सोमवार, 6 अगस्त 2012

भिन्न भावलोक में


जनसत्ता 5 अगस्त, 2012: सुपरिचित कवि उद्भ्रांत के संकलन अस्ति की कविताएं अद्यतन विचारशीलता, वस्तु वैविध्य, आत्मीय संवादधर्मिता और संवेदनात्मक रिपोर्ताज शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं।
ये एक आधुनिक बुद्धिजीवी के नागरिक मन, चिंता और बोध का विमर्श रचती हैं। समकालीन परिवेश और समाज को समझते और समझाते हुए, उसमें अपने अस्तित्व और स्व की तलाश करने वाली कविताएं आधुनिक मनुष्य के लिए अस्मिता की तलाश की चिंता से उपजी हैं। आत्माभिव्यक्तिमें सामाजिकता और सामाजिकता में आत्मान्वेषण ने उद्भ्रांत की अधिकतर कविताओं को आत्मीय, संवेदनशील, ईमानदार और अनौपचारिक रूप में विशिष्ट बनाया है।
अपने शिल्प और संरचना में ये कविताएं आत्मकथा, संस्मरण, समाचार, संस्कृति, समाज और विज्ञान संबंधी विचारों के विविध आयामों का संसार समेटे हुए हैं। इनमें ‘नई सृष्टि’, ‘दादाजी’ और ‘नवलगढ़’ शीर्षक से चार और ‘अयोध्या’ शीर्षक से सात आत्मकथात्मक कविताएं हैं तो सारा आबिदी, कालू जल्लाद, भटकती आत्माएं जैसी समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरों को पढ़ कर लिखी गई मार्मिक कविताएं भी। हांडी, जंगलतंत्र और बकरामंडी जैसी काव्यात्मक रिपोर्ताज शैली में लिखी गई कविताएं भी हैं जो कालाहांडी, सरिस्का के जंगल और जामा मस्जिद की बकरामंडी पर लिखी गई हैं।
कवि ने समकालीन जीवन के यथार्थ को इतने कोणों और आयामों से देखा है कि शायद ही कोई पहलू छूटा हो। इन कविताओं की सबसे अच्छी बात है कि ये एक सार्थक संवेदनात्मक पक्ष चुनती हैं। सही जीवन के पक्ष में प्रश्न उठाती और उनका उत्तर देने का भी प्रयास करती हैं। कवि ने समय और परिवर्तन की हर नन्ही आहट को सुना और दर्ज किया है। पेंटिंग, लाइट होल, ब्लैकहोल, उड़नतश्तरी, पेपरवेट, काक्रोच, टार्च, फ्लैट, पोस्टकार्ड, गांधी आश्रम और गिरगिट से लेकर इत्ता-सा ब्रह्मांड तक ‘अस्ति’ का काव्य-संसार बनाते हैं। इन कविताओं के माध्यम से उद्भ्रांत आधुनिक नागरिक जीवन-बोध और सांस्कृतिक पुनर्विचार के कवि रूप में भी सामने आते हैं। उनकी रचनात्मक चिंता परंपरा और सभ्यता के पुनर्विचार और पुनर्संस्कार की भी है।
उद्भ्रांत के यहां आधुनिक सभ्यता द्वारा निरस्त कर दिए गए परंपरागत जीवन-मूल्यों, रीतियों और विश्वासों का बड़ा संसार है। उनकी कविताएं बार-बार इस निरस्ति को समझना और समझाना चाहती हैं। उनकी कविताएं पारंपरिक विश्वासों में फंसे हुए मनुष्य के आधुनिकतावादी रूपांतरण को व्यापक और बहुआयामी विमर्श देती हैं। ‘क्या शैतान के भी सींग होते हैं’ और ‘मैंने ईश्वर को देखा प्रत्यक्ष’ ऐसी ही कविताएं हैं। उनकी ‘सारा आबिदी’ कविता सीबीएसइ की दसवीं कक्षा की परीक्षा में देश में प्रथम स्थान पाने वाली छात्रा की मार्ग दुर्घटना में हुई असामयिक मृत्यु पर लिखी गई है। संवेदनाजनित पीड़ा के निवारण के क्रम में ही कवि नियति और ईश्वर जैसी सभी सांस्कृतिक अवधारणाओं की पड़ताल करता हुआ एक प्रतिरोध रचता जाता है। ‘आत्महत्या’ कविता भी इसी तरह संवेदनात्मक रिपोर्ताज है। संकलन की अनेक कविताएं संस्मरणात्मक और संवादी हैं। कई कविताएं आधुनिकता का सांस्कृतिक विमर्श रचती हैं। ‘जैसे सपना एक चकमक पत्थर है’ कविता सृजन की दार्शनिकी प्रस्तुत करती है तो ‘नवग्रह’ में सही मूल्यांकन न होने की पीड़ा है।
‘अस्ति’ की दुनिया एक संवेदनशील सक्रिय मस्तिष्क की बेचैनियों की दुनिया है। एक समर्थ कवि की काव्यांकित दैनंदिनी, आत्मकथात्मक काव्य-रूप है। संवेदना, अनुभूति और विचार की त्रई उनकी अधिकतर कविताओं को काव्यात्मक निबंध या फिर संवेदनात्मक आख्यान बना देती है। ऐसे में अनौपचारिक अकृत्रिम भावावेग और गीतलेखन की साधना और संस्कार उनकी लंबी कविताओं को भी काव्यत्व-निर्वाह की दृष्टि से सफल बनाते हैं। 
समकालीन कविता के संपूर्ण परिदृश्य को सामने रख कर उद्भ्रांत की कविताओं के वैशिष्ट्य पर अलग से विचार करें तो कुछ इस तरह का आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य उभरता है। समकालीन लोकप्रिय हिंदी कविता ने बहुत चालाकी से एक बाजारोन्मुख पेशेवर शिल्प विकसित किया है। अमूर्तन, अस्पष्टता, खुसरो की पहेलियों जैसी ज्ञानरंजकता इस कविता के शिल्प की विशेषता है। पारदर्शी और स्पष्ट संवेदनात्मक आत्माभिव्यक्ति इस कविता के लिए एक घटिया कलावस्तु बन जाती है। अबूझ शिल्प की ये कविताएं प्राय: विशेषज्ञों के लिए लिखी जाती हैं और आम जनमानस की समझदारी की सीमा से दूर रहती हैं। बाजार पर नियंत्रण और बराबरी के सैद्धांतिक आधार वाले बहुसंख्यक लोकतांत्रिक समाज में नेतृत्व का अलग पेशेवर मनोविज्ञान हुआ करता है। चाहे साहित्य-लेखन ही क्यों न हो, सत्ता के प्रभावी केंद्र के रूप में विकसित होने के लिए उचित दूरी का मनोविज्ञान छिपाव की कला का एक अलग शिल्प रचता है। संभव है कि विज्ञापित होने के लिए पाठक से भी दूरी बनाए रखना और संप्रेषणीयता की दृष्टि से अबूझ बने रहना ही उंचाई के छवि-निर्माण की दृष्टि से युक्तियुक्त हो।
उद्भ्रांत की कविताएं बौद्धिकता के साथ-साथ संवेदनशीलता और भावुकता का मानसिक पर्यावरण बचाने के रचनात्मक प्रयास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। समकालीन भावबोध वाली उनकी कविताओं में कविता के समकालीन बाजार की प्रचलित कलात्मक-बौद्धिक मुद्रा से अलग सहज संवेदनात्मक साक्षात्कार का शिल्प मिलता है। ये कविताएं एक और बिंदु पर महत्त्वपूर्ण हैं। विचारधारात्मक वर्जना के कारण एक अघोषित सेंसरशिप के रूप में मुख्यधारा की प्रगतिशील कविता ने आम भारतीय जनमानस के बहुत-से सांस्कृतिक प्रश्नों और   मनोग्रंथियों को अछूता छोड़ दिया था। उदाहरण के लिए, जाति और धर्म की बहुत-सी सामाजिक निर्मितियां, जो हमारे समाज में तो हैं, भले बुद्धिजीवियों ने उचित भाषा में या वैचारिक प्रतिरोध के स्तर पर उनका संज्ञान न लिया हो। ये कविताएं प्रगतिशीलता को आधुनिकता से जोड़ कर उसकी समझदारी को एक वृहत्तर आयाम दे देती हैं।
उनकी कविताओं में पाठक से अधिक से अधिक संवाद करने की आकांक्षा दिखती है, और वे एक अलग तरह का तरल-सरल शिल्प सामने लाती हैं। गीत लेखन से गद्य कविताओं की ओर आने के कारण उनकी काव्यभाषा में एक विशिष्ट सांगीतिक संस्कार दिखता है। परंपरागत शब्दावली में कहा जाए तो उनकी कविताएं गीतात्मक संस्कार लिए अभिधा की कविताएं हैं। सर्जना का सौंदर्य उनकी काव्यभाषा की सहज बुनावट और संप्रेषणीयता में है।
उनकी कविताएं अनौपचारिक शिल्प की कविताएं हैं। उनके काव्य में माध्यम का रचाव गौण है और सच कहा जाए तो वह कवि की प्राथमिकता में ही नहीं है। माध्यम के अकृत्रिम रचाव के कारण ही ये कविताएं सीधे संवेदना तक ले जाती हैं। वे प्रतीकबहुल बौद्धिक दुरूहता के स्थान पर बिंबों का भावपूर्ण संसार रचती हैं। यह संवेदनाधर्मिता ही उनकी कविताओं को सार्थक और विशिष्ट बनाती है। उनकी कविताएं कलात्मक रचाव की नहीं, बल्कि संवेदनात्मक उपस्थिति की कविताएं हैं। हर भावुक विक्षोभ उनके यहां कविता बन गया है।
रामप्रकाश कुशवाहा
अस्ति: उद्भ्रांत; नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 750 रुपए।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

