाते .हम अपने अस्तित्व और संसार का जो भी जिस भी रूप में प्रत्यक्षीकरण करते हैं -उससे सम्बन्धित सारी व्याख्याएँ प्रायः समाज और समय के विकास के सापेक्ष होती हैं .तात्पर्य यह है कि समय और समाज के विकास के सापेक्ष हमारी सभी धारणाएँ बदल सकती हैं . पूर्वाग्रह रहित सत्य के लिए सिद्धांत रूप में ही सही अपने मस्तिष्क की ज्ञानात्मक तात्कालिकता का अतिक्रमण करना जरूरी है .इस दृष्टि से जैन धर्मं का अनेकांतवाद अधिक स्वस्थ दृष्टिकोण कहा जाएगा .हम यदि इस प्रबुद्ध अबोधता की ओर लौट सकें -दुसरे शब्दों में अपने आदिम आश्चर्य को पुनः प्राप्त कर सकें तो यह किसी आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार से भी महत्वपूर्ण घटना होगी .आत्मसाक्षात्कार की यही स्थिति,यही चित्ति ही किसी को महावीर तो किसी को बुद्ध या मुहम्मद बनाती है .उस ज्ञानात्मक आदिमता और समर्पण  के बिना केवल  शारीरिक योग व्यायाम ही कहा जाएगा .
        यद्यपि गीता में योग को कर्म करने की कला या कौशल के रूप में देखा गया है .उसमें भी बुद्ध की मध्यमा प्रतिप्रदा की तरह समत्व योग पर बल है .यह भी कि गीता में मूढ़ भाव से आशय क्षोभजनित किंकर्तव्यविमूढ़ता से है -मूढ़ शब्द का व्यंग्यार्थ लेते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि योग का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मुझपर यह पड़ा कि इसने मुझे मूढ़ भाव जिसे मैं मुर्ख भाव भी कभी -कभी कहता हूँ ; जिसे ही गीता में स्थिति -प्रज्ञ भाव कहा गया है -उसको जीने में मुझे महारत प्रदान कर दी .यह वह योग नहीं है जिसे योग को स्वास्थ्य का व्यायाम बना देने वाले प्रसिद्ध गुरु रामदेव नें लोगों को सिखाया है .यह योग दरअसल बेहया बनने की कला है .अब आप दस लाख लोगों की भीड़ को मुझे गाली देने के लिए मेरे सामने खड़ा कर दीजिए तब भी मैं अविचलित और अप्रभावित ही रहूँगा .गीता वाला यह योग तो मान और अपमान बोध से मुक्त होने में बड़ा सहायक है .यह बाह्य जगत से साहचर्य मुक्त रहकर अपने आप में प्रसन्न रहने की क्षमता देता है भारत जैसे बेईमानों और खुदगर्जों  से भरे  देश में जहाँ की सामाजिकता विविध जातियों और धर्मों में बंटी हुई है और जहाँ के नागरिक दुसरे की मुक्त प्रशंसा करने में कृपण हैं -ऐसा योग बहुत ही महत्वपूर्ण है .श्री कृष्ण को भी ऐसे योग की जरुरत इस लिए पड़ी थी कि दुर्योधन उन्हें ग्वाल कहकर अपमानित करता रहता था .इसीलिए उन्होंने मान और अपमान में सम रहने वाला योग प्रवर्तित किया . .यद्यपि रामदेव यह योग नहीं सिद्ध कर पाएं हैं लेकिन भौतिक फायदे वाले गुरु के रूप में उनका योगदान महत्वपूर्ण ही कहा जाएगा .
    वैसे योग की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मुझे यह लगती है कि यह बुद्धि की यांत्रिक सक्रियता से या यह कहें कि बुद्धि को चुप करा कर बिना किसी शोर -शराबे के जीवन जीने का विकल्प देता है .शरीर की भौतिक सक्रियता से मानसिक दुनिया पीछे छूट जाती है .इसीप्रकार यह तनाव को कम करता है .यह मन से देह की ओर बाहर निकाल देता है .इसी अर्थ में चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है ..यह अनुचित या विवेकहीन चिंता को कम कर सकता है .विवेकहीन चिंता से आशय यह है कि सब कुछ जानते हुए भी कि काम नहीं होना है  या होना संभव नहीं है -हम दुखी रहते हैं .गीता में योग को कर्म करने की कुशलता के रूप में देखा गया है .योग का यह सक्रिय और सामाजिक स्वरूप है .इसे जीवन पद्धति के रूप में देखा गया है .वैसे योग का शाब्दिक अर्थ तो जुड़ना ही होता है .यह अपनी संवेदना को विस्तृत करने का अवसर भी देता है .अगर आप आस्तिक हैं तो इसे आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के प्रयास के रूप में देख सकते हैं लेकिन यदि आप नास्तिक या मार्क्सवादी हैं तो वृहत्तर प्रकृति के प्रति जुड़ने का भाव रख सकते हैं .
     इसमें संदेह नहीं कि योग मनोविकारों पर नियंत्रण करने की क्षमता विकसित करता है इसके प्रचार और लोकप्रियता से अपराध और .आत्महत्याएँ कम हो सकती हैं .लेकिन उससे पुल और सड़कें नहीं बन जाएंगी .किताबों को पढ़ने का श्रम नहीं कम हो जाएगा .योग जादू नहीं है लेकिन भीतर के या मानसिक शोर को कम करने और शांतिपूर्ण जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है .व्यायाम के रूप में वह खिंचाव के सिद्धांत पर आधारित हैं ओर शरीर को लचीला बनाता है .उसके शीर्षासन आदि कुछ आसन जो गुरुत्वाकर्षण के दुष्प्रभावों को कम करने एवं उससे सम्बंधित रोगों से मुक्त होने में सहायक होते हैं .उदाहरण के लिए सिर्फ मनुष्य ही उर्ध्वाधर रहता चलता और जीता है -अन्य कशेरुकी प्राणी क्षैतिज जीवन जीते हैं . आजकल कुर्सी आदि पर अधिक देर तक बैठने के कारण भी पेट की खराबी और रक्त अवरुद्ध होने वाले रोग जैसे बवासीर आदि से मुक्त होने में योग सा सम्बंधित आसन सहायक हो सकते हैं .क्योकि सारी प्राण शक्ति एवं उसकी जैविक यांत्रिकी धड में ही होती है इसलिए कपालभांति जैसे डायफ्राम से सम्बंधित व्यायाम का महत्त्व भी असंदिग्ध ही है .

रविवार, 31 मई 2015

कबीर के राम

कबीर का निर्गुण ब्रह्म सर्वव्यापी एवं साधनामूलक होने के कारण  हर काया को राम का अवतरण -स्थल मनाता है .उनके राम तक पहुँचने के लिए किसी को भी अपने से बाहर  नहीं जाना है ;किसी को भी बाहर भटकना नहीं है .उनका अंतर्यामी राम इस तरह हर जीव को राम के एक अवतार में बदल देता है .दरअसल जाति-पांति से ग्रसित इस देश नें मुक्ति के लिए जिस अस्मितामूलक आध्यात्म का विकास किया है -उसका कोई मनोवेज्ञानिक विकल्प नहीं है .सनातनी परंपरा में आदि शंकराचार्य ;आदिकाल में गुरु गोरखनाथ  और मध्यकाल में संत मत के प्रवर्तक कबीरदास जी सभी भारतीयों के लिए अपने अस्मिता मूलक आध्यात्म के कारण महत्वपूर्ण हैं , इस दृष्टि से शंकराचार्य को मैं गीताकार से भी अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ .गीता में भेद -भाव मूलक आत्मा और परमात्मा के द्वैत का अपरोक्ष प्रतिपादन है .कृष्ण को ईश्वर विज्ञापित करने के चक्कर में वे अर्जुन और दुर्योधन आदि के आध्यात्मिक मानवाधिकार की उपेक्षा कर देते हैं .अर्जुन के पास विकास का समय नहीं है .दुर्योधन के पास सुधार और प्रायश्चित का विकल्प ही नहीं है -सिर्फ मारे जाने के अतिरिक्त .अर्जुन सामान्य मनुष्य की आत्मा के प्रतिनिधि हैं तो कृष्ण सर्वव्यापी परमात्मा के .शंकराचार्य का अद्वैतवाद आत्मा और परमात्मा दोनों की तात्विक समानता की खुलकर घोषणा करता है . आदिकाल में  गुरु गोरखनाथ भी  ' जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे ' कहकर दोनों की तात्विक समानता की घोषणा करते हैं .कबीर भी जल में कुम्भ ,कुम्भ में जल है ,बाहर -भीतर पानी ; फूटा कुम्भ जल-जलहि समाना ,यह तथा कथहु गियानी 'कहकर मानव -जीवन की महत्ता को स्वतन्त्रतापूर्वक जीते हैं .आज हम जानते हैं की यह स्वतंत्रता सामंती समाज से व्यक्ति -जीवन के मुक्ति की भी है ,
               इस क्रम में कबीर अपने राम को एक दार्शनिक अवधारणा के रूप में लेते हैं .उनका प्रयोजन दशरथ के पुत्र पौराणिक राम से नहीं है .कबीर के राम अन्तर्यामी एवं घट-घटव्यापी राम हैं .इसीलिए वे अपने राम -नाम के मर्म को अन्य बतलाते हैं . मेरी दृष्टि में वह मर्म यह है कि कबीर की माने तो हर आत्मा परमात्मा की अवतार है .इसतरह वे अभिजनवादी पौराणिक अवतारवाद का लोकतांत्रिककरण करते हैं .वे सभी के लिए राम बनने की मुक्ति का द्वार खोलते हैं . जबकि पुरोहितवाद एक राम के बाद ,दूसरे किसी भी मनुष्य के राम होने के अधिकार और संभावना का निषेध करता है .कबीर इस विभेद और विषमताकारी रामत्व को ही अस्वीकार करते हैं .सही अर्थों में देखा जय तो वे पौराणिक राम के भी अधिक समीप और सही थे .पौराणिक राम के गुरु विश्वामित्र  और उनका प्रसिद्ध गायत्री मंत्र भी तो सभी आत्माओं के दिव्यत्व की घोषणा ही करता था .उनका पुरोहित वशिष्ट(विशिष्ट !)) से लम्बा मुक्ति -संघर्ष भी चला .अपने नाम के अनुरूप विश्वामित्र जन-जन के आध्यात्मिक मानवाधिकार के समर्थक थे ; जबकि पुरोहितों का आध्यात्म अभिजनोचित और विशिष्टतावादी था . विश्वामित्र के प्रथम शिष्य के रूप में राम की स्थिति भी आधुनिक युग में मार्क्स के अनुयायी  लेनिन सरीखी ही  थी .राम का चरित्र गायत्री मंत्र के भावार्थ को ही अपने आदर्श आचरण के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाता है .कबीर का संत मत उसी रामत्व को पुनः मुक्त करता है .