संस्कृतियों का वैश्विक संघर्ष और सभ्यता का पुन:पाठ

सृजन-संवाद
संपादक-ब्रजेश
इ -६४ ,साऊथ सिटी ,लखनऊ



          विकास और इतिहास की पृष्ठभूमि सम्बन्धी भिन्नता के कारण ,भिन्न-भिन्न जीवन-पद्धति और मानव-व्यवहार को प्रस्तावित करती हुर्इ विश्व की हर संस्कृति जीवन जीने का एक भिन्न (सामूहिक) पाठ प्रस्तुत करती है । जीवन शैली की भिन्नता जहां एक ओर संस्कृति विशेष की विशिष्टता का आधार बनती है ; वहीं अलग भौगोलिक अंचल और सामुदायिक मूल की सांस्कृतिक आदिमताएं मानव-विश्व को अलग-अलग समुदायों में भी बांटती हैं ।  दूसरी ओर सांस्कृतिक एकता अलग-अलग नस्लों के लोगों को एक सामाजिक-सांस्कृतिक र्इकार्इ के रूप में पुनसर्ंयोजित भी करती हैं । इन दोनों प्रक्रियाओं के कारण ही एक मानव-विश्व के निर्माण की दृष्टि से संस्कृतियों को सकारात्मक और नकारात्मक दोहरी प्रकार्यात्मक भूमिका में देखा जा सकता है । अपने प्रभावितों और अनुयायियों की संख्या अथवा जनसंख्यात्मक विस्तार तथा मानव-व्यवहार के प्रतिमानीकरण की दृषिट से देखने पर हर सांस्कृतिक समुदाय एक भिन्न ऐतिहासिक संक्रमण-यात्रा है ।  इस दृषिट से सारी संस्कृतियां मानव-व्यवहार के आदर्श प्रतिमान की खोज एवं प्रभाव का परिणाम हैं । वे जीवन-पद्धति का सरलीकरण करती हैं ; एक सामान्य एवं सर्वमान्य चरित्र-सृषिट को प्रस्तावित करती हैं  और मनोवैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो वे समुदाय-विशेष के सभी सदस्यों को एक समान प्रत्यक्षीकरण हेतु ऐसे प्रभावी एवं मार्मिक व्यकितत्वों की कथात्मक पुनर्पस्तुति करती हैं , जो विभिन्न अवसरों पर उनके संवेदनात्मक व्यवहार को एक पद्धति दे सके ।
            सही अथोर्ंं में संस्कृति मनुष्य की परम्रागत व्यवहार-पद्धति ही है । एक ऐसा व्यवहार जो उसके निजी विवेक से कम लेकिन उसे उत्तराधिकार में मिले सामाजिक व्यवहार से अधिक संचालित और सम्बनिधत होता है । इसप्रकार कहीं न कहीं हर संस्कृति वर्तमान मानवीय विवेक का शैक्षणिक अतीतीकरण ही है अथवा दूसरे रूप में वह अतीत की स्मृतियों और मानवीय विवेक का वर्तमानीकरण है । इसप्रकार संस्कृति उत्तराधिकार में मिली हुर्इ सभ्यता है । यह अनुभव और अबादतों के रूप में बचा हुआ पिछली पीढ़ी का वर्तमान है । हमारी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक आदतें ही हमारी सभ्यता का अलग प्रारूप रचती हैं । हमारी सभ्यता का मूल उत्स हमारी अचेतन ऐतिहासिक-सामाजिक ग्रनिथयों में है । हम मूलत: अतीतजीवी हैं । हमारा वर्तमान भी अतीत की पद्धतिगत उपसिथति हैं । हम जब नया इतिहास बना रहे होते हैं तब भी मानव-इतिहास की पुरानी आदतों को ही दुहरा रहे होते हैं । हमारा स्वयं को बदल पाना इतना आसान नहीं होगा । कर्इ बार हम पुन: उसी दुनिया में अपने पड़ोसियों द्वारा खींच लिए जाते हैं जिसे अपनी दृषिट मेंं पूरी तरह व्यर्थ जानकर छोड़नें की तैयारी कर रहे होते हैं हम । कर्इ बार न बदल पाने के कारण तकनीकी और यानित्रक भी होते हैं । उदाहरण के लिए भाषा-सम्प्रेषण के लिए एक अलग संसार ही रचती है । यह संसार एक काल-निरपेक्ष उपसिथति का होता है । भाषा कायान्तरण और कालान्तरण दोनों का ही माध्यम है । भाषा की यह प्रकृति ही मानवीय स्मृति और साहित्य दोनो को ही अपरिवर्तनीय बना देती है । सिद्धान्तत: वह अपनी साहितियक स्मृति को तो नहीं बदल सकता ,लेकिन समझ बदल सकता है ।
       सांस्कृतिक प्रभाव के कारण ही हमारी सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा सुदूर अतीत के मनुष्यों के अनुभवों ,विचारो और कल्पनाओं पर आधारित और उससे सामूहिक अचेतन प्रभावों के रूप में सम्बधित है।  अतीत के अविस्मरणीय मनुष्य और उनकी भोली अवधारणाएं अब भी हमारे मानसिक पर्यावरण का निर्माण करती हुर्इ वर्तमान का व्यवहार रच रही हैं । अतीत आज भी हमारी सामूहिक और सांंस्कृतिक आदतों के रूप में जिन्दा है । वह हमारी व्यवस्था-परिकल्पना को प्रभावित करने वाला सामूहिक अचेतन बन गया है ।
        दरअसल ,सामूहिक मानवीय अनुभव एवं निर्णय भी संज्ञान के स्तर पर एक बार घटित हो जाने के बाद ,प्रकृति की तरह ही मानव-जीवन की नियति के निर्धारक बन जाते हैं । वे मनुष्य की सामूहिक स्मृति के माध्यम से रुचि के नियामक बन जाते हैं । उन जातीय ग्रनिथयों ,मनोवृत्तियों एवं आदतों का निर्माण करते हैं ; जिन्हें सामूहिक अचेतन ही कहा जा सकता है । इनसे प्रेरित और प्रभावित होकर मानव-जीवन के मानसिक, सामाजिक,सांस्कृतिक ,राजनीतिक और आर्थिक आयाम अन्तत जैविक पर्यावरण में भी बदल जाते हैं । एक समय के बाद सामाजिक स्वीकृतियां ,व्यवहार और कार्य मनुष्य के विचार को ही पर्यावरण में बदल देते हैं । आदिकाल की जंगलों से भरी धरती का वर्तमान में बागों और खेतों में बदल जाना ,कृषि-कार्य करने के मनुष्य के मनुष्य के विचार का ही दीर्घकालीन परिणाम है ,जिसने वानस्पतिक पर्यावरण का पूरी तरह रूपान्तरण कर दिया है ।
            मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिल से जटिलतर होते जा रहे विकास-क्रम नें मानव-जीवन के पर्यावरण में मानवीय सृषिट को भी शामिल कर दिया है । मनुष्य जाति द्वारा अर्जित ज्ञान-विज्ञान ,निर्मित भव्य भवन ,सड़कें ,विधुत-व्यवस्था, कारखानें ,बांध ,पुल ,शिक्षा-व्यवस्था, ग्रन्थ, साहित्य, संगीत, फिल्में ,टी.वी., नगर , मुद्रा और राज्य- वयवस्था आदि सभी मानव-निर्मित पर्यावरण ही हैं । आदिम मनुष्य नें जब प्राकृतिक गुफाओं की तलाश छोड़कर पहली बार घर बनाया होगा  या एसिकमों नें ध्रुवीय भालू का अनुसरण करते हुए इग्लू के पूर्व रूप का निर्माण किया होगा या फिर किसी मृत पशु के चर्म में घुसकर बर्फीली हवाओं को पछाड़ा होगा तो उसका यह कार्य पर्यावरण निर्माण की दिशा में ही बढ़ा हुआ कदम था । आज भी जब अपराध-नियन्त्रण के लिए वह कोर्इ नया कानून बनाता है तो उसके इस प्रयास में भी अपने पर्यावरण (सामाजिक) को ही बेहतर बनाने की सामूहिक इच्छा छिपी रहती है । इस दीर्घकालीन विकास-क्रम में गम्भीर अवरोध तब उत्पन्न हुए ,जब संस्कृति को अतीत के मानवीय सृजन के रूप में न देखकर उसे जातीय और धार्मिक जड़ता यानि अपरिवर्तनीय श्रेष्ठता एवं पूर्णता के रूप में देखा जाने लगा ।
          किसी सांस्कृतिक समुदाय में प्रचारित चरित्र-विशेष की कथात्मक प्रस्तुति ( चाहे वह मिथकीय हो या धार्मिक ) ही पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक उत्तरजीविता को सम्भव बनाती है । आइन्स्टीन की यह अवधारणा कि काल  भी एक आयाम है और यह दुनिया है ही नहीं बलिक निरन्तर हो भी रही है तथा असितत्ववादियों की दृषिट में जीवन का गुजरते क्षणों में निरन्तर होना की तरह संस्कृति-विशेष भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच सूचनाओं ,कथाओं और विष्वासों के हस्तान्तरण के साथ समुदाय विशेष के सदस्यों के बीच बनी रहती है । इसप्रकार सांस्कृतिक नैरन्तर्य समाज में निरन्तर चलने वाले उस प्रशिक्षण का परिणाम है ,जो संस्कृति विशेष का सदस्य अभिभावक के रूप में अपनी सन्तान को देता है । फ्रायड के दमित अचेतन से अलग यह वह अचेतन संक्रमण है जो व्यकित को उसके बचपन में ही उसके अपरिपक्व और अप्रशिक्षित मसितष्क को प्रशिक्षण के रूप में सौंप दिया गया होता है । इस तरह संस्कृति-निर्माण एक जातीय सामाजिक परियोजना की तरह निरन्तर चलते रहने वाली प्रक्रिया है । इसलिए संस्कृति का उत्तर-आधुनिक पाठ यहीं से आरम्भ होता है कि संस्कृतिकरण ,समकालीन मानव-जाति में चलने वाली अतीतीकरण की प्रक्रिया है। वह एक समान स्मृतियों वाले मनुष्य का वंशानुक्रमिक पुनरूत्पादन है । वह विशेष प्रकार का सूचनात्मक या मसितष्कीय उत्तराधिकार है ।
            मानव-जाति की वैशिवक एकता के विरुद्ध संस्कृति की वर्तमान विरोधी भूमिका को देखते हुए सांस्कृतिक अचेतन से मुक्त एक आधुनिक वैज्ञानिक मनुष्य का निर्माण ,उत्तर-आधुनिक वैशिवक संस्कृति के निर्माण की दिशा में पहता साभ्यतिक कदम होगा । वर्तमान मनुष्य के विवेक के अतीतीकरण की सामाजिक प्रक्रिया को रोकने के लिए एक वैज्ञानिक जेहाद की जरूरत है । वैज्ञानिक जेहाद से मेरा तात्पर्य वैज्ञानिक विचारों और विश्वासों की निर्णायक स्वीकार्यता से है । वैज्ञानिक सूचनाओं नें अनेक प्राचीन विश्वासों की सत्यता पर गम्भीर एवं तथ्यसम्मत प्रश्नचिहन लगाए हैं । उन प्रश्नों एवं तथ्यों से नर्इ पीढ़ी के मनुष्य को वंचित करना यानि आधुनिक सूचनाओं से अपरिचित रखकर नर्इ पीढ़ी का एकल अतीतीकरण करने वाली साम्प्रदायिक शिक्षा को सांस्कृतिक अपराध के रूप में देखे जाने की जरूरत है । दुर्भाग्य से कर्इ देशों की राजनीति सत्ता और शासन सम्बन्धी स्वाथोंं के कारण आधुनिक युग के नवजन्में शिशु का मानसिक या बौद्धिक बधियाकरण यानि उसके कृत्रिम अतीतीकरण पर मौन धारण किए हुए हैं ।      
          सांस्कृतिक अतीतीकरण जिस सामूहिक अवचेतन का निर्माण करता है ,वह सामाजिक प्रशिक्षण की इतनी जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया का परिणाम है कि है कि उसे सिर्फ किसी सम्प्रदाय या संस्कृति-विशेष के अनुयायी के विचार के रूप में ही चिहिनत नहीं किया जा सकता । सांस्कृतिक अतीत एक सर्वग्रासी अचेतन की तरह हमारी सभी संस्थाओं से सम्बनिधत मानवीय व्यवहारों को संचालित-परिचालित कर रहा है । यहा तक कि आदिम कबीलार्इ युग का सांस्कृतिक अचेतन आज भी हमारी राजनैतिक -सामाजिक शकित-परिकल्पना का प्रमुख आधार है । हमारे सभी सामाजिक-आर्थिक राजनैतिक व्यवहार इस दृषिट से अतीतीकरण के शिकार है कि उनके पीछे आदिम मानव जाति के असुरक्षा-बोध ,भय एवं वे सुरक्षात्मक आक्रामकताएं छिपी हुर्इ हैं । उनका वर्तमान में कोर्इ औचित्य नहीं होते हुए भी हम इसलिए उन्हें जिए जा रहे हैं कि हम सांस्कृतिक आदतों के कारण भिन्न तरह से जी ही नहीं सकते । हम नए विश्व को बनाने में इसलिए विफल हैं कि हम नए ढंग से जीने के अयोग्य हैं । हमारेे सत्ता-संघर्ष, पूंजी निर्माण और सामाजिक संगठनजीविता के मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि में आज भी एक असुरक्षित और आक्रामक शिकारी मनुष्य छिपा हुआ है । इसलिए सांस्कृतिक अतीतीकरण से मुकित की सजगता ही मानव-सभ्यता के विकास की भावी दिशा हो सकती है । वैज्ञानिक युग नें वर्तमान सभ्यता को समझने की जो विश्लेषण धर्मी वैचारिक  दृषिट दी है , उसका पर्याप्त बौद्धिक विनिवेश हमारी सभ्यता की विवेकपूर्ण समीक्षा और पुनर्रचना में नहीं हो रहा है । हम आज भी स्ांस्कृतियों पर विचार करते हुए, प्राय: संस्कृति-विशेष में प्रचलित मिथकों ,मानव-व्यवहार के अलग सांस्कृतिक प्रतिमानों  यानि रूढि़यों और रीति-रिवाजों आदि की अनुकरणात्मक जड़ता से आगे संस्कृति-विमर्श को नहीं ले जा पाते । हमारी साभ्यतिक समस्याओं का प्रमुख आधार सांस्कृतिक अचेतन ही है ।
          वैशिवक स्तर पर देखने पर मृत्यु-बोध की भिन्नता के कारण जीवन और जगत-बोध के भी दो भिन्न रूप सामने आते है। पशिचम के पास द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी विकासपरक  इतिहास-चेतना है तो पूरब के पास हर युग के मनुष्य के विवेक को अपने युग की साभ्यतिक विकृतियों और इतिहास-चेतना से बाहर निकलने की मनोवैज्ञानिक दार्शनिक प्रविधि है । पशिचम उपलबिधपरक लौकिक स्मृतियों का संरक्षक है तो पूरब मूल्य-परक चारित्रिक स्मृतियों का । पशिचम के लिए अतीत भी एक वस्तुनिष्ठ उपसिथत यथार्थ रहा है । उसके लिए मृत्यु का मतलब सम्पूर्ण विलुपित नहीं ,बलिक एक कब्र में बदल जाना है ,जबकि पूरब के लिए अतीत एक राख से अधिक महत्वपूर्ण कभी नहीं रहा । जबकि पशिचम नें अतीत के संरक्षण के लिए ममी और पिरामिडों की रचना की , पूरब ने स्मृति संरक्षण के लिए मिथक-निर्माण की प्रकि्रया अपनार्इ । पशिचम की सजग स्मृति-संरक्षणवादी ऐतिहासिक चेतना से अलग ,विसर्जन और विस्मृतिवादी पूरब अपनी जातीय स्मृति के निर्माण के लिए चयनधर्मी ही रहा है । उसकी व्यापक उपेक्षा और विस्मरण-नीति के पीछे जन-सामान्य के प्रतिरोध का सामाजिक मनोविज्ञान भी देखा जा सकता है । उसने सर्वोत्तम और पसन्द चरित्रोंं को मिथकों में बदलकर उन्हें धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संरक्षण देकर जहां उसें जीवित मानसिक उपसिथति में बदल कर भिन्न स्मृति प्रकि्रया का परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त सामान्यत: पूरब की सारी सांस्कृतिक-धार्मिक प्रविधियां मनुष्य को अपने सभ्यतागत समय से बाहर निकालने की रही है । उसकी सबसे बड़ी विश्ेाषता निरन्तर मानव-जाति के आदिम और निर्विकार चित्त की खोज को एक सांस्कृतिक लक्ष्य का आयाम देना है । पूरब निरन्तर ही अपने समय की सभ्यता का अतिक्रमण और उससे निष्क्रमण का आवाहन करता है । वह चित्त के स्तर पर वर्तमान जीवी है ,अपने वर्तमान चित्त की खोज होने के कारण एक सीमा से अधिक पूर्व में घटित घठनाएं एवं ऐतिहासिक स्मृतियां उसके लिए एक अनावश्यक उत्पाद है ;जबकि पशिचम अपनी ऐतिहासिक स्मृति के सापेक्ष संभावित वर्तमान की तलाश करता रहा है।  इसके स्थान पर पूरब अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को मिथक में बदल देना अधिक पसन्द करता रहा है । एक दृषिट से यह ऐतिहासिक स्मृति में से चारित्रिक स्तर पर महत्वपूर्ण प्रभावशीलता का चयन कहा जा सकता है ।
         अपनी भिन्न सांस्कृतिक अवधारणाओं और सामूहिक अचेतन के कारण पशिचम और पूरब की सभ्यताएं दो भिन्न मानवीय पर्यावरण का निर्माण करती हंै । इसीलिए किसी नर्इ व्यवस्था की खोज का प्र्रश्न पूरब और पशिचम के भिन्न सांस्कृतिक रुचियों के प्रश्न से भी टकराता है । मानव-जाति के असितत्त्व और विकास की लम्बी यात्रा में पूरब और पशिचम के मानव-समूहों के अलग-अलग विशिष्ट ऐतिहासिक अवदान सामने आए हैं । इस यात्रा में एक वैज्ञानिक युग और सभ्यता की ओर   विश्व-इतिहास को ले जाने में पशिचम ने युगान्तरकारी सफलता पार्इ है । उसने मानव-जीवन को और बेहतर,सुखी,सुरक्षित और संरक्षित बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका  का निर्वाह किया है । ऐसे में  पशिचमी सभ्यता को अपना आदर्श और आधुनिकता का पर्याय मानकर पूरब का भी पशिचमीकृत होते जाना स्वाभाविक ही है । ऐसे में कुछ ही समय पूर्व के औपनिवेशिक अतीत से अपमानित पूरब की सभ्यता और संंस्कृति का भी कोर्इ आधुनिक और वैशिवक विमर्श  हो सकता  है- इसकी प्रस्तावना मात्र से ही प्रतिगाामिता के कर्इ आरोप लग जाने का भी खतरा है ।
         दरअसल, पूर्वनिर्मित विचारधाराएं भी  बनी-बनार्इ सड़कों की तरह ही होती है । तिरछी या घुमावदार होने पर भी मनुष्य उसे ही मानक दूरी के रूप में मापता रहता है । दूसरे षब्दों में अच्छी बनी सड़कों से ही यात्रा करना अधिक सुविधाजनक समझता है । पूरब अभी भी प्रामाणिक और औचित्यपूर्ण विचारधारा के रूप में कोर्इ नर्इ अच्छी सड़क नहीं बना सका है ! उसे मानव-सभ्यता के विकास में अपने भीतर के श्रेष्ठ को योगदान के लिए अभी भी विश्लेषित और प्रमाणित करना है । अपनी सतत वैज्ञानिक उपलबिधयों के कारण  वर्तमान में आधुनिक मानव-सभ्यता के वैशिवक विमर्श के केन्द्र में पशिचम ही है । यधपि पशिचम ने स्वयं को बार-बार परिभाषित और व्याख्यायित किया है ;लेकिन वह निर्णायक प्रयास के स्तर तक ऐसा करने ंमे इसलिए असमर्थ रहा है कि उसने एक तो पूरब को विचार योग्य ही नहीं समझा या पूरब को विमर्श में शामिल करना स्वयं ही अपने औपनिवेशिक विस्तार और वर्चस्व के स्वर्णिम अतीत को अपमानित करना होता ।
         वैज्ञानिक विकास से समृद्ध दो अविस्मरणीय शताबिदयों के बीत जाने के बाद भी अधिक बेहतर व्यवस्था की खोज में लगी मानव-जाति के लिए सभ्यता और संस्कृति एक संवेदनषील मुददा बना हुआ है । ऐसे में किसी नर्इ और बेहतर सभ्यता ,व्यवस्था और संस्कृति-निर्माण की सृजनात्मक संभावनाओं की वैकलिपक दिशाएं कम ही होंगी । पहला विकल्प यह हो सकता है कि पशिचम को ही और बेहतर बनाकर उसे सार्वभौम कर दिया जाय । दूसरा यह कि पूरब और पषिचम दोनों के प्राच्य और वर्तमान से उपयोगी सृजन-सूत्रों की तलाश की जाय । तीसरा विकल्प पूरब की सभ्यता को आधार बनाकर पशिचम का पूर्वी संस्करण तैयार करने का है । वर्तमान के वैशिवक और भूमंडलीकरण-दौर में अलग-अलग कारकों से प्रेरित होकर ये सारी प्रकि्रयाएं स्वत:स्फूर्त ढंग से एक साथ चल रही हैं। ऐसे में 'किया जाय से मेरा आशय सजग बौद्धिक चुनाव से ही है । इसलिए वर्तमान बौद्धिक युग में और विकसित एवं निर्दोष सभ्यता की दिषा में प्राथमिक आवष्यकता तो यही होगी कि हम अपने अचेतन स्वीकारों की पुनर्समीक्षा कर उसे जहां सचेतन औचित्य प्रदान करें ; वहीं एक संवादी और समावेशी वैशिवक सभ्यता के लिए अपने अराजक एवं विरोधी विश्वासों को वैज्ञानिक-तार्किक आधारों पर कोर्इ अधतन एवं सर्वमान्य व्यवस्था दें । इसके लिए इस सिद्धान्त को मान्यता देनी ही होगी कि मनुष्यकृत वर्तमान व्यवस्था और उसका पर्यावरण उसके अतीत की बौद्धिक सक्रियताओं एवं कार्यात्मक हस्तक्षेप का परिणाम है ।  इसलिए भविष्य की बेहतर व्यवस्था की खोज तब तक संभव नहीं है जब तक हम उसके अतीत और वर्तमान की बौद्धिक आदतों को समझ न लें । अलग-अलग साभ्यतिक चित्त एवं आदतों की खोज ही हमें उनके भिन्न सामूहिक अचेतन के उस अन्धी सुरंग में ले जाती है , जिन्हें बन्द किए बिना मानवता का भविष्य बार-बार भटक कर उसकी ओर ही मुड़ जाने के लिए अभिशप्त है ।