रविवार, 3 मई 2015

पिता-अपराध सो-च-ते हुए....

तुम डर रहे हो
क्योंकि तुम्हें डरते रहने के लिए कहा गया था
इसके पहले कि तुम स्वयं कुछ सोचो और रचो
तुम्हें भी सौंपी गयी थी एक दुनिया
पहले से भी रची और सोची गयी ।

तुम सुविधाओं में और सुरक्षाओं में पले हो
तुम्हें जहरीले पौधों और जन्तुओं की पहचान करायी गयी है
तुम्हें सौंपी गयी हैं अनेक अव्याख्यायित वर्जनाएं
ताकि तुम उन्हें समझ पाने तक बचे रह सको....
इसतरह तुम एक उत्पाद हो पिछली पिता-पीढ़ी की समझदारी के......
तुमने जीने की आदतें सीखी हैं और कला
तुमनें डर सीखें हैं और दूसरों द्वारा विरासत में मिले हुए विश्वास.....

तुम कल तक बच्चे थे और आज बनने जा रहे हो पिता
तुम एक अवसर हो डरनें और न डरने के नए चयन के लिए
तुम एक जैविक पिता ही नहीं हो
तुम एक सांस्कृतिक और साभ्यतिक पिता भी हो
एक दुर्लभ अवसर हो नए आरम्भ के लिए.......

उठो ! यह तुम्हारे सोने का वक्त नहीं है ,सोचने का है
बहुत हो लिया अब अपने छत के ऊपर
खुली हवा में निकल आओ
यदि छत न हो ता मैदान में......

सबसे पहले अपने नाम के बारे में सोचना है तुम्हें
और यह किसी भी भाषा का हो सकता है शब्द
इसे संज्ञा भी कहते हैं.....

संज्ञा हर भाषा के वे शब्द होते हैं
जो दूसरी भाषाओं में भी जाकर बनें रहते हैं अपरिवर्तनीय
जिनका नहीं किया जा सकता कोर्इ अनुवाद
ये शब्द आते-जाते हैं बस उधार यूं ही...ऐसे ही
देश और भाषा से पक्षिओं सरीखे
जन-जन से ज्यों पेड़-पेड़ से उड़ते रहते और बैठते.....

अब सोचो - तुम क्यों हो राम !
यधपि यह है ही सहज पर बात कठिन
हालांकि है भाषा की ही समस्या
कि तुम्हें राम ही क्यों कहा गया ?
जबकि पीटर ,डैनी ,रहीम,करीम-करीमन कुछ भी
कहा जा सकता था.....

अब सोचो कितने वर्ष उम्र है तुम्हारी
पांच वर्ष ! दस वर्ष ? बीस ? पच्चीस ? पचास ?
अच्छा तो तुम चालीस वर्षों से हो हिन्दू
और तुम पचास साल से मुसलमान
पर इतना ही नहीं
दस वर्ष पहले जन्में बच्चे को
बिना पूछे ही उससे तुमनें उसे बना रखा है हिन्दू ?
उसनें मुसलमान आठ वर्षों से
पांच वर्ष से उसनें सिक्ख
ऐसे ही और-और.....

आखिर तुम हो कौन
होते कौन हो
किसी के होने के ऊपर
अपना होना थोप रहे जो !

श्रीमान मियां और पंडित जी !
पूछा तो नहीं था आप-आपने अपने-अपने बच्चों से
कि तुम जन्म लेना चाहते हो या नहीं !
तुम हिन्दू बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम गोरा या काला,अफ्रीकन या ब्रिटिश बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम अमुक भाषा-भाषी या देश होना चाहते हो या नहीं -
वैसे ही जैसे तुमसे नहीं पूछा था तुम्हारे पिताओं नें
हिन्दू या मुसलमान,हिन्दी-उर्दू या तमिल बनाते हुए.......

यधपि आप हैं और होते हुए भी पिता
बिना पूछे स्वयं को उसका अपना पिता बताकर
उसकी नन्ही पीठ पर लद जाने वाले
उसके मन-मसितष्क पर संकीर्ण अस्मिताओं की इबारत लिख देने वाले....
जबकि हर पिता अपनी सन्तान के साथ
उसके जन्म के साथ ही कर देता है
एक प्राकृतिक अपराध
बिना पूछे एक नए मनुष्य जीवन को धरती पर लाकर
अपनी वासना और कामना की आड़ में
किसी निरीह शिकार की तरह घायल पशु सा पटक देना
रोग-शोक,दु:ख और मृत्यु की युद्धभूमि में
एक असमाप्त और अन्तहीन लड़ार्इ लड़ने के लिए.....

हां-हां महोदय ! पितृ-ऋण नहीं
पिता-एक प्राकृतिक अपराधी सन्तान का
भुगते जो उसके पालन-पोषण की सजा
सजा पूरी हो क्षमा मिल जाने तक.....

हां-हां महोदय । यह होगा आपका अपराध
एक पुत्र को जन्म देना या पुत्री को
उतना ही जितना एक रूत्री की बिना सहमति के
किए सम्पर्क पर होने वाली सार्वजनिक भर्त्सना बलात्कार की !

कि एक मानव-शिशु हमेशा ही होता है-
एक प्राकृतिक बलात्कार का शिकार और परिणाम
चहे वह विवाहित दम्पति से जन्मा हो या फिर अवैध सम्बन्ध से....
दूसरा बलात्कार कि उसको दे दिया एक नाम
तीसरा कि बिना पूछे ही उससे दे दिया एक धर्म
और उसका पिता होने का करते हुए दुरुपयोग
लगे पीटनेढालने उसे आतंकवादी अनुशासन में
अपनी सनकों की शिक्षा का पाठ पढ़ाते हुए
अपने र्इश्वर और खुदा को भी बुला लिया
अपने बलात्कार के परिणाम से अपने होने का
अनधिकृत हिस्सा मांगने....
जाओ पिता ! अब भी समय है कि
उसके उगनें में हस्तक्षेप न करते हुए
संकीर्णताओं से परे की उदारता के साथ
उसे फूलने-फलने और विकसने दो
होने दो मनुष्य-उसे छोटा मत समझो
मत बनाओं उसे अपने अहंकार का चौकीदार
बौनसार्इ या फिर निजी जागीर उसे
क्योंकि वह ह ैअब तक के सम्पूर्ण मानव-जाति के वैश्विक 
उत्तराधिकार में मिले अनुभवों और सूचनाओं से समृद्ध
तुम तक बूढ़ी हुर्इ मानव-जाति का सहज उत्तराधिकारी !
तुम्हारा शिशु होते हुए भी अब तक की सभ्यता का
तुमसे भी बूढ़ा सदस्य मनुष्य होगा वह
वह ज्ञान-वृद्ध शिशु !

जाओ पिता ! और मांगो उस नवजात मनुष्य से
घुटने टेककर,उसके मस्तक  को चूमते हुए मांगो क्षमा
यदि तुम मां भी हो चाहे
यदि तुम पिता भी हो चाहे
यदि तुम र्इश्वर,खुदा या गाड भी हो चाहे......

उसे चूमो ! उसे पुकारो ! और उससे मांगों क्षमा
उसके साथ खेलते और उसे प्रसन्न करते हुए
उसके लिए दूध और रोटियों की खोज में
भटको सारी धरती !

और यह मत भूलो कि
एक जिन्दा मनुष्य की हत्या कर देने से
अधिक भयानक पाप है
एक नए मनुष्य के जीवन को
उसकी इच्छा के विरुद्ध बिना पूछे इस धरती पर
भूख ,रोग और संकटों से लड़ने के लिए बुला लेना.....

उसके सामने टेककर घुटनें
उससे मांगते हुए क्षमा
उसे धीरे से अपनी बाहों में उठाओ !
शायद वह हंस दे और तुम्हारी सजा
पूरी तरह माफ कर दी जाय......

शुक्रवार, 1 मई 2015

निथतिवाद की मानसिकता जीवन के रचनात्मक प्रतिरोध को कु्ठित और सथगित करती है ।इस दृष्टि से नियतिवादी होना ठीक नही है

गुरुवार, 12 मार्च 2015

भारतीय ईश्वर से

मैं जब शून्य को जिऊंगा
तुम मेरी इच्छाएँ किसी और को दे दोगे
क्या तुम जानते हो
तुम्हारे बनाए संसार की तरह
इच्छाओं का भी अलग संसार होता है .....

जिसने भी बनायीं होगी चिड़िया और उसका सुरीला कंठ
तुमने या जीवन का उत्पादन करने में समर्थ प्रकृति के आतंरिक गुण -धर्मं नें
क्या तुम जानते हो कि मेरा अपनी इच्छाओं को वापस ले लेना
किसी गायक चिड़िया का अपना गीत सुनाने से इंकार कर देना है ?

मेरी इच्छाएँ जो मेरे सृजन की स्वतंत्रता हैं
मेरे विवेक की स्वतंत्रता हैं
भले ही अपने विवेक के लिए अपने स्वभाव से परतंत्र हूँ मैं
या फिर मजबूर और उत्तेजित कर देने वाली परिस्थितियों के कारण
मैं स्वाधीन क्रियाओं का नहीं बल्कि पराधीनता जन्य
प्रतिक्रियाओं का ही जीवन जीने लगूं
दूसरों की अपराधी इच्छाओं के उद्वेलन से
मैं भूल जाऊं की मैं वास्तव में चाहता क्या था
और मुझे क्या करना पड़ा ?