           दरअसल सामूहिक मानवीय निर्णय भी एक बार घटित हो जाने के बाद ,प्रकृति की तरह ही मानव-जीवन की नियति के निर्धारक बन जाते हैं । वे मनुष्य की सामूहिक स्मृति के माध्यम से रुचि के नियामक बन जाते हैं । उन जातीय ग्रनिथयों ,मनोवृत्ति एवं आदतों का निर्माण करते है। जिन्हें सामूहिक अचेतन ही कहा जा सकता है । इनसे प्रेरित और प्रभावित होकर मानव जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक आयाम अन्तत: जैविक पर्यावरण में बदल जाते हैं । एक समय के बाद सामाजिक स्वीकृतियां व्यवहार और कार्य मनुश्य के विचार को ही पर्यावरण में बदल देते हैं । आदि-काल की जंगलों से भरी धरती का वर्तमान में बागों और खेतों में बदल जाना कृषि-कार्य करने के मनुष्य के विचार का ही दीर्घकालीन परिणाम है ,जिसने वानस्पतिक पर्यावरण का पूरी तरह रूपान्तरण कर दिया है । मानव-सभ्यता के निरन्तर जटिल से जटिलतर होते जा रहे विकासक्रम नें मानव-जीवन के पर्यावरण में मानवीय सृषिट को भी शामिल कर दिया है । मनुष्य जाति द्वारा अर्जित ज्ञान-विज्ञान ,निर्मित भव्य भवन,सड़के,विधुत व्यवस्था ,कारखानें ,बांध,पुल, शिक्षा-व्यवस्था ,ग्रन्थ, साहित्य ,संगीत ,फिल्में , टी.वी. नगर और राज्य-व्यवस्था आदि सभी मानव-निर्मित पर्यावरण ही हैं । आदिम मनुष्य नें जब प्राकृतिक गुफाओं की तलाश छोड़कर पहली बार घर बनाया होगा या एसिकमों नें ध्रुवीय भालू का अनुकरण करते हुए इग्लू के पूर्व रूप का निर्माण किया होगा या फिर किसी मृत पशु के चर्म में घुसकर बर्फीली हवाओं को पछाड़ा होगा तो उसका यह कार्य पर्यावरण निर्माण की दिशा में ही बढ़ा हुआ कदम था और आज भी अपराध-नियन्त्रण के लिए जब वह नया कानून बनाता है तो उसके इस प्रयास में भी अपने पर्यावरण (सामाजिक) को ही और बेहतर बनाने की सामूहिक इच्छा छिपी रहती है । इस दीर्घकालीन विकासक्रम में गम्भीर अवरोध तब उत्पन्न हुए जब संंस्कृति को मानवीय सृजन के रूप में न देखकर उसे जातीय और धार्मिक जड़ता और अपरिवर्तनीयता से जोेड़ दिया गया ।
            एक ऐसे समय में जब पशिचम नें पूरब को न सिर्फ संक्रमित ,आक्र्रान्त और परिवर्तित किया है , बलिक पूरब में पशिचम कें संक्र्रमण के प्रतिरोध में उत्पन्न रूढि़वादी प्रतिसांस्कृतिक उभार को भी प्रतिक्रि्रयात्मक ढंग से उत्तेजित किया है । विशुद्ध पूरब को दूषित और विकृत कर उसे अन्तर्जीवी या फिर आक्रामक और प्रतिहिंसात्मक बना दिया है । कुछ वैसे ही जैसे किसी वायरस से संक्र्रमित होने पर मानव-शरीर ''एण्टी-बाडी का निर्माण करने लगता है - इस विमर्श का उददेश्य पशिचम की शकित-संरचना  के उस आदिम कबीलार्इ अचेतन के प्रति पशिचम को भी सावधान करना है ,जिससे उसके द्वारा निर्मित और विकसित आज तक की सभी व्यवस्थाएं निकल नहीं पार्इ हैं । इन व्यवस्थाओं में उसके द्वारा निर्मित आधुनिकतम राष्æ अमेरिका ,साम्यवादी अवधारणा का इतिहासित प्रतीक सोवियत रूस और संयुक्त राष्æ संघ जैसी संस्थाएं भी हैं। इस विमर्श की आधारभूत स्थापना यह है कि पशिचम और पूर्व की सभ्यताओं के वर्तमान व्यवहार और प्रवृत्यात्मक  विषेशताओं के अन्तर को ,उनके भिन्न सामूहिक अचेतन को उनके पूर्वजों के द्वारा विकसित र्इश्वर की भिन्न अवधारणाओं से समझा जा सकता है । इस विमर्श की दूसरी महत्त्वपूर्ण स्थापना यह है कि पशिचम के व्यवस्था की शकित-संरचना उसके र्इश्वर की चारित्रिक परिकल्पना के अनुरूप ही न सिर्फ अधिनायकवादी है ,बलिक वह वैसी ही शकित-संरचना के अनुरूप बार-बार राजनीतिक व्यवस्था, की खोज करती है । यह विमर्श उनके लिए भी उपयोगी हो सकता है जो पशिचम के सामूहिक अचेतन से अनभिज्ञ रहते हुए, उसे एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक आदर्श मानकर ,उसे पूरब के सामूहिक अचेतन को समझे बिना ही पूरब की धरती पर पशिचम की अवधारणाओं को अविकल रूप से किसी उपनिवेश की तरह घटित और मूर्त देखना चाहते हैं। चाहे वह पशिचम का साम्यवाद या वैशिवक नेतृत्व के दावेदार अमेरिका का तथाकथित सफल पूंजीवाद ही क्यों न हो ।
          पशिचम की सभ्यता-चाहे वह लोकतन्त्र ही क्यों न हों ,आज भी व्यवहार के धरातल पर सामान्य मनुूष्य के अधिकारों के अन्तत: निरस्तीकरण और अपहरण पर ही आधारित है । आज भी पशिचम की सभ्यता अपने द्वारा विकसित सबसे आदर्श व्यवस्था लोकतन्त्र में भी सबसे सही मनुष्य के रूप में तात्कालिक राजनीतिक र्इश्वर की खोज कर रही है । यह कि पशिचम की राजनीतिक शकित की परिकल्पना में आज भी वही आदिम कबीलार्इ र्इश्वर छिपा हुआ है ,जिसने सददाम हुसैन की तरह एडम को अपने आदेश की अवहेलना कर वर्जित फल चखने के अपराध में धरती पर अपदस्थ कर दिया था । जो आज भी उतना ही असहिष्णु है -मानव निर्मित राजनीतिक व्यवस्था के माध्यम से पुनर्जीवित होकर । जिसने कभी भी वैचारिक चुनौती देकर शैतान को सभ्य और नैतिक होने के लिए प्रेरित नहीं किया । जो स्वयं उस युग के मनुष्यों की खोज है जब भारत में असामान्य मनोरोगी राक्षस और पशिचम में शैतान से प्रेरित माने जाते थे । जो उन्नीसवीं शताब्दी में मनुष्य द्वारा निर्मित दैत्याकार मशीनों की तरह ही दैत्याकार यानित्रक व्यवस्था के रूप में पुन: जीवित हो उठा था । जिससे जुड़े मानव-विश्वासों को माक्र्स नें मानव-जाति के लिए अफीम के समान मानते हुए भी अपने भीतर के उसके अचेतन मनोवैज्ञानिक प्रभावों का अतिक्रमण करने की वैचारिक सफलता नहीं प्राप्त की , क्योंकि पशिचम के अधिनायकवादी निरंकुश,असहिष्णु और एडम विरोधी र्इश्वर की तरह उसका पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही उसके जातीय आदिम अचेतन का ही दार्शनिक विस्तार है । पशिचम का सामूहिक अचेतन शैतान के रूप में निरन्तर अपने किसी अदृश्य शत्रु की खोज के लिए विवश करती है । शैतान के कुटिल चालों से संत्रस्त र्इश्वर और उसकी सृषिट की तरह पशिचम जिस अवधारणा की उपज है ,वह बुद्ध के अशेष करुणा के मर्म तक पहुंच ही नहीं सकता है। सच तो यही है कि शैतान की ओर से होने की आशंका  के साथ ही यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया गया था । मुहम्मद साहब के विरोध का कारण भी उनके शैतान की ओर से होने की आशंका ही थी । आश्चर्य की बात यही है कि यहूदी ,र्इसार्इ और इस्लाम तीनों धमोर्ं को मानने वाले समाज नें शैतान के रूप में शत्रु की खोज जारी रखी । यही कारण है कि पशिचम एक आशंकित सभ्यता का निर्माण करता है तथा अनैतिक कूटनीति और शकित-आधारित हत्याओं  का नैतिक समर्थन और भव्यीकरण भी। ऐसे ही विश्लेषणों के कारण अप्रिय लगते हुए भी इस लेख में इस तथ्य की ओर भी संकेत करना पड़ा है कि अपनी सारी वैचारिक स्थापनाओं के बावजूद माक्र्स प्रणीत साम्यवाद की सांस्कृतिक सीमा यह है कि वह पशिचम के एकेश्वरवादी-अधिनायकवादी आदिम-कबीलार्इ सांस्कृतिक अचेतन की न सिर्फ परम्परा में है ,बलिक उसका लाेंकतानित्रक राजनीतिक आधुनिक संस्करण है । उसके द्वारा विकसित व्यवस्थाओं के वर्तमान व्यवहार में भी कबीलार्इ आक्रामकता और असभ्यता के अचेतन प्रेरक-बिन्दु देखे जा सकते हे। भारत के एकमात्र निर्णायक और विशुद्ध क्रानितकारी आन्दोलन नक्सलवाद में भी पशिचम के कबीलार्इ अचेतन का ही पूरब में वैचारिक उपनिवेश देखा जा सकता है ।
          मेरी दृषिट में आज के पशिचम की सभी राजनीतिक व्यवस्थाएं पषिचम के अधिनायकवाादी असहिष्णु र्इश्वरीय सामूहिक अचेतन का अतिक्रमण नहीं करती ,बलिक उसके राजनीतिक व्यवहार को मानकीकृत करती हैं । इसके विपरीत पूरब का साभ्यतिक अचेतन बहुलतावादी और उदार है । पूरब की हिन्दू और बौद्ध जैसी दोनों महत्वपूर्ण गैर-राजनीतिक सभ्यताएं मानव-जीवन के स्थायित्व के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक सत्ता और व्यवस्था-प्रविधियों की खोज करती रही हैं । अपने अविश्वास के जातीय मनोविज्ञान एवं संस्कृति के कारण पशिचम जहां शकित आधारित राजनीतिक सत्ता को पसन्द करता रहा है वहीं पूरब का प्रयास राज्य-व्यवस्था को एक सांस्कृतिक-सामाजिक उपसिथति के रूप में विकसित करने का रहा है । यहीं कारण है कि पूरब के सभी महान आदर्श और प्रेरक चरित्र चाहे वह राम ,कृष्ण महावीर बुद्ध हों या गांधी सभी राजनीतिक सत्ता के परित्याग के मिथक का ही साभ्यतिक भव्यीकरण प्रमाणित करते हैं । प्राचीन समय से ही पूरब की सामाजिक और सांस्कृतिक मानव-सम्बन्धों की संरचना राजनीतिक सत्ता के निषेध और विकेन्æीकरण पर ही आधारित रही है । विशेषकर भारत की उपजाऊ भौगोलिक समृद्धि ने उसके नागरिकों को प्राचीन काल से ही अभावजन्य प्रतिक्रियावादी और आर्थिक धरातल पर अपहरणधर्मी होने से बचाए रखा । संभवत: इसीलिए अपने लम्बे इतिहास में इसनें पशिचमी अर्थों में राजनीतिक सत्ता की खोज और स्थापना कभी नहीं की । केवल उन क्षणों को छोड़कर जिसमें काबुल-कन्धार ने रामायण और महाभारत काल में कैकेयी और गान्धारी के माध्यम से भारतीय राजघरानों में अपनी प्रत्यक्ष हस्तक्षेपकारी उपसिथति नहीं दर्ज करार्इ थी। यह अकारण नहीं है कि ये दोनों भारतीय संस्कृति को दूर तक प्रभावित करने वाले महाकाव्य पूरब और पशिचम के जीवन-मूल्य और व्यवस्था दृषिट के द्वन्द्वात्मक अन्तर्संघर्ष को भी अत्यन्त तीव्रता और प्रामाणिकता से प्रस्तुत करते हैं । इसी संघर्ष के पश्चात भारतीय समाज अपने सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक आदशोर्ं का निर्णायक चयन करता है ।
      भारत अपने पशिचमी प्रभाव में जिस प्रकार शकित पर आधारित राजनीतिक समाज में बदलता जा रहा है ,वह न सिर्फ भारतीय नहीं है ,बलिक सभ्यताओं के वैषम्य के कारण भारत के सामाजिक पर्यावरण में कर्इ नर्इ उत्तर-आधुनिक यानि अभूतपूर्व विकृतियों की भी सृषिट कर रहा है । इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या है भारत में पशिचमी ढंग के पेशेवर यानि कार्य एवं मूल्यांकन आधारित राजनीतिक समर्थन-तंत्र का विकसित न होना । राजनीतिक दल और उनका नेतृत्त्व गैर-राजनीतिक प्रविधियों का प्रयोग करते हुए सत्ता में बने रहना जान गए हैं । लेकिन अभी कुछ ही समय पूर्व बिहार राज्य के चुनाव-परिणामों ने संकेत कर दिया है कि देर से सही भारत बाजार के नियमों से संचालित पेशेवर राजनीति की ओर बढ़ रहा है । यहां बाजार षब्द का प्रयोग मैंने विशेष अभिप्राय से ही किया है । लोभ जनित क्रूरताओं के बावजूद बाजार सामान्यतया एक र्इमानदार मूल्य संसूचक व्यवस्था भी है। यदि उसे बाजारेतर विशेषज्ञता द्वारा दूषित या दुष्प्रभावित न किया गया हो । धर्म, जाति ,कुल और परिवारवादी संगठनों से अपâत भारतीय राजनीति एक स्वस्थ सभ्यता की दिशा में गम्भीर चिन्ता का विषय है ।
          इस चिन्ता के बावजूद पशिचम की व्यवस्था-परिकल्पना और क्रानित सम्बन्धी अनेक वैचारिक स्थापनाएं पूरब के मानवीय सांस्कृतिक-साभ्यतिक अचेतन के अनुरूप मैं नहीं पाता। अपनी विनम्रतापूमर्ण असहमति के साथ मैं ऐसा मानता हूं कि पूरब को एक स्वाभिमानी और मौलिक सभ्यता के रूप में बने रहने के लिए ही नहीं बलिक एक शान्त,विमर्शपूर्ण और मानवीय सभ्यता की संभावनाओं की तलाश में अपनी आधुनिकता ,वैज्ञानिक औचित्य ,वैशिष्टय तथा उपयोगिता के वास्तविक आधारों की खोज करनी ही चाहिए । उससे पशिचम राज्य और राजनीति को सामाजिक सत्ता के रूप में विकसित करने की सांस्कृतिक प्रविधि एवं मानवीय चरित्र प्राप्त कर सकता है । पशिचम की तनाव,बल-प्रयोग,अविश्वास और हिंसक कार्य-संस्कृति से बाहर निकालने में पूरब की सभ्यता के अनुभवों का मनोवैज्ञानिक विनिवेश हो सकता है । पूरब को अपनी विषेशताओं से पषिचम को परिचित कराना चाहिए न कि पशिचम के समाज के राजनीतिक सत्ता में रूपान्तरण की अवधारणा को बिना किसी परिवर्तन के स्वीकार कर लेना चाहिए ।
           अलग-अलग सभ्यताओं के र्इश्वर और उसके चरित्रीकरण-प्रतीकीकरण की भिन्न अवधारणाओं को उनके अलग और विशिष्ट सामूहिक अचेतन के प्रभावशाली प्रमाण के रूप में देखना उचित होगा । ऐसा करने के पर्याप्त साभ्यतिक साक्ष्य है। यह एक तथ्य है कि विगत सामुदायिक विश्वास एक भावी और आदर्श वैशिवक समाज की रचना में बाधक हैं । अवधारणाओं की अराजकता ने जिस बहुसांस्कृतिक और बहुराष्æीय विश्व का निर्माण किया है , एक विकसित और सभ्य मानव-सभ्यता के लिए उसका संरक्षण किया जाना चाहिए या विसर्जन । जबकि एक सीमा के बाद ये विविधताएं किसी स्वतन्त्र आविष्कार की तरह मानव-विश्व को रंगारंग और बहुवैकलिपक भी बनाती है । जबकि आस्वाद आधारित सभी उत्पाद -मिठार्इ और संगीत से लेकर सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवहार तक सभी मनुष्य की सृजनशीलता के ही विविध आयाम हैं । उन सभी के लिए जो इस धरती को छोड़कर अन्तरिक्ष की उड़ान नहीं भर सकते इसी बूढ़ी धरती में ही अपनी सृजनष्ीलता के आयामो और अवसरों की खोज करनी होगी। उदाहरण के लिए हर नया खेल एक नए आनन्दपूर्ण व्यवहार पद्धति की भी खोज करता है । चाहे वह कि्रकेट ,फुटबाल या टेनिस ही क्यों न हो अपनी व्यापक लोकप्रियता और सामाजिक स्वीकृति के बाद सांस्कृतिक बन ही जाता है । कर्इ रीति-रिवाज सीमित या व्यापक रूप से उत्सवधर्मी मानवीय पर्यावरण का निर्माण करने के कारण स्थानीय और हास्यास्पद होने के बावजूद समुदाय विशेष के लिए महत्वपूर्ण आनन्द प्रदायी भूमिका में होते हैं ।  इसलिए ''सोशल और 'कल्चरल इंजीनियरिंग भी मानव-सभ्यता के विकास और आधुनिकीकरण के दो क्षेत्र हो सकते हैं । इसलिए उसे संवेदनशीलता से हटाकर सृजनशीलता के दायरे में लाना ही मानव-सभ्यता के भविष्य के लिए हितकर होगा । सभ्यता और संस्कृति पर किसी वैशिवक आधुनिक विमर्श के लिए यह भी विचार का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है।
         गांधी की आंखों से न भी देखें तो भी राजनीतिक सत्ता का भव्यीकरण एक पशिचमी नजरिया है जो मनोवैज्ञानिक दृषिट से न सिर्फ लोकतन्त्र की समानता की अवधारणा की मूल-भावना के विपरीत है ,बलिक वह अपनी प्रतिक्रिया में असामान्य मनोवैज्ञानिक चुनौतियां देने वाला और आपराधिक रूप से उकसाने वाला भी है । मैं भारत और अमेरिका में हुए आक्रमणों को ऐसी ही असामान्य मनोवैज्ञानिक उत्तेजना का परिणाम मानता हूं। गांधी की हत्या के पीछे भी उनकी नीतियों का कम, उनके महात्मार्इ विशिष्टतावाद की प्रतिक्रिया में उपजी चुनौतियों का अधिक हाथ रहा होगा । असितत्व और व्यकितत्व के भव्यीकरण और बढ़ते सार्वजनिक प्रभाव के साथ वह व्यकित अपनी प्रभावशीलता के औचित्य और अनौचित्य के प्रति जवाबदेह होता जाता है ।  
         जीवन का विसंस्कृतिकरण करने वाले या संस्कृति-विशेष को एकमात्र आदर्श करने वाले जीवन के ऐसे तथाकथित शुद्धतावादी प्रयासोें के पीछे मनुष्य को यन्त्र मानने वाली वह मशीनी अवधारणा भी छिपी है ,जो अठारहवी-उन्नीसवीं शताब्दी के आविष्कारों तथा दैत्याकार यन्त्रों की अतिमानवीय शकितयों से चमत्कृत और मुग्ध होकर मनुष्य को भी एक स्वचालित जैविक यन्त्र-विशेष ही मान बैठा । मुझे तो प्रथम और द्वितीय विश्व-युद्ध तथा आज की आतंकवादी बर्बरता में भी अठारहवीं सदी की नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से चमत्कृत युगीन चेतना का यन्त्रवादी अचेतन ही छिपा दिखता है। जबकि आज के परमाणु युग का जीव-विज्ञान जीन की संरचना में विभिन्न रसायनों के बन्ध के रूप में भौतिक पदाथोर्ं के भी जीवन के उदभव और असितत्व के महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखे जाने का आग्रह कर रहा है। अठारहवीं शताब्दी के यानित्रक भौतिकवाद से प्रेरित जीवनबोध को जैविक भौतिकवाद की ओर ले जाने की जरूरत है । यह सांस्कृतिक-बोध मुझे अब भी असाहितियक नहीं लगता कि प्रकृति का जैव-यानित्रक उत्पाद ही सही फिर भी जीवन अपनी भौतिक सामान्यता में भी एक असामान्य विलक्षण चमत्कार है-जो प्रकृति और ब्रहमाण्ड के अरबों-खरबों विरल संयोगों के बाद संभव हुआ है । उसे मध्ययुगीन आध्यातिमक सम्मान यदि नहीं दे सकते तब भी उसे आतिमक सम्मान तो दिया ही जाना चाहिए-इस ऐतिहासिक अनुभव और वैचारिक चेतावनी के साथ कि तथ्यपरक विश्वास रहे हों या काल्पनिक अन्ध-विश्वास दोनों ने ही हजारों वर्षो तक मनुष्य जाति की जिज्ञासा वृतित को स्थगित रखनें में प्रगति-विरोधी सफलता पार्इ है ।