तुम चाहते हो की मैं अपना होना तुम्हारे लिए छोड़ दूं
तुम चाहते हो कि मैं अपना स्वाभिमान न जिऊं !
तुम चाहते हो कि मैं इतना विनम्र हो जाऊं कि तुम्हारे लोग
किसी घास या कीट की तरह रोंदते हुए मेरे ऊपर से गुजर सकें ....
तुम चाहते हो की मैं अपनी इच्छाओं को निरस्त कर दूँ
या फिर भूल जाऊं तुम्हारे लिए
अपने चित्त के प्रशिक्षित आत्मनियंत्रण के बावजूद
मैं जानता हूँ कि तुम इच्छाओं की अराजकता रोक नहीं पाओगे
किएक अच्छे आदमी की इच्छाओं और संवेदनाओं को स्थगित करा देना
एक धार्मिक हिंसा और अपराध ही है ....


जबकि पाशविक ,अशिक्षित ,संस्कारित यांत्रिकता
घटिया इच्छाओं का लगातार उत्पादन कर
इस दुनिया को और बुरी बनाती जाएगी
मेरी इच्छाएँ जो अच्छी हैं
क्योंकि मैं सभी के साथ ..सभी के लिए जीने का सपना देखता हूँ
मैं ईमानदारी से इस बहुसंख्यक दुनिया में किसी तानाशाह का
अकेले ईश्वर की तरह जीना पसंद नहीं करता
मैं एक सामाजिक विनम्र और जिम्मेदार ईश्वर चाहता हूँ
ईश्वर जो मानव -जाति पर शासन करता हुआ नहीं
बल्कि मनुष्यता को भीतर से जीता हुआ हो .....

भारतीय ईश्वर से

मैं जब शून्य को जिऊंगा
तुम मेरी इच्छाएँ किसी और को दे दोगे
क्या तुम जानते हो
तुम्हारे बनाए संसार की तरह
इच्छाओं का भी अलग संसार होता है .....

जिसने भी बनायीं होगी चिड़िया और उसका सुरीला कंठ
तुमने या जीवन का उत्पादन करने में समर्थ प्रकृति के आतंरिक गुण -धर्मं नें
क्या तुम जानते हो कि मेरा अपनी इच्छाओं को वापस ले लेना
किसी गायक चिड़िया का अपना गीत सुनाने से इंकार कर देना है ?

मेरी इच्छाएँ जो मेरे सृजन की स्वतंत्रता हैं
मेरे विवेक की स्वतंत्रता हैं
भले ही अपने विवेक के लिए अपने स्वभाव से परतंत्र हूँ मैं
या फिर मजबूर और उत्तेजित कर देने वाली परिस्थितियों के कारण
मैं स्वाधीन क्रियाओं का नहीं बल्कि पराधीनता जन्य
प्रतिक्रियाओं का ही जीवन जीने लगूं
दूसरों की अपराधी इच्छाओं के उद्वेलन से
मैं भूल जाऊं की मैं वास्तव में चाहता क्या था
और मुझे क्या करना पड़ा ?


तुम चाहते हो की मैं अपना होना तुम्हारे लिए छोड़ दूं
तुम चाहते हो कि मैं अपना स्वाभिमान न जिऊं !
तुम चाहते हो कि मैं इतना विनम्र हो जाऊं कि तुम्हारे लोग
किसी घास या कीट की तरह रोंदते हुए मेरे ऊपर से गुजर सकें ....
तुम चाहते हो की मैं अपनी इच्छाओं को निरस्त कर दूँ
या फिर भूल जाऊं तुम्हारे लिए
अपने चित्त के प्रशिक्षित आत्मनियंत्रण के बावजूद
मैं जानता हूँ कि तुम इच्छाओं की अराजकता रोक नहीं पाओगे
किएक अच्छे आदमी की इच्छाओं और संवेदनाओं को स्थगित करा देना
एक धार्मिक हिंसा और अपराध ही है ....


जबकि पाशविक ,अशिक्षित ,संस्कारित यांत्रिकता
घटिया इच्छाओं का लगातार उत्पादन कर
इस दुनिया को और बुरी बनाती जाएगी
मेरी इच्छाएँ जो अच्छी हैं
क्योंकि मैं सभी के साथ ..सभी के लिए जीने का सपना देखता हूँ
मैं ईमानदारी से इस बहुसंख्यक दुनिया में किसी तानाशाह का
अकेले ईश्वर की तरह जीना पसंद नहीं करता
मैं एक सामाजिक विनम्र और जिम्मेदार ईश्वर चाहता हूँ
ईश्वर जो मानव -जाति पर शासन करता हुआ नहीं
बल्कि मनुष्यता को भीतर से जीता हुआ हो .....