          इसीप्रकार एक नर्इ मानव-सभ्यता की खोज में पूरब की सभ्यता और संस्कृति के आधुनिकतावादी विमर्श  के लिए भिन्न मानव-व्यवस्था ,परिकल्पना और वैशिष्टय के कर्इ और बिन्दु रेखंकित किए जा सकते हैं । सभ्यतागत भिन्नता और उनकी भिन्न प्रेरक अवधारणाओं के तुलनात्मक विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि अपने सजग इतिहास-बोध की परम्परा के कारण पशिचम जहां समय को रचता है ; या यह कहें कि समय को रचते हुए जीता है तो पूरब हर मनुष्य को अपने आदिम निर्विकार मन की खोज के लिए प्रेरित करता रहा है । यहीं एक और तथ्य सामने आता है कि एक सीमा के बाद हर सभ्यता अपने मनुष्यों को साभ्यतिक यन्त्र में बदलती जाती है । पूरब की सांस्कृतिक प्रकि्रया मनुष्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी साभ्यतिक यानित्रकता, लौकिक स्मृतियों के पूर्वापर प्रभाव नियति या जड़ता से बाहर निकालकर विशुद्ध विवेक की ओर मोड़ने की रही है । जीवन-बोध को निरन्तर अधतन बनाए रखने का प्रयास शवों को तुरन्त जलाकर उसका तुरन्त विलोपन कर दिए जाने में भी देखी जा सकती है । प्रकृति मृत को सड़ाकर खाद में बदल देना चाहती है ,जबकि स्मृतिजीवी होने के कारण मनुष्य अपनी सारी स्मृतियों को अनन्तकाल के लिए संरक्षित करना चाहता है । पशिचम की इतिहास चेतना इसी मानवीय स्मृतिजीविता का परिणाम है । यही स्मृतिजीविता ही उसे कब्र-निर्माण के लिए प्रेरित करती है । वह मानव शरीर को नहीं बचा सकता तो वह उसकी कब्र को ही बचा लेना चाहता है । इसप्रकार वह स्मृति की अमरता की खोज करता है जबकि पूरब की सारी सराहना लौकिक स्मृति से बाहर निकले चित्त के लिए ही रही है । इसे ही वह मोक्ष कहता रहा है ।
         इसीलिए मैंं इस विमर्श का आरम्भ यहां से करना चाहूंगा कि वैशिवक धरातल पर मानव-जाति के सांस्कृतिक इतिहास का विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आता है कि वर्तमान में आदिम विश्वासों के रूप में मानव-जाति के पास दो र्इश्वर है । एक पशिचम का विधि-निषेधों के प्रति अति-संवेदनशील नैतिक किन्तु असहिष्णु र्इश्वर ; दूसरा र्इश्वर के होने न होने की परवाह न करने वाला , मानव के विशुद्ध चित्त की खोज करने वाले धर्म का आविष्कारक मनुष्य जो अपनी पवित्रता और दिव्यता से र्इश्वर की अवधारणा को ही अप्रतिषिठत कर उसे धरती पर उतारने में विश्वास करता है । जिसके धर्म का आरम्भ ही राजनीतिक शकित के परित्याग से होता है । इसे स्पष्ट करते हुए मैं कहूं तो दुख से मुकित के लिए सिद्धार्थ के राज्य-त्याग को मैं सामाजिक और सांस्कृतिक शकित ( संघ ) की खोज के रूप में लेता हूं । राज्य-त्याग का वर्तमान भारत में दूसरा महत्त्वपूर्ण लोकप्रिय आदर्शवादी चरित्र राम का है,,जिन्हें भारत में एकल दाम्पत्य का मैं प्रवर्तक मानता हूं । जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी से लेकर उन्नीसवी शताब्दी के पूर्वाद्र्ध तक सकि्रय और जीवित मो.क.गांधी तक मानव-अपमान पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का नैतिक बहिष्कार करते दीखते हैं । इसी आधार पर मैं पूरब की संस्कृति और धर्म को मानव-असितत्त्व की दिव्यता का सम्मान करने वाली संस्कृति मानता हूं । बौद्ध और जैन धर्म के बाहर भी पूरब का र्इश्वर एक विकेन्द्रीकृत र्इश्वर है। तातिवक दृषिट से वह मनुष्य की र्इश्वरता और दिव्यता को स्वीकार कर र्इश्वर की व्यकितवादी शकित-संरचना उपसिथति और असितत्व की सभी धारणाओं को शून्य करता है । इतना शून्य कि वह एक नैतिक और शिष्ट-पवित्र मनुष्य के रूप में भी देखा जा सकता है ।
          पूरब की र्इश्वर सम्बन्धी अनेक अवधारणाएं जीवन की आश्चर्यजनक विविधता और चमत्कारिक उपसिथति को समेटने के प्रयास में र्इश्वरीय सत्ता के विकेन्द्रीकरण का बोध और संकल्पना देती हैं ;जबकि पशिचम का र्इश्वर अवधारणा के समाज-मनोवैज्ञानिक प्रभावों के धरातल पर राजनीतिक सत्ता के केन्द्रीकरण को प्रोत्साहित करता है । यही कारण है कि इस व्यवस्था का प्रतिरोध निर्मित करने के लिए कार्ल माक्र्स को सर्वहारा के अधिनायकत्व की परिकल्पना करनी पड़ती है । इसप्रकार पूरब की मुकित का अधतन यूटोपिया साम्यवाद भी शकित-संरचना के पशिचमी अचेतन से बाहर नहीं निकल पाया और निरन्तर बल-प्रयोग के द्वारा स्वयं को जीवित रखने का प्रयास करता हुआ जल्दी ही थक गया । पशिचम की व्यवस्था-संरचना और परिकल्पना का दोष और सीमा दोनों ही यही है कि वह बार-बार अपने र्इश्वर की आदिम अवधारणा की राजनीतिक पुनर्रचना करने लगता है। अमेरिकी राष्æपति इसका उदाहरण है फ्रांस भी इसका अपवाद नहीं है ,इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री भी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने निर्वाचित सहयोगियों की  इच्छा के निरस्तीकरण और उपेक्षा की वैधानिक षकित पा लेता है। कहने के लिए वह जनता के प्रति जवाबदेह होता है ,संचार-माध्यमों द्वारा निर्मित जनमत से प्रभावित हो सकता है ; लेकिन सच्चार्इ यही है कि एक बार निर्वाचित होने के बाद वह प्रभावित होने के लिए बाघ्य नहीं है । व्यवस्था के शकित-संरचना से सम्बनिधत सभी का सामूहिक अचेतन एक होने के कारण जनता भी उसके ऐसे निरंकुश व्यवहार को स्वीकार करती रहती है । दूसरे शब्दों में वह अचेतन रूप से सहमत होती चलती है । इसीलिए मुझे लगता है कि पशिचमी सभ्यता जब तक अपने सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक अचेतन का समुचित विश्लेषण नहीं करती तब तक वह नेपालियन ,हिटलर और स्टालिन ,निक्सन और बुश पैदा करती रहेगी । उसका लोकतन्त्र भी सामान्य  जन की इच्छाओं के निरस्तीकरण से प्राप्त व्यवस्था-प्रभु की खोज करता है । आज का भारत पशिचमी र्इश्वर की अवधारणा से संक्रमित शत्रु राष्æों के कूटनीतिक विद्वेष और घात करने वाले चालों से संत्रस्त है ।
           पषिचम के र्इश्वर को जिसे मैं पशिचम के सांस्कृतिक अचेतन का आदिम सामूहिक प्रतीक मानता हूं । उसमें यीषु मसीह के प्रतिरोधपूर्ण हस्तक्ष्ेाप की सही समाज-मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्या स्वयं पशिचम ने ही नहीं की है । एक ऐसा भावुक युवक जोे अपनेे जीवनकाल में ही अपनी मां के पति यूसुफ का पुत्र नहीं माना जाता है -अपने जीवन को एक ऐसे दिव्य पिता की खोज में समर्पित कर देता है ,जिसके पुत्र सारी दुनिया और सभी देश-काल के सभी मनुष्य हैं । र्इसार्इ धर्म का योग दान यह है कि जैविक पिता सम्बन्धी कबीलार्इ  अवधारणा का विरोध करता है । यहूदी धर्म की मूल परम्परा ही नस्लीय और रक्त-शुद्धता पर आधारित ,हजारों वर्ष लम्बी  वंशानुगत यात्रा में एक जातीय परिवार की रही है । उनके जन्म को देवदूतों से जोड़ने वाला प्रसंग जितना  उन्हें महिमा-मंडित करता है ,उनके जन्म से ही विशिष्ट होने के बोध का व्यकितगत और सामाजिक पोषण करता है । दूसरी ओर बार-बार उनके पिता के बारे में पूछे जाने को जिसे र्इसार्इ परम्परा प्राय: आध्यातिमक प्रश्न के रूप में ही लेती है उसकी तत्कालीन यहूदी मनोवृतित की परिचायक व्यंग्यात्मक प्रश्न के रूप में सामाजिक व्याख्या भी की जा सकती है । जिसका काव्यात्मक उत्तर देकर यीशु अपनी प्रतिष्ठा बचाने का प्रयास करते रहे और अन्तत: तत्कालीन यहूदियों के शुद्धतावादी प्रतिरोध एवं षडयन्त्र के शिकार हो गए । जैविक पिता की अनिवार्यता तथा यहूदियों की कुटुम्बीय जाति की अवधारणा का अतिक्रमण करते हुए यीशु स्वयं को अपने दिव्य पिता का पुत्र घोषित कर सारी मानव-जाति के एक ही उदगम की ओर जो ध्यान आकर्षित करते हैं , उनकी उपलबिधयां प्लेटो और अरस्तू की तरह भले ही बुद्धिवादी नहीं रही होंं लेकिन पशिचमी समाज के लिए वे युगान्तरकारी संस्कृति-वैज्ञानिक अवश्य प्रमाणित हुए । उनके दिव्य पिता का पुत्र होने की अवधारणा प्रसिद्ध भारतीय अवधारणा 'वसुधैव कुटुम्बकमके समानान्तर ही प्राचीन काल का क्रानितकारी वैशिवक प्रयास है ।
         इन दृषिटयों को लेकर मैं जब पशिचम की ओर देखता हूं तो आम धारणा के विपरीत यीशु और मुहम्मद दोनों ही मुझे पषिचम में पूरब की राजनीतिक शकित विरोधी सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक शकितवादी चेतना के ही विस्तार लगते हैं । दोनों ही एडम ओर र्इव की थोड़ी भी चूक को बर्दास्त न करने वाले पषिचम के असहिश्णु अधिनायकवादी र्इश्वर को मानवीय बनाते हैं । मानव-जाति के सम्पूर्ण इतिहास में दोनों ही अभूतपूर्व यतीम (पितृविहीन,अनाथ) न सिर्फ दिव्य और सार्वभौम पिता की खोज करते हैं बलिक आदिम कबीलार्इ अवधारणा के गुस्सैल-असहिश्णु र्इश्वर का पिता और पुत्र के मानवीय सम्बन्धों में पुनर्संस्कार करते हैं । जैसे आज का भारत गांधी को गोली मारकर उनकी विचारधारा से दूर हट गया है ,मुझे बार-बार लगता है कि यीशु को क्रूस पर चढ़ाकर और मुहम्मद साहब की मृत्यु के पष्चात पशिचम भी अपने प्रर्वतकों की पीड़ा और विचारधारा को समझने में असफल रहा है । पशिचम बार-बार अपने व्यवस्था-निर्माण की सभी शैलियों में ,अपने आदिम-कबीलार्इ अधिनायकवादी र्इश्वर की ही खोज करते हुए दमन ,निरसित तथा सामान्य मनुष्य के अधिकारों का अपहरण करने वाली व्यवस्था-परिकल्पना की ओर बार-बार लौट आता है । इस लौटने को सिकन्दर,नेपोलियन,हिटलर,स्टालिन ,सददाम हुसैन,लादेन और जार्ज बुश आदि कर्इ आवर्ती रूपों में देखा जा सकता है । पशिचम इस अचेतन से बाहर निकलकर राजनीतिक शकित आधारित व्यवस्था से बाहर किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शकित आधारित मानव-विश्व और व्यवस्था की खोज कर ही नहीं सका है । विभाजित स्वामित्व (र्इश्वर और शैतान ) की अचेतन अवधारणा नें उसे क्रमश: काल्पनिक शत्रु के षडयन्त्रों के प्रति शक्की ,कूटनीतिक ,सह-असितत्व विरोधी ,कुचक्री ,असहिष्णु और हिंसक बना दिया है । अपने इस अचेतन से मुकित का संघर्ष और प्रयास स्वय पशिचम को ही करना होगा । उसे लौटना ही होगा यीशु और मुहम्मद जैसे अपने दिव्य पिता के दिव्य पुत्रों की मानव करुणा वाले पवित्र संस्कृति-पूर्वजों की ओर। इतना ही नहीं ,एक ही सामूहिक अचेतन के उत्तराधिकारी पशिचमी पूंजीवाद और साम्यवाद प्रवर्तक कार्ल माक्र्स के भी राजनीतिक साम्यवादी व्यवस्था को पूरब के सामाजिक-सांस्कृतिक-विकेन्द्रीकृत र्इश्वर वाले सामूहिक अचेतन के अनुरूप-मानव-सम्मान पर आधारित ,विकेन्द्रीकृत किन्तु आत्मानुशासित ,अहिंसक, और शान्त मानवीय व्यवस्था की खोज करनी ही होगी ।  
        पूरब -विषेशकर भारत की आध्यातिमक अवधारणाओं का मूल सूत्र उसकी भाषा-वैज्ञानिक चेतना के विकास में छिपा हुआ है । उसका ब्रहम, सिथतिप्रज्ञता  और शून्य वस्तुत : सभ्यताजन्य विकृतियों से अप्रभावित मनुष्य के विशुद्ध चित्त की खोज ही है । यह चित्त जो सर्वकालिक आदिम है और अधतन भी । इस चित्त की खोज उस रेफरी की उपसिथति की तरह महत्वपूर्ण है ,जो किसी खेल के हिंसा में बदल जाने के पूर्व ही चेतावनी की सीटी बजाकर उसे रोक सकता है । पशिचम का र्इश्वर नितान्त अवधारणापरक है जबकि  पूरब का र्इश्वर अवधारणा से अधिक सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक है । पूरब के लिए ऐतिहासिक स्मृतियों को जीना जीवन-प्रकि्रया की आवृतित और अनावश्यक को जीना है । उसके लिए ऐतिहासिक स्मृतियों को जीना ही अहंकार और मोह-युक्त मन को जीना है -अफीम है । इसके विपरीत पशिचम के  र्इश्वर की व्यापित कम है । वह तात्तिवक और दार्शनिक कम लेकिन सामाजिक और मानवीय अधिक है । वह सृषिट के निर्माता तथा अच्छार्इ और बुरार्इ के प्रतीकों का सरलीकृत रूप है।  वह अपनी अवधारणा में ही सर्वशकितमान नहीं है । वह और उसकी बनार्इ दुनिया , उसके समानान्तर की र्इष्यालु रूहानी उपसिथति शैतान के कायोर्ं एवं मानव-विरोधी षडयन्त्रपूर्ण प्रयासों से संत्रस्त है । उसका एकेश्वरवाद भी दरअसल आषिंक एवं विभाजित एकेश्वरवाद है ; क्योंकि उसकी अवधारणा में सृषिट की सारी शकितयां ( शैतान के सह-असितत्त्व के कारण निरीह एवं संत्रस्त किन्तु सिर्फ मानव-विश्व का निर्माता होने की सीमा तक ही आंशिक सर्वशकितमान) एक अच्छे एवं पवित्र (जिन्न!) गाड ,खुदा या यहोवा तथा (बुरे जिन्न ) शैतान या इबलीस में विभाजित हैं। दरअसल वह प्रभावशाली शासक-सत्ता और शासक बनने क लिए निरन्तर षडयन्त्ररत शत्रु-सत्ता का ही आदिम रूपक है। मानव समाज में व्याप्त अच्छाइयों और बुराइयों का ही सृषिट की विराटता के समकक्ष निर्मित चारित्रिक प्रतिरूप । इस प्रकार अवधारणा के स्तर पर वह जन-सामान्य के लिए उपयोगी है ही नहीं । क्योंकि उसकी अवधारणा एक राजनीतिक संस्कृति का ही निर्माण कर सकती है और अपने समाज-मनोवैज्ञानिक प्रभावों में वह सिर्फ एक सैन्यीकृत समाज और संस्कृति का ही प्रेरक और निर्माता हो सकता है ।
           यह एक संयोग नही है कि पशिचम के प्राय: सभी प्रसिद्ध धर्मप्रवर्तक जैविक परिवार की आदिम कबीलार्इ अवधारणा को न सिर्फ गहरी चोट पहुंचाकर उसे ध्वस्त करते हैं और सम्पूर्ण मानव-जाति के एक परिवार होने का सन्देश देते हैं। (सिर्फ मूसा को छोड़कर , जो अपने कुल की अपमानित असिमता के प्रतिकार के प्रयास में विश्व के सबसे बड़े पारिवारिक धर्म (यहूदी) से कभी बाहर नहीं निकल पाये )। लौकिक या संकीर्ण परिवार के प्रति उनका (यीशु और मुहम्मद का ) दार्शनिक निषेेेध अकारण ही नहीं है । ऐसा करने के पीछे उनके निजी जीवन के अनुभवों का ठोस मनोवैज्ञानिक आधार भी था । मनोवैज्ञानिक दृषिट से पितृ-विहीनता की यही मानसिक आवृतित इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब में भी देखी जा सकती है तथा कुछ परिवर्तन के साथ रामायण और महाभारत के नायक राम और कृष्ण में भी। मुहम्मद साहब के पिता अब्दुल्लाह की मृत्यु तो उनके जन्म से पहले ही हो चुकी थी । कृष्ण की तरह , जिन्होने अपनी मां देवकी का दूध नहीं पिया बलिक यशोदा का पिया तथा उनका विकास ही एक सर्वप्रिय सार्वजनिक शिशु के रूप में हुआ-मुहम्मद साहब नें भी अरब की प्रथा के अनुसार अपने चाचा की दासी सुवैबा तथा किराए की दार्इ हलीमा का दूध पिया । सन्तानोत्पतित के लिए अयोग्य दसरथ के यहां राम का जन्म ही विशिष्ट एवं दिव्य शिशु होने की अवधारणा के साथ हुआ । मध्ययुगीन सन्त कवि कबीर के भी जन्म की मानवीय-मनोवैज्ञानिक परिसिथतियां इसीप्रकार की हैं । अपने वास्तविक जैविक पिता के जीवित स्नेह और मानवीय संरक्षण से वंचित इन सभी शिशुओं ने मानव-जाति की सांस्कृतिक संरचना को बहुत दूर तक प्रभावित किया। ये सभी किसी दिव्य सत्ता के प्रतिनिधि या अवतार हैं या नहीं लेकिन मेरी दृशिट में महान और महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव वाले ऐसे संस्कृति-वैज्ञानिक हैं जिन्होनें मानव-जाति के इतिहास में रागात्मक सम्बन्धों की पारिवारिक और कबीलार्इ संरचना को तोडा । उसका अतिक्रमण किया और मानव-जीवन को रागात्मक सम्बन्ध के धरातल पर सम्पूर्ण प्रकृति के साथ अन्तर्सन्दर्भित करते हुए पुनर्परिभाषित किया । यह धर्म का वह समाज- मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य है जिसका सम्बन्ध र्इश्वर की दार्शनिक अवधारणा से कम ,लेकिन मानव-जाति के सम्पूर्ण असितत्व से अधिक है । मानव-जाति के असितत्व के सम्पूर्ण इतिहास में परमाणु और हाइड्रोजन बम के आविष्कार और विस्फोट की तरह ये नैतिकता और आत्मीयता के बड़े संवेदनात्मक विस्फोट हैं । हिन्दुओं में जीवन पर्यन्त के लिए एकल दाम्पत्य-सम्बन्ध की सामाजिक प्रथा का सम्बन्ध तीन पतिनयों वाले पिता दसरथ के पुत्र राम के एकल दाम्पत्य से है ।
        स्वयं र्इसाइयत में भी बौद्ध-धर्म की वैशिवक उपसिथति के परिदृश्य में भी पूरब की सांस्कृतिक सत्ता का पशिचम मेें स्थापित होता हुआ उपनिवेश देखा जा सकता है । लेकिन पशिचम की त्रासदी यह है कि र्इसार्इ-विश्व संगठित होते ही एक बार फिर ' ओल्ड टेस्टामेंट मेें व्यक्त सृषिट के उदभव सम्बन्धी अवधारणाओं की ओर मुड गया। इससे आगे चलकर पशिचम का नवजागरण और अधिक संघर्ष और चुनौती-पूर्ण हो गया । बाद का सारा र्इसार्इ धर्म स्वयं र्इसा मसीह द्वारा नहीं बलिक उनकी शहादत को प्रचारित और भव्यीकृत करने वाले उनके भावुक अनपढ़ और अन्धविश्वासी अनुयायियोंं द्वारा रचा गया । उदाहरण के लिए आदम के पाप के फल को चखने और यीषु के बहे हुए रक्त के बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाली भावुक धार्मिक अपील के लिए स्वयं यीशु को तो जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । सृषिट के मात्र छह दिन में रचना सम्बन्धी धारणा का भी यीशु से क्या सम्बन्ध हो सकता है ! इसीलिए मेरा मानना ह कि यीशु मसीह पूरब की संस्कृति और चेतना के ऐसे प्रतिनिधि हैं , जिनकी पशिचम नें हत्या कर दी ,दूसरी हत्या पशिचमीकृत भारत के अचेतन धार्मिक अनुयायी नें गांधी की बीसवीं शताब्दी में की जिसे मैं इस्लाम की प्रतिक्रिया में भारतीय सभ्यता के पषिचम से संक्रमण की स्वााभाविक एवं ऐतिहासिक प्रतिनिर्मित में उपजे -सांस्कृतिक दृषिट से मुसिलमीकृत हिन्दू के हाथों हुर्इ मानता हूं । इस्लाम के सांस्कृतिक प्रतिरोध में निर्मित हिन्दू जिसका जन्म ही शरीर में बनने वाले प्रतिजैव की तरह प्रति- इस्लामी है । इस संक्रमित इस्लामीकृत हिन्दू का सांस्कृतिक अचेतन भी मैं पूरब के विकेन्æीकृत शकित-संरचना तथा  र्इश्वर की अवधारणा सम्बन्धी अचेतन के अनुरूप भारतीय नहीं मानता ।
            वस्तुत: पूरब लम्बे समय तक सामुदायिक-सांस्कृतिक सत्ताओं को ही जीने का आदी रहा है.....


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         एक नयी व्यवस्था को पानें की दिशा में भविष्य-चिंतन परिकल्पना,योजना और यूटोपिया के रूप में हो सकता है । खतरा यह है कि अधिकांश यूटोपिया अपनें निर्माण के समय की वास्तविकताओं की प्रतिकि्रया में ही जन्म लेते हैं । लेकिन उनके अनुयायी और प्रशंसक उन्हें सार्वभौम मान लेते हैं । इस समझ के अभाव में किसी यूटोपिया या विचारधारा के पाश्र्व-दुष्प्रभाव का चिन्तन नहीं हो पाता । इस तरह हर परिकल्पनात्मक विचारधारा एवं यूटोपिया में
मनवीय प्र्यावरण के विनाश के कुछ खतरे हो सकते हैं ।

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

नए रचाव का समर्थ कवि

चिन्तन-दिशा
सम्पादक-âदयेश मयंक
अंक-6-7,जनवरी-जून 2012 में प्रकाशित
(सम्पादेीय कार्यालय-
ए-701,आशीर्वाद-1,पूनम सागर काम्लेक्स,
मीरा रोड (पूर्व),मुम्बर्इ-401107
मोबाइल-09869118707)



                     

         रामाज्ञा शशिधर के काव्य संग्रह ''बुरे समय में नींद की कविताओं को पढ़ना एक विरल एवं विशिष्ट काव्य अनुभव से गुजरना है । गहन संवेदनात्मक जीवनानुभवों और स्मृतियों के सघन बिम्बधर्मी मौलिक रचाव की उनकी कविताएं समकालीन कविता और कवियों के प्रति सजग रचनात्मक असन्तोष की उपज हैं। इस असन्तोष और नकार में ही रामाज्ञा की कविताओं की अलग भाव-भूमि और अलग शिल्प के प्रस्थान-बिन्दु का रहस्य भी छिपा है । तर्ज की मर्ज की शिकार, कविताएं पढ़कर कविताएं लिखने वालों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए मेरी भी निजी धारणा समकालीन कविताओं के अधिकांश के प्रति बहुत अच्छी नहीं रही है । मुद्रण की सर्वसुलभ प्रौधोगिकी नें अच्छे-बुरे सभी को छपने की सुविधा प्रदान की है । अब छपना एक सामान्य घटना है और सत्ता के संसााधनों पर अपनी पकड़ और नजदीकियों  के कारण अथवा किसी बड़ी पूंजी के सहारे बाजार पर नियन्त्रण से अर्जित यश के अर्थशास्त्र और समीकरणों को बढ़ती जागरूकता के कारण आम पाठक भी बहुत कुछ समझने लगा है । आम जनता से कटा यह साहित्य लेखन सरकारी खरीद के माध्यम से पुस्तकालयों में अपनी जगह पा तो लेता है,लेकिन हिन्दी के आम पाठकों में साहित्य के प्रति अरुचि और अनास्था उत्पन्न कर पठनीयता को हतोत्साहित भी करता है ।
         रामाज्ञा शशिधर की कर्इ कविताएं समकालीन बुद्धिजीवियों तथा हिन्दी कविता की अविश्वसनीयता और पतनशीलता की पड़ताल करती हैं ।  इस दृषिट से ''वे बुद्धिजीवी हैं,'दिल्ली,'कला समय,'एक दिन चुक जाओगे'मुंडेर पर कौआ,'मुठभेड़,'कसौटी आदि कविताएं महत्वपूर्ण हैं । यह समय जो सत्ता,बाजार और संचार के सहारे महानता को प्रायोजित करती है ,सम्बन्धों के सहारे सफलता का इतिहास रचती है ,सिर्फ उपसिथति और प्रसिद्धि केे तथ्य और तर्क के आधार पर मूल्यांकन और महत्व का निर्धारण एक झूठे और संदिग्ध रचना-समय को विज्ञापित करती है । रामाज्ञा की इन कविताओं में प्रतिभा और योग्यता के बावजूद उपेक्षित युवा पीढ़ी की पीड़ा और आक्रोश की प्रभावी अभिव्यकित हुर्इ है ।'वे बुद्धिजीवी हैंइसलिए हर चीज का विकल्प है उनके पास......वे अपने समय सेइतनी ज्यादा नफरत करते हैंकि बीबी और बच्चे भीअपनी रचना का कच्चा माल दिखते हैं (वे बुद्धिजीवी हैं ),'हम दिल्ली के सबल सिपाहीगीत गजल पर शासन अपना....रामराज्य तक आवाजाही! (दिल्ली)'यह सिद्धों का नहींसिद्धहस्तों की कला का समय है (कला समय)'उग रही हैं पत्थरों परदूबों की नर्इ प्रजातियांप्रतीक्षा कर रहे हैं सबतुम्हारी रचना के रí हो जाने की (एक दिन चुक जाओगे),लूटते हैंरोशनी की हाट जोरच रहेवे ही समय की सुर्खियां (मुंडेर पर कौआ),तुमनें एडि़यों से रगड़ दी पगडण्डी  चुपचाप गायब हो गयीं दिशाएंउड़ेल दी स्याही पृष्ठों परमर गए सारे के सारे अक्षर (मुठभेड़ ) तथा 'महान कवि होता जा रहा हूं इन दिनोंमूल्य में भर रहा हूं आस्वाद की नकलनकल के आस्वाद को ही मूल्य बता रहा हूं (कसौटी)।