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

पहल की पुनर्नवा पहल एवं नई व्यवस्था का विमर्श


पहल की पुनर्नवा पहल एवं नई व्यवस्था का विमर्श

                                                                                 रामप्रकाश कुशवाहा


पहल का पुनर्नवा अंक मेरे हाथों में है -अंक ९१ .अद्यतन पीढ़ी की  सृजनशीलता और सृजन की अद्यतन्शीलता को समर्पित. अपने नाम के ही अनुरूप पहल लम्बे अरसे से नए साहित्यकारों के लिए लाँचपैड रही है .उसके पिछले अंकों में भी हिन्दी-क्षेत्र की एक व्यापक मानव-जाति के आर्थिक व्यव्हार को समझने और समझाने की दृष्टि से मार्क्स का विश्लेषण आधुनिक वैचारिकी को आधारिक सूत्र और दृष्टिया उपलब्ध करता है .क्योंकि संवेदनात्मक द्रष्टि से मार्क्सवाद के उद्देश्य की नैतिक पवित्रता असंदिग्ध है ;इस लिए उसके दार्शनिक पक्षों को भी निर्विवाद और अपरिवर्तनीय मन लिया जाता है .उसमे कुछ भी निरर्थक और अनावश्यक खोजना
वर्ग-शत्रु का हमला भी हो सकता है .क्योंकि भारत में वह पश्चिम की पवित्र धरोहर है ,इसलिए भारतियों को यह अधिक स्वीकार्य होगा कि स्वयं पश्चिम ही उसमे परिवर्तन संशोधन करे .वैसे भी भारतीय मेधा संरक्षण वादी है .वह नई पहल में कम ही विश्वास करती है . मार्क्सवाद की दार्शनिकी में भी बहुत से परम्परा से अर्जित तत्व हैं -उनमें से एक हीगल से लिया गया द्वंद्ववाद भी है .यह विकास की सामाजिक प्रक्रियाओं का विचलित प्रत्ययीकरण करता है .रुढ़िवादी और विकासवादी शक्तियों के द्वंद्व को मानवीय और समाजशास्त्रीय रूप में भी समझने और समझाने की जरुरत है .वर्ग -स्वार्थ के मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण मार्क्स का मानव-जाति के इतिहास में आर्थिक प्रवृत्तियों और व्यव्हार का सूत्रीकरण प्रायः ठीक और प्रामाणिक है .लेकिन मेरा मानना है कि मनुष्य की ज्ञानात्मक प्रगतिशीलता से अधिक उसकी विकास विरोधी जड़ताओं और आदिमताओं को भी समझाने की जरुरत है .ऐसे में तो और भी जब जीनेटिक आधार वाली जड़ताएँ होने की वैज्ञानिक संभावनाएं बढ़ गई हैं .इसके बावजूद मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण सन्देश मानवीय व्यवस्था को यथास्थितिवादी स्वीकार की सामूहिक मानसिकता से बाहर निकालकर उसे प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की सृजनशीलता के दायरे में लाना है .प्राचीन धार्मिकों की तरह हमें ईश्वर और स्वर्ग का सृजन करने के स्थान पर वर्तमान मानवीय व्यवस्था को और मानवीय और निर्दोष बनाने पर विचार करना चाहिए .और इसके लिए मार्क्सवाद से भी अधिक महत्वपूर्ण है मार्क्स के बाद के मानवीय विकास की जटिलताओं को समझना .वर्तमान विश्व राजनीतिक नेतृत्व से आर्थिक नेतृत्व की ओर स्थानांतरित हो गया है .राजनीतिक संस्थाओं की तुलना में आर्थिक संस्थाएं मानव -सभ्यता की संरचनाओं को अधिक तीव्रता से प्रभावित कर रही हैं .विश्व प्रायः आर्थिक सक्रियताओं द्वारा अधिक रूपान्तरित हो रहा है .दूसरे शब्दों में विश्व राष्ट्रों से अधिक कंपनियों के उत्पादों से अधिक रूपान्तरित हो रहा है .क्योंकि यांत्रिक उत्पाद श्रम की प्रकृति को ही बदल दे रहे है 'इसलिए वर्ग-संरचना और उसकी मात्रात्मक उपस्थिति का स्वरूप भी बदला है .आज स्थानीय आर्थिक शोषण से अधिक प्रभावी अन्तर-राष्ट्रीय शोषण हो गया है .विषमता व्यक्ति और वर्ग स्तरीय ही नहीं बल्कि राष्ट्र स्तरीय और कंपनी स्तरीय भी है .बहुराष्ट्रीय होने के साथ-साथ कंपनियों का संगठनात्मक और जनसंख्यात्मक ढांचा विस्तृत हुआ और बढ़ा है .इस विषमता को भी मार्क्सवादी चिंतन के दायरे में लाना होगा .क्योंकि मार्क्सवाद साम्यवाद का पर्याय बन चूका है गोपाल प्रधान का लेख "इक्कीसवी सदी में मार्क्सवाद "सात उपशीर्षकों के अंतर्गत  मार्क्सवादी विचारधारा की अद्यतन प्रासंगिकता का विवरण ,स्वयं उनके ही शब्दों में कहें तो सोवियत संघ के विघटन से लेकर वर्तमान समय तक मार्क्सवाद के उत्थान-पतन का ब्यौरा दर्ज है .पहला उपशीर्षक लिओनार्ड वुल्फ की किताब "हावी रीड मार्क्स टुडे" के विचारों का पता देती है .
             इसी अंक में प्रकाशित शिवप्रसाद जोशी और सचिन गौड़ के बीच ई-मेल से हुए  अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन पर केन्द्रित संवाद -"सुविधा-दुविधा के आन्दोलन और मध्य-वर्ग " में मध्य-वर्ग के प्रति परम्परित मार्क्सवादी विचारधारा का दृष्टिकोण निवेश नकारात्मक ही है .पूंजीवादी व्यवस्था -प्रारूप के संरक्षण और परिष्कार की जिम्मेदारी प्रायः मध्यवर्ग पर ही है .सर्वहारा आधारित क्रान्ति की अवधारणा के कारण वामपन्थी क्रान्ति की दृष्टि से मध्यवर्ग की उपयोगिता एवं भूमिका नगण्य ही है .ज्ञानार्जन और बुद्धि -व्यवसाय में सबसे अधिक समय और जीवन का निवेश मध्य-वर्ग ही करता है .बौद्धिक विकास में लगे रहने के कारण वह बहुत ही कम अन्तराल के बाध्यकारी नेतृत्व का शिकार होता है .दूसरे शब्दों में कहें तो वह बौद्धिक श्रेष्ठता के कारण नहीं बल्कि आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक कारणों से इतिहास में बाध्यकारी नेतृत्व को     स्वीकार करता है .सर्वाधिक प्रतिरोध और सजगता के कारण उसकी भूमिका को लेकर सबसे अधिक भर्तस्ना-पत्र लिखे गए हैं .उसके आत्म-विश्वास को तोड़ने एवं उसे विचलित करनें की कोशिशें हुई हैं .इसमें संदेह नहीं कि औसत,सन्दिग्ध एवं अस्पष्ट समझ की वह अनदेखी करता है .
                     मध्य -वर्ग की अवधारणा  का विकास पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों के विचारकों द्वारा प्रति-क्रान्ति एवं क्रांतिविरोध और अवरोध को समझाने के लिए किया गया था .मध्य-वर्ग के वर्ग-चरित्र और उसके रुझानों ,प्रवृत्तियों तथा मनोविज्ञान को समझाने की दिशा में मार्क्सवादी खेमा भी रूढ़ मुहावरों ,सरलीकरण और विचारधारात्मक सम्भाव्यवाद से आगे नहीं जा पाया है .स्वयं मार्क्सवादी विचारधारा ,सर्वहारा और पूंजीपति वर्ग ,उच्च और निम्न वर्ग की परिभाषिकी में ही विस्तार से सोचती है .सर्वहारा क्रान्ति की अवधारणा के कारण उसकी थीसिस और एजेंडे में मध्य-वर्ग की अधिक सक्रिय भूमिका नहीं थी .मार्क्स के लिए मध्यवर्ग क्रन्तिकारी असंतोष की दृष्टि से शून्य और अनुपयोगी था .वह बहुत कुछ दर्शक और तटस्थ जनसँख्या का हिस्सा था ,जो संगठित क्रन्तिकारी शक्तियों का न तो समर्थन कर सकता था और न ही सक्रिय विरोध .
               मध्यवर्ग को प्रायः उपभोक्ता वर्ग या समुदाय में देखने का नजरिया भी ठीक नहीं है .क्योंकि वह बौद्धिक विकास और सृजनशीलता के प्रति समर्पित केन्द्रीय समुदाय है .चेतन एवं प्रशिक्षित होने से उसमे सजग प्रतिरोध की क्षमता है .नेतृत्वकारी शक्तियों द्वारा उनका सहज अनुकूलन संभव नहीं है .इसी प्रतिरोध के कारण ही वे नेतृत्व के अभिलाषी महत्वकांक्षी बुद्धिजीवियों के सहज अनुगामी नहीं बन सकते .अरुंधती राय की मध्य वर्ग पर समस्त थीसिस उनकी इसी कुंठा और क्षोभ पर आधारित है .
             मध्य वर्ग की अब तक की भूमिका को देखते हुए जनवादी क्रान्ति के बाद भी नईक्रन्तिकारी व्यवस्था के संरक्षण में मध्यवर्ग  की भूमिका के महत्वपूर्ण होने की संभावना देखी जा सकती है .उसका सृजनात्मक असंतोष व्यवस्था के परिष्करण ,परिवर्धन और गतिशीलता को बनाए रख सकता है .
                  दोनों ही विमर्शकारों नें अन्ना हजारे के गाँधीवादी शैली के आंदोलनात्मक नेतृत्व या फिर कांग्रेसी राष्ट्रवादी आन्दोलनों के जनपक्ष के रूप में देखने की कोशिश नहीं की है . यहाँ  वाम पंथी  लाइन की प्रतिबद्धता से उपजी   दूसरे शब्दों में कहें तो उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था से निष्क्रमण और विद्रोह का कोई ठोस मनोवैज्ञानिक आर्थिक आधार नहीं बनता .इसलिए भी कि आदर्श साम्यवादी व्यवस्था औद्योगिक पूंजीवाद की प्रतिक्रिया में आनी थी .लेनिन ने अवश्य ही सर्वहारा  सर्वहारा वर्ग के पक्ष में उसके नैतिक समर्थन और वर्गांतरण की परिकल्पना दी .
                    समाजशास्त्रीय और आर्थिक विकास की दृष्टि से देखें तो मध्यवर्ग एक यात्रा-शील स्थिति है .पूंजीवादी व्यवस्था में वैयक्तिक आर्थिक मुक्ति निम्न-वर्ग से निकलकर उच्च -वर्ग में शामिल हो जाने से ही सम्भव है .पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक निम्न वर्ग में जन्मे व्यक्ति के लिए निम्न वर्ग से बाहर निकल कर उच्च वर्ग में शामिल हो जाना ही चरम पुरुषार्थ है .उच्च वर्ग में शामिल होने की आकांक्षा के साथ मध्य वर्ग का हर व्यक्ति वयक्तिक आर्थिक मुक्ति के एक सपने को जी रहा होता है .यह सपना पूंजीवादी व्यवस्था की सुरक्षा सम्बन्धी संरचनात्मक आश्वासनहीनता से पैदा होता है .पूंजीवादी व्यवस्था हर व्यक्ति को आर्थिक असुरक्षा की परिस्थितियों में डाल देती है .इस मनोविज्ञान के कारण एक अन्तहीनहोड़ का जन्म होता है .अस्तित्व की एक निर्मम प्रतिस्पर्धा पूंजीवाद को अमानवीय बनाती है .इसके विकल्प  में साम्यवाद
पूंजी के सामूहिक और साझे निर्माण और उपभोग की परिकल्पना देता है .देखा जय तो सामूहिक सृजनशीलता के आवाहन के कारण साम्यवाद को सामूहिक पूंजीवाद और पूंजीवाद को वैयक्तिक पूंजीवाद कहा जाना चाहिए .इस प्रकार साम्यवाद पूंजीवादी व्यवस्था का स्वर्ग है तो वैयक्तिक पूंजीवाद नरक .फिर प्रश्न उठता है कि भारतीय मध्यवर्ग अपने अधिकांश में साम्यवादी हिंसक क्रान्ति को अराजकता पूर्ण भयावह दुष्कल्पना के रूप में क्यों देखता है ? इसका कारण यही है  कि
         मार्क्स द्वारा प्रतिपादित साम्यवादी क्रान्ति की परिकल्पना में यहूदी धर्म की सांस्कृतिक असहिष्णुता और उनकी धार्मिक कथाओं में मिलने वाली बर्बर शुद्धता और उच्छेदवादी नरसंहारों का सांस्कृतिक अचेतन छिपा हुआ है .ऐसे में क्रांतिकारी बनना नायकत्व की मध्ययुगीन मानसिकता और परिकल्पना की भी विरासत है .अन्यथा जब सामूहिक पूंजीवादी सृजनशीलता तक ही जन-मानस को ले जाने की बात है तो ऐसे साम्यवाद को अहिंसक साम्यवाद के रूप में भी सामूहिक आर्थिक ,सामाजिक,राजनीतिक लक्ष्य और महत्वाकांक्षा के रूप में प्रचारित किया जा सकता है .इसके लिए सामूहिक पूंजी की सृजनशीलता को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था-संरचनाएं और मानसिकता विकसित करनी होंगी .अपने हिंसक सांस्कृतिक अचेतन के कारण अठारहवी शताब्दी का परंपरागत मार्क्सवाद एक प्रतिक्रियाजीवी तनावपूर्ण असभ्य मानवीय समाज की रचना ही करेगा .  इस लिए मार्क्स के प्रति उचित श्रद्धांजलि तो यही होगी की साम्यवाद के भावी प्रारूप की खोज नए सिरे से सामूहिक पूंजीवाद की परिकल्पना के रूप में आधिक सभ्य ,शिष्ट ,स्वाभाविक और अहिंसक तरीके से किया जाय .संस्थागत या राजनीतिक क्रान्ति का एक पूंजीवादी तरीका यह भी हो सकता है कि सरकार हत्या करने की जगह क्रमशः या चरण बद्ध तरीके से मुद्रा या मुवावजा देकर सारी जमीने स्वयं खरीदती जाए  .इसके बाद वह जन-जीवन के पुनर्नियोजन के लिए स्वतन्त्र होती जाएगी .मानव जाति के सुरक्षित अस्तित्व के लिए यह कार्य बुरा नहीं है .ऐसा न होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हो रहा है कि भवन व्यक्ति की आवश्यकता और संख्या के अनुसार,जरुरत के हिसाब से नहीं बनाए जा रहे हैं ,बल्कि पूंजी-प्रदर्शन और प्रतिष्ठा के अनुसार बनाए जा रहे है .इस कारण से बढ़ती जनसँख्या के विपरीत कृषि-योग्य भूमि निरन्तर ही कम होती जा रही है .अनियन्त्रित-अनियोजित स्थापत्य में शहरों का विकास आधुनिक युग की सबसे गम्भीर समस्या है ,जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है .
         अपनी इन्हीं दृष्टियों  के कारण समकालीन प्रगतिशील विचारक प्रायः मुझे शैक्षणिक या ज्ञानात्मक अतीतीकरण के शिकार लगते हैं .यह एक परिकल्पनात्मक पिछड़ापन है ,जिसकी ओर स्वयं को प्रगतिशील होने का श्रेष्ठताबोध जीने वाले बुद्धिजीवियों का ध्यान ही नहीं जाता .उन्हें क्रन्तिकारी नायकत्व के मध्य-युगीन माडलों और उसकी महत्वकांक्षी स्वप्न्दर्शिता से बाहर निकालने में अभी वक्त लगेगा.ऐसी अभिव्यक्ति पहल ९१ के शिवप्रसाद जोशी के संवाद जो सचिन गौड़ के साथ है-'सुविधा दुविधा के आन्दोलन और मध्य-वर्ग '  शीर्षक संवाद के निम्न स्थल में देखी जा सकती है -"क्योंकि वो वक्त शायद कुछ और ही होता है .वो तो इतिहास की करवट है ,हम और आप तो बस लुढ़कते ,बढ़ते,लपकते चले जाएँगे .या वहीँ ठिठके रह जाएँगे .उस विचार को आप कैसे गिरा देंगे.और ये कोई अमूर्तता नहीं है .क्रान्ति हमसे नहीं होगी तो वो ऐसा नहीं होगा कि होगी ही नहीं.वो किसी और से होगी .पर होगी जरुर ." श्री जोशी के इस सपने में क्रान्ति का हीरोइक इज्म भी साफ-साफ देखा जा सकता है.
           