        समकालीन हिन्दी कविताओं के परिदृश्य में रखकर देखें तो उनकी कविताएं सबसे पहले एक अलग और बिल्कुल निजी काव्यभाषा के रचाव,लोक-सम्पृक्त कविता-मानस ,जन-सरोकारों एवं संधषोर्ं के लिए चिनितत ,प्रतिबद्ध और सक्रिय कवि व्यकितत्व के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं। समकालीन समाज में कवि-कर्म की गिरती हुर्इ साख के दौर के प्रति एक सफल प्रतिरोध रचती उनकी कविताएं जुझारू आस्था एवं सृजनात्मक आत्मविश्वास के साथ कवि-कर्म को सार्थक प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। कवि का यह रचनात्मक आत्मविश्वास 'पपड़ी के नीचे शीर्षक कविता में इसप्रकार व्यक्त हुआ है-' मैं समय की क्यारी में दबा हुआ अंखुआसुख का स्वप्न का भविष्य कामैं सभ्यता की पपड़ी में ढकी हुर्इ भाषा प्यार की उमंग की उम्मीद की........मैं ही रचूंगा हवा में खुशबूमैं ही भरूंगा भविष्य में जीवनमैं ही गाऊंगा हरेपन का गीतशब्द हूं मैंबीज के कोश से फूटता हुआ स्वप्न। यह आत्मविश्वास इस संग्रह की 'भाषा'तुम्हारे खिलाफ,'बदलो जी,'हमारी कतारों में शामिल'इनिद्रय बोध आदि कर्इ कविताओं देख जा सकता है । ये कविताएं रामाज्ञा के कविकर्म के संकल्प ,स्वभाव और सन्देश की शिनाख्त की दृषिट से महत्वपूर्ण हैं । चाहे वह भाषा कविता की'भाषा में प्रतिरोध ऐसे फैलाओजैसे वे फैलाते हैंव्यापारके रूप में हो या तम्हारे खिलाफ कविता की 'तुम्हारे खिलाफ सपने देखनें और गीत गानें की चुनौती ,'बदलो जी कविता में घिसे-पिटे राग बदलने का संकल्प तो 'हमारी कतारों में शामिल कविता में कविता को प्रतिरोध और संघर्ष के सशक्त सामूहिक हथियार के रूप में रचनें और देखने का स्वप्न ।
          रामाज्ञा जीवन के सूक्ष्म निरीक्षण के कवि हैं । लेकिन उनका यह सूक्ष्म निरीक्षण भी उनकी गहरी संवेदनशील प्रकृति से परिचालित है । इस दृषिट से उनकी एक ही कविता कुम्हार का उद्धरण ही काफी है । जिसमें उन्होंने कुम्हार जीवन के सारे अनुभवों और पेशे की घ्वनियों को बिम्बों में बदल दिया है । समय और बाजार के खिलाफ अपनें पेशे में बनें हुए कुम्हार की चिन्ता ,आर्थिक परिसिथतियां और नियति को कवि पृथ्वी और चाक दोनों के उसके न चाहते हुए भी घूमनें के सहज रूपकात्मक बिम्ब से व्यक्त कर देता है-
               उसके न चाहते हुए भी
               उसकी उंगलियों में घूम रही है
               पृथ्वी...
कविता का एक दूसरा बिम्ब दिए बनाते समय टूटते रहनें की ध्वनि को गहरे आदिम सम्बन्धो के टूटते रहनें की ध्वनि को गहरे आदिम सम्बन्धों के टूटनें से जोड़ देता है-
             ' खुच से टूटे हैं अभी-अभी
              गहरे आदिम संबध
आर्थिक मजबूरियों से हुए विस्थापन किस प्रकार प्राकृतिक रिश्तों को भी बंजर धरती में बदल देते हैं,यह संकलन की'पिता आये थे सपने में शीर्षक कविता में देखा जा सकता है । पिता का सपने में आना वास्तविक जीवन में पिता के न आ पाने की अभावात्मक व्यंजना करता है । यह व्यंजना जीवन की त्रासदी को और गम्भीर बना देती है । पिता के साथ साहचर्य ,राग और संवेदना के साथ जीवन जीने का एक अविस्मरणीय लोक ,प्राकृतिक जीवन पद्धति तथा लुप्त हुआ महत्वपूर्ण पर्यावरण है ,जिसे यह कविता सपने के रूप में ही सही बचाने का प्रयास करती है ।
       रामाज्ञा लोक के उत्सवधर्मी मन ,आस्था ,राग और संवेदना के सभी तारों काी सघन बुनावट के कवि हैं । इस दृषिट से उनकी छठ का पुआ कविता देखी जा सकती है । छठ यधपि सूर्य की आराधना से सम्बनित है लेकिन उध्सकी तिथि का निर्धारण षष्ठी के चन्द्र से ही होता है । प्रवासी कवि को मां की याद छठ के पर्व पर आती है । छठ के पर्व पर मां के गतिविधियों की परिकल्पना कवि की कल्पना को उत्तेजित कर उसे पुए छानती मां से चांद तक पहुंचा देती है। फिर कवि की कल्पना काव्य-न्याय के सहारे अनेक रागात्मक संभावनाओं से खेलने लगती है । कभी चांद के धब्बे उसे जली हुर्इ रोटी की याद दिलाते हैं तो कभी कटे हुए अधूरे चांद का दृश्य उसे चूहों द्वारा कुतरी गर्इ रोटी तक पहुचा देता है । रागात्मक अनुभवों का एक अलग संसार पूरी जीवन्तता के साथ पाठक के लिए भी खुल पड़ता है । यह संसार कविता का संसार होते हुए भी वास्तविक संसार की अनुभूतियों एवं यादों से रचा गया है । यह संसार लोक की संवेदना ,समर्पण और राग का है ,जहां का सूरज कृतज्ञता और आभार का है और हर श्रमजीवी का जीवन आधार है ,जहां उसका पूजना भी परिहास का नहीं बलिक एक श्रद्धास्पद आस्था के साथ गौरवशाली मानव-मूल्य बन जाता है -'पसीनें में आस्था है पसीने से प्यार हैपसीना सूरज से जन्मा है मैं सूरज का बेटा हूंसूरज को पूजता हूं। सूरज यहां जीवन के एक खोए हुए रिश्ते और अर्थ के रूप में सामनें आता है । इस तरह यह कविता लोकपर्व छठ के उत्सवधर्मी लोकमन का साक्षात्कार कराती है ।
        रामाज्ञा की कर्इ कविताएं सूक्ष्म निरीक्षण ,सृजनात्मक कल्पना और जीवन राग का अदभुत संयोजन प्रस्तुत करती हैं । ऐसी कविताएं सामान्य में भी असामान्य ढूंढ़ लेने वाली कवि की तीसरी आंख और लम्बे रचनात्मक श्रम और चिन्तन का परिणाम हैं । उदाहरण के लिए लड़कियों का साइकिल स्टैण्ड  शीर्षक कविता के रचनात्मक कौशल को देखा जा सकता है । साइकिलों का मानवीकरण और फिर लड़कियों के व्यकितत्व का आरोपण ,उनका लड़कियों के कभी प्रतीक तो कभी प्रतिनिधि के रूप में चित्रण और अन्त में निद्र्वन्द्व लड़कियों के किशोर मनोविज्ञन के अनुरूप उनके जीवन का अल्हड़ खिलन्दड़ापन इस कविता को इस संकलन की ही नहीं बलिक हिन्दी की भी अविस्मरणीय कविता बना देती हैं -'एक की गलबहियां किए दूसरी खड़ी हैदूसरों की टांग पर पहली नें रक्खी एड़ीतीसरी खींच रही दूसरी का रिबन........कतारबद्ध खड़ी हैं लड़कियों की आत्माएंआरजू आशिकी दीवानगी तमन्नाएंं।
        साझेदार  कविता जीवन में सहयोग और साहचर्य का दर्शन प्रस्तुत करती है -'तुम्हारे सुख में शामिल है मेरा सुखतुम्हारे दु:ख में शामिल मेरा दु:ख.......कोर्इ फलजैसे थोड़ी सी मिटटी का बना होता है थोड़े से पानी काथोड़ सी हवा काथेड़ी सी धूप का.......साझा कोख में पलता है भविष्य।इसी तरह चौकीदार कविता पूंजीवादी सभ्यता में किसी मनुष्य के श्रम का मूल्यांकन करने की प्रवृतित को मानवीय संवेदना के धरातल पर प्रश्नांकित करती है -जबकि बीत चुका है रात का तीसरा पहरदोनों को जरूरत है गाढ़ी नींद की ऐसी नींद जो ओस की तरह कोमल होकपास के फूल की तरह आरामदेहदेर सुबह मांगोगे उससेझपकियां लेनेनींद,स्वप्न औरऐसी ही कर्इदूसरी चीज में खो जानें का हिसाबइसके एवज मेंकहां से दोगे उसेउसके हिस्से का सूरज....।बजट कविता सम्बन्धों पर पड़ने वाले बाजारवादी प्रभाव का रेखांकन करती है -'संबन्धों का ऐसा हमने बजट बनायाहर सपना चीख पड़ा है।
      पुस्तक के अनितम कवर पृष्ठ पर प्रकाशित मदन कश्यप की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि 'रामाज्ञा शशिधर की कविताएंं संवेदना की नर्इ बनावट के साथ-साथ यथार्थ को देखने-परखने के अपने नजरिए के कारण भी प्रभावित करती है । यह नर्इ रचना-दृषिट आम आदमी के संघषोर्ं में उनकी सक्रिय भागीदारी की देन है। आज की कविता और कवियों को देखते हुए इसे दुर्लभ ही माना जाएगा । इसीलिए रामाज्ञा अपने समकालीनों में सबसे अलग हैं । वे किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं और इस रूप में नागाजर्ुन की परम्परा का विकास उनमें देखा जा सकता है । कपास की खेती करनें वाले किसानों के शोषण और आत्महत्याओं की त्रासदी तथा उनके यथार्थ की भयावहता को रामाज्ञा नें अपनी विदर्भ कविता में जिसप्रकार रूपाान्तरित किया है वह उनकी रचना-सामथ्र्य का तो मानक है ही ,एक नए समर्थ कवि की प्रापित के रूप में हिन्दी कविता के लिए भी महत्वपूर्ण है -
     संसार का सबसे बड़ा श्मशानधूसर सलेटी कालासंसार का सबसे बड़ा कफनमुलायम
     सफेद आरामदेहमणिकर्णिकेतुमनें विदर्भ नहीं देखा है
कविता विदर्भ के सफेद कपास की खेती को कफन की संज्ञा देकर और मणिकर्णिका से सन्दर्भित कर शोषण के कारण हो रही मौतों के बारे में सीधे-सीधे न कहते हुए भी बहुत कुछ कह देती है ।
    रामाज्ञा की कर्इ कविताएं कुतिसत राजनीति और उसकी साजिशों के प्रति आम जनता को सजग करती हैं-'मेमनें को सब बता दूंगा तुम्हारे द्वारा बांटी गर्इ हरी पतितयों के बारे में । संकलन की खेत कविता राजनीतिक शोषण और उपेक्षा के शिकार कृषिकर्म तथा उसके त्रासद यथार्थ को, जो किसानाें को आत्महत्या के लिए विवश करती हैं को एक नर्इ सांकेतिक व्यंग्यार्थी अभिव्यंजना देती है -'खेत से आते हैं फांसी के धागेखेत से आती है सल्फास की टिकियाखेत से आते हैं श्रद्धान्जलि के फूलखेत से आता है सफेद कफनखेत से सिर्फ रोटी नहीं आती ।      
       संकतन की शीर्षक कविता 'बुरे समय में नींद विकास के नाम पर बहुआयामी विनाश के वर्तमान दौर का एक प्रभावी स्वप्न-रूपक प्रस्तुत करती है । अन्य कविताओं की तरह इस कविता में भी वांछित अभिव्यकित के लिए बिल्कुल नए काव्य-शिल्प की तलाश देखी जा सकती है । यह कविता बहुत आसानी से फैण्टेसी शिल्प में लिखी जा सकती थी । लेकिन इस कविता की विश्वसनीय प्रभावशीलता इसके स्वाभाविक रूप में वास्तविक दु:स्वप्न के रूप में प्रस्तुत किए जानें में ही है -
               ' इस बुरे समय में देर-सबेर आती है नींदनींद के साथ ही शुरू होता है सपना
                सपने में पृथ्वी आती है नाचती नहींकोयल आती है कूकती नहीं
                गौरैया आती है चुग्गा नहीं चुगतीबादल आते हैं बरसते नहीं'
रामाज्ञा के कविताओं की रचना प्रकि्रया एक साथ इतनी बहुस्तरीय,सहज और विशिष्ट है कि उनमें प्रकृत संसार के साथ-साथ कविता का बौद्धिक मानसिक सूक्ष्म संवेदी प्रति-संसार भी अर्थ-सम्प्रेषण की अधिकतम संभावनाओं के साथ सक्रिय रहता है । सूरन कविता के रचाव को देखें तो वह चुपचाप दलित उपेक्षित सर्वहारा वर्ग के प्रतीक में कब बदल जाता है ,इसका पता ही नहीं चलता -मैं रह गया ओल का ओलन मिली नागरिकता न भूगोल। कविता सूरन के स्वाभाविक वर्णन से शुरू होती है और शीघ्र ही असितत्व के जुझारूपन,जददोजहद और जिजीविषा के प्रतीक में सूरन को बदलती हुर्इ पाठक को जीवन के दार्शनिक साक्षात्कार तक ले जाती है -
      ''फालतू बोझिल समय नेंफेंक दिया गाठों के गुच्छ कोबंसवाड़े,गंडोरे या भटठे के पांव तले
     फैलना पड़ा धीरे-धीरेधरती के गर्भाशय को जबरिया फैलाता हुआ
     कोख का जीवन से ऐसा ही रिश्ता है
        रामाज्ञा शशिधर उन कवियों में से हैं,जो कविता को सिर्फ रचतें ही नहीं ,बलिक उसे जीते भी हैं । जब मैं उनसे पहली बार काशी हिन्दू विश्वविधालय के हिन्दी विभाग में व्यकितगत रूप से मिला था ,तो उनके कवि रूप और उनकी कविताओं से बिल्कुल ही परिचित नहीं था । मैंने पंकज विष्ट के समयान्तर में प्रकाशित उनके कुछ रिपोर्ताज पढे थे और,जोकहरा में आयोजित एक सेमिनार में दिया हुआ उनका व्याख्यान भी सुन चुका था । दोनों ही जगह उनकी संवेदनाधर्मी बिम्बात्मक भाषा पढ़-सुनकर मुझे यह अनुमान हो गया था कि इस व्यकित में कविता है । उनसे मैंने यह कहा कि आपमें मुझे कविता दिखती है । यदि अब तक नहीं लिखा हो तो लिखिए और यदि लिख चुके हों तो पढ़ाइये । जब भी लिखेंगे अपने ढंग की होगी । मेरी बात सुनकर रामाज्ञा सिर्फ मुस्कराए थे । 'बुरे समय में नींद  की कविताएं पढ़कर मेरे उस पूर्वाभास और पूर्वकथन की पुषिट हुर्इ है । रामाज्ञा की कविताएं दुर्लभ संवेदी प्रजाति की कविताएं हैं । वे लोकधर्मी संवेदना,प्रतिरोध ,संकल्प और जिजीविषा की अभिव्यकित करने वाली कविताएं हैं । उनकी कविताओं में त्रासद यथार्थ -विनाश और प्रलय में भी जीवन की चीखों की मार्मिक शिनाख्त मिलती है ।
   रामाज्ञा की कविताएं सामूहिकता और रिश्तों का मानवीय पर्यावरण ,राग और संवेदना ,कविकर्म की सामाजिक परिवर्तन में निर्णायक भूमिका के साथ कविता के प्रति एक नयी आस्था की प्रतिष्ठा करती हैं-'कि तुम भाषा मेंआग इस तरह लाओजैसे वे लाते हैंस्ांधि-पत्रभाषा में प्रतिरोध ऐसे फैलाओजैसे वे फैलाते हैं व्यापार....... हमारा समय नायकविहीन हो गया है....रामाज्ञा की कविताएं एक नायक विहीन युग में सही नायक के तलाश की प्रस्तावना करती है ।

            समीक्षित पुस्तक-
                        'बुरे समय में नींद
                        कवि- रामाज्ञा शशिधर
                        प्रकाशक-अनितका प्रकाशन, सी-56यूजीएफ-4
                        शालीमार गार्डन,एक्सटेशन-।। गजियाबाद-201005 (उ0प्र0)

मंगलवार, 26 जून 2012

प्रेम-त्रासदी

उन दिनों प्रेमी का असितत्व और चेहरा
कहीं खोया हुआ था दुनिया की भीड़ के बीच
जिसकी अनथक तलाश करनी थी हमें
मित्रगण पिट रहे थे
और रात-रात भर जाग कर काट रहे थे अपना समय
प्रेम की असफल तलाश में...