अल्पना मिश्र की कहानी "वक्त के बेसमेंट और खिलाता हुआ पीला गुलाब " का आत्मकथ्यात्मक शिल्प और कथ्य के अतिरिक्त यथार्थ के प्रति अपने विशिष्ट कथात्मक व्यवहार एवं दृष्टिकोण के कारण ध्यान आकर्षित करता है .वाराणसी का आंचलिक एवं ब्राह्मण वर्णीय जातीय यथार्थ ,परम्परावादी सोच के कारण आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा जीवन स्तर के साथ मुक्त बाजार-व्यवस्था में जीवनयापन का संघर्ष इस कहानी को समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है .नई मुक्त बाजार-व्यवस्था में सवर्ण मानसिकता वाले चरित्रों की अपनी अलग अयोग्यताएँ इस कहानी को जाति -विमर्श की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती हैं .यह कहानी दलित वर्ग से अलग जातीय-सांस्कृतिक यथार्थ का आर्थिक दृष्टि से प्रतिपक्ष प्रस्तुत करतीहै .
हिन्दी में पत्रकारिता ,सत्ता और बाजार पर वर्चस्व के कारण बहुत से महत्वपूर्ण चिंतकों के कार्यों का समकालीन पाठकीय चेतना  में सही निवेश नहीं हो पाया है .प्रतिष्ठित होने के बावजूद डॉo सुरेन्द्र चौधरी का विस्तृत लेखन अभी भी हिन्दी जगत के सामने नहीं जा पाया है .सुरेन्द्र चौधरी की रचनावली सम्पादित करने वाले उदय शंकर का आलेख 'समकालीनता का आहत नैरन्तर्य '
सुरेन्द्र चौधरी के आलोचक वैशिष्ट्य की ऐतिहासिक एवं वैचारिक पृष्ठभूमि की पड़ताल प्रस्तुत करता है .सामाजिक -सांस्कृतिक अंतर्लयन  की प्रक्रिया का अध्ययन  सिर्फ समकालीन ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक यथार्थ की प्रक्रियाओं की भी पड़ताल डॉसुरेन्द्र चौधरी के चिंतन और लेखन-कर्म को महत्वपूर्ण बनाती है .उनके साहित्य के समर्पित अध्ययन से उदय शंकर एक आधिकारिक विशेषज्ञ के रूप में उभरे हैं .उदय शंकर की सूचना के अनुसार गया और मगध का ऐतिहासिक अध्ययन 'मिथक और ब्राह्मणवाद ' ,कहानी की समकालीनता 'तथा 'भारतीय कृषक समुदाय की प्रागैतिहासिक पृष्ठभूमि 'जैसी अप्रकाशित पांडुलिपियाँ डॉo चौधरी को समाजशास्त्रीय महत्व के एक जमीनी विचारक के रूप में भी सामने लती हैं .उनके अनुसार समकालीन यथार्थ की पूरकता और अंतर्लयन की प्रक्रियाएं उनकी कथा-आलोचना को समझाने के लिए भी महत्वपूर्ण सूत्र हैं .
            समकालीन भारतीय यथार्थ के सम्बन्ध में पूरकता और अंतर्लयन सम्बन्धी डॉo चौधरी की अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए उदय शंकर उनकी निम्न लिखित पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं -
"मेरी दृष्टि में समकालीन यथार्थवाद का अर्थ दो रूपों में अपने को प्रकट करता है ;एक जनता और व्यवस्था के नये अंतर्विरोध के रूप में और दूसरा ,जनता के बीच के अंतर्विरोध के रूप में.ये दोनों ही प्रकार के नए अंतर्विरोध हमारे समाज में आजादी के बाद प्रकट होते हुए एक नया सामाजिक अस्तित्व धारण कर लेते हैं .अतः इन अंतर्विरोधों के सन्दर्भ में ही हम आजादी के बाद की सामाजिक वास्तविकता की धारणा को स्पष्ट कर सकते हैं."(पृo २५९)  उदय शंकर के अनुसार सुरेन्द्र चौधरी के यहाँ 'समकालीनताके विभिन्न स्वरों को पकड़ने पर जोर है और उन सभी स्वरों को समकालीन यथार्थ में अंतर्लायित होता हुआ देखना चाहते हैं .डॉनम्वर४ सिंह की कहानी-आलोचना इस अंतर्लयन को बाधित कराती है 'समकालीन यथार्थ को आहात कराती है .(पृo २६२ )
भारतीय यथार्थ के सन्दर्भ में उनका यह इतिहास-बोध भी महत्वपूर्ण है कि'आजादी जैसे तात्कालिक लक्ष्य के कारण स्थगित अंतर्विरोधों को आजादी नें पनपने की एक जमीन दी .इसने निरंतरता को बाधित किया .पूर्ववर्ती पीढ़ी के ऊपर जो हमला संभव हुआ ,वह भी इसी आहत नैरन्तर्य के कारण संभव हुआ .रचना और परिस्थिति की भी संगति बाधित होती है .अंतर्विरोध स्वीकार का भी था और नकार का भी .ये सारे अंतर्विरोध अगर किसी एक लेखक में मिलते हैं तो वे मुक्तिबोध हैं .(पृo २६४ )
               मौलिक और प्रासंगिक चिंतन की दृष्टि से वैभव सिंह का वैचारिक निबंध "लेखक : नैतिकता और स्वप्न" स्थाई महत्व की साहित्यिक उपलब्धि है .यह लेख सृजन की वैयक्तिक आकांक्षा और आवश्यकता तथा उसकी सामाजिक नैतिक प्रस्थिति के द्वंद्वात्मक अन्तर्सम्बन्धों की दार्शनिकी प्रस्तुत करने का प्रयास करती है . महत्वपूर्ण यह है की वैभव नें लेखक के परंपरागत कर्त्तव्य और नैतिकता से बाहर भी उसकी भूमिका और संभावना को तलाशने का प्रयास किया है .कुछ उद्धरण 'आलोचना में उनके आधुनिक हस्तक्षेप 'की पुष्टि करने में सहायक हो सकते हैं -'लिखना वह कौशल है जिसमें कल्पनाओं का विस्तार होता है .एक कल्पनाशील प्राणी ही लेखक या ज्ञान की खोज में भटकने वाला दार्शनिक -वैज्ञानिक बन सकता है .बाज वक्त कुछ लेखक केवल विद्वतापूर्ण बैटन और तर्कों के बीच रहना चाहते हैं और कल्पनाशीलता के जोखिम से खुद को अलग कर लेते हैं .वे ज्ञान की बातें करते हैं जो जरुरी होती है पर वे सृजनशीलता की यातनाओं से बचाते हैं .इसलिए भी क्योंकि कल्पनाओं की दुनिया नैतिकता और अनैतिकता के दायरों से बाहर जाकर ही संभव होती है ."(पृo २६८ )"प्रायः कम अच्छे लोग अच्छा लेखन करते हैं और अधिक अच्छे लोग ख़राब लेखन .मीरा हो या मंटो किसी के पास इसका प्रमाण नहीं था कि वे अपने समय के शरीफ और अच्छे नागरिक हैं .शराफत के बाड़ों को लांघकर ,लोकलाज त्यागकर ही उन्होंने साहित्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी या सही निर्वाह भी किया है .कथित नागरिक समाज नें मीरा को भी त्याग दिया था और अक्सर ही मंटों को भी ."(पृo २६९-२७० )
        इसमें संदेह नहीं कि नेतृत्व कारी समर्थ मस्तिष्कों का जोखिमपूर्ण आत्मनिर्णय ही एक नए कल्पनाशील मानवीय भविष्य को सृजित करता आया है .इतिहास में अनेक बार यह निर्णय अकेले और कई बार विरोध के बावजूद लिया गया है .यद्यपि वैभव इस सवाल में निहित सामाजिकता और असामाजिकता की भूमिका को विस्तार या ठीक से समझा नहीं पाएं हैं ,न ही अप्रचलित-अविज्ञापित नए सही विवेक पर लोक-प्रिय विवेक के हिंसक बाध्यकारी  सामूहिक इतिहास के निर्माता दबाव को ही समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य और शब्दावली में व्याख्यायित कर पाए है-संभवतः लेख की सीमा या लेखकीय क्षण की साहित्यिक चित्ति के कारण ,लेकिन इस विषय के समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की केन्द्रीय और प्रामाणिक समझ उनके पास है -"आज का लेखक धर्म या सामंत के इशारों या उसके आश्रय में जीने की बाध्यता से मुक्त है और उसने फ्रेंच क्रान्ति ,औद्योगिक क्रान्ति ,रुसी क्रान्ति तथा आधुनिक भारतीय समाज-निर्माण की प्रक्रिया से उपजे परिवर्तनों की परम्परा को आत्मसात किया और अपनी बदली ही भूमिका का अनुभव भी किया है .धर्म या मनोरंजन तक लेखन को सीमित रखने की विवशता उसके आगे नहीं है पर इसी नें उसके दायित्व को बाधा भी दिया.इसीलिए नैतिकता और अपने लेखन की सामाजिक भूमिका के बारे में सचेत होना ऐतिहासिक रूप से तर्कसंगत और जरुरी भी लगता है .लेकिन इसी आधुनिकता नें उसे पहले से अधिक अंतर्द्वंद्व ,व्यक्तित्व-विभाजन और अवसाद भी दिए है .( पृo २७१ )'उसकी अवस्था उस मोमबत्ती के लौ की तरह रही है ,जिसे अंधकार से ही नहीं बल्कि अंधकार को बढ़ने वाली रोशनियों से भी अकेले ही लड़ना है .यानी लेखक अगर अपना खास विचार और नैतिकता को चुन लें तो भी उसके साथ उसका अकेलापन बढ़ जाता है .भाषा के भीतर की रहस्यमय और अपेक्षाकृत जटिल दुनिया में उसके प्रवेश ने उसे अर्थों के नए विरत विश्व के आगे खड़ा कर दिया जहाँ उसकी इन्द्रियां,बोध और भावनाएं किन्हीं तुफानो का सामना करने लगती हैं और उसकी आवेगमयता उसके स्नायविक तंत्र की परीक्षाएं लेने लगती हैं .(व्ही २७१ ) वैभव नें वर्तमान अर्थ-केन्द्रित विश्व में राजनीतिक तन्त्र की घटती भूमिका को उचित ही रेखांकित किया है -"अब हल यह है कि लेखक जिस राजनीति को अपने लिए मूल्य-स्रोत के रूप में देखता था ,वह विश्व में हाशिए पर जाने लगी और लेखक ऐसी अंतर्विरोधी दशा में पहुँच गया जहाँ लगभग सौ साल पुराने प्रश्न उसके सामने थे कि-'किधर जाएँ .'(पृ० २७३ ) वैभव पूर्ण स्वतंत्रता के सैद्धांतिक अनौचित्य को भी रेखांकित करते हैं -"वह स्वतन्त्र होकर दुनिया को देखना चाहता है ,उसकी संरचनाओं को समझना चाहता है .पूर्ण स्वतंत्रता को हासिल कर नीत्शे के सुपरमैन की तरह बन जाना भी कई लेखकों का कम्य रहा है .पर संभवतः पूर्ण स्वतंत्रता जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता है पर उसी को लेकर सबसे अधिक आकर्षण मन में मौजूद रहता है .उसकी निरन्तर खोज अपने को लेकर भी है और अपने जीवन-मूल्यों  को भी .(पृo २७४)
        चन्दन पांडे की कहानी 'लक्ष्य शतक का नारा ' भ्रष्ट -यथार्थ पर आधारित डायरी (मूलतः बही)  शैली में लिखी गयी व्यंग्य रचना है .थाने पर होने वाली अवैध वसूली सत्ता के दुरूपयोग से ऊपरी आमदनी के विविध प्रकार ,मंत्रियों के कदाचार ,नियुक्तियों में धांधली  और घूस आदि के प्रकरणों का कथांकन किया है .

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

राजनीतिनामा

भारत जैसे देश में एक स्वस्थ राजनीतिक तंत्र  लिए पेशेवर राजनीति का उदय होना जरुरी है। सबसे अच्छा दिन वह होगा जब मतदाता के पास एक राजनीतिक उपभोक्ता का विवेक होगा।  वह राजनेताओं को एक उपभोक्ता  तरह ही डरा सकेगा कि  सही तो मैं किसी और से सेवाएं  लूंगा। यद्यपि आज भी देश में कई राजनीतिक दल हैं। पहली दृष्टि  में भ्रम  होता है कि मतदाता स्वतन्त्र है। लेकिन समस्या यह है कि उसकी यह स्वतंत्रता सापेक्ष है। वह इस   दृष्टि से अविवेकी एवं अपरिपक्व है कि उसका विवेक सामाजिक यानि जातीय आधारों पर सामूहिक निर्णयशीलता की शिकार है। उसकी निष्ठा बहुत कुछ पूर्वनिर्धारित है। उसकी प्रतिबद्धता एवं जड़ता तय है।

                 भारतीय मतदाताओं की इस लाचारी को कुछ इस प्रकार समझना होगा। सभी दाल एवं उसके संचालक नेतागण पहले से ही जानते है कि किस क्षेत्र में किस जाति के मतदाताओं की बहुलता है। दलों की विचारधारा कुछ भी हो वे प्रत्याशियों का चयन अतिरिक्त योग्यता की तरह जातीय आधार पर ही करती हैं। सबसे पहले प्रत्याशी चयन करने वाला दल दूसरे दलों को फिर बचे  हुए जातीय समीकरणों के आधार पर प्रत्याशी चयन करने की चुनौती देता है। समीकरण कुछ इस तरह के बनाए जाते हैं कि पहले घोषित प्रत्याशी की जाति से कम जनसंख्या वाली जाति का प्रत्याशी न चुना जाय।     

शनिवार, 31 जनवरी 2015

डॉo मंजुलता लाल :एक काव्य-चित्र

प्राचार्या श्रीमती डॉo मंजुलता लाल : एक काव्य –चित्र

(सेवानिवृत्ति के अवसर पर अपनी प्राचार्या श्रीमती डॉo मंजू लता लाल को एक आत्मीय श्रद्धा -सुमन )

क्योंकि आपने अपनी यात्रा का आरम्भ
रजनी की मोह – निशा में किया था
और देखे थे दिवा के सुनहरे स्वप्न ...
संभवतः इसीलिए जब आप स्वयं सत्ता में आयी
आपने सत्ता को शासन का नहीं
अनुशासन का पर्याय समझा ---    

आपने रजनी सिंह की बंधुआ मजदूर वाली
हिंसक शैली को स्वीकार नहीं किया
बल्कि उन्हें किसी स्नेहिल अभिभावक की तरह
एक परिवार बनाकर साथ-साथ चलना और करना सिखाया
कुछ इसतरह की जैसे आपने
भांति –भांति के यात्रियों से भरे सराय रूपी महाविद्यालय को
अपनी आत्मीयता से घर में बदलना सिखाया ....

इस तरह आपने
मुसाफिरखाना ,ओबरा,चंदौली और गाजीपुर में भी
अत्यंत शानदार और वृहत्तर घर बनाए
और अब वाराणसी के नव-निर्मित
नव्यतम एवं भव्यतम घर में
जाने की लिए
हमसे विदा हो रही हैं ....

आपको कंटीले पौधों का भी
सार्थक उपयोग करना आता है
आपने उनका सुरक्षा के लिए
मजबूत बाड़ बनाने में इश्तेमाल किया ...

आप सबसे पहले अपने कर्त्तव्य –आसन पर
विराजमान होती रहीं
ताकि विलम्ब से आने वालों को शर्मिन्दगी की सजा देकर
या फिर क्षमा के अहसानों के बोध से सुधार जा सके ...

जब आप स्वयं उपस्थित नहीं रह्ती थीं
तब भी आपके महाविद्यालय में बने रहने की अनुभूति बनी रहती थी
आपके द्वारा प्रतिनियुक्त
आँख,कान और दिमाग
पूरी ईमानदारी और मुस्तैदी से गश्त लगते रहते थे
और प्राध्यापकगण भी पूर्ण मनोयोग से पढ़ाते  रहते थे। 

मुझे नहीं मालूम कि
आपने जंगली और बिगडैल घोड़ों को
पालतू बनाकर उन्हें सरपट दौड़ाने की कला कब और कहाँ से सीखी
आपके द्वारा सींचा गया उपवन
पुनः एक नए बसन्त के स्वागत की तैयारी कर रहा है

आप जैसे एक अभिशापित परिसर को
सिर्फ शाप-मुक्त करने आयीं थीं
आपकी नयी यात्रा के बाद भी यह महाविद्यालय
एक परिवार की तरह जीने के
स्वस्थ संस्कार और आदतों को जीता हुआ
आपको श्रद्धा-सुमन प्रेषित करता रहेगा ...
जो महाविद्यालय  कभी सिर्फ अपने रजनी-काल के लिए
जाना जाता था
वह अब आपका भी कीर्ति –स्थल और स्मारक है .