उन दिनों सड़क पर प्रेम खोजने से अच्छा था
बन्द कमरे में बिस्तर पर लेटकर
की गयी प्रेम की कल्पनाएं ....
इस तरह हमारा काफी लम्बा समय 
प्रेम की प्रतीक्षा और उसकी तैयारियों में निकल गया

लम्बे समय तक हम यही तय नहीं कर पाये कि
हमें प्रेम करने की पहल करनी है
या करनी है किसी और द्वारा प्रेम में पहल की प्रतीक्षा.....
सड़कों पर लड़कियां कम थीं
और उनसे टकराने के अवसर और भी कम
या फिर ऐसी थीं जिन्हें कोर्इ भी
पसन्द करने से बचना चाहता था

निर्दोष चेहरे बहुत कम थे
और सच्चे और सही प्रेम की तलाश में
अपनी हार स्वीकार चुके मेरे मित्र
फिल्मी नायिकाओं के पोस्टरों से काम चला रहे थे
या फिर चुपके-वुपके यात्रा काते हुए भी टकरा जा रहे थे
एक ही पसन्द के चौराहे पर

कर्इ बार बाल-बाल बचे हम
हो सकने वाली भीषण टक्कर से
कर्इ बार मित्रों को सहलाते-समझााते और स्वस्थ करते रहे
प्रेम के भीषण टक्कर से हुर्इ नुकसान से......

कर्इ बार हम ऐसे अनुभव से गुजरे
जब कल्पना छिन गयी
और पूरी तरह जमीन पर आ गये हम
लेकिन बिना नाम-पता पूछे खो गयी चिटिठयों की तरह ही
खत्म हो गए प्रेम के ऐसे संभावित पड़ाव
तो कर्इ बार र्इष्र्या से बीमार मित्रों को बचाने के लिए
प्रेम के अवसरों का बहिष्कार कर आगे बढ़ गए हम

सच तो यह है कि प्रेम की तलाश में निकलना
मेरे लिए एक श्रमसाध्य और त्रासद अनुभव की तरह रहा
मैं एक युद्ध में फंसा था सामाजिक अपमान के
और मेरा अधिकांश समय उसके प्रतिकार की तैयारियों में नष्ट हो रहा था
मेरे लिए प्रेम में भटकने से अधिक महत्त्वपूर्ण था
मेरा उर्वर और सृजनात्मक मानसिक समय
मैं किसी भी प्रिय-अप्रिय अनुभव-क्षण के कालिक-विस्तार में फंसना नहीं चाहता था.....

अनितम निष्कर्ष यह कि
घर के भीतर रहने और उसे बाहर से देखने के अनुभव की तरह
जनसंख्या की आवृतित के साथ
प्रेम के वैकलिपक तलाश की दुविधा कर्इ बार बनी रहती है
सबके लिए संभव नहीं है मिल पाना वांछित और निर्विकल्प प्रेम

अनुभव के ऐसे ही एक विशेष क्षण में
मैंने उसे देखा
उसका होना एक अपरिहार्य विचार की तरह
छा रहा था मेरे मन-मसितष्क पर
मैंने उसके बारे में सोचा....और-और सोचा तथा
उसके विकल्पों के द्वन्द्व से बाहर निकलने की प्रतीक्षा की......
मैं उसे विचारों से बाहर निकालकर
जीवन में भी जीना चाहता था
मैंने सोचा और सोचा-उसके बारे में और सोचना
मेरे लिए एक पीड़ादायक विचार की तरह था
मैंने उसे अपने विचारों की दुनिया से निकाल बाहर किया
और वापस अपने पास लौट आया....
औसत प्रेम बाजार के किसी सामान को अपना बनाकर
उसे घर में बदल देने वाले अनुभव में पूरा होता है ।

कवियों के बारे में

यह कविता
कर्इ कवियों के व्यकितगत जीवन
के सर्वेक्षण पर आधारित
एक तथ्यात्मक विचार मात्र है !

सर्वेक्षण में अधिकांश कवि दूसरों के प्रति
सामान्य से अधिक शिकायतों से भरे थे
वे दूसरों के प्रति बहुत अधिक अपेक्षाओं से भरे थे
वैसे तो थे वे दुनिया के सबसे संवेदनशील प्राणी
दु:ख के तापमापी यन्त्र की तरह
डूबते-उतराते हुए अपने ही भीतर व्याप्त दु:ख में.....

अधिकांश कवि इतने आत्मकेनिद्रत थे कि
दूसरों के दु:ख के प्रति संवेदनशील और र्इमानदार रह पाना
उनके लिए संभव ही नहीं था.......
उनके असन्तोष का स्तर इतना अधिक था कि
उनके आस-पास के लोग
वंचित होते हुए भी सन्तुष्ट और सुखी होने की सीमा तक
चुपचाप जीना सीख गए थे....

अधिकांश कवि बहुत भीतर से
चालाक और सतर्क थे
लेकिन बाहर से वे बेवकूफ और बेकार 
प्रचारित हो गए थे
दूसरे शब्दों में वे मजाक के स्तर पर
कवि होने के लिए याद किए जाते थे......

अधिकांश कवि दूसरों के बारे में
सोचने के प्राय: अयोग्य होते हैं
लेकिन वे अपने बारे में इतनी गहरार्इ से सोचते हैें कि
उनका सोचना सबका सोचना बन जाता है 

सवेक्षण से यह भी पता वला कि
यधपि सारे कवि आत्मकेनिद्रत होते हैं
लेकिन उनका रोना इतनी दूर तक
दूसरों को सम्बोधित होता है कि
प्राय: उनके आत्मकेनिद्रत होने की ओर
हमारा ध्यान ही नहीं जाता....

दूसरे शब्दों में 
बचपन में सबसे ज्यादा रोने वाले बच्चों के
कवि होने की संभावना ज्यादा होती है....

अच्छे कवि इतना अच्छा रोते हैं कि
उनका रोना हमारे समय का
प्रामाणिक रोना बन जाता है....
इसतरह रोते हैं कि उनका रोना
सारी दुनिया का रोना बन जाता है ।

रविवार, 24 जून 2012

समय में कौए

(यह कविता आपातकाल के दिनों में ही स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से किए जा रहे माननीय प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन के साथ एक कौए का पाश्र्व स्वर गूंजने पर लिखी गयी थी । अधतन प्रासंगिकता के कारण डायरी के पन्नों से बाहर प्रकाशित देखना जरूरी लगा)


1.

टी0वी0 पर गूंज रही है उस कौए की कर्कश आवाज
(माननीय) प्रधानमंत्री जी के भाषण के साथ
हम सिर्फ उसे सुन सकते हैं उड़ा नहीं सकते
इस वक्त आवाज निकालकर या लगभग डांटते हुए
उसे उड़ा देना या चुप करा देना संवैधानिक शिष्टाचार के खिलाफ है...
प्रधानमंत्री भी उसे उड़ा नहीं सकते या फिर
किसी को उसे उड़ाने के लिए कह नहीं सकते....
वे अपना पूर्वलिखित भाषण पड़ रहे हैं
उसमें उस कौए के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है

कविता की भाषा से बाहर वास्तविकता में संभवत:
वह इतने अधिक मनुष्यों की चुप और शान्त उपसिथति को समझ नहीं पा रहा है
या फिर वह माननीय प्रधानमंत्री जी की एकल आवाज सेले रहा है होड़़
या फिर आतंकवादियों की किसी विध्वंसक साजिश की ओर
वह अपनी ही भाषा में कोर्इ जरूरी रहस्यमय संकेत करना चाहता हो

अंगरक्षक उस पर गोली भी नहीं चला सकते क्योंकि तब
कोए के साथ गोली की आवाज भी पूरे राष्ट्र में गूंज जाएगी
उसकी आवाज निर्णायक अनितम और अपरिहार्य है
वह अब हमारी पसन्द और नापसन्द से परे है
जाने क्या कुछ बोलता हुआ
उसे अब किसी का भी भय नहीं
उसे अभयदान मिल चुका है और अब वह निर्भय कौआ है
अब उसे ही यह तय करना है कि वह क्या कुछ
और कब तक बोलता रहे और कब उड़ जाए
चुने गए राजनीतिज्ञो के समानान्तर
अब वह एक संवैधानिक रूप से संरक्षित प्रतीकात्मक कौआ बनता जा रहा है

सीधे प्रसारण में राजनीतिज्ञों की तरह गूंज रही है उसकी आवाज
प्रिय या अप्रिय होने की चिन्ता से मुक्त
सत्ता द्वारा संरक्षित एक प्रतीकात्मक उपसिथति की तरहं....
जैसे वह आश्वस्त हो कि इस वक्त उसकी उपसिथति का
अब कोर्इ विकल्प नहीं है-वह बोल सकता है
 जो और जैसा चाहे......उसके सही या गलत होने के बावजूद
 लोगों को उसे सुनना ही पड़ेगा....


2.


व्यकितगत रूप से मुझे चुने गए राजनीतिज्ञ भी पसन्द नहीं थे
मैंने उन्हें अपना अमूल्य मत भी नहीं दिया था
वे जिन दलों के प्रत्याशी थे
उनके स्थानीय सदस्य और कार्यकर्ता भी उन्हें बिल्कुल नहीं जानते थे
कि वेे कौन हैं और क्या करना चाहते हैं
इसतरह वे एक अप्रत्याशित प्रत्याशी थे नेतृत्व के
व्यकितगत रूप से वे एक गूंगे प्रत्याशी की तरह थे जिनके साथ
लिखित आवाज के रूप में पार्टी का घोषणापत्र था...

मुझे कौए भी पसन्द नहीं हैं और नही उनकी कर्कश-कटु आवाज
मैंने उन्हें गौरैया के अंडों को बिना बच्चे बने ही फोड़कर
किसी आतंकवादी की तरह पी जाते देखा है
अपनी हिंसक प्रवृतित और संगठित व्यवहार के कारण
वे प्राय: गलत इतिहास पुरुषों जैसे ही होते हैं
जिन्हें समय की विडम्बनाओं के साथ सिर्फ सहा जाता है और सहना पड़ता है
मुझे तो समय के राजनीतिज्ञ भी कौओं जैसे ही लगे
जो शिशु हाथों की रोटियों की तरह
आम जन की भावनाएं एवं विचार छीनकर
व्यवहार और शब्दों तक पहुचने के पहले ही उड़ और उड़ा ले जाते हैं
इस तरह कौआ मेरे लिए मेरे जीवन और पर्यावरण की
बलात,हिंसक और अप्रिय उपसिथति एवं अवांछित समय है......



3.



समय और पर्यावरण में कौए
हर दिन-हर सुबह...हर शाम मेरे छत की मुंडेर पर
अपनी खुफिया आंखे लिए आ बैटता है
और फिर ध्वनि एवं विचार-प्रदूषण की तरह
घण्टों करता रहता है अपनी अपरिहार्यता की मुनादी
कुठ ऐसे कि खबरदार ! अपनी औकात से बाहर
जो कुछ भी सोचा तो.....

दूसरे दिन वह फिर आ जाता है
हलो ! कहकर व्यंग्य से मुस्कराता है
कुचर-कुचर करता हुआ डरावनी आवाज में फिर शुरू हो जाता है
लड़ाता और धमकाता है बहसें
एक ही बात को कर्इ-कर्इ माध्यमों से कर्इ-कर्इ बार
प्र्रसारित करवाता है-ऐसा है मेरा समय...वैसा है मेरा समय
कुछ ऐसा ही बार-बार दुहराता है

अपनी भददी आवाज की कर्कश धार से
चोंचों की मार से मेरे विचारों को लहूलुहान करता
छीन लेता है मेरे अन्तर में
अंकुरित होने के लिए छटपटाते
बीज जैसे हर नन्हें नए कोमल चूजे विचार....
वह मुझे पूर्ण सहमत देखना चाहता है
वही नहीं चाहता कि मेरे भीतर पल रहा हो कोर्इ
वैचारिक संभावना का वैकलिपक प्रतरोध
मेरे भीतर का विचार उसके सिद्धान्तत:
उसके सही ही होने के दावे को स्वीकार नहीं करता
जबकि वह पूरी ताकत के साथ मेरे मसितष्क में भी
अपने ही विचरों का उपनिवेश देखना चाहता है
वह मेरे प्रतिरोध पर क्षुब्ध आक्रोशित और आक्रामक है....

कहां मैं हूं गलत-मैं हाथ जोड़कर पूछना चाहता हूं उससे
और मेरे हर पूछनें के साथ उसकी खुली खोंच
किसी खूंखार सैनिक की निशाने पर तनी गन की तरह
विस्फोटक धमाकों में गूंजती रहती है खांव-खांव-खांव-खांव....
अब वह मुझसे शानित और व्यवस्था के अनुशासन के रूप में
पूर्ण स्थगन मांगने लगा है.....

शायद वह मुझे भी समझने लगा है आतंकवादी
ऊपर के किसी खुफिया निर्देश पर
जैसे कि उनके लोकतंत्र के असितत्व को भी हो खतरा
मेरे भूमिगत सृजनात्मक सपनों और मेरे आदर्श मानवतावाद से
बहुत ही खतरनाक क्रानितकारी है यह
करता है सम्पूर्ण मनुष्यता की बातें
किसी भी देश की सरकार को संकीर्ण वर्ग और आतंक समझता
अपने-आप को प्रतिबद्ध समुदायवादी समझता है मनुष्यता का
हर देश की पुलिस को रखनी चाहिए इस पर खुफिया नज़र
यह भयानक बुद्धि-अपराधी किसी भी देश के देश-भकित प्रचार को
एक मध्ययुगीन आदर्शवादी निष्ठा और
सारी मानवता के खिलाफ षडयन्त्र समझता है-घेर लो इसे !
कौओं का कमाण्डर कांव-काव चीखता हुआ
अपने सैनिकों को देता है निर्देश
जबकि मैं अभी भी नहीं डर रहा
उसकी भावनाओं की तात्कालिक वैधता का करता हुआ सम्मान
उसकी भी दृषिट पर सहानुभूति से विचार करता
भीतर अपनी असहमति छिपाए संवैधानिक लाचारी में ही सही
उसे पूरे सम्मान के साथ कांव-कांव नांव-नांव करने की देता हुआ सहमति ।ं
समय के कौए तो चीख रहे और तेज
सिर के बहुत पास तक लड़ाकू हेलिकाप्टरों-सा उतर आए
अपने ऊपर उनके भ्रमों से बुरी तरह परेशान
उनके आरोपों का प्रतिवाद करता
दोनों हाथ उठाए आत्मसमर्पण की मुद्रा में
मैं निकल आता बाहर...खुले मैदान में मुझे देखकर
और सतर्क हो जाता है कौओं का कमाण्डर
देता वह कौओं को जल्दी-जल्दी आदेश-निर्देश....

मैं कौंओं का एकतरफा बहरापन और
सिर्फ उन्हें बोलते सुनते रहनें की अपनी निरीह नियति पर क्षुब्ध
अपनी असहाय सिथति का आकलन कर
हाथ उठाकर चीखता-सा और असमय बोलने के अपने अपराध को
स्वीकार करता-सा निरपराध
अब भी कहता कि- हां ! मैंने फेंके थे विचारों के ढेले
इन्कार नहीं कर रहा....पर तुमनें भी चलार्इ कम बो(गो)लियां
मारे कम जन ? शानित और व्यवस्था का ले-लेकर नाम.....
हां ! मैं स्वीकारता कि फेंके थे ढेले विचरों के
अपने भीतर असहमति का करता दु:साहस
पर सब कुछ सिर्फ नागरिक होने के लिए....
झूठा नहीं नागरिक-देखता-सुनता-समझता-सोचता-चुनता हुआ
गुस्साता पर ढेलों से बार-बार खींचता हाथ
हां ! स्वीकारता कि लगे जो तुमको विचारों के ढेले.....
सबने तुमको गौरैया के अंडों को
फोड़-फोड़कर खा जाते देखा......