राम प्रकाश कुशवाहा

३१.०१.२०१५ 

सोमवार, 26 जनवरी 2015

लिंग -भेद कि अभियांत्रिकी

मानव-जाति इस आधार पर  दुनिया का सबसे कामुक प्राणी है .,कि मनुष्य को छोड़ कर  दूसरा कोई भी प्राणी काम-चिंतन  नहीं करत्त .पशु-जगत के काम-व्यव्हार से मानव-जगत के काम-व्यव्हार की तुलना करने पर जो अन्तर सामने आता है उसमें मनुष्य द्वारा ज्ञान,बुद्धि और स्मृति के स्तर पर किया जाने वाला कामुक व्यव्हार ही प्रमुख है .मनुष्य ने कामुकता को सभ्यतागत और संस्थागत विस्तार दिया है .विवाह-संस्था से लेकर उसके सामाजिक व्यव्हार में लिंग-भेद की चेतना की बहुआयामी अभिव्यक्तियाँ  उसके काम-व्यव्हार को विशेष बनती हैं .क्योंकि मनुष्य में ज्ञान की सारीअभियांत्रिकी उसके भाषा-तंत्र पर ही आधारित है ,इसलिए स्वाभाविक है कि उसके कामुक बुद्धि का भी प्रमुख आधार भाषा-आधारित ज्ञान-तंत्र ही है .हर भाषा में कामोत्तेजक श्लील-अश्लील शब्द मिलते हैं .संवेदनात्मक साहचर्य के कारण ये शब्द पुरुष और स्त्री में विपरीत लिंग के साथी की प्रत्यक्ष दैहिक उपस्थिति के बिना भी उसकी कल्पना द्वारा उसके मन-मस्तिष्क को संवेदित करने में समर्थ है .संवेदनात्मक साह्चर्य के कारण ये शब्द उसकी अन्तःस्रावी ग्रंथियों को भी उत्तेजित करने में समर्थ है. क्योंकि अन्तःस्रावी ग्रंथियों का स्विच मनोरासायनों में है और यह कोई छिपी बात नहीं कि मस्तिष्क अपने सबसे निरीह अवस्था में काम-चिंतन के क्षणों में ही होता है .मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र का एक बड़ा हिस्सा कामजनित तनावों और उत्तेजनात्मक जैविक व्यस्तताओं को ही समझाने और संभालने में लग जाता है .वस्त्र,व्यक्तित्व  से लेकर भाषा,मुहावरों और गालियों तक मनुष्य के काम-तन्त्र का ज्ञानात्मक विस्तार है .पुरुष और स्त्री व्यक्तित्व कि अलग अभियांत्रिकी रूचि,वेशभूषा से लेकर खेल तक देखी जा सकती है .इस लिए स्त्री-पुरुष के समानतावादी व्यव्हार पर आधारित समाज की  रचना के लिए इस सारे पर्यावरण को बदलना होगा .
               मनुष्य के लैंगिक अपराधों को देखते हुए आश्चर्य होता है कि पशु-जगत अपने विपरीत लिंगी साथी के प्रति काम-व्यव्हार में कितना शिष्ट और सभ्य है .वह कभी लैंगिक दुर्व्यवहार या बलात्कार नहीं करता है .अपने समागम में भी वह जैविक उपकारक कि भूमिका में होता है .ऐसा वह प्रकृति प्रदत्त सहज -वृत्ति के द्वारा करता है .वह तलाश करता है .जो कुछ भी करता है सहमति के साथ .मनुष्य का लैंगिक व्यव्हार उसकी जैविक प्रेरणा से अधिक उसके बोद्धिक-मानसिक पर्यावरण से अधिक प्रभावित होता है .उसका सांस्कृतिक पर्यावरण भी उसके काम-व्यवहार को प्रभावित करता है .पहले भारतीय गांवों में अपने गाँव की युवतियों को बहन मानने की सांस्कृतिक व्यवस्था थी .युवतियां बहन-भाई के रिश्ते के विस्तार के कारण सुरक्षित रहती थीं .कुछ धार्मिक अवधारणाए भी स्त्री शरीर को देवी की  प्रतिनिधि के रूप में देखने कि दृष्टि देती थीं..यह प्रभाव फ़िल्मी नायक-नायिकाओं के अश्लील प्रभाव से अलग एक पवित्र भाव-लोक रचता था .मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे प्रत्यक्षीकरण की सांस्कृतिक अभियांत्रिकी कहा जा सकता है .यह पद्धति स्त्री शरीर को देखने की दृष्टि और मानसिक व्याख्या बदलती है .आधुनिक भौतिकवाद और बाजारवाद नें उससे यह दृष्टि छीनी है .वर्जनाओं की पूरी  सांस्कृतिक अभियांत्रिकी निरस्त कर दी गयी है .यह जरुरी नहीं है कि संस्कृति को केवल धार्मिकता के अंतर्गत ही देखा जाय .पारिवारिक रिश्तों को विस्तार देते हुए भीं समाज की बेहतर संस्कृति रची जा सकती है .
            इस सम्बन्ध में यह भी देखना होगा कि अधिकांश यौन-नैतिकता का निर्माण सामन्ती युग में ही हुआ है .उस युग की मान्यताओं में यौन-शुचिता और शुद्धता कि मान्यताएं भी हैं .एक समय था जब भोजन के बर्तन छू जाने मात्र से धर्म बदल जाते थे .यौन शुचिता कि अवधारणा भी उसी दौर की और उनमें से एक है .स्त्री को सिर्फ देह के रूप में देखने से उसके व्यक्तित्व का सही मूल्याङ्कन नहीं हो सकता .समाज को यह मानना सीखना होगा कि अपने साथ हुए यौन -अपराध कि शिकार होने के बावजूद भी कोई स्त्री अपनी इच्छाओं,मन और भावनाओं से उसमे शामिल नहीं है .एक लुटी हुई स्त्री योन-अपराधी के प्रति अपनी घृणा में भी बची हुई हो सकती है .शिकार होने के बाद भी ,यदि वह किसी एड्स रोगी द्वारा नहीं किया गया है -कोई स्त्री अपने मानसिक सोंदर्य और व्यक्तित्व के साथ बची हुई हो सकती है .संतान-उत्पत्ति में सक्षम उसके वे सारे डिम्ब जो उसकी जैविक-जीनेटिक विशेषता के अनुरूप एक नए मनुष्य को जन्म दे सकते हैं,बलात्कार कि शिकार स्त्री के पास भी एक संभावनापूर्ण भविष्य के रूप में बचे रह सकते हैं .इस तरह हर स्त्री एक विशिष्ट जैविक गुणवत्ता का बीज भी है .इस तरह यों-अपराधों कि शिकार स्त्री के शरीर का परंपरागत अवमूल्यन और शुचितावाद एक अंधविश्वासपूर्ण पूर्वाग्रह के अतिरिक्त और कुछ नहीं है .इस मध्ययुगीन सोच से समाज को बाहर निकालने कि जरुरत है .http://www.jansatta.com/columns/jansatta-editorial-stri/24367/http://www.jansatta.com/columns/jansatta-editorial-stri/24367/

रविवार, 18 जनवरी 2015

कविता का चरित्र

वर्त्तमान में कविता के स्वरूप और चरित्र को लेकर इतनी विविधता है कि उसका कोई निश्चित स्वरूप भी हो सकता है -यह नहीं कहा जा सकता .लेकिन यह भी एक सच है कि कविता एक सांस्कृतिक अविष्कार है ,इसी कारण से सभी देशों की कवितायेँ एक ही भूमिका में नहीं रही हैं .पश्चिम में ओल्ड टेस्टामेंट हो या भारत का वादिक साहित्य -प्रारंभिक साहित्य अपने प्रयोजन में प्रायः धार्मिक ही रहा है ..बाद में यद्यपि यह कहना अधिक सही होगा कि भाषिक सामर्थ्य के विकास के साथ समर्थ कवियों नें वृहत्तर कथा -काव्यों की रचना की होगी ,जिन्हें आज हम महाकाव्य कहते हैं . कथा -काव्य यानि कि गाथाएँ कविता सांसारिक आकांक्षाओं को सम्पूर्णता में व्यक्त करती है.
           यूरोपीय और भारतीय काव्य परम्पराओं का तुलनात्मक अध्ययन करें तो एक अंतर यह सामने आता है कि पश्चिमी साहित्य विस्मय और रोमांच मूलक है .उसके कवियों का चित्त नवीन जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के प्रति अधिक आकर्षित होता है .प्रत्याशा और रोमांच उसके साहित्य के स्थायी स्वाभाविक वृत्तियाँ हैं .वे वैसा ही जीवन जीते हैं और वैसा ही पसंद करते हैं तो स्वाभाविक है कि उनका साहित्य भी उन्ही भावनाओं से भरा हुआ है .इसका कारण यह प्रतीत होता है कि उनका जीवन और परिवेश अधिक चुनौतीपूर्ण  रहा है .इसके विपरीत भारतीय साहित्य स्तायित्वपूर्ण कृषि -व्यवस्था के कारण परिवार एवं रिश्ते जीनेवाला रहा है ..इसलिए उसके साहित्य में रिश्तों से जुडी भावनाएं ही अधिकांशतः व्यक्त हुई हैं .सामाजिक जीवनराग एवं चरित गायन उसके साहित्य का केन्द्रीय स्वर रहा  है .प्राचीन भारतीय साहित्य यदि केवल धार्मिक भावनाओं को ही प्रश्रय देता दिखाई देता है तो इसका सामाजिक कारण यह भी हो सकता है कि भारत में लिखित  साहित्य  के संरक्षण की जातीय जिम्मेदारी प्रायः ब्राह्मणों के ऊपर ही रही है ..इस जाति की दिलचस्पी प्रायः नैतिक और धार्मिक साहित्य को ही संरक्षित करने की रही है .  लौकिक साहित्य तो प्रायः लोकागाथाओं या फिर रजा द्वारा संरक्षित किये जाने पर ही बचा है . 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

हिंदी का वैश्विक भविष्य

विश्व हिन्दी दिवस 10 जनवरी पर विशेष -

 10 जनवरी 1975 को नागपुर मे आयोजित प्रथम विश्व  हिंदी सम्मलेन के चालीस वर्ष बीतने और  भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा  10 जनवरी 2006  को प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस माने जाने की घोषणा के दसवें वर्ष में हिंदी कंप्यूटर  एवं इंटरनेट युग की वैश्विक भाषा तो बन ही गयी है . आज यूनिकोड में टंकित  हिंदी को गूगल के अनुवाद(ट्रांसलेशन ) एवं लिप्यान्तरण(ट्रांसलिटरेशन) सॉफ्टवेयर के माध्यम से विश्व की किसी भी भाषा में पढ़ा जा सकता है .यह एक बड़ी तकनीकी विजय है ,जिसने पूर्ववर्ती पीढ़ी के हिंदी -विरोध को बेमानी कर दिया है . वैश्वीकरण और उन्मुक्त बाजार व्यवस्था नें हिंदी भाषियों के संख्या-बल के आधार पर विवश होकर यह महत्वपूर्ण कार्य किया है .
                यद्यपि इससे  10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस को औपचारिक रूप से माने जाने का महत्त्व कम नहीं हो जाता .इसका महत्त्व एक संकल्प दिवस के रूप में है कि विश्व में हिंदी के प्रचार -प्रसार के लिए हम क्या -कुछ कर सकते हैं .ऐसे में तो और भी जबकि हम हिंदी भाषी  भाषा-चेतना की दृष्टि से भारत के ही अन्य भाषाभाषियों की तुलना में उदासीन और पिछड़े ही कहे जाएँगे .औपिनिवेशिक मानसिकता के कारण  ही  बाजार में दुकानों तक के नाम भी अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं .अभी तक तो विश्व हिंदी दिवस एक सरकारी पर्व ही बन कर रह गया है .विदेशों में स्थित भारत के दूतावास इस दिवस को विशेष रूप से मानते हैं .इसका उद्देश्य हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए तथा विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता पैदा करना है .हिंदी को सरकारी स्टार पर नहीं ,बल्कि सामाजिक स्टार पर विश्व में प्रतिष्ठित होने के लिए अभी भी एक लम्बी यात्रा करनी है .
                              इतिहास में देखा जाए तो पहले भी भारत के व्यापक भूभाग में हिंदी को फैलाने में भक्ति आन्दोलन के साथ -साथ बाजार एवं शहरीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका थी . व्यापार की आवश्यकताओं नें अतीत में हिंदी के प्रचार प्रसार और उसके मानकीकरण में महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई है .व्यप्परियों को दूर -दूर तक यात्राएं करनी पड़ती हैं ,ऐसे में आंचलिक और स्थानीय भाषा और उसके शब्दों से उनका काम  नहीं  चलता .ऐसे में दूर तक समझे और बोले जाने वाले शब्दों को बढ़ावा मिलता है . आज भी बाजारीकरण की प्रक्रिया वैश्विक आदान-प्रदान के रूप में जारी है .अभी भारत नें मारीशस को स्वदेशी युद्ध पोत बेचा है .हिंदी में नामकरण वाले ऐसे भारतीय उत्पाद भी अपनी प्रतिष्ठा और यश के साथ हिंदी शब्दों को फैला सकते हैं .प्रधानमंत्री महोदय की 'मेक इन इण्डिया  नीति सफल होने पर अप्रत्यक्ष रूप में ही सही ' हिंदी शब्दों के प्रचार -प्रसार में महत्त्व पूर्ण भूमिका अदा कर सकती है .
               अभी हिंदी को वैश्विक ख्याति वाली गीतांजलि जैसी किसी महत्वपूर्ण  साहित्यिक कृति के रचे जाने का भी इंतजार है .एक ऐसी कृति जिसके लिए लोग विवश होकर हिंदी सीखें या फिर उसके माध्यम से हिंदी के बहुत सारे शब्द सारे विश्व में फ़ैल जाएं . आज भी अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी के विकास की जो चुनौतियां हैं ,वह राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों की हैं .पहला तो यह की हम सभी भारतीय ही बिना किसी राजनीतिक विद्वेष के हिंदी का सम्मान करें  और उसका  बिना किसी हीनता ग्रंथि के व्यव्हार में उपयोग करें .भारत के दक्षिणी राज्यों में हिंदी थोपे जाने का प्रबल प्रतिरोध  अंततः उनको ही क्षति पहुंचता है .इस मानसिकता से मुक्त होंने के कारण  केरल के लोग सर्वाधिक संख्या में उत्तर भारत में नौकरी करते पाए जाते हैं .
              अब तक के इतिहास का अनुभव यह बताता है कि राजनीति एवं राजनीतिज्ञ हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रतिष्ठापरक एवं संरक्षण देने जैसे सहयोग ही कर सकते हैं .पहले भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल जी नें और अब वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी इस भूमिका के प्रति सजग हैं .दर असल राष्ट्रवादी भावना के बिना हिंदी को उसका वांक्षित सम्मान नहीं मिल सकता .इसी भावना के कारण स्वाधीनता के नायकों नें हिदी को ही भारत की राष्ट्रभाषा की सही अधिकारिणी समझा था .इसके अतिरिक्त हिंदी सांप्रदायिक एकता की भी भाषा है   . सभी भाषा-वैज्ञानिक इस रहस्य को जानते हैं कि अपनी संरचना में हिंदी और उर्दू दोनों ही खडी बोली  पर ही आधारित दो शैलियाँ हैं .उनमें  इतनी समानता है कि पाकिस्तान का उर्दू प्रसारण  भी हिंदी ही लगता है .मुझे एक पुस्तक मिली थी पाकिस्तान के उर्दू शायरों की उसमें भारत में लिखने वालों से बहुत अधिक हिंदीपन था .इतना कि वे हिंदी की गजलें ही लग रही थीं .इस दृष्टि से देखें तो बिना लिप्यान्तरण के उर्दू के रूप में हिंदी पाकिस्तान में भी बोली जाती है .सिर्फ लिपि-भेद और शैलीभेद के साथ राजनीतिक संकीर्णता के कारण कोई भी किसी सार्वजनिक मंच से इस सत्य को स्वीकार करना नहीं चाहता . 
                      इसके बावजूद यह एक तथ्य है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की मानसिकता के कारण विश्व में फैले प्रवासी भारतीय विश्व में हिंदी फैला रहे हैं .ठीक वैसे ही जैसे मारीशस में कभी भोजपुरी गयी थी .पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की ओर विदेशियों का भी आकर्षण बढ़ा है .हम ऐसा दिवा स्वप्न देखा सकते हैं की हिंदी अंग्रेजी की तरह भूमंडली कृत भाषा भले ही ण बन पे लेकिन वह एक सामानांतर महत्त्व की वैश्विक भाषा तो बन ही सकती है .

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

ईश्वर की भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा

ईश्वर की भारतीय और पाश्चात्य अवधारणा में जो अंतर है ,वह दोनों सभ्यताओं की मानसिकता और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के अनुरूप ही है .पश्चिमी सभ्यता के ईश्वर की अवधारणा जहाँ प्रकृतिपरक होने के कारण एक भौतिकवादी सभ्यता का आधार बनती है ,वहीँ भारतीय  ईश्वर की अवधारणा भावपरक होने के कारण एक आध्यात्मिक सभ्यता का ।
   "एकाकी न रमते ,सो कामयत एकोअहम बहुस्यामि" का प्रसिद्ध औपनिषदिक कथन आत्मा और परमात्मा की इसी एकता का उद्घोष करता है . यह तात्विक समानता के साथ-साथ आवयविक एकता की भी अवधारणा है .यहाँ ईश्वर स्वयं ही सभी जीवों में रूपांतरित हुआ है .वैसे ही जैसे पिता अपने पुत्र में जैविक रूप से रूपांतरित होता है .इसीलिए आध्यात्म से आशय संपूर्ण प्रकृति में व्याप्त आत्मा की एकता को अनुभूत करना है .आत्मा व्यष्टि की आत्मा है तो परमात्मा समष्टि की वृहत्तर आत्मा .इसीलिए भारतीय आध्यात्मिकता अपने से परे की संपूर्ण सृष्टि  के प्रति उदात्त आत्मीयता के रूप में है। इस अर्थ में कि जो आत्म से अधिक है वही आध्यात्म है और जो आत्मिक से अधिक है वही आध्यात्मिक । यहाँ "अधि" अपने आशय में अधिक , विस्तृत,अतिरिक्त ,ऊपर एवं परे आदि बहुत से शब्दों के अर्थों को अपने में समेटे हुए हैं. 
                ऐसा इस लिए कि भारतीय  ईश्वर परमात्मा यानि परम आत्मा तो है ही  वह परम पिता भी है। यद्यपि यह एक तथ्य है कि ईसा मसीह स्वयं को ईश्वर का पुत्र घोषित करते हैं इस तरह प्रकारांतर से  ईश्वर का साक्षात्कार परम पिता के रुप  में ही करते हैं -लेकिन सिर्फ उनके स्वीकार से ही पश्चिमी सभ्यता का सांस्कृतिक अचेतन बदल नहीं जाता। इस न बदलने का कारण ईश्वर का इस सृष्टि या जगत से वह रिश्ता है,जो सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर को एक बाहरी शक्ति बना देती है।
                पश्चिमी ईश्वर इस सृष्टि से बिलकुल् अलग एक विशुद्ध निर्माता शक्ति है। वह स्वयं इस सृष्टि का अभिन्न हिस्सा नहीं है।  उसने किसी कुम्हार के घड़े की तरह इस दुनिया को बाहर से बनाया है ,उसने छः दिन में इस दुनिया कि बनाकर सातवें दिन विश्राम भी किया है.वह इस दुनिया का कृतिकार है और यह दुनिया उसकी कलाकृति की तरह है .इस तरह वह अलग है और उसकी बनायीं हुई यह दुनिया अलग। .इस तरह पश्चिमी अचेतन के व्यक्तित्व की मुख्य विशेषता उसकी सृजनशीलता है। इसीलिए उसने ईश्वर और उसकी बनायीं प्रकृति के रहस्यों के उदघाटन के लिए उसकी सृजनशीलता के रहस्यों को ही उद्घाटित करना सही समझा।  तरह पश्चिम का भौतिकवाद और उसकी वैज्ञानिक जिज्ञासा उसकी विशिष्ट  धार्मिकता का ही प्रतिफल है।
                  इसके विपरीत भारतीय ईश्वर किसी कुम्हार की तरह नहीं है। पश्चिमी अवधारणा के विपरीत  वह एक जैविक  पिता की तरह मनुष्य की आत्मा से अभिन्न शक्ति है। जैसे माता और  पिता अपने शरीर से ही  अपनी संतान को जन्म देते हैं ,जैसे कि विकसित होने के बाद पुत्र भी पिता की जगह ले सकता है- वैसे ही मनुष्य भी विकास के पश्चात ईश्वरता को प्राप्त हो सकता है। क्योकि पिता और पुत्र में तात्विक अंतर नहीं होता इसलिए मनुष्य की आत्मा और परमात्मा भी तात्विक दृष्टि से अभिन्न हैं ,भारतीय अवतारवाद का आधार यही अवधारणा है। उसका सांस्कृतिक अचेतन ईश्वर और प्रकृति के रहस्यों को जानने में नहीं बल्कि उसे किसी आत्मीय की तरह जीने में विश्वास करता है। उसकी भक्ति की प्रकृति भी भावुक है। जबकि पश्चिम में मनुष्य ईश्वर का सृजन या उत्पाद है। इसलिए पश्चिमी मनीषा मनुष्य के स्वयं ईश्वर होने की बात सोच भी नहीं सकती। इसके विपरीत भारतीय मनीषा ईश्वर होने का दंभ तो जीती रही है ,लेकिन उसने सृष्टि एवं सृजनशीलता की यात्रा को समझाने का बिलकुल ही प्रयास नहीं किया .वह सिर्फ दिव्य सृजनशीलता पर मुग्ध ही होती रही है . उसकी जाति और वर्ण वादी जातीय संरचना नें उसके विवेक को भी बाँट दिया था . हाथ और  मस्तिष्क की जातीय दूरी नें वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से एक संभावना शुन्य समाज और सभ्यता को जन्म दिया .उसके सिद्धांतकार अलग जातियों में पैदा होते रहे और प्रयोग्कार अलग जातियों में -इससे वह बेहतर यंत्रों के विकास से भी वंचित रही . [