कौए तो शायद और गुस्सा हो उठे तबसे
लड़ाकू विमान की तरह आवाजों की बमबारी करते
मेरे सिर के ऊपर...नीचे तक मंडराते
और लो...यह उसनें अपनी दंभी हिंसक चोच भी मार दी
लोकतंत्र है तो क्या सत्ता के मद में...संगठन में...
बहुमत में है कौआ-कुछ ऐसे कि जैसे भरी सड़क पर
बरस रही लाठियां पुलिस की.....

और मैंने भी फिर उठा लिया है ढेला
गुस्साते कौओं पर....और चीखना कौओं का भी तेज हो गया
ढेले ऐसे विचारों के कि देश अभी आजाद नहीं हुआ
देह अगर आजाद हुआ तो और नहीं कुछ-
मन,बुद्धि ,विचार,भाव और कल्पना.......
पहचान रहा कि कहता तो स्वयं को दिल्ली का ही कौआ
पर लन्दन का....यदि होता कौआ दिल्ली का
पहचानता अपने लोगों को और विरुद्ध अपने ही हित के
नागरिकों को लोकतंत्र की उलट दिखाते
औरों का हिस्सा कुछ जन मिलकर खाते
अपनों का ही खाते—और उड़ाते ...और बीटते कौए
ये कौए तो दिल्ली में पर दिल्ली के भी नहीं
न्याय की भाषा में रचते अन्याय का विषाक्त इतिहास
कहने को ही अनुशासन और व्यवस्था के कर्ता
पर सच में तो भोग-रोग,शराब-साकी की डूब मचाते खूब अपहर्ता....

लगता ह ैअब और क्षुब्ध हैं कौए
मेरा अपने ही खिलाफ यह बड़-बड़ सुनकर
और तेज संगीनों जैसी हिलती उनकी चोंच....
उनकी बढ़ती कर्कश चीख के साथ
मेरा भी बढता जा रहा विचारक गुस्सा
देख रहे हाथें में क्या है मेरे
यह ढेले जो बंधे हुए से शब्द तीखे विचारधार किनारों वाले
खींचकर मारूंगा मैं भी यदि चुप नहीं हुए तो
तू तो केवल चयनित घोषित वुद्धिमान मात्र है समझदार नहीं है
अर्थ की अनर्थकारी इतिहास की विडम्बना से चयनित
चयनक को तू मूर्ख समझता और बनाता.....

वैसे ही तो मैं भी नागरिक जैसे तुम
मैं अब भी वापस न लेता कहता यह
हौए हो तुम कौए-जो भटके इतिहास-समय में
रोटियां खोदते श्रमजीवी जन की न फुरसत का लाभ उठाकर
सिर,कन्धे और पीठ नोचते
कांव-कांव से भरते आसमान
क्षितिज तक धौंस जमाते...तनिक नहीं शरमाते
सेवा के अवसर में सत्ता-मदमाते...

शुक्रवार, 22 जून 2012

जीवनोत्तर विमर्श.....


जीवनोत्तर विमर्श.....

मैं एक देह हूं जिन्दा फिर भी
मेरी चिन्ता यह कि मेरी मृत्यु के पश्चात
विचारपूर्ण ढंग से मेरी देह के साथ
होना कैसा चाहिए अच्छा कि्रया-कर्म.....

पहला विचार तो यह कि
क्या ही अच्छा होता यदि मैं ऐसे ही
खुली हवा में छोड़ दिया जाता मरनें पर
दूर-दूर तक धरती होती...आसमान भी ऊपर
और कोर्इ मनुष्य न होता(अ)शानित के लिए......

तब भी मरा सड़ जाना तो तय है-जानते हैं जीववैज्ञानिक
कि भोजन हूं तो मैं भी-कि बच्चे ! गिद्ध और कौओं से
यदि तुम बच भी जाते हो तो
हमारे जाने-पहचाने कीटाणुओं से बच भी पाओगे कैसे !
तो न बचूं-मेरा जाता ही क्या जो
छोड़ चला जाने पर कोर्इ ले-ले !
जीवन भर मैं खाता रहा जीव-सम्पदा
मरनें पर वे खा जायं तो ही है अच्छा !

यह तो अच्छा ही रहेगा
सहमत भी होता-सा पाता हूं
किसी भी भूखे का भोजन बन जाना सबसे अच्छा
लेकिन मैंने सुना कि नहीं कहीं ऐसा है निर्जन
जहां नहीं मनुष्य दूसरा दूर-दूर तक
यह भी कि ये कीटाणु बहुत होते हैं गन्दे
खाते समय सड़ा-सड़ाकर फलाते हैं दुर्गन्धों को
ते यह जिन्दा मनुष्य की घ्राणेनिद्रयों के
होगा विरुद्ध तो निश्चय ही विद्रोह जो होगा नहीं बचूंगा
डाक्टरगण भी सहमत होंगे निश्चय
नहीं सह सकेगे तो नष्ट के लिए
हिन्दू हाथ जला ही देंगे
और मुसलमान जो मुझे ढक देंगे कब्र में और र्इसार्इ
तो ऐसे ही बच पाएंगे सड़ने वाले संकट से वे......

लेकिन मजा तो ऐसे में ही आएगा कि
जैसे भी इस समय सोचकर आ रहा मजा अब से ही
कि सोचूं कि यह धरती भी मौत से
होगी हिन्दू या मुसलमान-र्इसार्इ.....

जलते हुए आग के गोलों से ठंडी हो निकली धरती
जन्म से तो हिन्दू ही है विश्वासों में
दशरथ को फल दाता राम-पिता भी अगिन महोदय ही थे
जीवन का जो कुछ भी सब निकला है आग से-
वैज्ञानिकों का समर्थन दिलाते हिन्दू होंगे खुश.......

पर मेरी तो चिन्ता ही दूसरी
यदि धरती की मौत भी होगी
तो वह मरेगी मौत कौन-सी !
हिन्दू की या मुसलमान सरीखी ?
क्या वह किसी जलते सूरज में जाकर जल जाएगी !
या वह ठंडी होते-होते जीवन का ही बन जाए्रगी कब्र ?
जे भी हो निकली तो वह है आग से ही
फिर तो मैं अत्यन्त हो रहा हुलसित
मुसलमान और र्इसार्इ के पूर्वज जीवन-अणु भी आग-पुत्र हैं
मरें मौत चाहे जो.....

फिर तो यह भी सोच लिया कि
हर हिन्दू या सिक्ख-र्इसार्इ
मुसलमान,पारसी,बौद्ध-जन
और सभी माक्र्सीय नासित-जन
सिद्धान्तत: सब ही हैं जन्म से हिन्दू
और प्रश्न मौत धरती की तो
यह धरती यदि
फिर आग के गोलों में ही लय न हुर्इ
ठंडी हो गयी कब्र सरीखी
त्ब तो सारे हिन्दू भी मौत मरेंगेे
मुसलमान और र्इसार्इ ही की
पर यदि मैं हिन्दू होता तो
सोच-सोचकर ख्ुश यह होता
क्योंकि यह दुनिया तो मरनी है एटम बम से ही
फिर तो कोर्इ धर्म-जाति हो
सब मनुष्य-जन मरेंगे निश्चय
एक हिन्दू की ही मौत !
   

पिता-अपराध सो-च-ते हुए....

तुम डर रहे हो
क्योंकि तुम्हें डरते रहने के लिए कहा गया था
इसके पहले कि तुम स्वयं कुछ सोचो और रचो
तुम्हें भी सौंपी गयी थी एक दुनिया
पहले से भी रची और सोची गयी ।

तुम सुविधाओं में और सुरक्षाओं में पले हो
तुम्हें जहरीले पौधों और जन्तुओं की पहचान करायी गयी है
तुम्हें सौंपी गयी हैं अनेक अव्याख्यायित वर्जनाएं
ताकि तुम उन्हें समझ पाने तक बचे रह सको....
इसतरह तुम एक उत्पाद हो पिछली पिता-पीढ़ी की समझदारी के......
तुमने जीने की आदतें सीखी हैं और कला
तुमनें डर सीखें हैं और दूसरों द्वारा विरासत में मिले हुए विश्वास.....

तुम कल तक बच्चे थे और आज बनने जा रहे हो पिता
तुम एक अवसर हो डरनें और न डरने के नए चयन के लिए
तुम एक जैविक पिता ही नहीं हो
तुम एक सांस्कृतिक और साभ्यतिक पिता भी हो
एक दुर्लभ अवसर हो नए आरम्भ के लिए.......

उठो ! यह तुम्हारे सोने का वक्त नहीं है ,सोचने का है
बहुत हो लिया अब अपने छत के ऊपर
खुली हवा में निकल आओ
यदि छत न हो ता मैदान में......

सबसे पहले अपने नाम के बारे में सोचना है तुम्हें
और यह किसी भी भाषा का हो सकता है शब्द
इसे संज्ञा भी कहते हैं.....

संज्ञा हर भाषा के वे शब्द होते हैं
जो दूसरी भाषाओं में भी जाकर बनें रहते हैं अपरिवर्तनीय
जिनका नहीं किया जा सकता कोर्इ अनुवाद
ये शब्द आते-जाते हैं बस उधार यूं ही...ऐसे ही
देश और भाषा से पक्षिओं सरीखे
जन-जन से ज्यों पेड़-पेड़ से उड़ते रहते और बैठते.....

अब सोचो - तुम क्यों हो राम !
यधपि यह है ही सहज पर बात कठिन
हालांकि है भाषा की ही समस्या
कि तुम्हें राम ही क्यों कहा गया ?
जबकि पीटर ,डैनी ,रहीम,करीम-करीमन कुछ भी
कहा जा सकता था.....

अब सोचो कितने वर्ष उम्र है तुम्हारी
पांच वर्ष ! दस वर्ष ? बीस ? पच्चीस ? पचास ?
अच्छा तो तुम चालीस वषोर्ं से हो हिन्दू
और तुम पचास साल से मुसलमान
पर इतना ही नहीं
दस वर्ष पहले जन्में बच्चे को
बिना पूछे ही उससे तुमनें उसे बना रखा है हिन्दू ?
उसनें मुसलमान आठ वषोर्ं से
पांच वर्ष से उसनें सिक्ख 
ऐसे ही और-और.....

आखिर तुम हो कौन
होते कौन हो
किसी के होने के ऊपर
अपना होना थोप रहे जो !

श्रीमान मियां और पंडित जी !
पूछा तो नहीं था आप-आपने अपने-अपने बच्चों से
कि तुम जन्म लेना चाहते हो या नहीं !
तुम हिन्दू बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम गोरा या काला,अफ्रीकन या बि्रटिश बनना चाहते हो या नहीं ?
तुम अमुक भाषा-भाषी या देश होना चाहते हो या नहीं -
वैसे ही जैसे तुमसे नहीं पूछा था तुम्हारे पिताओं नें
हिन्दू या मुसलमान,हिन्दी-उदर्ू या तमिल बनाते हुए.......

यधपि आप हैं और होते हुए भी पिता
बिना पूछे स्वयं को उसका अपना पिता बताकर
उसकी नन्ही पीठ पर लद जाने वाले
उसके मन-मसितष्क पर संकीर्ण असिमताओं की इबारत लिख देने वाले....
जबकि हर पिता अपनी सन्तान के साथ
उसके जन्म के साथ ही कर देता है
एक प्राकृतिक अपराध
बिना पूछे एक नए मनुष्य जीवन को धरती पर लाकर
अपनी वासना और कामना की आड़ में
किसी निरीह शिकार की तरह घायल प्शु-सा पटक देना
रोग-शोक,दु:ख और मृत्यु की युद्धभूमि में
एक असमाप्त और अन्तहीन लड़ार्इ लड़ने के लिए.....

हां-हां महोदय ! पितृ-ऋण नहीं
पिता-एक प्राकृतिक अपराधी सन्तान का
भुगते जो उसके पालन-पोषण की सजा
सजा पूरी हो क्षमा मिल जाने तक.....

हां-हां महोदय । यह होगा आपका अपराध
एक पुत्र को जन्म देना या पुत्री को
उतना ही जितना एक रूत्री की बिना सहमति के
किए सम्पर्क पर होने वाली सार्वजनिक भत्र्सना बलात्कार की !

कि एक मानव-शिशु हमेशा ही होता है-
एक प्राकृतिक बलात्कार का शिकार और परिणाम
चहे वह विवाहित दम्पति से जन्मा हो या फिर अवैध सम्बन्ध से....
दूसरा बलात्कार कि उसको दे दिया एक नाम
तीसरा कि बिना पूछे ही उससे दे दिया एक धर्म
और उसका पिता होने का करते हुए दुरुपयोग
लगे पीटनेढालने उसे आतंकवादी अनुशासन में
अपनी सनकों की शिक्षा का पाठ पढ़ाते हुए
अपने र्इश्वर और खुदा को भी बुला लिया
अपने बलात्कार के परिणाम से अपने होने का 
अनधिकृत हिस्सा मांगने....
जाओ पिता ! अब भी समय है कि
उसके उगनें में हस्तक्षेप न करते हुए
संकीर्णताओं से परे की उदारता के साथ
उसे फूलने-फलने और विकसने दो
होने दो मनुष्य-उसे छोटा मत समझो
मत बनाओं उसे अपने अहंकार का चौकीदार
बौनसार्इ या फिर निजी जागीर उसे
क्योंकि वह ह ैअब तक के सम्पूर्ण मानव-जाति के वैशिवक
उत्तराधिकार में मिले अनुभवों और सूचनाओं से समृद्ध
तुम तक बूढ़ी हुर्इ मानव-जाति का सहज उत्तराधिकारी !
तुम्हारा शिशु होते हुए भी अब तक की सभ्यता का
तुमसे भी बूढ़ा सदस्य मनुष्य होगा वह
वह ज्ञान-वृद्ध शिशु !

जाओ पिता ! और मांगो उस नवजात मनुष्य से
घुटने टेककर,उसके मस्मत को चूमते हुए मांगो क्षमा
यदि तुम मां भी हो चाहे
यदि तुम पिता भी हो चाहे
यदि तुम र्इश्वर,खुदा या गाड भी हो चाहे......

उसे चूमो ! उसे पुकारो ! और उससे मांगों क्षमा
उसके साथ खेलते और उसे प्रसन्न करते हुए
उसके लिए दूध और रोटियों की खोज में
भटको सारी धरती !

और यह मत भूलो कि
एक जिन्दा मनुष्य की हत्या कर देने से
अधिक भयानक पाप है
एक नए मनुष्य के जीवन को
उसकी इच्छा के विरुद्ध बिना पूछे इस धरती पर
भूख ,रोग और संकटों से लड़ने के लिए बुला लेना.....

उसके सामने टेककर घुटनें
उससे मांगते हुए क्षमा
उसे धीरे से अपनी बाहों में उठाओ !
शायद वह हंस दे और तुम्हारी सजा
पूरी तरह माफ कर दी जाय......






कि आयेगी सरकार.....

   
लोकतंत्र की मौज मनाती हस्ती जड़,
और तंत्र का शोक मनाती बस्ती जड़
इतने जड़ कि जैसे नदी किनारे बिखरे पत्थर
इतने जड़ कि जितना मौन पहाड़......
अन्तहीन प्रतीक्षा में सोयी अलसायी.......

पहले जैसे कि वे देख रहे होते थे
सूना आसमान कि
आयेगी बरसात और बादल.......

कुछ वैसे ही
हां कुछ वैसे ही
जैसे आने वाली होती है बारात
नहीं गयी आदत जो
वह अलाव संस्कृति
घोर प्रतीक्षा की सूनी पत्तलें बिछाए
धैर्य-धीर से
कि आयेगी सरकार
कि कर देगी सब काम
कि डाक्टर और मजदूर बनकर
हाथ पर हाथ धरे बैठे
हो जायेगा काया पलट
बन जायेंगे रास्ते -मकान
खुल जायेंगे बन्द दरवाजे और
बन्द खिड़कियां सुख की
कि आयेगी सरकार
जैसे नहर में पानी
जैसे बिजली,जैसे सड़क
जैसे गर्मी और बरसात......